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Tuesday, February 12, 2019

सिनेमालोक : कामकाजी प्रेमिकाएं


सिनेमालोक
कामकाजी प्रेमिकाएं
-अजय ब्रह्मात्मज
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इश्क और काम के बारे में लिखा था :
वो लोग बड़े खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
आखिर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया.

आज की बात करें तो कोई भी लड़की इश्क और काम के मामले में फ़ैज़ के तजुर्बे अलग ख्याल रखती मिलेगी.वह काम कर रही है और काम के साथ इश्क भी कर रही है.उसने दोनों को अधूरा नहीं छोड़ा है.इश्क और काम दोनों को पूरा किया है और पूरी शिद्दत से दोनों जिम्मेदारियों को निभाया है.आज की प्रेमिकाएं कामकाजी हैं.वह बराबर की भूमिका निभाती है और सही मायने में हमकदम हो चुकी है.अब वह पिछली सदी की नायिकाओं की तरह पलट कर नायक को नहीं देखती है.उसे ज़रुरत ही नहीं पडती,क्योंकि वह प्रेमी की हमकदम है.
गौर करेंगे तो पाएंगे कि हिंदी फिल्मों की नायिकाओं के किरदार में भारी बदलाव आया है.अब वह परदे पर काम करती नज़र आती है.वह प्रोफेशनल हो चुकी है.गए वे दिन जब वह प्रेमी के ख्यालों में डूबी रहती थी.प्रेमी के आने की आहट से लरजती और प्रेमी के जाने से आहत होकर तडपती नहीं है.21 वीं सदी की पढ़ी-लिखी लड़कियां सिर्फ प्रेम नहीं करतीं,वे प्रेम के साथ और कई बार तो उसके पहले काम कर रही होती हैं.जिंदगी में लड़कियां लड़कों से दोस्ती रखती हैं,लेकिन उन्हें प्रेमी के तौर पर स्वीकार करने के पहले अपने करियर के बारे में सोचती हैं.उन्हें बहु बन कर घर में बैठना मंज़ूर नहीं है.परदे पर जिंदगी का विस्तार नहीं दिखाया जा सकता,लेकिन यह परिवर्तन दिखने लगा है कि वे अपने प्रेमियों की तरह बोर्ड रूम की मीटिंग से लेकर २६ जनवरी की परेड तक में पुरुषों/प्रेमियों के समक्ष नज़र आती हैं.
नए सितारों में लोकप्रिय आयुष्मान खुराना की फिल्मों पर नज़र डालें तो उनकी प्रेमिकाएं ज्यादातर स्वतंत्र सोच की आत्मनिर्भर लड़कियां हैं.आयुष्मान को हर फिल्म में निजी समस्याओं को सुलझाने के साथ उनके काम के प्रति भी संवेदनशील रहना पड़ता है.कभी ऐसा नहीं दिखा कि वे अपनी कामकाजी प्रेमिकाओं की व्यस्तता से खीझते दिखे हों.वास्तव में यह जिंदगी का सर है.शहरी प्रेमकहानियों में कामकाजी प्रेमिकाओं की तादाद बढती जा रही है.और यह अच्छी बात है.
इधर की फिल्मों के प्रेमी-प्रेमिकाओं(नायक-नायिकाओं) का चरित्र बदल गया है.गीतकार इरशाद कामिल कहते हैं कि अब जिंदगी में रहते हुए ही प्रेम किया जा रहा है.उन्हें वीराने,चांदनी रात,झील और खयाली दुनिया की ज़रुरत और फुर्सत नहीं रह गयी है.फिल्मों और जीवन में रोज़मर्रा की गतिविधियों के बीच ही प्रेम पनप रहा है.साथ रहने-होने की रूटीन जिम्मेदारियों के बीच ही उनका रोमांस बढ़ता और मज़बूत होता है.फ़िल्में इनसे अप्रभावित नहीं हैं.
परदे की नायिकाओं की निजी जिंदगी में झाँकने पर हम देखते हैं कि पहले की अभिनेत्रियों की तरह आज की अभिनेत्रियों को कुछ छिपाना या ढकना नहीं पड़ता है.बिंदास युवा अभिनेत्रियाँ अपने प्रेमियों की पूर्व प्रेमिकाओं से बेधड़क मिलती और दोस्ती करती हैं और अभिनेता भी प्रेमिकाओं के प्रेमियों से बेहिचक मिलते हैं.पूर्व प्रेमी-प्रेनिकाओं से अलग होने और संबंध टूटने के बाद भी उन्हें साथ काम करने और परदे पर रोमांस करने में हिचक नहीं होती.उनके वर्तमान प्रेमी-प्रेमिकाओं को यह डर नहीं रहता कि कहीं शूटिंग के एकांत में पुराना प्रेम न जाग जाए.सचमुच दुनिया बदल चुकी है.प्रेम के तौर-तरीके बदल गए हैं और प्रेमी-प्रेमिका तो बदल ही गए हैं.इस बदलाव में उत्प्रेरक की भूमिका लड़कियों की है.उन्हें अब अपने काम के साथ इश्क करना है या यूँ कहें कि इश्क के साथ काम करना है. अगर प्रेमी कुछ और चाहता है या इश्क का हवाला देकर काम छुड़वाना चाहता है तो लड़कियां कई मामलों में प्रेमियों को छोड़ देती हैं.

Tuesday, February 5, 2019

सिनेमालोक : क्यों मौन हैं महारथी?


सिनेमाहौल
क्यों मौन हैं महारथी?
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के प्रसार और प्रभाव के इस दौर में किसी भी फिल्म की रिलीज के मौके पर फ़िल्मी महारथियों की हास्यास्पद सक्रियता देखते ही बनती है?हर कोई आ रही फिल्म देखने के लिए मर रहा होता है.यह अंग्रेजी एक्सप्रेशन है...डाईंग तो वाच.हिंदी के पाठक पूछ सकते हैं कि मर ही जाओगे तो फिल्म कैसे देखोगे?बहरहाल,फिल्म के फर्स्ट लुक से लेकर उसके रिलीज होने तक फिल्म बिरादरी के महारथी अपने खेमे की फिल्मों की तारीफ और सराहना में कोई कसार नहीं छोड़ते हैं.प्रचार का यह अप्रत्यक्ष तरीका निश्चित ही आम दर्शकों को प्रभावित करता है.यह सीधा इंडोर्समेंट है,जो सामान्य रूप से गलत नहीं है.लेकिन जब फिल्म रिलीज होती है और दर्शक किसी महारथी की तारीफ के झांसे में आकर थिएटर जाता है और निराश होकर लौटता है तो उसे कोफ़्त  होती है.फिर भी वह अगली फिल्म के समय धोखा खाता है.
इसके विपरीत कुछ फिल्मों की रिलीज के समय गहरी ख़ामोशी छा जाती है.महारथी मौन धारण कर लेते हैं.वे नज़रअंदाज करते हैं.महसूस होने के बावजूद स्वीकार नहीं करते कि सामने वाले का भी कोई वजूद है.ऐसा बहार से आई प्रतिभाओं के साथ होता है.उन्हें अपनी फिल्मों के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.ताज़ा उदहारण ‘मणिकर्णिका’ का है.कंगना रनोट की इस फिल्म के प्रति भयंकर भयंकर उदासी अपनाई गयी है.रिलीज के बाद दर्शकों ने इस फिल्म को स्वीकार किया है.रिलीज के बाद के विवादों के बावजूद इस फिल्म का कारोबार औसत से बेहतर रहा है.लेकिन महारथी और ट्रेड पंडित भी ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी को लेकर सहज नहीं दिख रहे है.महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन,निरूपण और चित्रण को लेकर असहमति हो सकती है.मुझे खुद लगा कि इस फिल्म में व्यर्थ ही हिन्दू राष्ट्रवाद को तरजीह देने के साथ प्रचारित किया गया है.अंतिम दृश्य में महारानी लक्ष्मीबाई का ॐ में तब्दील हो जाना सिनेमाई ज्यादती है.फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कंगना रनोट ने इस फिल्म को अधिकांश दर्शकों की पसंद बना दिया है.उनका अभिनय प्रभावपूर्ण है.फिल्म के कारोबार को स्वीकार करने के साथ कंगना रनोट के योगदान की भी तारीफ होनी चाहिए थी.कंगना अपनी पीढ़ी की चंद अभिनेत्रियों में से एक हैं,जो नारी प्रधान फिल्म को प्रचलित फिल्मों के समकक्ष लेकर आई हैं.
कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ के बारे में अभी तक सोशल मीडिया पर फिल्म बिरादरी के महाराथियीं की हलचल नहीं दिख रही है.करण जौहर से लेकर अमिताभ बच्चन तक चुप हैं.अमिताभ बच्चन तो हर नए-पुराने कलाकार की तारीफ़ करते नहीं चूकते.हस्तलिखित प्रशंसापत्र और गुलदस्ता भेजते हैं.हो सकता है कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी हो,लेकिन...करण ज़ोहर और कंगना रनोट का वैमनस्य हम सभी जानते है.उनके ही शो में कंगना ने उन्हें बेनकाब कर दिया था.उसके बाद से मुद्दे को लतीफा बना कर हल्का करने में करण जौहर सबसे आगे रहते हैं.उनके गिरोह ने एक अवार्ड शो में खुलेआम नेपोटिज्म का मजाक उड़ाया और बाद में माफ़ी मांगी.गौर करें तो यह नेपोटिज्म का दूसरा पक्ष और पहलू है,जब आप खुद के परिचितों और मित्रों के दायरे के बाहर की प्रतिभाओं की मौजूदगी और कामयाबी को इग्नोर करते हैं.अब तो कंगना ने नाम लेकर कहना शुरू कर दिया है.ताज्जुब यह है कि इसके बावजूद महारथियों के कान पर जूं नहीं रेंग रही है.
महारथियों का मौन भी दर्ज हो रहा है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद,खेमेबाजी,लॉबिंग जैम कर चलती रही है.बार-बार एक परिवार होने का दावा करने वाली फिल्म इंडस्ट्री वास्तव में एक ही हवेली के अलग-अलग कमरों में बंद है.और वे चुन-चुन कर दूसरों के कमरों में जाते हैं या अपने कमरे में उन्हें बुलाते हैं.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बैठकी में सभी(खास कर बाहरी प्रतिभाओं) के लिए आसन नहीं होता.हाँ,अनुराग कश्यप जैसा कोई पालथी मार कर बैठ जाये तो उसे कुर्सी दे दी जाती है.


Wednesday, January 30, 2019

सिनेमालोक : बहुभाषी सिनेमा बेंगलुरु में


सिनेमालोक
बहुभाषी सिनेमा बेंगलुरु में
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल ही में बेंगलुरु से लौटा हूँ.पिछले शुक्रवार को बेंगलुरु में था.आदतन शुक्रवार को वहां के मल्टीप्लेक्स में ताज़ा रिलीज़ ‘मणिकर्णिका’ देखने गया.आशंका थी कि कन्नड़भाषी प्रान्त कर्णाटक की राजधानी बेंगलुरु में न जाने ‘मणिकर्णिका’ को प्रयाप्त शो मिले हों कि नहीं मिले हों.मुंबई और उत्तर भारत में यह बात फैला दी गयी है कि कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री ने राज्य सरकार पर दवाब डाल कर ऐसा माहौल बना दिया है कि हिंदी फिल्मों को सीमित शो मिलें.कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री को बचने और चलाये रखने के लिए यह कदम उठाया गया था.यह स्वाभाविक और ज़रूरी है. महाराष्ट्र में महाराष्ट्र सरकार ने मल्टीप्लेक्स में प्राइम टाइम पर मराठी फिल्मों के शो की अनिवार्यता से स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री को संजीवनी दी है.यह कभी सोचा और लागू किया गया होगा.पिछले हफ्ते का मेरा अनुभव भिन्न और आदर्श रहा.अगर सारे मेट्रो शहरों के मल्टीप्लेक्स में ऐसी स्थिति आ जाये तो भारतीय फिल्मों के लिए वह अतिप्रिय आदर्शवादी बात होगी.
मैं पास के मल्टीप्लेक्स में सुबह 10 बजे के शो के लिए गया था.उस मुल्त्प्लेक्स में ‘मणिकर्णिका’ के सात शो थे.टिकट के लिए क़त़ार में लगा था.उत्सुकता थी कि किस फिल्म के लिए यह क़त़ार लगी है.मेरे आगे के पांच-सात दर्शकों में से केवल एक ने ‘मणिकर्णिका’ का टिकट लिया.एक ने ‘ठाकरे’(मराठी} का टिकट लिया.बाकि ने तमिल और तेलुगू के टिकट लिए.उस मल्टीप्लेक्स के छः स्क्रीन में अलग-अलग भाषाओँ की फ़िल्में कगी थीं और सभी के दर्शक उस कतार में थे.हमारे मेट्रो शहर कॉस्मोपॉलिटन हो चुके हैं,लेकिन सिनेमा के दर्शकों के लिहाज से यह मेरा पहला अनुभव था.वहां कुछ फिल्मों के पोस्टर दिखे.बाद में सर्च कर मैने देखा कि उस मल्टीप्लेक्स में चार भाषाओँ की फ़िल्में चल रही थीं,जबकि बेंगलुरु शहर में सात भाषों की फ़िल्में चल रही थीं.हिंदी और अंग्रेजी के साथ कन्नड़,तेलुगू,मलयालम,तमिल.मराठी और कोरियाई की फ़िल्में शहर के सिनेमाघरों में चल रही थीं.हिंदी की ‘मणिकर्णिका’ और ‘ठाकरे’.कन्नड़ की ‘सीतराम कल्याण’ और ‘केजीएफ़’,मलयालम की ‘इरुपतियोनाम तुनांडू’,तेलुगू की ‘मिस्टर मजनू’ और तमिल की ‘विस्वासम’...सच कहूं तो यह देख और जान कर बहुत ख़ुशी हुई.मुंबई में हिंदी,अंग्रेजी,मराठी और तमिल फ़िल्में साथ चलती हैं.दिल्ली में मुमकिन है पंजाबी और भोजपुरी की फ़िल्में चलती हों.अगर सभी बड़े शहरों में देश की भाषाओँ के दर्शक मिलें तो उनको भाषाओँ की फ़िल्में भी लगेंगी और दोस्तों-पैचितों के साथ दर्शक दूसरी भाषाओँ की फ़िल्में देख कर आनंदित होंगे.
कुछ हफ्ते पहले एक शोध के दरम्यान मैंने जाना कि बेंगलुरु हिंदी फिल्मों का तीसरा बड़ा मार्किट हो चुका है.मुंबई और दिल्ली के बाद उसी का स्थान है.पहले हैदराबाद तीसरे नंबर पर था.गौर करें तो पिछले पांच सालों में आईटी उद्योग में आई तेज़ी से बेंगलुरु में उत्तर भारत से युवकों की आमद बढ़ी है.वे नौकरियों के लिए सुरक्षित शहर बेंगलुरु को चुन रहे हैं.उत्तर भारत की कामकाजी लड़कियां भी बेंगलुरु को प्राथमिकता दे रही हैं.हो ये रहा है कि उत्तर भारत के नौकरीपेशा अभिभावक रिटायर होने के बाद अपनी संतानों के साथ रहने के लिए बेंगलुरु शिफ्ट हो रहे हैं.ये युवक और उनके परिवार हिंदी फिल्मों के मुख्या दर्शक हैं.उनके साथ दूसरी भाषाओँ के दोस्त-परिचित भी हिंदी फिल्मों के दर्शक हो जाते हैं.इस तरह होंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.
आने वाले समय में बेंगलुरु में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गुणात्मक इजाफा होगा.वहां के इस ट्रेंड को राजस्थान के हिंदी अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ ने बहुत पहले समझ लिया था.हिन्दीभाषी पाठकों के लिए यहाँ अख़बार एक दशक पहले से ही वहां से प्रकाशित हो रहा है.मुझे पूरी उम्मीद है के दुसरे मीडिया हाउस भी इस दिशा में सोच रहे होंगे.हिंदी फिल्मों के सन्दर्भ में मुझे लगता है की निर्माताओं और प्रोडक्शन घरानों को हिंदी फिल्मों की मार्केटिंग में बेंगलुरु को ध्यान में रख कर प्लानिंग करनी चाहिए.अभी सारा फोकस मुंबई,दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ शहरों में होता है.सच्चाई यह है कि उत्तर भारत में सिनेमाघर नहीं हैं.ज़रूरी है कि जहाँ सिनेमाघर और दर्शक हैं,वह प्रचार हो. बहुभाषी दर्शकों के बीच हिंदी दर्शकों को समय से जानकारी मिले.

Tuesday, January 22, 2019

सिनेमालोक : एनएम्आईसी सरकार का सराहनीय कदम


सिनेमालोक : एनएम्आईसी सरकार का सराहनीय कदम 
पिछले शनिवार को प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा का उद्घाटन किया.यह मुबई के पेडर रोड स्थित फिल्म्स डिवीज़न के परिसर में दो इमारतों में आरम्भ हुआ है.पिछले दो दशकों के टालमटोल और कच्छप गति से चल रही प्रगति के बाद आख़िरकार इसका शुभारम्भ हो गया.प्रधान मंत्री ने समय निकाला.वे उद्घाटन के लिए आये.ऐसा नहीं है कि उद्घाटन की औपचारिकता निभा कर वह निकल गए.उन्होंने पहले संग्रहालय का भ्रमण किया.खुद देखा.सराहना की और फिर 50 मिनट लम्बा भाषण दिया.इस भाषण में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की उपलब्धियों की तारीफ की.उसे उभरते सॉफ्ट पॉवर के रूप में स्वीकार किया. उन्होंने फिल्म व्यवसाय के अनेक आयामों को छूते हुए कुछ घोषनाएँ भी कीं.वे इस अवसर पर प्रफ्फुल्लित नज़र आ रहे थे.उन्होंने भाषण में अपने निजी अनुभवों को शेयर किया और बार-बार कहा कि आप सभी का योगदान प्रसंसनीय है.उन्होंने मंच से कुछ फिल्मकारों और हस्तियों के नाम लिए और उनके व्यापक योगदान को रेखांकित किया.
नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा(एनएमआईसी) के लिए कोई हिंदी पर्याय नहीं सोचा गया है.फिल्म डिवीज़न के साईट पर एनएम्आईसी ही लिखा हुआ है.वहां क्लिक करने पर फ़िलहाल उपलब्ध जानकारियां अंग्रेजी में ही लिखी राखी हैं.यह विडंबना और सच्चाई है कि भारतीय सिनेमा की बातें अंग्रेजी में होती हैं और दावा किया जाता है कि फिल्मों के इतिहास से देश की आम जनता(दर्शक) को वाकिफ कराना है.अगर आप सिर्फ भारतीय भाषाएँ जानते हैं तो नावाकिफ ही रहें.है न सोचनीय बात? इसे राष्ट्रीय सिनेमा संग्रहालय कहा जा सकता है.इससे संबंधित जानकारियां देश की सभी भाषाओँ में उपलब्ध होनी चाहिए.कोई भी दर्शक अपनी भाषा में इसका ऑडियो सुन सके.उम्मीद है एनएम्आईसी के संबंधित अधिकारी इस दिशा में ध्यान देंगे.
बताया गया है कि एनएम्आईसी में सिनेमा के विकास के साथ देश के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास की झलक प्रदर्शित होगी.आरंभिक काल से इसकी प्रवृतियों और प्रभाव का आकलन होगा.यह एक शोध केंद्र के रूप में विकसित किया जायेगा,जहाँ समाज पर सिनेमा के प्रभाव से संबंधित विषयों पर शोध होंगे.फिल्मप्रेमियों और अध्येताओं के लिए यहाँ प्रसिद्द निर्देशकों,निर्माताओं,संस्थानों आदि की गतिविधियों और कार्यों की प्रदर्शनी लगायी जाएगी.फिल्मकारों और फिल्म छात्रों के लिए सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित किये जायेंगे.इसके साथ ही फिल्म आन्दोलन के प्रति भविष्य की पीढ़ियों की रूचि जगाने की गतिविधियाँ भी होंगी.ये सभी कार्य बेहद महत्वपूर्ण और सिने संस्कार के लिए ज़रूरी हैं.हम सभी जानते हैं कि भारतीय सिनेमा के चौतरफा विकास और पहुँच ने विदेशी सिनेमा को अभी तक भारतीय बाज़ार में मजबूत नहीं होने दिया है.हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओँ की फ़िल्में दर्शक देखते हैं.कोशिश यह चल रही है कि कैसे उन्हें इंटरनेट युग में भी संतुष्ट रखा जाये और सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने की उनकी आदत बनी रहे.
पुणे में फिल्म आर्काइव है.वहां फिल्म संरक्षण का काम होता है.कुछ दिक्कतों और कमियों के बावजूद नेशनल आर्काइव का कार्य प्रशंसनीय है.वहां सुविधाएँ बढाने की ज़रुरत है. एनएम्आईसी सिनेमा के प्रदर्शन का कार्य करेगा.आर्काइव और म्यूजियम की भूमिकाएं अलग होती हैं.दर्शकों की रूचि जगाने और उन्हें जानकारी देने का फौरी काम म्यूजियम करता है.कहते हैं कि एशिया में कहीं और ऐसा म्यूजियम नहीं है.हो भी नहीं सकता,क्योंकि किसी और देश में सिनेमा भारत की तरह विकसित और स्वीकृत नहीं है. एनएम्आईसी की साल भर के कार्यक्रमों और गतिविधियों से पता चलेगा कि यह किस हद तक आम दर्शकों के काम आ रहा है?अपने देश की दिक्कत है कि संस्थान बन जाते हैं.उनके उद्देश्य तय हो जाते हैं.और फिर कोई अयोग्य अधिकारी उस संस्थान के मूल उद्देश्यों को ही पूरा नहीं कर पता. एनएम्आईसी को देश के दूसरे शहरों में घूमंतू कार्यक्रमों की परिकल्पना करनी होगी. शोधार्थियों और छात्रों के लिए अध्ययन और शोध की सुविधाएँ देनी होंगी.शोध के कार्य को बढ़ावा देने के लिए फेलोशिप और अनुदान की व्यवस्था करनी होगी.सिनेमा के शिक्षा केन्द्रों और विश्वविद्यालयों से भी एनएम्आईसी को जोड़ना होगा.
फ़िलहाल शुरूआत है.तमाम आशंकाओं और सवालों के बीच हमें सरकार के इस सराहनीय कदम की तारीफ करनी चाहिए.

Tuesday, January 8, 2019

सिनेमालोक : चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी

सिनेमालोक
चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी
-अजय ब्रह्मात्मज
2018 में रिलीज हुई फिल्मों के आधार पर ट्रेन और निष्कर्ष उनकी बात करते हुए लगभग सभी समीक्षकों और विश्लेषको ने स्त्री अंधाधुंध और बधाई हो का उल्लेख करते हुए कहा कि दर्शक अब कंटेंट पसंद करने लगे हैं. संयोग ऐसा हुआ कि खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की फिल्में अपेक्षा के मुताबिक शानदार कारोबार नहीं कर सकीं.बस,क्या था? खान से बेवजह परेशान विश्लेषकों ने बयान जारी करने के साथ फैसला सुना दिया कि खानों के दिन लद गए.27 सालों के सफल अडिग कैरियर में चंद फिल्मों की असफलता से उनके स्टारडम की चूलें नहीं हिलेंगी.हां, उन्हें अपनी उम्र के अनुसार भूमिकाएं चुनते समय दर्शकों की बदलती अभिरुचि का खयाल रखना होगा.उदीयमान सितारों राजकुमार राव,आयुष्मान खुराना और विकी कौशल को 2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से साबित करना होगा कि वे ताज़ा स्टारडम के काबिल हैं.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कंटेंट प्रधान छोटी फिल्मों का ज़िक्र करते समय हम उन फिल्मों के ही नाम गिनाते हैं,जिन्होंने 100 करोड़ या उसके आसपास का कारोबार किया.इसी लिहाज से 'स्त्री' और ' बधाई हो' उल्लेखनीय फिल्में हो गयी हैं.बेहतरीन होने के बावजूद हम 'अंधाधुन' का नाम उन दोनों के बाद ही ले रहे हैं.खुले दिल से हम भले ही स्वीकार न करें,लेकिन सच्चाई यही है कि कारोबार और कमाई ही हम सभी के लिए लोकप्रियता और श्रेष्ठता का प्रमाण है.अन्यथा 2018 की श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में 'गली गुइयां' और 'तुम्बाड' शामिल रहती। दरअसल, कामयाबी के लिहे भी चेहरे चाहिए और 100 करोड़ का आंकड़ा.

दर्शकों की पसंद-नापसंद का कोई सामान्य नियम नही है.और न कोई ऐसा फार्मूला है कि ट्रेंड और कामयाबी मापी जा सके. पिछले साल की 13 सौ करोड़ी फिल्मों पर ही नज़र डालें तो हिस्टोरिकल,सोशल,कॉमेडी,एक्शन और हॉरर फिल्में दर्शकों को पसंद आईं। दर्शकों को तो साल के आझिरी हफ्ते में रिलीज 'सिंबा' भी पसंद आई,जिसमें कुछ भी मौलिक नहीं था.जिस कंटेंट और दर्शकों की बदलती पसंद की दुहाई दी जा रही है,वह 'सिंबा' में कहां थी? दर्शकों को नई और मौलिक कहानियां पसंद आती हैं,लेकिन उन्हें समयसिद्ध फार्मूला फिल्में भी पसंद आती हैं.कंटेंट नया हो या घिसा-पिटा... अगर मनोरंजन मिल रहा है दर्शक टूट पड़ते हैं.दर्शकों को अगर भनक भी लग जाये कि निर्माता-निर्देशक उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं तो वे लोकप्रिय स्टारों की फिल्में भी ठुकरा देते हैं.हर साल कुछ स्थापित और लोकप्रिय स्टारों और निर्देशकों को दर्शकों की तरफ से अस्वीकृति का तमाचा लगता है.कई बार दर्शक अनजाने में बेहतरीन फिल्मों तक नहीं पहुंच पाते.पर्यापत प्रचार नहीं होने से दर्शक उनसे अनजान राह जाते हैं.
वास्तव में दर्शकों को कामयाब कंटेंट चाहिए.फिल्मों का कारोबार अच्छा होता है तो वे ललकते हैं.कुछ फिल्में कलेक्शन और कारोबार की वजह दर्शकों की पसंद बन जाती हैं. सच कहें तो दर्शक और समीक्षक बेहतरीन फिल्मों के विवेक से वंचित हैं.फिलहाल बाजार हावी है.वह बहुत कुछ निर्धारित कर रहा है।

Saturday, January 5, 2019

सिनेमालोक : शहरी दर्शकों के लिए बन रहा है सिनेमा


सिनेमालोक
शहरी दर्शकों के लिए बन रहा है सिनेमा
-अजय ब्रह्मात्मज
याद करें कि ग्रामीण पृष्ठभूमि की आखिरी फिल्म कौन सी देखी थी? मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि किस आखिरी फिल्म में धोती-कमीज और साडी पहने किरदार दिखे थे.बैलगाड़ी,तांगा और सायकिल भी गायब हो चुके हैं.कुआं,रहट,चौपाल,खेत-खलिहान आदी की ज़रुरत ही नहीं पड़ती.कभी किसी आइटम सोंग में हो सकता है कि यह सब या इनमें से कुछ दिख जाये.तात्पर्य यह कि फिल्म की आवश्यक प्रोपर्टी या पृष्ठभूमि में इनका इस्तेमाल नहीं होता.अब ऐसी कहानियां ही नहीं बनतीं और कैमरे को ग्रामीण परिवेश में जाने की ज़रुरत नहीं पड़ती.धीरे-धीरे सब कुछ शहरों में सिमट रहा है.किरदार,परिवेश और भाषा शहरी हो रही है.
दरअसल,फ़िल्में शहरी दर्शकों के लिए बन रही हैं.हिंदी फ़िल्में कहने को पूरे भारत में रिलीज होती हैं,लेकिन हम जानते है कि दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों की मौजूदगी टोकन मात्र ही होती है.तमिल और तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री हिंदी के समकक्ष खड़ी है.कन्नड़ और मलयालम के अपने दर्शक हैं.कर्णाटक में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर हदबंदी रहती है.दक्षिण के राज्य अपनी भाषा की फिल्मों के लिए संवेदनशील हैं.उन्होंने प्रदेश की भाषाओँ की फिल्मों के प्राइम प्रदर्शन की अनिवार्यता सख्त कर दी है.महाराष्ट्र में मराठी फिल्मों का सुनिश्चित प्रदर्शन होता है.
पिछले पांच-दस सालों में मल्टीप्लेक्स की संख्या बढ़ी है और सिंगल स्क्रीन लगातार कम हुए हैं.जिन शहरों और कस्बों के सिंगल स्क्रीन टूट या बंद हो रहे हैं,उन शहरों में उनके स्थान पर मल्टीप्लेक्स नहीं आ पा रहे हैं.कुछ राज्यों में सरकारें कर में छूट और अन्य सुविधाएँ भी दे रही हैं,लेकिन सिनेमाघरों के बंद होने और खुलने का अनुपात संतुलित नहीं है.स्थिति बद से  बदतर होती जा रही है.अपने बचपन के सिनेमाघरों को याद करें तो अब वे केवल आप की यादों में ही आबाद हैं.ज़मीन पर उनका अस्तित्व नहीं रह गया है.इलाहांबाद,माफ़ करें प्रयागराज के मेरे फिल्म इतिहासकार मित्र अपने शहर के बंद हुए सिनेमाघरों की मर्मान्तक कथा लिख रहे हैं.यह जानना और समझना रोचक होगा कि कैसे और क्यों सिनेमाघर हमारे दायरे से निकल गए?
देश की सामाजिक संरचना तेज़ी से बदली है.शिक्षा के प्रसार और आवागमन की सुविधा बढ़ने हिंदी प्रदेशों के युवा राजधानियों और बड़े शहरों की तरफ भाग रहे हैं.अच्छी पढाई और नौकरी की तलाश में शहरों में युवा जमघट बढ़ रहा है.थोड़ी और अच्छी व ऊंची पढाई और फिर उसी के अनुकूल नौकरी के लिए हिंदी प्रदेशों के युवा मेट्रो शहरों को चुन रहे हैं.हिंदी फिल्मों के मुख्य दर्शक यही युवा हैं.पूरे बाज़ार का मुख्य ग्राहक युवा ही है और वही हिंदी फिल्मों का दर्शक है.कभी सर्वेक्षण होना चाहिए कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों का प्रोफाइल कितना बदल चुका है.दर्शक फ़िल्में तो देख रहे हैं,लेकिन उनके प्लेटफार्म और माध्यम बदल चुके हैं.फिल्म देखने की वैकल्पिक सुविधा और किफ़ायत से सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखनेवाले शहरी दर्शकों की संख्या घटी है.गंवाई और कस्बाई दर्शकों की हद में सिनेमाघर ही नहीं हैं,उनसे यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि फिल्म देखने के लिए वे पास के शहरों में जायेंगे.
मेट्रो शहरों और प्रदेश की राजधानियों में सिनेमाघर और दर्शक सिमट रहे हैं.हिंदी प्रदेशों के हिन्दीभाषी दर्शक अभी तक इस भ्रम में रहते हैं कि उनकी संख्या की वजह से ही हिंदी फ़िल्में चलती हैं.यह कभी सच रहा होगा.अभी की सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्मों की सर्वाधिक कमाई मुंबई से होती है.इसके बाद दिल्ली एनसीआर का स्थान है.इधर कुछ सालों में बंगलोर में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.इस बढ़त की वजह सभी समझते हैं.आईटी उद्योग ने उत्तर भारतीय युवा को आकर्षित किया है.उत्तर भारत का अब शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा ,जिसका कम से कम एक सदस्य बंगलौर में कार्यरत न हो. क्या आप जानते हैं कि बंगलौर फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के मामले में मुंबई और दिल्ली के बाद तीसरे नंबर पर आ चुका है.


Tuesday, December 25, 2018

सिनेमालोक : कार्तिक आर्यन

सिनेमालोक
कार्तिक आर्यन
-अजय ब्रह्मात्मज
इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
दस महीने पहले 23 फ़रवरी को ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ रिलीज हुई थी. लव रंजन की इसी फिल्म के शीर्षक से ही प्रॉब्लम थी. कुछ को यह टंग ट्विस्टर लग रहा था तो अधिकांश का यही कहना था कि यह भी कोई नाम हुआ? फिल्म रिलीज हुई और सभी को पसंद आई. इस तरह के विषय की फिल्मों पर रीझ रहे दर्शक टूट पड़े तो वहीँ खीझ रहे समीक्षक इसे दरकिनार नहीं कर सके.समीक्षकों ने फिल्म के विषय की स्वाभाविक आलोचना की, लेकिन उसके मनोरंजक प्रभाव को स्वीकार किया.नतीजा यह हुआ कि खरामा-खरामा यह फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंची. फिल्म के कलाकारों में सोनू यानि कार्तिक आर्यन को शुद्ध लाभ हुआ. छह सालों से अभिनय की दुनिया में ठोस ज़मीन तलाश रहे कार्तिक आर्यन को देखते ही देखते दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री ने कंधे पर बिठा लिया. उन्हें फ़िल्में मिलीं,एनडोर्समेंट मिले और कार्तिक ग्लैमर वर्ल्ड के इवेंट में चमकने लगे.
22 नवम्बर 1990 को ग्वालियर के डॉक्टर दंपति के परिवार में जन्मे और पीला-बढे कार्तिक मुंबई तो आये थे इंजीनियरिंग की पढाई करने,लेकिन मन के कोने में सपना फिल्मों में एक्टिंग का था.पढाई के दौरान सपनों को पंख लगे और कार्तिक ने अभिनय के आकाश की तलाश जारी रखी. नए कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के ताऊ-तरीकों से नावाकिफ होते हैं. सही हिम्मत और पूरा जज्बा न हो तो सपनों को चकनाचूर करने के रोड़े रास्तों में पड़े मिलते हैं.कार्तिक ने खुद ही राह बनायीं.दिक्कत का एहसास हुआ तो तैयारी की और प्रयास करते रहे. आख़िरकार 2011 में उन्हें लव रंजन की ‘प्यार का पंचनामा’ मिली.इस फिल्म में रजत का किरदार दर्शकों के ध्यान में आया.वह उन्हें याद रहा.पहली फिल्म के नए एक्टर के लिए इतना बहुत होता है.इस फिल्म में उनके लम्बे संवाद और उसकी अदायगी ने सभी को प्रभावित किया. कार्तिक के साथ ऐसा चल रहा है.उनकी फ़िल्में अपने विषय की वजह से आलोचित होती हैं,लेकिन उनका किरदार प्रशंसित होता है.कार्तिक की नयी फ़िल्में इस विरोधाभास को कम करें तो उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति तेज़ी से बढ़ेगी.
पहली फिल्म की सफलता और चर्चा के बावजूद दूसरी फिल्म ‘आकाशवाणी’ दर्शकों ने पसंद नहीं की. अगले साल ई सुभाष घई की ‘कांची’ कब रिलीज होकर चली गयी? किसी को पता ही नहीं चला. इं दोनों फिल्मों की असफलता से कार्तिक के करियर में विराम आया.निराशा नज़दीक पहुंची.इस छोटे अंतराल में बेचैन होने के बावजूद कार्तिक ने बेसब्री में गलत फ़िल्में नहीं चुनीं.वक़्त गुजरता रहा और कार्तिक सही फिल्म के इंतजार में रहे.फिर से लव रंज आये और उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’ में कार्तिक आर्यन को अंशुल का किरदार दिया.इस फिल्म में फिर से उनके एकल संवाद की तारीफ हुई.बतौर एक्टर भी उनमें आत्मविश्वास और परफॉरमेंस की रवानी दिखी.बीच में आई ‘गेस्ट इन लंदन’ हलकी रही,लेकिन ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ ने परिदृश्य ही बदल दिया.
पिछले 10 महीनों में कार्तिक लगातार चौंका रहे हैं.वे सुर्ख़ियों में बने हुए हैं.उनकी फिल्मों की घोशनाएँ हो रही है.सही या गलत यह खबर भी फैल रही कि उन्होंने कौन सी फिल्म छोड़ दी.करीना कपूर के साथ रैंप वाक तो चर्चा में आये. उस इवेंट की तस्वीरों में कार्तिक का कॉन्फिडेंस देखते ही बनता है.यूँ लगता है की कार्तिक लगातार खुद को मंज रहे हैं और अभी से बड़ी चमक और खनक के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं.कार्तिक की एक अघोषित खूबी है.ग्वालियर की पृष्ठभूमि और परिवार से उन्हें हिंदी मिली है.हिंदी के उच्चारण और अदायगी में अपने समकालीनों से बहुत आगे हैं.उनके एकल संवाद प्रमाण हैं कि हिंदी पर उनकी जबरदस्त पकड़ है.
कार्तिक की ‘लुका छुपी’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. इसमें वह कार्तिक आर्यन के साथ हैं.’किंक पार्टी’ में वह जैक्लिन फ़र्नांडिस के साथ नज़र आयेंगे. इम्तियाज़ अली की ‘लव आजकल 2’ में सारा अली खान के साथ उनकी जोड़ी बनेगी. 2018 ने कार्तिक के सपनों को ऊंची उड़ान दी है.


Tuesday, December 18, 2018

सिनेमालोक : राधिका आप्टे


सिनेमालोक
राधिका आप्टे
-अजय ब्रह्मात्मज
पिछले दिनों ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स ने एक ट्विट किया कि ‘अंधाधुन की स्ट्रीमिंग चल रही है.यह इसलिए नहीं बता रहे हैं कि इसमें राधिका आप्टे हैं,लेकिन हाँ इसमें राधिका आप्टे हैं.’ इस ट्विट की एक वजह है.कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर मीम चल रही थी और दर्शक सवाल कर रहे थे कि नेटफ्लिक्स के हर हिंदी प्रोग्राम में राधिका आप्टे ही क्यों रहती है? संयोग कुछ ऐसा हुआ कि ‘लस्ट स्टोरीज’,’सेक्रेड गेम्स’ और ‘गुल’ में एक के बाद एक राधिका आप्टे ही दिखीं.मान लिया गया है कि डिजिटल शो में राधिका का होना लाजिमी है.
करियर के लिहाज से देखें तो राधिका आप्टे की पहली फिल्प्म 2005 में ही आ गयी थी.उन्होंने महेश मांजरेकर के निर्देशन में ‘वह लाइफ हो तो ऐसी’ फिल्म की थी,जिसमे शहीद कपूर और अमृता राव मुख्या भूमिकाओं में थे.उस फिल्म की आज किसी को याद भी नहीं है.हिंदी,बंगाली मराठी और तेलुगू फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकायें करने के बाद एक तरीके से ऊब कर राधिका लंदन चली गयीं.वहां उन्होंने कंटेम्पररी डांस सीखा.वहीँ उनके लाइफ पार्टनर बेनेडिक्ट टेलर भी मिल गए.कुछ समय तक लीव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद दोनों ने शादी कर ली.राधिका के प्रशंसक उनके पति को नहीं पहचानते,क्योंकि वह राधिका के आगे-पीछे डोलते नज़र नहीं आते.शादी के बाद राधिका ने जिस तरह की बोल्ड फ़िल्में की हैं,वह शायद आम हिन्दुस्तानी पति को गवारा नहीं होता.तमाम आज़ादी और और नारी स्वतंत्रता की बैटन के बावजूद हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों को शादी के बाद अघोषित दायरे में रहना पड़ता है.
राधिका ने ऐसी कोई परवाह नहीं की.डांस और थिएटर की ट्रेनिंग से उनकी एक्टिंग की नींव पुख्ता है.धीरे-धीरे दिख रहा है कि वह हर किस्म और तबके के किरदारों को आसानी से निभा ले जाती हैं.उन्होंने ‘लस्ट स्टोरीज’ की तो ‘पैडमैन’ में घरेलू महिला की भी भूमिका निभाई.इसके पहले उन्हें ‘माझी-द माउंटेनमैन’ में भी हमने देखा था.राधिका के परफॉरमेंस में वैराइटी है.थोड़ी सी दिक्कत उनके उच्चारण और संवाद अदायगी की है.हल्का सा मराठी टच होने से उनकी भूमिकाओं का असर कम होता है.राधिका के दोस्तों और निर्देशकों को उन्हें हिंदी उच्चारण सुधारने की सलाह देनी चाहिए.
राधिका के साथ सबसे अच्छी बात है कि वह किसी एक भाषा या विधा से नहीं बंधी हैं. वह अंग्रेजी समेत 6-7 राष्ट्रीय बह्षाओं में काम कर चुकी अहै और उन्होंने आगे के लिए भी खुद को हिंदी तक सीमित नहीं किया है.फीचर के साथ शार्ट फिल्म और वेब सेरिज करने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है.इं दिनों शार्ट फिल्मों की काफी चर्चा है.राधिका आप्टे ने 2015 में सुजॉय घोष के साथ ‘अहल्या’ होर्त फिल्म की थी.तब कुछ आलोचकों ने समझा और लिखा था कि फिल्मों में राधिका का करियर समाप्त सा हो गया है,इसलिए वह शार्ट फाइलों की ओर मुड़ गयी हैं.अब पलट कर देखें तो वह पायनियर जान पड़ती हैं.उन्होंने भांप लिया था कि आने वाला समय शार्ट फिल्म और वेब सीरिज का है.
इस सन्दर्भ में अनुराग कश्यप औr विक्रमादित्य मोटवानी की ‘सेक्रेड गेम्स’ में राधिका आप्टे की भूमिका की बहुत चर्चा हुई.वह और भी वेब सीरिज कर रही हैं.लगातार दिखने से भी फिल्म एक्टर दर्शकों को खटकने लगते हैं.राधिका ने ‘बाज़ार’ जैसी फिल्मों में मामूली भूमिकाएं स्वीकार कर गलती ही की.इन फिल्मों में ज्यादा कुछ करने की गुंजाईश नहीं होती.और फिर डायरेक्टर सक्षम नहीं हो तो वह कलाकार को प्रेरित भी नहीं कर पाटा.राधिका के अभिनय में एकरसता नहीं है,लेकिन उसके लिए बेहतरीन और कल्पनाशील डायरेक्टर की ज़रुरत है.और फिर हिंदी फिल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के लिए नाच-गाने वाली आकर्षक भूमिकाएं भी करनी पड़ती हैं.राधिका का मिजाज ऐसी फिल्मों से मेल नहीं खता.यही उम्मीद की जा सकती है कि इंडी सिनेमा के नए दौर में राधिका को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कुछ चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं मिलें. अगले साल पिया सुकन्या के निर्देशन में उनकी ‘बंबैरिया’ रिलीज होगी.



Tuesday, December 4, 2018

सिनेमालोक : तापसी पन्नू


सिनेमालोक
तापसी पन्नू
दिसंबर आरभ हो चुका है.इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
हम शुरुआत कर रहे हैं तापसी पन्नू से.2012 की बात है.तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर रिलीज होने वाली थी. चलन के मुताबिक तापसी के निजी पीआर ने उनके साथ एक बैठक तय की.पता चला था कि दक्षिण की फिल्मों से करियर आरम्भ कर दिल्ली की यह पंजाबी लड़की हिंदी में आ रही है.पहली फिल्म के समय अभनेता/अभिनेत्री थोड़े सहमे और डरे रहते हैं.तब उनकी चिंता रहती है कि कोई उनके बारे में बुरा न लिखे और उनका ज़रदार स्वागत हो.तापसी भी यही चाहती रही होंगी या यह भी हो सकता है कि पीआर कंपनी ने उन्हें भांप लिया हो.बहरहाल अंधेरी के एक रेस्तरां में हुई मुलाक़ात यादगार रही थी.यादगार इसलिए कह रहा हूँ की,उसके बाद तापसी ने हर मुलाक़ात में पहली भेंट का ज़िक्र किया.हमेशा अच्छी बातचीत की.अपनी तैरियों और चिंताओं को शेयर किया.अपना हमदर्द समझा.कामयाबी के साथ आसपास हमदर्दों और सलाहकारों की भीड़ लग जाती है.ऐसे में संबंध टूटते हैं,लेकिन तापसी ने इसे संभाल रखा है.
बहरहाल,तापसी ने ‘चश्मेबद्दूर से शुरुआत कर ‘बेबी से बड़ी धमक दी.’बेबी में तापसी की भूमिका छोटी लेकिन महत्वपूर्ण थी.शबाना खान इ भूमिका ने तापसी ने अपनी फूर्ती और मेधा से चकित किया था.अक्षय कुमार के होने के बावजूद वह दर्शकों और समीक्षकों को याद रह गयी थीं.यह उस भूमिका का ही कमाल था कि बाद में नीरज पाण्डेय ने ‘नाम शबाना फिल्म बनायीं और उस किरदार को नायिका बना दिया.’नाम शबाना का निर्देशन शिवम नायर ने किया था.इसके पहले अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में ‘पिंक आ चुकी थी.’पिंक में तापसी ने मीनल अरोड़ा की दमदार भूमिका में ज़रुरत के मुताबिक एक आधुनिक लड़की की हिम्मत का परिचय दिया था.’पिंक अपने विषय की वजह से शहरी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गयी थी.इं दोनों फिल्मों के बाद जब तापसी ने ‘जुड़वां 2 चुनी तो उनके खास प्रशंसकों को परेशानी हुई.तब तापसी ने कहा था की वह मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा और हाई कांसेप्ट सिनेमा के बीच तालमेल रखना चाहती हैं.वह अपने दर्शकों का विस्तार चाहती हैं.
2018 में तापसी पन्नू की ‘सूरमा,’मुल्क और ‘मनमर्जियाँ’ फ़िल्में आयीं हैं.तीनों ही फ़िल्में अलग मिजाज की हैं.’सूरमा में वह हाकी प्लेयर हैं,जो अपने प्रेमी संदीप सिंह से दूर जाने का मुश्किल फैसला लेती है ताकि वह अपने खेल और रिकवरी पर ध्यान दे सके.अनुभव सिन्हा निर्देशित ’मुल्क में वह वकील आरती मल्होत्रा की भूमिका में है.आरती ने मुस्लिम लड़के से शादी की है.वह अपने ससुराल के पक्ष में कोर्ट में कड़ी होती है और मुसलमानों के प्रति बनी धारणाओं को तर्कों से तोडती है.अनुराग कश्यप की ‘मनमर्जियाँ’ में वह आजाद ख्याल रूमी बग्गा के किरदार में खूब जंची हैं.यह तो स्पष्ट है कि तापसी पन्नू अभि तक किसी एक इमेज में नहीं बंधी हैं.वह प्रयोग कर रही हैं.
तापसी पन्नू हिंदी फिल्मों की टिपिकल हीरोइन बन्ने से बची हुई हैं.यह एक अभिनेत्री के लिए तो सही है,लेकिन एक स्टार अभिनेत्री को मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों की ज़रुरत होती है.किसी लोकप्रिय स्टार के साथ रोमांटिक भूमिका में आने से उनके दर्शक बढ़ते हैं,तापसी भी यह चाहती हैं.अभि तक लोकप्रिय स्टार उनसे दूर-दूर हैं.अगर बात नहीं बिगड़ी होती तो वह आमिर खान की बेटी की भूमिका में ‘दंगल में दिखी होतीं. हो सकता है उसके बाद उनके करियर की दिशा अलग हो जाती. ‘दंगल न हो पाने का एक फायदा हुआ कि तापसी नए निर्देशकों की पसंद बनी हुई हैं,उन्हें लगता है कि अलग किस्म की भूमिकाओं में तापसी को चुना जा सकता है.’तड़का और ‘बदला उनकी अगली फ़िल्में हैं.
हिंदी फिल्मों में बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए टिक पाना ही मुश्किल होता है.ताप पन्नू ने तो अपनी पहचान और प्रतिष्ठा हासिल कर ली है.फिर भी हिंदी फिल्मों के केंद्र में अभि वह नहीं पहुंची हैं.म्हणत के साथ ही उन्हें फिल्मों के चुनाव के प्रति भी सजग रहना होगा.उन्हें बड़े बैनर और बड़े निर्देशकों के साथ फ़िल्में करनी होंगी.लोकप्रियता और स्टारडम का यही रिवाज़ है.


Wednesday, November 21, 2018

सिनेमालोक : ठगे गए दर्शक,लुट गए निर्माता


सिनेमालोक
ठगे गए दर्शक,लुट गए निर्माता
-अजय ब्रह्मात्मज
दीवाली के मौके पर रिलीज हुई ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ ने पहले दिन ही 50 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर एक नया रिकॉर्ड बना दिया.फिर तीन दिनों में 100 करोड़ क्लब में फिल्म आ गयी. चार दिनों के वीकेंड में 123 करोड़ के कुल कलेक्शन की विज्ञप्ति आ चुकी है.कमाई के इन पड़ावों के बावजूद ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के बारे में आम धारणा बन चुकी है कि इस फिल्म को दर्शकों ने नापसंद कर दिया है.यह फिल्म अपेक्षा के मुताबिक दर्शकों को लुभा नहीं सकी. नतीजतन फिल्म का कारोबार लगातार नीचे की ओर फिसल रहा है.ट्रेड पंडित हैरान नहीं हैं.उनहोंने तो पहले दिन ही घोषणा कर दी थी.उसके बाद शायद ही किसी समीक्षक ने फिल्म की तारीफ की हो.फिल्म देख कर निकले दर्शक सोशल मीडिया और लाइव रिव्यू में फिल्म से निराश दिखे..
पहली बार तो ऐसा नहीं हुआ है,लेकिन हाल-फिलहाल की यह बड़ी घटना है जब किसी फिल्म ने दोनों पक्षों को निराश किया.’ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ की घोषणा के समय से दर्शकों की उम्मीदें अमिताभ बच्चन और आमिर खान की जोड़ी से बंध गयीं.हिंदी फिल्मों के सन्दर्भ में यह बड़ी घटना है.दो पीढ़ियों के लोकप्रिय अभिनेताओं के साथ आने से यह आस बनी थी कि परदे पर परफारमेंस बिजली चमकेगी और संवाद अदायगी के बादल गरजेंगे.यशराज फिल्म्स के बैनर में बन रही कॉस्टयूम और पीरियड फिल्म के निर्माण में हो रहे भारी खर्च से भव्य मनोरंजन(बाहुबली किस्म का) का अंदाजा था.ऊपर से ‘धूम 3 के निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य के हाथों में कमान होने से लग रहा था कि पिछली फिल्म के जैसा ही कुछ रोचक ड्रामा दिखेगा.’धूम 3’ में भी आमिर खान और कट्रीना कैफ थे.पहले दिन इन उम्मीदों की वजह से ही दर्शक उमड़े,लेकिन सारी उम्मीदें धरी रह गयीं.आम दर्शक और खास समीक्षक दोनों ही थिएटर से निराश निकले और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर निगेटिव टिपण्णी,कटाक्ष,वीडियो और मीम का ताँता लग गया.हर तरफ से फिल्म की बुराई होने लगी.
फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं,लेकिन यह फिल्म आमिर खान की है.पिछली कुछ फिल्मों(पीके,दंगल,सीक्रेट सुपरस्टार आदि) की सफलता का सेहरा.आमिर खान के माथे बंधता रहा है,इसलिए असफलता का ठीकरा भी उनके माथे फूटा है.यह सही भी है.जानकारों के मुताबिक आमिर खान ने फिल्म के लिए हाँ कहने के बाद पूरी स्क्रिप्ट फिर से लिखवाई.ऐसा कहा और माना जाता है कि आमिर खान का स्क्रिप्ट सेंस जबरदस्त है.उनसे कोई चूक नहीं होती.ऐसे में उनके सुझाओं को तरजीह दी जाती है.फिल्म के लेखन से लेकर एडिटिंग तक में आमिर खान की सक्रिय भागीदारी रही.अन्य फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में भी आमिर खान इन्वोल्व रहे.उन्होंने ही फिल्म को वह रंग और शेप दिया,जो दर्शकों के बीच आया.विजय कृष्ण आचार्य फिल्म के निर्देशक और कप्तान हैं,लेकिन फिल्म के कोच आमिर खान हैं.उन्होंने ने ही फिल्म की विधि और रणनीति तय की.फ़िल्में असफल होती हैं तो मुख्या सितारे खामोश हो जाते हैं.यही ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के साथ हो रहा है.
फिल्म के शीर्षक से भ्रांति बढ़ी.सभी को यही लग रहा था कि यह फिल्म 18-19वीं सदी में सक्रिय और अंग्रेजों के सिरदर्द बने ठगों पर आधारित होगी.बहुत बाद में आमिर खान ने बताना शुरू किया कि यह ठगों की प्रचलित कहानी पर आधारित नहीं है.विजय कृष्णा आचार्य ने काल्पनिक कहानी लिखी है और एक फंतासी गढ़ी है.लगातार अंग्रेजी फ़िल्में देख रहे दर्शक और समीक्षक फिल्म की प्रस्तुति,किरदारों के गठन,लुक और निर्वाह,सेट और सजावट में विदेशी फिल्मों की झलक देखते-खोजते रहे.शहरों के एक बड़े तबके को ऐसा लगता है कि फिल्म का वीएफ़एक्स साधारण कोटि का है.इन दिनों नेटफ्लिक्स और दूसरे लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर सभी देशों की बेहतरीन फ़िल्में उपलब्ध हैं.तकनीक के स्तर पर अब कोई भी कोताही झट से पकड़ी जाती है.हिंदी फिल्मों के युवा निर्देशक फिल्मों में भारतीय इमोशन लाने में विफल हो रहे हैं.इस फिल्म के किरदारों में भावनात्मक आवेग नदारद है.संबंधों का गाढ़ापन नहीं है.अधिकांश युवा निर्देशक भारतीय फिल्मों की मेकिंग,शैली और परंपरा से खुद को अलग कर आधुनिक होने की कोशिश में ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान जैसी गलतियाँ कर रहे हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान अपनी लागत और भव्यता की वजह से नुकसान में है. अब एक ही उम्मीद बची है कि अगर यह फिल्म चीन में दर्शकों को पसंद आये तो आंकड़े और कमाई में थोड़ी बढ़त हो जाए.आमिर खान की फ़िल्में चीन में अच्छा कारोबार करती रही हैं.

Monday, November 12, 2018

सिनेमालोक : लोकप्रियता का नया पैमाना


सिनेमालोक
लोकप्रियता का नया पैमाना
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के विस्तार से फिल्मों के प्रचार को नए प्लेटफार्म मिल गए हैं.फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर और यूट्यूब....सोशल मीडिया के चरों प्लेटफार्म किसी भी फिल्म के प्रचार के लिए मह्त्वपूर्ण हो गए हैं.उनके लिए खास रणनीति अपनाई जा रही है.कोशिश हो रही है कि ज्यादा से ज्यादा यूजर और व्यूअर इन प्लेटफार्म पर आयें.जितनी ज्याद तादाद,निर्माता-निर्देशक और स्टार की उतनी बड़ी संतुष्टि.आरंभिक ख़ुशी तो मिल ही जाती है.ख़ुशी होती है तो जोश बढ़ता है और फिल्म के प्रति उत्सूकता घनी होती है.इन दिनों फिल्मों की कमाई और कामयाबी के लिए वीकेंड के तीन दिन ही थर्मामीटर हो गए हैं.वीकेंड के तीन दिन के कलेक्शन से पता चल जाता है कि फिल्म का लाइफ टाइम बिज़नस क्या होगा?शायद ही कोई फिल्म सोमवार के बाद नए सिरे से दर्शकों को आकर्षित कर पा रही है.
पिछले हफ्ते ‘जीरो’ और ‘2.0’ के ट्रेलर जारी हुए.मुंबई के आईमैक्स वदला में प्रशंसकों और मीडिया के बीच ट्रेलर जरी कर निर्देश आनद एल राय ने अपने स्टार श रुख खान,अनुष्का शर्मा और कट्रीना कैफ के साथ मीडिया को संबोधित किया.मुख्या रूप से शाह रुख खान से ही सवाल किये जा रहे थे और वही जवाब भी दे रहे थे.निर्माता-निर्देशक ने फिल्म की कथाभूमि मेरठ का फील देने के लिए वहां के घंटाघर का कटआउट लगाया था.मेरठ के स्वाद की भी व्यवस्था की गयी थी.इन आकर्षणों के साथ शाह रुख खान का जन्मदिन भी था.लिहाजा ट्रेलर के यूट्यूब पर आते ही दर्शक और प्रशंसक टूट पड़े.दूसरी तरफ रजनीकांत और निर्देशक शंकर की टीम ने ‘2.0 के ट्रेलर लांच का आयोजन चेन्नई में किया था.मुंबई से अक्षय कुमार भी वहां गए थे.’2.0 मूल रूप से तमिल फिल्म है.इसे हिंदी समेत अन्य भाषाओँ में भी डब किया गया है.ट्रेलर भी अनेक भाषाओँ में यूट्यूब पर चल रहे हैं.दोनोंओ ही फिल्मों के त्रलेर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी है और अभी गिनती जारी है.
‘जीरो के बारे में तो अनुमान था कि इसे दर्शकों का प्यार मिलेगा.बौने शाह रुख खान के तेवर और अंदाज को सभी देखना चाहते थे.निर्माता-निर्देशक ने ट्रेलर में कुछ छिपाया नहीं है.खास कर तीनों प्रमुख किरदारों के बारे में बता दिया है.बऊआ का खिलंदड़ा और आक्रामक अंदाज पसंद आ रहा है.बऊआ ग्रंथिहीन हीरो है.उसे अपने अधूरेपन का कोई रंज नहीं है.वह मस्त रहता है और किसी के साथ भी जुड़ कर उसकी ज़िन्दगी बदल देता है.देखते ही देखते ‘जीरो के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच गयी.’2.0 का भी यही हाल रहा.उसके व्यूअर भाषाओँ की वजह से बंट गए.इन दोनों के पहले आये ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या 8 करोड़ पार कर चुकी है.क्या ये सभी इन फिल्मों के दर्शक भी होंगे?
फिल्मों के ट्रेलर के व्यूअर दर्शक में तब्दील हो पते हैं क्या?इसे मापने का अभी तक कोई सूत्र विकसित नहीं हुआ है.पिछली कुछ फिल्मों के ट्रेलर ने भी यूट्यूब पर आग लगा दी थी,लेकिन बॉक्स ऑफिस तक उस आग की गर्मी नहीं पहुंची.मीडिया के विशेषज्ञ मानते हैं कि यूट्यूब के व्यूअर और थिएटर के दर्शक अलग होते हैं.यूँ समझें कि किसी भी मॉल में रोजाना फूटफॉल हजारों और लाखों में होता है,लेकिन वास्तविक खरीददारों की संख्या उनके अनुपात में बहुत कम होती है.यही हाल व्यूअर और दर्शक के बीच के गैप में नज़र आता है.
फिर भी यूट्यूब फिल्मों की प्रति उत्सुकता और लोकप्रियता का नया पैमाना बन गया है.उसके विशेषज्ञ आ गए हैं.ट्रेलर के व्यूअर जुटाने के लिए भी ऐड दिए जाते है.उन्हें बूस्ट किया जाता है.व्यूअर की संख्या के खोखलेपन को समझते हुए भी निर्माता-निर्देशक उन तरकीबों और रणनीतियों के मद में भारी राशि खर्च कर रहे हैं.मीडिया के इन्फ़्लुऐंसर की भी मदद ली जा रही है.देखें तो सोशल मीडिया और खास कर यूट्यूब नया मैदान-ए-जंग बना हुआ है.लोकप्रियता की पहली झड़प यहाँ जीतनी होती है.

Wednesday, October 31, 2018

सिनेमालोक : मुंबई में फिल्मों की फुहार


सिनेमालोक
मुंबई में फिल्मों की फुहार  
-अजय ब्रह्मात्मज
मुंबई में इन दिनों फिल्मों की बहार है.खास कर पश्चिमी उपनगर के तीन मल्टीप्लेक्स में चल रही फिल्मों की फुहार से सिनेप्रेमी भीग रहे हैं. वे सिक्त हो रहे हैं.देश-विदेश से लायी गयी चुनिन्दा फिम्लें देखने के लिए उमड़ी दर्शकों की भीड़ आश्वस्त करती है कि इन्टरनेट प्रसार के बाद फिल्मों की ऑन लाइन उपलब्धता के बावजूद दर्शक सिनेमाघरों के स्क्रीन पर फ़िल्में देखना पसंद करते हैं.फेस्टिवल सिनेमा का सामूहिक उत्सव है.दर्शकों को मौका मिलता है कि वे अपनी रिची और पसंद के मुताबिक फ़िल्में देखें और सह्दर्शक के साथ उस पर बातचीत करें.ज्यादातर नयी फिल्मों के निर्माता,निर्देशक और कलाकार फिल्मों के प्रदर्शन के बाद दर्शकों से मुखातिब होते हैं. वे उनकी जिज्ञासाओं के जवाब देते हैं.यह सुखद अनुभव होता है.फेस्टिवल के मास्टरक्लास से अंतर्दृष्टि मिलती है और विमर्शों से सिनेमहौल की दिशा और दृष्टि मिलती है.
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने आज़ादी के बाद देश में विभिन्न कला माध्यमों के विकास के लिए अनेक संस्थाओं का गठन किया,जिनके तहत कला चेतना के विकास के लिए गतिविधियाँ आयोजित की गईं.उनमें से एक महत्वपूर्ण गतिविधि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन था.1952 में पहला फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया गया था,जिसमें सिर्फ 23 देशों की फ़िल्में आ सकी थीं.इस साल ख़बरों के अनुसार 100 से अधिक देशों की फ़िल्में प्रदर्शित होंगीं.पिछले अनेक सालों से यह फेस्टिवल अब गोवा में आयोजित होने लगा है.फिल्म फेस्टिवल के प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय की बेरुखी और फिल्म निदेशालय की नौकरशाही से यह फिल्म फेस्टिवल अपनी गरिमा खो चुका है. देश के दूसरे शहरों में ज्यादा सुगठित और सुविचारित फिल्म फेस्टिवल हो रहे हैं.दर्शक अपने आसपास के शहरों के फेस्टिवल में शिरकत कर लेते हैं.देखा यह जा रहा है कि सभी फेस्टिवल में 60 से 70 प्रतिशत फ़िल्में एक सी होती हैं.दुनिया भर से चर्चित 200 फिल्मों से ही सभी काम चलाते हैं.ऐसी स्थिति में हर फेस्टिवल में जाना ज़रूरी नहीं रह जाता.अब समय आ गया है कि ये फेस्टिवल सोच-विचार का भिन्नता जाहिर करें.तात्पर्य यह की सभी फेस्टिवल की अपनी खासियत हो.मुंबई में इस तरह के कुछ आयोजन इधर पॉपुलर हुए हैं.
मुंबई का फिल्म फेस्टिवल मुंबई अकादमी ऑफ़ मूविंग इमेजेज(मामी) के तहत आयोजित होता है.श्याम बेनेगल के नेतृत्व में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य के साथ की गयी थी कि फिल्म इंडस्ट्री का एक अपना फेस्टिवल हो,जिसमें इंडस्ट्री के कलाकार और तकनीशियन भी शामिल हो सकें.साथ ही हिंदी फिल्मों की केन्द्रीय नगरी होने की वजह से भी मुंबई में ऐसे फेस्टिवल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी.आरंभिक वर्षों में महराष्ट्र सर्कार ने भी इस फेस्टिवल की मदद की.फिर अंबानी बंधुओं ने बारी-बारी से इस फेस्टिवल के लिए आवश्यक धन प्रदान किये.अभी यह फेस्टिवल जियो और स्टार के सहयोग से संचालित हो रहा है.
अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के नेत्रित्व में मामी फिल्म फेस्टिवल अधिक पॉपुलर और व्यापक हुआ है.अनुपमा चोपड़ा फ़िल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की पत्नी हैं और किरण राव फिल्म स्टार आमिर खान की पत्नी हैं.दोनों की पृष्ठभूमि और पहुँच से फिल्म फेस्टिवल में लोकप्रिय चेहरों की मौजूदगी बढी.आम दर्शक भी खींचे आये.इस साल तो दर्शकों और डेलिगेट की भागीदारी इतनी ज्यादा हो गयी है कि पहले दिन टिकट बुक करने की ऑन लाइन व्यवस्था कुछ घंटों के लिए बैठ गयी.बाद में स्थिति सुधरी तो भी दर्शकों को मनपसंद फ़िल्में चुनने और देखने में भी दिक्कतें हो रही हैं.बढती भीड़ और भागीदारी को देखते हुए फेस्टिवल के नियंताओं को नयी तरकीब खोजनी पड़ेगी या मल्टीप्लेक्स की संख्या बढानी पड़ेगी.
सीमाओं और कमियों के बावजूद मामी फिल्म फेस्टिवल देश का अग्रणी फिल्म फेस्टिवल बन चूका है.यह लोकतान्त्रिक,मुखर और उदार फेस्टिवल है.गोवा का सरकारी फिल्म फेस्टिवल सरकारी सोच की संकीर्णता का शिकार है.नयी सरकार के नुमाइंदों ने अपने खेमे के अयोग्य लोगों को ज़िम्मेदारी देकर इस फेस्टिवल का स्वरुप नष्ट कर दिया है.पिछले साल के आयोजन की कमियां फेस्टिवल के दौरान ही उजागर हो गयी थीं.इस साल सिनेप्रेमियों का उत्साह नज़र नहीं आ रहा है.



Tuesday, October 23, 2018

सिनेमालोक दीपिका-रणवीर की शादी


सिनेमालोक
दीपिका-रणवीर की शादी
-अजय ब्रह्मात्मज
दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी की ट्विटर पर की गयी संयुक्त घोषणा ने मीडिया की संडे की शांति में खलबली मचा दी. धडाधड अपडेट होने लगे और उनकी पंक्तियों को दोहराया और उद्धृत किया जाने लगा.हाल-फिलहाल में शादी की घोषणा कर रही किसी फिल्म स्टार जोड़ी ने पहली बार हिंदी में भी अपना सन्देश जारी किया.इस बात के लिए हिंदी फिल्मों के दोनों स्टार बधाई के पात्र हैं.ठीक है कि वर्तनी और व्याकरण की कुछ गलतियाँ हैं.जैसे कि दीपिका का नाम ही दीपीका लिखा गया है.फिर भी जिस इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है,वहां पॉपुलर स्टार की ऐसी पहल के दूरगामी प्रभाव होते हैं.
बताते हैं कि 2012 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला की शूटिंग के दरम्यान दोनों करीब आये.संजय लीला भंसाली की अगली दो फिल्मों में वे फिर से साथ रहे.शूटिंग के दिनों के लम्बे साथ में दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सके.पहली फिल्म की रिलीज के बाद से ही दोनों की नजदीकियां नज़र आने लगी थीं,लेकिन शुरू में इसे रणवीर सिंह का हाइपर अंदाज माना गया.रणवीर मौके-बेमौके अपने प्रेम का सार्वजानिक इजहार करते रहे.दीपिका की स्मित मुस्कान से स्पष्ट था कि वह भी राज़ी हैं.दीपिका का व्यवहार हमेशा संयत रहा,जबकि रणवीर सिंह बेहिचक प्रेम प्रदर्शन करते रहे.
पलट कर देखें तो दीपिका पादुकोण पुराने प्रेम संबंध से निकलने के बाद डिप्रेशन की शिकार हो गयी थीं.उस दौर में उन्हें अपने परिवार से पूरा प्यार और समर्थन मिला.मुंबई में रणवीर सिंह की समझदार संवेदना और हमदर्दी से दीपिका को संबल मिला.याद करें तो दीपिका संबंध टूटने से बिखर गयी थीं.उन्हें रणवीर सिंह ने मजबूत सहारा दिया.वह उनके साथ रहे.अपने खिलंदडपने से उन्हें हंसाते रहे.रणवीर सिंह की हरकतें ऊलजलूल लग सकती हैं,लेकिन आप ठहर कर देखें तो उनके पीछे एक सिस्टम है.एनर्जी से लबालब रणवीर अपने रिएक्शन रोक नहीं पाते हैं.वे दूसरे फिल्म स्टार की तरह गले मिलने की सिर्फ औपचारिकता नहीं निभाते.मैंने पाया है कि वे प्यार से भींचते हैं.निहाल कर देते हैं.उन्होंने डिप्रेशन में डूबी दीपिका की उंगली थामी और समय पर ज़रूरी सहारा दिया.शुरू में कुछ लोगों को यही लगता रहा कि रणवीर जबरदस्ती दीपिका से चिपकने की कोशिश करते हैं.अब उन आलोचकों की समझ में आ गया होगा कि दोनों एक-दूसरे से कितना प्रेम करते हैं.
रणवीर सिंह का फ़िल्मी करियर दीपिका के आगमन के चार साल बाद शुरू हुआ. यशराज फिल्म्स की ‘बैंड बाजा बारात से सफल लेकिन छोटी शुरुआत के बावजूद रणवीर सिंह कामयाबी की छलांगे मारते हुए अपनी पीढ़ी के पॉपुलर स्टारों की कतार में आ गए. दीपिका के साथ आई तीनों फिल्मों ने बतौर स्टार और एक्टर उनकी पोजीशन मजबूत कर दी.आखिरी फिल्म ‘पद्मावत के बाद रणवीर सिंह ने जोया अख्तर की ‘गली बॉय पूरी कर ली है और अभी रोहित शेट्टी की ‘सिम्बा’ पूरी कर रहे हैं.दीपिका ने अलबत्ता ‘पद्मावत के बाद केवल एक फिल्म की घोषणा की है.तेजाब हमले की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर बन रही बायोपिक में वह मेघना गुलज़ार के निर्देशन में काम करेंगी.वह इस फिल्म की एक निर्माता भी हैं.
कयास लगाये जा रहे हैं कि दीपिका-रणवीर की शादी के बाद उनका फ़िल्मी करियर क्या करवट लेगा? अब इस तरह का सवाल बेमानी है कि क्या शादी के बाद दीपिका फिल्मों में काम करेंगी? समय बदल चुका है.अभी की अभिनेत्रियाँ न तो प्रेम छिपाती हैं और ना शादी के बाद अपने करियर को विराम देती हैं.दर्शकों की मानसिकता और स्वीकृति भी बदली है.अब वे शादीशुदा अभिनेत्रियों को बराबर पसंद करते हैं.यह हो सकता है कि भविष्य में फिल्मों के चुनाव के मामले में दीपिका की पसंद और प्राथमिकतायें बदल जाएं.समृद्धि और सम्मान हासिल कर चुकी दीपिका से यह उम्मीद भी रहेगी कि वह फिल्मों सार्थक भूमिकाएं निभाएं.अपने स्टारडम का लाभ लेकर ऐसी फ़िल्में करें जो अबी तक किसी और दबाव की वजह से वह नहीं कर पायी हों.
दोनों के सुखी दांपत्य जीवन और फ़िल्मी करियर के लिए शुभकामनाएं!


Tuesday, October 16, 2018

सिनेमालोक : लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे

सिनेमालोक
लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे
-अजय ब्रह्मात्मज
देश के विभाजन के बाद लाहौर के दो प्राण वहां से निकले – प्राण सिकंद और प्राण नेविले. प्राण सिकंद मुंबई आये.उन्होंने लाहौर में ही एक्टिंग आरम्भ कर दी थी. मुंबई आने के बाद वे प्राण के नाम से मशहूर हुए.पहले खलनायक और फिर चरित्र भिनेता के तौर पर अपनी अदाकारी से उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. दूसरे प्राण दिल्ली में रुके. उन्होंने भारतीय विदेश सेवा की नौकरी की.कला,संगीत और फिल्मों में उनकी खास रूचि रही.उन्होंने लाहौर की यादों को सह्ब्दों में लिखा और भारतीय संगीत में ठुमरी और फ़िल्मी संगीत पर अनेक निबन्ध और पुस्तकें लिखीं. उन्हें के एल सहगल खास पसंद रहे.उन्होंने के एल सहगल मेमोरियल सर्किल की स्थापना की और सहगल की यादों और संगीत को जोंदा रखा. उन्होंने भारत सरकार की मदद से सहगल की जन्म शताब्दी पर खास आयोजन किया और उनके ऊपर एक पुस्तक भी लिखी.
पिछले गुरुवार को दिल्ली में उनका निधन हुआ.उनके निधन की ख़बरें अख़बारों की सुर्खिउयाँ नहीं बन पायीं.हम नेताओं,अभिनेताओं और खिलाडियों की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं.हमें अपने समाज के साहित्यकारों,कलाकारों और इतिहासकारों की सुधि नहीं रहती.हम उनके बारे में बेखबर रहते हैं.प्राण नेविले भारत सर्कार की विदेश सेवा से मुक्त होने के पहले से कला और संगीत के अध्ययन और दस्तावेजीकरण में व्यस्त रहे.उन्होंने ब्रिटिश राज के दिनों पर गहरा रिसर्च किया था.उनकी पुस्तकों और लेखों में उस ज़माने की कहानियों और घटनाओं का विस्तृत चित्रण हुआ है.कोठेवालियों पर उनकी पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है.नैना देवी और बेगम अख्तर के मुरीद प्राण नेविले ने दोनों प्रतिभाओं पर मन से लिखा है.
प्राण नेविले से मेरा परिचय लाहौर की वजह से हुआ.नौकरी से मुक्ति और निवृति के बाद मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री पर शोध कर रहा हूँ.मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि विभाजन के पहले फिल्म निर्माण में सक्रिय लाहौर के योगदान का संचयन और उल्लेख नहीं हुआ है.भारतीय इतिहासकारों ने नए देश पाकिस्तान में होने की वजह से लाहौर का उल्लेख ज़रूरी नहीं समझा और पाकिस्तान ने विभाजन के पहले के लाहौर की गतिविधियों को पाकिस्तानी सिनेमा से बहार रखा.जाहिर तौर पर पाकिस्तान का सिनेमा 1947 के बाद आरम्भ होता है.भारतीय और हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस लुप्त कड़ी पर ध्यान देने की ज़रुरत है.शोध के सिलसिले में ही मुझे प्राण नेविले की पुस्तक लाहोर – ए सेंटीमेंटल जर्नी की जानकारी मिली.इस पुस्तक के कई चैप्टर में उन्होंने आज़ादी के पहले के लाहौरी सिनेमा के बारे में लिखा है. इसके साथ लाहौर के रोज़मर्रा ज़िन्दगी को भी उन्होंने अपने संस्मरणों में याद किया है.
पिछले दिनों लाहौर फिल्म इंडस्ट्री के अध्ययन और शोध के सिलसिले में दिल्ली में उनसे मुलाक़ात का अवसर मिला.मेरी सोच रही है कि वयोवृद्ध चिंतकों को तंग नहीं किया जाना चाहिए.इसी संकोच में उनका संपर्क मिल जाने पर भी मैंने उनसे बात नहीं की.फिर लगा कि पता नहीं आज़ादी और विभाजन के पहले के लाहौर की धडकनों को महसूस किये किसी और शख्स से मेरी कब मुलाक़ात होगी?मैंने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो वे सहज ही तैयार हो गए.उन्होंने २८ अप्रैल २०१८ को 11 बजे का समय दिया. मैं आदतन समय से पहले पहुँच गया,लेकिन वे ठीक 11 बजे ही मिले.खूब साडी बातें हुईं.उनकी बातचीत से लाहौर और वहां की फिल्म इंडस्ट्री को समझने की अंतर्दृष्टि मिली.उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेंट में दीं.वे चाहते थे कि उनकी पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित होकर हिंदी पाठकों के बीच पहुंचे.एक प्रकाशन के संपादक आश्वासन देकर निष्क्रिय हो गए.प्राण साहेब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना चाहते थे.एक दैनिक अख़बार के फीचर प्रभारी ने सूफी संगीत पर लिखे उनके शोधपूर्ण लेक को छपने का आश्वासन दिया था.वह लेख उनके जीते जी नहीं छप पाया.
तय था कि हम फिर मिलेंगे.उन्होंने मेरे काम में रूचि दिखाई थी और हर प्रकार की मदद का वादा किया था.वे चाहते थे कि मैं जल्दी से अपना काम पूरा करूं और उन्हें दिखाऊँ.मेरा शोध अब उन जैसे लाहौरियों के लिए समर्पित होगा.

Wednesday, October 10, 2018

सिनेमालोक : यौन शोषण के और किस्से आएंगे सामने


सिनेमालोक
और किस्से आएंगे सामने
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता-नाना पाटेकर प्रसंग के किसी निदान और निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले विकास बहल का मामला सामने आ गया है. उसके बाद से कुछ और नाम आये हैं.कुछ ने तो आरोप लगने की आशंका में माफ़ी मंगनी शुरू कर दी है.अगर प्रशासन ने इस मामले को उचित तरीके से सुलझाया तो यकीं करें सकदों मामले उजागर होंगे.अनेक चेहरे बेनकाब होंगे.स्त्रियों को लेकर बढ़ रही बदनीयती की सडांध कम होगी. पिछले पच्चीस सालों के अनुभव पर यही कहना चाहूँगा की भारतीय समाज की तरह फिल्म जगत में भी औरतों के प्रति पुरुषों का रवैया सम्मानजनक नहीं है.उन्हें दफ्तर,स्टूडियो औए सेट पर तमाम सावधानी के बावजूद शर्मनाक और अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है.
सोमवार की ख़बरों के मुताबिक मुंबई पुलिस ने तनुश्री दत्ता के एफ़आईआर पर कार्रर्वाई शुरू कर दी है. गृह राज्य मंत्री दीपक केसरकर ने अस्वासन दिया था कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत दर्ज करती हैं तो मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होगी.उम्मीद की जाती है कि मुंबई पुलिस तत्परता से जांच कर जल्दी ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी.मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोसन और उत्पीडन की बातें और शिकायतें तो चलती रहती हैं,लेकिन पहली बार मामला इतना उभर कर सामने आया है.तनुश्री दत्त के मुताबिक 2008 में 26 मार्च को एक डांस सीक्वेंस की शूटिंग के समय नाना पाटेकर ने उनके साथ अवांछित दुर्व्यवहार किया.तनुश्री दत्त ने 2008 में भी इस मेल को उठाया था,लेकिन फिल्म बॉडी और पुलिस विभाग की तरफ से उन्हें राहत नहीं मिल सकी थीं.स्थितियां ऐसी बनीं कि तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री ही छोड़नी पड़ी.दास सालों के बाद उन्होंने ने इस मेल को उठा तो उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया का भरपूर सपोर्ट मिला.मिडिया  ने हर सेलेब्रिटी से सार्वजानिक मंच पर इस प्रसंग में उनसे सवाल पूछे.कुछ उदासीन रहे और सवाल को टाल गए,लेकिन ज्यादातर फ़िल्मी हस्तियों ने सपोर्ट किया.इस वजह से दबाव बढ़ा है.
इस बीच विकास बहल का मामला भी सामने आया है.विकास बहल फैंटम के चार निदेशकों में से एक थे.फिल्मों की यह प्रोडक्शन कंपनी हफिंगटन पोस्ट में आई खबर के बाद रातोंरात डिजोल्व कर दि गयी.अब इस कंपनी के निदेशक अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी अफ़सोस जाहिर कर रहे हैं.अपनी भूल स्वीकार कर रहे हैं.अपने आप में यह स्वीकृति उनके अच्छे रवैये को व्यक्त करती है,लेकिन यह किसी परिणाम तक नहीं पहुँचती. इधर कंगना रनोट ने ‘क्वीन की शूटिंग के समय का हवाला देकर विशाल के व्यवहार पर सवाल खड़े करते हुए उसे यौन उत्पीडन से जोड़ दिया है.कुछ लोगों को लग रहा है कि अभी विकास बहल पर मौका देख कर चौतरफा आक्रमण हो रहा है.आरोप लग रहे हैं.इस तरह के विवादों में हमेशा कुछ लोग बेवजह ‘यह भी सच,वह भी सच’ का रवैया अपनाते हैं.वे न्याय की बात करते हुए भी अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं मिलते.दूसरे दशकों से यही देखा जा रहा की हर विवाद पर कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद ये किस्से कानाफूसियों तक रह जाते हैं.
माना और बताया जा रहा है की हालीवुड के ‘मी टू के प्रभाव में भारत की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह चेतना जगी और बढ़ी है.लड़कियां खुल कर उल्लेख कर रही हैं.भारतीय समाज महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने और उनकी बात सुनने के मामले में अभी बहुत पीछे है.सबसे पहले तो उनकी शिकायत को छुपाने-दबाने की बात की जाती है.बदनामी का खौफ दिखाया जाता है.कहीं न कहीं यह धरना घर कर चुकी है कि कोई भी परिणाम नहीं निकलता.हिंदी फिल्म इन्दुस्त्री में आवाज़ उठाने वाली लड़कियों को धीरे से किनारे कर दिया जाता है.उन्हें काम मिलना बंद हो जाता है.नतीजतन महिलाएं दशकों से ख़ामोशी की साजिश की शिकार होती रहती हैं.हर दशक में ऐसे किस्से मिलेंगे,जिनमें किसी निर्माता,निर्देशक या को-स्टार ने नयी अभिनेत्रियों के शोषण की कोशिश की है.कुछ अभिनेत्रियों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे हादसों के संकेत दिए हैं.
वक़्त आ गया है कि हम ऐसी शिकायतों को गॉसिप से अलग कर के देखें.समाज में लड़कियों और फिल्मों में अभिनेत्रियों के प्रति अपना नजरिया बदलें.

Wednesday, October 3, 2018

सिनेमालोक : फ़िल्में और गाँधी जी


सिनेमालोक
 फ़िल्में और गाँधी जी
-अजय ब्रह्मात्मज
आज महात्मा गाँधी का जन्मदिन है. 1869 में आज ही के दिन महत्मा गाँधी का जन्म पोरबंदर गुजरात में हुआ था.मोहनदास करमचंद गाँधी को उनके जीवन कल में ही महत्मा और बापू संबोधन मिल चूका था. बाद में वे राष्ट्रपिता संबोधन से भी विभूषित हुए. अनेक समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों का मनना है कि गौतम बुद्ध की तरह ही महात्मा गाँधी के नाम और काम की चर्चा अनेक सदियों तक चलती रहेगी. गाँधी दर्शन की नई टीकाएँ और व्याख्याएं होती रहेंगी. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
महात्मा गाँधी ने अपने समय के तमाम मुद्दों को समझा और निजी अनुभवों और ज्ञान से उन पर टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं दीं. बस,इस तथ्य पर ताज्जुब होता है कि उन्होंने अपने जीवन कल में पापुलर हो रहे मनोरंजन के माध्यम सिनेमा के प्रति उदासी बरती. उनसे कभी कोई आग्रह किया गया तो उन्होंने टिपण्णी करने तक से इंकार कर दिया. क्या इसकी वजह सिर्फ इतनी रही होगी कि आधुनिक तकनीकों के प्रति वे कम उदार थे. इन पूंजीवादी आविष्कारों के प्रभाव और महत्व को समझ नहीं पाए. यह भी हो सकता है कि सिनेमा उनकी सोच और सामाजिकता में प्राथमिकता नहीं रखता हो. सच्चाई यही है कि उन्होंने सिनेमा के प्रति हमेश बेरुखी जताई. उसके भविष्य के प्रति आशंका भी जाहिर की. उन्हें फ़िल्में देखने का शौक नहीं रहा. फ़िल्मी हस्तियों से उनका मिलना-जुलना नहीं होता था. केवल चार्ली चैप्लिन के साथ उनकी एक तस्वीर कभी-कभार दिखाई पड़ जाती है.
सन्‌ 1927 में इंडियन सिनैमेटोग्राफ कमेटी ने उनकी राय जानने के लिए एक प्रश्नावली भेजी तो गाँधी जी ने उसका नकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने जवाब में लिखा, 'मैं आपकी प्रश्नावली के उत्तर के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति हूं। मैंने कभी कोई सिनेमा नहीं देखा और मैं इसके प्रभाव से अनभिज्ञ हूं। अगर इस माध्यम में कोई अच्छाई है तो वह अभी सिद्घ होना बाकी है।' गाँधी जी ने बाद में भी सिनेमा की अनभिज्ञता ख़त्म नहीं की. उनकी राजनीतिक सक्रियता बढती गयी.कुछ सालों के बाद भारतीय सिनेमा की रजत जयंती के मौके पर एक स्मारिका के लिए उनसे सन्देश माँगा गया तो उनके सचिव ने जवाब दिया, 'नियमत: गांधी केवल विशेष अवसरों पर संदेश देते हैं और वह भी ऐसे उद्देश्यों के लिए जिनके गुणों पर कोई संदेह न हो। सिनेमा इंडस्ट्री की बात करें तो इसमें उनकी न्यूनतम रुचि है और इस संदर्भ में किसी को उनसे सराहना की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।' अपनी पत्रिका 'हरिजन' में एक संदर्भ में उन्हों स्पष्ट लिखा, 'मैं तो कहूंगा कि सिनेमा फिल्म ज्यादातर बुरे होते हैं।'
सिनेमा के प्रति गांधी जी के कट्टर विरोधी विचारों को देखते हुए ही ख्वाजा अहमद अब्‌बास ने उन्हें एक कुला पत्र भेजा.इस पत्र के जरिए अब्बास ने गांधी जी से फिल्म माध्यम के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने की अपील की थी। अब्बास  के पत्र का अंश है - 'आज मैं आपकी परख और अनुमोदन के लिए अपनी पीढ़ी के हाथ लगे खिलौने - सिनेमा को रखना चाहता हूं। आप सिनेमा को जुआ, सट्‌टा और घुड़दौड़ जैसी बुराई मानते हैं। अगर यह बयान किसी और ने दिया होता, तो हमें कोई चिंता नहीं होती...लेकिन आपका मामला अलग है। इस देश में या यों कहें कि पूरे विश्व में आपको जो प्रतिष्ठा मिली हुई है, उस संदर्भ में आपकी राय से निकली छोटी टिप्पणी का भी लाखों जनों के लिए बड़ा महत्व है। दुनिया के एक सबसे उपयोगी आविष्कार को ठुकराया या इसे चरित्रहीन लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। बापू, आप महान आत्मा हैं। आपके हृदय में पूर्वाग्रह के लिए स्थान नहीं है। हमारे इस छोटे खिलौने सिनेमा पर ध्यान दें। यह उतना अनुपयोगी नहीं है, जितना दिखता है। इसे आपका ध्यान, आर्शीवाद और सहिष्णु मुस्कान चाहिए।'
ख्वाजा अहमद अबबास के इस निवेदन पर गांधी जी की प्रतिक्रिया नहीं मिलती। अगर वह आजादी के बाद के वर्षों में जीवित रहते और फिल्मों के प्रभाव को करीब से देख पाते तो निश्चित ही अपनी राय बदलते,क्योंकि गांधीजी अपने विचारों में कट्‌टरपंथी नहीं थे और दूसरों से सीखने-समझने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
भारतीय समाज और विश्व इतिहास में महात्मा गांधी के महत्व के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। गांधी के सिद्घांतों ने पूरी मानवता को प्रभावित किया है। बीसवीं सदी के दो विश्व युद्घों की विभीषिका के बीच अपने अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह से उन्होंने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। भारतीय मानस में गांधी अचेतन रूप से मौजूद हैं। लाख कोशिशों के बावजूद उनके प्रभाव को नकार नहीं जा सकता. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
सिनेमा और खास कर हिंदी फिल्मों में हम गांधी दर्शन से कभी ‘गांधीगिरी’(लगे रहो मुन्नाभाई) तो कभी किसी और नाम से प्रेरित और प्रभावित चरित्रों को देखते रहेंगे.