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Monday, October 5, 2009

हिन्दी टाकीज-जिंदगी है तो सिनेमा है और सिनेमा ही जिंदगी है-सोनाली सिंह



हिन्दी टाकीज-४८




सोनाली से चवन्नी की मुलाक़ात नहीं है। तस्वीर से ऐसा लगता है कि वह खूबसूरत और खुले दिल की हैं। जुगनुओं के पीछे भागती लड़की के हजारों सपने होंगे और उनसे जुड़ी लाखों ख्वाहिशे होंगी। चवन्नी चाहेगा कि रोज़ उनकी कुछ खेअहिशें पूरी हों.वैसे सोनाली कम से कम २२-२३ चीजों पर पक्का यकीं करती हैं। यकीनयाफ्ता सोनाली निश्चित ही ज़िन्दगी को भरपूर अंदाज़ में जीती होंगी। चवन्नी ने उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी हैं,पर भरोसे के करीबियों से उनकी तारीफें सुनी है। उनके लेखन का एक नमूना यहाँ लिखे शब्द भी है...आप उनसे संपर्क करना चाहें तो पता है... sonalisingh.smile@gmail.com


चवन्‍नी के हिन्‍दी टाकीज का कारवां जल्‍दी ही 50वे पड़ाव पर पहुंच जाएगा। सफर जार रहेगा और आप के संस्‍मरण ही चवन्‍नी के हमसफ़र होंगे। आप भी लिखें और पोस्‍ट कर दें ... chavannichap@gmail.com
यूं तो मैं जब तीन माह की थी, मैंने अपनी मौसी के साथ सिनेमा देखने जाना शुरू कर दिया था। मौसी बताती हैं कि मैं बिना शोरगुल किये चुपचाप बड़े शौक से तीन घंटे तक पिक्‍चर देख लिया करती थी। कुछ बड़ी हुई तो चाचा लोगों के साथ सिनेमा हॉल जाना शुरू कर दिया। 'नि‍गाहें', 'नगीना', 'चालबाज'... सारी की सारी श्रीदेवी की फिल्‍में... इतनी देखी, इतनी देखी कि अब मेरी आंखें श्रेदेवी को स्‍क्रीन पर देखते ही पलट जाती है। दोनों चाचा की फेवरिट हीरोइन श्रीदेवी थीं। एक के साथ पिक्‍चर देखकर आओ तो दूसरे के साथ भी वही पिक्‍चर देखने जाना पड़ता था। मैं दोनों में से किसी को भी नाराज नहीं कर सकती थी।
जब भारतीय सिनेमा के रूपहले पर्दे पर नीलम की एंट्री हुई तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली। उसके बाद काफी वर्षों तक रंगीन पर्दे का सफर थम गया। गोया अब मैं बड़ी हो गयी थी और हॉल में शरीफ लड़कियों के जाने का चलन शुरू नहीं हुआ था। रोज रात नौ के बाद एक नयी मूवी देखो। हम पापा के घर से बाहर जाने का बेसब्री से इंतजार किया करते थे।
तभी एक महान अभिनेत्री दिव्‍या भारती पर्दे पर अवतरित हुई। कितनी सुंदर थीं वो।. तब उनकी उपमा के अनरूप 'क्‍यूट' शब्‍द से हम वाकिफ नहीं थे। अचानक हादसे में जब उनकी सफलताओं का कारवां रूक गया तो हमारे कस्‍बे की गति थम गयी और मोहल्‍ले के लड़कों ने गम से खाना-पीना बंद कर दिया। रियली तब एहसास हुआ कि सिनेमा की पैठ भारतीय जनमानस में कितनी गहरी है।
चलिए।. आगे बढ़ते हैं। अपने स्‍वीट सिक्‍सटीन से सिनेमाघरीय अनुभव किसी जादुई कल्‍पना जैसे चंद्रकांता को पढ़ने से कम रोमांचक नहीं था। पहली बार घर से दूर लखनऊ में हॉस्‍टल में रह रही थी। हॉल का नाम था -'नॉवल्‍टी' और पिक्‍चर थी 'कुछ कुछ होता है'। निहायत देखने लायक सीन था जब हम कुल मिलाकर चालीस लड़कियां नॉवल्‍टी में अपनी वार्डन के साथ पिक्‍चर देखने गये थे। मिनी बस से हॉल तक एक लाइन में लगकर गये थे। साथ ही साथ वार्डन गिनती करती जा रही थीं कि कहीं एकाध अपने ब्‍यायफ्रेंड के साथ गुम तो नहीं हो गयी। एक-एक कर के हम सभी अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गये। हमारी वार्डन और हॉस्‍टल के गार्ड किनारे वाली सीटों पर बैठे हुये थे। भरसक सुरक्षा इंतजामों के बीच हमने मूवी का लुत्‍फ उठाया। पिक्‍चर का खुमार इतना था कि हॉस्‍टल लौटकर सभी के नाम फिल्‍म के पात्रों के नाम पर रख दिये गये। राहुल, टीना, वगैरह-वगैरह। हमने अपनी वार्डन का नाम मिस ब्रिगेन्‍जा रख दिया। वार्डन के साथ फिल्‍म देखने जाने का सिलसिला अजय देवगन और काजोल स्‍टारर 'प्‍यार तो होना ही था' तक चला।
अब हमने अपने-अपने ग्रुप के साथ चोरी-छिपे सिनेमा हॉल जाना शुरू कर दिया था। हॉस्‍टल में एक्‍सट्रा क्‍लासेज का बोलकर मूवीज का एक्‍सट्रा मजा लिया करते थे कि अचानक यह हादसा हो गया।
हम कहीं बाहर से लौटे थे कि देखा रूम नम्‍बर दस में लड़कियों का जमावड़ा बैठा रो रहा था। रूम नम्‍बर दस हॉस्‍टल का सबसे बड़ा रूम था इसलिये हमारी बैठक वहीं जमा करती थी। एक अफवाह इस सरापे की वजह थी कि एचआईवी इन्‍फेक्टिव लोगों ने अपना ग्रुप बना लिया है। वे 'न हम जीयेंगे और न ही तुमको जीने देंगे' की पॉलिसी पर काम कर रहे थे। वह यहां-वहां हर जगह फैले हुये थे। जो भी लड़की पिक्‍चर देखने जाती थी वे एक सीरिंज की सहायता से इन्‍फेक्‍शन आगे बढ़ा देते थे। वे इतने एक्‍सपर्ट थे कि किसी भी शिकार को एक चींटी काटने से ज्‍यादा एहसास नहीं होता था। जब लोग मूवी देखकर लौटते थे और कपड़े चेंज करते थे तब उन्‍हें अपनी पीठ पर एक स्‍टीकर चिपका मिलता था 'वेलकम टू एचआईवी फैमिली'।
हमें एचआईवी के बारे में कोई विस्‍तृत जानकारी नहीं थी। मसलन कि यह कोई जानलेवा बीमारी है और छूने से फैलती है। रोने वालियों को पूरा यकीन था कि वे एचआईवी इन्‍फेक्‍टेड हो चुकी हैं, क्‍योंकि पिछले हफ्ते क्‍लासेज बंक कर के पिक्‍चर देखकर आयी थीं। हम उन्‍हें लगातार तसल्लियां दे रहे थे कि अरे तुम्‍हारी पीठ पर तो 'वेलकम टू एचआईवी फैमिली' वाला स्‍टीकर चिपका मिला ही नहीं तो कैसे हो सकता है।
खैर या तो अफवाह जबरजस्‍त थी या बहुत मासूम थी। हमने बात दिल पर ले ली और हॉल से नाता तोड़ दिया।
टाइम बीतता गया। समय के थपेड़े कभी यहां तो हमें कभी वहां अपने साथ उड़ाते रहे। झांसी आकर तो मेरी लॉटरी खुल गयी। मिनर्वा, नटराज, खिलौना और चांदनी... चारो की चारो टॉकीज एक साथ इलाइट चौरहे पर। और साथ जाने के लिये दोस्‍तों-रिश्‍तेदारों की कंपनी बिल्‍कुल फ्री। हमें सिर्फ पिक्‍चर देखने जाने से मतलब होता था। कौन सी पिक्‍चर चल रही है - यह हॉल जाकर पता चलता था। हम कुछ भी देखते थे मसलन अक्षय कुमार की सड़ी से सड़ी पिक्‍चर और बहाना 'लाइट नहीं आ रही है चलो, पिक्‍चर देखकर आते हैं।' जैसा कुछ भी हो सकता था। सीटों का सिस्‍टम एकदम मस्‍त था, कोई कहीं भी बैठ सकता था। फर्स्‍ट क्‍लास वाले भी बालकनी में आकर बैठ जाया करते थे। फिर जब बालकनी वाले अपनी सीट की दुहायी देते थे तब टिकट चेकर आकर टिकिट चेक करता था और फर्स्‍ट क्‍लास वाली को वापस अपनी क्‍लास में भेज दिया करता था। हमें याद है कि जब 'पहेली' देखने गये। आधा घंटा लेट पहुंचे थे। उस पर आधा घंटा अंधेरे में अपनी सीट ढूंढते हुये हम लोगों के लिये खुद एक पहेली बन गये थे। शाहरुख खान की फिल्‍मों का जुनून इस कदर था कि फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो ब्‍लैक में टिकिट लेकर देखा करते थे।
झांसी मे तब नारमली पांच के बाद लड़कियां पिक्‍चर देखने नहीं जाया करती थी। फैमिली भी जाने से पहले सोचा करती थी। तभी हमने यह एडवेंचर किया था। अब फैमिली भी जाने से पहले सोचा करती थी। तभी हमने यह एडवेंचर किया था। अब शायद आप लोगों को यह मामूली बात लगे पर हमारे लिये बड़ा कारनामा थी जिसे याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 'कल हो न हो' रिलीज हो चुकी थी। यूनिवर्सिटी के टाइम शेड्यूल की वजह से शो देखने निकल नहीं पा रहे थे। बस छह से नौ का शो ही देख सकते थे। नवम्‍बर की गुलाबी सर्दियां चल रही थी। मिशन को कामयाब बनाने के लिये मैंने अपनी जूनियर प्रियंका को साथ ले लिया। हम दोनों अच्‍छे पैकअप होकर हॉस्‍टल से निकले। हमने अपने-अपने चेहरे शॉल से ढक रखे थे। डर इतना लग रहा था कि पूछो मत। अगर कोई जान-पहचान वाला देख लेता तो अच्‍छी तरह खबर लेता। खबर क्‍या मामू, वॉट लग जाती। इस तरह हमें चोरी-छिपे, डरे-सहमे सिनेमा हॉल पहुंचे। देखते क्‍या हैं बालकनी में सिर्फ पांच पुरुष और हमें मिलाकर कुछ सात स्‍त्री-पुरुष। बुरे फंसे... खैर कुछ बुरा नहीं घटा। हमने खुश तबियत से पिक्‍चर का मजा लिया और खैरियत से वापस लौट आये। जब वापस हॉस्‍टल आकर हमने अपना कारनामा सुनाया तो सभी ने दांतो तले उंगली दबा ली।
जिंदगी का रुख एकबारगी फिर लखनऊ की ओर मुड़ गया। वहां WAVE सिनेमा हॉल हमारे जीवन का पर्याय बन गया। मैंने और मेरी परमप्रिय सखी प्रज्ञा ने वहां हर हफ्ते पिक्‍चर दरेखने का रिकार्ड बनाया था। बात कुछ यूं थी कि हम थे तो बचपन की सखियां पर हमारी रुचियां कहानी घर-घर की बहुओं की तरह अलग-अलग थी। इसका सोल्‍यूशन कुछ इस तरह निकला कि एक पिक्‍चर वह मेरी पसंद की देखती थी फिर दूसरी पिक्‍चर मैं उसकी पसंद की। इस तरह हम कभी-कभार हफ्ते में दो पिक्‍चरें भी देख लिया करते थे। WAVE सिनेमा हॉल में लोग-बाग हम दोनों को देखने के इस कदर यूज्‍ड टू हो गये थे कि हमें क्‍यू में खड़े हुये देर नहीं होती थी कि मशीन ऑटोमैटिकली अपर कोर्नर सीट के दो टि‍किट निकाल कर दे दिया करती थी। जिंदगी है तो सिनेमा है और सिनेमा ही जिंदगी है - यह सिलसिला दिल्‍ली आकर भी जारी है। पंसदीदा फिल्‍मों की लिस्‍ट बहुत लंबी है पर उनके उनके साथ कुछ मीठी-मीठी बातें जुड़ जाती है और उस फिल्‍म को यादगार बना देती है।
(1) 'जोधा अकबर' तीन घंटे से ऊपर की फिल्‍म है हमें मालूम नहीं था। हम अपने तयशुदा समय से ऊपर पिक्‍चर देखकर लौटे। नाइट शो था। हॉस्‍टल का गेट बंद हो चुका था। मिन्‍नतें करने के बाद गेट तो खुल गया पर सिर्फ चाय पर रात काटनी पड़ी।
(2) 'कभी अलविदा न कहना' शायद पहली फिल्‍म थी। जिसे देखकर मैं और प्रज्ञा बहुत रोये। देखते हुये रोये सो अलग वापस लौटकर भी बहुत रोये।
(3) 'तारे जमीन पर' देखते वक्‍त हमने पूरी पिक्‍चर के दौरान बैकग्राउंड में लोगों की सुबकियां सुनी थी।
(4) 'चलते-चलते' देखने के लिये हमने ब्‍लैक टिकिट्स के लिए मारा-मारी की थी।
(5) 'कल हो न हो' देखने के लिए बहादुरी का कोई अवार्ड तो बनता है ना।.
(6) 'माचिस' और 'इस रात की सुबह' लगातार एक के बाद एक देखी थी। पिक्‍चर देखने के बाद मटरगश्‍ती सुबह तक चालू रही थी।
(7) 'दस कहानियां' देखते वक्‍त हमने अपने बॉस को उनकी गर्लफ्रैन्‍ड के साथ रंगे-हाथो पकड़ा था।
(8) 'पहेली' देखने के लिये अपनी सीट ढूंढ़ते-ढूंढते हम ही लोगों के लिये पहेली बन गये थे।
(9) 'धूम 2' देखने हॉस्‍टल की फौज गयी थी। जैसे ही रि‍तिक रोशन पर्दे पर आता हमारी जांबाज लड़‍कियां सीटियां बजानी शुरू कर देती। आसपास के अंकल हमारा दंगल देखकर हैरान थे।
(10) 'लव आज कल' छोटी रील की फिल्‍म। इम्तियाज अली से बेहद नाराजगी है। इतनी छोटी पिक्‍चर क्‍यों बनायी कि टिकट, को‍ल्‍डड्रिंक और पॉपकार्न के पैसे ही नहीं वसूल होते।

Tuesday, September 1, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा देखने का सुख - विपिन चन्द्र राय

हिन्दी टाकीज-४६
मुझे सिनेमची भी कह सकते हैं। सिनेमा देखने की लत उम्र के किस पड़ाव में लगी, याद नहीं, पर पचासवें पड़ाव तक कायम है और आगे भी कायम रहेगा। असल में मेरे पिताजी नगर दंडाधिकारी थे, सो उन्हें पास मिलता था। वे फिल्म नहीं देखते थे तो पास का सदुपयोग करना मेरा ही दायित्व बनता था। वैसा मैं करता भी था, शान से जाता था, गेटकीपर सलाम बजाता था और वीआइपी सीट पर मुझे बिठा देता था। यहां तक कि इंटरवल में मूंगफली भी ला देता था। मैं मूंगफली फोड़ता हुआ सिनेमा दर्शन का सुख उठाता था। क्या आंनद दायक दिन थे वे, बीते दिनो की याद जेहन में समायी हुई हैं।
मेरे छोटे से कस्बे जमालपुर में दो सिनेमा हाल अवंतिका और रेलवे था। उसमें प्रत्येक शनिवार को सिनेमा देखना मेरी दिनचर्या में शामिल था। सिनेमा बदले या वही हो, दोबारा देख लेता था। मुंगेर में तीन सिनेमा हाल था विजय, वैद्यनाथ और नीलम। उस जमाने में नीलम सबसे सुंदर हाल था। मुंगेर जाता तो बिना सिनेमा देखे वापस आने का सवाल नहीं था। पास जो उपलब्ध रहता था। उस जमाने में मनोरंजन का एकमात्र सर्वसुलभ साधन सिनेमा ही था। बस इसलिए वही देखता था। ढेर सारी फिल्में देखी हैं। नाम गिनाने लगूँ तो दो-चार पेज भर जायेगा। पूरे होशोहवास में बॉबी से याद आता है। फिर तो यह दौर लगातार जारी रहा। मेरा दुर्भाग्य कि बाबूजी का ट्रांसफर हो गया और फ्री सिनेमा देखना भी बंद हो गया।
संयोगवश मेरे घर के पास ही प्रकाश प्रेस था, वह अवंतिका का टिकट छापता था। प्रेस के मालिक का बेटे प्रभुनारायण से मेरी दोस्ती थी। बस उसके साथ प्रतिदिन नौ से बारह का रात वाला शो देखने जाने लगा। एक ही हाल, एक ही सिनेमा, रोज देखता, पर थकता नहीं था। असल में हमलोगों का अपना घर उस समय बन रहा था, इसकी रखवाली मैं अकेला ही करता था। मां और भाई अलग घर में,जो भाड़े का था, उसमें रहते थे। उस घर से आठ बजे तक खाना खाकर मैं बन रहे घर में आ जाता था। फिर प्रभु के साथ निकल जाता था, किसी को पता भी नहीं चलता था और मजे से सिनेमा देखने का सुख लाभ उठाता था।
क्या सुहाने दिन थे। सिनेमा हॉल में घुप्‍प अंधेरा और एकटक सबकी निगाह बड़े से परदे पर। हीरो के धांसू डायलाग पर तालियों की गड़गड़ाहट, सीटियों की गूंज, मस्ती का आलम। इन कार्यो में मेरा भी योगदान रहता था। कोई कोई दर्शक तो पैसे भी उछालते, पर मैं नहीं। क्योंकि देखता था कि गेटकीपर टार्च जलाकर पैसे चुन रहा है। मुझे यह मूर्खतापूर्ण काम लगता था, सो मैं कभी भी पैसे नहीं फेंकता था। इस नजारे का दर्शन टीवी पर दुलर्भ है, पूछिए उनसे जिन्होंने ऐसे क्षणों का प्रसन्नतापूर्वक सिनेमा हॉल में उपभोग किया है।
इंटरमीडिएट तक जमालपुर प्रवास रहा। आज एक गुप्त बात सरेआम कबूल रहा हूँ। कभी-कभार जमालपुर से भागलपुर और पटना तक की दौड़ लगा देता था। भागलपुर तक तो रेलवे टिकट भी नहीं कटाता, किसकी हिम्मत जो स्टूडेंट से टिकट मांगने की जुर्रत करता। हां,पटना के लिए टीटीई के हाथ में पांच का नोट थमा देता था, जाते वक्त और आते वक्त। अपर इंडिया एक्सप्रेस से पटना जाता था, वहां वीणा सिनेमा में फिल्म देखना और शाम सात बीस में उसी ट्रेन से वापस। किसी को पता भी नहीं चलता था। कभी मां ने पूछा कि खाने के लिए नहीं आया तो कहता कि भूख नहीं थी। बस बहाने बनाने में माहिर मैं और सिनेमा देखने में भी माहिर। काम बन जाता था। कभी भी मेरी यह चालबाजी पकड़ में नहीं आयी।
इंटर पास करने के बाद टाटा स्टील में अपरेंटिस में आ गया। जमशेदपुर में उस समय नटराज, वसंत, करीम, जमशेदपुर, जीटी और स्टार टॉकीज था। नटराज की शान ही निराली थी, एसी हॉल था। प्रत्येक बुधवार को जेटीआई जो आजकल एसएनटीआई कहलाता है, वहाँ थ्योरी क्लास होता था। हमलोगों का छह साथियों का ग्रुप था, हाफ डे क्लास से पंगा और चल देते थे सिनेमा हाल। यहां तो आजाद पंछी था, कोई रोकने-टोकने वाला भी नही। बस साइकिल उठाओ और सिनेमा हॉल की सैर करो। नटराज, वसंत, करीम, जमशेदपुर टॉकीज बंद हो गए। शहर की रौनक ही खतम हो गयी। बस ले देकर देखने लायक एक हॉल पायल बचा हुआ है, पर मेरी कॉलोनी से मानगो काफी दूर है, सो कभी-कभार ही मौका मिलता है, पर आज भी छोड़ता नहीं हूँ।
प्रसंगवश एक घटना बताता हूँ सिनेमा देखने की धुन का शिकार दो दिन के सस्पेंशन से झेलना पड़ा। आदत से लाचार स्टार टॉकीज में ढाई बजे के शो में हम छह जन थे। फिल्म खत्म होते ही बाहर निकले तो ट्रेनिंग मैनेजर से आमना-सामना हो गया। वे भी फिल्म देखने आये थे। दूसरे दिन आफिस में बुलाहट, डांट-फटकार और दो दिन का सस्पेशन आर्डर मिला। फिल्म थी गूंज उठी शहनाई। सजा भोगी पर फिल्म देखना बदस्तूर जारी रहा।
जिस समय मेरा सिनेमा देखना पूरे शबाब पर था। उस समय दर्शकों को में राजेश खन्ना की धूम थी, उसके हेयर स्टायल की नकल, आँख झपकाने की अदा के दीवाने थे। उसके बाद अभिताभ बच्चन की तूती बोलती थी। मैंने इन दोनों का कोई भी सिनेमा नहीं छोड़ा है। वैसे राजकपूर की श्री 420 और जिस देश में गंगा बहती है, दिलीप कुमार की गोपी और राम और श्याम, देवानन्द की गाइड और जानी मेरा नाम, धर्मेन्‍द्र की सीता और गीता और धर्मवीर, जीतेन्द्र की फर्ज और वारिस, राजेश खन्ना की दो रास्ते, नमकहराम, आनंद, अभिताभ बच्चन की दीवार, जंजीर, अदालत, मुकद्दर का सिंकदर, अनिल कपूर की मिस्टर इंडिया, नायक, सलमान की हम आपके है कौन, बीबी नं 1, अमिर खान की हम है राही प्यार के, सरफरोस, तारे जमीन पर शाहरूख खान की चक दे इंडिया, दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे, वीर जारा जैसी फिल्मों को हॉल में देखना अवर्णनीय अनुभव है। इसे शब्दाकिंत करना कठिन है, यह सुखकारी अनुभूति दिल में समायी हुई है। हीरोइनों में मेरी खास रुचि नहीं थी। वैसे हेमामालिनी, श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित का दीवाना हूँ। यह दीवानापन अभी भी कायम है। आजकल भी ढेर सारी फिल्में बनती है, पर मन की छूती नहीं है। लगता है कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा की तर्ज पर बनती है आज की फिल्में।
आजकल बनती है ढेरों फिल्में, अधिकांश फिल्में तो आकाशीय चैनलो की मेहरबानी से घर बैठे ही देखने को मिल जाता है। बाकी पायरेटड सीडी है ही। पर एक बात बताऊँ टीवी पर आँख गड़ाये, आँख दर्द करने लगता है। रही-सही कसर विज्ञापन पूरी कर देती है। हर दस मिनट बाद विज्ञापनों की भरमार, चिढ़ और ऊब पैदा कर देती है। एक तो छोटा स्क्रीन, फिर विज्ञापन, देखे क्या खाक।
बीते दिनो की कसक भी चुभती है, क्या उत्साह रहता था, भीड़भाड़ में धक्का-मुक्की करते हुए टिकट कटाना और बड़े परदे पर सिनेमा हॉल में सिनेमा देखना। कई बार तो ब्लैक में भी टिकट कटाता था, वापस आने का सवाल ही नहीं, चाहे जिस विधि हो, सिनेमा देखना ही था।
नौ आने से सिनेमा देखना शुरू किया था और तीस रूपये तक देखा। उसके बाद धीरे-धीरे हॉल भी बंद होने लगा। आजकल तो मल्टीप्लेक्स का जमाना है और टिकट दर हतोत्साहित करने का कारण है। आखिर जेब भी अलाऊ करें ना, लेकिन दो सौ रूपये खर्च करना अपने बूते से बाहर है। सारी सुख-सुविधा के बावजूद मल्टीप्लेक्स में दर्शकों का टोटा ही रहता है। वास्तव में सिनेमा हॉल का कोई विकल्प ही नहीं है। सरकार ने दुधारू गाय समझकर ऐसा दोहन किया कि सिनेमा के टिकट पर सिनेमा के दाम से अधिक मनोरंजन कर ही अंकित रहता है। बेचारे सिनेमा हॉल के मालिक के सामने एकमात्र चारा हॉल बंद करना ही रह गया सो बंद हो रहा है।
लेकिन मेरे जैसे अनगिनत दीवाने होंगे, जिन्हें बीते दिनो की याद सताती होगी। काश कि सरकार और सिनेमा हाल के मालिकों को सद् बुद्धि आए और सिनेमा हॉल खुल जाए। मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि सिनेमा देखने का सुख सिनेमा हॉल में उठाऊँ। आज नहीं तो कल होगा जरूर, भले हम न होगें, पर सुहाने दिन अवश्‍य आएंगे। सयाने कहते भी हैं कि दुनिया गोल है, यानी कि घूम फिर कर सिनेमा हॉल के दिन भी बहुरेंगे। फिर मैं रहूंगा, सिनेमा होगा और सिनेमा हॉल रहेगा और मस्ती के दिन रहेंगे। इसी कामनारत मनोभावो के साथ, सिनेमा हॉल को भेरी शुभकामनाएँ।
मेरी पसंदीदा फिल्में:-
(1) जिस देश में गंगा बहती है।
(2) गाइड
(3) बाबी
(4) दो रास्ते
(5) दीवार
(6) दिल वाले दुल्हनिया ले जाएगें
(7) हम आपके हैं कौन
(8) मिस्टर इंडिया
(9) गदर
(10) तारे जमीन पर

विपिन चन्द्र राय
एफ - 12, टायो कॉलोनी
जमशेपुर - 832108.
e-mail : bipinchandraroy@yahoo.in

Tuesday, August 11, 2009

हिन्दी टाकीज:काश, लौटा दे मुझे कोई वो सिनेमाघर ........ -सुदीप्ति

हिन्दी टाकीज-४५
चवन्नी को यह पोस्ट अचानक अपने मेल में मानसून की फुहार की तरह मिला.सुदीप्ति से तस्वीर और पसंद की १० फिल्मों की सूची मांगी है चवन्नी ने.कायदे से इंतज़ार करना चाहिए था,लेकिन इस खूबसूरत और धड़कते संस्मरण को मेल में रखना सही नहीं लगा.सुदीप्ति जब तस्वीर भेजेंगी तब आप उन्हें देख सकेंगे.फिलहाल हिन्दी टाकीज में उनके साथ चलते हैं पटना और सिवान...
bबिहार के एक छोटे से गाँव से निकलकर सुदीप्ति ने पटना वूमेन'स कॉलेज और जे एन यू में अपनी पढ़ाई की है। छोटी-छोटी चीजों से अक्सरहां खुश हो जाने वाली, छोटी-छोटी बातों से कई बार आहत हो जाने वाली, बड़े-बड़े सपनों को बुनने वाली सुदीप्ति की खुशियों की चौहद्दी में आज भी सिनेमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है।जितनी ख़ुशी उनको इतिहास,कहानियों,फिल्मों और मानव-स्वभाव के बारे में बात करके मिलती है, उससे कहीं ज्यादा खुश वो पटनहिया सिनेमाघरों के किस्सों को सुनाते हुए होती हैं. झूठ बोलकर या छुपाकर ही सही, खुद सिनेमा देखने बिहार में सिनेमाघर में चले जाना, बगैर किसी पुरुष रिश्तेदार/साथी के, साहस और खुदमुख्तारी को महसूस करने का इससे बड़ा जरिया भला और क्या हो सकता था उनके लिए तब...
बढ़ती उम्र, बदलते सिनेमाघर
हम दो छोटे-छोटे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर करते हैं--एक शब्द है मज़ा और दूसरा मस्ती। मेरे लिए अगर इनका कोई मायने है तो वह सिनेमा से अभिन्न रूप से जुडा हुआ है।
ज़िन्दगी में मैंने चाहे जितने 'मज़े' किये, उनमें से नब्बे फीसदी फिल्मों की वजह से किये। आज अगर मैं किसी को कहती हूँ कि एक ज़माने में हमने भी खूब 'मस्ती' की है तो उस वक़्त कहीं न कहीं दिमाग में वो ही दौर रहता है जो ग्रेजुएशन के समय में हमारे छोटे से 'गैंग' ने फिल्में देखते हुए गुजारा।
सिनेमा मेरे लिए पैशन है....था भी...और शायद रह भी जाये...., पर वो बात अलग थी; कैसे?
चलिए बात शुरू से ही बताती हूँ।
मेरा पहला सिनेमाघर
चलती हुई कहानी देखने का मेरा सबसे पहला अनुभव तब का है, जब मैं अपने माँ-पापा के साथ एक बार सिवान के मशहूर सिनेमाघर 'दरबार हॉल' में फिल्म देखने गयी थी। जिस पहली फिल्म की धुंधली-सी छाया आज तक बनी हुई है, वो है 'राम तेरी गंगा मैली'। माशाअल्लाह...! शुरुआत ही ऐसी थी; पर मैं सिनेमा के शौकीन अपने माँ-पापा के पास से पढ़ाई के लिए अपनी नानी के घर चली आई। सिवान जिले के महाराजगंज प्रमंडल के पकवलिया नामक गाँव में।वहां से फिल्म देखने तो किसी के 'ले जाने' पर ही जाया जा सकता था. दिक्कत यह कि मामा लोग तो बाहर रह कर पढाई करते थे, अब हमें फिल्म कौन ले जाये? तभी घर में टी. वी. का दाखिला हुआ. वो रामायण-महाभारत का ज़माना था. सिनेमा न सही, टी. वी. ही सही- की तर्ज पर बचपन में टी. वी. से चिपकने की मेरी आदत हजारों लानतें सुनकर भी नहीं सुधरी.
***
जब मैं आठवीं में आई तो मेरे फ्रेंड्स महाराजगंज के ही छोटे से हॉल में जा कर फिल्मे देखते थे, पर प्रोफेसर साहब की नातिन के रूप में शहर भर में मेरी जो पहचान हो गयी थी (जिसके चलते उस छोटे से शहर में दूर से ही मेरी साईकिल तक पहचान ली जाती थी) उसे देखते हुए कभी मैंने 'रिस्क' नहीं लिया!दूरदर्शन पर जिन सैकड़ों फीचर फिल्मों को देख-देख मैंने खुद को दिलासा दिए रखा,उनमें बावर्ची ,कटी पतंग,अराधना,अभिमान जैसी फिल्में भी होती थीं,जो आस-पड़ोस के लोगों के साथ हॉउसफुल जाती थीं और सूरज का सातवाँ घोड़ा जैसी फिल्म भी होती थी, जिसे देखने बैठे घर के लोग भी एक-एक कर उठ जाते और मौसी बार-बार कहने लगती कि- "टी।वी. बंद कर दो, बैटरी बचेगी तो कल 'रिपोर्टर' (धारावाहिक) देखा जायेगा". मैं रुआंसी हो उसकी तरफ देखती और जब विज्ञापन (उस समय हम प्रचार कहते थे) आता तो बंद कर देती, पर प्राण तो उस बुद्धू बक्से में ही कैद रहते! सो मिन्नतें करती कि बीच-बीच में देख सकूँ. आज तक सूरज का सातवाँ घोड़ा उन्हीं छोटे-छोटे टुकडों में ही दिमाग में कैद है; जबकि अच्छे से देखी हुईं कई फिल्में गायब हो चुकी है. इसे अच्छे सिनेमा का प्रभाव भी कह सकते हैं या मेरे सिनेमा-प्रेम का जिद्दी रूप भी. खैर,मेरा पहला सिनेमाघर टी.वी. ही था, जिसने सिनेमा के प्रति मेरे लगाव को जिलाए रखा.
किशोर उम्र और असली सिनेमाघर की डगर
अपनी मुकम्मल याददाश्त में हॉल में देखी पहली फिल्म है- बंजारन, जो पटना के चाणक्या या एलिफिस्टन सिनेमा हॉल में मेरी पसंद से प्रकाश आचार्य जी ने दिखाया और संजीव-संदीप को मन मार कर देखना पड़ा। दरअसल हम तीनों अपने स्कूल की क्वीज़ टीम में पटना गए थे और पहला स्थान हासिल किया.क्वीज़ के दौरान नब्बे फीसदी जबाब मैंने दिए तो मेरी पसंद की फिल्म देखना तय हुआ. उन्हें तो फिल्म में क्या मज़ा आया होगा! अच्छा तो प्रकाश आचार्य जी को भी क्या खाक़ लगा होगा!! पर मेरी खातिर सबने देखी. और मुझे बंजारन ही इसलिए देखनी थी, क्योंकि उसमें मेरी फेवरिट हिरोइन श्रीदेवी थी. चाँदनी और चालबाज़ से लेकर नगीना तक सारी फिल्में मैं दशहरे के दौरान और शादियों के सीज़न में चलने वाले विडियो पर देख चुकी थी.
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थोडा अवांतर तो है,पर एक मजेदार बात बताने से मैं अपने को रोक नहीं पा रही हूँ। उन दिनों किसी की बारात में या तो 'नाच' होता था (बिहार का खास लौंडा नाच) या किसी पैसे वाले शौकीन के यहाँ 'बाई जी का नाच'. नये-नए पर विडियो का चलन बढ़ रहा था.नाच में मुझे कुछ खास मज़ा नहीं आता था. वो मेरी परिष्कृत हो चुकी रूचि को थोड़ा भोंडा प्रतीत होता, पर विडियो देखने तो गर्मियों की दुपहर में सबके सो जाने पर झूना (जो गोली के खेल में मेरा गेम पार्टनर हुआ करता था ) के साथ खूब गयी हूँ. बचपन में मेरे लिए अच्छी बारात वही होती थी, जिसमे विडियो आए और शादी का बेस्ट समय वह,जब गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद हो.मेरे लिए उस समय वीडियो सिनेमाघर से कमतर के बदले बढ़कर था.जा कर देख लेने की सहूलियत तो उसमें थी ही,नई-नई फिल्में भी देखने को मिलतीं थीं.ये दोनों सहूलियतें मेरे शहर के सिनेमाघर से जुडी हुई नहीं थीं. उन दिनों को याद कर मैं भी सिनेमा देखने की अपनी ललक के लिए रेणु जी के इन शब्दों को दुहरा भर सकती हूँ......
'तेरे लिए लाखों के बोल सहे' ;-)
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वो मेरे बोर्ड एक्जाम के दिन थे, जब हमारे शहर में हम आपके हैं कौन फिल्म लगी थी।उन दिनों वहां फिल्में रिलीज होने के साथ नहीं,बाद में लगा करती थीं. परीक्षा के ही दौरान मैंने पापा से जिद्द शुरू कर दी.वो मेरी चचेरी बहन (जिसका एक्जामिनेशन सेंटर भी महाराजगंज ही था) को सेंटर ले जाने-घर लाने के लिए मेरी नानी के यहाँ ही रह रहे थे.पापा ने टालते हुए कहा- अच्छा पहले परीक्षा दे लो. परीक्षा ख़त्म हुई तो वे चले गए, पर 'हम आपके हैं कौन' तो सुपर-डुपर हिट फिल्म थी और दरबार में आधी सीटें लेडिज थीं और यह फिल्म पूरी तरह पारिवारिक-सामाजिक थी; सो लोग अपने परिवार की औरतों को खूब दिखा रहे थे. इसलिए भी अगले कुछ महीनों तक यह लगी ही रही और जब एक-आध माह के अंतराल पर मेरे पापा आये तो मैंने उन्हें इमोशनली ब्लेकमेल करना शुरू किया.पापा सोच रहे होंगे कि कहाँ इसे ले जाऊँ और कहाँ बिठाऊंगा.लेडिज सीट पर भी अकेले बिठाने का ख्याल उन्हें तब आ भी कैसे सकता था? तो उन्होंने कहा कि अगर तुम्हारी मौसी चलेंगी तो तुम्हें ले चलेंगे. अब मौसी को मनाने का काम था जो ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ा, क्योंकि वो भी सिनेमा की शौकीन थी. इस तरह सिवान के दरबार सिनेमा हॉल में हम आपके हैं कौन वह दूसरी फिल्म रही, जिसे मैंने दसवीं (के इम्तहान के समय) की उम्र में हॉल में देखा और जाहिर सी बात है कि सलमान को देखना अच्छा लगने लगा. आज उम्र के दरिया से काफी पानी बह जाने के बाद (और बौद्धिक स्तर पर समझदार कहलाने के बाद भी) किसी भी बहस में ये साबित कर सकती हूँ कि सलमान को क्यों देखा जाना चाहिए तो कच्ची उम्र के उस लगाव के कारण ही. कुछ नहीं है उसमें तो कम से कम दर्शनीय चेहरा और सुन्दर शरीर तो है. आखिर हमारी अधिकांश हीरोइनें भी तो इनमें से एक भी होने पर सालों-साल चल जाती हैं. इस फिल्म ने और एक कमाल किया. इसे देखने से पहले तक मैं माधुरी दीक्षित को बहुत नापसंद करती थी.सिर्फ इसलिए कि मेरी फेवरिट श्रीदेवी थी,जिसे मैं पागलों की तरह पसंद करती थी... तो ज़ाहिर सी बात है की माधुरी मुझे कैसे पसंद हो? आज मैं भी अपनी वैसी पसंद पर हँस सकती हूँ /हंसती हूँ, पर तब हालत ये थी कि जैसे स्टेफी ग्राफ के किसी प्रशंसक ने मोनिका सेलेस को चलते मैच में छुरे से घायल कर दिया था, वैसे ही मैं माधुरी दीक्षित को चलती फिल्म में मार डालने का हिंसक भाव रखती थी. खैर, इस फिल्म ने मुझे माधुरी को पसंद करना तो नहीं, पर स्वीकार करना सिखा दिया.
असली सिनेमाघरों वाला मेरा हसीन शहर
१०वीं के बाद की पढ़ाई के लिए मैं पटना आ गयी। उसी शहर में,जहाँ के सिनेमाघर की शक्ल मेरी यादों में बहुत लुभावनी थी. मेरा मौसेरा भाई पटना में कोचिंग करता था. एक दिन वो मेरे हॉस्टल आया और बोला,"चल,तुझे घुमा कर लाते है". मैंने आंटी से पूछा तो उन्होंने हाँ कह दिया. हम बाहर गए तो उसने पूछा, 'कहा चलेगी'? मैंने कहा, 'फिल्म'. उसने बताया कि रीजेंट यहाँ का सबसे अच्छा हॉल है और वहां DDLJ लगी है. हम वही देखने गए. ६ बजे का शो मिला और जब हम देखने लगे तो मेरे भाई ने बताया कि इस फिल्म में काजोल उसे अच्छी लगी है. थोडी देर में जब मेरे ख्वाबों में... गाना शुरू हुआ और काजोल छोटी-सी सफ़ेद ड्रेस में बारिश में भींग -भींग नाच रही थी तो उसने अपनी सीट पर पहलू बदलते हुए कहा कि, "यहाँ नहीं,सेकेंड हाफ में अच्छी लगती है". उस समय की उसकी लाचारी पर आज हंसी आती है. खैर,रीजेंट (सिनेमाघर) और DDLJ (सिनेमा) दोनों मुझे पसंद आये.साथ ही इस रहस्य का पता चला कि स्पेशल क्लास दरअसल सबसे सस्ता वाला क्लास होता है.भाई ने जैसे मेरा इम्तिहान लेते हुए पूछा था- किस में देखोगी? स्पेशल, बी.सी., डी.सी.- देख मैंने स्पेशल कहा था. तब उसने बताया कि वो सबसे बेकार होता है. इसी के साथ यह भी पता चला (और जान कर मेरा मुंह खुला रह गया) कि डी.सी. की कीमत मात्र १२.५०रु. है. अचानक मुझे लगने लगा कि तब तो ५००रु. की अपनी पॉकेट मनी में मैं चाहूँ तो सारी फिल्में देख सकती हूँ.
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खैर, इंटर(11th-12th) में जिस हॉस्टल में थी,वो मेरी चाची के परिचितजन का था और वहां ज्यादातर स्कूली बच्चे रहते थे,सो उस दौरान मोना,अशोक,रीजेंट आदि में जो फिल्में मैंने देखीं,वो अपने पापा के पटना आने पर जिद्द करके या चाची की मेहरबानी से उनके परिवार के साथ। इस दौर की फिल्में हैं खामोशी- द म्यूजिकल, इश्क़, दिल तो पागल है आदि. खामोशी-द म्यूजिकल पापा ने दिखाई जो मेरे दिमाग पर लम्बे अरसे तक छाई रही. 'बांहों के दरमियाँ ... ' गाने से तो सलमान और अच्छा लगने ही लगा,साथ ही साथ मनीषा कोइराला मेरी नयी पसंद बनी.आज जब अपनी पसंद को एनालाइज करती हूँ तो लगता है कि मुझे पूरी तरह औरत दिखने वाली हिरोइनें पसंद आती थीं और हीरो...(?) ॥पहली शर्त तो गुडलुकिंग होना है ही. देवानंद, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, अमिताभ से लेकर हृतिक और इमरान खान तक मुझे अच्छी शक्ल वाले हीरो ही पसंद आते रहे है. जिंदगी में तो हम गुण देखते ही हैं, रुपहले परदे पर रूप ही क्यों न देखा जाये! हालाँकि इसकी एक गड़बडी है. सभी लड़कियों को पसन्द तो सलमान,आमिर,शाहरुख,हृतिक वगैरह हीरो ही आते हैं, पर रियल लाइफ में ऐसा भी होता है कि एक्स्ट्रा के रूप में भी नहीं चल पाने जैसे लड़के से तालमेल बिठानी पड़ती है. क्योंकि हमारे यहाँ शादियों में लड़के की शक्ल नहीं,अक्ल भी नहीं, आय देखी जाती है. जिसे अमिताभ जैसा छः फुट्टा पसंद हो, उसकी हालत सोचिये- जब उसे ५फ़ुट का दूल्हा मिले? खैर, अपना समाज तो विडंबनाओं से भरा समाज है ही!इस पर नया क्या रोना!!!
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हॉस्टल में रहने की असली आज़ादी मिली बी।ए. पार्ट-I में, जब मैं पटना विमेंस कॉलेज के पीछे के हॉस्टल पीटर विला में रहने लगी. यह अब भी नागेश्वर कालोनी में है.जो भी माँ-बाप अपनी व्यस्तता के चलते विमेंस कॉलेज हॉस्टल के सख्त नियम- कायदों का पालन नहीं कर सकते,पर अपनी लड़कियों को ज्यादा सुरक्षित और कड़े प्राइवेट हॉस्टल में रखना चाहते थे,उनके लिए पीटर विला से बेहतर कुछ नहीं होता था. इसी हॉस्टल में रिंकी और रश्मि के साथ मेरी जो तिकड़ी बनी,वो IIIrd year आते-आते फिल्म देखने में उस्ताद हो गयी.
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पहली फिल्म का दृश्य :
सिनेमा हॉल :अशोक
फ़िल्म : जब प्यार किया तो डरना क्या,
शो : दोपहर १२ से ०३ बजे यानी noon show।
करीब पच्चीस लड़कियाँ तरह-तरह से तैयार और फिल्म के बारे में बातें करते हुए... मैं सकपकाई हुई... चारों तरफ देखती हुई कि कहीं कोई मेरा परिचित तो नहीं है.... तब तक ढेर सारे लड़के देखने, समझने और टिकेट पा लेने की जुगत में! मुझे कभी इससे घबराहट नहीं हुई,पर उन लड़कों की हरकतों पर जब-तब गुस्सा जरुर आ रहा था और मैं अपने साथ खड़ी पूनम से कहने लगती- यार, सलमान की आँखें इतनी खूबसूरत हैं तो वह गोगल्स क्यों पहनता है?
दरअसल बी।ए।-पार्ट I (इको आनर्स) की लड़कियों ने तय किया कि जब प्यार किया तो डरना क्या लगी है और इसे ग्रुप में देखना है. डिपार्टमेन्ट की सबसे कम उम्र मैम को भी मनाया ,पर आखिर में उन्होंने दगा दे दिया.मैंने अपनी लोकल गार्जियन (चाची) से पूछा; क्योंकि तब डर बना रहता था कि पटना में रहने वाले दसियों रिश्तेदार देख कर चुगली मत खाएं . पर चाची ने चलताऊ ढंग से टाल दिया (भाई,दूसरे की लड़की!कुछ हो हवा गया तो रिस्क किसका?), पर उनके इसी ढंग ने मुझे शह्काया कि जब इन्हें मतलब ही नहीं तो पूछने से क्या फायदा ? और उस समय मोबाईल और फोन तो इतने थे नहीं कि हर बार पापा से पूछ सको! तो अब मैं बेखौफ तो नहीं,पर डर के बावजूद फिल्में देखने जाने लगी. इस तरह पहली फिल्म देखी 'जब प्यार किया तो डरना क्या'. बड़े-से परदे पर जब सलमान और अरबाज आते,हम सब जोर से चिल्लाते. इसी फिल्म और हॉल में मैंने पहली बार सीटी बजायी और चुपचाप देखने के बजाय हल्ला -गुल्ला करते हुए फिल्म देखने का मज़ा पाया.और फिर यह हॉल 'अशोक' अब मेरा पसंदीदा सिनेमाघर बन गया;क्योंकि यहाँ लड़कियों को स्पेशल प्रिविलेज मिलता था.कैसे? अभी बताती हूँ.
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अशोक में डी।सी., बी.सी. में टिकट पहले लड़कियों को मिलता था. अगर बच जाये तो ही लड़कों को. अब होता ये था कि लड़के लाइन में खड़ी लड़कियों से खूब निहोरे (request) करते थे. उनमें से कोई -कोई दया दिखाते हुए उनका पैसा लेकर टिकट ले देती,पर मैंने कभी इसका समर्थन नहीं किया.एक तो ये गलत था,साथ ही अगर उनका टिकट हम लेंगे तो वो हमारे बगल में बैठ जायेंगे और फिल्म के बीच ऐसे अवांछित तत्वों को कौन झेले!...और हॉल के कर्मचारी भी मना करते थे कि यह ठीक नहीं है.बाद में आप लोगों को ही परेशानी होगी तो मत कहियेगा.अशोक के अलावा पटना के जिन सिनेमाघरों में हम खूब गए,वो हैं- उमा, रीजेंट, वीणा, रूपक, रीजेंट, मोना. एलिफिस्टन. यहाँ तक कि अप्सरा में भी एकाध बार चले गए.यही शुकर था कि हम हॉस्टल में रहते थे और हमारे वापस लौटने की अपर लिमिट ३.३०p.m. तय थी.इसी वजह से हम दानापुर और दीघा के हॉल से वंचित रह गए!
हमारी तिकड़ी और इन सिनेमाघरों के किस्से
सबसे पहले उमा।
इसमें हमारे गैंग (मैं,रश्मि और रिंकी तो 'आजीवन सदस्य' थे, बाकी घटते-बढ़ते रहे, 2 से 8-10 की संख्या तक) ने बंधन नामक फिल्म देखी। दो रिक्शों में लद के हम पहुंचे १०.३० बजे सुबह.यहाँ एक जरुरी बात बता दूँ- हम १२ से ३का noon show ही देख सकते थे.किसी कारण से क्लास कैंसिल हो जाये तब या उबाऊ पढ़ाने वाली मैम की क्लास बंक कर या अच्छी फिल्म हो तो यूँ भी क्लास छोड़कर फिल्म देख सकते थे पर हॉस्टल किसी कीमत पर ३.३० तक लौट कर खाना खा लेना होता था,वरना पेशी हो जाती. उमा कदमकुआँ में है जो बोरिंग रोड स्थित हमारे हॉस्टल से काफी दूर था.पर उस समय मैं दिल्ली से बंधन के रिलीज की खबरें दिल्ली टाईम्स में पढ़ के गयी थी और टीम लीडर थी तो ये फिल्म देखनी ही थी. १०बजे के करीब हम लोग उमा पहुँच चुके थे. दरअसल नून शो की टिकट तत्काल ही मिलती थी. मैटनी शो की तो एडवांस में मिलती,पर नून की नहीं. करेंट बुकिंग १०.३० से होता था और ५ मिनट में जितनी हो जाये,उसके बाद ब्लैक कर देते. तो हमें ठीक १०.३० बजे पहुचने से क्या फायदा,अगर हम लाइन के शुरू के ५-७ लोगों में नहीं हो!फिर तो ब्लैक से देखना ही पड़ता. अब १२.५० की टिकट ३० रुपये में कौन खरीदना चाहेगा? इसलिये हम ९ से १० के बीच हॉल जाकर टिकट खिड़की पर खड़े हो जाते. लगभग हर हॉल में हमें टिकट १०.३० से १०.४० के बीच मिल जाती. अब समस्या रहती कि बचा हुआ टाइम कैसे खपाया जाये, तो हमने पटना के मंदिर,दरगाह और म्युजियम की खाक़ खूब छानी.इसलिए भी हमें अशोक पसंद था कि वहां से हम बिना रिक्शा का पैसा खर्च किये हनुमान मंदिर में समय गुजार सकते थे.अशोक में फिल्म देखना सबसे सस्ता और सुविधाजनक था. इसलिए 3rd year में तो हमने शायद ही कोई फिल्म वहां छोड़ी होगी. १२.५० रुपये की टिकट+१० रुपये रिक्शा भाड़ा ( एक आदमी के आने-जाने का ) ,यानी कम-से-कम २२.५० में हम एक फिल्म देख सकते थे.
खैर,उमा भी इस मायने में अच्छा था कि दूर होने की वजह से यहाँ किसी परिचित के आने की सम्भावना कम थी और अन्दर में बैठ कर इंतज़ार करने के लिए काफी जगह थी।वहां हम टिकट लेने के साथ ही अन्दर जा सकते थे. इस फिल्म में भी हम १०.३० में अन्दर चले गए और गप्प हांकने लगे. उमा काफी बड़ा हॉल था.अशोक से डेढ़ गुना बड़ा तो होगा ही. इसलिए यहाँ पर दूसरी जगहों की अपेक्षा देर से आने पर भी टिकट मिल जाती थी.कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि दूसरी जगह टिकट नहीं मिलने पर हम यहाँ आने की सोचते थे और वहां जाने पर आसानी से टिकट मिल जाता था.उमा का स्क्रीन बहुत बड़ा था,लेकिन आवाज कुछ खरखराहट के साथ आती. फिर भी ये हमारा सेकेंड फेवरेट हॉल था.उमा में जाने की एक और वजह थी-सलमान की फिल्में ज्यादातर उसी हॉल में लगती थीं. उमा में देखी सबसे यादगार फिल्म है- तक्षक. गोविन्द निहलानी की इस फिल्म को समीक्षकों ने भलें ही उतना नहीं सराहा हो, पर हमारे लिए यह उत्कृष्ट फिल्म थी.राहुल बोस का अभिनय लाजवाब था. पर फिल्म आने से पहले ही रंग दे गाने पर रिंकी और रश्मि ने हमारे हॉस्टल डे पर जो डांस किया था,उसका मुकाबला फिल्म में स्टिफ तब्बू नहीं कर पाई.और उमा में ही देखी सबसे वाहियात फिल्म थी-हेल्लो ब्रदर जिसे देखते हुए हम बीच से ही उठ कर जाने को तैयार थे.
अशोक में एक से बढ़ कर एक अनगिनत फिल्में देखी हैं हमने। दिल तो पागल है और इश्क़ तो अपनी लोकल गार्जियन के साथ देखी,पर अपने गैंग के साथ हम दिल दे चुके सनम, ताल, गाडमदर , फायर, हे राम, जख्म जैसी यादगार फिल्में यहाँ देखीं और आज भी इस हॉल मुरीद हूँ. इसमें कुछ और भी फिल्में (जैसे फिर भी दिल है हिदुस्तानी भी ) देखीं, पर वो सब उल्लेखनीय नही हैं. अशोक की खासियत यही थी कि आज तक उसमें हमने ब्लैक से टिकट खरीद कर नहीं देखी.
एक बार हम जल्दी यानी ९ बजे पहुच गए। दो लाइनें देख यह सोचा कि एक तत्काल और दूसरी एडवांस बुकिंग की लाइन होगी. हमने टिकट लिया और चले अपने ठिकाने पर; मतलब हनुमान मंदिर.उस दिन तो एक फैमिली के साथ सत्यनारायण की पूजा में भी शामिल हुए. रस्ते में थे,जब मैंने टिकट देखा (टिकट, पैसा मेरे पास ही रहता था और लौट कर हिसाब भी मैं ही करती थी.सो एक दोस्त ने मेरा नाम ही मुनीम जी रख छोडा था).टिकट पर मैटनी प्रिंट था.मैंने रिंकी को दिखाया.उसने कहा कि-"चलो जो भी होगा ...ज्यादा से ज्यादा आज नहीं देख पाएंगे".हम जब हॉल पर पहुचे तो सच में गड़बड़ हो गयी थी,पर मैं कहाँ मानाने वाली थी? मैं हॉल के मैनेजर के पास गयी और अपनी समस्या सुनाई. उसने सुना और रहम खाते हुए तीन सीटों की व्यवस्था कर दी.
बाद के दिनों में बस हम तीन जने जाने लगे थे- मैं, रिंकी और रश्मि।तीनों अपना G.S. का क्लास कॉलेज के साइंस ब्लाक की जगह सिनेमा हॉल में करने लगे थे.हम तीनों रूममेट भी थे और बैचमेट भी,तो प्राइवेसी और यूनिटी खूब थी.बस एक-एक फिल्म मैंने और रिंकी ने और मैंने और रश्मि ने अकेले देखी थी. मैं कॉमन थी, मेठ जो थी! मुझे छोड़ वे जा ही नहीं सकते थे...आखिर टिकट कौन कटाता? ब्लैकेटियर से झगडा कौन करता??
अशोक की दूसरी यादगार घटना फायर फिल्म की है। यह माँर्निंग शो में लगी थी.जाना समस्या नहीं था. वह टिकट लेना और माँर्निंग शो के लोगों को झेलना हमारे हिम्मत का इम्तेहान था.जब हम नून शो के लिए खड़े होते थे,उस वक्त भी माँर्निंग का जो क्राउड निकलता था,वो वाहियात होता था.खैर, फिल्म तो देखनी ही थी. आज भी कोई मुझे देख मेरी उम्र के बारे में गफलत में आ सकता है.ये तो १० साल पहले की बात है.टिकट लेने को और कोई राजी नहीं था.हमारे बहुत प्रयत्नों के बाद भी हॉस्टल से और लड़कियों में सिर्फ ११वीं की एक बेवकूफ किस्म की लड़की तैयार हुई थी. कहाँ तो हम सोच रहे थे कि बड़े ग्रुप में आ कर हम शर्मिंदगी से बच सकेंगे, कहाँ सिर्फ चार लड़कियाँ!! हॉल पहुँच कर सुकून मिला कि इस माँर्निंग शो में ढेर सारे अंकल लोग आंटियों के साथ आये थे.टिकट खिड़की पर पहुँच मैं बहुत गंभीर बनते हुए और ये बोलते हुए आगे बढ़ी कि अगर टिकट नहीं देगा तो हम कालेज का आई कार्ड देंगे. कैसे नहीं देगा?जैसे ही अपनी बारी आई,मुंह से निकला-"अंकल प्लीज चार टिकट दे दो". उसने सर उठा ऊपर से नीचे तक देखा, दो सेकेंड सोचा फिर बोला, "ये अडवांस की लाइन नहीं है." मैंने झेपते हुए कहा, "हमें फायर देखनी है." उसे पता था कि यह प्रचलित अर्थों में 'मॉर्निंग शो' की फिल्म नहीं है और टिकट दे दिया. साथ साथ इस बात का ख्याल भी रखा कि हमारी सीट बुजुर्गों/सयाने लोगों के बीच में हो ...so nice of him :)
फायर मूवी में ऐसा कुछ नहीं था,जिसके लिए इतना हल्ला मचा हुआ था। हमारे लिए हताश होने जैसी बात तो नहीं थी,बस दिमाग में सवाल कुलबुला रहा था.सबसे मजेदार बात यह थी कि जब नंदिता दास और जावेद जाफरी के बीच कुछ होने की गुंजाइश बनती दिखी तो उसकी शुरुआत में जोर की सीटी बजी,पर उससे ज्यादा प्रगाढ़ दृश्यों में पूरा हॉल स्तब्ध रहा.आज तक मैं समझ नहीं पाई कि ऐसा क्यों हुआ?
अशोक ही वो हॉल था,जहाँ हमने 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' देखने की हसरत भी पूरी की।फिल्म थी हे राम और हमें ये अंदाजा था कि पटना में इसके लिए मारामारी तो नहीं होगी. बस, अपन पहुँच गए 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' की फैंटेसी पूरी करने. इसी फिल्म के बाद मैं रानी को पसंद करने लगी. इसमें गला काटने वाला दृश्य हमने आँखे खोल कर देखीं और लौट कर खाना नहीं खा पाए. इस फिल्म के प्रेम-दृश्य अद्भुत थे.बाद में जब नदी के द्वीप पढ़ा तो वे दृश्य बार बार स्मृति -पटल पर उभर रहे थे.प्रेम के क्षणों में कविता बुदबुदाना... , यह तो नदी के द्वीप में अद्भुत रूप में है.आज भी अशोक बहुत याद आता है.
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रीजेंट वाकई अच्छा हॉल था।उसकी बुराई बस यही थी कि वहां टिकट ब्लैक कर देते थे. कभी लड़-झगड़ कर तो कभी ब्लैक में ही टिकट खरीद यहाँ भी हमने खूब मस्ती की. हम साथ साथ है - देखने तो लगभग पूरा होस्टल ही चला गया था. इसमें हमने हर टिकट पर बस दस रुपये ज्यादा दिए थे. फिल्म ख़त्म होने पर वो भी खल रहा था और हॉस्टल की एक लड़की ने ऐसी हरकत की कि कुछ लड़कों ने नागेश्वर कालोनी तक हमारा पीछा किया. इसी हॉल मे कुछ कुछ होता है देखने आठ लोग गए थे और ये पहली फिल्म थी,जिसे हमने ५० रुपये में और वो भी स्पेशल क्लास में बैठ कर देखा.टिकट नहीं मिल रहा था तो मेरी एक दोस्त ने कहा कि चलो दूसरी जगह छोटे मिया-बड़े मिया लगी है, वही देख लेते है.पर मैं गोविंदा की फिल्म नहीं देखना चाहती थी और पूजा कि छुट्टी में घर जाने से पहले सब ये फिल्म देख लेना चाहते थे.सो हमने ब्लैक में और स्पेशल क्लास में देखी ही. हमारी दो सीनियर लड़कियाँ जो आपस में गहरी दोस्त थीं , इस फिल्म को देखते हुए इतनी बुरी तरह रोने लगीं कि बगल में बैठा आदमी घबरा ही गया.इन अनुभवों के बाद हमने तय किया कि अब अपने छोटे ग्रुप में जाएँगे. बड़े ग्रुप में मज़ा और प्रॉब्लम दोनों ज्यादा है. कोई काम करने तो बढ़ता नहीं, बस फायदा सबको चाहिए.अब हम फिल्म का प्रोग्राम सोते समय बनाते और लौट कर बताते कि देख आये है.
रीजेंट से जुडी दो मधुर यादे भीं हैं---सरफ़रोश देखने मैं और रिंकी बस दो लोग गए थे। फिल्म जब रिलीज हुई थी तो हमारी छुट्टियाँ थीं और जब वापस आये तब तक हट चुकी थी, पर डिमांड इतनी कि दुबारा लगाना पड़ा. हमारी तो मुराद पूरी हो गयी मानों. लगभग सबने देख रखी थी, सो हम दो ही गए. आज तक इस एडवेंचर का अहसास बहुत मजेदार है कि बस दो लड़कियों ने जाकर फिल्म देख ली. इससे बड़ा फिल्म संबन्धी एडवेंचर मेरे पास यही है कि दिल्ली के पी.वी.आर.प्रिया हॉल में नाइट शो में बस एक लड़की के साथ कारपोरेट फिल्म देखी. पर तब तक मैं J.N.U. में शोध छात्रा थी और प्रिया कुछ ख़ास दूर भी नहीं है.बस १.४५में जब हॉल से बाहर सड़क पर थे, तो जल्दी से ऑटो मिल जाए- इसी की कोशिश में लगे थे. खैर,अभी रीजेंटकी बात. हम लोग अक्सर सेकेंड डे पहला शो देखा करते थे, क्योंकि G.S. की क्लास शनिवार को होती थी और उसमें अटेंडेंस नहीं होता. फिल्में शुक्रवार को रिलीज होतीं और हम शनिवार बिना नागा पहुँच जाते. एक ही शुक्रवार को रिलीज हुई फिर भी दिल है हिदुस्तानी और कहो ना प्यार है. दोस्तों ने हम........का मन बनाया,लेकिन मुझे तो शाहरुख पसंद नहीं. पहले उसे बन्दर कहती थी बाद में पता चला कि बन्दर कहना रेसिस्ट होना है,तब से छोड़ दिया. अब मैं अपनी पसंद के कारण नहीं जाने का तर्क नहीं दे सकती थी. क्यों??? दोस्त बड़े कमीनें थे,याद दिला देते कि कौन-कौन सी फिल्में उन्होंने सिर्फ मेरी पसंद से देखी थी,सो मैंने तर्क दिया- शाहरुख की फिल्म है तो पहले हफ्ते भीड़ होगी तो क्यों ना दूसरी वाली देख ली जाये? बात में दम था और हम रिक्शे पे सवार हो पहुँच गए रीजेंट. भीड़ थी, पर उतनी नहीं. लड़कियों की लाइन में हम ५वे नंबर पे थे. टिकट मिल गयी. बीच का टाइम बिताने के लिए हम पटना मार्केट गए. रीजेंट गांधी मैदान के पास है वहां से हम पटना मार्केट या रेस्टोरेंट ही जाते थे. जब हॉल में घुसे तो हमें फिल्म के बारे में कुछ पता नहीं था और ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी,पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ रही थी मज़ा आ रहा था.एक लड़का तो पागलों जैसा चिल्ला रहा था,"साला शहरुखवा अब गया". इंटरवल तक तो हम रोमांचित हो उठे कि वाह क्या फिल्म है! इंटरवल के बाद और मज़ा आया, यह देख कि अब क्यूट हृतिक की जगह हैण्डसम हृतिक है. और ढर्रे पर चली आती डबल रोल वाली बात भी नहीं है.ये फिल्म हमने दुबारा देखी थी,ठीक एक महीने बाद.रूपक पता नहीं, है कि बंद हो गया. इसका रास्ता किसी गली से होकर जाता था.यह रीजेंट से काफी अन्दर था. हॉल की अच्छाई और सुविधाओं को देखते हुए तो यह एकदम बेकार था.इतना बेकार कि हम कभी यहाँ १० बजे तक जाने का नहीं सोचते थे.ज्यादा जल्दी जाते तो ११.१५ तक और हमेशा ब्लैक में ही फिल्में देखी यहाँ. अंदर जाने पर पता चलता था कि हॉल तो बहुत खाली है, पर टिकट कभी खिड़की पर नहीं मिली. हम कभी समय से गए भी नहीं, क्योंकि वहां से लौट कर कहीं जाना और दुबारा टिकट लेने जाना बहुत महंगा पड़ता. तो हम पिक्चर के टाइम से जाते और २०/३०या ४० में टिकट खरीद लेते. वहां मोल-तोल भी खूब होता था. अब सवाल तो यह है कि हम वहां जाते ही क्यों थे? दरअसल उस समय की लगभग सारी क्रिटिकली एक्लेम्ड फिल्में वही लगती थी.
रूपक में देखी यादगार फिल्में हैं अर्थ-1947, हु-तु-तू ,संघर्ष आदि। अर्थ-1947 से जुडी मजेदार घटना है.हम देर से पहुचे और ब्लैकेटिएर से रिक्वेस्ट करने लगे कि भैया हमें अच्छी जगह पर सीट देना (पता था कि फिल्म में 'सीन' है). उसने मुस्कुराते हुए जिस तरह से 'हाँ' कहा, हमें थोड़ा शक हुआ, पर उस दिन हम छः थे. सोचा, कोई नहीं, देखा जायेगा. हमें सीट तो साइड से ही मिली. छः के बाद एक् कपल था. लड़की हमारी तरफ बैठ गयी...और भी अच्छा...लेकिन ये क्या? फिल्म शुरू होने के दो मिनट पहले हमारे आगे हमारी ही उम्र के ५-६ लड़के आ कर बैठ गए. अब तो जो टेंशन शुरू हुई....उन लड़कों की आँखों में भी हमें देख एक मुस्कराहट आ गयी. खैर इतना डरते हमलोग तो हॉल हमारा दूसरा कालेज क्यों होता? अर्थ-१९४७ में राहुल खन्ना की एक साईकिल है. जैसे ही उस पर नंदिता को आगे बिठा वो ले जाता है, वैसे ही सामने वालो में किसी ने कहा,"अरे यार!मेरे मामा जी के पास भी ऐसी साईकिल है.आज समझ में आया, क्यों वे उसे छूने भी नहीं देते." ना चाहते हुए भी हमारी हंसी फूट पड़ी. हम जानते थे कि हँसना इनको बढावा देना है, पर रोक नहीं सके.अब तो उन लड़कों ने पूरी फिल्म के दौरान इतने मजेदार कमेन्ट किये कि फिल्म का मज़ा दोगुना हो गया. एक बानगी- नंदिता और राहुल के बीच एक रोमांटिक सीन है, कुछ physical closeness लिए हुए. उस सीन के पहले नंदिता रो रही थी और उसके बाद मुस्कुराती है. हमारी धड़कने भी खामोश थीं.हम मानो उस सीन के बीच से गायब हो जाना चाहते थे. तभी एक लड़के ने बहुत innocently दूसरे से पूछा," इसीलिए रो रही थी क्या?" उस टोन में कोई कमेन्ट नहीं था. हमारी हंसी दबी-दबी सी ही सही,पर निकल ही गयी.
मोना में भी खूब फिल्में देखी।हॉल ठीक ठाक था,पर रीजेंट के पास होने के कारण उसकी तुलना में थोड़ा बुरा लगता था. रीजेंट, मोना, एलिफिस्टन- तीनों आस-पास थे. किसी-ना-किसी में टिकट तो मिल ही जाता था.हमारा उस एरिया में जाना कभी बेकार नहीं हुआ.किसी- किसी बार तो हम सोचते कि तीनों लोग तीनों हॉल के पास जाएँ,चाहे जिसे टिकट मिल जाये;पर तब मोबाईल का जमाना नहीं था. हम एक-दूसरे को बताते कैसे, सो यह प्लान कभी हकीकत में नहीं बदला.मोना में हमने ऐश्वर्या की एक तरह से पहली फिल्म आ अब लौट चले देखी और पाया कि सुमन रंगनाथन उससे हॉट है.वो मेरी रिंकी का बर्थडे था,जब यह फिल्म हमने देखी. 9th फरवरी- आज तक याद है. मोना में ही हमने लगातार दो शो देखने का रिकार्ड बनाया- सत्या मोर्निंग शो में और नून शो में दिल से. परदे पर पानी पीती हुई मनीषा के गले के भीतर से पानी उतरता दिखाई दे रहा था और हमने मान लिया कि मनीषा ही हमारे समय की सबसे सुन्दर और versatile ऐक्ट्रेस है.वीणा वो आखिरी हॉल था,जहाँ हम फिल्म देखने जाते थे; बहुत मजबूरी में,जब किसी और हॉल में कोई चांस न हो.एक तो ये हॉल गन्दा था,दूसरे क्राउड वाहियात होता था.एकदम स्टेशन के पास था और रुकने की कोई जगह नहीं थी. जहाँ वेट करते थे,वो जगह एकदम सड़क पर लगती थी.देखी तो कई फिल्में यहाँ, पर याद नहीं रखीं.इसकी वजह वहां से निकलने के बाद का आफ्टर इफेक्ट था. एक-दो मज़ेदार वाकये वहाँ जरुर हुए. तब की बात है जब मन फिल्म रिलीज हुई थी. एक दिन RJD का बिहार बंद था.कॉलेज भी बंद था, क्योंकि रूलिंग पार्टी के बंद में कुछ खोलने की हिम्मत तो होती नहीं. लाइब्रेरी खुली थी.सिस्टर को बाहर से आना तो था नहीं कि वो बंद रहे?हमने तय किया कि कोई एक जाकर टिकट लेगा और हॉस्टल फ़ोन कर देगा कि क्लास चल रही है.अब मुझ-सा वीर बहादुर कौन जो जाकर टिकट ले और बाहर का माहौल देखे. मैं ८.३० बजे ही निकली, पर आंटी ने देख लिया और पूछा, "आज तो बंद है,कहाँ जा रही हो?" मैंने कहा, "लाइब्रेरी जा रही हूँ, वो बंद नहीं होगा और जल्दी जा रही हूँ कि कोई दिक्कत न हो." आंटी ने कहा, "ठीक है पर ध्यान रखना. मत ही जाओ तो अच्छा." मैंने कहा, "नहीं आंटी!जरुरी नोट्स बनाना है."इस तरह से मैं निकल गयी. सड़क से रिक्शा ले सीधे वीणा पहुंची. मुश्किल से ९ ही बजे होंगे.मैंने देखा कि लड़कियों की कोई लाइन नहीं लगी थी. मैं गयी और तीन टिकट मांगे. टिकट खिड़की पर बैठे आदमी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और दूसरों को टिकट देता रहा. मैंने थोड़ी देर में गुस्से से कहा कि "मुझे तीन टिकट दे दीजिये पहले." उस आदमी ने और अधिक गुस्से से कहा, "मोर्निंग शो का टिकट मिल रहा है यहाँ." मैं इतना अधिक सकपका गयी कि आगे कुछ पूछ भी नहीं पाई; क्योंकि सामने ही मोर्निग की फिल्म का पोस्टर लगा था- प्यासी जवानी. उस दिन तो लौट के बुद्धू घर को आये की तर्ज पर हम हॉस्टल लौट आये.अगली बार जब मन देखने गए तो और मजेदार घटना हुई.हम सुबह जल्दी ही गए और.टिकट लेने के लिए खिड़की खुलने का इंतजार कर रहे थे. सामने में एक दक्षिण भारतीय युवक था.हमने सोचा कि वो क्या समझेगा और कारू-कारू कह मजाक बनाने लगे.हमारा मकसद उसका अपमान करना नहीं था, बल्कि अपना मनोरंजन करना था. हम लोग कोई गोरे नहीं थे, पर हमारी बनिस्पत वो काला था और हमेशा हमारा मन ऐसे ही तो लगता था- अपरिचितों का आपस में मजाक बना. लेकिन वो 'कारू' शब्द समझ गया. जरुर उसकी भाषा में कारू से मिलता-जुलता काले का कोई पर्याय होगा.उसने आगे बढ़ हमसे कहा, "this is very bad.this is really bad to comment on color." आज भी मैं उसकी हिम्मत कि दाद देती हूँ कि किसी और प्रदेश में तीन लड़कियों को उसने टोका. पर हमें तो काटो तो खून नहीं. हम सभी का चेहरा लाल! हिम्मत बटोर कर रश्मि ने ही पहले कहा,"we did not mean that.we are just talking." तब तक मैं थोडी संभल गयी थी और उसे समझाना चाहा , "no, in our language karu means something else." उसने कहा, "no, i can understand little Hindi and I can sense things." वो दिल्ली में software engineer था और पटना किसी काम के सिलसिले में आया था.काम पूरा हो गया और रात की ट्रेन से उसे जाना था सो फिल्म के लिए आ गया था. मिडिल क्लास गिल्टी महसूस करते हुए हमने उसका टिकट लिया.१०.३५ से १२ बजे का समय बिताने और उसे पटना घुमाने के लिए म्युजिअम ले गए. एक रिक्शे पर हम तीनों और एक पर वो गया और दोनों का पैसा हमने दिया. म्युजिअम में रश्मि ही उसे घुमाती रही और मैं-रिंकी आपस में बुदबुदाते रहे कि अगर किसी ने इसके साथ देख लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे. अकेले फिल्म देखना तो समझ में आता है, पर इसको लेकर घुमाना? जैसे-तैसे फिल्म देखकर ख़त्म किया और इंटरवल में हमने कोल्ड ड्रिंक भी ख़रीदा,ताकि वो नहीं खरीद सके और हमें किसी और के पैसे का कुछ न लेना पड़े. फिल्म के अंत में उसने पूछा कि पूरे समय तो तुम्हीं लोगों ने खर्च किया, तो मेरे साथ लंच कर लो. हमने उसे बताया कि हमें ३.३० में हॉस्टल पहुँच जाना होता है. उसे लगा कि हम बहाना कर रहे हैं तो वो अपना शेयर देने लगा. मैं तो लेने ही वाली थी कि रश्मि की बच्ची ने मुस्कुरा कर मना कर दिया. पूरे टाइम मैं लड़ते आई कि हम उस कारू के ऊपर क्यों खर्च करें.हमारा बजट गड़बड़ा गया और उस महीने हमने एक फिल्म कम देखी.
इससे भी दिलचस्प बात हॉस्टल आकर पता चली कि उसने हमारा पता माँगा तो रश्मि ने दे दिया था।हमने उसे खूब डांटा...इतना कि वो डर गयी और कहने लगी,"मुझे लगा कि वो क्या लिखेगा? लेकिन अगर वो लिखता है तो मेरे नाम से ही लिखेगा. मुझसे ही तो बात हो रही थी सबसे ज्यादा". हमने चिढाया भी कि उस समय तो चिपक रही थी, अब क्या हुआ? जुलाई,१९९९ में ये घटना हुई थी.अगस्त तक हम डरे रहे, पर सितम्बर आते-आते भूल गए. अक्टूबर में पूजा की छुट्टियों में घर चले गए. एक दिन सुबह-सुबह जब मैं सो ही रही थी तो माँ ने पुकारा- "रूम में आओ".मैं अपनी कजिन के रूम में सोती थी. आते ही उसने उस लड़के/आदमी का नाम लेकर पूछा कि ये कौन? मुझे याद ही नहीं था.मैंने कहा- पता नहीं. माँ ने कहा तो तुम्हे चिट्ठी कैसे लिख दिया है? मैंने कहा- चिट्ठी?? माँ ने लिफाफा सामने कर दिया.ऊपर लिखा था- तो, Miss Rashmi,Rinki & Sudipti. अब तक मैंने हॉस्टल के अंकल को दसियों गालियाँ दी कि सबसे पहला नाम रश्मि का था,तो लेटर मुझे क्यों फारवर्ड किया? बाद में पता चला कि पोस्टल एड्रेस सिर्फ मेरा ही था उनके पास और रश्मि ने तो लाख-लाख शुकर मनाया; क्योंकि अगर उसके घर जाता तो उसके भैया उसे हॉस्टल से हटा ही लेते. लेकिन उस दिन मुझे अपनी माँ के सामने क्या-क्या झूठ नहीं बोलना पड़ा? कैसे मैं बची, मैं ही जानती हूँ. मेरे भोले पापा ही वो लेटर लाये थे, पर उन्होंने पढ़ा नहीं था.पढ़ा माँ ने था और फिल्म देखने की बात तो वो समझ ही गयी थी. मैंने कॉलेज फंक्शन में उसके गेस्ट होने की बात समझाई,जिसे पता नहीं माँ ने कितना सच माना, पर उसने देखा कि पत्र ज्यादातर रश्मि को ही संबोधित है.मेरा नाम बस संबोधन में ही है,तो वह थोडी निश्चिंत दिखी. लौट कर मैंने रश्मि को खूब हड़काया.दूसरी घटना: जब दिल क्या करे फिल्म रिलीज हुई,हम यह फिल्म अजय- काजोल की वजह से देखना चाह रहे थे. वीणा को नकारने के लिए हम अप्सरा में चले गए.अप्सरा गाँधी मैदान के दाहिनी तरफ है.कौटिल्य होटल के पीछे की एक गली से रास्ता जाता है.हम वहाँ पहली बार गए और पता चला कि शो आल रेडी हाउस फुल हो चुका था. जो शुद्ध झूठ था.खैर,मैंने कहा- चलो, वीणा चलते है.इससे तो बेहतर ही है.सबों ने कहा- छोड़ देते हैं आज, जब यहाँ नहीं मिल रहा तो अब वीणा पहुँच कर मिलेगा? मैंने कहा- चलो, देखते है.हम सब देर से गए और मैनेजेर से लड़ कर टिकट लिया.
पटना शहर के पटना विमेन'स कॉलेज में पढ़ते और पीटर विला में रहते हुए कमोबेश यही मेरी सिनेमाई दास्ताँ रही।आज भी संतोष इसी बात का है कि हमने कभी किसी लड़के या किसी सहेली के बॉयफ्रेंड से मदद नहीं ली, बल्कि अपने उद्यम से हर फिल्म देखी और किसी का पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च करवाया, जिसके लिए लड़किया बदनाम रहती है :) !!!
आज भी इन यादों के साथ होठों पे मुस्कराहट इसलिए भी आ जाती है कि हम कभी बदनाम पटना शहर में भी छेड़खानी जैसी चीजों के शिकार नहीं हुए.उस दौर(१९९६-२०००) के पटना में कई दहशतनाक घटनाएं हुई थीं, जिससे हमारे माता-पिता डरे रहते थे,पर हम फिल्में देखने से कब बाज आने वालों में थे!!! और ऐसी कोई बुरी घटना भी नहीं घटी,जिससे आज भी हमारे मुंह का जायका बिगड़ जाये.... मुझे तो लगता है कि उन सिनेमाघरों की व्यवस्था ऐसी थी कि हम "लड़की होकर भी" वैसी-वैसी फिल्में और इतनी ढेर सारी (!) सम्मानजनक तरीके से देख सके.
पसंद की १० फिल्में-
१.कागज़ के फूल
२.सूरज का सातवां घोड़ा
३.मुगलेआज़म
४.खामोशी
खामोशी दी म्यूजिकल
६.अंगूर
७। सदमा
८.हम आपके हैं कौन
९.जब वी मेट
१०.अमिताभ बच्चन की लगभग हर फ़िल्म

Monday, July 20, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा से पहली मुलाकात-मंजीत ठाकुर

हिन्दी टाकीज-४४
मंजीत ठाकुर उत्साही व्यक्ति हैं.लेखक और पत्रकार होने के इस विशेष गुण के धनी मंजीत इन दिनों पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं.अच्छा ही है,दिल्ली की प्रदूषित हवा से जितना दूर रहें.अपने बारे में वे लिखते हैं...
मैं मजीत टाकुर.. वक्त ने बहुत कुछ सिखाया है। पढाई के चक्कर में पटना से रांची और दिल्ली तक घूमा.. बीएससी खेती-बाड़ी में किया। फिर आईआईएमसी में रेडियो-टीली पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा.. सिनेमा की सनक ने एफटीआईआई के चक्कर भी लगवा दिए। नवभारत टाइम्स में सात महीने की संक्षिप्त नौकरी के बाद से डीडी न्यूज़ का नमक खा रहा हूं। फिलवक्त सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट हूं। सिनेमा के साथ-साथ सोशल और पॉलिटिकल खबरें कवर करने का चस्का है। सिनेमा को साहित्य भी मानता हूं, बस माध्यम का फर्क है..एक जगह शब्द है तो दूसरी जगह पर चलती-फिरती तस्वीरें..। सिनेमा में गोविंदा से लेकर फैलिनी तक का फैन हूं..। दिलचस्पी पेंटिंग करने, कविताएं और नॉन-फिक्शन गद्य लिखने और कार्टून बनाने में है। निजी जिंदगी में हंसोड़ हूं, दूसरों का मज़ाक बनाने और खुद मज़ाक बनने में कोई गुरेज़ नहीं। अपने ब्लॉग गुस्ताख पर गैर-जरुरी बातें लिखता हूं.. हल्की-फुल्की तरल बातें..पिछले कुछ महीनों से भारत दर्शन पर हूं, लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल और फिर बजट के दौरान पूरे पूर्वी भारत की सड़क यात्रा ने बेहतरीन तजरबे दिए... फिल हाल गुजरात में हूं...इस उम्मीद में हूं कि सूरज की कोई खास किरण एक दिन मेरे सिर पर पड़ेगी। मानता हूं कि मैं दुनिया का सबसे ज़रुरी पत्रकार बस बनने ही वाला हूं, डीडी के लिए कई डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई हैं। लेकिन मेरा सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। आप उनसे sampark करना चाहते हैं to यहाँ likhen...manjit2007@gmail.com

या फ़ोन करें...09871700240


अपने स्कूली दिनों में कायदे से बेवकूफ़ ही था। पढ़ने-लिखने से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक में पिछली पांत का खिलाड़ी। क्रिकेट को छोड़ दें, तो बाकी किसी चीज़ में मेरी दिलचस्पी थी ही नहीं। बात तब की है जब मैं महज सात-आठ साल का रहा होऊंगा।॥ मेरे छोटे-से शहर मधुपुर में तब, दो ही सिनेमा हॉल थे, वैसे आज भी वही दो हैं।





लेकिन सिनेमा से पहली मुलाकात, याद नहीं कि कौन सी फिल्म थी वह- मम्मी के साथ हुई थी। मम्मी और कई पड़ोसिनें, मैटिनी शो में फिल्में देखने जाया करतीं। हम इतने छोटे रहे होंगे कि घर पर छोड़ा नहीं जा सकता होगा। तभी हमें मम्मी के साथ लगा दिया जाता होगा। बहनें भी साथ होतीं॥ तो सिनेमा के बारे में जो पहली कच्ची याद है वह है हमारे शहर का मधुमिता सिनेमा..।





इस सिनेमाहॉल की इमारत पहले रेलवे का गोदाम थी। थोड़ा बहुत नक्शा बदल कर इसे सिनेमा हॉल में तब्दील कर दिया था। अब इस हॉल को पुरनका हॉल कहा जाता है। महिलाओं के लिए बैठने का अलग बंदोबस्त था। आगे से काला पर्दा लटका रहता॥ जो सिनेमा शुरु होने पर ही हटाया जाता। तो सिनेमा शुरु होने से पहले जो एँबियांस होता वह था औरतों के आपस में लड़ने, कचर-पचर करने, और बच्चों के रोने का समवेत स्वर।





लेडिज़ क्लास की गेटकीपर भी एक औरत ही थीं, मुझे याद है कुछ ललिता पवारनुमा थी। झगड़ालू॥किसी से भी ना दबने वाली..उसकी पटरी किसी से नहीं खाती। चूंकि हमारे मुह्ल्ले की औरतें प्रायः फिल्में देखनो को जाती तो उस ललिता पवार से उनकी गाढ़ी छनती थी और सीट ठीक-ठाक मिल जाती। शोहदे भी उस वक्त कम ही हुआ करते होंगे, ( अरे जनाब आखिरकार हम तब तक जवान जो नहीं हुए थे) तभी औरतों की भीड़ अच्छी हुआ करती थी।





बहरहाल, फिल्म के दौरान बच्चों की चिल्ल-पों, दूध की मांग, उल्टी और पैखाने के वातावरण में हमारे अंदर सिनेमा के वायरस घर करते गए। हमने मम्मी के साथ जय बाबा अमरनाथ, धर्मकांटा, संपूर्ण रामायण, जय बजरंगबली, मदर इंडिया जैसी फिल्में देखी। रामायण की एक फिल्म में रावण के गरज कर - मैं लंकेश हूं- कहने का अंदाज़ मुझे भा गया। और घर में अपने भाईयों और दोस्तों के बीच मैं खुद को लंकेश कहता था।





मेरे पुराने दोस्त और रिश्तेदार अब भी लंकेश कहते हैं। वैसे लंकेश का चरित्र अब भी मुझे मोहित करता है, और इसी चरित्र की तरह का दूसरा प्रभावी चरित्र मुझे गब्बर और फिर मोगंबो का लगा। लेकिन तब तक मैं थोड़ा बड़ा हो गया था। और मानने लगा था कि अच्छी नायिकाओं का साथ पाने के लिए या तो आपको अच्छा और मासूम दिखने वाला अनिल कपूर होना चाहिए या फिर गुस्सैल अमित।





जब हम थोड़े और बड़े हुए तो उस काले परदे के आगे की दुनिया की खबर लेने की इच्छा बलवती होती गई। तब कर एक और सिनेमाघर शहर में बन गया। सिनेमाघर की पहली फिल्म थी- याराना। सन बयासी का साल था शायद। हम छोटे ही थे, लेकिन भाई के साथ फिल्म देखने के साथ गया। अमिताभ से पहला परिचय याराना के जरिए हुआ।





उस समय तक हमारे क़स्बे में वीडियों का आगाज़ नहीं हुआ था। बड़े भाई आसनसोल से आते तो बताते टीवी और वीडियो के बारे में। हॉल जैसा दिखता है या नहीं?? पता चला बित्ते भर के आदमी दिखते हैं, छोटा सा परदा होता है। निराश हो गया मैं । लेकिन घर पर भी लगा सकते हैं यह अहसास खुश कर गया।





बहरहाल, हमारे शहर में एक राजबाड़ी नाम की जगह है, जहां लड़कों ने आसनसोल से वीडियो लाकर फिल्में दिखाने का फैसला किया था। टिकट था - एक रुपया। औरतो के लिए फिल्म दिखाई जा रही थी-मासूम और एक और फिल्म थी दीवार। मम्मी और उनकी सहेलियां मासूम देखने गईँ। शाम में दीवार दिखाई जानी थी, बाद में जब हम और रतन भैया फिल्म देखकर लौट रहे थे। हम दोनों में विजय बनने के लिए झगड़ा हो गया। वह कहते रहे कि तुम छोटे हो कायदे से रवि तुम बनोगे, लेकिन रवि जैसा ईमानदार बनना मुझे सुहा नहीं रहा था। विजय की आँखों की आग अच्छी लगी और उस दिन के बाद से लगती ही रही। खासकर, विजय के बचपन के किरदारने जूते साफ करते हुए जब डाबर के साथी से कहा- साहब पैसे हाथ में उठाकर दो॥ मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। सच कहूं तो उस वक्त मेरा गला रुंध गया था, वीडियो देखते हुए। आज लगता है कि सलीम-जावेद ने कितनी कुशलता से सामूहिक चेतना में आत्मसम्मान की बात पैबस्त कर दी थी।





उस दिन के बाद से फिल्मों का चस्का लग गया। लेकिन घर में एक बदलाव आ गया। आर्थिक कारणों से अब मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया गया। वजह-पिताजी का देहांत हो गया था। घर में एक किस्म की संजीदगी आ गई थी। मम्मी, मां में बदल गई। उनके सरला, रानू और बाकी के उपन्यास पढ़ना छूट गया। अचानक मेरी मां मनोरमा और कांदबिनी, सरिता छोड़कर रामचरितमानस का पाठ करने लगा। एक बेहद संजीदा माहौल॥ भारी-भारी-सा। मुझे पिता के देहांत के साथ इस माहौल का भारीपन खलने लगा। बड़े भैया कमाने पर उतरे, मंझले भाई में पढाई का चस्का लगा। मुझे बेवजह ज्यादा प्यार मिलने लगा। घर के लोग सिनेमा से दूर होते गए। सबका बकाया मैं और बड़े भैया पूरा करने लगे। घर के भारीपन से दूर मैं सिनेमाहॉल में जगह तलाश करने लगा।





सरकारी स्कूल से बंक करना कोई मुस्कल काम नहीं था। मैं क्लास से भाग कर सिनेमा देखने जाने लगा। लेकिन तीन घंटे तक स्कूल और घर से दूर रहने की हिम्मत नहीं थी। उन दिनों -८६ का साल था- मधुपुर के सिनेमाघरों में जबरदस्ती इंटरवल के बाद घुस आने वालों को रोकने के लिए एक नई तरकीब अपनाई गई थी। इंटरवल में बाहर निकलते वक्त गेटकीपर एक ताश के पत्ते का टुकडा़ देता था। अब हमने एक और दोस्त के साथ इस तरकीब का फायदा उठाया। इस तरीके में हम इंटरवल के पहले की फिल्म एक दिन और बाद का हिस्सा दूसरे दिन देख लेते थे।





गिरिडीह में सवेरा सिनेमा हो, या देवघर में भगवान टॉकीज, मधुपुर में मधुमिता और सुमेर, आसनसोल में मनोज टॉकीज, हर सिनेमाहॉल का पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हमें पहचानने लगा। गेटकीपरों के साथ दोस्ती हो गई। फिल्म देखना एक जुनून बन गया। कई बार हमारे बड़े भाई ने सिनेमाहॉल में ही पकड़ कर दचककर कूटा। लेकिन हम पर असर पड़ा नहीं।





बाद में अपने अग्रीकल्चर कॉलेज के दिनों में या बाद में फिल्में पढाई के तनाव को दूर करने का साधन बन गईं। अमिताभ के तो हम दीवाने थे। शुरु में कोशिश भी की अंग्रेजी के उल्टे सात की तरह पट्टी बढा़ने की , लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। बाद में शाहरुख ने अमिताभ को रिप्लेस करने की तरकीबें लगाईं, तो डीडीएलजे ने बहुत असर छोड़ा था हम पर। नकारात्मक भूमिकाओं को लेकर मै हमेशा से सकारात्मक रहा हूं। ऐसे में बाजीगर और डर वाले शाहरुख को हमने बहुत पसंद किया था। उसके हकलाने की कला, साजन में संजय के बैसाखी लेकर लंगड़ाने की अदा, अजय देवगन की तरह फूल और कांटे वाला सोशल एलियनेशन, ॥ सब पर हाथ आजमाया। वैसे, बाज़ीगर में शाहरुख जब शिल्पा की हत्या कर देते हैं, तो हमें बड़ा अफ़सोस हुआ था। यार, ऐसे नहीं मारना चाहिए था लड़की को..सुंदर थी।





लेकिन दूरदर्शन की मेहरबानी से फिल्मों से हमारा रिश्ता और मजबूत ही हुआ। दूरदर्शन पर मेरी पहली फिल्म याद नहीं आ रहा कि साल कौन-सा था, लेकिन फिल्म थी समझौता। गाना अब भी याद है समझौता गमो से कर लो॥। फिर अमृत मंथन, अवतार, मिर्च-मसाला, पेस्टेंजी, आसमान से गिरा, बेनेगल निहलाणी की फिल्में देखने का शौक चर्राया।





लगा कि लुटेरे, मरते दम तक, लोहा, एलान-ए-जंग, हिम्मतवाला और तोहफा ॥से इतर भी फिल्में हो सकती हैँ। तो हर तरह की फिल्में देखना शुरु से शौक में शामिल रहा। और दूरदर्शन की इसमें महती भूमिका रही। जिसने कला फिल्में देखने की आदत डाल दी। तो हर स्तर की हिंदी अंग्रेजी फिल्में देखते रहे। हां, डीडी की कृपा से ही ऋत्विक घटक और सत्यजित् रे की फिल्मों से परिचय हुआ। तो सिनेमा एक शगल न रह कर ज़रुरत में बदल गया।





बहुत बाद में २००७ में एफटीआईआई में फिल्म अप्रीशिएशन के लिए पहुंचा तो पता चला कि एक पढाई ऐसी भी होती है जिसमे पढाई के दौरान फिल्मे दिखाई जाती हैं। तो पूरे कोर्स को एंजाय किया। फिल्में देखने और फिल्मे पढ़ने की तमीज आई। विश्व सिनेमा से परिचय गाढा हुआ।





गोवा और ओसियान जैसे फिल्मोत्सवों में ईरानी, फ्रेंच और इस्रायली सिनेमा से दोस्ती हुई और सिनेमा का वायरस मुझे नई जिंदगी दे रहा हैं... मैं हर स्तर के फिल्मे जी रहा हूं, और गौरव है मुझे इस बात का कि दुनिया में सिनेमा एक कला और कारोबार के रुप में जिंदा है तो मेरे जैसे दर्शक की वजह से, जो एक ही साथ रेनुवां-फेलेनी और राय-घटक का मज़ा बी ले सकता है साथ ही गोविंदा के सुख, और रनबीर के सांवरिया भी झेल सकता है।





मेरी पसंद की फिल्में



१. शोले,


२. प्यासा,


३.स्वदेश,


४.काग़ज़ के फूल


५. दीवार


६.जाने भी दो यारों


७. दस्विदानिया ७. अंगूर


८. मौसम


९ गरम हवा


१०. जागते रहो

Monday, July 13, 2009

हिन्दी टाकीज:जाने कहां गये वो सिनेमा के दिन ...-पूनम चौबे


हिन्दी टाकीज-४३

पूनम चौबे नयी पीढ़ी की पत्रकार हैं। अंग्रेजी की छात्रा हैं मगर लिखना-पढ़ना हिंदी में करती हैं। कुछ नया करने का जज्‍बा इन्‍हें पत्रकारिता में घसीट लाया है। कुछ कहानियां भी लिख चुकी हैं। मगर किसी एक विधा पर टिके रहना अपनी तौहीन समझती हैं। सो फिलहाल पहचान कहां और कैसे बनेगी, इसी में सर खपा रही हैं।

बचपन की यादों में शुमार मूवी देखने का खुमार। बरबस यह जुमला इसलिए याद आ रहा है क्‍योंकि आज भी पिक्‍चर हॉल में जाकर फिल्‍में देखने में वही मजा आता है, जो दस-बारह साल पहले था। आज भी वो यादें धुंधली नहीं पड़ीं जब मेरी जिद पर डैडी हम चारों भाई-बहनों को फिल्‍म दिखाने ले गये थे। 1996 की वह सुहानी शाम, शुक्रवार का दिन, फिल्‍म थी 'हम आपके हैं कौन' पिक्‍चर हॉल जाने के लिए डैडी से ढेरों मिन्‍नतें करनी पड़ती थीं। कारण था उनकी ऑफिस से छुट्टी न मिलना। फिर भी उस शुक्रवार की शाम को तो मैं अपनी जिद पर अड़ी रही। आखिरकार हम पिक्‍चर हॉल पहुंचे। टिकट लेने के बाद जैसे ही उस बड़े हॉल के कमरे में पहुंचे, लगा मानो, भूतों के महल में आ गये हों। ऐसा धुप अंधेरा। क्‍या ऐसा ही होता है सिनेमाघर? मुझे लगा यहां बिजली की कोई समस्‍या होगी। खैर, टिकट चेक करने वाले की टॉर्च की रोशनी ने मुझे और मेरे परिवार को हमारी सटी से मुखातिब कराया। फिल्‍म शुरू हुई पर ये क्‍या? आवाजें इतनी तेज कि कान मनो अभी फट पड़ेंगे। हर रोमांटिक सीन पर कुछ लड़कों की सीटी सुनायी देती। वैसे में भी इस कला में निपुण थी। मुझे लगा ये कोई परंपरा है। बस मैंने भी अपनी कला का एक नजारा दिखा ही दिया। लेकिन फिर पिताजी की डांट के बाद मैं दोबारा अपनी इस कला का प्रदर्शन नहीं कर पायी। मुझे दूसरी बार हैरत उस समय हुई जब इंटरवल होने के साथ ही रोशनी से पूरा सिनेमाहाल नहा गया। डैडी ने हम चारों भाई-बहनों को हॉल की कैंटीन में चलने को कहा ताकि हम कुछ खा-पी सकें। पर मुझे डर था कि कहीं कोई मेरी सीट पर बैठ गया तो क्‍या होगा। यह डर और ऊपर से सिनेमा का रोमांच, दोनों मेरे ऊपर इस तरह से हावी थे कि मैंने कैंटीन जाने का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया और अपने भाई-बहनों को वहीं, मेरी सीट पर कुछ लाने के लिए कह दिया।

आखिरकार मैंने अपने इस डर को छुपाकर बाकी लोगों को ही मेरे लिए कुछ लाने को कह दिया। तीन घंटे के बाद जब हॉल से बाहर निकली तो पूरे रास्‍ते बस फिल्‍म की ही चर्चा चलती रही। चाहे जो कुछ हो, पर मजा तो बहुत आया इस फिल्‍म में। इसके बाद दूसरी फिल्‍म 'साजन चले ससुराल' देखा। पिक्‍चर हॉल में अंधेरा होने की वजह से गलती से मम्‍मी की जगह किसी और आंटी को न जाने कितनी बार हर सीन पर कमेंट करने के नये-नये नुस्‍खे बताती रही। इंटरवल में पता चला कि मम्‍मी मेरे बाएं नहीं बल्कि दाएं साइड में बैठी थी। इसके बाद एक-दो मौके और भी आएं, जब फैमिली के साथ फिल्‍में देखने का मौका मिला। एक बार तो मेरी छोटी बहन ने हॉल में कॉकरोच को देख कर ऐसा तहलका मचाया कि उफ्फ, पूरी फिल्‍म मानों कॉकरोच बेस्‍ड फिल्‍म हो गयी थी। हर पांच मिनट पर कॉकरोच को देखने का आतंक पूरी फिल्‍म का मजा ही किरकिरा कर दिया। हां 'कुछ कुछ होता है' देखने के बाद कुछ दिनों तक काजोज जैसे बाल रखने का जो खुमार चढ़ा, वह ग्रेजुएशन तक उतरा ही नहीं। फिल्‍म भी काफी रोमांचक लगी और इसे देखने का नतीजा यह निकला कि इसे पूरे 25 बार देखने के बाद आज भी किसी फिल्‍म को देखते वक्‍त मेरे जेहन में आ जाती है। करीब चार साल पहले फिल्‍म 'बागवान' देखने का मौका मिला। चूंकि इस बार यह फिल्‍म देखना किसी करीबी दोस्‍त की तरफ से एक निमंत्रण था। हमलोग कुछ चार दोस्‍त इस आमंत्रण का हिस्‍सा बने थे। पूरी प्‍लानिंग के अनुसार यह तय हुआ कि सभी लोग ठीक पौने 12 बजे तक पिक्‍चर हॉल के बाहर मिलेंगे। मुझे थोड़ी देर हो गई। करीब बारह बज कर दस मिनट पर मैं जब हॉल पहुंची, तो मेरे बाकी दोस्‍त फिल्‍म के लुत्‍फ उठाने में मशगुल हो चुके थे। उन्‍हें यह ध्‍यान नहीं आया कि मैं उस पिक्‍चर हॉल के लिए नहीं नहीं, बल्कि उस शहर के लिए भी नयी थी। अब हॉल पहुंचने के बाद मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अब क्‍या करूं। किसी तरह हॉल के अंदर जाने का रास्‍त खोजा और अंदर पहुंच गई। मगर टिकट तो मेरे पास था ही नहीं। तब मेरे पास मोबाइल जैसी संचार सुविधा का भी अभाव था। इतनी भीड़ में दोस्‍तों को कैसे खोजूं। और जब तक टिकट पास नहीं होगा सीट मिलने का तो सवाल ही नहीं था। जब टिकट चेकर ने मेरे पास आकर मुझसे टिकट मांगा, तो मेरे दिमाग में भी एक नयी घंटी बजी। मैंने उसे थोड़े कड़े आवाज में यह कहते हुए डांट पिलायी कि एक तो मेरे दोस्‍त मुझसे बिछड़ गये हैं और उस पर आपको टिकट की पड़ी है। आपके हॉल का पूरा सिस्‍टम ही बेहद फालतू लगता है। अगर इस भीड़ में कोई खो जाये, तो शायद पूरी फिल्‍म खत्‍म हो जाये मगर वह आदमी न मिले। पहली बार इस शहर में आयी और ऐस देखने को मिला। इस शहर के ऊपर की गयी मेरी सारी रिसर्च बेकार जायेगी। कहां मैं इसके बारे में लंबी-लंबी तारीफों के पुल बांध रही थी और कहां ये... बस-बस पूनम, रहने दो। हमें मालूम हो चुका है कि तुम आ गयी हो। पीछे से मेरे दोस्‍त ने मेरी बात बीच में काटते हुए मुझे पुकारा। थैंक गॉड मेरी जान में जान आ गयी। वह टिकट चेकर तो बस मेरा मुंह देखे जा रहा था। कुछ लोग भी भौचक्‍के से मुझे और मेरे दोस्‍त को देखे जा रहे थे। आखिरकार किसी तरह उसने उनलोगों को शांत कराया और मुझे मेरी सीट तक लाकर अच्‍छी-खासी डांट भी मुफ्त में दे दी। पर मुझे तो इस बात की खुशी थी कि कुछ भी हो मैंने तो बाजी मार ली। दोस्‍त भी मिल गये और पिक्‍चर का मजा, भले ही इस हो-हल्‍ला के चक्‍कर में 20 मिनट की फिल्‍म से हाथ धोना पड़ा, पर मजा खूब आया। वेसे आज भी उन दिनों जैसी बदमाशियों का सिलसिला थमा नहीं। मौका मिला नहीं कि मैं फिर से वैसे कारनामे करने को तैयार हो जाती हूं।
मेरी पसंदीदा फिल्‍में :

१.मोहब्‍बतें

२.परदेस

३.वीर-जारा

४.बागवान

५.हम साथ-साथ हैं

६.विवाह

७.हेरा-फेरी।

८.वेलकम टू सज्‍जनपुर

९.जाने तू या जाने ना



Monday, May 18, 2009

हिन्दी टाकीज:मेरा फ़िल्म प्रेम-अनुज खरे



हिन्दी टाकीज-३६

अनुज खरे फिल्मों के भारी शौकीन हैं.चवन्नी को लगता है की अगर वे फिल्मों पर लिखें तो बहुत अच्छा रहे.उनसे यही आग्रह है की समय-समय पर अपनी प्रतिक्रियाएं ही लिख दिया करें.आजकल इतने मध्यम और साधन हैं अभिव्यक्ति के.बहरहाल अनुज अपने बारे में लिखते हैं...बुंदेलखंड के छतरपुर में जन्म। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर। घाट-घाट का पानी पीया। समस्त स्थलों से ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान देने का मौका आने पर मनुष्य प्रजाति ने लेने से इनकार किया खूब लिखकर कसर निकाली।
पत्रकारिता जीविका, अध्यापन शौकिया तो लेखन प्रारब्ध के वशीभूत लोगों को जबर्दस्ती ज्ञान देने का जरिया। अपने बल्ले के बल पर जबर्दस्ती टीम में घुसकर क्रिकेट खेलने के शौकीन। फिल्मी क्षेत्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने की गलतफहमी। कुल मिलाकर जो हैं वो नहीं होते तो अद्भुत प्रतिभाशाली होने का दावा।जनसंचार, इतिहास-पुरातत्व में स्नातकोत्तर। शुरुआत में कुछ अखबारों में सेवाएं। प्रतियोगी परीक्षाओं के सरकारी-प्राइवेट संस्थानों में अध्यापन। यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप।पत्रकारिता की विशिष्ठ सेवा के लिए सरस्वती-पुत्र सम्मान। व्यंज्य पर एक पुस्तक प्र्काशित। मप्र की संस्कृति-जनजीवन पर पूर्व में किताब का प्रकाशन। विभिन्न समाचार पत्रों में दर्जनों लेखों का प्रकाशित। विगत दस वर्षो से दैनिक भास्कर पत्र समूह में, भास्कर पत्रकारिता अकादमी में उपनिदेशक रहने के पश्चात कई स्थानों पर कार्य किया। संप्रति-भास्कर डॉट कॉम पोर्टल में संपादक।
अपने फिल्म प्रेम की कहानी पूरी फिल्मी अंदाजे की ही है। पिताजी का सरकारी नौकरी में होने के कारण निरंतर ट्रांसफर होता रहता था। बाद में खुद भी ट्रांसफर को प्राप्त होते रहे सो, पूरा फिल्म प्रेम बुंदेलखंड से लेकर जयपुर, भोपाल और ना जाने कितने शहरों की विस्तृत लोकेशनों पर शूट हुआ है। कई बार तो मुझे ऐसा लगता था कि एक साथ दो फिल्में चल रही हैं। एक मेरे जीवन की रीयल लाइफ फिल्म। जिसमें मुख्य पात्रों में मैं खुद हूं, सपोर्टिग एक्टर देशकाल के हिसाब से दोस्तों, सहकर्मियों सेलेकर श्रीमती जी तक रहे हैं। जबकि दूसरी रील लाइफ में चलती फिल्म है जिसमें मुख्य पात्रों में अधिकतर अमिताभ बच्चन और उनके सहयोगी कलाकार ही रहे। क भी कभार धर्मेद्र से लेकर जीतेंद्र तक, सहूलियत से जिनकी भी फिल्में हमारे शहर में उपलब्ध हो गईं वे मुख्य पात्र बन जाते थे। बचपन में देखी गईं इन फिल्मों का मेरे जीवन पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। चूंकि सेल्यूलाइड हमेशा आपको आकर्षित करता रहता है। हमेशा आपको चमत्कृत करता है। सो बहुत आश्चर्य नहीं कि फिल्में किसी भी भारतीय के अंतस में गहरे धंसी रहती हैं। गाहेबगाहे वे उसे प्रेरणा देती हैं। तो अपने अंतर्मन में खास तौर पर फिट कर दी गईं इन फिल्मों ने बाद में मेरी बड़ी मदद की। खूब जमकर इन फिल्मों पर लिखा।
खैर मेरी कहानी की शुरूआत बुंदेलखंड के एक छोटे से शहर छतरपुर से होती है। जहां कि मेरा बचपन बीता, कुछ नाले -नालियों के बैकग्राउंड में कुछ दोस्त थे। सारे के सारे फिल्मों के विकट प्रेमी। इन्हीं नाले-नालियों पर रखे बड़े-बड़े सीमेंट के पाइपों पर बैठकर सभी का फिल्म प्रेम एक साथ परवान चढ़ा। इन्हीं पर बैठकर सभी एक दूसरे को अपनी देखी गई फिल्मों की कहानियां एक खास ध्वनि ट्रेक ढेन॥र्ट्रेन ड्रैन..को बार-बार निकालते हुए सुनाते थे। मूलत: यह ध्वनि यह बताने के लिए निकाली जाती थी कि हीरो कहीं विलेनों में घिर गया है या उस पर कोई मुसीबत आ गई है। यानि कुल मिलाकर बताया जाता था कि मुकाम गंभीर है। इसी ध्वनि के माध्यम से पूरे मित्रों को सिनेमा हाल का मजा दिया जाता था। बुंदेलखंड में लगभग प्रत्येक शहर में तब मेरा मानना है कि फि ल्म देखकर आने के बाद मित्रों की उसका सस्वर बैकग्राउंड म्यूजिक सहित स्टोरी सुनाने की बड़ी विशिष्ट परंपरा पाई जाती थी। तब अमिताभ अद्भुत रूप से फेमस थे। उनकी हर फिल्म को तब जोरदार शुरूआत मिलती थी । मुझे उनकी एक फिल्म की याद है। मुकद्दर का सिकंदर। शायद अस्सी के दशक का कोई वर्ष रहा होगा। फिल्म लगी थी महेश टॉकीज में। क्या भीड़ थी। क्या लोग उमड़े थे। वो नजारा आज भी आंखों में जवां है। पहली-पहली बार टिकट ब्लैक कैसे होते हैं वहीं देखा था। कैसे रिक्शेवाले धीरे से टिकट निकाल कर साइड में ले जाकर धीरे से तौलमोल करके टिकट खिसकाते।
एक बात भी अक्सर याद आती है। तब हम सुबह से ही टॉकीज में फिल्म की पब्लिसिटी देखने पहुंच जाया करते थे। फिर धीरे से माहौल बनाया जाता था कि फिल्म कैसे देखें। हालांकि फिल्म देखने पर कोई ज्यादा प्रतिबंध नहीं था। फिर भी फिल्म बड़ों के साथ ही देखी जाती थी। वे ही तय करते थे कि किसफिल्म को देखा जाना है। फिल्म देखने के सामूहिक आयोजन अकसर ही होते थे। फिल्म देखने तब एक उत्सव बन जाता था। अड़ोस-पड़ोस के कई परिवार से कुछ दीदीयां, हम लोग। जिस दिन फिल्म जाना होता था। दोस्तों को पूरे जोर-शोर से बताया जाता था कि हम आज फिल्म देखने जा रहे हैं। सुबह से ही नए कपड़े पहनकर घूमना शुरू कर दिया जाता था। कुल मिलाकर मोहल्ले में शायद ही कोई बचता हो जिसे पता न चल जाता हो कि हम फिल्म देखने जा रहे हैं। फिल्म देखने के दौरान तब अमिताभ के आने पर कैसे चीख-पुकार मचती थी वो अपने आप में अलग ही अनुभूति थी। आज सोचते हैं तो लगता है कि इस कलाकार में क्या रहा होगा जिसने पूरा एक जमाना प्रभावित रहा। फिरअमिताभ का अभिनय, अत्यंत अतार्किक पात्र भी कितनी गंभीरता और शिद्दत से निभाते थे वे कि महसूस ही नहीं होता था। हालांकि एक बात है हिरोइनें तब हमारी श्रृद्धा का उतना पात्र नहीं होती थीं। रेखा की बात की जाती थी, जया बच्चन की मजबूरी पर कई बार कोई ज्ञानी मित्र प्रकाश डाल देता था बस। हिरोइनों से ज्यादा चर्चा खलनायकों की होती थी। अमजद खान को जितना कोसा जा सकता था कोसा जाता था। सारी मित्र मंडली इस बात पर सहमत थी कि अमिताभ की सारी मुसीबतों की जड़ यही दुष्ट है। बरसात की एक रात, सत्ते पे सत्ता और शोले की नफरत का विस्तार तब याराना की दोस्ती देखकर कम हुआ था। जिस पर इतना चिंतन जरूर किया गया था कि यार, अमिताभ को इसका दोस्त नहीं बनना था।
एक्टिंग से ज्यादा चर्चा का केंद्र फाइटिंग होती थी। चूंकि उसी से हम अपने लड़ने के तरीकों में नवाचार करते थे, तो अमिताभ या धर्मेंद्र ने किस तरह से बदमाशों को कूटा, कैसी गाली दी या कैसे बदमाशों को ललकारा कि जिसके बाप में दम हो चाबी मुझसे छीनकर दरवाजा खोल लो। हमारी आपसी लड़ाइयों में भी तेरे बाप में दम हो तो छूकर दिखाओ जैसे डॉयलाग सहजता से निकलते थे। जिस पर तटस्थ दोस्त दूसरे दोस्त को भी बढ़ावा देते थे कि तू भी कुछ बोल कि बेटा डर गया। जिस पर उसे भी कोई मौलिक किस्म का डॉयलाग लाना पड़ता था। यानी फिल्मों का कुछ यूं भी होता था वास्तविक जीवन में भरपूर इस्तेमाल। जितनी उत्सुकता से फिल्म देखी जाती थी उसी उत्साह से फिर फिल्म देखकर लौटने पर दोस्तों से कहानी शेयर की जाती थी। दोस्त भी पट्ठे नाली वाली जगह पर जमे मिलते थे। कोई औपचारिकता नहीं सीधे कहानी सुनाओ। बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं निकाला तो नाराजगी जताई जाती थी कि -क्यों बे जल्दी भगना चाहता है, पूरी सुना, ढंग से सुना। अबे, अमिताभ ने डांस किया था कि नहीं। वोई पुराना वाला डांस किया होगा। फिर एक हाथ कमर पर रखकर दूसरा हाथ हवा में लहराते हुए अमिताभ का ट्रेडमार्का डांस भी थोड़ बहुत करके दिखाना होता था। अमिताभ तब की पीढ़ी के सबकुछ होते थे। स्टाइल उन्हीं से सीखी जाती थी। अमिताभ की देखा-देखी कुछ दोस्त तो बाएं हाथ से लिखने या खेलने तक लगे थे। कुली के दौरान तो पुनीत इस्सर हम सबके गुस्से के एकमात्र पात्र थे। रोज कोई न कोई अमिताभ की दुर्घटना की किसी अलग ही एंगल से कहानी ले आता था। सब रस लेकर उसे सुनते। तब उसमें बहुत कुछ हमारी कल्पना का मिश्रण भी होता था लेकिन सुनाने का ढंग इतना जोरदार होता था कि उसे सही माना जाता था। फिर किसी भी तथ्य को सही माने जाने का तब एक ही पैमाना होता था कि उसे दो -तीन दोस्तों का समर्थन प्राप्त हो जाए। तो कहानियां ऐसे गढ़ी जाती थीं कि बहुमत उस पर विश्वास कर ले। तब मनोरंजन के ज्यादा साधन नहीं थे मुझे लगता है कि तब शायद ऐसे ही स्टोरी टेलिंग से लोगों की रचनात्मकता बढ़ती होगी।
तब शहर में तीन टॉकीजें थीं। महेश, गोवर्धन, छत्रसाल। इनमें से छत्रसाल टॉकीज तालाब के किनारे थी। उसकी छत नहीं थी। एकदम ओपनएयर थियेटर था वो। फिल्म चलती तो हवाएं भी साथ चलतीं। कभी तालाब भर जाता तो टॉकीज बंद हो जाती। फिल्में वहां हमेशा अच्छी ही लगती थी। गोवर्धन और महेश टॉकीज वैसी थीं जब कि किसी कस्बे में तब टॉकीजों को होना चाहिए था। लाल-पीली पतंगी कागजों वाली टिकटें। गेटकीपरनुमा कुछ लोग। कुछ चौथी-पांचवीं बार फिल्म देखने वाले भयंकर फिल्म प्रेमी, जो पूरी फिल्म की कहानी लगातार अपने दोस्तों को सुनाते रहने का पुनीत कत्र्तव्य भी निरंतर निभाते थे। पटिये वाली कुर्सियां। टॉर्च लेकर पूरी फिल्म के दौरान लोगों को बैठाने वाले गेटकीपर। गाने के दौरान बाहर निकलने वाले कुछ व्यक्तित्व। छोटे बच्चों को लगातार बाहर खिलाने वाले कुछ पति। ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ दर्शक। जबर्दस्त सीटियां। फिल्म की रील कटने पर भारी पैमाने पर होने वाला गाली-गलौज से भरपूर आग्रह। इंटरवल में समोसे-मूंगफली। फिल्म खत्म होने पर रिक्शे के लिए की जाने वाली भागदौड़। ये वो यादें हैं जिन्हें आज ढूंढ़ों तो कहीं नहीं दिखेंगी। मल्टी प्लेक्स के शानदार संसार में इनकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। एक फिल्म की याद है मुझे तब गोवर्धन टॉकीज में लगी थी सरगम। ऋषि कपूर और जयाप्रदा। शायद जयाप्रदा की पहली हिन्दी फिल्म थी। गोवर्धन टॉकीज बाजार और मंडी के पास थी। लाइनें इतनी लंबी लगीं थी कि बाजार तक पहुंच रही थीं। आज इस दृश्य की कल्पना कठिन है।
फिल्मों से जुड़ा मेरा एक बड़ा रोचक अनुभव है। फिल्म थी काला पत्थर। तब मुझे फिल्म जाना था और घर से अनुमति नहीं मिल रही थी। मेरी मां तब आकाशवाणी में सिंगर थीं। एक बार वे गईं गाना गाने के लिए , पिताजी तब शहर से बाहर पोस्टेड थे,सो अपनी निकल पड़ी। धीरे से दोपहर घर से ऊपर छत से कूदे, फिर कुछ दोस्तों के साथ निकल लिए महेश टॉकीज। फिल्म देखी। बीच-बीच में घर पर पड़ने वाली डांट के डर से कुछ मजा भी खराब हुआ। फिल्म खत्म हुई बाद में डरते-डरते घर पहुंचा। दोस्त तो बाहर से ही खिसक लिए कि बेटा झेलो तुम क्यों गए थे बिना बताए फिल्म। अंदर पहुंचा तो मां ने कुछ नहीं कहा। फिर पूछा कुछ खालो। मैं भूखा तो था ही फटाफट खाने लगा। धीरे से मां ने बात शुरू की केैसी थी फिल्म। इधर मैेने स्टोरी बताना चालू कर दी। उन्होंने धीरे-धीरे समझाना शुरू कर दिया। अपन ने भी उस दिन के बाद हाथ जोड़े कि कोई कितना भी कहे अकेले तो नहीं ही जाएंगे। फिल्मों के साथ तब फिल्मी गाने बेहद प्रभावित करते थे। दोस्तों में से तब अधिकतर लोग किशोर कुमार के फैन थे। उनकी क मेडी और गायन पर अकसर चर्चा छिड़ती थी। पड़ोसन एक ऐसी फिल्म थी जिसे कई बार देखने के बाद भी उसका जादू कम नहीं हुआ। अमिताभ और राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार ने जो गाने गाए हैं उन्हें हम अकसर ही लाइट जाने या गमियों की दोपहर खेली जाने वाली में अंत्यक्षरी चीख-चीख कर गाते थे। चू्ंकि मम्मी सिंगर थीं तो बाद में कुछ गाने की तमीज भी आ गई तब गाने के म ौके नहीं रहे। इस तरह आज सोचता हूं तो लगता है कि वे भी क्या दिन रहे होंगे। एकदम निश्चिंत-बेपरवाही से भरपूर। हालांकि अकसर इस बात पर सोचता हूं कैसे अभी तक देश में लोगों के जीवन को इतना प्रभावित करने वाली फिल्मों के अध्ययन का कोई पाठ्यक्रम शुरू नहीं किया जा सका है। खैर, बचपन की गलियों से गुजरकर अपना फिल्म प्रेम बड़े शहरों में भी उसी शिद्दत से बना रहा। लेकिन एक बात जो हमेशा लगती रही कि फिल्मों ने भले ही तकनीकी तौर पर बेहद तरक्की कर ली हो लेकिन लोगों का वैसा जुड़ाव कम हुआ है जैसा हमारे बचपन में पाया जाता था।
दस पसंदीदा फिल्में
1। सत्ते पे सत्ता
2। शोले
३. हाफ टिकट
४. पड़ोसन
५. दीवार
६.रंग दे बसंती
७. गजनी
८. अंदाज अपना-अपना
९. हेराफेरी
१०. हीरो न. वन

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Wednesday, May 13, 2009

हिन्दी टाकीज:काश! हकीकत बन सकता गुजरा जमाना-विजय कुमार झा


हिन्दी टाकीज-३५

हिन्दी टाकीज कोशिश है अपने बचपन और कैशोर्य की गलियों में लौटने की.इन गलियों में भटकते हर हम सभी ने सिनेमा के संस्कार हासिल किए.जीवन में ज़रूरी तमाम विषयों की शिक्षा दी जाती है,लेकिन फ़िल्म देखना हमें कोई नहीं सिखाता.हम ख़ुद सीखते हैं और सिनेमा के प्रति सहृदय और सुसंस्कृत होते हैं.अगर आप अपने संस्मरण से इस कड़ी को मजबूत करें तो खुशी होगी.अपने संस्मरण पोस्ट करें ...chavannichap@gmail.com


इस बार युवा पत्रकार विजय कुमार झा। विजय से चवन्नी की संक्षिप्त मुलाक़ात है.हाँ,बातें कई बार हुई हैं.कभी फ़ोन पर तो कभी चैट पर। विजय कम बोलते हैं,लेकिन संतुलित और सारगर्भित बोलते हैं.सचेत किस्म के नौजवान हैं। अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर उन्होंने लिखा.इस संस्मरण के सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है...यादें हसीन हों तो उनमें जीना अच्‍छा लगता है, पर उस पेशे में हूं जहां कल की बात आज बासी हो जाती है। सो आज में ही जीने वाला पत्रकार वि‍जय बन कर रह गया हूं। हिन्दी टाकीज का शुक्रि‍या कि‍ उसने अतीत में झांकने को प्रेरि‍त कि‍या और मैं कुछ देर के लि‍ए बीते जमाने में लौट गया। मुश्‍कि‍ल तो हुई, पर मजा भी खूब आया। जो समेट पाया, वह लेकर एक बार फि‍र आज में लौट आया हूं।
आप उनसे vijay.bgp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

जब से महानगर (दि‍ल्‍ली) में मशीनी जिंदगी जीने के लि‍ए मजबूर हुआ और टीवी, कंप्‍यूटर, इंटरनेट आदि‍ की सुवि‍धा सुलभ हो गई, बड़े पर्दे पर सि‍नेमा देखने के कम ही मौके मि‍लते हैं। महीनों बाद, कभी-कभार। वैसे, सच कहें तो अब देखने लायक फि‍ल्‍में भी तो कभी-कभार ही बनती हैं। शायद महीनों नहीं, बल्‍कि‍ सालों बाद। बहरहाल, जब कभी भी मल्‍टीप्‍लेक्‍स की लि‍फ्ट चढ़ने का मौका मि‍लता है, गुजरा जमाना याद आता है। स्‍कूल-कालेज वाले दि‍न।

अचानक फि‍ल्‍म देखने का प्रोगाम बनता तो चौकड़ी में पहला सवाल यही उठता था- टि‍कट मि‍ल जाएगा? मैं जि‍स शहर (भागलपुर) में पला-बढ़ा, वहां अभी भी फोन या इंटरनेट से बुकिंग की सुवि‍धा नहीं है। बॉक्‍स ऑफि‍स पर चमकी हुई फि‍ल्‍म के शो के टि‍कट लेना फल पाने (फि‍ल्‍म देखने) से पहले तपस्‍या करने के बराबर था। यह बात अलग थी कि‍ अक्‍सर यह तपस्‍या मेरा कोई दोस्‍त कि‍या करता था और पूरे तीन घंटे ‘फल’ का आनंद हम सब मि‍ल कर लेते थे।

हमारे लि‍ए उन दि‍नों फि‍ल्‍म देखना एक गोपनीय अभि‍यान हुआ करता था। सि‍नेमा हॉल जाने और वहां से नि‍कलने तक इस बात की पूरी कोशि‍श की जाती थी कि‍ कहीं कोई जान-पहचान वाला नहीं दि‍ख जाए, जो घर तक खबर पहुंचा दे। दरअसल, पि‍‍ताजी फि‍ल्‍मों के प्रति‍ दीवानगी को सीधे बच्‍चे की बर्बादी से जोड़ कर देखते थे। यह फि‍ल्‍मों के प्रति‍ समाज के एक तबके में प्रचलि‍त हेय दृष्‍टि‍कोण का नतीजा था। यह तबका फि‍ल्‍म कलाकारों को नाचने-गाने वाले और फि‍ल्‍म को समाज को गलत दि‍शा दि‍खाने वाले माध्‍यम के रूप में लेता था। ऐसी धारणा फि‍ल्‍मों और फि‍ल्‍मी दुनि‍या को देखे-जाने-समझे बि‍ना ही बनी हुई थी कि‍ फि‍ल्‍में भावी पीढ़ी को बि‍गाड़ने का सबसे अच्‍छा जरि‍या हैं। लगभग सभी दोस्‍तों की यही समस्‍या थी, सो सामूहि‍क प्रयास से हम अपने ‘अभि‍यान’ को गोपनीय रखने में अक्‍सर कामयाब हो जाते थे। बहरहाल, आज जब इसका सकारात्‍मक पहलू ढूंढता हूं तो यही लगता है कि‍ चोरी चुपके फि‍ल्‍म देखने का हमारा अभि‍यान कहीं न कहीं हम दोस्‍तों की दोस्‍ती के बंधन को मजबूती ही देता था। स्‍कूल में प्रेमरंजन से मेरी और रूपेश की दोस्‍ती ही फि‍ल्‍म देखने के क्रम में हुई थी। उन लोगों ने क्‍लास बंक कर फि‍ल्‍म देखने का प्रोग्राम बनाया था और उसमें हम दोनों को भी शामि‍ल कर लि‍या था। वहीं से हमारी दोस्‍ती की शुरुआत हुई थी।

उन दि‍नों सि‍नेमा को लेकर समाज का नजरि‍या, समाज को लेकर सि‍नेमा जगत की सोच और बनने वाली फि‍ल्‍में ही अलग नहीं थीं, बल्‍कि‍ फि‍ल्‍में देखने का अंदाज भी अलग था। तीन घंटे की फि‍ल्‍म देखने का मतलब पूरे तीन घंटे मनोरंजन, मनोरंजन और केवल मनोरंजन। हर कोई अपने-अपने अंदाज में ‘पैसा वसूल’ मनोरंजन करता था। कोई सीटी बजा कर, कोई नायकों के कारनामे देखकर, कोई हीरो-हीरोइन का रोमांस देख कर तो कोई कहानी और कि‍रदारों में डूब कर। दर्शक पर्दे पर नायकों के कारनामे से उत्‍साहि‍त होते और खलनायकों पर गुस्‍सा भी करते थे। फि‍ल्‍मों को वास्‍तवि‍कता के काफी करीब रख कर देखा जाता था। फि‍ल्‍में बनाने वाले शायद उसे हकीकत के इतना करीब लाने की कोशि‍श नहीं करते थे, पर दर्शक उसे वास्‍तवि‍कता से जोड़ लेते थे। आज फि‍ल्‍मकार अपनी तरफ से कोशि‍श कर भी दर्शकों को वास्‍तवि‍कता के करीब ले जाने में सफल नहीं हो पाते। शायद इसलि‍ए कि‍ फि‍ल्‍में तकनीकी रूप से वास्‍तवि‍कता के करीब आई हैं, पर कहानी और कि‍रदारों के मोर्चे पर यह करीबी नहीं आई है। यही वजह है कि‍ आज फि‍ल्‍म बनाने वालों को प्रचार पर भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है और प्रचार के नए-नए तरीके भी खोजने पड़ रहे हैं। इस दौरान फि‍ल्‍मों का व्‍यावसायीकरण (कॉरपोरेटाइजेशन ऑफ फि‍ल्‍म्‍स) जि‍तना बढ़ा है, उतना कुछ नहीं। इसलि‍ए रील लाइफ की सभी रि‍यल चीजें बनावटी लगती हैं।

‘हि‍न्‍दी टाकीज’ की बात गानों की चर्चा के बि‍ना अधूरी रहेगी। यह इसलि‍ए भी क्‍योंकि‍ फि‍ल्‍मों के प्रति‍ मेरी रुचि‍ वि‍कसि‍त होने में गानों की अहम भूमि‍का रही। गाने सुनने के लि‍ए रेडि‍यो एक मात्र सर्वाधि‍क लोकप्रि‍य और सस्‍ता साधन था। घर में ‘डेक’ (आडि‍यो प्‍लेयर) और टीवी आ जाने के बाद भी मैं रेडि‍यो पर ही गाने सुनने का मजा लेता था। वजह यह थी कि‍ हर दौर और मूड के गाने आसानी से सुनने को मि‍ल जाते थे। सुरैया से लेकर यशुदास तक और पंकज उधास से कुमार शानू तक। सुबह बीबीसी सुनने के बाद पि‍ताजी रामचरि‍त मानस का पाठ सुना करते थे। उसके बाद श्रीलंका ब्राडकास्‍टिंग कारपोरेशन के वि‍देश वि‍भाग (सीलोन) से फि‍ल्‍मी गाने सुनने का मेरा दौर शुरू होता था। आठ से नौ तक हर मूड के गाने सुनने के बाद नौ बजे से आधे घंटे तक स्‍थानीय भागलपुर रेडि‍यो स्‍टेशन से ‘गीत र्नि‍झर’ बहा करता था। पौने दस से सवा दस बजे तक पटना स्‍टेशन से गाने आते थे। सुबह के इस सत्र का जहां तक संभव हो सके, मैं पूरा लाभ उठाता था। फि‍र रात को रेडि‍यो नेपाल। इनसे इतर, बेवक्‍त गाने सुनना हो तो वि‍वि‍ध भारती था ही। अब ये सोचने में पसीना मत बहाइए कि‍ मैं पढ़ाई कब करता था। वह मैं कर लि‍या करता था। बहरहाल, गाने सुन कर मैं बालीवुड की वि‍वि‍धता के बारे में सोचने लगता था और मेरा दि‍माग चकरा जाता था। असल जिंदगी की कि‍सी भी स्‍थि‍ति‍ (सि‍चुएशन) की कल्‍पना कीजि‍ए और उससे संबंधि‍त गाना सोचि‍ए, मि‍ल जाएगा। हालांकि‍ अगर सिर्फ बीते दस-बीस साल के गाने तलाशे जाएं तो संभवत: ऐसा नहीं हो, पर पुराने जमाने के गाने वि‍वि‍धता और वास्‍तवि‍कता की इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। बालीवुड के प्रति‍ मेरी सकारात्‍मक सोच वि‍कसि‍त होने में इस सच्‍चाई का काफी योगदान रहा। फि‍र नई आने वाली फि‍ल्‍मों के गाने सुन कर ही हम प्रथमदृष्‍टया यह तय करते थे कि‍ फि‍ल्‍म देखने चलना है या नहीं। अगर चलना है तो मंडली में वि‍चार होता था और फि‍र कार्यक्रम बन जाता था। उन दि‍नों गाने नई फि‍ल्‍मों के प्रचार का भी बड़ा हथि‍यार होते थे। प्रचार मुख्‍य रूप से गली-मोहल्‍लों में लाउडस्‍पीकरों से अनाउंस करवा कर और पोस्‍टर चि‍पका कर कि‍ए जाते थे। लाउडस्‍पीकरों से फि‍ल्‍म के गाने सुनाए जाते थे और बीच-बीच में प्रचार करने वाला शख्‍स फि‍ल्‍म के कलाकारों के बारे में बताता था। पता नहीं, मेरे शहर में अब भी फि‍ल्‍मों का प्रचार ऐसे ही होता है या इसकी जरूरत ही नहीं रह गई है। अब तो साल या दो साल में एक बार जाना होता है और वह भी कुछ दि‍नों के लि‍ए। काश! बीते जमाने को यादों से इतर, हकीकत में जीना मुमकि‍न हो पाता।

दस पसंदीदा फि‍ल्‍में

बातों बातों में

बावर्ची

तीसरी कसम

गाइड

मेरा नाम जोकर

श्री ४२०

दोस्ती

उमराव जान

लगान

तारे ज़मीन पर

Friday, May 8, 2009

हिन्दी टाकीज:बार-बार याद आते हैं वे दिन-आनंद भारती

हिन्दी टाकीज-३४
पत्रकारों और लेखों के बीच सुपरिचित आनंद भारती ने चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया.उन्होंने पूरे मनोयोग से यह संस्मरण लिखा है,जिसमें उनका जीवन भी आया है.हिन्दी टाकीज के सन्दर्भ में वे अपने बारे में लिखते हैं...बिहार के एक अविकसित गांव चोरहली (खगड़िया) में जन्‍म। यह गांव आज भी बिजली, पक्‍की सड़क की पहुंच से दूर है। गांव भी नहीं रहा, कोसी नदी के गर्भ में समा गया। बचपन से ही यायावरी प्रवृत्ति का था। जैसे पढ़ाई के लिए इस ठाम से उस ठाम भागते रहे,उसी तरह नौकरी में भी शहरों को लांघते रहे। हर मुश्किल दिनों में फिल्‍मों ने साथ निभाया, जीने की ताकत दी। कल्‍पना करने के गुर सिखाए और सृजन की वास्‍तविकता भी बताई। फिल्‍मों का जो नशा पहले था, आज भी है। मुंबई आया भी इसीलिए कि फिल्‍मों को ही कैरियर बनाना है, यह अलग बात है कि धक्‍के बहुत खाने पड़ रहे हैं। अगर कहूं कि जिस जिस पे भरोसा था वही साथ नहीं दे रहे, तो गलत नहीं होगा। फिर भी संकल्‍प और सपने जीवित हैं। जागते रहो का राज कपूर, गाईड का देव आनंद प्‍यासा का गुरुदत्‍त, आनंद का राजेश खन्‍ना और अमिताभ बच्‍चन,तीसरी कसम के निर्माता शैलेंद्र, अंकुर और निशांत के निर्देशक श्‍याम बेनेगल जैसे लोगों को हमेशा अपने भीतर महसूस करता रहता हूं। उनसे संपर्क करना चाहें तो लिखें ... anandbharti03@gmail.com
संभवत: 63 की बात है जब मैंने बिहार-नेपाल सीमा से सटे शहर फारबिसगंज में पहली फिल्‍म देखी थी 'ग्‍यारह हजार लड़कियां'। उसके एक सप्‍ताह बाद ही पूर्णिया में दूसरी मगर पुरानी फिल्‍म देखने का मौका मिला 'प्‍यार की जीत'। मेरी उम्र तब बहुत छोटी थी। मुझे अच्‍छी तरह याद है कि इसके कुछ समय बाद पूर्णिया के रूपवाणी टॉकीज में 'गंगा की लहरें' के पोस्‍टर को देखकर मैं खो गया था। पोस्‍टरों ने मुझे एक मायावी दुनिया में पहुंचा दिया था। उसी दिन पहली बार जेहन में आता था कि क्‍या मैं फिल्‍में नहीं बना सकता। जवाब खुद ही मिला कि 20-22 की उम्र हो जाए तब सोचना। कुछ भी करने के लिए बंबई जाना पड़ेगा, जो तब किसी भी रूप में संभव नहीं था। 'प्‍यार की जीत' के बाद कुछ फिल्‍में और भी देखीं,लेकिन पढ़ाई को लेकर दिमाग पर इतना दबाव था कि ज्‍यादा सोच ही नहीं पाता था। मगर फिल्‍मी खबरों से साबका रोज पड़ता था। बिनाका गीत माला ने पहली बार फिल्‍म का ज्ञान दिया था। उसके बाद घर में आने वाले अखबार, सा‍हित्यिक और फिल्‍मी मैगजीन ने उस ज्ञान को और समृद्ध किया। पिताजी की दिलचस्‍पी राजनीतिक खबरों और साहित्‍य में थी, वह अ‍सर हम तीनों भाइयों पर भी आ गया। छोटे चाचा सा‍हित्‍य-प्रेमी थे,मगर वह उससे ज्‍यादा फिल्‍मों में दिलचस्‍पी रखते थे इसलिए फिल्‍मी खबरें उनसे सुनने को मिलती रहती थीं। हमारे परिवार में देव आनंद सबकी पसंद थे इसलिए देव साहब की तस्‍वीरें घर की दीवारों पर सबसे ज्‍यादा सटी मिलती थीं।
हम बिहार के ऐसे गांव में थे, जहां की आबादी बहुत घनी थी। हिंदू और मुसलमान बराबर की संख्‍या में थे। समृद्ध लोगों की भरमार थी। सात-आठ घरों में तब रेडियो हुआ करता था, जिनकी आवाज हमेशा गूंजती रहती थी। अकेला मेरा घर था, जहां ग्रामोफोन भी था। उस गांव में तब भी बिजली और सड़क नहीं थी और आज भी नहीं है। अब तो वह गांव रहा ही नहीं। कोसी नदी के गर्भ में समा गया। लोग टोलों की शक्‍ल में जहां-तहां रह रहे हैं। तब हर साल मेरा गांव चोरहली ही क्‍यों पूरा इलाका तीन महीने तक बाढ़ के पानी से घिरा और डूबा रहता था। निचले इलाके के लोग हमारे जैसे लोगों के बड़े घरों में आ जाते थे। मिलकर रहते थे। कोई अमीरी-गरीबी का भाव ऐसे समय में नहीं आता था। जीवन ऐसे चलता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। मुसलमान परिवार बाकी लोगों के मुकाबले ज्‍यादा रूतबे वाले थे,क्‍योंकि उनके परिवारों के लोग कमाई के लिए कलकता, गौहाटी और बम्‍बई में जाते रहते थे। हम जैसे फिल्‍मी लोगों के लिए बंबई आने-जाने वाले ज्‍यादा महत्‍व रखते थे क्‍योंकि उनके पास दिलीप साहब, देव आनंद, राजकपूर, नरगिस, सुरैया, मीना कुमारी की मानो आंखों से देखी खबरें होती थीं। वे बखान इस कदर करते कि बंबई जाने की मेरी जिद को पंख लग जाते थे। उनके पहनने के कपड़े, बोलने की स्‍टाईल, हाव-भाव काफी आकर्षक होते थे। मैंने छठी-सातवीं में पढ़ते हुए कई बार उनके साथ भागने की बात सोच ली थी।
घर से भागा जरूर लेकिन घर में पढ़ाने वाले एक मास्‍टरजी के खिलाफ विद्रोह कर। चाहा था कि सीधे बंबई चला जाऊं। लेकिन मुझे उसका कोई अता-पता नहीं था। डेढ़ महीने तक बिहार, बंगाल के अपने रिश्‍तेदारों के यहां चक्‍कर काटता रहा। जब पैसे खत्‍म हो गए तब घर लौट आया। बंबई जाने का सपना अधूरा रह गया। सच कहूं तो भागने का रास्‍ता मुझे फिल्‍मों ने ही दिखाया था, लेकिन इस दौरान डेढ़-दो महीने में दो बड़ी उपलब्धियां हाथ लगीं। पहला यह कि गुरू रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर के शांतिनिकेतन देख आया और दूसरा, यह कि हिंदी फिल्‍मों के साथ-साथ बंगला फिल्‍मों को देखने का रेकार्ड कायम कर लिया। भागलपुर, साहेबगंज, कहलगांव, पीरपैंती, कटिहार, पूर्णिया, कलकता और खास कर बिहार में पूर्णिया और कटिहार तो पूरा पूरा बंगाल ही लगता था। मैंने बंगला फिल्‍मों का जो फ्रेम देखा था, वह मेरे किशोर मन पर गहरा असर छोड़ा था। तभी जाना था कि सत्‍यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, संध्‍या राय, छवि विश्‍वास आदि राजकपूर, नरगिस, दिलीप कुमार, देव आनंद आदि से भी बड़े नाम हैं। इसी लोभ में अपूर संसार, पथेर पांचाली, विराज बहू, अपराजितो, अजांतिक सहित कई फिल्‍में देख लीं। तब एक बड़ा फर्क देखता था। बंगला फिल्‍में हिंदी के मुकाबले ज्‍यादा सीरियस होती हैं। सीधी सादी ढंग से कहानी चलती हैं। बंगला फिल्‍मों ने जो मेरे मन पर असर छोड़ा वह आज भी बरकरार है। बंगला फिल्‍मों ने ही मुझे बंगला उपन्‍यासकारों की तरफ आकर्षित किया। शरतचंद्र मेरे प्रिय लेखक बन गए। वैसा ही जीवन जीने का सपना भी देखने लगा था। कुछ हद तक जीया भी। मगर जो जीया, वह मेरे अंदर का ही भाव था। शरतचंद्र ने उसमें आवारगी को एक हिस्‍सा बना दिया।
फिल्‍में देखने का सिलसिला बाद में और भी तेज हो गया, जब वनसठवा हाई स्‍कूल को छोड़कर जवाहर हाई स्‍कूल, महेशखूंट आ गया। बड़े व्‍यावसायिक परिवार से था इसलिए पैसे की कभी कमी महसूस नहीं हुई। हाई स्‍कूल में हॉस्‍टल में रहने लगा। हॉस्‍टल का अनुशासन था मगर आजादी का अहसास भी था। वहां पढ़ते हुए अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में चिट्ठयां छपने लगी थीं। छोटी-छोटी बाल कथाएं तथा मिनी कविताओं को भी जगह मिलने लगी थी। एक तो पैसे का दबदबा और दूसरे पत्र-पत्रिकाओं में नाम छपने से मिल रही लोकप्रियता ने मुझे अचानक स्‍टार बना दिया था। स्‍कूल के सारे शिक्षक भी मुझ पर गर्व करते थे। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, दिनकर जी, जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री, कवि आरसी प्रसाद सिंह, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, पंत जी सहित उस समय के सारे साहित्‍यकारों पर लंबा-चौड़ा व्‍याख्‍यान देने की स्थिति में होता था। जरूरत पड़ने पर सिनेमा पर धाराप्रवाह बोलता था क्‍योंकि फिल्‍मी पत्रिकाएं हॉस्‍टल में छिप-छिप कर खूब पढ़ता था। इसी कारण लड़कियां मेरी दीवानी रहती थीं। वे मुझ में फिल्‍म एक्‍टर की छाया देखती थीं। लेकिन पढ़ने की आदत ने मेरे अंदर बैठे एक्‍टर को षडयंत्र के शिकंजे में ले लिया। वहां से एक्‍टर को हटाकर राइटर को बिठा लिया। गांव के नाटकों में की हुई अदाकारी पीछे घूटती चली गई। गांव में हर साल कानपुर से नौटंकी आती थी। लगभग 15-20 दिन तक चलती रहती थी। ऐसा कोई दिन नहीं जब नौटंकी में नहीं जाता था। नौटंकी के सारे आर्टिस्‍ट मुझे बहुत प्‍यार करते थे। उनके संवादों को नौटंकी से प्रेरित होकर मैंने पहले हाई स्‍कूल में और फिर कालेज में कई नाटक लिखे, जो खेले भी गए।
हाई स्‍कूल में आने के बाद शौक बदल गए। नाटक की जगह सिनेमा ने ले लिया। ट्रेन में विदआउट टिकट न जाने कितनी बार फिल्‍में देखने के लिए खगडिया, बेगूसराय, नौगछिया, गोगरी जमालपुर और कटिहार गया। यह साप्‍ताहिक कार्यक्रम बन गया। कभी-कभी सिनेमाघर में दो से तीन फिल्‍में भी देख लेता था। कोई-कोई सिनेमाघर ऐसा भी था जहां एक टिकट में दो फिल्‍में दिखाता था। वहीं से फिल्‍मों की कहानी के बारे में सोचने लगा। फिल्‍में देखना जुनून की तरह हो गया। 1971-72 में पूर्णिया कालेज में एडमिशन ले लिया। आरएसएस के बहुत सारे लड़के मेरे साथ पढ़ते थे। कालेज में मेरी अच्‍छी शक्‍ल-सूरत और साहित्यिक दिलचस्‍पी ने मुझे कालेज में सबका चहेता बना दिया था। मेरी यह छवि आरएसएस के लोगों को अच्‍छा नहीं लग रही थी। वे मुझे गंभीर बनाना चाहते थे तथा जिम्‍मेदार भी। इसलिए वे किसी भी तरह मुझे पकड़ना चाहते थे। मैं उनकी बातों में आ गया और खुद को अपने सांचे से अलग हटाकर उनके सांचे में डाल दिया। यह भी षडयंत्र ही था। मेरे दोनों बड़े भाई तब नाराज भी हुए थे। इसलिए कि बड़े भैया मार्क्‍सवादी थे और मंझले भाई लोहियावादी, इंटरमीडियट के बाद हिंदी ऑनर्स ले लिया। जितने भी लेक्‍चरर थे, सबने समझाया कि साहित्‍य तक ही रहो तो ज्‍यादा ठीक है। सिनेमा को उसी नजरिए से देखो मगर मैं संघ के जाल में फंस गया। विद्यार्थी परिषद का नाम संभाल लिया। आंदोलन स्‍वभाव बन गया। सिनेमा देखना हालांकि तब भी कम नहीं हुआ, मगर संघ के प्रचारकों से यह बार-बार तोहफा मिली कि नौजवानों बच्‍चों पर क्‍या यही छाप छोड़ोगे? जब 1974 का आंदोलन में 1975 की इमरजेंसी में राजगीर समांतर लेखक सम्‍मेलन से जिस दिन गुलाबबाग (पूर्णिया) लौटा, उसी दिन पुलिस ने मुझे रात में होटल में खाना खाते समय गिरफ्तार कर लिया।
काफी समय बाद जेल से छूटने पर मैंने सबसे पहला काम किया वह फिल्‍म देखना था। बहुत दनों बाद लगा कि अपनी पुरानी जगह पर वापसी कर रहा हूं। उस दौरान बार-बार सोचा कि इमरजेंसी पर फिल्‍म बनाने जैसी कोई कहानी अवश्‍य लिखूंगा। जेल में मेरे साथ ज्‍यादातर आरएसएस तथा सर्वोदयी लोग थे। कुछ मार्क्‍सवादी और नक्‍सलवादी समर्थक थे। इनके साथ घंटों बहस चलती रहती। हर रात जेल में सामूहिक बहस का कार्यक्रम रखा जाता था। जब बहस के लिए विषय कम पड़ने लगते तब मेरे सुझाव पर फिल्‍मों को बहस का केंद्र में ले आया गया। सारे क्रांतिकारी लोग ध्‍यान से फिल्‍मों के बारे में सुनते थे। तब देशभक्ति वाले गीतों में साथ-साथ फिल्‍मी गीत भी खूब गाए जाने लगे थे। फिल्‍मी बातों से हर आदमी का छुपा हुआ चेहरा परत-दर-परत खुलने लगा था। हर किसी के पास फिल्‍में देखने का अनुभव था। फिल्‍मों ने उन्‍हें प्रेम-मुहब्‍बत का मतलब और तरीका भी सिखाया था। तब मेरे गहरे मित्र बने चुके मार्क्‍सवादी नेता चंद्रकांत सरकार (जो अब इस दुनिया में नहीं हैं) ने शायद व्‍यंग्‍य में कहा था कि जीवन इतना रंगीन भी होता है, मुझे कभी पता ही नहीं चला।
बहरहाल जिस दिन मैं जेल से छूटा था, अपने दोस्‍तों, परिवारों से मिलने के बाद सीधे सिनेमाघर का रास्‍ता पकड़ा था। यह काम मैं अमूमन हर परीक्षा के दौरान पहले भी करता रहा था। पेपर देकर निकलता और सीधे सिनेमा देखने चला जाता। 1976 में बी. ए. का एग्‍जामिनेशन सेंटर कटिहार पड़ा था। हर दिन शाम को फिल्‍म देखने जाता था। साथी-संगी कहने लगे कि सिनेमा मेरी कमजोरी है जब कि मैं मानता था कि वही मेरी मजबूरी है। पटना विश्‍वविद्यालय से एम. ए. करने गया। पढ़ाई के समांतर सिनेमा को रखा। वह मेरे खाली समयों का ही नहीं, व्‍यस्‍त क्षणों का भी साथी बना रहा। तब तक दिल और दिमाग का भी दायरा बड़ा हो चुका था।
लेकिन एक बात मेरे अंदर आज भी बैठी हुई है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का नहीं, बदलाव का भी माध्‍यम है। यह बेचैनी मुझे मथ रही है कि सिनेमा को आज के फिल्‍मकार ही हल्‍के तौर पर लेते हैं जब कि समाज उसे गंभीरता से लेता रहा है। पहले वो खास तौर पर बंगाली फिल्‍मकारों ने सिनेमा को कथात्‍मक और सामाजिक ऊंचाइयां दीं, जबकि पंजाबी फिल्‍मकारों ने उसे सिर्फ व्‍यवसाय का साधन बना दिया। यही वजह है कि उनकी फिल्‍में मिक्‍स वेजिटेबल हो जाती है।
सिनेमा का असर क्‍या होता है, यह तमिलनाडु में मैंने खुद भी देखा था। हिंदी विरोध के नाम जो सबसे पहला कदम उठता गया वह हिंदी फिल्‍मों के प्रदर्शन पर रोक का था। वर्ष 1966-67 की बात है जब डा. लो‍हिया हिंदी की तरफदारी कर रहे थे और उधर बंगाल में किसी कारण हिंदी का विरोध हो रहा था। मेरे दादा जी के छोटे भाई कलकते में रहते थे। उनकी मृत्‍यु संभवत: 1966 में हो गई थी। मेरे दादाजी अपने साथ श्राद्ध कर्म में भाग लेने के लिए मुझे भी कलकता ले गए थे। वहां काफी दिनों तक रहने का मौका मिला। मगर ऊब इसलिए गया था कि थियेटरों में हिंदी फिल्‍मों के के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी। कुछ मामला ठंडा हुआ तो कुछ भोजपुरी फिल्‍मों को चलाने की इजाजत दे दी गई। मैं भोजपुरी नहीं जानता था लेकिन भोजपुरी फिल्‍मों को देखना भी मेरे लिए 'मदर इंडिया' और 'आन' देखने जैसा था। अपनी रिश्‍तेदारों के साथ कुछ बंगला फिल्‍में भी देखीं।
1981 में एम.ए. की परीक्षा देकर पटना से सीधे दिल्‍ली चला गया। यह एक बड़ी गलती थी। तब पटना से मेरे दो मित्र आलोक रंजन और सुमन सरीन बम्‍बई के लिए चल चुके थे। हम तीनों फिल्‍मों के शौकीन थे। लेकिन पढ़ाई के दौरान कई पत्रिकओं के लिए पालीटिकल रिपो‍र्टिंग करता था, उसी ने मुझे दिल्‍ली जाने के लिए बाध्‍य कर दिया था। कई छोटे-छोटे पत्रों में काम किया। मगर लक्ष्‍य था टाइम्‍स ग्रुप में जाने का। 1982 के शुरू में टाइम्‍स डेली के लिए फाइनेंस्‍ट इंटव्‍यू देने बंबई गया। सोचकर गया था कि बंबई में तय करूंगा कि फिल्‍म पत्रकारिता करती है या राजनीतिक। मगर सारी उम्‍मीदों पर झटका लग गया। इटरव्‍यू अच्‍छा हुआ लेकिन जनसंघी होने का आरोप तब के नभाटा के संपादक आनंद जैन ने इस तरह लगा दिया कि धर्मवीर भारती के बीच-बचाव के बावजूद मेरा चयन नहीं हुआ। हम दोनों दिल्‍ली लौट गए। लेकिन जब तक बंबई में रहे, थियेटरों के छक्‍के छुड़ा दिए। फिल्‍में नहीं देखी सिर्फ सिनेमाघरों के चेहरे देखे। इसलिए सपने अगर साकार होंगे तो उसके गवाह थियेटर ही बनेंगे। खुद में ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास, सलीम-जावेद, अली राज, नवेंदु घोष आदि को देखने लगा था।
एक जो अहम बात है, उसकी चर्चा के बिना सब कुछ अधूरा लगेगा। बचपन से लेकर हाई स्‍कूल तक जितनी भी फिल्‍में देखीं - वह यादगार इसलिए भी है क्‍योंकि कभी भी शांति से टिकट नहीं मिला। ग्रुप में जाता था और पूरी मस्‍ती लेता था। सीटों पर रूमाल या गमछा रखकर कब्‍जा करता था। सीटी भी बजाता था लेकिन जिम्‍मेदारी के साथ। आज वैसा दृश्‍य मुंबई में नवरंग जैसे थियेटर में देखने को मिलता है जहां भोजपुरी फिल्‍में दिखाई जाती हैं। लेकिन इस सीटी और उस सीटी में फर्क है।
पहले की वह युवा हूं कि देव आनंद मेरे प्रिय एक्‍टर रहे हैं। मुझे तब रोमांटिक एक्‍टर और रोमांटिक कहानियां बहुत पसंद थी। वैसे सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुआ राज कपूर से और फिर गुरु दत्‍त से। दिलीप कुमार मेरी पहुंच से काफी दूर रहे। हां, राजेश खन्‍ना की अदा मुझे अच्‍छी लगती थी। इनकी 'आनंद' और 'आराधना' न जाने किती बार देखी होगीं। सबसे ज्‍यादा बार 'गाईड' देखी है। शायद 14-15 बार।द्य उसके बाद 'तीसरी कसम' को देखने का रिकार्ड तोड़ा। 'देवदास', 'आवारा', 'बरसात', 'याराना' , 'तेरे घर के सामने', 'राम और श्‍याम', 'हम दोनों', 'ज्‍वेल थीफ', 'मुगलेआजम', 'संगम', 'अंदाज', को भी बार-बार देखा।
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि तब छोटे शहरों में रिक्‍शा, घोड़ागाड़ी पर फिल्‍मों की पब्लिसिटी होती थी। हम उसके पीछे-पीछे भी दौड़ते रहते थे। गानों के बीच-बीच में एनाउंसर की आवाजें दूर-दूर तक गूंजती रहती थीं। पोस्‍टर देखना भी फिल्‍म देखने से कम नहीं लगता था। सिनेमा को लेकर मेरे घर में न जाने कितनी शिकायतें लोगों ने मेरे बड़ों में की होंगी, मगर मुझे परिवार से हल्‍की झिड़की के अलावा कभी बड़ी डांट नहीं मिली। इसलिए कि सिनेमा की समझ रखने वाले सारे लोग थे।
एक ऐसा दौर भी आया था जब व्‍यावसायिक सिनेमा के मुकाबले मुझे समांतर, प्रयोगधर्मी, कलात्‍मक फिल्‍में ज्‍यादा पसंद आने लगी थीं। वह पसंद आज ज्‍यादा मजबूती के साथ बरकरार है। सई परांजपे, श्‍याम बेनेगल, मुजफ्फर अली, सथ्‍यू की दृष्टि को सलाम करता था।
मगर सबसे ज्‍यादा सलाम तब के गीतकारों, संगीतकारों और गायकों को करता था जिनके गानों के कारण फिल्‍में हिट हुआ करती थीं। फिल्‍मों को लोग देखें, गाने सबसे ज्‍यादा प्रेरित करते थे।

पसंद की फिल्‍में
1 अंकुर
2 शोले
3 बाइड
4 प्‍यासा
5 मुगलेआजम
6 बरसात
7 आनंद
8 तीसरी कसम
9 लगान
10 कागज के फूल