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Friday, February 26, 2016

फिल्‍म समीक्षा : अलीगढ़



साहसी और संवेदनशील
अलीगढ़
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता की अलीगढ़ उनकी पिछली फिल्‍म शाहिद की तरह ही हमारे समकालीन समाज का दस्‍तावेज है। अतीत की घटनाओं और ऐतिहासिक चरित्रों पर पीरियड फिल्‍में बनाना मुश्किल काम है,लेकिन अपने वर्त्‍तमान को पैनी नजर के साथ चित्रबद्ध करना भी आसान नहीं है। हंसल मेहता इसे सफल तरीके से रच पा रहे हैं। उनकी पीढ़ी के अन्‍य फिल्‍मकारों के लिए यह प्रेरक है। हंसल मेहता ने इस बार भी समाज के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के व्‍यक्ति को चुना है। प्रोफेसर सिरस हमारे समय के ऐसे साधारण चरित्र हैं,जो अपनी निजी जिंदगी में एक कोना तलाश कर एकाकी खुशी से संतुष्‍ट रह सकते हैं। किंतु हम पाते हैं कि समाज के कथित संरक्षक और ठेकेदार ऐसे व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देते हैं। उन्‍हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं। उन्‍हें शर्मसार किया जाता है। प्रोफेसर सिरस जैसे व्‍यक्तियों की तो चीख भी नहीं सुनाई पड़ती। उनकी खामोशी ही उनका प्रतिकार है। उनकी आंखें में उतर आई शून्‍यता समाज के प्रति व्‍यक्तिगत प्रतिरोध है।
प्रोफेसर सिरस अध्‍ययन-अध्‍यापन से फुर्सत पाने पर दो पैग ह्विस्‍की,लता मंगेशकर गानों और अपने पृथक यौन व्‍यवहार के साथ संतुष्‍ट हैं। उनकी जिंदगी में तब भूचाल आता है,जब दो रिपोर्टर जबरन उनके कमरे में घुस कर उनकी प्रायवेसी को सार्वजनिक कर देते हैं। कथित नैतिकता के तहत उन्‍हें मुअत्‍तल कर दिया जाता है। उनकी सुनवाई तक नहीं होती। बाद में उन्‍हें नागरिक अधिकारों से भी वंचित करने की कोशिश की जाती है। उनकी अप्रचारित व्‍यथा कथा से दिल्‍ली का युवा और जोशीला रिपोर्टर चौंकता है। वह उनके पक्ष से पाठकों को परिचित कराता है। साथ ही प्रोफेसर सिरस को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करता है। प्रोफेसर सिरस बेमन से कोर्ट में जाते हैं। तब के कानूनी प्रावधान से उनकी जीत होती है,लेकिन वे जीत-हार से आगे निकल चुके हैं। वे सुकून की तलाश में बेमुरव्‍वत जमाने से चौकन्‍ने और चिढ़चिढ़े होने के बावजूद छोटी खुशियों से भी प्रसन्‍न होना जानते हैं।
पीली मटमैली रोशनी और सांवली छटा के दृश्‍यों से निर्देशक हंसल मेहता प्रोफेसर सिरस के अवसाद को पर्दे पर बखूबी उतारते हैं। उन्‍होंने उदासी और अवसन्‍न्‍ता को अलग आयाम दे दिया है। पहले दृश्‍य से आखिरी दृश्‍य तक की फीकी नीम रोशनी प्रोफेसर सिरस के अंतस की अभिव्‍यक्ति है। हंसल मेहता के शिल्‍प में चमक और चकाचौंध नहीं रहती। वे पूरी सादगी से किरदारो की जिंदगी में उतरते हैं और भावों का गागर भर लाते हैं।दरअसल,कंटेंट की एकाग्रता उन्‍हें फालतू साज-सज्‍जा से बचा ले जाती है। वे किरदार के मनोभावों और अंतर्विरोधों को कभी संवादों तो कभी मूक दूश्‍यों से जाहिर करते हैं। इस फिल्‍म में उन्‍होंने मुख्‍य कलाकारों की खामोशी और संवादहीन अभिव्‍यक्ति का बेहतरीन उपयोग किया है। वे प्रोफेसर सिरस का किरदार गढ़ने के विस्‍तार में नहीं जाते। शाहिद की तरह ही वे प्रोफेसर सिरस के प्रति दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उनके किरदार हम सभी की तरह परिस्थितियों के शिकार तो होते हैं,लेकिन वे बेचारे नहीं होते। वे करुणा पैदा करते हैं। दया नहीं चाहते हैं। वे अपने तई संघर्ष करते हैं और विजयी भी होते हैं,लेकिन कोई उद्घोष नहीं करते। बतौर निर्देशक हंसल मेहता का यह संयम उनकी फिल्‍मों का स्‍थायी प्रभाव बढ़ा देता है।
अभिनेताओं में पहले राजकुमार राव की बात करें। इस फिल्‍म में वे सहायक भूमिका में हैं। अमूमन थोड़े मशहूर हो गए कलाकार ऐसी भूमिकाएं इस वजह से छोड़ देते हेंकि मुझे साइड रोल नहीं करना है। अलीगढ़ में दीपू का किरदार निभा रहे राजकुमार राव ने साबित किया है कि सहायक भूमिका भी खास हो सकती है। बशर्ते किरदार में यकीन हो और उसे निभाने की शिद्दत हो। राजकुमार के लिए मनोज बाजपेयी के साथ के दृश्‍य चुनौती से अघिक जुगलबंदी की तरह है। साथ के दृश्‍यों में दोनों निखरते हैं। राजकुमार राव के अभिनय में सादगी के साथ अभिव्‍यक्ति का संयम है। वे एक्‍सप्रेशन की फिजूलखर्ची नहीं करते। मनोज बाजपेयी ने फिर से एक मिसाल पेश की है। उन्‍होंने जाहिर किया है कि सही स्क्रिप्‍ट मिले तो वे किसी भी रंग में ढल सकते हैं। उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के एकाकीपन को उनकी भंगुरता के साथ पेश किया है। उनकी चाल-ढाल में एक किस्‍म का अकेलापन है। मनोज बाजपेयी ने किरदार की भाव-भंगिमा के साथ उसकी हंसी,खुशी और उदासी को यथोचित मात्रा में इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने अभिनय का मापदंड खुद के साथ ही दूसरों के लिए भी बढ़ा दिया है। उन्‍होंने यादगार अभिनय किया है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में वे कविता की तरह संवादों के बीच की खामोशी में अधिक एक्‍सप्रेसिव होते हैं।
निश्चित ही यह फिल्‍म समलैंगिकता के प्रश्‍नों को छूती है,लेकिन यह कहीं से भी उसे सनसनीखेज नहीं बनाती है। समलैंगिकता इस फिल्‍म का खास पहलू है,जो व्‍यक्ति की चाहत,स्‍वतंत्रता और प्रायवेसी से संबंधित है। हिंदी फिल्‍मों में समलैंगिक किरदार अमूमन भ्रष्‍ट और फूहड़ तरीके से पेश होते रहे हैं। ऐसे किरदारों को साधरण निर्देशक मजाक बना देते हैं। हंसल मेहता ने पूरी गंभीरता बरती है। उन्‍होंने किरदार और मुद्दा दोनों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। लेखक अपूर्वा असरानी की समझ और अपनी सोच से उन्‍होंने समलैंगिकता और सेक्‍शन 377 के प्रति दर्शकों की समझदारी दी है। अलीगढ़ साहसिक फिल्‍म है।
अवधि- 120 मिनट
स्‍टार- साढ़े चार स्‍टार

Sunday, February 21, 2016

अभिनेता राजकुमार राव और निर्देशक हंसल मेहता की बातचीत




अजय ब्रह्मात्‍मज

( हंसल मेहता और राजकुमार राव की पहली मुलाकात शाहिद की कास्टिंग के समय ही हुई थी। दोनों एक-दूसरे के बारे में जान चुके थे,लेकिन कभी मिलने का अवसर नहीं मिला। राजकुमार राव बनारस में गैंग्‍स ऑफ वासेपुर की शूटिंग कर रहे थे तब कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा ने उन्‍हें बताया था कि हंसल मेहता शाहिद की प्‍लानिंग कर रहे हैं। राजकुमार खुश हुएफ उन्‍हें यह पता चला कि लीड और ऑयोपिक है तो खुशी और ज्‍यादा बढ़ गई। इधर हंसल मेहता को उनके बेटे जय मेहता ने राजकुमार राव के बारे में बताया। वे तब अनुराग कश्‍यप के सहायक थे। एक दिन मुकेश ने राजकुमार से कहा कि जाकर हंसल मेहता से मिल लो। मुकेश ने हंसल को बताया कि राजकुमार मिलने आ रहा है। तब तक राजकुमार उनके दफ्तर की सीढि़यां चढ़ रहे थे। हंसल मेहता के पास मिलने के सिवा कोई चारा नहीं था। दोनों मानते हैं कि पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच रिश्‍ते की बिजली कौंधी। अब तो हंसल मेहता को राजकुमार राव की आदत हो गई है और राजकुमार राव के लिए हंसल मेहता डायरेक्‍टर के साथ और भी बहुत कुछ हैं।)
राजकुमार राव और हंसल मेहता की तीसरी फिल्‍म है अलीगढ़। दोनों के बीच खास समझदारी और अंतरंगता है। स्थिति यह है कि हंसल अपनी फिल्‍म उनके बगैर नहीं सोच पाते और राजकुमार राव उन पर खुद से ज्‍यादा यकीन करते हैं। झंकार के लिए यह खास बातचीत...यहां राजकुमार राव के सवाल हैं और जवाब दे रहे हैं हंसल मेहता।
-सिटीलाइट्स के बाद जब ईशानी ने आप का यह कहानी भेजी तो ऐसा क्‍यों लगा कि इसी पर फिल्‍म बनानी चाहिए? उन दिनों तो आप ढेर सारी कहानियां पढ़ रहे थे?
0 मैं कहानी के इंतजार में था। कई विचारों पर काम कर रहा था। सच कहूं तो मैं कहानियां ,खोजता नहीं। कहानियां ख्‍ुद ही मेरे पास आ जाती हैं। उस वक्‍त उनका मेल आ गया।वह भी जंक मेल में चला गया था। पढ़ते ही वह विचार मुझे प्रभावित कर गया। फिर भी उन्‍हें फोन करने के पहले मैंने तीन-चार घंटे का समय लिया।
-क्‍श्या लिखा था उन्‍होंने मेल में ?
0 उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के बारे में लिखा था कि एएमयू में ऐसे एक प्रोफेसर थे,जिनका इंतकाल हो गया था। उन्‍हें सेक्‍सुअलिटी के मुद्दे पर सस्‍पेंड कर दिया गया था। बेसिक थॉट था। प्रोफेसर सिरस से संबंणित कुछ आर्टिकल थे। मैंने उसी शाम ईशानी को बुलाया। ईशानी स्क्रिप्‍ट लिखने के लिए तैयार नहीं थी। तभी हमलोग सिटीलाइट्स की एडीटिंग कर रहे थे। मैंने अपने एडीटर अपूर्वा असरानी से पूछा कि क्‍या तुम लिखोगे? अपूर्वा कूद पड़ा। वह पहले से जानता था मुद्दे के बारे में। मैंने शैलेष सिंह को निर्माता के तौर पर जोडा। फिल्‍म पर काम शुरू हो गया। लिखने के दौरान ही तुम्‍हारे कैरेक्‍टर दीपू सैबेस्टियन का जन्‍म हुआ। हमें अकेली जिंदगी जी रहे प्रोफेसर सिरस की कहानी कहने के लिए कोई चाहिए था। फिर यह सिरस और दीपू की कहानी बन गई।
- शाहिद पर काम करते समय हम ने कहां सोचा था कि उसे नेशनल अवार्ड मिल जाएगा। अभी अजीगढ़ चर्चा में है। क्‍या निर्माण के दौरान यह अहसास था कि समलैंगिक अधिकारों की यह फिल्‍म ऐसी प्रासंगिक हो जाएगी? व्‍यक्ति सिरस से बढ़ कर अब यह एक सामाजिक विषय की फिल्‍म हो गई है।
0 हमेशा मेरी कोशिश रहती है कि मानव अधिकारों की कहानी पूरी जिम्‍मेदारी के साथ कहें। हम उन पर फिल्‍में क्‍यों बनाते हैं,क्‍योंकि वे समाज के बहुसंख्‍यकों से अलग हैं। हम उन्‍हें अल्‍पसंख्‍यक कहते हैं। चाहे वे मुसलमान हों या माइग्रैंट हों या होमोसेक्‍सुअल हों। मेरी कोशिश रहती है कि मैं उन्‍हें इंसान की तरह पेश करूं और उनके अधिकारों की बात करूं। समाज में उनकी मौजूदगी को रेखांकित करना ही ऐसी फिल्‍मों का ध्‍येय हो जाता है। जब हम लिख रहे थे तो सेक्‍शन 377 पर कोई बात करने को तैयार नहीं था। संसद ने चुप्‍पी साध ली थी। संसद यों भी निष्क्रिय ही रहता है। सड़क और संसद में बड़ा अंतर आ गया है। सभी चाहते हैं कि यह लॉ हटे। अब सुप्रीम कोर्ट लोगों की इच्‍छाओं पर ध्‍यान दे रहा है। अलीगढ़ अब उस लड़ाई का हिस्‍सा बन गई है।
- इस फिल्‍म का मकसद क्‍या है ?
0 सीधी सी बात है कि एक व्‍यक्ति अपने बंद कमरे में क्‍या कर रहा है,यह उसका निजी मामला है। दो व्‍यक्ति राजीखुशी क्‍या कर रहे हैं,उससे स्‍टेट का क्‍या लेनादेना है अगर वे समाज को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। हम फिल्‍म में यही दिखा रहे हैं। एक व्‍यक्ति की जिंदगी  कुछ लोगों ने तबाह कर दी।
-अगर आ से पूछूं कि बीच के दौर के हंसल मेहता और आज के हंसल मेहता में क्‍या अंतर दिखता है?
0 हर फिल्‍म में सेंसर से लड़ाई। फिल्‍म की रिलीज का संघर्ष... इसके बावजूद मैं थकता नहीं। बीच की फिल्‍मों में मैं थक जाता था। उनमें कहने के लिए कुछ नहीं रहता था। इन फिल्‍मों से मुझे ऊर्जा मिलती है। एक मकसद मिल गया है मुझे। उस दौर में मैं फिल्‍मों से अपने खाली समय भर रहा था। उन फिल्‍मों की एक भूमिका रही। मुझे असफलता मिली। उसकी वजह से मैंने अंदर झांका। और ऐसी फिल्‍मों की तरफ लौटा।

Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, May 29, 2014

अंधेरा है महानगरों की चकाचौंध में-हंसल मेहता


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता और राजकुमार राव की जोड़ी की दूसरी फिल्म ‘सिटीलाइट््स’ आ रही है। पिछले साल की ‘शाहिद’ के लिए दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ‘सिटी लाइट’ का निर्माण महेश भट्ट और फॉक्स स्टार स्टूडियोज ने किया है। ‘सिटीलाइट्स’ में राजकुमार राव राजस्थान के दीपक की भूमिका में हैं, जो आजीविका के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे महानगर में दीपक के सरवाइवल और संघर्ष की यह कहानी छोटे शहरों से सपनों के साथ बडे शहरों में आ रहे लाखों-करोड़ों युवकों की प्रतीकात्मक कहानी है।
    हंसल मेहता से पहले इस फिल्म के निर्देशन के लिए अजय बहल को चुना गया था। उन्होंने ‘शाहिद’  देख रखी थी। उन्हें लगा कि हंसल ‘सिटीलाइट़्स’ की थीम के साथ न्याय कर सकते हैं। ऐसा लग सकता है कि हंसल मेहता ने ही इस फिल्म के लिए राजकुमार राव को चुना होगा। यहां तथ्य उल्टे हैं। राजकुमार राव पहले से फिल्म में थे। बाद में हंसल मेहता को बतौर निर्देशक बुलाया गया।
    ‘शाहिद’ के लिए मिले पुरस्कार से फर्क तो पड़ा है। हंसल बताते हैं, ‘संयोग है कि हम दोनों को पुरस्कार मिले और अब ‘सिटीलाइट्स’ आ रही है। फिल्म इंडस्ट्री और बाकी लोगों के बीच पुरस्कार से साख बढ़ी है। अब हम कुछ और भी काम कर सकते हैं। अभी मेरी चाहत है कि दर्शक यह फिल्म देखने आएं। उनका समर्थन मिलेगा और फिल्म चलेगी, तभी हमलोग बेहतरीन फिल्में ला सकेंगे। खुशी है कि इस फिल्म को समर्थन मिल रहा है। फिल्म के गीत भी लोकप्रिय हो रहे हैं।’
     ‘सिटीलाइट्स’ फिलीपिंस की फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ पर आधारित है। फॉक्स स्टार स्अूडियोज ने महेश भट्ट से आग्रह किया था कि वे इस फिल्म को भारतीय संदर्भ देकर बनाएं। चूंकि फिल्म का कथ्य भारत के लिए भी सामयिक है, इसलिए महेश भट्ट राजी हो गए। उन्होंने अपने कैंप के मशहूर निर्देशकों को यह फिल्म नहीं दी, क्योंकि इस फिल्म का मिजाज रियल और सादा है। उन्होंने हंसल मेहता को फिल्म सौंपी। हंसल मेहता कहते हैं, ‘भट्ट साहब के बारे में अनेक धारणाएं फैली हुई हैं। मुझे उन जैसा साहसी और क्रिएटिव कोई व्यक्ति नहीं दिखता। मुंबई की शूटिंग के दौरान मैं रोजाना उनसे मिलने पहुंच जाता था और रिचार्ज होकर निकलता था। भट्ट साहब ने कहा था कि निर्भीक होकर फिल्म बनाओ। बाकी मैं देख लूंगा। वे सिर्फ आजादी ही नहीं देते। वे आजाद रहने की हिम्मत भी देते हैं।’ हंसल मेहता ‘सिटीलाइट्स’ के बारे में स्पष्ट करते हैं, ‘मैंने मूल फिल्म नहीं देखी है। मैं नहीं चाहता था कि ‘मैट्रो मनीला’ से प्रेरित या प्रभावित हो जाऊं। ‘मैट्रो मनीला’ के आधार पर रितेश शाह ने स्क्रिप्ट लिख ली थी। उस स्क्रिप्ट पर ही मैंने काम किया। मैंने केवल मुख्य किरदारों को हिमाचल प्रदेश से निकाल कर राजस्थान में बिठा दिया।’
    फिल्म के टायटल को हंसल मेहता उचित ठहराते हैं। वे तर्क देते हैं, ‘इस फिल्म के लिए यह टायटल उपयुक्त है। महानगरों की चकाचौंध में अंधेरा पसरा रहता है। रोशनी के बीच रहते हुए भी सभी के मन में अंधेरा है। आप मुंबई शहर को ही लें। ऊंची इमारतों के वासी नीचे झोपड़पट्टियों को नहीं देखते। उनकी नजर दूर समुद्र की लहरों को टटोलती रहती है। देश के छोटे शहरों से लोग महानगरों की चमक-दमक (सिटीलाइट्स) देख कर भागे आते हैं और यहां की अंधेरी गलियों में गुमनाम हो जाते हैं।’
    ‘सिटीलाइट्स’ की शूटिंग राजस्थान के एक गांव में हुई है। शूटिंग से पहले राजकुमार राव और पत्रलेखा कुछ समय के लिए उस गांव में जाकर रहे। उन्होंने स्थानीय लोगों की चाल-ढाल और भाषा सीखी। हंसल मेहता बताते हैं कि इससे काफी फर्क पड़ा, ‘राजकुमार राव हरियाणा के हैं और पत्रलेखा असम की है। फिर दोनों शहरों में रह रहे हैं। जरूरी था कि वे मेरे किरदारों की भाषा, वेशभूषा और व्यवहार को वास्तविक तरीके से पर्दे पर ले आएं। मैंने उन्हें यह मौका दिया कि वे किरदार के अनुसार कुछ सीख-समझ सकें।’

बाक्स
    राजकुमार राव ‘सिटीलाइट्स’ में दीपक की भूमिका को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। फिल्म में दीपक का किरदार उनके देखे-सुने व्यक्तियों से भिन्न और एक हद तक आत्मकेंद्रित है। वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है। उसकी एक ही चिंता है कि वह अपनी बीवी और बेटी को सुरक्षित जिंदगी से सके। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता राजकुमार राव शूटिंग के दरम्यान किसी प्रकार का दबाव नहीं महसूस करते। वे मानते हैं कि अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और गहराई से निभाने की चिंता भर रहती है। मैं यही कोशिश करता हूं कि दर्शकों को परिचित किरदार भी नए रूप-रंग में दिखाऊं। ‘सिटीलाइट्स’ का दीपक ‘शाहिद’ के शाहिद आजमी से स्वभाव और एटीट्यूड में भिन्न है।  
   

Sunday, May 11, 2014

पुरानी बातचीत : हंसल मेहता

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
फिल्‍मों के इतिहास और फिल्‍मकारों के विकास के अध्‍ययन में रुचि रखने वाले चवन्‍नी के पाठकों के लिए हसंल मेहता का यह इंटरव्यू दिल पर मत ले यार के समय यह इंटरव्यू किया गया था। तब इतनी लंबी बातें कर लेना मुश्‍िकल नहीं था। अब न तो जवाब मिलते हैं और न सवाल सूझते हैं। पढ़ने के बाद फीडबैक अवश्‍य दें। यहां या मेल करें। chavannichap@gmail.com


-     'दिल पे मत ले यार' का आयडिया कब आया?
0     जब मैं 'जयते' बना रहा था उस वक्त बहुत सारी कहानियां दिमाग में थीं. हमारे कुछ लेखक कई सारे विषयों पर सोच रहे थे कि किस तरह की फिल्म बनाई जा सकती है. मुझे आर वी पंडित ने कहा था कि मैं कहानी चुनूं ,जो प्रासंगिक हो, ऐसी कहानी हो जो जिंदगी से जुड़ी हो. उस वक्त शहर की हालत गंभीर थी. खून-खराबा, गैंगवार जौसी चीजें अपने चरम पे थी. उसी वक्त एक आयडिया दिमाग में आया. और 'जयते' की कहानी उभरकर आई. और 'जयते' बना दिया. पर कहीं लगता था कि एक कहानी छूटी हुई है जो अच्छी है. एक समय ऐसा आया जब मैंने सोचा कि उसको लेकर टेलीविजन पर ही कुछ कर दिया जाए. लग रहा था कि टीवी पर जो सस्पेंस, थ्रीलर जौसे प्रोग्राम हैं उन्हीं के मुताबिक ये कहानी ढाल दूं. पर ये किसी में फीट नहीं हो रहा था. एक्शन, आपसी संबंध जौसे पहलुओं का मिश्रण था. सौभाग्यवश ऐसा हुआ नहीं. मैं 1998 में सौरभ शुक्ला के साथ रिश्ते कर रहा था सौरभ हमारे साथ पहली बार काम कर रहा था, पर एक-दूसरे के साथ काम करके मजा आया. हम दोनों ही एक-दूसरे की मानसिकता समझ रहे थे. एक रात जब हम शूट कर रहे थे तो मैंने सौरभ को एक लाइन की कहानी सुनाई और कहा कि मुझे इस पर छोटी फिल्म करने की इच्छा है. सौरभ ने कहा कि मैं लिखूंगा इस कहानी को और तुम्हारे लिए काम भी करूंगा. लेकिन शर्त ये होगी कि यह किरदार मैं करूंगा. मैंने कहा अगर तुम लिखते नहीं तब भी यह तुम्हारे लिए ही सोचा था. सौरभ ने कहा कि विषय तो अच्छा है पर इस पर बहुत काम करना पड़ेगा. और उत्साह में हमलोगों ने स्क्रिप्ट पर काम करना शुरू कर दिया. एक छोटी फिल्म की स्क्रिप्ट तौयार हो गई,जिसे हमने पन्द्रह से बीस लाख में करने का सोचा था. पर हम किसी भी तरह से फिल्म शुरू नहीं कर पाए. धीरे-धीरे लगने लगा कि यह और भी बड़ी फिल्म हो सकती है. फिर मैंने अपने स्कूल के मित्र अजय तुली के साथ कहानी पर बातचीत की. उसने जब कहानी सुनी तो वो भी उत्साहित हो गया. उसने भी कहा कि इस पर बड़ी फिल्म बननी चाहिए. उसी वक्त 'सत्या' हिट हो गई. फिर सोचा कि मनोज और सौरभ को मुख्य किरदारों में रखकर एक अच्छी व बड़ी फिल्म बनाई जा सकती है. अजय ने ही प्रोत्साहित किया कि बड़ी फिल्म ही बनाई जाए. उस वक्त तक ये नहीं पता था कि अजय ही निर्माता होगा. लेकिन अजय की रूचि इस प्रोजेक्ट में बढ़ती चली गई. 98-99 में हमलोगों ने कई सारे निर्माताओं को यह कहानी सुनाई. पर कोई बात नहीं बनी. हम लगातार स्क्रिप्ट पर काम करते रहे. इस जुनून के साथ कि ये फिल्म तो हमें करनी है. पिछले साल मई में एक निर्माता ने अपनी रूचि दिखाई तब तक मनोज से बात नहीं की गई थी. हमने मनोज से भी बात की और उसे कहानी पसंद आई. मनोज ने पूछा इसका निर्माण कौन करेगा. मैंने कहा कि मेरे पास निर्माता है. परंतु आगे चलकर हमें लगने लगा कि जो हम कहना चाहते हैं वो बाहर का निर्माता नहीं समझ पाएगा. हम कुछ ऐसा करने की सोच  रहे थे जो आजतक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नहीं किया गया था. इस फिल्म को आप एक दायरे में बांध नहीं सकते. जब कोई निर्माता सुनता था कि थ्रीलर है और वो भी मनोज के साथ तो खुश हो जाता था. पर जब मैं कहता था कि इसमें ह्यूमर भी है तो समझ नहीं पाता था. थ्रीलर और ह्यूमर एक साथ कैसे हो सकता है. कभी मैं कहता था कि इसमें ह्यूमर है पर कॉमेडी नहीं है तो वो इस फर्क को भी नहीं समझ पाते थे. निर्माता पूछते थे कि इसमें रोमांस है, मैं कहता था कि इसमें रोमांस तो है पर 'कुछ कुछ होता है' वाला नहीं. लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि  विषय क्या है? पर हमें समझ में आ रही थी फिल्म, इसलिए हमने सोचा कि इसे हम ही बनाएंगे. हमने अपनी तरफ से कोशिशें शुरू की .पहले मनोज को साइन किया फिर तब्बू को. सौरभ साथ में थे ही. आदित्य श्रीवास्तव को जोड़ा. और इस तरह जनवरी 21 को हमने फिल्म शुरू की. ये एक अजूबा ही था. क्योंकि हमें लग रहा था कि हमारे पास पौसे नहीं हैं तो फिल्म कैसे बनाएंगे. लेकिन वह जनवरी 21 था और आज 1 जुलाई है. हमारी फिल्म तौयार होनेवाली है. शूटिंग और डबिंग पूरी हो गई है. मुझे अभी तक ऐसा लग रहा है जौसे मैं, अभी भी, सपने में जी रहा हूं. कुछ भी सच नहीं लगता.
-     'दिल पे मत ले यार' है क्या?
0     कहानी के बारे में मैं कम बात करना चाहता हूं. कहानी के बारे मैं ये कह सकता हूं कि फिल्म आपका मनोरंजन करेगी. दिलचस्पी आपकी बनी रहेगी और आपको सोचने पर मजबूर भी करेगी. मैं कभी नहीं चाहता हूं कि माइंडलेस फिल्म कॉमेडी हो. वौसी फिल्म नहीं है ये. इसमें हमने कुछ कहने की भी कोशिश की है. इस फिल्म की कहानियत बेजोड़ है. मैंने भी कोशिश की है कि  कहानी ईमानदारी से दर्शकों को कही जाए. दर्शकों को कहानी समझ में आए. आप कई सालों से पाप्युलर सिनेमा देखते आ रहे हैं, लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व भी डाले हैं जो हमारे सिनेमा में नहीं होता है. जौसे डार्क ह्यूमर है. और जो प्यार और रोमांस की आम धारणा है फिल्मों में, वो टूटेगी . थ्रीलर, रोमांस और कॉमेडी की जो आम धारणा है वो टूटेगी. अगर ये फिल्म दर्शकों को कह पाई जो ये कहना चाहती है तो मैं कह सकता हूं कि इस फिल्म से बहुत सारी नई चीजें देखने को मिलेगी. अगर सफल रही तो एक नया चलन शुरू हो जाएगा.
-     लेकिन आम दर्शकों को जोड़ने के लिए कोई तो बात होगी?
0     हर इंसान के अंदर अपने परिवेश से बाहर निकलने की प्रवृति होती है. कोई छोटे शहर से बड़े शहर को आता है. कोई बडे़ शहर से विदेश जाना चाहता है. हर इंसान ये महसूस करता है कि वो फंसा हुआ है. और वहां से निकलना चाहता है. हर इंसान को लगता है कि वो भंवर में फंसा हुआ है. आम जिंदगी के उतार-चढ़ाव से हर आदमी लड़ता हुआ दिखता है. कहानी हम सबकी है. मानसिक या सामाजिक भंवर को हमने कहानी का रूप दिया. एक प्रवासी की कहानी है. वो कैसे शहर में आता है उसके सपने क्या हैं, और उसके सपने उसे कहां तक ले जाते हैं. ये सीधा-सादा किरदार है जो बातों को बहुत जल्दी दिल पे ले लेता है. कहानी की खासियत ये है कि हर मोड़ पर आपको लगेगा कि अब आगे क्या होनेवाला है.? जौसे-जौसे फिल्म क्लाइमेक्स तक पहुंचेगी आप सोच भी नहीं पाएंगे कि ऐसा होनेवाला था. उत्साह का जो तत्व है वो बहुत मजबूत है इस फिल्म में. कहानी ऐसी है जो दर्शकों को पूरे समय तक बांधकर रखती है. कहानी कहीं भी बंद होती नहीं दिखाई देती.
-     मनोज के किरदार के बारे में कुछ बताइए.
0     वही जो मैंने अभी बताया. इस नायक का नाम रामसरन पांडे है. वो एक छोटे शहर जौनपूर से आया है. बहुत छोटे-छोटे सपने हैं उसके. गौराज में काम करता है. तो सोचता है कि वहां का सुपरवाइजर बन जाएगा. उसकी जिंदगी में एक लड़की आती है और उसे एक नया सपना दे जाती है. उस लड़की के साथ संबंध स्थापित होते-होते कुछ और सपने जुड़ जाते हैं. और उन सपनों का क्या होता है यही कहानी है इस फिल्म की.
-     मासूमियत खोनेवाली बात जो थी वो कहां है?
0     मासूमियत खोनेवाली बात है. मैं इसलिए इसके विषय में बात नहीं कर रहा हूं क्योंकि मैं कहानी के अंदर ज्यादा झांकना नहीं चाहता. मेरे लिए ये ऐसा सफर है जो हर इंसान तय करता है. मैं मुंबई छोड़कर कई सालों तक  बाहर रहा. वो मेरी जिंदगी का एक सफर था. शुरू में एक उमंग लेकर एक सपना लेकर गया. धीरे-धीरे अच्छा होता गया. मैं पौसे भी कमाने लगा. लेकिन फिर वो सपना टूट गया. और मैं वापस आ गया. मुझे लगने लगा कि ये सपना तो मैंने नहीं देखा था. ये अच्छा है, पर बुरा बहुत ज्यादा है. एक अजीब सी भावना थी इसलिए मैं लौट आया. रामसरन पांडे की कहानी भी ऐसी ही है. जो एक सपना लेकर आता है शहर में और वो सपना उसे कहां तक ले जाता है. कहानी में हमने समाज के अलग-अलग तबकों को भी दिखाने की कोशिश की है. मनोज का किरदार प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करता है. सौरभ इस शहर का कीड़ा है. जो इसी शहर में पला-बड़ा है. शहर की कमियों को और उससे उत्त्पन्न असमंजस की स्थितियों का वो प्रतिनिधित्व करता है. उसे लगता है कि ऐसा करूंगा तो गलत हो जाएगा, वौसा करूंगा तो भी गलत हो जाएगा. तब्बू उच्च मध्यवर्गीय समाज का प्रतिनिधित्व करती है. किशोर कदम शहर के निगेटिव पहलू का प्रतिनिधित्व करता है. वो गैंगस्टर है. शहर के अलग-अलग तबकों के बीच कैसे संबंध बनते हैं और समय के साथ कैसे उनमें बदलाव आता है उस पर आधारित ये कहानी है.
-     अंतत: आपका नायक कहां पहुंचता है.
0     उसके लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. मैं अभी उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता.
-     शहरो में पूंजीवाद के साथ आए अलगावाद(एलियनेशन)ो आपने कहानी का आधार बनाया है ...
0     नहीं ऐसा नहीं है. मैं जरूरत से ज्यादा बौद्धिक स्तर पर भी कहानी को नहीं ले जाना चाहता. मैं सिर्फ एक कहानी कहने की कोशिश कर रहा हूं. मेरे लिए किरदार के साथ जो समीकरण बनते हैं वो अहमियत रखते हैं. अलग-अलग तबके के लोग मिलकर जो समीकरण बनाते हैं वो जरूरी है. गोविंद निहलानी ने एक पार्टी में ही सबको दिखा दिया था. मैं पूरी फिल्म में दिखा रहा हूं. जब ये सारे लोग एकत्रित होते हैं तो अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इनके बीच हर पल कुछ न कुछ बदलता रहता है. किसी की भावनात्मक जरूरत है तो किसी की नकारात्मक. समीकरण कैसे बनते हैं कैसे बदलते हैं मेरे लिए वो महत्वपूर्ण है. एलियनेशन, वर्गसंघर्ष जरूरी नहीं है. शहर में आकर वो खत्म हो जाता है.
-     वह समय खत्म हो गया है या सोचने का तरीका बदल गया है?
0     समय भी खत्म हो गया है और सोचने का तरीका भी बदल गया है. तब्बू उच्च मध्य वर्गीय समाज की होते हुए भी जिस तरह से मनोज के साथ मिलती-जुलती है. हकीकत में मनोज उससे प्यार करने का सपना भी देख सकता है . आम व्यावसायिक फिल्मों में हकीकत से परे एक टैक्सी ड्राइवर प्यार भी कर सकता है, पर इसमें ऐसा कुछ नहीं है. इसमें हमने वास्तविकता से जुड़े रहकर बदलते हुए संबंधों को दिखाया है. ये सबसे बड़ी चुनौती भी थी. इसमें हमारे बदलते हुए आदर्श कहीं न कहीं दिखाई देते हैं.
-     कुछ ठोस कहने की कोशिश नहीं की है क्या?
0     मेरे लिए ये कोई वक्तव्य नहीं है. यह एक कहानी है,जिसका आप आनंद उठाएंगे. और जो आपको थोड़ा बहुत सोचने पर भी मजबूर करेगी. इसे देखने के बाद आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में झांकना जरूर चाहेंगे. लोग थिएटर अलग-अलग कारणों से जाते हैं. कोई मनोरंजन के लिए जाता है, कोई सूचना के लिए जाता है तो कोई सोचने के लिए जाता है. मेरी यह फिल्म सब के लिए है. मेरे लिए फिल्म एक ऐसा माध्यम है,जहां सारी कलाओं का मिलन होता है. मैंने कोशिश भी यही किया है. शहर की जो अपनी कविता होती है, जिस भाषा का इस्तेमाल शहर में होता है वह इस फिल्म में है. फिल्म में अगर कोई गाली भी देता है तो आपको अपनी बीवी के साथ बौठे फिल्म देखते समय सोचना नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह इस शहर के रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. जिसने कविता का रूप ले लिया है. यह फिल्म शहर की वास्तविक चित्रकारी है. साहित्यिक रूप रखते हुए भी सरल भाषा में कही गई कहानी है.
-     कहीं आम व्यवसायिक फिल्मों की तरह सबको खुश करने जौसी कोई बात तो नहीं?
0     मैं अपने आपको एक ऐसा फिल्मकार मानता हूं जो अपने काम को पूरी निष्ठा के साथ करता है. जब टेलीविजन के लिए काम करता था या जब पहली फिल्म बनाई तो एक बात मैंने सीखी कि दर्शकों से सीधा संपर्क स्थापित करना बहुत जरूरी है. खुश करने का जरिया भी एक तरह से दर्शकों से सीधे जुड़ने का जरिया है. इसलिए अगर आप चर्चित तत्वों के सहारे दर्शकों से जुड़ जाते हैं तो आप पूर्ण हैं. एक जेफरी आर्चर का उपन्यास जिसे ज्यादातर लोग समझते हैं और एक बड़े साहित्यिकार की रचना जिसे बहुत कम लोग समझ सकते हैं. उन दोनों को मिलाने की कोशिश की है. मैं जो कुछ भी कह रहा हूं, उसे थिएटर में सामने बौठे दर्शकों से लेकर पीछे बौठे दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है. मेरे लिए यह अलग माध्यम है लोगों से संपर्क स्थापित करने का. मैंने हमेशा माना है कि गाने हमारे फिल्म संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं. सत्यजीत रे ने भी इसे बखूबी साबित किया है. उन्होंने अपनी फिल्मों में भी गाने और नृत्य का अच्छा मेल रखा है. जबकि हमने उसे बहुत बुरा रूप दे रखा है. मतलब ये कि गाने चाहिए तो ठोक दो. जबकि गाना या गाने हमारे फिल्म को एक अलग रूप देते हैं. पिछले साल जब 'जयते' फिल्म फेस्टीवल में थी तो मैंने गौर किया कि विदेशी लोग फिल्म पौनोरमा की फिल्मों को छोड़कर 'कुछ कुछ होता है' देखने ज्यादा जा रहे थे. 'कुछ कुछ होता है' के चार शो थे,पर इसमें खड़े रहने की जगह भी नहीं थी. जबकि फिल्म हिट हो चुकी थी और लोगों ने देखी भी थी. इससे मुझे एहसास हुआ कि हमारी फिल्म संस्कृति विकसित है और यह लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करती है. इस फिल्म ने लोगों को दिल को छुआ था. अगर मैं ऐसी फिल्म बनाऊं जो मुझे ही समझ में आए तो उसका कोई फायदा नहीं. फिल्म अगर लोगों तक पहुंचने का माध्यम है तो यह समझना जरूरी है कि उन तक कैसे पहुंचा जाए.
-     सब तक पहुंचने मेंे एक तरीका हावी होता है. आप एक लड़की और लड़के को दिखाते हैं तो दर्शकों को पता होता है कि आगे क्या होनेवाला है. ज्यादा से ज्यादा आप उनके संवाद बदल सकते हैं. एक तरह का मानकीकरण होता जा रहा है.
0     मैं इसी स्टंैडर्डाइजेशन या मानकीकरण से बचना चाह रहा हूं. वहीं निर्देशक की तौर पर मेरे लिए चुनौती है. दूसरी चुनौती यह है कि मैं अपने आपको दोहराऊं नहीं. और यह भी ध्यान रखना है कि अलग करते हुए भी ऐसा न हो कि दर्शकों को झटका लगे. मैं मणि कौल जौसी फिल्म नहीं बनाऊंगा. राजकपूर, गुरूदत्त से लेकर मनमोहन देसाई तक सबने हमें कुछ न कुछ दिया है. मैं उनकी बातों को अपनी कहानी में जोड़ने की कोशिश करता हूं. मैंने उन्हीं औजारों का इस्तेमाल करके एक नई चित्रकारी की है.
-     पिछले कुछ सालों में कॉमेडी फिल्मों की एक अलग पहचान बन गई है. हमारे समाज में ह्यूमर निहित है, फिर भी हम उसे फिल्मों तक नहीं ला पा रहे हैं.
0     शुरू से लेकर अब तक हमलोगों ने ह्यूमर का एक फॉर्मूला बनाया है. उस हिसाब से ह्यूमर हमेशा लाउड रहा है. किसी की चड्ढी गिर रही है, कोई नंगा भाग रहा है, कोई चिल्ला रहा है. ... ऐसी चीजों को ह्यूमर कहा जाता है. दुर्भाग्यवश हमलोगों में भी ह्यूमर की कमी है. इतनी दुख भरी जिंदगी जीते हैं कि उसमें ह्यूमर को सम्मिलित नहीं कर पाते हैं. हम जब दारू पीते हैं तो जोर से हंसते हैं. यह एक तरह से अपनी परेशानी को कम करने का तरीका है. पर इसे ही ह्यूमर समझा जाता है. और यही हम दिखाते भी हैं. मैंने तो यहां तक सुना है कि दादा कांेडके अपने सहायकों के साथ खूब दारू पीते थे और बाद में टेपरिकार्डर चालू कर देते थे. दारू के नशे में कही गई बातों को फिल्मों में डाल देते थे. हालांकि यह सुनी हुई बात है. पर इसमें सच्चाई लगती है. क्योंकि जब हम आप शराब के नशे में होते हैं. तो ऐसे ही फालतू की बातें करते हैं. सही ह्यूमर को हम देख ही नहीं पाते. हमने कोशिश की है कि इस फिल्म से आपको कॉमेडी और ह्यूमर के बीच का फर्क समझ आए. फिल्म में आप पेट पकड़कर नहीं हंसेंगे. पर आपके चेहरे पर मुस्कान बनी रहेगी. मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे लोग इसे भी अपना लेगें. क्योंकि एक वास्तविक स्थिति में ह्यूमर को कैसे दिखाया जाए ये निर्देशक के लिए भी कठिन होता है और लेखक के लिए भी. इस फिल्म की सबसे बड़ी बात यही है.
-     ह्यूमर को ध्यान में रखते हुए हिंदी फिल्मों में कौन सी ऐसी फिल्में हैं,जिसने आपको प्रेरित किया हो?
0     मैं सिर्फ दो फिल्मों का नाम लूंगा - 'जाने भी दो यारो' और 'अमर अकबर एंथनी'. 'अमर अकबर एंथनी' एक मसाला फिल्म थी पर उसका हास्य समय के परे हैं. हालांकि कहना ठीक नहीं होगा पर मुझे राजकपूर की फिल्मों का हास्य थोपा हुआ लगता है. लेकिन फिल्म को इतनी अच्छी तरह से वे समझते थे कि थोपा हुआ हास्य भी खटकता नहीं था. 'चुपके-चुपके' और 'अंगूर' भी अपने आप में कमाल की फिल्म थी. दोनोें ही फिल्मों में हास्य को एक मुकाम पर दिखाया गया है. 'अंगूर' शेक्सपीयर के नाटक का हिंदी रूपांतर था. पर उसमें इतना मजा आएगा यह मौंने सोचा भी नहीं था.
-     क्या आपको यह नहीं लगता कि आप जोखिम मोल ले रहे हैं?
0     ऐसा कुछ नहीं है. मैं मूलत: एक कहानी कह रहा हूं. हास्य जिसका अभिन्न अंग है. मेरा ध्यान न ही रोमांस पर है, न ही थ्रीलर पर है. मैं न तो हीरो पर फोकस कर रहा हूं , न ही हिरोइन पर. क्योंकि ये परंपरागत हीरो-हिरोइन भी नहीं हैं. ये किरदार की कहानी है. और मेरा पूरा ध्यान कहानी को कहने में है.
-     वो क्या चीजें थीं जिसने आपको व्यवस्थित और सुरक्षित जिंदगी से उठाकर यहां ले आया?
0     मुझे आज तक नहीं मालूम कि मैं कैसे यहां आया हूं. मैंने किसी से विधिवत निर्देशन सीखा भी नहीं है. लेकिन जिस दिन पहली बार एक्शन बोला था सेट पर,मुझे लगा था कि मुझे यहीं होना चाहिए था. कह सकता हूं कि मैं भटका हुआ था और अब अपनी दुनिया में हूं. मुझे हमेशा यही लगता रहा कि ये सारी चीजें तो मुझे मालूम है. फिल्में देखता था लोगों से बातें करता था. फिल्मों की प्रशंसा भी करता था. मुझे किताबें पढ़ने की आदत थी. यहां जब आया तो फिल्मों से संबंधित किताबें पढ़ने लगा. शुरू में मेरे सिर के ऊपर से चीजें गुजर जाती थी. सौभाग्यवश यहां जो मेरे मित्र बने उन्होंने मुझे बताया कि मुझे क्या पढ़ना चाहिए. मैं उनसे किताबें लेता था पढ़ता था. पर फिर भी कुछ समझ में नहीं आता था. 'तारकोवस्की' कौन था, मुझे मालूम भी नहीं था. उसकी बातें भी समझ में नहीं आती थी. पर जब सेट पर काम करता था तो मुझे लगता कि मैं सब ठीक कर रहा हूं. धीरे-धीरे काम करते-करते ही विकसित हुआ हूं. पर कह नहीं सकता कि मैं यहां कैसे आया. मेरे उस जिंदगी के दोस्त और परिवार वालोंें ने इस बदलाव के लिए मुझे माफ नहीं किया अभी तक.
-     अभिव्यक्ति के किसी और माध्यम से आप पहले जुड़े हुए थे क्या?
0     नहीं, बिल्कुल नहीं. मुझे सिर्फ एक शौक था कहानी लिखने का. मैं छोटी-छोटी कहानियां लिखता था. मेरे अंदर एक कला थी चीजों को शब्दों में ढालने की. अंग्रेजी में जो कहानियां लिखता था,उससे लोग बहुत प्रभावित होते थे. मैंने अंग्रेजी में कविताएं भी लिखने की कोशिश की थी जिसे आज देखकर बहुत शर्म आती है.मैंने कुछ वर्ष तक शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश की थी. उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान से. लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के चक्कर में वह भी पूरा नहीं कर पाया. लेकिन जब कभी भी फिल्म देखता था तो मुझे लगता था कि मैं गलत जगह बौठा हूं. अपनी दुनिया से दूर. मैं आज भी असुरक्षित हूं, क्योंकि टेलीविजन में काम करके भी मैंने आर्थिक रूप से अपने आपको सुरक्षित नहीं किया है. लेकिन रचनात्मक तौर पर मैं सुरक्षित महसूस करता हूं. मैं खुश हूं. मैं आज भी अपने पुराने कामों को देखकर भावुक हो जाता हूं.
-     ऐसा कौन सा पड़ाव था,जहां आपने फैसला कर लिया कि अब आपको फिल्मी दुनिया में आ ही जाना है? कोई ऐसी घटना या खास बात?
0     मेरी निजी जिंदगी में एक ऐसा दर्दनाक मोड़ आया था,जिसकी वजह से मैं बाहर पढ़ने चला गया था.वहां टेलीविजन के लिए काम किया और बाकी समय में शादी-ब्याह की शूटिंग करता था. मैंने छोटे-छोटे कदम बढ़ाने शुरू कर दिए थे. मैं अपने मां-बाप से बहुत ज्यादा जुड़ा हुआ था. एक वक्त ऐसा आया जब मुझे लगा कि मैं ऐसा करके उन्हें कष्ट दे रहा हूं. एक जिम्मेवारी का भी एहसास हुआ कि वहां वेे अकेले हैं और यहां मैं फकीरों की जिंदगी जी रहा हूं. जिम्मेवारी के एहसास तले मैंने फैसला किया कि कम्प्यूटर की जिंदगी फिर से शुरू करनी होगी. पर जब यहां आया तो जीटीवी जौसे चौनल आ चुके थे. मैंने बहुत छोटे से कार्यक्रम'खाना-खजाना'से अपनी शुरूआत की. मैंने उस वक्त भी नहीं सोचा था कि मैं एक दिन फिल्म करूंगा. उस दौरान किसी ने सुझाया कि मैं म्यूजिक वीडियो करूं . मैं शायद पहला व्यक्ति था,जिसने म्यूजिक वीडियो बनाया था. हालांकि वह दिखाया नहीं गया. फिर 'यूल लवस्टोरी' आई. लोगों ने काफी प्रशंसा की. इस तरह मैं धीरे-धीरे ऊपर उठता रहा और अपनी महत्वाकांक्षाओं को उसी अनुपात में बढ़ाता रहा.
-     अब जब आ गए हैं. आप किसकी तरह बनना चाहेंगे या कैसी फिल्में करना चाहेंगे?
0     मैं किसी का शिष्य बनना नहीं चाहूंगा. वौसे जब मैं इस इंडस्ट्री में नहीं था,तब भी मुझे गुरूदत्त, गुलजार साहब, महेश भट्ट जौसे लोगों ने प्रेरणा दी है. गुरूदत्त साहब की फिल्मों ने मेरी जिंदगी को झकझोर दिया था. और इस वजह से भी मैं मुंबई से भाग गया. जब बाहर था तो गुलजार साहब की फिल्में वीडियो पर देखता था. उन्होंने मुझे संबंधों को जीना सिखाया है. 'सारांश' ने मुझे जिंदगी का मकसद दिया है. मैं इन सबसे प्रेरित होता रहा हूं, पर प्रभावित किसी से नहीं हुआ. एक पोलिस फिल्मकार हैं किसलोस्की .. उनकी फिल्मों ने भी मुझे वौसे ही छुआ है, प्रेरित किया है.म्ैंने उनकी फिल्म ब्लू कई बार देखी है.
-     कभी ऐसा लगा कि अगर आप सीखकर आए होते इस इडस्ट्री में तो कहीं और से शुरूआत की होती आप ने?
0     नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता. यदि सीख कर आया होता तो फिर मैं ऐसा नहीं होता,जौसा हूं. मेरे काम में एक अलग तरह की ताजगी है, एक मासूमियत है. मेरे काम में जो मासूमियत है उसने मुझे अलग पहचान दी है. और मैं कह सकता हूं कि मुझे दूसरी जिंदगी नहीं चाहिए. जिस तरह की जिंदगी जी रहा हूं,उससे मैं बहुत ज्यादा खुश हूं.
-     किसी फिल्मकार ने कहा था कि हर निर्देशक को अपना विषय खुद चुनना चाहिए. आप क्या सोचते हैं?
0     इससे जुड़ी और भी बात होती है ---- जब कोई निर्देशक बाहर के लेखक के साथ काम करता है तो वह विषय उसका हो जाता है. विजय आनंद ने आर. के. नारायण की 'गाइड' को अपने अंदाज में बनाया. उसी तरह मैं भी अपने आपको मानता हूं. अगर मेरी कहानी है तो अच्छी बात है. अगर किसी और कि कहानी पर मैं फिल्म बनाऊं तो यह यकीनन वह मेरी कहानी बन जाती है. वह हम सब की कहानी बन जाती है. मेरी या उसकी नहीं रह जाती. कोरोसावा ने यहां तक कहा था कि एक निर्देशक को लेखक होना बहुत जरूरी है. पटकथा उसे स्वयंं लिखनी चाहिए. इसलिए निर्देशन बहुत सारे आयामों को इकट्ठा करने का भी नाम है. बिल गेट्स ने विंडोज नहीं बनाया था. उसने हूनर को परखकर उसको एक अभिव्यक्ति की दिशा दे दी थी. वहे लोगों तक पहुंचा. निर्देशक का काम भी ऐसा ही होता है. अलग-अलग कलाओं को एक साथ लाकर उन्हें एक दिशा देना यह काम है निर्देशक का. फिल्मकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. मेरा इसमें भरपूर विश्वास है.
-     सत्यजीत राय ने अपनी बाद की फिल्मोें में सारा काम ख्ुद किया. फिल्म से जुड़े जितने भी विभाग हैं, कैमरा, संगीत, संकलन .. सब कुछ ख्ुद किया. लगभग सारे बड़े निर्देशक के साथ रहा है. ऐसा कितना जरूरी है?
-     मेरा मानना है कि तकनीकी बातों को समझना बहुत जरूरी है. उसमें पटकथा भी है. इसलिए फिल्म के हर भाग को जानना और उसकी बारीकी को समझना बहुत जरूरी है. मैं जब किताबें प़ढ़ता हूं तो निर्देशन से संबंधित कम पढ़ता हूं. सिनेमेटोग्राफी की किताबें ज्यादा पढ़ता हूं. उसके मौेनुअल से सारी चीजें एकत्रित करता हूं.नई मशीन आती है, उसके विषय में पढ़ता हूं. इसलिए मैं हमेशा पूरी तरह से तौयार रहता हूं. मैंने सबसे पहले संपादक(एडीटर) के रूप में काम की शुरूआत की थी. हालांकि मौं झूठ बोला था कि मौं संपादक था,क्योंकि मैं वहां शादी के वीडियो शूट करके ही देता था. फिर भी मुझे संपादन का काम मिलने लगा और मैं उसमें रमता गया. चूंकि इंजीनियर्रिग की पढ़ाई की थी. इसलिए मशीनों से लगाव है. एक बच्चे सा उत्साह मन में उठता है,जब भी नई मशीन देखत हूं.
-     मैंने यह सवाल इसलिए किया कि जौसे-जौसे सत्यजित राय सारा विभाग खुद देखने लगे, वौसे-वौसे उनकी फिल्में कमजोर होती गई. इसलिए लगता है कि यह बहुत जरूरी नहीं है.
0     बिल्कुल सही. एक समय के बाद फिल्मकार का अहम् उससे ज्यादा बड़ा हो जाता है. दिक्कत तकनीक की नहीं है, अहम् की है. उसे लगने लगता है कि सारी चीजें वह खुद ही कर सकता है. अगर ऐसा होता तो आप ही दर्शक भी होते. अगर आप सब कुछ कर सकते हैं तो फिल्म भी देखिए. वास्तविक्ता खत्म हो जाती है और काम में नयापन नहीं रह जाता. मैं जानता हूं कि लाइट कहां रखनी है. पर मैं अपने कैमरामौेन से कभी नहीं कहता. हो सकता है कि वह लाइट कहीं और रखे और मुझे कुछ नया सीखने को मिल जाए. आधी जानकारी खतरनाक होती है. वौसे कैमरा के विषय में मेरी जानकारी को देखते हुए विशाल भारद्वाज ने कहा था कि जब वह काम शुरू करेगा तो मैं कैमरामौन रहूंगा. मैंने उससे कहा था कि काम मत बिगाड़ो,क्योंकि मैं अपने काम से और पढ़-पढ़कर सीखता हूं.
-     सिनेमा की जो स्थिति है, उसे आप किस रूप में देखते हैं? दो-तीन चीजें एकदम साफ दिख रही है.हिंदी फिल्मों के अंतर्राष्ट्रीय बाजार की खेाज चल रही है,इस खेाज में  बड़े मेकर भी शामिल हैं, दूसरी तरफ एक अलग दर्शक है जो कि 'जानवर' और 'जंगल' जौसी फिल्मों को पसंद करता है. कहीं-कहीं बहुत बड़ा दर्शक 'डाकू हसीना' फिल्म को पसंद कर रहा है. इन सबको लेकर एक फिल्मकार के लिए कितनी चुनौती है? कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकते हैं?
0     मेरे लिए एक चीज बहुत जरूरी है.स्पष्ट संकेत मिल रहा है. दो सालों में दर्शकों की संवेदनशीलता नहीं बदलती.हमने उनकी संवेदनशीलता को बहुत आहत किया है. बहुत चोट पहुंचाई है. अब वो दिन नहीं रहे. मतलब हमारे दर्शक चीजों को समझने लगे हैं.े हैं. 'डाकू हसीना' देखनेवाले दर्शकोें का प्रतिशत बहुत कम है. जिसकों हम एक्सपोर्ट या एनआरआई ओरियेंटेड फिल्म बोल रहे हैं, वो यहां भी अच्छी चल रही है. इसलिए चल रही है कि उसमें संवेदना नाम की चीज है.'कुछ कुछ होता है' मेरे लिए आधुनिक परिदृश्य की महत्त्वपूर्ण फिल्म हैै. 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' 'कुछ कुछ होता है' से  बहुत ज्यादा आधुनिक परिदृश्य की प्रतिनिधि फिल्म है.वह आज की क्लासिक फिल्म है.मैं मानता हूं कि इस फिल्म में हमारी संस्कृति का सही प्रतिनिधित्व हुआ है. मैं इसे लौंडमार्क फिल्म मानता हूं . हमारे पारिवारिक सबंध,मां-बेटी के संबंध, रोमांस, हमारे मूल्यों को किस प्रकार अच्छी तरह कहानी में नौरेट किया जाता है, मेरे लिए 'दिलवाले दुलहनिया जाएंगे' उसका एक प्राइम उदाहरण है.और वह बदलती संवेदना की शुरूआत थी. . 'हम आपके कौन!' 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' हमारी बदलती संवेदना के परिचायक हैं. 'कुछ कुछ होता है' उसी चीज को ज्यादा विज्ञापित करते हुए.. .. च्यूंगगम,लॉली पॉप, पेप्सी जेनरेशन- जेनरेशन नेक्स्ट को लेकर ,उनके वौल्यू सिस्टम को लेकर एक कहानी दे दी. लेकिन समस्या क्या है हमारी फिल्म इंडस्ट्री में  कि हम हर सफल चीज को एक फामर््ाूला बना लेते हैं. हम सोचते हैं कि यही है सफलता का फार्मूला. और हर हफ्ते सफलता का नया फार्मूला बनता है और अगले हफ्ते वह टूटता है. तो मेरा सवाल ये है कि फार्मूला क्यों बनाते हो? आप फिल्में बनाइए.अपनी संवेदना को प्रोजेक्ट करते हुए फिल्म बनाइए.जिन चीजों में विश्वास करते हैं, उनको फिल्मों में ढालिए और फिर लोगों को फैसला करने दीजिए कि वह सही है या नहीं है. ईमानदारी से फिल्में बनाइए. फार्मूला का अनुसरण मत करिए. मेरी यह लड़ाई जबसे मैं टेलीविजन में हूं, तब से है. टेलीविजन में भी एक फार्मूला हो गया है. मतलब फार्मूला ड्राइविंग बहुत ज्यादा है. हॉलीवूड में ये बीमारी एक हद तक है लेकिन उनमें जब आप ग्रीन मौन जौसी फिल्में देखते हैं. तो आपको लगता है कि नहीं उम्मीद है. मतलब वेे पूरी तरह से फार्मूला में नहीं घुस गए हैं. हर साल एक फार्मूला टाइप फिल्म आती है और तीन-चार ऐसी फिल्में आती हैं,जो आपको उत्साहित करती है कि हम ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनाते हैं. अभी एक फिल्म आई थी सिगरेट लॉबी पर क्या नाम था उसका ... तो हमलोग काफी फार्मूलाबाज हैं. दो साल से यह मिथ टूटता जा रहा कि फार्मूला फिल्म नहीं चलती है. फार्मूला मत बनाओ, फिल्में बनाओ. कोई भी फार्मूला नहीं चलता है. 'दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे' चलना चाहिए. लोगों ने कहा कि डेविड धवन की जो ब्रांड है,,वह कॉमेडी है वो एक तरह की फिल्में बनाता है. अब उनकी 'दीवाना मस्ताना' के बाद कौन सी फिल्में इतनी चली है. आप मुझे बताइए. फार्मूला से दूर हटना पड़ेगा. मेरे लिए संकेत ये है कि फार्मूला से दूर हटो. 'डाकू हसीना'.. हॉरर और सेक्स जो बना रहे उनको भी हमारी सुझाव है कि आप अपना फार्मूला चेंज करो नहीं तो जौसे मिथुन दा की फिल्में एक साल चली थी, अभी वे गायब हो गए. उसी तरह से 'डाकू हसीना' का फार्मूला भी बंद हो जाएगा. हर सेक्सन के लिए फार्मूला बना के रखे हैं वो. थोड़ा दिन तक चलेगा, फिर अपने आप बंद हो जाएगा.
-     तब्बू के बारे में क्या कहना है? तब्बू का रोल और तब्बू का अपना परफार्मेंस और तब्बू कैसी अभिनेत्री हैा?
0 मौ माचिस से जुड़ा हुआ था. माचिस का ट्रेलर और प्रोमो बनाया था. आर बी पंडित और गुलजार साहब के वजह से मैं माचिस के साथ बड़े नजदीक से साथ जुड़ा हुआ था. मैं तब्बू को जानता नहीं था तब, लेकिन मैं तब्बू के काम से बहुत प्रभावित हुआ था. मुझे लगा कि इस अभिनेत्री के साथ काम करना चाहिए. बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ था. मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी अच्छी अभिनेत्री इस पीढ़ी में है. इस फिल्म में कामिया का जो चरित्र बन रहा था.मुझे लगा कि इस देश में और कोई अभिनेत्री इस चरित्र को नहीं समझ पाएगी. समझने के बाद उसे अभिनीत करने के लिए भी प्रतिभा चाहिए. उसके लिए एक समझदारी भी चाहिए. आम फिल्मों में हिरोइन की जो धारणा है यह वौसी हिरोइन नहीं है. तब्बू ने इस चरित्र को कमाल तरीके से निभाया है. इस भूमिका को समझा है. मैंने  अभिनय के जिस स्तर के उम्मीद भी नहीं की थी वह किया है.पता नहीं इस फिल्म के लिए उसे अवार्ड मिले या न मिले लेकिन उसने साबित किया है कि वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अभिनेत्री है. एक जमाने में  शबाना आजमी थीं. गॉडमदर से पहले. तब्बू उस स्तर की अभिनेत्री है. वह किसी भी फिल्ममेकर के लिए स्वपन है. मेरे लिए खुशी की बात यह है कि तब्बू न केवल एक अच्छी अभिनेत्री है बल्कि बेहतर इंसान भी है. उसके साथ काम करना बड़ा आसान है. सेट पर कोई तकलीफ नहीं देती है अपने काम के प्रति समर्पित है. सबसे घुलमिल कर काम करती है. मेरे लिए एक अच्छी दोस्ती की शुरूआत भी है. यह मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरे टीम में न केवल एक अच्छी अभिनेत्री मिल गई बल्कि एक दोस्त भी मिल गई.
-     मनोज के बारे में बताएं?
0     हमदोनों एक-दूसरे को सात सालों से जानते हैं. हमदोनों ने बुरे दिन देखे हैैं. मनोज के पास काम नहीं था , मेरे पास भी काम नहीं था. मैं 'खाना खजाना' करता था. मनोज उसकी शूटिंग पर आता था खाना खाता था, बौठा रहता था और चला जाता था. हमलोगों ने साथ में बहुत बुरे दिन देखे हैं. एक-दूसरे को पौसे दिए हैं. एक-दूसरे के कपड़े पहने हैं. मेरे कपड़े बड़े होते थे लेकिन वह पहनकर चला जाता था. हमारा ऐसा रिस्ता बना था. हमने सोचा था कि कभी साथ में फिल्म बनाएंगे. हम सपने देखते थे. हर महत्वाकांक्षा आदमी सपना देखता है. हमारे सपने पूरे हो रहे हैं इस फिल्म से. ऐसा नहीं है कि इस फिल्म के लिए मनोज को अलग से लिया कि वह स्टार है. उसके स्टार होने के वजह से ही यह फिल्म बनी है. मनोज के स्टार होने से इसकी मांग बढ़ी है. मैं रामगोपाल वर्मा का आभारी हूं. उन्होंने एक अच्छे अभिनेता को बाजार में बिकने लायक बना दिया. इसकी  वजह से दो दोस्त साथ में फिल्म बना सके. मेरे लिए मनोज के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था. अपनी पीढ़ी में मनोज से अच्छा अभिनेता इस देश में नहीं है. होगा तो कहीं कोने में छिपा होगा. आज की तारीख में मनोज में सारे अभिनेताओं की खूबियां शामिल हैं. मनोज बाहर और भीतर दोनों तरफ से तौयारी करता है. वह चरित्र को व्याखायित करता है. वह सिनेमा के व्याकरण को अच्छी तरह समझ गया है. 'सत्या' के बाद वह सिनेमा का एक्टर हो गया है. सिनेमा के कला और शिल्प दोनों को उसने खूबसूरती से मिला लिया है.
-     फिल्म के संगीत के बारे मेें बताएं?
0     विशाल भी उन्हीं दिनों का मेरा दोस्त है. जब वह 'माचिस' का संगीत तौयार कर रहा था तब मैं उसके साथ था. एक छोटे से कमरे में बौठकर वे संगीत तौयार करते थे. मैं भी उसका हिस्सा था. संगीत तौयार करने के बाद वे मुझे सुनाते थे. गुलजार साहब को सुनाने के पहले तीसरे आदमी के तौर पर मेरी राय लेते थे. विशाल जहां संगीत रचना करते थे वह जगह बहुत दूर थी. तब उनकी पत्त्नी रेखा गर्भवती थी. तब विशाल के पास गाड़ी नहीं थी. मैं ड्राइवर की तरह उसे छोड़ने जाता था और लाने जाता था. हमारे भावनात्मक संबंध रहे हैं. उस समय विशाल के पास स्टिरियो सिस्टम नहीं था. दो गाने तौयार हो गए थे 'छोड़ आए हम वो गलियां' और चपा-चपा. निर्देशकों को उन गीतों को सुनाने के लिए मैं अपना स्टियरियो सिस्टम लेकर विशाल के म्यूजिक रूम में जाता था. यह तो तय ही था कि इस फिल्म का संगीत विशाल ही देगा. विशाल के संगीत के प्रति मेरे मन में आदर भी है. कई बातों पर हमलोगों की असहमति है, लेकिन वह अपने विश्वास पर टिका रहता है. जिद्दी है वह. उसकी जिद से लोगों को तकलीफ भी होती है. लेकिन मुझे इस बात का फकर है कि विशाल अपने विश्वास को लेकर हिलता नहीं है. उसके लिए वह लड़ भी लेता है. ऐसा संबंध मेरे लिए सृजनात्मक रूप से आदर्श है.
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0     इस फिल्म का संगीत विशाल के कैरिअर को नई दिशा देगा. 'माचिस' के बाद अगर विशाल ने किसी कमर्शियल फिल्म का संगीत दिया है तो वह इसी में है. इस फिल्म के गानों को जब भी मैं किसी को सुनाता हूं, हर आदमी एक नई पसंद लेकर आता है. अब मैं ऐसा भम्रित हो गया हूं कि अपनी पसंद तय नहीं कर पा रहा हूं. उसका मतलब यह है कि उसने सबकी पसंद का संगीत तौयार किया है. इस फिल्म का संगीत अगर लोकप्रिय हुआ तो बतौर संगीतकार विशाल के कैरिअर में एक नया मोड़ होगा.
-     फिल्म के गीत
0     गुलजार साहब के साथ काम करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. जिन्हें आप भगवान मानते हैं उनके साथ काम करना या उनके साथ लड़ना मुश्किल होता है. मैं इस चीज से कतराता हूं. मैं गुलजार साहब से कैसे कह सकता हूं कि कुछ गलत जा रहा है. मुझे डर लगता है. गुलजार साहब से मिलता हूं तो मेरी आवाज नहीं निकलती है. मेरी बोलती बंद हो जाती है. हालांकि एक सपना भी है उनके साथ काम करना. इस फिल्म में अलग गीत चाहिए था क्योंकि संगीत फिल्म का हिस्सा है. हमने कई संगीतकारों के साथ काम करने की कोशिश की. इस फिल्म को देखते हुए कुछ पता ही नहीं चलता कि गाने कब चले गए. हमेशा गाने फिल्म के कहानी को आगे ले जाते हैं. एक नया मोड़ देते हैं. इस फिल्म के गीतों के लिए कहानी और गीत के प्रसंग को समझना बहुत जरूरी है. विशाल अब्बास टायरवाला को लेकर आए. उसने पहला गाना लिखा तो मैंने कहा कि कहां थे अभी तक. उसका पहला गीत था 'चल पड़ी' मेरे लिए वह खोज के समान था. अब्बास को मैं इस फिल्म का अतिरिक्त लेखक मानता हूं. उसके गाने फिल्म के हिस्से हैं.
-     टॉकिंग पिक्चर्स
0     टॉकिंग पिक्चर्स हमने एक जरूरत के तौर पर स्थापित किया. यह फिल्म कोई और नहीं बना सकता था. दोस्तों ने मिलकर यह कंपनी शुरू की. हमलोग समान उद्देश्य से प्रेरित हैं. हम अच्छे लोगों के साथ अच्छी फिल्में बनाना चाहते हैं. हम अपनी फिल्मों में कुछ कहना चाहते हैं. हम फार्मूला फिल्मों के बीच अपनी फिल्में बनाना चाहते हैं और उस सफल भी देखना चाहते हैं. आजकल फिल्म बनाने के साथ-साथ उसकी मार्केटिंग, उसका प्रचार पूरी पेकेजिंग पर ध्यान देना पड़ता है. एक खास दृष्टि से हमलोग काम कर रहे हैं. 'दिल पे मत ले यार' सफल हो या न हो हमलोग इसी तरह से फिल्में बनाते रहेंगे.
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अजय तुली स्कूल में मेरे साथ थे. मैं जब से इस इंडस्ट्री में हूं तब से वह मेरा समर्थक और प्रशंसक रहा है. हमेशा मेरे साथ रहा है. हमेशा मेरी मदद करता रहा है. मेरे ऊपर उसका विश्वास था. अनीश से मैं मनोज बाजपेयी के जरिए मिला. हमलोग समान सोच के हैं. कभी-कभी अनीश की सोच समझ में नहीं आती. वह अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं. हमलोग शहरी होने के कारण इन चीजों से हमेशा दूर रहे हैं. हमें अपने जड़ों के बारे में अधिक पता नहीं है. हमें थोड़ा पता है. अजय को बिल्कुल पता नहीं है. अनीश ने आकर हमें संतुलित कर दिया. उसने मिट्टी और सोना में फर्क बताया. अनीश हमारे लिए पिता के समान है. हालांकि उनकी उम्र हमसे ज्यादा नहीं है.
-     नई योजनाएं?
0     नई योजनाओं पर अभी चर्चा करना जल्दबाजी होगी. इसके बाद हमलोग 'नेटुआ' बना रहे हैं. उसके बाद एक फिल्म सौरभ शुक्ला निर्देशित करेंगे. 'डाकू' इस साल के अंत तक दोनों शुरू हो जाएंगे. कनिका और विक्रम तुली हमारे लिए फिल्म निर्देशित करेंगे. हम फिल्म से पौसे कमाकर फिल्मों में डालनेवाले हैं. साल में चार-पांच अच्छी फिल्में बनाने की योजना है.
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आदित्य श्रीवास्तव का जिक्र मैं नहीं कर पाया वे इस फिल्म में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. वे उत्प्रेरक हैं. वह रामसरन के सपनों का उत्प्रेरक हैं. वह उसके पतन का भी कारण बनता है. आदित्य श्रीवास्तव ने हम सबको चौका दिया. उसे लोगों ने अभी तक 'सत्या' में इंस्पेक्टर खाडिलकर के रूप में देखा है. इस फिल्म के बाद उसे बहुत सारी फिल्में मिली. लेकिन सभी में पुलिस इंस्पेक्टर का ही रोल था. उसने सबको मना किया. इस फिल्म के जरिए लोगों को पता चलेगा कि आप अभिनेता को कभी इमेज में नहीं बांध सकते हैं. मेरे लिए वह फिल्म की खास बात है. सौरभ को भी देखकर आप चौकेंगे. मैं मानता हूं कि सौरभ अंतर्राष्टीय स्तर का अभिनेता है. वह भारत का डैनी दवितो है. और मनोज रॉवर्ट डिनोरा है. किशोर कदम मेरे पुराने प्रिय अभिनेता हैं. 'जयते' में मैंने उन्हें रखा था. परेश रावल की भूमिका मैंने उसे सौंपी थी. किशोर ने कभी कहा भी जो लोग मुझे वर्षो से जानते हैं उन्होंने कभी काम नहीं दिया. हंसल मुझे नहीं जानता मगर उसने हमेशा काम दिया. हमारे संबंध बन गए हैं. मेरे लिए किशोर ऐसी प्रतिभा है जिसका अभी उपयोग नहीं हुआ है. मैं उसे यही कहता हूं कि तुम शिक्षित अभिनेता हो लेकिन यह शिक्षा पर्दे पर नहीं दिखना चाहिए. वह कोशिश कर रहा है. किशोर कदम को कला फिल्मों का अभिनेता माना जाता है. उसने 'समर' किया उसने 'कल का आदमी' किया. इस फिल्म में वह इस छवि को तोड़ेगा.
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बाहर की फिल्मों की बातें चल रही है. अगर निर्देशक के तौर पर मुझे विकास करना है तो सिर्फ अपनी कंपनी के काम नहीं कर सकता. मुझे बाहर का काम करना होगा.














Thursday, April 17, 2014

राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों में युवा प्रतिभाएं छाईं

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
फिल्मों के नेशनल अवार्ड के लिए इस साल ‘शाहिद’, ‘जॉली एलएलबी’, ‘थिप ऑफ थीसियस’ और ‘काफल’ के साथ ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘धूम 3’ ‘कृष 3’ जैसी फिल्में भी विचारार्थ थीं। सईद अख्तर मिर्जा के नेतृत्व में गठित निर्णायक मंडल ने हिंदी फिल्मों की उपधारा की फिल्मों को गुणवत्ता और कलात्मकता की दृष्टि से पुरस्कारों के योग्य समझा। यही वजह है कि ‘शाहिद’,‘जॉली एल एल बी’ और  ‘शिप ऑफ थिसियस’ और को दो-दो पुरस्कार मिले। पुरस्कारों की भीड़ में आज भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म फेस्टिवल निदेशालय के अधीन जरी नेशनल अवार्ड का महत्व बना हुआ है। देश भर के फिल्म कलारों और तकनीशियनों को इसकी प्रतीक्षा रहती है। इस बार युवा और योग्य फिल्मकारों, कलाकारों और तकनीशियनों को पुरस्कृत किया है।
    सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए पुरस्कृत ‘शाहिद’ के निर्देशक हंसल मेहता अपने पुरस्कार का श्रेय शाहिद आजमी को देते हैं। वे कहते हैं, ‘शाहिद आजमी के दृढ़ संघर्ष और जीवट ने मुझे इस फिल्म के लिए प्रेरित किया। भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे सामाजिक और सरकारी अत्याचार में शाहिद निहत्थे आरोपियों के साथ खड़े रहे। इसी के लिए उनकी जान गई। मैं यह पुरस्कार उनकी लड़ाई और यादों को समर्पित करता हूं। मेरे लिए अतिरिक्त खुशी की बात यह है कि मुझे उसी साल निर्देशन का पुरस्कार मिल रहा है, जिस साल मेरे गुरू और पथ निर्देशक गुलजार को दादा साहेब फालके पुरस्कार मिल रहा है। मैं उनके पांव छू कर पुरस्कार ग्रहण करने जाऊंगा।’ ‘शाहिद’ क लिए राजकुमार राव को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है। वे यह पुरस्कार मलयाली फिल्म ‘पेरारियत्वर’  के अभिनेता सूरज वंजारा मूडु के साथ शेयर करेंगे। राजकुमार राव ‘शाहिद’ की भूमिका के लिए पहले ही प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुके हैं। नेशनल अवार्ड मिलने की खुशी जाहिर करते हुए वे कहते हैं, ‘मैं हंसल का शुक्रगुजार हूं। उन्होंने मुझे शाहिद आजमी की बायोपिक में मुख्य किरदार निभाने का मौका दिया। पुरस्कार तो सभी की तरह मैं भी चाहता हूं, लेकिन मैंने इसकी अपेक्षा नहीं की थी। यही कहूंगा कि काम के प्रति ईमानदारी बनी रहे। मैं कभी बेईमानी ना करूं। मैंने पुरस्कार की सूचना सबसे पहले ‘डॉली के डॉली’ के निर्माता अरबाज खान और निर्देशक अभिषेक डोगरा को दी। परिवार में मां और बहनों से बातें हुईं।’
    इस साल सुभाष कपूर की व्यंग्यात्मक फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित हुई। इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता का पुरस्कार सौरभ शुक्ला को मिला है। सौरभ कहते हैं, ‘यह मेरा पहला नेशनल अवार्ड है। इसकी अलग महत्ता है। मुझे खुद से ज्यादा खुशी ‘जॉली एलएलबी’ के लिए है। उसे हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड मिला है। ‘जॉली एलएलबी’ के निर्देशक सुभाष कपूर अभी ‘गुड्डू रंगीला’ की शूटिंग कर रहे हैं। फोन पर वे बताते हैं। ‘मैं अपनी टीम और निर्माता के लिए खुश हूं। उन्होंने मुझ पर भरोसा किया और ऐसी फिल्म में मदद की। अच्छी बात है कि मेरी फिल्म को दर्शकों ने भी सराहा और अब यह फिल्म पुरस्कृत हो रही है। मेरा जोश और विश्वास बढ़ गया है।’
    नेशनल फिल्म अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का पुरस्कार राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘भाग मिल्खा भाग’ को मिला है। सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म बतुल मुख्तियार की ‘काफल’ है, जिसका निर्माण चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी ने किया है। हिंदी में बनी कमल स्वरूप की ‘रंगभूमि’ को सर्वश्रेष्ठ गैरफीचर फिल्म का पुरस्कार मिला। इस फिल्म में दादा साहेब फालके के जीवन के संघर्ष और विजय का चित्रण है। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार ‘लायर्स डाइस’ की गीतांजलि थापा को मिला है।
    पुरस्कारों की सूची से यह भान होता है कि निर्णायक मंडल ने सभी भाषाओं में नई प्रतिभाओं की फिल्मों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने भारतीय सिनेमा में कथ्य और शिल्प में हो रहे परिवत्र्तनों को महत्व देते हुए दिग्गजों की मुख्यधारा की फिल्मों को दरकिनार किया। फिर भी ‘द लंचबॉक्स’ को किसी पुरस्कार के योग्य न समझना असमंजस पैदा करता है। यह फिल्म देश-विदेश में दर्शकों और समीक्षकों द्वारा अत्यंत सराही गई।

Saturday, October 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : शाहिद

गैरमामूली शख्सियत का सच
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाहिद सच्ची कहानी है शाहिद आजमी की। शाहिद आजमी ने मुंबई में गुजर-बसर की। किशोरावस्था में सांप्रदायिक दंगे के भुक्तभोगी रहे शाहिद ने किसी भटके किशोर की तरह आतंकवाद की राह ली, लेकिन सच्चाई से वाकिफ होने पर वह लौटा। फिर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और जेल में डाल दिया। सालों की सजा में शाहिद ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। बाहर निकलने पर वकालत की पढ़ाई की। और फिर उन बेकसूर मजलूमों के मुकदमे लड़े, जो सत्ता और समाज के कानूनी शिकंजे में लाचार जकड़े थे।
शाहिद ने ताजिंदगी बेखौफ उनकी वकालत की और उन्‍हें आजाद आम जिंदगी दिलाने में उनकी मदद की। शाहिद की यह हरकत समाज के कुछ व्यक्तियों को नागवार गुजरी। उन्होंने उसे चेतावनी दी। वह फिर भी नहीं डरा तो आखिरकार उसके दफ्तर में ही उसे गोली मार दी। हंसल मेहता की फिल्म 'शाहिद' यहीं से आंरभ होती है और उसकी मामूली जिंदगी में लौट कर एक गैरमामूली कहानी कहती है।
'शाहिद' हंसल मेहता की साहसिक क्रिएटिव कोशिश है। अमूमन ऐसे व्यक्तियों पर दो-चार खबरों के अलावा कोई गौर नहीं करता। इनकी लड़ाई, जीत और मौत नजरअंदाज कर दी जाती है। गुमनाम रह जाती है। भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया और समझ जारी रहने की वजह से ही ऐसा होता है।
'शाहिद' में एक संवाद है कि सिर्फ अपने नाम और मजहब की वजह से फहीम जेल में है। अगर उसका नाम सुरेश, जैकब या कुछ और होता तो उस पर शक नहीं किया जाता। देश की यह अफसोसनाक सच्चाई है कि विभाजन के बाद से हिंदू-मुसलमान समुदाय के बीच ठोस सद्भाव कायम नहीं हो सका। ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर में हुए दंगे हैं। इस पृष्ठभूमि में 'शाहिद' सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती। यह समुदाय, समाज और देश की कहानी बन जाती है।
हिंदी फिल्मों के नायक मुसलमान नहीं होते। यह भी एक कड़वी सच्चाई है। हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं। उनमें मुसलमान किरदार भी होते हैं, लेकिन उन्हें ज्यादातर निगेटिव शेड्स में दिखाया जाता है। दशकों पहले मुस्लिम सोशल बनते थे, जिनमें पतनशील नवाबी माहौल का नॉस्टेलजिक चित्रण होता था। तहजीब, इत्र, शायरी, बुर्के और पर्दे की बातें होती थीं। उन फिल्मों में भी मुस्लिम समाज की सोशल रिएलिटी नहीं दिखती थी। सालों पहले 'गर्म हवा' में विभाजन के बाद भारत से नहीं गए एक मुसलमान परिवार की व्यथा को एम एस सथ्यू ने सही ढंग से पेश किया था। संदर्भ और स्थितियां बदल गई हैं, लेकिन सोच और समझ में अधिक बदलाव नहीं आया। 'शाहिद' एक अर्थ में कमोबेश 'गर्म हवा' की परंपरा की फिल्म है।
सीमित बजट और संसाधनों से बनी 'शाहिद' कोई मसाला फिल्म नहीं है। तकनीकी गुणवत्ता की भी कमियां दिख सकती हैं, लेकिन मानवीय मूल्यों के लिहाज से यह उल्लेखनीय फिल्म है। विषम परिस्थितियों में एक व्यक्ति के संघर्ष और जीत को बयान करती यह फिल्म हमारे समय का पश्चाताप है। हंसल मेहता ने इसे अतिनाटकीय नहीं होने दिया है। वे दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उन्होंने शाहिद को मजबूर और बेचारे युवक के तौर पर नहीं पेश किया है। साधारण परिवार का सिंपल युवक शाहिद जिंदगी के कुछ संवेदनशील मोड़ों से गुजरने के बाद एक समझदार फैसला करता है। वह वंचितों के हक में खड़ा होता है और इस जिद में मारा भी जाता है।
राज कुमार फिल्म की शीर्षक भूमिका में हैं। उन्होंने शाहिद के डर, खौफ, संघर्ष, जिद और जीत को बखूबी व्यक्त किया है। वे हर भाव के दृश्यों में नैचुरल लगते हैं। फिल्म की कास्टिंग जबरदस्त है। शाहिद के भाइयों, मां और पत्‍‌नी की भूमिकाओं में भी उपयुक्त कलाकारों का चयन हुआ है। फिल्म के कोर्ट रूम सीन रियल हैं। 'जॉली एलएलबी' के बाद एक बार फिर हम कोर्ट रूम की बहसों को बगैर डायलॉगबाजी और सौगंध के देखते हैं।
'शाहिद' मर्मस्पर्शी और भावुक कहानी है। फिल्म के अंतिम प्रभाव से आंखें नम होती हैं, क्योंकि हम सत्ता और समाज के हाथों विवश और निहत्थे व्यक्ति की हत्या देखते हैं। यह फिल्म सिहरन देती है। खौफ पैदा करती है। हिंदी सिनेमा के वर्तमान मनोरंजक दौर में लकीर से अलग होकर एक सच कहती है।
अवधि-112 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, October 10, 2013

ताजातरीन बॉयोपिक ‘शाहिद’


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता की ‘शाहिद’ किसी व्यक्ति की जिंदगी पर बने ताजातरीन बॉयोपिक है। फरवरी 2010 में वकील शाहिद आजमी की हत्या उनके दफ्तर में कर दी गई थी। शाहिद ने ताजिंदगी उन असहायों की सहायता की, जो गलत तरीके से शक के आधार पर कैद कर लिए गए थे। उन्होंने ऐसे अनेक आरोपियों को मुक्त करवाया। शाहिद ने इसे अपनी जिंदगी का मुहिम बना लिया था, क्योंकि किशोरावस्था में वे खुद ऐसे झूठे आरोप में टाडा के अंतर्गत गिरफ्तार होकर पांच सालों तक जेल में रहे थे। पांच भाइयों में से एक शाहिद ने आक्रोश में आतंकवादी ट्रेनिंग के लिए कश्मीर की भी यात्रा की थी। वहां के तौर-तरीकों से मोहभंग होने पर मुंबई लौटे तो उन्हें टाडा के तहत सजा हो गई। जेल में ही उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और जेल से निकलने के बाद वकालत की पढ़ाई की। वे कुछ समय तक मशहूर वकील माजिद मेनन के सहायक रहे। फिर अपनी वकालत शुरू की।
    शाहिद की हत्या के तीन सालों के अंदर हंसल मेहता ने समीर गौतम सिंह की मदद से उनकी जिंदगी की छानबीन की और इस फिल्म की कहानी लिखी। सच्ची घटनाओं और तथ्यों पर आधारित ‘शाहिद’ में कल्पना का सहारा धागे की तरह किया गया है, जो घटनाओं को सिलता है। 1 करोड़ से कम बजट में बनी इस फिल्म की शूटिंग मुंबई के कुर्ला, पायधनी और गोवंडी जैसे वास्तविक लोकेशन में की गई है। शाहिद आजमी के दफ्तर में भी खास दृश्यों की शूटिंग हुई।
    पूर्वाग्रहों और वैमनस्य से विभक्त हो रहे वर्तमान समाज में शाहिद आजमी ने कानूनी दायरे में वंचितों के हक की लड़ाई लड़ी और मारे गए। हंसल मेहता ने उनकी इस खास जिंदगी को ‘शाहिद’ में बगैर नाटकीयता के चित्रित किया है। यह फिल्म अनेक फेस्टिवल में प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुकी है।



Sunday, September 16, 2012

मुझे फिल्मों में ही आना था- राज कुमार


-अजय ब्रह्मात्मज
उन्होंने अपने नाम से यादव हटा दिया है। आगामी फिल्मों में राज कुमार यादव का नाम अब सिर्फ राज कुमार दिखेगा। इसकी वजह वे बताते हैं, ‘पूरा नाम लिखने पर नाम स्क्रीन के बाहर जाने लगता है या फिर उसके फॉन्ट छोटे करने पड़ते हैं। इसी वजह से मैंने राज कुमार लिखना ही तय किया है। इसके अलावा और कोई बात नहीं है।’ राज कुमार की ताजा फिल्म ‘शाहिद’ इस साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में उन्होंने शमशाद की जीवंत भूमिका निभाई। उनकी ‘चिटगांव’ जल्दी ही रिलीज होगी। एफटीआईआई से एक्टिंग में ग्रेजुएट राज कुमार ने चंद फिल्मों से ही, अपनी खास पहचान बना ली है। इन दिनों वे ‘काए पो चे’ और ‘क्वीन’ की शूटिंग कर रहे हैं।
    -आप एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं, लेकिन आप की पहचान मुख्य रूप से थिएटर एक्टर की है। ऐसा माना जाता है कि आप भी एनएसडी से आए हैं?
0 इस गलतफहमी से मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल शुरू में लोग पूछते थे कि आप ने फिल्मों से पहले क्या किया है, तो मेरा जवाब थिएटर होता था। फिल्मों में लोग थिएटर का मतलब एनएसडी ही समझते हैं, इसलिए यह गलतफहमी है। अब धीरे-धीरे लोगों को मालूम हो रहा है कि मैं एफटीआईआई से आया हूं। पिछले दो-तीन सालों में और भी कुछ छात्र आए हैं।
    - एक जमाने में एफटीआईआई से एक्टर की पूरी जमात आई थी। वे सभी आज मशहूर हैं। एक अंतराल के बाद आप लोग उस ट्रेडिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी कैसी फैकल्टी है और वहां पढऩे का क्या लाभ हुआ?
0 पेंटल साहब हमारे हेड थे। फैकल्टी काफी अच्छी थी। दो सालों की पढ़ाई में उनलोगों ने एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं। वहां थोड़ी आजादी भी दी जाती है। आप ने सही कहा। एक समय एफटीआईआई से काफी एक्टर हिंदी फिल्मों में आए। उन्होंने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग को नई दिशा दी। बीच में वहां एक्टिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी। अब शुरू हुई है। धीरे-धीरे हमारी तादाद बढ़ेगी।
    - आप ने एफटीआईआई जाने की जरूरत क्यों महसूस की? आप के पहले नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी ने एनएसडी से पढ़ाई पूरी करने के बाद एफटीआईआई से भी अभिनय का प्रशिक्षण लिया। क्या एफटीआईआई में फिल्म एक्टिंग की खास पढ़ाई होती है?
0 मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था। वहां श्रीराम सेंटर से जुड़ा हुआ था। 2004 में जब एफटीआईआई में एक्टिंग का कोर्स चालू हुआ तो एक मित्र वहां गए। उनके बारे में सुनने और जानने के बाद मैंने भी एफटीआईआई में ही जाना उचित समझा। एनएसडी का ख्याल मुझे कभी नहीं आया। मुझे थिएटर करना ही नहीं था। शुरू से स्पष्ट था कि मुझे फिल्मों में एक्टिंग करनी है। मेरे दिमाग में यह बात थी कि एफटीआईआई मुंबई के नजदीक है। एफटीआईआई से निकले काफी लोग फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। मुझे लगा कि उससे थोड़ी सहूलियत होगी।
    -फिल्मों में एक्टिंग करने का फैसला कब लिया आप ने?
0 सच कहूं तो स्कूल के दिनों में सोच लिया था। स्कूल के वार्षिक समारोहों और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया करता था। दोस्तों और शिक्षकों की प्रशंसा से लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। उन्हीं दिनों यह ख्वाब पैदा हुआ। बाद में डांस सीखा, थिएटर किया, नाटक पढ़े, फिल्में देखी.. और खुद को फिल्मों के लिए तैयार किया।
    - अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
0 मैं गुडग़ांव का हूं। उस गुडग़ांव का, जो एक गांव हुआ करता था। अभी तो वह सिंगापुर का मुकाबला कर रहा है। हम रात में छतों पर चादर बिछाकर सोया करते थे। ऊपर तारों से सजा आकाश होता था। वहीं कुछ सपने देखे थे। मेरे पिता पटवारी थे। उन्होंने ईमानदार जिंदगी जी और उसी की सीख दी। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं। दोनों बड़े भाई भी एक्टिंग और डांसिंग के शौकीन थे। फिलहाल वे नौकरी कर रहे हैं। मुझे पर्दे पर देखकर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होती है। शायद मैं उनके अधूरे ख्वाबों को भी जी रहा हूं। बहुत संबल मिलता है। बतौर एक्टर मुझे बचपन की सरल और साधारण जिंदगी बहुत मदद करती है। मैंने चेहरे और किरदार पढ़े हैं। वे सभी मेरे अंदर जिंदा हैं। मैंअपने परिवार और परिवेश का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में ही अनौपचारिक ट्रेनिंग दे दी। मैं संयुक्त परिवार से आता हूं। रिश्तों की रेस्पेक्ट जानता हूं। रहते हम लोग गुडग़ांव में थे, लेकिन दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। मुझे एक साथ गांव और शहर दोनों को समझने और जीने का मौका मिला।
    - परिवार का माहौल कैसा था? फिल्मों के प्रति मां-बाप की रुचि थी या नहीं?
0 फिल्मों के प्रति बहुत ज्यादा रूझान नहीं था, लेकिन मेरी मां अमिताभ बच्चन की जबरदस्त प्रशंसक हैं। पिताजी को राजेश खन्ना ज्यादा पसंद थे। उनके गाने वे आज भी गुनगुनाया करते हैं। भाइयों को फिल्मों का शौक था। उन्हीं के साथ मुझे भी फिल्में देखने को मिल जाती थी। मुझे बचपन से पूरी आजादी मिली। फिल्में देखने पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन मैंने कभी इसका नाजायज फायदा नहीं उठाया। मेरे ऊपर 90 प्रतिशत अंक लाने का या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का दवाब नहीं था। मैं ठीक-ठाक छात्र रहा हूं। परीक्षा के समय पढक़र फस्र्ट क्लास लाया करता था। पिताजी ने बताया था कि वे परीक्षा के दिनों में फिल्में जरूर देखते थे। उनसे यह आदत मैंने भी सीख ली।
    -फिल्मों में काम मिलने में कितनी दिक्कतें हुईं? संघर्ष कितना लंबा और कठिन रहा?
0 मुझे लगभग एक साल कथित स्ट्रगल करना पड़ा। आने के बाद मैंने भी वही तरीका अपनाया कि प्रोडक्शन हाउस में जाकर अपनी तस्वीर छोड़ो और फिर उनके फोन का इंतजार करो। ज्यादातर निराशा ही हाथ लगती थी। मैंने उन्हीं दिनों दोस्तों की मदद से अपना एक शोरील बनाया। डीवीडी के ऊपर अपनी तस्वीर चिपकाई और किसी प्रोफेशनल एक्टर की तरह उन्हें प्रोडक्शन के दफ्तरों में छोड़ा। फिर कहीं अखबार में पढ़ा कि दिबाकर बनर्जी को   ‘लव सेक्स और धोखा’ के लिए नए कलाकार चाहिए। मुझे यकीन हो गया कि मेरे लिए ही उन्होंने यह शर्त रखी है। मैंने उनके कास्टिंग डायरेक्टर से संपर्क किया। संयोग देखें कि मेरा चुनाव हो भी गया। उस एक फिल्म ने हिंदी फिल्मों में मेरा प्रवेश आसान कर दिया। उसके तुरंत बाद  ‘रागिनी एमएमएस’ मिल गई। वैसे  ‘लव सेक्स और धोखा’ की शूटिंग के बाद ही मैंने  ‘चिटगांव’ की शूटिंग शुरू कर दी थी और  ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के लिए हां कह दिया था। फिर विजॉय नांबियार ने  ‘शैतान’ में छोटा सा अपीयरेंस दिया। अभी तक के अपने काम से संतुष्ट हूं और मुझे लग रहा है कि सही दिशा में बढ़ रहा हूं।
    -अपनी फिल्म  ‘शाहिद’ के बारे में बताएं?
0 यह मुंबई के वकील शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित है। वे ऐसे निर्दोष व्यक्तियों की वकालत करते थे, जिन्हें किसी गलतफहमी या साजिश के तहत गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने कई निरपराध आरोपियों को बरी कराया। उनके इस रवैए से परेशान होकर असामाजिक तत्वों ने राजनीतिक कारणों से उनकी हत्या कर दी। हंसल मेहता ने उनकी जिंदगी पर बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह फिल्म मेरी क्षमताओं से दर्शकों और समीक्षकों को परिचित कराएगी।
    -आप का करियर अच्छा और सीधा ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है। अभी तक की फिल्मों में किस अभिनेता या अभिनेत्री के साथ एक फ्रेम में आने की सबसे ज्यादा खुशी हुई? भविष्य में और किस के साथ आना चाहेंगे?
0  ‘चिटगांव’ में मनोज बाजपेयी के साथ आना मेरे लिए गर्व की बात थी। उनके साथ एक कनेक्शन महसूस करता हूं। वे भी दिल्ली से थिएटर कर मुंबई आए। मैं उन्हीं के पद्चिह्नों पर चल रहा हूं। उसके बाद  ‘तलाश’ की शूटिंग में आमिर खान के साथ काम करने का मौका मिला। आमिर बड़े ही सहज और डेमोक्रेटिक स्टार हैं। उन्होंने फिल्म एक्टिंग की बारीकियां बातों-बातों में सिखा दीं। भविष्य में चाहूंगा कि कभी इरफान के साथ काम करने का मौका मिले। मुझे डर है कि शायद मैं सहज नहीं रह पाऊंगा। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं और उनके प्रभामंडल से प्रभावित हूं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में एक्टिंग की नई परिभाषा गढ़ी है।