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Friday, June 20, 2008

श्याम बेनेगल का सम्मान



-अजय ब्रह्मात्मज


थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित 9वें आईफा अवार्ड समारोह के दौरान हिंदी फिल्मों केपुरस्कार समारोह में श्याम बेनेगल को लाइफ टाइम एचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दरअसल, श्याम बेनेगल का नाम फिल्म इंडस्ट्री में आज भी बहुत आदर व सम्मान से लिया जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस अच्छे फिल्मकार के कार्य को अभी तक रेखांकित नहीं किया गया है। चूंकि उनका काम इतना महत्वपूर्ण और स्पष्ट है कि बगैर गहराई में गए ही सभी उनके नाम का उल्लेख करते रहते हैं।
गौर करें, तो नामोल्लेख का भी फैशन चलता है। जैसे कि गुरुदत्त, बिमल राय, के.आसिफ जैसे महान फिल्मकारों को बिना देखे ही सिनेप्रेमी महान निर्देशक मान लेते हैं। निश्चित ही वे सभी महान हैं, लेकिन क्या हमने निजी तौर पर उनकी महानता को परखा, देखा और समझा है? आप आसपास पूछ कर देख लें। संभव है, अधिकांश ने उनकी फिल्में देखी भी न हों! ऐसे ही श्याम बेनेगल का नाम हर संदर्भ में लिया जाता है।
हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा से दरकिनार कर दिए गए विषयों, चरित्रों और स्थानों को श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्मों में जगह दी। उन्होंने लंबे अभ्यास के बाद 1974 में अंकुर का निर्देशन किया। हिंदी फिल्मों के इतिहास में अंकुर का ऐतिहासिक महत्व है। यहीं से पैरेलल सिनेमा की शुरुआत होती है और साथ ही साथ उस तरह के निर्देशकों की जमात बढ़ती है, जो सिनेमा के यथार्थवादी स्वरूप को गढ़ने की कोशिश में लगे थे। श्याम बेनेगल ऐसी फिल्मों के नेतृत्वकारी फिल्मकार रहे, लेकिन अपनी विनम्रता में वे किसी प्रकार के नेतृत्व से इनकार करते हैं। उन्होंने हमेशा कहा कि कई दूसरे निर्देशकों के साथ मैं भी फिल्में निर्देशित कर रहा था। हम सभी यही चाहते थे कि सिनेमा सिर्फ पलायन और मनोरंजन का माध्यम नहीं बना रहे।
देश के प्रमुख समीक्षक चिदानंद दासगुप्ता ने अपने एक लेख में कहा है कि अगर सत्यजीत राय की फिल्में टैगोर के प्रबोधन का चित्रण करती हैं, तो श्याम बेनेगल की फिल्मों में हम नेहरू के भारत को देख सकते हैं, क्योंकि लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता, अवसर की समानता, मानव अधिकार और नारी अधिकार आदि मामलों में श्याम बेनेगल ने ही नेहरू की सोच को फिल्मों में प्रतिस्थापित किया। हिंदी फिल्मों में सामाजिक दृष्टि से इतना सचेत और जागरूक दूसरा कोई फिल्मकार शायद नहीं है। उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एकनया परिवेश गढ़ा और कई कलाकारों और तकनीशियनों को सामने ले आए। उन्होंने यह साबित किया कि फिल्मों के लिए स्टार पहली आवश्यकता नहीं है।
इस छोटे आलेख में श्याम बेनेगल के योगदान को समेटना नामुमकिन है। बस एक ही पहलू पर ध्यान दें कि उनकी हर फिल्म की भाषा भी अलग होती है। वे जिस परिवेश की कहानी चुनते हैं, उसी परिवेश की भाषा रखते हैं। संवादों में स्थानीय मुहावरों का सुंदर समावेश करते हैं और लहजा पूरी तरह से भाषा और क्षेत्र विशेष से प्रेरित रहता है। उनकी भाषा भिन्न होने के बावजूद समझ में आने लायक रहती है। अंकुर, मंडी, जुनून, मंथन आदि फिल्मों को याद करें या फिर से देखें, तो लोग इस तथ्य से सहमत हो जाएंगे।
पुरस्कार लेते समय श्याम बेनेगल ने बिल्कुल सही कहा कि हाशिए के विषयों के फिल्मकार को आज मुख्यधारा का पुरस्कार समारोह सम्मानित कर रहा है। उन्होंने न तो इस पर आश्चर्य व्यक्त किया और न ही गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने वस्तुस्थिति की तरफ इशारा किया! बस, श्याम बेनेगल की फिल्मों के सम्यक अध्ययन और मूल्यांकन की जरूरत है। जरूरत यह भी है कि हम उनके संभाषणों को संकलित करें, क्योंकि वे संभाषण वे वैचारिक स्पष्टता के साथ फिल्म, समाज और अपने समय को देखते हैं।

Thursday, June 19, 2008

बॉक्स ऑफिस:२०.०६.२००८

मंदा ही रहा धंधा

राम गोपाल वर्मा की फिल्म सरकार राज का विज्ञापन आया है कि एक हफ्ते में उसने 50 करोड़ से अधिक की कमाई कर ली है और आगे की कमाई जारी है। जब भी किसी फिल्म का ऐसा विज्ञापन आता है तो ट्रेड के लोग कहने लगते हैं कि सही कमाई का योग विज्ञापन में दी गई राशि से कम ही होगा। इस फिल्म को लेकर बच्चन परिवार और राम गोपाल वर्मा कुछ ज्यादा ही संवेदनशील और आक्रामक हैं। अमिताभ बच्चन और राम गोपाल वर्मा अपने ब्लॉग के जरिए आलोचकों को जवाब दे रहे हैं। बहरहाल, ट्रेड सर्किल में चर्चा है कि यह फिल्म मुंबई और महाराष्ट्र में औसत से बेहतर कारोबार कर लेगी, लेकिन अन्य सर्किट में वितरकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। अन्य राज्यों से संतोषजनक रिपोर्ट नहीं आ रही है।
पिछले हफ्ते रिलीज हुई मेरे बाप पहले आप और समर-2007 का बुरा हाल रहा। दोनों ही फिल्मों ने निराश किया और दर्शकों को जुटाने में उनकी असमर्थता पहले दिन से ही जाहिर होने लगी थी। विषय वस्तु की गंभीरता और जटिलता के कारण समर-2007 दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई। मेरे बाप पहले आप से प्रियदर्शन दर्शकों को नहीं हंसा सके। समर-2007 की तुलना में उसे ज्यादा दर्शक मिले, फिर भी 40 प्रतिशत ही कलेक्शन हो पाया। इस साल की पहली छमाही में रिलीज हुई हर कॉमेडी फ्लॉप साबित हुई। क्या दर्शक हंसना नहीं चाहते या फिल्में हंसा नहीं पा रही हैं?

Wednesday, June 18, 2008

अभिनेत्री करीना कपूर बनाम ब्रांड बेबो


ताजा खबर है कि करीना कपूर ने एक साबुन के विज्ञापन के लिए करोड़ों की रकम ली है। इस तरह वह विज्ञापन से कमाई करनेवाली महंगी अभिनेत्रियों में से एक हो गई हैं। इन दिनों वह हर तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट के विज्ञापनों में दिख रही हैं। अभिनेत्रियों की मांग कॉस्मेटिक, पर्सनल केयर प्रोडक्ट और ज्वेलरी के विज्ञापनों में ज्यादा रहती है। करीना कपूर इस तरह के विज्ञापनों में आगे हैं। वह लाइफ स्टाइल प्रोडक्ट बेचने के लिए सबसे उपयुक्त एक्ट्रेस मानी जा रही हैं।

इन दिनो फिल्म अभिनेत्रियों की कमाई का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से आता है। पॉपुलर एक्टर की तरह पॉपुलर एक्ट्रेस भी इस कमाई पर पूरा ध्यान दे रही हैं। बाजार में करीना कपूर की मांग बढ़ने का एक कारण यह भी है कि पिछले साल उनकी फिल्म 'जब वी मेट' जबरदस्त हिट रही। उनके कुछ प्रशंसकों को लग सकता है कि शाहिद कपूर से अलग होकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। नैतिकता के इस प्रश्न से उनके इमेज पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उल्टा दर्शकों के बीच उनकी चाहत बढ़ गई है। हीरोइनों के सपनों में खोए दीवाने दर्शकों के लिए करीना कपूर ऐसी आइकॉन बन गयी हैं, जो किसी एक सितारे से नहीं बंधी हैं। शाहिद कपूर के साथ उनके संबंध को टिकाऊ माना जा रहा था। सैफ अली खान के साथ उनके संबंधों को लेकर आम धारणा है कि वह कभी भी टूट सकता है। इस तरह करीना कपूर का ख्वाब उनके दीवानों के लिए सुरक्षित है। अमूमन शादीशुदा या मजबूत संबंधों की हीरोइनों की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम हो जाती है। शाहिद से संबंध तोड़कर करीना कपूर ने अपनी लोकप्रियता में ज्यादा इजाफा ही किया है।

ऐसा लगता है कि करीना कपूर थोड़ी मेहनत, लगन और एकाग्रता से काम करें तो वह बेहतर अभिनय कर सकती हैं। उन्होंने 'चमेली', 'ओमकारा' और 'जब वी मेट' में इसके उदाहरण दिए हैं, लेकिन उन्हें सुधीर मिश्र, विशाल भारद्वाज या इम्तियाज अली जैसा निर्देशक भी चाहिए। करण जौहर टाइप निर्देशक तो करीना कपूर के जरिए लाइफ स्टाइल और फिगर में ही ऊब-डूब करते रहेंगे। तय करीना को ही करना है कि वह पॉपुलैरिटी और डिमांड के बीच कैसे संतुलन बिठाती हैं और अपने लिए कौन सा रास्ता चुनती हैं। अभिनेत्री करीना कपूर और ब्रांड बेबो एक-दूसरे की पूरक बन कर ही कामयाब रहेंगी।

Tuesday, June 17, 2008

'उत्सुशी-ए' - सिनेमा से पहले मनोरंजन की जापानी लोकशैली




सिनेमा, फिल्म, मूवी, पिक्चर, चलचित्र ... आप इसे जो नाम दें और जिस अर्थ में समझें, मनोरंजन का सशक्त माध्यम हो गया है। सिनेमा के वजूद में आने के पहले भी तो मनोरंजन के साधन और माध्यम होंगे। हम उन्हें मनोरंजन की लोकशैली कहते हैं। भारत की बात करें तो हर क्षेत्र और प्रदेश की नाट्य एवं नृत्य शैलियां हैं। कठपुतलियों का नृत्य रहा है। छाया और प्रकाश के माध्यम से भी नागरिकों के बहलाने के प्रयास होते रहे पश्चिमी और योरोपीय देशों में 'फैंटसमैगोरिया' का चलन रहा तो चीन और जापान में छायाचित्रों के माध्यम से गांव-कस्बों में मनोरंजन किया जाता रहा।

जापान की एक ऐसी ही मनोरंजक लोकशैली 'उत्सुशी-ए' है। जापानी भाषा, संस्कृति और इतिहास के जानकार चवन्नी और उसके पाठकों की जानकारी में इजाफा कर सकते हैं। चवन्नी को इसके संबंध में जो जानकारी मिली, वह उसे बांटने के लिए तत्पर है। सिनेमा के प्रचलित होने के पहले जापान में उत्सशी-ए के शो काफी पसंद किए जाते थे। अठारहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के अंत तक उत्सशी-ए का बोल बाला रहा। इदो और मेइजी काल में इस शैली का विकास और विस्तार हुआ।

उत्सशी-ए में छवियां पर्दे पर नाचती, घूमती और थिरकती हैं। पश्चिमी देशों में मुख्य रूप से एक लालटेन की रोशनी में यह प्रदर्शन किया जाता था। जापान के कलाकारों ने छह और उससे ज्यादा लालटेनों की मदद से इस कला को सिनेमा की खूबियों तक विकसित कर लिया था। कट, फेड, डिजॉलव, डबल एक्सपोजर और जूम जैसी तकनीक का इस्तेमाल वे कैमरे और फिल्म के विकास के पहले कर रहे थे। सिनेमा के आविष्कार से सौ साल पहले ही जापानियों ने प्रोजेक्शन तकनीक से दर्शकों का मनोरंजन करना सीख लिया था। इस प्रदर्शन में कुछ लालटेनें स्थिर रख दी जाती हैं या फिर हाथों में लेकर उन्हें आगे-पीछे कर प्रकाश की तीव्रता को बदला जाता है। उत्सुशी-ए के प्रदर्शन में छह से ज्यादा कलाकारों की जरूरत पड़ती थी।

सिनेमा के विकास के बाद यह मनोरंजन की यह कलाशैली लुप्तप्राय हो रही थी । 1950 से 1980 के बीच अयाको शिबा ने अपने पिता गैजिरो कोबायाशी की मदद से इसे बचाया। दोनों ने उस समय तक जीवित उत्सुशी-ए कलाकारों की मदद से इस शैली को संरक्षित किया। जापान में आए 1923 के भूकंप और विश्वयुद्धों में अन्य कलाओं के साथ 'उत्सुशी-ए' का भी भारी नुकसान हुआ था।

उत्सुशी-ए की लालटेनें और स्लाइड्स बालसा की लकड़ी से बनाए जाते हैं। बालसा की लकड़ियां हल्की होती हैं। कलाकार दो-तीन घंटों तक उंगलियों, हथेलियों की मदद से उन्हें विविध रूपों में संयोजित करने में नहीं थकते थे। उत्सुशी-ए के प्रदर्शन में लालटेन थामने वालों के साथ संगीतज्ञों और कथावाचकों की जरूरत पड़ती थी। परफॉर्मिंग आर्ट की खूबी है कि हर प्रदर्शन में थोड़ी विविधता आ जाती है। कई बार दर्शकों की रुचि और प्रतिक्रिया से कहांनियां भी बदल जाती हैं या नया मोड़ ले लेती हैं। उत्सुशी-ए में इसकी भरपूर संभावना रहती थी।

(अगर कोई तथ्यात्मक भूल हो तो चवन्नी सुधारने के लिए तैयार है। अपने सुधी पाठकों से चवन्नी की गुजारिश है कि वे सिनेमा के पहले की मनोरंजन परंपराओं के बारे में अपनी जानकारी बांटे।)