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Thursday, January 2, 2014

दरअसल : 2013 की उपलब्धि हैं राजकुमार और निम्रत


-अजय ब्रह्मात्मज
    बाक्स आफिस और लोकप्रियता के हिसाब से कलाकारों की बात होगी तो राजकुमार राव और निम्रत कौर किसी भी सूची में शामिल नहीं हो पाएंगे। चरित्र, चरित्रांकन और प्रभाव के एंगल से बात करें तो पिछले साल आई हिंदी फिल्मों के कलाकारों में उन दोनों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। हंसल मेहता निर्देशित ‘शाहिद’ और रितेश बत्रा निर्देशित ‘द लंचबाक्स’ देखने के बाद आप मेरी राय से असहमत नहीं हो सकेंगे। दोनों कलाकारों ने अपने चरित्रों को आत्मसात करने के साथ उन्हें खास व्यक्तित्व दिया। दोनों अपनी-अपनी फिल्मों में इतने सहज और स्वाभाविक हैं कि फिल्म देखते समय यह एहसास नहीं रहता कि व्यक्तिगत जीवन में राजकुमार राव और निम्रत कौर कुछ और भी करते होंगे।
    हिंदी फिल्मों में कभी-कभार ही ऐसे कलाकारों के दर्शन होते हैं। समीक्षक, दर्शक और फिल्म पत्रकार इन्हें अधिक तरजीह नहीं देते, क्योंकि ये फिल्म से पृथक नहीं होते। इनके बारे में चटपटी टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी स्वाभाविकता को व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। दूसरे कथित स्टारडम नहीं होने से इन्हें अपेक्षित लाइमलाइट नहीं मिल पाता। ‘शाहिद’ और ‘द लंचबाक्स’ में श्रेष्ठ अभिनय और प्रदर्शन के बावजूद 2013 की उपलब्धियों में दोनों कलाकारों को शामिल नहीं किया गया। पत्र-पत्रिकाओं में इनके बारे में अलग से नहीं लिखा गया। टीवी चैनलों के पास वक्त नहीं है कि वे इनके प्रयासों को रेखांकित कर सकें। बहुत संभव है कि 2013 की फिल्मों के लिए दिए जाने वाले अवाडर््स में भी इनका नाम न हों। हिंदी फिल्मों में ज्यादातर चमक चलती है। खोटा भी चमकदार है तो वह खरा पर भारी पड़ता है।
    राजकुमार राव और निम्रत कौर अपारंपरिक कलाकार हैं। हिंदी फिल्मों में लाउड और ओवर द वोर्ड अभिनय को ही आम दर्शक नोटिस करते हैं। उसे ही एक्टिंग मान लिया जाता है। देखा गया है कि किरदारों को अंडरप्ले या रियलिस्ट तरीके से पोट्रे करने पर कलाकारों की मेहनत अनदेखी रह जाती है। वे फिल्म के अविभाज्य हिस्से होते हैं।  उनकी फिल्मों की तारीफ करते समय हम उस प्रभाव को नहीं समझ पाते, जो उनके परफारमेंस के कारण होता है। ‘शाहिद’ और ‘द लंचबॉक्स’ के साथ यही हो रहा है। दोनों फिल्मों की तारीफ में भी राजकुमार राव और निम्रत कौर गौण हैं।
    राजकुमार राव ने एफटीआईआई से अभिनय का प्रशिक्षण लिया। हिंदी फिल्मों में प्रशिक्षित अभिनेताओं को अयोग्य ही माना जाता है। पापुलर कलाकारों ने यह भ्रम फैलाया है कि अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता, जबकि अभी चल रहे समर्थ अभिनेताओं की पृष्ठभूमि में रंगमंच या प्रशिक्षण रहा है। बहरहाल, राजकुमार ने बहुत पहले तय किया था कि उन्हें फिल्मों में ही आना है। यही वजह है कि दिल्ली के समीप गुडग़ांव से होने के बावजूद उन्होंने कभी एनएसडी में दाखिले की नहीं सोची। वे सीधे एफटीआईआई गए और फिर मुंबई आ गए। दिबाकर बनर्जी की ‘लव सेक्स और धोखा’ उनकी पहली फिल्म थी। ‘शाहिद’ उनकी आखिरी फिल्म है। राजकुमार राव इन दिनों हंसल मेहता के निर्देशिन में ‘सिटी लाइट््स’ की शूटिंग कर रहे हैं। राजस्थान के बैकड्रॉप पर बन रही इस फिल्म के निर्माता मुकेश भट्ट हैं। इसके अलावा सोनम कपूर के साथ वे ‘डॉली की डोली’ और विद्या बालन के साथ ‘मेरी अधूरी कहानी’ भी कर रहे हैं।
    निम्रत कौर ने अभी तक कोई फिल्म साइन नहीं की है। ‘द लंचबॉक्स’ से मिली तारीफ और उम्मीद से कमतर कोई भी फिल्म वह कर नहीं सकतीं। पहली फिल्म चर्चित हो जाने के ये अंतर्निहित खतरे हैं। ‘द लंचबॉक्स’ की चर्चा से यह फर्क जरूर पड़ा है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी पहचान और साख बढ़ गई है। उन्हें प्रस्ताव मिल रहे हैं। कुछ तय भी हो चुके हैं, लेकिन घोषणा बाकी है। निम्रत कौर ने अभिनय की दुनिया में आने के बाद कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। वह सही ब्रेक की प्रतीक्षा मेंथिएटर में खुद को मांजती रहीं । उन्होंने माडलिंग और ऐड फिल्में जरूर कीं और खुद को व्यस्त रखा। फिल्मों में काम पाने की कोशिश में ही निम्रत कौर इंडस्ट्री के तौर-तरीके से परिचित होती गई। बगैर किसी रंजिश और हीन भावना के वह प्रयास करती रहीं। इंतजार और धैर्य काम आया। ‘द लंचबॉक्स’ ने उन्हें बड़ा प्रतिसाद दिया। पिछले दिनों एक बातचीत में उन्होंने बताया कि वह टाइपकास्ट नहीं हो रही हैं। ‘द लंचबॉक्स’ के लगभग साथ आए कैडबरी ऐड से उनकी इमेज एक खांचे में बंधने से बच गई। कुछ लोगों ने इस संयोग को निम्रत कौर की रणनीति माना। मुख्यधारा की ग्लैमरयुक्त फिल्म पत्रकारिता में निम्रत कौर पर भी वाजिव ध्यान नहीं दिया गया है।