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Sunday, November 27, 2011

फिल्‍म समीक्षा देसी ब्‍वॉयज

देसी ब्वॉयज: फीका एंटरटेनमेंट-अजय ब्रह्मात्‍मज

न्यूयार्क के फिल्म स्कूल से निर्देशन की पढ़ाई कर चुके डेविड धवन के बेटे रोहित धवन ने देसी ब्वॉयज की फिल्म के चारों मुख्य कलाकारों को स्क्रिप्ट के नाम पर क्या सुनाया होगा? और फिर स्क्रिप्ट सुनने-समझने के बाद हां करने के लिए मशहूर कलाकारों को इस स्क्रिप्ट में क्या उल्लेखनीय लगा होगा। पुरूषों का अंग प्रदर्शन, स्ट्रिपटीज, पोल डांस, लंदन, ट्रिनिटी कॉलेज, नायिकाओं के लिए डिजायन कपड़े, दो-तीन गाने और संजय दत्त का आयटम अपीयरेंस.. देसी ब्वॉयज में यह सब है। बस कहानी नहीं है,लेकिन इमोशनल पंच हैं। मां-बेटा, बाप-बेटी, दोस्त, टीचर-स्टूडेंट के अनोखे संबंधों के साथ जब जीरो दिया मेरे भारत ने सरीखा राष्ट्रप्रेम भी है। ऐसा लगता है कि रोहित धवन और उनके सहयोगी लेखक मिलाप झावेरी को पुरानी हिंदी फिल्मों के जो भी पॉपुलर (घिसे पिटे पढ़ें) सीन याद आते गए, उनकी चिप्पी लगती चली गई।

ऊपरी तौर पर यह दो दोस्तों निक और जेरी की कहानी है। मंदी की वजह से दोनों की बदहाली शुरू होती है। मजबूरी में वे पुरूष एस्कॉर्ट का काम स्वीकार करते हैं, लेकिन अपनी नैतिकता के दबाव में कुछ रूल बनाते हैं। निक की प्रेमिका राधिका को उनकी करतूतों का पता चलता है तो वह स्वाभाविक तौर पर नाराज होती है और नारी अस्मिता और दर्प से जुड़े कुछ सवाल भी पूछ बैठती है। दूसरी नायिका तान्या बारह सालों के बाद उस लड़के से मिलती है, जिस पर कॉलेज में उसका दिल आया था। तब वह मोटी थी और जेरी ने उस पर ध्यान नहीं दिया था। फिर से वह प्रेम जागता है और कैंपस-क्लास में हम दोनों केअनोखे प्रेम की बानगी देखते हैं। सचमुच रोहित धवन अपनी पहली फिल्म में फोकस नहीं कर पाए हैं कि उन्हें क्या और किस रूप में कहना है? अनेक पॉपुलर डायरेक्टर का प्रभाव दिखता है। सबके प्रभाव मे देसी ब्वॉयज कंफ्यूज फिल्म लगती है।

अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम आकर्षक दिखते हैं। उनके बीच की केमिस्ट्री भी जमती है, लेकिन उनके पास किरदार और कहानी ही नहीं है। नाचते-गाते, घूंसा मारते,कसरती बदन दिखाते और एक्शन दृश्यों में वे अच्छे लगते हैं, लेकिन यह सब टुकड़ों-टुकड़ों में ही भाता है। ऐसी फिल्मों में नायिकाएं सिर्फ शोपीस होती हैं। इस काम को दीपिका पादुकोण और चित्रांगदा सिंह ने बखूबी निभाया है। चित्रांगदा सिंह पहली कमर्शियल फिल्म के जोश में हैं। संजय दत्त अपने आयटम अपीयरेंस और संवादों से कुछ दर्शकों को अवश्य लुभएंगे। फिल्म का टायटल गीत ही याद रह जाता है।

फिल्म के अंत में देसी ब्वॉयज के सीक्‍वल का संकेत दे दिया गया है।

रेटिंग- ** दो स्टार

Friday, November 25, 2011

फैंटम के पीछे की सोच

फेंटम के पीछे की सोच-अजय ब्रह्मात्‍मज

मुंबई में आए दिन फिल्मों की लॉन्चिंग, फिल्म कंपनियों की लॉन्चिंग या फिल्म से संबंधित दूसरे किस्म के इवेंट होते रहते हैं। इनका महत्व कई बार खबरों तक ही सीमित रहता है। मुहूर्त और घोषणाओं की परंपरा खत्म हो चुकी है। कॉरपोरेट घराने शो बिजनेस से तमाशा हटा रहे हैं। वे इस तमाशे को विज्ञापन बना रहे हैं। उनके लिए फिल्में प्रोडक्ट हैं और फिल्म से संबंधित इवेंट विज्ञापन...। सारा जोर इस पर रहता है कि फिल्म की इतनी चर्चा कर दो कि पहले ही वीकएंड में कारोबार हो जाए। पहले हफ्ते में ही बड़ी से बड़ी फिल्मों का कारोबार सिमट गया है। इस परिप्रेक्ष्य में मुंबई के यशराज स्टूडियो में नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की लॉन्चिंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

यश चोपड़ा, यशराज फिल्म्स और यशराज स्टूडियो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी के साथ खास किस्म की फिल्मों के एक संस्थान के रूप में विख्यात है। पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य चोपड़ा के विजन से चल रहे इस संस्थान के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का लंबा इतिहास जुड़ा है। सफल और मशहूर यश चोपड़ा की फिल्मों ने ही समकालीन हिंदी सिनेमा की दिशा और जमीन तैयार की है। आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का नया अध्याय आरंभ होता है। आदित्य चोपड़ा की शैली और सोच ने मुख्य रूप से फिल्म इंडस्ट्री से निकले फिल्मकारों को प्रभावित किया। इस तरह के सिनेमा के उत्कर्ष के दिनों में ढेर सारे युवा फिल्मकारों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया। वे अपने साथ नई सोच और शैली लेकर आए। उनके सिनेमा को स्थापित फिल्मकारों के सिनेमा के साथ जगह नहीं मिली। यहां तक कि युवा फिल्मकारों को हतोत्साहित किया गया। उन्हें मौकों और पैसों से महरूम रखा गया, ताकि वे अपने ख्वाबों के सिनेमा को शक्ल न दे सकें।

ऐसे फिल्मकारों में अनुराग कश्यप काफी आगे और वाचाल रहे। उन्होंने अपनी फिल्मों और बयानों से स्थापित सिनेमा को चुनौती दी। उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। उनकी पहली फिल्म पांच अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। फिर भी अनुराग ने हिम्मत नहीं हारी। वे किसी तरह अपनी फिल्में और जगह बनाते रहे। पांव धरने की थोड़ी-सी जगह मिली, तो उन्होंने अपनी मौजूदगी से सभी को चौंका दिया। उनकी फिल्में पसंद की गईं। उससे भी बड़ी बात है कि अनुराग को नई सोच और परिवर्तन का प्रतीक माना गया। यह सच भी है, क्योंकि अनुराग कश्यप और उनके समकालीन फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को ताजगी दी है। हालांकि उन्हें फिल्म इंडस्ट्री के ढांचे में ही काम करना पड़ा और पुराने तरीके के बीच चलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी फिल्मों से स्पष्ट कर दिया है कि उनका सिनेमा हिंदी फिल्मों में कुछ जोड़ रहा है।

अनुराग कश्यप ने अपने मित्रों विक्त्रमादित्य मोटवाणी और विकास बहल के साथ नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की शुरुआत की है। इसमें उनके साथ विक्त्रम मल्होत्रा और मधु मंटेना भी हैं। पांचों ने मिलकर फैंटम की लॉन्चिंग के साथ नई फिल्म लुटेरा की घोषणा की। लुटेरा का निर्देशन विक्त्रमादित्य मोटवाणी कर रहे हैं। इसमें रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा की जोड़ी है। छठे दशक की पृष्ठभूमि पर बन रही लुटेरा पीरियड फिल्म है। फैंटम युवा फिल्मकारों की प्रोडक्शन कंपनी हैं, जिसका उद्देश्य नए विषयों पर अलग किस्म की नई फिल्में बनाना है। अनुराग कश्यप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभी तक हम निर्माताओं के दबाव में रहते हैं। हम अपनी समझ की फिल्में नहीं बना पाते हैं। फैंटम के जरिए कोशिश होगी कि किसी फिल्मकार पर कथित बाजार का दबाव न हो। चूंकि हम सभी क्त्रिएटिव व्यक्ति हैं, इसलिए भी उम्मीद की जा सकती है कि हमारा ध्यान फिल्म के बिजनेस से अधिक विषय पर होगा।

यशराज स्टूडियो में फैंटम प्रोडक्शन कंपनी की लॉन्चिंग वास्तव में पुरानी व्यवस्था की गोद से नई व्यवस्था का जन्म लेना है। हमें इस पहल का स्वागत करना चाहिए।

Monday, November 21, 2011

आफ़त होती है औरत-विद्या बालन





-अजय ब्रह्मात्‍मज

डांसिंग गर्ल सिल्क स्मिता के जीवन से प्रेरित फिल्म द डर्टी पिक्चरमें सिल्क की भूमिका निभाने की प्रक्रिया में विद्या बालन में अलग किस्म का निखार आया है। इस फिल्म ने उन्हें शरीर के प्रति जागृत, सेक्स के प्रति समझदार और अभिनय के प्रति ओपन कर दिया है। द डर्टी पिक्चरके सेट पर ही उनसे यह बातचीत हुई।

- चौंकाने जा रही हैं आप? पर्दे पर अधिक बोल्ड और थोड़ी बदतमीज संवाद बोलते नजर आ रही हैं। क्या देखने जा रहे हम?

0 बदतमीज तो नहीं कहूंगी। यह एक बेबाक लडक़ी का किरदार है। पर्दे पर उसे दिखाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। उसकी पर्सनैलिटी को सही कंटेक्स्ट में दिखाने के लिए ऐसा चित्रण जरूरी है। वह निडर लडक़ी थी। मैं नहीं कहूंगी कि यह सिल्क स्मिता के ही जीवन से प्रेरित फिल्म है। उस वक्त ढेर सारी डांसिंग गर्ल थीं। उनके बगैर कोई फिल्म पूरी नहीं हो पाती थी। उनके डेट्स के लिए काफी टशन रहती थी। हीरो-हीरोइन के डेट्स मिल जाते थे, लेकिन उनके गाने और समय के लिए फिल्मों की शूटिंग रुक जाती थी।

- हिंदी फिल्मों में डांसिंग गर्ल की परंपरा रही है। कुक्कू, हेलन आदि... सिल्क स्मिता के दौर में क्या खास बात थी?

0 हेलन और कुक्कू जी के जमाने में डांसिंग गर्ल की एक अलग डिग्निटी थी। नौवें दशक में डांसिंग गर्ल वास्तव में आयटम गर्ल के तौर पर इस्तेमाल होने लगीं। उस दौर में काफी लड़कियां आईं। उनमें सिल्क स्मिता पहली थीं। उन्हें सभी जानते हैं। नायलेक्स नलिनी, पॉलिएस्टर पद्मिनी आदि न जाने कितनी लड़कियां थीं, लेकिन सिल्क की बात अलग थी। इस फिल्म में मेरा नाम सिल्क ही रखा गया है। फिल्म में उनके जीवन के अंश जरूर हैं। वह अपने किस्म की पहली लडक़ी थीं। उन्होंने साफ कहा था कि मेरी बॉडी है। खुद को पॉपुलर करने या काम पाने के लिए मैं अपनी बॉडी का इस्तेमाल करूंगी मुझे इसमें कोई झिझक नहीं है। उन्होंने अपनी सेक्सुएलिटी को सेलिब्रेट किया। उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी। आज ढेर सारी लड़कियां पॉपुलैरिटी के लिए अपनी बॉडी और सेक्सुएलिटी का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उस जमाने में किसी ने बेझिझक और निडर होकर यह किया। इसके प्रति उनके मन में कोई अपराधबोध भी नहीं था। न सिर्फ कपड़ों और डांस में, बल्कि पूरे एटीट्यूड में वह बिंदास थीं। अपने काम पर उन्हें गर्व था। उन्होंने इसे शोषण की तरह नहीं लिया। पूरी समझदारी और सहमति के साथ उन्होंने अपने काम को एंज्वॉय किया। द डर्टी पिक्चरका एक संवाद उनके बारे में बताता है, ‘जिंदगी एक बार मिली है तो दो बार क्या सोचना?’ हर लम्हे का आनंद उठाती हैं सिल्क।

- द डर्टी पिक्चरआपकी पिछली फिल्म इश्कियासे काफी आगे है। क्या इस भूमिका को निभाते समय अभिनेत्री विद्या बालन के मन में कोई द्वंद्व भी रहा?

0 तब इश्कियामेरे लिए आगे की फिल्म थी। अभी द डर्टी पिक्चरकाफी आगे की फिल्म है। अभिनेत्री के तौर पर मैंने अपनी कोई सीमा तय नहीं की है। मैंने हमेशा कहा है कि अगर किरदार की जरूरत हो तो मैं कुछ भी कर सकती हूं। अगर किसी फिल्म में वेश्या का किरदार निभा रही हूं तो पहनावे और मिजाज में उसकी तरह लगूंगी। द डर्टी पिक्चरमें दर्शकों को रिझाने के लिए कुछ नहीं रखा गया है। किरदार निभाते समय मेरे मन में कोई द्वंद्व नहीं रहता। इस फिल्म के संवाद और कपड़ों में खुलापन है। इस फिल्म को करते समय मैंने महसूस किया कि जो बोल्ड और बिंदास होते हैं, वे सरल और सीधे भी होते हैं। वे डरते और मुकरते नहीं हैं। मेरे किरदार में एक मासूमियत भी है।

- इस फिल्म के लिए हां कहने की क्या वजह थी?

0 जब मिलन लूथरिया मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आए थे तो मैंने भी उनसे यही सवाल किया था कि मैं ही क्यों? उन्होंने कहा था कि फिल्म बन जाने के बाद मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम क्यों? फिलहाल मैं इस किरदार में और किसी को नहीं देख पा रहा हूं। मैंने मिलन की पिछली फिल्म वन्स अपऑन ए टाइम इन मुंबईदेखी थी। मैंने देखा कि मिलन किसी ट्रिकी सीन को भी वल्गर नहीं होने देते। इस फिल्म में वल्गैरिटी का बहुत स्कोप था, लेकिन उन्होंने बहुत संभाल कर शूटिंग की। इस फिल्म के प्रोमो देखकर लोग मुझ से कह भी रहे हैं कि मैं कहीं से भी वल्गर नहीं लग रही। उस जमाने में अंग प्रदर्शन और शरीर के झटकों में एक कामुकता और अश्लीलता रहती थी। मिलन ने यह सब नहीं होने दिया। इस फिल्म के दृश्यों को करते समय कभी नहीं लगा कि मैं गंदी या अश्लील हरकत कर रही हूं। मैंने सच्चाई के साथ किरदार को चित्रित किया। मैं भूल गई कि मेरी परवरिश क्या रही है। मैं व्यक्तिगत तौर पर क्या सोचती हूं।

- कुछ खास तैयारी करनी पड़ी? आप ने उस दौर की फिल्में देखीं या डांसिंग गर्ल का बारीक अध्ययन किया?

0 मिलन ने कहा था कि किसी तैयारी की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा था कि तुम हर सीन के हिसाब से रिएक्ट करना। पहले से सोच कर करोगी तो सब कुछ बनावटी और नकली दिखेगा। पहले ही दिन की शूटिंग के बाद महसूस हो गया था कि मैं किसी बंधन या दबाव में नहीं हूं। सिल्क को मैंने आत्मसात कर लिया था। मेरे लिए यह समझना जरूरी था कि बॉडी का इस्तेमाल गलत नहीं है और मेरा शोषण नहीं हो रहा है। अगर किरदार की नासमझी में होता या किसी दबाव में होता तो शोषण होता। सिल्क अपने समय से बहुत आगे थी। उसका कहना था कि यह मेरा शरीर है। मैंने अपनी मर्जी से इसका इस्तेमाल कर रही हूं। मुझे यकीन है कि फिल्म देखते समय दर्शक सिल्क की सच्चाई को समझ पाएंगे। वह कनेक्ट बन गया तो दर्शक भी किरदार को उसके बॉडी के पार जाकर देख सकेंगे।

- इस फिल्म के तीन मर्द नसीरुद्दीन शाह, इमरान हाशमी और तुषार कपूर की क्या भूमिकाएं हैं। क्या वे सिल्क के अलग-अलग पहलुओं को उद्घाटित करेंगे?

0 मैं लेखक रजत अरोड़ा का एक संवाद बोलूंगी -इतिहास में मर्दो का जमाना रहा है। औरतों ने आकर आफत की है।मर्द हर हाल में मर्द रहता है। औरत हर मर्द के साथ अपने रिश्ते के हिसाब से खुद को ढाल लेती है और फिर मैनीपुलेट करती है। वही मजेदार चीज है। औरत एक साथ मां, बेटी और बीवी होती है, लेकिन मर्द हर जगह मर्द ही रहता है। आप मानते हैं मेरी बात?

- शायद मैं सहमत न होऊं... मर्द भी रंग बदलते हैं... हो सकता है कि जेंडर भिन्नता की वजह से मैं आपकी तरह नहीं सोच सकता...

0 यह लंबा विवाद है। मर्द कभी औरत को नहीं समझ पाएंगे और औरतें भी मर्द को नहीं समझ पाएंगी। यह सिलसिला चलता रहेगा। औरत-मर्द का रिश्ता दोधारी तलवार है।

- मैं तीनों मर्दों से आप के किरदार के रिश्तों की बात पूछ रहा था...

0 नसीर बहुत ही मतलबी और स्वार्थी मर्द हैं। उनसे जरूरत का रिश्ता है। इमरान के साथ नफरत का रिश्ता है,लेकिन नफरत भी एक नजदीकी रिश्ता होता है। तुषार के साथ प्यार और संभाल का रिश्ता है। मैं तुषार को पनपने देती हूं। लेकिन तीनों ही आखिरकार मर्द हैं। उनका मेल इगोही रिश्ते को परिभाषित करता है।

- किरदार को निभाने में आप के और मिलन के अप्रोच में कोई फर्क रहा क्या? मिलन और उनके लेखक मर्द हैं। उन्होंने सिल्क के किरदार को अपने नजरिए से लिखा होगा। आप एक औरत हैं, सिल्क के किरदार को निभाते समय औरत के मिजाज को आप ने समझा होगा... कभी कोई अंतर नजर आया सोच और अप्रोच में?

0 मिलन और रजत के साथ कहानी और चरित्र को लेकर मेरी पूरी सहमति थी। उसे निभाने की जिम्मेदारी उन्होंने मुझ पर छोड़ दी थी। मिलन हमेशा कहते हैं कि 70 प्रतिशत मैं एक्टर पर छोड़ देता हूं। मैंने महसूस किया कि मिलन के साथ बहस और सवाल की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि उन्होंने स्टोरी समझदारी और उसे चित्रित करने का काम मेरे ऊपर छोड़ दिया। इस फिल्म को देखते समय आप निर्देशक और अभिनेत्री की परस्पर समझदारी देख पाएंगे। कई बार मेरे पोट्रेयल से किरदार के नए पहलू उद्घाटित हुए। मिलन भी चौंक जाते थे कि मुझे तो कुछ नया दिखा। मैंने खुद को पूरी तरह से उनके हवाले कर दिया था। पूर्ण समर्पण... उन्हें मुझ पर विश्वास था और मुझे उन पर उतना ही विश्वास था। कभी समझ में नहीं आया तो भी मैंने उनकी बात मानी। कई बार मेरे चित्रण को उन्होंने कबूल किया। सिल्क के किरदार को निभाते समय मैंने महसूस किया कि पांच किरदारों को एक साथ जी रही हूं। वह कभी बच्ची है तो कभी औरत है। कभी सेक्सुअल एनीमल है तो कभी नार्मल औरत है।

- आप फेमिनिस्ट नहीं हैं, फिर भी क्या सिल्क का किरदार औरत की मर्यादा के बाहर है या अगर मैं पूछूं कि लाज ही औरत की कहना हैजैसी सोच के विपरीत है सिल्क का किरदार... आप क्या सोचती हैं? मैं यह सवाल औरत विद्या बालन से पूछ रहा हूं।

0 सिल्क अपनी इज्जत का खयाल रखती है। वह आत्मसम्मान को महत्व देती है। उसकी मर्जी के खिलाफ उससे कुछ नहीं करवाया जा सकता। उसे नहीं लगता कि लाज का संबंध शरीर से है। वह सच्चाई से अपना काम कर रही है और दूसरों से इज्जत चाहती है। सिल्क के व्यक्तित्व में दोहरापन नहीं है। मेरे निभाए किरदारों में एक इज्जतदार औरत है सिल्क। वह अपने औरत होने का जश्न मनाती है। वह अपने काम के लिए शरीर दिखाती है, अंग प्रदर्शन करती है, लेकिन कहती है कि उसकी वजह से आप मेरा शोषण नहीं कर सकते। मुझे बदचलन या नीच औरत नहीं कह सकते। इस फिल्म में यही कोशिश है कि सिल्क महज एक शरीर नहीं है। मर्दों का नजरिया है कि औरत या तो सीता होती है या वेश्या होती है, लेकिन जैसा कि कहा गया है... तू कौन है तेरा नाम है क्या, सीता भी यहां बदमान हुई।

- इस फिल्म में सिल्क के किरदार को निभाने की प्रक्रिया में शरीर और सेक्सुएलिटी की आप की झिझक कितनी खत्म हुई या यह बताएं कि अब आप इन चीजों को किस रूप में देखती हैं?

0 मुझे लगता है कि शरीर को लेकर मैं सहज हो गई हूं। झिझक और खत्म हुई है। शरीर को लेकर अतिरिक्त रूप से सचेत नहीं हूं अब। एक्टर विद्या भी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। इस फिल्म से मुझे मुक्ति मिली है, मैं दायरों और सीमाओं से निकल गई हूं। अब मैं बंधन रहित हूं। अगर कैरेक्टर की डिमांड हो तो मैं 200 प्रतिशत तक योगदान कर सकूंगी।

- और आगे बढ़ कर पूछूं तो क्या किसी फिल्म में न्यूड सीन भी कर सकती हैं?

0 अश्लीलता के लिए हरगिज नहीं करूंगी, लेकिन राजा रवि वर्मा के लिए म्यूजका रोल है तो जरूर करूंगी। मुझे अगर वह किरदार अच्छा लगा तो कर सकती हूं। अभी तो यही कहूंगी कि मैं खुद को न्यूड सीन में नहीं देख पाऊंगी, लेकिन अगर किसी निर्देशक ने समझा दिया तो कर भी सकती हूं। सिल्क जिंदगी के हर लम्हे को मजेदार बनाना चाहती थी। वह आफत थी। उसे कोई अपराध बोध नहीं था। मैंने उसी रूप में पर्दे पर उसे जीवंत किया है। यह फिल्म दर्शकों को अच्छी लगेगी। इसमें हम सभी की महीनों की मेहनत है। इस फिल्म में मैंने बहुत कुछ दिया है। मुझे हमेशा गर्व रहेगा कि मैंने सिल्क का किरदार निभाया। मैं बहुत खुश हूं।

- आपकी मां और बहन की क्या प्रतिक्रिया सही?

0 मां की पहली प्रतिक्रिया थी कि तुम तो बिल्कुल पहचान में नहीं आ रही हो। मेरी बहन को बहुत अच्छा लगा। उसे मेरा काम पसंद आया। उसने कहा कि इसे निभाते समय तुम झिझकती तो पर्दे पर वह अश्लील लगता। तुम ने सच्चाई के साथ किया है, वह पर्दे पर दिख रहा है।

- अगली फिल्म?

0 सुजॉय घोष की कहानीपूरी हो चुकी है। वह जनवरी में रिलीज होगी। इस बीच मेरी तबियत खराब रही, इसलिए मैंने कोई फिल्म भी नहीं साइन की।

Thursday, November 17, 2011

प्रचार के नाम पर धोखाधड़ी

-अजय ब्रह्मात्मज


हिंदी फिल्मों के धुआंधार और आक्रामक प्रचार में इन दिनों निर्माता-निर्देशक और स्टार बहुत रुचि ले रहे हैं। नया रिवाज चल पड़ा है। रिलीज के पहले फिल्म के स्टारों के साथ इवेंट और गतिविधियां आयोजित की जाती हैं। ऐसे हर मौके पर फिल्म के स्टार और डायरेक्टर मौजूद रहते हैं। कोशिश रहती है कि उनकी इन गतिविधियों का टीवी पर भरपूर कवरेज हो। पत्र-पत्रिकाओं में तस्वीरें छप जाएं। फिल्म के प्रति दर्शकों की जिज्ञासा बढ़े और वे पहले वीकएंड में सिनेमाघरों का रुख करें। इन दिनों फिल्मों का बिजनेस पहले वीकएंड की कमाई से ही तय हो जाता है। ऐसा होने से पता चल जाता है कि फिल्म मुनाफे में रहेगी या घाटे का सौदा हो गई।

आपने कभी आक्रामक प्रचार अभियानों पर गौर किया है। इन अभियानों में स्टार फिल्म के बारे में बताने के अलावा सब कुछ करते हैं। फिल्म के गाने दिखाते हैं। बताते हैं कि शूटिंग में मजा आया। क्या-क्या मस्ती हुई? कहां-कहां शूट किया? शूटिंग में कौन लोग शामिल हुए और क्या नया कर दिया है? कभी तकनीक, कभी 3डी, कभी वीएफएक्स तो कभी ऐक्शन का कमाल..। सारी बातें इधर-उधर की होती हैं, हवा-हवाई..। पूरे प्रचार के बावजूद समझ में नहीं आता कि फिल्म में क्या है? यही कारण है कि दर्शकों को धोखा महसूस होता है, फिल्म जरा भी नापसंद आई तो दर्शक उखड़ जाते हैं। बड़ी से बड़ी फिल्म का कलेक्शन बिगड़ जाता है। ताजा उदाहरण रा.वन का है। फिल्म के जोरदार प्रचार और शाहरुख खान के होने के बावजूद फिल्म का बिजनेस अपेक्षा से कम रहा। दर्शकों ने वीएफएक्स, 3डी और नवीनता की तारीफ की, लेकिन कंटेंट, कहानी और संवाद की तो प्रशंसकों ने घनघोर आलोचना की। शाहरुख खान के मुरीद भी नाखुश दिखे। रा. वन ने निश्चित ही औसत से बेहतर व्यापार किया, लेकिन कलेक्शन उस अपेक्षित ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाया।

दर्शकों को महसूस होने लगा है कि फिल्मों का प्रचार किसी उपभोक्ता सामग्री के प्रचार की तरह ही हो गया है। साबुन के प्रचार में जैसे खुशबू की बात की जाती है, वैसे ही फिल्मों के प्रचार में दिखाने और पैकेजिंग पर जोर रहता है। ताज्जुब यह है कि आधारहीन प्रचार से दर्शक भी प्रभावित होते हैं। कई बार वे भी धोखे में आ जाते हैं। तीनों खानों ने फिल्म प्रचार को एक अलग स्तर पर पहुंचा दिया है। वे मानदंड बन गए हैं। हर नए स्टार पर दबाव रहता है कि वह भी उनकी तरह खुद को प्रचार में झोंक दे। अभी रॉकस्टार के प्रचार में शहर-शहर भटकते रणबीर कपूर, इम्तियाज अली और नरगिस फाकरी को हम देख रहे हैं। बेचारे कभी बस में घूम रहे हैं, कहीं रिक्शा चला रहे हैं और कभी अपनी फिल्मों के गानों का कंसर्ट कर रहे हैं। क्या इन गतिविधियों से उनके दर्शक बढ़ते हैं? अभी तक ऐसा कोई मापदंड नहीं आया है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि प्रचार से कितने दर्शक बढ़े। फिर भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि आक्रामक प्रचार से फिल्म की जानकारी बढ़ती है। दर्शकों को इतना पता चल जाता है कि कौन सी फिल्म कब आ रही है?

अच्छा होता यदि फिल्म के प्रचार अभियान में थोड़ी कंटेंट की जानकारी दी जाती। दर्शकों को पहले से फिल्म के बारे में मालूम हो तो फिल्म नापसंद आने पर भी उन्हें धोखाधड़ी का अहसास नहीं होगा। आम शिकायत है कि फिल्म के प्रोमोशन से फिल्म की कोई जानकारी नहीं मिलती। अब इधर ऐसा हो गया है कि फिल्म से जुड़े या प्रचार के दौरान इंटरव्यू में भी डायरेक्टर और ऐक्टर कहते हैं कि हम फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताएंगे। फिल्म की जानकारी देने के नाम पर वे कैरेक्टर की ऊपरी जानकारी भर दे देते हैं। भारत अनोखा देश है, जहां बगैर फिल्म देखे ही स्टारों से पत्रकार बातें करते हैं और फिल्मों के बारे में लिखते हैं। फिल्म रिलीज होने के बाद कोई स्टार या ऐक्टर सवाल-जवाब के लिए नहीं मिलता। फिल्मों का प्रचार वास्तव में दर्शकों को धोखे में रखने और फंसाने का जरिया बन गया है। फिलहाल इसमें सुधार की संभावना भी नहीं दिखती..।

Friday, November 11, 2011

फिल्‍म समीक्षा : रॉकस्‍टार

रॉकस्टार : हीर का मॉर्डन प्रेमी जार्डन-अजय ब्रह्मात्‍मज

युवा फिल्मकारों में इम्तियाज अली की फिल्में मुख्य रूप से प्रेम कहानियां होती हैं। यह उनकी चौथी फिल्म है। शिल्प के स्तर पर थोड़ी उलझी हुई, लेकिन सोच के स्तर पर पहले की तरह ही स्पष्ट... मिलना, बिछुड़ना और फिर मिलना। आखिरी मिलन कई बार सुखद तो कभी दुखद भी होता है। इस बार इम्तियाज अली प्रसंगों को तार्किक तरीके से जोड़ते नहीं चलते हैं। कई प्रसंगअव्यक्त और अव्याख्यायित रह जाते हैं और रॉकस्टार अतृप्त प्रेम कहानी बन जाती है। एहसास जागता है कि कुछ और भी जोड़ा जा सकता था... कुछ और भी कहा जा सकता था।

रॉकस्टार की नायिका हीर है और नायक जनार्दन जाखड़... जो बाद में हीर के दिए नाम जॉर्डन को अपना लेता है। वह मशहूर रॉकस्टार बन जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया में अंदर से छीजता जाता है। वह हीर से उत्कट प्रेम करता है, लेकिन उसके साथ जी नहीं सकता... रह नहीं सकता। कॉलेज के कैंटीन के मालिक खटाना ने उसे मजाक-मजाक में कलाकार होने की तकलीफ की जानकारी दी थी। यही तकलीफ अब उसकी जिंदगी बन गई है। वह सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी अंदर से खाली हो जाता है, क्योंकि उसकी हीर तो किसी और की हो चुकी है... छिन गई है उसकी हीर। क्या इम्तियाज अली ने वारिस शाह की हीर रांझा से प्रेरित होकर इस फिल्म की कहानी लिखी है? यहां भी हीर अमीर परिवार की खूबसूरत लड़की है और रांझा की तरह जॉर्डन संगीतज्ञ है। रांझा की जिंदगी में बाबा गोरखनाथ आए थे और अलख जगा गए थे। इस फिल्म में जॉर्डन उस्ताद जमील खान के संपर्क में आता है और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह की कव्वाली के दौरान उसके अंदर के तार बजते हैं।

ओरिजनल रांझा की तरह पूरी जिंदगी जॉर्डन भी भटकता रहता है और हीर से मिलकर भी नहीं मिल पाता।

इम्तियाज अली ने हीर रांझा की कहानी को आधुनिक परिवेश में हीर-जॉर्डन की कहानी बना दिया है। रॉकस्टार जनार्दन के जॉर्डन बनने की भी कहानी है। एक संगीतज्ञ और कलाकार की जेनेसिस के रूप में इसे देखें तो पाएंगे कि साधारण व्यक्ति की जिंदगी की साधारण घटनाएं ही कई बार व्यक्ति के अंदर असाधारण विस्फोट करती हैं और उसे विशेष बना देती है। रूपांतरण की यह घटना आकस्मिक नहीं होती। कलाकार इससे अनजान रहता है। जॉर्डन के जीवन का द्वंद्व, विरोधाभास और सब कुछ हासिल कर उन्हें गंवा देने की सहज प्रवृत्ति अविश्वसनीय होने के बावजूद स्वाभाविक है।

रॉकस्टार एक विलक्षण प्रेम कहानी भी है। हीर और जॉर्डन के बीच प्रेम पनपता है तो वह नैतिकता और अनैतिकता ही परवाह नहीं करता। दोनों अपने प्रेम की अनैतिकता को जानते हुए भी उसमें डूबते जाते हैं, क्योंकि वे विवश हैं। उनका रिश्ता सही और गलत के परे है। साथ आते ही उनके बीच जादुई रिश्ता बनता है, जो मेडिकल साइंस को भी झुठला देता है। तर्क के तराजू पर तौलने चलें तो रॉकस्टार में कई कमियां नजर आएंगी। इस फिल्म का आनंद इसके उद्दाम भावनात्मक संवेग में है, जो किनारों और नियमों को तोड़ता बहता है।।

यह फिल्म सिर्फ रणबीर कपूर के लिए भी देखी जा सकती है। रणबीर अपनी पीढ़ी के समर्थ और सक्षम अभिनेता हैं। उन्होंने जनार्दन की सादगी और जॉर्डन की तकलीफ को अचछी तरह चित्रित किया है। वे एक कलाकार के दर्द, चुभन खालीपन, निराशा, जोश, खुशी सभी भावों को दृश्य के मुताबिक जीते हैं। रॉकस्टार में उनके अभिनय के रेंज की जानकारी मिलती है। फिल्म का कमजोर पक्ष नरगिस फाखरी का चुनाव है। वह सुंदर हैं, लेकिन भावपूर्ण नहीं हैं। फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्यों को वह कमजोर कर देती हैं। सहयोगी कलाकारों में कुमुद मिश्रा और पियूष मिश्रा उल्लेखनीय हैं। दोनों सहज, स्वाभाविक और चरित्र के अनुरूप हैं।

इस फिल्म के गीत-संगीत की चर्चा पहले से है। इरशाद कामिल ने जॉर्डन की तकलीफ को उचित शब्द दिए हैं। उन्हें ए.आर. रहमान ने भाव के अनुरूप संगीत से सजाया है।

रेटिंग- *** 1/2 साढ़े तीन स्टार

Tuesday, November 8, 2011

संग-संग : मनोज बाजपेयी-शबाना रज़ा बाजपेयी




-अजय ब्रह्मात्मज

मनोज बाजपेयी और शबाना रजा बाजपेयी पति-पत्नी हैं। लंबे प्रेम के बाद दोनों ने शादी की और अब एक बेटी आवा नायला के माता-पिता हैं। शबाना को हिंदी फिल्मप्रेमी नेहा नाम से जानते हैं। मनोज और शबाना का मौजूदा परिवेश फिल्मी है,लेकिन उनमें दिल्ली और बिहार बरकरार है। दोनों कई मायने में भिन्न हमसफर हैं ...
मुलाकात और प्रेम का संयोग
शबाना - दिल्ली के एक दोस्त डायरेक्टर रजत मुखर्जी हैं। उनसे मिलने मैं उस पार्टी में गई थी। उन्होंने जबरदस्ती मुझे बुला लिया था। मेरी ‘करीब’ रिलीज हो चुकी थी। मनोज की भी ‘सत्या’ रिलीज हो गई थी। मैंने अपनी बहन और बहनोई (तब उनकी शादी नहीं हुई थी) के साथ ‘सत्या’ देख ली थी। मनोज ने ‘करीब’ देख ली थी।
मनोज - मैं ‘कौन’ की शूटिंग से लौटा था। उस फिल्म की शूटिंग केवल रातों में हुई थी। 9 -10 दिनों की रात-रात की शूटिंग से मैं थका हुआ था। मैं ठीक से सो नहीं पा रहा था। घर पहुंचा तो विशाल भारद्वाज का फोन आया कि रेखा (विशाल की पत्नी और गायिका)को पार्टी में जाना है, तू उसे लेकर चला जा। विशाल से दिल्ली की दोस्ती थी। वे कहीं और से पार्टी में आने वाले थे। इस तरह रेखा को लेकर मैं पार्टी में गया था। उस पार्टी में शबाना से मिलना हुआ। मिलते ही मुझे लगा कि ये तो मेरी बीवी हैं।
शबाना - सच कहूं तो मैं पार्टी में ज्यादा देर नहीं रुकने वाली थी और मनोज भी विशाल के आने तक रुकने का सोच कर आए थे,लेकिन हम दोनों ही पार्टी खत्म होने तक रुके रहे। वहां से निकलने के पांच घंटों के बाद मनोज का फोन आ गया और हम मिलने लगे। उस रात उतनी ही देर में ऐसा लगा कि इन्हें और जानना चाहिए।
मनोज - सिर्फ मेरे ही मन में यह खयाल नहीं आया। आप पूछ लें, शबाना के दिल में भी यही खयाल जगा था।
शबाना - उस रात कुछ अच्छा लग रहा था। हम दोनों ने ज्यादा बातें नहीं की थी, पर करीब रहना भा रहा था। कुछ हो गया था।

महसूस हुआ जुड़ाव, फिर भी रहे अलग
शबाना - कुछ घंटों में आप क्या महसूस करेंगे? बहुत मजबूत जुड़ाव फील हुआ। उसके पीछे कोई कारण या पुराना किस्सा नहीं था। कुछ हफ्तों के बाद मैंने खुद से ही सवाल पूछा कि कहीं यह कोई बहाव तो नहीं है? दिमाग ठीक है ना? दीवाने हुए जा रहे हैं।
मनोज - मन में सवाल तो उठ रहे थे कि यह सही है या नहीं है? हम समझ नहीं पा रहे थे। हमें शादी करने का फैसला लेने में पांच-छह साल लगे। हम दोनों एक-दूसरे के करीब हुए, अपनी जरूरतें समझीं और करिअर पर ध्यान दिया, लेकिन शादी के बारे में नहीं सोच सके।
शबाना - हम एक-दूसरे से सहज हो गए थे। साथ रहने पर सुकून महसूस करते थे ।
मनोज - हम दोनों आसपास ही अलग पतों पर रहते थे। आना-जाना रहता था। कभी-कभार मैं इनके यहां रुक जाता था। कभी पार्टियों के बाद शबाना मेरे पास ठहर जाती थीं।
शबाना - हम दोनों करीब थे, लेकिन हमारी परवरिश और सोच में बगैर शादी किए साथ रहने वाली बात नहीं थी। शायद हमारे परिवारों को बात उतनी अच्छी नहीं लगती ... हालांकि उनकी तरफ से ऐसा कोई विरोध नहीं था।
मनोज - हमें अपने माता-पिता की संवेदनाओं का खयाल रखना था। माडर्न लुक और सोच के बावजूद पारिवारिक मूल्यों के साथ संतुलन बिठाना था। शबाना के माता-पिता स्वीकार कर भी लेते, लेकिन मेरे माता-पिता को यह बात अच्छी नहीं लगती। मेरा परिवार थोड़ा रूढि़वादी और पारंपरिक था। मुझे बदलने में सालों लगे। मैं उनसे नहीं कह सकता था कि ट्रेन से दिल्ली या मुंबई में उतरते ही बदल जाएं। हम दोनों ने अपने और उनके पक्ष को जोड़ा और संतुलन बनाए रखा।

समानताएं
शबाना - हमारे राजनीतिक और सामाजिक विचार काफी मिलते-जुलते हैं। हमारे सोचने का ढंग एक जैसा है। नैतिकता के लिहाज से भी हम काफी चीजों को हम समान रूप में देखते हैं। लड़ाइयां हो सकती हैं। कई बार हम बिल्कुल अलग तरीके से भी सोचते हैं। तब मैं कहती हूं कि मैं अभी आप की बात नहीं समझ पा रही हूं। मुझे थोड़ा वक्त दें।
मनोज - ज्यादा जानकारी हासिल करने ... ज्ञान की खोज में हम दोनों समान हैं। शबाना बहुत ज्यादा पढ़ती हैं। मैं उतना नहीं पढ़ता। अच्छी बात है कि शबाना मेरे पैशन को समझती हैं। मेरा जो ‘पैशन फॉर एक्टिंग एंड लाइफ’ है, उसे समझती है। मां-पिता ने मुझे पैदा किया। वे मेरी भावनाओं को समझते हैं और हमें अपने ढंग से जीने देते हैं। लेकिन शबाना मेरे पैशन को समझती हैं। खुद एक्ट्रेस हैं तो उस पागलपन को समझती हैं। मैं जिस उन्मादी और उग्र रंगमंच की पृष्ठभूमि से आया हूं, वह उन्हें मालूम है। एक्टर को जो स्पेस और एकांत चाहिए, वह मुझे मिल जाता है।
शबाना - हां, लेकिन मेरा मन करता है या कोई आलतू-फालतू बात भी करनी है तो मैं उस एकांत को तोड़ देती हूं। ऐसे वक्त मैं मनोज मेरी भावनाओं को समझते हैं। साथ घूमने चलते हैं। बातें करते हैं।
मनोज - शादी के पहले शबाना मेरे व्यक्तित्व में जो चीजें नहीं चाहती थीं उसे हटाने में ...
शबाना - हटाने में नहीं ... मेरे साथ उसका तालमेल बिठाने में कहें ... हम मिलने के साथ ‘जिंदगी के चक्र’ में फंसने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थे। शादी करने के साथ जिम्मेदारियां शुरू हो जाती हैं। मनोज भी हड़बड़ी में नहीं थे।
मनोज - हम दोनों अपने कुंवारेपन का पूरा आनंद उठा रहे थे और साथ भी थे। शबाना - शादी करने के दो-तीन साल पहले से मन तो बन गया था, पर किसी न किसी वजह से टाल देते थे। यह तो मालूम था कि शादी के बाद जिम्मेदारी निभानी ही पड़ेगी।

रोमांस और विवाह
मनोज - हमारा प्रेम रोमियो-जूलियट टाइप नहीं था। हम दोनों मैच्योर थे। एक-दूसरे की जरूरत और सान्निध्य समझते थे। विवाह के लिए हम पर दबाव भी नहीं था। रोमांस चल रहा था।
शबाना - हमारे परिवारों ने स्वीकार कर लिया था हमें। अब यह हम पर ही था कि कब शादी करें? सच बताऊं कि शादी क्यों की? हम घर के लिए लोन लेने गए थे। बैंक अधिकारी ने समझाया कि आप दोनों तो शादीशुदा नहीं हैं तो आपको संयुक्त बैंक लोन नहीं मिल सकता। ऐसी ही कुछ और समस्याएं आईं, जिनमें शादी के सर्टिफिकेट की मांग थी। फिर ..;
़मनोज - हमने फैसला लिया कि चलो कर लेते हैं ...
शबाना - शादी तो हम करते ही, ऐसी मांगों ने शादी की जरूरत बढ़ा दी। लगा कि लोग भी क्या-क्या पूछते रहते हैं ...चलो सब को चुप कर दो शादी कर लो ...

चित्त पर चढ़े गुण
मनोज - शबाना बहुत पढ़ती हैं। इतनी समझदारी का मैं कायल हूं। अपने निजी और घरेलू काम खुद करने की आदत इन्होंने मेरे अंदर डाली। इन्होंने अपनी मां और पिता से बहुत कुछ ग्रहण किया है और उसे अपने जीवन में ढाला है। शबाना पारंपरिक होते हुए भी अपारंपरिक हैं। मेरी जद्दोजहद यही रही है कि गांव का कितना अपने पास रखूं और शहर का क्या फेंकूं ... बाकी खूबसूरत हैं। यह सभी जानते हैं। हम दोनों अलग धर्मों के हैं, लेकिन इन्हें पता है कि कहां धर्म को पीछे छोड़ दिया जाए। मैं भगवान में विश्वास करता हूं। पूजा करता हूं। मैंने शबाना से सीखा है कि निजी और पारिवारिक रिश्तों में कैसे धर्म को अलग रखा जाए।
शबाना - मुझे मनोज का पैशन बहुत प्रेरित करता है। शुरू से अभी तक ऐसे ही हैं। इनके हाथ कोई अच्छी स्क्रिप्ट आती है और ये उसकी तैयारी करते हैं तो पूरे घर में क्रिएटिविटी नजर आती है। तब ये अजीब-अजीब हरकतें करने लगते हैं। कई बार स्टारकास्ट वाली फिल्म की स्क्रिप्ट आती है और नापसंद होने पर भी ये हां कहते हैं तो मैं समझ जाती हूं ... मैं कहती हूं, हम कैसे भी घर चला लेंगे, लेकिन यह फिल्म मत करो। कभी कुछ ऐसा किया तो ये नाखुश हो जाते हैं। असहनीय हो जाते हैं। बीमार हो जाते हैं। मनोज नारी स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर संजीदा और आक्रामक हैं। उनके मुद्दों को गहराई से समझते हैं। कई लोग कहने-सुनने के लिए बड़ी बातें करते हैं। लेकिन खुद मर्दवादी होते हैं। इनके जैसे पुरुष कम मिलेंगे। इन्होंने कभी मुझे अधिकार और नियंत्रण में रखने की कोशिश नहीं की। कई बार गाइड करने के नाम पर मेरी ख्वाहिशों को मैनीपुलेट जरूर किया है ़ ़ ़ मैं इतनी बेवकूफ नहीं हूं कि न समझूं।
मनोज - हम ने परिवार में कुछ मूल्य रखे हैं। हम दोनों उनका पालन करते हैं। उसमें बराबरी का दर्जा है।
शबाना - मेरी एक बहन है। अगर हम दोनों भी साथ रहने लगे तो जरूर लड़ेंगे। खूब लड़ेंगे, लेकिन क्या उस लड़ाई की वजह से अलग हो जाएंगे? वैसा ही पति-पत्नी के साथ क्यों नहीं होता? दो व्यक्तियों के संबंध में सब कुछ गुलाबी नहीं होता। ग्रे को भी जगह मिलनी चाहिए।
मनोज - यह मान कर चलना बेवकूफी होगी कि कभी झगड़ा नहीं होगा। मतभेद और झगड़े होते हैं, लेकिन सहमति भी बहुत मजबूत होती है। एक ही दिन में सब कुछ हो जाता है। हम जब एक-दूसरे की कमजोरियों के आदी हो जाएं। उसे व्यक्तित्व का हिस्सा मान लें तो जिंदगी आसान हो जाती है।
शबाना - कुछ बातों पर तो रोज ही झगड़ा होता है। अब जैसे कि इनसे दरवाजा खुला छूट जाता है और मैं रोज उलाहना देती हूं, लेकिन फिर से वही बात होती है। उन छोटी लड़ाइयों का कोई समाधान नहीं है। मैं अपने माता-पिता को देखती हूं। वे सालों से एक ही बात पर लड़ रहे हैं ... मुझे लगता है कि उस वक्त में वह बहुत चिढ़ पैदा करता है, लेकिन बाद में याद करने पर हंसी आती है।

असुरक्षा और अपेक्षा
शबाना - हम ने बहुत पहले साफ कर लिया था कि हम साथ में इसलिए रहते हैं कि रहना चाहते हैं। किसी का अफेयर होता है या शादी टूटती है तो वह भी होकर रहेगा। उसके बारे में क्या सोचना? अगर कुछ हो रहा है और मुझे नहीं पता है तो नहीं पता। अगर पता चल भी गया तो उस समय क्या करूंगी ... यह अभी नहीं पता। उसके बारे में अभी क्यों सोचूं? आज की रात की नींद क्यों खराब करूं? निस्संदेह मुझे पसंद नहीं होगा कि मनोज का कोई अफेयर हो। इन्हें भी पसंद नहीं होगा कि मैं किसी और के प्रति ज्यादा आकर्षण महसूस करूं।
मनोज - साथ रहने के फैसले के बाद यह सब खयाल आता ही नहीं। भावनात्मक जुड़ाव किसी प्रकार की असुरक्षा पैदा नहीं होने देती।
शबाना - अपेक्षा क्या होगी? साथ रहें, खुशहाल रहें।

अहम फैसले और ना या हां
शबाना - हर फैसला स्थिति पर निर्भर करता है। हम देखते हैं कि अच्छा ख्याल या विकल्प किस का है। छोटी बातों में एक-दूसरे की पसंद और भावनाओं का दोनों ही खयाल रखते हैं। ज्यादातर फैसले सतह पर मनोज लेते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे मैं रहती हूं।
देखते ही लगा यही तो है हमसफर: मनोज बाजपेयी-शबाना रजामनोज - जी ... हा हा हा ... एक दायरे में मुझे आजादी रहती है।
शबाना - कई बार अटक भी जाते हैं। मामूली चीज पर ... कई बार सुबह उठने के बाद से ही अटकने में मूड में रहते हैं। बिला वजह फालतू की लड़ाई में भिड़ गए और फिर याद करते हैं कि उस बार भी तुमने यही किया था। इसके बावजूद शाम तक यह एहसास तारी हो जाता है कि न न मैं गलत थी। तुम बैठो, मैं चाय बना कर ले आती हूं या ले आता हूं। ज्यादातर सॉरी मैं बोलती हूं। मेरी कोशिश रहती है कि लड़ाई के साथ सोना न हो। अगर झगड़ा हुआ है तो निबटा लें ... लेकिन ये ...
मनोज - कुढ़ू हैं ... कुढ़ता रहता हूं यही न?
शबाना - मनोज कई बार समस्याओं को अंदर में पालते-पोसते और चारा डालते हैं। उसे बड़ा करते हैं। आवा के आने के बाद मैंने तय किया है कि इन्हें टेढ़े मूड में देखने पर शुरू से ही शांत कर देती हूं। इनकी हर बात को सही कहने लगती हूं... आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।
मनोज - फिर बारह बजते-बजते यह लगने लगता है कि कहीं मैं पागल तो नहीं हो गया हूं कि मैं कुछ भी बोले जा रहा हूं और शबाना रिएक्ट ही नहीं कर रही हैं।
शबाना - मैं हमेशा कहती हूं कि आओ बात करें, लेकिन मनोज बहुत प्रायवेट हैं। शेयर नहीं करते ... मैंने किसी और से शेयर किया तो भी इन्हें बुरा लगता है।
मनोज - मैं तो ढेर सारे मामलों पर भाई-बहन या मां-पिता से भी बातें नहीं करता। मुझे लगता है कि आपस में ही बातें कर लेनी चाहिए। हम निजी और सार्वजनिक मुद्दों पर भी बातें करते हैं। शबाना हमेशा सलाह देती हैं ... मैं मानूं या न मानूं।
शबाना - मनोज बड़ी अच्छी तरह कई बार मेरी सलाह नजरअंदाज कर देते हैं। मैं बुरा भी नहीं मानती।

काम और परिवार
शबाना - हम स्पष्ट जानते हैं कि मेरा कुछ चल नहीं रहा है। मैं पहले भी व्यस्त नहीं थी। आज कल कुछ नहीं चल रहा है। समझौते की स्थिति नहीं है। मैं बहुत महत्वाकांक्षी थी, लेकिन इंडस्ट्री का रवैया मेरी समझ में नहीं आया। अभी तो आवा को पाल रही हूं।
मनोज - हम दोनों की बीच कोई ‘अभिमान’ जैसी स्थिति तो बिल्कुल नहीं है। शबाना को मेरे काम की कामयाबी में अपनी कामयाबी दिखाई पड़ती है। यह बहुत कमाल की बात है। मेरे बहुत सारे अच्छे दोस्तों में भी यह क्वालिटी नहीं है। कई बार सोचता हूं कि क्या मैं शबाना की स्थिति में होता तो क्या खुश हो पाता? शायद नहीं हो पाता। शबाना की परवरिश और पर्सपेक्टिव का असर है। शबाना मेरी फिल्मों के प्रीमियर पर अवश्य जाना चाहती हैं।
शबाना - मनोज कभी अव्यवस्थित नहीं रहे। इन्होंने कभी तनाव नहीं दिया। ये बहुत पॉजीटिव हैं। बदनतोड़-दिमागतोड़ मेहनत करने पर खुश होते हैं। प्रतिकूल स्थिति होने पर ये और व्यवस्थित हो जाते हैं। सब कुछ रूटीन से होने लगता है। जल्दी हताश नहीं होते। अपने काम में इन्वॉलव होते हैं। केवल खुद में नहीं रहते। ये आत्मकेंद्रित नहीं हैं।
मनोज - समय और रूटीन के पाबंद होने की कोशिश करता हूं।
शबाना - मनोज बहुत अच्छा सोते हैं। क्रिएटिव लोगों को नींद नहीं आती, लेकिन मनोज अच्छी तरह सोते हैं।

विस्तृत परिवार
शबाना - मनोज का परिवार बहुत बड़ा परिवार है। मनोज की जिंदगी में मेरे आने के पहले मनोज का परिवार इनसे हाथ धो चुका था। उन्होंने समझा लिया था कि से ऐसे ही है - सुधरेंगे नहीं। हमारी मुलाकात को पंद्रह दिन भी नहीं हुए थे और मैं इन्हें लेकर अपने मम्मी-पापा से मिलाने चली गई थी। मैंने इशारा कर दिया था कि वे समझ लें कि हम दोनों काफी सीरियस हैं।
मनोज - मैं इन्हें लेकर अपने गांव गया था। छोटी बहन की शादी थी ... ‘शूल’ की शूटिंग का वक्त था। तभी हमलोग गए थे। सभी से मिलवा दिया।
शबाना - अब चूंकि परिवार के लिए मनोज गए-गुजरे थे, इसलिए उनकी दोस्त या होने वाली बीवी भी गई गुजरी होगी। उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। धर्म को लेकर समस्या रही भी हो तो उन्होंने कभी कहा नहीं।
मनोज - शबाना के दूसरे धर्म के होने की वजह से वे चिंतित जरूर हुए होंगे, लेकिन उन्होंने कभी जाहिर नहीं किया। कोई नाखुशी नहीं जाहिर की।
शबाना - मनोज के बारे में उनकी सोच थी कि कौन इनके मुंह लगेगा।
मनोज - शबाना का परिवार काफी खुला और उदार था। उनका स्पष्ट कहना था कि धर्म से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।
शबाना - मेरे मम्मी-पापा कि एक ही चिंता थी कि लडक़ा अच्छा और तमीजदार हो। मेरी बेटी को ठीक से रखे। उसके आगे-पीछे उनकी चिंता नहीं थी।
मनोज - शबाना की छोटी बहन की शादी पंजाबी परिवार में हुई है। इनका परिवार मॉडर्न है। शहरों में भी पिछड़े लोग रहते हैं, लेकिन इनका परिवार आधुनिक है। सच कहें तो गांव से ज्यादा रूढि़वादी लोग शहरों में रहते हैं। शबाना का परिवार काफी सीमित है। उन्हें किसी को जवाब नहीं देना होता है। अभी मैंने तय किया है कि हर ईद पर मैं दोस्तों को बुलाया करूंगा। दीवाली पर पूजा होती रही है। अब से ईद भी मनेगी।
शबाना - धार्मिक आस्था है, लेकिन हम एक-दूसरे की विधि में कोई हस्तक्षेप नहीं करते।

संदेश
शबाना - नए लडक़े-लडक़ी शादी को बहुत व्यावहारिक रूप में लेते हैं। वे अपने काम और परिवार के साथ तालमेल की संभावनाएं देख कर मम्मी-पापा को बता देते हैं और उनसे ही कहते हैं कि आप खोज दो। मैं देख रही हूं कि रोमांस और प्रेम के लिए उनके पास समय ही नहीं है। वे अपने करिअर पर ध्यान देना चाहते हैं। उन्हें रिश्ता भी रेडीमेड चाहिए। मुझे लगता है कि उन्हें थोड़ा वक्त निकालकर आपसी रिश्ते को मजबूत करना चाहिए।
मनोज - आदमी अच्छा हो ... लडक़ा या लडक़ी कोई भी हो। दूसरे के परिवार के प्रति भी आदर भाव हो। पारंपरिक शादी में पूरा परिवार जुड़ता है। प्रेमविवाह में शादी के साथ खुद चुनने पर बाद में यह संबंध बनाना पड़ता है।

Thursday, November 3, 2011

ऑन स्‍क्रीन ऑफ स्‍क्रीन :आधुनिक स्त्री की पहचान हैं करीना कपूर

आधुनिक स्त्री की पहचान हैं करीनाबेबो ही नाम है उनका। घर में सभी उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एक प्रकार से उनके घर का विस्तार है, इसलिए इंडस्ट्री उन्हें प्यार से बेबो बुलाती है। सार्वजनिक स्थानों पर औपचारिकता में भले ही फिल्म बिरादरी उन्हें करीना नाम से संबोधित करती हो, लेकिन मंच से उतरते ही, कैमरा ऑफ होते ही और झुंड में शामिल होते ही वह सभी के लिए बेबो हो जाती हैं।

तोडी हैं कई दीवारें

करीना कपूर का अपने सहयोगी स्टारों से अनोखा रिश्ता है। खान त्रयी (आमिर, सलमान और शाहरुख) के अलावा अजय देवगन उन्हें आज भी करिश्मा कपूर की छोटी बहन के तौर पर देखते हैं। मतलब उन्हें इंडस्ट्री में सभी का प्यार, स्नेह और संरक्षण मिलता है। अपने सहयोगी के छोटे भाई-बहन से हमारा जो स्नेहपूर्ण रिश्ता बनता है, वही रिश्ता करीना को हासिल है। मजेदार तथ्य है कि इस अतिरिक्त संबंध के बावजूद उनकी स्वतंत्र पहचान है। वह सभी के साथ आत्मीय और अंतरंग हैं। पर्दे पर सीनियर, जूनियर व समकालीन सभी के साथ उनकी अद्भुत इलेक्ट्रिक केमिस्ट्री दिखाई पडती है। आमिर से इमरान तक उनके हीरोज की लंबी फेहरिस्त है।

हिंदी फिल्मों की अघोषित खेमेबाजी छिपी नहीं है। खानत्रयी व दूसरे अभिनेता अपनी पसंद की हीरोइनों के साथ काम करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि विरोधी खेमे की करीबी हीरोइनों को वे मौका न दें। अभी के माहौल में केवल करीना कपूर ही खेमों की दीवार तोडकर सभी की फिल्मों में नजर आती हैं। अभी ईद के मौकेपर आई उनकी फिल्म बॉडीगार्ड के हीरो सलमान खान थे। नवंबर में रिलीज हो रही फिल्म रा.वन के हीरो शाहरुख हैं तो अगले साल आमिर के साथ उनकी धुआं रिलीज होगी। तीनों खानों से तालमेल बिठाकर वह उनकी कामयाबी का हिस्सा बन रही हैं। फिलहाल देखने से यही लग रहा है कि जो भी हीरो करीना के साथ आ रहा है, वह कामयाब हो रहा है। पिछले दिनों 100 करोड की कामयाबी व कलेक्शन का काफी शोर हुआ। इस संदर्भ में देखें तो 3 इडियट्स, गोलमाल रिट‌र्न्स और बॉडीगार्ड की हीरोइन करीना हैं, जबकि तीनों फिल्मों के अलग-अलग हीरो हैं, आमिर खान, अजय देवगन, सलमान खान। आज की सफलता के इसी उदाहरण को कुछ सालों पहले तक फ्लॉप फिल्मों की हिट हीरोइन कहा जाता था।

अभिनय के प्रति संजीदा

पिछले दिनों एक बातचीत में मैंने उनसे इस तालमेल के मंत्र के बारे में पूछा था। उनका सीधा सा जवाब था, मुझे उनके व्यक्तिगत राग-द्वेष से कोई मतलब नहीं। मैं अपना रोल देखती हूं। अछा लगता है तो हां करती हूं और अपना काम पूरी संजीदगी व ईमानदारी से करती हूं। न मैं किसी के कान भरती हूं और न उनके बीच के बनते-बिगडते समीकरण पर ध्यान देती हूं। सैफ अली खान को इससे फर्क नहीं पडता कि मैं किस हीरो के साथ फिल्म कर रही हूं। मैं प्रोफेशनल और इंडिपेंडेंट अभिनेत्री हूं। अपने करियर के फैसले खुद ले सकती हूं। करीना के बारे में कहा जाता है कि वह रोल हथियाने के लिए लॉबिंग या चापलूसी नहीं करतीं। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, मैं करीना कपूर हूं। कपूर खानदान की बेटी हूं। किसी फिल्म या रोल के लिए मुझे डायरेक्टरों के घर जाकर खाना बनाने या उनके साथ शॉपिंग पर जाने की जरूरत नहीं है। अगर कोई मुझे अपनी फिल्म में चुनना चाहता है तो मेरे पास आएगा। करीना मशहूर फिल्म निर्देशक करण जौहर के बेहद करीब हैं, लेकिन उन्होंने कभी करण पर दबाव नहीं डाला कि वे हर फिल्म में उन्हें रखें। उनकी स्पष्ट राय है, अगर करण को अपनी फिल्म में मेरी जरूरत होगी तो वे अवश्य बुलाएंगे। मैं उनके प्रोफेशनल फैसलों का स्वागत करती हूं। करीना कपूर ने अपने दौर के सभी बडे निर्देशकों के साथ काम किया है। निश्चित ही वह कपूर खानदान का नाम रोशन कर रही हैं। मेहनत और प्रतिभा के दम पर उन्होंने खास पहचान हासिल की है। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि कपूर खानदान का होने की वजह से करीना को फिल्में मिलती हैं। अपनी फ्लॉप व साधारण फिल्मों में भी वह कभी कमजोर नहीं दिखतीं। करीना कपूर अपनी पीढी की सशक्त अभिनेत्री हैं।

मां की महत्वाकांक्षा का नतीजा

करीना छोटी उम्र से ही बहन करिश्मा के साथ शूटिंग में आने लगी थीं। उनकी मां बबीता भी साथ होती थीं और कभी-कभी करीना भी आती थीं। बचपन व किशोरावस्था में ही उन्होंने उन गलियों को छान मारा, जिनसे वयस्क होकर अभिनेत्री बनने के बाद उन्हें गुजरना था। यही वजह है कि उन्हें करिश्मा की तरह संघर्ष नहीं करना पडा। उल्लेखनीय है कि बबीता ने जिद व करिश्मा की चाहत के मेल के लिए कपूर खानदान की परंपरा तोडी थी। पृथ्वीराज कपूर के समय से ही कपूर खानदान की बहू-बेटियों ने फिल्मों में काम नहीं किया। शशि कपूर की पत्नी एक अपवाद थीं, जिन्होंने थिएटर और फिल्मों में छिटपुट अभिनय किया। खानदान की कथित मर्यादा को भंग करने की इस हिमाकत के लिए करिश्मा को ताने व तनाव सहने पडे। लेकिन बबीता ने उन्हें हिम्मत दी। लंबे अभ्यास से उन्होंने अभिनय को संवारा और यश चोपडा और श्याम बेनेगल सरीखे निर्देशकों की चहेती बनीं। करीना ने बडी बहन की जद्दोजहद को करीब से देखा और सबक की गांठें बांधती गई। बेबो को स्टार बनने व चमकने में वक्त नहीं लगा।

आत्मविश्वास से भरपूर

टूटे परिवारों से आए बचों में रिक्तता व अकुलाहट रहती है। करीना के माता-पिता में घोषित तलाक नहीं हुआ, लेकिन काफी पहले से दोनों अलग रहे। बबीता ने अकेले बेटियों को पाला। शायद इसी कारण करीना एक मजबूत पर्सनैलिटी के तौर पर उभरीं। स्वतंत्र स्वभाव के साथ ही परिवार की संरक्षक बन गई। मां की सीख में खुद को और परिवार को प्रोटेक्ट करने में रक्षा कवच बन गई। बडी बहन करिश्मा की तरह उन्हें झेलना नहीं पडा, इसलिए उनकी आवाज एवं पर्सनैलिटी में खालीपन नहीं है। आत्मविश्वास से भरपूर लडकी की तरह वह जीवन, करियर और भविष्य के फैसले ले सकती हैं। करीना के शब्द मुझे याद हैं, पहले जब हम दोनों बहनों के फिल्मों में आने की बात चली तो पापा बहुत तनाव व दबाव में थे। हमने उनसे वादा किया था कि हम खानदान का नाम रोशन करेंगे। अब जब हम पापा के साथ बैठते हैं तो पुरानी बातें याद करने पर उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। वे कहते हैं कि मेरी बेटियों ने हीरो जैसा काम किया। साथ ही करीना मां की भूमिका को रेखांकित करती हैं, क्योंकि हमने जो भी पाया है, मां के आशीर्वाद से हमें मिला है।

करीना के करियर पर नजर डालें तो उनकी पहली फिल्म रिफ्यूजी थी कुछ लोग जानते हैं कि रितिक की पहली फिल्म कहो ना प्यार है के लिए राकेश रोशन ने पहले उनका चुनाव किया था। बबीता से सहमति न होने से फिल्म में अमीषा पटेल आ गई। करीना को इसका अफसोस नहीं रहा। रिफ्यूजी की रिलीज के पहले करीना ने एक इंटरव्यू में बताया था, राकेश जी अपने बेटे को लॉन्च कर रहे थे। उनका बेटा तो स्टार बन गया लेकिन लडकी को फायदा नहीं हुआ।

प्रोड्यूसरों की लाइन लडके के घर के बाहर लगी है, लडकी के घर के बाहर नहीं। फिर मैं क्यों अफसोस करूं? वह तब रिफ्यूजी से खुश थीं। तब बचन परिवार के लडके व कपूर परिवार की लडकी की लॉन्चिंग थी। उन दिनों अभिषेक और करिश्मा के रोमैंस की भी खबरें आ रही थीं। फिल्म इंडस्ट्री के लिए रिफ्यूजी एक बडी घटना थी। हालांकि अभिषेक-करिश्मा की मंगनी टूटने से दोनों परिवारों के रिश्ते में खटास आ गई थी, लेकिन करीना ने अमिताभ बचन या अभिषेक के लिए कभी अनादर नहीं प्रकट किया। वह हर रिश्ते को अपने ढंग से जीती हैं।

मॉडर्न व सहज

बहरहाल करीना के करियर की नाव सफलता की लहरों तक आने के पहले डगमगाती रही। बीच-बीच में वह समीक्षकों व दर्शकों को प्रभावित करती रहीं, लेकिन सही स्टारडम उन्हें जब वी मेट की बंपर सफलता से मिला। इस फिल्म में इम्तियाज अली ने करीना की स्वत: स्फूर्त प्रतिभा का संपूर्ण उपयोग किया। गीत जब कहती है कि मैं अपनी ही फैन हूं तो उसमें एरोगेंस से ज्यादा स्वाभिमान झलकता है। चमेली की शीर्षक भूमिका और ओमकारा की डॉली की भूमिका में उन्होंने कई पुरस्कार जीते। उन्होंने साबित किया कि संवेदनशील निर्देशक व किरदार में गहराई हो तो वह डूबने से नहीं कतरातीं। करीना से आप गिफ्ट में सिर्फ तीन फिल्में मांगें तो वह चमेली, ओमकारा और जब वी मेट ही देंगी।

करीना के आलोचकों का एक समूह मानता है कि स्वछंद जिंदगी के मोह में करीना करियर पर पूरा ध्यान नहीं देतीं। समकालीन अभिनेत्रियों में वह अकेली हैं, जो एक साथ चमेली व टशन जैसी भूमिकाएं निभा सकती हैं। ओमकारा की डॉली और कमबख्त इश्क की बेबो को पर्दे पर जीवंत कर रही एक ही अभिनेत्री है करीना.. यकीन नहीं होता। करीना नहीं मानतीं कि वह करियर के प्रति लापरवाह हैं। वह गंभीर, हलकी-फुल्की और बिलकुल मॉडर्न भूमिकाओं के बीच संतुलन बिठा कर चलना चाहती हैं। न तो उन्हें घोर कमर्शियल फिल्मों से परहेज है और न सीरियस किस्म की फिल्मों से अतिरिक्त लगाव है। करीना मानती हैं, मेरे पास अभी वक्त है। मैं दर्शकों को हर तरह से संतुष्ट करने के बाद ही अपनी पसंद की फिल्में करूंगी। समर्थकों व प्रशंसकों को मैं बताना चाहूंगी कि मैं कभी दो गाने या दो सीन की फिल्में नहीं करूंगी। बॉडीगार्ड जैसी फिल्म में भी मेरे लिए कुछ था। अब तो निर्देशक भी जानते हैं कि करीना को लेना है तो रोल कायदे से लिखना पडेगा।

करीना के प्रेम प्रसंगों को तब विराम मिल गया, जब वह सार्वजनिक जगहों पर भी शाहिद कपूर के साथ दिखने लगीं। उन्होंने अपने संबंध को पारदर्शी रखा और शाहिद से अपनी अंतरंगता को छिपाने की कोशिश नहीं की। दोनों के प्रेम संबंधों का सुंदर नतीजा जब वी मेट है। इसमें करीना व शाहिद की जोडी दर्शकों को इसलिए भी पसंद आई कि दोनों की आंखों से छलकती परस्पर आसक्ति उन्हें दिखी। इसके पीछे सिर्फ स्क्रिप्ट या निर्देशक की कल्पना नहीं थी। संयोग है कि जब वी मेट की रिलीज के समय तक दोनों के संबंध टूट चुके थे। करीना तब सैफ के साथ नजर आने लगी थीं। लोगों ने शाहिद से सहानुभूति जाहिर की। इसके बावजूद इस जोडे ने कभी एक-दूसरे पर आरोप नहीं लगाया। धीरे-धीरे सैफ-करीना की जोडी सैफरीना के नाम से स्वीकृत हो गई। अब इनकी शादी के कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले महीने सैफ के पिता नवाब अली खान पटौदी का देहांत हो गया। मातम के इस मौकेपर हम सभी ने सैफ के परिवार की महिला सदस्यों के साथ शोक संतप्त करीना को सफेद लिबास में देखा। करीना खुद को इस परिवार का हिस्सा मानती हैं। उनके लिए शादी एक सर्टिफिकेट है, जिसकी अपनी अहमियत है। फिलहाल वह सैफ के साथ बगैर इस सर्टिफिकेट के ही खुश हैं।

Friday, October 28, 2011

अकेली औरत की दो बेटियां

द्वंद्व और संघर्ष के बीच संवारी जिंदगी-अजय ब्रह्मात्‍मज

कभी ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी हिंदी फिल्मों की नंबर वन हीरोइन थीं। उनकी फिल्मों के लाखों-करोड़ों दीवाने थे। हेमा मालिनी ने अपने करियर केउत्कर्ष के दिनों में दर्जनों सहयोगी स्टारों को भी अपना दीवाना बनाया, लेकिन शादी धर्मेन्द्र के साथ की।

धर्मेन्द्र पहले से शादीशुदा थे। उन्होंने सुविधा के लिए धर्म बदल कर हेमा मालिनी से शादी तो कर ली, लेकिन उन्हें अपने घर नहीं ले जा सके। उनकी पहली पत्नी और बेटों ने हेमा मालिनी को परिवार में जगह नहीं दी। हेमा मालिनी शादी के बाद भी अकेली रहीं। अकेली औरत की जिंदगी जी। उन्होंने अपना घर बसाया, जहां धर्मेन्द्र सुविधा या आवश्यकता के अनुसार आते-जाते रहे।

हेमा मालिनी और धर्मेन्द्र की प्रेम कहानी और दांपत्य के बारे में वे दोनों ही बेहतर तरीकेसे बता सकते हैं। बाहर से जो दिखाई पड़ता है, उससे स्पष्ट है कि हेमा मालिनी ने अकेले ही अपनी जिंदगी संवारी और पिता के साये से वंचित बेटियों ऐषा और आहना को पाला। सभी जानते हैं कि आज भी धर्मेन्द्र के परिवार और हेमा मालिनी के परिवार में सार्वजनिक मेलजोल या संबंध नहीं है।

हेमा मालिनी ने अपने अभिनय करियर का उत्कर्ष देखा। बाद में नृत्य नाटिकाओं में उन्होंने अपनी नृत्य साधना के नए आयाम खोजे। पॉलिटिक्स में आई, तो भाजपा से जुड़ीं। भाजपा ने उनकी लोकप्रियता का पूरा उपयोग किया। छोटी-मोटी जिम्मेदारियां दीं और अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों में उन्हें व्यस्त रखा। हेमा मालिनी आज भी काफी व्यस्त हैं। उन्होंने अपनी बेटियों को नृत्य का शिक्षा दी और अपने साथ मंच पर उतारा। उनकी नृत्य नाटिकाओं में ऐषा और आहना की सक्रिय भूमिकाएं रहती है। अभी पिछले दिनों ही अपनी बेटियों के साथ उन्होंने न्यूयार्क में डांस परफॉर्मेस दिया।

बेटी ऐषा देओल ने अभिनय में रुचि दिखाई और फिल्मों में आने की उत्सुकता जाहिर की तो मां का सपोर्ट मिला। पिता धर्मेन्द्र नहीं चाहते थे कि ऐषा फिल्मों में आएं। इस पर रिसर्च होना चाहिए कि आखिर क्यों अभिनेता नहीं चाहते कि उनकी बेटियां फिल्म अभिनेत्री बनें, जबकि मां बन चुकी अभिनेत्रियों को इसमें कोई दिक्कत नहीं होती। बहुत कम पिताओं ने बेटियों के फिल्मों में आने का फैसले का समर्थन किया और उन्हें सहयोग दिया। याद नहीं आता कि किसी ने अपनी बेटी को लॉन्च करने के लिए कोई फिल्म बनाई हो, जबकि बेटे की लॉन्चिग का बड़ा हंगामा होता है।

कहीं न कहीं यह हमारी सोच और समाज की विडंबना है। देओल परिवार इसका अपवाद नहीं है। कपूर परिवार, खान परिवार और बच्चन परिवार की बेटियों ने फिल्मों में कोशिश ही नहीं की। सबसे पहले करिश्मा और फिर करीना कपूर ने खानदान के रिवाज को तोड़ा। बहरहाल, ऐषा, आहना और हेमा मालिनी को धर्मेन्द्र और देओल परिवार से केवल सरनेम मिला, बाकी सारा संघर्ष उन्हें खुद करना पड़ा। हेमा मालिनी की जिंदगी इस संदर्भ किसी दूसरी भारतीय औरत से अलग और श्रेष्ठ नहीं है। जुहू के बंगलों के भीतर उन्हें कितने अपमान और ताने सहने पड़े होंगे, उन पर कितनी फब्तियां कसी गई होंगी? उनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हेमा मालिनी ने इस सामाजिक द्वंद्व और विडंबना के बीच अपना सिर ऊंचा रखा। पिता के परिवार से समर्थन नहीं मिलने पर भी उन्होंने बेटियों को उनकी मर्जी का काम करने दिया। अभी उन्होंने बेटी ऐषा के लिए टेल मी ओ खुदा का निर्माण और निर्देशन किया है। हालांकि इस फिल्म में धर्मेन्द्र भी हैं, लेकिन साफ दिखता है कि उनकी मौजूदगी महज एक औपचारिक दबाव ही है। इस फिल्म की रिलीज और मार्केटिंग में वे हेमा मालिनी की कोई मदद नहीं कर रहे हैं। उनके होम प्रोडक्शन विजयता फिल्म्स का टेल मी ओ खुदा से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

दरअसल, ड्रीम गर्ल के इस द्वंद्व और दर्द को समझने की जरूरत है। मुझे लगता है कि हेमा मालिनी के अस्मिता के इस संघर्ष का मूल्यांकन होना चाहिए और देखना चाहिए कि ग्लैमर, रसूख और लोकप्रियता के बावजूद हेमा मालिनी जैसी औरतें आज भी कितनी आजाद हो सकी हैं?

Monday, October 24, 2011

नए अंदाज का सिनेमा है रा. वन - अनुभव सिन्‍हा

-अजय ब्रह्मात्‍मज

रा. वन में विजुअल इफेक्ट के चार हजार से अधिक शॉट्स हैं। सामान्य फिल्म में दो से ढाई हजार शॉट्स होते हैं। विजुअल इफेक्ट का सीधा सा मतलब है कि जो कैमरे से शूट नहीं किया गया हो, फिर भी पर्दे पर दिखाई पड़ रहा हो। 'रा. वन' से यह साबित होगा कि हम इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के विजुअल इफेक्ट कम लागत में भारत में तैयार कर सकते हैं। अगर 'रा. वन' को दर्शकों ने स्वीकार कर लिया और इसका बिजनेस फायदेमद रहा तो भारत में दूसरे निर्माता और स्टार भी ऐसी फिल्म की कोशिश कर पाएंगे।

भारत में 'रा. वन' अपने ढंग की पहली कोशिश है। विश्व सिनेमा में बड़ी कमाई की फिल्मों की लिस्ट बनाएं तो ऊपर की पाच फिल्में विजुअल इफेक्ट की ही मिलेंगी। भारत में 'रा. वन' की सफलता से क्रिएटिव शिफ्ट आएगा। यह भारत में होगा और मुझे पूरा विश्वास है कि यह हिंदी में होगा।

ऐसी फिल्म पहले डायरेक्टर और लेखक के मन में पैदा होती हैं। डायरेक्टर अपनी सोच विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर से शेयर करता है। इसके अलावा विजुअल इफेक्ट प्रोड्यूसर भी रहता है। इस फिल्म में दो सुपरवाइजर हैं। एक लास एंजल्स के हैं और दूसरे यहीं के। आम शूटिंग में जो रोल कैमरामैन प्ले करते हैं, वही रोल विजुअल इफेक्ट सुपरवाइजर का होता है। मान लीजिए, मैंने माग रखी कि मेरा एक कैरेक्टर आग के बीच से आता दिखाई पड़े। अब विजुअल इफेक्ट डायरेक्टर तय करेगा कि कैसे आर्टिस्ट को चलना है, कैसे आग शूट करना है और कैसे दोनों में मेल बिठाना है, ताकि दर्शक आर्टिस्ट को आग के बीच से आते देखकर रोमाचित हों।

विजुअल इफेक्ट दो प्रकार के होते हैं। एक में तो दर्शकों को मालूम रहता है कि यह विजुअल इफेक्ट ही है जैसे कि हवा में उड़ना या ऊंची बिल्डिंग से कूदना, लेकिन आग के बीच से आर्टिस्ट के निकलने के शॉट में पता नहीं चलना चाहिए कि विजुअल इफेक्ट है। 'जुरासिक पार्क' में अगर डायनासोर को देखते समय विजुअल इफेक्ट दिमाग में आ जाता तो मजा चौपट हो जाता।

'रा. वन' एक बाप-बेटे की कहानी है, जिसमें बाप सुपर हीरो बन जाता है। बेसिक इमोशनल फिल्म है। इस फिल्म में सुपरहीरो थोपा नहीं गया है। बच्चा, मा और सुपरहीरो तीनों ही कहानी में गुथे हुए हैं। बाप-बेटे का रिश्ता बहुत उभर कर आया है। सक्षेप में कहूं तो यह भारतीय सुपरहीरो की फिल्म है। उसकी एक फैमिली भी है। फिल्म की कहानी लदन से शुरू होती है, भारत आती है और फिर लदन जाती है।

इस फिल्म में 'रा. वन' को व्यक्तिगत तकलीफ दे दी गई है। वह तबाही पर उतारू है। इस फिल्म के लिए शाहरुख ने न कर दिया होता तो मैं लिखता भी नहीं। मैं तो प्रोड्यूसर शाहरुख खान के पास गया था। मुझे मालूम था कि प्रोड्यूसर मिला तो स्टार मिल ही जाएगा। मुझे कमिटमेंट चाहिए था। वह विजन के साथ जुड़े। तीन साल पहले 2008 में हमने 100 करोड़ की फिल्म की कल्पना की थी। मुझे ऐसा प्रोड्यूसर-एक्टर चाहिए था, जो फिल्म से जुड़े और दिल से जुड़े। इस फिल्म में दुनिया के मशहूर और अनुभवी तकनीशियनों को जोड़ा गया है। उन सभी के योगदान से फिल्म बहुत बड़ी हो गई है।

'रा. वन' शीर्षक की कहानी भी दिलचस्प है। मैं एक ऐसे खलनायक की कल्पना कर रहा था, जो अभी तक के सभी खलनायकों से अधिक खतरनाक हो। मैंने यूं ही कहा कि 10 खूाखार दिमाग मिला दें तो वह तैयार हो। वहीं से 10 सिरों के रावण का ख्याल आया और हमारे विलेन का नाम 'रा. वन' पड़ा। वही बाद में फिल्म का शीर्षक हो गया। हीरो का नाम 'जी. वन' रखने में थोड़ी परेशानी जरुर हुई, क्योंकि जीवन नामक एक्टर निगेटिव भूमिकाएं करते थे। वैसे जीवन मतलब जिंदगी है, इसलिए 'रा. वन' के खिलाफ 'जी. वन' की कल्पना अच्छी लगी।

Tuesday, October 18, 2011

बेटी एषा को निर्देशित किया हेमा मालिनी ने

-अजय ब्रह्मात्‍मज

शाहरुख खान हेमा मालिनी को अपना पहला निर्देशक मानते हैं। पहली बार शाहरुख ने उनकी फिल्म दिल आशना है के लिए ही कैमरा फेस किया था। अब 19 सालों बाद हेमा ने टेल मी ओ खुदा के साथ फिर से निर्देशन की कमान संभाली है। इस बार हेमा के कैमरे के सामने उनकी बड़ी बेटी एषा देओल हैं।

हेमा मालिनी कहती हैं, ''मुझे लगता है कि एषा को उसके टैलेंट के मुताबिक रोल नहीं मिले। वह ट्रेंड डांसर है और इमोशनल सीन भी अच्छी तरह करती है। मणि रत्नम की फिल्म युवा के छोटे से रोल में भी उसने अपनी प्रतिभा दिखाई थी। मैंने जब देखा कि वह गलत फिल्में कर और भी फंसती जा रही है तो मुझे सलाह देनी पड़ी। टेल मी ओ खुदा में एषा को आप नए अंदाज में देखेंगे। इस फिल्म में उसने डांस, एक्शन और इमोशन सीन किए हैं।''

हेमा पहले इस फिल्म से बतौर प्रोड्यूसर जुड़ीं। उन्होंने क्रिएटिव फैसलों में भी दखल रखा, लेकिन निर्देशन के लिए मयूर पुरी को चुना और उन्हें पूरी छूट दी। फिल्म के आरंभिक हिस्से देखने पर हेमा मालिनी को संतुष्टि नहीं मिली और उन्होंने निर्देशन की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

टेल मी ओ खुदा एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे पता चलता है कि वह गोद ली हुई बेटी है। इसके बाद वह अपने पिता की तलाश में देश-दुनिया में भटकती है। इस सफर में वह तीन संभावित प्रौढ़ों से मिलती है। आखिरकार उसकी मुलाकात अपने पिता से होती है, लेकिन वह अपने जीवन में आए पिता सरीखे दूसरे व्यक्तियों को नहीं भूल पाती।

हेमा खुश हैं कि एषा के पिता की भूमिकाओं के लिए उन्हें विनोद खन्ना, फारूख शेख, ऋषि कपूर और धर्मेन्द्र का सहयोग मिला। चूंकि फिल्म अभिनेत्री प्रधान है, इसलिए सहयोगी भूमिकाओं में अपेक्षाकृत छोटे स्टार अर्जन बाजवा और चंदन राय सान्याल का चुनाव किया गया है।

दो फिल्मों के अपने अनुभवों को शेयर करते हुए हेमा मालिनी कहती हैं, ''पहले हम लोग फिल्म बना कर ही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते थे। अभी मार्केटिंग और प्रमोशन के लिए भी जूझना पड़ता है।'' उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि फिल्म इंडस्ट्री के भरोसेमंद दोस्तों ने हमेशा उनका साथ दिया। टेल मी ओ खुदा के प्रमोशनल गीत के लिए सलमान खान ने समय दिया तो म्यूजिक लॉन्च के लिए शाहरुख खान आए।