Search This Blog

Saturday, July 29, 2017

फिल्‍म समीक्षा : मुबारकां



फिल्‍म रिव्‍यू
मजेदार मनोरंजक फिल्‍म
मुबारकां
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले कुछ सालों में कॉमेडी ने डबल मीनिंग डॉयलॉग,यौनाचार की मुद्राओं और देहदर्शन का रूप ले लिया है। निर्माता सेक्‍स कॉमेडी की हद तक गए,जिन्‍हें दर्शकों ने ही दरकिनार कर दिया। गोविंदा की लोकप्रियता के दिनों में ऐसी फिल्‍मों का एक दौर था, जब डेविड धवन,अनीस बज्‍मी और रुमी जाफरी ने मिलकर दर्शकों को खूब हंसाया। उनकी फिल्‍में शुद्ध हास्‍य को लकर चलती थीं और स्‍थानों,स्थितियों और किरदारों की दिलचस्‍प भिड़तों से हंसी के फववारे छोड़ती थीं। दर्शक भी भगते और लोटपोट होते रहते थे। फिर एक ऐसा दौर आया कि इनकी ही फिल्‍मों में द्विअर्थी संवाद घुस आए और संकेतों में सेक्‍स की बातें होने लगीं। और लोकप्रियता की लकीर पर चलते हुए कुछ निर्माता-निर्देशक सेक्‍स कॉमेडी की गलियों में भटक गए। एक अंतराल के बाद अनीस बज्‍मी की वापसी हुई है। वे नानसेंस ड्रामा लेकर आए हैं,जिसमें हास्‍यास्‍पद स्थितियां बनती हैं और हम फिर से ठहाके लगाते हैं।
हिंदी फिल्‍मों की यह लोकप्रिय मनोरंज‍क धारा सूख सी गई थी। अनीस बज्‍मी ने अपने पुराने दोसत और भरोसेमंद अभिनेता अनिल कपूर के साथ मुबारकां का जबरदस्‍त कंफ्यूजन बुना है। करतार सिंह बने अनिल कपूर की समाधान की हर युक्ति नईं मुश्किलों में बदल जाती है। चरण और करण बने अर्जुन कपूर की हर नई उम्‍मीद रिश्‍तों के नए समीकरणों में उलझ जाती है। थोड़ी देर के लिए लगता है कि सभी पागल हो गए हैं और अजीगोगरीब हरकतें कर रहे हैं। दरअसल,लेखक और निर्देशक यही चाहते हैं कि कंफ्यूजन से दर्शकों की सांस फूलने लगे और फिर वह पंक्‍चर हो एक राहत मिले। हंसी छूटे। न हंसने की कसम खाकर आप यह फिल्‍म देखने जाएं और यकीन करें कि कुछ देर के बाद आप मुस्‍कराएंगे,फिर खी-खी करेंगे और फिर ठहाके लगाएंगे। लंबे अर्से के बाद फिर से ऐसी फिल्‍म आई है। निश्चित ही इसका पूरा श्रेय अनीस बज्‍मी को मिलना चाहिए।
फिल्‍म में दो अर्जुन कपूर हैं और एक अनिल कपूर हैं। वे एक के चाचा और दूसरे के मामा हैं। उन्‍होंने ही उनके बचपन में ऐसा पांस फेंका था कि जुड़वां भाइयों चरण और करण में एक भांजा और दूसरा भतीजा बन गया। अकेले अनिल कपूर दो-दो अर्जुन कपूर से दूने प्रभाव के साथ हर सीन में आते हैं। अपने उलजलूल आयडिया से वे सिचुण्‍यान को संभालने के बजाए और उलझा देते हैं। अनिल कपूर ने जिस एनर्जी और कंफीडेंस के साथ करतार सिंह के किरदार को निभाया है,वह उन्‍हें फिल्‍म के सेंटर में ले आता है। इस कॉमेडी के सेंटर फारवर्ड प्‍लेयर हैं तो पवन मल्‍होत्र और रत्‍ना पाठक शाह बैक और गोली की भूमिका में है। तीनों के बीच का ताना-बाना निर्देशक के सामने स्‍पष्‍ट है। उन्‍हें मालूम है कि कब किसे कॉमेडी की गेंद देनी है। कुछ दृश्‍य तो बगैर संवाद के हैं। क्रिया-प्रतिक्रिया से तीनों कलाकार उन दृश्‍यों को रोचक बनाते हैं। तीनों कलाकारों की केमिस्‍ट्री ही फिल्‍म की जान है। पवन मल्‍होत्रा अपने लाउडनेस में भी एक लय बनाए रखते हैं। उनकी भंगिमाएं देखते ही बनती हैं।
अर्जुन कपूर दोहरी भूमिकाओं में जुचे हें। उन्‍होंने करण और चरण को अलग-अलग अंदाज देने की कोशिश की है। इसमें वे कहीं-कहीं चूकते हैं। अन्‍य किरदारों के सपोर्ट की वजह सक उनकी कमियां नजरअंदाज हो जाती है। बतौर एक्‍टर उन्‍हें अगली फिल्‍मों में संभलना होगा और थोड़ा खयाल रखना पड़ेगा। लडकियों में अलियाना डिक्रज और नेहा शर्मा अच्‍छी लगी हैं। अथिया शेट्टी के साथ अभी दिक्‍कतें हैं। वह अपनी लंबाई के साथ एडजस्‍ट नहीं कर पाती हैं। छोटी भूमिकाओं में आए ललित परिमू और राहुल देव की मौजूदगी फिल्‍म की थीम के अनुकूल है। ललित परिमू के एक्‍सप्रेशन उल्‍लेखनीय हैं।
मुबारको मजेदार मनोरंजक फिल्‍म है।
अवधि- 148 मिनट
*** तीन स्‍टार  

फिल्‍म समीक्षा : इंदु सरकार



फिल्‍म रिव्‍यू
इंदु सरकार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाह कमीशन की रिपोर्ट और भारत सरकार के तमाम विभागों के सहयोग और इनपुट के साथ बनी मधुर भंडारकर की इंदु सरकार देश आपात्‍काल के समय और दुष्‍परिणामों को नहीं पेश कर पाती। फिल्‍म में लंबा डिसक्‍लेमर है कि फिल्‍म में दिखाए सभी पात्र और घटनाएं पूरी तरह से काल्‍पनिक हैं,वास्‍तविकता से कोई समानता होती है,तो वह मात्र एक संयोग होगा। कोई भी समानता,चाहे वह किसी व्‍यक्ति (मृत या जीवित),पात्र या इतिहास से हो,पूरी तरह काल्‍पनिक है। इस डिसक्‍लेमर के बाद कुछ किरदारों का संजय गांधी,इंदिरा गांधी,कमलनाथ,जगदीश टाइटलर की तरह दिखना कांग्रेस के शासन में लगे आपातकाल का संकेत तो देता है,लेकिन बगैर नाम के आए इन चेहरों से फिल्‍म का प्रभाव पतला हो जाता है। संदर्भ और विषय की गंभीरता नहीं बनी रहती। हालांकि फिल्‍म में किशोर कुमार,तुर्कमान गेट और नसबंदी जैसे वास्‍तविक आपातकालीन प्रसंग आते हैं। 20 सूत्री कार्यक्रम और पांच सूत्री कार्यक्रम का जिक्र आता है,फिर भी फिल्‍म आपातकाल के दौर में घुसने से बचती है। यह फिल्‍म आपातकाल के हादसों और फैसलों से रोंगटे नहीं खड़ी करती,क्‍योंकि फिल्‍मकार गतिविधियों को किनारे से देखते हैं।
इंदु सरकार ऊपरी तौर पर अनाथ इंदु की कहानी है। आत्‍मविश्‍वास की कमी से ग्रस्‍त और बोलने में हकलाने वाली संवेदनशील इंदु की मुलाकात नवीन से होती है। उसकी जिंदगी पटरी पर आती लगती है कि पति और पत्‍नी की सोच का वैचारिक फर्क उन्‍हें अलग कर देता है। सिस्‍टम के मामली पुर्जे नवीन सरकार और संवेदनशील कव‍यित्री इंदु सरकार के बीच की दूरियों और समझ के दरम्‍यान में ही आपात्‍काल को समेटने की कोशिश में मधुर भंडारकर विषय के साथ न्‍याय नहीं कर पाते। फिल्‍म छोटी हो जाती है। यह इंदु की साधारण लड़ाई बन कर रह जाती है,जिसकी पृष्‍ठभूमि में आपातकाल है। इंदु सरकार अंतर्आत्‍मा की आवाज सुनती है और शोषितों व दमितों के साथ आ खड़ी होती है। वह सिस्‍टम की ज्‍यादतियों के खिलाफ खड़ी होती है। पर्चे बांटती है। जेल जाती है और पुलिस अत्‍याचार का शिकार होती है। आपातकाल के संगठित विरोध के लिए सक्रिय संगठनों में मधुर भंडारकर को वंदे मातरम बोलते राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता मात्र दिखते हैं। छात्र युवा वाहिनी,जेपी और अन्‍य नेताओं का पुरजोर उल्‍लेख नहीं होता। केवल नाना जी सक्रिय दिखते हैं। यहां मधुर की सोच एकांगी हो जाती है। फिल्‍म भी पंक्‍चर होती है।
यों,अभिव्‍यक्ति की आजादी और सत्‍ता के दमन के मसलों का छूती यह फिल्‍म आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। इस फिल्‍म का सामयिक संदर्भ भी बनता है। कला और सृजन में यह खूबी होती है वह ध्‍येय से इतर भावों को भी व्‍यक्‍त करती है। संजय छेल के अनेक संवाद आज के संदर्भ में उपयुक्‍त लगते हैं। अभी जिस तरह से सत्‍तारूढ़ पार्टी के प्रभाव में एक सोच,वाद और विचार पर सभी को अमल करने के लिए बाध्‍य किया जा रहा है,वह भी अघोषित आपातकाल ही है। मधुर भंडारकर की राजनीतिक निकटता से सभी परिचित हैं। इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि इंदु सरकार सत्‍ता और जनता के बीच के रिश्‍ते को वस्‍तुनिष्‍ठ तरीके से समझने की कोशिश करती है। हां,वे आपातकाल की पृष्‍ठभूमि पर एक सार्थक फिल्‍म बनाने से चूक गए। या यों कहें कि वर्तमान समाज के दबावों के कारण वे खुल कर अपनी बात और राय नहीं रख सके। फिल्‍मकारों के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वे नाम और प्रसंग के उल्‍लेखों के बिना कैसे समसामयिक विषयों पर फिल्‍में बनाएं। सिर्फ सीबीण्‍फसी ही नहीं है। देश में किसी को भी ठेस लग सकती है। कोई भी आहत हो सकता है।
इंदु सरकार की शीर्षक भूमिका में कीर्ति कुल्‍हाड़ी ने संजीदा काम किया है। उन्‍होंले किरदार की परेशानियों को बखूबी पर्दे पर जिय है। नवीन सरकार के रूप में तोता राय चौधरी का योगदान सराहनीय है। बगैर नाम लिए संजय गांधी के रूप में नील नितिन मुकेश ने व्‍यक्ति की आक्रामकता को पकड़ा है। मधुर भंडारकर की अन्‍य फिल्‍मों की तरह इंदु सरकार भी एक गंभी और जरूरी मुद्दे का टच करती है। वह उससे टकराती और उलझती नहीं है।
अवधि-139 मिनट
*** तीन स्‍टार   

रोज़ाना : रिलीज तक व्‍यस्‍त रहते हैं निर्देशक



रोज़ाना
रिलीज तक व्‍यस्‍त रहते हैं निर्देशक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों रणबीर कपूर के पिता ऋषि कपूर जग्‍गा जासूस के निर्देशक अनुराग बसु पर भड़के हुए थे। उन्‍होंने अनुराग बसु की लेट-लतीफी की खिंचाई की। बताया कि फिल्‍म की रिलीज के दो दिन पहले तक वे पोस्‍ट प्रोडक्‍शन में लगे हुए थे। उन्‍होंने फिल्‍म किसी को नहीं दिखाई। और फिल्‍म रिलीज हुई तो ऋषि कपूर समेत कई दर्शकों को पसंद नहीं आई। ऋषि कपूर की शिकायत का आशय यह था कि अगर वक्‍त रहते शुभचिंतक फिल्‍म देख लेते तो वे आवश्‍यक सुधार की सलाह देते। तब शायद फिल्‍म की ऐसी आलोचना नहीं होती। कहना मुश्किल है कि क्‍या होता? अगर रिलीज के पहले दिखा और ठोक-बजा कर रिलीज की सारी फिल्‍में सफल होतीं तो ऋषि कपूर की कोई भी फिल्‍म फ्लॉप नहीं हुई होती। फिल्‍मों की सफलता-असफलता बिल्‍कुल अलग मसला है। उस मसले से इतर यह आज की सच्‍चाई है कि तकनीकी सुविधाओं के चलते निर्देशक और उनकी तकनीकी टीम अंतिक क्षणों तक फिल्‍म में तब्‍दीलियां करती रहती हैं। उनकी यही मंशा रहती है कि कोई कमी या कसर ना रह जाए।
मुमकिन है इससे फिल्‍म को संवारने में मदद मिलती हो। फिलम को अंतिम रूप देने के पहले निर्देशक सब कुछ ठीक कर लेना चाहते हैं। यह लगभग किसी पार्टी या अवसर के लिए सजने के समान है। आप आईने के सामने खड़ी हो जाती हैं और अपनी एक-एक लट या साड़ी की चुनट ठीक करने लगती हैं। चेहरे पर लिपस्टिक से लेकर बिंदी और अन्‍य मेकअप ठीक करने लगती हैं। आईने के सामने से हटने का मन नहीं करता और इवेंट के लिए देर हो रही होती है। या फिर किसी यात्रा पर निकलने के पहले अंतिम समय में पैकिंग करते हैं और हड़बड़ी में सूटकेश बंद नहीं होता। यकीन मानें फिल्‍मों की रिलीज के पहले का असमंजस इनसे कई गुना बड़ा होता है। निर्देशक चाहता है कि वह मुकममल फिल्‍म पेश करे। इस कोशिश में ज्‍यादातर निर्देशक अपने फिल्‍म के प्रचार से हाथ खींच लेते हैं। उन्‍हें लगता है कि मीडिया और दर्शक का इंटरेस्‍ट तो स्‍टार में रहता है। अगर स्‍टार इंटरव्‍यू दे रहे हैं तो उसका काम हो रहा है। फिल्‍म प्रचारित हो रही है। सच्‍चाई और प्रभाव इससे अलग है।
किसी भी फिल्‍म के बारे में लेखक और निर्देशक ही सबसे ज्‍यादा विस्‍तार से बता सकते हैं। वे फिल्‍म के विषय और संदर्भ के बारे में बता सकते हैं। स्‍टार आने रोल के बारे में बता सकते हैं,लेकिन उनकी नकेल कसी रहती है। उन्‍हें हिदायत रहती है कि वे कुछ ऐसा न बता जाएं कि फिल्‍म की कहानी पता चल जाए। इस संकोच में पूरे इंटरव्‍यू मीडियाकर्मी को टहला रहे होते हैं। अब चूंकि मीडिसकर्मी भी अनुभवों से जान गए हैं कि स्‍टार कुछ बताएगा नहीं तो वे भी टहलते रहते हैं। ऐसे इंटरव्‍यू एंटअेन तो करते हैं,लेकिन फिल्‍म के बारे में नहीं बताते। वे फिल्‍म का दर्शक नहीं तैयार करते।
मेरा मानना है कि केवल लेखक और निर्देशक ही फिल्‍म के बारे में संदर्भगत जानकारी दे सकते हैं। उन्‍हें आगे आना चाहिए। समय निकालना चाहिए। रिलीज के दो हफते पहले से खुद को खाली रखना चाहिए। वर्ना वही होता है जल्‍दबाजी में मांग के बदले कनपटटी में सिंदूर डाल दिया जाता है।

Friday, July 28, 2017

सात सवाल : तिग्‍मांशु धूलिया



सात सवाल
तिग्‍मांशु धूलिया
-अजय ब्रह्मात्‍मज
तिग्‍मांशु धूलिया ने आईएनए ट्रायल पर राग देश फिल्‍म निर्देशित की है। यह फिल्‍म लाल किले में सहगल,ढिल्‍लों औौर शाहनवाज पर चले मुकदमे का पर आधारित है। राज्‍य सभा टीवी ने इसका निर्माण किया है।
-राज्‍य सभा टीवी के लिए राग देश बनाने का संयोग कैसे बना?
0 ऐसी कोई फिल्‍म मेरे एजेंडा में नहीं थी। राज्‍य सभा टीवी के गुरदीप सप्‍पल मेरे पास दो प्रोजेक्‍ट लेकर आए- एक सरदार पटेल और दूसरा आईएनए ट्रायल। उन्‍होंने पूछा कि बनाना चाहोगे क्‍या? मैंने तुरंत कहा कि सरदार पटेल तो मैं कर चुका हूं। आईएनए ट्रायल पर काम करूंगा। मेरी इतिहास में थोड़ी रुचि है। और फिर मुंबई के सेटअप में मुझे ऐसी फिल्‍म बनाने के लिए कोई णन देता नहीं।
- आप ने इसे किस तरह शूट किया। फार्मेट का चुनाव कैसे किया?
0 हम ने स्क्रिप्‍ट तो 6 घंटों के 6 एपीसोड के हिसाब से लिखी थी। शूट भी वैसे ही किया। एडिट पर हम ने यह फिल्‍म निकाली।
-यह हमारे निकट अतीत की बात है,जिसके साक्ष्‍य मौजूद हैं। फिल्‍म के रूप में लाने की कैसी चुनौतियां रहीं?
0 फिल्‍म के 99 प्रतिशत दृश्‍य दस्‍तावेज के रूप में मौजूद हैं। पीरियड फिल्‍म में तकनीकी टीम अपना हुनर दिखाने लगती है। उसमें कंटेंट छूट जाता है। मेरी चुनौती रही कि यह फिल्‍म आज के दर्शकों से संवाद कर सके। अगर संवाद स्‍थापित हो गया तो फिल्‍म वर्क करेगी। नहीं तो लोग म्‍यूजिकल देख आएंगे।
-स्‍वाधीनता आंदोलन में सुभाष चंद्र बोस और उनके आजाद हिंद फौज नायक के तौर पर नहीं उभरते। जापान और जर्मनी से उनका सहयोग लेना ऐतिहासिक नजरिए से सकारात्‍मक रूप में नहीं देखा जाता। ऐसे में...
0 हम एक टिप्‍पणी से सुभाष चंद्र बोस की भूमिका से इंकार नहीं कर सकते। जापान और आजाद हिंद फौज के बीच करार था कि जीती गई जमीनें आजाद हिंद फौज को मिलती जाएंगी1 ऐसा नहीं था कि अंग्रेज को हटाकर जापनी रूल करने लगेंगे। दूसरी बात यह है कि बोस मूल रूप से कांग्रेसी थे। विश्‍व युद्ध के समय वे कांग्रेस से अलग हो गया। उस इतिहास से सभी परिचित हैं। गांधी जी ने भी तो 1942 में भारत छोड़ो आदोलन के  समय करो या मरो का नारा दिया। बोस के सामने स्‍पष्‍ट था कि कांगे्रस के अंतर्गत ही आजादी के बाद काम करेंगे।
-देश की आजादी में आजाद हिंद फौज की कितनी बड़ी भूमिका मानते हैं?
0 आजाद हिंद फौज नहीं होता तो 1947 में हमें आजादी नहीं मिलती। आजाद हिंद फौज की जंग 1857 के विद्रोह की परंपरा में है। आजाद हिंद फौज के ट्रायल के खत्‍म होने के बाद मुबई में नौसैनिकों का विद्रोह हुआ। अंग्रेजों को फैसला लेना पड़ा।
-क्‍या राग देश के बाद हम अपने इतिहास पर फिल्‍में बनाने की शुरूआत करेंगे?
0हमारे पास बजट की समस्‍या है। हालीवुड में इतिहास के अध्‍यायों पर बनी फिल्‍मों की तरह राग देश भी रोचक फिल्‍म होगी। हम ने अपनी सीमाओं के बावजूद बेहतरीन काम करने की कोशिश की है। मैं बहुत खुश हूं इस काम से।
-राग देश टायटल कैसे चुना गया?
0 हम ने बहुत सारे टायटल पर सोचा। हम ने इस फिल्‍म को देश के गीत के रूप में देखा। संगीत में एक देश राग है। वहां से हम ने यह टायटल लिया।

दरअसल : ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत



दरअसल...
ट्रेलर और गानों के व्‍यूज की असलियत
-अजय ब्रह्मात्‍मज

आए दिन रिलीज हो रही फिल्‍म के निर्माता और अन्‍य संबंधित निर्देशक व कलाकार सोशल मीडिया पर बताते रहते हैं कि उनके ट्रेलर और गानों को इतने लाख और करोड़ व्‍यूज मिले। तात्‍पर्य यह रहता है कि उक्‍त ट्रेलर या गाने को संबंधित स्‍ट्रीमिंग चैनल पर उतनी बार देखा गया। ज्‍यादातर स्‍ट्रीमिंग यूट्यूब के जरिए होती है। व्‍यूज यानी दर्शकता बताने का आशय लोकप्रियता से रहता है। यह संकेत दिया जाता है कि रिलीज हो रही फिल्‍म के ट्रेलर और गानों को दर्शक पसंद कर रहे हैं। इससे निर्माता के अहं की तुष्टि होती है। साथ ही फिल्‍म के पक्ष में माहौल बनाया जाता है। दर्शकों को तैयार किया जाता है। लुक,टीजर,ट्रेलरऔर गानों को लकर ऐसे दावे किए जाते हैं। आम दर्शकों पर इसका कितना असर होता है? क्‍या वे इसके दबाव में फिल्‍म देखने का मन बनाते हैं? अभी तक कोई स्‍पष्‍ट अध्‍ययन या शोध उपलब्‍ध नहीं है,जिससे व्‍यूज और दर्शकों का अनुपात तय किया जा सके। सफलता का अनुमान किया जा सके।
टीजर,ट्रेलर या गाने आने के साथ फिल्‍म से जुड़े सभी व्‍यक्ति सोशल मीडिया पर एक्टिव हो जाते हैं। वे ट्वीट और रीट्वीट करने लगते हैं। उनके नुमांइदे मीडियाकर्मियां से आग्रह करते हैं वे उनके बो में ट्वीट करें। साथ ही टीजर,ट्रेलर और गानों के लिंक भी दें। फिल्‍मी हस्तियों के गुडबुक में बने रहने या निकटता पाने की लाासा और भ्रम में अनेक मीडियकर्मी फिल्‍म यूनिट के सदस्‍यों से अधिक सक्रियता दिखाते हैं। ने तरीफ के शब्‍दों के साथ उक्‍त्‍टीजर,ट्रेलर और गाने के लिंक ट्वट कर देते हैं। यह एक ऐसी नादानी है,जिसमें फिल्‍मों और फिल्‍म के निर्माताओं का सीधा फायदा होता है। मीडियाकर्मी अप्रत्‍यक्ष प्रचारक बन जाते हैं। उन्‍हें पता भी नहीं चलता और वे फिल्‍म की कमाई में सहायक हो जाते हैं। अगर आप के ट्वीट की वजह से आपके फॉलोअर उक्‍त वीडियो को देखते हैं तो कहीं न कहीं रूट्रीमिंग नेटवर्क से मिल रही कमाई में आप का योगदान हो जाता है। एक तरीके से मीडियाकर्मी रिटेलर की भूमिका में आ जाते हैं। अब कुछ मीडियकर्मियों की समझ में यह बात आई है तो उनकी सक्रियता कम हुई है। 

उचित तो यह होगा कि जिस फिल्‍म ,फिल्‍मकार या कलाकार के काम में विश्‍वास हो और उसे सपोर्ट करने का मन करे तो हमें अवश्‍य लिंक के साथ ट्वीट या रीट्वीट करना चाहिए। सिर्फ सराहना से काम चल सकता हो तो ज्‍यादा बेहतर।यह भी रोचक तथ्‍य है कि किसी व‍ीडियो को मिली संख्‍यात्‍मक दर्शकता(व्‍यूज) वास्‍तव में दर्शकों में तब्‍दील नहीं होती। पिछले महीनों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे,जब किसी वीडियो को करोड़ों में दर्शक मिले,लेकिन बाक्‍स आफिस पर फिल्‍म का बुरा हाल रहा। दर्शक उस फिल्‍म को देखने थिएटर नहीं गए। करोड़ो दर्शकता के वीडियो की फिल्‍म की कमाई पहले दिन करोड़ रुपयों तक भी नहीं पहुंच पाई। भारतीय राजनीति से उदाहरण लें तो किसी सभा में आई भीड़ इस बात का कतई संकेत नहीं होती कि उक्‍त उम्‍मीदवार चुनाव में जीत ही जाएगा। भीड़ की वजह उस दिन का वक्‍ता भी हो सकता है। या किसी और वजह से उस दिन की सभा में भीड़ उमड़ सकती है। यह भी ध्‍यान में रखना चाहिए कि किसी भी वीडियो को देखने के प्रत्‍यक्ष पैसे नहीं लगते। इंटरनेट या ब्रॉडबैंड के किराए में हो रहे खर्च सीधे जेब पर भारी नहीं पड़ते। अगर वीडियों के हर व्‍यू के लिए एक पैसा भी देने पड़े तो करोड़ों की दर्शकता लाखों तक भी रेंग कर पहुंचेगी। अभी तक भारत में पैसे देकर हर शो या वीडियो देखने की आदत आम नहीं हुई है।हर निर्माता और उसकी फिल्‍म यूनिट अपने प्रचारात्‍मक वीडियो की दर्शकता बढ़ा-चढ़ा कर दर्शक बटोरना चाहती है। उनकी इसचाहत को देखते हुए वीडियो स्‍ट्रीमिंग कंपनिया पैसे लेकर व्‍यूज बढ़ाने का काम करने लगी हैं। दर्शकों को छलने और झांसा देने की मुहिम जारी है।

फिल्‍म समीक्षा : पर्दे पर इतिहास के पन्‍ने



फिल्‍म रिव्‍यू
पर्दे पर इतिहास के पन्‍ने
राग देश
-अजय ब्रह्मात्‍मज

तिग्‍मांशु घूलिया की राग देश का बनना और सिनेमाघरों में रिलीज होना ही एक घटना है। राज्‍य सभा टीवी की इस पहल की तारीफ करनी चाहिए कि उन्‍होंने समकालीन इतिहास के एक अध्‍याय को फिल्‍म के रूप में पेश करने के बारे में सोचा। तिग्‍मांशु धूलिया ने आजाद हिंदी फौज के मेजर जनरल शाहनवाज खान,लेफिटनेंट कर्नल गुरबख्‍श सिहं ढिल्‍लों और लेफिटनेंट कर्नल प्रेम सहगल पर लाल किले में चले मुकदमे पर ही फिल्‍म केंद्रित की है। उस मुकदमें के बहाने आजादी की लड़ाई सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की भूमिका से भी हम परिचित होते हैं। इतिहास के पन्‍ने दृश्‍यों में सज कर पर्दे पर आते हैं और हम उस दौर की घटनाओं को देख पाते हें। तिग्‍मांशु धूलिया ने मुख्‍य रूप से वास्‍तविक किरदारों और मुकदमें के इर्द-गिर्द ही कहानी रखी है। उन्‍होंने कथा बुनने के लिए कुछ किरदार जोड़े हैं। उन पर अधिक फोकस नहीं किया है।
द्वितीय विशव युद्ध में जापना और जर्मनी की हार और ब्रिटेन की जीत के बाद आजाद हिंद फौज के सैनिकों को समर्पण करना पड़ा था। युद्धबंदी के तौर पर उन सैनिकों को देश के अलग-अलग जेलों में रखा गया था। आजाद हिंद फौज का नूतृत्‍व कर रहे शाहनवा,ढिलों और सहगल पर राष्‍ट्रद्रोह का मुकदमा चला था। इस मुकदमें का दस्‍तावेजीकरण तो हुआ है कि इस ऐतिहासिक घटना के बारे में इतिहास में नहीं पढ़ाया जाता। दरअसल,देश के स्‍वाधीनता आंदोलन में गांधी और नेहरु के नेतृत्‍व में कांगेस की भूमिका ही रेखांकित हो पाई है। कांग्रेस के आंदोलन और अभियानों के साथ भगत सिहं और सुभाष चंद्र बोस जैसे का्रतिकारियों और सेनानियों का भी योगदान रहा है। भगत सिंह को देश एक शहीद के रूप में याद करता है,लेकिन बोस को लेकर आम सहमति नहीं बन पाई है। आजादी के बाद सुभाष चंद्र बोस को किंवदंती और रहस्‍यपूर्ण व्‍यक्ति के रूप में तो पेश किया गया,लेकिन उनकी भूमिका का उचित मूल्‍यांकन नहीं हो सका। यह भी लगता है कि तत्‍कालीन संदर्भ में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका देशहित में रही हो,लेकिन इतिहास ने साबित किया कि जर्मनी और जापान से मदद लेने का उनका फैसला ऐतिहासिक रूप से गलत रहा। दोनों ही देश द्वितीय विश्‍वयुद्ध के खलनायक बन गए। खलनायकों का साथ लेने की वजह से सुभाष चंद्र बोस भी नायक नहीं रह गए। दूसरे कांग्रेस के शासन काल में कभी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका और योगदान को रेखांकित नहीं किया गया।
राग देश प्रकारांतर से सुभाष चंद्र बोस को एक संदर्भ देती है। मुकदमें के बहाने आजादी की लड़ाई में आजाद हिंद फौज की मंशा और मिशन की बातें उद्घाटित होती हैं। हमें यह भी पता चलता है कि उस समय देश के नेता और जनता की क्‍या सोच थी। तिग्‍मांशु धूलिया की ईमानदार कोशिश राग देश अतिहस के अनछुए प्रसंग को विश्‍वसनीयता के साथ पेश करती है। बजट की सीमाओं के कारण युद्ध के दृश्‍यों में रोमांच नहीं उभर पाया है। दूसरे यह भी चुनौती रही है कि मूल रूप से एक-एक घंटे के 6 एपीसोड के रूप में सोची और लिखी सामग्री से काट-छांट कर एक फिल्‍म निकालना। इस वजह से फिल्‍म कहीं-कहीं डीली और बिखरी नजर आती है। तारतम्‍य भी टूटता है।
कलाकारों में अमित साध ढिलों की अपनी भूमिका और आक्रामक किरदार की वजह से ज्‍यादा आकर्षित करते हैं। शाहनवाज खान की भूमिका में कुणाल कपूर मेहनत के बावजूद प्रभाव नहीं पैदा कर पाते। मोहित मारवाह की मौजूदगी पुरअसर है। लक्ष्‍मी की भूमिका में आई अभिनेत्री एक्‍सप्रेसिव और प्रभावशाली है। भूला भाई देसााई के रूप में केनी देसाई याद रह जाते हैं। इस फिल्‍म का कमजोर पक्ष कलाकारों का अभिनय है। मुमकिन है वे टीवी शो के विस्‍तार में सहयोगी किरदारों के साथ जंचते हों।
अवधि-137 मिनट
*** तीन स्‍टार

Wednesday, July 26, 2017

एक म्‍यूजिकल स्‍केच है जग्‍गा जासूस

एक म्यूज़िकल स्केच है 'जग्‍गा जासूस'
-अनुराग आर्य


कहानियो में दिलचस्पी पिता के एक दोस्त ने किताबे गिफ्ट कर के डाली। फिर कहानिया ढूंढ ढूंढ कर पढ़ने का शौक चढ़ा फिर कहानिया देखने का। उम्र कम थी और समांनातर सिनेमा के कुछ फिल्मे बच्चो के लिए वर्जित। दूरदर्शन ही एक खिड़की था उस दुनिया का.शहर में लिमिटेड सिनेमा हाल थे। पर जहाँ मौका लगता फिल्मे देखते। पिता अनुशासन वाले रहे फिल्मो से दूर फिर भी देहरादून स्कूलिंग ने नए दोस्त जोड़े और उनके जरिये नयी फिल्मे। मेडिकल कॉलेज एडमिशन गुजरात के सूरत में हुआ जहाँ इंग्लिश फिल्मो के दो सिनेमाघर होते , और एक थियेटर हॉस्टल के लड़को के मुफीद। तब तक शयाम बेनेगल ,मणि कॉल ,गोविन्द निहालिनी ,सत्यजीत रे ,गुरुदत्त ,चेतन आनद और राज कपूर के सिनेमा से वाकिफ हो चुके थे। सुधीर मिश्रा ,केतन मेहता भी इम्प्रेस करने लगे। सूरत के एक पिक्चर हॉल पर कभी कभी ओल्ड क्लासिक दिखलाता। मदर इण्डिया भी वही देखी। हॉस्टल के दोस्तों ने कई इंग्लिश क्लासिक से इंट्रोडक्शन करवाया ,और एक दोस्त ने ईरानी फिल्मो से। तब लगा कैमरे के जरिये कहानी कहने में कितनी ताकत है दूसरी जबान का आदमी भी वो समझ लेता है जो आप कहना चाहते है
 



एक गाँव का ,लकड़ी से बने घर का हॉस्पिटल और हॉस्टल के बीच गुजरी दुनिया का जिसमे अपना वज़ूद तलाशता अधूरा बच्चा है बोलने वाली इस दुनिया में वो अधूरा है क्यूंकि दुनिया की तरह नहीं बोल पाता। हॉस्पिटल में दया से उपजे स्नेह की कमी नहीं है पर बचपन को बैठकर सुनने का वक़्त किसी के पास नहीं है इसलिए वे कहना छोड़ देता है सुनने का वक़्त सिर्फ अपनों के पास होता है। इत्तेफ़ाक़ का एक रेड सर्कल है ,एक दायरा जो उसके आस पास खिंचता है उसमे मिला एक अजनबी उसे बैठकर सुनता है ,सुनने से उसमे हौसला जगता है कहने का।

उसकी लड़ाई लफ्ज़ो से है वो अपनी लड़ाई लड़ना सीख गया है ,कहना सीख गया है ,लोग उसे सुनने लगे है। ज़िंदगी में स्नेह और दया से अलग एक और प्यार होता है बिना शर्त वो उसे पहचानने लगा है पर इत्तेफ़ाक़ के सर्कल की एक लिमिट है वो जल्दी पूरा होता है ,कभी कभी वक़्त से पहले।
इस दफे उसकी ज़िंदगी में हॉस्टल है ,छोटे से कसबे में एक हॉस्टल। वो अपनी पहचान बनाना सीख गया है। लड़ना सीख गया है उसके हौसले की चाभी है जो हर साल एक नयी चाभी लेकर आता है ज़िंदगी के कई दरवाजे है दरवाजो को खोलने के लिए। इत्तेफ़ाक़ का रेड सर्कल अभी ख़त्म नहीं हुआ है ,इन दरवाजो के पार मिले किरदार उसे उसका वज़ूद देते है। अपनी तरह से कहने वाला बच्चा अपनी लिमिटेशन को दूसरी काबिलियत से भरने लगा है ,चीज़ो को देखने परखने और ब्रेन के एक हिस्से को उसने मजबूत कर लिया है जिसने उसे भीड़ से अलग कर लिया है। फेलुदा और शर्लोक होम्ज़ को नायक मानता हुआ वो घटनाओ को अपनी तरह से देखने लगा है उसकी विजन शक्ति मजबूत हुई है ,थ्री डायमेंशन से बाहर।
वही उसे नयी पहचान देती है ,रिकॉग्नाइजेशन।
इत्तेफ़ाक़ का दूसरा रेड सर्कल है हमशक़्ल सा लगता किरदार ! पहले रेड सर्कल की तलाश वो इस किरदार की मदद से पूरी करके दोनों रेड सर्कल कम्प्लीट करता है।
"जग्गा जासूस" एक फेंटेसी है
एक अधूरे बच्चे की रंग बिरंगी फेंटेसी!

जो इस दुनिया में मिसफिट है। उसी के तरीके से सुनाई गयी दास्तान हिंदी सिनेमा में इस तरह दास्ताँ कहने का ये पहला वाक्या है ,इंडियन सिनेमा में अलबत्ता एक दूसरे तरीके का सक्सेसफुल एक्सपेरिमेंट कई साल पहले "पुष्पक" के जरिये हो चूका है। हॉलीवुड में लीड एक्टर को लेकर म्यूजिकल फिल्मे बनी है 2002 की "शिकागो" को याद करिये. .
एक लय और बीट्स पर शुरू हुई इस फिल्म चेलेंज इस बीट्स पर कायम रहने का है। जो आखिर तक आते आते अपनी पकड़ खोने लगता है।
पुष्पक की ताकत उसकी एडिटिंग थी ,उसकी लम्बाई। इस तरह कीफिल्मो में कहते हुए बहुत कुछ कह जाने का खतरा बना रहता है .अनुराग बासु उस लाइन को क्रॉस कर गए है इसलिए शुरुआत से एक क्रिएटिव कॉम्पेक्ट बनाती हुई फिल्म अंत में उस क्राफ्ट को छोड़ देती है। फिल्म अंत में फिसल गयी है।
फिल्म एक फतांसी है ,सूत्रधार जो फिल्म का किरदार है वो फिल्म में ही कह रहा है के ये एक फतांसी है।इस तरह कहानी कहने में एक साहस है
एक विजन !

अनुराग जैसे अपने बचपन की कई चीज़ो को रिक्रिएट कर रहे है ,किताबों ,अपने नायको को ट्रिब्यूट दे रहे है। फेलुदा जैसे सत्यजीत रे के रचे किरदारों को इस रंग बिरंगी बचपन की फतांसी को अनुराग बड़ो की दुनिया में खींच लाये है ,वे अपनी दुनिया को एक्स्टेंड कर रहे है ,बड़ो को फ्लैशबैक में ले जाने की कोशिश। पर कितने लोग उससे रिकनेक्ट होंगे यही जोखिम है
फतांसी कहते हुए अलबत्ता वे कई जगह छोटे छोटे सटायर करते है ,जिन्हे पकड़ना पड़ता है
पोलिस के काम करने के तरीके पर एक बनी हुई
ओपिनियन पर इन्वेस्टिगेशन करने पर
मिडिल क्लास के सेल्फ सेंटर्ड रहने पर (खाना खाकर दारु पी कर चले गये )
नक्सल मूवमेंट की क्रान्ति पर लड़ी लड़ाई पर
ब्यरोक्रेट्स और हथियार बनाने वाले नेक्सस पर
मीडिया पर।

फिल्म में कई सीन्स बिना डायलॉग्स के है लेकिन बहुत कुछ कह जाते है इसमें सिनेफोटोग्राफी का कमाल है। कई सीन ब्रिलिएंटली कैप्चर हुए है
पेड़ से लटका हुआ झूला
पेड़ के पास खड़ी रेड कार
मचान पर बैठकर डाकिये का इंतज़ार करता बच्चा
थाने में मौजूद कई टेलीफोन
हॉस्टल की सुबह का शोर
मणिपुर की सड़को और गलियों में अपने किस्म की साइकिल पर जग्गा
होठो के पास जाकर चूमने की कोशिशे
सबसे अच्छा दास्ताँ कहने और जोड़ने का नेरेटिव !
नहीं नहीं
मेरे कहने पर फिल्म मत देखिये। ये एक एक्स्ट्रा ऑडनरी बिरलिएंट फिल्म नहीं है ,ना मै कोई रेगुलर क्रिटिक।

ये एक शुरआती एफर्ट है फतांसी कहने का हिंदी सिनेमा में। इसे फेंटेसी समझ कर ही देखने जाइये। इस फिल्म में नार्मल डायलॉग डिलीवरी नहीं है यही इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष भी है ,आम दर्शक इसी वजह से इससे डिस्कनेक्ट महसूस करते है। वे कुछ सीन्स के लिए तो तैयार रहते है पर बड़े होते रणबीर के साथ संवादों की इस स्टाइल से वे असहज होने लगते है उन्हें इसकी आदत नहीं है। रणबीर अलबत्ता ऊर्जा से भरे हुए है। अनकन्विंसिंग से लगते किरदार को अपनी बॉडी लेंग्वेज से मुकम्मल करते है अपना 100 परसेंट उन्होंने इस फिल्म में दिया है। एक एक्टर की रेंज पता चलती है अलबत्ता कैटरीना उनके एनर्जी लेवल से मैच करती नजर नहीं आती। अमिताभ उपाध्याय ने लिरिक्स में कमाल किया है उतना ही प्रीतम ने म्युज़िक में और क्रोयोग्राफ़र ने डांस मूवमेंट में। कैमरा रंगो को ,जगहों को इतनी खूबसूरत तरीके से कैप्चर करता है के हॉल पर रंग बिखर जाते है। फिल्म को किसी दूसरे तरीके से ट्रीटमेंट की जरुरत थी ,अनुराग बासु को इसे अपने दायरे से बाहर आकर कनेक्ट करवाना था तब ये मासेस को अपील करती। फिल्म एक ख़ास मूड में देखने वाली फिल्म है शायद नार्मल डायलॉग डिलीवरी होती और आखिर के सीन्स में कुछ कनेक्टिविटी और आसान होते तो फिल्म मासेस को तो अपील करती ही बिरलिएंट फिल्म बन जाती।

रोज़ाना : देओल परिवार की दिक्‍कतें



रोज़ाना
देओल परिवार की दिक्‍कतें
-अजय ब्रह्मात्‍मज
देओल परिवार के धर्मेन्‍द्र और उनके बेटों सनी और बॉबी देओल से दर्शक प्‍यार करते हैं। खास कर पंजाब और उत्‍तर भारत के दर्शक तो उन पर मर-मिटने का तैयार रहते हैं। धर्मेन्‍द्र अपे समय के पॉपुलर और संवेदनशील स्‍आर रहे। उनकी फिल्‍मों में गजब की वैरायटी मिलती है। हालांकि ढलती उम्र में उन्‍होंने कुछ फालतू फिल्‍में की,लेकिन उनकी बेहतरीन फिल्‍मों की संख्‍या कम नहीं है। आज के दर्शक भी उन्‍हें प्‍यार और आदर से याद करते हैं। उनकी बातें सुनना चाहते हैं। णमेंन्‍द्र इन दिनों बातें करते हुए यादों में खो जाते हैं। शायद उन्‍हें बीते साल किसी रील की तरह बातचीत करते समय दिखाई पड़ते हों। उनकी यादें ताजा है। उन यादों में बसी भावनाओं में एक युवक के सपनों की गूंज आज भी बाकी है। लंबे करिअर और कामयाबी के बावजूद धर्मेन्‍द्र सुना ही देते हैं...
नौकरी करता
सायकिल पर आता-जाता
फिल्‍मी पोस्‍टर में अपनी झलक देखता
अनहोने ख्‍वाब सजाता
और सुबह उठ कर आइने से पूछता
मैं दिलीप कुमार बन सकता हूं क्‍या?
धर्मेन्‍द्र के सारे ख्‍वाब पूरे हो गए,लेकिन कोई कसक है। वह उनकी बातों और यादों में चुभती सुनाई पड़ती है। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में जिन हस्तियों का सही मूल्‍यांकन नहीं हुआ और जिन्‍हें उनके योगदान की तुलना में सम्‍मान नहीं मिला,उनमें से एक धर्मेन्‍द्र भी हैं।
धर्मेन्‍द्र के प्रति हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की उदायीनता से उनके बड़े बेटे सनी देओल दुखी रहते हैं। उनकी बातचीत में भी यह तड़प सुनाई पड़ती है। उन्‍हें लगता है कि उनके पिता के महत्‍व के मुताबिक समाज और सरकार ने उन्‍हें प्रतिष्‍ठा नहीं दी। देओल परिवार की इस तकलीफ में सच्चाई है। देओल परिवार के सदस्‍य दूसरे फिल्‍मी परिवारों की तरह चालू और होशियार नहीं हैं। उस परिवार में कोई भी बहिर्मुखी स्‍वभाव का नहीं है। वे अपना पीआर भी ढंग से नहीं कर पाते। यहां तक कि प्रचार के जरूरी ताम-झाम से भी दूर रहते हैं। उनकी बातचीत में आत्‍म प्रचार के प्रति बेरुखी झलकती है। यही कारण है कि वे अपनी ख्‍याति को भी समय की मांग के मुताबिक भुना नहीं पाते। उनकी एक छवि बन गई है कि वे मीडिया और प्रचार से दूर रहते हैं।
चंद मुलाकातों और दूसरों से सुनी बातों से यही अंदाजा लगता है कि देओल परिवार अपनी स्थिति से संतुष्‍ट नहीं है। आज सनी देओल को कम फिल्‍में मिल रही हैं। बॉबी देओल के पास फिल्‍में ही नहीं हैं। धर्मेन्‍द्र चाहते हैं कि उन्‍हें फिल्‍में मिलें,लेकिन उन्‍हें ध्‍यान में रख कर फिल्‍में नहीं लिखी जातीं। देओल परिवार की वर्तमान स्थिति के लिए वे स्‍वयं भी जिम्‍मेदार हैं। सनी को उम्र के हिसाब से खुद का बदलने और रीइन्‍वेंट करने की जरूरत है। साठ के करीब पहुंच चुके सनी देओल को अब उनकी प्रचलित छवि के मुताबिक लीड रोल नहीं मिल सकते। वैसी फिल्‍मों का दौर भी चला गया है।
देखें,देओल परिवार की अगली पीढ़ी के करण देओल के पर्दे पर आने के बाद देओल परिवार की दिक्‍कतें कम होती हैं या नहीं? सनी देओल स्‍वयं ही उन्‍हें पल पल दिल के पास में निर्देशित कर रहे हैं। 

Tuesday, July 25, 2017

रोज़ाना : नए मिजाज की फिल्‍म!



रोज़ाना
नए मिजाज की फिल्‍म!
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अनुराग बसु की जग्‍गा जासूस रिलीज हो चुकी है। हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक दर्शकों और कुछ समीक्षकों ने इसे नापसंद किया है। यह फिल्‍म कुछ दर्शकों और बहुत कम समीक्षकों को पसंद आई है। मुझे लगता है कि नापसंदगी की एक बड़ी वजह फिल्‍म को सही संदर्भ में नहीं समझ पाना है। यह भी हो सकता है कि रणबीर कपूर और कट्रीना कैफ से वे किसी और तरह की फिल्‍म उम्‍मीद कर रहे हों और उन्‍हें उत्‍तेज‍क रोमांटिक दृश्‍यों में नहीं देख कर उन्‍हें निराशा हुई हो। हिंदी फिल्‍मों की एक सामान्‍य सीमा तो यही है कि हर तरह की फिल्‍म में रोमांस और खुलेआम रोमांस की जरूरत पड़ती है। नए निर्देशक हिंदी फिल्‍मों की इस सीमा से जूझ रहे हैं। ने रोमांस और प्रेम कहानियों से निकलना चाह रहे हैं। वे घिसे‍-पिटे दृश्‍यों और किरदारों से उकता चुके हैं। कमी नए निर्देशकों में भी है। वे अपनी परंपरा को अपनी जरूरतों के हिसाब से साध नहीं पर रहे हैं। उनके और दर्शकों के बीच फांक रह जाती है।
जग्‍गा जासूस एक बेहतरीन फिल्‍म है। शैली और शिल्‍प के स्‍तर पर यह मुग्‍ध करती है। अनुराग बसु ने अपनी फिल्‍म के लिए बिल्‍कुल नई शैली चुनी है। उन्‍होंने इसे म्‍यूजिकल फार्मेट में रखा है। हिंदी फिल्‍मों में गीत-संगीत के प्रयोग की म्‍यूजिकल परिभाषा सेजग्‍गा जासूस अलग है। अनुराग बसु ने संगीत निर्देशक प्रीतम से फिल्‍म लिखवाई है। उसे सांगीतिक बनाया है। इस फिल्‍म में छंद और लय है। हमें सामान्‍य दृश्‍यों और संवदों की आदत हो गई है,जहां सब कुछ स्‍पष्‍ट शब्‍दों और मुद्राओं में बयान कर दिया जाता है। यह फिल्‍म दर्शकों की कल्‍पना को उड़ान देती है। उन्‍हें अपने अर्थ खोजने के लिए उकसाती है। बाल और किशोर दर्शक इस फिल्‍म को देख कर आनंदित होंगे। मुझे लगता है कि समय बीतने के साथ इस फिल्‍म की सार्थकता बढ़ेगी। मैं इसे पूरी तरह से निर्दोष फिल्‍म नहीं कह सकता। कुछ कमियां हैं,लेकिन वे नए प्रयोग की कमियां हैं। अपरिचित राह और शैली में भूल और भटकाव मुमकिन है।
ऐसी फिल्‍मों को समुचित दर्शक नहीं मिल पाने का एक बड़ा कारण निर्देशकों और कलाकारों का प्रमाद भी है। जब भी प्रयोगात्‍मक फिल्‍में आती हैं और निर्देशक उसके बारे में कायदे से नहीं बतरते हैं तो दर्शक उचट जाते हैं। उन्‍हें पहले से फिल्‍म का संदर्भ और परिवेश मालूम हो तो वे फिल्‍म का सही व अधिक आनंद ले सकते हैं। दिबाकर बनर्जी,अनुराग कश्‍यप,राकेश ओमप्रकाश मेहरा से ऐसी भूलें हुई हैं। इस बार अनुराग बसु चूक गए। इन निर्देशकों को अपनी फिल्‍मों के बारे में विस्‍तार से बताना चाहिए। दर्शकों को मानसिक तरीके से तैयार करना चाहिए। फिल्‍म प्रचार के पुराने तरीके से लए मिजाज की फिल्‍मों के लिए दर्शक नहीं जुआ सकते। जग्‍गा जासूस की प्रचार रणनीति में दिक्‍कतें थीं। अनुराग बसु और रणबीर कपूर ने जग्‍गा जासूस की विशेषताओं और अनोखेपन के बारे में ढंग से नहीं बताया था।

Saturday, July 22, 2017

रोज़ाना : पूरी हो गई मंटो की शूटिंग



22 जुलाई,2017
रोज़ाना
पूरी हो गई मंटो की शूटिंग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
नंदिता दास ने मंटो की शूटिंग पूरी कर ली। अब वह एडीटिंग में जुटेंगी। खुशखबर का यह एक रोचक पड़ाव है। फिल्‍म पूरी होने और रिलीज होने के पहले ऐसे अनेक पड़ावों से गुजरना पड़ता है। मंटो जैसी फिल्‍म हो तो हर पड़ाव के बाद आगे का मोड अनिश्चित दिशा में होता है। अंदाजा नहीं रहता कि सब कुछ ठीक तरीके से आगे बढ़ रहा है या रास्‍ते में कहीं भटक गए और फिल्‍म रिलीज तक नहीं पहुंच सकी। इन आशंकाओं में समाज और सिनेमा के कथित ठेकेदार भी होते हैं,जो आपत्तियों की लाठी भंजते रहते हैं। उन्‍हें हर प्रकार की क्रिएटिविटी से दिक्‍कत होती है। नंदिता दास संवेदनशील और जागरूक अभिनेत्री व निर्देशक हैं। अभी का समाज जागरुकों से कुछ ज्‍यादा ही खफा है। बहराहाल,शूटिंग पूरी होने की शुभकामनाओं के साथ नंदिता दास को बधाइयां कि वह ऐसे वक्‍त में मंटो को लेकर आ रही हैं,जो भीतरी तौर पर पार्टीशन के मरोड़ से गुजर रहा है। संदेह का धुंआ उठता है और हर छवि धुंधली हो जाती है। आकृतियां लोप होने लगती हैं। केवल शोर सुनाई पड़ता है। एक भीड़ होती है,जो सूजन और सामयिक सोच के खिलाफ चिल्‍ला रही होती है। लुंचन कर रही होती है।
मंटो पर बन रही नंदिता दास की फिल्‍म की शूटिंग का पूरा होना इसलिए खुश खबर है कि इसके पहले के प्रयासों में निर्देशकों को शूटिंग करने तक का मौका नहीं मिल पाया। मेरी जानकारी में तीन योजनाएं बनीं और फ्लोर पर जाने के पहले ही रद्द कर दी गईं। कभी बजट तो कभी कलाकार और सबसे बड़ा यह असमंजस कि क्‍या दर्शक विवादास्‍पद और विरोधाभासी लेखक सआदत हसन मंटो को बड़े पर्दे पर देखना चाहेंगे। मंटो ने खूब लिखा है। अपने समकालीनों पर भी लिखा है। मंटो पर भी लिखा गया है। सभी ने अपने तरीके से मुटो को समझने की कोशिश की है। मंटो की ऐसी कोई मुकम्‍मल छवि नहीं है,जिससे सभी सहमत हों। इस अंतर्विरोध के बावजूद इस तथ्‍य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मंटो ने अपने वक्‍त के जख्‍मों को कुरेदा और हरा रखा। उन्‍होंने मरहम लगाने की कोशिश नहीं की। उनके इस रवैए से तब की सत्‍ता खफा रही है और आज भी अनेक नाखुश हैं। एक सच्‍चाई यह भी है कि मंटो के बारे में सभी बातें करते हैं,लेकिन उन्‍हें पढ़ते नहीं हैं। जो पढ़ते हैं,वे मंटो की सोच नहीं अपनाते। सृजन के अन्‍य क्ष्‍ेत्रों में भी यही प्रवृति चल रही है। नाम चलाते रहो,काम दरकिनार कर दो।
नंदिता दास ने मंटो के भारत से पाकिस्‍तान जाने से लेकर लाहौर में बीती उनकी बाकी जिंदगी को अपनी फिल्‍म में समेटा है। इन सालों में मंटो सबसे अधिक व्‍यथित,विचलित और व्‍यग्र थे। नंदिता दास की फिल्‍म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी मंटो को पर्दे पर उतार रहे हैं। हमें पार्टीशन के दौर की एक बेहतरीन फिल्‍म का इंतजार है। फिल्‍मों में इस दौर को हमेशा नजरअंदाज किया गया।

Wednesday, June 28, 2017

रोज़ाना : शाह रूख खान की ईद



रोज़ाना
शाह रूख खान की ईद
-अजय ब्रह्मात्‍मज
ईद के मौके पर शाह रूख खान बुलाते हैं। वे मीडियाकर्मियों को ईद की दावत देते हैं। इस दावत में देर-सबेर वे शामिल होते हैं। मीडियाकर्मियों से जत्‍थे में मिलते हैं। उनसे अनौपचारिक बातें करते हैं। अफसोस कि ये अनौपचारिक बातें भी रिकार्ड होती हैं। अगले दिन सुर्खियां बनती हैं। अब न तो फिल्‍म स्‍टार के पास सब्र है और न पत्रकारों के पास धैर्य...स्‍टार की हर बात खबर होती है। वे खुद भी पीआर के प्रेशर में में हर मौके को खबर बनाने में सहमति देने लगे हैं। या कम से कम तस्‍वीरें तो अगले दिन आ ही जाती हैं। चैनलों पर फटेज चलते हैं। सभी के करोबार को फायदा होता है।
हर साल ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्‍में रिलीज हो रही हैं और शाह रूख खान से ईद पर उनकी अगली फिल्‍मों की बातें होती हैं,जो दीवाली या क्रिसमस पर रिलीज के लिए तैयार हो रही होती हैं। वक्‍त ऐसा आ गया है कि पत्रकार हर मुलाकात को आर्टिकल बनाने की फिक्र में रहते हैं। उन पर संपादकों और सहयोगी प्रकाशनों का अप्रत्‍यक्ष दबाव रहता है। अघोषि प्रतियोगिता चल रही होती है। सभी दौड़ रहे होते हैं। इस दौड़ में सभी पहले पहुंचना चाहते हैं। अच्‍छा है कि जो पिछड़ जाए,वह भी विजेता माना जाता है।
इस ईद की बात करें तो बारिश की वजह से शाह रूख खान ने अपने बंगले मननत के पास के पांचसितारा होटल में लंच का इंतजाम किया था। वे आए। घोषित समय से डेढ़-दो घंटे देर से आना उनके लिए सामान्‍य बात है। अगर किसी इवेंट पर किसी दिन वे समय पर आ जाएं तो आश्‍चर्य होगा और अनेक पत्रकार उस इवेंअ पर उनसे मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारों ने भी स्‍टारों के हिसाब से मार्जिन तय कर लिया है। केवल अमिताभ बच्‍चन और आमिर खान समय के पाबंद हैं। बहरहाल,शाह रूख ने हमारे जत्‍थे से कुछ रोचक बातें कीं। बाद में दूसरे जत्‍थों के बीच भी उन्‍होंने लगभा वे ही बातें कीं। मसलनएईद की रात बच्‍चों के लिए खाना बनाने की बात। उन्‍होंने हमें विस्‍तार से बताया कि जब हैरी मेट सेजल की शूटिंग के दौरान अपने मेजबान से सीखी। मेजबान मियां-बीवी ने शाह रूख खान को इतालवी व्‍यंजनों के पाक विधि सिखाई। अगर बनाते समय कुद भूल जाता है तो गूगल है ही मदद के लिए। और हो,छठे-छमाही खाने बनाने के शौकीन सभी पतियों और मर्दां की तरह शाह रूख खान भी किचेन में बहुत कुछ फैला देते हैं।
शाह रूख खान की ईद से आया कि अब त्‍योहारों के ऐसे सार्वजनिक आयोजन फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कम हो गए हैं। पहले होली,दीवाली और ईद पर ऐसे कई आयोजन होते थे। उनसे खबरें भी नहीं जुड़ी रहती थीं। सभी त्‍योहार के रंग में रहते थे। यह चिंता नहीं रहती थी कि क्‍यो बोलें और कैसे दिखें? मीडिया के प्रकोप और सोशल मीडिया के आतंक ने त्‍योहारों का जश्‍न छीन लिया है। सब कुछ रुटीन और फैशन सा हो गया है। हर हाथ में मोबाइल के साथ आए कैमरे और सेल्‍फी की धुन ने त्‍योहारों की लय तोड़ दी है।

Tuesday, June 27, 2017

रोज़ाना : एयरपोर्ट लुक



रोज़ाना
एयरपोर्ट लुक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मिलीभगत है। ज्‍यादातर बार फोटोग्राफर को मालूम रहता है कि कब कौन सी सेलिब्रिटी कहां मौजूद रहेगी। उनकी पीआर मशीनरी सभी फोटोग्राफर और मीडियाकर्मियों को पूर्वसूचना दे देते हैं। विदेशों की तरह भारत में पापाराजी नहीं हैं। यहां दुर्लभ तस्‍वीरों और खबरों की भी सामान्‍य कीमत होती है। विदेशों में एक दुर्लभ तस्‍वीर के लिए फोटोग्राफर भारी खर्च करते हैं और धैर्य से घात लगाए रते हैं। यह बंसी डाल कर मछली पकड़ने से अधिक अनिश्चित और वक्‍तलेवा काम होता है। मुंबई में फिल्‍मी सितारों की निजी गतिविधियों की जानकारी छठे-छमाही ही तस्‍वीरों में कैद होकर आती है। बाकी सब पूर्वनियोजित है,जो खबरों की तरह परोसा जा रहा है।
ऐसी ही पूर्वनियोजित खबरों व तस्‍वीरों में इन दिनों एयरपोर्ट लुक का चलन बढ़ा है। एयरपोर्ट लुक उस खास तस्‍वीर के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है,जो मुंबई से बाहर जाते-आते समय एयरपोर्ट के अराइवल और डिपार्चर के बाहर फिल्‍मी सितारों उतारी जाती हैं। गौर करेंगे कि कुछ फिल्‍मी हस्तियों की तस्‍वीरें बार-बार आती हैं। इसका चलन इतना ज्‍यादा बढ़ गया है कि उम्रदराज और कम लोकप्रिय सितारों को भी ऐसी तस्‍वीरों के लिए तैयार रहना पड़ता है। उन्‍हें अपने लुक और ड्रेस का खास खयाल रखना पड़ता है। उन्‍हें यह भी खखल रखना पड़ता है कि हेयर स्‍टाइल,ज्‍वेलरी व अक्‍सेसरीज और ड्रेस में रिपीटिशन न हो। इसके लिए सितारों की टीम चौकस रहती है। कई बार एयरपोर्ट लुक की तस्‍वीरों के साथ सारे ब्रांड की जानकारी रहती है। बताया जाता है कि पर्स किस ब्रांड का है और चश्‍मा किस ब्रांड का है...आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह जानकारी स्‍टार की पीआर टीम ही देती है। प्रचलित और लोकप्रिय सितारों की इमेज को इससे लाभ होता होगा,लेकिन आउट ऑफ जॉब और कम फिल्‍में कर रही सितारों को जबरन इस मुश्किल से गुजरना होता है।
पिछले दिनों एक मुलाकात में भीदेवी कोफ्त जाहिर कर रही थीं। उन्‍हें निजी काम से लगातार चेन्‍नई जाना होता है। कुछ घरेलू और पारिवारिक काम होते हैं। वह सुबह जाती हैं और शाम तक लौट आती है। इधर कुछ दिनों से अब उन्‍हें भी खयाल रखना पड़ता है कि आते-जाते समय एक ही ड्रेस न हो। और वह पूरे मेकअप में रहें। कुछ सितारों का यह अतिरिक्‍त खर्च लगता है,लेकिन सभी कर रहे हैं तो उन्‍हें भी करना पड़ता है। आप न करें और कभी किसी फोटोग्राफर के कैमरे में सामान्‍य तस्‍वीर कैद हो गई तो अगले दिन वही तस्‍वीर अखबारों में होगी और नीचे कुछ सवाल छोड़ दिए जाएंगे।
सचमुच,ग्‍लैमर की दुनिया में बने और टिके रहने की अपनी समस्‍याएं हैं। हम चाहते भी हैं कि हमारे पसंदीदा सितारे हमेशा सज-धज में रहें। अभिनेत्रियों की मुश्किलें ज्‍यादा रहती हैं,क्‍योंकि उनकी सज-धज में विकल्‍प और चुनौतियां हैं। अभिनेता तो जैसे-तैसे भी दिख सकते हैं। उन्‍हें अधिक फर्क नहीं पड़ता। अभिनेत्रियों की छवि खराब हुई या उनकी स्‍टाइल फीकी पड़ी तो दस तरह की बातें होने लगती हैं। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उन्‍हें थम्‍स डाउन मिलता है। बताया जाता है कि उनका फैशन सेंस अपडेटेड नहीं है।

Saturday, June 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ट्यूबलाइट



फिल्‍म रिव्‍यू
यकीन पर टिकी
ट्यूबलाइट
-अजय ब्रह्मात्‍मज

कबीर खान और सलमान खान की तीसरी फिल्‍म ट्यूबलाइट भारज-चीन की पृष्‍ठभूमि में गांधी के विचारों और यकीन की कहानी है। फिल्‍म में यकीन और भरोसा पर बहुत ज्‍यादा जोर है। फिल्‍म का नायक लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट मानता है कि यकीन हो तो चट्टान भी हिलाया जा सकता है। और यह यकीन दिल में होता है। लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट के शहर आए गांधी जी ने उसे समझाया था। बाद में लक्ष्‍मण के पितातुल्‍य बन्‍ने चाचा गांधी के विचारों पर चलने की सीख और पाठ देते हैं। फिल्‍म में गांधी दर्शन के साथ ही भारतीयता के सवाल को भी लेखक-निर्देशक ने छुआ है। संदर्भ 1962 का है,लेकिन उसकी प्रासंगिकता आज की है।
यह प्रसंग फिल्‍म का एक मूल भाव है। भारत-चीन युद्ध छिड़ने के बाद अनेक चीनियों को शक की नजरों से देखा गया। फिल्‍म में ली लिन के पिता को कैद कर कोलकाता से राजस्‍थान भेज दिया जाता है। ली लिन कोलकाता के पड़ोसियों के लांछन और टिप्‍पणियों से बचने के लिए अपने बेटे के साथ कुमाऊं के जगतपुर आ जाती है। पश्चिम बंगाल से उत्‍तराखंड का ली लिन का यह प्रवास सिनेमाई छूट है। बहरहाल,जगतपुर में लक्ष्‍मण ही उन्‍हें पहले देखता है और उन्‍हें चीनी समझने की भूल करता है। बाद में पता चलता है कि ली लिन के परदादा चीन से आकर भारत बस गए थे। और अब वे भारतीय हैं। लेकिन ठीक आज की तरह उस दौर में भी तिवारी जैसे लोग नासमझी और अंधराष्‍ट्रभक्ति में उनसे घृणा करते हैं। उन पर आक्रमण करते हैं। फिल्‍म में प्रकारांतर से कबीर खान संदेश देते हैं कि भारत में कहीं से भी आकर बसे लोग भारतीय हैं। ली लिन कहती है... मेरे परदादा चीन से हिंदुस्‍तान आए थे। मेरे पापा,मेरी मां,मेरे पति हम सब यहीं पैदा हुए हैं,लेकिन जंग सब बदल देता है। लोगों की नजर में हम अब दुश्‍मन बन गए हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह हमारा घर है,कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम इस मुल्‍क से उतनी ही मोहब्‍बत करते हैं जितनी कि तुम या तुम्‍हारा भाई... गौर करने की जरूरत है कि हम आज जिन्‍हें दुश्‍मन समझ रहे हैं और उन्‍हें देश से निकालने की बात करते हैं। वे दूसरे भारतीयों से कम नहीं हैं। ट्यूबलाइट के इस महत्‍वपूर्ण संदेश में फिल्‍म थोड़ी फिसल जाती है। कथा विस्‍तार,दृश्‍य विधान,प्रसंग और किरदारों के चित्रण में फिल्‍म कमजोर पड़ती है।
मंदबुद्धि लक्ष्‍मण और भरत अनाथ है। बन्‍ने चाचा ही उनकी देखभाल करते हैं।  भारत-चीन युद्ध के दौरान भरत फौज में भर्ती हो जाता है और मोर्चे पर चला जाता है। लक्ष्‍मण को यकीन है कि जंग जल्‍दी ही खत्‍म होगी और उसका भाई जगतपुर लौटेगा। इस यकीन के दम पर ही उसकी दुनिया टिकी है। बीच में उसके भाई की मौत की गलत खबर आ जाती है। सभी के साथ श्रद्धांजलि देने के बाद लक्ष्‍मण का यकीन दरक जाता है,लेकिन फिल्‍म तो संयोगों का जोड़ होती है। लेखक और निर्देशक मिलवाने की युक्ति निकाल ही लेते हैं। भोले किरदार लक्ष्‍मण के यकीन के विश्‍वास‍ को मजबूत करते हैं।
कबीर खान ने पिछली फिल्‍म बजरंगी भाईजान की तरह ही इस फिल्‍म में भी सलमान खान को सरल,भोला और निर्दोष चरित्र दिया है। इस फिल्‍म में भी एक बाल कलाकार है,जो लक्ष्‍मण के चरित्र का प्रेरक बनता है। इस बार पाकिस्‍तान की जगह चीन है,लेकिन पिछली फिल्‍म की तरह लक्ष्‍मण को उस देश में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। सब कुछ सीमा के इसी पार घटता है। फिल्‍म में युद्ध के दृश्‍य बड़े सतही तरीके से फिल्‍मांकित किए गए हैं। जगतपुर गांव और शहर से परे पांचवें से सातवें दशक के हिंदुस्‍तान की ऐसी बस्‍ती है,जहां शहरी सुविधाएं और ग्रामीण रिश्‍ते हैं। पीरियड गढ़ने में कई फांक नजर आती है,जिनसे कमियां झलकती हैं। लेखक-निर्देशक का जोर दूसरी बारीकियां से ज्‍यादा मुख्‍य किरदारों के बात-वयवहार पर टिका है। उसमें वे सफल रहे हैं। यह फिल्‍म पूर्वार्द्ध में थोड़ी शिथिल पड़ी है। निर्देशक लक्ष्‍मण को दर्शकों से परिचित करवाने में अधिक समय लेते हैं।
51 साल के सलमान खान और उनसे कुछ छोटे सोहेल खान अपनी उम्र को धत्‍ता देकर 25-27 साल के युवकों की भूमिका में जंचने की कोशिश करते हैं,लेकिन उनकी कद-काठी धोखा देती है। ट्यूबलाइट के सहयोगी किरदारों में आए ओम पुरी,मोहम्‍मद जीशान अय्यूब,यशपाल शर्मा,जू जू और माटिन रे टंगू फिल्‍म की जमीन ठोस की है। वे अपनी भाव-भंगिमाओं से फिल्‍म के कथ्‍य को प्रभावशाली बनाते हैं। खास कर जू जू और माटिन बेहद नैचुरल और दिलचस्‍प हैं।
अवधि- 136 मिनट
*** तीन स्‍टार

Friday, June 23, 2017

दरअसल : भारत में जू जू,चीन में आमिर खान



दरअसल...
भारत में जू जू,चीन में आमिर खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कबीर खान निर्देशित ट्यूबलाइट में चीन की अभिनेत्री जू जू दिखाई पड़ेंगी। यह पहला मौका होगा जब किसी हिंदी फिल्‍म में पड़ोसी देश की अभिनेत्री सलमान खान जैसे लोकप्रिय सितारे के साथ खास किरदार निभाएंगी। पिछले कुछ सालों से भारत और चीन के बीच फिल्‍मों के जरिए आदन-प्रदान बढ़ा है। कुछ फिल्‍मों का संयुक्‍त निर्माण हुआ है। कुछ निर्माणाधीन हैं। चीन में दंगल की कामयाबी ने हमारी तरफ से दरवाजे पर चढ़ाई गई कुंडी खोल दी है। दरवाजा खुला है। अभी तक भारत में चीनी सामानों को दोयम दर्जे के सस्‍ते प्रोडक्‍ट का का माना और मखौल उड़ाया जाता है। चीन के राष्‍ट्रपति तक ने भारत के प्रधानमंत्री से दंगल की तारीफ की। हिंदी-चीनी भाई-भाई नारे की अनुगूंज अब कहीं नहीं सुनाई पड़ती। 21 वीं सदी में दोनों देशों की सिनेमाई दोस्‍ती नई लहर के तौर पर आई है। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई का नारा बुलंद किया जा सकता है।
जू जू को हिंदी में झू झू और चू चू भी लिखा जा रहा है। हम दूसरे देशों की भाषा के शब्‍दों के प्रति लापरवाही की वजह से सही उच्‍चरित शब्‍द की खोज नहीं करते। हिंदी ध्‍वनि प्रधान भाष है। थोड़ी मेहनत की जाए तो हिंदी में दुनिया की हर भाषा का करीबी उच्‍चरण किया जा सकता है। बहरहाल,जू जू में एक जू उनका पारिवारिक सरनेम है। और उनके जू नाम का मतलब मोती है। मोती की चमक और शुद्धता है जू जू के व्‍यक्तित्‍व में। जू जू अगले महीने 33 साल की हो जाएंगी। चीन के पेइचिंग शहर में एक सैनिक परिवार में पैदा हुई जू जू बचपन से कलात्‍मक रुझान की हैं। उन्‍होंने छोटी उम्र में पियानो बजाना सीखा। बता दें कि चीन में लगभी सभी बच्‍चे कोई न कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखते हैं। चीन में आर्थिक उदार नीति आने के बाद पियानो का आकर्षण बढ़ा है। सांस्‍कृतिक क्राति के दौर में पियानों जैसे वाद्य यंत्र पर पाबंदी सी लगी थी। गाने-बजाने की शौकीन जू जू भारत की अनेक प्रतिभाओं की तरह ही एक म्‍यूजिकल कंटेस्‍ट से सामने आईं। उन्‍होंने चीन में एमटीवी के शो होस्‍अ किए और अपने रुझान का दायरा बढ़ाती गईं। 2011 में आई छन तामिंग की फिल्‍म वु चिड़ न्‍वी रन सिन(औरतें क्‍या चाहती हैं) से उनके एक्टिंग करिअर की शुरुआत हुई। 2012 में उन्‍‍हें हालवुड की द मैन विद द आयन फिस्‍ट फिल्‍म मिल गई। फिल्‍मों और टीवी शो से इंटरनेशनल पहचान हासिल कर चुकी जू जू ने 2016 में ट्यूबलाइट साइन की। वह भारत आईं और उन्‍होंने हिंदी भी सीखी।
जू जू का भारत में कैसा स्‍वागत होगा? यह तो कुछ घंटों के बाद पता चल जाएगा। हिंदी-चीनी सिनेमाई भाई के संदर्भ में हाल में चीन में मिली आमिर खान की पहचान और सफलता उल्‍लेखनीय है। किसी भी भारतीय कलाकार को चीन में ऐसी कमर्शियल कामयाबी नहीं मिली थी। वैसे चीन में राज कपूर और उनकी फिल्‍म आवारा के बारे में 35-40 से अधिक उम्र के सभी नागरिक जानते हैं। अमेरिकी फिल्‍मों के प्रवेश के पहले भारतीय फिल्‍में ही चीनी दर्शकों के विदेशी मनोरंजन के लिए उपलब्‍ध थीं। उनमें राज कपूर शीर्ष पर रहे। दंगल ने आमिर खान की पहचान मजबूत कर दी है। राजकुमार हिरानी की 3 इडियट ने सबसे पहले चीनी दर्शकों को आमिर खान के प्रति आकर्षित किया। बता दें कि 2009 में आई 3 इडियट का अधिकांश चीनियों ने पायरेटेड फार्मेट में देखा। यह फिल्‍म वहां के युवकों के बीच खूब पसंद की गई। उन्‍हें रैंचो अपने बीच का ही युवक लगा था। फिर धूम 3 की रिलीज तक चीन में थिएटर का्रति आ चुकी थी। सिनेमाघरों के संख्‍या मशरूम की तर बड़ी। आमिर खन की धूम 3 को चीन में अच्‍छी रिलीज मिली। इस फिल्‍म में एक्‍शन और अदाकारी से आमिर खान से चीनी दर्शकों के दिल में जगह बना ली। उनकी पीके भी वहां पॉपुलर रही। और अब दंगल ने तो सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अभी तो कहा जा रहा है कि चीन का हर फिल्‍मप्रेमी आमिर खान को पहचानता है। उसने दंगल देख रखी है।
जू जू और आमिर खान दोनों देशों के बीच सांस्‍कृतिक दोस्‍ती के नए राजदूत हैं। जू जू अपनी व्‍यस्‍तता की वजह से ट्यूबलाइट के प्रचार में शामिल नहीं हो सकी,लेकिन आमिर खान दंगल के लिए चीन गए थे। उम्‍मीद है कि आगे यह सहयोग और संपर्क बढ़ेगा।