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Tuesday, May 23, 2017

फर्क है बस नजरिए का - कृति सैनन



कृति सैनन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
- कृति सैनन के लिए राब्‍ता क्‍या है? फिल्‍म और शब्‍द...
0 शब्‍द की बात करूं तो कभी-कभी किसी से पहली बार मिलने पर भी पहली बार की भेंट नहीं लगती। लगता है कि पहले भी मिल चुके हैं। कोई संबंध हे,जो समझ में नहीं आता... मेरे लिए यही राब्‍ता है। मेरा मेरी पेट(पालतू) के साथ कोई राब्‍ता है। फिल्‍म मेरे लिए बहुत खास है। अभी यह तीसरी फिल्‍म है। पहली फिल्‍म में तो सब समझ ही रही थी। मार्क,कैमरा आदि। दिलवाले में बहुत कुछ सीखा,लेकिन इतने कलाकारों के बीच में परफार्म करने का ज्‍यादा स्‍पेस नहीं मिला। इसकी स्‍टोरी सुनते ही मेरे साथ रह गई थी। एक कनेक्‍शन महसूस हुआ। मुझे दो कैरेक्‍टर निभाने को मिले-सायरा और सायबा। दोनों की दुनिया बहुत अलग है।
-दोनों किरदारों के बारे में बताएं?
0 दोनों किरदार मुझ से बहुत अलग हैं। इस फिल्‍म में गर्ल नेक्‍स्‍ट डोर के रोल में नहीं हूं। सायरा को बुरे सपने आते हें। उसके मां-बाप बचपन में एक एक्‍सीडेंट में मर गए थे। वह बुदापेस्‍ट में अकेली रहती है। चॉकलेट शॉप चलाती है। उसे पानी से डर लगता है। वह बोलती कुछ है,लेकिन सोचती कुछ और है। फिर भी आप उससे प्‍यार करेंगे। सायबा के लिए कोई रेफरेंस नहीं था। मैं वैसी किसी लड़की को नहीं जानती थी। उसका कोई स्‍पष्‍ट समय नहीं है। वह बहादुर राजकुमारी है। झट से कुछ भी कर बैठती है। घुड़सवारी और शिकार करती है।
- बुदापेस्‍ट की सायरा और दिल्‍ली-मुंबई की कृति में कितना फर्क है?
0 उसकी तरह मैं भी जल्‍दी से फैसले नहीं ले पाती। मैं आउटस्‍पोकेन और फ्रेंडली हूं। मेरे कई दोस्‍त हैं। सायरा  बंद-बंद रहती है। वह लोगों को अपने पास आने देती है,लेकिन एक दूरी रखती है। शिव से मिलने के बाद उसमें परिवर्तन आता है। मेरा निजी जीवन बहुत सुरक्षित रहा है। मैंने सायरा की तरह स्‍ट्रगल नहीं किया है।
- क्‍या हर शहर की लड़कियां अलग होती हैं?
0 दिल्‍ली और मुंबई की लड़कियों में ज्‍यादा फर्क नहीं है। दूसरे देशों की लड़कियों की जीवन शैली और स्‍टायल अलग होती है। उनका सही-गलत का नजरिया भी अलग होता है। हमें कई बातें असहज लगती हैं। उन्‍हें इनसे फर्क नहीं पड़ता। संबंधों के मामले में हमारी सोच में अंतर रहता है। संस्‍कृति के भेद से ही यह भसेद आता होगा शायद।
-सुशांत सिंह राजपूत के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 इस फिल्‍म से पहले मैं सुशांत को बिल्‍कुल नहीं जानती थी। मैंने उन्‍हें कभी हाय भी नहीं बोला था। पहली बार दिनेश के ऑफिस में मिला था तो यही इंप्रेशन था कि अच्‍छा एक्‍टर है। एक्‍टर के तौर पर मेरा अनुभव कम है तो डर था कि कोई दिक्‍कत न हो। यह भी लगा कि मेहनत के साथ अच्‍छी एक्टिंग करनी पड़ेगी। उस मीटिंग में एक सीन करते समय हमारी फ्रिक्‍वेंसी मिल गई थी। उसके बाद फिल्‍म की तैयारी में हमारी नजदीकी बढ़ी। हमारा कंफर्ट बढ़ा। एक्टिंग का हमारा प्रोसेस अलग है। सुशांत इंस्‍पायरिंग हैं। बुदापेस्‍ट पहुंचने तक हम एक-दूसरे को अच्‍छी तरह समझ गए थे। काम करने में बहुत मजा आया।
-खुश हो आप?
0 मैं बहुत खुश हूं। पिछले साल मेरी कोई फिल्‍म रिलीज नहीं हुई। फिर भी लगातार तैयारी की वजह से ऐसा नहीं लगा कि खाली हूं। इस फिल्‍म को लेकर एक संतोष है। फिल्‍म के दूसरे युग में हमलोगों ने जो प्रयास किया है,वह सभी को अच्‍छा लगेगा।
-किस की तरह याद किया जाना पसंद करेंगी?
0 माधुरी दीक्षित की तरह। वह मेरी फेवरिट हैं। बचपन में मैं उनके गानों पर ही डांस किया करती थी। अंखियां मिलाऊं,कभी अंखियां चुराऊं मेरा सबसे प्रिय गाना था। वह इतनी खूबसूरत और एक्‍सप्रसिव हैं। वह गाने की पंक्तियों में एक्‍सप्रेशन दे देती हैं। वह फेस से डांस करती थीं। वह स्‍क्रीन पर आती हैं तो स्‍क्रीन अलाइव हो जाता है। मैं जैसे उन्‍हें याद कर रही हूं,चाहूंगी कि वैसे ही कोई मुझे याद करे।

Friday, May 19, 2017

सात सवाल : पलट’ मोमेंट होता है प्रेम में -सुशांत सिंह राजपूत



सात सवाल
पलट मोमेंट होता है प्रेम में
सुशांत सिंह राजपूत
सुशांत सिंह राजपूत ने टीवी से फिल्‍मों में कदम रखा। अपनी फिल्‍मों के चुनाव और अभिनय से वे खास मुकाम बना चुके हैं। उनकी राब्‍ता जल्‍दी ही रिलीज होगी,जिसे दिनेश विजन ने निर्देशित किया है।
-प्रेम क्‍या है आप के लिए?
0 प्रेम से ही सेंस बनता है हर चीज का। जिंदगी के लिए जरूरी सारी चीजें प्रेम से जुड़ कर ही सेंस बनाती हैं।
-प्रेम का पहला एहसास कब हुआ था?
0 बचपन में अकेला नहीं सो पाता था। मां नहीं होती थी दो रातों तक नहीं सो पाता था। मेरे लिए वही प्रेम का पहला एहसास था।
- रामांस की अनुभूति कब हुई
0 सच कहूं तो चौथे क्‍लास में। अपनी क्‍लास टीचर से मेरा एकतरफा रोमांस हो गया था। वह मुझे बहुत अच्‍छी लगती थीं। उन्‍हें भी इस बात का अंदाजा था।
-हिंदी फिल्‍मों ने आप को प्रेम के बारे में क्‍या सिखाया और बताया?
0लड़कियों को चार्म कैसे करते हें। मेरे पास कोई रेफरेंस नहीं था। मुझे एकदम याद है कि दिलवाले दुल्‍‍हनिया ले जाएंगे देखने के बाद लगा कि लड़का तो ऐसा ही होना चाहिए। उसके बाद कुछ कुछ होता है देख कर शाह रूख की तरह होने की इच्‍छा हुई। इन फिल्‍मों के समय मैं पांचवीं और आठवीं में था।
-प्रेम में कोई पलट मोमेंट होता है क्‍या?
0 होता है,बिल्‍कुल होता है। मैं आठवीं में था और लड़की दसवीं में थी। उन्‍हें देखता रहता था और फीलिंग रहती थी कि वह पलटेंगी...उनके पलटने से विश्‍वास बना रहता था कि व‍ह फिर से पलटेंगी।
-प्रेम कैसे जताना चाहिए?
0मुझे लगता है कि छ़ुपाना नहीं चाहिए। एक बार बता देना चाहिए। उसके बाद जो हो,सो हो। सीधे शब्‍दों में बता दो।
-क्‍या बताएं? आई लव यू...
0 मेरे हिसाब से एक्‍थ्‍शन से अधिक जरूरी इंटेंशन है। बोल देना चाहिए। बोल कर आलिंगन करेंगे तो उसका मतलब प्रेम होगा। बाकी इन दिनों आलिंगन(हग) तो सभी का करते हैं।

Friday, September 30, 2016

फिल्‍म समीक्षा : एम एस धौनी-द अनटोल्‍ड स्‍टोरी



छोटे पलों के बड़े फैसले

-अजय ब्रह्मात्‍मज
सक्रिय और सफल क्रिकेटर महेन्‍द्र सिंह धौनी के जीवन पर बनी यह बॉयोपिक 2011 के वर्ल्‍ड कप तक आकर समाप्‍त हो जाती है। रांची में पान सिंह धौनी के परिवार में एक लड़का पैदा होता है। बचपन से उसका मन खेल में लगता है। वह पुरानी कहावत को पलट कर बहन को सुनाता है...पढ़ोगे-लिखोगे तो होगे खराब,खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे नवाब। हम देखते हैं कि वह पूरी रुचि से फुटबॉल खेलता है,लेकिन स्‍पोर्ट्स टीचर को लगता है कि वह अच्‍छा विकेट कीपर बन सकता है। वे उसे राजी कर लेते हैं। यहां से धौनी का सफर आरंभ होता है। इसकी पृष्‍ठभूमि में टिपिकल मिडिल क्‍लास परिवार की चिंताएं हैं,जहां करिअर की सुरक्षा सरकारी नौकरियों में मानी जाती है।
नीरज पांडेय के लिए चुनौती रही होगी कि वे धौनी के जीवन के किन हिस्‍सों को फिल्‍म का हिस्‍सा बनाएं और क्‍या छोड़ दें। यह फिल्‍म क्रिकेटर धौनी से ज्‍यादा छोटे शहर के युवक धौनी की कहानी है। इसमें क्रिकेट खेलने के दौरान लिए गए सही-गलत या विवादित फैसलों में लेखक-निर्देशक नहीं उलझे हैं। ऐसा लग सकता है कि यह फिल्‍म उनके व्‍यक्तित्‍व के उजले पक्षों से उनके चमकदार व्‍यक्तित्‍व को और निखारती है। यही फिल्‍म की खूबी है। कुछ प्रसंग विस्‍तृत नहीं होने की वजह से अनुत्‍तरित रह जाते हैं,लेकिन उनसे फिल्‍म के आनंद में फर्क नहीं पड़ता। यह फिल्‍म उन्‍हें भी अच्‍छी लगेगी,जो क्रिकेट के शौकीन नहीं हैं और एम एस धौनी की उपलब्धियों से अपरिचित हैं। उन्‍हें धौनी के रूप में छोटे शहर का युवा नायक दिखाएगा,जो अपनी जिद और लगन से सपनों को हासिल करता है। क्रिकेटप्रेमियों का यह फिल्‍म अच्‍छी लगेगी,क्‍योंकि इसमें धौनी के सभी प्रमुख मैचों की झलकियां हैं। उन्‍हें घटते हुए उन्‍होंने देखा होगा। फिल्‍म देखते समय तो उन यादगार लमहों के साथ पार्श्‍व संगीत भी है। प्रभाव और लगाव गहरा हो जाता है। रेगुलर शो में इसे देखते हुए आसपास के जवान दर्शकों की टिप्‍पणियों और सहमति से स्‍पष्‍ट हो रहा था कि फिल्‍म उन्‍हें पसंद आ रही है।
एम एस धौनी छोटे पलों के असमंजस और फैसलों की बड़ी फिल्‍म है। मुश्किल घडि़यों और चौराहों पर लिए गए फैसलों से ही हम सभी की जिंदगी तय होती है। हमारा वर्तमान और भविष्‍य अपने अतीत में लिए गए फैसलों का ही नतीजा होता है। इस फिल्‍म में हम किशोर और युवा आक्रामक और आत्‍मविश्‍वास के धनी धौनी को देखते हैं। उसकी सफलता हमें खुश करती है। उसके खेलों से रोमांच होता है। फिल्‍म का अच्‍छा-खासा हिस्‍सा धौनी के प्रदर्शन और प्रशंसा से भरा गया है। उनके निजी और पारिवारिक भावुक क्षण हैं। एक पिता की बेबसी और चिंताएं हैं। एक बेटे के संघर्ष और सपने हैं। फिल्‍म अपने उद्देश्‍य में सफल रहती है।
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने एम एस धौनी के बॉडी लैंग्‍वेज,खेलने की शैली और एटीट्यूड को सही मात्रा में आत्‍मसात किया है। फिल्‍म देखते समय यह एहसास मिट जाता है कि हम धौनी के किरदार में सुशांत को देख रहे हैं। उन्‍होंने इस किरदार को निभाने में जो संयम और समय दिया है,वह प्रशंसनीय है। उन्‍होंने धौनी के रूप में खुद को ढाला है और वही बने रहे हैं। हो सकता है भावुक,खुशी और नाराजगी के मौकों पर धौनी के एक्‍सप्रेशन अलग होते हों,लेकिन यह फिल्‍म देखते हुए हमें उनकी परवाह नहीं रहती। लंबे समय के बाद अनुपम खेर अपनी संवेदना और ईमानदारी से धौनी के पिता के रूप में प्रभावित करते हैं। धौनी के जीवन में आए दोस्‍त,परिजन,कोच और मार्गदर्शकों की भूमिका निभा रहे किरदारों के लिए उचित कलाकारों का चुनाव किया गया है। किशोरावस्‍था के क्रिकेटर दोस्‍त संतोष की भूमिका में क्रांति प्रकाश झा अच्‍छे लगते हैं। बाकी कलाकारों का योगदान भी उल्‍लेखनीय है। प्रेमिका और पत्‍नी की भूमिकाओं में आई अभिनेत्रियों ने धौनी के रोमांटिक पहलू को उभारने में मदद की है। नीरज पांडेय ने प्रेम के खूबसूरत पलों को जज्‍बाती बना दिया है।
अंत में इस फिल्‍म की भाषा और परिवेश की तारीफ लाजिमी है। इसमें बिहार और अब झारखंड में बोली जा रही भाषा को उसके मुहावरों से भावपूर्ण और स्‍थानीय लहजा दिया गया है।दुरगति,काहे एतना,कपार पर मत चढ़ने देना,दुबरा गए हो जैसे दर्जनों शब्‍द और पद गिनाए जा सकते हैं। इनके इस्‍तेमाल से फिल्‍म को स्‍थानीयता मिली है।
एम एस धौनी छोटे शहर से निकलकर इंटरनेशनल खिलाड़ी के तौर पर छाए युवक के अदम्‍य संघर्ष की अनकही रोचक और प्रेरक कहानी है। फिल्‍म में वीएफएक्‍स से पुराने पलों को रीक्रिएट किया गया। साथ ही गानों के लिए जगह निकाली गई है।
अवधि- 190 मिनट
चार स्‍टार
   

Wednesday, December 10, 2014

दोनों हाथों में लड्डू : सुशांत सिंह राजपूत


-अजय ब्रह्मात्मज
सुशांत सिंह राजपूत की ‘पीके’ इस महीने रिलीज होगी। ‘पीके’ में उनकी छोटी भूमिका है। दिबाकर बनर्जी की ‘ब्योमकेश बख्शी’ में हम उन्हें शीर्षक भूमिका में देखेंगे। झंकार के लिए हुई इस बातचीत में सुशांत सिंह राजपूत ने अपने अनुभवों, धारणाओं और परिवर्तनों की बातें की हैं।
    फिल्मों में अक्सर किरदारों के चित्रण में कार्य-कारण संबंध दिखाया जाता है। लेखक और निर्देशक यह बताने की कोशिश करते हैं कि ऐसा हुआ, इसलिए वैसा हुआ। मुझे लगता है जिंदगी उससे अलग होती है। यहां सीधी वजह खोज पाना मुश्किल है। अभी मैं जैसी जिंदगी जी रहा हूं और जिन द्वंद्वों से गुजर रहा हूं, उनका मेरे बचपन की परवरिश से सीधा संबंध नहीं है। रियल इमोशन अलग होते हैं। पर्दे पर हम उन्हें बहुत ही नाटकीय बना देते हैं। पिछली दो फिल्मों के निर्देशकों की संगत से मेरी सोच में गुणात्मक बदलाव आ गया है। पहले राजकुमार हिरानी और फिर दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में समझ में आया कि पिछले आठ सालों से जो मैं कर रहा था, वह एक्टिंग नहीं कुछ और थी। मैं आप को प्वॉइंट देकर नहीं बता सकता कि मैंने क्या सीखा, लेकिन बतौर अभिनेता मेरा विकास हुआ। अगली फिल्मों में अपने किरदारों को निभाते समय रिसर्च के अलावा और बहुत सारी चीजें ध्यान में रखूंगा। किसी भी दृश्य में एक इमोशन के चार-पांच डायमेंशन आते हैं। हम उनमें से एक चुनते हैं। कई बार तो कर देने के बाद उसकी वजह खोजते हैं और खुद को सही ठहराते हैं।
    दिबाकर के साथ काम करते समय हमलोग रियल इमोशन पर खेल रहे थे। एक दृश्य बताता हूं, मैं अपनी तहकीकात कर रहा हूं। एक व्यक्ति से कुछ सवाल पूछ रहा हूं। वह व्यक्ति जवाब देते-देते मेरे सामने मर जाता है। मेरे अपने रिसर्च से उस दृश्य में मुझे गुस्सा, निराशा और कोफ्त जाहिर करनी थी। दो टेक में वह सीन हो गया। अभी मेरे पास बीस मिनट बाकी थे। दिबाकर ने आकर बताया कि इस दृश्य में एक अलग इमोशन ले आओ। तुमने अभी तक किसी को अपने सामने मरते हुए नहीं देखा है। पहली बार कोई बात करते-करते मर गया। तुम्हारी रिएक्शन में उसकी मौत के प्रति  विस्मय और आकर्षण भी होना चाहिए। इस इमोशन के साथ सीन को शूट करने पर सीन का इम्पैक्ट ही बदल जाएगा। ‘ब्योमकेश बख्शी’ से ऐसे अनेक उदाहरण दे सकता हूं।
    ‘ब्योमकेश बख्शी’ शूट करते समय मैंने एक बार भी मॉनिटर नहीं देखा। पोस्ट प्रोडक्शन और डबिंग के दौरान मैंने अपना परफॉरमेंस देखा। मैंने पाया कि मैं बिल्कुल अलग एक्टर के तौर पर सभी के सामने आया हूं। लोग तारीफ करेंगे तो थैंक्यू कहूंगा। नापसंद करेंगे तो माफी मांग लूंगा। सच यही है कि कुछ अलग काम हो गया है। दिबाकर बनर्जी की फिल्मों में प्रचलित हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का अनुकरण नहीं होता। ग्रामर का पालन न करने से एक ही डर लग रहा है कि कहीं कुछ ज्यादा रियल तो नहीं हो गया। बाकी फिल्म की गति इतनी तेज है। दो घंटे दस मिनट में पूरा ड्रामा खुलता है। आप यकीन करें फिल्म देखते समय पलकें भी नहीं झपकेंगी।
    हिंदी फिल्मों में पांचवें दशक के कोलकाता को दिखाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। तीन महीनों की तैयारी में किरदार मेरी आदत बन चुका था। यह तो तय था कि कुछ गलत नहीं होगा। मुझे और दिबाकर को यह देखना था कि हम कितने सही हैं। दिबाकर की सबसे अच्छी बात है कि वे किसी भी टेक को एनजी यानी नॉट गुड नहीं कहते। हर शॉट को अच्छा कहने के बाद वे एक और शॉट जरूर लेते हैं। इस फिल्म के दौरान हम दोनों ‘ब्योमकेश बख्शी’ के किरदार को एक्सप्लोर करते रहे। इस फिल्म के पहले मैंने ऐसी ईमानदारी के साथ एक्टिंग नहीं की। शूटिंग के दूसरे दिन ही चालीस सेकेंड के एक लंबे सीक्वेंस में दिबाकर ने मुझे 1936 का एक वीडियो दिखाया और समझाया कि रियल लाइफ और रील लाइफ में क्या फर्क हो जाता है? मुझे उस सीक्वेंस में एक केस सुलझाने के लिए पैदल, रिक्शा, बस, ट्राम से जाना था। अपने परफॉरमेंस में मैं दिखा रहा था कि आज मैं बहुत परेशान हूं। मुझे जल्दी से जल्दी केस सुलझाना है। दिबाकर के उस वीडियो को देखने के बाद मेरी समझ में आया कि रियल लाइफ में ऐसी परेशानी चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में नहीं होती। हम ऐक्टर छोटे दृश्य में भी परफॉर्म करने से बाज नहीं आते। मेरे लिए यह बहुत बड़ी सीख थी। पर्दे पर हम ज्यादातर फेक होते हैं। या एक्टिंग के अपने टूल से दर्शकों को अपनी फीलिंग्स का एहसास दिलाते हैं। दिबाकर कहते थे, फिलहाल अपने टूल्स रख दो। मैंने इस  दृश्य को तीस मिनट दिया है। 29 मिनट तक अगर मेरे हिसाब से नहीं हुआ तो 30 वें मिनट में अपने टूल्स का इस्तेमाल कर लेना। शुरू में तो मैं डर गया कि बगैर टूल्स के मैं एक्टिंग कैसे करूंगा, लेकिन धीरे-धीरे मजा आने लगा?
    ‘पीके’ बहुप्रतीक्षित फिल्म है। आमिर खान और राजकुमार हिरानी जैसे दिग्गज के संग काम करना बड़े गर्व की बात है। उसमें मेरा कैमियो रोल है, मगर वह बड़ा प्रभावी है। उसमें मेरा चयन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा के जरिए हुआ। हिरानी सर को दरअसल उस भूमिका के लिए फ्रेश चेहरा चाहिए था। उस वक्त तक मेरी ‘काय पो छे’ नहीं आई थी। मेरा ऑडिशन हुआ। वह सब को बेहद पसंद पड़ा। बाद में ‘पीके’ की शूट में देर होती गई, तब तलक ‘काय पो छे’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ आ गई। मैं थोड़ा-बहुत पॉपुलर भी हो गया। हिरानी सर ने एक दिन मुझे बुला मजाक में कहा, यार हमारी तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए। एक तो तुम्हारा चेहरा फ्रेश है। ज्यादा लोग तुम्हें जानते-पहचानते नहीं थे। अब मगर तुम स्टार भी हो गए।


Monday, March 31, 2014

अंकिता के साथ जिंदगी बीतना चाहता हूं- सुशांत सिंह राजपूत

चवन्‍नी के पाइकों के लिए यह इंटरव्‍यू रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से लिया गया है। सुशांत सिंह राजपूत के जीवन में टर्निंग पॉइंट रहा. काय पो चे और शुद्ध देसी रोमांस की कामयाबी ने उन्हें एक हॉट फिल्म स्टार बना दिया. रघुवेन्द्र सिंह ने की उनसे एक खास भेंट
सुशांत सिंह राजपूत के आस-पास की दुनिया तेजी से बदली है. इस साल के आरंभ तक उनकी पहचान एक टीवी एक्टर की थी, लेकिन अब वह हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय फिल्म निर्माण कंपनी यशराज के हीरो बन चुके हैं. शुद्ध देसी रोमांस के बाद वह अपनी अगली दोनों फिल्में ब्योमकेष बख्शी और पानी इसी बैनर के साथ कर रहे हैं. उन पर आरोप है कि आदित्य चोपड़ा का साथ पाने के बाद उन्होंने अपने पहले निर्देशक अभिषेक कपूर (काय पो चे) से दोस्ती खत्म कर ली. डेट की समस्या बताकर वह उनकी फिल्म फितूर से अलग हो गए. 
हमारी मुलाकात सुशांत सिंह राजपूत के साथ यशराज के दफ्तर में हुई. काय पो चे और शुद्ध देसी रोमांस की कामयाबी को वह जज्ब कर चुके हैं. वैसे तो इस हॉट स्टार के दिलो-दिमाग को केवल उनकी गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे ही बखूबी समझती हैं. औरों के सामने वह बड़ी मुश्किल से अपना हाल-ए-दिल बयां करते हैं. लेकिन हम इस मुश्किल काम को करने की कोशिश कर रहे हैं. आप खुद जज कीजिए की इस बातचीत में आप सुशांत को कितना बेहतर जान पाए...

माना जाता है कि यशराज का हीरो बनने के बाद बाजार और दर्शकों का नजरिया आपके प्रति बदल जाता है. क्या वाकई ऐसा होता है?
जब मैं हीरो नहीं भी बनना चाहता था, जब मैं फिल्में देखा करता था, तब मैं यह सोचता था कि यार, यशराज का हीरो बन जाएं, तो क्या बात होगी. ये तो आप समझ ही सकते हैं कि आज मैं कितना अच्छा फील कर रहा हूं. दूसरा, जब मैंने एक्टर बनने के बारे में सोचा, तो मैंने यह तय नहीं किया कि एक दिन मैं टीवी करूंगा, फिर फिल्म करूंगा और एक दिन मैं इनके साथ काम करूंगा, एक दिन उनके साथ काम करूंगा. मेरे दिल में केवल यह बात थी कि एक्टिंग करने में मुझे मजा आता है. तो इसे मुझे बहुत अच्छे से करना और सीखना है. जब मैं थिएटर में कोई प्ले करता था, तो इतना ही एक्साइटेड होता था, मैं इतनी मेहनत और अच्छे से काम करता था. और जब लोग आकर मेरा प्ले देखते थे और तालियां बजाते थे, तो मुझे बहुत अच्छा लगता था. उतना ही अच्छा लगता है, जब आज मेरी दो फिल्में हिट हो चुकी हैं. तो ये तुलना मैं कर ही नहीं सकता कि इसका हीरो, उसका हीरो, टीवी एक्टर बनने के बाद मुझे कैसा लग रहा है. मुझे छह साल से ऐसा ही लग रहा है.

इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता है, क्योंकि कुछ अचीव करने के बाद इंसान अलग महसूस करता है.
बहुत से लोगों को यकीन नहीं होता, लेकिन ये आपको लगता है न कि एक दिन मैं ये अचीव करूंगा और जब मैं उसे अचीव कर लूंगा, तो मुझे अच्छा लगेगा. लेकिन अगर आपने ऐसा कोई लक्ष्य बनाया ही नहीं है कि मैं एक दिन ये करूंगा, फिर वो करूंगा. मुझे भी नहीं पता कि मुझे जो फिल्में आज मिल रही हैं, वो क्यों मिल रही हैं. जो फिल्में मैं कर चुका हूं और जो आगे कर रहा हूं. वो सारी ऐसी स्क्रिप्ट्स हैं, जिनका हिस्सा मैं बनना चाहता हूं, इसलिए मैं इतना एक्साइटेड हूं. मैं इसीलिए इतना एक्साइटेड हूं कि मैं अगली फिल्म में दिबाकर बनर्जी के साथ काम कर रहा हूं. वो इतने इंटेलीजेंट हैं, इतने अलग तरीके का सिनेमा बनाते हैं, तो उनके साथ मुझे काम करने का मौका मिला. मैं इसलिए एक्साइटेड नहीं हूं कि मैं एक और फिल्म कर रहा हूं और अब टीवी एवं थिएटर नहीं कर रहा हूं. एक्साइटमेंट के अलग-अलग कारण हैं और सेंस ऑफ अचीवमेंट के अलग कारण हैं. आज मैं पांच फिल्में साइन कर लूं और तब मुझे लगेगा कि मैं अच्छा एक्टर हूं. मुझे अपने बारे में नहीं पता. अगर आज मैं एक ही फिल्म कर रहा हूं या थिएटर में मैं एक ऐसा प्ले करूं, जिसे लगता है कि मैं नहीं कर सकता, तो मुझे अच्छा लगेगा.

दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी के लिए आपको किस तरह की तैयारी की जरूरत पड़ रही है?
मैं हर फिल्म की रिलीज के बाद दो से ढ़ाई महीने का गैप लेता हूं. ताकि अपने अगले किरदार के बारे में हर चीज पढ़ सकूं, समझ सकूं, उसका बैकग्राउंड पता करूं, ताकि जब मैं शूट करने जाऊं, तो मुझे यह कंफ्यूजन न हो कि यार, मैं यह कैरेक्टर नहीं हूं. ब्योमकेश बख्शी हमारे पहले फिक्शनल डिटेक्टिव हैं, जिनकी बत्तीस-तैंतीस स्टोरीज ऑलरेडी हैं, तो ब्योमकेश का नाम लेते ही आपके दिमाग में उसकी एक इमेज बन जाती है. सबने उसे अपने-अपने तरीके से प्रजेंट किया है, तो जब आप उस किरदार के बारे में सोचते हैं, जब स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, तो आप महसूस करते हैं कि डायरेक्टर कुछ अलग ही बताने की कोशिश कर रहा है, तो आपने जितना भी होमवर्क किया, वह आप पहले दिन भूल गए. फिर आप तय करते हैं कि चलिए देखते हैं कि क्या होता है.

शुद्ध देसी रोमांस जब आपने साइन की, तो यह खुशी सबसे पहले किसके संग शेयर की थी?
मैंने अंकिता से शेयर किया था. वो बहुत खुश थीं. अंकिता ने सेलिब्रेट किया था. यशराज की फिल्म मिलना और तब मिलना, जब आपकी पहली फिल्म रिलीज न हुई हो और दूसरा, आपने ऑडिशन के जरिए पाई हो. आप पहले ही एक बैगेज के साथ आते हैं कि आप एक टीवी एक्टर हैं. आपको खुद नहीं पता होता है कि टीवी में एक्टिंग करके आपने क्या गलत कर दिया जिंदगी में. और आपसे बोला जाता है कि पिछले बीस साल में तो ऐसा कोई नहीं कर पाया है, तो तुम क्या करोगे? आप समझते हैं कि वो भी सही बोल रहे हैं.

शुद्ध देसी रोमांस में आपने किसिंग सीन किया है. अंकिता को इस पर आपत्ति नहीं थी?
हम सब प्रोफेशनल एक्टर हैं और यह आपके काम का हिस्सा है. जब आप एक्टिंग कर रहे होते हैं, तो एक्टिंग कर रहे होते हैं. आप झूठ नहीं बोल रहे होते हैं. आप उस समय उस किरदार को फील कर रहे होते हैं. वह कर रहे होते हैं, जो वह करता है. इस फिल्म में दिखाना था कि दो किरदारों के बीच इस लेवल की इंटीमेसी है. हम क्या करते हैं कि हमें पर्दे पर यह सब नहीं देखना है. अगर आप आंकड़े उठाकर देखेंगे, तो पिछले बीस साल में सबसे ज्यादा जनसंख्या हमारे देश की बढ़ी है. सबसे ज्यादा बच्चे हमारे हुए हैं. लेकिन हम बात नहीं करेंगे भाई और ना ही टीवी पर दिखाएंगे. अगर आप एक रियलिस्टिक फिल्म में काम करते हैं, तो यह दिखाना पड़ेगा.

अंकिता आपको लेकर पजेसिव रहती हैं. क्या आप भी उन्हें लेकर पजेसिव हैं?
देखिए हम लोग चाहे कुछ भी बोल लें, लेकिन साइकॉलोजिकली हम सब इनसिक्योर्ड हैं. हम लोगों को एक चीज चाहिए होती है- सिक्योरिटी. वह हमें कभी लगता है कि जॉब से आ सकती है, तो हम हर वह काम करते हैं, जो वह जॉब बचाने में मदद करे. कुछ लोगों को लगता है कि किसी रिश्ते से आ सकती है, तो हम उसको पकडक़र रखते हैं. लेकिन साइकॉलोजिकल सिक्योरिटी मिलती नहीं है. यह ह्यïूमन नेचर है. कभी मेरे काम के बीच में अंकिता का पजेसिव नेचर नहीं आता. दूसरी बात कि अगर वह मेरे लिए पजेसिव न हों, तो मेरे लिए चिंता की बात होगी कि अरे यार, ये कैसी लडक़ी है कि मेरे लिए पजेसिव नहीं है. पजेसिव तो होना ही चाहिए. अगर मुझे मेरा काम पसंद है, तो मैं इसे लेकर पजेसिव हूं. अगर यह हाथ से चला गया, तो मेरा क्या होगा. अंकिता के साथ मैं इसलिए हूं या इसलिए जिंदगी बीतना चाहता हूं, क्योंकि वो मुझे अच्छी तरह से जानती और समझती हैं. वह मुझे साइकॉलोजिकली सिक्योर लगती हैं. इसलिए मैं पजेसिव हूं.

आपके हिसाब से परिनीती चोपड़ा और वाणी कपूर में से कौन बेटर एक्टर है?
दोनों में तुलना नहीं होनी चाहिए. दो इंसान, जिनका बैकग्राउंड फिल्म का नहीं है, वह यशराज की फिल्म कर रही हैं, मनीष शर्मा डायरेक्ट कर रहे हैं, तो उनमें कोई तो बात होगी. परिनीती बहुत कॉन्फिडेंट और स्पॉनटेनियस हैं. जब आप उनके साथ एक्ट कर रहे होते हैं, तो आपको इतना पता होता है कि अगर आप बीच में इंप्रॉवाइज भी करेंगे, तो वह उसी पर रिएक्ट करेंगी. वह उस लेवल तक तैयार रहती हैं. परिनीती के साथ एक्शन-रिएक्शन पर खेलते हैं. वाणी की बात करें, तो उनकी बिल्कुल ही फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं है. थिएटर नहीं किया, टीवी नहीं किया है. जब मैं पहली बार टीवी में काम करने गया था, तो मुझसे लाइन नहीं बोली जा रही थी. कैमरा सामने रखा था, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मुझे लगा कि वाणी के साथ भी ऐसी प्रॉब्लम होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उन्हें सारी लाइनें याद थीं. वह घबराई नहीं. ये चीजें मुझमें नहीं हैं. मैंने बहुत मेहनत की, तब जाकर आज इस तरह की स्पॉनटेनिटी लाने की कोशिश कर पाता हूं.

आदित्य चोपड़ा के साथ पहली मीटिंग याद है?
बिल्कुल याद है. उसे कौन भूल सकता है. जब मैं उनसे मिलने गया, तो शुरू में कुछ समय तक मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. मैं उन्हें सिर्फ देख रहा था. ऐसे पल में, आप खुद को यह समझा रहे होते हैं कि यह सब सच में हो रहा है. फिर धीरे-धीरे आवाज सुनाई पडऩे लगती है. उन्होंने शुद्ध देसी रोमांस के बारे में कहा. उन्होंने मेरा काम देखा है पहले और उनको लगता है कि मैं एक अच्छा एक्टर हूं. लेकिन उन्होंने कहा कि अंतिम फैसला राइटर जयदीप वर्मा और डायरेक्टर मनीष शर्मा लेंगे. आपको ऑडिशन देना पड़ेगा. मेरे लिए इतना ही बहुत था.

आपको आदित्य चोपड़ा कैसे इंसान लगे? उनके व्यक्तित्व को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
वह बहुत अच्छे फिल्ममेकर हैं. उन्हें पता है कि वह क्या कर रहे हैं. उनके दिमाग में क्लैरिटी है कि उन्हें क्या काम चाहिए. वह समझते हैं कि कौन कितना काबिल है और क्या कर सकता है. और अगर कोई अपने आपको काबिल समझता है और उसकी पोटेंशियल ज्यादा है, तो उसको रियलाइज करवाना कि तुम्हारी पोटेंशियल इसलिए ज्यादा है और ये करो, तो और भी ज्यादा हो जाएगा. इतना सपोर्टिव हैं. आप दूर की देख सकते हैं. आप वो चीजें सोच सकते हैं, जिसकी आम तौर पर लोग कल्पना भी नहीं कर पाते उस समय में.

क्या यह कह सकते हैं कि टीवी में आपकी मार्गदर्शक एकता कपूर थीं और अब फिल्म में आदित्य चोपड़ा हैं?
देखिए, हर बात घूम-फिर कर यहां आ जाती है कि आप कैमरे के सामने क्या करते हैं. अगर मैंने कैमरे के सामने अच्छी एक्टिंग करना बंद कर दी, तो फिर कोई भी आपको काम नहीं देगा. चाहे वह आपका मेंटर हो या कोई भी हो. मैं बहुत लकी हूं कि मैं इनके साथ काम कर रहा हूं. लेकिन वहीं, कल इस चीज को मैं हल्के से लेने लगूंगा कि चलो, ये लोग मुझे बैक कर रहे हैं, तो मैं बैठकर रिलैक्स करने लगूं, तो ऐसे काम नहीं चल सकता.

क्या आज आदित्य चोपड़ा के साथ आपके ऐसे संबंध हैं कि आप फोन उठाकर उनसे राय ले सकते हैं?
जी हां, बिल्कुल. उन्होंने खुद कहा है कि यशराज की फिल्म हो या बाहर की फिल्म, सारा डिसीजन तुम्हारा होगा. अगर तुम मुझसे पूछना चाहते हो कि सर, क्या करना चाहिए, तो वह तुम मुझसे कभी भी पूछ सकते हो. लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं कहूंगा कि ऐसा करो या ऐसा मत करो. मैं उनसे राय लेता हूं.

फराह खान की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में अंकिता काम करने वाली थीं, लेकिन अब वो उसका हिस्सा नहीं हैं. क्या वजह रही?
बातें चल रही थीं. बहुत सी चीजें थीं, जो वर्कआउट नहीं हो सकीं. काय पो चे से लेकर अब तक मेरे साथ पच्चीस फिल्मों की बातें चलीं, लेकिन चीजें वर्कआउट हुई नहीं. तो बातें होती रहती हैं.

Friday, September 6, 2013

फिल्‍म समीक्षा : शुद्ध देसी रोमांस

Shuddh desi romance-अजय ब्रह्मात्‍मज
समाज में रोमांस की दो परंपराएं साथ-साथ चल रही हैं। एक नैसर्गिक और स्वाभाविक है। किशोर उम्र पार करते ही तन-मन कुलांचे मारने लगता है। प्यार हो न हो ..आकर्षण आरंभ हो जाता है। यह आकर्षण ही समय और संगत के साथ प्यार और फिर रोमांस में तब्दील होता है। प्यार की कोई पाठशाला नहीं होती। कुछ जवांदिल मनमर्जी से प्यार की गली में आगे बढ़ते हैं और उदाहरण पेश करते हैं।
भारतीय समाज में दूसरे किस्म का रोमांस फिल्मों से प्रेरित होता है। पर्दे पर हमारे नायक के सोच-अप्रोच से प्रभावित होकर देश के अधिकांश प्रेमी युगल रोमांस की सीढि़यां चढ़ते हैं। मनीष शर्मा निर्देशित और जयदीप साहनी लिखित 'शुद्ध देसी रोमांस' इन दोनों परंपराओं के बीच है।
'शुद्ध देसी रोमांस' की पृष्ठभूमि में जयपुर शहर है। यह नाटक के स्क्रीन की तरह कहानी के पीछे लटका हुआ है। फिल्म में शहर किसी किरदार की तरह नजर नहीं आता। 'रांझणा' में हम ने बनारस को धड़कते हुए देखा था। 'शुद्ध देसी रोमांस' जयपुर जैसे किसी भी शहर की कहानी हो सकती है। लेखक का ध्यान शहर से अधिक किरदारों पर है। उन्हें रघु, गायत्री और तारा के दृष्टिकोण से पेंच और मोड़ पैदा करने हैं। तीनों किरदारों के आत्मकथन से यह स्पष्ट होता है कि 'शुद्ध देसी रोमांस' दिल के बजाए दिमाग से लिखी गई है। पटकथा की यह जोड़-तोड़ जहां ढीली हुई है, वहां फिल्म में दोहराव दिखने लगता है।
यशराज फिल्म्स विदेशी रोमांस के लिए मशहूर रहा है। विदेशों की धरती पर पनपे प्यार को दिखाने में माहिर यशराज फिल्म्स का 'शुद्ध देसी रोमांस' की तरफ मुड़ना उल्लेखनीय है। इस फिल्म के किरदार जिंदगी में असफल रहे नार्मल इंसान हैं। उनकी जिजीविषा में घबराहट है। किसी भी निर्णायक मोड़ पर वे दुविधा से कांपने लगते हैं। स्थितियों का मुकाबला करने के बजाए वे भाग खड़े होते हैं। शादी की जिम्मेदारी का एहसास होते ही उनका प्यार और रोमांस काफूर हो जाता है। रघु और गायत्री के बात-व्यवहार और निर्णयों से हमें आज के यूथ की झलक मिलती है। प्यार करने में उन्हें समय नहीं लगता, लेकिन शादी के नाम से ही उन्हें बुखार छूटने लगता है। उनमें प्यार का अर्पण तो है,लेकिन शादी के समर्पण का अभाव है।
लेखक-निर्देशक ने आज के प्यार और रोमांस को दोनों (लड़का व लड़की) पहलुओं से देखा और परखा है। एक बार रघु शादी के मंडप से भागता है और दूसरी बार गायत्री भागती है। इन दोनों से अलग तारा है। वह प्यार में पागल नहीं है। जीवन में संतुलित और व्यावहारिक है। इनके अलावा गोयल (ऋषि कपूर) भी हैं। वे इनके रवैए और दृष्टिकोण पर टिप्पणी तो करते हैं, लेकिन अपना पक्ष रखने में गोलमटोल कर जाते हैं।
प्यार और रोमांस के प्रति यूथ का ढुलमुल और अस्पष्ट रवैया फिल्म में अच्छी तरह से चित्रित हुआ है। अच्छी बात है कि 'शुद्ध देसी रोमांस' में युवतियां फैसले लेती हैं। वे स्वतंत्र हैं। उन पर परिवार या समाज का दबाव नहीं है। आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करने से उन्हें दूसरी आजादियां भी मिली हैं। 'शुद्ध देसी रोमांस' के तीनों चरित्र विश्वसनीय और हमारे आसपास के हैं। उनकी बातों, मुलाकातों और रातों में हम आज की युवापीढ़ी की सोच पाते हैं।
परिणीति चोपड़ा नई पीढ़ी की दमदार अभिनेत्री हैं। उन्होंने गायत्री को पूरी सहजता से पेश किया है। परिणीति की खासियत है कि वह अभिनय करती नजर नहीं आतीं। छोटी प्रतिक्रियाओं,आंखों के मूवमेंट और हसीन मुस्कराहट से वह अपने भाव प्रकट करती हैं। रघु के किरदार को सुशांत सिंह राजपूत ने उसकी दुर्बलताओं के साथ पेश किया है। वे इस फिल्म में भूमिका के अनुरूप निखरे हैं। वाणी कपूर की यह पहली फिल्म है। वह सम्मोहित करती हैं, लेकिन अभिनय में कच्चापन है।
फिल्म का गीत-संगीत नया और विषय के अनुकूल है। जयदीप साहनी केबोल हिंदी फिल्मों के गीतों के खांचे में नहीं आते। वे उद्गार से अधिक संभाषण और संवाद लगते हैं।
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Tuesday, September 3, 2013

खांचे और ढांचे से दूर सुशांत सिंह राजपूत


-अजय ब्रह्मात्मज
    पटना में पैदा हुए, दिल्ली में पले-बढ़े और मुंबई में पहले टीवी और अब फिल्मों में पहचान बना रहे सुशांत सिंह राजपूत की कामयाबी का सफर सपने को साकार करने की तरह है। ‘काय पो छे’  की सराहना और सफलता के पहले ही उन्हें राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ और मनीष शर्मा की ‘शुद्ध देसी रोमांस’ मिल चुकी थी। प्रतिभा की तलाश में भटकते निर्माता-निर्देशकों को तो सिर्फ धमक मिलनी चाहिए। वे स्वागत और स्वीकार के लिए पंक्तिबद्ध हो जाते हैं। सुशांत सिंह राजपूत के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। अभी 6 सितंबर को उनकी दूसरी फिल्म रिलीज होगी, लेकिन उसके पहले ही वे फिर से दो-तीन फिल्में साइन कर चुके हैं। आप अगर मुंबई में लोखंडवाला के इलाके में रहते हों तो मुमकिन है कि वे किसी मॉल, जिम या रेस्तरां में आम युवक की तरह मटरगस्ती करते मिल जाएं। अभी तक स्टारडम को उन्होंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है। वैसे फिल्म इंडस्ट्री में यह भी खबर फैल रही है कि सुशांत के तो भाव बढ़ गए हैं।
    बहरहाल, हमार बातचीत ‘शुद्ध देसी रोमांस’ को लेकर होती है। इस फिल्म के बारे में वे बताते हैं, ‘हिंदी फिल्मों में हम रोमांस के नाम पर फैंटेसी देखते रहे हैं। हीरो-हीरोइन केबीच सब कुछ गुडी-गुडी चलता रहता है। ‘शुद्ध देसी रोमांस’ मेंआज के यूथ की सोच और भावना है। एक आम युवक या युवती के मन में प्यार को लेकर जो भी कन्फ्लिक्ट होते हैं, उन सभी को यह फिल्म टच करती है। फिल्म देख कर सभी यही कहेंगे कि सच तो है। ऐसा ही मेरे साथ हुआ था। दोस्तों के साथ हुआ था।’
    इस फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत रघु गाइड की भूमिका में हैं। जयपुर शहर का यह गाइड मनचला और आजाद तबियत का है। सुशांत रघु की खासियतों को जाहिर करते हैं, ‘उसके अंदर जो चल रहा होता है, वह बोल देता है या कर देता है। वह अपने दिल की सुनता है और उससे वैसे ही डील करता है, जैसे हमारी उम्र के युवक होते हैं। जो कोई भी इस वक्त रिलेशनशिप में हैं, वे रघु से कनेक्टेड फील करेंगे।’
    क्या वजह है कि सुशांत अपारंपरिक किस्म की फिल्में ही चुन रहे हैं? क्या उन्हें हिंदी फिल्मों के टिपिकल हीरो की फिल्में नहीं मिलतीं या कोई और बात है? सुशांत मुस्कराते हैं और जवाब देते हैं, ‘मुझे दस में से पांच पारंपरिक फिल्में मिलती हैं। उनमें नाच-गाना और एक्शन रहता है। आप जानते हैं कि मैं डांसर रह चुका हूं और मैंने मार्शल आर्टस की ट्रेनिंग भी ली है। मैं ट्रैडिशनल फिल्मों की मांग पूरी कर सकता हूं। दरअसल, इस वक्त मैं लार्जर दैन लाइफ फिल्में नहीं चुन रहा हूं। अभी रियलस्टिक फिल्मों में मजा आ रहा है। जब तीन-चार महीनों का लंबा वक्त होगा तो वैसी फिल्में करूंगा। फिलहाल टिपिकल हीरो जैसा होने के बावजूद मसाला फिल्मों को ना कहने की हिम्मत कर रहा हूं।’ सुशांत ऐसे चुनाव को जोखिम नहीं मानते, उनके शब्दों में, ‘अगर 100-200 करोड़ के क्लब में जाने की मंशा हो तो ऐसी फिल्में रिस्क हो सकती है। मैं तो मीडियम और छोटी फिल्में कर रहा हूं। जिस तेजी से देश में मल्टीप्लेक्स बढ़ रहे हैं, उसकी वजह से ऐसी फिल्मों की मांग बढ़ेगी। अगले पांच साल उम्दा कंटेंट और आक्रामक मार्केटिंग का है।’
    सुशांत के लिए रघु अनजान किरदार नहीं था। जयदीप साहनी ने इसे जिस रंग-ढंग से गढ़ा है, वह अभिनेता को परफार्मेंस की संभावनाएं देता है। सुशांत स्पष्ट कहते हैं, ‘जयदीप साहनी को अच्छी तरह मालूम था कि उन्हें रघु में क्या चाहिए? वे विमर्श के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। उनके चरित्र और संवाद ऐसे होते हैं कि आप अपनी सोच से उसे गाढ़ा कर सकते हैं। मनीष शर्मा और जयदीप साहनी अपनी राय देने के बाद कलाकारों को खुला छोड़ देते हैं। वे हमें बंदिश में नहीं रखते थे। इस फिल्म को देखते समय किसी मोड़ पर रघु को थप्पड़ मारने का दिल करेगा, लेकिन आखिर में महसूस होगा कि अपना ही बंदा है। असल जिंदगी में तो ऐसा ही होता है।’
    पिछली फिल्म ‘काय पो छे’ में सुशांत के हिस्से में हीरोइन नहीं आई थी। ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में उनके साथ दो हीरोइनें हैं। लगता है भरपाई की जा रही है? बात काटते हुए सुशांत बताते समय कनखी मारते हैं, ‘आप को नहीं पता है हीरोइन पाने के लिए मैंने सोलह सोमवार कर व्रत किया था।’ फिर कहते हैं, ‘अच्छा ही हुआ। हीरोइनें की संख्या तो स्क्रिप्ट के हिसाब से घटती-बढ़ती रहेगी। इस बार परिणीति चोपड़ा और वाणी कपूर के साथ अच्छा अनुभव रहा। एक एनर्जेटिक है तो दूसरी नैचुरल ़ ़ ़ दोनों के अपने गुण हैं।’
    यशराज फिल्म्स के साथ जुडऩे की अपनी खुशी बताते समय वे बचपन का सपना याद करते हैं, ‘पांचवीं या छठी क्लास में ऐसे ही ख्याल आया था कि मैं यशराज फिल्म्स के लिए फिल्म कर रहा हूं। पर्दे पर लिखा आ रहा है यशराज फिल्म्स प्रेजेंट्स सुशंत सिंह राजपूत ़ ़  ़ ़। फिल्म साइन करते समय आदित्य चोपड़ा को मैंने अपने सपने के बारे में बताया था। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि जब तक अच्छा काम करते रहोगे, तब तक फिल्में मिलती रहेंगी। इसके बाद यशराज फिल्म्स की ही दिबाकर बनर्जी निर्देशित ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ कर रहा हूं।’ अपने स्टारडम से अंजान सुशांत कहते हैं, ‘स्टारडम शब्द से मैं अपरिचित हूं। इसे मैं समझ नहीं पाता। मैं न तो इसकी इच्छा रखता हूं और न इसके मजे लेना चाहता हूं। स्टार बनने की प्रक्रिया भी मुझे नहीं मालूम। अगर मुझे इस शब्द की वजह से क्या करू? क्या करूं? की स्थिति में आना होगा तो वह बहुत बड़ी विचलन होगी। स्टार बनने के साथ ही खांचा और ढांचा तय हो जाता है। मैं तो अभी भिन्न-भिन्न किरदारों को जीना चाहता हूं। सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत बने रहने में मजा नहीं है।’



Thursday, July 25, 2013

सुशांत सिंह राजपूत की 'ब्‍योमकेश बख्‍शी' बनने की तैयारी

-अजय ब्रह्मात्मज
देश में इस साल जबरदस्त मॉनसून आया हुआ है और इसके छींटे कोलकाता की गलियों और सडक़ों को मंगलवार को भीगो रहे थे। ठहरा शहर कुछ और थमकर चल रहा था। शहर की इस मद्धिम चाल के बीच भी ‘पार्क स्ट्रीट’ के पास शरगोशियां चालू थीं। मौका था ‘ब्योमकेश बख्शी’ के नायक सुशांत सिंह राजपूत के मीडिया से रू-ब-रू होने का। सुशांत सिंह राजपूत और दिबाकर बनर्जी ने मीडियाकर्मियों के साथ धरमतल्ला से खिदिरपुर तक की ट्राम यात्रा की। इस फिल्म में कोलकाता से जुड़ी पांच-छह दशक पुरानी कई चीजें देखने को मिलेंगी।
    एक सवाल के जवाब में सुशांत ने बताया कि मैं छह दिन पहले से कोलकाता में हूं। इस दरम्यान वे डिटेक्टिव ब्योमकेश के व्यक्तित्व को साकार करने के लिए स्थानीय लोगों से मिलकर बात-व्यवहार सीख रहे हैं। गौरतलब है कि दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी में वे पांचवे दशक के आरंभ(1942 के आसपास) के किरदार को निभा रहे हैं। हिंदी दर्शकों के लिए यह किरदार अपरिचित नहीं है। दूरदर्शन से प्रसारित इसी नाम के धारावाहिक में वे किरदार से मिल चुके हैं। सालों बाद दिबाकर बनर्जी को किशोरावस्था में पढ़े शर्दिंदु बनर्जी के किरदार ब्योमकेश की याद आई और उन्होंने इसे बड़े पर्दे पर लाने का फैसला किया। पिछले कुछ सालों में बंगाली में ब्योंमकेश पर अनेक टीवी शो और फिल्में आ चुकी हैं। ऋतुपर्णो घोष भी इसी किरदार को लेकर बंगाली में फिल्म बना रहे थे, जिसमें नायक के रूप में उन्होंने सुजॉय घोष को चुना था।
    दिबाकर बनर्जी के शब्दों में मुझे यह किरदार शुरू से आकर्षित करता रहा है। मुझे इस किरदार को फिल्म में लाने का मौका अभी मिला है। फिल्म सोचने के बाद कोलकाता आने पर मुझे एक और कैरेक्टर मिल गया। पहले  फिल्म में कोलकाता बैकग्राउंड में था। अब वह एक जीवंत कैरेक्टर बन चुका है। इस फिल्म को देखते समय दर्शक महसूस करेंगे कि ब्योमकेश बख्शी का फिल्मांकन कोलकाता के अलावा और कहीं हो नहीं सकता था।
    वे आगे कहते हैं, मैं खुद बंगाली हूं, लेकिन कोलकाता को इतनी अच्छी तरह नहीं जानता था। यहां आने के बाद मैंने देखा कि मॉर्डन कोलकाता में पुराना कोलकाता सांसें ले रहा है। हमने कई लोकेशन तय कर लिए हैं। अब हमारी बड़ी चुनौती है, उन्हें फिल्म में कैसे पिरोया जाए। निश्चित ही, इस फिल्म में वीएफएक्स का सदुपयोग होगा।
    पजामा-कुर्ता में आए सुशांत सिंह राजपूत में ब्योमकेश बख्शी में ढलने की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उन्होंने पिछले एक हफ्ते में कोलकाता की गलियों की सैर की है। स्थानीय लोगों से भी वे मिले हैं। बंगाली परिवारों में खाना खाया है और पुराने जमाने की कहानियां सुनी हैं। खाली समय में वे सत्यजीत रॉय समेत दूसरे अनेक बंगाली निर्देशकों की पुरानी फिल्में देख रहे हैं। उस दौर का साहित्य पढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात कि वे स्वयं ब्योमकेश बख्शी के किरदार को लेकर बहुत उत्साहित हैं।
    दिबाकर बताते हैं, इस साल के आखिर तक वे फिल्म की स्क्रिप्ट पूरी कर लेंगे। जनवरी में शूटिंग आरंभ करेंगे। दिसंबर 2014 में फिल्म की रिलीज की घोषणा की जा चुकी है। ‘ब्योमकेश बख्शी’ यशराज फिल्म्स और दिबाकर बनर्जी का संयुक्त प्रोडक्शन है।

Tuesday, June 25, 2013

रघु और तारा का शुद्ध देसी रोमांस

रघु (सुशांत सिंह राजपूत) और तारा (परिणीति चोपड़ा) का 'शुद्ध देसी रोमांस'।
मनीष शर्मा निर्देशित आदित्‍य चोपड़ा की यह फिल्‍म 13 सितंबर 2013 को रिलीज होगी।
 

Saturday, March 30, 2013

सुशांत सिंह राजपूत से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत


 सुशांत सिंह राजपूत 
 ‘काय पो छे’ के तीन युवकों में ईशान को सभी ने पसंद किया। इस किरदार को सुशांत सिंह राजपूत ने निभाया। टीवी के दर्शकों के लिए सुशांत सिंह राजपूत अत्यंत पॉपुलर और परिचित नाम हैं। फिल्म के पर्दे पर पहली बार आए सुशांत ने दर्शकों को अपना मुरीद बना लिया। ‘काय पो छे’ की रिलीज के पहले ही उन्होंने यशराज फिल्म्स की मुनीश शर्मा निर्देशित अनाम फिल्म की शूटिंग कर दी थी। इस फिल्म को पूरी करने के बाद वे राज कुमार हिरानी की ‘पीके’ की शूटिंग आरंभ करेंगे। ‘काय पो छे’ की रिलीज के बाद सुशांत सिंह राजपूत के साथ यह बातचीत हुई है।
- ‘काय पो छे’ पर सबसे अच्छी और बुरी प्रतिक्रिया क्या मिली?
0 अभी तक किसी की बुरी प्रतिक्रिया नहीं मिली। सभी से तारीफ मिल रही है। सबसे अच्छी प्रतिक्रिया मेरी दोस्त अंकिता लोखंडे की थी। उन्होंने कहा कि मैं इतने सालों से तुम्हें जानती हूं और ‘पवित्र रिश्ता’ में ढाई साल मैंने साथ में काम भी किया है। फिल्म देखते हुए न तो मुझे सुशांत दिखा और न मानव। एक शो में अपने दोस्तों के साथ गया था। फिल्म खत्म होने के बाद मुझे देखते ही दर्शकों की जो सीटी और तालियां मिली। वह अनुभव अनोखा है। आप ने इरफान की प्रतिक्रिया बताई। लोग हाथ मिला कर खुश होते हैं और मुझे एनर्जी देते हैं।
- क्या आरंभ से ही यह आत्मविश्वास था कि ऐसी सराहना और प्रतिक्रिया मिलेगी?
0 मुझे पिक्चर पर विश्वास था। निर्माण का शुद्ध प्रयास ही इसे यहां ले आया। बर्लिन में पहली प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। हम अपने दर्शकों की प्रतिक्रिया के इंतजार में थे। सच बताऊं तो ‘काय पो छे’ के पहले ही मुझे 5-6 फिल्में मिली थीं। सिंगल हीरो था मैं उनमें। मैं तब टीवी छोडक़र न्यूयॉर्क पढऩे जाने तैयारी कर रहा था। खाली था, फिर भी मैंने किसी फिल्म के लिए हां नहीं कह। इस फिल्म का ऑडिशन और स्क्रिप्ट पढऩे के बाद प्रार्थना करता रहा था कि मैं चुन लिया जाऊं। यह विश्वास था कि तीन दोस्तों की यह कहानी दर्शकों के साथ कनेक्ट होगी।
- फिल्म के प्रचार और प्रोमो में कहीं आप को कथित हीरो के तौर पर नहीं पेश किया गया, लेकिन फिल्म देखने के बाद दर्शकों ने आप को हीरो ठहरा दिया। ये हो गया कि आप लोग भी मान रहे थे?
0 हिंदी फिल्मों में जो प्रमुख किरदार मर जाता है, उसे हीरो मान लिया जाता है। इसकी अवधारणा में ही यह बात नहीं थी कि एक हीरो और दो दोस्त होंगे। अभिषेक कपूर ने किसी स्टार को इसीलिए नहीं रखा। तीनों नए चेहरे लिए गए कि उनकी कोई पूर्व छवि न हो। कोशिश थी कि दर्शक तीनों दोस्तों से कनेक्ट करें। वही हुआ, लेकिन लोगों ने मुझे थोड़ा ज्यादा प्यार दिया।
- आप की पृष्ठभूमि क्या रही है? कैसे आना हुआ ‘काय पो छे’ तक  ... 
0 मैं पटना में पैदा हुआ। प्रायमरी की पढ़ाई वहीं की। सेंट हाई स्कूल और कॉलेज मैंने दिल्ली से किया। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाई कर रहा था। शौक के लिए श्यामक डावर के डांस स्कूल जाता था। श्यामक को मैं अच्छा लगा के उन्होंने मुझे अपने डांस ट्रूप में चुन लिया। श्यामक ने ही सुझाव दिया कि तुम डांसर अच्छे हो। मुझे लगता है कि एक्टिंग भी कर सकते हो। फिर मैंने बैरी जॉन को ज्वायन किया। अंदर से एहसास हो रहा था कि डांस और थिएटर करते समय कुछ मैजिकल होता है। उस जादू का असर रहता था।
- क्या स्कूल-कॉलेज में भी परफारमेंस किए?
0 दिल्ली के हंसराज स्कूल में था। उस समय स्कूल शोज में हिस्सा लेता था। डांस और थिएटर ट्रैनिंग के बाद लगा कि इसमें मजा आ रहा है। फिर मैंने इंजीनियरिंग छोड़ दी। मैंने तय किया कि बाकी साल मनपसंद ट्रैनिंग में लगाऊंगा। मुंबई आने पर नादिरा बब्बर के साथ थिएटर किया। मैंने वहां ‘रोमियो जुलिएट’, ‘दौड़ा दौड़ा भागा भागा’,्र ‘प्रेमचंद की कहानियां’, ‘पुकार’ मोनोलॉग में एक्ट किया। दो-ढ़ाई साल इसमें बीते। ‘पुकार’ के प्रदर्शन में बालाजी के कास्टिंग डायरेक्टर ने मुझे देखा और एकता कपूर से मिलने के लिए बुलाया। एकता ने सलाह दी कि टीवी कर लो। तब तक मैंने कुछ सोचा नहीं था।
- अच्छा तो मुंबई आने के समय यह इरादा नहीं था कि टीवी फिल्मों में एक्टिंग करनी है?
0 मैंने यह नहीं सोचा था। कैरियर प्लान नहीं किया था। सीखने के लिए मैंने सब कुछ कर रहा था। टीवी का ऑफर मिला तो सभी सुझाव दिया कि प्राइम टाइम शो है, जरूर करो। अच्छा ही हो गया। कैमरे की ट्रेनिंग मिल गई। पैसे अच्छे मिलने लगे और आडिएंस भी पसंद करने लगी। दो साल बीतते-बीतते लगा कि मैं तो कुछ सीख ही नहीं रहा हूं। सिर्फ पैसे कमा रहा हूं। यह ख्याल आते ही मैंने ‘पवित्र रिश्ता’ छोड़ दिया। उस समय शॉर्ट फिल्में बनाने लगा। ‘इग्नोर्ड डे’ शॉर्ट फिल्म बनाई। फिल्म की ट्रेनिंग के लिए यूसीएलए में ट्राय किया। वहां हो गया। तो जाने की तैयारी करने लगा। टीवी छोड़ते ही मुझे फिल्मों के ऑफर आने लगे, फिर भी मन नहीं डिगा। फिल्मों के लिए ना कर ही रहा था। तभी कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे ‘काय पो छे’ के बारे में बताया और ऑडिशन के लिए बुलाया। लगभग सात सालों के अभ्यास और काम के बाद मैंने ऑडिशन दिया था।
- फिर क्या हुआ?
0 चुन तो लिया गया, लेकिन अभिषेक कपूर ने कहा कि छह हफ्ते के बाद शूटिंग पर जाना है। तुम्हें अपना वजन कम करना होगा। तब मैं 87 किलो का था। मैंने स्क्रिप्ट का अभ्यास किया। वजन कम किया। टीवी करते समय आलस्य और व्यस्तता के मोटा हो गया था। छह हफ्ते की मेहनत काम आई। 14 किलो ग्राम वजन कम हुआ।
- ‘काय पो छे’ के आरंभ होने के पहले के बारे में कुछ बताएं?
0 हमलोग वर्कशॉप और रिहर्सल करते रहे। हम तीनों एक-दूसरे को काटने या दबाने की कभी कोशिश नहीं की। हमारे बीच खूब छनती थी। अभिषेक ने तो मुकेश से पूछा भी था कि तीनों पहले से दोस्त हैं क्या? अभिषेक भी चौंके।
- क्या कभी आशंका या असुरक्षा का एहसास भी हुआ कि अगर फिल्म नहीं बन सकी तो क्या होगा? हम जानते हैं कि कई बार सारी कोशिशों के बावजूद फिल्में अटक जाती है?
0 मैं बस प्रार्थना करता रहता था कि सब कुछ ठीक से चलता रहे। इंट्रोवर्ट, अल्पभाषी और शर्मिला था। फिल्म में उसका उल्टा था। यही जोश था कि इसमें कुछ नया कर पाएंगे। अब तक अभिषेक ने एक्शन नहीं बोल दिया तब तक अज्ञात डर तो था ही।
- फिल्म मिलने की खबर सबसे पहले किस के साथ शेयर की?
0 मैं अंकिता के साथ ही बैठा हुआ था जब फोन आया था। तो सबसे पहली जानकारी अंकिता को मिली। फिर सबसे बड़ी बहन को बताया। उन्होंने हमेशा मेरी मदद की और हौसला दिया। आर्थिक मदद भी देती रहीं।
- कितने भाई-बहन हैं? परिवार के बारे में बताएं?
0 मेरी चार बड़ी बहनें हैं। मैं सबसे छोटा हूं। एक डॉक्टर हैं चंडीगढ़ में, उनकी शादी आईपीएस ऑफिसर के साथ हुई। दूसरी स्टेट लोकल तक क्रिकेट खेल चुकी हैं। अभी गोल्फ खेलती हैं। मीतू दीदी के ऊपर ही मैंने ईशान को आधारित किया था। तीसरी सुप्रीम कोर्ट में क्रिमिनल लॉयर हैं। चौथी बहन भी काम करती हैं। मीतू दीदी जब फिल्म देखने जा रही थी तो मैंने कहा था कि दीदी देख कर बताना कि ईशान किस पर आधारित है? दस मिनट के अंदर ही उनका फोन आ गया। मेरे डैडी का नाम के  के सिंह है।
- मीतू दीदी में ऐसी क्या बात थी, जो ईशान में भी है  ... 
0 जरूरी नहीं है कि काबिलियत को सही समय पर मौके मिल जाएं। उनके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। ईशान के साथ भी ऐसा हुआ तो वह बहुत इंपलसिव हो गया। ऊपर से वह गुस्सैल और असंवेदनशील लगता है, लेकिन अंदर से मुलायम और टची है। वह शुद्ध और ईमानदार है। असुरक्षित भी है।
- फिल्म में यह सब दिखा है और ईशान उसे धक्का देता है ...
0 जी, ईशान का गुस्सा अली पर नहीं है। सच कहें तो वह सिस्टम के प्रति नाराजगी जाहिर करता है। ईशान को तुरंत एहसास होता है कि मैंने अली को क्यों मारा।
- मीतू दीदी और सुशांत सिंह का संबंध फिल्म में विधा और ईशान के जैसा ही है या अलग था?
0 मीतू दीदी से मेरे संबंध की झलक अली और ईशान के बीच है। मीतू दीदी ने मुझे बाईक और कार चलाना सिखाया। क्रिकेट खेलना सिखाया। मैं जो भी अच्छी चीजें करता हूं, वह सब मीतू दीदी का सिखाया-बताया है। तब मेरी भी उम्र अली इतनी थी। जब सब कुछ सीख-समझ रहा था।
- आप के पिता का नाम के के सिंह है और आप अपने नाम में सिंह के आगे राजपूत लिखते हैं। कोई वजह?
0 मेरी मां राजपूत लिखती थीं। मैंने डैड से सिंह और मां से राजपूत लिया। मैं पटना का ही हूं। छोटा था तभी मां का देहांत हो गया था। तब मैं बारह का ही था। हमलोग शुरू से दिल्ली में ही रहे।
- उत्तर भारत... खास कर उत्तरप्रदेश और बिहार से फिल्मों में कम एक्टर आते हैं। मैंने देखा है कि उनके प्रति इंडस्ट्री का रवैया स्वागत और प्रोत्साहन का नहीं रहता। आप का अनुभव कैसा रहा?
0 मुझे कभी विरोध नहीं झेलना पड़ा। भेदभाव तो होता ही है। हमारे समाज और विश्व में है। यह मानवीय प्रवृति है। मेरे अंदर एक आत्मविश्वास रहा है। ऐसा नहीं था कि एक सुबह सो कर उठने के बाद मैंने एक्टर बनने का फैसला कर लिया। मैंने बाकायदा छह साल ट्रेनिंग की। फिर आप कैसे छांट सकते हो। सबसे बड़े जज दर्शक होते हैं। वे पैसे देकर फिल्में देखने आते हैं। वे जब फिल्म देखने के बाद हाथ मिलाते समय भावुक हो जाते हैं। उनकी आंखें छलकने लगती हैं तो स्वीकृति मिल जाती है। मेरे लिए यह एक प्रोसेस है। डांस, थिएटर, टीवी और फिल्म ... सब एक-एक होता गया। अभी सीख रहा हूं। मैं खुद को स्टार नहीं समझ रहा हूं।
- स्टारडम के अहंकार से बचने के लिए क्या कर रहे हैं?
0 मुझे लगता है कि लोग आप को पढ़ लेते हैं। मैं झूठ और सच नहीं छिपा सकता। पैसे और प्रसिद्धि का आकर्षण नहीं है। अभी तक मैं ट्विटर या फेसबुक पर भी नहीं हूं। मुझे जो भी सराहना मिली है, उसे स्वीकार कर दिल में रखा है। सिर तक आने नहीं दिया है।
- अपने रिलेशनशिप के बारे में बताएं?
0 अंकिता लोखंडे ‘पवित्र रिश्ता’ में मेरी कोस्टार थीं। उन से दोस्ती हुई। आज भी हम दोस्त हैं। साथ रहते हैं। शादी जब होनी होगी, हो जाएगी। अभी सोचा नहीं है। मैं ईमानदारी और मेहनत नहीं छोडऩा चाहता। बैरी जॉन और नादिरा बब्बर से जो सीखा है, उसे ही मांज रहा हूं। साथ ही नई चीजें भी सीख रहा हूं।