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Thursday, June 21, 2018

सिनेमालोक : यशराज स्टूडियो संग 'चाणक्य' का आना

सिनेमालोक
यशराज स्टूडियो संग 'चाणक्य' का आना
-अजय ब्रह्मात्मज
तीन दिनों से यह खबर सोशल मीडिया और अख़बारों में तैर रही है कि यशराज फिल्म्स कि एक फिल्म का निर्देशन डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी करेंगे.इस फिल्म के नायक अक्षय कुमार होंगे. पहली खबर में कयास लगाया गया कि हो सकता है कि ‘चाणक्य’ फिल्म हो और अक्षय कुमार उसमें चन्द्रगुप्त कि भूमिका निभा रहे हों.यह कयास स्वाभाविक है क्योंकि डॉ. द्विवेदी कि पहली पहचान ‘चाणक्य’ से ही बनी थी.१९९२ में आये इस धारावाहिक ने दूरदर्शन पर इतिहास रचा था. पहले बार विजुअल मध्यम में सेट और कोस्ट्युम कैलेंडर आर्ट से बाहर निकला था और ऐतिहासिक प्रामाणिकता नज़र आई थी.
डॉ. द्विवेदी ने बाद में और भी धारावाहिक किये,फिर उन्होंने ‘पिंजर’ फिल्म का निर्देशन किया. उसके बाद काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘कशी का अस्सी’ पर आधारित उनकी फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ बनी,जो निर्माता कि नादानी और फिर सीबीएफसी कि मेहरबानी से लम्बे समय तक अटकी रही.अभी फिल्म रिलीज हो सकती है,लेकिन निर्माता चादर ताने सोये हुए हैं.बहरहाल,इस बीच डॉ. द्विवेदी ने ‘जेड प्लस’ नमक फिल्म कि और दूदर्शन के लिए ‘उपनिषद गंगा’ का निर्माण और निर्देशन किया.भारतीय इतिहास और मिथक पर उनकी गहरी पकड़ हैं. वे चाहते हैं कि भारत कि इन कहानियों को वर्तमान के दर्शकों के बीच लाया जाये,दुनिया को इसकी जानकारी दी जाये. इस दरम्यान उन्होंने ५-६ बार इतिहास पर फिल्म बनाने कि कोशिशें कीं.हर बार किसी न किसी वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा.लम्बे समय तक फिल्म स्टार और निर्माताओं को यही लगता रहा कि देश के दर्शक ऐसे कहानियों के लिए तैयार नहीं हैं.
भला हो ‘बाहुबली’ का.यह फिल्म बनी और देश के हर कोने में सराही गयी.फिल्म कि अद्वितीय कामयाबी ने निर्माताओं की आँखें खोल दी.उन्हें लगा कि जब इतिहास कि काल्पनिक कहानी चल सकती है तो सच्ची कहानियों में ज्यादा ड्रामा और एक्शन है.कहानियों की खोज होने लगी. अभी हर बड़े प्रोडक्शन हाउस में ऐतिहासिक फिल्मों की कहानियों की मांग है.भारतीय मिथक से भी नाटकीय कथाएं खोजी जा रही हैं.ऐसी खबर है कि कारन जौहर,नीरज पाण्डेय और निखिल अडवाणी कि टीम इतिहास और मिथक खंगाल रही है.सभी हड़बड़ी में हैं.फिल्म इंडस्ट्री अपनी भेडचाल के लिए मशहूर है.उन्हें ट्रेंड और चलन में ही कामयाबी नज़र आती है.यूँ यह अच्छी बात है.हॉलीवुड जिस आक्रामक और रणनीतिक तरीके से भारतीय दर्शकों को अपनी तरफ खींच रहा है,उसके मुकाबले के लिए भारतीय सिनेमा को भी बड़ा और विशाल होना होगा.वर्तमान और भविष्य कि कहानियों में ऐसी काल्पनिक उड़ान वीएफएक्स के माध्यम से भी संभव नहीं है.
फ़िलहाल खबर है कि यशराज फिल्म्स और डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी मिल कर  ‘पृथ्वीराज चौहान’ को परदे पर ले आयेंगे.शीर्षक भूमिका को जीवंत करने के लिए योग्य अक्षय कुमार का चुनाव किया किया गया है.अभी इस बात कि ख़ुशी है कि अपनी-अपनी फिल्ड के देश के दो श्रेष्ठ और माहिर साथ आ रहे हैं.डॉ. द्विवेदी के पास इतिहास की समझ है.वे उन्हें आज के सन्दर्भ में पेश कर सकते हैं.यशराज फिल्म्स ऐसी फिल्मों के लिए आवश्यक संसाधन ओर प्रतिभाएं मुहैया करवा सकता है.ऐसा होने पर ही अपेक्षित कामयाबी मिल सकती है.बड़ी फ़िल्में तो बनती ही रहती हैं,अब वक़्त आ गया है कि बहुत बड़ी फ़िल्में बनें.हम इंटरनेशनल स्तर की फ़िल्में नयी तकनीक और अपने इतिहास के संयोग से क्रिएट करें.
बस एक ही ख्याल रखना होगा कि इतिहास प्रेम में हम कहीं अतीत राग में न डूब जाएँ.अभी इस बात का खतरा बढ़ गया है.हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है.फिल्म के किरदार जबरदस्ती राष्ट्रवादी हो रहे हैं.संवादों में देशभक्ति का जबरन उच्चार हो रहा है.सबसे अधिक राष्ट्रवादी होने कि होड़ में फिल्मों का नुकसान होगा.हर ट्रेंड समय के साथ ऊबाऊ हो जाता है.दर्शकों कि रूचि खत्म हो जाती है.अभी दर्शक और समाज तैयार हैं तो फिल्म निर्माताओं को इसका उचित उपयोग करना चाहिए.


Tuesday, June 12, 2018

सिनेमालोक : धरम जी का नया धाम ‘इंस्टाग्राम’

सिनेमालोक
धरम जी का नया धामइंस्टाग्राम

-अजय ब्रह्मात्मज

धर्मेंद्र ने इंस्टाग्राम पर अभी तक कुल 49 तस्वीरें और वीडियो पोस्ट किये हैं। वे पिछले साल 17 अगस्त को इंस्टाग्राम पर आये।  उन्होंनेयमला पगला दीवाना फिर सेकी एक तस्वीर लगायी,जिसमें वे किसी युवा बाइकर की तरह बाइक की हैंडल पकडे खड़े हैं। उन्होंने लिखा है…. आप के प्यार ने मुझे और करीब आने के लिए प्रोत्साहित किया। 17 अगस्त 2017 से आरम्भ यह सिलसिला जारी है। शुरू के महीनों में उनकी पोस्ट की रफ़्तार धीमी रही है। 10 सितम्बर 2017 को उन्होंने पहला वीडियो पोस्ट किया है।  इस पोस्ट में वे साहीवाल गाय के बछड़े को हथेली में कुछ लेकर खिला रहे हैं। वे कुर्सी पर बैठे हैं और पास में घास की ढेर है।
इन तस्वीरों और वीडियो से लगता है कि उनका ज़्यादातर समय अपने फार्म हाउस पर बीतता है। गौर करें तो वे पालतू जीव-जंतुओं के बीच अधिक समय बिताते हैं या उनकी ही तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करते हैं। यहाँ उनके आसपास तोते,बत्तख,मुर्गियां,कुत्ते,बुलबुल और गाय हैं। इन वीडियो में वे कभी उनसे बातें कर रहे होते हैं तो कभी उनके बारे में बता रहे होते हैं। वे अपने फॉलोवर्स से पूछते भी रहते हैं। आश्वस्त होना चाहते हैं। हर पोस्ट पर उनके प्रशंसक अपनी टिप्पणियां लिखते हैं। धर्मेंद्र उनसे इंटरैक्ट नहीं करते। यहाँ एक मशविरा देना उचित होगा...धरम जी के जो सहयोगी ये वीडियो बनाते हैं,वे वीडियो की साउंड क्वालिटी पर ध्यान दें। धरम जी इतना धीरे-धीरे बोलते हैं की उनकी आवाज़ स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ती। इमोशन तो दिख जाता है। उनका लगाव जाहिर होता है। मोहब्बत झलकती है…. लेकिन उनका कहा सुनने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
इंस्टाग्राम पर धरम जी का नामआप का धरमहै। उनके फॉलोवर्स की संख्या अभी 1 लाख से काम है। पोस्ट की फ्रीक्वेंसी बढ़ेगी तो फॉलोवर्स भी बढ़ेंगे। सोशल मीडिया के इस प्लेटफार्म पर बुजुर्ग धरम जी के दर्शन होते हैं। वे घर-परिवार के बुजुर्गों की तरह अपने समय और यादों को शेयर करते हैं। उन्होंने अपने दोनों बेटों सनी और बॉबी की पहली फिल्मों के गाने भी पोस्ट किये हैं। अपने पोते सनी देओल के बेटे करण की दो तस्वीरें भी शेयर की हैं। इन तस्वीरों में अभी तक हेमा मालिनी और उन दोनों की दोनों बेटियों की कोई तस्वीर नहीं आयी है। उन्होंने पहली पत्नी की तस्वीर भी नहीं डाली है। देओल परिवार अपने परिवार की महिलाओं को लाइमलाइट से दूर ही रखता है। शायद इसी वजह से अभी तक उनकी तस्वीरें नहीं दिखी हैं।
28 सितम्बर 2017 की पोस्ट में उन्होंने वह तस्वीर लगायी है,जो फिल्मफेअर टैलेंट कांटेस्ट के लिए भेजी थी। साथ में लिखा है
हसरत थी परवाज़ लूं
लेकर सबको मैं उडूं
मालिक ने चेहरा पढ़ा
सुनी दिल की मेरी सदा  
उस दौर की एक और तस्वीर इस साल 20 मार्च को पोस्ट करने के साथ उस पर लिखा है
खामोश चीख
तड़पते अरमानों की मेरे
मेरी माँ ने सुन ली थी
इसी क्रम में 30 सितम्बर 2017 को अपनी मिरर इमेज के साथ उन्होंने लिखा है
नौकरी करता साइकिल पर आता जाता
फ़िल्मी पोस्टर में अपनी झलक देखता
रातों को जगता उन्होने ख्वाब देखते
सुबह उठता आईने से पूछता
मैं दिलीप कुमार बन सकता हूँ क्या ?
उन्होंने दिलीप कुमार की दो तस्वीरें पोस्ट की हैं। उन्हें जन्मदिन की बधाई भी दी है। शशि कपूर और अर्जुन हिंगोरानी की मौत पर उन्हें याद किया है। पृथ्वीराज कपूर को पूरी इंडस्ट्री पापाजी कहती थी।  धरम जी ने भी उन्हें इसी नाम से याद किया है।इंडस्ट्री के दोस्तों और अग्रजों के साथ वे अपने फॉलोवर्स को बार-बार सम्बोधित करते हैं। दिल की ख़ुशी बताते हैं। एक पोस्ट में वे आर्गेनिक खेती की बात करते हैं. उन्होंने सर पर टोकरी उठा राखी है। एक और पोस्ट में वे बछड़ों के लिए नाद में चारा डालते नज़र आते हैं। फिर किसी किसान की तरह कंधे पर टोकरी रख लेते हैं। यूँ लगता है कि अपनी जड़ों को नहीं लौट पाने की कमी वे फार्म हाउस में पूरी करने के साथ नयी जड़ें डाल रहे हैं। कोई मनोवैज्ञानिक या सोशल मीडिया एक्सपर्ट उनकी पोस्ट के आधार पर उनकी वर्तमान मानसिक अवस्था और स्वाभाव के बारे में ठीक से बता सकता है।
और हाँ,वे अपने फॉलोवर्स को दिवाली और होली की बधाई देना भी नहीं भूले हैं।  
मीडिया क्रिटिक विनीत कुमार धर्मेन्‍द्र के इंस्‍टाग्राम को उनके जीवन का विस्‍तार मानते हैं। उनके शब्‍दों में... ऐसे दौर में जबकि सोशल मीडिया महज अपनी फिल्मों की प्रोमोशल और एक-दूसरे से हिसाब चुकता करने का माध्यम बनकर रह गया है, धर्मेन्द्र का इंस्‍टाग्राम आप का धरम एक दूसरी ही दुनिया में ले जाता है. इसे आप चाहें तो अपनी जड़ की तरफ लौटना भी कह सकते हैं.

गायों को चारा खिलाते धर्मेन्द्र, मुर्गियों को दाना देते धर्मेन्द्र और सिर पर अनाज की टोकरी रखकर खेतों से गुजरते धर्मेन्द्र. ये वो तस्वीरें हैं जो उन्हें सिल्वर स्क्रीन वाली छवि से घरेलू होने का एहसास कराती है. घरेलूपन और रोजमर्रा का जीवन इन तस्वीरों में जितनी मजबूती से उभरकर सामने आते हैं वो इस टाइमलाइन से गुजरनेवाले लोगों को समझने में मदद करती है कि सोशल मीडिया अपने कारोबार का विस्तार देने के अलावा जीवन का विस्तार देने का भी माध्यम हो सकता है.
बॉलीबुड के ज्यादातर सितारे जहां अपने कारोबार और राजनीतिक करिअर को यहां खींचकर लंबा करने में लगे हैं वहीं धर्मेन्द्र इसके जरिए जिंदगी का विस्तार देते जान पड़ते हैं.

Tuesday, June 5, 2018

सिनेमालोक : भाई-बहन का पहली बार टकराव


सिनेमालोक
भाई-बहन का पहली बार टकराव
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते सोनम कपूर कीवीरे दी वेडिंगऔर हर्षवर्धन कपूर कीभावेश जोशी सुपरहीरोएक ही दिन 1 जून को रिलीज हुई। सोनम और हर्ष अनिल कपूर के बेटी-बेटे हैं। हिंदी फिल्मों के इतिहास में यह पहली बार हुआ की भाई और बहन की अलग-अलग फ़िल्में एक ही दिन रिलीज हुई हों और दोनों अपनी फिल्मों में लीड रोल में हों। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भाई-बहन के एक साथ और सामान हैसियत में सक्रीय होने के उदहारण काम हैं।  लम्बे समय तक फिल्म कलाकारों और निर्माता-निर्देशकों ने अपने बेटों को लांच करने के लिए फ़िल्में बनायीं ,लेकिन बेटियों के मामले में पीछे रह गए। फिल्म इंडस्ट्री की काली और कड़वी सच्चाईयों के गवाह और हिस्सेदार होने के कारण उन्होंने बेटियों को फिल्मों से दूर रखा। जद्दनबाई और शोभना समर्थ जैसी कद्दावर अभिनेत्रियों ने ज़रूर अपवाद के तौर पर अपनी बेटियों के लिए पुख्ता इंतज़ाम किये।
बहरहाल,बात सोनम और हर्ष की हो रही थी। अनिल कपूर की बेटी और बेटे ने इतिहास रचा है। सोनम की फिल्म अच्छा कारोबार भी कर रही है।  वह चर्चा और विवाद में है। हर्ष की फिल्म की तारीफ हुई,लेकिन उसे कारोबार नहीं मिला। सभी जानते हैं कि अनिल कपूर और उनके भाई बोनी और संजय सुरिंदर कपूर के बेटे हैं। सुरिंदर कपूर बेटे बोनी के सक्रीय होने और प्रोडक्शन की कमल सँभालने के पहले असफल निर्माता रहे। दुसरे कपूर परिवार के जनक सुरिंदर कपूर का रिश्ता पेशावर और पृथ्वीराज कपूर से था। दोनों रिश्ते में भाई थे। कम लोग जानते हैं कि मुंबई आने के पहले सुरिंदर कपूर पेशावर में  सोसलिस्ट पार्टी की साप्ताहिक पत्रिकाजनतासे जुड़े हुए थे। वे उसके विक्रय प्रतिनिधि थे। एक बार पृथिवीराज पेशावर आये हुए थे तो सुरिंदर कपूर ने उनसे मुंबई चलने की इच्छा प्रकट की। पृथिवीराज जी ने उन्हें सहर्ष निमंत्रण दिया। कुछ दिनों के बाद सुरिंदर कपूर ने फ्रंटियर मेल पकड़ी और मुंबई पहुँच गए।
मुंबई आने के बाद उनकी मुलाक़ात पृथ्वीराज जी से हुई और काम की बात चली तो जाहिर तौर पर फिल्म इंडस्ट्री में सम्भावना देखि गयी। तब पृथ्वीराज मुगलेआज़म की शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने निर्देशन में सहायक का काम दिलवा दिया। के आसिफ के साथ सेट पर कुछ दिनों तक काम करने के बाद सुरिंदर कपूर की समझ में आ गया कि वे निर्देशन के लायक नहीं हैं। फिल्म बनाने में वक़्त भी लग रहा था। उन्होंने फिल्म छोड़ दी। इस बीच उनकी शम्मी कपूर से अच्छी दोस्ती हो गयी। बाद में वे उनकी पत्नी गीता बाली के भी संपर्क में आये। गीता बाली ने बेकरी के दिनों में उन्हें अपना सचिव बना लिया। सुरिंदर कपूर को वह बहुत मानती थीं। चाहती थीं कि सुरिंदर कपूर की आर्थिक स्थिति मजबूत हो. उनकी सलाह पर ही सुरिंदर कपूर निर्माता बने औरशाहज़ादाफिल्म प्रोड्यूस की। वह फिल्म नहीं चल पायी। बाद में बोनी कपूर ने उनके बैनर को सफल प्रोडक्शन कंपनी में बदल दिया। आज भी इस प्रोडक्शन की फिल्मों में गीता बलि को याद किया जाता है।
इस तरह दूसरे कपूर परिवार ने धीरे-धीरे फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनायीं। बोनी और अनिल को अपने पाँव ज़माने में काफी वक़्त लगा और भारी मेहनत करनी पड़ी। आज दोनों ही सफल हैं। इस परिवार की तीसरी पीढ़ी भी सक्रीय हो चुकी और कामयाबी हासिल कर रही है। इसे सुखद संयोग ही कहेंगे कि आप पहले और दूसरे कपूर परिवार के बच्चे बराबरी के दर्जे में हैं और साथ काम कर रहे हैं। सोनम ने रणबीर और करीना कपूर के साथ फ़िल्में कर ली हैं। अर्जुन कपूर भी एक फिल्म में करीना के साथ लीड में थे। कहते हैं कि दिन पलटते देर नहीं लगती और फिल्म इंडस्ट्री में तो ऐसे हज़ारों किस्से हैं।  याद करें कभी सुरिंदर कपूर शम्मी कपूर की पत्नी गीता बाली के मुलाजिम थे और आज दोनों परिवारों के बच्चे फिल्म इंडस्ट्री में बराबर पहचान और मुकाम रखते हैं।

Tuesday, May 29, 2018

सिनेमालोक : बनारस के बैकड्रॉप में ‘नक्काश’


सिनेमालोक

बनारस के बैकड्रॉप मेंनक्काश
-अजय ब्रह्मात्मज

कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी फिल्मों की हेरोइनों की धूम-झूम और कुछ फिल्मों के बड़े स्टार की कवरेज में मीडिया मेंनक्काशको नज़रअंदाज किया। ज़ैग़म इमाम निर्देशित यह फिल्म बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब के दरकते पहलुओं को छूती हुई कुछ वाजिब सवाल उठाती है।ज़ैग़म बनारस की पृष्ठभूमि में हिन्दू-मुसलमान किरदारों को लेकर मौजूं मसलों पर बातें करते हैं। उनकी यह खास खूबी है।  ‘दोजखऔरअलिफ़के बाद इसी परंपरा मेंनक्काशउनकी तीसरी फिम है। इसमें फिल्मिस्तानऔरएयरलिफ्टफेम इनामुल हक़ इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।
इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने के अपने अनुभवों को इनामुल ने शेयर किया था। उनके अनुसार,’बनारस में शूटिंग का पहला दिन था...छोटे शहरों की 'सिनेमाई जिज्ञासा' भीड़ में बदलने लगी थी, उसी भीड़ से कुछ नौजवान ये कहते हुए नज़दीक आ रहे थे कि चलो देखते हैं 'हीरो' कौन है"?...जैसे ही उनकी ये बात मेरे कानों तक पड़ी 'ब-ख़ुदा' मैं छुप गया था... वजह बहुत सीधी सी है..उनकी उत्सुकता को 'निराशा' में नही बदलना चाहता था । मुझे पता है 'हीरो' क्या होता है...रोज़ आईना देखता हूँ इसलिए किसी ग़लतफ़हमी में नहीं हूँ । लेकिन सपनों की कोई 'बाउंडरी वाल' नही होती...इसलिए अपने आपको कभी भी ये सोचने से नही रोक पाया कि किसी फ़िल्म में 'लीड रोल' हो । नियति पूर्व निर्धारित है हमें बस मदद करनी होती, उसकी राहों की रुकावटें हटानी होती है, उसे 'घट जाने देने' के लिए...घट जाना दरअसल बढ़ जाना ही होता है । पिछले छह महीने में बहुत कुछ 'घटा' इसलिए कुछ बढ़ पा रहा हूँ ।इनामुल और उन जैसे दर्जनों कलाकारों के लिए कान पहुंचना किसी मुश्किल सफर की मंज़िल से कम नहीं है। पिछले कुछ सालों में इनामुल सरीखे अनेकआउटसाइडरकलाकार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय के डैम पर पहचान बना कर आगे बढ़ रहे हैं।
नक्काशके मूल विचार के बारे में ज़ैग़म कहते हैं,’यह एक ऐसे मुसलमान कारीगर की कहानी है जो मंदिरों में नक्काशी का काम करता है। मंदिरों के गर्भ गृह में ऐसी नक्काशियां होती हैं। फिल्म में इस कला के जानकारी के साथ यह भी बताया गया है कि कैसे कारीगर अल्लारखा सिद्दीक़ी समाज में हो रहे बदलावों की वजह से अब दबाव में है। उसे अपने समुदाय और हिन्दुओं से भी विरोध झेलने पड़ रहे हैं। मुश्किल में भगवान दास वेदांती भी हैं कि वे नए दौर में कैसे इस परंपरा का निर्वाह करें? अल्ला मियां दशकों से भगवान दास के निर्देश पर मंदिरों में नक्काशी करते रहे हैं,लेकिन नए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से दोनों सांसत में हैं।' अपने समुदायों के दोनों प्रतिनिधि के आत्मसंघर्ष को बनारस के बदले राजनीतिक परिदृश्य में हम देखेंगे। बनारस की सदियों पुरानी सामासिक संस्कृति खतरे में है।
ज़ैग़म इमाम ने पहले दोनों फिल्मों की तरहनक्काशकी भी शूटिंग बनारस में की है। इस फिल्म के लिए उन्होंने सेट तैयार किया और वास्तविक कारीगरों से खूबसूरत नक्काशी करवाई। उन्होंने कुछ स्थानीय कलाकारों के साथ मुंबई से गए कुमुद मिश्रा और शारिब हाशमी को उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं सौंपी हैं। फिल्म के फर्स्ट लुक को जारी करने के लिए कान जाने की ज़रुरत पर वे कहते हैं,’इस से थोड़ी चर्चा हो जाती है और फिल्म ट्रेड के साथ दर्शकों के बीच भी जिज्ञासा बढ़ जाती है। हमें लाभ हुआ है। अस फिल्म में लोग रूचि दिखा रहे हैं।क्या फिल्म के विषय और चित्रण को लेकर विवाद नहीं होगा?’मुझे तो नहीं लगता। मैंने विवादस्पद विषय नहीं चुना है। अगर कोई सवाल करेगा तो मेरे पास जवाब है। मैं खुद बनारस की पैदाइश हूँ।  वही मेरी परवरिश हुई है। मैं हो रहे बदलावों को करीब से देख रहा हूँ,’दोटूक जवाब देते हैं ज़ैगम इमाम।