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Wednesday, January 9, 2013

बाबूजी की कमी खलती है- अमिताभ बच्चन

यह इंटरव्‍यू रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग से लिया गया है चवन्‍नी के पाठ‍कों के लिए....
अमिताभ बच्चन ने दिल में अपने बाबूजी हरिवंशराय बच्चन की स्मृतियां संजोकर रखी हैं. बाबूजी के साथ रिश्ते की मधुरता और गहराई को अमिताभ बच्चन से विशेष भेंट में रघुवेन्द्र सिंह ने समझने का प्रयास किया
लगता है कि अमिताभ बच्चन के समक्ष उम्र ने हार मान ली है. हर वर्ष जीवन का एक नया बसंत आता है और अडिग, मज़बूत और हिम्मत के साथ डंटकर खड़े अमिताभ को बस छूकर गुज़र जाता है. वे सत्तर वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उन्हें बुजऱ्ुग कहते हुए हम सबको झिझक होती है. प्रतीत होता है  िक यह शब्द उनके लिए ईज़ाद ही नहीं हुआ है.
उनका $कद, गरिमा, प्रतिष्ठा, लोकप्रियता समय के साथ एक नई ऊंचाई छूती जा रही है. वह साहस और आत्मविश्वास के साथ अथक चलते, और बस चलते ही जा रहे हैं. वह अंजाने में एक ऐसी रेखा खींचते जा रहे हैं, जिससे लंबी रेखा खींचना आने वाली कई पीढिय़ों के लिए चुनौती होगी. वह नौजवान पीढ़ी के साथ $कदम से $कदम मिलाकर चलते हैं और अपनी सक्रियता एवं ऊर्जा से मॉडर्न जेनरेशन को हैरान करते हैं.
अपने बाबूजी हरिवंशराय बच्चन के लेखन को वह सबसे बड़ी धरोहर मानते हैं. आज भी विशेष अवसरों पर उन्हें बाबूजी की याद आती है. पिछले महीने 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन बहुत धूमधाम से अनोखे अंदाज़ में सेलीब्रेट किया गया. इस माह की 27 तारी$ख को उनके बाबूजी का जन्मदिन है. प्रस्तुत है अमिताभ बच्चन से उनके जन्मदिन एवं उनके बाबूजी के बारे में विस्तृत बातचीत.  

पिछले दिनों आपके सत्तरवें जन्मदिन को लेकर आपके शुभचिंतकों, प्रशंसकों और मीडिया में बहुत उत्साह रहा. आपकी मन:स्थिति क्या है?
मन:स्थिति यह है कि एक और साल बीत गया है और मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि क्यों इतना उत्साह है सबके मन में? प्रत्येक प्राणी के जीवन का एक साल बीत जाता है, मेरा भी एक और साल निकल गया.
दुनिया की नज़र में आपके पास सब कुछ है, मगर जीवन के इस पड़ाव पर अब आपको किन चीज़ों की आकांक्षा है? 
हमने कभी इस दृष्टि से न अपने आप को, न अपने जीवन को और न अपने व्यवसाय को देखा है. मैंने हमेशा माना है कि जैसे-जैसे, जो भी हमारे साथ होता जा रहा है, वह होता रहे. ईश्वर की कृपा बनी रहे. परिवार स्वस्थ रहे. मैंने कभी नहीं सोचा कि कल क्या करना है, ऐसा करने से क्या होगा या ऐसा न करने से क्या होगा. जीवन चलता जाता है, हम भी उसमें बहते जाते हैं.
एक सत्तर वर्षीय पुरुष को बुजुर्ग कहा जाता है, लेकिन आपके व्यक्तित्व पर यह शब्द उपयुक्त प्रतीत नहीं होता.
अब क्या बताऊं मैं इसके बारे में? बहुत बड़ी गलतफहमी लोगों को. लेकिन हूं तो मैं सत्तर वर्ष का. आजकल की जो नौजवान पीढ़ी है, उसके साथ हिलमिल जाने का मन करता है. क्या उनकी सोच है, क्या वो कर रहे हैं, उसे देखकर अच्छा लगता है. खासकर के हमारी फिल्म इंडस्ट्री की जो नई पीढ़ी है, जो नए कलाकार हैं, उन सबका जो एक आत्मबल है, एक ऐसी भावना है कि उनको सफल होना है और उनको मालूम है कि उसके लिए क्या-क्या करना चाहिए. इतना कॉन्फिडेंस हम लोगों में नहीं था. अभी भी नहीं है. अभी भी हम लोग बहुत डरते हैं. लेकिन आज की पीढ़ी जो है, वो हमसे ज्यादा ता$कतवर है और बहुत ही सक्षम तरीके से अपने करियर को, अपने जीवन को नापा-तौला है और फिर आगे बढ़े हैं. इतनी नाप-तौल हमको तो नहीं आती. लेकिन आकांक्षाएं जो हैं, वो मैं दूसरों पर छोड़ता हूं. आप यदि कोई चीज़ लाएं कि आपने ये नहीं किया है, आपको ऐसे करना चाहिए, तो मैं उस पर विचार करूंगा. आप कहें कि अपने आपके लिए सोचकर बताइए, तो वो मैं नहीं करता. इतनी क्षमता मुझमें नहीं है कि मैं देख सकूं कि मुझे क्या करना है. 
आप जिस तरीके से नौजवान पीढ़ी के साथ कदम से $कदम मिलाकर चलते हैं, वह देखकर लोगों को ताज्जुब होता है कि आप कैसे कर लेते हैं?
ये सब कहने वाली बातें हैं. कष्ट तो होता है, शारीरिक कष्ट होता है. अब जितना हो सकता है, उतना करते हैं, जब नहीं होता है तो बैठ जाते हैं. लेकिन ऐसा कहना कि न जाने कहां से एनर्जी आ रही है, तो क्या कहूं मैं? मैं ऐसा मानता हूं कि जब ये निश्चित हो जाए कि ये काम करना है, तो उसके बाद पूरी दृढ़ता और लगन के साथ उसे करना चाहिए. परिणाम क्या होता है, यह बाद में देखना चाहिए. एक बार जो तय हो गया, उसे हम करते हैं.
क्या आप मानते हैं कि आप शब्दों, विशेषणों आदि से ऊपर उठ चुके हैं? इस बारे में सोचना पड़ता है कि आपके नाम के साथ क्या विशेषण लगाएं?
मैं अपने बारे में कैसे मान सकता हूं? और ये जो तकलीफ है, वह आपकी है. मुझ पर क्यों थोप रहे हैं आप? मैंने तो कभी ऐसा माना नहीं है. आप लोग तो बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखते हैं, अच्छे-अच्छे खिताब देते हैं मुझे. मैंने कभी नहीं माना है उनको, तो मेरे लिए वह ठीक है. अब आप को कष्ट हो रहा हो, तो अब आप जानिए.
बचपन में अम्मा और बाबूजी आपका जन्मदिन किस प्रकार सेलीब्रेट करते थे?
जैसे आम घरों में मनाया जाता था. हम छोटे थे, तो हमारी उम्र के बच्चों के लिए पार्टी-वार्टी दी जाती थी, केक कटता था, कैंडल लगता है. हालांकि ये प्रथा अभी तक चल रही है. अंग्रेज़ चले गए, अपनी प्रथाएं छोड़ गए. पता नहीं क्यों अभी तक केक काटने की प्रथा बनी हुई है! मैं तो धीरे-धीरे उससे दूर हटता जा रहा हूं. बड़ा अजीब लगता है मुझे कि फूंक मारो, कैंडल बुझ जाए. जितनी उम्र है, उतने कैंडल लगाओ. बाबूजी भी इसको कुछ ज़्यादा पसंद नहीं करते थे. इसलिए उन्होंने एक छोटी-सी कविता लिखी थी, जिसे जन्मदिन के दिन वो गाया करते थे. हर्ष नव, वर्ष नव...  
अभिषेक बच्चन ने हालिया भेंट में बताया कि घर के किसी सदस्य के जन्मदिन पर दादाजी उपहार स्वरूप कविता लिखकर देते थे. क्या आपने उन्हें सहेजकर रखा है?
जी, वह एक छोटी-सी कविता लिखकर लाते थे. ज़्यादातर तो हर्ष नव, वर्ष नव... ही हम सुनते थे. उसके बाद बाबूजी-अम्माजी कई जगह गाते थे इसको.
क्या बचपन में आपने बाबूजी से किसी गिफ्ट की मांग की थी? क्या आपकी मांगों को वो पूरा करते थे? उन दिनों इतने समृद्ध नहीं थे आप लोग.
कई बार हमने ऐसी मांग की, लेकिन मां-बाबूजी की परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि वह हमें मिल सके तो हम निराश हो जाते थे. और अभी यह सुनकर शायद अजीब लगे, लेकिन मेरे स्कूल में एक क्रिकेट क्लब बना और उसमें भर्ती होने के लिए मेंबरशिप फीस थी दो रुपए. मैं मां से मांगने गया, तो उन्होंने कहा कि दो रुपए नहीं हैं हमारे पास. एक बार मैंने कहा कि मुझे कैमरा चाहिए. पुराने जमाने में एक बॉक्स कैमरा होता था, वो एक-एक आने इकट्ठा करके मां जी ने अंत में मुझे कैमरा दिया.
कैमरे का शौक आपको कब लगा? पहला कैमरा आपने कब लिया?
शायद मैं दस या गयारह वर्ष का रहा होऊंगा. कुछ ऐसे ही सडक़ पर पेड़-वेड़ दिखता था, तो लगता था कि यह बहुत खूबसूरत है, उसकी छवि उतारनी चाहिए और इसलिए हमने मां जी से कहा कि हमको एक बॉक्स कैमरा लाकर दो. अभी भी बहुत सारे कैमरे हैं. ये हैं परेश (इंटरव्यू के दौरान हमारी तस्वीरें क्लिक कर रहे शख्स), यही देखभाल करते हैं. कैमरे का जो भी लेटेस्ट मॉडल निकलता है, उसे प्राप्त करना और उसे चलाना अच्छा लगता है मुझे. मैं घर में ही तस्वीरें लेता हूं, बच्चों की, परिवार की.
आपमें और अजिताभ में बाबूजी का लाडला कौन था? कौन उनके सानिध्य में ज़्यादा रहता था? बराबरी का हिस्सा था और हमेशा बाबूजी ने कहा कि जो भी होगा, आधा-आधा कर लो उसको.
क्या बाबूजी आपके स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आया करते थे? क्या वे सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए आपका उत्साहवर्द्धन किया करते थे?
अब पता नहीं कि फाउंडर डे पर जो स्कूल प्ले होता है, उसको एक सांस्कृतिक ओहदा दिया जाए या... लेकिन जब भी हमारा फाउंडर डे होता था, तो मां-बाबूजी आते थे. हम नैनीताल में पढ़ रहे थे. वो लोग आते थे और हफ्ता-दस दिन हमारे साथ गुज़ारते थे. हमारा नाटक देखते थे. हमेशा उन्होंने हमारा साथ दिया. मां जी ने स्पोट्र्स में प्रोत्साहित किया.  
क्या आप बचपन में उनके संग कवि सम्मेलनों में जाते थे?
जी. प्रत्येक कवि सम्मेलन में बाबूजी ले जाते थे और मैं भी साथ जाता था. रात-बिरात दिल्ली के पास या इलाहाबाद के पास मैं उनके साथ जाता था.
बाबूजी के कद, उनकी गरिमा और प्रतिष्ठा का ज्ञान आपको कब हुआ? 
सारी ज़िन्दगी. मैं तो जब पैदा हुआ, तभी से बच्चन जी, बच्चन जी थे. और हमेशा मैं था हरिवंश राय बच्चन का पुत्र अमिताभ. कहीं भी हम जाएं, तो लोग कहें कि ये बच्चन जी के बेटे हैं. उनकी प्रतिष्ठा जग ज़ाहिर थी.
निजी जीवन पर अपने बाबूजी का सबसे गहरा असर क्या मानते हैं? क्या हिंदी भाषा पर आपकी इतनी ज़बरदस्त पकड़ का श्रेय हम उन्हें दे सकते हैं?
हां, क्यों नहीं. मैंने सबसे अधिक उन्हीं को पढ़ा है. उनकी जो कविताएं हैं, जो लेखन है, जो भी छोटा-मोटा ज्ञान मिला है, उन्हीं से मिला है. लेकिन हिंदी को समझना और उसका उच्चारण करना, दो अलग-अलग बातें हैं. मैं नहीं मानता हूं कि मेरी जिज्ञासा या मेरा ज्ञान हिंदी के प्रति बहुत ज्यादा अच्छा है. लेकिन मैं ऐसा समझता हूं कि किसी भाषा का उच्चारण सही होना चाहिए. उसमें त्रुटियां नहीं होनी चाहिए. हिंदी बोलें या गुजराती या तमिल या कन्नड़ बोलें, तो उसे सही ढंग से बोलने का हमारे मन में  हमेशा एक रहता है. और बिना बाबूजी के असर के मैं मानता हूं कि मेरा जीवन बड़ा नीरस होता. स्वयं को भागयशाली समझता हूं कि मैं मां-बाबूजी जैसे माता-पिता की संतान हूं. माता जी सिक्ख परिवार से थीं और बहुत ही अमीर घर की थीं. उनके फादर बार एटलॉ थे उस जमाने में. वह रेवेन्यू मिनिस्टर थे पंजाब सरकार के पटियाला में. अंग्रेजी, विलायती नैनीज़ होती थीं उनकी देखभाल के लिए. उस वातावरण से माता जी आईं और उन्होंने बाबूजी के साथ ब्याह किया. जो कि लोअर मीडिल क्लास से थे, उनके पास व्यवस्था ज़्यादा नहीं थी. ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई-लिखाई करते थे, मिट्टी के तेल की लालटेन जलाकर काम करते थे, लाइट नहीं होती थी उन दिनों. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं मां जी का जो वातावरण था, जो उनके खयाल थे, वह बहुत ही पश्चिमी था और बाबूजी का बहुत ही उत्तरी था. इन दोनों का इस्टर्न और वेस्टर्न मिश्रण जो है, वो मुझे प्राप्त हुआ. मैं अपने आप को बहुत भागयशाली समझता हूं कि इस तरह का वातावरण हमारे घर के अंदर हमेशा फलता रहा. कई बातें थीं, जो बाबूजी को शायद नहीं पसंद आती होंगी, लेकिन कई बातें थीं, जिसमें मां जी की रुचि थी- जैसे सिनेमा जाना, थिएटर देखना. इसमें बाबूजी की ज़्यादा रुचि नहीं होती थी. वह कहते थे कि यह वेस्ट ऑफ टाइम है, घर बैठकर पढ़ो. मां जी सोचती थीं कि हमारे चरित्र को और उजागर करने के लिए ज़रूरी है कि पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा-सा खेलकूद भी किया जाए. मां जी खुद हमें रेस्टोरेंट ले जाती थीं, बाबूजी न भी जाते हों. तो ये तालमेल था उनका जीवन के प्रति और वो संगम हमको मिल गया. 
दोनों अलग-अलग विचारधारा के लोग थे. आप किससे अधिक जुड़ाव महसूस करते थे?
दोनों से ही. उत्तरी-पश्चिमी दोनों सभ्यताएं हमें उनसे प्राप्त हुईं. और उनमें अंतर कब और कहां लाना है, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है. वो सारा जो मिश्रण है, वह हमको सोचकर करना पड़ता है.
जया बच्चन के फिल्मफेयर को दिए गए एक पुराने साक्षात्कार में हमने पाया कि आपको लिखने का बहुत शौक है. उन्होंने बताया है कि जब आप काम ज़्यादा नहीं कर रहे थे, तो अपने कमरे में एकांत में लिखते रहते हैं. क्या आप लिखते थे, वो उन्होंने नहीं बताया है.
अच्छा हुआ कि वो उन्होंने नहीं बताया है, क्योंकि मुझसे भी आपको नहीं पता चलने वाला है कि मैंने क्या लिखा उन दिनों. बैठकर कुछ पढ़ते-लिखते रहना, फिर सितार उठाकर बजा दिया, गिटार उठाकर बजा लिया. ये सब हमको आता नहीं है, लेकिन ऐसे ही करते रहते थे. 
क्या बाबूजी की तरह आप भी कविताएं लिखते हैं?
कविता हमने नहीं लिखी. अस्पताल में जब था मैं 1982 में, कुली के एक्सीडेंट के बाद, उस समय एक दिन ऐसे ही भावुक होकर हमने अंग्रेज़ी में एक कविता लिख दी. वो हमने बाबूजी को सुनाई, जब वो हमसे मिलने आए. वो चुपचाप उसे ले गए और अगले दिन आकर कहा उसका हिंदी अनुवाद करके हमको दिखाया. उन्होंने कहा कि ये कविता बहुत अच्छी लिखी है, हमने इसका हिंदी अनुवाद किया है. ज़ाहिर है कि उनका जो हिंदी अनुवाद था, वह हमारी अंग्रेज़ी से बेहतर था. वो कविता शायद धर्मयुग वगैरह में छपी थी.  
जीवन में किन-किन पड़ावों पर आपको बाबूजी और अम्मा की कमी बहुत अखरती है?
प्रतिदिन कुछ न कुछ जीवन में ऐसा बीतता है, जब लगता है कि उनसे सलाह लेनी चाहिए, लेकिन वो हैं नहीं. लेकिन ये जीवन है, एक न एक दिन सबके साथ ऐसा ही होगा. माता-पिता का साया जो है, ईश्वर न करें, लेकिन खो जाता है. लेकिन जो बीती हुई बातें हैं, उनको सोचकर कि यदि मां-बाबूजी जीवित होते, तो वो क्या करते इन परिस्थितियों में? और फिर अपनी जो सोच रहती है उस विषय पर कि हां, मुझे लगता है कि उनका व्यवहार ऐसा होता, तो हम उसको करते हैं.
अपने अभिनय के बारे में बाबूजी की कोई टिप्पणी आपको याद है? वह आपके प्रशंसक थे या आलोचक? 
नहीं, वो बाद के दिनों में $िफल्में वगैरह देखते थे और जो फिल्म उनको पसंद नहीं आती थी, वो कहते थे कि बेटा, ये फिल्म हमको समझ में नहीं आई कि क्या है. हालांकि वो कुछ फिल्मों को पसंद भी करते थे और देखते थे. जब वो अस्वस्थ थे, तो प्रतिदिन शाम को हमारी एक फिल्म देखते थे.  
कभी ऐसा पल आया, जब उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की हो कि आप फलां किस्म का रोल करें?
ऐसा कभी उन्होंने व्यक्त नहीं किया. मैंने कभी पूछा भी नहीं. उनके लिए भी समस्या हो जाती और हमारे लिए भी.
क्या बाबूजी को अपना हीरो मानते हैं? उनकी कोई बात, जो आज भी आपको प्रेरणा और हिम्मत देती है?
हां, बिल्कुल. साधारण व्यक्ति थे, मनोबल बहुत था उनमें, एक आत्मशक्ति थी उनमें. लेकिन $खास तौर पर उनका आत्मबल. कई उदाहरण हैं उनके. एक बार वो कोई चीज़ ठान लेते थे, फिर वो जब तक $खत्म न हो जाए, तब तक उसे छोड़ते नहीं थे. बाबूजी को पंडित जी (जवाहर लाल नेहरू) ने बुलाया और कहा कि ये आत्मकथा लिखी है माइकल पिशर्ड ने. हम चाहते हैं कि इसका हिंदी अनुवाद हो, लेकिन ये हमारे जन्मदिन के दिन छपकर निकल जानी चाहिए. अब केवल तीन महीने रह गए थे. तीन महीने में एक बॉयोग्रा$फी का पूरा अनुवाद करना और उसे छापना बड़ा मुश्किल काम था, लेकिन बाबूजी दिन-रात उस काम में लगे रहे. जो उनकी स्टडी होती थी, उसके बाहर वो एक पेंटिंग लगा देते थे. उसका मतलब होता था कि अंदर कोई नहीं जा सकता, अभी व्यस्त हूं. बैठे-बैठे जब वो थक जाएं, तो खड़े होकर लिखें, जब खड़े-खड़े थक जाएं, तो ज़मीन पर बैठकर लिखें. विलायत में भी वो ऐसा ही करते थे. जब वो विलायत में अपनी पीएचडी कर रहे थे, तो उन्होंने अपने लिए एक खास मेज़ खुद ही बनाया. उनके पास इतना पैसा नहीं था कि मेज़ खरीद सकें. एक दिन मैं ऐसे ही चला गया, तो मैंने देखा कि एक कटोरी में गरम पानी है और उसमें उन्होंने अपना बायां हाथ डुबोया था. मैंने कहा कि क्या हो गया? तो उन्होंने बताया कि दर्द हो रहा था. हमने कहा कि कैसे हो गया? तो कहा कि लिखते-लिखते दर्द होने लगा. हमने कहा कि ये तो आपका बायां हाथ है, आप तो दाहिने हाथ से लिखते हैं? उन्होंने कहा कि हां, तुम सही कह रहे हो. दाहिने हाथ से लिखते-लिखते मेरा हाथ थक गया था, लेकिन क्योंकि मुझे काम खत्म करना था और लिखना था, तो मैंने अपने आत्मबल से दाहिने हाथ के दर्द को बाएं हाथ में डाल दिया है और अब मेरा बायां हाथ दर्द कर रहा है, इसलिए मैं उसकी मसाज कर रहा हूं. उनके ऐसे विचार थे.
अभिषेक और आपके बीच पिता-पुत्र के साथ-साथ दोस्त का रिश्ता नज़र आता है. क्या ऐसा ही संबंध आपके और आपके बाबूजी के बीच था?
हां, बाद के दिनों में. शुरुआत के सालों में हम सब उन्हें अकेला छोड़ देते थे, क्योंकि वो अपने काम में, अपने लेखन में व्यस्त रहते थे. मां जी थीं हमारे साथ, तो घूमना-फिरना होता था, जो बाबूजी को शायद उतना पसंद नहीं था. बाद में जब हमारे साथ यहां आए तो हमारा उनके साथ अलग तरह का दोस्ताना बना. कई बातें जो केवल दो पुरुषों के बीच हो जाती हैं, कई बार ऐसा अवसर आता था, जब हम करते थे. अभिषेक के पैदा होने के पहले ही मैंने सोच लिया था कि अगर मुझे पुत्र हुआ, तो वह मेरा मित्र होगा, वो बेटा नहीं होगा. मैंने ऐसा ही व्यवहार किया अभिषेक के साथ और अभी तक तो हमारी मित्रता बनी हुई है. 
क्या आप चाहते हैं कि अभिषेक और आपकी आने वाली पीढिय़ां बच्चनजी की रचनाओं, विचार और दर्शन को उसी तरह अपनाएं और अपनी पीढ़ी के साथ आगे बढ़ाएं, जैसे आपने बढ़ाया है?
ये अधिकार मैं उन पर छोड़ता हूं. यदि उनके मन में आया कि इस तरह से कुछ काम करना चाहिए, तो वो करें. मैं उन पर किसी तरह का दबाव नहीं डालना चाहता हूं कि देखो, ये हमारे परिवार की परंपरा रही है, हमारे लिए एक धरोहर है, जिसे आगे बढ़ाना है. न ही बाबूजी ने कभी हमसे ये कहा कि ये धरोहर है. क्योंकि उनकी जो वास्तविकता थी, उसे कभी उन्होंने हमारे सामने ऐसे नहीं रखा कि मैंने बहुत बड़ा काम कर दिया है. उसके पीछे छुपी हुई जो बात थी, वो हमेशा पता चलती थी. जैसे विलायत पीएचडी करने गए, पैसा नहीं था. कुछ फेलोशिप मिली, फिर बीच में वो भी बंद हो गई. मां जी ने गहने बेचकर पैसा इकट्ठा किया, क्योंकि वो चाहती थीं कि वो पीएचडी करें. चार साल जिस पीएचडी में लगता है, वो उन्होंने दो वर्षों में ही पूरी कर ली और का$फी मुश्किल परिस्थितियों में रहे वहां. जब वो वापस आए, तो उस ज़माने में तो विलायत जाना और वापस आना बहुत बड़ी बात होती थी और खासकर इलाहाबाद जैसी जगह पर. सब लोग बहुत खुश कि भाई, विलायत से लौटकर के आ रहे हैं और हम बच्चे ये सोचते थे कि हमारे लिए क्या तोहफा लाए होंगे. सबसे पहला सवाल हमने बाबूजी से यही किया कि क्या लाएं हैं आप हमारे लिए? उन्होंने मुझे सात कॉपी, जो उनके हाथ से लिखी हुई पीएचडी है, वो उन्होंने मुझे दी. कहा कि ये मेरा तोहफा है तुम्हारे लिए. ये मेरी मेहनत है, जो मैंने दो साल वहां की. उसे मैंने रखा हुआ है. उससे बड़ा उपहार क्या हो सकता है मेरे लिए.
बाबूजी की कौन सी रचना आपको बहुत प्रिय है और क्यों?
सभी अच्छी हैं. अलग-अलग मानसिक स्थितियों से जब बाबूजी गुज़रे, तो उन परिस्थितियों में उन्होंने अलग-अलग कविताएं लिखीं. बाबूजी के शुरुआत के दिन बहुत गंभीर थे. बाबूजी की पहली पत्नी का देहांत साल भर के अंदर हो गया था. वो बीमार थीं, उनकी चिकित्सा के लिए पैसे नहीं थे बाबूजी के पास, तो वो दुखदायी दिन थे. उनके ऊपर उनका वर्णन है. फिर मां जी से मिलने के बाद उनके जीवन में जो एक नया रंग, उल्लास आया, उसको लेकर उनकी कविताएं आईं. फिर आधुनिक ज़माने में आकर बहुत से जो ट्रेंड थे कविता लिखने के, खास तौर से हिंदी जगत में, वो बदलते जा रहे थे, हास्य रस बहुत प्रचलित हो गया था. कवि सम्मेलनों में हास्य कवियों को ज़्यादा तालियां मिलने लगीं. इन सारे दौर से गुज़रते हुए उन्होंने लेखन किया. किसी एक रचना पर उंगली रखना बड़ा मुश्किल होगा.
आपकी उनकी चीज़ों की आर्कइविंग करने की योजना थी?
प्रयत्न जारी है. समय नहीं मिल रहा है. दूसरी बड़ी बात ये है कि जो लोग बाबूजी के साथ उस ज़माने में थे, वो वृद्ध हो गए हैं. लेकिन मैं ये चाहूंगा कि जो उनके साथ उस ज़माने में थे, उन्हें ढूंढें. क्योंकि कई ऐसी बातें हैं, जो हमको नहीं पता हैं. बाबूजी पत्र बहुत लिखते थे और वो अपने हाथ से लिखते थे. प्रतिदिन वो पचास-सौ पोस्ट कार्ड लिखते थे जवाब में, जो उनके पास चिट्ठियां आती थीं और उसे $खुद ले जाकर पोस्ट बॉक्स में डालते थे. उन्होंने बहुत सी चिट्ठियां जो लोगों को लिखी हैं, उन चिट्ठियों को एकत्रित करके लोगों ने किताब के रूप में छाप दिया है. अब ये पता नहीं कि कानूनन ठीक है या नहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि साहब, ये पत्र तो उन्होंने हमें लिखा है, आपका इसके ऊपर कोई अधिकार नहीं है. तो मैं ऐसा सोच रहा था कि कभी अगर मुझे जानकारी हासिल करनी होगी तो मैं इश्तहार दूंगा मैं या पूछूंगा कि जिन लोगों के पास बाबूजी की लिखी चिट्ठियां हैं या याददाश्त हैं, वो हमें बताएं ताकि हम उनका एक आर्काइव बना सकें.
अब आप स्वयं दादाजी बन चुके हैं. इस संबोधन से आपको अपने दादाजी (प्रताप नारायण श्रीवास्तव) एवं दादीजी (सरस्वती देवी) की याद आती है. उनके बारे में हमें बहुत कम सामग्री मिलती है.
जी, दादाजी की स्मृतियां हैं नहीं, क्योंकि जब मैं पैदा हुआ, तो उनका देहांत हो गया था. दादी थीं, लेकिन उनका भी मेरे पैदा होने के साल-डेढ़ साल बाद स्वर्गवास हो गया. मां जी की तरफ से, उनकी माता जी का देहांत उनके जन्म पर ही हो गया था. जो नाना जी थे, मुझे ऐसा बताया गया है कि अब तो वो पाकिस्तान हो गया है, मां जी का जन्म लायलपुर में हुआ था, जो अब फैसलाबाद हो गया है और उनकी शिक्षा-दीक्षा सब गर्वमेंट कॉलेज लाहौर में हुई. वो वहां पढ़ाने भी लगीं. मुझे बताया गया है कि जब मैं दो साल का था, तो मां जी उनसे मिलवाने कराची ले गई थीं. ऐसा मां जी बताती हैं कि एक बार मैं नाना के पास गया, तो चूंकि वो सरदार थे, तो उनकी दाढ़ी बड़ी थी, तो मैंने आश्चर्य से उनसे पूछा कि आप कौन हैं? तो मेरे नानाजी ने कहा कि अपनी मां से जाकर पूछो कि मैं कौन हूं.
अभिषेक चाहते हैं कि आप अब काम कम और आराम ज़्यादा करें, अपने नाती-पोतों को वह सारे संस्कार और गुर सिखाएं, जो आपने उन्हें और श्वेता को सिखाए हैं. आपकी इस बारे में क्या राय है? 
मैं ज़रूर नाती-पोतों को सिखाऊंगा और मैं काम भी करूंगा. यदि शरीर चलता रहा और सांस आती रहेगी, तो मैं चाहूंगा कि मैं काम करूं और जिस दिन मेरा शरीर काम नहीं करेगा, जैसा कि मैंने आपसे कई बार कहा है कि हमारे शरीर के ऊपर निर्भर है, चेहरा सही है, टांग-वांग चल रही है, तो काम है, वरना हम बोल देंगे कि अब हम घर बैठते हैं.
फिल्मों को लेकर आपकी ओर से कब घोषणा होगी?
एक तो अभी हुई है प्रकाश झा की सत्याग्रह और दूसरी है सुधीर मिश्रा की मेहरुन्निसा. उसमें चिंटू (ऋषि) कपूर हैं, शायद चित्रांगदा हैं और मैं हूं. दो-एक और फिल्में हैं, महीने भर के अंदर उनकी भी घोषणा की जाएगी. 

Monday, December 8, 2008

भाषा से भाव बनता है: अमिताभ बच्चन


अमिताभ बच्चन अपने पिता की रचना 'जनगीता' को स्वर देंगे.इस बातचीत में अमिताभ बच्चन ने और भी बातें बतायीं.जिस प्रकार एक सुसंस्कारित, आस्थावाहक पुत्र की तरह सदी के महानायक पिता की रचनाओं को अपना स्वर देकर उस अनमोल विरासत और परम्परा से जुड़ने के आकांक्षी है वह एक बड़ी बात है-



आपने पिता द्वारा अनूदित 'ओथेलो' में कैसियो की भूमिका निभायी थी। उनकी इच्छा थी कि आप 'हैमलेट' की भी भूमिका निभाएं। क्या इसकी संभावना बनती है?
अब तो नहीं बन सकती। अब तो 'हैमलेट' के पिता के रूप में जो भूत था वही बन पाऊंगा। हां, इस बात का खेद है कि उसे नहीं कर पाया। कभी अवसर नहीं मिल पाया। जब अवसर था तो व्यस्तता बढ़ गई थी। व्यस्तता के कारण इस ओर मैं ध्यान नहीं दे पाया। मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले दिनों में कोई न कोई इसे पढ़ेगा और इसकी बारीकी को समझेगा। कोई न कोई कलाकार इस किरदार को जरूर निभाएगा।



इस सवाल का यह भी आशय था कि क्या आप निकट भविष्य में रंगमंच पर उतर सकते हैं?
इस उम्र में थिएटर में वापस जाना मेरे लिए संभव नहीं होगा, क्योंकि थिएटर बड़ा मुश्किल काम है। जो लोग थिएटर करते हैं,उनको मैं बहुत दाद देता हूं। वे उम्र बीतने पर भी लगातार थिएटर से जुड़े रहते हैं। इतने गुण मुझमें नहीं हैं।



बच्चन जी की स्मृति में युवा और उदीयमान साहित्यकारों के लिए किसी ठोस योजना पर कोई विचार चल रहा है क्या?
इस पर विचार चल रहा है। हमने सोचा है कि एक रिसर्च इंस्टीट्यूट बने,जहां लोग बाबूजी की रचनाओं पर आकर रिसर्च कर सकें। अध्ययन करें। इस तरफ हमलोग ध्यान दे रहे हैं। उम्मीद करते हैं कि जरूर कुछ होगा।



विदेशों में साहित्यकारों के घर म्यूजियम बना दिए जाते हैं। अपने देश में कलाकारों और साहित्यकारों के प्रति यह सम्मान नहीं है। क्या आप 'सोपान' को म्यूजियम के रूप में परिवर्तित करना चाहेंगे?
बाबूजी की स्मृति में एक लाइब्रेरी जरूर होनी चाहिए। इस दिशा में हमलोगों ने कई बार सोचा है। नक्शे भी बने। फिर बनते-बनते वह योजना रह गई है। हम चाहते हैं कि रिसर्च इंस्टीट्यूट बने। वहां उनकी पुस्तकें रखी जाएं। 'सोपान' हमारा निजी गृह है। उसे हम पब्लिक के लिए नहीं खोल सकते। 'सोपान' और यहां 'प्रतीक्षा' में उनकी चीजें ज्यों की त्यों रखी हुई हैं। हमारे लिए वे प्रेरणा हैं। हम उनका आदर करते रहेंगे। हां, अगर कोई उनका प्रेमी कुछ देखना चाहेगा और हमसे आग्रह करेगा तो हम इंकार नहीं करेंगे। आम जनता के लिए हम उन्हें नहीं खोलना चाहेंगे।



एक बच्चन संग्रहालय भी हो सकता है, जहां आपके पिताजी के साथ-साथ आपसे और जया जी, अभिषेक और ऐश्वर्या से जुड़ी चीजें और यादें रखी जा सकती हैं?
अगर कोई सोचे तो करने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। मिल-जुलकर सोचना होगा। पहली बात तो यह है कि हमने अपने आपको कभी इतना महत्वपूर्ण समझा नहीं कि हमारे लिए ऐसा कुछ हो। हां, बाबूजी के लिए कई बार सोचा है। हमलोग उनकी सारी चीजें एकत्रित कर रहे हैं। उन पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बन रही है, जिसका निर्देशन डॉ ़ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी कर रहे हैं। अगर कोई उनकी रचनाओं के रूपांतरण या अनुवाद की अनुमति लेता है तो हम कभी मना नहीं करते हैं। अभी हम अपनी सोच को मू‌र्त्त रूप नहीं दे पाए हैं।



आपको 'मधुशाला' क्यों अत्यधिक प्रिय है?
सरल है और उसमें जीवन का सार मिलता है।



आपके पिता जी ने एक बार अपनी रचनाएं स्वयं रिकॉर्ड की थीं। उस रिकॉर्ड को जारी किया जाए तो आज की पीढ़ी उनकी रचनाओं का आनंद उनके स्वर में ले सकती है। हम कब तक इसकी उम्मीद कर सकते हैं?
हाल ही में हमलोगों ने बहुत खोजने के बाद कुछ रिकॉर्ड एकत्रित किए हैं। उम्मीद करते हैं कि आने वाले वर्षो में इसका एक संग्रह निकल सके। उस समय की रिकॉर्डिग साधारण तरीके से की गई है। तब न तो हमारे पास इतने साधन थे और न ऐसी समझ थी। आकाशवाणी में रिकॉर्ड हुई चीजें ठीक हैं। व्यक्तिगत तौर पर कुछ लोगों ने कवि सम्मेलनों आदि में उनकी रचनाएं रिकॉर्ड की हैं। जैसे मुंबई में धर्मवीर भारती के यहां कभी कुछ रिकॉर्ड हो गया। कोलकाता में बिड़ला जी की संस्थाओं में कुछ रिकॉर्ड है। बहुत लोग लिखते हैं हमें कि उनके पास बाबूजी की चिट्ठियां हैं। बाबूजी हर किसी के पत्र का जवाब हाथ से लिखकर देते थे। हम उन सभी को एकत्रित कर रहे हैं। हो सकता है कि सभी पत्रों का एक संग्रह निकालें।



ऑडियो-विजुअल बहुत कम हैं?
जी, वह भी बहुत कम है। ज्यादातर घरेलू चीजें हैं। वह भी रिकॉर्ड होना तब शुरू हुआ, जब मैं फिल्मों में आया। फिल्मों में काम पाने के बाद हम एट एमएम कैमरा खरीद सके। उसके पहले तो हमारे पास साधन भी नहीं थे। अब तकनीक काफी विकसित हो गई है। इस लिहाज से हमारे पास जो चीजें हैं,उसकी क्वालिटी बहुत खराब है।



अपनी जीवन यात्रा में आपने पिता की मौजूदगी को कब सबसे ज्यादा महसूस किया?
हर पल। जब छोटे थे तब, जब बड़े हो रहे थे तब, स्कूल जाते समय। हर वर्ष। प्रत्येक अरसा उनकी यादों से भरा हुआ है। ऐसा कहना मेरे लिए संभव नहीं होगा कि उम्र के किस पड़ाव में वे ज्यादा करीब थे। उम्र बढ़ने के साथ रिश्ते का स्तर और आयाम बदल जाता है। लेकिन उनके प्रति कभी आदर-सम्मान कम नहीं हुआ। एक मर्यादा रही और बंधन रेखा का कभी उल्लंघन नहीं हुआ।



मां और पिता के सारे गुण और संस्कार आपमें समाहित हैं। हम जानना चाहेंगे कि पिता के किन गुणों पर आपने ज्यादा गौर किया और उन्हें सायास अपने जीवन में उतारना चाहा?
वे बहुत ही सरल इंसान थे। सहनशीलता उनमें बहुत थी। चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक। उनमें आत्मबल था। किसी चीज के बारे में एक बार सोच लिया और कहा कि इसे करूंगा तो जब तक वह पूरा नहीं हो जाता था तब तक उनका आत्मबल नहीं टूटता था।



बच्चन परिवार पीढि़यों से विरोधों के बीच आगे बढ़ता रहा। सार्वजनिक जीवन में आने के बाद यह विरोध कुछ ज्यादा ही हो गया। इसकी वजह क्या हो सकती है? क्या आप मानते हैं कि बच्चन जी समय से आगे सोचते और चलते थे, इसलिए प्रबल विरोध होता था? और अब आप उसी लीक पर चल रहे हैं।
हो सकता है कि यह आपका दृष्टिकोण हो। आप जैसे लोग जो समाज, जीवन और देश को एक अलग दृष्टि से देखते हैं। उन्हें लगता हो कि हम समय से आगे रहे। हम यही कहेंगे कि हमलोगों ने जानबूझ कर कभी कुछ ऐसा नहीं किया। न ही इस आशा से किया कि इस पर कुछ चर्चा होगी। हमारे मन में जो आया, वो हमने किया। अगर वह समय से आगे चल रहा है या देख रहा है तो उसका श्रेय आप हमें दे सकते हैं कि हमने ऐसा सोचा या किया। इसके साथ जो अवगुण आते हैं या चर्चा विवाद होता है, उसका न तो हमें एहसास रहा और न हमने सोचा। मेरा ऐसा मानना रहा है और मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों को कहता हूं कि यदि हम एक ऐसे प्रोफेशन में हैं,जहां पर सबकी नजर हम पर टिकी है तो इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। कहीं न कहीं जो लोग विख्यात होते हैं,उन पर ऐसी नजर रखी जाती है। यही हमारा जीवन है और इससे हमें जूझना होगा। यहां बाबूजी से सीखी सहनशीलता काम आती है।



हिंदी भाषा का संस्कार और शब्दों की समृद्ध पूंजी आपको पिता से मिली है। आपने निजी अभ्यास से उसे और विकसित एवं समृद्ध किया है। हिंदी की समृद्ध परंपरा से नयी पीढ़ी कैसे जुड़ सकती है?
उतनी नहीं मिली है,जितनी मैं चाहता हूं। इस बात का मुझे बहुत खेद है। लोग ऐसा मानते और देखते हैं कि मेरे पास भाषा की जबरदस्त पूंजी है। लेकिन ऐसा है नहीं। मैं अभी भी सोचता हूं कि मुझे बहुत कुछ सीखना है। प्रतिदिन कोशिश करता हूं कि बाबूजी के लेखन से या जो पत्रकार लिखते हैं,उनके लेखन से या कुछ पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकूं। यह काम अभी जारी है। भाषा एक समस्या है, जिसे मैं स्वीकार करता हूं। अपनी संतान से हमेशा कहता हूं कि जब तक आप अपनी भाषा ठीक से बोलना नहीं सीखेंगे, तब तक आप अपने कार्य में भी सफल नहीं हो पाएंगे। मेरा ऐसा मानना है कि अगर आप हिंदी फिल्मों में काम करते हैं तो सबसे पहले आपको हिंदी सीखनी चाहिए। अपनी भाषा सीखनी चाहिए। अगर आप मराठी फिल्मों में काम कर रहे हैं तो मराठी भाषा सीखें। अगर आप तमिल में काम कर रहे हैं तो आप तमिल सीखें। बंगाली भाषा में काम कर रहे हैं तो बंगाली सीखें। भाषा सीखना बहुत जरूरी है। भाषा से भाव बनता है। सही भाव समझ में आता है।



आपके पिता जी की दो पंक्तियां हैं-
मैं गाऊं तो मेरा कंठ, स्वर न दबे औरों के स्वर से/जीऊं तो मेरे जीवन की औरों से हो अलग रवानी/ दुनिया से अलग और आगे रहने की बात वे हमेशा सोचते रहे। इसे आप अपने जीवन में कितना उतार पाए?
पहली बात तो यह है कि किस परिस्थिति और मानसिक स्थिति में उन्होंने ये पंक्तियां लिखीं, इसे जानना बहुत मुश्किल है। अगर आप इसे मेरे लिए एक उदाहरण बनाते हैं तो यह मेरे लिए कठिन हो जाता है। मैं केवल इतना कहना चाहूंगा कि मैं जानबूझकर या निर्धारित कर किसी अलग लीक पर जाने का प्रयत्न नहीं करता हूं। अगर वह भाग्य या परिस्थितिवश हो जाता है तो मैं उसे स्वीकार कर लेता हूं। जीवन में कई बार ऐसे क्षण आए हैं,जब लीक से हटकर कोई समस्या आई हो या कोई मार्ग दिखा हो तो ऐसे अवसरों पर आम रवैया ही होता है कि भैया यह तो लीक से हटकर है। इस पर मत जाइए। पता नहीं यह रास्ता कहां जाएगा। हम केवल इतना कह सकते हैं और किसी घमंड से ऐसा नहीं कह रहे हैं कि कभी कोई ऐसा मार्ग दिखा है तो हमने चाहा है कि चलो इस पर भी चल कर देखते हैं। इस निश्चय से नहीं जाते कि यह लीक से हटकर है। यह हमारे मन में कभी नहीं रहा।



आपके बाबूजी ने 'जनगीता' की रचना की थी। उसका अधिक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ। क्या उस पुस्तक को लेकर कोई योजना है?
अच्छा हुआ कि आपने बात कर ली। इन्हीं दिनों मैं उस पर बैठ रहा हूं। अभी-अभी आदेश श्रीवास्तव ने फिल्म इंडस्ट्री के दस-बारह गायकों के साथ मेरी आवाज में 'हनुमान चालीसा' रिकॉर्ड की है। उनके किसी मित्र का बेंगलोर में हनुमान मंदिर खुल रहा था तो उन्होंने रिकॉर्ड किया था। उन्होंने मुझसे कहा तो मैंने भी गाया। वह बहुत अच्छा बना है। मैंने उनसे सारे अधिकार खरीद लिए हैं। इसका प्रचार किया जाएगा और वीडियो बनेगा। इसको जगह-जगह भेजा जाएगा। इसी स्तर पर मैं 'जनगीता' का भी पाठ करूंगा। मैंने उनसे कहा है कि वे काम करें। वे इसे संगीतबद्ध कर रहे हैं। हम प्रतिदिन इस पर लगे हुए हैं। अपनी आवाज में पूरी 'जनगीता' हम रिकॉर्ड करेंगे और इसे सबके लिए ले आएंगे। यह अवधी मिश्रित भाषा में है।



लखनऊ और भोपाल में कुछ मौलानाओं ने 'मधुशाला' पर आपत्ति की है? उसके खिलाफ फतवा जारी किया है। आप इस संबंध में क्या कहेंगे?
अब इसके ऊपर मैं क्या चर्चा करूं? देश का कानून है। वे हमें बताएं कि उन्हें क्या परेशानी है। हम उसका पालन करेंगे। जिस पुस्तक को प्रकाशित हुए सत्तर साल से ऊपर हो गए और हिंदी साहित्य में जिसे एक मापदंड माना जाता है ... इस मामले पर तो साहित्यकारों को बोलना चाहिए। मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा।
इस इंटरव्यू का पहला हिस्सा यहाँ पढ़ें...

Monday, December 1, 2008

लोग मुझे भूल जायेंगे,बाबूजी को याद रखेंगे,क्योंकि उन्होंने साहित्य रचा है -अमिताभ बच्चन



अमिताभ बच्चन से उनके पिता श्री हरिवंश राय बच्चन के बारे में यह बातचीत इस मायने में विशिष्ट है कि अमित जी ज्यादातर फिल्मों के बारे में बात करते हैं,क्योंकि उनसे वही पूछा जाता है.मैंने उनके पिता जी के जन्मदिन २७ नवम्बर से एक दिन यह पहले यह बातचीत की थी। यकीन करे पहली बार अमिताभ बच्चन को बगैर कवच के देखा था.ग्लैमर की दुनिया एक आवरण रच देती है और हमारे सितारे सार्वजनिक जीवन में उस आवरण को लेकर चलते हैं.आप इस बातचीत का आनंद लें...
-पिता जी की स्मृतियों को संजोने की दिशा में क्या सोचा रहे हैं?

हम तो बहुत कुछ करना चाहते हैं। बहुत से कार्यक्रमों की योजनाएं हैं। बहुत से लोगों से मुलाकात भी की है मैंने। हम चाहते हैं कि एक ऐसी संस्था खुले जहां पर लोग रिसर्च कर सकें। यह संस्था दिल्ली में हो या उत्तर प्रदेश में हो। हमलोग उम्मीद करते हैं कि आने वाले वर्षो में इसे सबके सामने प्रस्तुत कर सकेंगे।

आप उनके साथ कवि सम्मेलनों में जाते थे। आप ने उनके प्रति श्रोताओं के उत्साह को करीब से देखा है। आज आप स्वयं लोकप्रिय अभिनेता हैं। आप के प्रति दर्शकों का उत्साह देखते ही बनता है। दोनों संदर्भो के उत्साहों की तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन हम जानना चाहेंगे कि आप इन्हें किस रूप में व्यक्त करेंगे?
सबसे पहले तो पिता के रूप में हमेशा काफी याद किया है। क्योंकि वो अक्सर मुझे अपने साथ ले जाया करते थे। उनका वो रूप भी मैंने देखा है। जिस तरह का उत्साह और जितनी तादाद में लोग रात-रात भर लोग उन्हें सुनते थे, ऐसा तो मैंने इधर कभी देखा नहीं। लेकिन वो जो एक समां बनता था बाबूजी के कवि सम्मेलनों का वो अद्भुत होता था। दिन भर बाबूजी दफ्तर में काम करते थे उसके बाद रात में कहीं कवि सम्मेलन होता था। यह जरूरी नहीं कि हम जिस शहर में थे उसी शहर में कवि सम्मेलन हो। पास के शहरों में भी होता था। कभी गाड़ी से जाना होता था, कभी ट्रेन से जाना पड़ता था। रात को जाना वहां, पूरी रात कवि सम्मेलन में पाठ करना। अलस्सुबह वापस आना और फिर काम पर चले जाना, इस तरह का संघर्ष था उनका। उनके साथ कवि सम्मेलन में जो समय बीतता था, वो अद्भुत था।

अपने प्रति दर्शकों का उत्साह और उनके प्रति श्रोताओं के उत्साह के बारे में क्या कहेंगे?
दोनों अलग-अलग हैं। मुझे तो लोग भूल गए हैं। एक-दो साल में पूरी तरह भूल जाएंगे। बाबूजी को तो हजारों साल तक याद रखेंगे, क्योंकि उन्होंने साहित्य रचा है।

क्या कभी आपकी इच्छा होती है कि आप कवि सम्मेलनों या साहित्यिक गोष्ठियों में श्रोता की तरह जाएं या कभी अपने आवास पर ऐसे सम्मेलन या गोष्ठी का आयोजन करें?
कई बार गया हूं मैं और अपने घर पर भी आयोजन किया है।

अपने पिता के समकालीन या मित्र साहित्यकारों में किन व्यक्तियों को आपने करीब से जाना और समझा?
जब हम छोटे थे तो जितने भी उनके करीब थे, उनके साथ हमारा संपर्क रहता था। चाहे वो पंत जी हों या दिनकर जी हों और जितने भी उनके समकालीन थे, सब के साथ काफी भेंट होती थी, मुलाकात रहती थी। फिर सब अलग-अलग दिशाओं में चले गए। हम भी अपने काम में व्यस्त हो गए। ज्यादा संपर्क नहीं रहा॥ लेकिन कहीं न कही उनके साथ संपर्क रहा, जब कभी मिलना-जुलना होता तो अच्छी तरह मिले।

सुमित्रानंदन पंत जी ने आपका और आपके भाई का नाम क्रमश: अमिताभ और अजिताभ रखा। क्या पंत जी की कुछ स्मृतियां बांटना चाहेंगे?
पंत जी जब भी इलाहाबाद आते थे तो हमारे घर ही रहते थे। फिर जब हम दिल्ली चले गए। जब भी वो दिल्ली आते थे तो हमारे घर पर ही रहते थे। बहुत ही शांत स्वभाव था उनका ... उनके लंबे बाल हमेशा याद आते हैं। उस समय तो हम छोटे थे और उनके साथ समय बिताना खाने की मेज पर कुछ साहित्यिक बातों की चर्चा होती थी, जीवन की चर्चा होती थी और एक साहित्यिक वातावरण बना रहता था। वे बहुत ही शांत और साधारण व्यक्ति थे।

बच्चन जी ने आत्मकथा में लिखा है - मेरे 'मन की नारी' मेरे बड़े लड़के को मिली है ... उनके इस निरीक्षण को आप कैसे व्यक्त करेंगे?
अब ये तो मैं नहीं बता पाऊंगा। ये उनका दृष्टिकोण था। पता नहीं उनका दृष्टिकोण क्या था, ये मैं नहीं कह सकता हूं। लेकिन मैं केवल इतने में ही खुश हूं कि यदि वो ऐसा सोचते हैं तो मैं अपने-आपको भाग्यशाली समझता हूं। उनके मन में जो भी मेरे प्रति या परिवार के प्रति आशायें थीं यदि मैं उन्हें पूरा कर पाया हूं तो इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं।

उन्होंने इच्छा प्रकट की थी कि अमित को अपनी आत्मकथा लिखनी चाहिए। उनके शब्द हैं, 'अमित का जीवन अभी भी इतना रोचक, वैविध्यपूर्ण, बहुआयामी और अनुभव समृद्ध है - आगे और भी होने की पूरी संभावना लिए-कि अगर उन्होंने कभी लेखनी उठाई तो शायद मेरी भविष्यवाणी मृषा न सिद्ध हो।' उन्होंने आप को भेंट की गयी प्रति में लिखा था, 'प्यारे बेटे अमित को, जो मुझे विश्वास है, जब अपनी आत्मकथा लिखेगा तो लोग मेरी आत्मकथा भूल जाएंगे?' पिता की इस भविष्यवाणी को आप सिद्ध करेंगे न?
मुझमें इतनी क्षमता है नहीं कि मैं इसे सिद्ध करूं। उनका ऐसा कहना पुत्र के प्रति उनका बड़प्पन है । लेकिन एक तो मैं आत्मकथा लिखने वाला नहीं हूं। और यदि कभी लिखता तो जो बाबूजी ने लिखा है,उसके साथ कभी तुलना हो ही नहीं सकती। क्योंकि बाबूजी ने जो लिखा है, आज लोग ऐसा कहते हैं कि उनका जो गद्य है वो पद्य से ज्यादा बेहतर है। खास तौर से आत्मकथा। उनके साथ अपनी तुलना करना गलत होगा।

ब्लॉग के जरिए आपके प्रशंसक दैनंदिन जीवन के साथ ही आपके दर्शन, विचार और मनोभाव से भी परिचित हो रहे हैं। ब्लॉग में आप के जीवन के अंश बिखरे रूप में आ रहे हैं। क्या हम इसे आपकी आत्मकथा की पूर्वपीठिका मान सकते हैं?
नहीं, बिल्कुल नहीं। आधुनिक काल में ब्लॉग एक ऐसा माध्यम मिल गया है, जिसमें अपने चाहने वालों से अपने प्रशंसकों के साथ मैं व्यक्तिगत रूप से वार्तालाप कर सकूं। हमारे जीवन में ऐसे अवसर कम ही मिलते हैं। और क्योंकि ये एक ऐसा माध्यम है जिससे कि मुझे किसी बिचौलिए की जरूरत नहीं है, चाहे वो कोई पत्रकार हों या कोई अखबार हो या कोई सेक्रेट्री हो या मित्रगण हो तो मुझे अच्छा लगता है कि मैं जितनी जल्दी हो, उनसे ये कनेक्शन प्राप्त कर लेता हूं। ये मुझे अच्छा लगता है। फिर जिस तरह से दो व्यक्ति शाम को मिलते हैं, चाय पीते हुए कुछ बतियाते हैं, उस तरह से मैं प्रतिदिन शाम को बैठकर कुछ समय ़ ़ ़जो मेरे साथ बीता या कोई ऐसी याददाश्त मेरे मन में या कोई ऐसा अनुभव हुआ या बाबूजी के साथ बिताया कोई पल हो, मां जी के साथ बिताया क्षण हो, अपने सहपाठियों के साथ बिताया वक्त हो, कलाकारों के साथ काम के क्षेत्र में बिताया अवसर हो, उनका मैं कभी-कभी वर्णन कर देता हूं। लेकिन ऐसा मानना ठीक नहीं होगा कि ये मेरी आत्मकथा की पूर्वपीठिका है। ये केवल एक सुविधा मिल गई है।

आप के ब्लॉग को पढ़ कर कोई चाहे तो आपकी जीवनी लिख सकता है। पिछले एक साल का सिलसिलेवार और ब्यौरेवार वर्णन कर सकता है।
हां, लेकिन ऐसा मान लेना कि यही सब कुछ होता है मेरे जीवन में तो गलत होगा।

पिता की किन कृतियों का अवलोकन आप नियमित तौर पर करते हैं? उनकी कौन सी पुस्तक हमेशा आप के साथ रहती है?
हमारे साथ पूरी रचनावली उनकी रहती है। प्रतिदिन तो मैं उसे नहीं पढ़ता हूं, लेकिन हमारे साथ रहती है। कहीं भी जाऊं,मैं उन्हें निश्चित रूप से साथ ले जाता हूं और यदा-कदा उनकी आत्मकथा पढ़ता हूं, उनकी कवितायें पढ़ता हूं और जीवन का रहस्य, जीवन का दुख-सुख सब कुछ मुझे उसमें मिलता है। और उसमें बड़ी सांत्वना मिलती है मुझे। कई प्रश्नों का उत्तर जो कि हमारे उम्र के लोगों या हम जो कम उम्र के लोग हैं उनके जीवन में कई बार आते रहते हैं। उनकी रचनाएं हमारे लिए एक तरह से मार्गदर्शक बन गयी हैं ।

आप ने ब्लॉग के एक पोस्ट में लिखा है कि पिता की रचनाओं में आपको शांति, धैर्य, व्याख्या, उत्तर और जिज्ञासा मिलती है। इनके बारे में थोड़े विस्तार से बताएं?
जितना भी उन्होंने अनुभव किया अपने जीवन में, वो किसी आम इंसान के जीवन से कम या ज्यादा तो है नहीं। जो भी उनकी अपनी जीवनी है या जो आपबीती है उनकी। उसमें संसार के जितने भी उतार-चढ़ाव है, सब के ऊपर उन्होंने लिखा है और उनका क्या नजरिया रहा है। तो वो एक बहुत अच्छा उदाहरण बन जाता है हमारे लिए। हम उसका पालन करते हैं।

पिछली बार अभिषेक से जब मैंने यही सवाल पूछा था तो उन्होंने बताया था कि आप ने आत्मकथा पढ़ने की सलाह दी थी और कहा था कि उसमें हर एक पृष्ठ पर कोई न कोई एक सबक है।
किसी भी पन्ने को खोल लीजिए कहीं न कहीं आपको कुछ ऐसा मिलेगा। लेखन के तौर पर, जो लोग भाषा सीख रहे हों या जिनकी भाषा अच्छी न हो, उसमें आपको बहुत ऐसी चीजें मिलती हैं। और जीवन का रहस्य, जीवन की जो समस्याएं हैं, जीवन की जो कठिनाईयां हैं या उसके ऊपर कोई एक बहस हो या उनकी विचारधारा हो ये पढ़कर बहुत अच्छा लगता है।

आप ने अपने ब्लॉग पर पचास से अधिक दिनों की पोस्ट में किसी न किसी रूप में पिता जी का उल्लेख किया है। पिता की स्मृतियों का ऐसा जीवंत व्यवहार दुर्लभ है। उनके शब्दों से किस रूप में संबल मिलता है?
देखिए ये एक आम इंसान जो है, वो प्रतिदिन इसी खोज में रहता है कि ये जो रहस्यमय जीवन है, इसकी कैसी उपलब्धियां होंगी? क्या विचारधारा होगी। बहुत से प्रश्न उठते उसके मन में। क्योंकि प्रतिदिन हमारे और आपके मन में कुछ न कुछ ऐसा बीतता है, जिसका कभी-कभी हमारे पास उत्तर नहीं होता। यदि हमें कोई ऐसा ग्रंथ मिल जाए जिसमें ढूंढते ही हमें वो उत्तर प्राप्त हो जाए तो फिर हमारे लिए वो भगवान रूप ही होता। मैं ऐसा मानता हूं कि हम अपने जीवन में, जब हमलोग बड़े हो रहे थे या आपके जीवन में भी है, किसी भी आम इंसान के जीवन में ऐसा ही होता है जब हम किसी समस्या में होते हैं, जब कठिनाई में होते हैं तो सबसे पहले कहां जाते हैं? सबसे पहले अपने माता-पिता के पास जाते हैं। कि आज मेरे साथ ये हो गया। क्या करना चाहिए? तो माता-पिता एक मार्ग दिखाते हैं। मार्गदर्शक बन जाते हैं। उनकी बातें हमेशा याद रहती हैं। क्योंकि जाने-अनजाने में आप चाहे पुस्तकें पढ़ लीजिए, विद्वान बन जाइए, लेकिन कहीं न कहीं जो माता-पिता की बातें होती हैं वो हमेशा हमें याद रहती हैं। क्यों याद बनी रहती है, क्या वजह है इसकी, ये तो मैं नहीं बता सकता, बहरहाल वो बनी रहती हैं। वही याद आती रहती हैं। जब कभी भी हमारे सामने कोई समस्या आती है या कोई ऐसी दुविधा में हम पड़ जाते हैं तो तुरंत ध्यान मां-बाबूजी की तरफ जाता है और हम सोचते हैं कि यदि वो यहां होते और हम उनके पास जाते तो उनसे क्या उत्तर मिलता। उसी के अनुसार हम अपना जीवन व्यतीत करते हैं। क्या उन्हें ये ठीक लगता?

पिता जी की आखिरी चिंताएं क्या थीं? समाज और साहित्य के प्रति वे किस रूप में सोचते थे?
इस पर ज्यादा कुछ अलग से उन्होंने कुछ नहीं बताया। सामान्य बातें होती थीं, देश-समाज को लेकर बातें होती थीं। साहित्यकारों से अवश्य वे साहित्य पर बातें करते थे, जिस तरह की कविता लिखी जा रही थी। जिस तरह से उनका स्तर गिर रहा था, उस पर वे बोलते थे।

'दशद्वार से सोपान तक' के बाद उन्होंने अपनी आत्मकथा को आगे नहीं बढ़ाया। क्या बाद की जीवन यात्रा न लिखने के कारण के बारे में उन्होंने कुछ बताया था?
उनका एक ध्येय था कि मैं यहां तक लिखूंगा और इसके बाद नहीं लिखूंगा। उनसे हमने इस बारे में कभी पूछा नहीं और न कभी उन्होंने कुछ बताया।

आप के जीवन को उनकी आत्मकथा के विस्तार के रूप में देखा जाता है।
ये तो मैं नहीं कह सकता। अगर उनके जीवन को देखा जाए तो बहुत ही विचित्र बात नजर आती है। तकरीबन 60-65 वर्षो तक एक लेखक लिखता रहा। आम तौर पर लेखक दस-बारह साल लिखते हैं। उसके बाद लिखते नहीं या खत्म हो जाते हैं। एक शख्स लगातार 60-65 सालों तक लिखता रहा । यह अपने आप में एक उपलब्धि है।

घोर निराशा के क्षणों में आपने एक बार उनसे पूछ दिया था, 'आपने हमें पैदा क्यों किया?' इस पर उन्होंने 'नयी लीक' कविता लिखी थी। इस प्रसंग को पिता-पुत्र के रिश्तों के संदर्भ में आज किस रूप में आप समझाएंगे?
पहले तो मेरे पुत्र को मुझ से ये प्रश्न पूछना पड़ेगा, फिर मैं कुछ कह पाऊंगा। अभी तक उन्होंने पूछा नहीं। और ऐसी उम्मीद नहीं है कि वो मुझ से आकर पूछेंगे। वो अपने काम में लग गए हैं। एक उत्साह है उनके मन में। वे प्रसन्न हैं। लेकिन यदि वो मुझसे पूछते तो मैं उनको बाबूजी की कविता पढ़ा देता।

इस प्रसंग को लेकर कभी व्यथा होती है मन में?
बिल्कुल होती है। बाबूजी के सामने कभी आंख उठा कर हमने बात नहीं की थी। और अचानक ऐसा प्रश्न पूछ देना। प्रत्येक नौजवान के जीवन में ऐसा समय आता है, जब जीवन से, समस्याओं से, काम से, अपने आप से निराश होकर हम ऐसे सवाल कर बैठते हैं। हम सब के जीवन में ऐसा समय आता है।

बच्चन जी ने लिखा है कि मेरे पुस्तकालय में आग लग जाए तो मैं 'बुद्धचर्या, भगवद्गीता, गीत गोविंद, कालिदास ग्रंथावली, रामचरित मानस, बाइबिल , कम्पलीट शेक्सपियर, पोएटिकल व‌र्क्स ऑफ ईट्स, दीवाने गालिब, रोबाइयत उमर खैयाम की और गुंजाइश बनी तो वार एंड पीस और जां क्रिस्तोफ लेकर भागूंगा।' क्या ऐसी कुछ पुस्तकों की सूची आपने भी सोच रखी है?
मैं तो उनकी रचनावली लेकर भागूंगा।