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Friday, June 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हमारी अधूरी कहानी

स्टार: 3

मोहित सूरी और महेश भट्ट एक साथ आ रहे हों तो एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद की ज सकती है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ बेहतरीन की परिधि में आते-आते रह गई है। यह फिल्मी संवादों, प्रेम के सिचुएशन और तीनों मुख्य कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए देखी जा सकती है। फिल्म में आज के ट्रेंड के मुताबिक औरतों की आजादी की भी बातें हैं। पुरूष दर्शकों को वसुधा का गुस्सा कुछ ज्यादा लग सकता है, लेकिन सच तो यही है कि पति नामक जीव ने परंपरा और मर्यादा के नाम पर पत्नियों को सदियों से बांधा और सेविका बना कर रख लिया है। फिल्म के संवाद के लिए महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक को बधाई देनी होगी। अपने पति पर भड़क रही वसुधा अचानक पति के लिए बहुवचन का प्रयोग करती है और ‘तुमलोगों’ संबोधन के साथ सारे पुरुषों को समेट लेती है। 

 वसुधा भारतीय समाज की वह अधूरी औरत है, जो शादी के भीतर और बाहर पिस रही है। वह जड़ हो गई है, क्योंकि उसकी भावनाओं की बेल को उचित सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। वह कामकाजी और कुशल औरत है। वह बिसूरती नहीं रहती। पति की अनुपस्थिति में वह अपने बेटे की परवरिश करने के साथ खुद भी जी रही है। आरव के संपर्क में आने के बाद उसकी समझ में आता है कि वह रसहीन हो चुकी है। उसे अपना अधूरापन नजर आता है। आरव खुशी देकर उसका दुख कम करना चाहता है। हालांकि फिल्म में हवस और वासना जैसे शब्दों का इस्तेकमाल हुआ है, लेकिन गौर करें तो आरव और वसुधा की अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशों में यह प्रेम का पूरक है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ स्त्री-पुरुष संबंधों की कई परतें पेश करती है। हरि-वसुधा, आरव-वसुधा, आरव की मां और उनका प्रेमी, हरि के माता-पिता .... लेखक-निर्देशक सभी चरित्रों के विस्तार में नहीं गए हैं। फिर भी उनके जीवन की झलक से प्रेम के अधूरेपन की खूबसूरती और बदसूरती दोनों नजर आती है।

 ‘हमारी अधूरी कहानी’ का शिल्प कमजोर है। आरव और वसुधा के जीवन प्रसंगों में भावनाएं तो हैं, किंतु घटनाओं की कमी है। वसुधा जिंदगी से ली गई किरदार है। आरव को पन्नों पर गढ़ गया है। अपनी भावनाओं के बावजूद वह यांत्रिक लगता है। यही कारण है कि उसकी सौम्यदता, दुविधा और कुर्बानी हमें विचलित नहीं करती। इस लिहाज से हरि जीवंत और विश्वसनीय किरदार है। रुढियों में जीने की वजह से औरतों के स्वामित्व की उसकी धारणा असंगत लगती है, लेकिन यह विसंगति अपने समाज की बड़ी सच्चाई है। पुरुष खुद को स्वामी समझता है। वह औरतों की जिंदगी में मुश्किलें पैदा करता है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ अपनी कमियों के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियों में उतरती है। लेखकों की दृष्टि पुरानी है और शब्दों पर अधिक जोर देने से भाव का मर्म कम हुआ है। फिर भी यह फिल्म पॉपुलर ढांचे में कुछ सवाल रखती है।

इमरान हाशमी ने आरव के किरदार को उसके गुणों के साथ पर्दे पर उतारा है। कशमकश के दृश्योंण में वे प्रभावित करते हैं। उन्हें किरदार(लुक और कॉस्ट्यूम) में ढालने में फिल्म की तकनीकी टीम का भी योगदान है। विद्या बालन इस अधूरी कहानी में भी पूरी अभिनेत्री हैं। वह वसुधा के हर भाव को सलीके से पेश करती हैं। पति और प्रेमी के बीच फंसी औरत के अंतर्विरोधों को चेहरे से जाहिर करना आसान नहीं रहा होगा। विद्या के लिए वसुधा मुश्किल किरदार नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में किरदार के अधूरेपन को बरकरार रखना उललेखनीय है। राजकुमार राव के बार में यही कहा जा सकता है कि हर बार की तरह उन्होंने सरप्राइज किया है। हमें मनोज बाजपेयी और इरफान खान के बाद एक ऐसा एक्टैर मिला है, जो हर कैरेक्टर के मानस में ढल जाता है। हरि की भूमिका में उन्होंने फिर से जाहिर किया है कि वे उम्दा अभिनेता हैं। राजकुमार राव और विद्या बालन के साथ के दृश्य मोहक हैं। नरेन्द्र झा छोटे किरदार में जरूरी भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत बेहतर है फिल्म के गीतों में अधूरी कहानी इतनी बार रिपीट करने की जरूरत नहीं थी। राहत फतह अली का गाया गीत फिल्म के कथ्य को कम शब्दों में बखूबी जाहिर करता है।
 वही हैं सूरतें अपनी वही मैं हूँ, वही तुम हो
मगर खोया हुआ हूँ मैं मगर तुम भी कहीं गुम हो
मोहब्बत में दग़ा की थी काफ़िर थे सो काफ़िर हैं
मिली हैं मंज़िलें फिर भी मुसाफिर थे मुसाफिर हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुंचे
 मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
अवधि- 131 मिनट

Tuesday, June 9, 2015

खुशी है पूरी हुई ख्‍वाहिश - विद्या बालन


-स्मिता श्रीवास्तव
सिल्वर स्क्रिन पर कभी शोख, कभी संजीदा नजर आई विद्या बालन ने बहुत सारे किरदारों को जीया है। इंटेस फिल्में उनकी पसंदीदा रही है। हमारी अधूरी कहानी उसी जॉनर की फिल्म है। इस फिल्म को करने के साथ महेश भट्ट के साथ काम करने की उनकी दिली तमन्ना भी पूरी हुई। इसमें वह वसुधा का किरदार निभा रहीं। फिल्म को लेकर उन्होंने साझा की बातें : 
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मैं महेश भट्ट और गुलजार साहब के साथ काम करने की हमेशा से ख्वाहिशमंद थी। भट्ट साहब निर्देशन से संन्यास ले चुके हैं। गुलजार साहब भी निर्देशन से दूरी बना चुके हैं। हालांकि मैंने गुलजार साहब से कई बार निर्देशन का आग्रह किया है। उनका जवाब होता है अगर फिल्म बनाई तो तुम्हारे साथ ही बनाऊंगा। मैं कहती हूं देर किस बात की बना डालिए। बहरहाल महेश भट्ट ने हमारी अधूरी कहानी की लिखी है। निर्देशन न सही उनकी लिखी कहानी पर अभिनय मौका मिला। मैंने विशेष फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्मों में पूर्व में काम नहीं किया था। उनकी फिल्मों और मेरी फिल्मों का मिजाज अलग रहा है। खास तौर से पिछले दस वर्षो के दौरान। कैंप से जुड़ने की कहानी दिलचस्प है। आशिकी 2 मुझे बेहद पसंद आई। मैंने निर्देशक मोहित सूरी से उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की। यह सुनकर वह मुस्कुरा दिए। शायद उन्हें लगा कि उत्साह में मैंने यह बात कही। फिर मैंने भट्ट साहब को फोन किया। भट्ट साहब की फिल्में मुझे इसलिए पसंद होती हैं क्योंकि सिर्फ सिचुएशन नहीं उनके कैरेक्टर जटिल होते थे। जबकि ज्यादातर फिल्मों में हीरो-हीरोइन कठिन परिस्थितियों से जूझते हैं। मैं उनकी फिल्म अर्थ की मुरीद थी। दोस्त के घर पढ़ने जाने के दौरान मैं उसके सीन की नकल करती थी। यह कोशिश होती थी कि बिना ग्लिसरीन के आंसू बहे। उस फिल्म का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है। मोहित में मुझे मानवीय जटिलताओं को दिखाने को लेकर गंभीरता दिखी। इंसानी फितरत बेहद अस्थिर होती है। उसकी सोच पल में तोला पल में माशा होती है। मोहित उसे दिखाने में निडर हैं। मैंने भट्ट साहब से कहा कि अर्से बाद किसी निर्देशक में आपका अख्स दिखा। यह संयोग है कि यह आपके बैनर तले बनी फिल्म है। मैं मोहित के साथ काम करने की ख्वाहिशमंद हूं। यह कहने के बाद मैंने फोन रख दिया। एक महीने बाद भट्ट ने फोन करके आफिस बुलाया। उन्होंने कहा कि आपको एक आइडिया सुनाता हूं। अगर पसंद आया तो मैं कहानी लिखूंगा। उसे मोहित निर्देशित करेंगे। मुझे कहानी बेहद पसंद आई। मुझे इंटेस चीजें पसंद हैं। हमारी अध्ूारी कहानी इंटेंस लवस्टोरी है। मुझे अच्छी लगी। मैंने झट से हां कहा। फिर उन्होंने कहानी डेवलप की। फाइनली मुझे कहानी नरेट की। उसे सुनने के बाद बिना कुछ कहे मैं उनके आफिस से निकल गई। फिर मैंने उन्हें मैसेज किया कि आप मेरी खुशी का अंदाज नहीं लगा सकते। मेरे लिए आपका स्क्रिप्ट नरेट करना बहुत बड़ी बात थी। यह हमेशा से मेरी चाहत थी। बीच में वह मुझे फोन करते रहते। उन्होंने मुझे अपनी किताब अ टेस्ट ऑफ लाइफ पढ़ने को दी। उसके साथ कहा कि अंकंवेंशनल लव क्या होता है यह किताब पढ़कर समझ आएगा। मैंने किताब पढ़ी। बीच में कोड्स भेजते। इस तरह मैंने रोल की तैयारी की। जबकि मोहित ज्यादा तैयारी में यकीन नहीं रखते। हमारी दो-दो घंटे मीटिंग होती। उसमें तमाम बातें होती। फिल्म पर महज पांच मिनट बात होती। धीरे-धीरे हमारे बीच कंफर्ट लेवल आ गया। वो एक्टर को तैयारी नहीं कराते। काम की आजादी देते हैं। जहां कमी लगती वहां अपनी राय देते।
    हर दूसरी औरत की कहानी
परिणीता के बाद मैं लवस्टोरी कर रही हूं। भट्ट साहब ने कहा कि यह दूसरी औरत की कहानी है। मैं सहमत हूं उनकी बात से। यह मानसिकता सदियों से चली आ रही कि शादी के बाद औरत आदमी की जागीर हो जाती है। हालांकि यह बात दोनों पक्षों पर लागू होनी चाहिए। आधुनिकता और शिक्षित होने के बावजूद महिलाएं भी इस धारणा से उबर नहीं पाती। आंधी में रहमान सर ने सुचित्रा सेन से कहा था कि राजनीति में रहना तुम्हारी तकदीर है। तुम क्यों शादी ब्याह के झंझट में फंस रही। औरत को सिखाया गया है कि उसकी पहचान मर्द से होती है। यहां पर इमरान का किरदार आरव वसुधा को सिर्फ इंसान के तौर पर देखता है। वह पहली बार किसी ऐसे इंसान से मिलती है जो उसे किसी की बीवी या मां के तौर पर नहीं देखता। फिर उसे प्यार करने लगता है। यह अनजाने में होता है। वसुधा शादी से नाखुश नहीं थी। उसने सोचा नहीं था कि वो शादी से बाहर प्यार महसूस करेगी। उसका पति उसके लिए पजेसिव है। वसुधा के हाथ पर अपना नाम लिखाता है। उसकी सांसों से लेकर उसके जिस्म पर अपना अधिकार मानता है। भट्ट साहब ने कहा कि ऐसे किरदार आपको अपने ईदगिर्द मिल जाएंगे। मैंने सोचा था यह प्रवृत्ति अनपढ़ लोगों में ज्यादा होगी। मगर ये हर जगह व्याप्त है। कहीं कम कहीं ज्यादा।
    मेरी अधूरी कहानी महेश भट्ट की मां की कहानी नहीं है। यह महेश भट्ट के माता-पिता, उनकी सौतेली मां और आसपास के लोगों के जीवन से प्रेरित है। जब उन्होंने मुझे यह बताया तो कहीं न कहीं प्रेशर बढ़ गया था। इस फिल्म को लेकर मैं नर्वस थी। बाद में पता चला इमरान और मोहित भी नर्वस थे। रिलेशनशिप की बारीकियों को जिस गहराई से महेश साहब ने लिखा है मोहित ने उतनी संजीदगी से उसे पर्दे पर उतारा है। यह सीन पढ़कर तुरंत करने वाली फिल्म नहीं है। उसे महसूस करना पड़ता है। फिल्म की कहानी खूबसूरती से कहती है कि सच्चा प्यार आपको बंधन में नहीं बांधता।
    सिर्फ वूमन सेंट्रिक फिल्में करना मेरा लक्ष्य नहीं। मैं अलहदा फिल्में करना चाहती हूं। वूमन सेंट्रिक फिल्म करने से फीस में इजाफा नहीं हुआ है। बल्कि कम फीस में काम करना पड़ता है। हाल में कंगना, प्रियंका और दीपिका की महिला प्रधान फिल्में हिट हुई हैं। वूमन सेंट्रिक अगर यूं ही हिट रही तो हमारा पारिश्रमिक भी हीरो के बराबर हो जाएगा। फिलहाल मैं बेनजीर भुट्टो या सुचित्रा सेन की बायोपिक नहीं कर रही। भुट्टो का प्रस्ताव भी मेरे पास नहीं आया। सुचित्रा सेन का प्रस्ताव आया था। मैं उसे करना चाहती थी। यह फिल्म बंगाली में बनेगी। राइमा सेन अपनी नानी की तरह दिखती हैं। मुझे लगा वो उसके लिए उपयुक्त लगेंगी। फिलहाल टीवी पर एक नान फिक्शन शो करने की सहमति दी है। पहली बार मुझे कोई कांसेप्ट पसंद आया है। यही वजह है कि कोई फिल्म साइन नहीं कर रही।