Search This Blog

Showing posts with label film review. Show all posts
Showing posts with label film review. Show all posts

Friday, June 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हमारी अधूरी कहानी

स्टार: 3

मोहित सूरी और महेश भट्ट एक साथ आ रहे हों तो एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद की ज सकती है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ बेहतरीन की परिधि में आते-आते रह गई है। यह फिल्मी संवादों, प्रेम के सिचुएशन और तीनों मुख्य कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए देखी जा सकती है। फिल्म में आज के ट्रेंड के मुताबिक औरतों की आजादी की भी बातें हैं। पुरूष दर्शकों को वसुधा का गुस्सा कुछ ज्यादा लग सकता है, लेकिन सच तो यही है कि पति नामक जीव ने परंपरा और मर्यादा के नाम पर पत्नियों को सदियों से बांधा और सेविका बना कर रख लिया है। फिल्म के संवाद के लिए महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक को बधाई देनी होगी। अपने पति पर भड़क रही वसुधा अचानक पति के लिए बहुवचन का प्रयोग करती है और ‘तुमलोगों’ संबोधन के साथ सारे पुरुषों को समेट लेती है। 

 वसुधा भारतीय समाज की वह अधूरी औरत है, जो शादी के भीतर और बाहर पिस रही है। वह जड़ हो गई है, क्योंकि उसकी भावनाओं की बेल को उचित सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। वह कामकाजी और कुशल औरत है। वह बिसूरती नहीं रहती। पति की अनुपस्थिति में वह अपने बेटे की परवरिश करने के साथ खुद भी जी रही है। आरव के संपर्क में आने के बाद उसकी समझ में आता है कि वह रसहीन हो चुकी है। उसे अपना अधूरापन नजर आता है। आरव खुशी देकर उसका दुख कम करना चाहता है। हालांकि फिल्म में हवस और वासना जैसे शब्दों का इस्तेकमाल हुआ है, लेकिन गौर करें तो आरव और वसुधा की अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशों में यह प्रेम का पूरक है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ स्त्री-पुरुष संबंधों की कई परतें पेश करती है। हरि-वसुधा, आरव-वसुधा, आरव की मां और उनका प्रेमी, हरि के माता-पिता .... लेखक-निर्देशक सभी चरित्रों के विस्तार में नहीं गए हैं। फिर भी उनके जीवन की झलक से प्रेम के अधूरेपन की खूबसूरती और बदसूरती दोनों नजर आती है।

 ‘हमारी अधूरी कहानी’ का शिल्प कमजोर है। आरव और वसुधा के जीवन प्रसंगों में भावनाएं तो हैं, किंतु घटनाओं की कमी है। वसुधा जिंदगी से ली गई किरदार है। आरव को पन्नों पर गढ़ गया है। अपनी भावनाओं के बावजूद वह यांत्रिक लगता है। यही कारण है कि उसकी सौम्यदता, दुविधा और कुर्बानी हमें विचलित नहीं करती। इस लिहाज से हरि जीवंत और विश्वसनीय किरदार है। रुढियों में जीने की वजह से औरतों के स्वामित्व की उसकी धारणा असंगत लगती है, लेकिन यह विसंगति अपने समाज की बड़ी सच्चाई है। पुरुष खुद को स्वामी समझता है। वह औरतों की जिंदगी में मुश्किलें पैदा करता है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ अपनी कमियों के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियों में उतरती है। लेखकों की दृष्टि पुरानी है और शब्दों पर अधिक जोर देने से भाव का मर्म कम हुआ है। फिर भी यह फिल्म पॉपुलर ढांचे में कुछ सवाल रखती है।

इमरान हाशमी ने आरव के किरदार को उसके गुणों के साथ पर्दे पर उतारा है। कशमकश के दृश्योंण में वे प्रभावित करते हैं। उन्हें किरदार(लुक और कॉस्ट्यूम) में ढालने में फिल्म की तकनीकी टीम का भी योगदान है। विद्या बालन इस अधूरी कहानी में भी पूरी अभिनेत्री हैं। वह वसुधा के हर भाव को सलीके से पेश करती हैं। पति और प्रेमी के बीच फंसी औरत के अंतर्विरोधों को चेहरे से जाहिर करना आसान नहीं रहा होगा। विद्या के लिए वसुधा मुश्किल किरदार नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में किरदार के अधूरेपन को बरकरार रखना उललेखनीय है। राजकुमार राव के बार में यही कहा जा सकता है कि हर बार की तरह उन्होंने सरप्राइज किया है। हमें मनोज बाजपेयी और इरफान खान के बाद एक ऐसा एक्टैर मिला है, जो हर कैरेक्टर के मानस में ढल जाता है। हरि की भूमिका में उन्होंने फिर से जाहिर किया है कि वे उम्दा अभिनेता हैं। राजकुमार राव और विद्या बालन के साथ के दृश्य मोहक हैं। नरेन्द्र झा छोटे किरदार में जरूरी भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत बेहतर है फिल्म के गीतों में अधूरी कहानी इतनी बार रिपीट करने की जरूरत नहीं थी। राहत फतह अली का गाया गीत फिल्म के कथ्य को कम शब्दों में बखूबी जाहिर करता है।
 वही हैं सूरतें अपनी वही मैं हूँ, वही तुम हो
मगर खोया हुआ हूँ मैं मगर तुम भी कहीं गुम हो
मोहब्बत में दग़ा की थी काफ़िर थे सो काफ़िर हैं
मिली हैं मंज़िलें फिर भी मुसाफिर थे मुसाफिर हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुंचे
 मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
अवधि- 131 मिनट

Friday, March 15, 2013

फिल्‍म रिव्‍यू : जॉली एलएलबी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
तेजिन्दर राजपाल - फुटपाथ पर सोएंगे तो मरने का रिस्क तो है।
जगदीश त्यागी उर्फ जॉली - फुटपाथ गाड़ी चलाने के लिए भी नहीं होते।
सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' में ये परस्पर संवाद नहीं हैं। मतलब तालियां बटोरने के लिए की गई डॉयलॉगबाजी नहीं है। अलग-अलग दृश्यों में फिल्मों के मुख्य किरदार इन वाक्यों को बोलते हैं। इस वाक्यों में ही 'जॉली एलएलबी' का मर्म है। एक और प्रसंग है, जब थका-हारा जॉली एक पुल के नीचे पेशाब करने के लिए खड़ा होता है तो एक बुजुर्ग अपने परिवार के साथ नमूदार होते हैं। वे कहते हैं साहब थोड़ा उधर चले जाएं, यह हमारे सोने की जगह है। फिल्म की कहानी इस दृश्य से एक टर्न लेती है। यह टर्न पर्दे पर स्पष्ट दिखता है और हॉल के अंदर मौजूद दर्शकों के बीच भी कुछ हिलता है। हां, अगर आप मर्सिडीज, बीएमडब्लू या ऐसी ही किसी महंगी कार की सवारी करते हैं तो यह दृश्य बेतुका लग सकता है। वास्तव में 'जॉली एलएलबी' 'ऑनेस्ट ब्लडी इंडियन' (साले ईमानदार भारतीय) की कहानी है। अगर आप के अंदर ईमानदारी नहीं बची है तो सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' आप के लिए नहीं है। यह फिल्म मनोरंजक है। फिल्म में आए किरदारों की सच्चाई और बेईमानी हमारे समय के भारत को जस का तस रख देती है। मर्जी आप की ़ ़ ़ आप हंसे, रोएं या तिलमिलाएं।
हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के नाम पर हास्य इस कदर हावी है कि हम व्यंग्य को व्यर्थ समझने लगे हैं। सुभाष कपूर ने किसी भी प्रसंग या दृश्य में सायास चुटीले संवाद नहीं भरे हैं। कुछ आम किरदार हैं, जो बोलते हैं तो सच छींट देते हैं। कई बार यह सच चुभता है। सच की किरचें सीने को छेदती है। गला रुंध जाता है। 'जॉली एलएलबी' गैरइरादतन ही समाज में मौजूद अमीर और गरीब की सोच-समझ और सपनों के फर्क की परतें खोल देती है। 'फुटपाथ पर क्यों आते हैं लोग?' जॉली के इस सवाल की गूंज पर्दे पर चल रहे कोर्टरूम ड्रामा से निकलकर झकझोरती है। हिंदी फिल्मों से सुन्न हो रही हमारी संवेदनाओं को यह फिल्म फिर से जगा देती है। सुभाष कपूर की तकनीकी दक्षता और फिल्म की भव्यता में कमी हो सकती है, लेकिन इस फिल्म की सादगी दमकती है।
'जॉली एलएलबी' में अरशद वारसी की टीशर्ट पर अंग्रेजी में लिखे वाक्य का शब्दार्थ है, 'शायद मैं दिन में न चमकूं, लेकिन रात में दमकता हूं'। जॉली का किरदार के लिय यह सटीक वाक्य है। मेरठ का मुफस्सिल वकील जगदीश त्यागी उर्फ जॉली बड़े नाम और रसूख के लिए दिल्ली आता है। तेजिन्दर राजपाल की तरह वह भी नाम-काम चाहता है। वह राजपाल के जीते एक मुकदमे के सिलसिले में जनहित याचिका दायर करता है। सीधे राजपाल से उसकी टक्कर होती है। इस टक्कर के बीच में जज त्रिपाठी भी हैं। निचली अदालत के तौर-तरीके और स्थिति को दर्शाती यह फिल्म अचानक दो व्यक्तियों की भिड़ंत से बढ़कर दो सोच की टकराहट में तब्दील हो जाती है। जज त्रिपाठी का जमीर जागता है। वह कहता भी है, 'कानून अंधा होता है। जज नहीं, उसे सब दिखता है।'
सुभाष कपूर ने सभी किरदारों के लिए समुचित कास्टिंग की है। बनी इमेज के मुताबिक अगर अरशद वारसी और बमन ईरानी किसी फिल्म में हों तो हमें उम्मीद रहती है कि हंसने के मौके मिलेंगे। 'जॉली एलएलबी' हंसाती है, लेकिन हंसी तक नहीं ठहरती। उससे आगे बढ़ जाती है। अरशद वारसी, बमन ईरानी और सौरभ शुक्ला ने अपने किरदारों को सही गति, भाव और ठहराव दिए हैं। तीनों किरदारों के परफारमेंस में परस्पर निर्भरता और सहयोग है। कोई भी बाजी मारने की फिक्र में परफारमेंस का छल नहीं करता। छोटे से दृश्य में आए राम गोपाल वर्मा (संजय मिश्रा) भी अभिनय और दृश्य की तीक्ष्णता की वजह से याद रह जाते हैं। फिल्म की नायिका संध्या (अमृता राव) से नाचने-गाने का काम भी लिया गया है, लेकिन वह जॉली को विवेक देती है। उसे झकझोरती है। हिंदी फिल्मों की आम नायिकाओं से अलग वह अपनी सीमित जरूरतों पर जोर देती है। वह कामकाजी भी है।
सुभाष कपूर ने 'जॉली एलएलबी' के जरिए हिंदी फिल्मों में खो चुकी व्यंग्य की धारा को फिर से जागृत किया है। लंबे समय के बाद कुंदन शाह और सई परांजपे की परंपरा में एक और निर्देशक उभरा है, जो राजकुमार हिरानी की तरह मनोरंजन के साथ कचोट भी देता है। धन्यवाद सुभाष कपूर।

Friday, February 8, 2013

फिल्‍म समीक्षा : एबीसीडी

ABCD anybody can dance movie review-अजय ब्रह्मात्मज
एक डांसर क्या करता है? वह दर्शकों को अपनी अदाओं से इम्प्रेस करता है या अपनी भंगिमाओं से कुछ एक्सप्रेस करता है। प्रभाव और अभिव्यक्ति के इसी द्वंद्व पर 'एबीसीडी' की मूल कथा है। बचपन के दोस्त जहांगीर और विष्णु कामयाबी और पहचान हासिल करने के बाद डांस से 'इम्प्रेस' और 'एक्सप्रेस' करने के द्वंद्व पर अलग होते हैं। जहांगीर को लगता है कि इम्प्रेस करने के लिए उसे अपनी कंपनी में विदेशी नृत्य निर्देशक की जरूरत है। आहत होकर विष्णु लौट जाने का फैसला करता है, लेकिन कुछ युवक-युवतियों के उत्साह और लगन को एक दिशा देने के लिए वह रुक जाता है।
'एबीसीडी' एक प्रकार से वंचितों की कहानी है। समाज के मध्यवर्गीय और निचले तबकों के युवा साहसी और क्रिएटिव होते हैं, लेकिन असुविधाओं और दबावों की वजह से वे मनचाहे पेशों को नहीं अपना पाते। विष्णु एक जगह समझाता है कि काम वही करो, जो मन करे। मन का काम न करने से दोहरा नुकसान होता है। 'एबीसीडी' सामूहिकता, टीमवर्क, अनुशासन और जीतने की जिद्द की शिक्षा देती है। डांस ऐसा नशा है कि उसके बाद किसी नशे की जरूरत नहीं रह जाती। विष्णु अपनी टीम को अंतिम जीत तक ले जाता है। इस प्रक्रिया में वह कोमल और मौलिक भावनाओं से मतिभ्रम के शिकार दोस्त जहांगीर का भी दिल जीत लेता है।
रैमो डिसूजा मुख्य रूप से कोरियोग्राफर हैं। उन्होंने डांस और डांसर की पृष्ठभूमि पर रोचक कहानी गढ़ी है। यह फिल्म शुरू से अंत तक डांस और म्यूजिक के आधार पर चलती है। डांस कहानी का हिस्सा है, इसलिए संख्या में अधिक होने पर भी डांस परफामेंस नहीं अखरते। फिल्मों में किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता में दर्शक कमजोर टीम के साथ हो जाते हैं। रैमो डिसूजा अपने विष्णु के नेतृत्व में ऐसे किरदारों के लिए सहानुभूति बटोरने में सफल रहे हैं।
प्रभु देवा और के के मेनन अपनी भूमिकाओं में अच्छे लगते हैं। प्रभु देवा के डांस के प्रशंसक उन्हें एक्टर के तौर पर भी देख कर खुश होंगे। के के मेनन निश्चित ही उम्दा एक्टर हैं। जहांगीर के किरदार को उन्होंने सहज आत्मसात किया है। गणेश आचार्य भी फिल्म में एक किरदार निभाते हैं। वे डांस करते हुए ही अच्छे लगते हैं। संवाद और भाव जाहिर करते समय उनकी सीमाएं नजर आ जाती हैं। डांसरों की टीम ने रैमो डिसूजा का पूरा सहयोग दिया है।
फिल्म में गीत-संगीत का विशेष महत्व है। सचिन-जिगर ने गणेश भक्तों को आधुनिक धुनों पर जोशपूर्ण भजन दे दिया है। उन्होंने फिल्म के डांस परफारमेंस के लिए जरूरी संगीत तैयार किया है। फिल्म का टायटल हालांकि एनी बॉडी कैन डांस है,लेकिन फिल्म देखते हुए पता चलता है कि यह कितने डिसिप्लिन और डेडिकेशन का काम है।
*** तीन स्टार

फिल्‍म समीक्षा : स्‍पेशल छब्‍बीस

special 26 movie review-अजय ब्रह्मात्मज
तकरीबन 25 साल पहले साधारण और सामान्य परिवारों से आए चार व्यक्ति मिल कर देश भर में भ्रष्ट लोगों को लूटने और ठगने के काम में सफल रहते हैं। अपने अंतिम मिशन में वे 'स्पेशल छब्बीस' टीम बनाते हैं और अलर्ट सीबीआइ ऑफिसर वसीम (मनोज बाजपेयी) की आंखों में धूल झोंकने में सफल होते हैं। 'ए वेडनेसडे' से विख्यात हुए नीरज पांडे की दूसरी फिल्म है 'स्पेशल छब्बीस'। पिछली बार विषय और शिल्प दोनों में संजीदगी थी। इस बार विषय हल्का है। उसकी वजह से शिल्प अधिक निखर गया है।
अजय (अक्षय कुमार), शर्माजी (अनुपम खेर), जोगिन्दर (राजेश शर्मा) और इकबाल (किशोर कदम) देश के चार कोनों में बसे ठग हैं। चारों अपने परिवारों में लौटते हैं तो हम पाते हैं कि वे आम मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं। अमीर बनने का अपने हिसाब से उन्होंने ठगी का सुरक्षित रास्ता चुना है। वे बड़ी सफाई से अपना काम करते हैं। कोई सुराग नहीं छोड़ते। फिल्म में उनकी तीन ठगी दिखाई गई है, लेकिन अपनी 50वीं ठगी के लिए उन्होंने 'स्पेशल छब्बीस' का गठन किया है। बड़ा हाथ मार कर वे चैन की जिंदगी जीना चाहते हैं। उनके अंतिम अभियान की भनक असली सीबीआई को मिल चुकी है। असली और नकली के बीच चोर-सिपाही का खेल नीरज पांडे ने रोमांचक तरीके से पेश किया है। फिल्म में एक रहस्य भी है, जिसे अपनी पटकथा और पेशगी की पेंचीदगी में नीरज पांडे छिपा कर रखते हैं। क्लाइमेक्स के ठीक पहले का यह उद्घाटन फिल्म को और रोचक बना देता है।
लंबे समय के बाद इतनी सघन, सांद्र और सुसंबद्ध फिल्म आई है। नीरज पांडे ने हर दृश्य और प्रसंग में सघनता रखी है। चुस्त पटकथा के दुरुस्त फिल्मांकन से जिज्ञासा बनी रहती है। खास कर नकली और असली का भेद मालूम होने के बाद फिल्म की गति बढ़ जाती है। ऐसा लगता है कि नकली इस बार असली की चपेट में आ जाएगा। हम उत्सुक होते हैं, लेकिन हमारी उम्मीद पर नकली पानी फेर देता है। अपनी योजनाओं में वह ज्यादा सफल है। पता चलता है कि अजय कभी सीबीआई ऑफिसर बनना चाहता था, लेकिन अंतिम सलेक्शन में विफल रहा था। हल्का संकेत मिलता है कि सरकारी नौकरियों में हमेशा लायक का ही चुनाव नहीं होता। नीरज पांडे ने सभी किरदारों को अच्छी तरह गढ़ा है और उन्हें खास चरित्र दिया है। फिल्म में हीरोइन (काजल अग्रवाल) की मौजूदगी यों ही है। अजय के प्रेमप्रसंग और प्रेमगीत फिल्म में व्यवधान ही डालते हैं। क्या जरूरी है कि हर फिल्म में हीरो का रोमांटिक एंगल हो?
किरदारों को सही ढंग से गढ़ने के साथ ही नीरज पांडे ने उनकी भूमिकाओं के लिए उचित कलाकारों को चुना है। कॉमेडी और एक्शन की मशहूर छवि से अलग भूमिका में अक्षय कुमार प्रभावित करते हैं। पता चलता है कि सधे हाथों में आकर अक्षय कुमार भी नए आकार ले सकते हैं। इधर अभिनय से बेपरवाह हो चुके अनुपम खेर भी इस फिल्म में पुराना प्रभाव डालते हैं। अनुपम खेर की खासियत उनकी बॉडी लैंग्वेज है। शर्माजी की भूमिका में उनकी यह योग्यता दीखती है। मनोज बाजपेयी निस्संदेह बेहतरीन कलाकार हैं। 'स्पेशल छब्बीस' में नीरज पांडे ने उनका सदुपयोग किया है। किरदार में ढलने में वे माहिर हैं। सहयोगी भूमिकाओं में जिम्मी शेरगिल, राजेश शर्मा और किशोर कदम अभिनय से कथ्य को गाढ़ा करते हैं।
'स्पेशल छब्बीस' की एक खासियत परिवेश का सही चित्रण है। नौवें दशक की सच्ची घटनाओं पर आधारित यह फिल्म लोकेशन, लुक और प्रापर्टी के लिहाज से अपने समय का एहसास कराती है। बॉबी सिंह के कैमरे ने फिल्म की गति और विस्तार को अच्छी तरह समेटा और पकड़ा है। दो शब्द खटकते हैं-दिव्या दत्ता का नाम शांति की जगह शान्ती और आई कार्ड पर अन्वेषण की जगह अन्वेषन है।
फिल्म का पाश्‌र्र्व संगीत पटकथा की तेजी के अनुकूल है। दृश्यों में घटनाओं की गति और लय बनाए रखने में संगीत से उपयुक्त मदद ली गई है। गीत •ी गुंजाईश नहीं थी। गीत जबरन ढूसे गए हैं और अधिकांश एक्टर सिंगर की तरह अक्षय कुमार भी सुर में नहीं हैं।
अवधि- 144 मिनट
साढ़े तीन स्टार

Friday, September 7, 2012

फिल्‍म समीक्षा : राज 3

Review : Raaz 3 

डर के आगे मोहब्बत है 

-अजय ब्रह्मात्मज  

 अच्छी बात है कि इस बार विक्रम भट्ट ने 3डी के जादुई प्रभाव को दिखाने के बजाए एक भावनापूर्ण कहानी चुनी है। इस कहानी में छल-कपट, ईष्र्या, घृणा, बदला और मोहब्बत के साथ काला जादू है। काला जादू के बहाने विक्रम भट्ट ने डर क्रिएट किया है, लेकिन दो प्रेमी (खासकर हीरो) डर से आगे निकल कर मोहब्बत हासिल करता है।

कल तक टॉप पर रही फिल्म स्टार सनाया शेखर अपने स्थान से फिसल चुकी हैं। संजना कृष्ण पिछले दो साल से बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड ले रही हैं। सनाया किसी भी तरह अपनी खोई हुई पोजीशन हासिल करना चाहती है। पहले तो भगवान और मंत्र के जरिए वह यह कोशिश करती है। सफल नहीं होने पर वह काला जादू और तंत्र के चक्कर में आ जाती है। काला जादू राज-3 में एक तरकीब है डर पैदा करने का, खौफ बढ़ाने का। काला जादू के असर और डर से पैदा खौफनाक और अविश्वसनीय दृश्यों को छोड़ दें, तो यह प्रेमत्रिकोण की भावनात्मक कहानी है। फिसलती और उभरती दो अभिनेत्रियों के बीच फंसा हुआ है निर्देशक आदित्य अरोड़ा। वह सनाया के एहसानों तले दबा है। वह पहले तो उसकी मदद करता है, लेकिन काला जादू के असर से संजना की बढ़ती तकलीफ और अकेलेपन से उसे अपने अपराध का एहसास होता है। वह संजना से प्रेम करने लगता है, उसे बचाने के लिए वह आत्माओं की दुनिया में भी प्रवेश करता है। वह अपनी संजना को बचा कर ले आता है।
विक्रम भट्ट ने सनाया को खलनायिका के तौर पर पेश किया है। वह फिसल रही प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए युक्ति अपनाती है। नाम और शोहरत के आगे वह रिश्तों और मोहब्बत का भी ख्याल नहीं करती। हमें बीच में पता चलता है कि संजना और कोई उसकी सौतेली बहन है। सनाया सिर्फ उसकी तरक्की से ही नहीं जल रही है। उसके दिल और दिमाग में बचपन में पिता के बंटे प्यार की खलिश भी है। शुरू में हमें सनाया से सहानुभूति होती है, लेकिन उसकी करतूतों से पता चलता है कि वह दुष्ट औरत है। फिर संजना की बेचारगी हमें उसका हमदर्द बना देती है। इस हमदर्दी में हीरो भी उसके साथ आता है, इसलिए राज-3 की कहानी भावनात्मक रूप से छूती है।
बिपाशा बसु ने सनाया के ग्रे शेड को अच्छी तरह उभारा है। अभिनय की उनकी सीमाओं के बावजूद विक्रम भट्ट ने उनसे बेहतरीन काम लिया है। नयी अभिनेत्री ईशा गुप्ता उम्मीद जगाती हैं। उन्होंने अपने किरदार के डर को अच्छी तरह चित्रित किया है। इन दोनों के बीच पाला बदलते इमरान हाशमी जंचे हैं। इमरान हाशमी के अभिनय में निखार आया है।
विक्रम भट्ट ने दोनों हीरोइन के साथ लंबे चुंबन दृश्यों को रखकर इमरान हाशमी के दर्शकों को खुश रखने की कोशिश की है। बिपाशा बसु के साथ के अंतरंग दृश्यों के पीछे भी यही उद्देश्य रहा होगा।
तीन स्टार
अवधि-136 मिनट

 

Sunday, June 17, 2012

फिल्‍म समीक्षा :गैंग्‍स ऑफ वासेपुर- द हालीवुड रिपोर्टर-देबोरा यंग

Bollywood film maker Anurag Kashyap directs this two part gangster thrill ride about vengeance, greed and deep-rooted family rivalries.

An extraordinary ride through Bollywood’s spectacular, over-the-top filmmaking, Gangs of Wasseypur puts Tarantino in a corner with its cool command of cinematically-inspired and referenced violence, ironic characters and breathless pace. All of this bodes well for cross-over audiences in the West.  Split into two parts, as it will be released in India, this epic gangster story spanning 70 years of history clocks in at more than five hours of smartly shot and edited footage, making it extremely difficult to release outside cult and midnight venues. Its bow in Cannes’ Directors Fortnight met with rousing consensus, but it’s still an exotic taste at a delirious length.
Tipping his hat to Scorsese, Sergio Leone and world cinema as well as paying homage to Bollywood, writer-director-producer Anurag Kashyap (Black Friday) fashions a kind of “Once Upon a Time in Bengal”, a piece of violent entertainment that never seems to run out of invention or bullets. Less successful is the screenwriters’ attempt to embed the tale in a historical and political context, which simply doesn’t have room to emerge amid all the mayhem. Though the testosterone level is pumped to the max, there’s still room for funny jokes, fooling around and vibrant film characters that spring to life with mythical deeds and single-minded passions. No moralizing or regrets trouble their consciences, nor are they likely to bother the young male demographic that will account for the lion’s share of the audience.
Vengeance, blind ambition and greed oil the wheels of a long-running blood feud between competing godfathers in the Bengal mining towns of Wasseypur and Dhanbad.  The film opens with a teasing flash-forward to the end of the story, when a gang armed to the teeth with bombs and machine guns blast their way into the palace-fortress of the reigning don, Faizal Khan. The do enough damage to believe him dead, but the audience will be rightly suspicious that his body is not among the rubble.
PHOTOS: Cannes 2012: Opening Night Gala
In the first half of the film, the early history of Faizal’s family is told, beginning with the rise of his grandfather Shahid Khan in the days when coal mines represented wealth and power. An omniscient narrator, who survives throughout the film, explains how, from time immemorial, Muslims have fought other Muslims in the area, not for religious reasons, but out of pure evil. Back in 1941, the mythic robber Sultana Daku looted British trains; he is later imitated by the sadistic Shahid Khan (Jaideep Ahlawat), who is eventually murdered by the young owner of the coal mines, Ramadhir Singh, setting off a power struggle between the two clans that lasts till the final reel.
Shahid’s hot-blooded son Sardar shaves his head, vowing not to grow his hair until he exacts revenge for his father’s death. His passion for two women who will become his wives gives him a human, even comic, side.  There are only four female characters in this boys’ club, all beautiful firebrands whose bloodthirsty ambition for their offspring would put Ma Barker to shame. Nagma, Sardar’s first wife, bears him four sons including the gangsters Faizal, Danish and “Perpendicular” Khan, while his Hindi wife Durga belatedly contributes the fearsome “Definitive” Khan.  Each murderous son stars in a section of the story highlighting his outrageous misdeeds and amorous pursuits.
If the first half of the film sets the background to the present day, Part 2 has moments of humor and is an easier, if certainly no less bloody, watch thanks to its many salutes to popular music and cinema. Sardar’s violence has made him the godfather, a role he keeps until betrayed at a gas station. His body, riddled with bullets, is carted away by his maddened son Danish, who goes on a rampage. But Danish isn’t smart enough to last long, and the family black sheep Faizal (Nawazuddin Siddiqui), a hash smoking pothead, climbs the ladder to power after cutting off his best friend and betrayer’s head. Taking his cue from Michael Corleone, Faizal modernizes the family arsenal and buys some new-fangled pagers that have just come on the market to communicate with his gang. Cell phones will soon be added.
PHOTOS: Cannes Film Festival 2011's Hottest Films
His courtship of Mohsina (Huma Qureshi) is one of the film’s non-violent high points. Addicted to romantic movies, the lovely Mohsina looks like a Brooklyn moll and wears the same Ray Bans as Faizal, by which they recognize they are soul mates. Their sexy dialogue is a hoot, though the most blatant vulgarities are left to the lyrics (duly translated in the subtitles) to Sneha Khanwalkar’s sparkling score, pumped up with drumbeats at the first sign of gunplay.
It is now 2002 and Sardar’s strangely named teenage sons Definitive and Perpendicular are ready start their own violent careers, both defined by the narrator as “more terrifying than Faizal.” Their wanton killing sprees pepper the final scenes with death. Faizal is talked into going into politics, alarming his perennial nemesis Ramadhir Singh, now a corrupt old government minister. Their final reckoning takes place on election day as Faizal and his handful of loyalists lay siege to a hospital.
Kashyap, whose reputation as a screenwriter and controversial director reach a culmination in this film, is the real behind-the-scenes godfather, never losing control over the story-telling or hundreds of actors, and allowing tongue-in-cheek diversions in the second half that confirm his command over the sprawling material. In the spirit of Bollywood, Rajiv Ravi’s lensing is fast on its feet, with a continually moving camera that always seems to be in the right spot to capture the action.
Venue: Cannes Film Festival (Directors Fortnight), May 21, 2012.
A Viacom 18 Motion Pictures presentation of an Anurag Kashyap Films/Jar Pictures production in association with Tipping Point Films, Akfpl, Elle Driver.
Cast: Manoj Bajpayee, Richa Chaddha, Reema Sen, Tigmanshu Dhulia, Jaideep Ahlawat, Piyush Mishra, Mukesh Chhabra, Jameel Khan, Harish Khanna, Aditya Kumar, Murari Kumar, Huma Quershi, Yashpal Sharma, Nawazuddin Siddiqui, Raj Yadav, Raj Kumar Yadav
Director: Anurag Kashyap
Screenwriters: Anurag Kashyap, Zeishan Quadri, Akhilesh Jaiswal, Sachin Ladia
Producers: Anurag Kashyap, Sunil Bohra
Director of photography: Rajiv Ravi
Production Designer: Wasiq Khan
Costumes: Subodh Srivastava
Editor: Shweta Venkat
Music: Sneha Khanwalkar
Sales Agent: Elle Driver
No rating; 320 minutes

Thursday, June 14, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-स्‍क्रीन डेली-ली मार्शल

Gangs of Wasseypur

Dir: Anurag Kashyap. India. 2012. 318mins
Though it runs at over five hours, there’s never a dull moment in this Indian gangland epic by one of India’s hottest indie directors, Anurag Kashyap. Oozing visual style, laced with tight and often blackly comic dialogue, bolstered by tasty performances and a driving neo-Bollywood soundtrack, this Tarantino-tinged Bihari take on The Godfather has what it takes to cross over from the Indian domestic and Diaspora markets to reach out to action-loving, gore-tolerant theatrical and auxiliary genre audiences worldwide.
With characters appearing and disappearing as the bloodshed takes its toll, Gangs is set to the rhythm of a fast-paced dance.
The broad canvas and the genre focus suits Kashyap well. The director’s previous outings, from No Smoking to That Girl in Yellow Boots, feel a little like trial runs for this confident coming of age work, which despite the extended running time is given discipline and focus by the genre frame and the director’s deft control of gritty atmosphere and jaded, street-smart tone.
It takes some initial effort for non-Indian viewers in particular to make sense of the sheer weight of exposition needed to get the story going and to remember who’s who and how they’re all related, but voiceover, character-naming captions and sparing use of flashback and flashforward help clear things up, and after an hour so we know our way around. The film was split into two reasonably self-contained parts of 160 and 158 minutes for its Cannes Quinzaine debut, and maintaining this division into Gangs I and Gangs II would give reluctant exhibitors some Kill-Bill-style programming flexibility. 
Wasseypur is the district surrounding India’s coal capital, Dhanbad. It’s coal that provides the story’s historical starting point, after an opening baptism of fire sequence involving a gangland raid on a rival family that will be reprised, and explained, around five hours later.
A voiceover tells us that the story we’re about to see centres on two rival Wasseypur clans, the Khans and the Qureshis. It’s not a religious war - both are Sunni Muslim families – but a clan conflict born out of old rancours and strategic alliances. Backtracking to 1940, the film then uses a mix of voiceover, captions and action to charts the Indian takeover of the lucrative Dhanbad coal mining industry following independence.
Mine owner Ramadhir Singh (Dhulia) begins his rise to business and political dominance of the area by securing a contract to run a group of mines; he enlists former bandit Shahid Khan (Ahlawat) as his muscle man, but after a falling out sends a hit man to wipe out him and his family. However, Shahid’s son Sardar (played by Bajpayee once he becomes an adult) escapes and is nurtured on the desire for revenge against Singh, who has meanwhile become a powerful, corrupt politician with the entire district under his sway.
The impulsive, wily but not entirely bright Sardar rises to become a powerful underworld boss, but is cowed by both his wives – Nagma (Chaddha), a sort of youthful Mama Corleone who gives her husband three sons, and initially simpering Durga  (Sen), who shows her claws when Sardar abandons her and her son Definite. The latter, together with Nagma’s sons, serious Danish (Singh) and pot-smoking Faizal (Siddiqui) will become the key players in the family dynasty after Sardar is eliminated by the rival Qureshi clan – butchers by trade and by inclination.
The script alternates engagingly between scenes of sometimes stomach-churning violence and moments of domestic comedy, made more tasty by hard-boiled lines of dialogue like “in Wasseypur even the pigeons fly with one wing, because they need the other to cover their arse”. Locations have a dirty realism, but lighting and a real feel for colour matches keep things cinematic; it’s as if the camera keeps searching for beauty and pathos amidst the squalor.
With characters appearing and disappearing as the bloodshed takes its toll, Gangs is set to the rhythm of a fast-paced dance. Khanwalkar’s inventive, adrenalin-driven soundtrack nails the pace beautifully, switiching effortlessly between Spaghetti western trombone melodies and driving electronica melds of hip-hop and traditional music. Characters sometimes break into dance numbers, but these are always embedded in the action; and the song lyrics often comment sarcastically on what’s happening onscreen, as if mouthed by a Greek chorus of street punks.
Production companies: Tipping Point Films presents an AKFPL production in association with Jar Pictures
International sales: Elle Driver, www.elledriver.eu
Producers: Viacom 18 Motion Pictures – Guneet Monga, Sunil Bohra, Anurag Kashyap
Screenplay: Zeishan Quadri, Akhilesh, Sachin Ladia and Anurag Kashyap
Cinematography: Rajeev Ravi
Editor: Shweta Venkat Matthew
Production designer: Wasiq Khan
Music: Sneka Khanwalkar
Main cast: Manoj Bajpayee, Nawazuddin Siddiqi, Jaideep Ahlawat, Richa Chadda, Reemma Sen, Tigmanshu Dhulia

Wednesday, June 13, 2012

फिल्‍म समीक्षा : गैंग्‍स ऑफ वासेपुर-वैरायटी-मैग्‍गी ली

Gangs of Wasseypur

(India)



A Viacom 18 Motion Pictures release of a Tipping Point Films presentation of an AKFPL production in association with Jar Films. (International sales: Elle Driver, Paris.) Produced by Guneet Monga, Sunil Bohra, Anurag Kashyap. Directed by Anurag Kashyap. Screenplay, Zeishan Quadri, Akhilesh, Sachin Ladia, Kashyap, based on the story by Quadri.
With: Manoj Bajpayee, Jaideep Ahlawat, Tigmanshu Dhulia, Nawazuddin Siddiqui, Vineet Singh, Richa Chaddha, Reema Sen, Anurita Jha, Huma Qureshi, Rajat Bhagat, Vipin Sharma. (Hindi, Bhojpuri, Bihari dialogue)
The love child of Bollywood and Hollywood, "Gangs of Wasseypur" is a brilliant collage of genres, by turns pulverizing and poetic in its depiction of violence. A saga of three generations of mobsters cursed and driven by a blood feud, it's epic in every sense, not least due to its five-hour-plus duration. Helmer Anurag Kashyap puts auds on disturbingly intimate terms with this psychopathic family and its hardscrabble North Indian mining town, while encompassing nothing less than India's postwar history and deep-rooted problems in microcosm. Riveting as the film is, its sheer length presents a formidable challenge for theatrical distribs. Pic screened in two segments (159 minutes and 158 minutes, respectively) at its Cannes Directors' Fortnight preem. Although it will probably blast through international festivals where Kashyap is perceived as an edgy alternative to Bollywood, only part one has been booked for domestic theatrical release.
Unquestionably the magnum opus of Kashyap's seven released features, this saga allows the helmer to harness his visual flair and snappy narrative technique to a formidable subject, an extended historical timeframe (over 70 years) and a sizable production scale, while the quasi-rural backdrop requires him to rein in the kitschy excesses he displayed in urban-set works like "Dev. D" and "The Girl in Yellow Boots." Even with a tapestry of more than a dozen central characters, the screenplay is structured in such a way that half of them are granted their own chapters, so their personalities, foibles and mixed-up feelings toward each other emerge with coruscating clarity.
Absorbing styles as diverse as those of old-school Italo-American mafia classics a la Coppola, Scorsese and Leone, as well as David Michod's taut crime thriller "Animal Kingdom," Kashyap never lets his influences override the distinct Indian color. The pacing is machine-gun relentless, sweeping incoherence and repetitiveness under the carpet as it barrels forward with hypnotic speed.
The pulse-quickening prologue opens in 2004, with a shootout in Wasseypur that catches auds as off-guard as it does the Khan crime family, whose members are ambushed in their home by their rivals, the Qureshis, from neighboring Dhanbad. The origins of the strife between the two clans are then traced back to 1941, when the movement to oust the British left a power vacuum in the coal-mining industry, the only livelihood in a Muslim-populated region in North India. The family pioneer, Shahid Khan (Jaideep Ahlawat), blazes a trail as a train robber, exile, coal worker and merciless enforcer for mine owner/kingpin Ramadhir Singh (Rajat Bhagat), who has Shahid dispatched as soon as he becomes a threat.
When Shahid's son Sardar (Manoj Bajpayee) grows up, he moves back to Wasseypur in the 1960s and makes vengeance his vocation. Soon, he becomes sidetracked by empire building, a fracas with a guild of Qureshi butchers and, most of all, his bigamous pursuits. When his eldest son, Danish (Vineet Singh), marries Shama Parveen (Anurita Jha), daughter of butcher Ehsan (Vipin Sharma), an uneasy truce emerges, but it can't last: By the end of part one, Ramadhir (now played by Tigmanshu Dhulia) has become Sardar's nemesis.
Part two plays out in frenetic fashion as Sardar's sons -- libidinous Danish, pothead Faizal (Nawazuddin Siddiqui), money-grabbing Perpendicular and power-crazed Definite -- take turns auditioning for the role of most ruthless don.
As the town ushers in a new order in which every boy is a Godfather wannabe, the finale culminates in a spectacular orgy of bullets and blood that impresses even after five hours of murder, rape, castration, beheading and random carnage. Stirred into the hard-hitting action is a heady cocktail of spontaneous romanticism, cockily humorous dialogue, period-sensitive music of staggering range, and songs with lewd lyrics that form a caustic chorus.
On a fundamental level, the Khans mirror the power pyramid of postwar India, which, if one believes the film's mix of archival photography, footage and analytic commentary, is run by a few clans behaving like gangsters. Yet "Gangs of Wasseypur" is also a scrapbook of Bollywood references, observing the industry's hold on India's cultural imagination.
Sardar's chapter is the most fully realized, partly due to his complicated love life. His seduction of Hindu maid Durga (Reema Sen) invokes and reinvents Bollywood romance through a rapturous pageant of costume, dance and song that reps one of the film's intermittent sensual delights. Kashyap even suggests the gangsters are so brainwashed by glamour, they use their lives as fodder for Bollywood scripts.
Action veteran Bajpayee, who gets the most screentime, delivers a well-calibrated character study, treating Ahlawat's Shahid as a blueprint and wringing notable variations on it throughout; though his Sardar can charm when he needs to, he leaves no doubt of his intrinsic nastiness. The same could be said of all the members of the cruel Khan clan, brought to life by vigorous, hot-tempered thesping, in contrast with the cold efficiency of their rivals.
Coming off as a sort of Hamlet on hash, Faizal is the only figure here who grows sick of the cycle of violence, and Siddiqui sensitively limns the character's sense of world-weariness and self-loathing as he inherits the role of avenger, making him the most human character in the film.
Tech package is uneven, especially the sometimes deafening sound mix. Combo of 35mm and HD lensing by Rajeev Ravi captures the landscape's rugged majesty and the town's lumpen squalor, while staying in synch with the ever-changing action and mise-en-scene.
Camera (color/B&W, widescreen, 35mm/HD), Rajeev Ravi; editor, Shweta Venkat Matthew; music, Sneha Khanwalkar; production designer, Wasiq Khan; art director, Saikat Bose; set decorator, Raj Mohammed Shaikh; costume designer, Subodh Srivastava; sound (Dolby 5.1), Kunal Sharma; supervising sound editor, Zahir Bandukwala; re-recording mixers, Sharma, Bandukwala; visual effects supervisor, Gagan Vishwakarma; visual effects, 8 Fold; action choreographer, Shyam Kaushal; line producers, Prasanth Kumar, Rakesh Bhagwani, Shubh Shivdasani; associate producer, Ajay G. Rai; assistant directors, Sohil Shah, Sameer Kamble, Karuna Dutt, Jap Mehta, Neevaj Ghaywan, Siddhartha Gupt, Shilpa Srivastava, Vicky Kaushal, Rohit Pandey, Shasya Desai, Jahan Bakshi; second unit director, Shlok Sharma; second unit camera, Vinod Ellampally; casting, Mukesh Chhabra. Reviewed at Cannes Film Festival (Directors' Fortnight), May 21, 2012. Running time: 317 MIN. (I: 159 MIN., II: 158 MIN.)

Friday, June 8, 2012

फिल्‍म समीक्षा : शांघाई

Review : shanghai 

जघन्य राजनीति का खुलासा

-अजय ब्रह्मात्‍मज
शांघाई दिबाकर बनर्जी की चौथी फिल्म है। खोसला का घोसला, ओय लकी लकी ओय और लव सेक्स धोखा के बाद अपनी चौथी फिल्म शांघाई में दिबाकर बनर्जी ने अपना वितान बड़ा कर दिया है। यह अभी तक की उनकी सबसे ज्यादा मुखर, सामाजिक और राजनैतिक फिल्म है। 21वीं सदी में आई युवा निर्देशकों की नई पीढ़ी में दिबाकर बनर्जी अपनी राजनीतिक सोच और सामाजिक प्रखरता की वजह से विशिष्ट फिल्मकार हैं। शांघाई में उन्होंने यह भी सिद्ध किया है कि मौजूद टैलेंट, रिसोर्सेज और प्रचलित ढांचे में रहते हुए भी उत्तेजक संवेदना की पक्षधरता से परिपूर्ण वैचारिक फिल्म बनाई जा सकती हैं।
शांघाई अत्यंत सरल और सहज तरीके से राजनीति की पेंचीदगी को खोल देती है। सत्ताधारी और सत्ता के इच्छुक महत्वाकांक्षी व्यक्तियों की राजनीतिक लिप्सा में सामान्य नागरिकों और विरोधियों को कुचलना सामान्य बात है। इस घिनौनी साजिश में नौकशाही और पुलिस महकमा भी चाहे-अनचाहे शामिल हो जाता है।
दिबाकर बनर्जी और उर्मी जुवेकर ने ग्रीक के उपन्यासकार वसिलिस वसिलिलोस के उपन्यास जी का वर्तमान भारतीय संदर्भ में रूपांतरण किया है। इस उपन्यास पर जी नाम से एक फिल्म 1969 में बन चुकी है। सची घटना पर आधारित इस उपन्यास को दिबाकर बनर्जी और उर्मी जुवेकर ने भारतीय रंग और चरित्र दिए हैं। मूल कहानी और फिल्म से शांघाई में कई अपरिहार्य समानताएं मिलेंगी, लेकिन सोच और संवेदना में यह पूरी तरह से भारतीय फिल्म है। दिबाकर बनर्जी ने उर्मी जुवेकर के साथ तीक्ष्ण कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए सभी चरित्रों को भारत नगर में स्थापित किया है।
भारत नगर कस्बे से इंडिया बिजनेश पार्क में तब्दील हो रहा है। शांधाई बन रहा है। प्रदेश की मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय सहयोगी राजनीतिक पार्टी तक का ध्यान इस कस्बे की प्रगति पर टिका है। सभी तरक्की चाहते हैं और जय प्रगति के अभिवादन के साथ बातचीत करते हैं। निर्माण, विकास, प्रगति की ऐसी अवधारणा के विरोधी हैं डॉ ़ अहमदी। डॉ ़ अहमदी ने किस की प्रगति? किसका देश? नामक पुस्तक भी लिखी है। विदेश में अध्ययन-अध्यापन कर देश लौटे डॉ ़ अहमदी का एक ही लक्ष्य है कि विनाशकारी प्रगति को रोका जाए। वे स्वार्थी और सामाजिक लाभ से प्रेरित राजनीतिक चालों को बेनकाब करते रहते हैं। उन्होंने ऐसी कुछ योजनाओं पर जागृति फैला कर रोक लगवा दी है। अब वे भारत नगर आए हैं।
भारत नगर में डॉ ़ अहमदी के आने की खबर से शालिनी सहाय चिंतित हैं। शालिनी सहाय को भनक मिली है कि डॉ ़ अहमदी को इस बार जाने नहीं दिया जाएगा। उनकी हत्या हो जाएगी। परफेक्ट साजिश के तहत एक सड़क दुर्घटना में डॉ ़ अहमदी की मौत हो भी जाती है। उनकी विधवा इस दुर्घटना को हत्या मानती हैं और नेशनल टीवी पर इस हत्या की जांच की मांग करती है। मुख्यमंत्री के आदेश से जांच आरंभ होती है। इस जांच कमेटी के प्रमुख मुख्यमंत्री के प्रिय अधिकार टी ए कृष्णन हैं। ईमानदार जांच में जब कृष्णनन सच के करीब होते हैं तो उन्हें सलाह दी जाती है कि वे इस जांच को क्रिमिनल इंक्वारी कमेटी को सौंप दें। वे मान भी जाते हैं। उन्हें मुख्यमंत्री ने स्टाकहोम भेजने का प्रलोभन दे रखा है। बहरहाल, ऐन वक्त पर कृष्णनन को एक सुराग मिलता है। कृष्णन के व्यक्तित्व के सही धातु की जानकारी अब मिलती है। वह रफा-दफा हो रहे मामले को पलट देता है। साजिशों के तार मिलते और जुड़ते हैं और उनके पीछे के हाथ दिखते हैं तो पूरी राजनीति नंगी होकर खड़ी हो जाती है।
दिबाकर बनर्जी ने किसकी प्रगति? किसका देश के सवाल और उसकी पीछे की राजनीति को बगैर किसी लाग लपेट के उद्घाटित कर दिया है। सत्ता का समीकरण चौंकता है। अपनी कहानी के लिए दिबाकर बनर्जी ने उपयुक्त किरदार चुने हैं। मूल उपन्यास के चरित्रों के अलावा कुछ नए चरित्र जोड़े हैं। उन्होंने अपना ध्यान नहीं भटकने दिया है। फिल्म विषय के आसपास ही घूमती है। आयटम सौंग और डॉ ़ अहमदी की हत्या के इंटरकट राजनीति की जघन्यता जाहिर करते हैं।
शांघाई में इमरान हाशमी ने अपनी छवि से अलग जाकर कस्बाई वीडियोग्राफर की भूमिका को जीवंत कर दिया है। उन्होंने निर्देशक की सोच को बखूबी पर्दे पर उतारा है। शुरू में रोचक और हास्यास्पद लग रहा चरित्र क्लाइमेक्स में प्रमुख और महत्वपूर्ण चरित्र बन जाता है। इमरान हाशमी ने इस ट्रांजिशन में झटका नहीं लगने दिया है। टी ए कृष्णन जैसे रूखे, ईमानदार और सीधे अधिकारी की भूमिका में अभय देओल जंचते हैं। उनका किरदार एकआयामी लगता है, लेकिन चरित्र की दृढ़ता और ईमानदारी के लिए वह जरूरी था। अभय देओल पूरी फिल्म में चरित्र को जीते रहे हैं। कल्कि कोइचलिन दुखी और खिन्न लड़की की भूमिका में हैं। उन्हें टाइपकास्ट होने से बचना चाहिए।
खैर, इस फिल्म में उन्हें अधिक संवाद और दृश्य नहीं मिले हैं। भेद खुलने के दृश्य में उनकी प्रतिक्रिया प्रभावित करती है। भग्गू के किरदार में पित्ताबोस ने उन्मुक्त अभिनय किया है। फारुख शेख और प्रोसनेजीत अनुभवी अभिनेता हैं। वे भाव और संवाद की अभिव्यक्ति में सहज और स्वाभाविक हैं।
इस फिल्म का पाश्‌र्र्व संगीत उल्लेखनीय है। दृश्यों की नाटकीयता बढ़ाने में माइकल मैकार्थी़ के पाश्‌र्र्व संगीत का विशेष योगदान है। इन दिनों थ्रिलर फिल्मों में पाश्‌र्र्व संगीत के नाम पर शोर बढ़ गया है। शांघाई के छायांकन में दृश्यों के अनुरूप की गई लाइटिंग से भाव उभरे हैं। विभिन्न चरित्रों को उनके स्वभाव के अनुसार लिबास और लुक दिया गया है। इसके लिए मनोषी नाथ और रुशी श्मा बधाई के पात्र हैं। शांघाई में विशाल-शेखर का संगीत सामान्य है। भारत माता की जय गीत ही याद रह पाता है।
**** 1/2 साढ़े चार स्टार

Saturday, January 24, 2009

फ़िल्म समीक्षा-राज़

-अजय ब्रह्मात्मज
डर व सिहरन तो है लेकिन..
राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज में मोहित सूरी डर और सिहरन पैदा करने में सफल रहे हैं, लेकिन फिल्म क्लाइमेक्स में थोड़ी ढीली पड़ जाती है। इसके बावजूद फिल्म के अधिकांश हिस्सों में मन नहीं उचटता। एक जिज्ञासा बनी रहती है कि जानलेवा घटनाओं की वजह क्या है? अगर फिल्म के अंत में बताई गई वजह असरदार तरीके से क्लाइमेक्स में चित्रित होती तो यह फिल्म राज के समकक्ष आ सकती थी।
नंदिता (कंगना रानाउत) और यश (अध्ययन सुमन) एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं। नंदिता का सपना है कि उसका एक घर हो। यश उसे घर के साथ सुकून और भरोसा देता है, लेकिन तभी नंदिता के जीवन में हैरतअंग्रेज घटनाएं होने लगती हैं। हालांकि उसे इन घटनाओं के बारे में एक पेंटर पृथ्वी (इमरान हाशमी) ने पहले आगाह कर दिया था। आधुनिक सोच वाले यश को यकीन नहीं होता कि नंदिता किसी प्रेतात्मा की शिकार हो चुकी है। नंदिता अपनी मौत से बचने के लिए पृथ्वी का सहारा लेती है और कालिंदी नामक गांव में पहुंचती है। उसे पता चलता है कि एक आत्मा अपने अधूरे काम पूरे करने के लिए ही यह सब कर रही है। उसका मकसद गांव के पास स्थित कीटनाशक फैक्ट्री को बंद करवाना है, ताकि वार्षिक मेले में एकत्रित होने वाले श्रद्धालु कुंड के विषैल जल से बीमार न हों।
मोहित सूरी ने आस्तिक और नास्तिक दोनों तरह के दर्शकों को फिल्म से जोड़ने की कोशिश की है जिसके लिए कबीर के दोहों का सहारा लिया गया है, लेकिन क्लाइमेक्स में निर्देशन कमजोर पड़ जाने के कारण हॉरर फिल्म का रोमांच चला जाता है। कहीं-कहीं नकल भी की गई है। विक्रम भट्ट ने 1920 में भूत को भगाने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करवाया था, तो इस फिल्म में मोहित ने किरदारों के हाथ में गीता थमा दी है। शापित युवती की भूमिका के साथ कंगना ने न्याय किया है। सीरियल किसर इमेज से उबरे इमरान हाशमी अच्छे लगते हैं। फिल्म की उपलब्धि अध्ययन सुमन हैं। उनका आत्मविश्वास पर्दे पर दिखता है। मुश्किल दृश्यों में नए होने के कारण लड़खड़ाने के बावजूद पर्दे पर उनका आत्मविश्वास झलकता है।
**1/2

फ़िल्म समीक्षा:स्लमडाग करोड़पति

-अजय ब्रह्मात्मज

मुंबई की मलिन बस्ती में प्रेम

आस्कर के लिए दस श्रेणियों में नामांकित हो चुकी 'स्लमडाग मिलिनेयर' हिंदी में 'स्लमडाग करोड़पति' के नाम से रिलीज हुई है। अंग्रेजी और हिंदी में थोड़ा फर्क है। गालियों के इस्तेमाल के कारण 'स्लमडाग मिलिनेयर' को ए सर्टिफिकेट मिला है, जबकि 'स्लमडाग करोड़पति' को यू-ए सर्टिफिकेट के साथ रिलीज किया गया है। शायद निर्माता चाहते हों कि 'स्लमडाग करोड़पति' को ज्यादा से ज्यादा हिंदी दर्शक मिल सकें।
'स्लमडाग करोड़पति' विकास स्वरूप के उपन्यास 'क्यू एंड ए' पर आधारित है। फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से उपन्यास में कुछ जरूरी बदलाव किए गए हैं और कुछ प्रसंग छोड़ दिए गए हैं। उपन्यास का नायक राम मोहम्मद थामस है, जिसे फिल्म में सुविधा के लिए जमाल मलिक कर दिया गया है। उसकी प्रेमिका भी लतिका नहीं, नीता है। इसके अलावा उपन्यास में नायक के गिरफ्तार होने पर एक वकील स्मिता शाह उसका मामला अपने हाथ में लेती है। उपन्यास में राम मोहम्मद थामस धारावी में पला-बढ़ा है। फिल्म में उसे जुहू का बताया गया है। उपन्यास की शुरूआत में ही पता चलता है कि राम सभी सवालों के जवाब देकर एक अरब जीत चुका है। यह घटना शो आरंभ होने के कुछ हफ्तों के अंदर हो गयी है, जबकि शो के निर्माताओं ने सोचा था कि आठ महीनों के बाद कोई विजेता बनेगा। शो के निर्माताओं के पास विजेता को देने के लिए एक अरब रूपए नहीं है, इसलिए भी वे राम मोहम्मद थामस को धोखेबाज साबित करने में लगे हैं। यह एक बड़ी साजिश है,जो फिल्म से गायब है।
उपन्यास से इस फर्क के बावजूद जमाल मलिक (देव पटेल) की कहानी दिल को छूती है। मुंबई शहर की निचली बस्तियों का पुरजोश जीवन इस फिल्म का आधार है। विषम परिस्थितियों में भी इस बस्ती के लोगों की जिजीविषा प्रेरित करती है। इन मलिन बस्तियों में हर कदम उम्मीद धडक़ती रहती है और वही उन्हें जिंदा रखती है। जमाल मलिक और सलीम मलिक दोनों भाइयों की जिंदगी दो दिशाओं में मुड़ती है, फिर भी प्रेम, विश्वास और आशा से वे बंधे रहते हैं। जमाल मलिक के दिए सही जवाब वास्तव में सवालों के साथ उसकी जिंदगी की घटनाओं से जुड़ जाते हैं, जिसे फिल्म के नायक और निर्देशक नसीब की बात कहते हैं। जमाल की किस्मत में लिखा था कि वह करोड़पति बन जाएगा। चित्रण और फिल्मांकन की वास्तविकता के बावजूद यह सोच उन बस्तियों के बाशिंदों के जीवन संघर्ष को बेमानी ठहरा देती है। अगर नसीब और किस्मत का लिखा ही होता है तो फिर मनुष्य के सारे प्रयासों का कोई प्रयोजन नहीं बनता।
'स्लमडाग करोड़पति' पर आधारहीन विवाद हुए हैं। अमिताभ बच्चन के साथ जुड़े प्रसंग में तथ्यों की गलत व्याख्या की गयी। इस फिल्म में गरीबी, मुंबई की निचली बस्ती और निचली बस्तियों के सारे कुकर्म हैं। उन्हें निर्देशक डैनी बॉयल ने अपने नजरिए से पेश किया है। डैनी ने फिल्म के लिए इसी उपन्यास को चुना, इससे स्पष्ट हो जाता है कि वे किस उद्देश्य और मंशा के साथ
फिल्म बना रहे थे। 'स्लमडाग करोड़पति' एक विदेशी के नजर से चित्रित भारत है, जो एक भारतीय उपन्यासकार की कृति पर आधारित है।
'स्लमडाग करोड़पति' एक स्तर पर जमाल और लतिका की प्रेमकहानी भी है। दोनों का प्रेम कामयाब होता है और वे अंत में मिल जाते हैं। अवसाद का सुखद अंत होता है।

फिल्म में मलिक भाइयों की भूमिका में देव पटेल और मधुर मित्तल ने शानदार अभिनय किया है। लतिका की भूमिका में फ्रेइदा पिंटो स्वाभाविक हैं। क्विज शो के होस्ट के रूप में संवादों और मुद्राओं में अनिल कपूर 'कौन बनेगा करोड़पति' के पहले मेजबान अमिताभ बच्चन से प्रेरित हैं। इरफान खान छोटी भूमिका में प्रभाव पैदा करते हैं। वे दृश्य की बारीकियों को अच्छी तरह समझ लेते हैं। सौरभ शुक्ला और महेश मांजरेकर ने समुचित जिम्मेदारी निभायी है।
फिल्म का पाश्र्व संगीत और गीत-संगीत विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। ए आर रहमान ने ध्वनियों के सुनिश्चित क्रम एवं आरोह-अवरोह से दृश्यों का प्रभाव बढ़ा दिया है। फिल्म के अंत में टायटल के साथ आया गीत 'जय हो' खुशी और जोश का संचार करता है।