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Tuesday, October 16, 2018

सिनेमालोक : लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे

सिनेमालोक
लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे
-अजय ब्रह्मात्मज
देश के विभाजन के बाद लाहौर के दो प्राण वहां से निकले – प्राण सिकंद और प्राण नेविले. प्राण सिकंद मुंबई आये.उन्होंने लाहौर में ही एक्टिंग आरम्भ कर दी थी. मुंबई आने के बाद वे प्राण के नाम से मशहूर हुए.पहले खलनायक और फिर चरित्र भिनेता के तौर पर अपनी अदाकारी से उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. दूसरे प्राण दिल्ली में रुके. उन्होंने भारतीय विदेश सेवा की नौकरी की.कला,संगीत और फिल्मों में उनकी खास रूचि रही.उन्होंने लाहौर की यादों को सह्ब्दों में लिखा और भारतीय संगीत में ठुमरी और फ़िल्मी संगीत पर अनेक निबन्ध और पुस्तकें लिखीं. उन्हें के एल सहगल खास पसंद रहे.उन्होंने के एल सहगल मेमोरियल सर्किल की स्थापना की और सहगल की यादों और संगीत को जोंदा रखा. उन्होंने भारत सरकार की मदद से सहगल की जन्म शताब्दी पर खास आयोजन किया और उनके ऊपर एक पुस्तक भी लिखी.
पिछले गुरुवार को दिल्ली में उनका निधन हुआ.उनके निधन की ख़बरें अख़बारों की सुर्खिउयाँ नहीं बन पायीं.हम नेताओं,अभिनेताओं और खिलाडियों की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं.हमें अपने समाज के साहित्यकारों,कलाकारों और इतिहासकारों की सुधि नहीं रहती.हम उनके बारे में बेखबर रहते हैं.प्राण नेविले भारत सर्कार की विदेश सेवा से मुक्त होने के पहले से कला और संगीत के अध्ययन और दस्तावेजीकरण में व्यस्त रहे.उन्होंने ब्रिटिश राज के दिनों पर गहरा रिसर्च किया था.उनकी पुस्तकों और लेखों में उस ज़माने की कहानियों और घटनाओं का विस्तृत चित्रण हुआ है.कोठेवालियों पर उनकी पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है.नैना देवी और बेगम अख्तर के मुरीद प्राण नेविले ने दोनों प्रतिभाओं पर मन से लिखा है.
प्राण नेविले से मेरा परिचय लाहौर की वजह से हुआ.नौकरी से मुक्ति और निवृति के बाद मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री पर शोध कर रहा हूँ.मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि विभाजन के पहले फिल्म निर्माण में सक्रिय लाहौर के योगदान का संचयन और उल्लेख नहीं हुआ है.भारतीय इतिहासकारों ने नए देश पाकिस्तान में होने की वजह से लाहौर का उल्लेख ज़रूरी नहीं समझा और पाकिस्तान ने विभाजन के पहले के लाहौर की गतिविधियों को पाकिस्तानी सिनेमा से बहार रखा.जाहिर तौर पर पाकिस्तान का सिनेमा 1947 के बाद आरम्भ होता है.भारतीय और हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस लुप्त कड़ी पर ध्यान देने की ज़रुरत है.शोध के सिलसिले में ही मुझे प्राण नेविले की पुस्तक लाहोर – ए सेंटीमेंटल जर्नी की जानकारी मिली.इस पुस्तक के कई चैप्टर में उन्होंने आज़ादी के पहले के लाहौरी सिनेमा के बारे में लिखा है. इसके साथ लाहौर के रोज़मर्रा ज़िन्दगी को भी उन्होंने अपने संस्मरणों में याद किया है.
पिछले दिनों लाहौर फिल्म इंडस्ट्री के अध्ययन और शोध के सिलसिले में दिल्ली में उनसे मुलाक़ात का अवसर मिला.मेरी सोच रही है कि वयोवृद्ध चिंतकों को तंग नहीं किया जाना चाहिए.इसी संकोच में उनका संपर्क मिल जाने पर भी मैंने उनसे बात नहीं की.फिर लगा कि पता नहीं आज़ादी और विभाजन के पहले के लाहौर की धडकनों को महसूस किये किसी और शख्स से मेरी कब मुलाक़ात होगी?मैंने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो वे सहज ही तैयार हो गए.उन्होंने २८ अप्रैल २०१८ को 11 बजे का समय दिया. मैं आदतन समय से पहले पहुँच गया,लेकिन वे ठीक 11 बजे ही मिले.खूब साडी बातें हुईं.उनकी बातचीत से लाहौर और वहां की फिल्म इंडस्ट्री को समझने की अंतर्दृष्टि मिली.उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेंट में दीं.वे चाहते थे कि उनकी पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित होकर हिंदी पाठकों के बीच पहुंचे.एक प्रकाशन के संपादक आश्वासन देकर निष्क्रिय हो गए.प्राण साहेब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना चाहते थे.एक दैनिक अख़बार के फीचर प्रभारी ने सूफी संगीत पर लिखे उनके शोधपूर्ण लेक को छपने का आश्वासन दिया था.वह लेख उनके जीते जी नहीं छप पाया.
तय था कि हम फिर मिलेंगे.उन्होंने मेरे काम में रूचि दिखाई थी और हर प्रकार की मदद का वादा किया था.वे चाहते थे कि मैं जल्दी से अपना काम पूरा करूं और उन्हें दिखाऊँ.मेरा शोध अब उन जैसे लाहौरियों के लिए समर्पित होगा.

Wednesday, October 10, 2018

सिनेमालोक : यौन शोषण के और किस्से आएंगे सामने


सिनेमालोक
और किस्से आएंगे सामने
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता-नाना पाटेकर प्रसंग के किसी निदान और निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले विकास बहल का मामला सामने आ गया है. उसके बाद से कुछ और नाम आये हैं.कुछ ने तो आरोप लगने की आशंका में माफ़ी मंगनी शुरू कर दी है.अगर प्रशासन ने इस मामले को उचित तरीके से सुलझाया तो यकीं करें सकदों मामले उजागर होंगे.अनेक चेहरे बेनकाब होंगे.स्त्रियों को लेकर बढ़ रही बदनीयती की सडांध कम होगी. पिछले पच्चीस सालों के अनुभव पर यही कहना चाहूँगा की भारतीय समाज की तरह फिल्म जगत में भी औरतों के प्रति पुरुषों का रवैया सम्मानजनक नहीं है.उन्हें दफ्तर,स्टूडियो औए सेट पर तमाम सावधानी के बावजूद शर्मनाक और अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है.
सोमवार की ख़बरों के मुताबिक मुंबई पुलिस ने तनुश्री दत्ता के एफ़आईआर पर कार्रर्वाई शुरू कर दी है. गृह राज्य मंत्री दीपक केसरकर ने अस्वासन दिया था कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत दर्ज करती हैं तो मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होगी.उम्मीद की जाती है कि मुंबई पुलिस तत्परता से जांच कर जल्दी ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी.मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोसन और उत्पीडन की बातें और शिकायतें तो चलती रहती हैं,लेकिन पहली बार मामला इतना उभर कर सामने आया है.तनुश्री दत्त के मुताबिक 2008 में 26 मार्च को एक डांस सीक्वेंस की शूटिंग के समय नाना पाटेकर ने उनके साथ अवांछित दुर्व्यवहार किया.तनुश्री दत्त ने 2008 में भी इस मेल को उठाया था,लेकिन फिल्म बॉडी और पुलिस विभाग की तरफ से उन्हें राहत नहीं मिल सकी थीं.स्थितियां ऐसी बनीं कि तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री ही छोड़नी पड़ी.दास सालों के बाद उन्होंने ने इस मेल को उठा तो उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया का भरपूर सपोर्ट मिला.मिडिया  ने हर सेलेब्रिटी से सार्वजानिक मंच पर इस प्रसंग में उनसे सवाल पूछे.कुछ उदासीन रहे और सवाल को टाल गए,लेकिन ज्यादातर फ़िल्मी हस्तियों ने सपोर्ट किया.इस वजह से दबाव बढ़ा है.
इस बीच विकास बहल का मामला भी सामने आया है.विकास बहल फैंटम के चार निदेशकों में से एक थे.फिल्मों की यह प्रोडक्शन कंपनी हफिंगटन पोस्ट में आई खबर के बाद रातोंरात डिजोल्व कर दि गयी.अब इस कंपनी के निदेशक अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी अफ़सोस जाहिर कर रहे हैं.अपनी भूल स्वीकार कर रहे हैं.अपने आप में यह स्वीकृति उनके अच्छे रवैये को व्यक्त करती है,लेकिन यह किसी परिणाम तक नहीं पहुँचती. इधर कंगना रनोट ने ‘क्वीन की शूटिंग के समय का हवाला देकर विशाल के व्यवहार पर सवाल खड़े करते हुए उसे यौन उत्पीडन से जोड़ दिया है.कुछ लोगों को लग रहा है कि अभी विकास बहल पर मौका देख कर चौतरफा आक्रमण हो रहा है.आरोप लग रहे हैं.इस तरह के विवादों में हमेशा कुछ लोग बेवजह ‘यह भी सच,वह भी सच’ का रवैया अपनाते हैं.वे न्याय की बात करते हुए भी अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं मिलते.दूसरे दशकों से यही देखा जा रहा की हर विवाद पर कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद ये किस्से कानाफूसियों तक रह जाते हैं.
माना और बताया जा रहा है की हालीवुड के ‘मी टू के प्रभाव में भारत की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह चेतना जगी और बढ़ी है.लड़कियां खुल कर उल्लेख कर रही हैं.भारतीय समाज महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने और उनकी बात सुनने के मामले में अभी बहुत पीछे है.सबसे पहले तो उनकी शिकायत को छुपाने-दबाने की बात की जाती है.बदनामी का खौफ दिखाया जाता है.कहीं न कहीं यह धरना घर कर चुकी है कि कोई भी परिणाम नहीं निकलता.हिंदी फिल्म इन्दुस्त्री में आवाज़ उठाने वाली लड़कियों को धीरे से किनारे कर दिया जाता है.उन्हें काम मिलना बंद हो जाता है.नतीजतन महिलाएं दशकों से ख़ामोशी की साजिश की शिकार होती रहती हैं.हर दशक में ऐसे किस्से मिलेंगे,जिनमें किसी निर्माता,निर्देशक या को-स्टार ने नयी अभिनेत्रियों के शोषण की कोशिश की है.कुछ अभिनेत्रियों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे हादसों के संकेत दिए हैं.
वक़्त आ गया है कि हम ऐसी शिकायतों को गॉसिप से अलग कर के देखें.समाज में लड़कियों और फिल्मों में अभिनेत्रियों के प्रति अपना नजरिया बदलें.

Wednesday, October 3, 2018

सिनेमालोक : फ़िल्में और गाँधी जी


सिनेमालोक
 फ़िल्में और गाँधी जी
-अजय ब्रह्मात्मज
आज महात्मा गाँधी का जन्मदिन है. 1869 में आज ही के दिन महत्मा गाँधी का जन्म पोरबंदर गुजरात में हुआ था.मोहनदास करमचंद गाँधी को उनके जीवन कल में ही महत्मा और बापू संबोधन मिल चूका था. बाद में वे राष्ट्रपिता संबोधन से भी विभूषित हुए. अनेक समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों का मनना है कि गौतम बुद्ध की तरह ही महात्मा गाँधी के नाम और काम की चर्चा अनेक सदियों तक चलती रहेगी. गाँधी दर्शन की नई टीकाएँ और व्याख्याएं होती रहेंगी. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
महात्मा गाँधी ने अपने समय के तमाम मुद्दों को समझा और निजी अनुभवों और ज्ञान से उन पर टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं दीं. बस,इस तथ्य पर ताज्जुब होता है कि उन्होंने अपने जीवन कल में पापुलर हो रहे मनोरंजन के माध्यम सिनेमा के प्रति उदासी बरती. उनसे कभी कोई आग्रह किया गया तो उन्होंने टिपण्णी करने तक से इंकार कर दिया. क्या इसकी वजह सिर्फ इतनी रही होगी कि आधुनिक तकनीकों के प्रति वे कम उदार थे. इन पूंजीवादी आविष्कारों के प्रभाव और महत्व को समझ नहीं पाए. यह भी हो सकता है कि सिनेमा उनकी सोच और सामाजिकता में प्राथमिकता नहीं रखता हो. सच्चाई यही है कि उन्होंने सिनेमा के प्रति हमेश बेरुखी जताई. उसके भविष्य के प्रति आशंका भी जाहिर की. उन्हें फ़िल्में देखने का शौक नहीं रहा. फ़िल्मी हस्तियों से उनका मिलना-जुलना नहीं होता था. केवल चार्ली चैप्लिन के साथ उनकी एक तस्वीर कभी-कभार दिखाई पड़ जाती है.
सन्‌ 1927 में इंडियन सिनैमेटोग्राफ कमेटी ने उनकी राय जानने के लिए एक प्रश्नावली भेजी तो गाँधी जी ने उसका नकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने जवाब में लिखा, 'मैं आपकी प्रश्नावली के उत्तर के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति हूं। मैंने कभी कोई सिनेमा नहीं देखा और मैं इसके प्रभाव से अनभिज्ञ हूं। अगर इस माध्यम में कोई अच्छाई है तो वह अभी सिद्घ होना बाकी है।' गाँधी जी ने बाद में भी सिनेमा की अनभिज्ञता ख़त्म नहीं की. उनकी राजनीतिक सक्रियता बढती गयी.कुछ सालों के बाद भारतीय सिनेमा की रजत जयंती के मौके पर एक स्मारिका के लिए उनसे सन्देश माँगा गया तो उनके सचिव ने जवाब दिया, 'नियमत: गांधी केवल विशेष अवसरों पर संदेश देते हैं और वह भी ऐसे उद्देश्यों के लिए जिनके गुणों पर कोई संदेह न हो। सिनेमा इंडस्ट्री की बात करें तो इसमें उनकी न्यूनतम रुचि है और इस संदर्भ में किसी को उनसे सराहना की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।' अपनी पत्रिका 'हरिजन' में एक संदर्भ में उन्हों स्पष्ट लिखा, 'मैं तो कहूंगा कि सिनेमा फिल्म ज्यादातर बुरे होते हैं।'
सिनेमा के प्रति गांधी जी के कट्टर विरोधी विचारों को देखते हुए ही ख्वाजा अहमद अब्‌बास ने उन्हें एक कुला पत्र भेजा.इस पत्र के जरिए अब्बास ने गांधी जी से फिल्म माध्यम के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने की अपील की थी। अब्बास  के पत्र का अंश है - 'आज मैं आपकी परख और अनुमोदन के लिए अपनी पीढ़ी के हाथ लगे खिलौने - सिनेमा को रखना चाहता हूं। आप सिनेमा को जुआ, सट्‌टा और घुड़दौड़ जैसी बुराई मानते हैं। अगर यह बयान किसी और ने दिया होता, तो हमें कोई चिंता नहीं होती...लेकिन आपका मामला अलग है। इस देश में या यों कहें कि पूरे विश्व में आपको जो प्रतिष्ठा मिली हुई है, उस संदर्भ में आपकी राय से निकली छोटी टिप्पणी का भी लाखों जनों के लिए बड़ा महत्व है। दुनिया के एक सबसे उपयोगी आविष्कार को ठुकराया या इसे चरित्रहीन लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। बापू, आप महान आत्मा हैं। आपके हृदय में पूर्वाग्रह के लिए स्थान नहीं है। हमारे इस छोटे खिलौने सिनेमा पर ध्यान दें। यह उतना अनुपयोगी नहीं है, जितना दिखता है। इसे आपका ध्यान, आर्शीवाद और सहिष्णु मुस्कान चाहिए।'
ख्वाजा अहमद अबबास के इस निवेदन पर गांधी जी की प्रतिक्रिया नहीं मिलती। अगर वह आजादी के बाद के वर्षों में जीवित रहते और फिल्मों के प्रभाव को करीब से देख पाते तो निश्चित ही अपनी राय बदलते,क्योंकि गांधीजी अपने विचारों में कट्‌टरपंथी नहीं थे और दूसरों से सीखने-समझने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
भारतीय समाज और विश्व इतिहास में महात्मा गांधी के महत्व के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। गांधी के सिद्घांतों ने पूरी मानवता को प्रभावित किया है। बीसवीं सदी के दो विश्व युद्घों की विभीषिका के बीच अपने अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह से उन्होंने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। भारतीय मानस में गांधी अचेतन रूप से मौजूद हैं। लाख कोशिशों के बावजूद उनके प्रभाव को नकार नहीं जा सकता. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
सिनेमा और खास कर हिंदी फिल्मों में हम गांधी दर्शन से कभी ‘गांधीगिरी’(लगे रहो मुन्नाभाई) तो कभी किसी और नाम से प्रेरित और प्रभावित चरित्रों को देखते रहेंगे.  



Tuesday, September 18, 2018

सिनेमालोक : भट्ट साहब की संगत

सिनेमालोक

भट्ट साहब की संगत
( महेश भट्ट की 70 वें जन्मदिन पर खास)
-अजय ब्रह्मात्मज
कुछ सालों पहले तक महेश भट्ट से हफ्ते में दो बार बातें और महीने में दो बार मुलाकातें हो जाती थीं.आते-जाते उनके दफ्तर के पास से गुजरते समय कभी अचानक चले जाओ तो बेरोक उनके कमरे में जाने की छूट थी. यह छूट उन्होंने ने ही दी थी. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बात-व्यवहार को समझने की समझदारी उनसे मिली है.उनके अलावा श्याम बेनेगल ने मेरी फिल्म पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में अंतदृष्टि दी. फिलहाल महेश भट्ट की संगत के बारे में.इसी हफ्ते गुरुवार 20 सितम्बर को उनका 70 वां जन्मदिन है.
भट्ट साहब से मिलना तो 1982(अर्थ) और 1984(सारांश) में ही हो गया था. दिल्ली में रहने के दिनों में इन फिल्मों की संवेदना ने प्रभावित किया था.समानांतर सिनेमा की दो सक्षम अभिनेत्रियों(शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल) की यह फिल्म वैवाहिक रिश्ते में स्त्री पक्ष को दृढ़ता से रखती है.घर छोड़ते समय पूजा का जवाब ऐसे रिश्तों को झेल रही तमाम औरतों को नैतिक ताकत दे गया था.इस एक फिल्म ने शबाना आज़मी को समकालीन अभिनेत्रियों में अजग जगह दिला दी थी.कई बार फिल्म के किरदार अभिनेता-अभिनेत्रियों के व्यक्तित्व को नै छवि दे देते हैं. फिर भट्ट साहब कीसारांश' ने संवेदना और सहानुभूति के स्तर पर बी वी प्रधान की पीड़ा ने हिला दिया था.एक निर्देशक से यह दर्शक का परिचय था.
संयोग कुछ ऐसा बना कि मुंबई आना हुआ.यहां फिल्म पत्रकारिता से जुड़ने का वासर मिला. अध्ययन और शोध में रूचि होने से फिल्मों की ऐतिहासिक और सामाजिक और राजनीतिक आयामों पर विचार करने की आदत पड़ी.भट्ट साहब से दो-चार सामान्य मुलाकातें हो चुकी थीं.तभी भोपाल में आयोजित एक सेमिनार में भट्ट साहब के साथ मंच शेयर करने का मौका मिला.साम्प्रदायिकता के सवालों पर केन्द्रित उस सेमिनार में मैंने महेश भट्ट की विवादित और पुरस्कृत फिल्म  ‘ज़ख्म' के हवाले से कुछ बातें की थीं.सेमिनार में मौजूद श्रोताओं और मित्रों को आश्चर्य हुआ था की कैसे कोई भट्ट साहब की आलोचना उनके सामने कर सकता है.दूसरों की सोच से लग भट्ट साहब ने हाथ मिलाने के साथ आदतन गले से लगा लिया था.
उन दिनों मैं मुंबई में दैनिक जागरण का फिल्म प्रभारी था.फिल्म पत्रकारिता के पहलुओं को समझते हुए प्रयोग कर रहा था.मुंबई पहुँचने के दो दिनों के अन्दर ही भट्ट साहब के पीआरओ का फ़ोन आया कि भट्ट साहब तुम से मिलना चाहते हैं.इस सन्देश के साथ उसने मुझ से पूछा कि तुम ने भोपाल में ऐसा क्या बोल दिया कि वे तुम से प्रभावित हैं.आकर मिलो...तय समय पर मुलाक़ात हुई.भट्ट साहब ने फिर से गले लगाया और कहा कि फिल्म पत्रकारिता में आप जैसी सोच के पत्रकारों को अधिक सक्रिय होना चाहिए.आप मुझ से मिलते रहें.अमूमन ऐसी भिडंत के बाद फिल्मी हस्तियाँ नाराज़ हो जाती हैं और नज़रन्दाज करती हैं और यहाँ भट्ट साहब खुद ही संगत का न्योता दे रहे थे.मुझे अपनी नज़र में रख रहे थे.उसके बाद मुलाकातें बढीं और फिर एक समय आया कि उनके साथ काम करने का मौका मिला.
भट्ट साहब की संगत हमेशा प्रेरक रही.मैंने उन्हें कभी निराश और हताश नहीं देखा.कई बार नाउम्मीदी से घिरने पर उनसे संबल मिलता रहा है.रिश्तों की उलझनों की ऐसी बारीक समझ कम निर्देशकों और व्यक्तियों में मिलती है.उनकी साफगोई के पीछे अनुभवों का पुलिंदा है.फिल्मों से अलग उनका एक सांस्कृतिक और दार्शनिक व्यक्तित्व है.वे घनघोर किस्म से राजनीतिक और साम्प्रदायिकता विरोधी व्यक्ति हैं.कुछ साल पहले तक वे हर विषय और मुद्दे पर बोलने के लिए तैयार मिलते थे.अभी उन्होंने खुद को सीमित कर लिया है.कुछ तो उम्र और कुछ देश का महौल ऐसा है कि विवेकी जन भी ख़ामोशी इख़्तियार कर रहे हैं.
70 वें जन्मदिवस पर भट्ट साहब को हार्दिक बधाई.


Tuesday, September 4, 2018

सिनेमालोक : पलटन की पृष्ठभूमि


सिनेमालोक

पलटन की पृष्ठभूमि
-अजय ब्रह्मात्मज
 इस हफ्ते जेपी दत्ता कीपलटनरिलीज होगी. उनकी पिछड़ी युद्ध फिल्मबॉर्डर’  और  एलओसी कारगिलकी तरह यह भी युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी हुई फिल्म है.बॉर्डर  और एलओसी कारगिल क्रमश: 1965 और 1999 में पाकिस्तान से हुए युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में थीं.पलटनकी पृष्ठभूमि चीन के साथ 1967 में हुई झडप है. इस बार जेपी दत्ता भारत के पश्चिमी सीमांत से निकलकर पूर्वी सीमांत पर डटे हैं.उन्होंने छह सालों के अंतराल पर पिछले दोनों युद्ध फिल्में बना ली थीं.पलटनपंद्रह  सालों के बाद आ रही है.
1962 में हिंदी चीनी भाई-भाई के दौर में चीन के आकस्मिक आक्रमण से देश चौंक गया था. पर्याप्त तैयारी नहीं होने से उस युद्ध में भारत की हार हुई थी.  पंचशील के प्रवर्तक और चीन के मित्र भारतीय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को भारी सदमा लगा था. हम सभी भारतीय इस तथ्य को नहीं भूल पाए हैं कि चीन ने भारत के पीठ में छुरा घोंप दिया था. उसे युद्ध में जानमाल के नुकसान के साथ देश का मनोबल टूटा था. कहते हैं नेहरु उस सदमे से कभी नहीं निकल पाए.उस युद्ध से देश ने सबक भी लिया था.
भारत  ने पूर्वी सीमांत पर सेनाओं के चौकसी बढ़ा दी थी. हथियारों से लैस करने के साथ उन्हें किसी भी संभावित युद्ध से निबटने की ट्रेनिंग मिल चुकी थी. यही वजह है कि 5 सालों के बाद 1967 के सितंबर  महीने में जब चीन ने घुसपैठ की भारतीय सैनिकों ने मुंह तोड़ पलटवार किया. उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया. 11 सितंबर 1967 को चीन में नाथुला इलाके में उपद्रव किया था. इसकी भूमिका 5-6 महीने पहले से बन रही थी. भारत बार-बार चीन को आगाह कर रहा था,लेकिन चीन 1962 की जीत के मद में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. उल्टा पत्र लिखकर 1962 की याद दिलाते हुए धमकी दे रहा था कि भारत को सावधान रहना चाहिए.
इस बार भारत ने नाथूला में चीन को अपनी मनमानी नहीं करने दी.चार दिनों में ही भारत के वीर सैनिकों ने चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया और नाथूला में भारतीय झंडा फहराया. इस झड़प में चीन के सैकड़ों सैनिकों की जानें गई. आहत चीन ने अगले महीने ही स्थान बदल कर चो ला  में घुसपैठ की. यहाँ भी भारतीय सैनिकों ने उन्हें धूल चटाई. इन झड़पों में भारतीय सेना के शौर्य गाथा के बारे में आम भारतीय अधिक नहीं जानते. जेपी दत्ता कीपलटनइन झड़पों में भारत के युद्ध नीति, कौशल और विजय की रोमांचक कहानी पर्दे पर चित्रित करेंगी. अपनी पुरानी फिल्मों की तरह जेपी दत्ता ने युद्ध के चित्रण को वास्तविक रंग दिया है. सीजी और वीएफक्स की तकनीकी मदद से फिल्म का प्रभाव बढ़ाने में सुविधा मिली है.
जे पी दत्ता की पिछली दोनों युद्ध फिल्मों में उस समय के पॉपुलर स्टार थे. उनकी वजह से फिल्म का आकर्षण थोड़ा ज़्यादा था. इस बार अपेक्षाकृत कम पॉपुलर स्टारों के साथ उन्होंने यह फिल्म बनाई है. फिल्म की बहुत अधिक चर्चा और प्रचार नहीं है. पिच्च्ली दोनों फिल्मों की जबरदस्त कामयाबी और जेपी दत्ता का नाम ही मुख्य आकर्षण है. हिंदी में युद्ध फिल्में बनाने में जेपी दत्ता का सानी नहीं है. पहले भी वह इसे साबित कर चुके हैं.
1967 में 11 सितंबर को नाथूला की घटना घटी थी. 51 सालों के बाद 7 सितंबर 2018 को यह फिल्म रिलीज हो रही है. पडोसी देशों के बीच युद्ध न होना अच्छी स्थिति है, लेकिन हो चुके युद्ध को सिनेमा के पर्दे तक ले आना भी एक जरूरी काम है.


Tuesday, August 28, 2018

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों के दर्शक

सिनेमालोक

हिंदी फिल्मों के दर्शक
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले 6 सालों में दिल्ली और हिंदी प्रदेशों मैं हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है. इस बढ़त के बावजूद अभी तक हिंदी फिल्मों की कमाई  में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है. ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल मुंबई की हिस्सेदारी 31.37 प्रतिशत रही है.2012 में मुंबई की हिस्सेदारी 36.28 प्रतिशत थी. लगभग 5 प्रतिशत  की कमी शिफ्ट होकर दिल्ली और दूसरी टेरिटरी में चली गई है. कारोबार के हिसाब सेभारत में 13 टेरिटरी की गणना होती है. दशकों से ऐसा ही चला रहा है. इनके नए नामकरण और क्षेत्रों के विभाजन पर कभी सोचा नहीं गया.  मसलन अभी भी सीपी, ईस्ट पंजाब और निजाम जैसी टेरिटरी चलती हैं. राज्यों के पुनर्गठन के बाद इनमें से कई टेरिटरी एक से अधिक राज्यों में फैली है. पारंपरिक रूप से दिल्ली और यूपी एक ही टेरिटरी मानी जाती है.
हिंदी प्रदेशों के हिंदी भाषी दर्शक इस भ्रमित गर्व में रहते हैं हिंदी फिल्में उनकी वजह से ही चलती हैं. सच्चाई यह है राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को मिलाने के बावजूद फिल्मों की कुल कमाई में हिंदी प्रदेशों का प्रतिशत 25 से अधिक नहीं होता. बिहार-झारखंड का ही उदाहरण लें तो इस साल बढ़त के बावजूद उनका योगदान 2.9 प्रतिशत है. मैसूर,ईस्ट पंजाब और वेस्ट बंगाल का योगदान 5 प्रतिशत से अधिक ही है. हिंदीभाषी दर्शकों को निराधार इतराने से निकलना चाहिए. कोशिश होनी चाहिए कि वे थियेटर में जाकर फिल्में देखें. जाहिर सी बात है कि हिंदी प्रदेशों में ज्यों-ज्यों  मल्टीप्लेक्स बढ़ेंगे त्यों-त्यों दशकों में इजाफा होगा.
पिछले 6 सालों में मुंबई समेत सीआई, राजस्थान, निजाम और उड़ीसा में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है, जबकि दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब,सीपी, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, आसाम और टीएनके में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.यह परिवर्तन शुभ है. दर्शकों की तादाद फिल्मों के विषय तय करती है. गौर करें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियां मुम्बई से निकल कर देश के अंदरूनी इलाकों में जा रही हैं. निश्चित ही हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शक हैं. यह स्वाभाविक है. दिक्कत यह है कि इन दर्शकों में से अधिकांश सिनेमाघरों में जाकर फिल्में नहीं देखते.इसके कई कारण हैं. सिनेमाघर लगातार टूट और बंद हो रहे हैं.कस्बों के सिनेमाघरों पर ताले लग रहे हैं.पहले रिपीट या देर से रिलीज की सुविधा होने से छोटे सिनेमाघरों में भी फिल्में आ जाती थीं. अब नई से नई फिल्म रिलीज के दिन ही देश-विदेश में पहुंच जाती हैं.रिलीज के वीकेंड ।इन ही दर्शक फिल्में देखना चाहते हैं. सिनेमाघर न होने से वंचित दर्शक दूसरे प्लेटफार्म पर फिल्में देख लेते हैं. मुम्बई के निर्माताओं को यकीन नहीं होगा,लेकिन यही कड़वा तथ्य है कि दर्शक स्मार्टफोन पर उनकी ताज़ा फिल्में देख रहे हैं.
दर्शकों की प्राथमिकताओं का खयाल रखते हुए निर्माताआ,वितरक और प्रदर्शकों को युक्ति निकालनी पड़ेगी. मोबाइल नेटवर्क,डाटा डिस्ट्रीब्यूटर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से वे दर्शकों तक पहुंच कर खो रहे रेवेन्यू को हासिल कर सकते हैं. छोटे और स्मार्ट सिनेमाघरों के निर्माण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. काम सीटों और आधुनिक सुविधाओं से लैस सिनेमाघर हों. स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों के बाहर के शहरों-कस्बों में सिनेमाघर बनाने में प्रशासन और स्थानीय व्यापारियों का ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मौजूद मल्टीप्लेक्स में टिकट दर भी कम करना होगा.

Tuesday, August 21, 2018

सिनेमालोक : निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका


सिनेमालोक

 निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका

-अजय ब्रह्मात्मज

 अमेरिका के गायक निक जोनस और अमेरिका में नाम कमा रही भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा का अभीरोकाहुआ है. शादी अभी दूर है. दोनों में से किसी नेअभी तक इसका संकेत नहीं दिया है.रोका’(मंगनी) हुआ है तो देर-सवेर शादी भी होगी. दोनों सेलिब्रिटी हैं. उनके सामने उनका भविष्य और कैरियर हैं. जाहिर सी बात है कि फुरसत पर सुविधा होने पर दोनों परिणय सूत्र में बंध जाएंगे. अभी कहना मुश्किल है कि शादी के बाद उनका आशियाना भारत में होगा या अमेरिका में? किसी भी देश को वे अपना स्थायी ठिकाना बनाएं. इतना तय है कि दोनों में से कोई भी कैरियर से संन्यास नहीं लेगा.दोनों एक-दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखते हुए परस्पर मदद ही करेंगे.
निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा के साथ होने से दोनों के परिजन और प्रशंसक खुश हैं. परिजनों को तो मालूम रहा होगा लेकिन प्रशंसकों के लिए इतनी जल्दबाजी में सब कुछ हो जाना हैरानी की बात है. अमूमन सेलिब्रिटी शादी जैसे बड़े फैसले में वक्त लगाते हैं. ज्यादा उन्हें अपने कैरियर का ख्याल रहता है. भारत में खुद को स्थापित करने के बाद प्रियंका चोपड़ा ने अमेरिका के टीवी और फिल्म जगत में भी जोरदार दस्तक दी है. वहां उन्हें अभी और भी मंजिलें तय करनी है .वह भारत मैं हिंदी फिल्म भी कर रही हैं. उन्होंने अपने समय और फोकस को बहुत अच्छी तरह दोनों महाद्वीपों में बांट रखा है. दूसरी तरफ निक जोनस अभी अपने करियर की चढ़ाई पर हैं. उन्हें कामयाबी के अनेक पायदान चढ़ना है.इस पृष्ठभूमि में दोनों को बहुत सोच-समझकर अपने कदम उठाने होंगे. दोनों कामयाब होने के साथ इतने समझदार हैं कि वे अपने भविष्य विवाह को लेकर उचित निर्णय ले सकें.
 प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस  की उम्र में 11 साल का फर्क है. प्रेम और विवाह में ऐसे फर्क सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. फिल्म  बिरादरी में अनेक जोड़ियों के बीच उम्र का यह फासला रहा है. दिलीप कुमार और सायरा बानो की उम्र में 22 सालों का अंतर है. असल चीज होती है मोहब्बत और समझदारी.  बाकी उम्र तो एक अंक मात्र है. फिर भी उन दोनों के बीच से उम्र का यह अंतर और पूर्व एवं पश्चिम से होने की वास्तविकता से उनके प्रशंसक आशंकित हैं.रोकाके दिन ही उनके घोर प्रशंसक  पत्रकार ने चिंता व्यक्त की,’ क्या लगता है? दोनों की शादी चल पाएगी?’ मैंने उनकी चिंता की वजह पूछी. उनके पास कोई ठोस आधार नहीं था फिर भी वे  उन आशंकित प्रशंसकों की चिंता ही जाहिर कर रहे थे,जिन्हें लगता है कि निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा की शादी टिकने वाली नहीं है.
आज मिलेनियल पीढ़ी के इस दौर में रिश्ते स्थायी होने के पहले ही दरकने लगते हैं. ऐसा माना और कहा जाता है कि नई पीढ़ी त्याग और जिम्मेदारियों से भागती है. दबाव पड़ने पर वे एक-दूसरे का सहारा बनने के बजाय पहले मौके पर कन्नी काट लेते हैं. पिछली और पुरानी पीढ़ी ने मिलेनियल पीढ़ी के बारे में गलत धारणाएं बना रखी हैं. पीढ़ियों के अंतर के बीच पल रही ऐसी गलतफहमियां नई नहीं है. फिल्मों से ही उदाहरण लें अतीत में अनेक अभिनेत्रियों ने विदेशियों से शादी की और आज सुखी दांपत्य जीवन जी रही हैं. प्रीति जिंटा,सेलिना जेटली,श्रिया सरन और राधिका आप्टे का उदाहरण मौजूद है. प्रियंका चोपड़ा बुद्धिमान है.  खुद निक जोनस उनकी बुद्धिमत्ता के कायल हैं. हम आशंकाओं को किनारे रख कर हम तो यही चाहेंगे दोनों सुखी और संपन्न रहें.


Tuesday, August 14, 2018

सिनेमालोक : इस 15 अगस्त को

सिनेमालोक

 इस 15 अगस्त को 

-अजय ब्रह्मात्मज

कल 15 अगस्त है. दिन बुधवार... बुधवार होने के बावजूद दो फिल्में रिलीज हो रही हैं. अमूमन हिंदी फिल्में शुक्रवार को रिलीज होती हैं, लेकिन इस बार दोनों फिल्मों के निर्माताओं ने जिद किया कि वे दो दिन पहले ही अपनी फिल्में लेकर आएंगे. रिलीज की तारीख को लेकर वे टस से मस ना हुए. दोनों 15 अगस्त की छुट्टी का लाभ उठाना चाहते हैं. इस तरह उन्हें पांच दिनों का वीकेंड मिल जाएगा. इन दिनों शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों के बारे में रविवार इन दिनों में पता चल जाता है एक ऐसा व्यवसाय करेगी?  इस बार परीक्षा के लिए दोनों फिल्मों को पांच दिनों का समय मिल जाएगा.देखना रोचक होगा इन दोनों फिल्मों को दर्शक क्या प्रतिसाद देते हैं? रीमा कागटी कीगोल्डऔर मिलाप मिलन झावेरी की फिल्मसत्यमेव जयतेआमने-सामने होंगी.

पहली फिल्मगोल्डकी पृष्ठभूमि में हॉकी है. हॉकी खिलाड़ी तपन दास के नेतृत्व में 1948 में भारत ने पहला गोल्ड जीता था. पिछले रविवार को इस उपलब्धि के 70 साल होने पर देश के सात स्थापत्यों और जगहों को सुनहरी रोशनी से आलोकित किया गया था.रीमा कागटी ने सच्ची घटना पर इस फिल्म की कहानी लिखी है. कहते हैं तपन दास के बारह सालों के अथक प्रयासों से यह मुमकिन हो पाया था. आजाद भारत में इंग्लैंड की धरती पर देश का पहला गोल्ड मेडल जीता था. राष्ट्र गौरव के क्षण को हाईलाइट करने के साथ ही जीत के संघर्ष और तैयारी पर भी रीमा ध्यान देंगी. विजेता टीम बनाना उसमें जीत का जोश भरना आसान काम नहीं रहा होगा. अक्षय कुमार इस फिल्म में तपन दास की भूमिका निभा रहे हैं.  उनकी टीम में विनीत कुमार सिंह, कुणाल कपूर, अमित साध  और सनी कौशल जैसे कलाकार हैं.

 ‘गोल्डके सामनेसत्यमेव जयतेरहेगी. मिलाप मिलन झावेरी ने आज के दौर की फिल्म में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है. हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश को ग्रस्त रखा है. सीधा और ईमानदार नागरिक भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसते हैं. देश को आर्थिक नुकसान होता है. प्रगति और विकास की योजनाएं रुक जाती हैं.सत्यमेव जयतेमें  जॉन अब्राहम और मनोज बाजपेयी की टक्कर दिखेगी. पहली बार दोनों कलाकार किसी फिल्म में एक साथ आ रहे हैं. इस फिल्म की कैच लाइन है -  ‘बेईमान पिटेगा, करप्शन मिटेगा’. मनोज बाजपेयी एक बार फिर पुलिस अधिकारी की भूमिका में बहादुरी दिखाएंगे. हाल ही में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न मेंगली गुलियां' फिल्म के लिए  एक्टर अवार्ड मिला है.

गौर करें तो दोनों ही फिल्मों की थीम राष्ट्र और देश प्रेम है. इसी वजह से उनके निर्माताओं ने रिलीज के लिए 15 अगस्त का दिन चुना है. राष्ट्रीय भावना से लबरेज इस दिन को थिएटर जा रहे दर्शकों में यह फिल्में देश प्रेम और राष्ट्रीयता का संचार करेंगी. इन दिनों हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है. फिल्में किसी भी जोनर की हों . लेखक और निर्देशक की कोशिश रहती है कि किसी दृश्य, संवाद या गाने में राष्ट्र से संबंधित कुछ संदेशात्मक बातें हों.यह तरीका बहुतों को पसंद आ रहा है. अक्षय कुमार इस दौर केभारत कुमारबन गए हैं. कवि मनोज कुमार को हम इस नाम से जानते थे.  अक्षय कुमार के ठीक पीछे जॉन अब्राहम खड़े हैं. उन्होंने परमाणु’  में संकेत दिया  कि वे भी अक्षय कुमार के रास्ते पर चल रहे हैं.

देखना रोचक होगा की इस हफ्ते दर्शक किस राष्ट्रप्रेमी को अधिक पसंद करते हैं. दोनों फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों ने प्रचार का हर जोर लगा रखा है. वे दर्शकों को अपनी फिल्मों के लिए लुभा रहे हैं.


Wednesday, August 1, 2018

सिनेमालोक : जब गीतों के बोल बनते हैं मुहावरा

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जब गीतों के बोल बनते हैं मुहावरा

-अजय ब्रह्मात्मज

दस दिनों पहले अतुल मांजरेकर  की फिल्म ‘फन्ने खान' का एक गाना जारी हुआ था.इस सवालिया गाने की पंक्तियाँ हैं,’
खुदा तुम्हें प्रणाम है सादर
पर तूने दी बस एक ही चादर
क्या ओढें क्या बिछायेंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे
दो रोटी और एक लंगोटी
एक लंगोटी और वो भी छोटी
इसमें क्या बदन छुपाएंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे अच्छे दिन कब आयेंगे?
गाना बेहद पोपुलर हुआ.इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया गया.यह देश के निराश नागरिकों का गाना बन गया.’अच्छे दिनों' के वाडे के साथ आई वर्तमान सरकार से लोग इसी गाने के बहाने सवाल करने लगे.सवाल का स्वर सम्मोहिक हुआ तो नुमैन्दों के कान खड़े हुए.कुछ तो हुआ कि जल्दी ही महज दस दिनों में इसी गाने की कुछ और पंक्तिया तैरने लगीं.अब उसी गाने का विस्तार है…
जो चाह था
हो ही गया वो
अब न कोई खुशियाँ रोको
सपनों ने पंख फैलाये रे
मेरे अच्छे दिन हैं आये रे.
ऐसा माना जा रहा है कि निर्माता-निर्देशक पर दबाव पड़ा तो उन्होंने इस गीत को बदल दिया.’अच्छे दिन कब आयेंगे?’ के सवाल को ‘अच्छे दिन आये रे' कर दिया और सपनों के पंख फैलाने की बात कही.निर्देशक अतुल मांजरेकर का बयान आया है कि इस गाने के अकारण राजनीतिकरण से बात बढ़ी और निर्माताओं के पास कॉल आये. किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए गीत का अगला हिस्सा डालना पड़ा.
इरशाद कामिल ने बताया कि मूल रूप में पूरा गाना यूँ ही लिखा गया है.किसी दबाव में पंक्तियाँ नहीं बदली गयी हैं.कुछ गानों में ख़ुशी और ग़म के वर्सन होते हैं,कुछ में आशा-निराशा के.इस गाने में आशा-निराशा को व्यक्त करते शब्द हैं.दोनों वर्सन आगे-पीछे ज़रूर आये हैं.लोगबाग जो मतलब निकाल रहे हैं,वैसा कुछ नहीं हुआ है.’ फिल्मों,फ़िल्मी गानों और संवादों में दर्शक अपनी उम्मीदें,गुस्सा और शिकायतें पा जाते हैं तो वे उसे सराहते हैं और उन्हें अपनी पंक्तिया बना लेते हैं.यह किसी गीतकार और संवाद लेखक की अप्रतिम सफलता होती है कि उसके बोल और संवाद मुहावरे बन जाएँ.इरशाद कामिल के गीतों में यह प्रभाव मिलता है.उनके गीत वर्तमान समय के भाव और मंशा को बहुत खूबसूरती के साथ बगैर आक्रामक हुए व्यक्त करते हैं.इस बार भी ऐसा ही हुआ है.
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस गीत के पहले बोलों ने समाज के नाखुश और निराश नागरिकों को वाणी दी.यही करण है कि वे अपने आम सवालों को इस गीत के बहाने पोस्ट करने लगे.सत्ताधारी शक्तियां हमेशा ऐसे मौकों पर अतिरिक्त तौर पर सावधान रहती हैं.अगर सत्ता निरकुंश हो तो ज्यादा सजग रहती है.वह बवंडर बनने के पहले ही हवा का रुख बदलती है.निश्चित ही निर्माताओं को फ़ोन आये होंगे.हो सकता है,उन्हें आग्रह के अंदाज में आदेश दिया गया हो.निर्माता डरपोक नहीं होते.उन्हें विवाद से संभावित हानि का व्यवसायिक डर रहता है.अगर अभिव्यक्ति का डर रहता तो इस गाने की रिकॉर्डिंग ही नहीं होती.हम जानते हैं कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा साहसी निर्माता-निर्देशक हैं.उनकी ‘रंग दे बसंती’ मिसाल है. लेकिन यह भी सच है कि इन दिनों ढेर सारे लेखक निजी अंकुश के साथ लेखन कर रहे हैं.यह प्री सेंसरशिप है.यह अभिव्यक्ति को सीमित और संकीर्ण कर रही है.
फिलहाल यह तो जाहिर हुआ कि सरकार और सत्ता गीत के बोलों से भी घबराती है.

Tuesday, July 10, 2018

सिनेमालोक : बेहतरीन प्रयास है ‘सेक्रेड गेम्स’


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बेहतरीन प्रयास हैसेक्रेड गेम्स

-अजय ब्रह्मात्मज
अश्वत्थामा,हलाहल,अतापी वतापी,ब्रह्मास्त्र सरम,प्रेतकल्प,रूद्र और ययाति… यह नेटफ्लिक्स पर आरंभ हुए सेक्रेड गेम्स के 8 अध्याय हैं. इन्हें हम 8 एपिसोड के रूप मे देखेंगे.सेक्रेड गेम्स’  विक्रम चंद्रा का उपन्यास है. यह 2006 में प्रकाशित हुआ था. 900 से अधिक पृष्ठों के इस उपन्यास को वरुण ग्रोवर,वसंत नाथ और स्मिता सिंह ने वेब सीरीज के रूप में ढाला है. रूपांतरण की प्रक्रिया लंबी और श्रमसाध्य रही. तीनों लेखकों ने वेब सीरीज के लिए उचित प्रसंगों,किरदारों और विवरणों में काट-छांट की है. कुछ घटाया है तो कुछ जोड़ा भी है. दरअसल, अभिव्यक्ति के दो भिन्न माध्यम होने की वजह से यह रूपांतरण जरूरी हो जाता है. उपन्यास पढ़ते वक्त हम लेखक के विवरणों के आधार पर दृश्य और किरदारों की कल्पना करते हैं. लेखक शब्दों के माध्यम से स्थान,माहौल और चरित्रों का चित्रण करता है. वह पाठक की कल्पना को उड़ान देता है. लेखक और पाठक के बीच कोई तीसरा नहीं होता. इससे भिन्न दृश्य माध्यम में उस उपन्यास को एक लेखक स्क्रिप्ट में बदलता है और फिर निर्देशक अपनी तकनीकी टीम की मदद से स्थिति एवं मनःस्थिति को दृश्य और संवाद में बदलता है. दृश्य माध्यम दर्शकों की कल्पना कतर देता है. दर्शक पर्दे पर सब कुछ देख रहा होता है और संवादों से चरित्रों का व्यवहार समझ रहा होता है.

साहित्य और सिनेमा के जटिल रिश्ते पर बहुत कुछ लिखा गया है. प्रायः सुनाई पड़ता है कि लेखक निर्देशक के काम से असंतुष्ट रहे. कहा जाता है कि दृश्य माध्यम में साहित्य की आत्मा को खो जाती है.सेक्रेड गेम्सउपन्यास पढ़ चुके पाठकों को वेब सीरीज देखते हुए ऐसी दिक्कत हो सकती है. इसके लेखकों और निर्देशकों ने उपयोगिता और सुविधा के अनुसार फेरबदल किए हैं. इस फेरबदल में विक्रम चंद्रा की सहमति रही है, लेकिन पाठक असहमत हो सकते हैं. किसी भी रूपांतरण में माध्यमों की भिन्नता की वजह से स्वभाविक रुप स कुछ चीजें खो या जुड़ जाती हैं. पाठक और दर्शकों के लिए बेहतर तो यही होता है कि हर माध्यम का अलग आनंद लें, क्योंकि रसास्वादन की प्रक्रिया माध्यमों के हिसाब से बदल जाती है. ;सेक्रेड गेम्स; उपन्यास औरसेक्रेड गेम्सवेब सीरीज दो भिन्न सृजनात्मक कृतियां हैं. उपन्यास विक्रम चंद्रा ने लिखा है, जबकि वेब सीरीज के सृजन में लेखकों और निर्देशकों के साथ पूरी तकनीकी टीम रही है. वेब सीरीज उन सभी का सम्मिलित प्रयास है.

विक्रमादित्य मोटवानी और अनुराग कश्यप अलग शैली और सोच के निर्देशक हैं. दोनों के युगल प्रयास और सामंजस्य का खूबसूरत उदाहरण हैसेक्रेड गेम्स. इसके दो मुख्य किरदार हैं - गणेश गायतोंडे और सरताज सिंह. सूचना के मुताबिक गणेश गायतोंडे के ट्रैक का निर्देशन अनुराग कश्यप ने किया है. वह ऐसी कहानियों को पर्दे पर लाने में माहिर हैं. हिंसा,अपराध और अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया रचने में उनका मन रमता है. समाज के वंचित और वर्जित किरदार उन्हें प्रिय रहे हैं. इस सीरीज में उन्होंने जी गैंग के सरगना गणेश गायतोंडे की मानसिकता,चिंता और महत्वकांक्षा पर रोशनी डाली है. वह खतरनाक अपराधी है. दूसरी तरफ ईमानदार पुलिस अधिकारी सरताज सिंह है. गणेश गाय गायतोंडे ने पहले ही एपिसोड में सरताज सिंह को सूचना देने के साथ चुनौती भी दे दी है. पहले तो वह अपने लौटने की सूचना देता है, सरताज सिंह जब तक उसके पास पहुंचे गणेश गायतोंडे खुद को ही गोली मार देता है. मरने से पहले वह सरताज सिंह को बता चुका है कि 25 दिनों में बचा सकते हो तो मुंबई को बचा लो. उसकी यह चेतावनीसेक्रेड गेम्सका रोचक और रोमांचक ड्रामा रचती ह

नेटफ्लिक्स पर ओरिजिनल इंडियन कंटेंट के तौर पर सेक्रेड गेम्स का प्रसारण एक नई शुरुआत है. पहली बार किसी भारतीय शो को एक साथ 100 से अधिक देशों के दर्शक मिले हैं. यह एक बड़ी उपलब्धि है. अभी तक हम दुनिया के शो देखते-सराहते रहे हैं. अब दुनिया भी भारतीय कंटेंट देखेगी. दृश्य माध्यम में काम कर रहे हैं लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों को बड़ा अवसर मिला है.फिलहालसेक्रेड गेम्सदेखें और फिर उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा करें.