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Thursday, April 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : नूर



फिल्‍म रिव्‍यू
बेअसर और बहकी
नूर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जब फिल्‍म का मुख्‍य किरदार एक्‍शन के बजाए नैरेशन से खुद के बारे में बताने लगे और वह भी फिल्‍म आरंभ होने के पंद्रह मिनट तक जारी रहे तो फिल्‍म में गड़बड़ी होनी ही है। सुनील सिप्‍पी ने पाकिस्‍तानी पत्रकार और लेखिका सबा इम्तियाज के 2014 में प्रकाशित उपन्‍यास कराची,यू आर किलिंग मी का फिल्‍मी रूपांतर करने में नाम और परिवेश के साथ दूसरी तब्‍दीलियां भी कर दी हैं। बड़ी समस्‍या कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास को मुंबई में रोपना और मुख्‍य किरदार को आयशा खान से बदल कर नूर राय चौधरी कर देना है। मूल उपन्‍यास पढ़ चुके पाठक मानेंगे कि फिल्‍म में उपन्‍यास का रस नहीं है। कम से कम नूर उपन्‍यास की नायिका आयशा की छाया मात्र है।
फिल्‍म देखते हुए साफ पता चलता है कि लेखक और निर्देशक को पत्रकार और पत्रकारिता की कोई जानकारी नहीं है। और कोई नहीं तो उपन्‍यासकार सबा इम्तियाज के साथ ही लेखक,निर्देशक और अभिनेत्री की संगत हो जाती तो फिल्‍म मूल के करीब होती। ऐसा आग्रह करना उचित नहीं है कि फिल्‍म उपन्‍यास का अनुसरण करें,नेकिन किसी भी रूपांतरण में यह अपेक्षा की जाती है कि मूल के सार का आधार या विस्‍तार हो। इस पहलू से चुनील सिन्‍हा की नूर निराश करती है। हिंदी में फिल्‍म बनाते समय भाषा,लहजा और मानस पर भी ध्‍यान देना चाहिए।
नूर महात्‍वाकांक्षी नूर राय चौधरी की कहानी है। वह समाज को प्रभावित करने वाली स्‍टोरी करना चाहती है,लेकिन उसे एजंसी की जरूरत के मुताबिक सनी लियोनी का इंटरव्‍यू करना पड़ता है। उसके और भी गम है। उसका कोई प्रेमी नहीं है। बचपन के दोस्‍त पर वह भरोसा करती है,लेकिन उससे प्रेम नहीं करती। नौकरी और मोहब्‍बत दोनों ही क्षेत्रों में मनमाफिक न होने से वह बिखर-बिखरी सी रहती है। एक बार वह कुछ कोशिश भी करती है तो उसकी मेहनत कोई और हड़प लेता है। बहरहाल,उसका विवेक जागता है और मुंबई को लांछित करती अपनी स्‍टोरी से वह सोशल मीडिया पर छा जाती है। उसे अपनी स्‍टोरी का असर दिखता है,फिर भी उसकी जिंदगी में कसर रह जाती है। फिल्‍म आगे बढ़ती है और उसकी भावनात्‍मक उलझनों को भी सुलझाती है। इस विस्‍तार में धीमी फिल्‍म और बोझिल हो जाती है।
अफसोस है कि नूर को पर्दे पर जीने की कोशिश में अपनी सीमाओं को लांघती सोनाक्षी सिन्‍हा का प्रयास बेअसर रह जाता है। नूर में बतौर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्‍हा कुछ नया करती हैं। वह अपने निषेधों को तोड़ती है। खिलती और खुलती हैं,लेकिन लेखक और निर्देशक उनकी मेहनत पर पानी फेर देते हैं। 21 वीं सदी की मुबई की एक कामकाजी लड़की की दुविधाओं और आकांक्षाओं की यह फिल्‍म अपने उद्देश्‍य तक नहीं पहुंच पाती।
अवधि- 116 मिनट
** दो स्‍टार

Friday, November 18, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फोर्स 2

चुस्‍त और फास्‍ट
फोर्स 2
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अभिनय देव की फोर्स 2 की कहानी पिछली फिल्‍म से बिल्‍कुल अलग दिशा में आगे बढ़ती है। पिछली फिल्‍म में पुलिस अधिकारी यशवर्द्धन की बीवी का देहांत हो गया था। फिल्‍म का अंत जहां हुआ था,उससे लगा था कि अगर भविष्‍य में सीक्‍वल आया तो फिर से मुंबई और पुलिस महकमे की कहानी होगी। हालांकि यशवर्द्धन अभी तक पुलिस महकमे में ही है,लेकिन अपने दोस्‍त हरीश की हत्‍या का सुराग मिलने के बाद वह देश के रॉ डिपाटमेंट के लिए काम करना चाहता है। चूंकि वह सुराग लेकर आया है और उसका इरादा दुष्‍चक्र की जड़ तक पहुंचना है,इसलिए उसे अनुमति मिल जाती है।
रॉ की अधिकारी केके(सोनाक्षी सिन्‍हा) के नेतृत्‍व में सुराग के मुताबिक वह बुदापेस्‍ट के लिए रवाना होता है। फिल्‍म की कहानी चीन के शांगहाए शहर से शुरू होती है। फिर क्‍वांगचओ शहर भी दिखता है। पेइचिंग का जिक्र आता है। हाल-फिलहाल में किसी फिल्‍म में पहली बार इतने विस्‍तार से चीन का रेफरेंस आया है। बदलाव के लिए चीन की झलकी अच्‍छी लगती है। फिल्‍म में बताया जाता है कि चीन में भारत के 20 रॉ ऑफिसर काम में लगे हुए हैं। उनमें से तीन की हत्‍या हो चुकी है। तीसरी हत्‍या हरीश की होती है,जो संयोग से हषवर्द्धन का दोस्‍त है। यहां से फोर्स 2 की कहानी आरंभ होती है।
यशवर्द्धन और केके सुराग के मुताबिक इंफार्मर की तलाश में बुदापेस्‍ट पहुंचते हैं। उन्‍हें पता चल चुका है कि भारतीय दूतावास का कोई भारतीय अधिकारी ही रॉ ऑफिसर के नाम चीनी एजेंटों को बता रहा है। रॉ डिपार्टमेंट और पुलिस डिपार्टमेंट में कौन चुस्‍त और स्‍मार्ट होने की चुहल यशवर्द्धन और केके के बीच होती है। हम देखते हैं कि सूझबूझ और पहल में यशवर्द्धन आगे है,लेकिन केके भी कम नहीं है। चुस्‍ती-फुर्ती में में वह यश के बराबर ही है। दोनों पहले एक-दूसरे से खिंचे रहते हैं। काम करने के दौरान उनकी दोस्‍ती बढ़ती है। वे एक-दूसरे का सम्‍मान करने लगते हैं। अच्‍छा है कि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच प्रेम नहीं कराया है। प्रेम नहीं हुआ तो उनके रोमांटिक गाने भी नहीं हैं। फिल्‍म बहुत ही सलीके से मुख्‍य कहानी पर टिकी रहती है। फिर भी एक बेतुका आयटम सौंग आ ही गया है। उसकी कोई जरूरत नहीं थी। हंगरी में हिंदी गाने गाती लड़की फिल्‍म में फिट नहीं बैठती।
लेखक-निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने फोर्स 2 को विषय से भटकने नहीं दिया है। फिल्‍म में गति है। पर्याप्‍त एक्‍शन है। जॉन अब्राहम एक्‍शन दृश्‍यों में यों भी अच्‍छे और विश्‍वसनीय लगते हैं। फिल्‍म में उनके किरदार को इस तरह गढ़ा गया है वे अपनी खूबियों के साथ फिल्‍म में दिखें। उनकी कमियों को उभरने का मौका नहीं मिला। एक-दो नाटकीय दृश्‍यों में जॉन अब्राहम संघर्ष करते दिखते हैं। उनके चेहरे पर नाटकीय भाव नहीं आ पाते। इस फिल्‍म में उन्‍होंने आम दर्शकों का लुभाने के लिए कुछ प्रसंगों में मुंबइया अंदाज पकड़ा है। उन्‍हें खेलने के लिए दो-तीन दृश्‍य भी मिले हैं। इन दृश्‍यों में वे भाएंगे। सोनाक्षी सिन्‍हा ने जॉन का गतिपूर्ण साथ निभाया है। वह भी रॉ अधिकारी की भूमिका में सक्षम दिखती हैं। एक्‍शन दृश्‍यों में कूद-फांद और दौड़ लगाने में उनकी सांस नहीं फूली है। इस फिल्‍म में कहीं भी केके के किरदार को अबला नहीं दिखाया गया है। यह एक चेंज है।
फिल्‍म में खलनायक शिव शर्मा की भूमिका निभा रहे ताहिर राज भसीन उम्‍दा अभिनेता हैं। वे अपने किरदार को ओवर द ऑप नहीं ले जाते,फिर भी किरदार के खल स्‍वभाव को अच्‍छी तरह व्‍यक्‍त करते हैं। हम ने उन्‍हें मर्दानी में देखा था। इस फिल्‍म में वे और भी सधे अंदाज में हैं। छोटी भूमिका में नरेन्‍द्र झा और आदिल हुसैन अपनी जिम्‍मेदारियां अच्‍छी तरह निभते हैं।
फोर्स 2 रॉ ऑफिसर की जिंदगी के अहम मुद्दे पर बनी फिल्‍म है। किसी भी देश के जासूस जब पकड़े जाते हैं तो उनकी सरकारें  उनकी पहचान से साफ इंकार कर देती हैं। मृत्‍यु के बाद उन्‍हें सम्‍मान तो दूर कई बार उनके परिवारों का अपमान और लांछनों के बीच जीना पड़ता है। इस फिल्‍म का कथित खलनायक ऐसे ही एक रॉ ऑफिसर का बेटा है। कैबिनेट सेक्रेटरी ने उसके पिता की पहचान से इंकार किया था। 23 सालों की उनकी सेवा कहीं रजिस्‍टर नहीं हो सकी थी। वही कैबिनेट सेक्रेटरी अब एचआरडी मिनिस्‍टर है। उसकी हत्‍या करने की मंशा से ही शिव शर्मा यह सब कर रहा है। कुछ वैसा ही दुख यशवर्द्धन का भी है। उसके दोस्‍त हरीश की भी यही गति होती है। फिल्‍म के अंत में यशवर्द्धन के प्रयास और मांग से सभी रॉ ऑफिसर को बाइज्‍जत याद किया जाता है। यह एक बड़ा मुद्दा है। इसमें किसी अधिकारी या व्‍यक्ति से अधिक सिस्‍टम का दोष है,जो अपने ही अधिकारियों और जासूसों को पहचानने से इंकार कर देता है।
भाषा की अशुद्धियां खटकती हैं। भारतीय टीवी एचआरडी मिनिस्‍टर का नाम गलत हिज्‍जे के साथ ब्रीजेश वर्मा लिखता है। हंगरी के अधिकारी सही नाम ब्रजेश वर्मा बोलते हैं। यही मिनिस्‍टर अपने भाषण में हंगेरियन-इंडो बोलते हैं,जबकि यह इंडो-हंगेरियन होना चाहिए था। चीनी शहरों और व्‍यक्तियों के नामों के उच्‍चारण और शब्‍दांकन में भी गलतियां हैं।
अवधि- 126 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, September 1, 2016

‘अकीरा’ का अर्थ है सुंदर शक्ति - सोनाक्षी सिन्‍हा




-अजय ब्रह्मात्‍मज
अपनी पीढ़ी की कामयाब अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्‍हा में कुढ ऐसी बातें हैं कि वह दूसरी समकालीन अभिनेत्रियों की तरह चर्चा में नहीं रहतीं। दबंग 2010 में अई थी। पिछले छह सालों में सोनाक्षी सिन्‍हा ने 15 से अधिक फिल्‍में की हैं और उनमें से ज्‍यादातर हिट रही हैं। कल उनकी अकीरा आ रही है। इस फिल्‍म के पोस्‍टर और प्रचार में वह किक मारती दिखाई पड़ रही हैं। उनसे यह मुलाकात मुंबई के महबूब स्‍टूडियों में उनके वैनिटी वैन में हुई।
-अकीरा साइन करने की वजह क्‍या रही?
0 मुझे इस फिल्‍म में अपना कैरेक्‍टर अच्‍छा लगा। थ्रिलिंग और एंटरटेनिंग फिल्‍म होने के साथ ही इस फिल्‍म में एक सेदंश भी है। फिल्‍म के डायरेक्टर मुर्गोदास देश के बड़े एक्‍श फिल्‍म डायरेक्‍टर हैं। उन्‍होंने इस फिल्‍म का मुझे ऑफर दिया। मुझ पर उनका विश्‍वास भी प्रेरक रहा। मेरे लिए यह बहुत बड़ी रात रही।
-क्‍या बताया था उन्‍होंने?
0 ‘हॉलीडे में मेरे काम और एक्‍शन से वे प्रभावित थे। उन्‍होंने तभी कहा था कि वे मेरे साथ अगली हिंदी फिल्‍म बनाएंगे। यह मेरे अभी तक के करिअर का सबसे चैलेंजिंग रोल है।
-कुछ खास सीखना पड़ा?
0 मुझे मिक्‍स मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेनी पड़ी। चार महीनों की कड़ी ट्रेनिंग के बाद शूटिंग के दरम्‍यान भी अभ्‍यास जारी रहा। ऐसे एक्‍श सीन में बगैर तैयारी के जाने पर सब दिख जाता है। दर्शक समझ जाते हैं कि हीरोइन को कितना एक्‍शन आता है? मैं उन्‍हें निराश नहीं करना चाहती थी।
-एक्‍शन सीन में इमोशन कैसे कैरी करती हैं? उस समय तो चेहरे के भाव पर नियंत्रण नहीं रहता।
0 हमें फिलमों में एक्‍शन करते समय भी सही इमोशन रखना पड़ता है। एक्‍शन करने में शारीरिक तनाव रहता है,उसका असर चेहरे पर आ ही जाता है। एक्‍शन में टाइमिंग,फोर्स और स्‍पीड पर ध्‍यान देना पड़ता है। हमें यह भी ध्‍यान में रखना पड़ता है कि कोई चोट न लग जाए। अभी सुरक्षा और सुविधाएं बढ़ गई हैं,इसलिए हम लड़कियां एक्‍शन कर पा रही हैं।
-कितनी मुश्किल रही?
0 एक्‍शन तो है ही। मेरे लिए यह फिल्‍म इमोशनली भी मुश्किल रही। अकीरा के कैरेक्‍टर से मैं बिल्‍कुल रिलेट नहीं कर पाती हूं1 जिन परिस्थितियों से वह गुजरी है,मैं तो दु:स्‍वप्‍न में भी उनके बारे में नहीं सोच सकती। वह जेल जा चुकी है। करप्‍ट पुलिस अधिकारी से डील कर रही है। उसकी फैमिली ने उसे छोड़ दिया है। वह असाइलम में भी जाती है।
-कौन है अकीरा?
0 अकीरा एक स्‍ट्रांग लड़की है। वह अपने साथ गलत हो रही चीजों से लड़ती है और बाहर निकलती है। अकीरा जोधपुर की लड़की है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि अकीरा का मतलब सुंदर शक्ति होता है। यह संस्‍कृत शब्‍द है। हमारे पास और भी नाम आए थे,लेकिन यही नाम उचित लगा।
-अनुराग कश्‍यप इस फिल्‍म में आप के साथ बतौर अभिनेता आ रहे हैं। क्‍या बताना चाहेंगी?
0 सही में वे इस फिल्‍म के अभिनेता हैं। उन्‍होंने सेट पर कभी जाहिर नहीं किया कि वे चर्चित डायरेक्‍टर हैं। उन्‍होंने विलेन की बेहतरीन भूमिका निभाई है। मुझे तो अपने लिए वह सही विलेन लगे1 करप्‍ट पुलिस ऑफिसर के रूप में सभी उन्‍हें पसंद करेंगे। मैं तो उनसे मिलती रही हूं। वे लूटेरा के प्रोड्यूसर थे। मुझे लगता है कि दुनिया उन्‍हें ढंग से जानती नहीं है। वह बड़े सहज और खुशमिजाज व्‍यक्ति हैं। उनके पास इतनी कहानियां हैं।
-छह सालों के इस सफर से कितनी खुश हैं?
0 मैंने 15 फिल्‍में कर ली हैं। बहुत काम किया है। ऐसा लगता है कि कुल जमा अच्‍दा ही रहा। मैंने कुछ अच्‍छी और कुछ बुरी फिल्‍में की हैं। करना भी चाहिए। हमारे फैसले कई बार गलत भी हो जाते हैं। उनसे सीखते हैं हम। कोशिश करते हैं कि फिर से वैसी गलती न करें1

Friday, January 9, 2015

फिल्‍म समीक्षा : तेवर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
लड़के का नाम घनश्याम और लड़की का नाम राधिका हो और दोनों ब्रजभूमि में रहते हों तो उनमें प्रेम होना लाजिमी है। अमित शर्मा की फिल्म 'तेवर' 2003 में तेलुगू में बनी 'ओक्काड़ु' की रीमेक है। वे शांतनु श्रीवास्तव की मदद से मूल कहानी को उत्तर भारत में रोपते हैं। उन्हें अपनी कहानी के लिए आगरा-मथुरा की पूष्ठभूमि समीचीन लगती है। वैस यह कहानी हरियाणा से लेकर झारखंड तक में कहीं भी थोड़े फेरबदल के साथ ढाली जा सकती है। एक बाहुबली है। उसके दिल यानी रोज के गार्डन में एक लड़की प्रवेश कर जाती है। वह प्रोपोज करता है। लड़की मना कर देती है। और ड्रामा चालू हो जाता है। मथुरा के गुंडा बाहुबली की जोर-जबरदस्ती के बीच में आगरे का लौंडा पिंटू शुक्ला उर्फ घनश्याम आ जाता है। फिर शुरू होती है भागदौड़, मारपीट,गोलीबारी और चाकू व तलवारबाजी। और डॉयलागबाजी भी। हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के इन परिचित मसालों का इस्तेमाल होता रहा है। इस बार नई बात है कि उसमें अर्जुन कपूर और सोनाक्षी सिन्हा आ जाते हैं। उन्हें मनोज बाजपेयी से मुकाबला करना है। अपने तेवर के साथ प्यार का इजहार करना है।
फिल्में में कथ्य और विषय-वस्तु के तौर पर कोई नयापन नहीं है। फिर भी निर्देशक अमित रवींद्रनाथ शर्मा की प्रस्तुति रोचक है। नए कलाकारों की वजह से उत्सुकता बनी रहती है। यों लगता है कि निर्माता की तरफ से निर्देशक को स्पष्ट निर्देश है कि उन्हें एक मेकविलीब मसालेदार फिल्म में अर्जुन कपूर को फिट करना है। अमित इस निर्देश और जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हैं। वे अर्जुन को नाचते-गातेे, मस्ती करते, जोखिम उठाते, निडर भाव से विलेन से टकराते और नायिका के साथ प्रेम करते दिखाते हैं। माना जाता है कि किसी हीरो को अगर दर्शक इन अदाओं में पसंद कर लेते हैं तो वह पॉपुलर हो जाता है। 'तेवर' का ध्येय है अर्जुन कपूर को ऐसे पॉपुलर हीरो के तौर पर स्थापित करना। जाहिर सी बात है कि इसके लिए एक दमदार विलेन भी चाहिए था। उसकी जरूरत मनोज बाजपेयी ने पूरी की है। नायिका सुंदर और नृत्य प्रवीण हैं। वक्त-बेवक्त वह हीरो के साथ गाने गाती हैं। विलेन तो उनके नृत्य से ही मुग्ध और प्रेमासिक्त हुआ है। कुल मिला कर 'तेवर' शुद्ध मसाला फिल्मों के मानदंड पर खरी उतरती है। यह दर्शकों को भरपूर आनंद देगी।
'तेवर' में निर्देशक अमित रवींद्रनाथ शर्मा ने अर्जुन कपूर और सोनाक्षी सिन्हा को पारंपरिक मसाला फिल्म के ढांचे में ही कुछ नया कर दिखाने के अवसर दिए हैं। अर्जुन कपूर भरोसेमंद एक्टर-स्टार के तौर पर उभरते हैं। उन्होंने फिल्म में खुद का सलमान खान का फैन बताया है। 'तेवर' में वे वास्तव में सलमान खान के फंस के बीच अपनी पैठ बनाने की सफल कोशिश करते हैं। सच कहें तो मनोज बाजपेयी की मौजूदगी ने फिल्म को नया आयाम दे दिया है। वे अपने अंदाज से फिल्म को घिसे-पिटे माहौल से बाहर निकाल लाते हैं। खल भूमिकाओं के लिए आवश्यक नहीं है कि आप ऊंची आवाज में चिल्लाएं या अपनी कद-काठी से आतंकित करें। मनोज अपने हाव-भाव और छोटे इशारों से ही सिहरन पैदा करते हैं।
'तेवर' में देसी टच है। पिछले दिनों साउथ की रीमेक के तौर पर बनी अन्य फिल्मों से यह इसी कारण भिन्न प्रभाव डालती है। कहानी उत्तर भारत की लगती है। कलाकारों की संवाद अदायगी में उच्चारण की स्पष्टता गौरतलब है। इसमें थिएटर के ही चार से अधिक कलाकार है। उनके सान्निध्य में अर्जुन कपूर और सोनाक्षी सिन्हा की बोली भी निखर गई है। 'तेवर' में सुब्रत दत्ता पर नजर टिकती है। वे दी गई भूमिका में प्रभावित करते हैं। महेन्द्र मेवाती भी छोटी भूमिका में असरदार हैं। इसी प्रकार अनुभवी राज बब्बर अपनी भूमिका में जंचते हैं। इस बार तो वे अपनी जमीन के किरदार में थे।
फिल्म के गीत-संगीत में ब्रज की शैली और संस्कार की ध्वनियों की कमी खलती है। कुछ गीत तो असंगत और अनावश्यक हैं।
और अंत में, 'तेवर' हिंदी सिनेमा की उस शैली की फिल्म है, जिसमें गाल पर गुलाल लगा देने से पहचान छिप जाती है। इसके बावजूद अमित शर्मा की बारीकी ध्यान खींचती है।
अवधि-159 मिनट 
*** तीन स्‍टार

Tuesday, December 2, 2014

हर बार अलग अवतार में सोनाक्षी सिन्‍हा

-अजय ब्रह्मात्मज
 दो महीनों में सोनाक्षी सिन्हा की तीन फिल्में आएंगी। इनमें वह तीन पीढिय़ों के अभिनेताओं के साथ दिखेंगी। पहली फिल्म अजय देवगन के साथ ‘ऐक्शन जैक्सन’ है। उसके बाद दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकांत के साथ ‘लिंगा’ आएगी और फिर 2015 की शुरूआत अर्जुन कपूर एवं मनोज बाजपेयी के साथ आ रही ‘तेवर’ से होगी। तीनों के विषय और परिदृश्य अलग हैं।
    सोनाक्षी सिन्हा पहले ‘ऐक्शन जैक्सन’ की बात करती हैं,‘यह प्रभु देवा की फिल्म है। श्ह बहुत ही मसालेदार,एंटरटनिंग बौर ऐक्शन पैक्ड फिल्म है। इस फिल्म में पहली बार मेरे प्रशंसक मुझे वेस्टर्न ड्रेस में देखेंगे। चार सालों से लोग पूछ रहे थे कि मैं वेस्टर्न लुक में कब आऊंगी? तो लीजिए मैं आ गई। इस बार वे सभी खुश हो जाएंगे। इस फिल्म में मूरे चुने जाने की एक बड़ी वह मेरी कॉमिक टाइमिंग है। प्रभु देवा और अजय सर ने मुझे यही बताया। प्रभु और अजय दोनों के साथ पहले काम कर चुकी हैं। उन्हें लगा कि मैं रोल को संभाल पाऊंगी। बहुत ही फनी कैरेक्टर है मेरा। मैं ऐसी लडक़ी हूं,जिसका लक इतना खराब रहता है कि वह हमेशा फनी सिचुएशन में फंस जाती है। प्रभु देवा की फिल्म है तो सौंग ऐड डांस तो है ही।’
    अजय के साथ ‘सन ऑफ सरदार’ जैसी सफल फिल्म कर चुकी सोनाक्षी कहती हैं कि पिछली फिल्म से ‘ऐक्शन जैक्सन’ की तुलना करना उचित नहीं होगा। दोनों फिल्मों के विषय और डायरेक्टर अलग हैं। फिल्म में चुने जाने का किस्सा बताती हैं सोनाक्षी,‘प्रभु सर अजय देवगन के सामने जिक्र कर रहे थे कि उन्हें अगली फिल्म के परफेक्ट कॉमिक टाइमिंग की एक्ट्रेस चाहिए। अजय सर ने तत्काल कहा कि आप परफेक्ट टाइमिंग की एक्ट्रेस से बात कर रहे हैं। इन्हें चुन लें न ? कह सकती हूं कि मैं दोनों की पसंद हूं। टिवस्ट एंड टर्न हैं,लेकिन यह ऑल आउट एंटरटेनिंग फिल्म है।’
    रजनीकांत के साथ आ रही ‘लिंगा’ में सोनाक्षी ने पीरियड किरदार निभाया है। वह बताती है,‘मेरे लिए बहुत खुशी की बात है कि तमिल में मेरी शुरूआत रजनी सर के साथ हो रही है। मैं उनकी फैन पहले से थी। साथ में काम करने के बाद मैं उनकी जबरदस्त फैन हो गई हूं। कितने सरल और विनम्र हैं। ‘लिंगा’ की कहानी दो हिस्सों में बांटी जा सकती है। एक अभी की कहानी है और एक पांचवें दशक की कहानी है। मैं पांचवें दशक की कहानी में हूं। मेरा नाम मणि भारती है। चूंकि यह पीरियड फिल्म है,इसलिए फिल्म के प्रेम और अंतरंग दृश्य अलग तरीके से रचे गए। मुझे पापा के दोस्त रहे अभिनेता के साथ काम करने मेें कोई दिक्कत नहीं हुई। हम दोनों में किसी ने भी असहज महसूस नहीं किया। फिल्म देखते समय पाप भी असहज महसूस नहीं करेंगे।’ रजनीकांत ने सोनाक्षी को बताया कि वे खुद उनके पिता शत्रुघ्न सिन्हा के फैन रहे। उन्होंने करिश्माई अदाएं उसकी फिल्मों से सीखीं। सोनाक्षी ने बताया कि उन्होंने ‘लिंगा’ में काम करते हुए रजनीकांत से सीखा। उन्हें यह बात बहुत अच्छी लगी कि सेट पर निर्देशक समेत टीम के सभी सदस्य मदद करने के लिए आतुर रहते थे।
    अमित शर्मा की पहली फिल्म ‘तेवर’ को लकर सोनाक्षी बहुत उत्साहित हैं। वह अमित शर्मा की जारफ में उनकी ऐड फिल्मों का उल्लेख करती हैं। ‘तेवर’ के बारे में भी बताने के लिए उनके पास बहुत कुछ है। वह कहती हैं,‘आप देखेंगे कि अमित शर्मा आने वाले समय में कमाल करेंगे। गूगल के रीयूनियन ऐड की मर्मस्पर्शी फिल्में उन्होंने बनाई थीं। जो दो मिनट में अपनी बात कह सकता है,वह दो घंटे में तो कमाल कर देगा। मेरी अपेक्षा सही निकली। ‘तेवर’ तेलुगू में बनी ‘ओक्करू’ की रिमेक है। अमित ने फिल्म का भाव पहीं रखा है,लेकिन किरदार और परिवेश बदल दिया है। यह आगरा और मथुरा की कहानी हो गई है। यंग लव स्टोरी है। फिल्म के विलेन से भाग रहे लडक़े-लडक़ी के बीच प्यार पनपता है। इस बार लडक़ी प्यार का एहसास पहले करती है। बाद में लडक़ा भी उससे प्रेम करने लगता है। फिर दोनों मिल कर विलेन का मुकाबला करते हैं।’ अर्जुन स्कूल में सोनाक्षी के सीनियर रहे थे। तब हल्की-फुल्की मुलाकात रही थी। दोनों एक-दूसरे के बार में जानते रहे। मुलाकात और साथ ‘तेवर’ के सेट पर हुआ। उन्होंने पूरी मेहनत और लगन के साथ यह फिल्म की है। यह फिल्म उनके लिए इसलिए भी खास है कि वे पहली बार होम प्रोडक्शन की फिल्म में काम कर रहे हैं।
    सोनाक्षी संतुष्ट हैं कि उन्हें भिन्न उम्र के अभिनेताओं के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। वह कहती हैं,‘मेरे लिए चुनौती और अभ्यास का अवसर रहा। अर्जुन हमउम्र हैं। अजय सीनियर हैं और रजनी सर पापा के दोस्त।’

Tuesday, June 17, 2014

सोने की सीढ़ी चढ़ती सोनाक्षी सिन्‍हा


-अजय ब्रह्मात्मज
सोनाक्षी सिन्हा के लिए अच्छा ही रहा कि अक्षय कुमार प्रचलित फैशन में धुंआधार प्रचार में यकीन नहीं करते। अगर प्रमोशन के लिए शहरों के चक्कर लगते तो उन्हें ‘तेवर’ के सेट से छुट्टी लेनी पड़ती। संजय कपूर की इस फिल्म में वह अर्जुन कपूर के साथ दिखेंगी। फिल्म का निर्देशन अमित शर्मा कर रहे हैं। इस फिल्म की शूटिंग मथुरा, वाई और मुंबई में हुई है। मनोज बाजपेयी की प्रतिभा से मुग्ध सोनाक्षी उनकी तारीफ करना नहीं भूलतीं। अजय देवगन के साथ उनकी ‘एक्शन जैक्सन’ भी लगभग पूरी हो चुकी है। इन सभी फिल्मों से अधिक खुशी उन्हें रजनीकांत की फिल्म ‘लिंगा’ से है। ‘रजनीकांत की फिल्म करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। इस फिल्म की शूटिंग के पहले मैं घबराई हुई थी। मेरी घबराहट देख कर रजनी सर ने समझाया कि तुम से ज्यादा मैं घबराया हुआ हूं, क्योंकि तुम मेरे दोस्त की बेटी हो।’ सोनाक्षी बताती हैं कि फिल्म पांचवें दशक की पीरियड फिल्म है, इसलिए हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।
    दो दिनों पहले ही सोनाक्षी सिन्हा की ‘हॉलीडे’ रिलीज हुई है। अक्षय कुमार के साथ यह उनकी चौथी फिल्म है। जीवनशैली और आदतों से समानता की वजह से अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा की अच्छी निभती है। सोनाक्षी ने अक्षय कुमार की उन फिल्मों में भी झलक दी है, जिनकी वह नायिका नहीं रहीं। अक्षय उन्हें अपने लिए लकी मानते हैं। सोनाक्षी इस संबंध में कहती हैं, ‘पहली फिल्म ‘राउडी राठोड़’ के समय ही हमारी समझदारी बन गई थी। हमारी पिछली फिल्म ‘हॉलीडे’ पहले की फिल्मों से काफी अलग रही। इस बार कामेडी से अधिक जोर थ्रिलर पर था। मुर्गोदास को हिंदी दर्शक ‘गजनी’ से जानते हैं। उन्होंने इस बार गे्रग पावेल को एक्शन के लिए बुलाया था। मेरे लिए यह फिल्म अपने व्यक्तित्व के ज्यादा करीब रही। शुरू से खेलों में मेरी रुचि रही है। फिल्म में दिखाए गए लगभग सभी खेल मैं स्कूल के दिनों में खेल चुकी हूं। मेरे लिए केवल रग्बी और बॉक्सिंग ही नया खेल था। बॉक्सिंग की ट्रेनिंग और जानकारी मशहूर बॉक्सर विजेन्द्र सिंह से ली थी।’
    ‘हॉलीडे’ के लिए बाक्सिंग सीखने का यह फायदा हुआ है कि सोनाक्षी सिन्हा के नियमित एक्सरसाइज में बाक्सिंग भी शामिल हो गई है। वह कहती हैं, ‘हफ्ते में कम से कम दो दिन तो मैं बॉक्सिंग की प्रैक्टिश कर ही लेती हूं।’ फिल्में करते समय कलाकारों को नए-नए हुनर सीखने पड़ते हैं। कई बार ये हुनर जिंदगी में काम आते हैं और रेगुलर प्रैक्टिश न रहे तो भी सायकिलिंग और स्विमिंग की तरह हमेशा साथ रहते हैं। सोनाक्षी स्वीकार करती हैं, ‘यह हमारे पेशे की खासियत और मुसीबत दोनों है। चूंकि हमें पर्दे पर विश्वसनीय दिखना होता है, इसलिए कोशिश रहती है कि हम उसमें दक्ष दिखें।’ याद करें तो कुछ दशकों पहले तक हीरोइनें बैडमिंटन और टेनिस खेलती हुई नकली लगती थीं। सोनाक्षी स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, ‘अब निर्देशक या कलाकार वैसा रिस्क नहीं ले सकते।’
    लगातार सफल फिल्मों का हिस्सा रहीं सोनाक्षी सिन्हा समय की पाबंद और प्रोफेशनल हैं। फिल्म यूनिट से उनके नखरों की खबरें नहीं आतीं। कभी ऐसा भी नहीं सुना कि उनकी वजह से किसी यूनिट का कोई नुकसान हो गया हो। निजी जिंदगी में अनुशासन और व्यवहार का श्रेय वह अपनी परवरिश को देती हैं। वह कहती हैं, ‘शुरू से विनम्रता और अनुशासन की ट्रेनिंग मिली है। मैं हर तरह के उतार-चढ़ाव और बदलाव से वाकिफ हूं। फिल्मी परिवार है मेरा ़ ़ ़ मुझे मालूम है कि मैं क्या हूं और लोग मुझ से क्या चाहते हैं? यह मेरा प्रोफेशन है। फिल्मों के चलने या न चलने से हम प्रभावित जरूर होते हैं, लेकिन उन प्रभावों को दिमाग तक नहीं आने देते।’
    सोनाक्षी के अभी तक के करिअर में दो फिल्में नहीं चली हैं - एक ‘जोकर’ और दूसरी ‘लूटेरा’। ‘लूटेरा’ में उनके काम की सभी ने तारीफ की। ‘जोकर’ के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती। इन दोनों फिल्मों का जिक्र आने पर सोनाक्षी बेबाक कहती हैं, ‘मुझे ‘जोकर’ पसंद है। उसे बच्चों ने बहुत पसंद किया था। मुझे लगता है कि ‘जोकर’ अपने समय से पहले आ गई थी। मैं उसे अपनी बुरी फिल्म नहीं मानती। मौका मिले तो फिर से ‘जोकर’ कर सकती हूं। हां, ‘लूटेरा’ जैसी स्क्रिप्ट की तलाश में हूं। इधर कुछ स्क्रिप्ट पढ़ रही हूं, जिनमें टिपिकल मसाला फिल्मों की हीरोइन के रोल नहीं है। मैं आउट ऑफ द बाक्स फिल्मों के लिए तैयार हूं, लेकिकिसी दबाव या प्रलोभन में वैसी फिल्म नहीं कर सकती। सबसे पहले तो वह फिल्म मुझे अच्छी लगे। ‘लूटेरा’ मेरे लिए टेलर मेड रोल था। ऐसा रोल मिले तो कभी भी कर लूंगी। इसके बावजूद मुझे यह बताने में संकोच नहीं है कि मुझे मसाला फिल्में अच्छी लगती हैं। बतौर दर्शक मैं ऐसी फिल्में देखती हूं। ऐसी फिल्में ज्यादा से ज्यादा दर्शक तक पहुंचती हैं। बिजनेस अच्छा करती हैं। फिर भी संतुलन बनाए रखूंगी। इसी साल ‘हॉलीडे’ के बाद ‘एक्शन जैक्सन’ आएगी तो ‘तेवर’ और ‘लिंगा’ भी आएगी।’
    सोनाक्षी सिन्हा ‘लिंगा’ में पांचवे दशक का किरदार निभा रही हैं। यह पीरियड फिल्म है। ‘लूटेरा’ भी पीरियड फिल्म थी। सोनाक्षी अपने अनुभव के बारे में कहती हैं, ‘पीरियड फिल्में अलग तरह का सुख देती हैं। उन फिल्मों की तैयारी और परफारमेंस में वक्त लगता है। उनसे तृप्ति का अनुभव होता है।’ लगातार सफल फिल्में दे रही सोनाक्षी सिन्हा की तुलना हेमा मालिनी से की जा रही है। हेमा मालिनी अपने समय में कामयाब फिल्में जरूर दीं, लेकिन ़ ़ ़ बात खत्म होने के पहले ही सोनाक्षी पूछ बैठती हैं यह अच्छी बात है कि नहीं? यह बताने पर कि हेमा मालिनी की सफल फिल्मों की तुलना में यादगार फिल्में कम हैं,सोनाक्षी चौंकती हैं और फिर अपना पक्ष रखती हैं, ‘अभी मैं केवल चार साल पुरानी हूं। थोड़ा और समय दें। आप निराश नहीं होंगे। अभी मेरे पास काफी समय है। चार सालों की मेरी उपलब्धि दूसरी हीरोइनों की आठ सालों की जर्नी के बराबर है। मैं शुद्ध मन से हर तरह की फिल्में कर रही हूं। मैंने कभी किसी रणनीति के तहत फिल्में नहीं चुनी हैं।’

Friday, June 6, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हॉलीडे

Click to enlargeहालांकि मुरूगादास ने तमिल में 'थुपक्की' बना ली थी, लेकिन यह फिल्म हिंदी में सोची गई थी। मुरूगादास इसे पहले हिंदी में ही बनाना चाहते थे। अक्षय कुमार की व्यस्तता कमी वजह से देर हुई और तमिल पहले आ गई। इसे तमिल की रीमेक कहना उचित नहीं होगा। फिल्म के ट्रीटमेंट से स्पष्ट है कि 'हॉलीडे' पर तमिल फिल्मों की मसाला मारधाड़, हिंसा और अतिशयोक्तियां का प्रभाव कम है। 'हॉलीडे' हिंदी फिल्मों के पॉपुलर फॉर्मेट में ही किया गया प्रयोग है।

विराट फौजी है। वह छुट्टियों में मुंबई आया है। मां-बाप इस छुट्टी में ही उसकी शादी कर देना चाहते हैं। वे विराट को स्टेशन से सीधे साहिबा के घर ले जाते हैं। विराट को लड़की पसंद नहीं आती। बाद में पता चलता है कि साहिबा तो बॉक्सर और खिलाड़ी है तो विराट अपनी राय बदलता है। विराट और साहिबा की प्रेम कहानी इस फिल्म की मूलकथा नहीं है। मूलकथा है एक फौजी की चौकसी, सावधानी और ड्यूटी। मुंबई की छुट्टियों के दौरान विराट का साबका एक 'स्लिपर्स सेल' से पड़ता है। (स्लिपर्स सेल आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो नाम और पहचान बदल कर सामान्य नागरिक की तरह जीते हैं।) बहरहाल, स्लिपर्स सेल की जानकारी मिलने पर चौकस विराट अपने फौजी साथियों की मदद से उनका सफाया करता है।
अक्षय कुमार ने इस फिल्म के लिए लुक और गेटअप पर ध्यान दिया है। आवश्यक परिवर्तन से वे आकर्षक भी दिखे हैं, लेकिन वे अपनी चाल और शैली पूरी तरह से नहीं छोड़ पाते। इस कारण विराट और स्टार अक्षय कुमार गड्डमगड्ड हो जाते हैं। पापुलर एक्टर की यह बड़ी सीमा है कि वह कैसे अपने स्टारडम और इमेज से निकल कर किसी किरदार को आत्मसात करे। अक्षय कुमार पूरी कोशिश करते हैं और कुछ दृश्यों में प्रभावशाली लगते हैं। 'हॉलीडे' का एक्शन अधिक विश्वसनीय है। सोनाक्षी सिन्हा फिल्म की प्रेमकहानी के लिए आवश्यक थीं। लेखक-निर्देशक की कोशिश रही है कि ऐसी फिल्मों की हीरोइनों की तरह साहिबा केवल शोपीस या आयटम न रहे। फिल्म में साहिबा खिलाड़ी है। सोनाक्षी सिन्हा खिलाड़ी की तरह नजर आती हैं। फिल्म में कुछ गाने जबरन न डाले जाते तो ठीक रहता।
अन्य कलाकारों में सुमित राघवन, जाकिर हुसैन और फरहाद (फ्रेडी दारूवाला) प्रभावित करते हैं। खास कर फरहाद ने मिले मौके का भरपूर लाभ उठाया है। उनकी प्रेजेंस दमदार है। सुमित राघवन अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं। 'हॉलीडे' में परिचित सहयोगी कलाकारों को नहीं रखने से ताजगी आ गई है। जाकिर हुसैन ऐसी भमिका पहले भी कर चुके हैं।
फिल्म अलबत्ता थोड़ी लंबी लगती है और राष्ट्रप्रेम एवं फौज के प्रति आदर जगाने के प्रयास अपनी अतिवादिता से कही-कहीं कृत्रिम लगने लगती है। फिल्म के अंत का प्लेटफार्म पर चित्रित विदाई समारोह में रिश्तेदारों की भावुकता लंबी,यक्सांऔर नकली हो गई है। क्या फौजियों के मोर्च पर लौटने के समय रेल्वे स्टेशनों पर ऐसा ही रोना-रोहट चलता है?
अवधि- 170 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Saturday, December 7, 2013

फिल्‍म समीक्षा : आर...राजकुमार

-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रभु देवा निर्देशित 'वांटेड' से ऐसी फिल्मों की शुरुआत हुई थी। ढेर सारे हवाई एक्शन, हवा में लहराते कलाकार, टूटी-फूटी चीजों का स्लो मोशन में बिखरना और उड़ना, बदतमीज हीरो, बेजरूरत के नाच-गाने और इन सब में प्रेम का छौंक, प्रेमिका के प्रति नरम दिल नायक ..दक्षिण के प्रभाव में बन रही ऐसी फिल्मों की लोकप्रियता और कमाई ने हिंदी की पॉपुलर फिल्मों का फार्मूला तय कर दिया है। प्रभुदेवा निर्देशित 'आर ..राजकुमार' इसी कड़ी की ताजा फिल्म है।
इस बार शाहिद कपूर को उन्होंने एक्शन हीरो की छवि दी है। मासूम, रोमांटिक और भोले दिखने वाले शाहिद कपूर को खूंटी दाढ़ी देकर रफ-टफ बनाया गया है। एक्शन के साथ डांस का भड़कदार तड़का है। शाहिद कपूर निश्चित ही सिद्ध डांसर हैं। श्यामक डावर के स्कूल के डांसर शाहिद कपूर को प्रभु देवा ने अपनी स्टाइल में मरोड़ दिया है। एक्शन और डांस दोनों में शाहिद कपूर की जी तोड़ मेहनत दिखती है। ऐसी फिल्मों के प्रशंसक दर्शकों को 'आर .. राजकुमार' मनोरंजक लग सकती है, लेकिन लोकप्रियता की संभावना के बावजूद इस फिल्म की सराहना नहीं की जा सकती। फिल्म में थोड़ा प्यार और बहुत ज्यादा मार है।
फिल्म का हीरो अलग-अलग दृश्यों में 'सायलेंट हो जा नहीं तो वॉयलेंट हो जाऊंगा' दोहराता है। नायकसिर्फ बोलता ही नहीं। मौका मिलते ही वह वॉयलेंट भी हो जाता है। नायक के चरित्र को इसी रंग में गढ़ा गया है। उसके चेहरे पर प्रेम से अधिक गुस्से का भाव है। उसकी आंखों से रोमांस नहीं वॉयलेंस टपकता है। लहुलूहान चेहरा लिए दिल में उबलते नायक का लक्ष्य नयिका को हासिल करना है। हिंदी फिल्मों का यह पुराना लक्ष्य रहा है। इस लक्ष्य की पूर्ति में बीच की सारी हरकतें जायज मान ली जाती हैं। इस फिल्म में तो नायक मौत के बंद मुंह से लौट कर आता है। फिल्म के एक दृश्य में 'बुलशिट शायरी' का आनंद लिया गया है। 'आर ..राजकुमार' का मनोरंजन कुछ-कुछ उसी स्तर का है।
वक्त आ गया है कि 'आर .. राजकुमार' को दर्शक परखें और तय करें कि उन्हें भविष्य में कैसी फिल्में देखनी हैं? इसकी सफलता से निर्माता-निर्देशक को फिर एक बहाना मिलेगा कि दर्शक यही चाहते हैं। अफसोस की बात है कि नायक कभी पैसों तो कभी प्रेम के लिए हिंसक तो होता है, लेकिन उसकी इस मनोवृति के पीछे ठोस लॉजिक नहीं है। फिल्म के एक प्रसंग में बताया गया है कि वह भागलपुर से आया है। अचानक भागलपुर शहर से नायक का संबंध बताने का औचित्य समझ में नहीं आता।
प्रचलित खामियों के बावजूद इस फिल्म में शाहिद कपूर और सोनाक्षी दोनों की प्रतिभाओं के नए आयाम दिखते हैं। पर्दे पर दोनों की झिझक खत्म हुई है। उन्होंने अपनी भूमिकाएं जिम्मेदारी से निभाई है। सोनाक्षी सिन्हा के नृत्य में गति और मादकता आ गई है। शाहिद कपूर भी कैमरे के आगे अधिक सहज दिखे हैं। सोनू सूद को अच्छा मौका मिला है। लंबे समय के बाद आशीष विद्यार्थी को पर्दे पर देखना सुखद था, लेकिन घिसी-पिटी भूमिका में उनका लौटना दुखद था। अफसोस कि यह सब एक स्तरहीन फिल्म में हुआ है।
फिल्म के गीत मुख्य रूप से नृत्य के लिए ही रखे गए हैं। इन गीतों पर शाहिद कपूर और सोनाक्षी सिन्हा का झूमना फिल्म के वॉयलेंस की फील को थोड़ा कम करता है। गीतों के शब्द चालू किस्म के हैं। हाल से निकलने पर 'गंदी बात, गंदी बात' कानों में बजता रहता है।
अवधि-146 मिनट
** दो स्‍टार

Friday, November 29, 2013

फिल्‍म समीक्षा : बुलेट राजा

Bullet Rajaदेसी क्राइम थ्रिलर 
-अजय ब्रह्मात्‍मज
तिग्मांशु धूलिया 'हासिल' से अभी तक अपनी फिल्मों में हिंदी मिजाज के साथ मौजूद हैं। हिंदी महज एक भाषा नहीं है। हिंदी प्रदेशों के नागरिकों के एक जाति (नेशन) है। उनके सोचने-विचारने का तरीका अलग है। उनकी संस्कृति और तहजीब भी थोड़ी भिन्न है। मुंबई में विकसित हिंदी सिनेमा की भाषा ही हिंदी रह गई है। संस्कृति, लोकाचार, बात-व्यवहार, परिवेश और प्रस्तुति में इसने अलग स्वरूप ले लिया है। प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में यह एक हद तक आ पाती है। तिग्मांशु धूलिया ने बदले और प्रतिशोध की अपराध कथा को हिंदी प्रदेश में स्थापित किया है। हालांकि मुंबइया सिनेमा (बॉलीवुड) के दुष्प्रभाव से वे पूरी तरह से बच नहीं सके हैं, लेकिन उनके इस प्रयास की सराहना और प्रशंसा करनी होगी। 'बुलेट राजा' जोनर के लिहाज से 'न्वॉयर' फिल्म है। हम इसे 'पुरबिया न्वॉयर' कह सकते हैं।
इन दिनों हिंदी फिल्मों में लंपट, बेशर्म, लालची और लुच्चे नायकों की भीड़ बढ़ी है। 'बुलेट राजा' के राजा मिसरा को गौर से देखें तो वह इन सब से अलग तेवर का मिडिल क्लास का सामान्य युवक है। वह 10 से 5 की साधारण नौकरी करना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां ऐसे बनती हैं कि उसके हाथों में बंदूक आ जाती हैं। आत्मविश्वास के धनी राजा मिसरा के दिन-दहाड़े गोलीकांड से सभी आतंकित होते हैं। जल्दी ही वह प्रदेश के नेताओं की निगाह में आ जाता है। उनकी राजनीतिक छत्रछाया में वह और भी संगीन अपराध और हत्याएं करता है। एक स्थिति आती है कि उसकी हरकतों से सिस्टम को आंच आने लगती है। उसे हिदायत दी जाती है तो वह सिस्टम के खिलाफ खड़ा हो जाता है। राजा मिसरा आठवें दशक के एंग्री यंग मैन विजय से अलग है। वह आज का नाराज, दिग्भ्रमित और दिल का सच्चा युवक है। दोस्ती, भाईचारे और प्रेम के लिए वह जान की बाजी लगा सकता है।
राजा मिसरा के जीवन में दोस्त रूद्र और प्रेमिका हैं। इनके अलावा उसका मध्यवर्गीय परिवार भी है, जिसके लिए वह हमेशा फिक्रमंद रहता है। राजा मिसरा आठवें दशक के विजय की तरह रिश्तों में लावारिस नहीं है। रूद्र की हत्या का बदला लेने से जब उस रोका जाता है तो स्पष्ट कहता है, 'भाई मरा है मेरा। बदला लेने की परंपरा है हमारी। यह कोई कारपोरेट कल्चर नहीं है कि अगली डील में एडजस्ट कर लेंगे।' तिग्मांशु अपने फिल्मों के चरित्रों को अच्छी तरह गढ़ते हैं। इस फिल्म में ही रूद्र, सुमेर यादव, बजाज, मुन्ना और जेल में कैद श्रीवास्तव को उन्होंने हिंदी प्रदेश की समकालीन जिंदगी से उठा लिया है। शुक्ला, यादव और अन्य जातियों के नामधारी के नेताओं के पीछे कहीं न कहीं हिंदी प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को भी पेश करने की मंशा रही होगी। तिग्मांशु का ध्येय राजनीति के विस्तार में जाना नहीं था। कई प्रसंगों में अपने संवादों में ही वे राजनीतिक टिप्पणी कर डालते हैं। अगर भाषा की विनोदप्रियता से वाकिफ न हों तो तंज छूट सकता है। मुंबई, कोलकाता और चंबल के प्रसंग खटकते हैं।
सैफ अली खान ने राजा मिसरा के किरदार में चुस्ती, फुर्ती और गति दिखाई है। अगर उनके बातों और लुक में निरंतरता रहती तो प्रभाव बढ़ जाता। उम्र और अनुभव से वे देसी किरदार में ढलते हैं। जिम्मी शेरगिल को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन उन दृश्यों में ही वे अपनी असरदार मौजूदगी से आकर्षित करता है। सुमेर यादव की भूमिका में रवि किशन मिले दृश्यों में ही आकर्षित करते हैं। छोटी और महत्वपूर्ण भूमिकाओं में राज बब्बर, गुलशन ग्रोवर आदि अपनी भूमिकाओं के अनुकूल हैं। यहां तक कि चंकी पांडे को भी एक किरदार मिला है। सोनाक्षी सिन्हा बंगाली युवती के किरदार को निभा ले जाती हैं। विद्युत जामवाल का एक्शन दमदार है।
फिल्म का गीत-संगीत थोड़ा कमजोर है। देसी टच और पुरबिया संगीत की ताजगी की कमी महसूस होती है। 'तमंचे पर डिस्को' खास उद्देश्य को पूरा करता है और 'डोंट टच' में माही गिल का नृत्य बॉलीवुड के आयटम नंबर से प्रभावित है। इस फिल्म की खूबी परतदार पटकथा और स्थितिजन्य संवाद हैं।
अवधि: 138 मिनट 
**** चार स्‍टार 

Friday, August 16, 2013

फिल्‍म समीक्षा : वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा

Once upon a time in Mumbai Dobaara
नहीं बनी बात 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
मिलन लुथरिया अपनी पहचान और प्रयोग के साथ बतौर निर्देशक आगे बढ़ रहे थे। 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा' से उन्हें झटका लगेगा। यह उनकी कमजोर फिल्म है। पहली कोशिश में मिलन सफल रहे थे, लेकिन दूसरी कोशिश में पहले का प्रभाव नहीं बनाए रख सके। उन्होंने दो अपराधियों के बीच इस बार तकरार और तनाव के लिए प्रेम रखा, लेकिन प्रेम की वजह से अपराधियों की पर्सनल भिड़ंत रोचक नहीं बन पाई। पावर और पोजीशन के लिए लड़ते हुए ही वे इंटरेस्टिंग लगते हैं।
शोएब और असलम अनजाने में एक ही लड़की से प्रेम कर बैठते हैं। लड़की जैस्मीन है। वह हीरोइन बनने मुंबई आई है। आठवें दशक का दौर है। तब फिल्म इंडस्ट्री में अंडरव‌र्ल्ड की तूती बालती थी। जैस्मीन की मुलाकात अंडरव‌र्ल्ड के अपराधियों से होती है। कश्मीर से आई जैस्मीन का निर्भीक अंदाज शोएब को पसंद आता है। वह जैस्मीन की तरफ आकर्षित होता है, लेकिन जैस्मीन तो शोएब के कारिंदे असलम से प्रेम करती है। आखिरकार मामला आमने-सामने का हो जाता है। लेखक-निर्देशक ने इस छोटी सी कहानी के लिए जो प्रसंग और दृश्य रचे हैं, वे बांध नहीं पाते। संवादों पर अधिक मेहनत की गई है। इतनी मेहनत हो गई है कि दृश्यों पर संवाद भारी पड़ते हैं और अपना अर्थ खो देते हैं। दृश्यों में नाटकीयता हो तो संवादों (डायलॉगबाजी) में मजा आता है। इस बार रजत अरोड़ा का गुण ही फिल्म के लिए अवगुण बन गया है।
फिल्म के पीरियड में एकरूपता नहीं रखी गई है। कभी 'मदर इंडिया' के पोस्टर दिख जाते हैं तो कभी बाद के दशक का गाना सुनाई पड़ता है। अक्षय कुमार और इमरान खान के लुक और स्टाइल में भी उल्लेखनीय भिन्नता है। हां, कोशिश की गई है मारुति के बाद की कारें सड़कों पर न दिखाई पड़े। सोनाक्षी सिन्हा के पहनावे, चाल-ढाल और संवाद अदायगी में पीरियड का अधिक खयाल नहीं रखा गया है।
कुछ ही दृश्यों में इमरान खान की मेहनत सफल होती दिखती है। भाव और संवाद की अदायगी में वे सक्षम नहीं हैं। अक्षय कुमार के चरित्र को स्टाइल देने में सफलता मिली है। उन्हें जोरदार डायलॉग भी मिले हैं, लेकिन उनके कुछ संवादों में 'बुरा मान जाएगी' तकियाकलाम जोड़ने के चक्कर में रजत अरोड़ा ने उन्हें बेअसर कर दिया है। सोनाक्षी सिन्हा को शुरू में चपर-चपर करना था और बाद में बिसूरना था। वह दोनों ही काम को निजी स्तर पर ढंग से कर ले गई हैं। फिल्म के अन्य किरदार अत्यंत ढीले और फीके हैं।
यह फिल्म मर्दवादी है। शोएब के किरदार को रंगीन और असरकारी दिखाने के लिए रचे गए दृश्यों और संवादों में यह नजरिया स्पष्ट है। शोएब के चरित्र को नकारात्मक रखा गया है तो इसे लेखक-निर्देशक युक्तिसंगत ठहरा सकते हैं। जैस्मीन या अन्य महिला किरदारों के प्रति पुरूष किरदारों का रवैये के बारे में क्या कहेंगे? कह सकते हैं कि मर्द दर्शकों को ध्यान में रख कर ही यह फिल्म बनाई गई है।
और हां, अक्षय कुमार का नाम शोएब है। बीच-बीच में वह शोहेब क्यों सुनाई पड़ता है?
अवधि-160 मिनट 
** दो स्‍टार 

Friday, July 5, 2013

फिल्‍म समीक्षा : लुटेरा

Lootera-अजय ब्रह्मात्‍मज 
आप किसी भी पहलू से 'लुटेरा' का उल्लेख करें। आप पाएंगे कि चाहे-अनचाहे उसकी मासूमियत और कोमलता ने आप को भिगो दिया है। इस प्रेम कहानी का धोखा खलता जरूर है,लेकिन वह छलता नहीं है। विक्रमादित्य मोटवाणी ने अमेरिकी लेखक ओ हेनरी की कहानी 'द लास्ट लीफ' का सहारा अपनी कहानी कहने के लिए लिया है। यह न मानें और समझें कि 'लुटेरा' उस कहानी पर चित्रित फिल्म है। विक्रम छठे दशक के बंगाल की पृष्ठभूमि में एक रोचक और उदास प्रेम कहानी चुनते हैं। इस कहानी में अवसाद भी है,लेकिन वह 'देवदास' की तरह दुखी नहीं करता। वह किरदारों का विरेचन करता है और आखिरकार दर्शक के सौंदर्य बोध को उष्मा देता है। अपनी दूसरी फिल्म में ही विक्रम सरल और सांद्र निर्देशक होने का संकेत देते हैं। ठोस उम्मीद जगते हैं।
फिल्म बंगाल के माणिकपुर में दुर्गा पूजा के समय के एक रामलीला के आरंभ होती है। बंगाली परिवेश,रोशनी और संवादों से हम सीधे बंगाल पहुंच जाते हैं। विक्रम बहुत खूबसूरती से बगैर झटका दिए माणिकपुर पहुंचा देते हैं। फिल्म की नायिका पाखी रायचौधरी (सोनाक्षी सिन्हा)को जिस तरह उसके पिता वात्सल्य के साथ संभाल कर कमरे में ले जाते हैं,लगभग वैसे ही दर्शकों को संभालते हुए विक्रम अपनी फिल्म में ले आते हैं। आप भूल जाते हैं कि थोड़ी देर पहले थिएटर में आने के समय तक आप 2013 की यातायात समस्याओं को झेल रहे थे। याद भी नहीं रहता कि आप की जेब में मोबाइल है और आप को बेवजह देख लेना चाहिए कि कहीं कोई मैसेज तो नहीं आया है।
फिल्म सीधे बंगाल की धरती पर विचरती है। हम इस समाज और इसके किरदारों को सत्यजित राय की अनेक फिल्मों में देख चुके हैं। विक्रम यहां सत्यजित राय की शैली का युक्तिपूर्ण और सामयिक इस्तेमाल कर अपने किरदारों को पेश कर देते हैं। फिर उनके हिंदी संवादों से हम हिंदी फिल्मों की सिनेमाई दुनिया में आ जाते हैं। 'लुटेरा' का पीरियड और परिवेश चुभता नहीं है। निश्चित ही इसके लिए फिल्म के प्रोडक्शन डिजायनर और कॉस्ट्यूम डिजायनर समत अन्य तकनीशियनों को भी धन्यवाद देना होगा कि उनकी काबिलियत से यह फिल्म संपूर्णता को छूती नजर आती है।
फिल्म में पाखी के पिता भीलों के राजा की कहानी सुनाते हैं,जिसकी जान तोते में बसती थी। पाखी की जान का रिश्ता पत्ती से बन जाता है। फिल्म का यह रोचक दृष्टांत है। पाखी के शांत और सुरम्य जीवन में किसी मोहक राजकुमार की तरह वरूण (रनवीर सिंह) प्रवेश करता है। अचानक पाखी के मन की की थिर झील में हिलोरें उठने लगती हैं। भावनाओं की कोमल कोपलें फूटती हैं। वरूण भी इस प्रेम को स्वीकार करता है। पाखी के पिता को भी वरूण अपनी बेटी के लिए होनहार और उपयुक्त लगता है।
दोनों के परिणय सूत्र में बंधने-बांधने की तैयारियां शुरू होती हैं कि ़ ़ ़इस कि के बाद फिल्म मोड़ लेती है। यहां से विक्रम कहानी और चरित्रों को अलग दिशा और उठान में जाते हैं। उन्होंने दोनों प्रमुख कलाकारों के साथ बाकियों को भी हुनर दिखाने के अवसर दिए हैं।
विक्रम की 'लुटेरा' सोनाक्षी सिन्हा और रनवीर सिंह के करियर की उल्लेखनीय फिल्म रहेगी। इन दिनों फिल्मों की तमाम प्रतिभाएं कथित मनोरंजन की भेड़चाल में छीजती जा रही हैं। यहां एक फिल्म में दो युवा प्रतिभाओं को अपनी प्रतिभा की सधनता दिखाने का मौका मिला है। गौर करें तो रनवीर सिंह अपनी पिछली फिल्मों के चरित्रों के मिजाज के विस्तार में हैं,लेकिन इस बार उनका चरित्र जटिल और द्वंद्व में उलझा है। रनवीर ने अत्यंत सहजता से वरूण उर्फ नंदू उर्फ आत्मानंद त्रिपाठी के चरित्र को निभाया है। सोनाक्षी सिन्हा के बारे में धारणा रही है कि पॉपुलर स्टारों के सहारे वह बॉक्स ऑफिस की बेजोड़ हीरोइन रही हैं। उनके आलोचक भी स्वीकार करेंगे कि उन्होंने 'लुटेरा' में अपनी अनछुई और अनजान प्रतिभा को उजागर किया है। विक्रम की फिल्म ने उन्हें तराशा और तपाया है। सोनाक्षी ने पाखी को जिया है। अन्य कलाकार भी उल्लेखनीय हैं।
पाखी के जमींदार पिता के रूप में बरूण चंदा उल्लेखनीय हैं। हिंदी फिल्मों में किरदारों के बारे में बताने के लिए कुछ सीन खर्च करने पड़ते हैं। बरूण दा की उपस्थिति मात्र से उन दृश्यों की बचत हो गई है। आदिल हुसैन फिर से प्रभावशाली भूमिका में नजर आते हैं। आरिफ जकारिया,दिब्येन्दु भट्टाचार्य,विक्रांत मैसी और दिव्या दत्ता अपेक्षाकृत छोटी और जरूरी भूमिकाओं में संग योगदान करते हैं। इस फिल्म की एक प्रासंगिक खासियत है। फिल्म देखते समय आप ने संवादों पर धान ही नहीं दिया होगा। फिल्म में डॉयलॉगबाजी नहीं है। सारे भाव-अनुभाव सहज शब्दों में संप्रेषित होते हैं। संवाद लेखक अनुराग कश्यप का योगदान सराहनीय है। साथ ही फिल्म के एक खास दृश्य में बाबा नागार्जुन की कविता 'अकाल और उसके बाद' का युक्तिगत उपयोग उसे हिंदी मिजाज देता है। सभी भाषाओं में दो किरदारों को भाव की एक ही जमीन पे लाने के लिए लेखक-निर्देशक कविताओं का इस्तेमाल करते रहे हें। हिंदी फिल्मों में भी हम अंग्रेजी की कविताएं या अशआर सुनते रहे हैं। अनुराग कश्यप ने बाबा नागार्जुन की की कविता 'कई दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास' से पाखी और वरूण के बीच प्रेम का संचार कराया है। बाबा की कविता के इस्तेमाल के लिए टीम लुटेरा को अतिरिक्त बधाई।
फिल्म के गीत-संगीत और सिनेमैटोग्राफी का जिक्र होना ही चाहिए। अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य की जोड़ी ने भावपूर्ण और परिवेशात्मक संगीत देता है। केवल मोनाली ठाकुर के स्वर में 'संवार' की 'सवार' ध्वनि खलती है। फोटोग्राफी में महेंद्र शेट्टी के सटीक एंगल और विजन से फिल्म की खूबसूरती बढ़ गई है। और हां फिल्म के निर्माताओं को धन्यवाद कि उन्होंने ऐसे विध्वंयात्मक मनोरंजन के दौर में विक्रमादित्य की सोच को संबल दिया।
अवधि-187 मिनट
**** 1/2 साढ़े चार स्टार

Saturday, April 20, 2013

अफवाहें हंसने के लिए होती हैं- सोनाक्षी सिन्हा

सोनाक्षी सिन्हा की ब्लॉकबस्टर सफलता का सीक्रेट जानने की रघुवेन्द्र सिंह ने कोशिश की
'रामायण' कभी केवल शत्रुघ्न सिन्हा का पता हुआ करता था. इस बंगले का नाम लेते ही लोग आपको उनके घर तक पहुंचा देते थे. मगर वक्त के साथ दो चीजें परिवर्तित हो चुकी हैं. पहली- अब बंगले के स्थान पर एक सात मंजिला आलीशान इमारत खड़ी हो चुकी है और दूसरी- अब इसमें केवल एक नहीं, बल्कि दो स्टार रहते हैं. जुहू स्थित 'रामायण' वर्तमान की लोकप्रिय अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा का भी पता बन चुका है.
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने बेटे लव, कुश और बेटी सोनाक्षी सिन्हा को एक-एक फ्लोर दे दिया है, जिसकी आंतरिक साज-सज्जा आजकल वे स्वेच्छा से करने में जुटे हैं. लिफ्ट के जरिए हम सातवें फ्लोर पर पहुंचते हैं, तो सोनाक्षी की करीबी दोस्त और मैनेजर भक्ति हमारा स्वागत करती हैं. कुछ ही पल के बाद सोनाक्षी हाजिर होती हैं और फिल्मफेयर हिंदी की तरक्की के बारे में चर्चा करती हैं. आपको याद दिला दें कि दबंग गर्ल और अब राउड़ी गर्ल सोनाक्षी सिन्हा फिल्मफेयर हिंदी की पहली कवर गर्ल थीं. अनौपचारिक बातचीत के बाद हमने सवाल पूछना आरंभ किया, तो सोनाक्षी ने सबका जवाब अपनी खिलखिलाती हंसी के साथ दे डाला...

आप जिन फिल्मों का चुनाव करती हैं, वो ब्लॉकबस्टर साबित होती हैं. इसका राज क्या है?
कुछ सीक्रेट नहीं है. आप तो इनकी सफलता का सारा क्रेडिट मुझे ही दे दे रहे हैं (हा-हा-हा). ऐसा नहीं है कि दबंग और राउड़ी राठौड़ सिर्फ मेरी वजह से हिट हुई हैं. मैं अपने आप को बहुत खुशनसीब मानती हूं कि मैं इनका हिस्सा बन सकी. एक दर्शक के तौर पर मैं जैसी फिल्में देखना पसंद करती हूं, वैसी ही फिल्मों का चुनाव मैं काम करने के लिए करती हूं. जब मैंने इन फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ी, तो मुझे पसंद आईं और मैंने कर लीं. मैंने परवाह नहीं की कि बॉक्स-ऑफिस पर इनका क्या होगा. दबंग ब्लॉकबस्टर हो गई, तो राउड़ी राठौड़ पर हिट होने का प्रेशर आ गया. इसका सफल होना मेरे लिए बहुत खुशी की बात है. मैं इनकी सफलता का क्रेडिट अकेले नहीं ले सकती. यह सबकी डायरेक्टर, को-स्टार, तकनीशियन की मेहनत का नतीजा है, जो ये फिल्में व्यापक स्तर पर दर्शकों को छू गईं.

क्या आप फिल्मकारों के लिए खुद को लकी मानती हैं?
मुझे नहीं पता कि मैं लकी हूं या नहीं. ऐसे टैग हमें मीडिया दे देती है. मेरी दो फिल्में चल गईं, तो मैं लकी हूं और ईश्वर न करें कि कल मेरी कोई फिल्म नहीं चली, तो लकी का टैग मुझसे छीन लिया जाएगा. इसलिए मैं इन चीजों की ओर ध्यान नहीं देती. मैं केवल अपना काम करती हूं.

यानी आप इस चीज के लिए मानसिक रुप से तैयार हैं कि कल यह टैग जा भी सकता है?
हां, क्यों नहीं? इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है. उतार-चढ़ाव सबके जीवन में आते हैं. अच्छे-अच्छों के साथ ऐसा हुआ है.

आप मानती हैं कि शोहरत अस्थायी होती है?
बिल्कुल. सब अपने-अपने टाइम की बात होती है. किसी का टाइम अच्छा चल रहा है, तो चल रहा है. कल अच्छा समय नहीं रहा, तो उसके बाद और अच्छा टाइम आएगा.

आपको देखकर बहुत अपनापन लगता है. इस छवि के उलट भी क्या आपका कोई पहलू है, जिसे हम नहीं जानते हैं?
नहीं, मैं जैसी हूं, वैसी सबको दिखती हूं. आप जैसा मुझे देख रहे हैं, मैं हमेशा वैसी ही रहती हूं. दिल में जो है, वो बोल देती हूं. सबके साथ अच्छे से रहती हूं. मैं कैट फाइट नहीं करती हूं. अपने बारे में कैट फाइट की बातें पढ़-पढक़र मैं थक गई हूं. किसी से भी आप इस बारे में पूछेंगे, तो वो हंसेंगे, क्योंकि मैं ऐसी हूं ही नहीं. मैं अपना काम खत्म करती हूं, घर आती हूं और सबके साथ खुशी-खुशी रहती हूं.

ये बातें सुनकर लगता है कि आपको अपने प्लस पॉइंट्स पता हैं.
मुझे अपने प्लस और निगेटिव दोनों पहलू पता हैं और जो मेरे प्लस पॉइंट्स हैं, उसी पर मैं ध्यान देती हूं. मेरी स्क्रीन प्रजेंस अच्छी है, डायलॉग डेलीवरी अच्छी है, वह शायद पापा पर गई है. हिंदी भाषा पर मेरी पकड़ अच्छी है, कॉन्फिडेंस है और वह भी पापा से ही मुझे मिला है. ये मेरे प्लस पॉइंट्स हैं. माइनस पॉइंट्स मेरे हिसाब से है कि मैं इंपल्सिव हूं. मैं जल्दबाजी कभी-कभी करती हूं. मैं कभी-कभार अपना आपा खो देती हूं. मगर मैं अपने निगेटिव पॉइंट्स की ओर ध्यान नहीं देती.

आपके माइनस पॉइंट्स हमें कभी देखने को नहीं मिलते हैं?
और शायद आपको कभी देखने को मिले भी नहीं, क्योंकि ऐसा बहुत कम होता है. अपनी कमजोरियों पर मेरा कंट्रोल रहता है.

आपको क्या बातें नाराज कर देती हैं या अगर कोई आपके साथ बात कर रहा है, तो उसे क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
बहुत कम चीजें हैं, जो आजकल मुझे नाराज करती हैं, क्योंकि इंडस्ट्री में रहकर आपको इसकी आदत हो जाती है. आप रोज सुबह उठते हैं और कुछ न कुछ अपने बारे में न्यूजपेपर में पढ़ते हैं. यहां ऐसे लोग हैं, जो आपको जानते भी नहीं हैं, वो आपके बारे में कुछ भी लिख सकते हैं. हमें इसकी आदत पड़ जाती है. हां, मेरे काम, प्रोफेशनलिज्म की तारीफ हो, तो मुझे खुशी होती है.

एक्टर्स हमेशा चापलूसों से घिरे रहते हैं. ऐसी स्थिति में उनके लिए जेनुइन और झूठी प्रशंसा के बीच फर्क करना बहुत मुश्किल होता है. आप कैसे करती हैं?
मैं समझ जाती हूं कि कौन मेरी झूठी तारीफ कर रहा है. पता नहीं कुछ लोग कैसे नहीं समझ पाते. मेरे अगल-बगल ऐसे लोग हैं, जिन्हें मैं सालों से जानती हूं. मेरे स्कूल और कॉलेज के दोस्त हैं, फैमिली है. मैं जानती हूं कि ये लोग मेरी झूठी तारीफ नहीं करेंगे. अगर मुझमें कोई खामी है, तो ये खुलकर अच्छे तरीके से बता देंगे.

ग्रामीण लड़कियों की भूमिकाएं निभाते हुए आप उनके प्रति लगाव महसूस करती हैं. क्या आपको लगता है कि ग्रामीण लड़कियों को किसी चीज की कमी है?
ऐसी कोई बात नहीं है. गांव की लड़कियां शहर की लड़कियों की बराबरी कर रही हैं. औरत में जो शक्ति होती है, वो किसी मर्द में नहीं होती. जब मैं कोई किरदार निभा रही होती हूं, तो मेरे दिमाग में ये बातें नहीं आतीं. यह मेरा काम है और मैं उसे कर रही हूं. सेट के माहौल में ये सब बहुत कम सोचने को मिलता है. अगर कुछ दूसरा सेटअप हो, कोई प्रोग्राम हो, जिसमें मुझे डिटेल में रिचर्स करने को मिले, अनुभव करने को मिले, तो शायद मैं सोच पाऊं.

क्या हम आपको किसी ऐसी भूमिका में देखेंगे, जो हीरोइन होते हुए भी फिल्म की हीरो हो?
बिल्कुल, क्यों नहीं? अभी तो मेरी तीसरी फिल्म रिलीज हुई है. आगे जाकर बहुत सारे ऐसे रोल आएंगे, जो हीरोइन के कंधे पर होंगे. मैं ऐसी फिल्म करना चाहूंगी. लुटेरा शायद एक ऐसी फिल्म है, जिसमें लडक़ी का रोल लडक़े के बराबर है. वह शुरुआत होगी.

कई फिल्मों में हीरोइन की भूमिका ना के बराबर होती है. मीडिया में उसकी आलोचना भी होती है. आप फिल्में साइन करते समय इन बातों पर गौर करती हैं?
मैं ऐसा नहीं सोचती हूं. मैं स्क्रिप्ट पढ़ती हूं, तो देखती हूं कि यह फिल्म मुझे दर्शक के तौर पर पसंद आएगी, इसलिए मैं फिल्म करती हूं. रोल छोटा हो या बड़ा, वह काम तो है. अगर मैं वह काम नहीं करुंगी, तो कोई और उसे कर लेगा. अगर उस कैरेक्टर की जरुरत नहीं होती, तो वह फिल्म में होता ही नहीं. मैं नहीं समझ पाती कि मीडिया क्यों ऐसे सोचता है कि अरे, उसके छह डायलॉग थे, सीन कम था. ऐसे नहीं होता. फिल्म का हिस्सा होना अपने आप में अच्छी बात है.


अभिनेत्री होने का एक पहलू यह है कि आपके अफेयर की चर्चा चलती रहती है. जैसे आजकल आपके और रणवीर सिंह के नाम की चर्चा है. इन पर आप कितना ध्यान देती हैं और आप कैसे हैंडल करती हैं इन्हें?
अफवाहें हंसने के लिए होती हैं. मैं हंसकर भूला देती हूं. इन पर जितनी कम प्रतिक्रिया दी जाए, उतना अच्छा होता है. अगर आप रिएक्ट करेंगे, तो कोई और कुछ बोलेगा और फिर वह टेनिस बॉल की तरह हो जाएगा. चुप रहना बेहतर होता है.

इन चीजों से क्या पर्सनल लाइफ प्रभावित होती है?
बिल्कुल नहीं. लोगों को लगता है कि अफवाहों से हमारी निजी लाइफ पर असर पड़ता है. ऐसी भी अफवाह आ जाती है कि मेरे पैरेंट्स अपसेट हैं. जबकि किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. डैड पैंतीस साल से इंडस्ट्री में हैं. उन्हें पता है कि लोग क्या और कैसे लिखते हैं. वे बहुत सारे जर्नलिस्ट्स को जानते हैं. उनको ऐसी बातें पेपर या मैगजीन में पढक़र नहीं पता चलने वाली हैं. वे मुझे यानी अपनी बेटी को अच्छी तरह जानते हैं. 

इंडस्ट्री की लव स्टोरीज सच होती हैं, लेकिन फिर भी स्टार्स छुपाते रहते हैं. जैसे रितेश-जेनिलिया ने नौ साल तक ना-ना कहा और अचानक शादी कर ली. सेलीब्रिटीज प्यार की बात को छुपाते क्यों हैं?
मुझे नहीं पता. सबकी पर्सनल च्वॉइस होती है. अगर आप एक्टर हैं, तो आपका जीवन ऐसे ही पब्लिक के बीच रहता है, लोग आपको देखते हैं, बातें करते हैं. तो ऐसे में आप अपने जीवन की कुछ बातें छुपाकर रख सकते हैं, तो अच्छी बात है.

क्या यह सच है कि स्टार के जीवन का सच हम या दुनिया के लोग कभी नहीं जान पाते?यह स्टार पर निर्भर करता है. अगर कोई स्टार है, जो सब कुछ शेयर करता है, फिर नहीं. शायद हां, कभी नहीं जान पाते.

आपकी ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री सलमान खान, अक्षय कुमार और अजय देवगन के साथ जमती है. क्या पर्सनल लाइफ में भी आप ऐसे ही मेच्योर पुरुष को जगह देंगी?
देखते हैं. इतने मेच्योर... पता नहीं... हा-हा-हा. आपके इस सवाल ने मुझे लाजवाब कर दिया. बिल्कुल नहीं. मैं अपनी उम्र के किसी लडक़े को जगह दूंगी... हा-हा-हा. लेट्स सी... हा-हा-हा. मेरे ऑन स्क्रीन रोमांस का मेरे पर्सनल टेस्ट से कोई लेना-देना नहीं है... हा-हा-हा.

हो सकता है कि आपके डैड शत्रुघ्न सिन्हा की स्ट्रान्ग इमेज से आपके हमउम्र लडक़े आपके पास आने से डरते हों?
अभी उनको मौका ही कहां मिलता है. मैं बाहर नहीं जाती हूं, पार्टी नहीं करती हूं. मैं अपने दोस्तों के साथ रहती हूं. काम करती हूं. अभी तक ऐसा मौका किसी को मिला नहीं है. मगर ऐसा नहीं है कि मैं प्यार को अपने जीवन में आने से रोक रही हूं. हो जाए प्यार तो, ठीक है. प्यार जब होना होगा, अपने समय पर ही होगा.

मतलब अभी तक आपको प्यार हुआ ही नहीं है?
ऐसा नहीं है कि मुझे कभी प्यार नहीं हुआ. प्यार हुआ है, लेकिन अभी नहीं है.

शत्रुघ्न सिन्हा अभी अस्पताल में थे और आप लगातार शूटिंग कर रही थीं. आपके लिए यह बहुत मुश्किल वक्त रहा होगा?
जी थोड़ा-बहुत मुश्किल रहा. डैड हमेशा मेरी पहली प्राथमिकता रहते हैं. मैं हर दिन उनके साथ अस्पताल में रहती थी. या तो शूटिंग के पहले या शूटिंग पूरा करने के बाद. शूटिंग के बीच में भी समय मिल गया, तो उनके पास जाकर बैठती थी. अभी वो ठीक हैं.

बच्चन परिवार उनसे मिलने के लिए अस्पताल पहुंचा था. क्या अब दोनों परिवारों के बीच में सब अच्छा है?
जहां तक हमारी बात है, तो हां. हमारे संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं. जया (बच्चन) आंटी हमेशा मुझसे अच्छी तरह पेश आई हैं. जब वे अस्पताल में आए थे, तो मैं वहां पर थी. वो लोग डैड से मिले. दोनों परिवारों के बीच सब अच्छा है.

अभिनय की तरह राजनीति भी आपके घर में रही है, तो उस ओर आपकी कभी दिलचस्पी नहीं हुई?
नहीं, सबका अपना-अपना इंट्रेस्ट होता है. मेरी रुचि राजनीति में नहीं है. मैं एक्टिंग में खुश हूं. मैं राजनैतिक मुद्दों के बारे में ज्यादा नहीं सोचती हूं. रोज की बातचीत में थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती रहती है. पापा बताते रहते हैं.


अपने डैड को आप पर्दे पर मिस करती हैं?
नहीं, क्योंकि बचपन में भी मैंने उनकी कम फिल्में ही देखी हैं. मैंने उन्हें रोज घर में पापा के रुप में देखा है. मैंने उन्हें कभी एक्टर की तौर पर नहीं देखा है. मैं घर में रोज उनसे बात करती हूं. ऐसी कमी महसूस नहीं होती. हां, उन्हें स्क्रीन पर देखते हैं, तो गर्व महसूस होता है, क्योंकि वो इतने अच्छे कलाकार हैं.

आपने कहा है कि आप इंटीमेट सीन नहीं करेंगी. मगर माना जाता है कि अगर अभिनेत्रियां ऐसे दायरे बनाती हैं, तो उनका करियर छोटा हो जाता है.
देखते हैं कि आगे जाकर क्या होता है. अभी मुझे इसकी परवाह नहीं है, क्योंकि मैं काफी फिल्में कर रही हूं, जिनमें इनकी जरुरत नहीं है. अगर इसकी वजह से मेरा करियर छोटा हो जाएगा, तो हो जाए. देखेंगे. (हा-हा-हा). हम क्या कर सकते हैं.

करीना कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बीइंग फैट इज नॉट सेक्सी. फैट इज आउट. उन्होंने कहा कि हर लडक़ी स्लिम फीगर चाहती है. आप क्या कहना चाहेंगी?
सबका अपना अलग-अलग टेस्ट होता है. इस तरह जनरलाइज नहीं करना चाहिए. काफी लोग हैं, जो ऐसे ही खुश हैं. 'फैट बिल्कुल सेक्सी नहीं है, हां, फिट जरुर सेक्सी हैÓ, उन्होंने ये कहा था. और वे बिल्कुल सही हैं. मैं मानती हूं कि सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है. अगर आप बोल रहे हैं कि आपको कोई सुंदर नहीं लगा, तो ठीक है. सबकी अपनी-अपनी राय होती है.

फराह खान आपको शाहरुख खान के साथ एक फिल्म में साइन करना चाहती हैं. क्या आपसे उन्होंने संपर्क किया है?
उन्होंने आपसे कहा है (हा-हा-हा). मैंने भी रिपोर्ट्स पढ़ी हैं. उन्होंने अभी तक मुझसे संपर्क नहीं किया है. जब तक फराह से आपकी या मेरी बात न हो, हमें कुछ नहीं कहना चाहिए. जोकर फिल्म में मैंने उनके साथ एक कोरियोग्राफर के तौर पर काम किया है और उनके निर्देशन में जरुर काम करना चाहूंगी. वह बहुत अच्छी निर्देशक हैं.

आपके भाई लव और कुश ने फिल्मों में करियर बनाने की कोशिश की, लेकिन आप उनसे आगे निकल गई हैं. वे इसे कैसे लेते हैं?
उन्हें अपनी बहन पर गर्व है. हमारे बीच ऐसी कोई बात नहीं है. डैड ने हमारी परवरिश एक समान की है. हमारे बीच कभी भेद-भाव नहीं किया उन्होंने. मुझे भी कहा गया था कि तुम जो भी करना चाहती हो, करो, हम तुम्हें सपोर्ट करेंगे.

आप अपने भाई की फिल्म में काम करने जा रही हैं. इसका स्पष्टीकरण तो दे सकती हैं, क्योंकि यह आपके घर की बात है?
हां, यह मेरे घर की बात है, लेकिन यह अभी बहुत दूर की बात है. अभी मैं काफी कमिटमेंट्स में बंधी हुई हूं. स्क्रिप्ट का सेशन अभी शुरु होगा. अगर ऐसा कोई मौका मिलेगा, तो मैं जरुर काम करना चाहूंगी.

अक्षय कुमार के साथ आप लगातार फिल्में कर रही हैं. कुछ लोगों का कहना है कि वे आपको अपनी फिल्मों के लिए रिकमेंड कर रहे हैं?
अगर आप एक एक्टर के साथ काम कर रहे हैं, तो लोग वह जोड़ी, केमिस्ट्री, काम करने का तरीका देखकर साइन करते हैं. हम कभी सेट पर देर से नहीं आते हैं. समय पर हमारा काम खत्म हो जाता है. निर्माता को कभी हमसे कोई दिक्कत नहीं होती है. ये सब बातें भी इंडस्ट्री में जाती हैं, इसलिए लोग आपको बार-बार साथ साइन करना चाहते हैं. मुझे नहीं पता कि अक्षय का मुझे रिकमेंड करने वाली बातें सच हैं या नहीं.

अभी आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं?
अभी अच्छा काम चल रहा है. इस साल मेरी वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई 2, लुटेरा, दो-तीन और प्रोजेक्ट्स हैं, जो अभी पाइप लाइन में हैं. अगले दो साल के लिए मैं सेट हूं. उसके आगे का अभी मैं नहीं सोच रही हूं. जितना काम है, उसे पहले खत्म करुंगी.

 साभार : FILMFARE

Friday, December 21, 2012

फिल्‍म समीक्षा : दबंग 2

dabang 2 movie review

मसाले में गाढ़ा, स्वाद में फीका

-अजय ब्रह्मात्मज
अवधि-129 मिनट
**1/2 ढाई स्टार
पहली फिल्म की कामयाबी, धमाकेदार प्रचार, पॉपुलर गाने, प्रोमो से जगी जिज्ञासा और सब के ऊपर सलमान खान की मौजूदगी..अगर आप ने 'दबंग' देखी और पसंद की है तो 'दबंग 2' देखने की इच्छा करना लाजिमी है। यह अलग बात है कि इस बार मसाला गाढ़ा,लेकिन बेस्वाद है। पहली बार निर्देशक की जिम्मेदारी संभाल रहे अरबाज खान ने अपने बड़े भाई सलमान खान के परिचित अंदाज को फिर से पेश किया है। फिल्म में नवीनता इतनी है कि चुलबुल पांडे के अपने पिता प्रजापति पांडे और भाई मक्खीचंद से मधुर और आत्मीय रिश्ते हो गए हैं। इसकी वजह से एक्शन के दो दृश्य बढ़ गए हैं और इमोशन जगाने का बहाना मिल गया है। 'दबंग 2' में 'दबंग' की तुलना में एक्शन ज्यादा है। खलनायक बड़ा लगता है,लेकिन है नहीं। उसे चुनौती या मुसीबत के रूप में पेश ही नहीं किया गया है। सारी मेहनत सलमान खान के लिए की गई है।
'दबंग' की कहानी 'दबंग' से कमजोर है। सूरज को मुट्ठी में करने और कसने के जोश के साथ चुलबुल पांडे पर्दे पर आते हैं। चारों दिशाओं को थर्रा देने का उनमें दंभ है। चुलबुल पांडे लालगंज से कानपुर शहर के बजरिया थाने में आ गए हैं। इस थाने में आने के बाद वे शहर के कुख्यात सरगना बच्चा भैया से टकराते हैं। उद्देश्य है दबाव बनाए रखना। शहर में कानून-व्यवस्था ठीक करना और प्राप्त धन के हिस्से से चुलबुल पांडे चैरिटेबल ट्रस्ट चलाना। चुलबुल पांडे ने अपनी मां की अंतिम इच्छा का ख्याल रखते हुए पिता और भाई की देखभाल शुरू कर दी है। परिवार पर आंच आते ही चुलबुल पांडे अगियावैताल हो जाते हैं और फिर खुद ही नियम, कानून और व्यवस्था की परवाह नहीं करते। उनके इस ढीठ व्यवहार का कोई तर्क नहीं है, फिर भी सब कुछ चलता है।
ऐसी मसाला फिल्मों में एक्शन, कामेडी, इमोशन आदि भावों के दृश्यों को डाल देने के बाद लेखक-निर्देशक उसे हिलाकर मसालेदार मनोरंजन तैयार करते हैं। 'दबंग 2' में सारे मसाले हैं, लेकिन उन्हें ढंग से हिलाया नहीं गया है। इस वजह से फिल्म के अलग-अलग दृश्यों में मनोरंजन के विभिन्न स्वाद तो मिलते हैं,लेकिन थिएटर से निकलने के बाद कोई भी स्वाद याद नहीं रहता। लेखक-निर्देशक ने दृश्यों में तारतम्य बिठाने की अधिक कोशिश नहीं की है। पिछली बार कहानी के धागे में दृश्यों को पिरोया गया था, इस बार दृश्यों के गूंथने की कोशिश नहीं है। दरअसल, कहानी का धागा ही नहीं है। हां, एक्शन दृश्यों में चुस्ती, फुर्ती और गति रखी गई है। गानों के फिल्मांकन में भीड़ और लचक बढ़ गई है। कानपुर शहर की हल्की सी छटा मिलती है। फिर भी यह कैसा शहर है, जहां किसी शरीफ के दर्शन ही नहीं होते। पूरा पुलिस महकमा पांडे, तिवारी, चौबे और माथुर से भरा हुआ है।
फिल्म में अनेक विसंगतियां हैं। मोबाइल युग में हरे पर्दे वाला रेडियो.. यह तो टीवी चैनलों के आने से भी दो दशक पहले की बात है। शहर के सुशिला (सुशीला होना चाहिए) टाकीज में 'शोले' चल रही है, लेकिन चुलबुल पांडे की जीप और खलनायक की गाड़ियां आज की हैं। यहां तक कि कानपुर शहर में जिस अखबार को दिखाया जाता है, वह उस शहर से प्रकाशित ही नहीं होता। फिल्म के दृश्यों और गानों में कमर्शियल टायअप के उत्पादों का बेधड़क इस्तेमाल खटकता है।
साफ दिखता है कि निर्देशक ने पिछली फिल्म की कामयाबी के दोहन की पूरी कोशिश की है। सलमान खान खुद को इस तरह दोहराते रहेंगे तो जल्दी ही दर्शक उनका स्वागत करना बंद कर देंगे। एक सलमान खान के अलावा किसी भी कलाकार या किरदार को उभारने और निखारने का प्रयास नहीं किया गया है। खलनायक बने प्रकाश राज के अभिनय, अंदाज और प्रसंगों में भी दोहराव है। सोनाक्षी सिन्हा समेत सभी कलाकार बेअसर रहते हैं। निर्देशक ने उन पर ध्यान ही नहीं दिया है। आठवें-नौवें दशक की मसाला फिल्मों में नायक-खलनायक की जबरदस्त मुठभेड़ और डॉयलॉगबाजी होती थी। उनकी कमी खलती है। क्रम से आ रही ऐसी फिल्में मुख्यधारा की मसालेदार फिल्मों की खुरचन भर रह गई हैं। उसी के स्वाद से संतुष्ट होने के लिए मजबूर दिख रहे हैं दर्शक,क्योंकि फिलहाल और कोई मसालेदार विकल्प नजर नहीं आ रहा। 'दबंग 3' की संभावना का संकेत भी दे दिया गया है।

Thursday, December 20, 2012

रिश्तों से वजूद है चुलबुल पांडे का - सलमान खान


-अजय ब्रह्मात्मज
    सलमान खान की लोकप्रियता  का अंदाजा इस से भी लगाया जा सकता है कि वे मुंबई में जहां मौजूद रहें, उस इमारत के बाहर खबर लगते ही भीड़ लगने लगती है। मुंबई में बाकी स्टार भी हैं, लेकिन उनके साथ हमेशा ऐसा नहीं होता। भाई (मुंबई और इंडस्ट्री में सभी उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं) की एक झलक पाने के लिए बेचैन इस भीड़ को उनकी एक मुस्कान या हाथ हिलाने से ही सुकून मिल जाता है। बहरहाल, ‘दबंग 2’ की रिलीज के ठीक पहले हुई उनसे हुई बातचीत ...
-  क्या कहेंगे ‘दबंग 2’ के बारे में?
0 ‘दबंग’ और ‘दबंग 2’ एक ही फिल्म है। पहली फिल्म फस्र्ट हाफ थी, यह सकेंड हाफ हे। बड़ी जगह,  बड़ा विलेन, बड़ा एक्शन और हीरोइज्म ...हमने तगड़ी नजर रखी है कि यह ओवर बोर्ड न चली जाए। चुलबुल पांडे अपना ही कैरीकेचर न बन जाए। इस बार चुलबुल पांडे के इनहेरेंट हयूमर पर ज्यादा प्ले नहीं किया है। उसकी रियल लाइफ क्वालिटी को सुपर हीरो में नहीं बदलना था। फर्स्‍ट दबंग में चुलबुल पांडे के साथ अनेक परेशानियां थी। सेकेंड दबंग में सब ठीक हो गया है। भाई से सुलह हो गई है, पिता से सहज हो गए हैं चुलबुल और उनकी शादी हो चुकी है। ऐसी खुशी के बीच जब उसे अपने परिवार पर खतरा नजर आता है तो वह रिएक्ट करता है। वह अपनी मां की आखिरी ख्वाहिश पारिव7ार के बचाव के लिए कुछ असाधारण काम करता है।
- मतलब फिल्म रिश्तों और परिवार पवर केंद्रित है?
0 चुलबुल पांडे का वजूद ही रिश्तों से है। मां, सौतेले भाई, सौतले पिता और बीवी के बीच वह गाढ़े इमोशन से जुड़ा है। हम ने कोशिश की है कि दर्शकों को पहली फिल्म से यह अलग न लगे। इसे लिखने और बनाने में सभी की बैंड बज गई थी। सिंपल फिल्म लिखना मुश्किल काम है। बच्चों से बुजुर्गों तक मेरे दर्शक हैं। कोशिश यह भी रहती है कि जो दर्शक अभी तक प्रशंसक नहीं हैं, वे भी प्रशंसक बन जाएं।
- पूरी यूनिट और ट्रेड सर्किल में ‘दबंग 2’ को लेकर जोश बना हुआ है?
0 फस्र्ट लुक, ट्रेलर, गाने और डॉयलांग सबकुछ लोगों को पसंद आता गया है। इससे कंफीडेंस बढ़ा है। 21 दिसंबर को पता चलेगा कि हमारा कंफीडेंस ठीक था या नहीं? हम पास हुए कि नहीं?
- ‘वांटेड’ से आप की फिल्मों की दिशा बदल गई है?
0 मैंने तो ‘वीर’ में ही कोशिश की थी। तब अड़ नहीं पाया। मैंने 115 मिनट की फिल्म फायनल की थी, लेकिन उन्होंने 178 मिनट की फिल्म रिलीज कर दी थी। उसके बाद मैंने सबक लिया। अब अड़ जाता हूं, क्योंकि दर्शक मुझे ही देखने आते हैं। यहां अरबाज खान निर्देशक हैं। इस बार सब सही है अभी तक। हम जो फिल्म देखना चाहते हैं, वही बनाई है। फिल्म दर्शकों में देखने की जल्दबाजी पैदा कर दे तो हिट होती है।
- इस कामयाबी के पीछे कितनी मेहनत लगती है?
0 मेहनत तो सभी करते हैं। मुझे तो नवाजा है उस ने। मैंने लोगों को मेहनत करते देखा है, वे मेरे जैसे मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। मैंने कट्रीना कैफ से सीखा है कि जब नवाजा गया हूं तो नाशुक्रापन न दिखाऊं। मेहनत करूं और सभी को खुश रखूं। मैंने अपनी मेहनत का लेबल दो पर्सेंट बढ़ा दिया है। ताकि देखते हुए लगे कि सलमान खान पर्दे पर कुछ कर रहा है। गोविंदा के सहज और स्वाभाविक अभिनय को लोग मानने लगे हैं कि वे मेहनत नहीं करते। इसलिए मेहनत करते हुए दिखना चाहता हूं।
- लेकिन कामेडी पर ही इतना जोर क्यों?
0 अपने यह चीखने-चिल्लाने, रोने-बिसूरने और चुप हो जाने को, एक्टिंग माना जाता है। कामेडी सबसे मुश्किल काम है। टेलरमेड रोल में क्या परफार्मेंस? परफार्मेंस तो वो है, जो स्क्रिप्ट के आगे जाती है।
- बिइंग सलमान खुद आप के लिए क्या है?
0 मेरे प्रेजेंट पर ही निर्भर करता है। अभी सब ऊपर की तरफ जा रहा है। इसका जो मतलब निकालें।
- आप ट्रेडसेटर हो गए हैं। अपने इस रोल पर क्या कहेंगे?
0 यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा। चार-पांच फिल्में और बनेंगी। यह कोई फार्मूला नहीं है। यह जोनर जल्दी ही सैचुरेट हो जाएगा। फिल्म में इमोशनल बेस हो। ‘दबंग’ बच्चों की फिल्म नहीं है, लेकिन वे उसे पसंद कर रहे हैं। ‘तेरी मेरी प्रेम कहानी’ बच्चों का गाना नहीं , लेकिन उसे देश-विदेश के बच्चे गुनगुनाते रहे। हमारी संवेदना बच्चों की हो गई है या बच्चे बड़े हो गए हैं।
- ‘दबंग’ के बाद एक अच्छी बात हुई कि उत्तर भारत के दर्शक थिएटरों में लौटे। उन्हें खास फिल्मों और फिल्मकारों में पहले थिएटर से बाहर कर दिया था ...
0 उन्हें अपनापन लगा। आप ठीक कह रहे हैं कि देश के दर्शकों को अपना सिनेमा नहीं मिल रहा था। ‘दबंग’ के समय ट्रेड पंडित कह रहे थे कि हम मर जाएंगे। वे खुद के साथ फिल्म इंडस्ट्री को भी डुबाएंगे। चुलबुल पांडे स्माल टाउन का हीरो पर्दे पर आया। मैं नार्थ का नहीं हूं, लेकिन मेरे इमोशन स्माल टाउन के हैं। मैंने ‘दबंग’ में अनोखे शब्द बोले हैं।
- इमेज शिफ्ट भी हुआ है आप का?
0 कुछ नहीं . अब मैं आसानी से ना बोल देता हूं। पहले कई तरह के प्रेशर में रहता था। सीधा मना कर देता हूं। जानता हूं कि कुछ लोग इस से नाराज हैं, लेकिन करोड़ों लोग खुश भी हैं। मैं खुश हूं। बिइंग हयूमन का काम कर पा रहा हूं।
- क्या अपने बारे में लिखा पढ़ते हैं?
0 मैं अब समझ गया हूं कि आर्टिकल में आप का पाइंट ऑफ व्यू रहता है। जर्नलिस्ट या लेखक का ... तारीफ या आलोचना से प्रभावित नहीं होता। अच्छी चीज से खुशी होती है, लेकिन पता तो रहता है कि तारीफ भी कितनी सही है? जैसे कि आलोचना गलत होती है कई बार, वैसे ही तारीफ भी गलत होती है। लेकिन आप सभी के लेखन से मेरे फैन प्रभावित होते हैं। मेरी पर्सर्नलिटी फेसबुक, ट्विटर और बिग बॉस में आ जाती है।
- अपनी कामयाबी को कैसे संभालते हैं?
0 कैसी कामयाबी... काम करो। बूढ़े आदमी को अपने अंदर घुसने नहीं देता। हमेशा जवान रहता हूं और जवांदिली से काम करता हूं।

Sunday, December 16, 2012

सोनाक्षी सिन्‍हा से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत


-अजय ब्रह्मात्मज

    एक ‘जोकर’ को भूल जाएं तो सोनाक्षी की अभी तक रिलीज हुई हर फिल्म ने बाक्स आफिस पर अच्छी कमाई की है। ‘दबंग’, ‘राउडी राठौड़’ और ‘सन ऑफ सरदार’ इन तीनों फिल्मों ने 100 करोड़ से अधिक का कारोबार किया। अब उनकी ‘दबंग 2’ आ रही है। इस फिल्म के वितरण अधिकार ही 180 करोड़ में बेचे गए हैं। इसकी कामयाबी भी सुनिश्चित है। लगातार सफल फिल्में दे रही सोनाक्षी सिन्हा सफलता के नए अध्याय लिख रही हैं। इस कामयाबी के बावजूद शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी सिन्हा में गुरूर नहीं आया है। वह अब भी पहली फिल्म के समय की की तरह सहज, चुलबुली और सामान्य हैं। दिन हो या रात मुंबई हो या बंगाल  ़ ़ ़ हर समय हर जगह अपनी फिल्मों की शूटिंग में मशगूल सोनाक्षी अपनी आगे-पीछे की पीढ़ी की हीरोइनों के लिए ईष्र्या का कारण बन गई हैं। पिछले दिनों ‘वन्स अपऑन अ टाइम इन मुंबई 2’ की शूटिंग के दरम्यान उन से कुछ बातें हुईं।
- एक और कामयाबी ़ ़ ़ सारी आशंकाओं के बावजूद ‘सन ऑफ सरदार’ 100 करोड़ क्लब में आ ही गई। कैसा महसूस कर रही हैं?
0 हम सभी ने बहुत मेहनत और दिल लगा कर काम किया था। ‘सन ऑफ सरदार’ के लिए फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों के बीच शुरू से ही पॉजीटिव फीलिंग थी। फिल्म बनते समय अच्छी बातें सुनने को मिलने लगे तो हमारा जोश बढ़ जाता है। जैसी उम्मीद थी, फिल्म उससे ज्यादा चली।
- रिलीज के समय थोड़ा विवाद हो गया था। क्या उससे सफलता का स्वाद खट्टा हुआ?
0 यह तो हर फिल्म के साथ होता है। जब भी दो फिल्में एक साथ रिलीज होती हैं तो इस ढंग की बातें सुनने को मिलती हैं। सारी फिल्मों को सोलो रिलीज नहीं मिल सकती। मुझे लगता है कि मीडिया ने इस क्लैश को ज्यादा फ्लैश किया। उन्हें खूब इंटरेस्टिंग सुर्खियां मिलीं। मीडिया को लिखने-दिखाने के मिल गया और - इस सफलता ने सोनाक्षी सिन्हा पर क्या प्रभाव डाला?
0 कुछ भी नहीं। ‘दबंग’ के समय और उसके पहले से मैं आप से मिलती रही हूं। क्या आप ने मुझ में कोई बदलाव महसूस किया? मैं ऐसे परिवार से आती हूं, जिसने सफलता का खूब स्वाद चखा है। आप देख ही रहे हैं कि मैं लगातार शूटिंग कर रही हूं। मैं अपने काम में बिजी हूं। मुझे अच्छा लगता है काम करना। मैं एकदम नॉर्मल हूं। इसके आगे मैं सोचती नहीं हूं। कौन जाने कल क्या हो? पहली फिल्म ‘दबंग’ करते समय मुझे कहां पता था कि फिल्म का क्या होगा?
- ‘दबंग 2’ की क्या तैयारी है?
0 मैं रज्जो का ही किरदार निभा रही हूं। पिछली ‘दबंग’ में वह शादीशुदा नहीं थी। सेकेंड हाफ में शादी की बात हुई थी। ‘दबंग 2’ में रज्जो की शादीशुदा जिंदगी रहेगी। इन दिनों फिल्मों में शादीशुदा जोड़ों का रोमांस नहीं दिखाई पड़ता। मैंने इसमें मैच्योर रोमांस का प्रदर्शन किया है।
- अभी आपकी उम्र ही क्या है? आप पर्दे पर शादीशुदा जोड़े का रोमांस जाहिर करेंगी।
0 मैं पच्चीस की हो चुकी हूं। कानूनी तौर पर शादी करने की उम्र तो हो ही गई है। बस कर लिया मैंने। पर्दे पर बहुत क्यूट लगूंगी। मुझे लगता है कि मेरे प्रशंसक इस रोल में मुझे देख कर बहुत खुश होंगे।
- चुलबुल पांडे ‘दबंग 2’ में कितने चुलबुले हुए हैं?
0 बहुत ज्यादा। ‘दबंग’ में जितने थे,उससे दोगुने हो गए हैं। ‘दबंग 2’ में सबकुछ डबल है। डबल मजा, डबल हयूमर, डबल एक्शन एवरीथिंग। इस बार तो हंसते-हंसते लोगों की दाढ़ें गिर जाएगी। सलमान खान ने चुलबुल पांडे को और ज्यादा नटखट बना दिया है।
- अरबाज के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 उनकी यह पहली फिल्म है। जब से उनका नाम आया मैं तभी से कह रही हूं कि आपको डायरेक्शन तो बहुत पहले से शुरू कर देना चाहिए था। वे बहुत नैचुरल डायरेक्टर हैं। उन्हें अपनी रिक्वायरमेंट मालूम रहती है। यह तभी होता है जब पूरी फिल्म आपके दिमाग में हो।
- ‘जोकर’ के बारे में क्या कहेंगी?
0 फिल्म आई और चली गई। मुझे मायूस होने का समय भी नहीं मिला। मैं उन दिनों ‘सन ऑफ सरदार’ की शूटिंग कर रही थी। वह फिल्म मेरे बायोडाटा में रहेगी। दरअसल कोई नहीं जानता कि उसकी अगली फिल्म का फ्यूचर क्या होगा।
- आप पिछले दिनों पटना गई थीं। कैसा अनुभव रहा?
0 बहुत अच्छा। उम्मीद से ज्यादा जोरदार स्वागत हुआ। एअरपोर्ट से ही भीड़ लग गई थी।  शुक्र है कि पापा साथ में थे। उन्होंने सिक्युरिटी का पुख्ता इंतजाम किया था। वरना शहर में चलना मुश्किल हो जाता। हमलोग पटना साहिब भी गए। वहां भी माथा टेका। प्रेस कान्फ्रेंस भी बहुत अच्छा रहा। किसी ने पूछा कि आप इतने सालों के बाद क्यों आई हैं? मेरा यही जवाब था कि पटना मेरा घर है। घर आने की किसी की अनुमति तो नहीं लेनी पड़ती। आप सभी जानते हैं कि मैं लगातार फिल्में कर रही हूं। बिहारी बाबू की बेटी होने के कारण मुझे बिहार जैसा प्रेम कहीं और से नहीं मिलता।
- अभी आप ‘वन्स अपऑन ए टाइम ए मुंबई 2’ की शूटिंग कर रही हैं। यह तो आप की अभी तक की सभी फिल्मों से अलग है?
0 हां, यह परफारमेंस की मांग करता है। इस फिल्म की कहानी बहुत अच्छी है। लोगों ने पहले ही इसे प्यार किया है। अब उसी का सिक्वल बन रहा है। मुझे इतनी जल्दी ऐसी फिल्म का मौका मिलना ही मेरे लिए बड़ी बात है। अक्षय के साथ पहली दो फिल्में तो बहुत ही फनी और मजेदार रही। इस फिल्म में अक्षय का दूसरा रूप दिखाई पड़ रहा है। आप ने अभी मेरा काम देखा। आप बताएं कि कैसी लगी मैं?
- मैं अपनी बात फिल्म देखने के बाद लिखूंगा। फिलहाल बताएं और क्या फिल्में कर रही हैं?
0 इसके बाद मैं ‘बुलेट राजा’ शुरू करूंगी। इन दिनों लखनऊ में सैफ अली खान इस फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं। जल्दी ही उन्हें ज्वाइन करूंगी। ‘बुलेट राजा’ के डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया हैं। उसके बाद प्रभु देवा की ‘नमक’ करूंगी। इस फिल्म का नाम बदल भी सकता है। अगले साल ‘लुटेरा’ रिलीज होगी। उसकी शूटिंग पूरी हो गई है।

Friday, August 31, 2012

फिल्‍म समीक्षा : जोकर

Film review : Joker
प्रिय शिरीष,
आप धन्य हैं, साथ ही अक्षय कुमार और यूटीवी भी धन्य है, क्योंकि उन्होंने आप की विचित्र कल्पना में निवेश किया। अक्षय कुमार तो आप की फिल्म के हीरो भी हैं। हालांकि रिलीज के समय उन्होंने फिल्म से किनारा कर लिया, लेकिन कभी मिले तो पूछूंगा कि उन्होंने इस विचित्र फिल्म में क्या देखा था?
बहरहाल, आप ने अक्षय कुमार और सोनाक्षी सिन्हा को कामयाबी की हैट्रिक नहीं लगाने दी। हाउसफुल-2 और राउडी राठोड़ के बाद अक्षय कुमार को झटका भारी पड़ेगा। वहीं सोनाक्षी सिन्हा दबंग और राउडी राठोड़ के बाद नीचे उतरेंगी।
ताश की गड्डी के जोकर को फिल्म के कंसेप्ट में बदल देना और फिर उस पर पूरी फिल्म रचना। आप की कल्पना की उड़ान की दाद देनी पड़ेगी। पगलापुर भारत के नक्शे पर हो न हो, आप के दिमाग में जरूर रहा होगा। और उसका संपर्क किसी और इंद्रिय से नहीं रहा होगा। आजादी के 65 सालों के विकास से कटे गांव के अक्षय कुमार का नासा पहुंच जाना भी विचित्र घटना है। और फिर उसका भारत लौटना। पगलापुर को ध्यान में लाने के लिए एलियन की कहानी बुनना। लॉजिक तो हिंदी फिल्मों में आम तौर पर नहीं मिलता, लेकिन आप ने तो इलॉजिकल होने की पराकाष्ठा पार की।
फिल्म के पोस्टर पर लिखा है कि कभी-कभी एलियन होना ही अकेला विकल्प होता है। आप ने वह विकल्प भी खत्म कर दिया। अब जोकर का क्या होगा?
आप के ट्विट में जबरदस्त विट और ह्यूमर रहता है। इतना ज्यादा कि आहत होकर शाहरुख खान आप पर हाथ उठा देते हैं। फिल्म के संवादों और दृश्यों में वह विट और ह्यूमर नदारद है। अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा, अंजन श्रीवास्तव,दर्शन जरीवाला, ब्रजेश हीरजी, मिनिषा लांबा,असरानी,पित्तोबास त्रिपाठी और श्रेयस तलपड़े आदि जैसी प्रतिभाओं का दुरूपयोग कोई आप से सीखे। इनमें से एक-दो कलाकारों के सदुपयोग से •ुछ मामूली फिल्में भी मनोरंजक हो जाती हैं। आप ने तो सभी की प्रतिभा पर पानी फेर दिया। हां, अकेली चित्रांगदा सिंह का काफिराना अंदाज थोड़ी मस्ती दे गया। ऐसी ही मस्ती तीस मार खां की शीला की जवानी में भी थी। बेहतर होगा कि पूरी फिल्म के बजाए आप आयटम सांग ही सोचें और शूट किया करें। एलियन को बैकड्रॉप में रखकर हॉलीवुड के निर्माता एक से एक फिल्में बना रहे हैं। राकेश रोशन की कोई ़ ़ ़ मिल गया भी अच्छी कोशिश थी। और एक आप हैं, आदमी के सिर और शरीर पर सब्जियां चिपका कर एलियन का भी मजाक उड़ाते हैं। शिरीष आप की जोकर फिलहाल 2012 की सबसे साधारण फिल्म है। मुझे तो लगता हे कि दशक की साधारण फिल्मों में भी यह शुमार होगी।
मैं फिल्म देख कर आने के बाद से सिरदर्द से परेशान हूं। फिल्म में मन न लगे तो 105 मिनट की फिल्म भी लंबी लगती है।
अवधि- 105 मिनट
रेटिंग- * एक स्टार 
आपका,
अजय ब्रह्मात्मज

Sunday, August 5, 2012

दर्शकों की पसंद हूं मैं-सोनाक्षी सिन्हा

-अजय ब्रह्मात्मज
    सोनाक्षी सिन्हा की अभी तक दो ही फिल्में रिलीज हुई हैं, लेकिन दोनों ही सुपरहिट रही हैं। ‘दबंग’ और ‘राउडी राठोड़’ की जबरदस्त सफलता ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री की टॉप हीरोइनों में शामिल कर दिया है। हालांकि दोनों ही फिल्मों की कामयाबी का श्रेय उनके हीरो सलमान खान और अक्षय कुमार को ही मिला। फिर भी कामयाब फिल्म की हीरोइन होने के हिस्से के रूप में सोनाक्षी सिन्हा भी सफल मानी जाएंगी। अब उनकी तीसरी फिल्म ‘जोकर’ रिलीज होगी। इसमें भी उनके हीरो अक्षय कुमार हैं। सोनाक्षी सिन्हा से एक बातचीत ़ ़ ़
- दो-दो फिल्मों की कामयाबी से आप ने इतनी जल्दी ऐसी ऊंचाई हासिल कर ली है। बात कहां से शुरू करें?
0 कहीं से भी शुरू करें। इतनी छोटी जर्नी है मेरी कि न तो आप ज्यादा कुछ पूछेंगे और न मैं ज्यादा बता पाऊंगी। खुश हूं कि मेरी दोनों फिल्में दर्शकों को पसंद आई। पसंद आने की एक वजह तो मैं हूं ही।
- आप की तीसरी फिल्म शिरीष कुंदर की ‘जोकर’ होगी। उसके बारे में बताएं?
0 ‘जोकर’ वैसे मेरी दूसरी फिल्म है। ‘दबंग’ के बाद मैंने ‘जोकर’ ही साइन की थी और उसकी शूटिंग भी आरंभ हो गई थी। यह बहुत ही स्पेशल फिल्म है। इस फिल्म के यूनिकनेस ने मुझे आकर्षित किया था। अभी जैसी फिल्में आ रही हैं, उनसे बिल्कुल अलग है। बाकी अक्षय कुमार का हीरो होना दूसरा आकर्षण था। फराह खान और शिरीष कुंदर को मैं पहले से जानती थी। उनकी वजह से हां करने के लिए अधिक सोचना नहीं पड़ा।
- क्या है यूनिकनेस  ़ ़ ़ वैसे इन दिनों हर फिल्म हट के कही जाती है, लेकिन थिएटर में लगने पर सब एक सी दिखती है?
0 हाहाहा ़ ़ ़ मैं आप का इशारा समझ सकती हूं। हिंदी फिल्मों में पहले एलियन, क्रॉप सर्किल, यूएफओ आदि ऐसा नहीं आया है। थोड़ी एक्सपेरिमेंटल फिल्म है। मेरे ख्याल में शिरीष कुंदर ने बहुत अच्छी तरह शूट की है। यह फिल्म बच्चों को बहुत पसंद आएगी। बच्चे आते हैं तो उनके साथ फैमिली भी आती है फिल्में देखने। मुझे तो लगता है कि इस वजह से भी फिल्म चलेगी।
- ‘जोकर’ साइंस फिक्शन है क्या?
0 हां, साइंस फिक्शन है। थोड़ा-बहुत हिंदी फिल्मों का ड्रामा है। वास्तव में यह एक अंडरडॉग की कहानी है। भारतीय दर्शकों को ऐसे हीरो अच्छे लगते हैं। अभी के लिए इतना ही बता सकती हूं। सचमुच, यह अलग टाइप की फिल्म है, इसलिए जितना कम बताएं उतना अच्छा। इसका विजुअल आनंद है। फिल्म का इंतजार करें।
- ‘जोकर’ में अपनी मौजूदगी पर क्या कहेंगी?
0 ऑफकोर्स नयी सोनाक्षी दिखेगी। अभी तक दर्शकों ने मुझे ट्रैडिशनल लुक में ही देखा है। इसमें वेस्टर्न लुक में भी दिखूंगी। हमेशा इंडियन लुक की बात करते हुए लोग सवाल छोड़ जाते हैं कि क्या मैं वेस्टर्न लुक में जंचूंगी? उनके लिए मौका है कि वे परखें और बताएं। ‘जोकर’ में कॉमेडी करती भी दिखूंगी। वैसे ‘जोकर’ नाम से यह अर्थ न लगाएं कि यह हंसी-मजाक की फिल्म है।
- अपने किरदार और रोल के बारे में बताएं?
0 फिल्म में मेरा नाम दीवा है। फराह खान की एक बेटी का नाम दीवा है। फिल्म में मैं एक एनआरआई लडक़ी हूं। वहां से गांव में पहुंचती हूं। गांव में अक्षय कुमार और अन्य लोगों से घुलमिल जाती हूं। इसमें मेरे किरदार के दो पहलू हैं। वेस्टर्न लुक के साथ-साथ इंडियन लुक में भी नजर आऊंगी।
- क्या ‘जोकर’ पहली फिल्म ‘दबंग’ रिलीज होने के पहले ही साइन कर ली थी आप ने?
0 ‘दबंग’ की रिलीज के बाद साइन की थी। मैंने तय किया था कि ‘दबंग’ का नतीजा देखने के बाद ही अगली फिल्म साइन करनी है। दर्शकों के साथ अपनी इंडस्ट्री का रिएक्शन देख लेना चाहती थी।
- ‘दबंग’ करते समय तक आप एकदम नयी थीं। उस फिल्म की कामयाबी ने आपको झटके में बड़ा एक्सपोजर दिया और ऊंचे स्थान पर पहुंचा दिया। इस अचानक बदलाव का क्या असर हुआ?
0 ऊपरी तौर पर जरूर बदलाव हुआ। परपसेप्शन बदल गया। मेरे प्रति लोगों का नजरिया अच्छा बन गया। अंदरूनी तौर पर कोई असर नहीं हुआ। मैं इसी इंडस्ट्री की लडक़ी हूं। मैंने पापा की जिंदगी में यह शोहरत देखी है। नेम और फेम का गेम समझती हूं। मेरे लिए कामयाबी बहुत बड़ी या अलग बात नहीं थी। इस बार मैं सेंटर में थी, लेकिन इंडस्ट्री में पले-बढ़े होने की वजह से मुझे इसकी ट्रेनिंग मिल चुकी थी। परिवार में पहले से मशहूर कोई है, इसलिए भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। हां, सफल होने वाली परिवार की पहली सदस्य होती तो जरूर फर्क पड़ता। आप को बताया था कि ‘दबंग’ साइन करते वक्त भी एक्टर या स्टार बनने का मेरा कोई शौक नहीं था। सब कुछ अचानक हो गया। ‘दबंग’ के बाद भी निश्चित नहीं थी कि आगे क्या करना है? खुद को इतना सक्षम मानती हूं कि किसी और जॉब में रहती तो भी सफल ही रहती।
- फिर भी इस कामयाबी को सोनाक्षी सिन्हा किस स्तर पर महसूस करती हैं?
0 कामयाबी तो मिली है और मैं इसे ग्रांटेड नहीं समझ सकती। मुझे सभी की अपेक्षाओं के हिसाब से चलना है। जरूरी नहीं है कि कल भी यह कामयाबी बनी रहे। आज मैं जहां हूं, वहां कल कोई और होगा। यह सब तो चलता ही रहता है।
- करिअर के फैसले लेने में कौन मदद करता है? कैसी फिल्में चुननी हैं या बाकी क्या करना -नहीं करना है?
0 परिवार का अनुभव काम आता है। पापा-मम्मी की मदद लेना तो स्वाभाविक है। उनके 40 सालों के अनुभव के बाद भी उनसे सलाह नहीं लेना बेवकूफी ही होगी। नैरेशन में मम्मी साथ में रहती हैं। पापा शहर में नहीं होते तो उन्हें कहानी का सार बता देती हूं। वे अपनी राय दे देते हैं। उनकी राय सुनती हूं। अभी तक के चुनाव में उनकी राय का फायदा देखा है।
- चुनाव में क्या दिक्कत होती होगी? आप के पास तो बड़े ऑफर ही आते होंगे। वैसे भी आपने कोई छोटी फिल्म तो अभी तक नहीं की?
0 ऐसा नहीं है। मेरे पास हर तरह के ऑफर आते हैं और मैं सभी से मिलती भी हूं। एक समय मैं भी नयी थी। अभी कौन सी पुरानी हो गई हूं। सलमान खान जैसे सुपरस्टार मुझे लांच कर सकते हैं तो मैं किसी नए स्टार या डायरेक्टर के साथ काम नहीं कर सकती क्या? अभी तक जो फिल्में या कैरेक्टर मैंने चुने हैं, उनमें कमर्शियल वैल्यू देखी है। अभी एक्सपेरिमेंट या एकदम से हट के रोल नहीं कर सकती। उतना अनुभव भी नहीं है।
- अभी तक आप की सफलता सौ प्रतिशत रही है। 100 करोड़ क्लब में आप करीना कपूर और असिन के साथ हैं। क्या इस से दबाव या कंपीटिशन महसूस करती हैं?
0 मैं प्रेशर नहीं महसूस करती। उल्टा मुझे प्रोत्साहन सा मिला है। जितना अच्छा कर रही हूं,वैसा करती रहूं। सच कहूं तो मैं दबाव में बेहतर काम करूंगी। हर निगेटिव चीज को पॉजीटिव में बदल कर मेहनत करूंगी। मैं लकी हूं। इसे अनदेखा नहीं कर सकती। मुझे इसे बनाए रखना होगा।
- इंडस्ट्री में प्रतिभाओं को अवसर के साथ सफलताएं मिलती रही हैं, लेकिन अनेक इन्हें संभाल नहीं पाते। कुछ ही होते हैं जो शाहरुख खान की तरह सिद्ध करते हैं कि वे सफलता और अवसर के काबिल हैं  ़ ़ ़
0 बहुत सही बात कही आप ने ़ ़ ़ मेरे मन में कोई संशय नहीं है। अपने बारे में मैं श्योर हूं। मुझे तो एक्टिंग में ही नहीं आना था। आ गयी और इतना मिला। हां मैं मौके और सफलता को व्यर्थ नहीं जाने दूंगी।
- खुद को मांजने के लिए क्या करती हैं? आप को तो फुर्सत ही नहीं मिली अभी तक $  ़ ़ ़
0 फिल्में करने के दौरान ही यह होता है। डायरेक्टर और अनुभवी एक्टरों के साथ काम करने से सीखने को मिलता है। मेरी फिल्में ही मेरा ट्रेनिंग या लर्निंग ग्राउंड है। हर फिल्म में कुछ नया सीखती हूं। टेक्नीशियन तक कुछ न कुछ सिखा जाते हैं।
- कहां तक जाना है  ़ ़ ़ कोई लक्ष्य या मंजिल  ़ ़ ़
0 कुछ नहीं मालूम  ़ ़ ़ मुझे तो कल के बारे में भी नहीं मालूम कि क्या करना है? फिर भी माधुरी दीक्षित, रानी मुखर्जी, करीना कपूर और विद्या बालन की तरह कुछ कर लेना चाहूंगी।
- आप ने विद्या बालन का नाम लिया। लंबे समय के बाद आप दोनों ने हिंदी फिल्मों की हीरोइनों का कांसेप्ट बदला। बीच में तो जीरो साइज का फैशन चल गया था।
0 मैं अपनी सेहत और देह को लेकर अतिरिक्त सचेत नहीं रही। सभी का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। स्क्रीन पर अपीलिंग लगना चाहिए। फैशन हो गया था  पतली-दुबली और जीरो साइज दिखना। विदेशों की फैशन मैग्जीन पढ़ कर और सौंदर्य प्रतियोगिताओं की वजह से यह हुआ था। गौर करें तो हिंदी फिल्मों की हीरोइनों का इमेज कभी ऐसा था ही नहीं। सालों के बाद विद्या जी और मेरे साथ यह ट्रेंड वापस आया तो रिफ्रेशिंग चेंज की तरह लगा। हम दोनों कभी डिफेंसिव नहीं रहे। मैं खुश हूं, स्वस्थ हूं और खाते-पीते घर की हूं। आप ने नहीं सुना होगा कि सेट पर बेहोश होकर गिर गई। हट्टी-कट्टी हूं तो बुरा क्या है? जो लिखते हैं, वे कम होते हैं यानी आलोचक, जो देखते हैं वे ज्यादा होते हैं। यानी दर्शक। मैं तो दर्शकों की पसंद हूं।
- किस इलाके में सबसे ज्यादा प्रशंसक हैं आप के?
0 यह कहने की बात ही नहीं है। बिहार और वह भी खास कर पटना के ज्यादा प्रशंसक हैं। झारखंड से भी फैन मेल आते हैं। जर्मनी, रूस, यूक्रेन, अमेरिका, ब्रिटेन सभी देशों में हैं फैन। उनसे ट्विटर के माध्यम से ही इंटरेक्ट करती हूं। फुर्सत मिलने पर कुछ के जवाब देती हूं।
- अपने निर्देशक शिरीष कुंदर के बारे में कुछ बताएं?
0 उन्होंने मुझे पूरी आजादी दी। हालांकि ‘जोकर’ मेरी दूसरी फिल्म थी। मैंने एक बार पूछा भी कि आप टोकते क्यों नहीं? उनका जवाब था कि तुम सब कुछ सही कर रही हो। तुम्हें कुछ बताने या टोकने की जरूरत ही नहीं है। उनमें भरोसा करने का गुण है।