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Monday, June 19, 2017

बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार – सलमान खान



जंग के पैरोकारों को लगता है, वे बच जाएंगे!...हाहाहा सलमान खान
हॉलीवुड में सुपरमैन और स्‍पाइडरमैन जैसे सुपरहीरो, जिन्‍हें देखने के लिए दुनिया के अधिकांश देशों के दर्शक इंतजार करते होंगे। भारत में खास कर हिंदी दर्शकों को तो सलमान(Sal Man) का इंतजार रहता है। पिछले कुछ सालों से वे अपनी फिल्‍मों की ईदी लेकर दर्शकों के बीच मनोरंजन बांटने आ जाते हैं। उन्‍होंने धीरे-धीरे एक फार्मूला तैयार किया है। वे इस फार्मूले के दायरे के बाहर नहीं जाते। उन्‍होंने अपनी सीमाओं के अंदर ही खूबियां खोज ली हैं और दर्शकों के चहेते बने हुए हैं। इस साल ईद के मौके पर उनकी फिल्‍म ट्यूबलाइट आ रही है। कबीर खान के साथ तीसरी बार उनकी जुगलबंदी नजर आएगी। एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान की कामयाबी और तारीफ के बाद ट्यूबलाइट में उनकी जोड़ी फिर से दर्शकों को हंसाने और रुलाने आ रही है। सलमान खान ने झंकार के पाठकों के लिए अजय ब्रह्मात्‍मज से बातें कीं।
- ट्यूबलाइट की रिलीज के मौके पर हिंदी प्रदेशों के दर्शकों को क्‍या बताना चाहेंगे?
0 आप ने नोटिस किया होगा कि पिछले कुछ सालों से मैं वैसी ही फिल्‍में कर रहा हूं, जैसी हम अपने बचपन में देखा करते थे। उन फिल्‍मों के पोस्‍टर भी हमें आकर्षित करते थे। उन फिल्‍मों को देख कर थिएटर से निकलते समय ऐसी फीलिंग आती थी कि हमें भी ऐसा हीरो बनना है। मैा इन दिनों चुन कर वैसी ही फिल्‍में कर रहा हूं। फिल्‍मों का चुनाव इस आधार पर हो रहा है कि स्क्रिप्‍ट सुनते समय ही वह मुझे सारे काम छोड़ कर फिल्‍म शुरु करने का जोश दें। अगर मुझे हीरो और बाकी किरदार पसंद आ जाएं...स्‍क्रीनप्‍ले पसंद आ जाए और अंदरूनी फीलिंग आए कि फिल्‍म देख कर निकलते समय दर्शक खुश दिखें। वे हंस कर निकलें या रो कर निकलें...वे खुश दिल दिखें। या फिर उनकी चाल में मस्‍ती और स्‍वैग हो।- इन फिल्‍मों का उद्देश्‍य भी ध्‍यान में रहता है क्‍या?
0 बिल्‍कुल...अभी अपने लिए फिल्‍में नहीं करता। कोई गोल, कोई मकसद तो हो। फिल्‍म का हीरो लार्जर दैन लाइफ हो...वह अपने इमोशन से हिला दे। लार्जर दैन लाइफ का मतलब केवल यह नहीं होता कि हीरो दस लोगो को उठा कर पटक दे। दिल और दिमाग का ऐसा खेल हो कि साधारण दिख रहा व्‍यक्त्‍िा सभी का दिल जीत ले। परिवार, मोहल्‍ला, समाज और देश के लिए वह कुछ करे। उस पर सभी नाज करें। जिस पर शुरू में भरोसा नहीं रहा हो तो फिल्‍म के अंत तक सभी उस पर यकीन करने लगें। मेरी जिंदगी का सफर ऐसा ही रहा है। मेरी फिल्‍मों का हीरो कुछ-कुछ मेरे जैसा ही होता है।-खास कर बीइंग ह्ययूमन के तहत आप जो कर रहे हैं, उससे आप की छवि बदली है...0 बीइंग ह्यूमन की फिलासफी तो मेरे पैदा होने से पहले की है। मेरे वालिद और मां ने अपने बुजुर्गों से जो सीखा, वही हमें सिखाया। मैं उसे ही कंटीन्‍यू कर रहा हूं। मैंने सिर्फ इतना किया कि उसे एक संगठन का रूप दे दिया। बीइंग ह्यूमन के अस्तित्‍व में आने के पहले लोग हमें खूब बेवकूफ बना के जा रहे थे। लूट रहे थे। उसका बुरा असर यह होता था कि अगले जरूरतमंद की मदद नहीं हो पाती थी। पिछले का गुस्‍सा अगले पर निकलता था और बेकसूर व्‍यक्ति फंस जाता था। हमने छलियों को निकालने के लिए यह चैरीटेबल ट्रस्‍ट आरंभ किया। हम किसी को पैसे नहीं देते। हम स्‍कूलों की मदद कर रहे हैं। अस्‍पतालों को दान देते हैं। व्‍यक्तियों की मदद नहीं करते। अगर कोई शादी के लिए दो लाख मांगता है तो यही कहता हूं कि शादी के लिए अस्‍सी रुपए लेकर जाओ। मेरे माता-पिता की शादी अस्‍सी रुपए में हुई थी।
-ट्यूबलाइट के बिष्‍ट(लक्ष्‍मण और भरत) बंधुओं के बारे में बताएं?
0 दो भाई हैं। उनके मां-बाप नहीं हैं। बड़ा भाई लक्ष्‍मण मंदबुद्धि है। वह इतना सिंपल और सीधा है कि पूरा गांव उसे ट्यूबलाइट समझता है। वह बहुत ही प्‍यारा किरदार है। छोटा भाई उसे अपना हीरो समझता है। दोनों भाइयों के बड़े होने पर उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं। छोटा भाई वास्‍तव में बड़े भाई की तरह केयरिंग हो जाता है। भारत-चीन युद्ध के मौके पर गांव में बहाली चलती है। उसमें छोटा भाई क्‍वालीफाई कर जाता है। बड़ा भाई मतिमंद होने की वजह से नहीं चुना जाता। बड़ भाई अकेला रह जाता है। शुरु में वे इसे सामान्‍य बात मानते हैं कि बोर्डर पर जाना है और लौट आना है। जंग छिड़ जाती है और काफी जवान मारे जाते हैं। छोटा भाई नहीं लौटता। अब बड़ा भाई लक्ष्‍मण अपना यकीन जाहिर करता है कि वह छोटे भाई को ले आएगा। यह उसके पक्‍के यकीन की कहानी है। वह मिन्‍नतें करता है अपने तई कोशिश करता है। वह एक्‍शन में नहीं आता कि भाई को किसी के चंगुल से छुड़ा कर लाएगा। लक्ष्‍मण को यकीन है कि जंग रुकेगी और उसका भाई मौत के मुंह से लौट आएगा। उनके जवान अपने मां-बाप के पास लौट जाएंगे और हमारे जवान अपने भाइयों के पास आ जाएंगे। इसी कहानी में ट्विस्‍ट एंड टर्न और रोलर कोस्‍टर राइड है।
-इसे बजरंगी भाईजान जैसी फिल्‍म ही माना जा रहा है?
0 इमोशनली यह बजरंगी भाईजान से अधिक स्‍ट्रांग है। यह मैच्‍योर, लाइटर और इमोशनली गहरी जड़ों की फिल्‍म है। यह दो भाइयों की कहानी है ऑन स्‍क्रीन, जो ऑफ स्‍क्रीन भी भाई हैं। इसमें एक्टिंग और परफारमेंस नहीं है। भाई के प्रति भाई की फीलिंग है।- आप दोनों फिल्‍म में किस उम्र के बताए गए हैं?
0स्‍क्रीन एज तो है ही नहीं...पचास साल के तो हो चुके हैं। हमलोग तीन-चार के होते हैं। फिर थोड़े बड़े होते हैं और बाद में 26-27 साल के बताए गए हैं। हिंदी फिल्‍मों के हीरो की उम्र नहीं बताई जाती।
-फिल्‍म में दोनों भाइयों के साथ हाने से कोई निजी चुहलबाजी भी पर्दे पर आई है क्‍या?
0 वह तो आ ही जाती है। रियल लाइफ कनेक्‍ट पर्दे पर दिखता है। अभी जो गाना चल रहा है, उसमें हमारी केमिस्‍ट्री दिख रही है। कोई दूसरा एक्‍टर और बड़ा स्‍टार रहता तो वह रियल नहीं लगता। कुछ लोग कह रहे हैं कि भाई को प्रोमोट कर रहा हूं। अरे भाई, भाई-भाई की फिल्‍म है, इसलिए भाई को लिया। एक्‍ट करते समय ऐसी फीलिंग भी आई कि कहीं सचमुच में ऐसा हुआ तो क्‍या होगा...कल्‍पना में वास्‍तविकता का एहसास डरा गया। इस फिल्‍म में सोहैल के होने की वजह से हमेशा लगता रहा कि घर पर ही हैं। यह एक ईमानदार कोशिश है।
-आप ने शुरू में कहा कि यह फिल्‍म देख कर दर्शक निकलें तो आप की तरह बनना चाहें। आप जब बड़ हो रहे थे तो आप किस की तरह होना चाहते थे?
0 ब्रूस ली की फिल्‍में आती थीं तो थिएटर के बाहर झगड़ा हो ही होता था। केकड़ से केकड़ा आदमी भी खुद को ब्रूस ली समझता था। इस फिल्‍म से मैंने सबक लिया कि पर्दे की बात जिंदगी में भी की जा सकती है। मैं लक्ष्‍मण बनना चाहता हूं। मैं आश्‍वस्‍त हूं कि यह फिल्‍म अचेतन रूप से दर्शकों को प्रभावित करेगी। मुश्किलों में आप लक्ष्‍मण होना चाहेंगे। अपने यहां दिलीप कुमार की तरह किसी और ने असर नहीं डाला। मनोज कुमार की देशभक्ति की फिल्‍में मुझे बहुत अच्‍छी लगती थीं। अमिताभ बच्‍चन की मेरे डैड की फिल्‍मों में निभाई एंग्री यंगमैन की भूमिकाएं बहुत पसंद थीं। वह अलग और नया किरदार था। अपनी चाल-ढाल और अदाकारी से एक्‍शन फिल्‍मों में भी खूब जंचे।-चीन की अभिनेत्री जू जू के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 बहुत अच्‍छा। वह चीनी फिल्‍मों के साथ इंटरनेशनल प्रोजेक्‍ट भी कर चुकी हैं। प्रोफेशनल और सुलझी हुई लड़की है। अपनी संस्‍कृति साथ लेकर चलती हैं।
-हिंदी फिल्‍मों और भारतीय समाज में चीन की छवि निगेटिव है। क्‍या आप की...0 हम ने वह टच ही नहीं किया। हम ने वॉर की भी बात नहीं की है।- अभी पूरी दुनिया में जंग सी छिड़ी है। ऐसा लग रहा कि तीसरा  विश्‍वयुद्ध कभी भी हो सकता है... आप कुछ कहना चाहेंगे?
0ऊपर वाला हमें बचाए। कितने बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार? क्‍या उन्‍हें नहीं मालूम कि जंग होगी तो सभी मारे जाएंगे। उन्‍हें लगता है कि वे बच जाएंगे...हाहाहा।-आखिरी सवाल, क्‍या ट्यूबलाइट आप की ईदी है दर्शकों के लिए?
0 मेरी यह फिल्‍म देखें और अपना प्‍यार बनाए रखें। ईद के तोहफे के बाद क्रिसमस की गिफ्ट भी ला रहा हूं। हमारा काम एंटेरटेन करना सा है। वहीं करते रहेंगे। यही चाहूंगा कि मेरी फिल्‍म देखने के लिए पूरा परिवार इकट्ठा हो और साथ में फिल्‍म देखे।

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Friday, September 9, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फ्रीकी अली




स्‍ट्रीट स्‍मार्ट
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सोहेल खान की फ्रीकी अली के नायक अली और एक्‍टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी की कहानी और चरित्र में समानता है। फिलम का नायक हुनरमंद है। वह छह गेंद पर छह छक्‍के लगा सकता है तो गोल्‍फ में भी बॉल को होल में डाल सकता है। थोड़ी सी ट्रेनिंग के बाद वह गोल्‍फ के चैंपियन के मुकाबले में खड़ा हो जाता है। एक्‍टन नवाजुद्दीन सिद्दीकी हुनरमंद हैं। वे इस फिल्‍म में बतौर हीरो अपने समकालीनों के साथ खड़े हो गए हैं। नवाज ने पहले भी फिल्‍मों में लीड रोल किए हैं,लेकिन वे फिल्‍में मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍में नहीं थीं। मेनस्‍ट्रीम की फिल्‍मों में छोटी-मोटी भूमिकाओं से उन्‍होंने पॉपुलर पहचान बना ली है। दर्शक उन्‍हें पसंद करने लगे हैं। लेखक व निर्देश सोहेल खान ने उनकी इस पॉपुलैरिटी का इस्‍तेमाल किया है। उन्‍हें लीड रोल दिया है और साथ में अपने भार्अ अरबाज खान को सपोर्टिंग रोल दिया है। फ्रीकी अली पर अलग से बात की जाए तो यह नवाजुद्दी सिद्दीकी की भी जीत की कहानी है।
स्क्रिप्‍ट की सीमाओं के बावजूद नवाज अपनी प्रतिभा से फिल्‍म को रोचक बनाते हैं। उनकी संवाद अदायगी और आकस्मिक अदा दर्शकों को भाती है। पर्दे पर उनकी आंखों की शरारत रिझाती है। संयोग से पॉपुलर फिल्‍मों में उन्‍हें स्‍ट्रीट स्‍मार्ट किरदार मिलते रहे हैं,जिनमें उनकी ये भंगिमाएं प्रभाव पैदा करती हैं। फ्रीकी अली पूरी तरह से उन पर निर्भर करती है। थोड़ी देर के लिए सीमा विश्‍वास सहयोग देती है। आरिफ बसरा किरदार की सादगी और ईमानदारी की वजह से पसंद आते हैं। बाकी कलाकार भरपाई के लिए हैं। न तो उनके किरदारों पर मेहनत की गई है और न ही उनके भाव और अंदाज पर ध्‍यान दिया गया है। अरबाज खान लंबे अनुभवों के बावजूद नवाज के साथ के दृश्‍यों में घिसटते ही नजर आते हैं। इसका असर नवाज के परफारमेंस पर भी पड़ा है। अगर उन्‍हें सहयोगी कलाकार के रूप में बराबर का जोड़ीदार मिलता तो यह फिल्‍म कुछ और ऊंचाई हासिल करती।
फ्रीकी अली गोल्‍फ की पृष्‍ठभूमि पर है। स्‍ट्रीट स्‍मार्ट लावारिस अली को हिंदू मां ने पाला है। चडढी बेचने से लकर हफ्ता चसूलने तक के छोटे-मोटे धंधों में व्‍यस्‍त अली जब संयोगवश गोल्‍फ खेलने पर आमदा होता है और अपने हुनर से सफल रहता है। ऐसी फिल्‍मों में विजनरी निर्देशक नायक के खेल में पारंगत होने और फिर अंतिम मुकाबले में उसकी कोशिशों और निश्‍चय-अनिश्‍चय के रोमांच से दर्शकों को टस से मस नहीं होने देता। सोहेल खान अली को रच नहीं पाते। सोहेल खान विजनरी डायरेक्‍टर नहीं हैं। उन्‍होंने प्रीक्‍लाइमेक्‍स भी कमजोर रखा है। चूंकि फ्रीकी अली हिंदी फिल्‍मों के स्‍ट्रक्‍चर का पालन करती है,इसलिए उसमें प्रचलित तत्‍व भी मजेदार होने चाहिए थे। क्‍लाइमेक्‍स के पहले की कव्‍वाली और अली की हिंदू मां की भगवान से गुहार शुद्ध पच्‍चीकारी है। अकेले नवाज के प्रयत्‍न और प्रतिभा से फिल्‍म संभल पाती है।
हिंदी फिल्‍मों में इन दिनों स्‍टार अौर फिल्‍मों के रेफरेंस से हंसी पैदा करने का चलन बढ़ा है। इस फिल्‍म में भी आमिर खान,सलमान खान के हवाले से कुछ संवाद रखे गए हैं। एक संवाद तो नवाज की फिल्‍म मांझी से ले ली गई है...घमंड तो हम पहाड़ का तोड़ दें। हंसी तो आती है,लेकिन किरदार फिसल जाता है। फ्रीकी अली में प्रोडक्‍शन की भी कमियां हैं। सेट और कॉस्‍टृयूम में कल्‍पना और बजट की कटौती से फिल्‍म का प्रभाव कम हुआ है।
यह फिल्‍म नवाजुद्दी सिद्दीकी के लिए देखी जा सकती है। लेखक-निर्देशक थोड़ा और यत्‍न-प्रयत्‍न करते तो यह नवाज की उल्‍लेखनीय फिल्‍म होती।
अवधि- 125 मिनट
स्‍टार- तीन स्‍टार

Friday, July 24, 2009

आत्मकथा नहीं लिखना चाहते सलीम खान


-अजय ब्रह्मात्मज


सलीम खान के साथ घंटों बिताने के बाद चलते वक्त नंबर लेने के बाद जब मैंने पूछा कि क्या कभी उनसे फोन पर बातें की जा सकती हैं? उनका सीधा जवाब था, भाई, मैं तो रॉन्ग नंबर से आए कॉल पर भी आधे घंटे बात करता हूं। आप तो परिचित हैं और पत्रकार हैं। सलीम खान के व्यक्तित्व का अनुमान बगैर उनकी संगत के नहीं हो सकता। वे मीडिया से बातें नहीं करते और न अपने जोड़ीदार जावेद अख्तर की तरह बयान और भाषणों के लिए उपलब्ध रहते हैं। उनका अपना एक रुटीन है। वे उसमें व्यस्त रहते हैं। आज जिस उदारता, मेहमाननवाजी और फराक दिल के लिए सलमान खान की तारीफ की जाती है, वह सब उन्हें सलीम खान से विरासत में मिली है। सलीम खान इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन साथ में यह बताना नहीं भूलते कि सलमान की अपनी खासियतें हैं। वह अपने ढंग का वाहिद लड़का है। मेरा बेटा है, इसलिए नहीं.., वह सचमुच टैलेंटेड आर्टिस्ट है।
सलीम खान कमरे में टंगी पेंटिंग्स की तरफ इशारा करते हैं। उसे नींद नहीं आती। वह बेचैन रहता है। मैं उसकी क्रिएटिव छटपटाहट को समझ सकता हूं। कभी मैं भी उसकी तरह बेचैन रहता था। वे यादों की गलियों में लौटते हुए बताते हैं कि इंदौर में मेरी प्रेमिका की शादी कहीं और हो रही थी। उसके घर वालों ने मुझे इसलिए नकार दिया था कि मेरे पास एक मोटर साइकिल और कुछ ख्वाब थे। उन्होंने दुनियावी नजरिए से ठीक ही सोचा था कि ख्वाब से खाना नहीं मिलता। मैं इंदौर के एक टीले पर उदास और हारे हुए प्रेमी की तरह दुनिया को गाली देता बिसूर रहा था, तो किसी ने कंधे पर हाथ रखा और कहा, कुछ ऐसा करो कि तुम्हारी प्रेमिका और उसके घरवालों को अफसोस हो कि उन्होंने तुम्हें क्यों नकारा! सलीम खान को सलाह अच्छी लगी और वे मुंबई आ गए। दिल में फिल्मों में काम करने का जज्बा था। तब दिलीप कुमार का जमाना था। उनके पोस्टर और होर्डिग नुक्कड़ों पर लगे रहते थे। सलीम खान ने सोचा कि एक दिन अपना भी पोस्टर लगेगा। पोस्टर लगे, लेकिन ऐक्टर के रूप में नहीं। सलीम खान बहुत बड़े रायटर के रूप में मशहूर हुए। पहली बार तब लोगों ने पोस्टर पर लेखकों के नाम बडे़ और बोल्ड अक्षरों में देखे। सलीम-जावेद की जोड़ी हिट फिल्मों का पर्याय बन चुकी थी। उन दिनों वे फिल्म स्टारों की किस्मत पलट रहे थे। कई स्टार हैं, जिनमें से कुछ आज भी दोस्त हैं और कुछ समय के साथ छिटककर दूर चले गए हैं। दूर जाने वालों में अमिताभ बच्चन भी हैं। सलीम खान की लिखी अनेक फिल्मों के हीरो रहे अमिताभ से उनकी कोई बातचीत नहीं है। इस प्रसंग पर फिर कभी..
फिलहाल उनके निष्क्रिय होने की बात चली, तो सलीम खान स्पष्ट करते हैं कि मेरा बेटा तब तक स्टार बन चुका था। मुझे लगा कि अगर मैं अपनी कहानी किसी और के पास लेकर जाऊंगा, तो वह सोचेगा कि सलीम साहब सलमान के साथ क्यों काम नहीं करते? अगर कभी उसने बिठा दिया, तो मुझे और बेटों को तकलीफ होगी। बेटे के साथ फिल्म करूं, तो दूसरी दिक्कतें हैं। फिल्म हिट हो गई, तो सेहरा बेटे के नाम और अगर कहीं फिल्म पिट गई, तो झूठ का मैं बदनाम। लिहाजा मैंने लिखना बंद कर दिया। अचानक घर में बैठना तो भारी रहा होगा। कोई रोशनी से बाहर आ जाए, तो घुप्प अंधेरा मिलता है। कुछ भी नहीं सूझता। सलीम खान के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे बेटों की देखभाल में लग गए। अपनी मसरूफियत के बारे में वे बताते हैं कि जिंदगी में जो गलतियां मैं कर चुका था, वैसी गलतियां मेरे बेटे न करें, इस खयाल से मैंने उनकी देखभाल की। मैंने उनके कमाए धन का सही निवेश किया। आज मेरे सभी बच्चे इस स्थिति में हैं कि उन्हें भविष्य की चिंता नहीं है। सभी अपने ढंग से कमा रहे हैं और बाकी देखभाल के लिए मैं हूं। यहां कई तरह के जरूरतमंद आते हैं। उनकी मदद करने से सुकून मिलता है।
क्या कभी आत्मकथा लिखने का विचार नहीं आया। उनके अनुभव और जीवन के प्रसंग दूसरों के लिए प्रेरणादायी हो सकते हैं। सलीम खान आत्मकथा के महत्व को समझते हैं और इसी वजह से वे अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते। उनका मानना है कि आत्मकथा में साफगोई होनी चाहिए। मैं अगर सब कुछ साफ-साफ लिखूंगा, तो कई लोगों के चेहरों पर चढ़े नकाब उतर जाएंगे। इसके अलावा जीवन के अंतरंग प्रसंग हैं। उन्हें दुनिया के साथ शेयर नहीं किया जा सकता। कुछ कहानियां कहने-सुनने के लिए नहीं होतीं।
फिलहाल सलीम खान अपने बेटे सोहेल खान की फिल्म किसान को लेकर बहुत उत्साहित हैं। वे कहते हैं कि इस दौर में सोहेल ने ऐसी फिल्म बनाने की जरूरत समझी। मुझे फिल्म की थीम अच्छी लगी। मैंने उसे कहा कि इसे खुद ही वितरित करो।