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Monday, December 26, 2011

शहर-शहर डोलते स्टार

शहर-शहर डोलते स्टार-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले सप्ताह शाहरुख खान पटना नहीं जा सके। उनके न जा पाने की सही वजह के संबंध में कंफ्यूजन है। शाहरुख ने ट्विट किया था कि जिला अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों से उन्हें आने से रोका, लेकिन पटना प्रशासन कह रहा है कि हम तो सुरक्षा में चाक-चौबंद थे। अगर हम अमिताभ बच्चन को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं तो शाहरुख को भी पटना से सुरक्षित भेज सकते हैं। आखिकार शाहरूख खान पटना गए।बहरहाल, शाहरुख ने उम्मीद जताई है कि वे जल्दी ही पटना जाएंगे। पटना के प्रति अचानक शाहरुख की हमदर्दी समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा।

पटना और दूसरे कथित छोटे शहर अब फिल्मों के प्रचार रोडमैप में आ गए हैं। इसकी शुरुआत बहुत पहले महेश भट्ट ने की थी। महेश भट्ट अपनी फिल्मों की टीम के साथ छोटे-छोटे शहरों में घूमते रहे हैं। उन्होंने तमन्ना की टीम के साथ पटना की यात्रा की थी। उसके बाद दैनिक जागरण की पहल पर मनोज बाजपेयी प्रचार के लिए अपनी फिल्म शूल लेकर कानपुर गए थे। छोटे शहरों को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ने की कल्पना और योजना में इन पंक्तियों के लेखक की भी भूमिका रही है। शुरुआती सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अनेक कलाकार अपनी फिल्मों के साथ लखनऊ और कानपुर जाते रहे हैं, जिनमें रितिक रोशन, अभिषेक बच्चन, विवेक ओबेराय, ऐश्वर्या राय बच्चन, माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर, सूरज बड़जात्या, बोनी कपूर आदि नाम अभी याद आ रहे हैं। वहीं से मीडिया टाइअप और मीडिया पार्टनरशिप का कॉन्सेप्ट भी उभरा। यह कॉन्सेप्ट अब मीडिया की बड़ी प्रापर्टी बन चुका है।

दरअसल.. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री हमेशा से समीप दृष्टि की शिकार रही है। पहले फिल्मों की रिलीज के समय निर्माताओं की कोशिश रहती थी कि स्टारों के घर के आसपास और जुहू बीच पर अवश्य होर्डिग लग जाए। इससे स्टार के अहं की तुष्टि होती थी। आज भी कमोबेश यही हालत है, मुंबई में लगी होर्डिग और प्रिंट प्रचार का तुरंत असर फोन के रूप में दिखता है। स्टार के परिचित चापलूसी और बाजे दफा सच्ची खुशी में स्टार को बधाई देते हैं तो रिलीज के पहले फिल्म से स्टार का मनोबल बढ़ता है। फिल्म से जुड़े तकनीशियन और बाकी कलाकार भी ऐसे प्रचार से संतुष्ट होते हैं। जाहिर सी बात है कि उनकी नजरों से दूर हो रहा प्रचार उन्हें दिखता नहीं है तो उन्हें उसके प्रभाव का एहसास भी नहीं होता। उनके लिए मुंबई में बोरीवली के आगे दुनिया खत्म हो जाती है।

इधर फिल्मों के कंटेंट के साथ बिजनेस में भी उत्तर भारत का दबदबा बढ़ा है। पिछले कुछ सालों में 100 करोड़ के क्लब में पहुंची फिल्मों के कारोबार के आंकड़े उठाकर देखें तो पता चलेगा कि उन सभी फिल्मों का पचास-साठ प्रतिशत बिजनेस कथित छोटे शहरों और सिंगल स्क्रीन थिएटरों से आया है। फिल्मों के बिजनेस में इन शहरों के दर्शकों की भूमिका बढ़ती जा रही है। यकीन करें यदि उत्तर भारत से बिजनेस का यही प्रवाह बना रहा तो हिंदी फिल्मों के विषय, स्टार और अन्य सौंदर्यानुभूतियों के लिए उत्तर भारत के दर्शकों की रुचि का खयाल बढ़ जाएगा। यह होना ही है। इसकी शुरुआत हो चुकी है। उत्तर भारत के इसी बढ़ते असर को देखते हुए सलमान खान कानपुर, अमिताभ बच्चन पटना और शाहरुख खान नागपुर जा रहे हैं। उन्हें इन इलाकों में बाजार दिख रहा है। इन इलाकों के दर्शकों को चाहिए कि वे अपनी जेबों में मुज्ञि्‍यां भींच लें और सोच-समझकर ही फिल्मों पर पैसे खर्च करें। जिन फिल्मों में उनकी इच्छाएं पूरी हों, उन फिल्मों की सफलता से यह ट्रेंड बढ़ेगा।

बाजार की इसी खोज का एक पहलू टॉम क्रूज का भारत आना है। क्यों अचानक भारत के प्रति उनका प्रेम उमड़ आया? दरअसल, हॉलीवुड की फिल्मों के बिजनेस के फैलाव के लिए भारत और चीन बड़े बाजार के रूप में उभरे हैं। चीन ने अपने देश में हर साल केवल 20 विदेशी फिल्मों के आयात की अनुमति दे रखी है। भारत में अभी ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। पिछले एक दशक से हॉलीवुड की फिल्में भारतीय बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए प्रयासरत हैं। ये फिल्में हिंदी के साथ-साथ तमिल, तेलुगू, बांग्ला और भोजपुरी तक में डब हो रही हैं। कोशिश है कि हर भाषा के दर्शक को उसकी भाषा में मनोरंजन मिले ताकि वह मुज्ञ्‍ी खोल कर पैसे खर्च करें।

अब यह दर्शकों को फैसला करना है कि वे प्रचार के बहकावे में आकर अपने पैसे की फिजूलखर्ची करते हैं या स्टार, निर्माता-निर्देशकों को अपनी संवेदना और आकंक्षा की फिल्में बनाने के लिए मजबूर करते हैं। दर्शकों के स्वीकार और बहिष्कार से यह समझ में आएगा। आखिरकार दर्शक ही मनोरंजन के साम्राज्य के राजा हैं।

Saturday, December 24, 2011

फ‍िल्‍म समीक्षा : डॉन2

नाम बड़े और दर्शन छोटे-अजय ब्रह्मात्‍मज

एशिया में अंडरव‌र्ल्ड साम्राज्य कायम करने के बाद डॉन की नजर अब यूरोप पर है। इसकी भनक योरोप के ड्रग सौदागरों को मिल चुकी है। वे डॉन को खत्म करने की साजिश रचते हैं। हमारा हिंदी फिल्मों का डॉन भी शातिर दिमाग है। अपनी सुरक्षा के लिए वह जेल चला जाता है। वहां से अपने पुराने दुश्मन वरधान को साथ लेता है। मारने आए व्यक्ति जब्बार को अपनी टीम में शामिल करता है और जर्मनी के एक बैंक से यूरो छापने की प्लेट की चोरी की योजना बनाता है।

हंसिए नहीं,एशिया का किंग बन चुका डॉन इस चोरी को अंजाम देने के लिए खुद ही जाता है। मालूम नहीं उसके गुर्गे छुट्टी पर हैं या? हमारा डॉन अकेला ही घूमता है। जरूरत पड़ने पर उसके पास हथियार,गाड़ी और लश्कर चले जाते हैं। जैसे हिंदी फिल्मों का हीरो जब गाता है तो दर्जनों व्यक्ति उसके आगे-पीछे नाचने लगते हैं।

अनगिनत फिल्मों में देखे जा चुके दृश्यों से अटी पड़ी यह फिल्म शाहरुख के अभिनय और अंदाज के दोहराव से भरी हुई है। उनका मुस्कराना,खी-खी कर हंसना,लचकते हुए चलना,भींचे चेहरे और टेढ़ी नजर से तकना उनके प्रशंसकों को भा सकता है,लेकिन कब तक? अफसोस है कि दिल चाहता है से क्रिएटिव शुरुआत कर चुके निर्देशक फरहान लेखन और निर्देशन में निरंतर बेअसर और कमजोर होते जा रहे हैं।

मूलत: अंग्रेजी में सोचे लिखे गए डायलॉग जब हिंदी में अनूदित होते हैं तो उनमें व्याकरण और प्रयोग की गलतियां होती हैं। फरहान को ऐसी गलतियों से बचना चाहिए। बड़े नामों से जुड़ी यह फिल्म रूप-रंगत में इंटरनेशनल फील देने के बावजूद बांधे रखने में असफल रहती है। इंटरवल के पहले धीमी गति की वजह से ऊब पैदा करती है। शाहरुख खान अपनी लोकप्रिय छवि और स्टाइल को रिपीट करते हुए कई द़श्यों में ठीक नहीं लगते हैं। उन पर उम्र का बोझ हावी है, जो क्लोजअप में जाहिर होता है।

एमआई 4 के ठीक एक हफ्ते बाद रिलीज हो रही डॉन 2 के दृश्यों और मेकिंग को लेकर हम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की स्थिति पर रो ही सकते हैं। हालीवुड की फिल्मों से चोरी की गई दृश्य संरचना को सालों बाद डॉन 2 में देखकर हमें अपने डायरेक्टर और स्टार पर खीझ ही सकते हैं। कलाकारों की बात करें तो ऐसा लगता है कि ओम पुरी को अब अभिनय में आनंद नहीं आता। वे थक चुके हैं। इस बार बोमन ईरानी भी थके और किरदार में मिसफिट नजर आए। निगेटिव होने और दिखने में वे असफल रहे। प्रियंका चोपड़ा के किरदार का कंफ्यूजन उनके परफारमेंस में भी दिखता है। हां,लारा दत्ता अपनी संक्षिप्त मौजूदगी में जिम्मेदारी निभाती हैं। एक सिक्वेंस में आए रितिक रोशन के हिस्से में ज्यादा दृश्य ही नहीं थे।

फरहान अख्तर की डॉन 2 शाहरुख खान की लोकप्रियता को भुनाने में कामयाब नहीं हो पाई है। स्वयं शाहरुख खान अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद दर्शकों को रिझाने में असफल रहते हैं। फिल्म के अंत में आया जंगली बिल्ली गीत तो रोमा और डॉन के संबंधों के समीकरण का घालमेल कर देता है। क्या निर्देशक फरहान अख्तर को इस गीत की कल्पना के समय ख्याल नहीं था कि वे दो घंटे तक रोमा और डॉन को कैसे चित्रित कर रहे थे? फरहान अख्तर डॉन 3 के बारे में न सोचें तो बेहतर...

-अजय बह्मात्मज * 1/2 डेढ़ स्टार

दर्शक भी देखने लगे हैं बिजनेस

-अजय ब्रह्मात्‍मज
र हफ्ते फिल्मों की रिलीज के बाद उनके कलेक्शन और मुनाफे के आंकड़े आरंभ हो जाते हैं। कुछ सालों पहले तक हिट और सुपरहिट लिखने भर से काम चल जाता था। अब उतने से ही संतुष्टि नहीं होती। ट्रेड पंडित और विश्लेषक पहले शो से ही कलेक्शन बताने लगते हैं। मल्टीप्लेक्स थिएटरों के आने के बाद आंकड़े जुटाना, दर्शकों का प्रतिशत बनाता और कुल मुनाफा बताना आसान हो गया है। इन दिनों एक सामान्य दर्शक भी नजर रखना चाहे तो इंटरनेट के जरिए मालूम कर सकता है कि कोई फिल्म कैसा बिजनेस कर रही है। फिल्मों के प्रति धारणाएं भी इसी बिजनेस के आधार पर बनने लगी हैं। सामान्य दर्शक के मुंह से भी सुन सकते हैं कि फलां फिल्म ने इतने-इतने करोड़ का व्यापार किया। क्या सचमुच फिल्म के कलेक्शन से फिल्म के रसास्वादन में फर्क पड़ता है? क्या कलेक्शन के ट्रेंड से आम दर्शक प्रभावित होते हैं?

फिल्में देखना और उन पर लिखना मेरा काम है। शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों की समीक्षा अब शनिवार को अखबारों में आने लगी हैं। इंटरनेट केइस दौर में वो रिव्यू मेल करने के आधे घंटे के अंदर वह ऑनलाइन हो जाती है। इस दबाव में अनेक बार फिल्म के बारे में बनी पहली राय को ही अंतिम राय हो जाती है। मैंने कई दफा महसूस किया है कि भावावेग और जल्दी रिव्यू लिखने के दबाव में फिल्म का उपयुक्त विश्लेषण नहीं हो पाता। इसके अलावा शब्दों की सीमा की भी बाधा रहती है। बहरहाल, इन दिनों पाठकों और प्रशंसकों की जिज्ञासा रहती है कि रिव्यू में फिल्म के चलने या न चलने का भी संकेत मिलें। फिल्मों के प्रिव्यू से निकलने पर मित्रों-परिचितों के प्रश्न होते हैं, कैसी लगी फिल्म? अगर मैंने जवाब दिया अच्छी लगी तो दूसरा सवाल होता है कि चलेगी क्या? इस सवाल से बहुत कोफ्त होती है। किसी फिल्म के चलने या न चलने की भविष्यवाणी कोई समीक्षक कैसे कर सकता है? फिल्म श्रेष्ठ, अच्छी, सामान्य और बुरी के श्रेणी में तो बताई जा सकती है, लेकिन उसके हिट या फ्लॉप होने के बारे में कोई कैसे बता सकता है? हां, ट्रेड पंडित भविष्यवाणियां करते हैं। यह उनका काम है।

फिल्म ट्रेड का असर अब फिल्म पत्रकारिता में बढ़ गया है। टीवी पर जारी फिल्म पत्रकारिता में हिट या फ्लॉप का नजरिया पेश किया जाता है। फिल्म ट्रेड के पंडितों और विश्लेषकों को समीक्षकों के तौर पर पेश किया जाता है। ऐसा घालमेल हो गया है कि ट्रेड विश्लेषक ही क्रिटिक मान लिए गए हैं। फिल्म की गुणवत्ता के आधार पर बात करने वाले समीक्षकों को दोयम दर्जे का समझा जाता है। माना और कहा जाता है कि उन्हें आम दर्शकों की रुचि का कोई अंदाजा नहीं है। फिल्मों को तो आम दर्शक के नजरिए से देखा जाना चाहिए। यही कारण है कि फिल्मों के गंभीर समीक्षकों को खारिज करने का चलन बढ़ा है। इसके अलावा फिल्म इंडस्ट्री में अंग्रेजी के प्रचलन से गैरअंग्रेजी समीक्षकों की राय को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती। दरअसल, निर्माता, निर्देशक और स्टार आम तौर पर न तो हिंदी के अखबार पढ़ते हैं और न ही यह मानते हैं कि भारतीय भाषाओं के कवरेज से फिल्म को फायदा या नुकसान होता है। फिल्म इंडस्ट्री महानगरों की हद से बाहर न तो देख पाती है और न सोच पाती है, जबकि यह सच्चाई सामने आने लगी है कि सुपरहिट होने के लिए हर फिल्म को छोटे शहरों और कस्बों में भी लोकप्रिय होना पड़ेगा। देखें तो इधर 100 करोड़ के क्लब में आई फिल्मों का 40-50 प्रतिशत बिजनेस सिंगल स्क्रीन और छोटे शहरों से आ रहा है।

Thursday, December 22, 2011

टपोरी का किरदार होता है मजेदार-नील नितिन मुकेश

अमित कर्ण

अपनी अगली फिल्म 'प्लेयर्स' में मैं निभा रहा हूं एक हैकर की भूमिका। दरअसल टपोरी टाइप के किरदार मुझे पसद हैं क्योंकि इनमें काफी शेड्स होते हैं

जॉनी गद्दार फिल्म से कॅरियर का शानदार आगाज करने वाले नील नितिन मुकेश इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'प्लेयर्स' के प्रमोशन में व्यस्त हैं। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश :

'प्लेयर्स' में आपका क्या किरदार है?

इसमें मेरा स्पाइडर का किरदार है, जो एक हैकर है। वह इंटरनेट का जाल बुनता और काटता है। यह 'इटैलियन जॉब' की आधिकारिक रूप से रीमेक मूवी है। दर्शकों के मनोरंजन के लिए इसमें हर किस्म के मसाले हैं। कॅरियर के आरंभ से ही मेरी तमन्ना थी कि कभी अब्बास-मस्तान के साथ काम करूं। यह सपना अब पूरा हो चुका है। अब मैं गर्व और दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं उन दोनों के परिवार का हिस्सा हूं।

कंप्यूटर हैकर्स अपराधी होते हैं। ऐसे में इस फिल्म में आपको कानून से सजा मिलती है..?

हैकर्स तो वाकई अपराधी होते हैं। इस फिल्म में हैकर को सजा मिलती है या नहीं? इसके लिए दर्शकों को पहले यह मूवी देखनी होगी।

'जॉनी गद्दार' से लेकर अब तक कई फिल्मों में आपने टपोरी का किरदार निभाया है। ऐसे रोल आपको ज्यादा भाते हैं क्या?

जी हा। ऐसे किरदार मुझे पसद हैं, क्योंकि इनमें काफी शेड्स होते हैं। ऐसा इंसान हर पल एक अलग किस्म के मूड में होता है। वह कभी रो सकता है, कभी हंस सकता है। कभी किसी पर गुस्सा उतार सकता है। लिहाजा वह एक ही समय कई किरदारों को जी रहा होता है।

यानी टपोरी इंसान बुरे नहीं होते हैं?

इंसान अच्छे या बुरे नहीं होते। उनके हालात उन्हें अच्छा या बुरा बनाते हैं। हम कभी यह सोचकर पैदा नहीं होते कि हमें आगे चलकर अपराधी या फिर समाज सुधारक बनना है।

आपका ड्रीम रोल और ड्रीम डायरेक्टर कौन हैं?

ड्रीम रोल के बारे में तो अभी नहीं सोचा है, पर हा ड्रीम डायरेक्टर कई हैं। दिली ख्वाहिश है कि यश जी, राजकुमार हिरानी और नीरज पाडे के साथ काम करूं।

क्या आप रिएलिटी शो भी करने वाले हैं?

नहीं, इस वक्त तो ऐसा कुछ भी नहीं है। वैसे ऑफर तो ढेर सारे हैं। हाल ही में एक म्यूजिक रिएलिटी शो का ऑफर आया था। मुझे अपने परिवार से सगीत विरासत में मिला है। ऐसे में चद रुपयों के लिए कोई ऐसा सतही काम नहीं करूंगा जिसके लिए मन इजाजत न दे।

आपकी नजर में बेहतरीन अभिनेत्रिया कौन हैं और सबसे सेक्सी ड्रेस आप किसे मानते हैं?

पुराने जमाने की अभिनेत्रियों में परवीन बॉबी, वहीदा रहमान, नूतन, दिव्या भारती मेरी फेवरेट हैं। आज की बात करूं तो रिमी सेन, प्रियका चोपड़ा सहित मेरी अन्य सभी को-स्टार पसंद है। जहा तक सबसे सेक्सी ड्रेस का सवाल है तो एक हिंदुस्तानी औरत साड़ी में सबसे ज्यादा खूबसूरत दिखती हैं। मैं अपनी बीवी को हमेशा साड़ी में देखना पसद करूंगा। इसमें अपील और शालीनता दोनों का मिश्रण है।

Wednesday, December 21, 2011

जार्डन को जीने की खुशी से मस्‍त रण्‍बीर कपूर

जे जे खुश हुआ-अजय ब्रह्मात्‍मज

अमूमन फिल्म रिलीज होने के बाद न तो डायरेक्टर किसी से मिलते हैं और न ही ऐक्टर.., लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। रॉकस्टार की रिलीज के बाद जेजे यानी जॉर्डन यानी रणबीर कपूर लोगों से मिले। फिल्म की कामयाबी और चर्चा से वे खुश थे। उन्होंने फिल्म की मेकिंग, किरदार, एक्टिंग और इससे संबंधित अनेक मुद्दों पर बातें कीं। बर्फी की शूटिंग के लिए ऊटी निकलने से पहले बांद्रा स्थित अपने बंगले कृष्णराज में हुई मुलाकात में वे अच्छे नंबरों से पास हुए बच्चे की तरह खुश थे। प्रस्तुत हैं उनके ही शब्दों में उनकी बातें..

फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले के छह महीने हमने और इम्तियाज ने साथ बिताए थे। उस किरदार को समझना बहुत जरूरी था। बॉडी लैंग्वेज और फिजिकल अंदाज तो आ जाएगा। खास कपड़े पहनना, बालों को लंबा करना, दाढ़ी बढ़ाना.. ये सब बड़ी बातें नहीं हैं। किसी किरदार को समझने की एक आंतरिक प्रक्रिया होती है। जॉर्डन की म्यूजिकल क्वालिटी को समझना था। बात करना और चलना भी आ गया था, लेकिन वह अंदर से कैसे सोचता है? एक दो दिनों की शूटिंग के बाद समझ में आ गया। समझ में आने के बाद हम किरदार के साथ एकाकार हो जाते हैं। उसके बाद तो मुश्किल या आसान सीन होते हैं। अच्छे या बुरे दिन होते हैं।

फिल्म जिस क्रम में दिखाई देती है, जरूरी नहीं कि उसी क्रम में शूटिंग हुई हो। हमने लंबे बाल और दाढ़ी के दृश्य पहले किए थे। जनार्दन जाखड़ में मासूमियत है तो जॉर्डन में नाराजगी है। मैं अंदर से नाराज व्यक्ति नहीं हूं और न मुझमें जॉर्डन जैसी इंटेनसिटी है। इस किरदार के जरिए मुझे मौका मिला था यह जाहिर करने का फिल्म में सड्डा हक.. गाने के बाद के फेज में इम्तियाज जो कुछ कहना चाह रहे थे, वह व्यक्त हुआ है। अपने आसपास के समाज के प्रति गुस्सा, पाखंड और दोगलेपन से नाराजगी.. यों समझें कि किसी ने प्लग निकाल दिया हो, फिर भी करंट मौजूद है। जॉर्डन को पता ही नहीं है कि यह सब हीर की वजह से हो रहा है। जॉर्डन वास्तव में एक जीनियस है। आपने किसी जीनियस को करीब से देखा है। वे घबराए और अनिश्चित रहते हैं। इम्तियाज जीनियस हैं। वे जो महसूस कर रहे थे, उसे ही किरदारों के जरिए फिल्म में सजा रहे थे। फिल्म के शुरू में कॉलेज कैंटीन के सीन में खूब मजा आया। पहली बार मुझे किसी भारतीय कॉलेज-यूनिवर्सिटी में जाने और बैठने का मौका मिला। वहां का माहौल और खुशबू.. हॉस्टल देखे। कपड़े-बातचीत.., बिल्कुल अलग दुनिया थी। मैंने न्यूयॉर्क में पढ़ाई की है। यहां के बारे में नहीं जानता था। कैंटीन के सीन में सब रीअल स्टूडेंट्स थे। रीअल लोगों के होने से एक-एक आर्गेनिक फीलिंग आती है। आसपास के सारे लोग रीअल थे, तो मैं भी रीअल हो गया। मेरे अंदर अचानक परिवर्तन हुआ। परफॉर्म करना भूल गया। भूल गया कि मैं ऐक्टर हूं। मैं अपनी उम्र और स्टूडेंट की तरह बातें करने लगा।

इस फिल्म के कुछ दृश्यों में अगर लोगों को राजकपूर की झलक मिली या मैं पापा जैसा लगा, तो वह अनायास था। मैंने किसी की नकल करने की कोशिश नहीं की है। मैंने दादा राजकपूर और पापा की सारी फिल्में देखी हैं। मैं उसी परिवार का सदस्य हूं, तो यह स्वाभाविक है। आप अभिषेक बच्चन की फिल्मों में गौर करेंगे तो कई एंगल और दृश्यों में वे अमिताभ बच्चन की तरह दिखते हैं। अगर मेरे काम में पापा और दादा जी की झलक मिल रही है तो मैं तो इसे शिकायत नहीं, बल्कि कंप्लीमेंट की तरह लूंगा। वैसे मैं बता दूं कि पापा इतने ओरिजनल हैं कि उनकी नकल नहीं हो पाती। जॉनी लीवर स्टेज पर सभी स्टारों की मिमिक्री करते हैं। वे कहते हैं कि ऋषि जी आप की नकल ही नहीं हो पाती। इसकी वजह यही है कि पापा की ऐसी स्टाइल या मैनरिज्म नहीं है।

पापा से प्रेरणा लेकर मैंने फिल्म के गानों पर खास ध्यान दिया। इसे आप शम्मी कपूर जी की प्रेरणा भी कह सकते हैं। वे मोहम्मद रफी के साथ रिकार्डिग में बैठा करते थे। फिल्म में मैं एक संगीतकार हूं, इसलिए पर्दे पर गाते हुए मुझे वास्तविक दिखना चाहिए था। गिटार बनाना भी सही लगे। इस बार मैंने ट्रेनिंग ली है। हर गाने की रिकार्डिग के समय स्टूडियो गया। गाते समय चेहरे के भाव और हाव-भाव पर ध्यान दिया। इस फिल्म के गाने चालू किस्म के नहीं हैं। शुरू में बोल के अर्थ समझ में नहीं आए। इसमें पोएट्री है और अर्थो में गहराई है। इम्तियाज ने मुझे हर शब्द और गाने का मतलब समझाया। जॉर्डन का नजरिया गानों के बोल से समझ में आता है।

जॉर्डन की भूमिका लिए मुझे ढेरों बधाइयां मिलीं। आशीर्वाद मिले, लेकिन दादी का दिया तोहफा तो हमेशा की चीज हो गई। उन्हें बड़े दादा पृथ्वीराज कपूर ने सोने का मेडल किया था। दादी ने मुझे वह भेंट किया और आशीर्वाद दिया कि तुम कपूर परिवार की परंपरा आगे बढ़ा रहे हो। मैं अपने बेटे या पोते-पोतियों में किसी को इसे भेंट करूंगा। सचमुच मैं बहुत खुश हूं और नए जोश और जिम्मेदारी के साथ मेहनत कर रहा हूं।

Tuesday, December 20, 2011

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान-अजय ब्रह्मात्‍मज

फि ल्मों में अपनी जगह बनाने की गरज से कुछ-कुछ कर रहे सलीम खान ने सुशीला से शादी कर उन्हें सलमा नाम दिया था। पहली संतान के आने की आहट थी। मुंबई में देखभाल का पर्याप्त इंतजाम नहीं था तो उन्हें पुश्तैनी घर इंदौर छोड आए। इंदौर में ही अब्दुल रशीद सलमान खान का जन्म हुआ। बडे होकर वे सलमान खान के नाम से मशहूर हुए।

छोटे शहर का हीरो

27 दिसंबर 1965 को जन्मे सलमान खान अपनी जिंदगी में इंदौर का बडा महत्व मानते हैं। इंदौर में अपनी पैदाइश और बचपन की वजह से सलमान हमेशा कहते हैं कि मैं तो छोटे शहर का लडका हूं। अपने देश को पहचानता हूं। मेरी रगों में छोटा शहर है। शायद इसी वजह से देश के आम दर्शक मुझे अपने करीब पाते हैं। मेरी अदाओं और हरकतों में उन्हें अपनी झलक दिखती है। मेरी शैतानियां उन्हें भाती हैं, क्योंकि मैं उनसे अलग नहीं हूं।

सलमान के बचपन की सनक और शरारतों के जानकार बताते हैं कि सलीम खान को उनसे कोई उम्मीद नहीं थी। तीनों भाइयों में अरबाज खान ज्यादा तेज दिमाग के थे। वे शांत और समझदार भी थे। सलमान सनकी होने के साथ जिद्दी भी थे। किसी बात पर अड गए तो मां के सिवा किसी और की बात नहीं मानते थे। आज भी पिता सलीम और मां सलमा ही सलमान की मर्जी के खिलाफ जा सकते हैं या अपनी बात मनवा सकते हैं। सलमान खान ज्यादा बातें और बहस नहीं करते। घर-परिवार, करियर, दोस्ती, चैरिटी जैसे सभी मामलों में वे गौर से सबकी बातें सुनते हैं और उसे गुनते रहते हैं। बातें खत्म होने पर वे थोडी देर के लिए खामोश रहते हैं। तब उनकी पुतलियां बंद पलकों के अंदर बहुत तेज घूमती हैं। मानो वे आगत फैसले को देख रही हों और फिर सलमान खान संक्षेप में अपनी बात कहते हैं और निकल जाते हैं। सभी जानते हैं कि उसके बाद कुछ भी नहीं बदलता। वह अंतिम फैसला होता है। उस फैसले को बदलने का अधिकार केवल मां या पिता को है, लेकिन अधिकतर मामलों में उन्हें अपने बेटे का फैसला सही लगता है। सलमान खान दुनियावी या व्यावहारिक नहीं हैं। कई बार उन्हें अपने फैसलों का परिणाम भुगतना पडता है। लेकिन वे बाज नहीं आते। हमेशा की तरह दिल की सुनते हैं, मानते हैं, उसी पर अमल करते हैं।

रोमैंटिक हीरो

पिता सलीम खान बडे लेखक हो गए थे, लेकिन सलमान के फिल्मों में प्रवेश करने के समय उनके लेखन करियर की सांझ चल रही थी। दोनों चाहते भी नहीं थे कि विशेष लांचिंग के लिए किसी की मदद ली जाए। उनकी एक फिल्म बीवी हो तो ऐसी शुरू भी हो चुकी थी। इसी बीच सलमान को पता चला कि राजश्री प्रोडक्शन के सूरज बडजात्या अपनी पहली फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश कर रहे हैं। सूरज मन बना रहे थे कि आशुतोष गोवारीकर व भाग्यश्री को वे अपनी फिल्म में मौका देंगे। तब दोनों का सीरियल धूप छांव टीवी पर आ रहा था। कहते हैं कि जानकारी के बावजूद सलमान खान उनसे मिलने गए। उन्होंने सूरज बडजात्या को इस कदर प्रभावित किया कि आशुतोष की छंटनी हो गई और वे उनकी फिल्म के हीरो हो गए। सूरज बडजात्या की पहली फिल्म मैंने प्यार किया से सलमान ने रोमैंटिक हीरो की पहचान बनाई और प्रेम के नाम से विख्यात हुए। उन्हें अपना यह नाम बहुत पसंद है। कई फिल्मों में वे इसी नाम से आए हैं।

बरकरार है जादू

सलमान खान अपनी फिल्मों और अदाओं से हमेशा दर्शकों के चहेते बने रहे। गौर करें तो उन्होंने कला और कथ्य के लिहाज से कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं की, फिर भी पिछले 22 सालों से वे पॉपुलर हैं। कुछ खास जादू है उनमें, जो पर्दे पर चमत्कार करता है और आम दर्शकों को उनका दीवाना बना देता है। आलोचकों और सुधी दर्शकों ने उन्हें कभी अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन उन्हें इसकी फिक्र नहीं है। वे स्पष्ट कहते हैं, मैं दर्शकों का अभिनेता हूं। अगर दो-चार समीक्षकों को मेरी फिल्में नापसंद हैं तो क्या फर्क पडता है? देश के करोडों दर्शक मुझे पसंद कर रहे हैं न! मैं उनका मनोरंजन करता हूं। मुझे इसी बात की संतुष्टि है कि वे मुझे देखकर खुश होते हैं। दर्शकों की खुशी के लिए सलमान कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

निजी मदद करने से भी नहीं हिचकिचाते। यही चैरिटी उन्हें जेब पर भारी पडने लगी तो उन्होंने बीइंग ह्यूमन ट्रस्ट स्थापित किया और अब उसके जरिये जरूरतमंदों की मदद जारी है। दस का दम में बडी उम्मीद से आए एक प्रतियोगी को मौका नहीं मिला तो सलमान ने उसे अपनी तरफ से एक लाख देने में हिचक नहीं की।

संस्कार में है चैरिटी

सलमान पर पिता सलीम खान का अंकुश काम करता है। चैरिटी, मदद और जकात पर वे नजर रखते हैं। अगर छूट दे दी जाए तो सलमान अपनी जरूरत भर के पैसे रख कर सब कुछ दान में दे दें। चैरिटी उनके संस्कार में है। सलमान मानते हैं कि वे जो भी कमाते हैं, उसका 20 प्रतिशत उनके निजी उपयोग के लिए काफी है। बाकी 80 प्रतिशत दान किया जा सकता है। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्हें अपने बुढापे की चिंता नहीं है तो उनका कहना होता है, मरते दम तक मैं काम करता रहूंगा। मालूम है कि मैं हमेशा हीरो नहीं रह सकता। उम्रदराज होने पर मैं कैरेक्टर रोल करने लगूंगा, चाचा-ताया की भूमिका में आने लगूंगा। अगर वह भी नहीं मिला तो ऐक्शन डायरेक्टर बन जाऊंगा। मुझे अपनी चिंता नहीं है। अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ करता रहूंगा।

आम दर्शक सलमान को मुख्य रूप से अभिनेता के तौर पर जानते हैं। लेकिन इन दिनों वे लेखन, ऐक्शन, डांस, संगीत, संवाद जैसे सभी क्रिएटिव क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वे अपने अनुभवों व दर्शकों की समझ से सब कुछ बदलते हैं। मजेदार तथ्य है कि दबंग की ओरिजनल स्क्रिप्ट अभी तक ज्यों की त्यों बची हुई है। हमने जो फिल्म देखी, वह मूल ढांचे पर सलमान द्वारा तैयार की गई फिल्म है। वांटेड के बाद से सलमान ने तय किया है कि वे फिल्म की क्रिएटिव लगाम अपने हाथों में रखेंगे। नतीजा सभी के सामने है। उनकी फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही हैं और वे बिजनेस भी कर रही हैं।

सदाबहार लोकप्रियता

पिछली मुलाकात में मैंने उनसे पूछा था कि दर्शकों से उनका कैसा कनेक्शन है? क्या उसे परिभाषित किया जा सकता है? उनकी पॉपुलैरिटी का विश्लेषण किया जा सकता है? सलमान ने सरल शब्दों में बताया कि दर्शक जब हमारी ताजा फिल्म देखने आते हैं तो उनके मन में हमारी पुरानी छवि रहती है। मेरी पुरानी फिल्में, भूमिकाएं, मेरी निजी जिंदगी, मेरी चैरिटी, मेरा स्वभाव और मेरी इमेज.. इन सभी के सम्मिलित प्रभाव के साथ ही फिल्म का अपना असर होता है। ज्यादातर पॉपुलर और पुराने ऐक्टर के साथ यही बात होती है। यही वजह है कि हम सभी की फिल्मों को ओपनिंग मिलती है। पहले दो-तीन दिन दर्शक पिछले प्रभाव में आते हैं। उसके बाद अगर फिल्म में दम हो तो फिर वह चलती है। हमारा ब्रैंड बडा होता है और हमारी इमेज भी गहरी होती है। दर्शकों को हमारी अगली फिल्म का इंतजार रहता है।

सलमान फिल्म समीक्षकों और इतिहासकारों की समझ और विश्लेषण पर गौर नहीं करते। उनका क्रेज देश के बहुसंख्यक निम्न मध्यमवर्गीय व गरीब तबके के दर्शकों के बीच ज्यादा है। मुंबई में तबेले और चालों के बच्चे उनके नाम की माला जपते हैं। उनकी फिल्मों में एक गैर-इरादतन बदतमीजी रहती है, जो बच्चों, किशोरों और युवकों को बहुत पसंद आती है। उनकी फिल्मों में हीरो-हीरोइन का रिश्ता छेडखानी और बदतमीजी से भरा रहता है, जिसमें हीरो आमतौर पर हीरोइनों से दूर रहने या भागने की कोशिश करता है। हीरो जमीर का पक्का होता है। अपनी कही बातों से मुकरता नहीं और वादा कर लिया तो फिर जान पर खेल कर भी उसे पूरा करता है। हिंदी सिनेमा की गढी गई इस परिकथा को उनकी फिल्में आज भी बखूबी पेश करती हैं और दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। बॉडीगार्ड की रिलीज के समय भयंकर दर्द के बावजूद उन्होंने अपने कमिटमेंट पूरे किए और कैमरे के आगे मुस्कराते रहे।

उदारता का आलम

दयालुता का आलम एक परिचित बताते हैं। बांद्रा के एक स्कूल में सलमान पढा करते थे। वहां लंच ब्रेक में बांद्रा से दूर के बच्चों को दिक्कत होती थी। एक टीचर ने सुझाव दिया कि अगर बांद्रा के लडके अपने सहपाठियों को लंच में बारी-बारी साथ ले जाएं तो उन्हें सहूलियत होगी। सलमान दस सहपाठियों को लेकर घर पहुंच गए। मां ने सभी के लिए लंच तैयार किया। यह सिलसिला लगभग दो साल तक चला। खाने-खिलाने के शौकीन सलमान आज भी शूटिंग में घर से लंच मंगवाते हैं। एक खास जीप है, जिसमें टिफिन व कंटेनर लाने-ले जाने का इंतजाम है। कम से कम पंद्रह व्यक्तियों का लंच तैयार होता है। वह ज्यादा नखरैल नहीं हैं। बताते हैं कि रात में देर से लौटने पर वे किसी को तंग नहीं करते। किचन में जाकर बचे-खुचे खाने को पैन में रखते हैं और घी का तडका लेकर स्पेशल मिक्स डिश का आनंद उठाते हैं।

सलमान को पेंटिंग का सलीका अपनी मां से मिला है। शादी के कई सालों बाद तक सलमा पेंटिंग करती रही थीं। सलमान को नींद नहीं आती। रात में जागने और दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने का उन्हें शौक है। कई बार दोस्त नहीं होते या उनका मूड मौज-मस्ती करने का होता है तो वे पेंटिंग करते हैं। सलमान ने अपनी ज्यादातर पेंटिंग्स रात में तैयार की हैं। इसी कारण उनमें एक अलग रंग और छटा दिखाई पडती है। उनकी पेंटिंग में उदासी, एकाकीपन और छटपटाहट जाहिर होती है, जो वास्तव में सलमान का निजी एकांत है। अपनी लोकप्रियता और व्यस्तता के बीच भी निहायत अकेले हैं सलमान खान।

निजता में प्रवेश

उनके पिता कहते भी हैं सलमान खान के जीवन में आई लडकियों में से कोई भी उनके इस एकांत में प्रवेश नहीं कर सकी। कुछ सालों और समय के बाद अपना स्वार्थ पूरा कर सारी लडकियां चलती बनीं। केवल ऐश्वर्या राय से उनका प्रेम गहरा और वास्तविक था, लेकिन सलमान खान ने अपने स्वभाव के भटकाव और अपनी आदतों के कारण उन्हें खो दिया।

अपनी सारी उदारता और दयालुता के बावजूद सलमान खान में एक सामंती पुरुष भी है, जो औरतों को सिर्फ बहन और मां के रूप में ही इज्जत देना जानता है। प्रेमिकाओं से उनके संबंध बराबरी और आदर के कभी नहीं रहे। ऊपरी तौर वे कहते हैं कि शादी बच्चों के लिए की जाती है। मेरे परिवार में पहले से इतने बच्चे हैं कि मुझे शादी की जरूरत ही नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सलमान को किसी प्रकार का बंधन एक सीमा के बाद स्वीकार नहीं होता। हालांकि वे अपने भाई-बहनों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिलहाल तो एक-एक कर वे सभी को सफल निर्माता बना रहे हैं। उनकी फिल्में कर रहे हैं।

बादशाहत का भ्रम

सलमान खान को महेश भट्ट मौलिक शैतान छोकरा कहते हैं। उनके खयाल में सलमान खान की शैतानी कई बार उद्दंडता में बदल जाती है। वास्तव में सलमान खान जिस तरह की सीमित दायरे की जिंदगी जीते हैं, उसमें उन्हें दुनिया के दस्तूर से विशेष मतलब नहीं रहता। ऐसे सफल व्यक्ति खुद को अपनी दुनिया का बादशाह समझने की गलती कर बैठते हैं। उन्हें लगता है कि वे कानूनों, नियमों और बंधनों से परे हैं। ऐसे में उनके परिजनों और परिचितों की मुसीबतें बढती हैं। लोग पूछते हैं कि सलीम-जावेद की जोडी टूटने के बाद से सलीम खान और कुछ क्यों नहीं रच पाए। वास्तव में सलीम खान की पूरी ऊर्जा अपने इस शैतान बेटे को संभालने में ही गुजरती रहती है। सलमान खान सलीम खान की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं।

Saturday, December 17, 2011

सच है कि इस इंडस्ट्री में पुरुषों की प्रधानता है-प्रियंका चोपड़ा

लेडी डॉन-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रियंका चोपड़ा की शाहरुख खान अभिनीत फिल्म डॉन-2 आ रही है। इसमें उनकी क्या भूमिका है और वे नया क्या कर रही हैं, बता रही हैं इस बातचीत में..

डॉन-2 की कहानी कितनी बदली और आगे बढ़ी है?

यह सीक्वल है। पिछली फिल्म खत्म होते समय सभी को पता चल गया था कि विजय ही डॉन है। यह फिल्म वहीं से शुरू होती है। चार साल बाद वही कहानी आगे बढ़ती है। रोमा महसूस करती है कि उसके साथ धोखा हुआ। उसे विजय से प्यार हो गया था, लेकिन विजय तो डॉन निकला।

फिर तो रोमा भी नाराज और अग्रेसिव होगी?

बिल्कुल.., बीच के चार सालों में ट्रेनिंग लेकर रोमा पुलिस ऑफिसर बन चुकी है। उसका एक ही मकसद है कि किसी तरह वह डॉन को पकड़े और उसे सीखचों के पीछे लाए। उनका आमना-सामना होता है तो उनके बीच नफरत और मोहब्बत का रिश्ता बनता है। चूंकि विजय ने उसे धोखा दिया है, इसलिए रोमा उससे बहुत नाराज है। पूरी फिल्म में लोग मुझे गुस्से में ही देखेंगे। उस गुस्से में एक मोहब्बत भी है, क्योंकि रोमा को प्यार तो उसी व्यक्ति से हुआ था।

सुना है कि आपने ऐक्शन किया है डॉन-2 में..। क्या हम उम्मीद करें कि द्रोण की तरह आप फिर से ऐक्शन करती दिखेंगी?

उतना ज्यादा तो नहीं है। इस फिल्म का ऐक्शन हाथापाई तक सीमित है। रोमा पुलिस ऑफिसर है तो कुछ तो ऐक्शन होगा ही। दोनों के बीच क्रिमिनल और पुलिस ऑफिसर का भी तो रिलेशनशिप है।

शाहरुख खान हमेशा आपके सपोर्ट में रहे हैं। उनके साथ फिल्म करने का मतलब निश्चित कामयाबी मानी जाती है। आप क्या सोचती हैं?

उनके साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है और यह पिछली फिल्म की अगली कड़ी है। आपने सही कहा कि वे अपनी हीरोइनों के लिए लकी होते हैं। हमारी पिछली फिल्म सफल रही थी। इस फिल्म से भी वैसी ही उम्मीद है। शाहरुख की फिल्म को पर्याप्त दर्शक मिल जाते हैं।

और क्या-क्या चल रहा है? सुना है आप गाने भी गा रही हैं? दूसरी तरफ फिल्मों के फ्रंट पर भी बिजी हैं?

अभी तो बहुत कुछ हो रहा है। अग्निपथ पूरी हो चुकी है। जल्दी ही उसका प्रमोशन चालू होगा। उसके बाद बर्फी और कुणाल कोहली की फिल्म खत्म कर रही हूं मैं। मेरी कृष भी शुरू हो रही है। मेरा अंग्रेजी में एलबम आ रहा है।

एलबम के बारे में थोड़ा बताएंगी?

यह अंग्रेजी का एलबम है। विदेश में तैयार हो रहा है। इंटरनेशनल स्तर पर इसे रिलीज किया जाएगा। भारत में भी वह रिलीज होगा। खुद एलबम के गाने लिख रही हूं। गानों की रिकार्डिग के दौरान कई निर्माताओं से मुलाकात हुई। नए ढंग का एक्सपीरिएंस रहा। यह मुख्य रूप से पॉप एलबम है। कुछ लव सॉन्ग भी होंगे।

क्या आपने अपनी म्यूजिक कंपनी बनाई है या किस तरह का अरेंजमेंट हुआ है?

यह अमेरिका की मशहूर म्यूजिक कंपनी है। लेडी गागा, एमएनएम और दूसरे बड़े आर्टिस्ट के एलबम यहां से रिलीज हुए हैं। मुझे लगता है कि किसी इंडियन आर्टिस्ट के लिए यह बड़ा मौका है। मेरे लिए तो बहुत बड़ा अचीवमेंट है।

गाने का शौक कैसे और फिर एलबम लाने का इरादा क्यों हुआ? गाना ही था तो फिल्मों के लिए क्यों नहीं गाया?

सच कहूं तो मैं एक्टिंग के पहले से गीत गा रही हूं। पापा गायक रहे हैं। संगीत से हमारा वास्ता रहा है। उस तरफ ज्यादा ध्यान तब नहीं दे सकी। एक्टिंग में मेरा करियर 17 साल की उम्र में शुरू हो गया था, इसलिए गाने पर ध्यान नहीं गया। मुझे जब यूनिवर्सल से म्यूजिक के लिए अप्रोच किया गया तो मुझे लगा कि एक अच्छा प्लेटफार्म मिल रहा है, मैंने सोचा कि कर लेने में क्या हर्ज है? एक्टिंग तो कर ही रही हूं।

अग्निपथ और बर्फी के बारे में कुछ बताएंगी?

अग्निपथ में मैं काली की भूमिका निभा रही हूं। ओरिजनल फिल्म से यह किरदार बदल गया है। यह एक नया किरदार है। काली एक वेश्या की बेटी है, लेकिन वह वेश्यावृति में नहीं जाना चाहती। उसे विजय से प्यार है। विजय ही उसकी जिंदगी है। इस फिल्म में मैं एक चुलबुली मराठी लड़की का किरदार निभा रही हूं। वह मस्ती पसंद करती है। कुणाल कोहली की फिल्म का टाइटिल अभी तक नहीं मिला है। वह तीन युगों की कहानी है। तीन जन्मों में वह अपने प्रेमी से मिलती है। प्यार के रिश्ते में सात जन्मों की बात की जाती है, लेकिन यह फिल्म तीन जन्मों की है। कृष के बारे में अभी कुछ भी बताना जल्दबाजी होगी। कृष सुपरहीरो है और मैं उसका लव इंटरेस्ट हूं। कह सकती हूं कि अभी मेरे पास पर्याप्त काम है और हां, अनुराग बसु की बर्फी में ऑस्टिक गर्ल की भूमिका में हूं।

लगता है इंडस्ट्री ने हीरोइनों पर ध्यान देना शुरू किया है। इधर द डर्टी पिक्चर भी हिट हुई है और अब हीरोइन बन रही है?

मेरी लाइफ में तो फैशन आ चुकी है। इंडस्ट्री में आए चार साल भी नहीं हुए थे कि वह फिल्म मिली और उसके लिए अवार्ड भी मिले। अभी 7 खून माफ भी मैंने की। ठीक है कि फिल्म नहीं चली, लेकिन लोगों ने मेरे काम की तारीफ की। फिर कोई ऐसी फिल्म मिलेगी, तो जरूर करूंगी। इस बदलाव के बावजूद यह भी सच है कि इस इंडस्ट्री में पुरुषों की प्रधानता है। हमें पैसे कहां मिलते हैं। अगर मुख्य रोल है तो पैसे भी बढ़ने चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसी बराबरी कभी हीरोइनों को मिल पाएगी।

अभी की अभिनेत्रियों के लिए कितने काम हो गए हैं। फिल्मों के साथ बाकी सारी चीजें भी करनी पड़ती हैं। कैसे संतुलन बिठाती हैं?

मेरा मुख्य काम एक्टिंग है। यही मेरा पेशा है। फिल्म रहेंगी और चलेंगी, तभी दूसरी चीजें होती रहेंगी, इसलिए सबसे ज्यादा ध्यान फिल्मों पर देती हूं। बाकी मेरी एक टीम है, जो सभी चीजों और समय का ध्यान रखती है। अभी हमें क्या करना उनके लिए संतुलन बिठाना पड़ता है।

फिल्‍म समीक्षा : पप्‍पू कांट डांस साला

पप्पू कांट डांस साला: सिंपल प्रेम कहानी-अजय ब्रह्मात्‍मज

दो पृष्ठभूमियों से आए विद्याधर और महक संयोग से टकराते हैं। दोनों अपने सपनों के साथ मुंबई आए है। उनके बीच पहले विकर्षण और फिर आकर्षण होता है। सोच और व्यवहार की भिन्नता के कारण उनके बीच झड़प होती रहती है। यह झड़प ही उनके अलगाव का कारण बनता है और फिर उन्हें अपनी तड़प का एहसास होता है। पता चलता है कि वे एक-दूसरे की जिंदगी में दाखिल हो चुके हैं और साथ रहने की संतुष्टि चाहते हैं। ऐसी प्रेमकहानियां हिंदी फिल्मों के लिए नई नहीं हैं। फिर भी सौरभ शुक्ला की फिल्म पप्पू कांट डांस साला चरित्रों के चित्रण, निर्वाह और परिप्रेक्ष्य में नवीनता लेकर आई है।

सौरभ शुक्ला टीवी के समय से ऐसी बेमेल जोडि़यों की कहानियां कह रहे हैं। उनकी कहानियों का यह स्थायी भाव है। नायक थोड़ा दब्बू, पिछड़ा, भिन्न, कुंठित, जटिल होता है। वह नायिका के समकक्ष होने की कोशिश में अपनी विसंगतियों से हंसाता है। इस कोशिश में उसकी वेदना और संवेदना जाहिर होती है। पप्पू कांट डांस साला की मराठी मुलगी महक और बनारसी छोरा विद्याधर में अनेक विषमताएं हैं, लेकिन मुंबई में पहचान बनाने की कोशिश में दोनों समांतर पटरियों पर चले आते हैं। सौरभ शुक्ला ने एक सिंपल सी प्रेमकहानी सहज तरीके से चित्रित की है।

विनय पाठक ऐसे सिंपल चरित्र कई फिल्मों में निभा चुके हैं। अपनी इस इमेज से उन्हें कई फायदे हो जाते हैं। लेखक-निर्देशक भी अतिरिक्त दृश्यों से बच जाते हैं। समस्या वैसे दर्शकों के साथ हो सकती है, जो पहले से विनय पाठक और उनकी फिल्मों को नहीं जानते। नेहा धूपिया ने महक के किरदार को सुंदर तरीके से निभाया है। उन्होंने दृश्य की जरूरतों के मुताबिक बगैर मेकअप के शॉट देने में भी गुरेज नहीं किया है। महक के द्वंद्व और सोच को वह ढंग से अभिव्यक्तकरती हैं। रजत कपूर के किरदार पलाश को विस्तार नहीं मिल पाया है। संजय मिश्रा चंद दृश्यों की झलक में ही अपनी छटा छोड़ जाते हैं। पप्पू कांट डांस साला एक सीधी सरल फिल्म है, जो बासु चटर्जी और हृषीकेश मुखर्जी के दौर की फिल्मों से जुड़ती है।

रेटिंग- *** तीन स्टार

Thursday, December 15, 2011

फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो

-अजय ब्रह्मात्‍मज

फर्स्‍ट लुक और प्रोमो....आजकल इसे एक इवेंट का रूप दे दिया जाता है। निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों का फ‌र्स्ट लुक जारी करने के लिए किसी होटल या थिएटर में मीडिया को आमंत्रित करते हैं और फिर विभिन्न माध्यमों से फिल्म की चर्चा आरंभ होती है। छिटपुट रूप से ऐसी कोशिशें काफी सालों से की जा रही थीं, लेकिन आमिर खान ने गजनी की रिलीज के पहले इसका प्रोमो मीडिया के साथ शेयर किया था। साथ ही अपने विशेष लुक को देश के प्रमुख अखबारों के जरिए दर्शकों तक पहुंचाया था। तब से यह जोरदार तरीके से इंडिपेंडेंट इवेंट के तौर पर प्रचलित हुआ। फ‌र्स्ट लुक जारी करने का इवेंट अब कई स्तरों और रूपों में शुरू हो चुका है। कुछ निर्माता-निर्देशक सोशल मीडिया नेटवर्क का उपयोग कर रहे हैं। फ‌र्स्ट लुक प्रकट होते ही यह वायरस की तरह फैलता है। इसी से दर्शकों की पहली जिज्ञासा बनती है।

याद करें तो पहले पत्र-पत्रिकाओं में तस्वीरें और थिएटर में ट्रेलर चलते थे। पत्र-पत्रिकाओं में निर्देशक और फिल्म के प्रमुख स्टार्स के इंटरव्यू के साथ छपी तस्वीरों से दर्शकों का कयास आरंभ होता है। यहीं से संबंधित फिल्म के दर्शक बनने शुरू हो जाते हैं। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में सचित्र फीचर छपते थे। किसी भी फिल्म के प्रति बनी जिज्ञासा का अध्ययन करें तो सबसे पहले घोषणा, फिर कलाकारों का चयन, निष्कासन, फेरबदल, मुहूर्त, शूटिंग की छिटपुट खबरें, सेट पर रोमांस, तनाव और झगड़ों की खबरें, पोस्ट-प्रोडक्शन और डबिंग की सूचनाएं, रिलीज की तारीख की घोषणा और आखिर में फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो। जरूरी नहीं कि हर फिल्म के प्रचार अभियान में यही क्रम रखा जाए। फिर भी सारी फिल्में घोषणा से प्रदर्शक के बीच इन पड़ावों से गुजर कर ही दर्शकों तक पहुंचती हैं। दर्शक इस दरम्यान अपना मन बनाते रहते हैं। आदतन पहले दिन पहले शो के दर्शकों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर दर्शक फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो के आधार पर फिल्म देखने या नहीं देखने का फैसला करते हैं। रिलीज के बाद अखबारों और टीवी चैनलों के रिव्यू भी कई बार दर्शकों की हां या ना को बदलते हैं। कई बार फिल्म की हवा बन जाती है तो दर्शक उमड़ पड़ते हैं।

चूंकि दर्शकों को रिझाने और थिएटर में लाने के लिए फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो निहायत जरूरी हो गए हैं। इसलिए अब उनके विशेषज्ञ भी सामने आ गए हैं। फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो के लिए निर्माता-निर्देशक उनकी मदद लेते हैं। पब्लिसिटी डिजाइनर और प्रोमो स्पेश्लिस्ट के तौर पर मशहूर ये लोग इस फन में माहिर होते हैं। निर्देशक कई बार प्रोमो विशेषज्ञों के साथ बैठकर फिल्म के डिफरेंट प्रोमो तैयार करते हैं। कई अवसरों पर देखा गया है कि निर्माता प्रोमो के निर्माण में निर्देशक की मदद भी नहीं लेता। वह अपनी फिल्म के हित में दर्शकों को छलता है। इन दिनों दर्शकों को धोखा देने या बहकाने का सिलसिला बढ़ गया है। अक्सर प्रोमो आकर्षक और लुभावना होता है, लेकिन फिल्म घिसी-पिटी और बोरिंग निकलती है।

फिल्मों के विषय और स्टार वैल्यू के आधार पर ही फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो तैयार किए जाते हैं। आमतौर पर स्टार, फिल्म का विषय और फिल्म की खासियत को ध्यान में रखा जाता है। कोशिश रहती है कि दर्शकों को कुछ नया दिखे। फिल्म के स्टार भी फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो के कॉन्सेप्ट और निर्माण में बराबर का सहयोग देते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में तीनों खान खुद तय करते हैं कि उनकी फिल्मों का फ‌र्स्ट लुक कैसा होगा और कौन सा प्रोमो कब चलाया जाएगा? निर्माता के निवेश से अधिक बड़ा दांव उनके स्टारडम का रहता है। वे नहीं चाहते कि कोई कसर रह जाए और एक भी दर्शक-प्रशंसक गुमराह हो।

फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो ही दर्शकों को फिल्म देखने का पहला निमंत्रण देते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में कहा जाता है कि दर्शक फ‌र्स्ट लुक और प्रोमो से ही सूंघ लेते हैं। उन पर आक्रामक प्रचार का भी असर नहीं होता। वे रिलीज के पहले ही तय कर चुके होते हैं कि फिल्म देखनी है या नहीं देखनी है? फिर भी रिझाने-लुभाने का सिलसिला जारी रहता है।

Tuesday, December 6, 2011

भोजपुरी सिनेमा में बदलाव की आहट


-अजय ब्रह्मात्‍मज

भोजपुरी फिल्मों की गति और स्थिति के बारे में हम सभी जानते हैं। इसी साल फरवरी में स्वर्णिम भोजपुरी समारोह हुआ। इसमें पिछले पचास सालों के इतिहास की झलक देखते समय सभी ने ताजा स्थिति पर शर्मिदगी महसूस की। अपनी क्षमता और लोकप्रियता के बावजूद भोजपुरी सिनेमा फूहड़ता के मकड़जाल में फंसा हुआ है। अच्छी बात यह है कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शकों का एक बड़ा वर्ग है। बुरी बात यह है कि भोजपुरी सिनेमा में अच्छी संवेदनशील फिल्में नहीं बन रही हैं। निर्माता और भोजपुरी के पॉपुलर स्टार जाने-अनजाने अपनी सीमाओं में चक्कर लगा रहे हैं। वे निश्चित मुनाफे से ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे प्रयोग के लिए तैयार नहीं हैं और मान कर चल रहे हैं कि भोजपुरी सिनेमा के दर्शक स्वस्थ सिनेमा पसंद नहीं करेंगे।

भोजपुरी सिनेमा के निर्माताओं से हुई बातचीत और पॉपुलर स्टार्स की मानसिकता को अगर मैं गलत नहीं समझ रहा तो वे भोजपुरी सिनेमा में आए हालिया उभार के भटकाव को सही दिशा मान रहे हैं। मैंने पॉपुलर स्टार्स को कहते सुना है कि अगर हम सीरियस और स्वस्थ होंगे तो भोजपुरी का आम दर्शक हमें फेंक देगा। सौंदर्य की स्थूलता और दिखावे पर अधिक भरोसा करने के साथ भड़कीले अंदाज को ही पाला-पोसा जाता है। हर फिल्म में कुछ ऐसा जोड़ दिया जाता है, जो अश्लीलता की हदों को आसानी से छूता है। थोड़ी देर के लिए मैं मान सकता हूं कि अधिकांश दर्शक इस अश्लीलता के आनंद के लिए ही भोजपुरी फिल्में देखते हैं, लेकिन इसके साथ ही क्या भोजपुरी सिनेमा उन दर्शकों को नहीं खो रहा है, जो अश्लीलता की वजह से भोजपुरी फिल्में ही नहीं देखते।

पिछले दिनों रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी मखान पोखर पर बनी फिल्म सैयां ड्राइवर बीवी खलासी रिलीज हुई। इस फिल्म का शीर्षक आम भोजपुरी फिल्म का एहसास देता है। मखान पोखर में रेणु के बाद के उत्तर बिहार के समाज की आंचलिक झलक है। इस कहानी पर आधारित फिल्म के लेखक निलय उपाध्याय और निर्देशक अंजनी कुमार ने कहानी के मूल भाव को सुरक्षित रखते हुए उसके शीर्षक में चालू फिल्मों का आकर्षण रखा। मुमकिन है उनके ऊपर निर्माता या भोजपुरी सिनेमा के बाजार का दबाव हो, लेकिन उन्होंने फिल्म के कथ्य से समझौता नहीं किया। खबर है कि इस फिल्म को भोजपुरी सिनेमा के आम दर्शक ने अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन इसे कुछ नए दर्शक मिले। साथ ही भोजपुरी के उन नियमित दर्शकों को संतुष्टि हुई, जो बेहतरीन सिनेमा की आस में थे।

मैंने हाल ही में देसवा देखी। इस फिल्म के निर्देशक नितिन चंद्रा के वक्तव्यों और बयानों के बावजूद मैं फिल्म के प्रति आशंकित था। नितिन लगातार समकालीन भोजपुरी सिनेमा की भ‌र्त्सना कर रहे थे, लेकिन अपनी फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता रहे थे। देसवा को आरंभिक रूप में देख चुके कुछ मित्रों ने इसे पसंद नहीं किया था। अभी देसवा जिस रूप में प्रदर्शित हो रही है, वह अपनी अंतर्निहित सीमाओं के बावजूद आशान्वित करती है कि भोजपुरी में बेहतर सिनेमा की उम्मीद खत्म नहीं हुई है। देसवा भोजपुरी में बनी एक शिष्ट फिल्म है। साथ ही यह अपने निकट अतीत और वर्तमान की बातें करती हैं। भाषा और लोक परंपरा के नाम पर यह भदेस और फूहड़ नहीं हुई है, अभिनय के स्तर पर भी यह फिल्म अन्य भाषाओं की फिल्मों के समकक्ष है। निर्देशक नितिन चंद्रा और निर्माता नीतू चंद्रा के इस महत्वपूर्ण प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। भोजपुरी सिनेमा के बाजार को उदारता दिखाते हुए देसवा को जगह देनी चाहिए। देसवा के प्रदर्शन की दिक्कतों को दूर कर उसे आम दर्शकों तक पहुंचने की राह सुगम करनी चाहिए। भोजपुरी में देसवा जैसी फिल्मों की भी जरूरत है

Monday, December 5, 2011

देव आनंद :मौत ने तोड़ दी एक हरी टहनी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

किताबों,पत्रिकाओं,फिल्मों और विचारों से भरे दफ्तर के कमरे में बिना नागा हर दिन देव आनंद आते थे। अपना फोन खुद उठाना और खास अंदाज में हलो के साथ स्वागत करना ़ ़ ़मूड न हो तो कह देते थे देव साहब अभी नहीं हैं। बाद में फोन कर लें। अगर आप उनकी आवाज पहचानते हों तो उनके इस इंकार से नाराज नहीं हो सकते थे,क्योंकि वे जब बातें करते थे तो बेहिचक लंबी बातें करते थे।

पिछले कुछ सालों से उन्होंने मिलना-जुलना कम कर दिया था। अपनी फिल्मों की रिलीज के समय वे सभी को बुलाते थे। पत्रकारों को वे नाम से याद रखते थे और उनके संबोधन में एक आत्मीयता रहती थी। बातचीत के दरम्यान वे कई दफा हथेली थाम लेते थे। उनकी पतली जीर्ण होती उंगलियों और नर्म हथेली में गर्मजोशी रहती थी। वे अपनी सक्रियता और संलग्नता की ऊर्जा से प्रभावित करते थे। इस उम्र में भी उनमें एक जादुई सम्मोहन था।

देव आनंद ने अपने बड़े भाई चेतन आनंद से प्रेरित होकर फिल्मों में कदम रखा। आरंभ में उनका संपर्क इप्टा के सक्रिय रंगकर्मियों से रहा। नवकेतन की पहली ही फिल्म अफसर की असफलता से उन्हें हिंदी फिल्मों में मनोरंजन की महत्ता को समझ लिया। बाद में बाजी की सफलता ने उनके विश्वास को पक्का कर दिया। उन्होंने नवकेतन के बैनर तले मनोरंजक फिल्मों का निर्माण किया। अपने समकालीन राज कपूर और दिलीप कुमार से अलग उन्होंने शहरी युवक की ज्यादा भूमिकाएं निभाई। ऐसा शहरी युवक जो समाज के स्याह हाशिए पर रहता है और अपने सरवाइवल के लिए गैरकानूनी काम करने से भी नहीं हिचकता।

आज के स्याह और ग्रे चरित्रों से भिन्न देव आनंद की फिल्मों के नायकों का एक सामाजिक आधार और लॉजिक रहता था। पहनावे,बोलचाल और अंदाज में उन्हें आजादी के बाद शहरों में तेजी से सपनों के साथ बड़े हो रहे युवकों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जा सकता है। उनकी लोकप्रियता का अनुमान आज के पाठक और दर्शकनहीं लगा सकते। वैसी लोकप्रियता के पासंग में केवल राजेश खन्ना और रितिक रोशन पहुंच पाए। श्वेत-श्याम फिल्मों के दौर में देव आनंद के व्यक्तित्व का ऐसा जादू था कि उनके बाहर निकलने और काले कपड़े पहनने पर पाबंदी लगा दी गई थी।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी जमाने में पॉपुलर रह रात कपूर,दिलीप कुमार और देव आनंद की त्रयी में सबसे लंबी और सक्रिय पारी देव आनंद की ही रही। बतौर एक्टर उन्होंने 114 फिल्मों में काम किया। उन्होंने 31 फिल्मों का निर्माण् किया और 19 फिल्मों के स्वयं निर्देशक रहे। उन्होंने अनेक प्रतिभाओं को पहला मौका दिया और फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने के अवसर दिए। कभी किसी से बदले में न कुछ मांगा और न लिया। आखिरी दिनों में मशहूर हस्तियां उनकी फिल्मों का हिस्सा बनने से किनारा करने गी थीं तो उनकी मायूसी झलक जाती थी,लेकिन उन्होंने कभी किसी की शिकायत नहीं की और न ही अपनी अपेक्षाओं को जाहिर होने दिया। सुरैया से शादी न कर पाने की कसक ताजिंदगी रही। उन्होंने अभिनेत्रियों से अपने प्रेम और भाव को नहीं छिपाया। अपनी आत्मकथा में जीवन के सभी प्रसंगों को उन्होंने विस्तार से लिखा।

ग्लैमर की इस दुनिया में रहने के बावजूद उनका जीवन एकाकी था। कहना मुश्किल है कि उन्होंन साथ छोड़ा या उनक ा हमसफर रहे लोगों ने खुद राह बदल ली,लेकिन सच है कि वे अकेले हो गए थे। वे कहते थे,मैं एकान्त में रहना चाहता हूं। मैं काम करते रहना चाहता हूं।फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है मेरे पास। मैं इसे ठीक से नहीं बता सकता। यही मरा स्वभाव है। शायद इसी कारण मैं देव आनंद हूं। फिल्में उनके साथ रहीं और वे फिल्मों में डूबे रहे। अंतिम फिल्म चार्ज शीट की रिलीज के समय उन्होंने कहा था कि मैं चुप नहीं बैठूंगा। मैं एक म्यूजिकल फिल्म बनाना चाहता हूं। साथ ही हरे कृष्णा हरे राम को आज के युवकों के लिए नए रूप में पेश करना चाहता हूं। रोहन सिप्पी की फिल्म दम मरो दम में अपनी फिल्म के गाने के इस्तेमाल से वे दुखी हुए थे। उनका मानना था कि पुरानी फिल्मों और गानों के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।

ऐसा लग रहा है कि सदाबहार पेड़ की हरी टहनी किसी ने अचानक तोड़ दी है। इस टहनी के सारे पत्ते हरे हैं और फूल खिले हैं। 88 की उम्र में भी कुछ नया करने के लिए बेताब देव आनंद का दिल हमेशा जवान और हरा रहा। देव आनंद ने अपने ऊपर उम्र की थकान और बीमारी को कभी हावी नहीं होने दिया। उनकी किसी लंबी या गंभीर बीमारी की कभी कोई खबर नहीं आई। पिछली रात नींद में ही उन्होंने हमें अलविदा कह दिया।

उनकी इेमज और बेफिक्र व्यक्तित्व के संबंध में एक पुराने इंटरव्यू के प्रासंगिक अंश ़ ़ ़

-आपका अलहदा बेफिक्र व्यक्तित्व कैसे बना?

यह मैंने सोचा नहंी था। फिल्मों और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं से हमारा व्यक्तित्व बनता है। जिद्दी,बाजी और टैक्सी ड्रायवर से शहरी और बेफ्रिक इमेज बनी। दर्शकों को इा रूप में मैं अच्छा लगा तो मैंने और मेरे निर्देशकों ने उसी इमेज के अलग-अलग शेड्स फिल्मों में रखे। मेरी खास इमेज विकसित हुई।

जिद्दी से आपको सफलता और इमेज दोनों मिली। आ ने शहरी और थोड़े निगेटिव किरदार निभाए। आश्चर्य है कि तब भी लोगों ने आपको पसंद किया?

सही बात है कि जिद्दी से सफलता और पहचान दोनेां मिली। बांबे टाकीज की वह फिल्म थी। अशोक कुमार ने वह फिल्म दी थी। जिद्छी के बाद आई बाजी में मेरे लिए रोल लिखा गया। बलराज याहनी ने बाजी लिखी थी। बाजी से मिली इमेज ही आगे बढ़ती गई।टैक्सी ड्रायवर,काला पानी,काला बाजार में भी निगेटिव किरदार थे। जाल में भी गुरूदत्त ने निगेटिव किरदार दिया। आप देखें की गाइड का किरदार भी निगेटिव है। उस समय दूसरे की बीवी के साथ रहना साहसी विषय था।

आप के चरित्र समाज के अंधेरे इलाके से आते थे,लेकिन दिल से वे अच्छे होते थे। यह कोशिश होती थी कि फिल्म के अंत में उनका दिल बदल जाए।

लोग उन चरित्रों से खुद को जोंड़ कर देखते थे। मुझे लगता है कि मैं शहर के स्माट्र और चालाक युवक का प्रतिनिधित्व कर रहा था,जो अपने सरवाइवल के लिए छोटे-मोटे गैरकानूनी काम भी कर लेता है। इसके बावजूद वह दिल का अच्छा और नेक है। यह फिल्म की स्क्रिप्ट पर निर्भर करता था कि उसे कैसे और क्या रूप देना है। यह कहना गलत होगा कि हमें दर्शकों की रुचि मालूम थी। दर्शकों की रुचि मालूम हो तो सारे लोग हिट ही बना दें। हम लोग तो आजमाते रहते थे। कोशिश यह रहती थी कि वे किरदार दर्शकों को अपने करीब के लगें

Friday, December 2, 2011

फिल्‍म समीक्षा : द डर्टी पिक्‍चर


-अजय ब्रह्मात्‍मज

गांव से भागकर मद्रास आई रेशमा की ख्वाहिश है कि वह भी फिल्मों में काम करे। यह किसी भी सामान्य किशोरी की ख्वाहिश हो सकती है। फर्क यह है कि निरंतर छंटनी से रेशमा की समझ में आ जाता है कि उसमें कुछ खास बात होनी चाहिए। जल्दी ही उसे पता चल जाता है कि पुरुषों की इस दुनिया में कामयाब होने के लिए उसके पास एक अस्त्र है.. उसकी अपनी देह। इस एहसास के बाद वह हर शर्म तोड़ देती है। रेशमा से सिल्क बनने में उसे समय नहीं लगता। पुरुषों में अंतर्निहित तन और धन की लोलुपता को वह खूब समझती है। सफलता की सीढि़यां चढ़ती हुई फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है।

निर्माता, निर्देशक, स्टार और दर्शक सभी की चहेती सिल्क अपनी कामयाबी के यथार्थ को भी समझती है। उसके अंदर कोई अपराध बोध नहीं है, लेकिन जब मां उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर देती है और उसका प्रेमी स्टार अचानक बीवी के आ टपकने पर उसे बाथरूम में भेज देता है तो उसे अपने दोयम दर्जे का भी एहसास होता है।

सिल्क के बहाने द डर्टी पिक्चर फिल्म इंडस्ट्री के एक दौर के पाखंड को उजागर करती है। साथ ही डांसिंग गर्ल में मौजूद औरत के दर्द को भी जाहिर करती है। मिलन लुथरिया ने द डर्टी पिक्चर में विद्या बालन की अद्वितीय प्रतिभा का समुचित उपयोग किया है। हिंदी फिल्मों में हाल-फिलहाल में ऐसी साहसी अभिनेत्री नहीं दिखी है। विद्या बालन ने सिल्क के किरदार में खुद को ढाल दिया है। इन दिनों हर एक्टर कैरेक्टर में ढलने के लिए अपने रंग रूप में परिवर्तन लाते हैं, लेकिन वह ज्यादातर कास्मेटिक चेंज ही होता है। विद्या ने भद्दी दिखने की हद तक खुद को बदला है। यह उनकी अभिनय प्रतिभा और निर्देशक की दृश्य संरचना की खूबी है कि अंग प्रदर्शन और कामुक भाव मुद्राओं के बावजूद विद्या अश्लील नहीं लगतीं। पहले आयटम गीत में दर्शकों को रिझाने के लिए प्रदर्शित उनकी उत्तेजक मुद्राएं भी स्वाभाविक लगती हैं। विद्या की संवेदनशीलता और संलग्नता से अश्लील उद्देश्य से रचे गए दृश्यों में भी स्त्री देह का सौंदर्य दिखता है। ऐसा लगता है कि किसी शिल्पकार ने बड़े यत्‍‌न से कोई सौंदर्य प्रतिभा गढ़ी हो। दरअसल, निर्देशक की मंशा देह दर्शन और प्रदर्शन की नहीं है। वह उस देह में मौजूद औरत को उसे संदर्भो के साथ चित्रित करने में लीन है। विद्या बालन ने निर्देशक मिलन लुथरिया के साथ मिलकर पर्दे पर उस औरत को जीवंत कर दिया है। फिल्म के दौरान विद्या बालन याद नहीं रहती। हमारे सामने सिल्क रहती है, जो दर्शकों को एंटेरटेन करने आई है। विद्या ने इस फिल्म में अभिनय का मापदंड ऊंचा कर दिया है।

द डर्टी पिक्चर निर्देशक-लेखक के संयुक्त प्रयास की सम्मलित सफलता है। मिलन लुथरिया और रजत अरोड़ा की परस्पर समझदारी और सहयोग ने फिल्म को मजबूत आधार दिया है। फिल्म के संवाद बहुत कुछ कह जाते हैं। द डर्टी पिक्चर के संवाद अलग मायने में द्विअर्थी हैं। इसका दूसरा अर्थ मारक है और सीधे चोट करता है और झूठ पाखंड की कलई खोल देता है। उन संवादों को विद्या बालन ने सार्थक ढंग से उचित ठहराव, जोर और भाव के साथ अभिव्यक्त किया है। समकालीन अभिनेत्रियों को विद्या से संवाद अदायगी का सबक लेना चाहिए।

द डर्टी पिक्चर में विद्या बालन के बराबर में नसीरुद्दीन शाह, इमरान हाशमी, तुषार कपूर और अन्य कलाकार हैं। निश्चित ही नसीरुद्दीन शाह ने सूर्यकांत के सटीक चित्रण से सिल्क के किरदार को और मजबूती दी है। इमरान हाशमी और तुषार कपूर अपेक्षाकृत कमजोर अभिनेता हैं और उनकी कमियां इस फिल्म में भी दिखती हैं। सहयोगी कलाकारों की सहजता से फिल्म को विश्वसनीयता मिली है।

मिलन लुथरिया ने इस पीरियड फिल्म में प्रापर्टी और सेट को हावी नहीं होने दिया है। फिल्म के किरदारों के साथ हम तीस साल पहले के परिवेश में जाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत भी उसी दौर का है। गीतों के फिल्मांकन में भी मिलन ने उस दौर की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखा है। इमरान और विद्या पर फिल्माया गया इश्क सूफियाना अनावश्यक और ठूंसा हुआ लगता है। फिल्म यहीं थोड़ी कमजोर भी पड़ती है, जब दो विरोधी चरित्रों को लेखक-निर्देशक जोड़ने की कोशिश करते हैं। इस फिल्म की खूबी है कि आम और खास दर्शकों को अलग-अलग कारणों से एंटरटेन कर सकती है।

**** चार स्टार

Wednesday, November 30, 2011

कट्रीना से बहुत आगे है करीना

-अजय ब्रह्मात्मज

अभी भी खबर केवल यह आई है कि रोहित शेट्टी ने शाहरुख खान के साथ के लिए कट्रीना कैफ को अप्रोच किया है।

शाहरुख खान लंबे समय से रोहित शेट्टी को घेर रहे थे कि वे उनके साथ एक फिल्म करें। पहले आइडिया था कि अजय देवगन के साथ अपनी कॉमेडी फिल्मों से मशहूर हुए रोहित शेट्टी उनके लिए एक कॉमेडी फिल्म बनाएंगे। किसी पुरानी मशहूर कॉमेडी फिल्म के रीमेक के बारे में सोचा जा रहा था। इसी बीच अजय देवगन के साथ आई उनकी सिंघम हिट हो गई तो शाहरुख खान ने तय किया कि वे अब रोहित के साथ ऐक्शन फिल्म ही करेंगे। एक्शन हो या कॉमेडी। फिलहाल खबर यह है कि इस फिल्म में कट्रीना कैफ भी होंगी और इस खबर केसाथ स्थापित किया जा रहा है कि कट्रीना अपने प्रतिद्वंद्वी करीना से आगे निकल रही हैं।

सही है कि कट्रीना कैफ लगातार सफल फिल्मों का हिस्सा रही हैं। अपनी खूबसूरती के दम पर उन्होंने एक अलग किस्म का मुकाम हासिल कर लिया है, लेकिन अभिनय की बात करें तो अभी उन्हें प्रूव करना है।

उनकी कोई भी फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय नहीं है। अपनी सफल फिल्मों में वे नाचती-गाती गुडि़या से अधिक नहीं होतीं। निर्देशक भी उनकी सीमाओं से वाकिफ हैं, इसलिए उनके लिए नाटकीय दृश्य लिखते ही नहीं। वे महज उनकी खूबसूरती और चंचल अदाओं को भुनाते हैं।

फिर भी चर्चा है कि कट्रीना कैफ लोकप्रियता और स्टारडम के मामले में करीना कपूर के लिए चुनौती बन चुकी हैं। जल्दी ही वे नंबर वन के सिंहासन पर होंगी। गौर करें तो यह उनके शुभचिंतक प्रचारक की जल्दबाजी लगती है। कट्रीना कैफ अपनी लोकप्रियता और फिल्मों की सफलता के बावजूद करीना कपूर से मीलों पीछे हैं। अभी उन्हें करीना जैसी उपलब्धियां हासिल करनी हैं।

तीनों खानों के साथ उनके काम करने के उदाहरण से बताया जा रहा है कि कट्रीना आगे निकल रही हैं। क्या याद दिलाने की जरूरत है कि करीना कपूर ने बहुत पहले ही तीनों खानों के साथ फिल्में कर ली हैं। बाकी दो खान (सैफ और इमरान) के साथ भी उनकी फिल्में जल्दी ही आ रही हैं। जल्दबाजी में कट्रीना के समर्थक यह तथ्य भी भूल गए हैं कि फिलहाल चर्चा में आए 100 करोड़ के क्लब में करीना कपूर की चार फिल्में हैं। जिन चार सुपरस्टारों की फिल्म इन क्लब में पहुंची हैं, उनकी एक-एक फिल्म में करीना ही रही हैं। इस लिहाज से वे अकेली ऐसी अभिनेत्री हैं, जिनकी फिल्मों ने 100 करोड़ से अधिक का बिजनेस किया है। अफसोस है कि हिंदी फिल्मों के बिजनेस का चार्ट हीरोइनों के नाम से नहीं तैयार होता।

करीना कपूर अपनी पीढ़ी की अभिनेत्रियों में सबसे सक्षम और सफल हैं। अभिनय के लिहाज से उनकी ओमकारा, चमेली और जब वी मेट का बार-बार नाम लिया जाता है। इस स्तर की एक भी फिल्म कट्रीना के खाते में नहीं है। करीना कपूर घोर कॉमर्शियल फिल्मों में भी अपनी छाप छोड़ती हैं। सिर्फ नाचने-गाने वाली फिल्मों में भी उनका सानी नहीं है। अपनी लापरवाही में वे खुद ही अपने विकास के आड़े आ गई हैं। दरअसल, उनके सामने कोई हीरोइन चुनौती के रूप में खड़ी भी तो नहीं है। किसी जमाने में अमिताभ बच्चन की जो स्थिति थी, लगभग वैसी ही स्थिति में आज करीना कपूर हैं।

मधुर भंडारकर के निर्देशन में आ रही फिल्म हीरोइन से करीना कपूर का दर्जा कुछ और ऊंचा हो जाएगा। बिजनेस और एक्टिंग दोनों ही दृष्टिकोण से हीरोइन करीना की उल्लेखनीय फिल्म होगी। बाकी हीरोइनें अभी हीरोइन बनने का ख्वाब ही देख सकती हैं..

Sunday, November 27, 2011

हिन्दी फ़िल्म अध्ययन: 'माधुरी' का राष्ट्रीय राजमार्ग-रविकांत

जानकी पुल से कट-पेस्‍ट....

इतिहासकार रविकांत सीएसडीएस में एसोसिएट फेलो हैं, ‘हिंदी पब्लिक स्फेयर’ का एक जाना-माना नाम जो एक-सी महारत से इतिहास, साहित्य, सिनेमा के विषयों पर लिखते-बोलते रहे हैं. उनका यह लेख प्रसिद्ध फिल्म-पत्रिका ‘माधुरी’ पर पर एकाग्र है, लेकिन उस पत्रिका के बहाने यह लेख सिनेमा के उस दौर को जिंदा कर देता है जब सिनेमा का कला की तरह समझा-बरता जाता था, महज बाज़ार के उत्पाद की तरह नहीं और सिनेमा की पत्रकारिता कुछ मूल्यों, कुछ मानकों के लिए की की जाती थी. ‘लोकमत समाचार’ के दीवाली विशेषांक, २०११ में जब यह लेख पढ़ा तो रविकांत जी से जानकी पुल की ओर से आग्रह किया और उन्होंने कृपापूर्वक यह लेख जानकी पुल के लिए दिया. जानकी पुल की ओर से उनका आभार. जानकी पुल के लिहाज़ से यह लेख थोड़ा लंबा है, लेकिन यादगार और संग्रहणीय. जो सिनेमा के रसिक हैं उनके लिए भी, शोधार्थियों के लिए तो है ही

बहुतेरे लोगों को याद होगा कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की फ़िल्म पत्रिका माधुरी हिन्दी में निकलने वाली अपने क़िस्म की अनूठी लोकप्रिय पत्रिका थी, जिसने इतना लंबा और स्वस्थ जीवन जिया। पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में अरविंद कुमार के संपादन में सुचित्रा नाम से बंबई से शुरू हुई इस पत्रिका के कई नामकरण हुए, वक़्त के साथ संपादक भी बदले, तेवर-कलेवर, रूप-रंग, साज-सज्जा, मियाद व सामग्री बदली तो लेखक-पाठक भी बदले, और जब नवें दशक में इसका छपना बंद हुआ तो एक पूरा युग बदल चुका था।[1] इसका मुकम्मल सफ़रनामा लिखने के लिए तो एक भरी-पूरी किताब की दरकार होगी, लिहाजा इस लेख में मैं सिर्फ़ अरविंद कुमार जी के संपादन में निकलीमाधुरी तक महदूद रहकर चंद मोटी-मोटी बातें ही कह पाऊँगा। यूँ भी उसके अपने इतिहास में यही दौर सबसे रचनात्मक और संपन्न साबित होता है।

माधुरी से तीसेक साल पहले से ही हिन्दी में कई फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकल कर बंद हो चुकी थीं, कुछ की आधी-अधूरी फ़ाइलें अब भी पुस्तकालयों में मिल जाती हैं, जैसे, रंगभूमि,चित्रपट, मनोरंजन आदि। ये जानना भी दिलचस्प है कि हिन्दी की साहित्यिक मुख्यधारा की पत्रिकाओं - मसलन, सुधा, सरस्वती, चाँद, माधुरी - में भी जब-तब सिनेमा पर गंभीर बहस-मुबाहिसे, या, चूँकि चीज़ नई थी, बोलती फ़िल्मों के आने के बाद व्यापक स्तर पर लोकप्रिय हुआ ही चाहती थी, तो सिनेकला के विभिन्न आयामों से ता'रुफ़ कराने वाले लेख भी छपा करते थे। फ़िल्म माध्यम की अपनी नैतिकता से लेकर इसमें महिलाओं और साहित्यकारों के काम करने के औचित्य, उसकी ज़रूरत, भाषा व विषय-वस्तु,नाटक/पारसी रंगकर्म/साहित्य से इसके संबंध से लेकर विश्व-सिनेमा से भारतीय सिनेमा की तुलना, सेंसरशिप, पौराणिकता, श्लीलता-अश्लीलता,सार्थकता/अनर्थकता/सोद्देश्यता आदि नानाविध विषयों पर जानकार लेखकों ने क़लम चलाई।[2] इनमें से कुछ शुद्ध साहित्यकार थे, पर ज़्यादातर फ़िल्मी दुनिया से किसी न किसी रूप से जुड़े लेखक ही थे। इन लेखों से हमें पता चलता है कि पहले भले हिंदू घरों की औरतों का फ़िल्मी नायिका बनना ठीक नहीं समझा जाता था, वैसे ही जैसे कि उनका नाटक करना या रेडियो पर गाना अपवादस्वरूप ही हो पाता था। पौराणिक-ऐतिहासिक भूमिकाएँ करने वाली मिस सुलोचना, मिस माधुरी आदि वस्तुत: ईसाई महिलाएँ थीं,जिन्होंने बड़े दर्शकवर्ग से तादात्म्य बिठाने के लिए अपने नाम बदल लिए थे। पारसी थिएटर का सूरज डूबने लगा था, ऐसी स्थिति में रेडियो या सिनेमा के लिए गानेवालियाँ'बाई' या 'जान' के प्रत्यय लगाने वाली ही हुआ करती थीं। पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्डों पर भी आपको वही नाम ज़्यादातर मिलेंगे। अगर आपने अमृतलाल नागर की बेहतरीन शोधपुस्तकये कोठेवालियाँ[3] पढ़ी है, तो आपको अंदाज़ा होगा कि मैं क्या अर्ज़ करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी लेखकों ने ज़्यादा अनुभवी नारायण प्रसाद 'बेताब' या राधेश्याम कथावाचक या फिर बलभद्र नारायण 'पढ़ीस' की इल्तिजा पर ग़ौर न करते हुए[4] प्रेमचंद जैसे लेखकों के मुख़्तसर तजुर्बे पर ज़्यादा ध्यान दिया, जो कि हक़ीक़तन कड़वा था। उन्होंने आम तौर पर फ़िल्मी दुनिया को भ्रष्ट पूंजीपतियों की अनैतिक अय्याशी का अड्डा माना, माध्यम को संस्कार बिगाड़ने वाला 'कुवासना गृह' समझा, उसे छापे की दुनिया में होने वाले घाटे की भरपाई करके वापस वहीं लौट आने के लिए थोड़े समय के लिए जाने वाली जगह समझा। पर पूरी तरह चैन भी नहीं कि उर्दू वालों ने एक पूरा इलाक़ा क़ब्ज़िया रखा है। हिन्दी और उर्दू के साहित्यिक जनपद के बुनियादी फ़िल्मी रवैये में अगर फ़र्क़ देखना चाहते हैं तो मंटो को पढ़ें, फिर उपेन्द्रनाथ अश्क और भगवतीचरण वर्मा के सिनेमाई संस्मरण, रेखाचित्र या उपन्यास पढ़ें।[5] भाषा के सवाल पर गांधी जी से भी दो-दो हाथ कर लेने वाले हिन्दी के पैरोकार, अपवादों को छोड़ दें तो, अपने सिनेमा-प्रेम के मामले में काफ़ी समय तक गांधीवादी ही रहे।

बेशक स्थिति धीरे-धीरे बदल रही थी, पर 1964 में जब माधुरी निकली तब तक इसके संस्थापक संपादक के अपने अल्फ़ाज़ में "सिनेमा देखना हमारे यहाँ क़ुफ़्र समझा जाता था।" उन्होंने इस क़ुफ़्र सांस्कृतिक कर्म को हिन्दी जनपद में पारिवारिक-समाजिक स्वीकृति दिलाने में अहम ऐतिहासिक भूमिका अदा की। माधुरी ने कई बड़े-छोटे पुल बनाए, जिसने सिनेमा जगत और जनता को तो आपस में जोड़ा ही, सिनेमा को साहित्य और राजनीतिक गलियारों से, विश्व-सिनेमा को भारतीय सिनेमा से, हिन्दी सिनेमा को अहिन्दी सिनेमा से,और सिनेमा जगत के अंदर के विभिन्न अवयवों को भी आपस में जोड़ा। पत्रिका की टीम छोटी-सी थी, और इतनी बड़ी तादाद में बन रही फ़िल्मों की समीक्षा, उनके बनने की कहानियों, फ़िल्म समाचारों, गीत-संगीत की स्थिति, इन सबको अपनी ज़द में समेट लेना सिर्फ़ माधुरी की अपनी टीम के ज़रिए संभव नहीं था। अपनी लगातार बढ़ती पाठक संख्या का रुझान भाँपते हुए, उसके सुझावों से बराबर इशारे लेते हुए माधुरी ने उनसे सक्रिय योगदान की अपेक्षा की और उसके पाठकों ने उसे निराश नहीं किया। प्रकाशन के तीसरे साल में प्रवेश करने पर छपा यह संपादकीय इस संवाद के बारे में बहुत कुछ कहता है:

हिन्दी में सिनेपत्रकारिता सभ्य, संभ्रांत और सुशिक्षित परिवारों द्वारा उपेक्षित रही है। सिनेमा को ही अभी तक हमारे परिवारों ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। फ़िल्में देखना बड़े-बूढ़े उच्छृंखलता की निशानी मानते हैं। कुछ फ़िल्मकारों ने अपनी फ़िल्मों के सस्तेपन से इस धारणा की पुष्टि की है। ऐसी हालत में फ़िल्म पत्रिका का परिवारों में स्वागत होना कठिन ही था।

सिनेमा आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक मनोरंजन बन गया है। अत: इससे दूर भागकर समाज का कोई भला नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसमें गहरी रुचि लेकर इसे सुधारें, अपने विकासशील राष्ट्र के लायक़ बनाएँ। नवयुवक वर्ग में सिनेमा की एक नयी समझ उन्हें स्वस्थ मनोरंजन का स्वागत करने की स्थिति में ला सकती है। इसके लिए जिम्मेदार फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं की आवश्यकता स्पष्ट है। मैं कोशिश कर रही हूँ फ़िल्मों के बारे में सही तरह की जानकारी देकर मैं यह काम कर सकूँ। परिवारों में मेरा जो स्वागत हुआ है उसको देख कर मैं आश्वस्त हूँ कि मैं सही रास्ते पर हूँ।आत्मनिवेदन: (11 फ़रवरी, 1966).

इस आत्मनिवेदन को हम पारंपरिक उच्च-भ्रू संदर्भ की आलोचना के साथ-साथ पत्रिका के घोषणा-पत्र और इसकी अपनी आकांक्षाओं के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ सकते हैं। पत्रिका गुज़रे ज़माने के पूर्वग्रहों से जूझती हुई नयी पीढ़ी से मुख़ातिब है, सिनेमा जैसा है, उसे वैसा ही क़ुबूल करने के पक्ष में नहीं, उसे 'विकासशील राष्ट्र के लायक़' बनाने में अपनी सचेत जिम्मेदारी मानते हुए पारिवारिक तौर पर लोकप्रिय होना चाहती है। कहना होगा कि पत्रिका ने घोर आत्मसंयम का परिचय देते हुए पारिवारिकता का धर्म बख़ूबी निभाया,लेकिन साथ ही 'करणीय-अकरणीय' की पारिभाषिक हदों को भी आहिस्ता-आहिस्ता सरकाने की चतुर कोशिशें भी करती रही। भले ही इस मामले में यह अपने भगिनी प्रकाशन'फ़िल्मफ़ेयर'-जैसी 'उच्छृंखल' कम से कम समीक्षा-काल में तो नहीं ही बन पाई। बक़ौल अरविंद कुमार, जब पत्रिका की तैयारी चल रही थी, तो सुचित्रा की पहली प्रतियाँ सिनेजगत के कई बुज़ुर्गों को दिखाई गईं। उनमें से वी शांताराम की टिप्पणी थी कि इस पर फ़िल्मफ़ेयर का बहुत असर है। यह बात अरविंद जी को लग गई गई, और उन्हें ढाढ़स भी मिला। लिहाज़ा, माधुरी ने अपना अलग हिन्दीमय रास्ता अख़्तियार किया, और मालिकों ने भी इसे पर्याप्त आज़ादी दी। अनेक मनभावन सफ़ेद स्याह, और कुछ रंगीन चित्रों और लोकार्षक स्तंभों से सज्जित माधुरी जल्द ही संख्या में विस्तार पाते बड़े-छोटे शहरों के हिन्दी-भाषी मध्यवर्ग की अनिवार्य पत्रिका बन गई, जिसमें इसके शाफ़-शफ़्फ़ाफ़ और मेहनतपसंद संपादन - मसलन, प्रूफ़ की बहुत कम ग़लतियाँ होना - का भी हाथ रहा ही होगा। यहाँ 'मध्यवर्ग की पत्रिका' का लेबल चस्पाँ करते हुए हमें उन चाय और नाई की दुकानों को नहीं भूलना चाहिए, जहाँ पत्रिका को व्यापकतर जन समुदाय द्वारा पढ़ा-देखा-पलटा-सुना जाता होगा। अभाव से प्रेरित ही सही, लेकिन हमारे यहाँ ग्रामोफोन से लेकर सिनेमा-रेडियो-टीवी, पब्लिक फोन, और इंटरनेट(सायबर कैफ़े, -चौपाल) तक के आम अड्डों में सामूहिक श्रवण-वाचन-दर्शन-विचरण का तगड़ा रिवाज रहा है। संगीत रसास्वादन वॉकमैन और मोबाइल युग में आकर ही निजी होने लगा है। तो इस वृहत्तर पाठक-वर्ग तक फ़िल्म जैसे माध्यम को संप्रेषित करने के लिए माक़ूल शब्दावली जुटाने में मौजूदा शब्दों में नये अर्थ भरने से लेकर नये शब्दों की ईजाद तक की चुनौती संपादकों और लेखकों ने उठाई लेकिन अपरिचित को जाने-पहचाने शब्दों और साहित्यिक चाशनी में लपेट कर कुछ यूँ परोसा कि पाठकों ने कभी भाषायी बदहज़मी की शिकायत नहीं की। शब्दों से खेलने की इस शग़ल को गंभीरता से लेते हुए अरविंद जी ने अगर आगे चलकर शब्दकोश-निर्माण में अपना जीवन झोंक दिया तो किमाश्चर्यम, कि यह काम भी क्या ख़ूब किया![6]

सिने-जनमत सर्वेक्षण
बहरहाल, पूछने लायक़ बात है कि माधुरी के लिए सिनेमा के मायने क्या थे। ऊपर के इशारे में ही जवाब था - विशद-विस्तृत। पत्रिका ने न केवल दुनिया-भर में बन रहे महत्वपूर्ण चित्रों या चित्रनिर्माण की कलात्मक-व्यावसायिक प्रवृत्तियों पर अपनी नज़र रखी,बल्कि कैसे बनते थे/बन रहे हैं, इनका भी गाहे-बगाहे आकलन पेश किया, ताकि फ़िल्मी दुनिया में आने की ख़्वाहिश रखने वाले - लेखक, निर्देशक, अभिनेता, गायक - ज़रूरी हथियारों से लैस आएँ, या जो नहीं भी आएँ, वे जादुई रुपहले पर्दे के पीछे के रहस्य को थोड़ा बेहतर समझ पाएँ। इस लिहाज से ये ग़ौरतलब है कि माधुरी ने अपने पन्नों में सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेताओं को जगह नहीं दी, बल्कि तकनीकी कलाकारों - छायाकारों,ध्वनि-मुद्रकों और 'एक्स्ट्राज़' को भी, ठीक वैसे ही जैसे कि महमूद जैसे 'हास्य'-अभिनेताओं को आवरण पर डालकर, या फ़िल्म और टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, पुणे से उत्तीर्ण नावागंतुकों की उपलब्धियों को समारोहपूर्वक छापकर अपनी जनवादप्रियता का पता दिया। उनकी कार्य-पद्धति समझाकर, उनकी मुश्किलों, मिहनत को रेखांकित करते हुए उनकी मानवीयता की स्थापना कर सिनेमा उद्योग के इर्द-गिर्द जो नैतिक ग्रहण ज़माने से लगा हुआ था,उसको काटने में मदद की।

इस सिलससिले में घुमंतू परिचर्चाओं की दो शृंखलाएँ मार्के की हैं: पहली, जब माधुरी ने मुंबई महानगरी से निकलकर अपना रुख़ राज्यों की राजधानियों और उनसे भी छोटे शहरों की ओर किया ये टटोलने के लिए कि वहाँ के बाशिंदे बन रही फ़िल्मों से कितने मुतमइन हैं, उन्हें उनमें और क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए, आदि-आदि। जवाब में मध्यवर्गीय समाज के वाक्पटु नुमाइंदों ने अक्सरहाँ फ़िल्मों की यथास्थिति से असंतोष जताया,अश्लीलता और फ़ॉर्मूलेबाज़ी की भर्त्सना की, सिनेमा के साहित्योन्मुख होने की वकालत की। इन सर्वेक्षणों के आयोजन में ज़ाहिर है कि माधुरी का अपना सुधारवादी एजेंडा था,लेकिन इनसे हमें उस समय के फ़िल्म-प्रेमियों की अपेक्षाओं का भी पता मिलता है। हमारे पास उनकी आलोचनाओं को सिरे से ख़ारिज करने के लिए फ़िलहाल ज़रूरी सुबूत नहीं हैं,लेकिन ये सोचने का मन करता है कि इन पिटी-पिटाई, और एक हद तक अतिरेकी प्रतिक्रियाओं में उस ढोंगी, उपदेशात्मक सार्वजनिक मुखौटे की भी झलक मिलती है, जो अक्सरहाँ जनता के सामने आते ही लोग ओढ़ लिया करते हैं, भले ही सिनेमा द्वारा परोसे गए मनोरंजन का उन्होंने भरपूर रस लिया हो। मामला जो भी हो, माधुरी ने अपने पाठकों को भी यदा-कदा टोकना ज़रूरी समझा : मसलन, फ़िल्मों में अश्लीलता को लेकर हरीश तिवारी ने जनमत से बाक़ायदा जिरह की और उसे उचित ठहराया।[7] उस अंक में तो नहीं, लेकिन गोया एक सामान्य संतुलन बनाते हुए लतीफ़ घोंघी ने हिन्दी सिनेमा के तथाकथित फ़ोहश दृश्यों की एक पूरी परंपरा को दृष्टांत दे-देकर बताना ज़रूरी समझा। लेकिन फिल्मेश्वर ने चुंबनांकन को लेकर जो मख़ौलिया खिलवाड़ किस न करने वाली भारतीय संस्कृति के साथ किया, वह तो अद्भुत था।[8] थोड़े मुख़्तलिफ़ तरह का एक दूसरा सर्वेक्षण भौगोलिक था। याद कीजिए कि उस ज़माने में कश्मीर फ़िल्मकारों का स्वर्ग जैसा बन गया था। एक के बाद एक कई फ़िल्में बनी थीं, जिनका लोकेशन वही था, और पूरा कथानक नहीं तो कम-से-कम एक-दो गाने तो वहाँ शूट कर ही लिए जाते थे।[9]जान पड़ता है कि लोगों को कश्मीर के प्रति निर्माताओं की यह आसक्ति थोड़ी-थोड़ी ऊब देने लगी थी। माधुरी ने एक पूरी शृंखला ही समूचे हिन्दुस्तान की उन अनजान आकर्षक जगहों पर कर डाली जहाँ फ़िल्मों को शूट किया जा सकता है, बाक़ायदा सचित्र और स्थानीय इतिहास और सुविधाओं की जानकारियों मुहैया कराते हुए। इस तरह 'भावनात्मक एकता' का जो नारा मुल्क के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने उस ज़माने में बुलंद किया था, उसकी किंचित वृहत्तर परिभाषा कर कश्मीरेतर दूर-दराज़ की जगहों को फ़िल्मों के भौतिक साँचे में ढालने की ठोस वकालत माधुरी ने बेशक की।

सिने-माहौल और नागर चेतना
चलिए, आगे बढ़ें। सिनेमाघरों की दशा पर केन्द्रित माधुरी का तीसरा सर्वेक्षण अपेक्षाकृत ज़्यादा दिलचस्प था। इसकी प्रेरणा पाठकों से मिले शिकायती ख़तों से ही आई मालूम पड़ती है: जब पत्रों में अपने शहर के सिनेमा हॉल के हालात को लेकर करुण-क्रंदन थमा नहीं तो माधुरी ने उसे एक वृहत्तर अनुष्ठान और मुहिम का रूप दे दिया। इस मुहिम की अहमियत समझने के लिए आजकल की मल्टीप्लेक्स-सुविधा-भोगी हमारी पीढ़ी[10] को मनसा उस ज़माने में और उन छोटे शहरों में लौटना होगा, जब सिनेमा देखने को ही समाज में सम्मानजनक नहीं माना जाता था तो देखनेवालों को सिने-मालिक लुच्चा-लफ़ंगा मान लें तो उनका क्या क़ुसूर। जैसे दारू के ठेकों पर सिर-फुटव्वल आम बात थी, या है,वैसे ही पहले दिन/पहले शो में हॉल के बाहर टिकट खिड़की पर लाठियाँ चल जाना भी कोई अजीब बात नहीं होती थी। आप ख़ुद देखिए, लोगों ने फ़िल्म देखने के लिए कितने त्याग किए हैं, पूंजीवादी समाज की कैसी बेरुख़ी झेली है, एक-दूसरे को कितना प्रताड़ित किया है। माधुरी का शुक्रिया कि इसने सिनेमा हॉल को साफ़-सभ्य-सुसंस्कृत-पारिवारिक जगह बनाने की दिशा में पहल तो की।[11] नीचे पेश है एक बानगी उज्जैन, झाँसी,कानपुर, जमशेदपुर जैसे शहरों से दर्ज शिकायतनामों की। चक्रधर पुर, बिहार, से किसी ने लिखा कि हॉल में पीक के धब्बों और मूँगफली के छिलकों की सजावट आम बात है। सीटों पर नंबर नहीं और, लोग तो जैसे 'धूम्रपान निषेध' की चेतावनी देखते ही नहीं। फ़िल्म प्रभाग के वृत्तचित्र हमेशा अंग्रेज़ी में ही होते हैं, और जनता राष्ट्रगान के समय भी चहलक़दमी करती रहती है।( 8 सितंबर,1967). इसी अंक में होशंगाबाद से ख़बर है कि किसी ने गोदाम को सिनेमा हॉल बना दिया है, पीने को पानी नहीं है, हाँ, खाने की चीज़ ख़रीदने पर ज़रूर 'मुफ़्त' मिल जाता है। फ़रियादी की दरख़्वास्त है कि महीने में कम-से-कम एक बार तो कीटनाशक छिड़का जाए, मूतरियों को साफ़ रखा जाए, और टिकट ख़रीदने के बाद के इंतज़ार को आरामदेह बनाया जाए। झाँसी से एक जनाब फ़रमाते हैं कि वहाँ दो-ढाई लाख की आबादी में कहने को तो सात सिनेमाघर हैं, लेकिन एक को छोड़कर सब ख़स्ताहाल। फटी सीटें, पीला पर्दा, गोया किसी फोटॉग्रफर का स्टूडियो हो;लोग बहुत शोर मचाते हैं, जैसे ही बिजली जाती है या रील टूटती है, 'कौन है बे' की आवाज़ के साथ सीटियों का सरगम शुरू हो जाता है; गेटकीपर ख़ुद ब्लैक करता है और मना करने पर रौब झाड़ता है; पार्किंग में भी टिकट मिलता है, लेकिन साइकिल वहीं लगाने पर; अंग्रेज़ी-हिन्दी दोनों ही फ़िल्में काफ़ी देर से लगाई जाती हैं। 'महारानी लक्ष्मीबाई ने नगर' के इस शिकायती ने क्रांतिकारी धमकी के साथ अपनी बात ख़त्म की : अगर संबंधित अधिकारी कुछ नहीं करते तो झाँसी की जनता को फ़िल्म देखना छोड़ देना पड़ेगा। वाह! इसी तरह तीन सिनेमाघरों वाले बीकानेर से एक जागरूक सज्जन ने लिखा: एक हॉल तो कॉलेज से बिल्कुल सटा हुआ है, टिकटार्थियों की क़तार सड़क तक फैल जाती है, ब्लैक वालों के शोर--गुल से कक्षाएँ बाधित होती हैं; फ़र्स्ट क्लास की सीटें भी जैसे कष्ट देने के लिए ही बनाई गई हैं, एयरकंडीशनिंग ऐसी कि उससे बेहतर धूप में रहें, कभी सफ़ाई नहीं होती, कचरे के ढेर लगे होते हैं; तीसरे सिनेमा हॉल में तो बालकनी की हालत फ़र्स्ट क्लास से भी बदतर है। फ़र्स्ट क्लास का दर्शक जब 'सिनेमा देखने में मग्न हो तब अचानक ऐसा लगता है कि किसी सर्प ने काट खाया हो या इंजेक्शन लगा दिया गया हो। बरबस दर्शक उछल पड़ता है। पीछे देखता है तो मूषकदेव कुर्सियों पर विराजमान हैं। हॉल में कई चूहों के बिल देखने को मिल सकते हैं। सरदार शहर के एक सिनेमची ने शिकायत की कि वहाँ हॉल के अति सँकरे दरवाज़े से घुसने के बाद दर्शक और बदरंग पर्दे के बीच में दो-एक खंभे खड़े होकर फ़िल्म देखते हैं, ध्वनि-यंत्र ख़राब है, उससे ज़्यादा शोर तो छत से लटके पंखे कर देते हैं; बारिश में छत चूती है, कुर्सियों के कहीं हाथ तो कहीं पैर नहीं,कहीं पीठ ही ग़ायब है; आदमी ज़्यादातर ख़ुद को सँभालता रहता है: कोई नया हॉल बनाना भी चाहे तो लाइसेन्स नहीं मिलता। दरभंगा से रपट आई कि चार में से तीन सिनेमाहॉल तो 'उच्च वर्गों' के लिए हैं ही नहीं; नैशनल टॉकीज़ पूरा कबूतरख़ाना है; लोग हॉल में आकर अपनी सीट से ही टिकट ख़रीदते हैं, सीट संख्या नहीं होने पर काफ़ी कोहराम मचा होता है; मेरा साया शुरू हुआ तो पंखे की छड़ ऐन पर्दे पर नमूदार हो गई, और जिस तरह की फ़िल्म थी, हमें लगा ज़रूर कुछ रहस्य है इस साये में! लेकिन बात हँसने वाली नहीं। कौन इनका हल करेगा - सरकार या व्यवस्थापक? कोई नहीं, क्योंकि उनकी झोलियाँ तो भर ही रही हैं। सिनेमा का बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता बचता है। एप्रील फ़ूल देखकर आए गुरदासपुर के एक सचेत नागरिक ने हॉल वालों को तो आड़े हाथों लिया ही कि वहाँ निर्माण कार्य कभी बंद ही नहीं होता और पुराने प्रॉजेक्टर का शोर असह्य है, साथ ही दर्शकों के व्यवहार से भी घोर असंतोष ज़ाहिर किया: 'कामुक दृश्यों पर भद्दी आवाज़ों का शोर तमाम नैतिक मापदंडों की हत्या करके भी शांत नहीं होता। शायद यही कारण है कि कोई भी भलामानुस माँ-बहनों के साथ फ़िल्म देखने का साहस नहीं जुटा पाता...राष्ट्रगान के समय दरवाज़ा खुला छोड़ दिया जाता है, लोग बाहर निकल जाते हैं, जो अंदर भी रहते हैं, वे या तो बदन खुजाते या जम्हाइयाँ लेते दिखाई देते हैं।...अच्छी और सफल फ़िल्में जो पंजाब के बड़े शहरों में वर्ष के आरंभ में प्रदर्शित होती हैं, यहाँ अंत तक पहुँचती हैं,नतीजा ये होता है कि गणतंत्र दिवस की न्यूज़ रीलें हम स्वतंत्रता दिवस पर देखते हैं: हमें अभी तक अनुपमा और आए दिन बहार के का इंतज़ार है!

आरा से आकर एक सज्जन बड़े नाराज़ थे:
छुट्टियाँ बिताने आरा गया हुआ था। यहाँ के सिनेमा-हॉल और व्यवस्थापकों की लापरवाही देखकर दुख हुआ। सिनेमा हॉल के बाहर कुछ लोग लाइन में खड़े रहते हैं जबकि टिकट पास के पान की दुकान पर मिल जाता है। नोस्मोकिंग आते ही लोग बीड़ी जला लेते हैं। अगर कोई रोमाण्टिक सीन आ जाए तो उन्हें चिल्लाकर ही संतोष होता है, जिन्होंने अभी सीटी बजाना नहीं सीखा है। सिनेमा शुरू होने का कोई निश्चित समय नहीं है। अगर किसी अधिकारी की फ़ेमिली आने वाली है तो सिनेमा उनके आने के बाद ही शुरू होगा। हॉल में घुसते ही कुछ नवयुवक इतनी हड़बड़ी में आते हैं कि जल्दबाज़ी में फ़ेमिली स्वीट्स में घुस जाते हैं। (29 दिसंबर 1967).

डेविड धवन की हालिया फ़िल्म राजा बाबू की बरबस याद आ जाती है, जिसमें तामझाम से सजे लाल बुलेट पर घूमने वाला गोविंदा का किरदार सिनेमा हॉल में जाकर अपने मनपसंद दृश्य को 'रिवाइन्ड' करवाके बार-बार देखता है। साठ के दशक में छोटे शहरों के असली बाबू भी राजा बाबू से कोई कम थे! लेकिन ये शिकायती स्वर इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि सिनेदर्शक अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत हो रहा था, और सिने-प्रदर्शन में हो रही अँधेरगर्दी की पोल खोलने पर आमादा था। लेकिन इस तरह की परेशानियाँ सिर्फ़ छोटे शहरों तक सीमित नहीं थीं। एक आख़िरी उद्धरण देखिए, राजकुमार साहब के हवाले से:

दिल्ली के कुछ सिनेमा हॉल जो कि पुरानी दिल्ली में हैं बहुत ख़राब दशा में हैं। महिलाओं को केवल एक सुविधा प्राप्त है, और वो है टिकट मिल जाना। और इसके अलावा कोई सुविधा नहीं। अन्दर जाकर सीट पर बैठे तो क्या देखेंगे कि पीछे के दर्शक महोदय बड़े आराम से सीट पर पैर रख कर बैठे हुए हैं। ऐसा करना वे अपना अधिकार समझते हैं। आसपास के लोग बड़े प्रेम से घर की या बाहर की बातें करते नज़र आएँगे जबकि फ़िल्म चल रही होगी। मना किया जाय तो वे लड़ने लगेंगे और आप (जो कि माँ या बहन के साथ बैठे होंगे) लोगों की नज़रों के केन्द्र बन जाएँगे। यदि कोई प्रेम या उत्तेजक सीन होगा तो देखिए कितनी आवाज़ें कसी जाती हैं, गालियाँ दी जाती हैं, और सीटियाँ तो फ़िल्म के संगीत का पहलू नज़र आती हैं। यदि पास बैठी महिला के साथ छेड़छाड़ करने का अवसर मिल जाए तो वे हाथ से जाने नहीं देते। ये सब बातें सिर्फ़ इसलिए होती हैं कि सिनेमा हॉल में आगे बैठे लोग सिर्फ़ दो-तरफ़ा मनोरंजन चाहते हैं। इस तरह सिनेमा देखना तो कोई सहनशील व्यक्ति भी गवारा नहीं करेगा। (29 दिसंबर 1967, पत्र).

क़िस्सा कोताह ये कि दर्शकों की इन दूर-दराज़ की - सिनेव्यापार की भाषा में 'बी' 'सी'श्रेणी के शहरों-क़स्बों से आती - आवाज़ों को राष्ट्रीय गलियारों तक पहुँचाने का काम करते हुए माधुरी ने निहायत कार्यकर्तानुमा मुस्तैदी और प्रतिबद्धता दिखाई। इसका कितना असर हुआ या नहीं, कह नहीं सकते, लेकिन सिनेमा देखने वाले लोग भी नागरिक समाज की बुनियादी सहूलियतों और दैनंदिन सदाचरण के हक़दार हैं, अंक-दर-अंक यह चीख़ने के पीछे कम-से-कम माधुरी का तो वही भरोसा रहा, जो फ़ैज़ का था: 'कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएँगे'[12] और नहीं तो कम-से-कम शेष पाठकों तक तो नाले गए ही होंगे क्योंकि चंद संजीदा क़िस्म की शिकायतें तो आम जनता, ख़ासकर पुरुषों, को ही संबोधित हैं! एक और दिलचस्प बात आपने नोट की होगी इन ख़तों में कि हिन्दी-भाषी पुरुष उस ज़माने में सिर्फ़ 'माँ-बहनों' के साथ फ़िल्म देखने जाता था!

मधुर संगीतप्रियता
अच्छा साहब, बहुत हो लीं रोने-धोने की बातें। आइए अब कुछ गाने की भी की जाएँ।माधुरी ने यह बहुत जल्द पहचान लिया था कि रेडियो और ग्रामोफोन के ज़रिए लोग सिनेमा को सिर्फ़ देखते नहीं हैं, उसे सुनते भी हैं, वैसे लोग भी जो नहीं देखते, गुनगुनाते ज़रूर हैं, और इसके लिए वे बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दिनों से ही सस्ते काग़ज़ पर छपे चौपतिया मार्का 'कथा-सार व गीत' या बाद में नारायण ऐण्ड को., सालिमपुर अहरा, पटना जैसे प्रकाशकों द्वारा मुद्रित 'सचित्र-गीत-डायलॉग' के बेहद शौक़ीन थे, बल्कि उन पर मुनहसर थे। क्योंकि इससे बार-बार सिनेमा जाकर या रेडियो पर सुन-सुनकर कॉपी पे उतारने की उनकी अपनी मेहनत बचती थी। सिनेमा के गीतों ने एक अरसे से रोज़ाना की अंत्याक्षरी से लेकर औपचारिक, शास्त्रीय हर तरह की महफ़िलों में अपना रंग जमा रखा था, तो जो लोग राग-आधारित गाने गाना चाहते थे, उनके लिए गीत के बोल के साथ-साथ स्वराक्षरी देने का काम संपादक ने संगीत-मर्मज्ञ श्रीधर केंकड़े से काफ़ी लंबे अरसे तक करवाया। उन पृष्ठों पर संगीतकार-गीतकार-गायक-गायिका का नाम बड़े सम्मान से छापा जाता था। लेकिन जल्द ही 'रिकार्ड तोड़ फ़ीचर' और पैरोडियाँ भी स्तंभवत छपने लगीं, जो जनता के हाथों पुराने-नए मशहूर गानों के अल्फ़ाज़ की रीमिक्सिंग (=पुनर्मिश्रण, पुनर्रचना) के लोकाचार का ही एक तरह से साहित्यिक विस्तार था। इसलिए स्वाभाविक ही था कि हुल्लड़ मुरादाबादी और काका हाथरसी जैसे मशहूर कवियों के अलावा बेनाम तुक्कड़ों ने अच्छी तुकबंदियाँ पेश कीं। इस तरह की हास्य-व्यंग्य से लबरेज़ नक़्क़ाली के विषय अक्सर सामाजिक होते थे, कई बार फ़िल्मी, पर बाज़ मर्तबा राजनीतिक भी, जैसे कि सदाबहार मौज़ू 'महँगाई' को लेकर सीधे-सीधे भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री से पूछा गया सवाल, जो कि बतर्ज़ 'बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं'गुनगुनाये जाने पर सामान्य से किंचित अतिरिक्त फैलती मुस्कान की वजह बनता होगा:


इतना महँगा गेहूँ, औ इतना महँगा चावल
बोल इन्द्रा बोल सस्ता होगा कि नहीं

कितने घंटे बीत गए हैं मुझको राशन लाने में
साहब से फटकार पड़ेगी देर से दफ़्तर आने मे
इन झगड़ों का अन्त कहीं पर होगा कि नहीं॥ बोल इन्द्रा बोल...

दो पाटों के बीच अगर गेहूँ आटा बन जाता है
क्यों न जहाँ पर इतने कर हों, दम सबका घुट जाता है
कभी करों का यह बोझा कम होगा कि नहीं।। बोल इन्द्रा बोल...

हम जीने को तड़प रहे ज्यों बकरा बूचड़ख़ाने में
एक नया कर और लगा दो साँस के आने-जाने में
आधी जनता मरे चैन तब होगा कि नहीं? बोल इन्द्रा बोल...(22 सितंबर1967).

अब आप ही बताइए साहब कि ये नक़ल, असल से कविताई में कहीं से उन्नीस है? इसी तरह काका ने एक पैरोडी बनाई थी संत ज्ञानेश्वर के मशहूर गीत 'ज्योति से ज्योति जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो' पर, 'नोट से नोट कमाते चलो, काले धन को पचाते चलो,जिसका थीम इतना शाश्वत है कि कभी पुराना नहीं होगा। पता नहीं हम ऐसे ख़ज़ाने का जमकर इस्तेमाल क्यों नहीं करते। पुनर्चक्रण पर्यावरण-प्रिय युग की माँग है। माधुरी ने तो अपनी पुनर्चक्रण-प्रियता का सबूत इस हद तक दिया कि एक पूरा फ़िल्मी पुराण और एक संपूर्ण फ़िल्मी चालीसा ही छाप दिया, जिसमें फ़िल्मी इतिहास के बहुत सारे अहम नाम सिमट आए हैं। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप ख़ुद पाठ करें, तर्ज़ वही है गोस्वामी तुलसीदासकृत हनुमान चालीसा वाली:


दोहा: सहगल चरण स्पर्श कर, नित्य करूँ मधुपान
सुमिरौं प्रतिपल बिमल दा निर्देशन के प्राण
स्वयं को काबिल मानि कै, सुमिरौ शांताराम
ख्याति प्राप्त अतुलित करूँ, देहु फिलम में काम

चौपाई: जय जय श्री रामानंद सागर, सत्यजीत संसार उजागर
दारासिंग अतुलित बलधामा, रंधावा जेहि भ्राता नामा
दिलीप 'संघर्ष' में बन बजरंगी, प्यार करै वैजयंती संगी
मृदुल कंठ के धनी मुकेशा, विजय आनंद के कुंचित केशा।

विद्यावान गुनी अति जौहर, 'बांगला देश' दिखाए जौहर
हेलन सुंदर नृत्य दिखावा, लता कर्णप्रिय गीत सुनावा
हृषीकेश 'आनंद' मनावें, फिल्मफेयर अवार्ड ले जाएं
राजेश पावैं बहुत बड़ाई, बच्चन की वैल्यू बढ़ जाई

बेदी 'दस्तक' फिलम बनावें, पबलिक से ताली पिटवावें
पृथ्वीराज नाटक चलवाना, राज कपूर को सब जग जाना
शम्मी तुम कपिदल के राजा, तिरछे रोल सकल तुम साजा
हार्कनेस रोड शशि बिराजें, वाम अंग जैनीफर छाजें

अमरोही बनायें 'पाकीजा', लाभ करोड़ों का है कीजा
मनोज कुमार 'उपकार' बनाई, नोट बटोर ख्याति अति पाई
प्राण जो तेज दिखावहिं आपैं, दर्शक सभी हांक ते कांपै
नासैं दुख हरैं सब पीड़ा, परदे पर महमूद जस बीरा

आगा जी फुलझड़ी छुड़ावैं, मुकरी, ओम कहकहे लगावैं
जुवतियों में परताप तुम्हारा, देव आनंद जगत उजियारा
तुमहिं अशोक कला रखवारे, किशोर कुमार संगित दुलारे
राहुल बर्मन नाम कमावें, 'दम मारो दम' मस्त बनावें


नौशादहिं मन को अति भावें, शास्त्रीय संगीत सुनावें
रफी कंठ मृदु तुम्हरे पासा, सादर तुम संगित के दासा
भूत पिशाच निकट पर्दे पर आवें, आदर्शहिं जब फिल्म बनावें
जीवन नारद रोल सुहाएं, दुर्गा, अचला मा बन जाएं

संकट हटे मिटे सब पीड़ा, काम देहु बलदेव चोपड़ा
जय जय जय संजीव गुसाईं, हम बन जाएं आपकी नाईं
हीरो बनना चाहे जोई, 'फिल्म चालीसा' पढ़िबो सोई
एक फिलम जब जुबली करहीं, मानव जनम सफल तब करहीं

बंगला कार, चेरि अरु चेरा, 'फैन मेल' काला धन ढेरा
अच्छे-अच्छे भोजन जीमैं, नित प्रति बढ़िया दारू पीवैं
बंबई बसहिं फिल्म भक्त कहाई, अंत काल हालीवुड जाई
मर्लिन मनरो हत्या करईं, तेहि समाधि जा माला धरईं

दोहा: बहु बिधि साज सिंगार कर, पहिन वस्त्र रंगीन
राखी, हेमा, साधना, हृदय बसहु तुम तीन. (वीरेन्द्र सिंह गोधरा, 15 सितंबर1972.)

मज़ेदार रचना है न, बाक़ायदा दोहा-चौपाई से लैस, भाषा व शिल्प में पुरातन, सामग्री में यकलख़्त ऐतिहासिक और अद्यतन, फ़िल्म भक्ति के सहस्रनाम-गुण-बखान में निहायत समावेशी, नामित आराध्य की भक्ति में सराबोर लेकिन साथ ही अमूर्त देवी-देवताओं के'काले कार्य-व्यापार' से आधुनिक आलोचनात्मक दूरी बनाती हुई भी, जो आख़िरी चौपाई में मुखर हो उठती है। हमारे ज़माने में 'चोली के पीछे क्या है', के कई काँवड़िया संस्करण बन चुके हैं - अगले सावन में 'मुन्नी बदनाम हुई' के भी बन जाएँगे - अब अगर प्रामाणिक धर्म-धुरंधरों को इस तथाकथित अश्लील आयटम गीत की तर्ज़ पर शिवभक्ति अलापने में परहेज़ नहीं है तो उस ज़माने में माधुरी को इसकी उलट पैरोडी पेश करने में भला क्यों होता। फ़िल्म का एहतराम करना तो उसका घोषित धर्म ही ठहरा, और पाठक अगर धार्मिक पैकेजिंग में ही सिनेमा को घर ले जाना चाहते हैं तो वही सही। उन्हीं दिनों की बात है न जब जय संतोषी माँ आई थी तो लोग श्रद्धावश पर्दे पर पैसे फेंककर अपनी भक्ति का इज़हार कर रहे थे, जैसे कि किसी आयटम गाने पर ख़ुश होकर वे हॉल में सिक्के फेंकते पाए जाते थे, गोया किसी तवायफ़ की महफ़िल में बैठे हों। कैसा मणिकांचन घालमेल, कैसी अजस्र निरंतरता पायी जाती है हमारे लोक के धर्म-कर्म, नाच-गाने, और रुपहली दुनिया में कि शुद्धतावादियों का दम घुट जाए। वैसे माधुरी ने चंद बहसें धार्मिक फ़िल्मों के इतिहास व वर्तमान, उसके निर्माण के औचित्य-अनौचित्य पर भी चलाईं, एक ऐसे विशेषांक में अपना जवाब ख़ुद देता सवालिया प्रस्थान-बिंदु याद आता है: क्या धार्मिक फ़िल्मों के रथ को व्यावसायिकता का छकड़ा ढो रहा है?[13] ये तय है कि धर्म को लेकर माधुरी न तो भावुक थी न ही संवेदनशील; अगर किसी एक धर्म में इसकी अदम्य आस्था देखी जा सकती है, तो उसका नाम हमें राष्ट्रधर्म देना होगा। इसपर कुछ बातें, थोड़ी देर में।
'रिकार्ड तोड़ फीचर' स्तंभ में गानों की पंक्तियों से अटपटे सवाल पूछे जाते थे, या कटुक्तियाँ चिपकाई जाती थीं, कुछ इस बेसाख़्तगी से कि बोल के अपने अर्थ-संदर्भ गुम हो जाते थे,उनमें असली जीवन की छायाएँ कौंध जाती थीं। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:

) , पंख होते तो उड़ जाती रे.....
....चिड़िया नहीं तो फ़िल्मी हीरोइन तो हो, हवाई जहाज़ में क्यों नहीं उड़ आतीं?
) तख़्त क्या चीज़ है और लालो-जवाहर क्या है,
इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं....
.....हाँ जी, दूसरे का माल लुटाने में क्या लगता है!
) जज़्बा--दिल जो सलामत है तो इंशाअल्लाह
कच्चे धागे में चले आएँगे सरकार बँधे।
.....जनाब, वो नज़ाकत-नफ़ासत के ज़माने लद गए, अब तो लोहे की हथकड़ियों में बांधकर घसीटना पड़ेगा सरकार को।
) और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया, बहार देखते रहे...
....निकम्मों की यही पहचान होती है पुत्तर! (24 सितंबर, 1965).

क्या प्यारा हश्र हुआ है नीरज के पश्चाताप के आँसू रोते इस मशहूर भावुक गीत का!मूलत: हल्के-फुल्के हास्यरस का यह फ़ीचर बहुत लंबा नहीं चल पाया, लेकिन समझने लायक़ बात ये है कि यह उस परम-यथार्थवादी युग की दास्तान भी कहता है, जो तथाकथित फ़ॉर्मूला फ़िल्मों की हवा-हवाई बातों में आने से इन्कार कर रहा था, लिहाज़ा 'ये बात कुछ हज़म नहीं हुई' वाले अंदाज़ में प्रतिप्रश्न कर रहा था। जिसे आगे जाकर 'समांतर'सिनेमा कहा गया, उसका शबाब भी तो अँगड़ाइयाँ ले रहा था इस दौर में, जिसकी घनघोर प्रशंसिका बनकर ख़ुद माधुरी उभरती है। संक्षेप में, सत्यजीत राय, आदि के नक़्शे-क़दम चलकर लोकप्रिय मुख्यधारा की फ़ंतासियों के बरक्स ठोस दलीलें और वैकल्पिक फ़िल्में देने का वक़्त आ गया था, इन फुलझड़ियों से भला क्या होना था! उसके लिए तो उन साहित्यिक कृतियों के नाम गिनाए जाने थे, जो पता नहीं कब से फ़िल्म-रूप में ढल जाने को तैयार होकर बैठी थीं, और निर्माता कहते फिरते थे कि अच्छी कहानियाँ नहीं हैं।[14]दरमियानी धारा की फ़िल्में भी कई बनीं इस समय और साहित्यिक कृतियों पर भी, पर शुद्ध कलात्मक फ़िल्में माधुरी के परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन के बाद भी बहुत नहीं चल पाईं। अपवादों को छोड़ दें तो उनमें से ज़्यादातर के नसीब में सरकारी वित्तपोषण, फ़िल्मोत्सवी रिलीज़ और 'आलोचनात्मक प्रशंसा' ही आई।

साहित्यप्रियता
जितने अभियान माधुरी ने चलाए, जितने पुल इसने सिरजे, उनमें एक पुल और एक अभियान का ज़िक्र ज़रूरी है। साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बनाने में माधुरी ने कोई कसर नहीं उठाई, हिन्दी को हरेक अर्थ में प्रतिष्ठित करने की भी हर कोशिश इसने की। इसने इसरार करके हिन्दी के दिग्गजों से लेख लिखवाए, हरिवंश राय बच्चन से गीतों पर,पंत से फ़िल्मों की उपादेयता, उनके गुण-दोषों पर और 'दिनकर' को तो बाक़ायदा एक फ़िल्म दिखवाकर उसी पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी भी छापी।[15] एक तरफ़ कवि,गीतकार, लेखक और विविध भारती के पहले निदेशक बनकर आए नरेन्द्र शर्मा से फ़िल्मी गीतों की महत्ता'[16] पर लिखवाया तो दूसरी ओर गुलशन नंदा से यादवेन्द्र शर्मा चंद्र की आत्मीय बातचीत छापी।[17] ये याद दिलाना बेज़ा न होगा कि विविध भारती (ये शर्मा जी का रचनात्मक अनुवाद था अंग्रेज़ी के 'मिस्लेनियस प्रोग्राम' का) की स्थापना एक तरह से केसकर साहब के नेतृत्व वाले सूचना व प्रसारण मंत्रालय की बड़ी हार थी,लोकरंजक फ़िल्मी गीतों की ज़बर्दस्त लोकप्रियता के आगे। क्योंकि 1952 में भारतीय जनता को अपने मिज़ाज के माफ़िक बनाने के चक्कर में उन्होंने आकाशवाणी से फ़िल्मी गीतों के प्रसारण पर अनौपचारिक रोक लगा दी थी। जनता ने रेडियो सीलोन, और रेडियो गोआ की ओर अपने रेडियो की सूई का रुख़ कर दिया। अमीन सायानी इसी दौर में(बिनाका/सिबाका) गीतमाला के ज़रिए जो आवाज़ की दुनिया के महानायक बने तो आज तक हैं। घाटा भारतीय सरकारी ख़ज़ाने का हुआ जो पूरे पाँच साल तक चला, आख़िरकार केसकर साहब ने घुटने टेके, 'विविध भारती' चलायी, जिसे बाद में व्यावसायिक सेवा में तब्दील कर दिया गया।[18] बाक़ी तो देखा-भाला इतिहास होगा आपमें से कइयों के लिए। तो जब नरेन्द्र शर्मा ने माधुरी के लिए लिखा कि 'फ़िल्म संगीत इंद्र का घोड़ा है:आकाशवाणी उसका सम्मान करती है' तो वे भी सरकार की तरफ़ से उसको नकेल कसने की कोशिश की नाकामियों का इज़हार ही कर रहे थे, और क्या ठोस वकालत की उन्होंने फ़िल्मी गानों की। गुलशन नंदा ने, जिनका नाम आज तक हिन्दी साहित्यिक जगत में हिकारत से लिया जाता है, पर जिनके उपन्यासों पर कई सफल और मनोरंजक फ़िल्में बनीं, उस बातचीत में बग़ैर किसी शिकवा-शिकायत के, मुतमइन भाव से, अपनी बात रखी। तो माधुरी जहाँ एक ओर शुद्ध साहित्यिकों से बातचीत कर रही थी, वहीं दूसरी ओर फ़िल्मी लेखकों-शायरों - मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी, गुलज़ार, राही मासूम रज़ा,मीना कुमारी, सलीम-जावेद आदि से मुसलसल संवादरत थी।[19] नायक-नायिकाओं के साथ-साथ गायक-गायिकाओं को काफ़ी तवज्जो दी गई तो कल्याणजी-आनंदजी की चुटकुलाप्रियता की स्थानीय शोहरत को राष्ट्रीय में तब्दील करने में उनके माधुरी के स्तंभ का बेशक योगदान रहा होगा। नए-पुराने लिखने वाले निर्माता-निर्देशकों से भी साग्रह लिखवाया गया: किशोर साहू, बिमल राय, के.एन सिंह आदि की जीवनी/आत्मकथा धारावाहिक छपी तो राधू करमारकर जैसे छायाकार की कहानी को भी प्रमुखता मिली। शैलेन्द्र तो अरविन्द जी के प्रिय गीतकार और मित्र थे ही, तीसरी क़सम के बनने, असफल होने और शैलेन्द्र के उस सदमे से असमय गुज़र जाने की जितनी हृदयछू कहानियाँ माधुरी ने सुनाईं, शायद किसी के वश की बात नहीं थी। इनमें शोकसंतप्त रेणु की आत्मग्लानि से लेकर राजकपूर के अकाल-सखा-अभाव को वाणी देतीं भावभीनी श्रद्धांजलियाँ शुमार की जा सकती हैं।

लेकिन साहित्य को सिनेमा से जोड़ने के सिलसिले में सबसे रचनात्मक नुस्ख़े जो माधुरी ने कामयाबी के साथ आज़माए उनमें एक-दो ख़ास तौर पर उल्लेखनीय हैं। हालाँकि नायक-नायिकाओं के चित्रों के साथ काव्यात्मक शीर्षक देने की रिवायत पुरानी थी - उर्दू की मशहूर फ़िल्मी पत्रिका शमा में पचास के दशक में इसकी मिसालें मिल जाएँगी। वैसे ही जैसे कि तीस-चालीस के दशक की साहित्यिक पत्रिकाओं में 'रंगीन' तस्वीरों के साथ दोहा या शे'र डालने का रिवाज था। माधुरी में भी उर्दू के शे'र मिलते थे लेकिन कभी-कभार ही, उनकी जगह यहाँ हिन्दी कवियों को प्रतिष्ठित किया गया। दो-चार उदाहरणों से बात साफ़ हो जानी चाहिए। पूरे पृष्ठ पर 'पत्थरों में प्राण भरने वाले शिल्पी अभिनेता जीतेन्द्र' की सुंदर-सुडौल सफ़ेद-स्याह आवक्ष चित्ताकर्षक तस्वीर छपी है, लेकिन उसमें अतिरिक्त गरिमा डालने के लिए दिनकर की उर्वशी से पुरुरवा का दैहिक वर्णन डाल दिया गया है:

सिंधु सा उद्दाम, अपरंपार मेरा बल कहाँ है?
गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जय-जयकार
उस अटल संकल्प का संबल कहाँ है?
यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ,
सूर्य के आलोक से दीपित समुन्नत भाल,
मेरे प्यार का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।[20]

जिसे हिन्दी साहित्य पढ़ने-पढ़ानेवालियों ने अवश्य सराहा होगा। उसी तरह सायरा बानो की दिलकश रंगीन तस्वीर के साथ टुकड़ा लगाया 'कनक छरी-सी कामिनी' और जानने वालों ने अपनी तरफ़ से दोहे की दूसरी अर्धाली अनायास जोड़ी होगी, 'काहे को कटि क्षीण'![21]उससे भी ज़्यादा जाननेवालों ने इस दोहे के साथ औरंगज़ेबकालीन कृष्णभक्त कवि आलम को भी याद किया होगा और उस रंगरेज़न को भी, जिसने कहते हैं, इस दोहे की दूसरी पंक्ति - 'कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन' - पूरी कर दी, और उसके बाद तो आलम उसके इश्क़ में गिरफ़्तार ही हो गए। माधुरी को सायरा बानो की आवरण-कथा का सिर्फ़ एक शीर्षक देना था, इसलिए उसका काम पहली अर्धाली से ही हो गया था, लेकिन दूसरी अर्धाली और पंक्ति न देकर शायद इसने अपने 'पारिवारिक'आत्मसंयम का भी परिचय दिया, कि चतुर-सुजान ख़ुद कल्पना कर लें! वरना 'यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएँ' और 'कुचन मध्य धरि दीन' में यही तो फ़र्क़ है कि पहले में पुरुष-देह-सौंदर्य बखाना गया है, और दूसरे में स्त्री-सौंदर्य की ओर इशारा है! वैसे,आगे चलकर जब रंगीन पृष्ठ बढ़ते हैं, तो कई स्थापित या संघर्षशील तारिकाओं की अपेक्षाकृत कम या छोटे कपड़ोंवाली तस्वीरें भी माधुरी छापती है, और पाठकों के पत्रों में सेन्सरशिप की गुहार नहीं मचती दिखती है, तो ये मान लेना चाहिए कि वक़्त के साथ इसके पाठक भी 'वयस्क' हो रहे थे। वैसे फ़िल्म सेन्सरशिप के तंत्र की आलोचना - 'अंधी कैंची, पैनी धार' - बासु भट्टाचार्य जैसे दिग्दर्शक माधुरी के पृष्ठों में कर ही रहे थे, सो पाठकों तक पत्रिका का उदारमना संदेश तो जा ही रहा होगा।[22] मौखिक और लिखित तथा छप-साहित्य की जानी-मानी लोकप्रिय विधा - समस्यापूर्ति - का भी ख़ूब इस्तेमाल किया माधुरी ने। पाठकों से अक्सर किसी (सिर्फ़ बड़े नहीं) सिनेसितारे की दिलचस्प छवि के जवाब में मौलिक कविता माँगी जाती थी, और तीन-चार अच्छी प्रविष्टियों पर नक़द ईनाम भी दिए जाते थे। एक और आवरण कथा थी माला सिन्हा पर, बग़ीचे में लताओं व पेड़ों के बीच इठलाती उनकी तीन रंगीन तस्वीरों के साथ, साथ में छपा था विद्यापति कृत ये काव्यांश;

कालिन्दी पुलिन-कुंज बन शोभन।
नव नव प्रेम विभोर।
नवल रसाल-मुकुल-मधु मातल।
नव-कोकिल कवि गाय,
नव युवति गन चित उमता भई।
नव रस कानन धाय।

जिसे उद्धृत करने के पीछे मेरा ध्येय सिर्फ़ माधुरी के काव्य-चयन का विस्तृत दायरा दिखाना है। कुछ मिसालें उर्दू शायरी से भी। शर्मीला टैगोर का चित्र है, शीर्षक में मजरूह का शे':

यह आग और नहीं, दिल की आग है नादाँ,
शमअ हो के न हो, जल मरेंगे परवाने।

एक और जगह रंगीन, जुड़वाँ पृष्ठों पर शर्मीला और मनोज कुमार आमने सामने हैं, एक ही ग़ज़ल के दो अश'आर से जुड़े हुए:

शर्मीला: किस नजर से आज वह देखा किया।
दिल मेरा डूबा किया उछला किया।।
मनोज: उनके जाते ही ये हैरत छा गई।
जिस तरफ़ देखा किया, देखा किया।।(10 सितंबर, 1965)

वाह! वाह!!

हिन्दीप्रियता
इन उद्धरणों से यह साफ़ हो गया होगा कि हिन्दुस्तानी सिनेमा और उर्दू के बीच जो पारंपरिक दोस्ताना रिश्ता[23] था, उसके बीच माधुरी हिन्दी के लिए भी जगह तलाशने की कोशिश कर रही थी। इस तरह की कोशिशें हिन्दी की तरफ़ से कई पीढ़ियाँ कम-से-कम सौ साल से करती आ रही थीं : चाहे वह छापे की दुनिया के भारतेन्दु और उनके बाद के दिग्गज रहे हों, जो कविता में हिन्दी को ब्रजभाषा-अवधी वग़ैरह के बरक्स'खड़ी' करने में, या पारसी नाटक-लेखन के क्षेत्र में पं. राधेश्याम कथावाचक के सचेत प्रयास हों, या फिर रेडियो की दुनिया में पं. बलभद्र नारायण दीक्षित 'पढ़ीस' के परामर्श हों या पं. रविशंकर शुक्ल की आक्रामक राजनीतिक मुहिम हो, इन सबका एक सामान्य सरोकार उन इलाक़ों में हिन्दी की पैठ बनाना रहा जो उसके लिए नए थे।[24] ये इलाक़े हिन्दीवादियों को भाषायी नुक्ता--नज़र से ख़ाली बर्तन की तरह नज़र आते थे, जिन्हें हिन्दी की सामग्री से भरना इन्हें परम राष्ट्रीय कर्तव्य लगता था। अगर ग़लती से किसी और ज़बान, और ख़ुदा न करे उर्दू का वहाँ पहले से क़ब्ज़ा हो, तब तो मामला और संगीन हो उठता था, युद्ध-जैसी स्थिति हो उठती थी, कि हमें इस 'विदेशी' ज़बान को अपदस्थ करना है, अपनी ज़मीन पर निज भाषा का अख़्तियार क़ायम करना है। बेशक आज़ादी के बाद स्थिति तेज़ी से बदली, हिन्दी का अधिकार-क्षेत्र बढ़ा, उर्दू विभाजन और मुसलमानों की भाषा बनकर हिन्दुस्तान में बदनाम और बेदख़ल कर दी गई, लेकिन, जैसा कि हम नीचे देखेंगे, तल्ख़ियाँ अभी बाक़ी हैं, घाव अभी तक ताज़ा हैं। माधुरी'हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान' के लिए चले इस लंबे संघर्ष में हिन्दूवादी बनकर तो शायद नहीं,लेकिन कम-से-कम फ़िल्मक्षेत्रे हिन्दी राष्ट्रवादी हितों का हामी बनकर ज़रूर उभरती है।[25]

अपनी बात की पुष्टि के लिए चलिए एक बार फिर एक संपादकीय, 'हमारी बात' से ही यात्रा शुरू की जाए, जिसका शीर्षक था 'हिन्दी की फिल्में और हिन्दी':

कुछ पुरानी और कुछ आनेवाली फिल्मों के नाम इस प्रकार हैं: 'फ्लाइट टू बैंकाक', 'गर्ल फ्राम चाइना', हण्डरेड एण्ड एट [डेज़] इन कश्मीर', 'पेनिक इन पाकिस्तान', 'द सोल्जर', द कश्मीर रेडर्स', 'अराउण्ड द वर्ल्ड', 'लव इन टोकियो', 'ईवनिंग इन पेरिस', 'जौहर एण्ड जौहर इन चाइना', 'लव इन शिमला', मदर इंडिया', सन आफ इंडिया', मिस्टर एण्ड मिसेज फिफ्टी फाइव', मिस्टर एक्स इन बाम्बे, लव मैरिज',होलीडे इन बाम्बे'....। इन नामों को पढ़कर क्या आपको भ्रम नहीं होता कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है और कुछ सिरफिरे लोग बिना मतलब 'हिन्दी-हिन्दी' की रट लगाए रहते हैं? यह छोड़िये। सिनेमाघर में जब आप फिल्म देखते हैं तो आपको इतना तो अवश्य ही लगता होगा कि यदि भारत की भाषा हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी या इससे मिलती जुलती कोई और भाषा हो भी तो उसकी लिपि नागरी अरबी नहीं,रोमन है। इस सन्देह की पुष्टि तब और मिलती है, जब सड़कों, मुहल्लों के रोमन लिपि में लिखे नामपटोंपर कोलतार पोतने वाली राजनीतिक पार्टियाँ फिल्मोंकी रोमन नामावली पर चुप्पी साध लेती हैं। इन पार्टियों के सदस्य फिल्में नहीं देखते होंगे - इस पर तो विश्वास नहीं होता।
आपने अकसर यह दावा सुना होगा : हिन्दी के प्रचार में सबसे बड़ा योगदान फिल्मों का है। फिल्मकार इस आत्मछलपूर्ण दावेसे अपनेको हिन्दी सेवकोमें सबसे अगला स्थान देना चाहें तो आश्चर्य नहीं। आश्चर्य तब होता है जब आम लोग हिन्दी फिल्मों की लोकप्रियता देखकर इस दावे को सत्य मान लेते हैं। यह ऐसा ही है कि पूर्व में सूर्योदय और पश्चिम में सूर्यास्त देख कर लोग समझते रहे कि सूर्य धरतीकी परिक्रमा करता है।[26]

इस तरह की कोपरनिकसीय भाषावैज्ञानिक क्रांति को स्थापित करने के बाद हिन्दी फिल्मकारों के 'हिन्दी-प्रेम' की पोल ये कहकर खोली जाती है कि फ़िल्म कला का एक तरह का थोक व्यवसाय है, जिसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाकर ही लाभ कमाया जा सकता है, लिहाज़ा, इसकी ज़बान औसत अवाम की ज़बान रखी जाती है। लेकिन अफ़सोस कि नामावली और प्रचार-प्रसारमें एक प्रतिशत अंग्रेज़ी-भाषी जनता की लिपि को प्रश्रय दिया जाता है, जबकि 35 प्रतिशत पढ़े-लिखे लोग टूटी-फूटी हिन्दी और देवनागरी जानते हैं। "ऐसा करके निर्माता वस्तुत: अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं। बेहतर प्रचार होता अगर वे कुछ और पैसे ख़र्च करके भारत की दीगर लिपियों में भी फिल्म का नाम दें: हाल ही में निर्माता-निर्देशक ताराचंद बड़जात्या ने अपनी फिल्म'दोस्ती' के प्रचारमें इस नीतिको अपनाकर उचित लाभ उठाया था। बंगला फिल्मोंके अधिकांश निर्माता नामावलीमें बंगला लिपि ही काम में लाते हैं। लेकिन हिन्दीमें हाल यह है कि भोजपुरी फिल्मों में भी रोमन नामावली होती है (जबकि ये फिल्में हिन्दी क्षेत्रके बाहर कहीं नहीं देखी जाती)। यहाँ तक कि उन मारकाट वाली स्टण्ट फिल्मोंमें भी, जिन्हें अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग नहीं देखते। कई बार यह देखकर निर्माताओं की व्यावसायिक बुद्धिहीनता पर हंसी ही आती है।"

इस संपादकीय से आरंभ करके माधुरी ने जैसे रोमन नामावली के ख़िलाफ़ बाक़ायदा जिहाद ही छेड़ दिया, जिसका कई पाठकों ने भी खुले दिल से समर्थन किया। मसलन जब वे पत्र लिखते तो ये शिकायती स्वर में बताना नहीं भूलते कि फ़लाँ-फ़लाँ फिल्म में नामावली रोमन में दी गई है। लेकिन इस मुहिम की सबसे सनातन रट तो फ़िल्म समीक्षा के स्तंभ 'परख' में सुनाई पड़ती है। चाहे समीक्षक की राय में पूरी फ़िल्म अच्छी ही क्यों न हो, अगर नामावली नागरी में नहीं है तो उस पर एक टेढ़ी टिप्पणी तो चिपका ही दी जाती थी। माधुरी के अंदरूनी पृष्ठों पर सिने-समाचार नामक एक अख़बार भी होता था,अख़बारी काग़ज़ पर अख़बारी साज-सज्जा लिए, जिसमें 'जानने योग्य हर फिल्मी खबर'छपती थी। उसका 15 दिसंबर, 1967 का अंक मज़ेदार है क्योंकि इसके मुख्य पृष्ठ पर सुर्ख़ी ये लगाई गई थी: 'फिल्म उद्योग में हिन्दी नामों की जोरदार लहर: हिन्दी के विरुद्ध दलीलें देने वालों को चुनौती'। उपशीर्षक भी हमारे काम का है: 'उपकार, संघर्ष, अभिलाषा,विश्वास, समर्पण, जीवन मृत्यु, परिवार, धरती, वासना, भावना आदि फिल्मों के कुछ ऐसे शीर्षक हैं जो इस मत का खण्डन करते हैं कि केवल उर्दू या अंग्रेजी के नाम ही सुंदर होते हैं'। जैसा कि ऊपर उद्धृत संपादकीय से भी ज़ाहिर है, भाषा की माधुरी की अपनी आधिकारिक समझ वैसे तो आम तौर पर व्यापक है, पर कुछ और मिसालें लेने पर हमें उस आबोहवा का अंदाज़ा लग जाएगा, जिसमें हस्तक्षेप करने की चेष्टा वो कर रही थी। संपादकीय इस पंक्ति के साथ ख़त्म होता है: "अहिन्दी भाषी क्षेत्रोंके लिए फिल्म का नाम व अन्य मुख्य नाम हिन्दी के साथ दो-तीन अन्य प्रमुख भारतीय लिपियों(जैसे बंगला व तमिल)में भी दिए जा सकते हैं।" पूछना चाहिए कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में नाम नागरी में क्यों दिए जाएँ, केवल स्थानीय भाषा में ही क्यों नहीं। लेकिन ऐसा मानना हिन्दी-हित के साथ समझौता करना होता, चूँकि इस भाषा की पहचान इसकी लिपि से नत्थम-गुत्था है,आख़िरकार लिपि की लड़ाई लड़कर ही तो भाषा अपनी स्वतंत्र इयत्ता बना पाई थी। ठीक है हिन्दी-विरोध की हवा है, ख़ासकर दक्षिण में तो इतना मान लिया जाता है कि उनकी लिपि भी चलेगी: 'भी'; 'ही' - कत्तई नहीं। इस सिलसिले में दिलचस्प है कि माधुरी ने किसी प्रोफ़ेसर मनहर सिंह रावत से दक्षिण का दौरा करवाके एक लेख लिखवाया जिसका मानीख़ेज़ शीर्षक था - 'दक्षिण का नारा: हमें फिल्मों में हिन्दी चाहिए'। लब्बेलुवाब ये था कि भारत की ज़्यादातर भाषाएँ संस्कृत के नज़दीक हैं, दक्षिण की भी। इसलिए वहाँ के लोगों के लिए संस्कृत के तत्सम-तद्भव शब्द सहज ग्राह्य हैं। साथ ही संस्कार का सनातन सवाल भी है:

एक सामान्य भारतीय के लिए गुरू-उस्ताद, रानी-बेगम, विद्यालय-मदरसा, कला-फन,ज्ञान-इल्म,, धर्म-मजहब, कवि-सम्मेलन-मुशायरा, हाथ-दस्त, पाठ-सबक, आदि शब्द युग्मोंमें बिम्ब ग्रहण या संस्कार शीलताकी दृष्टि से बहुत बड़ा अंतर आ जाता है जो कि अनुभूत सत्य है।
पर इसके साथ ही हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि जन-साधारणकी भाषामें जो शब्द सदियों से घुलमिलकर उनके जीवन संस्कार के अंग बन चुके हैं, उन्हें जबरदस्ती हटाकर एक नयी बनावटी भाषाका निर्माण करना भी बहुत हानिकारक होगा। फिर वे प्रचलित शब्द या प्रयोग कहीं से क्यों न आये हों। मातृभाषा के प्रति अनावश्यक पूर्वाग्रह,ममत्व... द्वेषनात्मक दृष्टिकोण का ही सूचक है। सरल भाषाकी तो केवल एक ही कसौटी होनी चाहिये कि किसी शब्द प्रयोग या मुहावरेसे सामान्य जनता कितनी परिचित या आसानिसे भविष्य में परिचित हो सकती है। उदाहरणके लिये यदि हम कहें - “यह बात मुझे मालूम है।" तो साधारण हिन्दीसे परिचित श्रोताओंको भी समझनेमें कोई कठिनाई नहीं होती। पर इसी बातको अगर हम अनावश्यक रूप से अल्प परिचित संस्कृतनिष्ठ भाषामें कहें कि - "प्रस्तुत वार्ता मुझे विदित है।" तो यह भाषाका मज़ाक उड़ाने-जैसा हो जाता है।
इसके साथ-साथ कुछ सुन्दर सरल, उपयुक्त तथा अर्थ व्यंजक शब्द हमें जहां कहीं भी प्रादेशिक भाषाओं से मिलें, विशेषत: एसे शब्द जिनके समानार्थी या पर्यायवाची शब्द हिन्दीमें उतने निश्चित प्रभावोत्पादक एवं व्यापक अर्थोंको देनेवाले नहीं होते तो उन्हें नि:संकोच स्वीकार कर लेना चाहिये। (30 जुलाई, 1965)

रावत साहब से पूछने लायक़ बात यह है कि ये सामान्य भारतीय कौन है, और क्या पूरे दक्षिण की भाषाओं-उपभाषाओं की संस्कृतमयता यकसाँ है? अगर हाँ तो इतनी सदियों तक वे संस्कृत से अलग अपनी इयत्ता बनाकर क्यों रख पाईं? अगर हाँ तो ये सभी भाषाएँ संस्कृत ही क्यों नहीं कही जातीं। क्या तमिल भाषा के अंदर कई तरह की अंतर्विरोधी धाराएँ नहीं बह रही थीं, एक पारंपरिक ब्राह्मणवादी किंचित संस्कृतनिष्ठ तमिल के साथ-साथ दूसरी, दलित तमिल, भी तो उन्हीं दिनों अपने को राजनीतिक, साहित्यिक और फ़िल्मी गलियारों में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। तो दार्शनिक धरातल पर जहाँ रावत साहब उदारमना हैं, वहीं 'संस्कार' का सनातन सवाल उन्हें भाषाओं की उचित व्यावहारिक स्थिति का आकलन करने से रोक-रोक देता है। सवाल अंतत: शुद्धता का है,जैसा कि पटना की कुमुदिनी सिन्हा के इस ख़त से ज़ाहिर हो जाएगा:

माधुरी' एक एसी जनप्रिय पत्रिका है, जिसने हम जैसे हजारों पाठकों का दिल जीत लिया है। 10 सितंबर के अंक में 'आपकी बात' स्तंभ में प्रकाशित मधुकर राजस्थानी के विचार पढ़े.... वास्तव में आज अच्छे से अच्छे कलाकार, लेखक, कवियों का फिल्म जगत में प्रवेश आवश्यक है। फिल्म ही आज एक ऐसा माध्यम है, जो जन-जन तक पहुँचता है।
इसी स्तंभ में कलकत्ता के भाई निर्मल कुमार दसानी का पत्र पढ़ा, उन्हें भी धन्यवाद देती हूँ। इस लोकतंत्र राष्ट्र में हिन्दी के नाम पर खिचड़ी अधिक चल नहीं सकती। उसका एक अपना अलग रूप होना ही चाहिए और इसमें फिल्मों का सहयोग आवश्यक है। फिल्म के हरेक कलाकार, गीतकार को चाहिए कि फारसी-उर्दू मिश्रित भाषा त्यागकर यथाशक्ति संशोधित, परिमार्जित और मधुर हिन्दी व्यवहृत कर उसे फैलाने में अपना सहयोग दें
अंत में पुन: माधुरी की लोकप्रियता और सफलता की कामना करती हूँ।[27](ज़ोर हमारा)


एक तरफ़ जहाँ दशकों पुरानी गुहार – कि हिन्दी साहित्यकार सिनेमा की ओर मुड़ें - को बदस्तूर दुहराया गया है, वहीं लोकतंत्र की अद्भुत परिभाषा भी की गई है कि यहाँ फ़ारसी-उर्दू मिश्रित खिचड़ी भाषा नहीं चलेगी। एक तरफ़ लोकप्रियता की अभिलाषा, दूसरी तरफ़ परिमार्जित, संशोधित और परिनिष्ठित हिन्दी की वकालत - ज़ाहिर है कि लेखिका को इन दोनों चाहतों में कोई विरोधाभास नहीं दिखाई देता। लेकिन भाषायी ज़मीन पर क़ब्ज़े की युयुत्सा तब ख़ासी सक्रिय हो उठती है जब मुक़ाबले में हिन्दी की पुरानी जानी दुश्मन उर्दू खड़ी हो जाए, और कुछ नहीं बस अपना खोया हुआ नाम ही माँग ले तो यूँ लगता था गोया क़यामत बरपा हो गई।[28] मिसाल के तौर पर एक विवाद का ज़िक्र करना उतना ही ज़रूरी है जितना कि उसकी तफ़सील में जाना। सिने-समाचार में छपी इस ख़बर को देखें:


साहिर द्वारा हिन्दी के विरुद्ध विष वमन: फिल्म उद्योग में आक्रोश
(माधुरी के विशेष प्रतिनिधि द्वारा : तथाकथित प्रगतिशील शायर साहिर लुधियानवीकी उर्दू-हिन्दी का विवाद उठाकर साम्प्रदायिक तनाव पैदा करनेकी कोशिशशों की फिल्म उद्योग में सर्वत्र निंदा की जा रही है।)

हाल ही में एक मुशायरे में साहिरने कहा कि भारतमें 97 प्रतिशत फिल्में उर्दू में बनती हैं, इसलिए इन फिल्मोंकी नामावली उर्दू में होनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि 'हिन्दी साम्राज्यवाद' नहीं चलने दिया जायेगा।
सारी दुनियाके शोषित वर्ग का रहनुमा बननेवाले इस शायर की साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की यह कोई पहली हरकत नहीं है। कुछ ही मास पूर्व बिहारके बाढ़ पीड़ितोंकी सहायताके लिए चन्दा एकत्रित करने के उद्देश्यसे साहिर, ख्वाजा अहमद अब्बास, सरदार जाफरी आदि ने बिहार, उत्तर प्रदेश राजस्थान, पंजाब आदि प्रदेशों का दौरा किया था। लेकिन बिहारके अकाल का सिर्फ एक बहाना बन रह गया। हर मुशायरेमें सम्बन्धित प्रदेश की द्वितीय राजभाषा बनायी जानेका प्रचार किया गया।
आम चुनाव से पूर्व बम्बईके कुछ उर्दू पत्रकारों को इन्हीं शायर महोदय ने सलाह दी थी कि उत्तर प्रदेश के साथ महाराष्ट्र में भी द्वितीय राजभाषा का स्थान उर्दू को देने के लिए आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि महाराष्ट्र में सम्मिलित मराठवाड़ा क्षेत्र के निजामके आधीन था और वहाँ के वासी उर्दू बोलते हैं। इस आंदोलन में तन-मन-धनसे सहायता देनेका आश्वासन भी उन्होंने दिया था।
साहिर द्वारा साम्प्रदायिक आग भड़कानेकी इन कोशिशों से फिल्म उद्योगमें आक्रोश फैल गया है। फिल्म लेखक संघ के अध्यक्ष ब्रजेन्द्र गौड़ने साहिर की निन्दा करते हुए कहा कि फिल्म उद्योग में साम्प्रदायिकता फैलाने की यह कोशिश सफल नहीं हो सकेगी।
सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोजकुमार, निर्माता शक्ति सामंत, गीतकार भरत व्यास, मजरूह सुल्तानपुरी, पं. गिरीश, संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी आदि ने भी 'माधुरी' प्रतिनिधि से हुई भेंट में साहिर की इन हरकतों की निन्दा की। (16दिसंबर, 1967)

देखा जा सकता है कि माधुरी का हिन्दी राष्ट्रवाद जागकर गोलबंदी शुरू कर चुका है। साहिर ने अक्षम्य अपराध जो किया है, उर्दू की अपनी ज़मीन को अपना कहने का, इसके आगे उनके सारे प्रगतिशील पुण्य ख़ाक हो जाते हैं, अब तक के सारे भजन-कीर्तन बेकार,सारी लोकप्रियता ताक पर। आज का पाठक यह पूछ सकता है कि अगर हिन्दी के लिए आंदोलन चलाना साम्प्रदायिक नहीं था तो उर्दू में ऐसी क्या ख़ास बात थी जिसके स्पर्श मात्र से आपकी तरक़्क़ीपसंदगी मशकूक हो जाती थी? यह उसी 'शूच्याग्रे न दत्तव्यं' वाले युयुत्सु उत्साहातिरेक का लक्षण था जो हिन्दी के हिमायतियों में पचास और साठ के दशक में ज़बर्दस्त तौर पर तारी था, जो कुछ राज्यों में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा देने के नाम पर ही अलगाववाद सूँघने लगता था। पाठकों ने एक बार फिर माधुरी के मुहिम की ताईद करते हुए कई ख़त लिखे, सिर्फ़ एक लेते हैं:

'साहिर का असली चेहरा' शीर्षक-पत्र में कहा गया: "साहिरकी लोकप्रियता प्रगतिशील विचारोंके कारण ही बढ़ी है। एक प्रगतिशील साहित्यजीवी अगर संकीर्णता और अलगाववादी लिजलिजी विचारधाराको प्रोत्साहन देता है तो ऐसी प्रगतिशिलता को 'फ्राड' ही कहा जाएगा। साहिर निश्चय ही उर्दू का पक्षपोषण कर सकते हैं, लेकिन राष्ट्रभाषा का अपमान करके या अपमान की भाषा बोलकर नहीं। साहिर साहब को यह बतानेकी आवश्यकता नहीं है कि राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की क्या अहमियत होती है। उर्दू को हथियार बनाकर हिन्दीपर वार करना कौन देशभक्त हिन्दुस्तानी पसंद करेगा?...फिरकापरस्तों की यह कमजोरी होती है कि वे वतन की मिट्टी के साथ, उसकी पाकीजा तहजीब के साथ, उसकी भावनात्मक एकता के साथ गद्दारी ही नहीं बलात्कार तक करने की कोशिश करते हैं।...अच्छा हो साहिर साहब अपने रुख में परिवर्तन कर लें अन्यथा प्रगतिशीलता का जो नकाब उन्होंने चढ़ा रखा है, वह हमेशा के लिए उतार फेंके ताकि असली चेहरे का रंग-रोगन तो नजर आए।"

इस धौंस-भरे विमर्श में राष्ट्रभाषा हिन्दी तो सदा-सर्वदा लोकाभिमुख रही है, वह तो जनवाद के ऊँचे नैतिक सिंहासन से जनता से बोलती हुई जनता की अपनी भाषा है, उसको साम्राज्यवादी भला कहा कैसे जा सकता है! ऐसा पूर्वी बंगाल में बांग्ला के साथ पाकिस्तान भले कर सकता है, जबकि भारत की पूरी तवारीख़ में आक्रामकता के उदाहरण नहीं मिलते। दिलचस्प यह भी है कि इस विवाद के दौरान साहिर को कभी अपनी स्थिति साफ़ करने का मौक़ा नहीं दिया, हाँ चौतरफ़ा उनपर हल्ला अवश्य बोला गया। इस विवाद की अनुगूँज अंग्रेजी फ़िल्मफ़ेयर में भी उठी, पर वहाँ कम-से-कम कुछ ऐसी चिट्ठियों को भी छापा गया जो उर्दू व हिन्दुस्तानी यानि साहिर का पक्ष लेती दिखीं, जबकि एक भी ऐसी चिट्ठी माधुरी की उपलब्ध फ़ाइलों में नहीं दिखी।[29]

माधुरी से ही एक आख़िरी ख़त – चूँकि यह इस मुद्दे पर सबसे उत्कृष्ट बयान है - देकर इस विवाद और लेख की पुर्णाहुति की जाए। फिल्मेश्वर[30] ने अपने अनियत स्तंभ 'चले पवन की चाल' में 'हिन्दी-उर्दू के नाम पर नफरत के शोले भड़काने वाले साहिर के नाम एक खुला पत्र' लिखा, जिसमें सिद्ध किया गया कि हिन्दी-उर्दू दो अलहदा भाषाएँ नहीं हैं,गोकि उनकी लिपियाँ एक नहीं हैं: ग़ालिब ने अपने को हिन्दी का कवि कहा, और ख़ुद साहिर की नागरी में छपी किताबें उर्दू संस्करणों से ज़्यादा बिकी हैं, वो भी बग़ैर अनुवाद के, तो हिन्दी साम्राज्यवादी कैसे हो गई? और फिल्मों की भाषा अगर 97 प्रतिशत उर्दू है,तो वो हिन्दी हुई न? पिर झगड़ा कैसा! इस ख़त में साहिर के पूर्व-जन्म के पुण्य को बेकार नहीं मानकर उनके 'अलगाववादी' उर्दू-प्रेम पर एक छद्म अविश्वास, एक मिथ्या आहत भाव का मुजाहिरा किया गया है, कि 'साहिर, आप तो ऐसे न थे' या 'आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी'। छद्म और मिथ्या विशेषणो का सहारा मैंने इसलिए लिया है क्यूँकि शीर्षक में ही निर्णय साफ़ है, बाक़ी पत्र तो एक ख़ास अंदाज़े-बयाँ है, कोसने का एक शालीन तरीक़ा,बस। बहरहाल, पत्र-लेखक बेहद हैरत में है:

आख़िर बात क्या है? हिन्दी और उर्दू की? या हिन्दी और उर्दू के नाम पर सम्प्रदाय की? इस धर्मनिरपेक्ष राज्यमें आजादी के बीस सालोंमें इतना करिश्मा तो किया ही है कि हमारे अन्दर जो संकुचित भावनाओं की आग घुट रही है, हमने उसे उसके सही नाम से पुकारना बंद कर दिया है, और उसे हिन्दी-उर्दूका नाम दे कर हम उसे छिपाने की कोशिश करते [रहते] हैं।
आप अपनी भावुक शायरी में कितनी ही लफ्फाजी करते रहते हों, यह सही है कि आपके दिल में एक दिन इनसान के प्रति प्रेम भरा था। आप सब दुनियाके लोगों को एकसाथ कंधे से कंधा मिलाकर खुशहाली की मंजिल की तरफ बढ़ते हुए देखना चाहते थे। लेकिन दोस्त, आज ये क्या हो गया? इनसान को इनसान के करीब लाने के बजाए, आप हिन्दी-उर्दूकी आड़ में किस नफरत के शोलेसे खेलने लगे?सच कहूँ तो आपकी आवाज से आज जमाते-इस्लामी की घिनौनी बू आती है। आपने पिछले दिनों वह शानदार गीत लिखा था:

नीले गगन के तले,
धरती का प्यार पले

यह पत्र लिखते समय मुझे उस गीत की याद हो आयी, इसलिए आपको देशद्रोही कहनेको मन नहीं होता। पर मुशायरे में आपकी तकरीरको पढ़कर आपको क्या कहूँ यह समझ में नहीं आता। पूरे हिन्दुस्तानकी एक पीढ़ी, जिसमें पाकिस्तान की भी एक पीढ़ी शामिल की जा सकती है, आपकी कलम पर नाज करती थी, आपके खयालोंसे(खयालों उर्दू का नहीं हिन्दी का शब्द है, उर्दू में इसे खयालात कहते हैं,हुजूरेवाला) प्रभावित थी। आपने उस पीढ़ी की तमाम भावनाओं को अपनी साम्प्रदायिकता की एक झलक दिखा कर तोड़ दिया।...आपने एक बार लिखा था:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इनसान की औलाद है इनसान बनेगा

लेकिन आपकी आजकलकी गतिविधि देखते हुए तो ऐसा लगता है कि ये आपकी भावनाएँ नहीं थीं, आप सिर्फ फिल्म के एक पात्रकी भावनाएँ लिख रहे थे...सारे हिन्दुस्तान में फिल्म उद्योग एक ऐसी जगह थी जहां जाति, प्रदेश और धर्म का भेदभाव काम के रास्ते में नहीं आता था। और आप इन्सानियत के हामी थे। पर आपने इस वातावरण में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया। लगता है इनसान की औलाद का भविष्य आपकी नजर में सिर्फ एक है:

तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
शैतान की औलाद है शैतान बनेगा

मैं आख़िरमें इतनी ही दुआ करना चाहता हूँ: खुदा उर्दूको आप जैसे हिमायतियों से बचाये! (15 दिसंबर 1967).

एक झटके में साहिर लुधियानवी जैसा लोकप्रिय शायर 'फ़्राड', 'फिरकापरस्त', 'साम्प्रदायिक'और अमूमन 'देशद्रोही' क़रार दिया जाता है। इसमें इतिहास के विद्यार्थी को कोई हैरत नहीं होती क्योंकि फिल्मेश्वर की आलोचना चिरपरिचित ढर्रे पर चलती है, और इसको अपने मंत्रमुग्ध पाठक-समूह पर पूरा भरोसा है। कई दशकों से साल-दर-साल चलते आ रहे मुख्यधारा के राष्ट्रवादी विमर्श ने एक ख़ास तरह की परंपरा का सृजन किया था, और उसमें जो कुछ पावन, महान और उदात्त था, उसे अपनी झोली में डाल लिया था, और जो अल्पसंख्यक एक ख़ास तरह के सांस्कृतिक वर्चस्व को मानने से इन्कार करते थे, वे अलगाववादी कह कर अलग-थलग कर दिए गए थे। ये दोनों धाराएँ परस्पर प्रतिद्वंद्वी मानी गईं जबकि दोनों एक ही राष्ट्रवादी नदी के दो किनारे-भर थे। हिन्दी राष्ट्रवाद इस प्रवृत्ति का एक अतिरेकी विस्तार-मात्र था, वैसे ही जैसे कि उर्दू राष्ट्रवाद। जब इन दो किनारों को मिलाने वाली फ़िल्मी दुनिया की बिचौलिया पुलिया ज़बान को उर्दू के शायर ने उर्दू नाम दिया तो इस हिमाकत पर उन्हें वैसे ही संगसार होना ही था, जैसे एक-डेढ़ पीढ़ी पहले गांधी को उनकी हिन्दुस्तानी की हिमायत के लिए।[31]

बतौर निष्कर्ष यह कहा जा सकता है कि माधुरी ने सिनेमा को हिन्दी जनपद में सम्मानजनक, लोकप्रिय और चिंतन-योग्य वस्तु बनाने में अभूतपूर्व, संयमित, रचनात्मक योग दिया। लेकिन जिस तरह फ़िल्म-निर्माताओं की व्यावसायिक चिंताओं को समझे बग़ैर मुख्यधारा का सिनेमा नहीं समझा जा सकता, उसी तरह माधुरी की हिन्दी-प्रियता का आकलन किए बग़ैर इसके सिनेमा-प्रेम और सिने-अध्ययन की इसकी विशिष्ट प्रविधि का जायज़ा नहीं लिया जा सकता।

इस विशिष्ट पद्धति की एक आख़िरी मिसाल। हम मुख्यधारा के फ़िल्म अध्ययन में कथानक को संक्षेप में कहते हैं, और जल्द ही काम के दृश्य के विश्लेषण पर बढ़ जाते हैं। लेकिन अरविंद कुमार ने बक़लम ख़ुद फ़िल्म को क़िस्सागोई के अंदाज़ में पेश किया। फ़िल्मों को शॉट-दर-शॉट, बआवाज़, शब्दों में पेश करने की पहल करके उन्होंने एक नई विधा को ही जन्म दे दिया, जो आप कह सकते हैं कि किसी हिन्दुस्तानी सिनेमची के हाथों ही संभव था। क्योंकि यहीं पर आपको ऐसे लोग बड़ी तादाद में मिल सकते हैं जो कि फ़िल्म देखकर आपसे तफ़सील से उसकी कहानी बयान करने को कहेंगे। ख़ास तौर पर उस ज़माने में, जब आप ये नहीं कह सकते थे कि देख लेना, टीवी पर आ जाएगा, या देता हूँ, है मेरे पास। इस क़दर विस्तार से सुनने के लिए, और कहने के लिए वक्ता-श्रोता के पास फ़ुर्सत का वक़्त होना भी ज़रूरी है। ये बात भी याद रखने की है कि आठवें दशक के उस दौर में एक मौखिक लोकाचार को अपनी पसंद की पुरानी फ़िल्मों को कहन शैली में ढालकर उन्होंने अपने चिर-सहयोगी और नए संपादक विनोद तिवारी का हाथ भी मज़बूत किया, कि संपादकी का संक्रमण-काल सहज गुज़र जाए, पत्रिका वैसी ही लुभावनी व ग्राह्य बनी रहे। धारावाहिक रूप में छपने वाली इस शृंखला में आदमी, प्यासा, महल,बाज़ी, देवदास, जैसी शास्त्रीय बन चुकी कई लोकप्रिय फ़िल्मों का पुनरावलोकन किया, और यह लेखमाला 'शिलालेख' के नाम से जानी गई।[32]

और भी बहुत कुछ ऐतिहासिक और दिलकश था माधुरी में, पर बाक़ी पिक्चर फिर कभी।

(इस लेख को सीएसडीएस व बाहर के कई गुरुओं-दोस्तों-सहयोगियों ने सुना-पढ़ा है। उनकी हौसलाअफ़ज़ाई का शुक्रिया - ख़ास तौर पर शाहिद अमीन, रवि वासुदेवन, आदित्य निगम,अभय दुबे, प्रभात, संजीव, विभास, भगवती, विनीत व सौम्या का. राष्ट्रीय फ़िल्म अभिलेखागार, पुणे की मददगार श्रीमती रचना जोशी व दीगर स्टाफ़ का भी बहुत-बहुत शुक्रिया. पंकज जी-वंदना राग तथा राजेश-संगीता व करुणाकर का विशेष शुक्रिया जिन्होंने मेरे पुणे-प्रवास को हर बार लज़ीज़ बनाया। मित्र पीयूष दईया को भी अनेकश: धन्यवाद कि मुझसे लिखवा लिया।)



[1] इधर फिर से फ़िल्मफ़ेयर और सिनेब्लिट्ज़ जैसी अंग्रेज़ी पत्रिकाओं के हिन्दी संस्करण आने लगे हैं, लेकिन नाम सहित पूरी सामग्री अनुवाद ही होती है। याद करें कि बंद होने के पहले कुछ समय तक माधुरी का नाम भी फ़िल्मफ़ेयर ही रहा था.
[2] हिन्दी फ़िल्म पत्रकारिता पर देखें ललित मोहन जोशी का सुचिंतित आलेख, ' सिनेमा ऐण्ड हिन्दी पीरियॉडिकल्स इन कॉलोनियल इंडिया: 1920-1947' जो मंजू जैन(सं.) नैरेटिव्स ऑफ़ इंडियन सिनेमा,प्राइमस बुक्स, दिल्ली, 2009 में संकलित है।
[3] अमृतलाल नागर, ये कोठेवालियाँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2010.
[4] देखें इनकी आत्मकथाएँ: नारायण प्रसाद 'बेताब', बेताब चरित, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2002(मूलत: 1937 में प्रकाशित); कविरत्न पं. राधेश्याम कथावाचक, मेरा नाटक-काल: थिएटर के एक आदि व्यक्ति की आत्मकथा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2004. तुलना के लिए आग़ा हश्र कश्मीरी के व्यक्तित्व व कृतित्व को देखा जा सकता है: अनीस आज़मी: आग़ा हश्र कश्मीरी के चुनिंदा ड्रामे, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली, 2004, ख़ास तौर पर 'हयात और कारनामे', खंड 1.पारसी थिएटर में भाषा के मसले को लेकर देखें कैथरीन हैन्सन का अहम लेख, 'लैंग्वेजेज आन स्टेज: लिंग्विस्टिक प्लुरलिज़म ऐण्ड कम्युनिटी फ़ॉर्मेशन इन लेट नाइन्टीन्थ सेन्चुरी पारसी थिएटर',मॉडर्न एशियन स्टडीज़, वॉल्यूम 27, नंबर 2, (मई 2003), पृ. 381-405. हमारे अपने समय के बहुमाध्यमी लेखक स्वर्गीय मनोहर श्याम जोशी ने प्यार के इज़हार के लिए कसप में उर्दू शायरी और सिनेगीतों पर हमारी निर्भरता पर रचनात्मक टिप्पणियाँ की हैं। देखें इस विषय पर मेरा आलेख, 'कसपावतार में मनोहर श्याम की भाषा लीला', संवेद, फ़रवरी, 2007, पृ. 81-92.
[5] 'आदत हसन मंटो, दस्तावेज़ मंटो, (सं. बलराज मेनरा, शरद दत्त), खंड 5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995; उपेन्द्रनाथ अश्क, फिल्मी दुनिया की झलकियाँ, दो भाग, नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद, 1979; भगवतीचरण वर्मा, रचनावली, खंड 7 और 13, राजकमल प्रकाशन, 2008. दिलचस्प है कि इन तीनों अदीबों का त'आल्लुक रेडियो और सिनेमा से भी रहा, मंटो का बेशक सबसे ज़्यादा और गहरा।
[6] अरविंद जी हमारे समय के अथक और बेमिसाल कोशकार हैं - उनके वेसाइटhttp://arvindlexicon.com/3340/arvind-kumar-and-his-works/ पर तमाम तफ़सीलात और शब्दार्थ-खोज के विकल्प मौजूद हैं। उनकी जीवनी के लिए देखें, अनुराग की दो प्रस्तुतियाँ, http://lekhakmanch.com/2011/01/16/ रुकना-मेरा-काम-नहीं औरhttp://lekhakmanch.com/2011/01/17 लगन-से-किए-सपने-सच.
[7] हरीश तिवारी, 'फिल्मी गीतों में अश्लीलता सहनी ही पड़ेगी', सरगम का सफ़र, 2 मार्च, 1973.
[8] फ़िल्ल्लमेश्वर, 'किस्स्स्स्सा किस्स का', 22 सितंबर, 1967.
[9] अभी हाल में मशहूर सिने-चिंतक जयप्रकाश चौकसे ने शम्मी कपूर को गोया श्रद्धांजलि देते हुए कश्मीर में बनी फ़िल्मों को याद किया। देखें, उनके स्तंभ, 'पर्दे के पीछे', में छपा लेख, 'डल झील के आईने में यादें',दैनिक भास्कर, 8 सितंबर 2011.
[10] हमारे दौर में सिने-मनोरंजन टीवी-वीडियो और नक़ल करने की सहूलियतों के निहायत सस्ता और सहज-सर्वोपलब्ध हुआ है। मिसाल के तौर पर देखें मल्टीप्लेक्स के बरक्स 'खोमचाप्लेक्स' पर रवीश की यह रिपोर्ट:
http://naisadak.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html
[11] 30 जून, 1967 का अंक अच्छे सिनेमाघर के लिए चलाए गए आंदोलन का औपचारिक प्रस्थान-बिन्दु था‌।
[12] वैसे कुछ ठोस नतीजे भी निकले थे, ख़ासकर महानगरों में। मिसाल के तौर पर 'फिल्मक्षेत्रे'नामक स्तंभ में यह ख़बर छपी कि माधुरी में छपी शिकायत के बाद बंबई के पुलिस कमिश्नर ने नॉवेल्टी सिनेमाघर का एक दिन का लाइसेन्स रद्द कर दिया, 3 अगस्त, 1973.
[13] देखें धार्मिक फिल्म विशेषांक, 20 अक्तूबर, 1967
[14] ये लहर वैसे 70 के दशक में ज़ोर पकड़ती है, तभी माधुरी कहानियाँ लेकर भी आती है, मसलन,गोविंद मूनिस की हिमायत, रांगेय राघव की कहानी 'काका' के लि, 6 जुलाई, 1973, औरजयशंकर प्रसाद की कहानी 'गुण्डा' के लिए, 7 दिसंबर, 1973.

[15] 'सिनेमा और साहित्यकार' स्तंभ में सुमित्रानंदन पंत, 'जनरुचि का प्रश्न', 24 फ़रवरी, 1967.दुष्यंत कुमार, 'जब रामधारी सिंह दिनकर ने चेतना देखी', विजय बहादुर सिंह(सं), दुष्यंत कुमार रचनावली, खंड 4, किताब घर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.128-32.
[16] 'बलूचिस्तान से दिल्ली, दिल्ली से बंबई: लोकप्रिय लेखक गुलशन नंदा की लंबी कहानी', 21 अप्रैल1967. माधुरी की यह साहित्यिक यात्रा दोतरफ़ा थी: शास्त्रीय से लोकप्रिय की और, तो उलट भी: मिसाल के तौर पर देखें 22 मई 1964 के अंक में छपा शशि बंधुभ का आलेख, 'फिल्मी गीतों में छायावाद'। यहाँ व्यंजना रंचमात्र भी नहीं, उल्टे प्रसाद व महादेवी के बरक्स शकील बदायूँनी के गीतों के मौजूँ उद्धरण हैं। हालाँकि माधुरी ने फ़िल्मी प्रतिमानों का साहित्यिक मख़ौल भी जब-तब उड़ाया। इस तरह वह अपने साहित्य में पगे दुचित्ता पाठकों को फ़िल्मों को लेकर निंदा-रसपान से पूरी तरह महरूम भी नहीं रख रही थी। मज़ेदार है कि उसी साल आगरा विश्वविद्यालय से ओंकारप्रसाद माहेश्वरी ने 'हिन्दी चित्रपट और गीति-साहित्य' पर अपनी पीएचडी हासिल की, जो 14साल बाद, 1978 में जाकर इसी नाम से विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा से छपी। किताब के लिए मिले अनुदान की संस्तुति के लिए लेखक ने डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ओर डॉ. रामविलास शर्मा को शुक्रिया कहा है। देखें, प्राक्कथन, पृ. 4. इस अनूठी किताब की ओर ध्यान खींचने के लिए मैं तलत गीत कोश के संकलक, कानपुर निवासी श्री राकेश प्रताप सिंह का आभार मानता हूँ।
[17] 17 जून 1966.
[18] देखें एरिक बार्नोव व कृष्णास्वामी, इंडियन फ़िल्म्स, कोलंबिया युनिवर्सिटी प्रेस, न्यू यॉर्क व लंदन, 1963, पृ. 55-68. पी सी चैटर्जी, ब्रॉडकास्टिंग इन इंडिया, सेज पब्लिकेशन्स, 1987.
[19] एक ईमेलाचार में अरविंद जी ने बताया कि "राही मासूम रज़ा का छद्मनाम से एक स्थायी स्तंभ था माधुरी में। उस का काम था फ़िल्मजगत की अंदरूनी बातों पर मज़ेदार भाषा में लिखना। वह भाषा राही ही लिख सकते थे। उन्हीं की एक लेखमाला इसी स्तंभ में थी - 'हेमा मालिनी पर मुक़दमा'...यह इंदिरा गांधी पर चल रहे मुक़दमे की पैरोडी होती थी।"
[20] 30 जुलाई, 1965.
[21] महेनद्र सरल, 'कनक छरी-सी कामिनी', 12 जून 1966.
[22] 'अंधी कैंची, पैनी धार: भारतीय सेंसर पर एक चिंतनशील निर्देशक के विचार', 24 सितंबर, 1965.
[23] देखें मुकुल केशवन, 'उर्दू, अवध ऐण्ड द तवायफ़: दि इस्लामिकेट रूट्स आफ़ इंडियन सिनेमा', जो ज़ोया हसन(सं), फ़ोर्जिंग आइडेन्टिटीज़: जेन्डर, कम्युनिटीज़ ऐण्ड स्टेट, काली फ़ॉर विमेन, 1994,दिल्ली में संकलित है. अली हुसैन मीर व रज़ा मीर, ऐन्थेम्स आफ़ रेसिस्टेन्स: अ सेलेब्रेशन ऑफ़ प्रोग्रेसिव उर्दू पोएट्री, रोली बुक्स, नई दिल्ली, 2006, ख़ास तौर पर अध्याय 7: 'वो यार जो है ख़ुशबू की तरह, है जिसकी ज़बाँ उर्दू की तरह'
[24] रविशंकर शुक्ल, हिन्दी वालो, सावधान!, प्रचार पुस्तकमाला, काशी नागरी प्रचारिणी सभा,वाराणसी, 1947.
[25] हिन्दी, अंग्रेज़ी व उर्दू में इस मसले के ऐतिहासिक विवेचन पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है। मिसाल के तौर पर देखें, आलोक राय हिन्दी नैशनलिज़म, ओरिएण्ट लॉन्गमैन, दिल्ली, 2000.फ़्रन्चेस्का ओरसीनी, द हिन्दी पब्लिक स्फियर, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2003.दिलचस्प ये भी है कि अपनी हालिया किताब प्रिन्ट ऐण्ड प्लेज़र: पॉपुलर लिटरेचर ऐण्ड एन्टरटेनिंग फ़िक्शन्स इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया (ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2009) में फ़्रन्चेस्का ने बताया है कि लोकप्रिय साहित्य व संस्कृति में भाषा-व्यवहार की वह हदबंदी नहीं दिखाई देती जो पढ़े-लिखों की दुनिया में थी। पारसी थिएटर और सिनेमा की ज़बान उसी दरियादिल जनपद से तो आ रही थी।
[26] 5 नवंबर, 1965.
[27] 22 अक्तूबर, 1965.
[28] मैं ये चर्चा आधुनिक हिन्दी के संदर्भ में कर रहा हूँ, जहाँ आकर भाषाएँ अलग-अलग रास्ते बनाने लगती हैं, और नाम को लेकर भी लफ़ड़ा शुरू हो जाता है, वरना इतिहासकारों में अब तो ये आम सहमति है कि जो भी वो ज़बान रही हो, उसका सबसे पुराना, मध्यकालीन नाम तो हिन्दी ही था। देखें, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, अर्ली उर्दू लिटररी कल्चर ऐण्ड हिस्ट्री, ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2001. तारिक़ रहमान, फ़्रॉम हिन्दी टू उर्दू: ए सोशल ऐण्ड पॉलिटिकल हिस्ट्री, क्सफ़र्ड युनिवर्सिटी प्रेस, कराची, 2011.
[29] फ़िल्मफ़ेयर, 16 फ़रवरी, 1968.
[30] यह 'फ़िल्मेश्वर' कोई और नहीं, ख़ुद अरविंद जी थे, ये ईमेल में बताते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक बार कमलेश्वर ने उनसे कहा, कोई और नाम क्यों नहीं ले लेते, लोग समझते हैं कि फ़िल्मेश्वर मैं ही हूँ।
[31] इस लिहाज से 25 सितंबर, 1964 यानि शुरुआती दौर का संपादकीय 'राष्ट्रभाषा हिन्दी' काफ़ी संतुलित है, और हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी साहित्य व सिनेमा के संबंध को लेकर आशान्वित भी, लेकिन तब साहिर ने ये बात नहीं कही थी। एक और अहम बात यह कि अरविंद जी का मानना था कि उर्दू को लोग अब समझते नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने 'बर्क सी लहराई तो...गाने को लेकर एक सर्वेक्षण करवाया, बर्क का मतलब फ़िल्म उद्योग के लोगों से पुछवाया,अधिकतर को इसका मतलब पता नहीं था। उन्होंने साबित कर दिया भाषा वह चलेगी जो आसान हो, फिर वह चाहे उर्दू हो या हिन्दी, लेकिन बर्क जैसा शब्द नहीं चलेगा।' देखें, उनकी जीवनी वाला वेबपृष्ठ.
[32] मिसाल के लिए देखें 1 जुलाई 1977 का अंक, पृ. 15 : जिसका बैनर था - वी. शांताराम निर्देशित प्रभात चित्र, आदमी; हिन्दी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख * अरविंद कुमार द्वारा पु
अरविंद कुमार द्वारा पुनरावलोकन. -