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Sunday, September 23, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : आज़ादी के पहले की बोलती ऐतिहासिक फ़िल्में


फिल्म लॉन्ड्री
ऐतिहासिक फ़िल्में
आज़ादी के पहले की बोलती फ़िल्में
-अजय ब्रह्मात्मज
ऐतिहासिक फिल्मों को इतिहास के तथ्यात्मक साक्ष्य के रूप में नहीं देखा जा सकता.इतिहासकारों की राय में ऐतिहासिक फिल्मे किस्सों और किंवदंतियों के आधार पर रची जाती हैं.उनकी राय में ऐतिहासिक फ़िल्में व्यक्तियों,घटनाओं और प्रसंगों को कहानी बना कर पेश करती हैं. उनमें ऐतिहासिक प्रमाणिकता खोजना व्यर्थ है. ऐतिहासिक फिल्मों के लेखक विभिन्न स्रोतों से वर्तमान के लिए उपयोगी सामग्री जुटते हैं. फिल्मों में वर्णित इतिहास अनधिकृत होता है.फ़िल्मकार इतिहास को अपने हिसाब से ट्रिविअलाइज और रोमांटिसाइज करके उसे नास्टैल्जिया की तरह पेश करते हैं. कुछ फ़िल्मकार पुरानी कहानियों की वर्तमान प्रासंगिकता पर ध्यान देते हैं.बाकी के लिए यह रिश्तों और संबंधों का ‘ओवर द टॉप चित्रण होता है,जिसमें वे युद्ध और संघर्ष का भव्य फिल्मांकन करते हैं.इतिहास की काल्पनिकता का बेहतरीन उदहारण ‘बाहुबली है. हाल ही में करण जौहर ने ‘तख़्त के बारे में संकेत दिया कि यह एक तरह से ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म का ही ऐतिहासिक परिवेश में रूपांतरण होगा.फिल्मकारों की सोच और मानसिकता को ध्यान में रखें तो ऐतिहासिक फिल्मों को लेकर होने वाले विवादों की व्यर्थता समझ में आ जाती है.बहरहाल,इस बार हम बोलती फिल्मों के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों की बातें करेंगे.
आर्देशिर ईरानी की ‘आलम आरा’ हिंदी की पहली बोलती(टॉकी} फिल्म थी.इसका निर्माण इम्पीरियल फिल्म् कंपनी ने किया था.कंपनी के मालिक आर्देशिर ईरानी कुछ नया करने के लिए हमेशा सक्रिय रहते थे.उन्होंने ही पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या भी बनायीं थी,जिसे सआदत हसन मंटो ने लिखा था.उन्हीं की प्रोडक्शन कंपनी ने एज्रा मीर के निर्देशन में पहली बोलती ऐतिहासिक फिल्म ‘नूर जहां का निर्माण किया. यह चुथी बोलती फिल्म थी.जहाँगीर और नूर जहां के ऐतिहासिक प्रेम की कहानी मुग़ल साम्राज्य की प्रेम किंवदतियों में काफी मशहूर है.सलीम-अनारकली की कल्पित कहानी से अलग इसका ऐतिहासिक आधार है.एजरा मीर की यह फिल्म मूक फिल्म के तौर पर शुरू हुई थी,लेकिन टॉकी की तकनीक आ जाने से इसे बोलती फिल्म में तब्दील कर दिया गया.यह हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ बनी थी.एक साल पहले ही जहाँगीर के विख्यात न्याय पर ‘आदिल-ए-जहाँगीर मूक फिल्म आ चुकी थी.
मूक फिल्मों के दौर की तरह ही बोलती फिल्मों के दौर में भी मुग़ल साम्राज्य,हिन्दू राजाओं,संत कवियों और मराठा वीरों की कहानियां ऐतिहासिक फिल्मों का विषय बनती रहीं.छिटपुट रूप से मिथकों के सहारे भी ऐतिहासिक फिल्मों के रूपक रचे गए.राजा,महल,दरबार और वन-उपवन के दृश्यों से प्रेम की साधारण कहानियों में भी भव्यता और रम्यता आ जाती थी.कुछ निर्माताओं ने पॉपुलर रहीं मूक ऐतिहासिक फिल्मों का बोलती फिल्मों के रूप में भी रीमेक  किया.उदहारण के लिए1930 की ‘आदिल-ए-जहाँगीर के सरदार के निर्देशन में 1934 में फिर से बनी.रोचक तथ्य है कि 1955 में जी पी सिप्पी ने प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ इसका पुनर्निर्माण किया.यह उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी.
आज़ादी के पहले फिल्मों के निर्माण का प्रमुख केंद्र मुंबई और आसपास के शहरों पुणे व् कोल्हापुर में स्थित था.फिल्मों में मराठीभाषी फिल्मकारों ने मराठा इतिहास और समाज के चरित्रों को प्रमुखता दी.उन्होंने मराठी के साथ हिंदी में भी इन फिल्मों का निर्माण किया. इन फिल्मकारों में वी शांताराम,दामले और जयंत देसाई प्रमुख थे.उन्होंने पेशवाओं, उनके सेनापतियों और अन्य विख्यात व्यक्तियों पर फ़िल्में बनायीं. मराठी और हिंदी में बनायीं जा रही ऐतिहासिक फ़िल्में एक स्तर ओअर अंग्रेजी शासन में राष्ट्रीय अस्मिता,पहचान और गौरव के रूप में भी प्रकट हो रही थीं. फ़िल्मकार राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे थे. फ़िल्में केवल मनोरंजन और मुनाफे का धंधा नहीं बनी थीं.
इसी दौर में लाहौर से कोलकाता शिफ्ट कर चुके ए आर कारदार ने मौर्य वंश के प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त पर ‘चन्द्रगुप्त नामक फिल्म निर्देशित की.इसका निर्माण ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था.के सी डे के संगीत से रची इस फिल्म में गुल हामिद,सबिता देवी और नज़ीर अहमद खान ने मुख्या भूमिकाएं निभाई थीं.इस फिल्म की सफलता ने ए आर कारदार को कोलकाता में स्थापित कर दिया था.कोलकाता में न्यू थिएटर में के एल सहगल आ चुके थे. उनके और पहाड़ी सान्याल के साथ प्रेमांकुर एटोर्थी ने मशहूर फिल्म ‘यहूदी की लड़की का निर्देशन किया.यह फिल्म आगा हश्र कश्मीरी के नाटक पर आधारित था.इस फिल्म मे रत्तनबाई ने भी एक किरदार निभाया था.कम लोग जानते हैं कि वह पटना की पैदाइश थीं.1933 में हिमांशु राय और देविका रानी की ‘कर्मा,जे बी एच वाडिया की ‘लाल-ए-यमन,देबकी बोस की ‘पूरण भगत और ‘मीरा बाई फ़िल्में भी आईं.इन फिल्मों की थीम देशी-विदेशी राज परिवारों से सबंधित थी.पी सी बरुआ की ‘रूप लेखा में के एल सहगल ने सम्राट अशोक की भूमिका निभाई थी.इस दौर में कोलकाता और मुंबई के फ़िल्मकार संतों पर भी फ़िल्में बना रहे थे. संत रविदास,संत तुलसी दास,सूरदास,मीरा बाई.संत तुकाराम.चंडीदास.संत ध्यानेश्वर आदि पर कुछ फ़िल्में बनीं.इन फिल्मों के निर्माण की एक वजह यह भी हो सकती है कि निर्देशकों को संत कवियों के लोकप्रिय गीत और भजन के उपयोग से दर्शकों को थिएटर में लाने की युक्ति मिल गयी होगी.संतों के आदर्श श्रद्धालु दर्शकों को अलग से आकर्षित करते होंगे.अंग्रेजों के दमन और शासन भुगत रहे लोगों को नैतिक संबल मिलता होगा.
1939 में आई सोहराब मोदी की ‘पुकार ऐतिहासिक फिल्मों की परंपरा में बड़ी घटना है.इस फिल्म की कहानी भी जहाँगीर के न्याय पर आधारित थी.कहते हैं,मंगल अपने प्यार कँवर को पाने के लिए उसके भाई और पिता की हत्या कर देता है,बादशाह के वफादार मंगल के पिता संग्राम सिंह उसे गिरफ्तार कर दरबार में हाज़िर करते हैं.जहाँगीर उसे मौत की सजा देते हैं.कुछ समय के बाद एक धोबिन नूरजहाँ को अपने पति का कातिल ठहरती है,जो शिकार के समय रानी के हाथों मारा गया था.अपने न्याय के लिए मशहूर न्यायप्रिय जहाँगीर सजा के तौर खुद की जान पेश करते हैं.बादशाह के न्याय से प्रभावित धोबिन उन्हें माफ़ कर देती है. इस फिल्म की कहानी कमाल अमरोही ने लिखी थी.फिल्म में संवाद और गीत भी उनके ही लिखे हुए थे. ‘पुकार में नूरजहाँ की भूमिका नसीम बानो ने निभाई थी. इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने सोहराब मोदी को आगे भी ऐतिहासिक फ़िल्में बनाने का उत्साह दिया.उनकी कंपनी मिनर्वा मूवीटोन बड़ी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण के लिए विख्यात हुई. उन्होंने मिनर्वा मूवीटोन के बैनर में ‘सिकंदर,’पृथ्वी वल्लभ.’एक दिन का सुलतान’ जैसी फ़िल्में आज़ादी के पहले बनायीं.इनमें ‘एक दिन का सुलतान को दर्शकों ने नापसंद किया. उनकी ‘झाँसी की रानी और ‘मिर्ज़ा ग़ालिब का ज़िक्र आज़ादी के बाद की ऐतिहासिक फिल्मों की कड़ी में करेंगे.
सोहराब मोदी ने अपनी महँगी,भव्य,संवादों से पूर्ण फिल्मों से ऐतिहासिक फिल्मों का नया मानदंड स्थापित कर दिया.इस फिल्मों की ऐतिहासिकता पर सवाल उठाये जा सकते हैं.सोहराब मोदी का कंसर्न इतिहास से अधिक ड्रामा था,जिनके जरिए वे दर्शकों को मनोरंजन और आनंद दे रहे थे.’सिकंदर उनकी अत्यंत सफल फिल्म थी.पृथ्वीराज कपूर ने इसमें सिकंदर की भूमिका निभाई थी और सोहराब मोदी पोरस बने थे. इस फिल्म में लाहौर से आई खुर्शीद उर्फ़ मीना ने एक खास किरदार निभाया था.मीना बाद में मीना शोरी के नाम से मशहूर हुईं. कॉमिक भूमिकाओं में मोतीलाल के साथ उनकी जोड़ी बनी.
आज़ादी के पहले की ऐतिहासिक फिल्मों में मुग़ल साम्राज्य जहाँगीर के अलावा बाबर,हुमायूँ,अकबर और शाहजहाँ के जीवन की घटनाओं पर भी फ़िल्में बनीं. किसी ने सत्ता के लिए औरंगजेब और दाराशिकोह के संघर्ष को नहीं छुआ. इन सभी फिल्मों में बादशाहों की न्यायप्रियता,उदारता और दयानतदारी का चित्रण किया गया.आजादी के पहले भारतीय इतिहास को देखने-दिखाने का नजरिया अलग था.दर्शकों के अन्दर यह एहसास भी भरा जाता था कि हमारा इतिहास गौरवपूर्ण था,जिसमें प्रजा की बातें और शिकायतें भी सुनी जाती थीं.कहीं न कहीं फिल्मकारों की यह भावना भी रहती थी कि वे वर्तमान शासक अंग्रेजों के खिलाफ आम दर्शकों को प्रेरित करें.कई बार ब्रिटिश राज के सेंसर से इन फिल्मकारों को जूझना पड़ता था.कुछ फिल्मों के टाइटल और गीत भी बदले गए थे.याद करें तो यह राष्ट्रीय भावना के उबाल का भी समय था.हमारे फ़िल्मकार कैसे अलग-थलग रह सकते थे.आज़ादी के पहले के ऐतिहासिक फिल्मों के निर्देशकों में वजाहत मिर्ज़ा(बाबर),कमल रॉय(शहनशा अकबर),महबूब खान(हुमायूँ),ए आर कारदार(शाहजहाँ),जयंत देसाईं(तानसेन,चन्द्रगुप्त) का नाम लिया जाना चाहिए.इसी दौर में 1944  में आई ‘रामशास्त्री महत्वपूर्ण फिल्म है.इसे गजानन जागीरदार,विश्राम बेडेकर और रजा नेने ने मिल कर निर्देशित किया था. गजानन जागीरदार ने जज रामशास्त्री की भूमिका निभाई थी.रामशास्त्री ने एक मामले में अपने भतीजे के हत्या के जुर्म में पेशवा को ही सजा सुनाई थी.
आज़ादी के पहले के चौथे और पांचवे दशक में फिल्मों के विषय और उनके निर्वाह में मूक फिल्मों के दौर से अधिक फ़र्क नहीं आया था.उस दौर की फिल्मों के जानकारों के मुताबिक तकनीकी आविष्कारों की वजह से फिल्मों के निर्माण में अवश्य निखार आता रहा.कुछ बड़ी और भव्य फ़िल्में महंगे बजट में बनीं.ऐतिहासिक फिल्मों से फिल्मकारों को आज ही की तरह युद्ध और द्वंद्व के दृश्य दिखने का बहाना मिल जाता था.इन दो दशकों में फिल्मों के आर्ट डायरेक्शन में काफी बदलाव आया.ए आर कारदार ने ‘शाहजहाँ’ में मशहूर पेंटर एम आर आचरेकर को आर्ट डायरेक्शन का मौका देकर भविष्य की फिल्मों की साज-सज्जा ही बदल दी. ऐतिहासिक और मिथकीय चरित्रिन को गढ़ने में फ़िल्मकार और आर्ट डायरेक्टर कैलेंडर आर्ट के प्रभाव में लुक और कॉस्टयूम गढ़ते रहे.
आज़ादी के पहले की ऐतिहासिक फिल्मों ने मनोरंजन के साथ भारतीय इतिहास का पॉपुलर ज्ञान दिया. ऐतिहासिक फ़िल्में डोक्युमेंट्री नहीं होतीं.उनमें सामान्य बोध का उपयोग किया जाता है ताकि अधिकाधिक दर्शकों को संतुष्ट किया जा सके. एक तरह से ऐतिहासिक फिल्मे सच्ची घटनाओं की काल्पनिक कहानियां ही होती हैं.
प्रसंग- सोहराब मोदी की ‘सिकंदर की मीना का रोचक किस्सा यूँ है कि लाहौर से वाया कोलकाता मुंबई पहुंची खुर्शीद फिल्मों में अभिनय करने के लिए बेताब थी.वह मुंबई आ चुकी थी,लेकिन उसे कोई खूबसूरत मौका नहीं मिल पा रहा था.सोहराब मोदी ‘सिकंदर की घोषणा और मुहूर्त के लिए बड़ा कार्यक्रम कर रहे थे.खुर्शीद ने कहीं से उस फंक्शन का निमंत्रण हासिल कर लिया.उसके पास कार्यक्रम में जाने के लायक फैशनेबल कपडे नहीं थे. उसने पैड्स की अफगानी महिला से मदद मांगी.उस उदार अफगानी महिला ने कपडे देने के साथ खास मौके के लिए उसके बाल भी बना दिए.खुर्शीद जब कार्य्रम के लिए पहुंची तो एकबारगी सबी की निगाहें उसकी ओर पलतीं.वह बाला की खूबसूरत लग रही थी.फोटोग्राफरों को लगा कि हा न हो यही फिल्म की नयी हीरोइन हो. उनके फ़्लैश चमकाने लगे. अब सोहराब मोदी चौंके.उस अंजन चेहरे से आकर्षित हुए.कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद उन्होंने खुर्शीद से बात की और अगले दिन आने के लिए कहा.सोहराब मोदी ने खुर्शीद को साइन कर लिया और उसे नया नाम दिया मीना. 


Saturday, September 22, 2018

फिल्म समीक्षा : बत्ती गुल मीटर चालू

फिल्म समीक्षा
बत्ती गुल मीटर चालू
-अजय ब्रह्मात्मज
श्रीनारायण सिंह की पिछली फिल्म ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा' टॉयलेट की ज़रुरत पर बनी प्रेरक फिल्म थी.लोकप्रिय स्टार अक्षय कुमार की मौजूदगी ने फिल्म के दर्शक बढ़ा दिए थे.पीछ फिल्म की सफलता ने श्रीनारायण सिंह को फिर से एक बार ज़रूरी मुद्दा उठाने के लिए प्रोत्साहित किया.इस बार उन्होंने अपने लेखको सिद्धार्थ-गरिमा के साथ मिल कर बिजली के बेहिसाब ऊंचे बिल को विषय बनाया.और पृष्ठभूमि और परिवेश के लिए उत्तराखंड का टिहरी गढ़वाल शहर चुना.
फिल्म शुरू होती है टिहरी शहर के तीन मनचले(एसके,नॉटी और सुंदर ) जवानों के साथ.तीनो मौज-मस्ती के साथ जीते है. एसके(शाहिद कपूर) चालाक और स्मार्ट है.और पेशे से वकील है.नॉटी(श्रद्धा कपूर) शहर की ड्रेस डिज़ाइनर है.वह खुद को मनीष मल्होत्रा से कम नहीं समझती.छोटे शहरों की हिंदी फिल्मों में सिलाई-कटाई से जुड़ी नौजवान प्र्र्धि में मनीष मल्होत्रा बहुत पोपुलर हैं.भला हो हिंदी अख़बारों का. आशंकित हूँ की कहीं ‘सुई धागा' में वरुण धवन भी खुद को मनीष मल्होत्रा न समझते हों.खैर,तीसरा सुंदर(दिव्येन्दु शर्मा) अपना व्यवसाय ज़माने की कोशिश में है.नॉटी दोनों लड़कों से बराबर दोस्ती निभाती है.एक वक़्त आता है कि वह दोनों में से किसी एक को जीवन साथी बनाने का फैसला लेना चाहती है.तय होता है कि दोनों दोस्तों के साथ वह एक-एक हफ्ता बिताएगी.एसके देख लेता है कि नॉटी और सुंदर एक-दुसरे को चूम रहे हैं.उसे दंभ था कि नॉटी तो उसे ही चुनेगी.यहाँ से कहानी में ट्विस्ट आता है.
फिल्म का विषय है बिजली का बेहिसाब बिल...सुंदर प्रिंटिंग और पैकेजिंग का बिज़नस आरम्भ करता है.नॉटी और एसके खुश हैं.यह चुम्बन और ट्विस्ट के पहले के प्रसंग हैं.सुंदर के बिज़नस में बिजली का बिल ज्यादा आता है तो वह बिजली विभाग में शिकायत करता है.मीटर चेक करने का उपकरण लगाने के बाद बिल और ज्यादा आता है-पचास लाख.शिकायत करने पर बिजली विभाग के कर्मचारी बिल भरने की हिदायत देते हैं.बात आगे बढती है.तब तक एसके नाराज़गी में मसूरी चला गया है.दोनों उसकी मदद के लिए पहुँचते हैं तो वह दुत्कार देता है...इसके बाद कहानी मोड़ लेती है और एसके बेहिसाब बिल का माला हाई कोर्ट तक ले जाता है.थोड़े जिरह और बहसबाजी के बाद ग्राहकों के हक में कोर्ट फैसला लेती है.बिजली कंपनी का लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है.हिंदी फिल्मों के ‘पोएटिक जस्टिस' के नाम पर सब कुछ सुधर और संभल जाता है.
फिल्म सरल है.टिहरी की भाषा के खास फ्लेवर के साथ लिखी और बनायीं गयी है.लेखन में स्थानीय फ्लेवर इतना स्ट्रोंग हो गया है कि संवादों की सादगी कडवाहट में बदल गयी है.एक तो हर वाक्य में क्रिया के साथ ‘ठहरा' शब्द का प्रयोग कुछ देर के बाद खटकने लगता है.बार-बार ध्यान वहीँ ठहर जाता है. इसके अलावा ‘बल' का बहुतायत उपयोग बलबलाने लगता है. साथ में ‘लता' भी प्रव्हुर मात्रा में वाक्यों के अंत में जोड़ा गया है.इन तीन शब्दों का बारम्बार दोहराव सम्प्रेषण में बाधक बनता है.सिद्धार्थ-गरिमा ने इस भाषा के लिए अच्छी मेहनत की होगी.कलाकारों ने अभ्यास भी किया होगा,लेकिन फिल्म का प्रभाव उसी अनुपात में नहीं बढ़ता.खूबी ही खामी बन गयी है.प्रसंगवस शहीद कपूर की संवाद अदायगी का उल्लेख ज़रूरी है.वे संवाद बोलते समय न केवल पिच बदलते रहते हैं,बल्कि अदायगी का अंदाज भी बदल देते हैं.किरदार को मसखरी का अंदाज देने के चक्कर में वे हास्यास्पद हो जाते हैं.इस फिल्म में उनकी सीमायें भी नज़र आईं.किरदार के स्थायी भाव पर वे नहीं टिके रहते.बार-बार लाइन छोड़ देते हैं.उनके अभिनय में सुसंगति नहीं झलकती.
अभिनय के लिहाज से दिव्येंदु शर्मा अपने किरदार में सटीक हैं.उन्होंने सुंदर की मासूमियत और कमजोरी को अच्छी तरह साधा है.श्रद्धा कपूर ठीक सी हैं.फिल्म और संबंधों की कमान कभी उनके हाथ में नहीं आती,इसलिए वह असर भी नहीं छोड़तीं.सहयोगी किरदारों में सुंदर के पिता निभा रहे कलाकार की भंगिमाएं प्रभावित करती हैं.
कई संगीतकारों ने फिल्म के गाने बनाये हैं.मैं तो इंतजार में था कि किसी गाने में ‘ठहरा' टेक आएगा.गंगा की स्तुति समकालीन है और रहत फतह अली खान को भावपूर्ण गीत मिला है.इन गानों का फिल्म की थीम से खास मतलब नहीं है.यहाँ स्थानीयता की सुध नहीं रही है.
श्रीनारायण सिंह खुद एडिटर और डायरेक्टर हैं.फिल्म की लम्बाई उन्होंने ही तय की होगी.उसकी लम्बाई पर सवाल नहीं उठाया जा सकता,लेकिन फिल्म शिथिल होने के साथ बिखरती रहती है तो यह एहसास होता है कि फिल्म छोटी हो सकती थी.इंटरवल के ठीक पहले जुड़ते-बढ़ते दृश्यों को देखते हुए लगता है किनिर्देशल-एडिटर 'इंटरवल पॉइंट' खोज रहे हैं.
अवधि- 155 मिनट

** दो स्टार

Friday, September 21, 2018

फिल्म समीक्षा : मंटो

फिल्म समीक्षा
मंटो
-अजय ब्रह्मात्मज


नंदिता दास की ‘मंटो' 1936-37 के आसपास मुंबई में शुरू होती है. अपने बाप द्वारा सेठों के मनोरंजन के लिए उनके हवाले की गयी बेटी चौपाटी जाते समय गाड़ी में देविका रानी और अशोक कुमार की ‘अछूत कन्या' का मशहूर गीत ‘मैं बन की चिड़िया’ गुनगुना रही है.यह फिल्म का आरंभिक दृश्यबंध है. ‘अछूत कन्या' 1936 में रिलीज हुई थी. 1937 में सआदत हसन मंटो की पहली फिल्म ‘किसान कन्या’ रिलीज हुई थी. मंटो अगले 10 सालों तक मुंबई के दिनों में साहित्यिक रचनाओं के साथ फिल्मों में लेखन करते रहे. उस जमाने के पोपुलर स्टार अशोक कुमार और श्याम उनके खास दोस्त थे. अपने बेबाक नजरिए और लेखन से खास पहचान बना चुके मंटो ने आसान जिंदगी नहीं चुनी. जिंदगी की कड़वी सच्चाइयां उन्हें कड़वाहट से भर देती थीं. वे उन कड़वाहटों को अपने अफसानों में परोस देते थे.इसके लिए उनकी लानत-मलामत की जाती थी. कुछ मुक़दमे भी हुए.
नंदिता दास ने ‘मंटो’ में उनकी जिंदगी की कुछ घटनाओं और कहानियों को मिलाकर एक मोनोग्राफ प्रस्तुत किया है. इस मोनोग्राफ में मंटो की जिंदगी और राइटिंग की झलक मात्र है. इस फिल्म को मंटो के बायोपिक की तरह नहीं लिया जा सकता. मुख्य रूप से मंटो की जिंदगी के आखरी 5 सालों को नंदिता ने इस फिल्म में रखा है. देश के विभाजन की घोषणा के साथ लाखों मुसलमानों ने पाकिस्तान का रुख किया, उनमें से एक मंटो भी थे. फर्क इतना है कि मंटो ने नाउम्मीदी में यह फैसला लिया था. औरों की तरह पाकिस्तान जाने की उनकी वजह मजहबी और उम्मीदों से भरी नहीं थी. उनका भरोसा टूटा था. उन्होंने खुद को बेहद असहाय महसूस किया था. यूं लगता है कि उनके लेखक और फिल्मी दोस्त भी उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाए थे कि वह मुंबई में सुरक्षित रहेंगे. मंटो का पाकिस्तान जाना एक असुरक्षित संवेदनशील लेखक का पलायन था. फिल्म मैं श्याम के साथ के दो दृश्यों में संकेत मिलता है कि उन्होंने अचानक पाकिस्तान जाने का फैसला क्यों लिया?
मंटो - वो हड्डियाँ कहाँ जलाई या दफनाई जाएँगी,जिन पर से मजहब का गोष्ट चीलें नोच-नोच कर खा…
श्याम - भगवन के लिए अपनी ये डायलॉगबजी बंद करो. वो लोग तुम्हारी किसी कहानी के किरदार नहीं हैं.वो मेरे अपने लोग हैं.जीते-जागते असली लोग.
मंटो - पर या तो सब की ज़िन्दगी है श्याम या फिर किसी की भी नहीं.
श्याम - ये सब तुम्हारे लिए कहना-लिखना आसन है.
श्याम - साले मुसलमानों की टोल है…
मंटो - मैं भी तो मुसलमान हूँ श्याम. अगर यहाँ फसाद हो जाये तो मुमकिन है तुम मुझे ही मार डालो.
श्याम - हाँ,मुमकिन है मैं तुम्हें भी मार डालूँगा.
मंटो पाकिस्तान जाने की तयारी करने लगते हैं.श्याम उन्हें रोकते हैं और कहते हैं कि वैसे भी तुम कौन से बड़े मुसलमान हो?
मंटो जवाब देते हैं...इतना तो हूँ कि मारा जा सकू.
फिल्म देखते समय मेरी रूचि और जिज्ञासा यह जानने में थी कि मंटो पाकिस्तान क्यों गए? उनके ज्यादातर फ़िल्मी और अदबी दोस्त मुंबई में ही रहे. इस एक प्रसंग से पता चलता है कि मंटो खुद की सुरक्षा के साथ बीवी और बेटी के लिए भी परेशान हुए होंगे. उत्तेजना और असमंजस की उस घडी में मंटो को मजबूत भरोसा मिल गया होता तो शायद उनके पाकिस्तान जाने की नौबत नहीं आती.संवेदनशील मंटो अपने समाज के अंतर्विरोधों और विसंगतियों को समझने के बावजूद पाकिस्तान जाने का अहम फैसला लेते हैं.याद दिलाने पर भी वे एक रुपये की उधारी नहीं चुकाना चाहते.वे चाहते थे कि वे ज़िन्दगी भर मुंबई शहर का कर्ज़दार रहें.एक तरह से इसी कर्जदारी में उन्होंने ज़िनदगी बिता दि और मौत का आलिंगन किया.बंटवारे को वे कभी स्वीकार नहीं कर सके.इस दर्द के बवजू यह भी सच है कि वे पाकिस्तान गए. मंटो ने इस पर कभी विस्तार से नहीं लिखा और न किसी ने उनसे कभी पूछा.नंदिता उनकी पत्नी से मिल पाई होतीं तो शायद ठोस इशारा मिलता. नंदिता और किसी हवाले से भी इस जिज्ञासा को नहीं छू पातीं.
मंटो प्रासंगिक हैं. यह फिल्म उनके किरदारों के साथ उनकी ज़िन्दगी में उतरती है. नंदिता का यह शिल्प घटनाओं के अभाव को तो भर देता है,लेकी उनकी ज़िन्दगी के भाव को कम कर देता है.हालाँकि यह निर्देशक और लेखक का चुनाव है कि वे फिल्म के लिए क्या चुनें और छोड़ें. ‘मंटो' बतौर फिल्म संतुष्ट नहीं करती यह एक अधूरी कहानी है. नंदिता मंटो के मानस की परतों को उघेड़ने का प्रयास नहीं करतीं. इस मायने में पाकिस्तान में बनी समाद खूसट की फिल्म ‘मंटो' अधिक गहरे उतरती है.
फिल्म का तकनिकी और अभिनय पक्ष सटीक और खूबसूरत है. नंदिता दास की टीम पीरियड और परिवेश को फिल्म के काल के मुताबिक रचती है. मुख्य न्हूमिका में नाज़ज़ुद्दीन सिद्दीकी मंटो की झल्लाहट और उकताहट हो को अपनी चाल-ढाल और बोलचाल में उतारते हैं.वे मंटो की तकलीफ बगैर नाटकीयता के उभरते हैं. बाकि कलाकारों ने बराबर सहयोग दिया है. फिल्म इंडस्ट्री की कुछ बड़ी हस्तियाँ महज फिल्म की शोभा बढाती है. वे कुछ जोडती नहीं हैं.कलाकारों के संवादों में उछारण और अदायगी की अस्पष्टता खलती है.
अवधि - 116 मिनट

***1/2

Thursday, September 20, 2018

विशाल भारद्वाज की पटाखा


‘पटाखा’ फिल्म का पोस्टरविशाल भारद्वाज की पटाखा
-अजय ब्रह्मात्मज

पहले दीपिका पादुकोण की पीठ की परेशानी और फिर इरफ़ान खान के कैंसर की वजह से विशाल भारद्वाज को अगली फिल्म की योजना टालनी पड़ी.वे दुसरे कलाकारों के साथ उस फिल्म को नहीं बनाना कहते हैं.अभी के दौर में यह एक बड़ी घटना है,क्योंकि अभी हर तरफतू नहीं और सही,और नहीं कोई और सहीका नियम चल रहा है.विशाल ने उसके साथ हीछूरियां' के बारे में भी सोच रखा था.चरण सिंह पथिक की कहनेदो बहनें' पर आधारित इस फिल्म की योजना लम्बे समय से बन रही थी.संयोग ऐसा बना किछूरियांही बैक बर्नर से  ‘पटाखा' बन कर सामने आ गयी.
विशाल भारद्वाजपटाखा' के साथ फिर सेमकड़ी' औरमकबूल' के दौर की सोच और संवेदना में लौटे हैं.सीमित बजट में समर्थ कलाकारों को लेकर मनमाफिक फिल्म बनाओ और सृजन का आनद लो.पटाखा' में राधिका मदान,सान्या मल्होत्रा और सुनील ग्रोवर मुख्य भूमिकाओं में हैं.तीनों फिल्मों के लिहाज से कोई मशहूर नाम नहीं हैं.सुनील ग्रोवर कॉमेडी शो में विभिन्न किरदारों के रूप में आकर दर्शकों को हंसाते रहे हैं.खुद उन्हें भी उम्मीद नहीं थी कि विशाल उन्हें अपनी फिल्म के लिए चुनेंगे.थिएटर के लम्बे प्रशिक्षण और अनुभवों के बावजूद सुनील ग्रोवर घिसी-पिटी भूमिकाओं में खर्च हो रहे थे.विशाल ने उन्हें उचित मौका दिया.फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद सुनील ग्रोवर के समर्पण और अभिनय से खुश विशाल मानते हैं की सुनील में पंकज कपूर के गुण हैं.वे किरदार के मिजाज को समझ कर अपनी तरफ से बहुत कुछ जोड़ते हैं.यही होता भी है.थिएटर से आये कलाकार अभिनय के अभ्यास और जीवन के अनुभवों से सिद्ध होते हैं.उन्हें जब भी कोई चुनौतीपूर्ण किरदार मिलता है,वे खुद को साबित करते हैं.
विशाल भारद्वाज कोपटाखा' की दो बहनों के लिए दो ऐसे कलाकार चाहिए थे,जिनकी कोई प्रचलित छवि न हो.इसी वजह से उन्होंने इन भूमिकाओं में किसी लोकप्रिय अभिनेत्री को नहीं चुना.उन्हें ऐसी अभिनेत्रियाँ चाहिए थीं,जो अपने बालों और चेहरों की चिंता छोड़ कर गंवई किरदारों  को आत्मसात कर सकें.फिल्म का ट्रेलर देख चुके पाठक स्वीकार करेंगे कि राधिका और सान्या ने पूरी तरह से शहरी लुक छोड़ दिया है.गाँव की देहातन महिलाओं के रूप में वे लुभा रही हैं.फिल्म के देसी संवादों को बोलते हुए दोनों ही अपने परिवेश में दिख रही हैं.
चरण सिंह पथिक की कहानीदो बहनें' वास्तविक किरदारों को लेकर लिखी गयी हैं.फिल्म की कहानी के अनुसार सहोदर बहनें एक ही घर में सहोदर भाइयों के साथ ब्याही जाती हैं.दोनों एक-दुसरे को फूटी आँख भी नहीं सुहाती हैं.उन्हें बस बहाना चाहिए.हमेशा झगड़ने को तैयार बहनें देवरानी-जेठानी होने के बाद बी झगड़ना बंद नहीं करतीं.लेखक पथिक ने अपनी सगी भाभियों को लेकर लिखी यह कहानी दास सालों तक नहीं छपवाई कि कहानी पढने से दोनों नाराज़ हो सकती हैं.जब वे उम्रदराज हो गयीं तो उन्होंने कहानी प्रकाशित की.कहानी पर विशाल भारद्वाज की नज़र पड़ी तो उन्होंने तुरंत उसे फिल्म के लिए चुन लिया.विशाल और पथिक की मुलाक़ात और इस फिल्म की तैयारी का अलग रोचक किस्सा है.
एक अंतराल के बाद विशाल भारद्वाज ने सिर्फ साढ़े उनतीस दिन में इस फिल्म की शूटिंग की है,जिसमें से डेढ़ दिन तो केवल मलाईका अरोड़ा के आइटम सोंग में लगा.28 दिनों में बनी इस फिल्म से विशाल संतुष्ट हैं.हालाँकि फिल्म की घोषणा और ट्रेलर से उनके फ़िल्मी शुभचिंतक चौंके हैं कि विशाल किस ज़मीन पर लौटे हैं? विशाल को उनकी परवाह नहीं.उन्हें दर्शकों की वाह-वाह चाहिए.

Tuesday, September 18, 2018

सिनेमालोक : भट्ट साहब की संगत

सिनेमालोक

भट्ट साहब की संगत
( महेश भट्ट की 70 वें जन्मदिन पर खास)
-अजय ब्रह्मात्मज
कुछ सालों पहले तक महेश भट्ट से हफ्ते में दो बार बातें और महीने में दो बार मुलाकातें हो जाती थीं.आते-जाते उनके दफ्तर के पास से गुजरते समय कभी अचानक चले जाओ तो बेरोक उनके कमरे में जाने की छूट थी. यह छूट उन्होंने ने ही दी थी. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बात-व्यवहार को समझने की समझदारी उनसे मिली है.उनके अलावा श्याम बेनेगल ने मेरी फिल्म पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में अंतदृष्टि दी. फिलहाल महेश भट्ट की संगत के बारे में.इसी हफ्ते गुरुवार 20 सितम्बर को उनका 70 वां जन्मदिन है.
भट्ट साहब से मिलना तो 1982(अर्थ) और 1984(सारांश) में ही हो गया था. दिल्ली में रहने के दिनों में इन फिल्मों की संवेदना ने प्रभावित किया था.समानांतर सिनेमा की दो सक्षम अभिनेत्रियों(शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल) की यह फिल्म वैवाहिक रिश्ते में स्त्री पक्ष को दृढ़ता से रखती है.घर छोड़ते समय पूजा का जवाब ऐसे रिश्तों को झेल रही तमाम औरतों को नैतिक ताकत दे गया था.इस एक फिल्म ने शबाना आज़मी को समकालीन अभिनेत्रियों में अजग जगह दिला दी थी.कई बार फिल्म के किरदार अभिनेता-अभिनेत्रियों के व्यक्तित्व को नै छवि दे देते हैं. फिर भट्ट साहब कीसारांश' ने संवेदना और सहानुभूति के स्तर पर बी वी प्रधान की पीड़ा ने हिला दिया था.एक निर्देशक से यह दर्शक का परिचय था.
संयोग कुछ ऐसा बना कि मुंबई आना हुआ.यहां फिल्म पत्रकारिता से जुड़ने का वासर मिला. अध्ययन और शोध में रूचि होने से फिल्मों की ऐतिहासिक और सामाजिक और राजनीतिक आयामों पर विचार करने की आदत पड़ी.भट्ट साहब से दो-चार सामान्य मुलाकातें हो चुकी थीं.तभी भोपाल में आयोजित एक सेमिनार में भट्ट साहब के साथ मंच शेयर करने का मौका मिला.साम्प्रदायिकता के सवालों पर केन्द्रित उस सेमिनार में मैंने महेश भट्ट की विवादित और पुरस्कृत फिल्म  ‘ज़ख्म' के हवाले से कुछ बातें की थीं.सेमिनार में मौजूद श्रोताओं और मित्रों को आश्चर्य हुआ था की कैसे कोई भट्ट साहब की आलोचना उनके सामने कर सकता है.दूसरों की सोच से लग भट्ट साहब ने हाथ मिलाने के साथ आदतन गले से लगा लिया था.
उन दिनों मैं मुंबई में दैनिक जागरण का फिल्म प्रभारी था.फिल्म पत्रकारिता के पहलुओं को समझते हुए प्रयोग कर रहा था.मुंबई पहुँचने के दो दिनों के अन्दर ही भट्ट साहब के पीआरओ का फ़ोन आया कि भट्ट साहब तुम से मिलना चाहते हैं.इस सन्देश के साथ उसने मुझ से पूछा कि तुम ने भोपाल में ऐसा क्या बोल दिया कि वे तुम से प्रभावित हैं.आकर मिलो...तय समय पर मुलाक़ात हुई.भट्ट साहब ने फिर से गले लगाया और कहा कि फिल्म पत्रकारिता में आप जैसी सोच के पत्रकारों को अधिक सक्रिय होना चाहिए.आप मुझ से मिलते रहें.अमूमन ऐसी भिडंत के बाद फिल्मी हस्तियाँ नाराज़ हो जाती हैं और नज़रन्दाज करती हैं और यहाँ भट्ट साहब खुद ही संगत का न्योता दे रहे थे.मुझे अपनी नज़र में रख रहे थे.उसके बाद मुलाकातें बढीं और फिर एक समय आया कि उनके साथ काम करने का मौका मिला.
भट्ट साहब की संगत हमेशा प्रेरक रही.मैंने उन्हें कभी निराश और हताश नहीं देखा.कई बार नाउम्मीदी से घिरने पर उनसे संबल मिलता रहा है.रिश्तों की उलझनों की ऐसी बारीक समझ कम निर्देशकों और व्यक्तियों में मिलती है.उनकी साफगोई के पीछे अनुभवों का पुलिंदा है.फिल्मों से अलग उनका एक सांस्कृतिक और दार्शनिक व्यक्तित्व है.वे घनघोर किस्म से राजनीतिक और साम्प्रदायिकता विरोधी व्यक्ति हैं.कुछ साल पहले तक वे हर विषय और मुद्दे पर बोलने के लिए तैयार मिलते थे.अभी उन्होंने खुद को सीमित कर लिया है.कुछ तो उम्र और कुछ देश का महौल ऐसा है कि विवेकी जन भी ख़ामोशी इख़्तियार कर रहे हैं.
70 वें जन्मदिवस पर भट्ट साहब को हार्दिक बधाई.


Tuesday, September 11, 2018

फ़िल्म समीक्षा : वन्स अगेन

फ़िल्म  समीक्षा 
वन्स अगेन 
-शोभा शमी
वो खट से फोन रखती थी....... तारा. 
वो फोन पर दूसरी तरफ आंखे मींचे टूं टूं टूं सुनता था........ अमर.

तारा हर बार जब यूं फोन रखती है तब बुरा सा क्यों लगता है? हर कॉल पर लगता है कि अरे इतनी छोटी बात. अभी तो कुछ कहा ही नहीं. कोई ऐसी बात जो कुछ जता सके. ये एक दूसरे से कुछ कहते क्यों नहीं! कुछ नहीं कहते ऐसा जो शायद उन्हें कह देना था. या शायद यही खूबसूरती है कि वो कुछ नहीं कहते. 
एक अजीब सी तसल्ली है उन दोनों के फोन कॉल्स में. जो प्रेम में पड़े किन्हीं दो लोगों में आसानी से दिख जाती है. एक इच्छा जो उनके चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती है. बहुत बारीक. बहुत महीन. उन फोन कॉल्स में ऐसी कोई बात नहीं है सिवाए उस चाहना के जो बिना कुछ कहे सबकुछ कहती जाती है. 
दरअसल पूरी फिल्म ही ऐसी है जो कुछ नहीं कहती. जो प्रेम, चाहत और इच्छाओं की बात आखिर में करती है और बीच सारा वक्त उस प्रेम को बुनती रहती है. 
और ये असल जीवन के इतनी करीब महसूस होता है कि ऐसा लगता है कि अपनी एक किश्त की डायरी पलट ली हो पूरी. 

फिल्म जैसे स्मृतियों के रंग में है. हमारी अपनी स्मृतियों में भी मुलाकातों के अलावा कुछ नहीं है. कोई शोर नहीं है. कोई आवाज नहीं है. ऐसा जैसे प्रेम की स्मृति में होता है. सिर्फ रंग और अहसास में. वो सारा शोर और बाहरी दुनिया कहीं गुम जाती है हमेशा. 

मुम्बई की भीड़भरी सड़कों और शोर से फिल्म कितनी मोहब्बत से खेलती है. नीरज कबि खुद कहते हैं कि, ‘फिल्म में मुम्बई तीसरा और स्टैटिक कैरैक्टर है’. 

तारा अपने भीड़ भड़ाके वाले कैफे में है. अचानक अमर का फोन आता है और सारा शोर एकबारगी थम जाता है. उस फोन कॉल के बाद वो अपनी दुनिया में लौटती है और शोर भर जाता है. 


तारा का मच्छी बाज़ार जाना... मछलियां कट रही हैं. मसाले कुट रहे हैं. एक पैकेट मसाला पैक हो रहा है. तारा के आस पास शोर ही शोर है और अगले ही फ्रेम में धक्क सी चुप्पी है. कोई आवाज़ नहीं है. तारा हाथों पर सिर रखे बैठी है. सामने फोन रखा है. तारा की दो दुनियाएं, दो फ्रेम में खट से हमारे भीतर उतरती हैं. 



बहुत सुंदर पैटर्न है. जिस तरह से फिल्म के बहुत से फ्रेमों में बिना किसी डॉयलॉग और म्यूजिक के सिर्फ शोर है. और अचानक अगले फ्रेम में चुप्पी. और संगीत की वो सुंदर धुन जब वो दोनों साथ होते हैं या मिलकर लौट रहे होते हैं. 

दोनों के उस प्रेम में एक बहुत सहज सा सुचकुचाहट है. एक कौतुक. एक दूसरे को ना जानने का आश्चर्य औऱ इच्छा.  
“जैसा सोचा था आप वैसे ही हैं.”
“आप हमेशा यहां आते हैं?” 
एक दूसरे को न जानने का भाव. दो जीवन का अंतर जहां एक बहुत शिद्दत है. रिश्ता भी है. लेकिन एक अंतर, एक दूरी भी है. एक दूसरे को न जानने की. जो बहुत इंटेंस है.  
“आप किसके साथ आते हैं?”
“पहली बार किसी के साथ आया हूँ.”


जब दूर छोर पर वो उसे एकटक देखती है और बस देखती रह जाती है तो आपको अपनी एक बहुत अधूरी सी मुलाकात याद आती है. बहुत बारीक. महीन.

चाह किसी तड़कती भड़कती सी पार्टी या गुलाब के फूल लिए नहीं है. वो अपने किस्म की सादगी में है. जिसमें शिद्दत है. जुम्बिश है. धड़कन है. और बहुत मासूम बातें हैं जिनपर प्यार आ जाता है.


“अच्छा आप जिद भी करते हैं?”
“मैं ज़िद ना करता तो आप मिलतीं?”

“मुझे देखकर चलेंगी तो गिर जाएंगी आप.” (तारा सच में अमर को देखकर चल रही है)
“बाकी लोगों को आपको घूरना अच्छा लगता होगा पर मुझे कोई शौक नहीं है आपको देखने का” “लेकिन मुझे आपको देखना बहुत पसंद है” (अमर तारा को देख रहा है).

अमर: “आपको तो अगली फ़िल्म में कास्ट करना चाहिए.”
पहले तो आप मुझे अफोर्ड नहीं कर पाएंगे और दूसरा मैं आपके साथ एक्टिंग नहीं करना चाहती..
अमर पूछता है वो क्यों? उस क्यों का कोई जवाब नहीं आता.. बैकग्राउंड में एक खूबसूरत गाना बजता है. और एक लॉन्ग शॉट में दोनों कार में हंस रहे हैं.

फिल्म के सारे हिस्से इतने असल हैं. प्रेम कहानी के इतर दो परिवारों के बीच की धुकधुकी. उनका आपसी सामंजस्य. हर कैरैक्टर का अपने किस्म का अकेलापन या उलझन. जो अपनी अपनी लेयर लिए चलता है. और उस सब का बैलेंस. जो कि अद्भुत है. जो कहीं भी डिगा या इधर उधर नहीं होता. बिल्कुल वैसा जैसे फ़िल्म में तारा कहती है कि एक वक्त पर पता चल जाता है कि सबकुछ कैसा होगा. अच्छा, बुरा या बहुत अच्छा.
 ये बात भी तारा फोन पर कहती है. फिर कुछ कहकर खट से फोन रखती है और अमर सुनता है..टूं टूं टू.!

Sunday, September 9, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : ऐतिहासिक फिल्मों का अतीत



ऐतिहासिक फिल्मों का अतीत
(मूक फिल्मों  के दौर की ऐतिहासिक फिल्मों पर एक नज़र )
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल-फिलहाल में अनेक ऐतिहासिक फिल्मों की घोषणा हुई है.इन फिल्मों के निर्माण की प्रक्रिया विभिन्न चरणों में है. संभवत: सबसे पहले कंगना रनोट कीमणिकर्णिकाआ जाएगी. इस फिल्म के निर्देशक दक्षिण के कृष हैं.फिल्म के लेखक विजयेंद्र प्रसाद हैं. विजयेंद्र प्रसाद नेबाहुबली 1-2' की कहानी लिखी थी.बाहुबलीकी जबरदस्त सफलता ने ही हिंदी के फिल्मकारों को ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण के प्रति जागरूक और प्रेरित किया है.बाज़ार भी सप्पोर्ट में खड़ा है. करण जौहर कीतख़्तकी घोषणा ने ऐतिहासिक फिल्मों के प्रति जारी रुझान को पुख्ता कर दिया है.दर्शक इंतजार में हैं.
निर्माणाधीन घोषित ऐतिहासिक फिल्मों की सूची बनाएं तो उनमेंमणिकर्णिकाऔरतख़्तके साथ धर्मा प्रोडक्शन की कलंक, यशराज फिल्म्स  कीशमशेरा', यशराज की हीपृथ्वीराज’,अजय देवगन कीतानाजी’,आशुतोष गोवारिकर की  पानीपत, अक्षय कुमार की केसरी, नीरज पांडे कीचाणक्यशामिल होंगी. इनमें कलंकऔरशमशेरा' का इतिहास से सीधा संबंध नहीं है. लेकिन ये दोनों भी पीरियड फिल्में हैं.इन फिल्मों के विस्तार में जाने से पहले हिंदी फिल्मों के इतिहास  के पन्ने पलट लेना रोचक होगा.
हिंदी फिल्मों के विधात्मक वर्गीकरण में मिथकीय, पौराणिक, ऐतिहासिक, कॉस्ट्यूम और पीरियड फिल्मों को लेकर स्पष्ट विभाजन नहीं है. मोटे तौर पर लिखित इतिहास के  के पहले की कहानियों को हम मिथकीय और पौराणिक श्रेणी में डाल देते हैं. लिखित इतिहास के किरदारों और घटनाओं को लेकर बनी फिल्मों को ऐतिहासिक कहना उचित होगा.पीरियड फिल्मों का आशय काल विशेष की फिल्मों से होता है.व्यापक अर्थ में सभी फिल्में किसी न किसी काल में स्थित होती हैं.  इस लिहाज से सारी फिल्में पीरियड कही जा सकती हैं. कॉस्ट्यूम का सीधा संबंध  वेशभूषा, वस्त्र परिधान और जेवर से होता है. जिन फिल्मों में इनका उपयोग होता है उन्हें हम कॉस्ट्यूम ड्रामा कह सकते हैं.आम दर्शक इस वर्गीकरण में ज्यादा नहीं उलझते.
हिंदी  फिल्मों में ऐतिहासिक फिल्मों की परंपरा पर सरसरी निगाह डालें तो हम पाते हैं कि फिल्मकारों ने शुरू से ही इस तरफ ध्यान दिया है. पिछली सदी के सातवें,आठवें, नौवें और अंतिम दशक में कम ऐतिहासिक फ़िल्में बनी,लेकिन उसके पहले और बाद में उल्लेखनीय फिल्में बनी है. आज की रुझान को उसी के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए.
रिकॉर्ड के मुताबिक भारत में बनी चौथी फिल्म ऐतिहासिक थी. इसका निर्देशन एस एन पाटणकर ने किया था. उनकीडेथ ऑफ नारायणराव पेशवापहली ऐतिहासिक फिल्म है. इस फिल्म के निर्माण के अगले छह-सात सालों में किसी दूसरी ऐतिहासिक फिल्मों का उल्लेख नहीं मिलता.सीधे 1923 में दादा साहब फाल्के बुद्ध के जीवन पर फिल्म ले कर आते हैं. इसी साल मदान थिएटर कीनूरजहांभी आई थी.नूरजहांमें शीर्षक भूमिका पेशेंस कपूर ने निभाई थी. 1923  मैं ही बाबूराव पेंटर ने महाराष्ट्र फिल्म कंपनी के लिएसिंहगढ़का निर्देशन किया.शिवाजी के सेनापति तानाजी ने  शौर्य और कौशल से सिंहगढ़ के किले को विदेशियों से मुक्त करवाया था.सिंहगढ़में शांताराम ने शेलारमामा की भूमिका निभाई थी.इन दिनों अजय देवगन की टीम मराठा इतिहास के इसी वीर  की कहानी रचने में लगी है. 1924 में रजिया सुल्तान की जिंदगी पर मैजेस्टिक फिल्म कंपनी कीरजिया बेगमनाम की फिल्म बनी थी.1925 में राजस्थान के बहादुर राजाअमर सिंह डग्गरके जीवन पर बनी एक फिल्म का उल्लेख मिलता है.1927 में वी शांताराम ने निर्देशन में कदम रखा.उनकी पहली फिल्म ऐतिहासिक थी.प्रभात फिल्म कंपनी के लिए उन्होंनेनेताजी पालकरका निर्देशन किया.महाराष्ट्र फिल्म कंपनी ने उन्हीं दिनों बाबूराव पेंटर के निर्देशन मेंबाजी प्रभु देशपांडेका निर्माण किया.
अफसोस है कि ये फिल्में अब उपलब्ध नहीं है. भारत में फिल्मों के रखरखाव और संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया. नतीजतन पुरानी फिल्मों की ज्यादातर जानकारी  कागजो में उपलब्ध है.जर्मनी के सहयोग से 1926 में बनी हिमांशु राय कीद लाइट ऑफ एशियादेखी जा सकती है. फ्रान्ज़ ऑस्टिन निर्देशित फिल्म की कहानी निरंजन सरकार ने लिखी थी. तकनीक और अभिनय के लिहाज से यह अपने समय की बेहतरीन फिल्म थी.इस फिल्म ने विदेशों में धूम मचा दी थी. इस फिल्म का साफ-सुथरा प्रिंट आज भी उपलब्ध है. इसी के आसपास मुमताज महल के जीवन पर एक फिल्म बनी थी. मुमताज शाहजहां की बेगम थीं. उन्हीं की याद में शाहजहां ने ताजमहल का निर्माण करवाया था. इस दौर में दूसरे मराठा नायकों पर भी फिल्में बनीं.मूक फिल्मों के इस जमाने में राजस्थान के वीर राजाओं हमीर प्रताप और पृथ्वीराज के जीवन को पर्दे पर उतारा गया. इन दिनों डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी पृथ्वीराज के शौर्य और प्रेम को निर्देशित करने की तैयारी में जुटे हैं.
1928 में पहली बार सलीम और अनारकली के प्रेम पर दो फिल्में बनीं.द लव्स ऑफ़ अ मुग़ल प्रिंसइम्तियाज अली ताज के लिखे 1922 के नाटक पर आधारित था. इस में अनारकली की भूमिका सीता ने निभाई थी. दूसरी फिल्म का शीर्षकअनारकलीही था. उसमें सुलोचना शीर्षक भूमिका में थीं. हिमांशु राय कीशिराजभी उल्लेखनीय है. यह फिल्म ताजमहल के शिल्पकार के जीवन को उकेरती है. 1930 में आई वी शांताराम कीउदयकालउल्लेखनीय फिल्म है.स्वराज्य तोरणनाम से बनी इस फिल्म का टाइटल अंग्रेजों के दवाब और आदेश से बदलना पड़ा था. शिवाजी के जीवन पर आधारित फिल्म में शांताराम ने नायक की भूमिका भी निभाई थी. मूक फिल्मों के दौर में मौर्य और गुप्त वंश के राजाओं के जीवन पर भी फिल्में बनीं. चाणक्य के जुझारू व्यक्तित्व ने फिल्मकारों को आकर्षित किया. अभी नीरज पांडे ने अजय देवगन के साथचाणक्यबनाने का फैसला किया है.
साइलेंट एरा में बनी  ऐतिहासिक फिल्मों के आकलन,अध्ययन और विश्लेषण से हम पाते हैं कि फिल्मों के विषय,नायक और काल तय कर लिए गए थे.  फिल्मकार परतंत्र देश में आजादी और देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत नायकों का चुनाव कर रहे थे. कोशिश यह रहती थी अंग्रेजों की सेंसरशिप से बचते-बचाते हुए दर्शकों को जागृत और प्रेरित करने की फ़िल्में बनाई जाएं.उनमें राष्ट्रीय चेतना के साथ स्वतंत्रता की भावना का संचार किया जाये. उन्हें आलोड़ित किया जाये. इनके साथ ही मनोरंजक काल्पनिक कहानियां भी रची जा रही थी.
तब फिल्मों के निर्माण का बड़ा केंद्र मुंबई था. मुंबई के सक्रिय फिल्मकारों में अधिकांश महाराष्ट्र के थे. छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और इतिहास से परिचित मराठी फिल्मकारों ने ऐतिहासिक फिल्मों के लिए मराठा शासन के नायकों का चुनाव किया. मुक्ति और राष्ट्र की रक्षा के लिए मराठा योद्धाओं ने अनेक संघर्ष किए. मराठा शासन के अलावा फिल्मकारों को मुगल साम्राज्य के बादशाह, रानियां और राजकुमारों के जीवन में दिलचस्प ड्रामा दिखा. मराठों और मुगलों के साथ उनकी नजर भगवान बुद्ध के जीवन और उपदेशों पर पड़ी. देश-विदेश में विख्यात भगवान बुद्ध प्रिय विषय रहे हैं. पर अभी तक उनके जीवन पर कोई संपूर्ण फिल्म नहीं आ सकी है. मौर्य और गुप्त वंश के अशोक और चंद्रगुप्त फिल्मों के मशहूर ऐतिहासिक नायक रहे हैं.इस दौर में कुछ राजस्थानी राजाओं पर भी फिल्में बनीं.
 निर्माणाधीन फिल्मों की सूची पर ध्यान दें तो पाएंगे कि मूक फिल्मों के दौर में तय किये विषय और दायरे से आज के फिल्मकार आगे नहीं बढ़ पाए हैं. सोच और कल्पना की चौहद्दी नहीं बढी है.घूम-फिरकर फिल्मकार उन्हें कहानी और किरदारों को दोहरा रहे हैं. आज के फिल्मों पर बातचीत करने के पहले हम बोलती फिल्मों के दौर में बनी मशहूर ऐतिहासिक फिल्मों की चर्चा करेंगे.
जारी...



Friday, September 7, 2018

फिल्म समीक्षा : गली गुलियाँ

फिल्म समीक्षा
गली गुलियाँ
-अजय ब्रह्मात्मज
दिल्ली के चांदनी चौक की तंग गलियों में से एक गली गुलियाँ  से गुजरें तो एक  पुराने जर्जर मकान में खुद्दुस मिलेगा. बिखरे बाल, सूजी आंखें,मटमैले पजामे-कमीज़ में बदहवास खुद्दुस बाहरी दुनिया से कटा हुआ इंसान है. उसने अपनी एक दुनिया बसा ली है. गली गुलियाँ में उसने जहां-तहां सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं. वह अपने कमरे में बैठा गलियों की गतिविधियों पर नजर रखता है. वह एक बेचैनी व्यक्ति है. उसे एक बार पीछे के मकान से मारपीट और दबी सिसकियों की आवाज सुनाई पड़ती है. गौर से सुनने पर उसे लगता है कि बेरहम पिता अपने बेटे की पिटाई करता है. खुद्दुस उसके बारे में विस्तार से नहीं जान पाता. उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है. वह अपनी  बेचैनी को खास दोस्त गणेशी से शेयर करता है. अपने कमरे में अकेली जिंदगी जी रहे खुद्दुस  का अकेला दोस्त गणेशी ही उसकी नैतिक  और आर्थिक मदद करता रहता है. वह उसे डांटता-फटकारता और कमरे से निकलने की हिदायत देता है.खुद्दुस एक बार हाजत में बंद होता है तो वही उसे छुदाता है.पता चलता है कि गली गुलियाँ से निकल चुके अपने ही छोटे भाई से उसकी नहीं निभती.उसकी एक ही चिंता है कि कैसे वह पीछे के माकन के पिटते बच्चे को बचा ले.उसका ज़ालिम पिता कहीं उसकी जान न ले ले.
दीपेश जैन निर्देशित 'गली गुलियाँ' समाज से अलग-थलग पद गए खुद्दुस की कहानी कहती है. दीपेश जैन की यह पहली फिल्म है.उन्होंने किसी पारंगत निर्देशक की सूझ-बूझ का परिचय दिया है. उनकी तकनीकी टीम का उचित योगदान दीखता है.खास कर कैमरा,पार्श्व संगीत और संपादन में की सुघड़ता प्रभावित करती है.निश्चित ही मनोज बाजपेयी से उन्हें अतिरिक्त मदद मिली है.फिल्म में नाटकीयता नहीं है. एक अकेके व्यक्ति के मानस की खोह में उतरती यह फिल्म एक समय के बाद भावनाओं की आवृति से दर्शकों को भी मथ देती है.दर्शक चाहता है कि खुद्दुस की व्यथा का निस्तार हो ताकि वह स्वयं थोड़ी रहत महसूस करे.बन कमरे और तंग गलियों में तैर रही घबराहट दर्शकों के मन पर हावी होने लगती है.मेरे साथ तो यही हो रहा था.मैं चाहने लगा था की खुद्दुस को मुक्ति मिले.मुझे उसके व्यक्तित्वे से जुगुप्सा सी होने लगी थी.अगर वह बगल की कुर्सी पर आ बैठता तो शायद मैं उठ जाता या बैठे रहने का दवाब होने पर खुद को सिकोड़ लेता.यह दीपेश की खूबी है और मनोज बाजपेयी की खासियत है.
मनोज बाजपेयी इस दौर के बहुआयामी अभिनेता हैं.अभी वह एक तरफ 'सत्यमेव जयते' जैसी घोर कमर्शियल फिल्म के साथ 'गली गुलियाँ' कर रहे हैं.मज़ेदार यह है कि वह दोनों तरह की भूमिकाओं में सराहना पा रहे हैं.ऐसा लगता है कि 'गली गुलियाँ' के लिए उन्हें खास मशक्कत करनी पड़ी होगी.रिलीज के पहले एक बातचीत में उन्होंने ने कहा था कि 'यह मेरे जीवन की सबसे कठिन और जटिल फिल्म है. इसे करते हुए  मैं बहुत परेशान रहा. इस भूमिका ने मेरे अभिनय  की शैली और तकनीक को चुनौती दी. डेढ़ महीनों के अभ्यास में कई बार ऐसा लगा की यह मुझ से नहीं हो पाएगा. कई बार अपने अभिनेता होने पर शक हुआ. ऐसा भी लगा कि मैं जो सोचता हूं,वैसा हूं नहीं.  मुझे नई   युक्ति तलाशनी पड़ी. इस भूमिका के लिए पुरस्कार मिले तो खुद आश्वस्त हुआ यह मेरा बेहतरीन काम है.
 किसी भी भूमिका को निभाने में दो  प्रक्रियायें साथ चलती हैं. एक बाहरी होती है और एक भीतरी. किरदार के द्वंद्व और दुविधा को पकड़ पाने की मानसिक यात्रा... किरदार के सारे तत्वों को जोंड़कर चल पाना... यह एक जटिल प्रक्रिया होती है. किरदार के  मानसिक उथल-पुथल को चेहरे पर लाकर दर्शकों तक पहुंचाना ही असल चुनौती है.  इस फिल्म में संवाद कम है. किरदार खामोश रहता है. उसका संबंध सिर्फ दीवारों और सीसीटीवी मॉनिटर के साथ हैं. कमरे के पुराने पंखे और मकड़ी के जालों के साथ उसका रिश्ता है. वह कमरे में अकेला रहता है. हिंदी  फिल्मों में ऐसे किरदार कम दिखे हैं.'
अवधि :157 मिनट 
**** चार स्टार . .