Search This Blog

Showing posts with label सिनेमालोक. Show all posts
Showing posts with label सिनेमालोक. Show all posts

Tuesday, May 21, 2019

सिनेमालोक : प्रौढ़ नायक का प्रेम


सिनेमालोक
प्रौढ़ नायक का प्रेम
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में एक्टर की वास्तविक उम्र हमेशा अपने कैरेक्टर से ज्यादा होती हैं. फिल्मों की यह परिपाटी है कि कोई एक्टर नायक की भूमिका में लोकप्रिय और स्वीकृत हो गया तो वह अंत-अंत तक नायक की भूमिका निभाता रहता है...वह भी जवान नायक की भूमिका. दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद के जमाने से ऐसा चला आ रहा है. इनमें से दिलीप कुमार और राज कपूर तो एक उम्र के बाद ठहर गए,लेकिन देवानंद अंतिम सांस तक हीरो ही बने रहे. उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया कि सभी की तरह उनकी उम्र बड़ी है. वह भी उम्रदराज हो गए हैं.
आज के पॉपुलर नायकों में खानत्रयी (आमिर, शाह रुख और सलमान. अभी तक बतौर हीरो ही पर्दे पर नजर आ रहे हैं. उनके ज्यादातर करैक्टर उनकी वास्तविक उम्र से कम होते हैं. आमिर खान ने ‘दंगल’ में खुद से बड़ी उम्र की भूमिका जरूर निभाई, लेकिन विज्ञापन से लेकर फिल्मों तक में भेष और उम्र बदलने का प्रयोग कर वे वास्तविक उम्र को धोखा देते रहते हैं. शाह रुख खान ने ऐसे ही ‘वीर जारा’ में प्रोढ़ छवि पेश की थी. ‘डियर ज़िंदगी’ में वह आलिया भट्ट के साथ अपनी उम्र के किरदार में नजर आए. सलमान खान का शरीर अब इस बात की सहूलियत नहीं देता कि वे 25-30 की उम्र के दिखे. फिर भी वे अपनी उम्र से जवान दिखने का प्रयास करते रहते हैं. ‘भारत’ में वह चार अलग-अलग उम्र की छवियों में दिख रहे हैं. उनके सफ़ेद बालों का ज़िक्र एक संवाद में सुनाई पड़ता है. फिल्म में जवान भारत की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल चुनौती थी. उन्हें अपनी जवानी की फिल्में अंदाज-ओ-बयां के लिए देखनी पड़ी. उल्लेखनीय है कि तीनों खान 54 साल के हो चुके हैं.
इस पृष्ठभूमि में अजय देवगन और तब्बू की तारीफ करनी होगी. तब्बू तो पहले से उमदराज किरदारों की भूमिकायें पूरी संजीदगी से निभा रही हैं. खुद अजय देवगन ने भी पहले मधुर भंडारकर निर्देशित ‘दिल तो बच्चा है जी’ में अपनी उम्र का किरदार निभाया था. इस बार लव रंजन की अकिव अली निर्देशित ‘दे दे प्यार दे’ में वह 50 वर्ष के आशीष की भूमिका में दिखे. उन्होंने अपनी और किरदार की उम्र की समानता का ख्याल रखते हुए बालों की सफेदी को जाने दिया. अगर उनके बाल और दाढ़ी का रंग खिचड़ी (साल्ट एंड पेपर) होता तो फिल्म और जानदार हो जाती. इस फिल्म में तब्बू की उम्र 47 वर्ष थी. वह अजय देवगन की परित्यक्त पत्नी मंजू की भूमिका में है. लव रंजन और अकिव अली ने अपने  नायक -नायिका को प्रोढ़ रखा. उम्र के लिहाज से उनकी हरकतें होती हैं, लेकिन प्रेम का अधिकार नायक को ही मिलता है, वह खुद से 24 साल छोटी लड़की से प्रेम करने लगता है और उससे शादी भी करना चाहता है. यह स्वाभाविक तो नहीं है, लेकिन अजीब भी नहीं है. हिंदी फिल्मों में ही दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, कबीर बेदी, मिलिंद सोमण और सैफ अली खान के उदाहरण हैं.
फिल्मों की बात करें तो 1986 में राजेश खन्ना की फिल्म ‘अनोखा रिश्ता’ में भी बेमेल उम्र के किरदारों का प्रेम था. फिल्म की नायिका सबीहा थीं.अमिताभ बच्चन ने राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘निःशब्द’ में अपनी बेटी की सहेली से प्रेम किया था. जिया खान ने युवा सहेली की भूमिका निभाई थी. अमिताभ बच्चन ‘चीनी कम’ में भी खुद से कम उम्र की तब्बू से प्रेम करते दिखे. 
फिल्मों के अंदरूनी समस्या है कि प्रोढ़ प्रेम की अनुमति सिर्फ नायकों को ही मिलती है. फिल्मों की किसी प्रोढ़ नायिका को किसी युवक से प्रेम करते नहीं दिखाया जाता. ’दिल चाहता है’ और ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ के बेमेल उम्र के प्रेम को पूरा एक्स्प्लोर नहीं किया गया था. हो सकता है कि भारतीय समाज और दर्शक अभी इसके लिए तैयार ना हों, लेकिन इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों और रिश्तो के नए आयाम तलाश रहे फिल्मकार जल्दी ही ऐसी कोई फिल्म लेकर आयें तो आश्चर्य नहीं होगा. रियल लाइफ में प्रियंका चोपड़ा और निक जोंस ने प्रेम और शादी में उम्र के फासले को समेट दिया है. समाज में और भी उदाहरण हैं. बस, उन्हें पर्दे पर भी आना चाहिए.


Tuesday, May 14, 2019

सिनेमालोक : कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण

सिनेमालोक
 कलाकारों की हिंदी दोषपूर्ण
-अजय ब्रह्मात्मज
यह समस्या इधर बढ़ी है.हमारे युवा फिल्म कलाकार भाषा खास कर अपनी फिल्मों की भाषा - हिंदी पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. लगता है घडी की सुई घूम कर फिर से चौथे दशक में पहुँच गयी है, हिंदी फिल्मों के टाकी होने के साथ फिल्मों में आये कलाकार ढंग से हिंदी नहीं बोल पाते थे.पारसी और कैथोलिक समुदाय से आये इन कलाकारों के परिवेश और परिवार की भाषा पारसी और अंग्रेजी रहती थी,इसलिए उन्हें हिंदी बोलने में दिक्कत होती थी.तब उनके लिए भाषा के शिक्षक रखे जाते थे,उनका उच्चारण ठीक किया जाता था.सेट पर शूटिंग के समय और तैयारी के लिए हिंदी-उर्दू के प्रशिक्षक रखे जाते थे.पूरा ख्याल रखा जाता था.फिर भी चूक हो जाती थी तो फिल्म समीक्षक उनकी हिंदी पर अलग से टिपण्णी करते थे.80 सालों के बाद हम फिर से वैसे ही हालात में पहुंच रहे हैं.
ताज़ा उदहारण है ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2’. इस फिल्म में टाइगर श्रॉफ मुख्य भूमिका में हैं.उनके साथ तारा सुतारिया और अनन्या पांडे दो नयी हीरोइनें हैं. यह दोनों की लौन्चिंग फिल्म है.इस फिल्म को देखते हुए गहरा एहसास हुआ कि उनकी बोली गयी हिंदी दोषपूर्ण है.उच्चारण और अदायगी में खोट होने की वजह से वे संवादों से भाव नहीं व्यक्त कर पा रहे थे.अब यह सभी जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को रोमन में संवाद दिए जाते हैं.थिएटर से आए एक्टर और अमिताभ बच्चन सरीखे कुछ कलाकारों को छोड़ दें तो सभी को अपने संवाद रोमन में चाहिए होते हैं.
हिंदी लिखना और पढना हमारी हिंदी फिल्मों के कलाकारों को नहीं आता.मैं यहाँ टो-टो कर पढने की क्षमता को महत्व नहीं दे रहा हूँ.तमाम लोकप्रिय कलाकारों की यह दिक्कत है.खास कर 21 वीं सदी के कलाकारों की यह समस्या विकट हो गयी है.वे जिम जाते हैं.शरीर सौष्ठव पर ध्यान देते हैं.किरदार के लिए ज़रूरी बाकी प्रशिक्षण और अभ्यास करते हैं.सिर्फ भाषा सौष्ठव पर उनका ध्यान नहीं होता.हिंदी के मामले में ’हो जायेगा’ एटीट्युड हावी रहता है.कुछ निर्माता और निर्देशक शिक्षक-प्रशिक्षक की व्यवस्था करते हैं तो उनके प्रति कलाकारों का आदर नहीं रहता.वे आवश्यक बोझ की तरह भी भाषा को नहीं लेते.नतीजा यह होता है कि हर तरह से बेहतरीन होने के बावजूद फिल्म में भाषाई खामी रह जाती है.
यह प्रसंग कई बार पढ़ा और सुना गया है कि जब लता मंगेशकर पार्श्व गायन के लिए फिल्मों में संघर्ष कर रही थीं तो उनकी मुलाक़ात दिलीप कुमार से हो गई.दोनों लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहे थे.दिलीप कुमार ने उन्हें नेक सलाह दी कि उर्दू का अभ्यास करो और अपना उच्चारण ठीक करो.लता मंगेशकर ने गाँठ बाँध ली.उन्होंने सुर के साथ भाषा की भी साधना की.आज हम उनकी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं.आज़ादी के पहले और बाद के दौर में सभी कलाकार भाषा का अभ्यास करते थे.हिंदी फिल्मों में पंजाबी कलाकारों की जबान साफ होती थी. यह भी एक वजह है कि किसी और इलाके से अधिक पंजाब के कलाकार हिंदी फिल्मों में सफल हुए.कभी गौर कीजियेगा कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर हीरो का संबंध पंजाब से क्यों था उर आज भी है?
हिंदी भाषा के प्रति लापरवाही बढती जा रही है.यह एक सामाजिक समस्या है.21 वीं सदी के बच्चों की पढाई-लिखाई इंग्लिश मध्यम में हो रही है.फिल्मों में आ रहे नए स्टार खास कर फिल्म परिवारों से आये स्टारकिड बचपन से फिल्मों में आने तक इंग्लिश में ही जीते हैं.उनकी संपर्क भाषा इंग्लिश रहती है.फिल्मों में आने की तैयारी में हिंदी शिक्षक रखे जाते हैं.वे कुछ महीनों में उन्हें बेसिक हिंदी सिखाते हैं.फिल्म शुरू होने के पहले तक तो अभ्यास होता है.फिल्म शुरू होते ही जिम ज्यादा ज़रूरी रूटीन हो जाता है.जैसे-तैसे संवाद बोले जाते हैं और वैसी ही उनकी डबिंग कर ली जाती है.कायदे से अब उन्हें हिंदी ट्यूटर बहांल करना चाहिए.जो रिहर्सल से लेकर डबिंग तक कलाकारों के साथ रहे.उनके उच्चारण और अदायगी पर ध्यान दे और ज़रूरी सुधार करे.

यह विडम्बना ही है कि हिंदी फिल्मों के कलाकारों को हिंदी बोलना नहीं आता.वे अपने संवाद भी सही लहजे और प्रभाव से नहीं बोल पाते.एक इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन ने कहा था कि ‘भाषा से ही भाव आता है’.भाषा नहीं रहेगी तो भाव कहाँ से आएगा?और भाव नहीं होगा तो लाजिमी तौर पर प्रभाव भी नहीं होगा.

Wednesday, May 8, 2019

सिनेमालोक : रणवीर सबसे आगे


सिनेमालोक 
रणवीर सबसे आगे 
-अजय ब्रह्मात्मज
रात का समय था.करीब 11 बज चुके होंगे. यशराज स्टूडियो में दिन की चहल-पहल समाप्त हो चुकी थी. वहां मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. एक फ़िल्म के हीरो की व्यस्तता की वजह से इंटरव्यू के लिए मुझे यही समय मिला था. हीरो की फिल्म रिलीज पर थी. शुक्रवार को रिलीज हो रही फिल्म के हीरो का इंटरव्यू रविवार को छप जाए तो पाठक और संपादक दोनों खुश होते हैं. इसी खुशी के लिए दिन भर की थकान के बावजूद उस हीरो के इंटरव्यू के लिए हां कहना ही पड़ा. बातचीत शुरू हुई . और ना जाने कब बेख्याली में मुझ से भूल हुई. इंटरव्यू दे रहे रणवीर सिंह ने मुस्कुराते हुए मुझे टोका,' सर जी,आप मुझे दो बार रणबीर बुला चुके हैं. मैं रणबीर हूं. कहीं आप मुझ से रणबीर के सवाल तो नहीं पूछ रहे हैं.'
झेंपते हुए सॉरी कहने के बाद मैंने इंटरव्यू जारी रखा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी गलती हो सकती है. सामने बैठे एक्टर को मैं उसके प्रतिद्वंद्वी के नाम से बुला सकता हूँ. घर लौटने के बाद रिकॉर्डिंग सुनते ही एहसास हुआ कि यह तो भारी गलती है. फिर मैंने सोचा कि रणवीर को गुस्सा क्यों नहीं आया? वे चाहते तो बीच में ही इंटरव्यू छोड़ सकते थे. अगर यह इंटरव्यू लाइव होता तो श्रोता/दर्शक क्या कहते? अगली मुलाकात में रणवीर से माफी मांगने लगा. उन्होंने आदतन भींचते हुए कहा,' सर जी मुझे अभी और मेहनत करनी होगी. आप सभी के सवालों में जगह बना चुके रणबीर से कुछ बड़ा और सफल काम करना होगा. बड़ी कामयाबी देनी होगी.'

यह वाकया संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गोलियों की रासलीला - रामलीला' के समय हुआ था. तब से रणवीर सिंह ने संजय लीला भंसाली के साथ तीन कामयाब फिल्में कर ली हैं. तीनों में उनकी नायिका दीपिका पादुकोण रहीं, जो अब उनकी जीवनसंगिनी बन चुकी हैं. रणवीर खुद बताते हैं कि 'गोलियों की रासलीला-रामलीला' के सेट पर दीपिका पादुकोण ने भा गई थीं. शूटिंग के दौरान नज़दीकियां बढ़ीं. रणवीर ने धैर्य से काम लिया और फिर दोनों में प्यार हुआ. कुछ सालों के अफेयर के बाद दोनों ने शादी कर ली. शादी के बाद रणवीर सिंह भारतीय रिवाज के मुताबिक दीपिका पादुकोण को अपने घर नहीं लाए,बल्कि उनके साथ रहने चले गए. पुरुष प्रधान समाज और फिल्म इंडस्ट्री में यह छोटी और सामान्य बात नहीं है. शादी के समारोहों में भी वे दीपिका का जिस तरीके से ख्याल रख रहे थे,वह काबिले तारीफ है.
रणवीर सिंह लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं. इस साल रिलीज हुई उनके फिल्म 'गली ब्वॉय' खूब सराही गई और कामयाब रही. इसके पहले पिछले साल की जनवरी और दिसंबर में रिलीज हुई उनकी फिल्मों ने रिकॉर्ड कमाई की. 2018 में उनकी दोनों फिल्मों (पद्मावत और सिमबा) की कुल कमाई 500 करोड़ से अधिक रही. फिल्म इंडस्ट्री में कमाई और कामयाबी ही किसी स्टार अभिनेता के स्टारडम और भाव में इजाफा होता है. इस लिहाज से रणवीर सिंह अभी सबसे आगे हैं. उन्होंने खानत्रयी (आमिर,शाह रुख और सलमान),अक्षय कुमार,वरुण धवन, अजय देवगन और रितिक रोशन सभी को पीछे छोड़ दिया है. वे अभी सबसे आगे हैं. अभी वे '1983  की तैयारियों में जुटे हैं. इसके अलावा करण जौहर की फिल्म 'तख्त' में वे शाहजहां के बेटे दारा शिकोह की भूमिका निभाएंगे.
हर मुलाकात में रणवीर सिंह की आत्मीयता जस की तस बनी रहती है. विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म 'लूटेरा' की रिलीज के बाद हुई अंतरंग बातचीत में रणवीर ने वादा करने के साथ भरोसा दिया था कि मुझ में कोई बदलाव नहीं आएगा. 'सिम्बा' के समय हुई आखिरी मुलाकात में मैंने महसूस किया कि उनकी गर्मजोशी और आत्मीयता में कोई फर्क नहीं आया है. हालांकि इस बीच वे सफलता के शिखर पर पहुंच चुके हैं.


Wednesday, May 1, 2019

सिनेमालोक : राजनीति के फ़िल्मी मोहरे


सिनेमालोक
राजनीति के फ़िल्मी मोहरे
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी सिनेमा और राजनीति का रिश्ता बहुत मीठा और उल्लेखनीय नहीं रहा है.उत्तर भारत की राजनीति में उनका इस्तेमाल ही होता रहा है.वे सजावट और भीड़ जुटाने के काम आते रहे हैं.उत्तर भारत की राजनीति में हिंदी फिल्मों से ही फ़िल्मी हस्तियां आती-जाती रही हैं. पहले केवल राज्य सभा के लिए उन्हें चुन लिया जाता था.वे संसद की शोभा बढ़ाते थे और कभी-कभार फिल्म इंडस्ट्री या किसी सामाजिक मुद्दे पर कुछ सवाल या बहस करते नज़र आ जाते थे. उनका महत्व और प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही होता था.
इधर 21वी सदी में अब उनका उपयोग मोहरे की तरह होने लगा है. खास कर इस चुनाव में जिस तरह चुनाव की घोषणा के बाद उन्हें पार्टी में शामिल कर टिकट दिए गए हैं,उससे यही संकेत मिलता है कि किसी राजनीतिक समझदारी से अधिक यह उनकी लोकप्रियता भुनाने का कदम है. अब सनी देओल का ही मामला लें. ठीक है कि स्वयं धर्मेन्द्र(सनी के पिता) ने कभी बीकानेर से सांसद का चुनाव लड़ा था. उनकी सौतेली मां हेमा मालिनी राजनीति में निरंतर सक्रिय हैं.लेकिन सनी या बॉबी देओल ने कभी राजनीतिक झुकाव नहीं दिखाया.
जिस दिन अमित शाह के साथ सनी देओल की तस्वीर मीडिया में आई,उसी दिन जाहिर हो गया था कि कुछ तो पक रहा है.तब कयास लगया जा रहा था कि वे अमृतसर से चुनाव लड़ेंगे.बाद में जानकारी मिली कि उन्हें गुरदासपुर से उमीदवार बनाया गया है.विनोद खन्ना वहां से सांसद रहे थे. उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी या बेटे अक्षय खन्ना को उमीदवार बनाने की ख़बर भी आई थी.बहरहाल,सनी देओल ने उम्मीदवार के तौर पर पर्ची भर दी है. खुद नरेन्द्र मोदी ने उनके साथ अपनी तस्वीर ट्विटर पर शेयर की और ‘ग़दर’ का संवाद लिखा... हिंदुस्तान जिंदाबाद था,है और रहेगा. ‘ग़दर’ के सन्दर्भ के साथ याद करें तो इशारा स्पष्ट है.
राजनीति के पत्रकारों के मुताबिक इस बार के चुनाव में भाजपा के लिए एक-एक सीट ज़रूरी है. उन्हें अपनी संख्या बढ़ानी या कम से कम बरक़रार रखनी है. वे नहीं चाहते कि किसी कमज़ोर पेशेवर नेता को सीट देकर वे उसे खोने का जोखिम लें.यही कारण है कि आज़मगढ़ से निरहुआ और गोरखपुर से रवि किशन को टिकट दिए गए हैं. भोजपूरी फिल्मों के ये स्टार इन इलाकों में बेहद लोकप्रिय हैं. उम्मीद तो यही की जा रही है कि मनोज तिवारी की तरह वे भी भाजपा के काम आयेंगे.एक तरह से भोजपुरी के तीनों लोकप्रिय स्टार अब भाजपा के पास हैं. रवि किशन ने पिछले चुनाव में कांग्रेस का साथ दिया था. इस बार वे पाला बदल कर भाजपा के साथ आ गए हैं.
फ़िल्मी मोहरों के इस्तेमाल में कांग्रेस भी पीछे नहीं है.राज बब्बर तो उनके सक्रिय नेता हैं.उत्तर प्रदेश की कमान संभाले हुए हैं. इस बार शत्रुघ्न सिन्हा भी उनके पाले में आ गए हैं. भाजपा के वतमान नेतृत्व ने आडवाणी,जोशी समेत अनेक शीर्ष नेताओं की अवमानना की तो शत्रुघ्न सिन्हा सावधान हो गए. उन्होंने समय रहते ही छलांग लगायी और कांग्रेस में आ गए. चर्चा चल रही थी कि शायद भाजपा उन्हें पटना साहिब से उम्मीदवार न बनाये. कांग्रेस में आने से उन्हें टिकट तो मिल गया.अब यह देखना है कि वे वहां से जीत पाते हैं या नहीं. उधर सपा से जयाप्रदा ने भाजपा में प्रवेश कर पुराने साथियों को तिलमिला दिया है.वे बुदबुदाने लगे हैं.कांग्रेस ने मुंबई में उर्मिला मातोंडकर को टिकट दिया है.वह जी-जान से चुनाव में लगी हैं. माना जा रही कि वह वर्तमान सांसद को कड़ी टक्कर देंगी.अगर अंतिम समय में मतदाताओं ने रुख बदला तो वह जीत भी सकती हैं.
अगर ये फ़िल्मी हस्तियां सांसद चुने जाने के बाद भी सक्रिय रहें और फिल्म इंडस्ट्री और समाज के वास्तविक मुद्दे पर अपनी सहभागिता दिखाएँ तो अच्छी बात होगी. उन्हें शो पीस से आगे बढ कर अपनी महत्ता साबित करनी होगी.  


Tuesday, April 23, 2019

सिनेमालोक : दमकते मनोज बाजपेयी


सिनेमालोक
दमकते मनोज बाजपेयी
-अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों में काम करते हुए मनोज बाजपेयी को 25 साल हो गए.इन 25 सालों में मनोज बाजपेयी ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से खास मुकाम हासिल किया है. बिहार के बेलवा गाँव से दिल्ली होते हुए मुंबई पहुंचे मनोज बाजपेयी को लम्बे संघर्ष और अपमान से गुजरना पड़ा है. 1994 में उनकी पहली फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ आ गयी थी. इस फिल्म में मान सिंह के किरदार से उन्होंने यह तो जाहिर कर दिया था कि वे रंगमंच की तरह परदे पर भी प्रभावशाली मौजूदगी रखते हैं. नाटक और रंगमंच में सक्रिय अधिकांश अभिनेता की इच्छा बड़े परदे पर आने की रहती है,लेकिन बहुत कम को ही कैमरा,निर्देशक और दर्शक स्वीकार कर पाते हैं. मनोज बाजपेयी को भी वक़्त लगा. ‘बैंडिट क्वीन’ की सराहना और मुंबई के निमंत्रण से उत्साहित होकर वे मुंबई आ गए थे.
मुंबई में एक चर्चित और बड़े निर्देशक ने उन्हें मुंबई में मिलने का न्योता दिया था. स्वाभाविक रूप से मनोज को लगा था कि मुंबई पहुँचते ही फ़िल्में मिलने लगेंगी. कुछ कोशिशों के बाद उक्त निर्देशक से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने दुत्कार दिया. उनकी प्रतिक्रिया का भाव था कि मिलने के लिए कहा था. काम यानि कि फिल्म देने की तो बात नहीं हुई थी. आरंभिक कुछ झटकों में से यह पहला झटका था. मनिज चेत गए और उन्होंने फिल्मों में काम पाने की रणनीति बदल दी. उन्होंने धैर्य से काम लिया और सही समय की प्रतीक्षा की. इस दौर में उन्हें महेश भट्ट से ज़रूरी संबल मिला. मनोज ने कभी बताया था कि वे तो बोरिया-बिस्तर समेत कर दिल्ली लौटने को तैयार थे,लेकिन महेश भट्ट ने उन्हें रोका.उन्होंने लगभग भविष्यवाणी सी कर दी कि सालों बाद ऐसा प्रतिभाशाली अभिनेता आया है.
और फिर वक़्त व मौका आया. रामगोपाल वर्मा ने मनोज को देखा तो उन्हें अपनी अगली फिल्म का किरदार मिल गया. शेखर कपूर के प्रशंसक रामगोपाल वर्मा को ‘बैंडिट क्वीन’ में मनोज पसंद आये थे,लेकिन उन्हें खोज पाने का कोई तरीका नहीं था. ‘दौड़’ फिल्म के समय मुलाक़ात हुई तो रामगोपाल वर्मा ने माना भी किया कि इस फिल्म की छोटी भूमिका न करो. वे ‘सत्या’ में भीखू म्हात्रे की भूमिका उन्हें देने का मन बना चुके थे. आश्वासनों से मनोज का मोहभंग हो चूका था. उन्होंने ‘दौड़’ नहीं छोड़ी. रामगोपाल वर्मा ने अपना वडा पूरा किया.’सत्या’ के भीखू म्हात्रे ने सभी को मिहित किया. हिंदी फिल्मों में ऐसे नेगेटिव किरदार बहुत ही कम हैं,जिन्हें दर्शक सिर-माथे पर बिठाते हों. उसके बाद तो फिल्मों कि झड़ी लग गयी. यह वही दौर था जब कामयाबी के असर में उनसे फिल्मों और भूमिकाओं के चुनाव में गलतियाँ भी हुईं.
समय के साथ मनोज बाजपेयी संभले. उन्होंने अपने सामर्थ्य के साथ सम्भावना पर विचार किया. फिल्मों के चुनाव में सजग हुए. नतीजा यह हुआ कि उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गे. और इस साल उन्हें भारत सर्कार ने पद्मश्री से नवाज़ा.गाँव से निकले किसी कलाकार के लिए यह उल्लेखनीय यात्रा है. इस यात्रा के धूप-छाँव ने मनोज को गढ़ा है. वे हिंदी फिल्मों में प्रचलित किसी होड़ में शामिल नहीं हैं. उनकी जुदा राह है. इस राह में अधिक चमक नहीं है,लेकिन सोच की पुख्तगी है. मनोज बाजपेयी बाद की पीढ़ियों के लिए मिशल बन चुके हैं. वे एक साथ प्रायोगिक और मुख्यधारा की फ़िल्में कर रहे हैं. उन्होंने शार्ट फिल्म और वेब सीरीज को भी स्वीकार किया है. एक अन्तराल के बाद वे रंगमंच पर भी आने का मन बना रहे हैं.
25 सालों के इस सफ़र के बाद भी मनोज बाजपेयी के कदम ना तो थके आहें और न रुके हैं. वे आगे बढ रहे हैं. कम लोगों को मालूम है कि नयी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में वे कभी पीछे नहीं रहते. मुझे याद है कि ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ की शूटिंग से लौटने के बाद उन्होंने नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के बारे में कहा था कि उसे खूब सराहना मिलेगी. और यही हुआ.
आज मनोज बाजपेयी का जन्मदिन है. जन्मदिन कि बधाई के साथ उनके आगामी करियर के लिए शुभकामनाएं.

Tuesday, April 16, 2019

सिनेमालोक : अब समीक्षकों की संस्था देगी पुरस्कार


सिनेमालोक 
अब समीक्षकोंकी संस्था देगी पुरस्कार 

-अजय ब्रह्मात्मज

देश में अनेक फिल्म पुरस्कार हैं. हर मीडिया हाउस के अपने पुरस्कार हैं.इनके अलावा स्थानीय और राष्ट्रीय स्टार पर कुछ समोह्ह या संगठन भी फिल्म पुरस्कार बाँटते हैं. इनमे सबसे अधिक सम्माननीय भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन दिया जाने वाल राष्ट्रीय पुरस्कार है.यह पुरस्कार देश भर की फ़िल्मी गतिविधियों में से श्रेष्ठ कृति और व्यक्ति को दिया जाता है. कतिपय विवादों के बावजूद इस पुरस्कार की खास प्रतिष्ठा है. मुंबई में मैंने देखा है कि कलाकार और फ़िल्मकार अपने दफ्तर और बैठकी में इसे फ्रेम करवा कर रखते हैं. निश्चित ही यह उनके लिए गर्व और दिखावे की बात होती है.
ज्यादातर फिल्म पुरस्कार टीवी इवेंट बन चुके हैं. इन पुरस्कारों के स्पोंसर और आयोजकों की रुचि श्रेष्ठ काम से अधिक लोकप्रिय नाम में होती है, इसके अलावा फिल्म के कारोबार को भी मद्देनज़र रखा जाता है. नतीजा यह होता है कि श्रेष्ठ काम और नाम पुरस्कृत नहीं हो पाते. इन पुरस्कारों की मर्यादा इतनी गिर चुकी है कि कुछ शीर्षस्थ फ़िल्मकार और कलाकार इसमें भाग ही नहीं लेते. उनके बहिष्कार से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. ये पुरस्कार बदस्तूर चल रहे हैं. कलाकारों और फिल्मकारों को मालोम्म रहता कि उन्हेंक्यों नहीं ' याक्यों' पुरस्कार दिया जा रहा है? फोर भी वे ट्राफी के साथ माकली मुस्कान में नज़र आते हैं. मंच से पुरस्कार मिलने की ख़ुशी जाहिर करते हैं.
इन पुरस्कारों में एक केटेगरी होती हैक्रिटिक' अवार्ड. यह प्रायः उन समर्थ कलाकारों और फिल्मों को दिया जाता है,जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. ऐसे सराहे गए कलाकारों को छोड़ने पर पुरस्कार कि विश्वसनीयता पूरी तरह से संदिग्ध हो जाती है. फिल्म बिरादरी में इसे सांत्वना पुरस्कार भी माना जाता है. मुख्य केटेगरी से बाहर खड़े कद्दावर सृजनशील नाम और काम को मजबूरन तवज्जो देने की कोशिश साफ़ दिखती है.क्रिटिक' पुरस्कार धीरे-धीरे अपनी महत्ता खो चूका है.
ई साल से एक नया पुरस्कार आरम्भ हो रहा है. इसेक्रिटिक चॉइस फिल्म अवार्ड'(सीसीएफए) नाम दिया गया है. यह देश भर के फिल्म क्रिटिक की नवगठित संस्थाफिल्म क्रिटिक गिल्ड' द्वारा आरम्भ किया गया है. पिछले साल गिल्ड ने शोर्ट फिल्म के पुरस्कारों के बाद फीचर फिल्मों के लिए भी पुरस्कारों कि घोषणा की है. यह पुरस्कार इसी हफ्ते 21 अप्रैल को मुंबई में प्रदान किया जायेगा. आयोजन से पहले ही इसे लेकर उत्सुकता बनी हुई है. इसके नॉमिनेशन कि घोषणा के लिए आई विद्या बालन ने कहा था कि यह देश का विश्वसनीय पुरस्कार होगा. निस्संदेह उनके इस बयां में सच्चाई है. उनके साथ आई जोया अख्तार भी यही मानती हैं.
फ़िलहाल फिल्म क्रिटिक गिल्ड के 34 सदस्य हैं. ये सभी सालों से फिल्म समीक्षा करते आ रहे हैं.पत्र-पत्रिकाओं से आगे बढ कर ऑनलाइन,वेब,ब्लॉग और अन्य प्लेटफार्म के जरिये वे अपनी समीक्षाएं और टिप्पणियां प्रकाशित करते रहे हैं. ये सारे समीक्षक अपने दायरे में लोकप्रिय और प्रशंसित हैं. इनमें से 27 समीक्षक हिंदी फिल्मों की नियमित समीक्षा करते हैं. इरादा है कि इस पुरस्कार का अखिल भारतीय स्वरुप हो. इस साल समय और संसाधनों की कमी से केवल हिंदी में सभी केटेगरी के अवार्ड दिए जायेंगे. बाकि हिंदी के अलावा देश की अन्य सात भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ फिल्म को पुरस्कृत किया जायेगा. कोशिश है कि अगले साल से उन भाषाओं में भी सारे पुरस्कार दिए जाएँ.
पुरस्कारों की गिरती गरिमा के बीच देश भर के चुनिन्दा समीक्षकों का यह प्रयास सराहनीय है.


Tuesday, April 2, 2019

सिनेमालोक : 50 के हुए अजय देवगन


सिनेमालोक
50 के हुए अजय देवगन
-अजय ब्रह्मात्मज
वीरू देवगन के बेटे अजय देवगन आज 50 के हो गए.वे काजोल के पति हैं.उनकी पहली फिल्म ‘फूल और कांटे’ है. इसे कुक्कू कोहली ने निर्देशित किया था. इसी साल यश चोप्रा निर्देशित अनिल कपूर और श्रीदेवी की फिल्म ‘लम्हे’ भी रिलीज हुई थी. तब किसी को अनुमान नहीं था कि सामान्य चेहरे के अजय देवगन की फिल्म 1991 की बड़ी हिट साबित होगी. हिंदी सिनेमा का यह वैसा दौर था,जब मेलोड्रामा और गिमिक का खूब सहारा लिया जाता था. एक गिमिक हीरो की एंट्री हुआ करती थी.’फूल और कांटे’ में अजय देवगन दो मोटरसाइकिल पर खड़े होकर आते हैं. इस सीन पर तालियाँ बजी थीं और अजय देवगन एक्शन स्टार मान लिए गए थे. एक्शन डायरेक्टर के बेटे को एक्शन स्टार बताने के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने अजय देवगन के लिए एक अलग केटेगरी तय कर दी थी.
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लॉबी और ग्रुप के समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं. बहार से देखने पर लग सकता है कि अजय देवगन तो इनसाइडर हैं. उनके पिता स्थापित एक्शन डायरेक्टर रहे हैं तो अजय की लौन्चिंग में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी. सच्छायी कुछ और है. इनसाइडर की अपनी व्यवस्था और अनुक्रम है...आप किसी स्टार की संतान हैं,या डिरेक्टर की या किसी तकनीशियन की....परिवार की इस लिगेसी के आधार पर आपका स्थान तय किया जाता है. अजय देवगन एक्शन डायरेक्टर के बेटे थे,इसलिए उन्हें दूसरे स्टारकिड जैसी स्वीकृति नहीं मिली और न ही पहले से कोई हलचल मची. अजय ने अपनी प्रतिभा से लोहा मनवाया और पहली फिल्म से ही स्टार की कतार में खडे हो गए. उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट डेब्यू अवार्ड मिला. बाद में तो उन्हें ‘ज़ख्म’ और ‘द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले.
अजय देवगन अपनी पीढ़ी के लहदा अभिनेता हैं. कहते हैं उनकी आँखें बोलती हैं. निश्चित ही वे अपनी आँखों का सार्थक उपयोग करते हैं. उनकी अदाकारी की खास बात है कि वे समकालीन अभिनेताओं से अलग किसी भी किरदार को अंडरप्ले करते हैं. उनके निर्देशक उनकी चाल का भी इस्तेमाल करते हैं. उनकी ज्यादातर फिल्मों में उन्हें एक खास वाक के साथ कुछ दूरी तय करनी होती है और फिर दृश्य आरम्भ होता है. एक बार मैंने अपने इस निरिक्षण के बारे में उनसे पूछा था तो वे हंस पड़े थे. उन्होंने स्वीकार करते हर जवाब दिया था कि आपने सही गौर किया है. ऐसा लगभग सभी फिल्मों में मेरे साथ होता है. शायद उन्हें सीन ज़माने में इससे मदद मिलती हो. उनकी चाल और आँख के साथ ही दृश्यों और शॉट में उनक किफायती होना निर्देशकों और निर्माता के लिए फायदेमंद होता है.
किफायती अभिनय से तात्पर्य कम से कम रिटेक में अपना शॉट पूरा करना. सीन की ज़रुरत के मुताबिक एक्सप्रेशन रखना. ज्यादा फुटेज नहीं खाना और अपने शॉट में पर्याप्त स्फूर्ति रखना. फिल्म ढीली और कमज़ोर हो तो भी अजय देवगन के शॉट डल नहीं होते. उनकी कोशिश रहती है कि स्क्रिप्ट के अभिप्राय को अच्छी तरह व्यक्त करें, ज्यादातर निर्देशक उन्हें दोहराना पसंद करते हैं. गौर करें तो निर्देशकों ने उनकी अलग-अलग खासियत को पकड़ लिया है और वे उनके उसी आयाम को अपनी फिल्मों में दिखाते हैं. जैसे कि रोहित शेट्टी उनके व्यक्तित्व में मौजूद कॉमिक स्ट्रीक का ‘गोलमाल सीरीज में इस्तेमाल करते हैं तो सिंघम सीरीज में उनका रौद्र रूप दिखाई पड़ता है.
अजय देवगन को लगता नहीं है कि वे किसी विचलन के शिकार हैं या कमर्शियल सिनेमा उनका बेजा इस्तेमाल भी करता है. वे ‘टोटल धमाल’ जैसी फ़िल्में भी उसी संलग्नता से करते दिखाई पड़ते हैं,जबकि लगता है कि उनके जैसा होनहार एक्टर ऊल्जल्लो दृश्यों को कैसे हैंडल करता होगा? कोई कचोट तो उठती होगी? अगर ऐसा नहीं होता तो उन्हें बताना चाहिए कि इसे उन्होंने कैसे साधा है?
उन्हें जन्मदिन की बधाई!


Thursday, March 28, 2019

सिनेमालोक : सही फैसला है कंगना का


सिनेमालोक
सही फैसला है कंगना का
-अजय ब्रह्मात्मज
तीन दिनों पहले कंगना रनोट के जन्मदिन पर ‘जया’ फिल्म की घोषणा हुई. इसे तमिल में ‘थालैवी’ और हिंदी में ‘जया’ नाम से बनाया जा रहा है. निर्देशक हैं विजय और इसे लिख रहे हैं केवी विजयेंद्र प्रसाद. ‘बाहुबली’ के विख्यात लेखक ने ही कंगना रनोट की पिछली फिल्म ‘मणिकर्णिका’ लिखी थी. यह फिल्म तमिल फिल्मों की अभिएत्री और तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का बायोपिक है. इस फिल्म की घोषणा के साथ कंगना ने जाहिर किया है कि अब वह अपनी बायोपिक पर काम नहीं करेंगी.’मणिकर्णिका’ की रिलीज के समय कंगना ने बताया था कि वह अपनी आत्मकथा सेल्यूलाइड पर पेश करना चाहती हैं. इसे वह खुद ही लिखना और निर्देशित करना चाहती थीं.हिंदी फिल्मों के इतिहास में अपने ढंग का यह पहला प्रयास होता.
फ़िलहाल कंगना रनोट ने इरादा बदल दिया है. और यह सही किया.कंगना अपने करियर के उठान पर हैं. अभी उन्हें आने ऊंचाइयां और उपलब्धियां हासिल करनी हैं.लम्बे अपमान,तिरस्कार और संघर्ष के बाद वह यहाँ तक पहुंची हैं.आगे का रास्ता फिलहाल आसन नहीं दिख रहा है,क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री के कथित ताकतवर बिरादरी और लॉबी खुले दिल से उन्हें स्वीकार नहीं कर रही है.विरोध जारी है,लेकिन कंगना के साथ दर्शकों का एक समूह है.वह कंगना को पसंद करने के साथ उनकी कामयाबी भी चाहता है.कंगना के बडबोलेपन और पंगा लेने की आदत को नज़रअंदाज कर दें तो उनकी प्रतिभा संदेह से परे है. वह कुछ नया और बेहतर करना चाहती हैं.’जया’ फिल्म के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि मैं तो अपनी बायोपिक(आत्मकथा) पर काम कर रही थी.इसी बीच ‘जया’ की कहानी सुनाने पर वह मुझे अपने जीवन सदृश और करीब लगी.हमारी ज़िन्दगी में अनेक समानताएं हैं.हाँ,उनकी उपलब्धिया मुझ से बड़ी हैं.
कंगना को इस फिल्म के लिए 24 करोड़ का पारिश्रमिक मिलेगा. ‘जया’ फिल्म की घोषणा के साथ यह खबर भी आई है.इस खबर की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और ना ही कंगना की तरफ से कोई खंडन आया है.यकीन किया जा सकता है कि एस ही होगा. ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी क पूरा श्री कंगना को मिलना चाहिए.प्रतिकूल स्थितियों में वह फिल्मों को दर्शकों के बीच ले गयीं. फिल्म के कथ्य और प्रस्तुति से मैं असहमत हूँ,लेकिन कंगना की मेहनत और सफलता कैसे भूली जा सकती है. और फिर समकालीन अभिनेत्रियों के बीच वह अकेली ऐसी अभिनेत्री के तौर पर उभरी हैं जो किसी पॉपुलर स्टार का टेक लिए बगैर छलांग लगा रही है. यह दुर्लभ है.
अभी तक मन जा रहा था कि दीपिका पादुकोण सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री हैं. उन्हें ‘पद्मावत’ के लिए रणवीर सिंह और शहीद कपूर से अधिक राशी बतौर पारिश्रमिक मिली थी...13 करोड़. करीना कपूर खान को ‘वीरे दी वेडिंग’ के लिए 10 करोड़ दिए गए थे.पारिश्रमिक के लिहाज से भी कंगना ने अपने समकालीनों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. अब यह देखना होगा कि दूसरी अभिनेतरियां कितनी तेज़ी से कंगना के करीब पहुँचती हैं.दीपिका अपनी अगली फिल्म ‘छपाक’ में निर्माता बन गयी हैं.वह अभिनेताओं की तरह प्रॉफिट शेयरिंग के समीकरण में चली गयी हैं. इससे फिल्म चलेगी और कमाएगी तो उन्हें भारी लाभ होगा.
बस,कंगना रनोट का विचलन कई बार चिंतित करता है.वह आवेश में अनावश्यक बयानबाज़ी कर जाती हैं.उन्हें थोडा सचेत रहना चाहिए.अपने राजनीतिक विचारों का भी मंथन करना चाहिए.भावावेश में कुछ भी बोलना गलत सन्देश देता है.हालांकि समाज और देश की उनकी समझ बढ़ी है,लेकिन राजनीतिक स्पष्टता आणि बाकि है.ऐसा लगता है कि वह किसी खास दिशा में झुक रही हैं और वह उनके व्यक्तित्व की तरह प्रगतिशील नहीं है. 

Tuesday, March 5, 2019

सिनेमालोक : खुश्बू हैं निदा फाजली

सिनेमालोक
खुश्बू हैं निदा फाजली
-अजय ब्रह्मात्मज
अपनी फिल्म पत्रकारिता में कुछ अफ़सोस रह ही जायेंगे.उनका निदान या समाधान नहीं हो सकता.उसे सुधारा ही नहीं जा सकता. एक समय था कि लगभग हर हफ्ते निदा साहब से मुलाक़ात होती थी.मुंबई के खार डांडा की अम्रर बिल्डिंग के पहले माले के उनके फ्लैट का दरवाज़ा सभी पत्रकारों और साहित्यकारों के लिए खुला रहता था. मुझे अफ़सोस है कि उनके जीते जी मैंने कभी उनसे उनके फ़िल्मी करियर के बारे में विस्तृत बातचीत क्यों नहीं की? या कभी उन पर लिखने का ख्याल क्यों नहीं आया? शायद करीबी और पहुँच में रहने वली हतियों के प्रति यह नाइंसाफी इस सनक में हो जाती है कि उनसे तो कभी भी बात कर लेंगे. फ्रीलांसिंग के दिनों में किसी संपादक या प्रभारी ने उन पर कुछ लिखने के लिए भी नहीं कहा.
बहरहाल,पिछले दिनों उनकी पत्नी मालती जोशी और मित्र हरीश पाठक के निमंत्रण पर निदा फाजली पर कुछ पढने और बोलने का मौका मिला.मुझे केवल उनके फ़िल्मी पक्ष पर बोलना था...बतौर गीतकार.पता चला कि उन्होंने फिल्मों के लिए 348 गीत लिखे. निदा साहब ग्वालियर के मोल निवासी थे,जहाँ उनका परिवार कश्मीर से आकर बसा था. कह्श्मिर के अपने गाँव फाज़िला से उन्होंने अपना सरनेम फाजली चुना था.उनका असली नाम मुक्तदा हसन थे.बचपन से उन्हें साहित्य का शौक़ रहा.कहते हैं कि सातवें दशक में जब उनका परिवार पाकिस्तान शिफ्ट कर रहा था तो उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया. वे अपनी जड़ों से नहीं कटना चाहते थे. भारतीय संस्कृति और गंगा जमुनी तहजीब में उनका अटूट भरोस था. वे उससे कभी नहीं डिगे. हिंदू धर्म,दर्शन और मिथकों से वे खूब परिचित थे.अपनी शायरी और लेखन में उन्होंने इनका इस्तेमाल भी किया.कठमुल्ला मौलवियों और इस्लामिक कट्टरता से उन्हें नफरत थी. उन्होंने बेहिचक चोट की और फतवे भी बर्दाश्त किये.
फिल्मों की तरफ उनका रुझान था,लेकिन मुंबई आने के बाद पत्र-पत्रिकाओं के आरंभिक लेखन और मुशायरों के दिनों में उन्होंने साहिर लुधियानवी.कैफ़ी आज़मी और सरदार जाफरी को बेबाक टिप्पणियों से नाराज़ कर दिया था.जवान और आक्रामक निदा को लगता था कि क्रातिकारी शायरों की शायरी और ज़िन्दगी में फर्क और ढोंग है. वे बातें तो गरीबों की करते हैं,लेकिन खुद सुविधा संपन्न इमारतों और अपार्टमेंट में रहते हैं. साहिर साहेब को निदा इतने खटके कि उन्होंने उन मुशायरों में जाने से मन कर दिया,जहाँ निदा को भी बुलाया जाता था.मजबूरन निदा का बहिष्कार हुआ. इस हालत में उनके एक ही हमदर्द थे जां निसार अख्तर...उनसे ग्वालियर का परिचय था. फिर ऐसा संयोग भी बना कि कमल अम्तोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ में वे उनके उत्तराधिकारी बने.फिल्म के निर्माण के दौरान उनकी मौत हुई. दो गीत लिखे जाने बाकी थे. कमल अमरोही चाहते थे कि कोई ‘मुक़म्मल’ शायर ही गीत लिखे. निदा को मौका मिला और उन्होंने लिखा ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’.फिल्म रिलीज होने के पहले ही निदा को फ़िल्में मिलने लगीं. जिनको कमल अमरोही ने चुना हो.उनमें खास बात तो होगी.
निदा फाजली 1964-65 में मुंबई आ गए थे. फिल्मों में पहला मौका १९७९ में मिला.शायद पहले उनका इरादा न रहा हो कि फिल्मों के लिए गीत लिखे जायें.निदा हिंदी फिल्मों के ऐसे आखिरी गीतकार हैं,जो उर्दू अदब में भी बड़ा मुकाम रखते हैं.उनके बाद कोई ऐसा गीतकार नहीं दीखता,जो मकबूल शायर भी हो.तो 1979 में प्रख्यात स्तंभकार जयप्रकाश चोव्क्से ने ‘शायद’ की कहानी लिखी. मदन बावरिया निर्देशित इस फिल्म के तीनों गीतकार मध्यप्रदेश के थे.विट्ठल भाई पटेल.दुष्यंत कुमत त्यागी और निदा फाजली. इस फिल्के लिए निदा फाजली ने दो गीत लिखे...’खुश्बू हूँ मैं फूल नहीं हू जो मुरझाऊंगा’ और ‘दिन भर धुप का पर्वत कटा,शाम को पीने निकले हम,जिन गलियों में मौत बिछी थी,उनमें पीने निकले हम’... दूसरा गीत फिल्म की थीम को धयन में रख कर लिखा गया था. उन्होंने आरके की फिल्म ‘बीवी ऑ बीवी’ के गीत लिखे थे. राज कपूर से उनकी मुलाक़ात का किस्सा फिर कभी. अभि तो इतना ही कि निदा साहेब के गीत सुनिए और पढ़िए.उनकी खुश्बू से सुंगधित होइए,


Tuesday, February 19, 2019

सिनेमालोक : धारावी का ‘गली बॉय’


सिनेमालोक
धारावी का ‘गली बॉय’
-अजय ब्रह्मात्मज
जोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ की खूब चर्चा हो रही है.जावेद अख्तर और हनी ईरानी की बेटी और फरहान अख्तर की बहन जोया अख्तर अपनी फिल्मों से दर्शकों को लुभाती रही हैं.उनकी फ़िल्में मुख्य रूप से अमीर तबके की दास्तान सुनाती हैं.इस पसंद और प्राथमिकता के लिए उनकी आलोचना भी होती रही है.अभि ‘गली बॉय’ आई तो उनके समर्थकों ने कहना शुरू किया कि जोया ने इस बार आलोचकों का मुंह बंद कर दिया. जोया ने अपनी फिल्म से जवाब दिया कि वह निम्न तबके की कहानी भी कह सकती हैं.’गली बॉय’ देख चुके दर्शक जानते हैं कि यह फिल्म धारावी के मुराद के किरदार को लेकर चलती है.गली के सामान्य छोकरे से उसके रैप स्टार बनने की संगीतमय यात्रा है यह फिल्म.
इस फिल्म की खूबसूरती है कि जोया अख्तर मुंबई के स्लम धारावी की गलियों से बहार नहीं निकलतीं.मुंबई के मशहूर और परिचित लोकेशन से वह बसची हैं.इन दिनों मुंबई की पृष्ठभूमि की हर फिल्म(अमीर या गरीब किरदार) में सी लिंक दिखाई पड़ता है.इस फिल्म में सीएसटी रेलवे स्टेशन की एक झलक मात्र आती है.फिल्म के मुख्य किरदार मुराद और सफीना के मिलने की खास जगह गटर के ऊपर बना पुल है.इस गटर में कचरा जलकुंभी की तरह पसरा हुआ है.आप को याद होगा कि डैनी बॉयल ने 2008 में ‘स्लमडॉग मिलियेनर’ नमक फिल्म में में धारावी के किरदारों को दिखाया था.इंटरनेशनल ख्याति की इस फिल्म से धारावी की तरफ पर्यटकों का ध्यान गे.’गली बॉय’ में एक दृश्य है,जहाँ कुछ पर्यटक मुराद का घर देखने आते हैं तो उसकी दादी 500 रुपए की मांग करती है. इस फिल्म को बारीकी से देखें तो जोया भी पर्यटक निर्देशक के तौर पर ही कैमरे के साथ धारावी में घुसती हैं.धारावी की ज़िन्दगी और सपनों को कभी सुधीर मिश्र ने ‘धारावी’ नाम की फिल्म बहुत संजीदगी से चित्रित किया था.दूसरी हिंदी फिल्मों में भी धारावी की छटा झलकती रही है.ज्यादातर फिल्म निर्देशक यहाँ की गंदगी,गंदे आचरण और गंदे धंधे ही कैमरे में क़ैद करते रहे हैं.जोया ने यहाँ के पॉजीटिव किरदार लिए हैं.
जोया अख्तर की ‘गली बॉय’ सच्चाई और सपने को करीब लेन की कोशिश में जुटे मुराद की कहानी है.मुराद बुरी सांगत में होने बावजूद अच्छे ख्याल रखता है.वह अपनी नाराज़गी को गीतों में अभिव्यक्त करता है.उसकी मुलाक़ात एमसी शेर से होती और फिर उसके जीवन की दिशा बदल जाती है.वह रैप करने लगता है.तय होता है कि एक वीडियो बनाया जाये और उसे यौतुबे पर डाला जाये.वीडियो तैयार करने के बाद उसे एक्सपोर्ट करने के पहले रैपर का नाम रखने की बात आती है तो मुराद कहता है कि मेरा क्या नाम? मैं तो गली का छोकरा....यही गली बॉय नाम पड़ता है.वीडियो आते ही उसकी यात्रा आरम्भ हो जाती है.वह सपनों को जीने लगता है.वह अपने मामा की इस धारणा और सोच को झुठलाता है कि नौकर का बेटा नौकर ही हो सकता है.
जोया ने ‘गली बॉय’ की प्रेरणा ज़रूर रियल रैपर नेज़ी और डिवाइन से ली है,लेकिन उन्होंने उनकी ज़िन्दगी के कडवे और सच्चे प्रसंग कम लिए हैं.रीमा कागती के साथ उन्होंने गली के छोकरे के रैपर बनाने की कहने को हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे ढांचे में फिट किया है.’गली बॉय’ की यही सीमा उसे देश के दर्शकों से नहीं जोड़ पति.पहले दिन यह फिल्म संगीत और नेज़ी व डिवाइन के किस्सों की वजह से शहरी दर्शकों को खींचती है,लेकिन दर्शक जा फिल्म से कूनेक्तिओन फील नहीं करते तो वे छंट जाते हैं.दूसरे दिन ही घटे दर्शकों ने जाहिर कर दिया है कि जोया अख्तर की फिल्म उन्हें अधिक पसंद नहीं आई है.निर्देशक जोया अख्तर और मुख्य कलाकार रणवीर सिंह मुराद का करैक्टर ग्राफ नहीं रच पाते.फिल्म के पहले फ्रेम से ही रणवीर सिंह का रवैया और व्यवहार रैप स्टार का है,इसलिए किरदार की यात्रा छू नहीं पाती.
जोया अख्तर और करण जौहर कोशिश तो कर रहे हैं कि वे आम दर्शकों की ज़िन्दगी की कहानी कहें,लेकिन अनुभव,समझदारी और शोध की कमी से उनके प्रयास में छेद हो जाते हैं.


Tuesday, February 12, 2019

सिनेमालोक : कामकाजी प्रेमिकाएं


सिनेमालोक
कामकाजी प्रेमिकाएं
-अजय ब्रह्मात्मज
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इश्क और काम के बारे में लिखा था :
वो लोग बड़े खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
आखिर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया.

आज की बात करें तो कोई भी लड़की इश्क और काम के मामले में फ़ैज़ के तजुर्बे अलग ख्याल रखती मिलेगी.वह काम कर रही है और काम के साथ इश्क भी कर रही है.उसने दोनों को अधूरा नहीं छोड़ा है.इश्क और काम दोनों को पूरा किया है और पूरी शिद्दत से दोनों जिम्मेदारियों को निभाया है.आज की प्रेमिकाएं कामकाजी हैं.वह बराबर की भूमिका निभाती है और सही मायने में हमकदम हो चुकी है.अब वह पिछली सदी की नायिकाओं की तरह पलट कर नायक को नहीं देखती है.उसे ज़रुरत ही नहीं पडती,क्योंकि वह प्रेमी की हमकदम है.
गौर करेंगे तो पाएंगे कि हिंदी फिल्मों की नायिकाओं के किरदार में भारी बदलाव आया है.अब वह परदे पर काम करती नज़र आती है.वह प्रोफेशनल हो चुकी है.गए वे दिन जब वह प्रेमी के ख्यालों में डूबी रहती थी.प्रेमी के आने की आहट से लरजती और प्रेमी के जाने से आहत होकर तडपती नहीं है.21 वीं सदी की पढ़ी-लिखी लड़कियां सिर्फ प्रेम नहीं करतीं,वे प्रेम के साथ और कई बार तो उसके पहले काम कर रही होती हैं.जिंदगी में लड़कियां लड़कों से दोस्ती रखती हैं,लेकिन उन्हें प्रेमी के तौर पर स्वीकार करने के पहले अपने करियर के बारे में सोचती हैं.उन्हें बहु बन कर घर में बैठना मंज़ूर नहीं है.परदे पर जिंदगी का विस्तार नहीं दिखाया जा सकता,लेकिन यह परिवर्तन दिखने लगा है कि वे अपने प्रेमियों की तरह बोर्ड रूम की मीटिंग से लेकर २६ जनवरी की परेड तक में पुरुषों/प्रेमियों के समक्ष नज़र आती हैं.
नए सितारों में लोकप्रिय आयुष्मान खुराना की फिल्मों पर नज़र डालें तो उनकी प्रेमिकाएं ज्यादातर स्वतंत्र सोच की आत्मनिर्भर लड़कियां हैं.आयुष्मान को हर फिल्म में निजी समस्याओं को सुलझाने के साथ उनके काम के प्रति भी संवेदनशील रहना पड़ता है.कभी ऐसा नहीं दिखा कि वे अपनी कामकाजी प्रेमिकाओं की व्यस्तता से खीझते दिखे हों.वास्तव में यह जिंदगी का सर है.शहरी प्रेमकहानियों में कामकाजी प्रेमिकाओं की तादाद बढती जा रही है.और यह अच्छी बात है.
इधर की फिल्मों के प्रेमी-प्रेमिकाओं(नायक-नायिकाओं) का चरित्र बदल गया है.गीतकार इरशाद कामिल कहते हैं कि अब जिंदगी में रहते हुए ही प्रेम किया जा रहा है.उन्हें वीराने,चांदनी रात,झील और खयाली दुनिया की ज़रुरत और फुर्सत नहीं रह गयी है.फिल्मों और जीवन में रोज़मर्रा की गतिविधियों के बीच ही प्रेम पनप रहा है.साथ रहने-होने की रूटीन जिम्मेदारियों के बीच ही उनका रोमांस बढ़ता और मज़बूत होता है.फ़िल्में इनसे अप्रभावित नहीं हैं.
परदे की नायिकाओं की निजी जिंदगी में झाँकने पर हम देखते हैं कि पहले की अभिनेत्रियों की तरह आज की अभिनेत्रियों को कुछ छिपाना या ढकना नहीं पड़ता है.बिंदास युवा अभिनेत्रियाँ अपने प्रेमियों की पूर्व प्रेमिकाओं से बेधड़क मिलती और दोस्ती करती हैं और अभिनेता भी प्रेमिकाओं के प्रेमियों से बेहिचक मिलते हैं.पूर्व प्रेमी-प्रेनिकाओं से अलग होने और संबंध टूटने के बाद भी उन्हें साथ काम करने और परदे पर रोमांस करने में हिचक नहीं होती.उनके वर्तमान प्रेमी-प्रेमिकाओं को यह डर नहीं रहता कि कहीं शूटिंग के एकांत में पुराना प्रेम न जाग जाए.सचमुच दुनिया बदल चुकी है.प्रेम के तौर-तरीके बदल गए हैं और प्रेमी-प्रेमिका तो बदल ही गए हैं.इस बदलाव में उत्प्रेरक की भूमिका लड़कियों की है.उन्हें अब अपने काम के साथ इश्क करना है या यूँ कहें कि इश्क के साथ काम करना है. अगर प्रेमी कुछ और चाहता है या इश्क का हवाला देकर काम छुड़वाना चाहता है तो लड़कियां कई मामलों में प्रेमियों को छोड़ देती हैं.

Tuesday, February 5, 2019

सिनेमालोक : क्यों मौन हैं महारथी?


सिनेमाहौल
क्यों मौन हैं महारथी?
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के प्रसार और प्रभाव के इस दौर में किसी भी फिल्म की रिलीज के मौके पर फ़िल्मी महारथियों की हास्यास्पद सक्रियता देखते ही बनती है?हर कोई आ रही फिल्म देखने के लिए मर रहा होता है.यह अंग्रेजी एक्सप्रेशन है...डाईंग तो वाच.हिंदी के पाठक पूछ सकते हैं कि मर ही जाओगे तो फिल्म कैसे देखोगे?बहरहाल,फिल्म के फर्स्ट लुक से लेकर उसके रिलीज होने तक फिल्म बिरादरी के महारथी अपने खेमे की फिल्मों की तारीफ और सराहना में कोई कसार नहीं छोड़ते हैं.प्रचार का यह अप्रत्यक्ष तरीका निश्चित ही आम दर्शकों को प्रभावित करता है.यह सीधा इंडोर्समेंट है,जो सामान्य रूप से गलत नहीं है.लेकिन जब फिल्म रिलीज होती है और दर्शक किसी महारथी की तारीफ के झांसे में आकर थिएटर जाता है और निराश होकर लौटता है तो उसे कोफ़्त  होती है.फिर भी वह अगली फिल्म के समय धोखा खाता है.
इसके विपरीत कुछ फिल्मों की रिलीज के समय गहरी ख़ामोशी छा जाती है.महारथी मौन धारण कर लेते हैं.वे नज़रअंदाज करते हैं.महसूस होने के बावजूद स्वीकार नहीं करते कि सामने वाले का भी कोई वजूद है.ऐसा बहार से आई प्रतिभाओं के साथ होता है.उन्हें अपनी फिल्मों के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.ताज़ा उदहारण ‘मणिकर्णिका’ का है.कंगना रनोट की इस फिल्म के प्रति भयंकर भयंकर उदासी अपनाई गयी है.रिलीज के बाद दर्शकों ने इस फिल्म को स्वीकार किया है.रिलीज के बाद के विवादों के बावजूद इस फिल्म का कारोबार औसत से बेहतर रहा है.लेकिन महारथी और ट्रेड पंडित भी ‘मणिकर्णिका’ की कामयाबी को लेकर सहज नहीं दिख रहे है.महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन,निरूपण और चित्रण को लेकर असहमति हो सकती है.मुझे खुद लगा कि इस फिल्म में व्यर्थ ही हिन्दू राष्ट्रवाद को तरजीह देने के साथ प्रचारित किया गया है.अंतिम दृश्य में महारानी लक्ष्मीबाई का ॐ में तब्दील हो जाना सिनेमाई ज्यादती है.फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कंगना रनोट ने इस फिल्म को अधिकांश दर्शकों की पसंद बना दिया है.उनका अभिनय प्रभावपूर्ण है.फिल्म के कारोबार को स्वीकार करने के साथ कंगना रनोट के योगदान की भी तारीफ होनी चाहिए थी.कंगना अपनी पीढ़ी की चंद अभिनेत्रियों में से एक हैं,जो नारी प्रधान फिल्म को प्रचलित फिल्मों के समकक्ष लेकर आई हैं.
कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ के बारे में अभी तक सोशल मीडिया पर फिल्म बिरादरी के महाराथियीं की हलचल नहीं दिख रही है.करण जौहर से लेकर अमिताभ बच्चन तक चुप हैं.अमिताभ बच्चन तो हर नए-पुराने कलाकार की तारीफ़ करते नहीं चूकते.हस्तलिखित प्रशंसापत्र और गुलदस्ता भेजते हैं.हो सकता है कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी हो,लेकिन...करण ज़ोहर और कंगना रनोट का वैमनस्य हम सभी जानते है.उनके ही शो में कंगना ने उन्हें बेनकाब कर दिया था.उसके बाद से मुद्दे को लतीफा बना कर हल्का करने में करण जौहर सबसे आगे रहते हैं.उनके गिरोह ने एक अवार्ड शो में खुलेआम नेपोटिज्म का मजाक उड़ाया और बाद में माफ़ी मांगी.गौर करें तो यह नेपोटिज्म का दूसरा पक्ष और पहलू है,जब आप खुद के परिचितों और मित्रों के दायरे के बाहर की प्रतिभाओं की मौजूदगी और कामयाबी को इग्नोर करते हैं.अब तो कंगना ने नाम लेकर कहना शुरू कर दिया है.ताज्जुब यह है कि इसके बावजूद महारथियों के कान पर जूं नहीं रेंग रही है.
महारथियों का मौन भी दर्ज हो रहा है.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद,खेमेबाजी,लॉबिंग जैम कर चलती रही है.बार-बार एक परिवार होने का दावा करने वाली फिल्म इंडस्ट्री वास्तव में एक ही हवेली के अलग-अलग कमरों में बंद है.और वे चुन-चुन कर दूसरों के कमरों में जाते हैं या अपने कमरे में उन्हें बुलाते हैं.हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बैठकी में सभी(खास कर बाहरी प्रतिभाओं) के लिए आसन नहीं होता.हाँ,अनुराग कश्यप जैसा कोई पालथी मार कर बैठ जाये तो उसे कुर्सी दे दी जाती है.


Wednesday, January 30, 2019

सिनेमालोक : बहुभाषी सिनेमा बेंगलुरु में


सिनेमालोक
बहुभाषी सिनेमा बेंगलुरु में
-अजय ब्रह्मात्मज
हाल ही में बेंगलुरु से लौटा हूँ.पिछले शुक्रवार को बेंगलुरु में था.आदतन शुक्रवार को वहां के मल्टीप्लेक्स में ताज़ा रिलीज़ ‘मणिकर्णिका’ देखने गया.आशंका थी कि कन्नड़भाषी प्रान्त कर्णाटक की राजधानी बेंगलुरु में न जाने ‘मणिकर्णिका’ को प्रयाप्त शो मिले हों कि नहीं मिले हों.मुंबई और उत्तर भारत में यह बात फैला दी गयी है कि कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री ने राज्य सरकार पर दवाब डाल कर ऐसा माहौल बना दिया है कि हिंदी फिल्मों को सीमित शो मिलें.कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री को बचने और चलाये रखने के लिए यह कदम उठाया गया था.यह स्वाभाविक और ज़रूरी है. महाराष्ट्र में महाराष्ट्र सरकार ने मल्टीप्लेक्स में प्राइम टाइम पर मराठी फिल्मों के शो की अनिवार्यता से स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री को संजीवनी दी है.यह कभी सोचा और लागू किया गया होगा.पिछले हफ्ते का मेरा अनुभव भिन्न और आदर्श रहा.अगर सारे मेट्रो शहरों के मल्टीप्लेक्स में ऐसी स्थिति आ जाये तो भारतीय फिल्मों के लिए वह अतिप्रिय आदर्शवादी बात होगी.
मैं पास के मल्टीप्लेक्स में सुबह 10 बजे के शो के लिए गया था.उस मुल्त्प्लेक्स में ‘मणिकर्णिका’ के सात शो थे.टिकट के लिए क़त़ार में लगा था.उत्सुकता थी कि किस फिल्म के लिए यह क़त़ार लगी है.मेरे आगे के पांच-सात दर्शकों में से केवल एक ने ‘मणिकर्णिका’ का टिकट लिया.एक ने ‘ठाकरे’(मराठी} का टिकट लिया.बाकि ने तमिल और तेलुगू के टिकट लिए.उस मल्टीप्लेक्स के छः स्क्रीन में अलग-अलग भाषाओँ की फ़िल्में कगी थीं और सभी के दर्शक उस कतार में थे.हमारे मेट्रो शहर कॉस्मोपॉलिटन हो चुके हैं,लेकिन सिनेमा के दर्शकों के लिहाज से यह मेरा पहला अनुभव था.वहां कुछ फिल्मों के पोस्टर दिखे.बाद में सर्च कर मैने देखा कि उस मल्टीप्लेक्स में चार भाषाओँ की फ़िल्में चल रही थीं,जबकि बेंगलुरु शहर में सात भाषों की फ़िल्में चल रही थीं.हिंदी और अंग्रेजी के साथ कन्नड़,तेलुगू,मलयालम,तमिल.मराठी और कोरियाई की फ़िल्में शहर के सिनेमाघरों में चल रही थीं.हिंदी की ‘मणिकर्णिका’ और ‘ठाकरे’.कन्नड़ की ‘सीतराम कल्याण’ और ‘केजीएफ़’,मलयालम की ‘इरुपतियोनाम तुनांडू’,तेलुगू की ‘मिस्टर मजनू’ और तमिल की ‘विस्वासम’...सच कहूं तो यह देख और जान कर बहुत ख़ुशी हुई.मुंबई में हिंदी,अंग्रेजी,मराठी और तमिल फ़िल्में साथ चलती हैं.दिल्ली में मुमकिन है पंजाबी और भोजपुरी की फ़िल्में चलती हों.अगर सभी बड़े शहरों में देश की भाषाओँ के दर्शक मिलें तो उनको भाषाओँ की फ़िल्में भी लगेंगी और दोस्तों-पैचितों के साथ दर्शक दूसरी भाषाओँ की फ़िल्में देख कर आनंदित होंगे.
कुछ हफ्ते पहले एक शोध के दरम्यान मैंने जाना कि बेंगलुरु हिंदी फिल्मों का तीसरा बड़ा मार्किट हो चुका है.मुंबई और दिल्ली के बाद उसी का स्थान है.पहले हैदराबाद तीसरे नंबर पर था.गौर करें तो पिछले पांच सालों में आईटी उद्योग में आई तेज़ी से बेंगलुरु में उत्तर भारत से युवकों की आमद बढ़ी है.वे नौकरियों के लिए सुरक्षित शहर बेंगलुरु को चुन रहे हैं.उत्तर भारत की कामकाजी लड़कियां भी बेंगलुरु को प्राथमिकता दे रही हैं.हो ये रहा है कि उत्तर भारत के नौकरीपेशा अभिभावक रिटायर होने के बाद अपनी संतानों के साथ रहने के लिए बेंगलुरु शिफ्ट हो रहे हैं.ये युवक और उनके परिवार हिंदी फिल्मों के मुख्या दर्शक हैं.उनके साथ दूसरी भाषाओँ के दोस्त-परिचित भी हिंदी फिल्मों के दर्शक हो जाते हैं.इस तरह होंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.
आने वाले समय में बेंगलुरु में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गुणात्मक इजाफा होगा.वहां के इस ट्रेंड को राजस्थान के हिंदी अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ ने बहुत पहले समझ लिया था.हिन्दीभाषी पाठकों के लिए यहाँ अख़बार एक दशक पहले से ही वहां से प्रकाशित हो रहा है.मुझे पूरी उम्मीद है के दुसरे मीडिया हाउस भी इस दिशा में सोच रहे होंगे.हिंदी फिल्मों के सन्दर्भ में मुझे लगता है की निर्माताओं और प्रोडक्शन घरानों को हिंदी फिल्मों की मार्केटिंग में बेंगलुरु को ध्यान में रख कर प्लानिंग करनी चाहिए.अभी सारा फोकस मुंबई,दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ शहरों में होता है.सच्चाई यह है कि उत्तर भारत में सिनेमाघर नहीं हैं.ज़रूरी है कि जहाँ सिनेमाघर और दर्शक हैं,वह प्रचार हो. बहुभाषी दर्शकों के बीच हिंदी दर्शकों को समय से जानकारी मिले.

Tuesday, January 22, 2019

सिनेमालोक : एनएम्आईसी सरकार का सराहनीय कदम


सिनेमालोक : एनएम्आईसी सरकार का सराहनीय कदम 
पिछले शनिवार को प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा का उद्घाटन किया.यह मुबई के पेडर रोड स्थित फिल्म्स डिवीज़न के परिसर में दो इमारतों में आरम्भ हुआ है.पिछले दो दशकों के टालमटोल और कच्छप गति से चल रही प्रगति के बाद आख़िरकार इसका शुभारम्भ हो गया.प्रधान मंत्री ने समय निकाला.वे उद्घाटन के लिए आये.ऐसा नहीं है कि उद्घाटन की औपचारिकता निभा कर वह निकल गए.उन्होंने पहले संग्रहालय का भ्रमण किया.खुद देखा.सराहना की और फिर 50 मिनट लम्बा भाषण दिया.इस भाषण में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की उपलब्धियों की तारीफ की.उसे उभरते सॉफ्ट पॉवर के रूप में स्वीकार किया. उन्होंने फिल्म व्यवसाय के अनेक आयामों को छूते हुए कुछ घोषनाएँ भी कीं.वे इस अवसर पर प्रफ्फुल्लित नज़र आ रहे थे.उन्होंने भाषण में अपने निजी अनुभवों को शेयर किया और बार-बार कहा कि आप सभी का योगदान प्रसंसनीय है.उन्होंने मंच से कुछ फिल्मकारों और हस्तियों के नाम लिए और उनके व्यापक योगदान को रेखांकित किया.
नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा(एनएमआईसी) के लिए कोई हिंदी पर्याय नहीं सोचा गया है.फिल्म डिवीज़न के साईट पर एनएम्आईसी ही लिखा हुआ है.वहां क्लिक करने पर फ़िलहाल उपलब्ध जानकारियां अंग्रेजी में ही लिखी राखी हैं.यह विडंबना और सच्चाई है कि भारतीय सिनेमा की बातें अंग्रेजी में होती हैं और दावा किया जाता है कि फिल्मों के इतिहास से देश की आम जनता(दर्शक) को वाकिफ कराना है.अगर आप सिर्फ भारतीय भाषाएँ जानते हैं तो नावाकिफ ही रहें.है न सोचनीय बात? इसे राष्ट्रीय सिनेमा संग्रहालय कहा जा सकता है.इससे संबंधित जानकारियां देश की सभी भाषाओँ में उपलब्ध होनी चाहिए.कोई भी दर्शक अपनी भाषा में इसका ऑडियो सुन सके.उम्मीद है एनएम्आईसी के संबंधित अधिकारी इस दिशा में ध्यान देंगे.
बताया गया है कि एनएम्आईसी में सिनेमा के विकास के साथ देश के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास की झलक प्रदर्शित होगी.आरंभिक काल से इसकी प्रवृतियों और प्रभाव का आकलन होगा.यह एक शोध केंद्र के रूप में विकसित किया जायेगा,जहाँ समाज पर सिनेमा के प्रभाव से संबंधित विषयों पर शोध होंगे.फिल्मप्रेमियों और अध्येताओं के लिए यहाँ प्रसिद्द निर्देशकों,निर्माताओं,संस्थानों आदि की गतिविधियों और कार्यों की प्रदर्शनी लगायी जाएगी.फिल्मकारों और फिल्म छात्रों के लिए सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित किये जायेंगे.इसके साथ ही फिल्म आन्दोलन के प्रति भविष्य की पीढ़ियों की रूचि जगाने की गतिविधियाँ भी होंगी.ये सभी कार्य बेहद महत्वपूर्ण और सिने संस्कार के लिए ज़रूरी हैं.हम सभी जानते हैं कि भारतीय सिनेमा के चौतरफा विकास और पहुँच ने विदेशी सिनेमा को अभी तक भारतीय बाज़ार में मजबूत नहीं होने दिया है.हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओँ की फ़िल्में दर्शक देखते हैं.कोशिश यह चल रही है कि कैसे उन्हें इंटरनेट युग में भी संतुष्ट रखा जाये और सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने की उनकी आदत बनी रहे.
पुणे में फिल्म आर्काइव है.वहां फिल्म संरक्षण का काम होता है.कुछ दिक्कतों और कमियों के बावजूद नेशनल आर्काइव का कार्य प्रशंसनीय है.वहां सुविधाएँ बढाने की ज़रुरत है. एनएम्आईसी सिनेमा के प्रदर्शन का कार्य करेगा.आर्काइव और म्यूजियम की भूमिकाएं अलग होती हैं.दर्शकों की रूचि जगाने और उन्हें जानकारी देने का फौरी काम म्यूजियम करता है.कहते हैं कि एशिया में कहीं और ऐसा म्यूजियम नहीं है.हो भी नहीं सकता,क्योंकि किसी और देश में सिनेमा भारत की तरह विकसित और स्वीकृत नहीं है. एनएम्आईसी की साल भर के कार्यक्रमों और गतिविधियों से पता चलेगा कि यह किस हद तक आम दर्शकों के काम आ रहा है?अपने देश की दिक्कत है कि संस्थान बन जाते हैं.उनके उद्देश्य तय हो जाते हैं.और फिर कोई अयोग्य अधिकारी उस संस्थान के मूल उद्देश्यों को ही पूरा नहीं कर पता. एनएम्आईसी को देश के दूसरे शहरों में घूमंतू कार्यक्रमों की परिकल्पना करनी होगी. शोधार्थियों और छात्रों के लिए अध्ययन और शोध की सुविधाएँ देनी होंगी.शोध के कार्य को बढ़ावा देने के लिए फेलोशिप और अनुदान की व्यवस्था करनी होगी.सिनेमा के शिक्षा केन्द्रों और विश्वविद्यालयों से भी एनएम्आईसी को जोड़ना होगा.
फ़िलहाल शुरूआत है.तमाम आशंकाओं और सवालों के बीच हमें सरकार के इस सराहनीय कदम की तारीफ करनी चाहिए.

Tuesday, January 8, 2019

सिनेमालोक : चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी

सिनेमालोक
चाहिए कंटेंट के साथ कामयाबी
-अजय ब्रह्मात्मज
2018 में रिलीज हुई फिल्मों के आधार पर ट्रेन और निष्कर्ष उनकी बात करते हुए लगभग सभी समीक्षकों और विश्लेषको ने स्त्री अंधाधुंध और बधाई हो का उल्लेख करते हुए कहा कि दर्शक अब कंटेंट पसंद करने लगे हैं. संयोग ऐसा हुआ कि खानत्रयी(आमिर,शाह रुख और सलमान) की फिल्में अपेक्षा के मुताबिक शानदार कारोबार नहीं कर सकीं.बस,क्या था? खान से बेवजह परेशान विश्लेषकों ने बयान जारी करने के साथ फैसला सुना दिया कि खानों के दिन लद गए.27 सालों के सफल अडिग कैरियर में चंद फिल्मों की असफलता से उनके स्टारडम की चूलें नहीं हिलेंगी.हां, उन्हें अपनी उम्र के अनुसार भूमिकाएं चुनते समय दर्शकों की बदलती अभिरुचि का खयाल रखना होगा.उदीयमान सितारों राजकुमार राव,आयुष्मान खुराना और विकी कौशल को 2019 में रिलीज हो रही फिल्मों से साबित करना होगा कि वे ताज़ा स्टारडम के काबिल हैं.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कंटेंट प्रधान छोटी फिल्मों का ज़िक्र करते समय हम उन फिल्मों के ही नाम गिनाते हैं,जिन्होंने 100 करोड़ या उसके आसपास का कारोबार किया.इसी लिहाज से 'स्त्री' और ' बधाई हो' उल्लेखनीय फिल्में हो गयी हैं.बेहतरीन होने के बावजूद हम 'अंधाधुन' का नाम उन दोनों के बाद ही ले रहे हैं.खुले दिल से हम भले ही स्वीकार न करें,लेकिन सच्चाई यही है कि कारोबार और कमाई ही हम सभी के लिए लोकप्रियता और श्रेष्ठता का प्रमाण है.अन्यथा 2018 की श्रेष्ठ फिल्मों की सूची में 'गली गुइयां' और 'तुम्बाड' शामिल रहती। दरअसल, कामयाबी के लिहे भी चेहरे चाहिए और 100 करोड़ का आंकड़ा.

दर्शकों की पसंद-नापसंद का कोई सामान्य नियम नही है.और न कोई ऐसा फार्मूला है कि ट्रेंड और कामयाबी मापी जा सके. पिछले साल की 13 सौ करोड़ी फिल्मों पर ही नज़र डालें तो हिस्टोरिकल,सोशल,कॉमेडी,एक्शन और हॉरर फिल्में दर्शकों को पसंद आईं। दर्शकों को तो साल के आझिरी हफ्ते में रिलीज 'सिंबा' भी पसंद आई,जिसमें कुछ भी मौलिक नहीं था.जिस कंटेंट और दर्शकों की बदलती पसंद की दुहाई दी जा रही है,वह 'सिंबा' में कहां थी? दर्शकों को नई और मौलिक कहानियां पसंद आती हैं,लेकिन उन्हें समयसिद्ध फार्मूला फिल्में भी पसंद आती हैं.कंटेंट नया हो या घिसा-पिटा... अगर मनोरंजन मिल रहा है दर्शक टूट पड़ते हैं.दर्शकों को अगर भनक भी लग जाये कि निर्माता-निर्देशक उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं तो वे लोकप्रिय स्टारों की फिल्में भी ठुकरा देते हैं.हर साल कुछ स्थापित और लोकप्रिय स्टारों और निर्देशकों को दर्शकों की तरफ से अस्वीकृति का तमाचा लगता है.कई बार दर्शक अनजाने में बेहतरीन फिल्मों तक नहीं पहुंच पाते.पर्यापत प्रचार नहीं होने से दर्शक उनसे अनजान राह जाते हैं.
वास्तव में दर्शकों को कामयाब कंटेंट चाहिए.फिल्मों का कारोबार अच्छा होता है तो वे ललकते हैं.कुछ फिल्में कलेक्शन और कारोबार की वजह दर्शकों की पसंद बन जाती हैं. सच कहें तो दर्शक और समीक्षक बेहतरीन फिल्मों के विवेक से वंचित हैं.फिलहाल बाजार हावी है.वह बहुत कुछ निर्धारित कर रहा है।