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Friday, March 3, 2017

फिल्‍म समीक्षा : कमांडो 2



फिल्‍म रिव्‍यू 
हर मुठभेड़ में एक्‍शन
कमांडो 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले साल नोटबंदी लागू होने के बाद कहा जा रहा था कि काले धन को निकालने में वह मददगार होगी। काले धन पर बहस जारी है। अभी तक सही अनुमान नहीं है कि काला धन निकला भी कि नहीं और सभी के बैंक खातों में पंद्रह लाख रुपए आने की बात, बात ही रह गई। कहते हैं न,जो बातें रियल जिंदगी में संभव नहीं हो पातीं। वे फिल्‍मों में हो जाती हैं। विपुल अमृतलाल शा‍ह के निर्माण और देवेन भोजानी के निर्देशन में बनी कमाडो 2 में नोटबंदी सफल,काला धन वापस और किसानों के खातों में पैसे आ जाते हैं। फिल्‍म के टायटल में ही द ब्‍लैक मनी ट्रेल जोड़ दिया गया है। फिल्‍म का उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट था। यों निर्माता-‍निर्देशक का दावा था कि उन्‍होंने फिल्‍म की कहानी पहले सोच ली थी। नोटबंदी तो बाद में लागू हुई। बहरहरल, इस बार कमांडो देश से बाहर गए काले धन को वापस लाने की मुहिम में शामिल है। वे सफल भी होते हैं।
कमांडो विद्युत जामवाल हैं। उनमें गजब की स्‍फूर्ति है। वे एक्‍शन दृश्‍यों में सक्षम और गतिशील हैं। फिल्‍म की शुरूआत में ही पांच मिनट लंबे एक्‍शन दृश्‍य के साथ उनकी एंट्री होती हैं। हर मोड़ पर मुठभेड़ है और हर मुठभेड़ में विद्युत जामवाल का एक्‍शन है। हिंदी फिल्‍मों में हथियारों से लैस किरदार भी मुठभेड़ में हाथापाई करते नजर आते हैं। तय रहता है कि हीरो अपने विरोधियों को एक-एक कर मारेगा। कमांडो 2 क्षत-विक्षत हुए व्‍यक्तियों की गिनती करें तो यह अत्‍यंत हिंसक फिल्‍म कही जाएगी। एक्‍शन हीरो हॉट होता है। लड़कियां उस पर फिदा होती हैं। न सिर्फ हीरोइन,बल्कि वैम्‍प और निगेटिव किरदार का भी उस पर दिल फिसलता है। गनीमत है कि देवेन भोजानी ने गानों के ड्रीम सिक्‍वेंस नहीं रखे। उन्‍होंने रोमांटिक गानों से भी राहत दी।
लुक और गेटअप में इन दिनों युवा कलाकार एक जैसे ही दिखने लगे हैं। कमांडो2 में विद्युत जामवाल के साथ फ्रेडी दारूवाला अज्ञैर ठाकुर अनूप सिंह भिन्‍न किरदारों में हैं। महिला किरदारों में मारिया(ईशा गुप्‍ता) और भावना रेड्डी(अदा शर्मा) हैं। भावना रेड्डी को हैदराबादी किरदार बनाने के साथ उन्‍हें ऐसा लहजा दिया गया है कि दर्शकों को हंसी आए। हंसी आती भी है,लेकिन कुछ दृश्‍यों के बाद अदा की अदाओं में दोहराव आ जाता है। ईशा गुप्‍ता को दबंग किरदार मिला है,लेकिन वह इतनी समर्थ नहीं हैं कि मारिया को ढंग से निभा पाएं। अभिनय और परफारमेंस के लिहाज से इस फिल्‍म में सभी निराश करते हैं। किरदारों को गढ़ने की कोशिश ही नहीं की गई है। ज्‍यादातर को एक्‍शन दृश्‍यों में होना है। सपोर्टिंग भूमिका में आदिल हुसैन और शेफाली शाह आदतन बेहतर परफारमेंस करते हैं। फिल्‍म के अंत में भेद खुलने पर उनकी मुहिम जाहिर होती है।
फिल्‍म मुख्‍य रूप से थाईलैंड और मलेशिया में शूट की गई है। एरियल शॉट देखने पर लगता है कि हमारे महानगरों की ऊंची बिल्डिंगों की छतें इतनी सुदर क्‍यों नहीं होती?  दोनों देशों के शहर साफ-सफ्फाक हैं। वहां के सिक्‍युरिटी गार्ड और गुंडों से लड़ते और जीतते भारतीय किरदार अलग सा सुकून देते हैं। इस फिल्‍म का एक्‍शन प्रभावशाली है। विद्युत जामवाल उन एक्‍शन दृश्‍यों में विश्‍वसनीय लगते हैं। एक्‍शन के साथ में थोड़ी सी कहानी भी होती तो और मजा आता।
अवधि- 123 मिनट
दो स्‍टार

फिल्‍म समीक्षा - जीना इसी का नाम है

फिल्‍म रिव्‍यू
विंटेज कार और किरदार
जीना इसी का नाम है
- अजय ब्रह्मात्‍मज
केशव पनेरी निर्देशित जीना इसी का नाम है एक मुश्किल फिल्‍म है। यह दर्शकों की भी मुश्किल बढ़ाती है। 170 मिनट की यह फिल्‍म विंटेज कार और किरदारों की असमाप्‍त कथा की तरह चलती है। फिल्‍म के दौरान हम राजस्‍थान,मुंबई और न्‍यूयार्क की यात्रा कर आते हैं। फिल्‍म की मुख्‍य किरदार के साथ यह यात्रा होती है। आलिया के साथ फिल्‍म आगे बढ़ती रहती है,जिसके संसर्ग में भिन्‍न किरदार आते हैं। कभी कुंवर विक्रम प्रताप सिंह,कभी शौकत अली मिर्जा तो कभी आदित्‍य कपूर से हमारी मुलाकातें होती हैं। इन किरदारों के साथ आलिया की क्रिया-प्रतिक्रिया ही फिल्‍म की मुख्‍य कहानी है।
21 वीं सदी के 17 वें साल में देखी जा रही यह फिल्‍म कंटेंट में आज का ध्‍येय रखती है। आलिया के बचपन से ही बालिकाओं के प्रति असमान व्‍यवहार की जमीन बन जाती है। बाद में बालिकाओं की भ्रूण हत्‍या के मुद्दे को उठाती इस फिल्‍म में लक्ष्‍मी(सुप्रिया पाठक) उत्‍प्रेरक है,अपने महान कृत्‍य के बाद उनकी अर्थी ही दिखती है। फिल्‍म में उनकी मौजूदगी या कुंवर विक्रम प्रताप सिंह से हुई मुठभेड़ राजस्‍थान के सामंती समाज में नारी सशक्‍तीकरण के सवाल को पुख्‍ता कर सकती थीं। बहरहाल,‍ फिल्‍म में जो नहीं है उसकी चर्चा बेमानी है। यों फिल्‍म में जो है,वह बहुत विस्‍तार से है...उनका भी बहुत मानी नहीं बनता।
इस फिल्‍म को कोई समय नहीं बताया गया है। कार के मेक और टाइपरायटर के इस्‍तेमाल से ऐसा लगता है कि यह पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक की कहानी होगी। किरदारों के रंग-ढंग भी उन्‍हें कुछ दशक पीछे का ही जाहिर करते हैं। गानों के फिल्‍मांकन की शैली और लुक में पीरियोडिक असर दिखता है। चरित्रों के चरित्र निर्वाह की शैली भी आज की नहीं है। यही वजह है कि फिल्‍म अभी की नहीं लगती।
कलाकारों ने अपने किरदारों को जीने की कोशिश की है। स्क्रिप्‍ट की सीमा और कमजोरी ही उनकी हद बन गई है। वे उससे निकल नहीं पाते। आशुतोष राणा और अरबाज खान ने अपनी संजीदगी दिखाई है। किरदार के एकआयामी मिजाज के कारण वे कुछ अधिक नहीं कर पाते। यह फिल्‍म मंजरी फड़णीस और सुप्रिया पाठक की है। दोनों ने अपने किरदारों को निभाने में ईमानदारी बरती है। उन्‍हें लेखक का सहयोग भी मिला है। नतीजतन वे प्रभावशाली लगती हैं। आलिया के दोस्‍त एलेक्‍स के रूप में आए हिमांश कोहली‍ का व्‍यक्तित्‍व आकर्षक है। उनके चरित्र चित्रण में अधूरापन है।
अनेक प्रतिभाओं के योगदान के बावजूद गीत-संगीत मामूली है।
अवधि- 170 मिनट
दो स्‍टार

Tuesday, February 28, 2017

करण जौहर से रघुवेन्‍द्र सिंह की बातचीत



करण जौहर का यह इंटरव्‍यू रघुवेन्‍द्र सिंह ने लिया है। य‍ह इंटरव्‍यू फिल्‍मफेयर में छप चुका है। करण जौहर के व्‍यक्तित्‍व के विभिन्‍न पहलुओं को टच करता यह इंटरव्‍यू उनके बारे में विस्‍तृत जानकारी देता है। करण हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के कर्णधार हैं।
Karan Johar
-Raghuvendra Singh

Karan Johar is one of the most influential names in Hindi cinema. Raghuvendra Singh catches him in a candid mood talking about films, friends, insecurities and relationships

Karan Johar has the reputation of being a serious name of influence in the film industry. Whether it’s the A-list stars or the budding new talent, everyone is friends with KJo. He’s that rare breed of filmmaker and celebrity that even dwarfs the aura of some superstars. But Karan Johar is not the proverbial star with an entourage and LV and Gucci embellishments. That part is just a small brooch on the flawlessly style Armani suit that KJo fits into like a glove. The real Karan Johar is a man who drives endlessly establishing and maintaining his relationships. Whether it’s the bigwigs like Shah Rukh Khan and Aditya Chopra or the new talents like Shakun Batra and Ayan Mukerji, Karan is friends with them all. Because he values ringing phones more than ringing cash registers. He believes his people and his relationships give his life meaning. So in a candid mood, the master of conversations over coffee, spills some of his own secrets at loving and hating people. The one man who’s connections in the real world rival the nexus of social media, gives you the lo-down on what drives him and his film industry.

How is the young generation of actors different from their seniors?
Those times were different. They were different. I was different. This generation operates differently. With Shah Rukh there was always a sense of seniority, respect, awe and inspiration. There still is. Whenever Shah Rukh Khan walks into a room, I instinctively stand up because I call him Bhai. With Ranbir it’s easy and casual. I’m senior to them. I’ll always cherish both the memories. You can’t compare them because they’re different situations.
Your friendship with Gauri Khan has stood the test of time. What’s the secret?
She’s strong and solid. She’s a great mother, a wonderful wife and daughter. She’s the silent support in my life. We don’t need to talk to each other. Yet we’ll always stand by each another. She’s like a daughter to my mother (Hiroo Johar) and a sister to me. I love the way she handles her life. I love the way she balances being Shah Rukh’s wife and being a self-sufficient professional. She’s the support system we all lean on. Shah Rukh and I lean on her for stability because she’s such a strong lady. There’s a photo of Shah Rukh and Gauri in my room. I stare at them because they give me strength. The only other pictures in my room are of my father (the late filmmaker Yash Johar) and my mother.
Who’s dearer to you SRK or Gauri?
You don’t compare your relationships. You respect them. You love them.
When will we see Shah Rukh and you working together again?
Shah Rukh is a huge part of my career. When it comes to superstars, SRK is the only one I’ve worked with. He’s all I know. We will come together for something special immediately perhaps. But one doesn’t know when. I’m still in the thick of a movie. Working with Shah Rukh is easy. If I direct, he’ll say a yes for sure. We have that understanding. He never reads my scripts. Just a while ago, we had dinner and chatted for four hours about everything. I don’t enjoy that ease and comfort with anybody else because we have history between us. I’m in the movie business because of Aditya Chopra and Shah Rukh. I can never forget that.
When people suggest that you’ve moved on from Shah Rukh how do you react?
People talk rubbish. I’m co-producing two movies with him. How have I moved on? We’re co-producing the up-for-release Gauri Shinde film and we’re also collaborating to make the Ittefaq remake with BR Films. I’m in touch with his wife and him every day. I talk to Aryan and Suhana every day. People don’t understand people’s love and respect for each other.
Any plans of launching Aryan Khan, Shah Rukh Khan’s son?
Aryan is young. He has four years of university left. After that he’ll decide what he wants. I have told him that if he ever decides to do movies I have to be part of his launch. I will have to and I will force myself into that because I love Aryan. He’s my god child and I have seen him growing up. He is as old as my career. He was born after the first schedule of Kuch Kuch Hota Hai on the 12th of November, 1997. For me Aryan is beyond films. He’s more than family to me. Right now one should not burden him with anything.
You carry the halo of a ‘star director’. Is it a conscious effort?
I never planned it. I have projected myself in the way I wanted to project myself. I enjoy the limelight. I don’t believe in subtlety. I believe in front footing my celebrity status. I don’t have a problem posing for the paparazzi, hosting an awards show, judging a reality show, hosting a talk show. Being famous excites me and losing fans depresses me. I’m unapologetic about it. I don’t want to be behind the scenes. I’ve no interest in subtlety, neither in my cinema nor in my personality. I love who I am.
What’s tougher, directing a film or maintaining celebritydom?
Direction is my primary passion. Maintaining my stardom is not something that I have control over. It’s great as long as the going is good. Tomorrow when the flowers stop coming, then I’ll just have to deal with it. Right now life is kind. Hopefully, I’ll leave behind a strong legacy provided I have my feet planted firmly on the ground. I can’t be deluded. Delusion is the biggest disease. It can be the death of a career. I’m aware of my insecurities, inferiorities, mistakes… I know where I stand in the scheme of things. I don’t believe I’m the best filmmaker in the country or the most powerful person in the industry. I’m just a grateful member of this industry.
From where do you get this sense of wisdom?
I’m a friend, a father and family to my colleagues. That’s my biggest achievement. That’s what I learnt from my father. He taught me that hits and flops are immaterial. If your relationships fail you’ll stop mattering in the world. That I have smiling people who work in my company makes more difference to me than a blockbuster. For me, there’s no difference between a superhit film and a superhit family at work. Where will I take all this money? Money is a byproduct of success. But success is not just commercial. Success is a personal journey. I hope that my personal journey will always be more successful than my career.
Away from all the razzmatazz… what’s the real Karan like?
I’ve spent 44 years trying to figure myself out. I’m a Gemini. So there are two of me in any case. I’m many people in one. It depends on the circumstance and the situation. I can swing on politeness. I can swing on power. I can be sad, I can be happy on command. Because in the industry the cameras never go off. Even when we’re in business or creative meetings, the camera is always on. You’re an entity, you’re always performing. Those vulnerable moments of solitude or those intimate moments happen with just your family… my mom. Otherwise, when I leave the house I put on a mask and the camera starts rolling. And the camera goes off only when you put off the lights and sleep.
So are you being a different person all the time?
It’s not totally different but there is a difference between what you project and who you really are. We are in an industry of projections. You can’t be yourself everywhere. If you really get down to saying things that you want to, chances are you’ll end up in jail. So I don’t want to say those things. I mean at times you just have to shut up and you have to just play the part assigned to you.

What are your insecurities?
Bowing down to the system, bowing down to the norms or to fraternity practices I never want to ever be a weak version of myself. I always want to be strong and that’s not to do with commercial or monetary success, it’s to do with your own belief.
Did you ever feel Kapoor & Sons was a film that offered a risky proposition?
It was and we fought many odds. Many actors refused Fawad Khan’s role for various reasons. Everybody was worried about the how the film would shape up but Shakun (Batra) and I had faith in it. It was a powerful screenplay, it connected with the audience. It was brave and beautiful at the same time.

Is it true that Rishi Kapoor and Shakun Batra were not on the same page during the shoot of Kapoor & Sons?
Rishiji and Shakun definitely went through some ups and downs. It never got ugly, it never got bitter and it was a relationship of mutual debate and different perspectives. But they found their own ground. It was all for the betterment of the film. Eventually, they found a relationship. Today they’re very fond of each other.

Normally, in a situation like this, whose side would you take the actor or the director?
I’ll always take the director’s side. A film is a director’s medium. No actor can know the film better than the director. My energies are of course employed to sort out the situation. But I will always be there for the director. I’m a director myself. I believe the director knows best.  

Do you think Indian society and the film industry have become more accepting of homosexuality?
Acceptance is still a long way, away but at least we’re aware. That’s the first stage. There was once a point when we weren’t even aware. People criticized me for stereotyping homosexuality in Dostana but I’m the only filmmaker who put it out on the big scale. Its ridiculous how unaware people were before. The film, at least, brought the conversation of homosexuality into the drawing room of every urban home. I’ve received at least a thousand emails from kids, youngsters, teenagers, seniors… thanking me for making that film because now their parents are aware of the concept of homosexuality. It’s not brushed under the carpet anymore. I have always tried to address it in my own way. I’m not apologetic about Dostana. I’ve got a question for those intellectuals who think the movie was stereotypical... what are they doing? Rather than writing about it in columns no one will read, or making a self-indulgent film, might as well use pop culture to make people aware about homosexuality.

Does showbiz have a place for emotional and sensitive people?
It’s a sensitive profession. We make movies. Movies are an extension of our emotions especially when you write them yourself. They reflect your thoughts, your insecurities and your sensitivities. So of course we’re all sensitive being in a creative industry that allows us to be sensitive. In fact, our sensitivity makes us flourish. I think its fine to walk around with your emotions on your sleeve as long as you’re aware of the atmosphere and surroundings. Over time, I’ve realized that the more you expect from relationships the more they’ll disappoint. It’s important to be intelligent while being sensitive. I don’t think intelligence and sensitivity can exist on different ends of the spectrum. They have to co-exist. So while I might be sensitive about something I should be intelligent enough to know that just my sensitivity will not get me anywhere. You have to have a little bit of both. Fortunately for me I have struck that balance recently. I have understood how to balance and police my sensitivity and not get carried away with my emotions.

Have there been such moments?
Of course. There are people you get attach to and then there are people who hurt you. It’s important not to get over sensitive about everything and realize that there is line between what’s professional and what’s personal. In the industry we tend to blur those lines. That’s not the way to go. If there is a line then you have to respect it and live it. That’s what we don’t do. Many times I’ve been hurt but I’ve realized that probably my hurt is not warranted and it’s not coming from a place of a reason.

When someone hurts you, do you throw them out of your life or just let them be?
You don’t take drastic steps for small things. But when someone keeps hurting you over a period of time, continuously then you have to distance yourself from that person. I don’t like to fight, make things ugly, scream or shout. May be it’s good sometimes to do that but I’m not that person. I silently distance myself from that person.

How tough is it to nurture relationships in showbiz?
I think it’s a full time job. Films, projects, businesses every professional pursuit depends on maintaining relationships. Every relationship is different and everyone is difficult in its own way. Relationships are not machines. They don’t work with a button. You can’t switch it on and off when you like. You have to keep feeding it with human power. I wish relationships could work just like my I-pad. That doesn’t happen. There’s lot of your energy, time, compassion that needs to go into a relationship for it to really work. Every relationship needs all of this from both parties. People say it’s difficult to have friendships in the industry. The problem is that very few people try. If you want to make friends then you have to work at it. Then you have to keep going, maintain relationships and keep in touch. We’re all so self-absorbed in this industry and I think mobiles have contributed to the death of so many relationships. Today, we’re in a relationship with Twitter, Facebook and Instagram. We’re happy with our relationships with social media. When you’re in a relationship with virtual reality, not reality it takes away the romance, emotional investment and the friendships. The kind of time people spend with their phone, it’s like a new family member. Your phone has become your family and that’s an additional member that you should be dysfunctional with. The phone helps you distance yourself from people. It’s like a disease; we’re just not diagnosing it.

You’re known to be a friend to lot of people in the industry. What makes you a loyal friend?
Loyalty is not a pre-requisite of any relationship. I don’t know how it’s become such a prime feature in relationships. Loyalty, honesty and integrity are a given in any relationship. If you don’t have those basic pillars you’ll never have a friend in life. The key to maintaining relationships is to talk less and listen more. I know more than eight out of ten people just talk but how many of them listen? It’s important to be a listener because not every problem is yours, everybody goes through problems and I think that’s critical at maintaining bonds.

Who do you count as real friends?
I think I’m blessed with some really strong relationships and friendships. My mother understands and she’s a strong woman. Other than that there are lots of movie industry related relationships that are great and solid. I found some really good friends in the industry. Manish (Malhotra), Shah Rukh (Khan), Adi (Aditya Chopra) have been my friends for years. Right now I’m working with Ranbir (Kapoor), I’m close to him. The younger lot, Sidharth (Malhotra), Varun (Dhawan) and Alia (Bhatt) are like kids to me. They’re like extended family. I have a childhood equation with Tina (Akshay Kumar’s wife). I’m very much in touch with her. Right now she’s in a totally different zone but we still keep in touch. I’m friendly with Reshma Shetty. I have known her for 25 years. She’s a celebrity manager but I’m very close to her. Shah Rukh and Adi are responsible for me being in the movies. Outside the industry I have friends like Kajal Anand. I grew up with Farhan (Akhtar), Zoya (Akhtar) and Abhishek (Bachchan). Young directors like Punit (Malhotra), Ayan (Mukherjee), Abhishek Verman and Shashank Khaitan make the Dharma office a nice place to be in.  There’s no one person I turn to at any given point of time. I love the fact that I’m surrounded by all these wonderful energies.

Do you have plans of continuing your acting career?
I worked in Bombay Velvet as an experience. I’ll act again if I get offered something exciting. I’m not averse to doing it but I’ve not been offered anything after Bombay Velvet. Thankfully acting is just a byproduct of my presence in the industry. My phone didn’t ring for even one role. I was fortunate that the critical appraisal of my performance was decent; I believe I gave it my all. But I was not offered one role. I was not even offered a bad film. Right now I’m an unemployed actor.

Reportedly you met Rani Mukerji recently, how’s her and Adi Chopra’s parenting coming along?
Yes, I met her in Paris. I went to hang with Rani and Adi. I was in Europe. She is lovely. I keep teasing her by calling her Mother India. She’s obsessive about her child. We’re all amused about that. Adi and I are always laughing about how hysterical she is, but she’s lovely. Adira is beautiful. Adi and Rani are special to me and their child is exceptionally special. I feel so happy and I get teary when I see Rani and Adi as a parents. Adi is my closest friend in the industry. In fact we’re best friends. Rani is practically somebody, though I didn’t launch her but I feel I did. I feel a big part of her and I see them as parents and I was like I was so moved by them and how. To me it’s so special to see them with Adira. It’s amazing.

Does the younger generation of filmmakers and actors make you feel old?
No, I find myself younger than them. I feel my ideas and my thoughts about life, cinema and things in general are younger. I don’t feel old around them at all. I actually feel connected to all of them and I don’t feel a year older than them. I feel we’re all at the same level.
Ae Dil Hai Mushkil (ADHM) was about love and longing…
It’s a personal film. It’s about things we all have been through. It’s not a love story; it’s a story about love. It’s about how you react to heartbreak. It’s about unrequited love, one-sided love. ADHM is every single person’s film. I loved this couplet by Faiz Ahmed Faiz, “Gar baazi ishq ki baazi hai, jo chaho laga do dar kaisa, Gar jeet gaye to kya kehna, haare bhi to baazi maat nahi (loosely translated it means that one never actually loses in the game of love). That’s the thought on which I’ve based ADHM.  Even if you lose in love you’re still a winner because you did love.
Does it resonate your life?
Perhaps. I’m 44 years old, in the mid-point of my life. You realise the importance of being in a relationship, of love and romance. Do I miss love? Companionship? Intimacy? Yes, I do. So I felt that I needed to address that cinematically. Basically, it’s my quest for love. The lack of love in my life, my reflecting on my heartbreaks and the love that I could have had, which I never did. That has resulted in me writing AHDM. It’s about how tough the journey of heart can be, how you may achieve everything in the world professionally but if you don’t have love, you remain empty. Work is part of your mind. Love is about your heart. My mind feels liberated, my heart feels empty.
How was the experience of working with Ranbir Kapoor, Aishwarya Rai Bachchan and Anushka Sharma?
It was best experience I had because I knew all of them individually. They were cool, fun, co-operative, easy and supportive to the product we were making. I had the best time. I had two great outdoors back to back in London and I felt like I didn’t want to end. Working with Ranbir was exceptionally liberating. He is the easiest actor. He was so wonderfully fun. Anushka is gorgeous. Aishwarya I have known for years and I always wanted to work with her and my big dream to work with her came true in ADHM.

Is Fawad Khan your new favorite?
He is an exceptional talent. He is a great guy. He has a certain understanding of emotional nuances that I find rare in artistes. I have tracked him ever since Humsafar and Zindagi Gulzar Hai and I have also seen Khuda Ke Liye. He is an exceptionally sensitive man whose emotions come out beautifully when he performs. I think he was fantastic in Kapoor & Sons. I think he’ll be fantastic in everything he does because he is a great actor. He’s also funny. He’s got a great sense of humour. He can completely be the life of the party but he comes across as someone quiet. He takes time to open up but when he does he’s like a full raita failana type person. Fawad and I are friends today.

You have moved on from ‘Candy flaws’ to ‘serious’ films…

I don’t think now I can write a film like Kuch Kuch Hota Hai anymore. I don’t get those ideas. When I look back and see those movies I don’t know who directed them because I feel I was totally a different person. At 25, KKHH came naturally to me. At 27, Kabhi Khushi Kabhi Gham came naturally came to me. At 32, Kal Ho Na Ho was what I felt. At 36-37, My Name Is Khan was something I felt. And at 40, I was so exhausted of emotions that I wrote the happiest film of my life which was Student Of The Year. It was my holiday film. It’s not a great film from any angel. It’s just a happy film with a lot of time pass ness, songs everything I love about movies and launching three beautiful faces. I had no interest in moving Cinema Mountains. I knew I would not able to and I haven’t. SOTY is possibly my least cinematically appreciated film but it’s been a big success for me as my strategy go because I launched these three kids who have done phenomenally well and it made me feel very young at 40. It connected me with the young audience. I have kids from six to sixteen now who have seen that film five and ten times and I feel very proud of myself that I made that film. Yes, I didn’t achieve anything greatly cinematically in that film but I did a lot for my company with that film and that makes me extremely very proud. Everyone who thought that it was a wrong move for me I hope I proved them wrong because all three of them are where they are at today in the industry is definitely a reflection of the fact that I had to make that film at that juncture of my life.

Do you fear being disconnected with the younger generation?  
Yes, bahut dar lagta hai ki vo disconnect na ho jaayein because apne aap ko relevant rakhna bahut zaruri hota hai. It’s very important to be relevant to that generation. They are the generation that rules the roost today. It’s that big strong demographic between sixteen and twenty five are huge chunk of the movie goers that we have to be relevant today. I don’t want to be irrelevant. I’m still very young in my head and heart and I want to make that content that appeals to them as well. And I don’t think I’ll ever let myself down in that department because I’m very aware. When I look around me I know exactly who is wearing what, who is doing what, who is listening to what kind of music, how they are speaking to each other. I’m going to launch many more young kids and energies and give them a lease of life at Dharma because I connect with that generation. I understand their angst. I’m not somebody who walks with my age on my sleeves. I walk with my achievement on my sleeves.

What qualities do a person need to be Karan Johar?
Why should anybody want to be me? I think everyone is unique in their own way. I don’t want to be anyone else. So why does anybody need to be me? I’m happy being me. I have taken 44 years trying to figure myself out. I can’t bare the idea of trying to be somebody else. I would just tell them don’t try to be anybody else. Try to be the best version of yourself and you always know what your own feelings are and I feel you have to be your 2.O version, your new version. You have to always update yourself. We are just like technology is, we need to also update ourselves and that comes with awareness. Sometimes you have to better yourself. Don’t try to be me because you are wasting your time because I’m not all what I appear to be.

BOX:
Three men I love the most:
Amitabh Bachchan
I have great respect for Amitabh Bachchan and his achievement. His zest, his zing, the way he conducts himself at 74, he’s the youngest man I know. I want to have the spirit that he has.
Aditya Chopra
I have great respect for Aditya Chopra because of his vision and what he’s achieved with it. He started the first studio in this country. Today he’s built it into a massive brand.
Shahrukh Khan
I think he is one of a kind. He’s a superstar, entrepreneur and he is also a visionary. He’s the most intelligent mind I know in the business.
   
BOX
Women I admire:
Lata Mangeshkar
My love for Hindi cinema has a lot to do with the songs Lata Mangeshkar and Kishore Kumar sang together and individually. Lataji will always resonate cinema for me. Her rendition of Lag ja gale (Woh Kaun Thi) gives me emotional strength. I hear it almost every night.
Sridevi
I’m a big Sridevi fan. She has done over 500 films and has been a top star in every language be it Tamil, Telugu or Hindi. She’s a genius actor. There’s no one like her. I’m dying to direct her someday.
Jaya Bachchan & Gauri Khan
I love the way they stabilise their relationships within the industry and within their families. Jaya aunty has an identity of her own. She’s the fulcrum of her beautiful family. She’s maintained her dignity, her self-respect. Hers is a strong energy. I call her ‘Aunty J’ with affection. She’s been like a mother to me. 

Sunday, February 26, 2017

इस प्रेमकहानी में भूत है - अंशय लाल



अंशय लाल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अनुष्‍का शर्मा की नई फिल्‍म फिल्‍लौरी के निर्देशक अंशय लाल हैं। अनुष्‍का इस फिल्‍म की अभिनेत्री होने के साथ निर्माता भी हैं। अपने भाई कर्णेश शर्मा के साथ उन्‍होंने क्‍लीन स्‍लेट प्रोडक्‍शन कंपनी आरंभ की है। नए विषयों और नई प्रतिभाओं को मौका देने के क्रम में ही इस बार उन्‍होंने अंशय लाल को चुना है।
दिल्‍ली के अंशय लाल ने मास मीडिया की पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ समय तक माडलिंग की। राइजिंग सन की कोपल नैथानी ने उनकी आरंभिक मदद की। कोपल ने ही प्‍यार के साइड इफेक्‍ट निर्देशित कर रहे साकेत चौधरी से मिलवाया। अंशय लाल ने वहां क्‍लैप देते थे। तीन सालों तक वहां काम करने और अनुभव बटारने के बाद सहायकों की टीम के साथ अंशय भी शिमित अमीन की चक दे की टीम में शामिल हो गए। यशराज की एंट्री के बाद नेटवर्क बढ़ता गया। फिर दोस्‍ताना और हाउसफुल में सहायक रहे। इतने समय के अनुभवों के बाद उन्‍होंने ब्रेक लिया और स्क्रिप्‍ट लिखी। तीन स्क्रिप्‍ट लिखी और तीनों पर फिल्‍में नहीं बन सकीं तो एक बार भाई के पास अमेरिका जाने का भी खयाल हुआ। इस बीच ऐसा संयोग बना कि फिल्‍लौरी की शुरूआत हुई और अब 24 मार्च को फिल्‍म रिलीज हो रही है।
फिल्‍लौरी के आयडिया के बारे में पूछने पर अंशय बताते हैं, 2009 की बात है। मेरे एक दोस्‍त की पेड़ से शादी हो रही थी। हम दोस्‍त उसका मजाक उड़ाते थे कि अगर पेड़ में भूत होगी तो तेरी शादी हो जाएगी उससे। यशराज के मनीष शर्मा के यहां मेरी मुलाकात अनुष्‍का के भाई कर्णेश शर्मा से हुई थी। उन्‍हें मैंने कभी यह आयडिया सुनाया था। यह कहानी उनके दिमाग में रह गई। फिर एक दिन उन्‍होंने कहा कि इस पर काम करो। अंशय अपनी दोस्‍त और फिल्‍लौरी की रायटर अन्विता का जिक्र करना नहीं भूलते। उन्‍होंने फिल्‍म लिखी। अनुष्‍का को भी फिल्‍म का आयडिया पसंद आया था। स्क्रिप्‍ट सुनने के बाद वह खुद काम करने के लिए भी राजी हो गईं।
फिल्‍म के लिए फिल्‍लौरी नाम का सुझाव अन्विता ने दिया था। अंशय याद करते हैं, फिल्‍म का नाम अभी फायनल नहीं हुआ था। लोकेशन के लिए हमलोग पंजाब के बरनाला और अमृतसर जिलों में रेकी कर रहे थे। उन्‍होंने कहा था फि सतलज के किनारे बसे फिल्‍लौर चले जाना। तस्‍वीरें ले आना। वहां से उनके बचपन की यादें जुड़ी थीं। धीरे-धीरे हम फिल्‍लौर से प्रेरित होकर फिल्‍लौरी पर टिक गए। फिल्‍लौर के लोगों को फिल्‍लौरी कहेंगे। यह कहानी का हिस्‍सा है।
फिल्‍लौरी में दो पीरियड हैं। एक पीरियड में अनुष्‍का शर्मा और दिलजीत दोसांझ की कहानी है। दूसरे पीरियड में सूरज शर्मा आते हैं। लगभग 100 सालों का अंतर है। अंशय इस बात से ही खुश्‍ा थे कि इस जमाने में रहते हुए उस जमाने की प्रेम कहानी के बारे में सोचने और शूट करने का मौका मिलेगा। अंशय आगे कहते हैं, आम तौर पर भूत की कहानी हॉरर मान ली जाती है। हमारी फिल्‍म की भूत फ्रेंडली है। उसे क्रिएट करने में वीएफएक्‍स की काफी मदद ली गई है। रेड चिलीज के हरि और केतन ने उसे डिजाइन किया है। उनके रिसर्च से हमें सहायता मिली। अनुष्‍का हमेशा सुनहरे कपड़ों में दिखती हैं। उसकी खास वजह है। कथ्‍य के साथ टेक्‍नीक के लिहाज से भी यह फिल्‍म देखने लायक होगी। विशाल सिन्‍हा फिल्‍म के डीओपी हैं। पुराने समय और नए समय का रंग अलग रखने के साथ संतुलन भी रखा गया।
अंशय स्‍वीकार करते हैं कि वीएफएक्‍स के उपयोग के लिहाज से स्क्रिप्‍ट में कई चीजें जोड़ी गईं। वे बताते हैं,वीएफएक्‍स के जरिए हर कल्‍पना को मुमकिन किया जा सकता है।‍ शशि(अनुष्‍का शर्मा) का चरित्र गढ़ने में वीएफएक्‍स टीम के सुझाव से काफी लाभ हुआ। वीएफएक्‍स लेखक की कल्‍पना को विस्‍तार और उड़ान देता है। इस फिल्‍म की ज्‍यादातर शूटिंग ग्रीन स्‍क्रीन पर हुई है।
फिल्‍म की शुरूआत से ही अनुष्‍का शर्मा जुड़ी रहीं,इसलिए उन्‍हें हां करने में देरी नहीं हुई। उन्‍हें फिल्‍म और अपना रोल पसंद था। अंशय पूरी संतुष्टि के साथ कहते हैं,प्रोड्यूसर के ऑन बोर्ड आ जाने से बहुत आसानी हो गई। इस फिल्‍म में दोनों भाई-बहन की पूरी हिस्‍सेदारी रही। अनुष्‍का अभी की चर्चित अभिनेत्री हैं। उनके राजी होने से हमारी जिम्‍मेदारी बढ़ गई। अन्‍य कलाकारों के पूछने पर वे बताते हैं, सूरज शर्मा की फिल्‍म लाइफ ऑफ पाई मैंने देखी थीं। उनका टीवी शो होमलैंड भी देखा था। कर्णेश ने उनका नाम सुझाया। उनसे दिल्‍ली में मुलाकात हुई तो उन्‍हें हमारी फिल्‍म पसंद आई। उनके साथ मेहरीन हैं। दिलजीत दोसांझ की फिल्‍म पंजाब 1984 मुझे बहुत अच्‍छी लगी थी। फिर उड़ता पंजाब आई। अनुष्‍का को उनकी पंजाबी फिल्‍म जट एंड जूलियट फनी और अच्‍छी लगी थी। दिलजीत भी राजी हो गए। उन्‍होंने फिल्‍म की यूनिट के साथ लुक पर मेहनत की।
पंजाब में शुटिंग की दिककते रहीं। समृद्धि आने के बाद पंजाब के गांव बदल गए हैं। फिल्‍लौरी के लिए हमें पुराने किस्‍म का गांव चाहिए था। अंशय बतोत हैं, हमें दानगढ़ ऐसा गांव मिला,जो अभी तक लुक में पुराना है। इस पंचायत के लोगों ने दिल खोल कर मदद की। हम शहरियों को ऐसे व्‍यवहार की आदत नहीं। वहां हर घर के दरवाजे हमारे लिए खुले रहते थे। वे खाने-पीने की चीजें ले आते थे। शूटिंग में किसी प्रकार की अड़चन नहीं हुई

Saturday, February 25, 2017

मेरे गीतों के हैं अर्थ अनेक - राेहित शर्मा



रोहित शर्मा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अविनाश दास निर्देशित अनारकली ऑफ आरा में रोहित शर्मा ने संगीत दिया है। इस फिल्‍म में आरा की अनारवाली की भूमिका स्‍वरा भास्‍कर ने निभायी है। इस फिल्‍म की नायिका अनारकली देसी गायिका है। वह मंच पर गाती है और अपनी अदाओं से दर्शकों को रिझाती है। इस फिल्‍म का खास संगीत रोहित शर्मा ने तैयार किया है।
-अनारकली ऑफ आरा के पहले आप की कौन सी फिल्‍में आई हैं?
0 आनंद गांधी की शिप ऑफ थिसियस में मेरा ट्रैक था।  विवेक अग्निहोत्री की फिल्‍म बुद्धा इन ए ट्रैफिक जैम का संगीत मैंने ही तैयार किया था। फिर बच्‍चों की एक फिल्‍म शॅर्टकट सफारी में मेरा संगीत था। कुछ और फिल्‍मों में मैंने संगीत दिया। उनमें से कुछ रूक गईं। अभी अनारकली ऑफ आरा आ रही है।
- फिल्‍म संगीत की तरफ कैसे रुझान हुआ?
0 संगीत के प्रति रुझान बचपन से था। कभी सोचा न‍हीं था कि फिल्‍मों में संगीत निर्देशन करने आ जाऊंगा। घर के दबाव मेंं दिल्‍ली से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर भी संगीत में रुचि बनी रही। मैंने संगीत की विधिवत शिक्षा ली। मैंने शास्‍त्रीयं संगीत का अभ्‍यास किया। करते-करते ऐसा लगा कि फिल्‍मों के लिए कुछ किया जाए और मैं मुंबई आ गया।
- पहली फिल्‍म कौन सी थी?
0 पहली फिल्‍म थी फोसला(फ्रस्‍ट्रेटे वनसाइडेड लवर्स एसोसिएशन)। उसी यमय दिव्‍येन्‍दु शर्मा,राजकुमार राव और स्‍वरा भास्‍कर से पहली बार मिले थे। यह उन सभी की पहली फिल्‍म थी। वह नहीं बन सकी थी।
- अअनारकली ऑफ आरा के संगीत में क्‍या खास होगा?
0 इस फिल्‍म का संगीत मिट्टी से जुड़ा हुआ है। बिहार की सगंध है। हम ने यह कोशिश की है कि वहीं की लोकधुन,आज के फिल्‍म संगीत की झलक और कुछ समकालीन ट्रैक हैं। कुल ग्‍यारह गाने हैं। हम ने अच्‍छा मिश्रण किया है। निर्देशक अविनाश ने काफी मदद की। उन्‍होंने लोकप्रिय गाने सुनाए और अपनी पसंद बताई।  उन्‍होंने स्‍वयं एक पारंपरिक गीत लिखा। उनके साथ रामकुमार सिंह,रवींद्र रंधावा,डॉ. सागर और प्रशांत इंगोले के गीत हैं।
- फिल्‍म की नायिका देसी गायिका है,जो परफार्म भी करती है। उसके गीतों मैं कैसी सावधानी बरतनी पड़ी कि वे द्विअर्थी तो हो,लेकिन...
0 समझ गया। मैं इस फिल्‍म के गीतों का बहुअर्थी कहूंगा। पहला अर्थ बहुत साफ-सुथरा है। दूसरा-तीसरा अर्थ श्रोता और दर्शक पर निर्भर करता है। कुछ के राजनीतिक अर्थ भी हैं। द्विअर्थी गीत कलाकार की मुद्राओं से अश्‍लील संकेत देते हैं। अनारकली ऑफ आरा में ऐसा नहीं है।
- देसी आवाज के लिए किन गायकों का बुलाया आप ने?
0 स्‍वाति शर्मा,पावनी पांडे,रेखा भरद्वाज और सोनू लिगम ने गीत गाए हैं। स्‍वाति शर्मा को बन्‍नो तेरा स्‍वैगर और पावनी पांडे को लैला की वजह से लोग जानते हैं। सोनू निगम और रेखा भारद्वाज को परिचय की जरूरत नहीं है।
- पुरबिया लोकधुनों को फिल्‍मों में आज अपमार्कट नहीं माना जाता। ऐसा क्‍यो?
0 मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ है। अभी बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में तीसरी कसम के ‍पिंजरे वाली मुनिया का फिर से इस्‍तेमाल हुआ है। मेरे खयाल से यह चौथी बार हो रहा है। पुरबिया लोकधुनों का खूब इस्‍तेमाल होता रहा है। अभी उधर से आए संगीतकार नहीं हैं और एधर की कहानियां नहीं आ रही हैं। अनारकली ऑफ आरा जैसी फिल्‍में आएंगी तो देसी धुनें भी लोकप्रिय होंगी।

जुड़वां सोच है हमारी : अनुष्‍का-कर्णेश




-अजय ब्रह्मात्‍मज
ग्‍लैमर जगत में फिल्मी पृष्‍ठभूमि की ढेरों प्रतिभाएं हैं। पिता-पुत्र, बाप-बेटी व भाई-बहन की जोड़ी। फरहान-जोया, साजिद-फराह, एकता-तुषार प्रमुख भाई-बहन जोडि़यां हैं। ऐसी ही एक आउटसाइडर जुगलबंदी है, जो अनूठी कहानियों को बड़ा मंच प्रदान कर रही है। अनुष्‍का-कर्णेश शर्मा। अनुष्‍का स्थापित नाम हैं। भाई कर्णेश संग वे अपने बैनर की जिम्मेदारी को बखूबी संभाल रही हैं। एनएच 10 के बाद फिल्लौरी दूसरी ऐसी फिल्म है, जिसका निर्माण दोनों ने संयुक्त रूप से क्‍लीन स्‍लेट फिल्‍म्‍स के अधीन किया है।
इस भूमिका के सफर के आगाज को कर्णेश जाहिर करते हैं। वे बताते हैं, हम दोनों ने यह फैसला बहुत सोच-समझ के लिया हो, ऐसा नहीं है। एनएच 10 पहला मौका था, जब हम दोनों ने इस भूमिका के बारे में सोचा। हम दरअसल अच्छी कहानियों का मुकम्‍मल मंच मुहैया कराना चाहते हैं। अभी तक तो अच्छा हुआ है। आगे भी ऐसा ही हो।
अनुष्‍का इसमें अपने विचार जोड़ती हैं। उनके शब्दों में, मुझे ढेर सारे लोगों ने कहा था कि एक अभिनेत्री तब निर्माण में कदम रखती है, जब उनका करियर ढलान पर होता है। मैं अभी अपने करियर के उठान पर ही हूं। मैं इस फलसफे के विपरीत सोचती हूं। मेरा मानना है कि मैं इस वक्त बैंकेबल एक्ट्रेस हूं। मेरी मौजूदगी से कोई फिल्म एक खास बजट में बन सकती है। लिहाजा मैं इसे क्यों न इस्तेमाल करूं।
कर्णेश भी अनुष्‍का की इस सोच की वकालत करते हैं। वे बताते हैं, अब वक्त बदल चुका है। हॉलीवुड में भी सफल अदाकारा कथ्‍यप्रधान फिल्में प्रोड्यूस कर रही हैं। साथ ही हमारी कंपनी का मकसद केवल अनुष्‍का के लिए या उन्हें ध्‍यान में रखकर फिल्में नहीं बनाना है। हमारा परम लक्ष्‍य अच्छी फिल्मों को सपोर्ट करना है। अनुष्‍का खुद ऐसा सोचती हैं। शुरूआती फिल्मों में उनकी मौजूदगी से कंटेंट को मदद तो मिली ही, रिलीज के लिए ठीक-ठाक तादाद में स्क्रीन भी मिले। फिर जब, वे एक बेहतरीन और सफल अदाकारा भी हैं तो वे फिल्म का हिस्सा भी क्यूं न रहें। हमारा मोटिव यह रहा कि एक फिल्म की बेहतरी के लिए जो भी अच्छा हो, हम वह करेंगे। अलबत्ता हम आगे उनके बिना भी फिल्में बनाएंगे।
अनुष्‍का आगे कहती हैं, हम अपने बैनर की फिल्में अलग तरह से डिजाइन कर रहे हैं। एक्टर को दिमाग में पहले ही बिठाकर किरदार के बारे में नहीं सोचते। आगे ऐसा बिल्‍कुल मुमकिन है कि किसी किरदार में मैं फिट न बैठूं। हो सकता है कि मैं उसके लिए कुछ ज्यादा ही ओल्ड या ज्यादा न्यू लगूं। फिर वहां मैं एक्टर के तौर पर नहीं जुडूंगी। उस रोल के लिए जो एक्टर सही होंगे, उन्हीं को कास्ट किया जाएगा। अमूमन मेरे साथ ऐसा हुआ भी नहीं है कि मुझे एक ही किस्म के रोल मिले हों। हम साथ ही इंडस्ट्री से बाहर के हैं। नतीजतन, हमारी कोई पहले से तय धारणा नहीं है। हम जो कुछ भी करना चाहते हैं, उसको लेकर पूरी क्लैरिटी है। हमारी फिल्में देखने के बाद इंडस्ट्री को अंदाजा लगेगा कि हम क्या करना चाहते हैं। इस काम में बाकी लोगों का भी साथ मिल रहा है। क्रियाज नामक कंपनी है। उनके साथ हम कुछ लीक से हटकर फिल्में बना रहे हैं। उनकी घोषणा बहुत जल्द होगी।
हमारे बैनर का नाम क्लीन स्लेट है। इसका आइडिया अनुष्‍का शर्मा का था। कर्णेश बताते हैं, हम लोग वीडियो गेम खेल रहे थे एक दिन। विमर्श चल रहा था कि कंपनी का नाम क्या रखा जाए। अनुष्‍का ने झट कहा, क्लीन स्लेट। वह इसलिए कि हम कुछ भी पूर्वाग्रह के साथ नहीं करना चाहते थे। जो फिल्में सफल रही हैं, उन्हीं को रीहैश करने की कोशिश न करें। अनुष्‍का इसमें जोड़ते हुए कहती हैं, मुझे भेड़चाल से बड़ी प्रॉब्लम है। अगर कोई जॉनर चल पड़ा तो उसी लीक पर चलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। हम ऐसा नहीं चाहते हैं। हमारी हर दूसरी फिल्म पिछली वाली से नितांत अलग होगी। हम ज्यादा से ज्यादा अनूठा काम करना चाहते हैं।
बतौर टीम दोनों भाइ-बहनों ने पहले भी काम किया है। कर्णेश उस पुरानी याद को साझा करते हैं। वे बताते हैं, हम लोगों ने पिछले छह-सात साल में जितना वक्त साथ गुजारा है, उतना समय तो हमें बचपन में भी नहीं मिला था। उम्र में मैंने मर्चेंट नेवी की नौकरी कर ली थी। मैं बाहर हीरहता था। जो हमें तब करना था, वह अब कर रहे हैं।  हम मिलकर इस इंडस्‍ट्री को सोसायटी को कुछ देना चाहते हैं। मुझमें सामाजिक सरोकार उतना तो नहीं था, अनुष्‍का में था। हमारे पिता आर्मी में रहे हैं तो वहां लाइब्रेरी के लिए अनुष्‍का ने काफी काम किया है। वह कल्‍चरल इवेंट में भी लीड करती थी।
कर्णेश पहले मर्चेंट नेवी में थे। वहां काम की अलग डिमांड रहती है। क्‍या उन दिनों फिल्मों से किसी प्रकार का जुड़ाव था? कर्णेश हां में जवाब देते हैं। वे कहते हैं, शिप पर मेरी ड्यूटी तकरीबन 18 घंटे की होती थी। हम दुनिया से कटे रहते थे। ऐसे में मनोरंजन का एकमात्र साधन फिल्में ही हुआ करती थीं। मैं रोज एक फिल्म देखा ही करता था। सिर्फ हिंदी ही नहीं, हॉलीवुड व वर्ल्ड सिनेमा भी। मैंने जर्मनी, फ्रांस, पनामा से लेकर अर्जेंटीना तक की फिल्में देखी हैं। इससे फिल्मों की एक ठीक-ठाक समझ तो आ गई थी। बाकी मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं बहुत क्रिएटिव हूं।
अनुष्‍का ऐसा नहीं मानतीं। वे कर्णेश को काबिल मानती हैं। उनके शब्दों में, इनमें हीरे को परखने की भरपूर खूबी है। ये बिटविन द लाइंस के बीच के मायने पकड़ने में माहिर हैं। दूसरी चीज यह भी कि ये शिप का मैनेजमेंट भी संभालते रहे हैं, जिसका बजट करोड़ों में होता है। इन्हें लोगों को हैंडल करना बड़े अच्छे से आता है। मुझ में यह खूबी नहीं है। हम दोनों की सोच एक ही है। अगर हमारी पैदाइश में चार-पांच साल का फर्क नहीं होता तो हमें तो लोग जुड़वां कह देते, चूंकि सोच जो हमारी एक सी है। 
एनएच 10 में महिला हक और अस्मिता की बात थी। फिल्लौरी जरा अलग है। दोनों भाई-बहन लगभग एक स्‍वर में बताते हैं, एक मांगलिक लड़का है। लिहाजा उसका ग्रह-दोष दूर करने के लिए कहा जाता है कि  उसे पेड़ से शादी करनी होगी। वह चाहता तो नहीं है, फिर भी वह कर लेता है। अब पेड़ में भूतनी की आत्‍मा है। वह भूतनी मैं बनी हूं। बहरहाल, वह टिपिकल भूतनी नहीं है, जो लोगों को डराती है। वह इस शादी से खुद डरी हुई है। वह इसलिए कि उसके लिए भी इस किस्म की चीज अजीबोगरीब है। चूंकि वह पुराने जमाने से है, जब आस-पास बिजली भी नहीं हुआ करती थी। आज की तारीख की चीजों को देखकर वह हक्का-बक्का है। उन दोनों का सफर आगे क्या रूप लेता है, फिल्लौरी उसकी बानगी है। यह पंजाब में सेट है। फिल्लौर इलाके में। वहां के लोगों को फिल्लौरी कहा जाता है।
24 मार्च का रिलीज हो रही फिल्‍लौरी के बाद की यो जनाओं पर काम चल रहा है। कुछ फिल्‍मों की जल्‍दी ही घोषणा होगी। दोनों निश्चित हैं कि क्‍लीन स्‍लेट फिल्‍म्‍स अपनी फिल्‍मों से अलग पहचान बनाएगी।