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Tuesday, July 16, 2019

सिनेमालोक : कंगना से ताज़ा टकराव के बाद


सिनेमालोक
कंगना से ताज़ा टकराव के बाद
पिछले दिनों कंगना रनोट की एक फिल्म के सोंग लॉन्च के इवेंट में एक पत्रकार से उनकी तू तू मैं मैं हो गई. बात उलाहने से शुरू हुई और फिर फिसलती गई. लगभग 8 मिनट की इस बाताबाती में कंगना रनोट का अहम और अहंकार उभर कर आया. पत्रकार लगातार उनकी बातों से इंकार करता रहा. बाद में कंगना रनोट के समर्थकों और उनकी बहन रंगोली चंदेल ने उक्त पत्रकार के पुराने ट्वीट के स्क्रीनशॉट दिख कर यह साबित करने की कोशिश की कि वह लगातार उनके खिलाफ लिखता रहा है. उनकी गतिविधियों का मखौल उड़ाता रहा है. हालाँकि इस आरोपण में दम नहीं है.
फिलहाल फिल्म पत्रकारिता का जो स्वरूप उभरकर आया है, उसमें फिल्म बिरादरी के सदस्यों से सार्थक और स्वस्थ बातचीत नहीं हो पाती, पत्रकारों की संख्या बढ़ गई है, इसलिए फिल्म स्टार के इंटरव्यू और बातचीत का अंदाज और तरीका भी बदल गया है. पहले बमुश्किल एक दर्जन फिल्म पत्रकार होते थे. उनसे फिल्म कलाकार की अकेली और फुर्सत की बातचीत होती थी. लिखने के लिए कुछ पत्र पत्रिकाएं थीं. उनमें ज्यादातर इंटरव्यू, फिल्म की जानकारी और कुछ पन्नों में गॉसिप छपा करते थे, पत्रिकाओं से अखबारों में आने और फिल्म के रंगीन होने के बाद फिल्म पत्रकारिता में तेजी से परिवर्तन आया, उधर फिल्म इंडस्ट्री में पीआर (प्रचारक) का जोर बढ़ा. इन सभी के साथ मीडिया का विस्तार होता रहा. कुछ सालों पहले सोशल मीडिया के आ जाने के बाद तो संयम और सदाचार के सारे बांध टूट गए. टाइमलाइन की रिपोर्टिंग और कवरेज ने गंभीरता समाप्त कर दी. यह दोनों तरफ से हुआ. इसके लिए पत्रकार और कलाकार दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं.
कुछ मीडिया संस्थानों से जुड़े फिल्म पत्रकारों की ही क़द्र रह गई है. बाकी को पीआर और फिर इंडस्ट्री भीड़ से अधिक नहीं समझते. इसकी बड़ी वजह मीडिया की भेड़चाल ही है. मीडिया की बेताबी और जरूरतों को देखते हुए फिल्म कलाकारों के पीआर ने अंकुश लगाने के साथ शर्तें लड़नी शुरू कर दी हैं. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि पिछले दिनों एक लोकप्रिय स्टार का इंटरव्यू का वॉइस मेल सभी पत्रकारों को भेज दिया गया. बताया गया स्टार को फुर्सत नहीं है. पीआर ने तो अपनी सुविधा देखी. ताज्जुब तब हुआ जब ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं में उसी वॉइस मेल की बातचीत छपी हुई पढ़ने-सुनने को मिली.
कंगना रनोट अपने वीडियो मैं बोलते समय असंयमित हो गई और उन्होंने पत्रकारों के बारे में कुछ उटपटांग बातें भी कीं. उन्होंने एक तरफ से सभी को समेट लिया. जिन्हें ‘मणिकर्णिका’ पसंद नहीं आई,उन्हें ‘देशद्रोही’ तक कह डाला. यह कैसा बचकानापन है. दरअसल, गुस्से में कई बार हम व्यक्ति के साथ उसके परिवार, समूह, समुदाय और समाज को भी समेट लेते हैं, करना रनोट भूल गईं कि इसी मीडिया में से अधिकांश ने हमेशा उनकी हिम्मत की दाद दी, उनकी प्रतिभा का बखान किया, दिग्गजों से भिड़ने के समय उनके साथ रहे. वह अपने उलाहने में उन्हें अलग नहीं कर सकीं. नतीजतन मीडिया के सक्रिय सदस्य दुखी और नाराज हुए.
फिलहाल गतिरोध बना हुआ है, लेकिन कंगना रनोट अपनी आगामी फिल्म के प्रचार में जुटी हुई हैं. आनन-फानन में बने संगठन द्वारा लगाई गई पाबंदी के बावजूद कंगना से मीडिया की बातचीत हो रही है. आज के संदर्भ में किसी फ़िल्म पत्रकार के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह अपने समूह के आवाहन पर संस्थान के निर्देशों का उल्लंघन कर सके. पेशेवर पत्रकार के तौर पर यह मुमकिन भी नहीं है.
यह मौका है कि हम सभी फिल्म पत्रकारिता के स्वरूप और ढंग पर विचार करें. आज की जरूरतों और मांग के अनुसार उस में फेरबदल करें. कलाकारों से हो रही बातचीत को केवल क्विज और रैपिड फायर के नाम पर लतीफा और छींटाकशी का मंच न बनाएं. चंद् पत्रकार ही कलाकारों से बातें करते समय फिल्मों पर खुद को केंद्रित करते हैं. ज्यादातर बातचीत में कलाकारों की प्रतिक्रिया और सफाई रहती है. वे खुलासा कर रहे होते हैं. कलाकारों से ढंग की बातचीत नहीं हो पाने का सबसे बड़ा कारण बगैर फिल्म देखे किसी फिल्म पर बातचीत करना है. कलाकार कुछ बताना नहीं चाहते और पत्रकारों के पास भेदी सवाल नहीं होते. विदेशों की तरह फिल्म दिखा कर बातचीत की जाए तो उससे फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया संस्थान और दर्शक सभी का भला होगा.


Tuesday, July 9, 2019

सिनेमालोक : अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार


 सिनेमालोक
अश्लीलता का क्रिएटिव व्यभिचार
-अजय ब्रह्मात्मज
वेब सीरीज धड़ल्ले से बन रही हैं. लगभग सारे कलाकार, तकनीशियन और बैनर किसी ने किसी वेब सीरीज के निर्माण से जुड़े हैं, फिल्म और टीवी के बाद आया वेब सीरीज का यह क्रिएटिव उफान सभी के लिए अवसर और लाभ जुटा रहा है. वेब सीरीज के प्रसारण के लिए विशेष प्लेटफॉर्म बन गए हैं. देश-विदेश के अनेक उद्यमी इस दिशा में सक्रिय हैं. सभी को अनेक संभावनाएं दिख रही है. खासकर वेब सीरीज पर सेंसर का अंकुश नहीं होने की वजह से लेखक, निर्देशक और कलाकार अभिव्यक्ति की नई उड़ानें भर रहे हैं, कुछ के लिए यह उनकी कल्पना का असीमित विस्तार है तो कुछ क्रिएटिव व्यभिचार में मशगूल हो गए हैं.
वेब सीरीज में गाली-गलौज, हिंसा और सेक्स की भरमार चिंता का विषय है, समाज के नैतिक पहरुए तो लंबे समय से शोर मचा रहे हैं कि वेब सीरीज के कंटेंट की निगरानी हो. वे आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों पर कैंची चलाना चाहते हैं. दूसरा तबका सेंसरशिप के सख्त खिलाफ है. फिल्म और टीवी की सेंसरशिप से उकताया यह तबका थोड़ी राहत महसूस कर रहा है. पिछले दिनों निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने एक बातचीत में साफ शब्दों में कहा था कि पहली बार हमें क्रिएटिव आजादी मिली है. हम दर्शकों को बेहतरीन कंटेंट दे पा रहे हैं. फिल्म और टीवी माध्यम पर सेंसरशिप का अंकुश न होने की वजह से विषय, कथ्य और दृश्यों के वर्जित क्षेत्र खुल गए हैं’ लेखकों और निवेशकों को बड़ा मौका मिला है.
यह बड़ा मौका किसी बाढ़ की तरह गंदगी भी लेकर आ चुका है. खासकर वेब सीरीज की भाषा(गाली-गलौज) और सेक्स चित्रण में कुछ लेखक-निर्देशक मिली छूट और स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं. वे उत्तेजना और आकर्षण के लिए फूहड़ और अश्लील हो जाने की गलतियां कर रहे हैं. इस तरह वे पाबंदी और सेंसरशिप के समर्थकों को अवसर दे रहे हैं. हालांकि कोर्ट ने ऐसी आपत्तियों और जनहित याचिकाओं को फिलहाल ठुकरा दिया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि जल्दी ही वेब सीरीज की ढीली लगाम खींच ली जाएगी. ऐसा हुआ तो वेब सीरीज के विस्तार और संभावनाओं पर ब्रेक लग जाएगा.
वेब सीरीज पर पाबंदी और सेंसरशिप के पक्ष-विपक्ष की बहसों से अलग भी इस मुद्दे से संबंधित समस्याएं हैं. पिछले दिनों एक अभिनेता ने इसका खुलासा किया. अभिनय का प्रशिक्षण लेकर फिल्मों में आए इस अभिनेता की पिछले कुछ सालों में अपनी पहचान मिली है. सार्वजनिक स्थानों पर उनके दर्शक-प्रशंसक उनके साथ सेल्फी खिंचवाने के लिए बेताब रहते हैं. प्रशंसकों से घिरे अभिनेता ने फुर्सत मिलते ही अपनी दुविधा और उससे जुड़ा द्वंद्व शेयर किया. उन्हें इन दिनों काफी काम मिल रहा है और काम का बड़ा हिस्सा वेब सीरीज है.
अभिनेता ने बताया कि इन दिनों वेब सीरीज की भाषा से हमें दिक्कत होती है. कई दृश्यों में गाली-गलौज की जरूरत नहीं होती है. अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए संवादों में हम ममूली शब्दों का सहारा ले सकते हैं, लेकिन उसे नाटकीय  और कथित रूप से प्रभावपूर्ण बनाने के लिए जबरन गालियां ठूसी जा रही हैं. गालियों में अद्भुत प्रयोग हो रहे हैं. भाषा की अश्लीलता के साथ ही सेक्स दृश्यों की अधिकता भी हमें परेशान कर रही है. मुमकिन है कि स्त्री-पुरुष के अंतरंग और कामुक दृश्यों में दर्शकों को स्फुरण और आनंद आता हो, लेकिन हमारी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. पिछले दिनों एक निर्देशक ने बताया कि बेडरूम सीन के बाद हम आपके नितंब से कैमरा पुल करेंगे और आपको नंगे खड़े होकर तौलिया लपेटते हुए अपना संवाद बोलना है. जब मैंने आपत्ति की तो निर्माता का फोन आ गया. वह धमकी भरे अंदाज में अनुबंध का हवाला देने लगा. यह भी तर्क दिया गया कि हम इसे पूरे एस्थेटिक के साथ शूट करेंगे. आपको लाज या ग्लानि नहीं होगी. निर्देशक निर्माता की जिद देखने के बाद मुझे दूसरे इमोशनल और लॉजिकल तरीके से उन्हें समझाना पड़ा. फिर बात बनी और उन्होंने बॉक्सर पहनने की अनुमति दे दी. लेकिन एक अभिनेता कब तक ऐसे दबावों से बचेगा. मैं मना करूंगा तो कोई और तैयार हो जाएगा.  


Tuesday, July 2, 2019

सिनेमालोक : महज टूल नहीं होते कलाकार


 सिनेमालोक
महज टूल नहीं होते कलाकार
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दो हफ्तों में ‘कबीर सिंह’ और ‘आर्टिकल 15 रिलीज हुई हैं. दोनों में दर्शकों की रुचि है. वे देख रहे हैं. दोनों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण से बहसें चल रही हैं. बहसों का एक सिरा कलाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है. क्या फिल्मों और किरदारों(खासकर नायक की भूमिका) को चुनते समय कलाकार अपनी जिम्मेदारी समझते हैं.

‘आर्टिकल 15 के संदर्भ में आयुष्मान खुराना ने अपने इंटरव्यू में कहा कि कॉलेज के दिनों में वह नुक्कड़ नाटक किया करते थे. उन नाटकों में सामाजिक मुद्दों की बातें होती थीं. मुद्दों से पुराने साहचर्य के प्रभाव में ही उन्होंने अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘आर्टिकल 15 चुनी. कहा यह भी जा रहा है कि अनुभव ने उन्हें पहले एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ऑफर की थी, लेकिन ‘मुल्क’ से प्रभावित आयुष्मान खुराना ने वैसे ही मुद्दों की फिल्म में रुचि दिखाई.अनुभव ने मौका नहीं छोड़ा और इस तरह ‘आर्टिकल 15 सामने आई. कह सकते हैं कि आयुष्मान खुराना ने अपनी लोकप्रियता का सदुपयोग किया. वह एक ऐसी फिल्म के साथ आए जो भारतीय समाज के कुछ विसंगतियों को रेखांकित करती हैं. उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति का लाभ फिल्म को मिला. उसे दर्शक मिले.

आमिर खान फिल्म को मनोरंजन का माध्यम समझते हैं. उनकी फिल्में इसी उद्देश्य से बनती और प्रदर्शित होती हैं. फिर भी हम देखते हैं कि उनकी ज्यादातर फिल्मों में संदेश और कुछ अच्छी बातें रहती हैं. अपने कैरियर के आरंभ में आमिर खान ने भी दूसरे अभिनेताओं की तरह हर प्रकार की फिल्में कीं. उनमें कुछ ऊलजलूल भी रहीं, लेकिन ‘सरफरोश’ के बाद उनका चुनाव बदल गया है. उनकी स्लेट सार्थक फिल्मों से भरी है. उन्होंने एक बातचीत में मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मैं अपनी लोकप्रियता का उपयोग ऐसी फिल्मों में करना चाहता हूं, जो दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ सुकून और शिक्षा भी दें. हमारे होने की वजह से उन फिल्मों में दर्शकों की जिज्ञासा रहती है. वे फ़िल्में देखने आते हैं.

फिल्म कलाकारों में बड़ी जमात ऐसे अभिनेता/अभिनेत्री की है, जिन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है. वे और उनके प्रशंसक समर्थक मानते हैं कि कलाकार दो कलाकार होता है. उसे जो भी किरदार दिया जाता है, वह उसे निभाता है. एक स्तर पर यह तर्क सही है, लेकिन फिल्मों के प्रभाव को देखते हुए किसी भी अभिनेता/अभिनेत्री को यह तो देखना ही चाहिए कि उसकी फिल्म अंतिम प्रभाव में क्या कहती है? फिल्म में उनका किरदार पॉजीटिव या नेगेटिव हो सकता है, लेकिन इन किरदारों को निर्देशक कैसे ट्रीट करता है और फिल्म का क्या निष्कर्ष है? अगर इन बातों पर ध्यान ना दिया जाए तो फिजूल फिल्मों की झड़ी लग जाएगी. घटिया, अश्लील और फूहड़ फिल्मों की संख्या बढ़ती चली जाएगी. फ़िल्में  मनोरंजन और मुनाफा हैं, लेकिन इन उद्देश्यों के लिए उन्हें अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता.

‘कबीर सिंह’ सिंह के संदर्भ में शाहिद कपूर के प्रशंसक और समर्थक के साथ कुछ समीक्षक और विश्लेषक भी कहते नजर आ रहे हैं कि हमें शाहिद कपूर की मेहनत और प्रतिभा का कायल होना चाहिए. उनकी तारीफ करनी चाहिए. उन्होंने एक नेगेटिव किरदार को इतने प्रभावशाली ढंग से पेश किया. और फिर उन्होंने निर्देशक की मांग को पूरा किया. एक कलाकार के लिए सबसे जरूरी है कि वह अपने किरदार को सही तरीके से निभा ले जाए, लेकिन यह सोचना जरूरी है कि क्या कलाकार कोई मशीन है? वह मनुष्य है और उसकी अपनी सोच-समझ होनी चाहिए. कलाकार केवल टूल नहीं है कि चाभी देने या ऑन करने मात्र से चालू हो जाए. अपनी समझदारी से वह तय करता है कि कैरियर के लाभ के लिए उसे कौन सी फिल्म चुननी है? खासकर नायक हैं तो इतनी संवेदना तो होनी चाहिए कि  किरदार और फिल्म के प्रभाव को समझ सके.

भारतीय समाज में फिल्म कलाकारों की भूमिका बढ़ गई है, अब वे फिल्मों के अलावा सोशल इवेंट और प्रोडक्ट एंडोर्समेंट भी करते हैं. ज्यादातर कलाकारों को देखा गया है कि वे इवेंट और प्रोडक्ट चुनते समय यह खयाल रखते हैं कि उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? किसी इवेंट में जाना या किसी प्रोडक्ट को एंडोर्स करना उनके लिए कितना उचित होगा? इसी आधार पर उनकी राजनीतिक और सामाजिक समझ व्यक्त होती है. मामला सिर्फ फिल्मों के चुनाव का ही नहीं है. पूरी जीवन शैली और उन सभी फैसलों का भी है, जिनका असर सार्वजनिक जीवन पर पड़ता है. कोई भी कलाकार सिर्फ यह कहने से नहीं छूट या बच सकता कि हमें निर्देशक जो भी कहते हैं, हम कर देते हैं.


Tuesday, June 25, 2019

सिनेमालोक : कबीर सिंह के दर्शक


सिनेमालोक
कबीर सिंह के दर्शक
अजय ब्रह्मात्मज

पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई ‘कबीर सिंह’ मूल फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ से अच्छा कारोबार कर रही है. ‘अर्जुन रेड्डी’ ने कुल 51 करोड़ का कारोबार किया था, जबकि ‘कबीर सिंह’ ने तीन दिनों के वीकेंड में 70 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है. अगले दो नहीं तो तीन दिनों में यह 100 करोड़ी क्लब में शामिल हो जाएगी. कारोबार के लिहाज से ‘कबीर सिंह’ कामयाब फिल्म है. जाहिर है इसकी कामयाबी का फायदा शाहिद कपूर को होगा. वे इस की तलाश में थे. पिछले साल ‘पद्मावत’ ने जबरदस्त कमाई और कामयाबी हासिल की, पर उसका श्रेय संजय लीला भंसाली दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के बीच बंट गया था. ‘कबीर सिंह’ में शाहिद कपूर अकेले नायक हैं, इसलिए पूरे श्रेय कि वे अकेले हकदार हैं.
इस कामयाबी और शाहिद कपूर के स्टारडम के बावजूद ‘कबीर सिंह’ पर बहस जारी है. आलोचकों की राय में यह फिल्म स्त्रीविरोधी और मर्दवादी है. पूरी फिल्म में स्त्री यानि नायिका केवल उपभोग (कथित प्रेम) के लिए है. फिल्म के किसी भी दृश्य में नायिका प्रीति आश्वस्त नहीं करती कि वह 21वीं सदी की पढ़ी-लिखी मेडिकल छात्र हैं, जिसका अपना एक करियर भी होना चाहिए. मुग्ध दर्शकों को नायिका के इस चित्रण पर सवाल नहीं करना है? उन्हें ख्याल भी नहीं होगा कि वह स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में क्यों नहीं उभरती हैं? फिल्म के आरंभिक संवाद में ही नायक घोषणा करता है कि ‘प्रीति मेरी बंदी है’. ‘बंदी’ का एक अर्थ लड़की है लेकिन उसका दूसरा शाब्दिक/लाक्षणिक अर्थ ‘कैदी’ भी तो है. पूरी फिल्म में वह कैदीद ही नजर आती है. कभी कबीर सिंह की तो कभी अपने पिता की. इन दोनों के बाद वह परिस्थिति की भी कैदी है. लेखक-निर्देशक ने उसे गर्भवती बनाने के साथ पंगु भी बना दिया है. कबीर से अलग होने के बाद वह मेडिकल प्रैक्टिस भी तो कर सकती थी.
फिल्म के समर्थकों का आग्रह है कि कबीर सिंह के किरदार को पर्दे पर जीवंत करने के लिए शाहिद कपूर की तारीफ की जानी चाहिए. फिल्म के शिल्प और सभी तकनीकी पक्षों पर भी बातें होनी चाहिए. इस आग्रह में बुराई नहीं है, लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या ऐसे (खल)नायक की सराहना होनी चाहिए. साहित्य और फिल्मों में इसे हम ‘एंटी हीरो’ के नाम से जानते हैं. फिल्म का ऐसा नायक जिसमें नेगेटिव और ग्रे शेड हो. हॉलीवुड की फिल्मों में एंटी हीरो’ का अच्छा-खासा ट्रेडिशन रहा है. हिंदी फिल्मों में भी ‘एंटी हीरो’ का क्रेज रहा है अमिताभ बच्चन का फिल्मी विशेषण ‘एंग्री यंग मैन’ इसी ‘एंटी हीरो’ का पर्याय था. अनिल कपूर,शाह रुख खान और अन्य अभिनेताओं ने भी ‘एंटी हीरो’ के किरदार निभाए हैं.
गौर करें तो हिंदी फिल्मों में एंटी हीरो के पीछे सलीम-जावेद तर्क ले लिए आते थे. नायक के साथ हुए अन्याय की पृष्ठभूमि रहती थी, जिसमें उसकी नेगेटिव और गैरकानूनी गतिविधियां उचित लगती थीं. सारे चित्रण और ग्लेमर के बावजूद फिल्म के अंतिम दृश्य में एंटीहीरो को अपराध बोध और पश्चाताप से ग्रस्त दिखाया जाता था. उसे ग्लानि होती थी. वह अपने लिए और अपनी गलतियों के लिए अफसोस जाहिर करता था. भारतीय शास्त्रों, नाटकों और सिनेमा में खलनायकों को गरिमा प्रदान नहीं की जाती है. उन्हें रोमांटिसाइज़ नहीं किया जाता. ‘कबीर सिंह’ का नायक किसी ग्लानि में नहीं आता. उसे अपनी करतूतों पर पश्चाताप भी नहीं होता है. वह लड़कियों को महज उपभोग की वस्तु समझता है. चाकू की नोक पर उनके कपड़े उतरवाता है. डॉक्टर दोस्तों के मरीजों से हवस मिटाता है. प्रेमिका के विछोह में वह व्यभिचारी हो जाता है. ताज्जुब यह है कि  दर्शक उसे पर्दे पर देखकर लहालोट हो रहे हैं. तालियां बजा रहे हैं. सोशल मीडिया पर उसके पक्ष में तर्क के गढ़ रहे हैं.
‘कबीर सिंह’ के प्रशंसकों और समर्थकों को लगता है कि शाहिद कपूर ने अपने कैरियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय इस फिल्म में किया है. अभिनय की श्रेष्ठता और उदात्तता की सभी परिभाषाओं को भूलकर वे इस किरदार से मोहित हैं. देर-सबेर इस फिल्म की कामयाबी का सामाजिक अध्ययन होगा. कारण खोजे जाएंगे कि 2019 के जून में क्यों ‘कबीर सिंह’ जैसी फिल्म दर्शकों को पसंद आई. कारण स्पष्ट है. हमारा समाज जिस तेजी से पुरुष प्रधानता को प्रश्रय दे रहा है और उसकी बेजा हरकतों को उचित ठहरा रहा है. जिस देश में दिन-रात बलात्कार हो रहे हैं. अपराधियों को सजा नहीं मिल पा रही है. जिस समाज में बेटियों की भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक आम है, गली मोहल्लों में लड़कियों पर भद्दी टिप्पणियां और इशारे करने में युवकों को गुरेज नहीं होता... उस समाज और देश में ‘कबीर सिंह’ की जलील और अश्लील हरकतों में कोई खामी क्यों दिखेगी?
आज ऐसे किरदार का नाम कबीर रखा गया है. कल राम,कृष्ण, मोहम्मद, यीशु,विवेकानंद,बुद्ध, गाँधी,नानक भी हो सकता है. जब पूरा जोर कमाई और कामयाबी पर हो तो क्रिएटिव कर्तव्य की कौन सोचे?


Tuesday, June 4, 2019

सिनेमालोक : कोरियाई यथार्थ की भावुक पारिवारिक फिल्म


सिनेमालोक
कोरियाई यथार्थ की भावुक पारिवारिक फिल्म
अजय ब्रह्मात्मज
कल ‘भारत’ रिलीज होगी. सलमान खान की इस प्रतीक्षित फिल्म के निर्देशक अली अब्बास ज़फर हैं. दोनों की पिछली फिल्मों ‘टाइगर जिंदा है’ और ‘सुल्तान’ ने अच्छा कारोबार किया था. ‘भारत’ के साथ तिगडी पूरी होगी. ऐसा माना जा रहा है कि यह फिल्म भी तगड़ा कारोबार करेगी. एक तो ईद का मौका है. दूसरे इसमें कट्रीना कैफ भी हैं. हालाँकि फिल्म के ट्रेलर और गानों को दर्शकों का जबरदस्त रेस्पोंस नहीं मिला है,लेकिन ट्रेड पंडितों को लग रहा है कि सलमान को देखने की बेताबी फिल्म का बिज़नस बढ़ाएगी. उनका जोर इस बात पर है कि क्या ‘भारत’ 300 करोड़ का कारोबार कर पायेगी.
फिल्मों के एक्टिव दर्शकों को मालूम होगा कि ‘भारत’ कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फादर’(कुकसेजिंघ) की अधिकारिक रीमेक है. कोरियाई फिल्म 2014 में आई थी. इस फिल्म को देख कर सलमान खान इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अभी के प्रिय नर्देशक अली अब्बास ज़फर को इसे देखने के लिए उकसाया और हिंदी में भारतीय रूपांतर के लिए प्रेरित किया. कोरिई फिल्म देख रहे हिंदी दर्शक जानते हैं कि वहां की फिल्मों के इमोशन हिंदी फिल्मों जैसे ही होते हैं. पहले तो बगैर अधिकार और अनुमति लिए ही भारतीय निर्देशक चोरी-चोरी उन्हें हिंदी में बना लेते थे. अब इस तरह की चोरियां लगभग ख़त्म हो गयी हैं. अली अब्बास ज़फर ने ‘ओड टू माय फादर’ के मूल भाव को वैसे ही रखा है. भारतीय संदर्भ के लिए थोड़ी तब्दीलियाँ की हैं.
‘ओड टू माय फादर’ नायक सू देयोक की कहानी है. 23 दिसम्बर 1950 को युद्ध छिड़ने के बाद आज के उत्तर कोरिया के एक तटीय बस्ती को खाली करवाया जा रहा है. शिप में चढ़ने की हड़बोंग में सू का परिवार(पिता और बहन) बिखर जाता है. जाते-जाते उसके पिता हिदायत देते हैं कि परिवार का ख्याल रखना,क्योंकि आज से तुम ही परिवार के मुखिया हो. फिल्म सूके साथ साल के जीवन संघर्ष को समेटती है. पिता और बहन से मिलने की उम्मीद में वह पूरी जिंदगी कटता है. यह फिल्म दक्षिण कोरिया के इतिहास के साथ आगे बढती है. सारे ऐतिहासिक क्षणों को कैद करती यह फिल्म समय के थपेड़ों से जूझते एक परिवार की कहानी कहती है. बुरे दिनों में भी वे एक-दूसरे का सहारा बनते हैं. फिल्म का नायक जर्मनी और विएतनाम भी जाता है. इस फिल की सबसे बड़ी खूबी है कि भावनात्मक झंझावातों में यह अपनी ज़मीन नहीं छोडती. रियल रहने की कोशिश करती है. फिल्म में ऐसे प्रसंग हैं,जहाँ कठोरदिल दर्शकों की भी आँखें नम होती हैं. इस फिल्म ने कोरिया में ऐतिहासिक कारोबार किया था.
अब देखना है कि अली अब्बास ज़फर की कलम मूल कहानी का कैसे भारतीयकारन करती है. फिल्म के ट्रेलर और प्रमोशनल विडियो में कुछ महत्वपूर्ण दृश्य जस के तस दिख रहे हैं. इस फिल्म में नायक बहरत के बंटवारे से छह दशकों का सफ़र तय करता है. ‘भारत’ में सलमान खान को पांच उम्र के छह लुक दिए गए हैं. परदे पर सलमान की मौजूदगी आकर्षक होती है,लेकिन क्या वे किरदार की उम्र की भिन्नता को सही अंदाज और आवाज़ दे पाएंगे? इस फिल्म कट्रीना कैफ और दिशा पटनी के उपयोग के लिए कुछ गाने भी रखे गए हैं. हिंदी फिल्म है तो प्रेम कहानी का होना लाजिमी है. ऐसे में कतई ज़रूरी नहीं है ‘भारत’ मूल को फॉलो करे,लेकिन यह उम्मीद तो रहेगी ही कि यह मूल की तरह ही भावनाओं का उद्रेक कर सके. साथ ही बंटवारे के दर्द में जी रहे किरदारों की तकलीफ भी जाहिर कर सके. अली अब्बास ज़फर का दावा है कि उनकी टीम ने गहरे शोध और अध्ययन से पीरियड क्रिएट किया है. अधिकतम प्रामाणिक होने की कोशिश की है. फिल्म देखने के पहले किसी प्रकार की अशंक नहीं की जानी चाहिए. उम्मीद है कि अली अब्बास ज़फर ने ऐसी कहानी के लिए ज़रूरी परिपक्वता बरती होगी और सलमान खान की पूरी सहमती रही होगी.
सचमुच ‘भारत’ कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फत्दर’ के करीब हुई तो यह हिंदी की एक उल्लेखनीय फिल्म साबित होगी.



Tuesday, May 28, 2019

सिनेमालोक : मातृभाषा में संवाद


सिनेमालोक
मातृभाषा में संवाद
अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों कलाकार क्लब द्वारा आयोजित ‘शॉर्ट फिल्म प्रतियोगिता’ की जूरी में बैठने का संयोग बना. जूरी में मेरे अलावा निर्देशक डॉ, चंद्रप्रकाश द्विवेदी और एडिटर अरुणाभ भट्टाचार्य थे. इस प्रतियोगिता में अनेक भाषाओँ की फ़िल्में थीं. कई घंटो तक एक-एक कर फ़िल्में देखते हुए एक अलग एहसास घना होता गया. कलाकारों की भाषा...उनकी संवाद अदायगी और उससे प्रभावित अभिनय.हिंदी फिल्मों में हिंदी की बिगड़ती और भ्रष्ट हो रही हालत पर मैं लगातार लिखता रहता हूँ. नियमित फ़िल्में देखते समय भी दिमाग का एक अन्टेना यह पकड़ रहा होता है की संवादों में किस प्रकार का भाषादोष हो रहा है. हिंदीभाषी और हिंदी साहित्य का छात्र होने की वजह से भी कान चौकन्ने रहते हैं.यूँ भी कह सकते हैं कि खामियां जल्दी सुनाई पड़ती हैं. मैं अपनी समीक्षा और लेखों में आगाह और रेखांकित भी करता रहता हूँ.
कुछ हफ्ते पहले मैंने इसी कॉलम में उल्लेख किया था कि इन दिनों के अधिकांश अभिनेता स्पष्ट उच्चारण के साथ हिंदी संवाद नहीं बोल पते हैं.पहले के अभिनेता हिंदी में समर्थ नहीं होने पर अभ्यास करते थे. अभी भी भाषा और उसके लहजे के अभ्यास की औपचारिकता पूरी की जाती है,लेकिन कलाकारों का ध्यान भाषा सीखने से अधिक उसे निबटाने पर होता है. ज्यादातर यही सुनाई पड़ता है कि डबिंग में सुधार लेंगे. ठीक कर लेंगे,क्योंकि डबिंग करते समय एक भाषा इन्स्ट्रक्टर रहता है. इस सुविधा से कलाकारों में लापरवाही आ जाती है.
बहरहाल,उस दिन मैंने यह बात रखी कि कैसे हिंदीतर भाषाओँ की फिल्मों के कलाकार अपने संवादों को बोलते समय एक्सप्रेसिव दिखते हैं. ऐसा लगता है कि संवाद और भाव घुल गए हैं. हिंदी की फिल्मों में संवादों की अदायगी क्यों कृत्रिम और बनावटी लगती है? डॉ. द्विवेदी ने सहमति के साथ इस वजह की व्याख्या की. निर्देशन के अपने अनुभवों से उन्होंने बताया कि हिंदी फिल्मों के जिन कलाकारों की मातृभाषा हिंदी रही है या जो हिंदी संस्कार से आये हैं,उन सभी के साथ यह दिक्कत नहीं होती है. जिनकी पहली भाषा हिंदी नहीं है या जिनके व्यवहार में हिंदी नहीं है,वे सभी सही लहजे और पॉज के साथ हिंदी नहीं बोल पाते हैं. इनमें से कुछ हिंदी पढ़ लेते हैं,लेकिन धाराप्रवाह या भाव के साथ संवाद बोल पाना उनके लिए संभव नहीं होता. यही वजह है कि उनकी संवाद अदायगी और हिंदी में कृत्रिमता सुनाई पड़ती है. निर्देशक और बाकी तकनीकी सहायकों की भी हिंदी कमज़ोर होती है,इसलिए वे समय पर सही सुधार नहीं कर पाते. परिणाम परदे पर नज़र आता है. उनकी हिंदी संप्रेषणीय नहीं हो पाती.
यह समस्या हिंदी फिल्मों के साथ ही है. देश की शेष भाषाओँ की फिल्मों में उसी भाषा के कलाकार होते हैं.बंगला,तेलुगू,तमिल और मलयालम आदि भाषाओँ की फ़िल्में समान भाषा के कलाकारों की वजह से एक्सप्रेसिव और भावपूर्ण सुनाई पड़ती है. अभी के लोकप्रिय कलाकारों की संवाद अदायगी पर गौर करें तो वरुण धवन और राजकुमार राव की संवाद अदायगी के फर्क से इसे समझ सकते हैं. रणबीर कपूर और रणवीर सिंह के उच्चारण और लहजे में भी अंतर है. भाषा संस्कार के साथ आये कलाकार बोलते और अभिनय करते समय स्वाभाविक लगते हैं. यह स्वाभाविकता सीखी हुई भाषा में गहन अभ्यास से आ सकती है.उसके लिए ज़रूरी है कि आप हिंदी सुन भी रहे हों. लिखना-पढना तो आवश्यक है ही. आप देखें कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी सिर्फ संवादों की भाषा रह गयी है और वह भी रोमन में लिखी हिंदी. नतीजे में हिंदी फिल्मों के अभिनय और एक्सप्रेशन में सामान रूप से कृत्रिमता बढती जा रही है. भाषा न बोल पाने का असर चेहरे के भाव और आंगिक मुद्राओं पर भी आता है. दरअसल,निर्माण के दौरान ढंग से परखने वाला कोई नहीं रहता.फिल्म की टीम की कप्तानी कर रहे निर्देशक खुद ही हिंदी में तंग होते है. संवाद अंग्रेजी में लिखे और सोचे जाते हैं और फिर कोई और उन्हें हिंदी में अनूदित करता है. अभी से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले सालों में भाषा और अभिनय की स्थिति और बदतर होगी.
  

Tuesday, May 21, 2019

सिनेमालोक : प्रौढ़ नायक का प्रेम


सिनेमालोक
प्रौढ़ नायक का प्रेम
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में एक्टर की वास्तविक उम्र हमेशा अपने कैरेक्टर से ज्यादा होती हैं. फिल्मों की यह परिपाटी है कि कोई एक्टर नायक की भूमिका में लोकप्रिय और स्वीकृत हो गया तो वह अंत-अंत तक नायक की भूमिका निभाता रहता है...वह भी जवान नायक की भूमिका. दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद के जमाने से ऐसा चला आ रहा है. इनमें से दिलीप कुमार और राज कपूर तो एक उम्र के बाद ठहर गए,लेकिन देवानंद अंतिम सांस तक हीरो ही बने रहे. उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया कि सभी की तरह उनकी उम्र बड़ी है. वह भी उम्रदराज हो गए हैं.
आज के पॉपुलर नायकों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान. अभी तक बतौर हीरो ही पर्दे पर नजर आ रहे हैं. उनके ज्यादातर करैक्टर उनकी वास्तविक उम्र से कम होते हैं. आमिर खान ने ‘दंगल’ में खुद से बड़ी उम्र की भूमिका जरूर निभाई, लेकिन विज्ञापन से लेकर फिल्मों तक में भेष और उम्र बदलने का प्रयोग कर वे वास्तविक उम्र को धोखा देते रहते हैं. शाह रुख खान ने ऐसे ही ‘वीर जारा’ में प्रोढ़ छवि पेश की थी. ‘डियर ज़िंदगी’ में वह आलिया भट्ट के साथ अपनी उम्र के किरदार में नजर आए. सलमान खान का शरीर अब इस बात की सहूलियत नहीं देता कि वे 25-30 की उम्र के दिखे. फिर भी वे अपनी उम्र से जवान दिखने का प्रयास करते रहते हैं. ‘भारत’ में वह चार अलग-अलग उम्र की छवियों में दिख रहे हैं. उनके सफ़ेद बालों का ज़िक्र एक संवाद में सुनाई पड़ता है. फिल्म में जवान भारत की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल चुनौती थी. उन्हें अपनी जवानी की फिल्में अंदाज-ओ-बयां के लिए देखनी पड़ी. उल्लेखनीय है कि तीनों खान 54 साल के हो चुके हैं.
इस पृष्ठभूमि में अजय देवगन और तब्बू की तारीफ करनी होगी. तब्बू तो पहले से उमदराज किरदारों की भूमिकायें पूरी संजीदगी से निभा रही हैं. खुद अजय देवगन ने भी पहले मधुर भंडारकर निर्देशित ‘दिल तो बच्चा है जी’ में अपनी उम्र का किरदार निभाया था. इस बार लव रंजन की अकिव अली निर्देशित ‘दे दे प्यार दे’ में वह 50 वर्ष के आशीष की भूमिका में दिखे. उन्होंने अपनी और किरदार की उम्र की समानता का ख्याल रखते हुए बालों की सफेदी को जाने दिया. अगर उनके बाल और दाढ़ी का रंग खिचड़ी (साल्ट एंड पेपर) होता तो फिल्म और जानदार हो जाती. इस फिल्म में तब्बू की उम्र 47 वर्ष थी. वह अजय देवगन की परित्यक्त पत्नी मंजू की भूमिका में है. लव रंजन और अकिव अली ने अपने  नायक -नायिका को प्रोढ़ रखा. उम्र के लिहाज से उनकी हरकतें होती हैं, लेकिन प्रेम का अधिकार नायक को ही मिलता है, वह खुद से 24 साल छोटी लड़की से प्रेम करने लगता है और उससे शादी भी करना चाहता है. यह स्वाभाविक तो नहीं है, लेकिन अजीब भी नहीं है. हिंदी फिल्मों में ही दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, कबीर बेदी, मिलिंद सोमण और सैफ अली खान के उदाहरण हैं.
फिल्मों की बात करें तो 1986 में राजेश खन्ना की फिल्म ‘अनोखा रिश्ता’ में भी बेमेल उम्र के किरदारों का प्रेम था. फिल्म की नायिका सबीहा थीं.अमिताभ बच्चन ने राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘निःशब्द’ में अपनी बेटी की सहेली से प्रेम किया था. जिया खान ने युवा सहेली की भूमिका निभाई थी. अमिताभ बच्चन ‘चीनी कम’ में भी खुद से कम उम्र की तब्बू से प्रेम करते दिखे. 
फिल्मों के अंदरूनी समस्या है कि प्रोढ़ प्रेम की अनुमति सिर्फ नायकों को ही मिलती है. फिल्मों की किसी प्रोढ़ नायिका को किसी युवक से प्रेम करते नहीं दिखाया जाता. ’दिल चाहता है’ और ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ के बेमेल उम्र के प्रेम को पूरा एक्स्प्लोर नहीं किया गया था. हो सकता है कि भारतीय समाज और दर्शक अभी इसके लिए तैयार ना हों, लेकिन इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों और रिश्तो के नए आयाम तलाश रहे फिल्मकार जल्दी ही ऐसी कोई फिल्म लेकर आयें तो आश्चर्य नहीं होगा. रियल लाइफ में प्रियंका चोपड़ा और निक जोंस ने प्रेम और शादी में उम्र के फासले को समेट दिया है. समाज में और भी उदाहरण हैं. बस, उन्हें पर्दे पर भी आना चाहिए.


Tuesday, May 14, 2019

सिनेमालोक : कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण

सिनेमालोक
 कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण
-अजय ब्रह्मात्मज
यह समस्या इधर बढ़ी है.हमारे युवा फिल्म कलाकार भाषा खास कर अपनी फिल्मों की भाषा - हिंदी पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. लगता है घडी की सुई घूम कर फिर से चौथे दशक में पहुँच गयी है, हिंदी फिल्मों के टाकी होने के साथ फिल्मों में आये कलाकार ढंग से हिंदी नहीं बोल पाते थे.पारसी और कैथोलिक समुदाय से आये इन कलाकारों के परिवेश और परिवार की भाषा पारसी और अंग्रेजी रहती थी,इसलिए उन्हें हिंदी बोलने में दिक्कत होती थी.तब उनके लिए भाषा के शिक्षक रखे जाते थे,उनका उच्चारण ठीक किया जाता था.सेट पर शूटिंग के समय और तैयारी के लिए हिंदी-उर्दू के प्रशिक्षक रखे जाते थे.पूरा ख्याल रखा जाता था.फिर भी चूक हो जाती थी तो फिल्म समीक्षक उनकी हिंदी पर अलग से टिपण्णी करते थे.80 सालों के बाद हम फिर से वैसे ही हालात में पहुंच रहे हैं.
ताज़ा उदहारण है ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2’. इस फिल्म में टाइगर श्रॉफ मुख्य भूमिका में हैं.उनके साथ तारा सुतारिया और अनन्या पांडे दो नयी हीरोइनें हैं. यह दोनों की लौन्चिंग फिल्म है.इस फिल्म को देखते हुए गहरा एहसास हुआ कि उनकी बोली गयी हिंदी दोषपूर्ण है.उच्चारण और अदायगी में खोट होने की वजह से वे संवादों से भाव नहीं व्यक्त कर पा रहे थे.अब यह सभी जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को रोमन में संवाद दिए जाते हैं.थिएटर से आए एक्टर और अमिताभ बच्चन सरीखे कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो सभी को अपने संवाद रोमन में चाहिए होते हैं.
हिंदी लिखना और पढना हमारी हिंदी फिल्मों के कलाकारों को नहीं आता.मैं यहाँ टो-टो कर पढने की क्षमता को महत्व नहीं दे रहा हूँ.तमाम लोकप्रिय कलाकारों की यह दिक्कत है.खास कर 21 वीं सदी के कलाकारों की यह समस्या विकट हो गयी है.वे जिम जाते हैं.शरीर सौष्ठव पर ध्यान देते हैं.किरदार के लिए ज़रूरी बाकी प्रशिक्षण और अभ्यास करते हैं.सिर्फ भाषा सौष्ठव पर उनका ध्यान नहीं होता.हिंदी के मामले में ’हो जायेगा’ एटीट्युड हावी रहता है.कुछ निर्माता और निर्देशक शिक्षक-प्रशिक्षक की व्यवस्था करते हैं तो उनके प्रति कलाकारों का आदर नहीं रहता.वे आवश्यक बोझ की तरह भी भाषा को नहीं लेते.नतीजा यह होता है कि हर तरह से बेहतरीन होने के बावजूद फिल्म में भाषाई खामी रह जाती है.
यह प्रसंग कई बार पढ़ा और सुना गया है कि जब लता मंगेशकर पार्श्व गायन के लिए फिल्मों में संघर्ष कर रही थीं तो उनकी मुलाक़ात दिलीप कुमार से हो गई.दोनों लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहे थे.दिलीप कुमार ने उन्हें नेक सलाह दी कि उर्दू का अभ्यास करो और अपना उच्चारण ठीक करो.लता मंगेशकर ने गाँठ बाँध ली.उन्होंने सुर के साथ भाषा की भी साधना की.आज हम उनकी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं.आज़ादी के पहले और बाद के दौर में सभी कलाकार भाषा का अभ्यास करते थे.हिंदी फिल्मों में पंजाबी कलाकारों की जबान साफ होती थी. यह भी एक वजह है कि किसी और इलाके से अधिक पंजाब के कलाकार हिंदी फिल्मों में सफल हुए.कभी गौर कीजियेगा कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर हीरो का संबंध पंजाब से क्यों था उर आज भी है?
हिंदी भाषा के प्रति लापरवाही बढती जा रही है.यह एक सामाजिक समस्या है.21 वीं सदी के बच्चों की पढाई-लिखाई इंग्लिश मध्यम में हो रही है.फिल्मों में आ रहे नए स्टार खास कर फिल्म परिवारों से आये स्टारकिड बचपन से फिल्मों में आने तक इंग्लिश में ही जीते हैं.उनकी संपर्क भाषा इंग्लिश रहती है.फिल्मों में आने की तैयारी में हिंदी शिक्षक रखे जाते हैं.वे कुछ महीनों में उन्हें बेसिक हिंदी सिखाते हैं.फिल्म शुरू होने के पहले तक तो अभ्यास होता है.फिल्म शुरू होते ही जिम ज्यादा ज़रूरी रूटीन हो जाता है.जैसे-तैसे संवाद बोले जाते हैं और वैसी ही उनकी डबिंग कर ली जाती है.कायदे से अब उन्हें हिंदी ट्यूटर बहांल करना चाहिए.जो रिहर्सल से लेकर डबिंग तक कलाकारों के साथ रहे.उनके उच्चारण और अदायगी पर ध्यान दे और ज़रूरी सुधार करे.

यह विडम्बना ही है कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को हिंदी बोलना नहीं आता.वे अपने संवाद भी सही लहजे और प्रभाव से नहीं बोल पाते.एक इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन ने कहा था कि ‘भाषा से ही भाव आता है’.भाषा नहीं रहेगी तो भाव कहाँ से आएगा?और भाव नहीं होगा तो लाजिमी तौर पर प्रभाव भी नहीं होगा.

Wednesday, May 8, 2019

सिनेमालोक : रणवीर सबसे आगे


सिनेमालोक 
रणवीर सबसे आगे 
-अजय ब्रह्मात्मज
रात का समय था.करीब 11 बज चुके होंगे. यशराज स्टूडियो में दिन की चहल-पहल समाप्त हो चुकी थी. वहां मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. एक फ़िल्म के हीरो की व्यस्तता की वजह से इंटरव्यू के लिए मुझे यही समय मिला था. हीरो की फिल्म रिलीज पर थी. शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्म के हीरो का इंटरव्यू रविवार को छप जाए तो पाठक और संपादक दोनों खुश होते हैं. इसी खुशी के लिए दिन भर की थकान के बावजूद उस हीरो के इंटरव्यू के लिए हां कहना ही पड़ा. बातचीत शुरू हुई . और ना जाने कब बेख्याली में मुझ से भूल हुई. इंटरव्यू दे रहे रणवीर सिंह ने मुस्कुराते हुए मुझे टोका,' सर जी,आप मुझे दो बार रणबीर बुला चुके हैं. मैं रणबीर हूं. कहीं आप मुझ से रणबीर के सवाल तो नहीं पूछ रहे हैं.'
झेंपते हुए सॉरी कहने के बाद मैंने इंटरव्यू जारी रखा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी गलती हो सकती है. सामने बैठे एक्टर को मैं उसके प्रतिद्वंद्वी के नाम से बुला सकता हूँ. घर लौटने के बाद रिकॉर्डिंग सुनते ही एहसास हुआ कि यह तो भारी गलती है. फिर मैंने सोचा कि रणवीर को गुस्सा क्यों नहीं आया? वे चाहते तो बीच में ही इंटरव्यू छोड़ सकते थे. अगर यह इंटरव्यू लाइव होता तो श्रोता/दर्शक क्या कहते? अगली मुलाकात में रणवीर से माफी मांगने लगा. उन्होंने आदतन भींचते हुए कहा,' सर जी मुझे अभी और मेहनत करनी होगी. आप सभी के सवालों में जगह बना चुके रणबीर से कुछ बड़ा और सफल काम करना होगा. बड़ी कामयाबी देनी होगी.'

यह वाकया संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गोलियों की रासलीला - रामलीला' के समय हुआ था. तब से रणवीर सिंह ने संजय लीला भंसाली के साथ तीन कामयाब फिल्में कर ली हैं. तीनों में उनकी नायिका दीपिका पादुकोण रहीं, जो अब उनकी जीवनसंगिनी बन चुकी हैं. रणवीर खुद बताते हैं कि 'गोलियों की रासलीला-रामलीला' के सेट पर दीपिका पादुकोण ने भा गई थीं. शूटिंग के दौरान नज़दीकियां बढ़ीं. रणवीर ने धैर्य से काम लिया और फिर दोनों में प्यार हुआ. कुछ सालों के अफेयर के बाद दोनों ने शादी कर ली. शादी के बाद रणवीर सिंह भारतीय रिवाज के मुताबिक दीपिका पादुकोण को अपने घर नहीं लाए,बल्कि उनके साथ रहने चले गए. पुरुष प्रधान समाज और फिल्म इंडस्ट्री में यह छोटी और सामान्य बात नहीं है. शादी के समारोहों में भी वे दीपिका का जिस तरीके से ख्याल रख रहे थे,वह काबिले तारीफ है.
रणवीर सिंह लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं. इस साल रिलीज हुई उनके फिल्म 'गली ब्वॉय' खूब सराही गई और कामयाब रही. इसके पहले पिछले साल की जनवरी और दिसंबर में रिलीज हुई उनकी फिल्मों ने रिकॉर्ड कमाई की. 2018 में उनकी दोनों फिल्मों (पद्मावत और सिमबा) की कुल कमाई 500 करोड़ से अधिक रही. फिल्म इंडस्ट्री में कमाई और कामयाबी ही किसी स्टार अभिनेता के स्टारडम और भाव में इजाफा होता है. इस लिहाज से रणवीर सिंह अभी सबसे आगे हैं. उन्होंने खानत्रयी (आमिर,शाह रुख और सलमान),अक्षय कुमार,वरुण धवन, अजय देवगन और रितिक रोशन सभी को पीछे छोड़ दिया है. वे अभी सबसे आगे हैं. अभी वे '1983  की तैयारियों में जुटे हैं. इसके अलावा करण जौहर की फिल्म 'तख्त' में वे शाहजहां के बेटे दारा शिकोह की भूमिका निभाएंगे.
हर मुलाकात में रणवीर सिंह की आत्मीयता जस की तस बनी रहती है. विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म 'लूटेरा' की रिलीज के बाद हुई अंतरंग बातचीत में रणवीर ने वादा करने के साथ भरोसा दिया था कि मुझ में कोई बदलाव नहीं आएगा. 'सिम्बा' के समय हुई आखिरी मुलाकात में मैंने महसूस किया कि उनकी गर्मजोशी और आत्मीयता में कोई फर्क नहीं आया है. हालांकि इस बीच वे सफलता के शिखर पर पहुंच चुके हैं.


Wednesday, May 1, 2019

सिनेमालोक : राजनीति के फ़िल्मी मोहरे


सिनेमालोक
राजनीति के फ़िल्मी मोहरे
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी सिनेमा और राजनीति का रिश्ता बहुत मीठा और उल्लेखनीय नहीं रहा है.उत्तर भारत की राजनीति में उनका इस्तेमाल ही होता रहा है.वे सजावट और भीड़ जुटाने के काम आते रहे हैं.उत्तर भारत की राजनीति में हिंदी फिल्मों से ही फ़िल्मी हस्तियां आती-जाती रही हैं. पहले केवल राज्य सभा के लिए उन्हें चुन लिया जाता था.वे संसद की शोभा बढ़ाते थे और कभी-कभार फिल्म इंडस्ट्री या किसी सामाजिक मुद्दे पर कुछ सवाल या बहस करते नज़र आ जाते थे. उनका महत्व और प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही होता था.
इधर 21वी सदी में अब उनका उपयोग मोहरे की तरह होने लगा है. खास कर इस चुनाव में जिस तरह चुनाव की घोषणा के बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर टिकट दिए गए हैं,उससे यही संकेत मिलता है कि किसी राजनीतिक समझदारी से अधिक यह उनकी लोकप्रियता भुनाने का कदम है. अब सनी देओल का ही मामला लें. ठीक है कि स्वयं धर्मेन्द्र(सनी के पिता) ने कभी बीकानेर से सांसद का चुनाव लड़ा था. उनकी सौतेली मां हेमा मालिनी राजनीति में निरंतर सक्रिय हैं.लेकिन सनी या बॉबी देओल ने कभी राजनीतिक झुकाव नहीं दिखाया.
जिस दिन अमित शाह के साथ सनी देओल की तस्वीर मीडिया में आई,उसी दिन जाहिर हो गया था कि कुछ तो पक रहा है.तब कयास लगया जा रहा था कि वे अमृतसर से चुनाव लड़ेंगे.बाद में जानकारी मिली कि उन्हें गुरदासपुर से उमीदवार बनाया गया है.विनोद खन्ना वहां से सांसद रहे थे. उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी या बेटे अक्षय खन्ना को उमीदवार बनाने की ख़बर भी आई थी.बहरहाल,सनी देओल ने उम्मीदवार के तौर पर पर्ची भर दी है. खुद नरेन्द्र मोदी ने उनके साथ अपनी तस्वीर ट्विटर पर शेयर की और ‘ग़दर’ का संवाद लिखा... हिंदुस्तान जिंदाबाद था,है और रहेगा. ‘ग़दर’ के सन्दर्भ के साथ याद करें तो इशारा स्पष्ट है.
राजनीति के पत्रकारों के मुताबिक इस बार के चुनाव में भाजपा के लिए एक-एक सीट ज़रूरी है. उन्हें अपनी संख्या बढ़ानी या कम से कम बरक़रार रखनी है. वे नहीं चाहते कि किसी कमज़ोर पेशेवर नेता को सीट देकर वे उसे खोने का जोखिम लें.यही कारण है कि आज़मगढ़ से निरहुआ और गोरखपुर से रवि किशन को टिकट दिए गए हैं. भोजपूरी फिल्मों के ये स्टार इन इलाकों में बेहद लोकप्रिय हैं. उम्मीद तो यही की जा रही है कि मनोज तिवारी की तरह वे भी भाजपा के काम आयेंगे.एक तरह से भोजपुरी के तीनों लोकप्रिय स्टार अब भाजपा के पास हैं. रवि किशन ने पिछले चुनाव में कांग्रेस का साथ दिया था. इस बार वे पाला बदल कर भाजपा के साथ आ गए हैं.
फ़िल्मी मोहरों के इस्तेमाल में कांग्रेस भी पीछे नहीं है.राज बब्बर तो उनके सक्रिय नेता हैं.उत्तर प्रदेश की कमान संभाले हुए हैं. इस बार शत्रुघ्न सिन्हा भी उनके पाले में आ गए हैं. भाजपा के वतमान नेतृत्व ने आडवाणी,जोशी समेत अनेक शीर्ष नेताओं की अवमानना की तो शत्रुघ्न सिन्हा सावधान हो गए. उन्होंने समय रहते ही छलांग लगायी और कांग्रेस में आ गए. चर्चा चल रही थी कि शायद भाजपा उन्हें पटना साहिब से उम्मीदवार न बनाये. कांग्रेस में आने से उन्हें टिकट तो मिल गया.अब यह देखना है कि वे वहां से जीत पाते हैं या नहीं. उधर सपा से जयाप्रदा ने भाजपा में प्रवेश कर पुराने साथियों को तिलमिला दिया है.वे बुदबुदाने लगे हैं.कांग्रेस ने मुंबई में उर्मिला मातोंडकर को टिकट दिया है.वह जी-जान से चुनाव में लगी हैं. माना जा रही कि वह वर्तमान सांसद को कड़ी टक्कर देंगी.अगर अंतिम समय में मतदाताओं ने रुख बदला तो वह जीत भी सकती हैं.
अगर ये फ़िल्मी हस्तियां सांसद चुने जाने के बाद भी सक्रिय रहें और फिल्म इंडस्ट्री और समाज के वास्तविक मुद्दे पर अपनी सहभागिता दिखाएँ तो अच्छी बात होगी. उन्हें शो पीस से आगे बढ कर अपनी महत्ता साबित करनी होगी.  


Tuesday, April 23, 2019

सिनेमालोक : दमकते मनोज बाजपेयी


सिनेमालोक
दमकते मनोज बाजपेयी
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में काम करते हुए मनोज बाजपेयी को 25 साल हो गए.इन 25 सालों में मनोज बाजपेयी ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से खास मुकाम हासिल किया है. बिहार के बेलवा गाँव से दिल्ली होते हुए मुंबई पहुंचे मनोज बाजपेयी को लम्बे संघर्ष और अपमान से गुजरना पड़ा है. 1994 में उनकी पहली फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ आ गयी थी. इस फिल्म में मान सिंह के किरदार से उन्होंने यह तो जाहिर कर दिया था कि वे रंगमंच की तरह परदे पर भी प्रभावशाली मौजूदगी रखते हैं. नाटक और रंगमंच में सक्रिय अधिकांश अभिनेता की इच्छा बड़े परदे पर आने की रहती है,लेकिन बहुत कम को ही कैमरा,निर्देशक और दर्शक स्वीकार कर पाते हैं. मनोज बाजपेयी को भी वक़्त लगा. ‘बैंडिट क्वीन’ की सराहना और मुंबई के निमंत्रण से उत्साहित होकर वे मुंबई आ गए थे.
मुंबई में एक चर्चित और बड़े निर्देशक ने उन्हें मुंबई में मिलने का न्योता दिया था. स्वाभाविक रूप से मनोज को लगा था कि मुंबई पहुँचते ही फ़िल्में मिलने लगेंगी. कुछ कोशिशों के बाद उक्त निर्देशक से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने दुत्कार दिया. उनकी प्रतिक्रिया का भाव था कि मिलने के लिए कहा था. काम यानि कि फिल्म देने की तो बात नहीं हुई थी. आरंभिक कुछ झटकों में से यह पहला झटका था. मनिज चेत गए और उन्होंने फिल्मों में काम पाने की रणनीति बदल दी. उन्होंने धैर्य से काम लिया और सही समय की प्रतीक्षा की. इस दौर में उन्हें महेश भट्ट से ज़रूरी संबल मिला. मनोज ने कभी बताया था कि वे तो बोरिया-बिस्तर समेत कर दिल्ली लौटने को तैयार थे,लेकिन महेश भट्ट ने उन्हें रोका.उन्होंने लगभग भविष्यवाणी सी कर दी कि सालों बाद ऐसा प्रतिभाशाली अभिनेता आया है.
और फिर वक़्त व मौका आया. रामगोपाल वर्मा ने मनोज को देखा तो उन्हें अपनी अगली फिल्म का किरदार मिल गया. शेखर कपूर के प्रशंसक रामगोपाल वर्मा को ‘बैंडिट क्वीन’ में मनोज पसंद आये थे,लेकिन उन्हें खोज पाने का कोई तरीका नहीं था. ‘दौड़’ फिल्म के समय मुलाक़ात हुई तो रामगोपाल वर्मा ने माना भी किया कि इस फिल्म की छोटी भूमिका न करो. वे ‘सत्या’ में भीखू म्हात्रे की भूमिका उन्हें देने का मन बना चुके थे. आश्वासनों से मनोज का मोहभंग हो चूका था. उन्होंने ‘दौड़’ नहीं छोड़ी. रामगोपाल वर्मा ने अपना वडा पूरा किया.’सत्या’ के भीखू म्हात्रे ने सभी को मिहित किया. हिंदी फिल्मों में ऐसे नेगेटिव किरदार बहुत ही कम हैं,जिन्हें दर्शक सिर-माथे पर बिठाते हों. उसके बाद तो फिल्मों कि झड़ी लग गयी. यह वही दौर था जब कामयाबी के असर में उनसे फिल्मों और भूमिकाओं के चुनाव में गलतियाँ भी हुईं.
समय के साथ मनोज बाजपेयी संभले. उन्होंने अपने सामर्थ्य के साथ सम्भावना पर विचार किया. फिल्मों के चुनाव में सजग हुए. नतीजा यह हुआ कि उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गे. और इस साल उन्हें भारत सर्कार ने पद्मश्री से नवाज़ा.गाँव से निकले किसी कलाकार के लिए यह उल्लेखनीय यात्रा है. इस यात्रा के धूप-छाँव ने मनोज को गढ़ा है. वे हिंदी फिल्मों में प्रचलित किसी होड़ में शामिल नहीं हैं. उनकी जुदा राह है. इस राह में अधिक चमक नहीं है,लेकिन सोच की पुख्तगी है. मनोज बाजपेयी बाद की पीढ़ियों के लिए मिशल बन चुके हैं. वे एक साथ प्रायोगिक और मुख्यधारा की फ़िल्में कर रहे हैं. उन्होंने शार्ट फिल्म और वेब सीरीज को भी स्वीकार किया है. एक अन्तराल के बाद वे रंगमंच पर भी आने का मन बना रहे हैं.
25 सालों के इस सफ़र के बाद भी मनोज बाजपेयी के कदम ना तो थके आहें और न रुके हैं. वे आगे बढ रहे हैं. कम लोगों को मालूम है कि नयी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में वे कभी पीछे नहीं रहते. मुझे याद है कि ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ की शूटिंग से लौटने के बाद उन्होंने नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के बारे में कहा था कि उसे खूब सराहना मिलेगी. और यही हुआ.
आज मनोज बाजपेयी का जन्मदिन है. जन्मदिन कि बधाई के साथ उनके आगामी करियर के लिए शुभकामनाएं.

Tuesday, April 16, 2019

सिनेमालोक : अब समीक्षकों की संस्था देगी पुरस्कार


सिनेमालोक 
अब समीक्षकोंकी संस्था देगी पुरस्कार 

-अजय ब्रह्मात्मज

देश में अनेक फिल्म पुरस्कार हैं. हर मीडिया हाउस के अपने पुरस्कार हैं.इनके अलावा स्थानीय और राष्ट्रीय स्टार पर कुछ समोह्ह या संगठन भी फिल्म पुरस्कार बाँटते हैं. इनमे सबसे अधिक सम्माननीय भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन दिया जाने वाल राष्ट्रीय पुरस्कार है.यह पुरस्कार देश भर की फ़िल्मी गतिविधियों में से श्रेष्ठ कृति और व्यक्ति को दिया जाता है. कतिपय विवादों के बावजूद इस पुरस्कार की खास प्रतिष्ठा है. मुंबई में मैंने देखा है कि कलाकार और फ़िल्मकार अपने दफ्तर और बैठकी में इसे फ्रेम करवा कर रखते हैं. निश्चित ही यह उनके लिए गर्व और दिखावे की बात होती है.
ज्यादातर फिल्म पुरस्कार टीवी इवेंट बन चुके हैं. इन पुरस्कारों के स्पोंसर और आयोजकों की रुचि श्रेष्ठ काम से अधिक लोकप्रिय नाम में होती है, इसके अलावा फिल्म के कारोबार को भी मद्देनज़र रखा जाता है. नतीजा यह होता है कि श्रेष्ठ काम और नाम पुरस्कृत नहीं हो पाते. इन पुरस्कारों की मर्यादा इतनी गिर चुकी है कि कुछ शीर्षस्थ फ़िल्मकार और कलाकार इसमें भाग ही नहीं लेते. उनके बहिष्कार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. ये पुरस्कार बदस्तूर चल रहे हैं. कलाकारों और फिल्मकारों को मालोम्म रहता कि उन्हेंक्यों नहीं ' याक्यों' पुरस्कार दिया जा रहा है? फोर भी वे ट्राफी के साथ माकली मुस्कान में नज़र आते हैं. मंच से पुरस्कार मिलने की ख़ुशी जाहिर करते हैं.
इन पुरस्कारों में एक केटेगरी होती हैक्रिटिक' अवार्ड. यह प्रायः उन समर्थ कलाकारों और फिल्मों को दिया जाता है,जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. ऐसे सराहे गए कलाकारों को छोड़ने पर पुरस्कार कि विश्वसनीयता पूरी तरह से संदिग्ध हो जाती है. फिल्म बिरादरी में इसे सांत्वना पुरस्कार भी माना जाता है. मुख्य केटेगरी से बाहर खड़े कद्दावर सृजनशील नाम और काम को मजबूरन तवज्जो देने की कोशिश साफ़ दिखती है.क्रिटिक' पुरस्कार धीरे-धीरे अपनी महत्ता खो चूका है.
ई साल से एक नया पुरस्कार आरम्भ हो रहा है. इसेक्रिटिक चॉइस फिल्म अवार्ड'(सीसीएफए) नाम दिया गया है. यह देश भर के फिल्म क्रिटिक की नवगठित संस्थाफिल्म क्रिटिक गिल्ड' द्वारा आरम्भ किया गया है. पिछले साल गिल्ड ने शोर्ट फिल्म के पुरस्कारों के बाद फीचर फिल्मों के लिए भी पुरस्कारों कि घोषणा की है. यह पुरस्कार इसी हफ्ते 21 अप्रैल को मुंबई में प्रदान किया जायेगा. आयोजन से पहले ही इसे लेकर उत्सुकता बनी हुई है. इसके नॉमिनेशन कि घोषणा के लिए आई विद्या बालन ने कहा था कि यह देश का विश्वसनीय पुरस्कार होगा. निस्संदेह उनके इस बयां में सच्चाई है. उनके साथ आई जोया अख्तार भी यही मानती हैं.
फ़िलहाल फिल्म क्रिटिक गिल्ड के 34 सदस्य हैं. ये सभी सालों से फिल्म समीक्षा करते आ रहे हैं.पत्र-पत्रिकाओं से आगे बढ कर ऑनलाइन,वेब,ब्लॉग और अन्य प्लेटफार्म के जरिये वे अपनी समीक्षाएं और टिप्पणियां प्रकाशित करते रहे हैं. ये सारे समीक्षक अपने दायरे में लोकप्रिय और प्रशंसित हैं. इनमें से 27 समीक्षक हिंदी फिल्मों की नियमित समीक्षा करते हैं. इरादा है कि इस पुरस्कार का अखिल भारतीय स्वरुप हो. इस साल समय और संसाधनों की कमी से केवल हिंदी में सभी केटेगरी के अवार्ड दिए जायेंगे. बाकि हिंदी के अलावा देश की अन्य सात भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ फिल्म को पुरस्कृत किया जायेगा. कोशिश है कि अगले साल से उन भाषाओं में भी सारे पुरस्कार दिए जाएँ.
पुरस्कारों की गिरती गरिमा के बीच देश भर के चुनिन्दा समीक्षकों का यह प्रयास सराहनीय है.


Tuesday, April 2, 2019

सिनेमालोक : 50 के हुए अजय देवगन


सिनेमालोक
50 के हुए अजय देवगन
-अजय ब्रह्मात्मज
वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन आज 50 के हो गए.वे काजोल के पति हैं.उनकी पहली फिल्म ‘फूल और कांटे’ है. इसे कुक्कू कोहली ने निर्देशित किया था. इसी साल यश चोप्रा निर्देशित अनिल कपूर और श्रीदेवी की फिल्म ‘लम्हे’ भी रिलीज हुई थी. तब किसी को अनुमान नहीं था कि सामान्य चेहरे के अजय देवगन की फिल्म 1991 की बड़ी हिट साबित होगी. हिंदी सिनेमा का यह वैसा दौर था,जब मेलोड्रामा और गिमिक का खूब सहारा लिया जाता था. एक गिमिक हीरो की एंट्री हुआ करती थी.’फूल और कांटे’ में अजय देवगन दो मोटरसाइकिल पर खड़े होकर आते हैं. इस सीन पर तालियाँ बजी थीं और अजय देवगन एक्शन स्टार मान लिए गए थे. एक्शन डायरेक्टर के बेटे को एक्शन स्टार बताने के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अजय देवगन के लिए एक अलग केटेगरी तय कर दी थी.
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लॉबी और ग्रुप के समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं. बहार से देखने पर लग सकता है कि अजय देवगन तो इनसाइडर हैं. उनके पिता स्थापित एक्शन डायरेक्टर रहे हैं तो अजय की लौन्चिंग में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी. सच्छायी कुछ और है. इनसाइडर की अपनी व्यवस्था और अनुक्रम है...आप किसी स्टार की संतान हैं,या डिरेक्टर की या किसी तकनीशियन की....परिवार की इस लिगेसी के आधार पर आपका स्थान तय किया जाता है. अजय देवगन एक्शन डायरेक्टर के बेटे थे,इसलिए उन्हें दूसरे स्टारकिड जैसी स्वीकृति नहीं मिली और न ही पहले से कोई हलचल मची. अजय ने अपनी प्रतिभा से लोहा मनवाया और पहली फिल्म से ही स्टार की कतार में खडे हो गए. उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट डेब्यू अवार्ड मिला. बाद में तो उन्हें ‘ज़ख्म’ और ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले.
अजय देवगन अपनी पीढ़ी के लहदा अभिनेता हैं. कहते हैं उनकी आँखें बोलती हैं. निश्चित ही वे अपनी आँखों का सार्थक उपयोग करते हैं. उनकी अदाकारी की खास बात है कि वे समकालीन अभिनेताओं से अलग किसी भी किरदार को अंडरप्ले करते हैं. उनके निर्देशक उनकी चाल का भी इस्तेमाल करते हैं. उनकी ज्यादातर फिल्मों में उन्हें एक खास वाक के साथ कुछ दूरी तय करनी होती है और फिर दृश्य आरम्भ होता है. एक बार मैंने अपने इस निरिक्षण के बारे में उनसे पूछा था तो वे हंस पड़े थे. उन्होंने स्वीकार करते हर जवाब दिया था कि आपने सही गौर किया है. ऐसा लगभग सभी फिल्मों में मेरे साथ होता है. शायद उन्हें सीन ज़माने में इससे मदद मिलती हो. उनकी चाल और आँख के साथ ही दृश्यों और शॉट में उनक किफायती होना निर्देशकों और निर्माता के लिए फायदेमंद होता है.
किफायती अभिनय से तात्पर्य कम से कम रिटेक में अपना शॉट पूरा करना. सीन की ज़रुरत के मुताबिक एक्सप्रेशन रखना. ज्यादा फुटेज नहीं खाना और अपने शॉट में पर्याप्त स्फूर्ति रखना. फिल्म ढीली और कमज़ोर हो तो भी अजय देवगन के शॉट डल नहीं होते. उनकी कोशिश रहती है कि स्क्रिप्ट के अभिप्राय को अच्छी तरह व्यक्त करें, ज्यादातर निर्देशक उन्हें दोहराना पसंद करते हैं. गौर करें तो निर्देशकों ने उनकी अलग-अलग खासियत को पकड़ लिया है और वे उनके उसी आयाम को अपनी फिल्मों में दिखाते हैं. जैसे कि रोहित शेट्टी उनके व्यक्तित्व में मौजूद कॉमिक स्ट्रीक का ‘गोलमाल सीरीज में इस्तेमाल करते हैं तो सिंघम सीरीज में उनका रौद्र रूप दिखाई पड़ता है.
अजय देवगन को लगता नहीं है कि वे किसी विचलन के शिकार हैं या कमर्शियल सिनेमा उनका बेजा इस्तेमाल भी करता है. वे ‘टोटल धमाल’ जैसी फ़िल्में भी उसी संलग्नता से करते दिखाई पड़ते हैं,जबकि लगता है कि उनके जैसा होनहार एक्टर ऊल्जल्लो दृश्यों को कैसे हैंडल करता होगा? कोई कचोट तो उठती होगी? अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें बताना चाहिए कि इसे उन्होंने कैसे साधा है?
उन्हें जन्मदिन की बधाई!


Thursday, March 28, 2019

सिनेमालोक : सही फैसला है कंगना का


सिनेमालोक
सही फैसला है कंगना का
-अजय ब्रह्मात्मज
तीन दिनों पहले कंगना रनोट के जन्मदिन पर ‘जया’ फिल्म की घोषणा हुई. इसे तमिल में ‘थालैवी’ और हिंदी में ‘जया’ नाम से बनाया जा रहा है. निर्देशक हैं विजय और इसे लिख रहे हैं केवी विजयेंद्र प्रसाद. ‘बाहुबली’ के विख्यात लेखक ने ही कंगना रनोट की पिछली फिल्म ‘मणिकर्णिका’ लिखी थी. यह फिल्म तमिल फिल्मों की अभिएत्री और तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का बायोपिक है. इस फिल्म की घोषणा के साथ कंगना ने जाहिर किया है कि अब वह अपनी बायोपिक पर काम नहीं करेंगी.’मणिकर्णिका’ की रिलीज के समय कंगना ने बताया था कि वह अपनी आत्मकथा सेल्यूलाइड पर पेश करना चाहती हैं. इसे वह खुद ही लिखना और निर्देशित करना चाहती थीं.हिंदी फिल्मों के इतिहास में अपने ढंग का यह पहला प्रयास होता.
फ़िलहाल कंगना रनोट ने इरादा बदल दिया है. और यह सही किया.कंगना अपने करियर के उठान पर हैं. अभी उन्हें आने ऊंचाइयां और उपलब्धियां हासिल करनी हैं.लम्बे अपमान,तिरस्कार और संघर्ष के बाद वह यहाँ तक पहुंची हैं.आगे का रास्ता फिलहाल आसन नहीं दिख रहा है,क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री के कथित ताकतवर बिरादरी और लॉबी खुले दिल से उन्हें स्वीकार नहीं कर रही है.विरोध जारी है,लेकिन कंगना के साथ दर्शकों का एक समूह है.वह कंगना को पसंद करने के साथ उनकी कामयाबी भी चाहता है.कंगना के बडबोलेपन और पंगा लेने की आदत को नज़रअंदाज कर दें तो उनकी प्रतिभा संदेह से परे है. वह कुछ नया और बेहतर करना चाहती हैं.’जया’ फिल्म के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि मैं तो अपनी बायोपिक(आत्मकथा) पर काम कर रही थी.इसी बीच ‘जया’ की कहानी सुनाने पर वह मुझे अपने जीवन सदृश और करीब लगी.हमारी ज़िन्दगी में अनेक समानताएं हैं.हाँ,उनकी उपलब्धिया मुझ से बड़ी हैं.
कंगना को इस फिल्म के लिए 24 करोड़ का पारिश्रमिक मिलेगा. ‘जया’ फिल्म की घोषणा के साथ यह खबर भी आई है.इस खबर की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और ना ही कंगना की तरफ से कोई खंडन आया है.यकीन किया जा सकता है कि एस ही होगा. ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी क पूरा श्री कंगना को मिलना चाहिए.प्रतिकूल स्थितियों में वह फिल्मों को दर्शकों के बीच ले गयीं. फिल्म के कथ्य और प्रस्तुति से मैं असहमत हूँ,लेकिन कंगना की मेहनत और सफलता कैसे भूली जा सकती है. और फिर समकालीन अभिनेत्रियों के बीच वह अकेली ऐसी अभिनेत्री के तौर पर उभरी हैं जो किसी पॉपुलर स्टार का टेक लिए बगैर छलांग लगा रही है. यह दुर्लभ है.
अभी तक मन जा रहा था कि दीपिका पादुकोण सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री हैं. उन्हें ‘पद्मावत’ के लिए रणवीर सिंह और शहीद कपूर से अधिक राशी बतौर पारिश्रमिक मिली थी...13 करोड़. करीना कपूर खान को ‘वीरे दी वेडिंग’ के लिए 10 करोड़ दिए गए थे.पारिश्रमिक के लिहाज से भी कंगना ने अपने समकालीनों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. अब यह देखना होगा कि दूसरी अभिनेतरियां कितनी तेज़ी से कंगना के करीब पहुँचती हैं.दीपिका अपनी अगली फिल्म ‘छपाक’ में निर्माता बन गयी हैं.वह अभिनेताओं की तरह प्रॉफिट शेयरिंग के समीकरण में चली गयी हैं. इससे फिल्म चलेगी और कमाएगी तो उन्हें भारी लाभ होगा.
बस,कंगना रनोट का विचलन कई बार चिंतित करता है.वह आवेश में अनावश्यक बयानबाज़ी कर जाती हैं.उन्हें थोडा सचेत रहना चाहिए.अपने राजनीतिक विचारों का भी मंथन करना चाहिए.भावावेश में कुछ भी बोलना गलत सन्देश देता है.हालांकि समाज और देश की उनकी समझ बढ़ी है,लेकिन राजनीतिक स्पष्टता आणि बाकि है.ऐसा लगता है कि वह किसी खास दिशा में झुक रही हैं और वह उनके व्यक्तित्व की तरह प्रगतिशील नहीं है.