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Tuesday, April 11, 2017

रोज़ाना : मॉडर्न क्लासिक ‘ताल’ का खास शो


रोज़ाना/ अजय ब्रह्मात्‍मज
    मॉडर्न क्लासिक ताल का खास शो
महानगर मुंबई और इतवार की शाम। फिर भी सुभाष घई का निमंत्रण हो तो कोई कैसे मना कर सकता है? उत्‍तर मुंबई के उपनगर से दक्षिण मुंबई मुखय शहर में जाना ही पहाड़ चढ़ने की तरह है। इसके बावजूद खुद को रोकना मुश्किल था,क्‍योंकि सुभाष धई ने अपन फिल्‍म ताल देखने का निमंत्रण दिया था। सुभाष घई अब सिनेमाघर के बिजनेस में उतर आए हैं। वे पुराने सिनेमाघरों का जीर्णोद्धार कर उन्‍हें नई सुविधाओं से संपन्‍न कर रहे हें। उन्‍हें मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित न्‍यू एक्‍स्‍लेसियर सिंगल स्‍क्रीन में आधुनिक प्रोजेकशन और साउंड सिस्‍टम बिठा दिया है। उसयकी सज-धज भी बदल दी है। इसी सिनेमाघर में वे 1999 में बनी अपनी फिल्‍म ताल दिखा रहे थे। इस खास शो में उनके साथ म्‍यूजिक डायरेक्‍टर एआर रहमान, कैमरामैन कबीर लाल, कोरियोग्राफर श्‍यामक डावर, संवाद लेखक जावेद सिद्दीकी व गायक सुखविंदर सिंह भी मौजूद रहेथ।
फिल्‍ममेकिंग की रोचक और खास प्रक्रिया है। एक डायरेक्टर अपने विजन के अनुसार कलाकारों और तकनीशियन की टीम जमा करता है और फिर महीनों, कई बार सालों में अपनी सोच को सेल्‍युलाइड पर उतारने की कोशिश करता है। लोकप्रिय, चर्चित और देखी हुई क्‍लासिक की रचना और निर्माण प्रक्रिया से वाकिफ होने पर फिल्‍म के दृश्‍य खुलते हैं। उनके साथ जुड़ी घटनाओं को जानने पर हर दृश्‍य का रोमांच बढ़ जाता है। ताल शोमैन सुभाष घई की म्‍यूजिकल लवस्टोरी है।
मिस वर्ल्‍ड ऐश्‍वर्या राय के सौंदर्य से प्रेरित ताल में नृत्‍य और संगीत का नया आकर्षण था। एआर रहमान के लयपूर्ण संगीत की ताजगी आज भी कानों में रस घोलती है। लगातार 17 दिनों तक सुभाष घई के दिन और एआर रहमान की रातों की मेहनत से ताल का संगीत तैयार हुआ था। आनंद बख्‍शी के गीतों को रहमान ने संगीत से संवारा। शब्‍दों में लय और गति जोड़ी। श्‍यामक डावर ने उसी लय और गति को नृत्‍य में उतार दिया। ताल में ऐश्‍वर्या राय की नृत्‍य मुद्राएं भित्ति चित्रों की रूपसियों और अप्सराओं की याद दिलाती हैं।
    ताल हर लिहाज से 20 वीं सदी की मॉडर्न क्लासिक हिंदी फिल्‍म है।
@brahmatmajay

Sunday, April 9, 2017

अलहदा है बेगम का फलसफा’ : महेश भट्ट




 -अजय ब्रह्मात्‍मज
श्रीजित मुखर्जी का जिक्र मेरे एक रायटर ने मुझ से किया था। उन्‍होंने कहा कि वे भी उस मिजाज की फिल्‍में बनाते रहे हैं, जैसी ‘अर्थ’, ‘सारांश ‘जख्‍म’ थीं। उनके कहने पर मैंने ‘राजकहानी’ देखी। उस फिल्‍म ने मुझे झिझोंर दिया। मैंने सब को गले लगा लिया। मैंने मुकेश(भट्टसे कहा कि ‘राज   राज रीबूट’ हमने बहुत कर लिया। अब ‘राजकहानी’ जैसी कोई फिल्‍म करनी चाहिए। मुकेश को भी फिल्‍म अच्छी लगी। श्रीजित ने अपनी कहानी भारत व पूर्वी पाकिस्‍तान में रखी थी। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। यह प्लॉट ही अपने आप में बड़ा प्रभावी लगा। हमें लगा कि इसे पश्विमी भारत में शिफ्ट किया जाए तो एक अलग मजा होगा। हमने श्रीजित को बुलाया। फिर उन्होंने 32 दिनों में दिल और जान डालकर ऐसी फिल्‍म बनाई की क्या कहें।
   मेरा यह मानना है कि हर सफर आप को आखिरकार अपनी जड़ों की ओर ले जाता है। बीच में जरूर हम ऐसी फिल्‍मों की तरफ मुड़े़, जिनसे पैसे बनने थे। पैसा चाहिए भी। फिर भी लगातार फिल्‍म बनाने के लिए, पर रूह को छूने वाली आवाजें सुनाने  वाली कहानियां भी जरूरी हैं। यह जज्‍बा इस फिल्‍म में देखने को मिलने वाला है। कहानी जिस समय में सेट है उस वक्त की दुनिया दिखाने के लिए हम झारखंड के बीहड़ इलाके में गए और शूट किया। मुझे यकीन है कि लोग ‘बेगम जान’ की आत्‍मा और सादगी से यकीनन जुड़ेंगे।
   जो रवायत ‘सारांश’, ‘अर्थ’  ‘जख्‍म’ की है, यह उसी का विस्‍तार है। पिछले एक-डेढ दशक में हमने सफलता तो बड़ी अर्जित कर ली थी, पर हर तरफ से उसी किस्‍म की फिल्‍में बनाने की फरमाइशें आती थीं।राजकहानी’ में हमें हमारी तलाश खत्‍म होती दिखी। मौजूदा पीढी भी बड़ी भावुक है। ऊर्जावान तो वे हैं हीं, जो उनकी अपनी है। लिहाजा वे किसी चीज की जो व्‍याख्‍या करते हैं, वह अलहदा निकल कर आती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ‘बेगम जान’ से एक नई दास्तान शुरू होगी।
इत्‍तफाकन सेंसर बोर्ड भी इससे प्रभावित हुआ। वरना ‘उड़ता पंजाब’ व अन्य हार्ड हिटिंग फिल्‍मों पर उनका रवैया देख तो हम चिं‍तित थे कि कहीं इस फिल्‍म को भी अतिरिक्‍त कतरब्‍योंत न झेलनी पड़े। लिहाजा हमने ‘ सर्टिफिकेट के लिए ही अप्‍लाई किया था, पर जब उन्होंने वह फिल्‍म देखी और जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह देख हमें बड़ा ताज्‍जुब हुआ। वे भावुक हो गए। बड़े हिचकते हुए कहा कि गालियों को जरा तब्‍दील कर लिया जाए बस। इस तरह देखा जाए तो ‘बेगम जान’ ने सेंसर बोर्ड के साथ कमाल का अनुभव हमें दिया। खुद पहलाज निहलानी ने हमें फोन कर कहा कि बोर्ड वाले इस फिल्‍म की बड़ी तारीफें कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमने जिन सिद्धांतों के मद्देनजर यह फिल्‍म बनाई, वे मजबूत थे। नतीजतन, इसे सेंसर की मार नहीं झेलनी पड़ी।
जैसे ‘बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया। मनोरंजक होते हुए भी उसने बात तो कह दी न। वह देख,जब आप सिनेमाघरों से निकलते हैं तो लगता है कि हमारी बच्चियों के साथ जुल्‍म हो गया है। औरतों की आजादी की इज्‍जत की ही जानी चाहिए। यह बहुत अहम मैसेज है, पर एंटरटेनिंग तरीके से है। मतलब साफ है। आप इस दौर में इमेजेज दिखा कर घर-दुकान नहीं चला सकते। अब सेक्‍स वगैरह नहीं चलेगा। संचार के बाकी माध्‍यमों ने उसकी जरूरत पूरी कर दी है। सेक्‍स कहानी का हिस्‍सा हो तो बात बनेगी। मसलन, ‘जिस्‍म2। उसमें सेक्‍स  कहानी का हिस्‍सा था। उसे इरादतन नहीं परोसा गया था। हम दर्शकों को उल्‍लू नहीं बना सकते।
पार्टिशन को लेकर ढेर सारी कहानियां हैं, जिन्‍हें हम जीना नहीं चाहते। गिन कर पांच फिल्‍में बनी हैं उस मसले पर। हालांकि हमारी फिल्‍म शुरू होती है आज के कनॉट प्लेस से। उसके बाद हम हिंदुस्तान के बंटवारे की ओर जाते हैं। रेडक्लिफ लाइन पर जाते हैं। औरतों के सिद्धांत व उनके हक की बातें करते हैं। तो हम विशुद्ध पार्टिशन की बात नहीं करते हैं। हम औरतों के अधिकार की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। यह बदकिस्‍मती है हमारी कि औरतें तब भी गुलाम थीं, अब भी उन्हें पूरी आजादी नहीं दी गई है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि वे अपनी जिस्‍म की भी मालकिन नहीं।
फिल्‍म में ढेर सारी अभिनेत्रियां हैं। बेगम जान के लिए विद्या ही हमारी पहली च्‍वॉइस थीं। गौहर खान व इला अरूण भी हैं। इला के साथ काम कर बड़ा मजा आया। बेगम जान का फलसफा अलग है। इक मर्द उसकी मंजिल नहीं है। वह न हो तो भी वह खुद को अधूरी नहीं मानेगी। वह वेश्‍या है, मगर छाती नहीं पीटती कि उसके साथ अत्‍याचार हुआ है। वह कोठे को काम की तरह लेती है।
अमिताभ बच्चन का वॉयस ओवर इसलिए इस्तेमाल हुआ कि हम ऐसी आवाज चाहते थे, जिन्‍हें लोग सुनें। लोग इमोशन की गहराई में उतर सकें। हमने उनसे गुजारिश की तो उन्होंने बड़े विनीत भाव से उस ख्‍वाहिश को स्‍वीकारा। हालांकि उनके संग मेरा अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है। अमर सिंह के चलते हमारे रिश्‍ते में खटास आई थी। शाह रुख मामले में हमने एक स्‍टैंड लिया था! तब अमर सिंह के चलते हम दोनों के बीच जरा सी कड़वाहट थी, मगर मुकेश साथ उनके संबंध अच्छे रहे हैं। बच्चन जी खुद भी आलिया की बड़ी तारीफ करते रहते हैं। तो हम कब तलक मन में दूरियां पाले रखते।

कॉमन मैन अप्रोच है अक्षय कुमार का - सुभाष कपूर

कॉमन मैन अप्रोच है अक्षय कुमार का
-सुभाष कपूर
सबसे पहले तो मैं अक्षय कुमार को बधाई दूंगा। उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेता का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिलना खुशी की बात है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अक्षय कुमार ऐसे अभिनेता रहे हैं,जो बार-बार राइट ऑफ किए जाते रहे हैं। फिल्‍मी पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी घोषणाएं होती रही हैं। समय-समय पर कथित एक्‍सपर्ट उनके अंत की भविष्‍यवाणियां करते रहे हैं। उनके करिअर की श्रद्धांजलि लिखी गई है। अक्षय कुमार अपनी बातचीत में इसका जिक्र करते हैं। इन बातों को याद रखते हुए वे आगे बढ़ते रहे हैं।
अच्‍छा है कि एक मेहनती और अच्‍छे अभिनेता की प्रतिभा को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार ने रेखांकित किया है। अभी वे जैसी फिल्‍में कर रहे हैं,जैसे किरदार चुन रहे हैं,जैसे नए विषयों पर ध्‍यान दे रहे हैं,वैसे समय में उनको यह पुरस्‍कार मिलना बहुत मानी रखता है।
अक्षय कुमार बहुत ही सरल अभिनेता हैं। वे मेथड नहीं अपनाते। वे नैचुरल और नैसर्गिक अभिनेता हैं। जॉली एलएलबी 2 के अनुभव से कह सकता हूं कि वे किरदार और फिल्‍म पर लंबे विचार-विमर्श में नहीं फंसते। अपने किरदार को देखने-समझने की उनकी आम लोगो की शैली है। मुझे ऐसा लगता है कि उसकी कॉमन मैन अप्रोच से वे फिल्‍म करने ना करने का फैसला लेते हैं।
अक्षय कुमार सौ फीसदी निर्देशक के अभिनेता हैं। वे सेट पर अधिक सवाल नहीं पूछते। वे अपने अनुभव या अभिव्‍यंजना को किरदार में जबरन नहीं डालते। डायरेक्‍टर की बात सुनते हैं। उसके निर्देशों का पालन करते हैं। मेरी फिल्‍म में उनके साथ कई प्रशिक्षित अभिनेता थे। वे उनकी बहुत इज्‍जत करते हैं। वे अक्‍सर कहते हैं कि प्रशिक्षित अभिनेताओं के सामने उनकी कोई काबिलियत नहीं है। फिर भी मैं कहूंगा कि कई बार वे चौंकाते हैं।
मेरी फिल्‍म में हीना सिद्दीकी के साथ के उनके सीन बहुत पावरफुल हैं। उन सीन में अक्षय कुमार ने पूर्ण समर्पण किया। उन्‍होंने सामने के कनाकार को पूरा मौका दिया। वे उन सीन में कुछ भी नहीं कर रहे हें। जाहिर सी बात है कि सीन में कैरेक्‍टर के महत्‍व को समझते हुए वे हीरोगिरी करने से बचते हैं। ऐसा ही एक सीन सौरभ शुक्‍ला और अन्‍नू कपूर के धरने पर बैठने का है। वहां जॉली चुपचाप रहता है। अक्षय कुमार का यह फेवरिट सीन है।
मुझे नहीं लगता कि किसी योजना के तहत अक्षय कुमार इस मुकाम पर आए हैं। सब कुछ होता गया और उस प्रवाह में दम साधे अक्षय कुमार बढ़ते रहे। लोकरुचि बदल रही है,वक्‍त बदल रहा है,इसका उन्‍हें भरपूर एहसास है। अपनी बातों में वे बताते हैं कि दर्शक कैसे बदल रहे हैं? वे कलाकारों और निर्देशकों से अपनी सोच में बदलाव लाने पर जोर देते हैं। खुद को उसी के अनुरूप वे बदलते गए। बदलते वक्‍त की समझ रखते हैं अक्षय कुमार। यह उनके काम की वैरायटी में साफ नजर आता है। वे निजी बातचीत में बगैर जुमलों के अपने विचार रखते हैं।
यह उनकी विनम्रता है कि वे स्‍वयं को फिल्‍म इंडस्‍ट्री का सबसे टैलेटेड या खूबसूरत एक्‍टर नहीं मानते। वे अपनी कड़ी मेहनत और अनुशासन का जरूर उल्‍लेख करते हैं। काम और प्रोफेशन के प्रति समर्पण को वे सर्वोपरि मानते हैं1 हां,एक बात जरूर कहूंगा कि उन्‍हें कैरा और लेंस की बहुत अच्‍छी समझ है। वे अपने परफारमेंस की बारीकी और निर्देशक की जरूरत समझते हैं।
अमिताभ बच्‍चन और विनोद खन्‍ना उनके आदर्श और प्रिय अभिनेता हैं।
( राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित सुभाष कपूर जॉली एलएलबी 2 के निर्देशक हैं। फिलहाल वे अक्षय कुमार के साथ मुगल की तैयारी कर रहे हैं।)

विद्या से मिलता है बेगम का मिजाज - विद्या बालन

बेगम जान के निर्देशक श्रीजित मुखर्जी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

2010 से फिल्‍म मेकिंग में सक्रिय श्रीजित मुखर्जी ने अभी तक आठ फिल्‍में बांग्‍ला में निर्देशित की हैं। हिंदी में बेगम जान उनकी पहली फिल्‍म है। जेएनयू से अर्थशास्‍त्र की पढ़ाई कर चुके श्रीजित कहानी कहने की आदत में पहले थिएटर से जुड़े। हबीब तनवीर की भी संगत की और बाद में फिल्‍मों में आ गए। बांग्‍ला में बनी उनकी फिल्‍मों को अनेक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुके हैं। महेश भट्ट से हुई एक चांस मुलाकात ने हिंदी फिल्‍मों का दरवाजा खोल दिया। वे अपनी आखिरी बांग्‍ला फिल्‍म राजकाहिनी को हिंदी में बेगम जान नाम से ला रहे हैं। फिल्‍म की मुख्‍य भूमिका में विद्या बालन है। मूल फिल्‍म भारत-बांग्‍लादेश(पूर्वी पाकिस्‍तान) बोर्डर की थी। अग यह भारत-पाकिस्‍तान बोर्डर पर चली आई है।
पढ़ाई के बाद नौकरी तो मिडिल क्‍लास के हर लड़के की पहली मंजिल होती है। श्रीजित को बंगलोर में नौकरी मिल गई,लेकिन कहानी कहने की आदत और थिएटर की चाहत से वे महेश दत्‍तनी और अरूंधती नाग के संपर्क में आए। फिर फिल्‍मों में हाथ आजमाने के लिए मन कुलबुलाने लगा। श्रीजित ने सुरक्षा की परवाह नहीं की। उन्‍होंने तत्‍काल नौकरी छोड़ दी। तब तक निजी जिंदगी में शादी और तलाक से वे गुजर चुके थे। घर में अकेली मां थीं। अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी जैसा बोझ नहीं था। पहली फिल्‍म ऑटोग्राफ सफल रही। सफलता के साथ पुरस्‍कार भी मिले और  आगे की राह सुगम हो गई।
बेगम जान की पूष्‍ठभूमि पार्टीशन की है। मूल बांग्‍ला फिल्‍म को हिंदी में लाने के समय लोकेशन बदलना अनिवार्य लगा। पार्टीशन की देशव्‍यापी इमेजेज पंजाब से जुड़ी हैं। निर्देशक और निर्माता ने पूरी कहानी पाकिस्‍तान के बोर्डर पर शिफ्ट कर दी। बेगम जान के कोठे को देश के मेटाफर के रूप में देखें,जहां देश के सभी हिस्‍सों से आई लड़कियां काम करती हैं। उन्‍हें ऐसे संवाद दिए गए जसमें हिंदी के साथ उनके इलाके का टच हो। जया चटर्जी और उर्वशी बुटालिया की पार्टीशन से संबंधित किताब से फिल्‍म का आयडिया आया। रेडक्लिफ ने देश की आजादी के समय ब्रिटिश राज के आदेश से भारत के नक्‍शे पर एक लकीर खींच दी थी। उसमें कितने घर-परिवार और गांव बंट गए। उन्‍हें चार हफ्ते में अपना काम करना था। वहीं से मुझे लगा कि इस पर फिल्‍म बन सकती है। उसके बाद मंटो के अफसानों ने मेरे इरादे को पक्‍का कर दिया।
श्रीजित मानते हैं कि विद्या बालन ट्रेंड सेटर हैं। मेरी बेगम उनके मिजाज के करीब है,जिसके अंदर दबा हुआ गुससा है और जो अपने स्‍पेय में किसी को आने नहीं देती। मैं मानता हूं कि हिंदी फिल्‍मों में माधुरी दीक्षित के बाद विद्या ही दमदार अभिनेत्री हैं। मुझे तो यह भी लगता है कि अगर स्क्रिप्‍ट आपकी फिल्‍म का हीरो है तो उसकी हीरोइन विद्या ही हो सकती है। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों से इसे साबित किया है।
बेगम जान से यह फर्क आया है कि श्रीजित ने मुबई में ठिकाना बना लिया है। वे अब हिंदी फिल्‍में करना चाहते हैं। साथ ही मन है कि साल में एक बांग्‍ला फिल्‍म भी बनाते रहें। बांग्‍ला फिल्‍मों के लिए कोलकाता आन-जाना लगा रहेगा। मुंबई प्रोफेशनल शहर है। काम का माहौल रहता है। यहां बड़े बजट की फिल्‍में आसानी से बनाई जा सकती हैं। उनकी अगली फिल्‍म बांग्‍ला में ही है,जिसकी शूटिंग स्विटजरलैंड में होगी।
श्रीजित स्‍वीकार करते हैं कि अभी के बांग्‍ला फिल्‍ममेकर अर्बन हो चुके हैं। उनकी कहानियों में बंगाल की खुश्‍बू नहीं रहती। यही दशा दूसरे प्रदेशों से आए फिल्‍मकारों की भी है। एक सीमा के बाद हम सभी की प्रस्‍तुति समान हो गई है। अच्‍छा होगा कि फिल्‍ममेकर अपने इलाके को लेकर चलें और पूरे भारत के लिए कहानी कहें। अब तो विदेशी भी हमारे दर्शक हैं। हमें फिल्‍म की भाषा पर बहुत काम करना है।

Saturday, April 8, 2017

दरअसल : बंद हो रहे सिंगल स्‍क्रीन,घट रहे दर्शक



दरअसल...
बंद हो रहे सिंगल स्‍क्रीन,घट रहे दर्शक
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले साल की सुपरहिट फिल्‍म दंगल के प्रदर्शन के समय भी किसी सिनेमाघर पर हाउसफुल के बोर्ड नहीं लगे। पहले हर सिनेमाघर में हाउसफुल लिखी छोट-बड़ी तख्तियां होती थीं,जो टिकट खिड़की और मेन गेट पर लगा दी जाती थीं। फिल्‍म निर्माताओं के लिए वह खुशी का दिन होता था। अब तो आप टहलते हुए थिएटर जाएं और अपनी पसंद की फिल्‍म के टिकट खरीद लें। लोकप्रिय और चर्चित फिल्‍मों के लिए भी एडवांस की जरूरत नहीं रह गई है। लंबे समय के बाद हाल में दिल्‍ली के रीगल सिनेमाघर में हाउसफुल का बोर्ड लगा। रीगल के आखिरी शो में राज कपूर की संगम लगी थी। दिलली के दर्शक रीगल के नास्‍टेलजिया में टूट पड़े थे। आज के स्‍तंभ का कारण रीगल ही है। दिल्‍ली के कनाट प्‍लेस में स्थित इस सिंगल स्‍क्रीन के बंद होने की खबर अखबारों और चैनलों के लिए सुर्खियां थीं।
गौर करें तो पूरे देश में सिंगल स्‍क्रीन बंद हो रहे हैं। जिस तेजी से सिंगल स्‍क्रीन सिनेमाघरों के दरवाजे बंद हो रहे हैं,उसी तेजी से मल्‍टीप्‍लेक्‍स के गेट नहीं खुल रहे हैं। देश में मल्‍टीप्‍लेक्‍स संस्‍कृति आ चुकी है। फिल्‍मों के प्रदर्शन,वितरण और बिजनेस को मल्‍टीप्‍लेक्‍स प्रभावित कर रहा है। किसी भी फिल्‍म की रिलीज के पहले ही तय किया जा रहा है कि यह फिल्‍म किस समूह के लिए है। दर्शकों का यह विभाजन फिल्‍म के आस्‍वादन से अधिक टिकट मूल्‍य पर आधारित होता है। वितरक निर्माताओं को बताने लगे हैं और अनुभवी निर्माता वितरकों को समझाने लगे हैं कि उनकी फिल्‍म किन दर्शकों के बीच पहुंचे। दर्शकों की अस्‍पष्‍ट समझ से फिल्‍मों का बिजनेस मार खाता है। अभी निर्माताओं का जोर और फोकस मल्‍टीप्‍लेक्‍स पर रहता है,क्‍योंकि वहां कलेक्‍शन की पारदर्शिता है।
देश में सिनेमाघरों की संख्‍या कम है। सिंगल स्‍क्रीन के बंद होने से यह संख्‍या तेजी से घट रही है। फिल्‍म फेउरेशन ऑफ इंडिया के आकलन के मुताबिक 2011 में 10,000 से कुछ अधिक सिनेमाघर था। उन्‍होंने ताजा आंकड़े नहीं बटोरे हैं। अनधिकृत आंकड़ों के मुताबिक 2016 में देश में सिंगल स्‍क्रीन की संख्‍या 13,900 और मल्‍टीप्‍लेक्‍स स्‍क्रीन की संख्‍या 2050 रही। कहा जाता है कि 10 लाख दर्शकों के बीच 9 सिनेमाघर हैं। यह अलग बात है कि इन दिनों वे भी खाली रहते हैं। पिछले साल ही भारत में 1902 फिल्‍में रिलीज हुईं। अब आप अंदाजा लगा लें कि इनमें से कितनी फिल्‍मों को सिनेमाघर नसीब हुए होंगे। सिनेमाघर बंद हो रहे हैं,दर्शक घट रहे हैं और फिल्‍मों का निर्माण बढ़ रहा है। कोई समझ नहीं पा रहा है कि हम किस दिश में बढ़ या पिछड़ रहे हैं?
स्‍पष्‍ट नीति और सुविधाओं के अभाव में स्थिति विकराल होती जा रही है। सभी प्रेशों,केंद्र सरकार और भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री को बैठ कर नीतिया असैर योजनएं तय करनी होंगी। देश में सिनेमाघरों की संख्‍या बढ़ाने के साथ उनके टिकट मूल्‍यों पर भी विचार करना होगा ताकि सभी आय समूह के दर्शक सिनेमाघरों में जाकर फिल्‍में देख सकें। भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री को हालीवुड ने डेंट मारना शुरू कर दिया है। अगर अभी से बचाव और सुधार नहीं किया गया तो दुनिया के अन्‍य देशों का हाल भारत का भी होगा। हालीवुड की डब फिल्‍में भारतीय भाषाओं में दिखाई जाएंगी और भारतीय भाषाओं की मूल फिल्‍मों को सरकारी संरक्षण के आईसीयू में जीवन दिया जाएगा।
पड़ोसी देश चीन में सिनेमा नीति बनने के बाद से निमाघरों की संख्‍या तिगुनी हो गई है। दर्शक बढ़ हैं और बाक्‍स आफिस कलेक्‍शन में भारी इजाफा हुआ है। बाकी क्षेत्रों में हम उनके जैसे होने का सपना देख रहे हैं तो सिनेमा और मनोरंजन में क्‍यों नहीं?

दरअसल : कंगना के आरोप से फैली तिलमिलाहट



दरअसल...
कंगना के आरोप से फैली तिलमिलाहट
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल कंगना रनोट का जन्‍मदिन था। रिकार्ड के मुताबिक वह 30 साल की हो गई। उनकी स्‍क्रीन एज 13 साल की है। 2004 में आई अनुराग बसु की गैंगस्‍टर से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों में धमाकेदार एंट्री की। 13 सालों में 31 फिल्‍में कर चुकी कंगना को तीन बार अभिनय के लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुके हें। अपने एटीट्यूड और सोच की वजह से वह पॉपुर फिल्‍म अवार्ड की चहेती नहीं रहीं। वह परवाह नहीं करतीं। उन अवार्ड समारोहों में वह हिस्‍सा नहीं लेतीं। मानती हैं कि ऐसे सामारोहों और इवेंट में जाना समय और पैसे की फिजूलखर्ची है। अपनी बातों और बयानों से सुर्खियों में रही कंगना रनोट ने हिंदी फिल्‍मों में खास मुकाम हासिल किया है। कह सकते हैं कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में बाहर से आकर अपनी ठोस जगह और पहचान बना चुकी अभिनेत्रियों में वह सबसे आगे हैं। उनकी आगामी फिल्‍म हंसल मेहता निर्देशित सिमरन है। पाठकों को याद होगा कि पहली फिल्‍म गैंगस्‍टर में उनका नाम सिमरन ही था। सिमरन से सिमरन तक के इस सफर से एक चक्र पूरा होता है। एक दिन देर से ही सही,उन्‍हें जन्‍मदिन की बधाई।
कंगना रानोट को याद करने की खास वजह है। पिछले दिनों कॉफी दि करण शो में उन्‍होंने मेजबान करण जौहर पर प्रत्‍यक्ष आरोप लगाया था कि वह नेपोटिज्‍म(भाई-भतीजावाद) के झंडबरदार हैं। करण ने शो में कंगना के आरोप ज्‍यों के त्‍यों जाने देकर वाहवाही और टीआरपी बटोरी थी,लेकिन उनकी यह उदारता कुछ दिनों में ही फुस्‍स हो गई। उन्‍होंने एक बातचीत में कंगना के आरोप का जवाब देते हुए सलाह दिया कि अगर कंगना को इतनी ही दिक्‍कत है तो वह इंडस्‍ट्री छोड़ दें। उन्‍होंने यह भी कहा कि वह विक्टिम और वीमैन कार्उ खेलती हैं। कंगना चुप नहीं रहीं। कोई उन्‍हें टपकी मार कर निकले और वह खामोश रहें...हो ही नहीं सकता। कंगना ने फिर से जवाब दिया। उसके बाद से फिल्‍म इंडस्‍ट्री से आए इनसाइडर स्टार और कुछ बाहर से आए आउटसाइडर ने भी कहना-बताना शुरू कर दिया है कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कोई नेपोटिज्‍म नहीं है। उनके पास अपने विकलांग तर्क हैं,जिनसे हिंदी फिल्‍मों में मौका और जगह पाने की कोशिश में जूझता कोई भी महात्‍वाकांक्षी सहमत नहीं हो सकता।
वे अमिताभ बच्‍चन, शाह रूख खान और सुशांत सिंह राजपूत जैसे अपवादों के उदाहरण भी देते हैं। सच्‍चाई यह है कि हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में प्रवेश करना और प्रतिभा के अनुरूप ऊंचाई हासिल करना किसी परीकथा की तरह है। रोजाना सैकड़ों प्रतिभाएं मौके की उम्‍मीद में दम तोड़ रही हैं। निराशा और हताशा की यह सुरंग इतनी गहरी और अंधेरी है कि कामयाबी की रोशनी की आस में उम्र बीत जाती है। कंगना के प्रत्‍यक्ष आरोप से फिल्‍म इंडस्‍ट्री की तिलमिलाहट इस तथ्‍य से भी समझी जा सकती है कि करण जौहर से लेकर आलिया भट्ट तक सफाई और दुहाई दे रहे हैं। कुमार गौरव और अभिषेंक बच्‍चन के साक्ष्‍य से वे दंभ भरते हैं कि आख्रिकार प्रतिभा चलती है। प्रतिभा के प्रभाव से कौन इंकार करता है। सवाल है कि क्‍या बाहरी प्रतिभाओं को समान अवसर मिल पाते हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री ने तो अजय देवगन और रोहित शेट्टी को भी समान अवसर नहीं दिए।
भारतीय समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री भी भाई-भतीजावाद से ग्रस्‍त है। कंगना रनोट ने दुखती रग और वह भी सीधे करण जौहर पर उंगली रख दी तो सभी तिलमिला गए हैं।
कहानी की खोज
मसान और आंखिन देखी जैसी फिल्‍मों के निर्माता मनीष मुंद्रा चाहते हैं कि देश के कोने-अंतरों से उन्‍हें कहानियं मिलें। उन्‍होंने 20 मार्च से 20 अप्रैल के बीच लेखकों से हिंदी या अंग्रेजी में लिखी कहानियां मांगी हैं। इस साल पांच कहानियां चुनी जाएंगी। लेखकों को कहानी के अधिकार और क्रेडिट के लिए 5 लाख रुपए मिलेंगे। मनीष मुंद्रा अभी तक सनडांस फिल्‍म फस्टिवल के साथ मिल कर स्क्रिप्‍ट लैब चलाते रहे हैं। प्रविष्टि की विस्‍तृत जानकारी दृश्‍यम फिल्‍म्‍स के वेबसाइट पर उपलब्‍ध है। हिंदीभाषी इलाकों के लेखकों के लिए यह अच्‍दा मौका है।
abrahmatmaj@mbi.jagran.com        

Friday, April 7, 2017

मेरी हर प्‍लानिंग रही सफल : पिया बाजपेयी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिया बाजपेयी ने करिअर की शुरूआत बतौर डबिंग आर्टिस्‍ट की। मकसद था कि जेब खर्च निकलता रहे। उन्‍हीं दिनों में किसी की सलाह पर अपनी तस्‍वीरें सर्कुलेट कीं तो प्रिंट ऐड मिलने लगे। यह तकरीबन आठ साल पहले की बात है। सिलसिला बढ़ा तो कमर्शियल ऐड मिले और आखिरकार दक्षिण भारत की एक फिल्‍म का ऑफर मिला। यह खोसला का घोंसला की रीमेक फिल्‍म थी।  दक्षिण में पहली फिल्‍म रिलीज होने के पहले ही एक और बड़ी फिल्‍म मशहूर स्‍टार अजीत के साथ मिल गई। यह मैं हूं ना की रीमेक थी। फिर तो मांग बढ़ी और फिल्‍में भी। पिया की दक्षिण की चर्चित और हिट फिल्‍मों में को और गोवा शामिल हैं। दक्षिण की सक्रियता और लोकप्रियता के बीच पिया स्‍पष्‍ट थीं कि उन्‍हें एक न एक दिन हिंदी फिल्‍म करनी है। बता दें कि पिया बाजपेयी उत्‍तर प्रदेश के इटावा शहर की हैं। सभी की तरह उनकी भी ख्‍वाहिश रही कि उनकी फिल्‍में उनके शहर और घर-परिवार के लोग देख सकें। पिया पूरे आत्‍मविश्‍वास से कहती हैं, सब कुद मेरी योजना के मुताबिक हुआ और हो रहा है। कुछ लोगों की प्‍लानिंग पूरी नहीं होती। मैंने जो सोचा,वही होता गया।
किशोर उम्र में ही कुछ लड़के-लड़कियों को अपना शहर अपने सपनों के लिए छोटा लगने लगता है। वे उड़ान भरना चाहते हैं। शहर की सीमा के बाहर के आकश और जमीन को छूना चाहते हैं। पिया बाजपेयी भी ऐसी ही थी। 12वीं करते-करते पिया बाजपेयी को एहसास हो गया था वह केके कॉलेज के यूनिफार्म से निकलना चाहती है। दुपट्टा संभालना मुश्किल काम था। पिया ने पापा से कहा कि मुझे कंप्‍यूटर साइंस की पढ़ाई करनी है। उसके लिए बाहर भेज दो। पिया बताती हैं, मेरे पूरे परिवार में कभी कोई लड़की पढ़ने के लिए बाहर नहीं गई थी। अंधेरे में चलाया मेरा तीर सही लगा और पापा ने मुझे पढ़ने के लिए ग्‍वालियर भेज दिया। बाहर की हवा लगी और मेरे पंख फड़फड़ाने लगे। मैंने तय कर लिया कि पिया अब लौट कर इटावा नहीं जाएगी। मैंने पापा से छह महीने का समय मांगा। हां,तब तक हीरोइन बनने का खयाल नहीं आया था। मैंने यही सोच रखा था कि दिल्‍ली में कोई नौकरी मिल जाएगी। नौकरी मिल भी गई। पिया ने रिसेप्‍शनिस्‍ट की लौकरी खोज ली। दिल्‍ली की नौकरी के दिनों में पड़ोसी फोटोग्राफर ने फिल्‍मों में ट्राई करने की सलाह दी। तब पिया को याद आया कि आठवीं कक्षा के समय पापा ने एक दिन कहा था कि तू हीरोइन बन जा...बनेगी क्‍या? इस बात को लेकर पापा-मम्‍मी में बहस हुई। फिर भी पापा ने आश्‍वस्‍त किया था कि 12वीं कर लो फिर भेज देंगे,लेकिन 12वीं के बाद वे मुकर गए। पिया मानती हैं, पापा ने सपने की चिंगारी छोड़ दी थी,वह मन के कोने में कहीं सुलग रही थी। उसे हवा लगी तो वह लहकने लगी।
अब समस्‍या थी कि दिलली से मुंबई कैसे जाएं? मुंबई में कोई जानपहचान का नहीं था। वहां जाकर क्‍या बताएं। दिल्‍ली में ही इटावा शहर का नाम किसी ने नहीं सुना था। बताना पड़ता था कि फूलन देवी उसी इलाके की हैं। पिया ने किस्‍से गढ़े। घर पर बताया कि बालाजी में चुनाव हो गया। अब वह सीरियल में दिखेगी। पहले पापा ने नहीं माना। बाद में मम्‍मी के आग्रह पर वे राजी हो गए। पिया कहती हैं, अच्‍छा हुआ कि उन्‍होंने अनुमति दे दी। नहीं देते तो भी मैं आ जाती। मैंने तो सोच लिया था। पिया ने मुंबई आने की बात दिलली की दोस्‍तों से छिपा ली। डर था कि मुंबई में कुछ नहीं हुआ तो लौट कर क्‍या मुंह दिखएगी। उन्‍हें बताया कि घर जा रही हूं। कुछ दिनों में लौट आऊंगी। बहरहाल,मुंबई आने के बाद रहने की जगह खोजने की लंबी जद्दोजहद रही। इस दौर में पिया को पीजी में मकान मालिक के कुत्‍ते के साथ रूम शेयर करना पड़ा। फिर एक दफ्तर में पनाह मिली। जहां पूरी रात अंधेरे में गुजारनी पड़ती थी। कोई खटपट न हो,नहीं तो लोग जान जाएंगे। अच्‍छी बात रही कि स्‍ट्रगल के उन दिनों में किसी गलत आदमी से पिया का साबका नहीं पड़ा। अच्‍छे और मददगार लोग ही मिले।
पहली फिल्‍म का मौका प्रियदर्शन के साथ किए ऐड की शूटिंग से मिला। एक दिन प्रियन सर ने बुलाया और पूछा कि खोसला का घोंसला की रीमेक में काम करोगी? उनके सहाय‍क उस फिल्‍म का निर्देशन करने जा रहे थे। वहीं से दक्षिण की फिल्‍मों की शुरूआत हुई पिया ने सात सालों में दक्षिण की चौदह फिल्‍मों में काम किया। उनमें से कुछ सुपरहिट रहीं। पिया बाजपेयी की मुलाकात कास्टिंग डायरेक्‍टर कुणाल शाह से हुई। कुणाल ने उन्‍हें लाल रंग के डायरेक्‍टर सैयद अहमद अफजाल से मिलवाया और इस तरह हिंदी फिल्‍मों में पिया का आना हुआ। लाल रंग के बाद पिया ने तय कर लिया था कि आगे हिंदी फिल्‍मों में ही ज्‍यादा काम करना है। अगली फिल्‍म रिलीज होने में दो साल लग गए। पिया बताती हैं, पिछली फिल्‍म लाल रंग की शूटिंग खत्‍म होने के पहले ही मुझे मिर्जा जूलिएट मिल गई थी। मुझे ज्‍यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। इस बीच तमिल की एक और फिल्‍म पूरी कर ली है। अब मुझे अगली फिल्‍म का इंतजार है।

फिल्‍म समीक्षा : मुक्ति भवन



फिल्‍म रिव्‍यू
रिश्‍तों के भावार्थ
मुक्ति भवन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
निर्देशक शुभाशीष भूटियानी की मुक्ति भवन रिश्‍तों के साथ जिदगी की भी गांठे खोलती है और उनके नए पहलुओं से परिचित कराती है। शुभाशीष भूटियानी ने पिता दया(ललित बहल) और पुत्र राजीव(आदिल हुसैन) के रिश्‍ते को मृत्‍यु के संदर्भ में बदलते दिखाया है। उनके बीच राजीव की बेटी सुनीता(पालोमी घोष) की खास उत्‍प्रेरक भूमिका है। 99 मिनट की यह फिल्‍म अपनी छोटी यात्रा में ही हमारी संवेदना झकझोरती और मर्म स्‍पर्श करती है। किरदारों के साथ हम भी बदलते हैं। कुछ दृश्‍यों में चौंकते हैं।
दया को लगता है कि उनके अंतिम दिन करीब हैं। परिवार में अकेले पड़ गए दया की इच्‍दा है कि वे काशी प्रवास करें और वहीं आखिरी सांस लें। उनके इस फैसले से परिवार में किसी की सहमति नहीं है। परिवार की दिनचर्या में उलटफेर हो जाने की संभावना है। अपनी नौकरी में हमेशा काम पूरा करने के भार से दबे राजीव को छुट्टी लेनी पड़ती है। पिता की इच्‍छा के मुताबिक वह उनके साथ काशी जाता है। काशी के मुक्ति भवन में उन्‍हें 15 दिनों का ठिकाना मिलता है। राजीव धीरे-धीरे वहां की दिनचर्या और पिता के सेवा में तत्‍पर होता है। ऑफिस से निरंतर फोन आते रहते हैं। दायित्‍व और कर्तव्‍य के बीच संतुलन बिठाने में राजीव झुंझलाया रहता है। बीच में एक बार पिता की तबियत बिगड़ती है तो राजीव थोड़ा आश्‍वस्‍त होता है कि पिता को मुक्ति मिलेगी और वह लौट पाएगा। उनकी तबियत सुधर जाती है। एक वक्‍त आता है कि वे राजीव को भेज देते हैं और वहां अकेले रहने का फैसला करते हैं।
पिता-पुत्र के संबंधों में आई दूरियों को पोती पाटती है। अपने दादा जी से उसके संबंध मधुर और परस्‍पर समझदारी के हैं। दादा की प्रेरणा से पोती ने कुछ और फैसले ले निए हैं,जो एकबारगी राजीव को नागवार गुजरते हैं। बाद में समय बीतने के साथ राजीव उन फैसलों को स्‍वीकार करने के साथ बेटी और पिता को नए सिरे से समझ पाता है। यह फिल्‍म परिवार के नाजुक क्षणों में संबंधों को नए रूप में परिभाषित करती है। परिवार के सदस्‍य एक-दूसरे के करीब आते हैं। रिश्‍तों के भावार्थ बदल जाते हैं।
ललित बहल और आदिल हुसैन ने पिता-पुत्र के किरदार में बगैर नाटकीय हुए संवदनाओं को जाहिर किया है। दोनों उम्‍दा कलाकार हैं। राजीव की बेबसी और लाचारगी को आदिल हुसैन ने खूबसूरती से व्‍यक्‍त किया है। छोटी भूमिकाओं में पालोमी घोष और अन्‍य कलाकार भी भी योगदान करते हैं। फिल्‍म में बनारस भी किरदार है। मुक्ति भवन के सदस्‍यों के रूप में आए कलाकार बनारस के मिजाज को पकड़ते हैं।
अवधि- 99 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार  

Thursday, April 6, 2017

फिल्‍म समीक्षा : मिर्जा़ जूलिएट



फिल्‍म रिव्‍यू
दबंग जूली की प्रेमकहानी
मिर्जा जूलिएट
-अजय ब्रह्मात्‍मज

जूली शुक्‍ला उर्फ जूलिएट की इस प्रेमकहानी का हीरो रोमियो नहीं,मिर्जा है। रोमियो-जूलिएट की तरह मिर्जा-साहिबा की प्रेम कहानी भी मशहूर रही है। हाल ही में आई मिर्जिया में उस प्रेमकहानी की झलक मिली थी। मिर्जा जूलिएट में  की जूलिएट में थोड़ी सी सा‍हिबा भी है। राजेश राम सिंह निर्देशित मिर्जा जूलिएट एक साथ कई कहानियां कहने की कोशिश करती है।
जूली शुक्‍ला उत्‍तर प्रदेश के मिर्जापुर में रहती है। दबंग भाइयों धर्मराज,नकुल और सहदेव की इकलौती बहन जूली मस्‍त और बिंदास मिजाज की लड़की है। भाइयों की दबंगई उसमें भी है। वह बेफिक्र झूमती रहती है और खुलआम पंगे लेती है। लड़की होने का उसे भरपूर एहसास है। खुद के प्रति भाइयों के प्रेम को भी वह समझती है। उसकी शादी इलाहाबाद के दबंग नेता पांडे के परिवार में तय हो गई है। उसके होन वाले पति राजन पांडे कामुक स्‍वभाव के हैं। वे ही उसे जूलिएट पुकारते हैं। फोन पर किस और सेक्‍स की बातें करते हैं,जिन पर जूलिएट ज्‍यादा गौर नहीं करती। अपने बिंदास जीवन में लव,सेक्‍स और रोमांस से वह अपरिचित सी है। मिर्जा के लौटने के बाद उसकी जिंदगी और शरीर में हलचल शुरू होती है।
मिर्जा का ममहर मिर्जापुर में है। बचपन की घटनाओं की वजह से उसे मामा के परिवार का सहारा लेना पड़ता है। गुस्‍से में अबोध मिर्जा से अपराध हो जाता है। उसे बाल सुधार गृह भेज दिया जाता है। वहां के संरक्षक उसके जीवन की दिशा तय कर देते हैं। बड़े होन पर वह सामान्‍य जिंदगी जीने की गरज से अपराध की दुनिया छोड़ कर मिर्जापुर लौटता है। वहां उसकी मुलाकात बचपन के दोसत जूलिएट से होती है और फिर वह उसका रोमियो बन जाता है।
मिर्जा और जूलिएट के रोमांस में दुविधाएं हैं। जूलिएट इस प्रेम संबंध में भी लापरवाह रहती है। उसे तो बाद में एहसास होता है कि वह मिर्जा से ही मोहब्‍बत करती है। इस मोहब्‍बत में अड़चन हैं राजन पांडे और उसके तीनों भाई। कहानी इस पेंच तक आने के बाद उलझ जाती है। लेखक और निर्देशक कभी रोमांस तो कभी राजनीति की गलियों में मिर्जा और जूलिएट के साथ भटकने लगते हैं। बाकी किरदारों को स्‍पेस देने के चक्‍क्‍र में फिल्‍म का प्रवाह शिथिल और बाधित होता है।
अदाकारी के लिहाज से पिया बाजपेयी ने जूलिएट के किरदार को बखूबी पर्दे पर पेश किया है। नई अभिनेत्रियों मे पिया बाजपेयी में ताजगी है। वह किसी की नकल करती नहीं दिखती। अभिनय के निजी मुहावरे और ग्रामर से वह जूलिएट को साधती हैं। दर्शन कुमार उनका साथ देने में कहीं-कहीं पिछड़ जाते हैं। उनके किरदार के गठन की कमजोरी से उनका अभिनय प्रभावित होता है। उद्दाम प्रेमी के रूप में वे निखर नहीं पाते। राजन पांडे के रूप में चंदन राय सान्‍याल की हाइपर आदाकारी शुरू में आकर्षित करती है,लेकिन बाद में वही दोहराव लगने लगती है। हां,स्‍वानंद किरकिरे ने किरदार की भाषा,लहजा और अंदाज पर मेहनत की है। वे याद रह जाते हैं। प्रियांशु चटर्जी कुछ ही दृश्‍यों में जमते हैं।
मिर्जा जूलिएट में इलाकाई माहौल अच्‍छी तरह से आया है। निर्देशक और उनकी टीम ने परिवेश पर ध्‍यान दिया है। हमें कुछ नए देसी किरदार भी इस फिल्‍म में मिले हैं। उनके रिश्‍तेदारी और उनकी भाषा कहीं-कहीं खटकती है। इस फिल्‍म में भी स्‍त्री की ना है। न जाने क्‍यों लेखक-निर्देशक उस ना पर नहीं टिके हैं।
अवधि-125 मिनट
तीन स्‍टार

Tuesday, April 4, 2017

राजा है बेगम का गुलाम - विद्या बालन




-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍मों के फैसले हवा में भी होते हैं।हमारी अधूरी कहानी के प्रोमोशन से महेश भट्ट और विद्या बालन लखनऊ से मुंबई लौट रहे थे। 30000 फीट से अधिक ऊंचाई पर जहाज में बैठे व्‍यक्ति सहज ही दार्शनिक हो जाते हैं। साथ में महेश भट्ट हों तो बातों का आयाम प्रश्‍नों और गुत्थियों को सुलझाने में बीतता है।  जिज्ञासु प्रवृति के महेश भट्ट ने विद्या बालन से पूछा,क्‍या ऐसी कोई कहानी या रोल है,जो अभी तक तुम ने निभाया नहीं ?’ विद्या ने कहा,मैं ऐसा कोई रोल करना चाहती हूं,जहां मैं अपने गुस्‍से को आवाज दे सकूं।भट्ट साहब चौंके,तुम्‍हें गुस्‍सा भी आता है?’ विद्या ने गंभरता से जवाब दिया, हां आता है। ऐसी ढेर सारी चीजें हैं। खुद के लिए। दूसरों के लिए भी महसूस करती हूं। फिर क्या था, तीन-चार महीने बाद वे यह कहानी लेकर आ गए।
बेगम जान स्‍वीकार करने की वजह थी। अक्सर ऐसा होता है कि शक्तिशाली व सफल होने की सूरत में औरतों में हिचक आ जाती है। वे जमाने के सामने जाहिर करने से बचती हैं कि खासी रसूखदार हैं। इसलिए कि कहीं लोग आहत न हो जाएं। सामने वाला खुद को छोटा न महसूस करने लगे। हम औरतों को सदा यह समझाया गया है कि आदमी एक पायदान ऊपर रहेगा, जबकि औरत उसके नीचे। वैसे तो मेरी परवरिश इस किस्म के माहौल में नहीं हुई है, पर मुझे भी अपने आस-पास ऐसा कुछ महसूस हुआ है। औरत के लिए बॉस होना जरा झिझक से लैस होता है। मर्द वह चीज आसानी से कर लेते हैं। बेगम जान ऐसी नहीं है। वह बड़ी पॉवरफुल है। वह जब चाहे किसी को रिझा सकती है, जब चाहे गला दबोच ले। वह फिक्र और डर से परे है। उसकी यह चीज मुझे अच्छी लगी और मैंने हां कहा।
वैसे तो यह विभाजन काल की कहानी है। बेगम जान की परवरिश लखनऊ की है, पर उसका कोठा पंजाब के शक्‍करगढ और दोरंगा इलाके के बीच है। रेडक्लिफ लाइन के बीच में पड़ता है। बेगम जान को वह छोड़कर जाने को कहा जाता है, पर वह फाइट बैक करती है। यह आज के दौर में भी सेट हो सकती थी। आज भी लोग अपनी जर-जमीन के लिए लड़ते हैं। मिसाल के तौर पर मुंबई की कैंपा कोला सोसायटी के लोग। बहरहाल, यह बहुत स्ट्रॉन्‍ग कैरेक्‍टर है। यह पीरियड फिल्‍म है, पर टिपिकल सी नहीं। कॉस्‍ट्यूम व परिवेश को छोड़ बाकी सब आज सा ही है। हालांकि अब तो कोठों-वोठों का कॉन्‍सेप्ट रहा नहीं।
उस जमाने में कोठे का कॉन्‍सेप्ट था। संभ्रांत घर के लड़के शादी से पहले वहां जाते थे। पत्‍नी के साथ कैसे पेश आना है, वह सिखाया जाता था। पिछली सदी के पांचवें छठे दशक तक तो कई अभिनेत्रियां भी वहीं से ग्‍लैमर जगत में आई थीं। बहरहाल, मुझे यह किरदार करते हुए बड़ा मजा आया। किरदार की तरह डायलॉग्‍स भी बड़े पॉवरफुल हैं। जैसे, हमें किसी का हाथ यहां से हटाए, उससे पहले उसके शरीर का पार्टिशन कर देंगे। महीना गिनना हमें आता है साहब, साला हर बार लाल करके जाता है। गालियां तो तब भी बकते थे। साथ ही वह शिकायती स्‍वभाव की नहीं है। वह अपनी सभी सदस्या से भी यही कहती है कि हम शौक  से इस पेशे में नहीं आए हैं, पर आ गए हैं तो रो-धो कर नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से काम करना है। उसकी पहुंच राजा तक है। सिल्‍क स्मिता में बेबाकपन था, पर बेगम जान में रसूख का एहसास।
मैंने बहुत साल पहले तकरीबन इसी मिजाज की मंडी देखी थी। कॉलेज के दिनों में। शबाना आजमी ने उसमें कमाल का काम किया था। मैंने इरादतन बेगम जान साइन करने के बाद उसे नहीं देखी। वह इसलिए कि मैं उनकी बहुत बड़ी फैन हूं। फिर से मंडी देखती तो शायद उनसे प्रभावित हो जाती। फिर बेगम जान में मेरे अपने रंग शायद नहीं रह पाते। साथ ही यह शबाना जी के रोल से बिल्‍कुल इतर है। यह अपनी शर्तों पर काम करती है। शबाना जी का किरदार हंस-बोल कर काम निकालता था। यहां बेगम जान इलाके के राजा तक को अपनी शर्तों पर नचाती है।
राजा के रोल में नसीरुद्दीन शाह हैं। उनके साथ यह तीसरी फिल्‍म है। राजा के रोल में उनका स्‍त्री चरित्र भी सामने उभर कर आया है। एक सीन है फिल्‍म में, जहां वे नजरें नीचीं कर बातें करते हैं। वह कमाल का बन पड़ा है। उनके साथ-साथ फिल्‍म में इला अरुण हैं। सेट पर वे हंसती-नाचती नजर आती थीं, पर कैमरा ऑन होते ही वे झट अपने किरदार में आ जाती थीं। उन्होंने अपने थिएटर का पूरा अनुभव इस्तेमाल किया है। गौहर खान का काम मुझे इश्‍कजादे में अच्छा लगा था। वह देख मैंने श्रीजित को उनके नाम की सिफारिश की थी। संयोग से उस रोल के लिए श्रीजित की भी पसंद गौहर ही थीं। तो हमने उन्हें टेक्‍सट किया। वे उस वक्‍त मक्का गई हुई थीं। जवाब दिया कि वहां से आते ही वे श्रीजित से मिलेंगी। इस तरह वे बोर्ड पर आईं।
पल्‍लवी शारदा, मिष्‍टी व फ्लोरा सैनी भी साथ में हैं। श्रीजित ने उन सबकी एक महीने के लिए अलग वर्कशॉप रखी। मेरे साथ नहीं। वे उन सब की मुझ से एक दूरी बनाकर रखना चाहते थे ताकि बेगम जान की अथॉरिटी को वे महसूस कर सकें। इसकी शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई। बड़ी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में। हमारे जाने से पहले वहां सेट टूट गया था। हम कोलकाता में शांतिनिकेतन में रूके थे। वहां से सेट पर जाने में सवा से डेढ घंटे लगते थे। शूटिंग मई की चिलचिलाती धूप में हुई थी तो हर रोज किसी न किसी को डिहाईड्रेशन होती ही थी। पांव चोटिल होता ही था।