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Tuesday, December 4, 2018

सिनेमालोक : तापसी पन्नू


सिनेमालोक
तापसी पन्नू
दिसंबर आरभ हो चुका है.इस महीने के हर मंगलवार को 2018 के ऐसे अचीवर को यह कॉलम समर्पित होगा,जो हिंदी फिल्मों में बहार से आए.जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान हासिल की.2018 में आई उनकी फिल्मों ने उन्हें खास मुकाम दिया.
हम शुरुआत कर रहे हैं तापसी पन्नू से.2012 की बात है.तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म ‘चश्मेबद्दूर रिलीज होने वाली थी. चलन के मुताबिक तापसी के निजी पीआर ने उनके साथ एक बैठक तय की.पता चला था कि दक्षिण की फिल्मों से करियर आरम्भ कर दिल्ली की यह पंजाबी लड़की हिंदी में आ रही है.पहली फिल्म के समय अभनेता/अभिनेत्री थोड़े सहमे और डरे रहते हैं.तब उनकी चिंता रहती है कि कोई उनके बारे में बुरा न लिखे और उनका ज़रदार स्वागत हो.तापसी भी यही चाहती रही होंगी या यह भी हो सकता है कि पीआर कंपनी ने उन्हें भांप लिया हो.बहरहाल अंधेरी के एक रेस्तरां में हुई मुलाक़ात यादगार रही थी.यादगार इसलिए कह रहा हूँ की,उसके बाद तापसी ने हर मुलाक़ात में पहली भेंट का ज़िक्र किया.हमेशा अच्छी बातचीत की.अपनी तैरियों और चिंताओं को शेयर किया.अपना हमदर्द समझा.कामयाबी के साथ आसपास हमदर्दों और सलाहकारों की भीड़ लग जाती है.ऐसे में संबंध टूटते हैं,लेकिन तापसी ने इसे संभाल रखा है.
बहरहाल,तापसी ने ‘चश्मेबद्दूर से शुरुआत कर ‘बेबी से बड़ी धमक दी.’बेबी में तापसी की भूमिका छोटी लेकिन महत्वपूर्ण थी.शबाना खान इ भूमिका ने तापसी ने अपनी फूर्ती और मेधा से चकित किया था.अक्षय कुमार के होने के बावजूद वह दर्शकों और समीक्षकों को याद रह गयी थीं.यह उस भूमिका का ही कमाल था कि बाद में नीरज पाण्डेय ने ‘नाम शबाना फिल्म बनायीं और उस किरदार को नायिका बना दिया.’नाम शबाना का निर्देशन शिवम नायर ने किया था.इसके पहले अनिरुद्ध राय चौधरी के निर्देशन में ‘पिंक आ चुकी थी.’पिंक में तापसी ने मीनल अरोड़ा की दमदार भूमिका में ज़रुरत के मुताबिक एक आधुनिक लड़की की हिम्मत का परिचय दिया था.’पिंक अपने विषय की वजह से शहरी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गयी थी.इं दोनों फिल्मों के बाद जब तापसी ने ‘जुड़वां 2 चुनी तो उनके खास प्रशंसकों को परेशानी हुई.तब तापसी ने कहा था की वह मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा और हाई कांसेप्ट सिनेमा के बीच तालमेल रखना चाहती हैं.वह अपने दर्शकों का विस्तार चाहती हैं.
2018 में तापसी पन्नू की ‘सूरमा,’मुल्क और ‘मनमर्जियाँ’ फ़िल्में आयीं हैं.तीनों ही फ़िल्में अलग मिजाज की हैं.’सूरमा में वह हाकी प्लेयर हैं,जो अपने प्रेमी संदीप सिंह से दूर जाने का मुश्किल फैसला लेती है ताकि वह अपने खेल और रिकवरी पर ध्यान दे सके.अनुभव सिन्हा निर्देशित ’मुल्क में वह वकील आरती मल्होत्रा की भूमिका में है.आरती ने मुस्लिम लड़के से शादी की है.वह अपने ससुराल के पक्ष में कोर्ट में कड़ी होती है और मुसलमानों के प्रति बनी धारणाओं को तर्कों से तोडती है.अनुराग कश्यप की ‘मनमर्जियाँ’ में वह आजाद ख्याल रूमी बग्गा के किरदार में खूब जंची हैं.यह तो स्पष्ट है कि तापसी पन्नू अभि तक किसी एक इमेज में नहीं बंधी हैं.वह प्रयोग कर रही हैं.
तापसी पन्नू हिंदी फिल्मों की टिपिकल हीरोइन बन्ने से बची हुई हैं.यह एक अभिनेत्री के लिए तो सही है,लेकिन एक स्टार अभिनेत्री को मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों की ज़रुरत होती है.किसी लोकप्रिय स्टार के साथ रोमांटिक भूमिका में आने से उनके दर्शक बढ़ते हैं,तापसी भी यह चाहती हैं.अभि तक लोकप्रिय स्टार उनसे दूर-दूर हैं.अगर बात नहीं बिगड़ी होती तो वह आमिर खान की बेटी की भूमिका में ‘दंगल में दिखी होतीं. हो सकता है उसके बाद उनके करियर की दिशा अलग हो जाती. ‘दंगल न हो पाने का एक फायदा हुआ कि तापसी नए निर्देशकों की पसंद बनी हुई हैं,उन्हें लगता है कि अलग किस्म की भूमिकाओं में तापसी को चुना जा सकता है.’तड़का और ‘बदला उनकी अगली फ़िल्में हैं.
हिंदी फिल्मों में बाहर से आई अभिनेत्रियों के लिए टिक पाना ही मुश्किल होता है.ताप पन्नू ने तो अपनी पहचान और प्रतिष्ठा हासिल कर ली है.फिर भी हिंदी फिल्मों के केंद्र में अभि वह नहीं पहुंची हैं.म्हणत के साथ ही उन्हें फिल्मों के चुनाव के प्रति भी सजग रहना होगा.उन्हें बड़े बैनर और बड़े निर्देशकों के साथ फ़िल्में करनी होंगी.लोकप्रियता और स्टारडम का यही रिवाज़ है.


Wednesday, November 21, 2018

सिनेमालोक : ठगे गए दर्शक,लुट गए निर्माता


सिनेमालोक
ठगे गए दर्शक,लुट गए निर्माता
-अजय ब्रह्मात्मज
दीवाली के मौके पर रिलीज हुई ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ ने पहले दिन ही 50 करोड़ से अधिक का कलेक्शन कर एक नया रिकॉर्ड बना दिया.फिर तीन दिनों में 100 करोड़ क्लब में फिल्म आ गयी. चार दिनों के वीकेंड में 123 करोड़ के कुल कलेक्शन की विज्ञप्ति आ चुकी है.कमाई के इन पड़ावों के बावजूद ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के बारे में आम धारणा बन चुकी है कि इस फिल्म को दर्शकों ने नापसंद कर दिया है.यह फिल्म अपेक्षा के मुताबिक दर्शकों को लुभा नहीं सकी. नतीजतन फिल्म का कारोबार लगातार नीचे की ओर फिसल रहा है.ट्रेड पंडित हैरान नहीं हैं.उनहोंने तो पहले दिन ही घोषणा कर दी थी.उसके बाद शायद ही किसी समीक्षक ने फिल्म की तारीफ की हो.फिल्म देख कर निकले दर्शक सोशल मीडिया और लाइव रिव्यू में फिल्म से निराश दिखे..
पहली बार तो ऐसा नहीं हुआ है,लेकिन हाल-फिलहाल की यह बड़ी घटना है जब किसी फिल्म ने दोनों पक्षों को निराश किया.’ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ की घोषणा के समय से दर्शकों की उम्मीदें अमिताभ बच्चन और आमिर खान की जोड़ी से बंध गयीं.हिंदी फिल्मों के सन्दर्भ में यह बड़ी घटना है.दो पीढ़ियों के लोकप्रिय अभिनेताओं के साथ आने से यह आस बनी थी कि परदे पर परफारमेंस बिजली चमकेगी और संवाद अदायगी के बादल गरजेंगे.यशराज फिल्म्स के बैनर में बन रही कॉस्टयूम और पीरियड फिल्म के निर्माण में हो रहे भारी खर्च से भव्य मनोरंजन(बाहुबली किस्म का) का अंदाजा था.ऊपर से ‘धूम 3 के निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य के हाथों में कमान होने से लग रहा था कि पिछली फिल्म के जैसा ही कुछ रोचक ड्रामा दिखेगा.’धूम 3’ में भी आमिर खान और कट्रीना कैफ थे.पहले दिन इन उम्मीदों की वजह से ही दर्शक उमड़े,लेकिन सारी उम्मीदें धरी रह गयीं.आम दर्शक और खास समीक्षक दोनों ही थिएटर से निराश निकले और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर निगेटिव टिपण्णी,कटाक्ष,वीडियो और मीम का ताँता लग गया.हर तरफ से फिल्म की बुराई होने लगी.
फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं,लेकिन यह फिल्म आमिर खान की है.पिछली कुछ फिल्मों(पीके,दंगल,सीक्रेट सुपरस्टार आदि) की सफलता का सेहरा.आमिर खान के माथे बंधता रहा है,इसलिए असफलता का ठीकरा भी उनके माथे फूटा है.यह सही भी है.जानकारों के मुताबिक आमिर खान ने फिल्म के लिए हाँ कहने के बाद पूरी स्क्रिप्ट फिर से लिखवाई.ऐसा कहा और माना जाता है कि आमिर खान का स्क्रिप्ट सेंस जबरदस्त है.उनसे कोई चूक नहीं होती.ऐसे में उनके सुझाओं को तरजीह दी जाती है.फिल्म के लेखन से लेकर एडिटिंग तक में आमिर खान की सक्रिय भागीदारी रही.अन्य फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में भी आमिर खान इन्वोल्व रहे.उन्होंने ही फिल्म को वह रंग और शेप दिया,जो दर्शकों के बीच आया.विजय कृष्ण आचार्य फिल्म के निर्देशक और कप्तान हैं,लेकिन फिल्म के कोच आमिर खान हैं.उन्होंने ने ही फिल्म की विधि और रणनीति तय की.फ़िल्में असफल होती हैं तो मुख्या सितारे खामोश हो जाते हैं.यही ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ के साथ हो रहा है.
फिल्म के शीर्षक से भ्रांति बढ़ी.सभी को यही लग रहा था कि यह फिल्म 18-19वीं सदी में सक्रिय और अंग्रेजों के सिरदर्द बने ठगों पर आधारित होगी.बहुत बाद में आमिर खान ने बताना शुरू किया कि यह ठगों की प्रचलित कहानी पर आधारित नहीं है.विजय कृष्णा आचार्य ने काल्पनिक कहानी लिखी है और एक फंतासी गढ़ी है.लगातार अंग्रेजी फ़िल्में देख रहे दर्शक और समीक्षक फिल्म की प्रस्तुति,किरदारों के गठन,लुक और निर्वाह,सेट और सजावट में विदेशी फिल्मों की झलक देखते-खोजते रहे.शहरों के एक बड़े तबके को ऐसा लगता है कि फिल्म का वीएफ़एक्स साधारण कोटि का है.इन दिनों नेटफ्लिक्स और दूसरे लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म पर सभी देशों की बेहतरीन फ़िल्में उपलब्ध हैं.तकनीक के स्तर पर अब कोई भी कोताही झट से पकड़ी जाती है.हिंदी फिल्मों के युवा निर्देशक फिल्मों में भारतीय इमोशन लाने में विफल हो रहे हैं.इस फिल्म के किरदारों में भावनात्मक आवेग नदारद है.संबंधों का गाढ़ापन नहीं है.अधिकांश युवा निर्देशक भारतीय फिल्मों की मेकिंग,शैली और परंपरा से खुद को अलग कर आधुनिक होने की कोशिश में ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान जैसी गलतियाँ कर रहे हैं.
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान अपनी लागत और भव्यता की वजह से नुकसान में है. अब एक ही उम्मीद बची है कि अगर यह फिल्म चीन में दर्शकों को पसंद आये तो आंकड़े और कमाई में थोड़ी बढ़त हो जाए.आमिर खान की फ़िल्में चीन में अच्छा कारोबार करती रही हैं.

Monday, November 12, 2018

सिनेमालोक : लोकप्रियता का नया पैमाना


सिनेमालोक
लोकप्रियता का नया पैमाना
-अजय ब्रह्मात्मज
सोशल मीडिया के विस्तार से फिल्मों के प्रचार को नए प्लेटफार्म मिल गए हैं.फेसबुक,इंस्टाग्राम,ट्विटर और यूट्यूब....सोशल मीडिया के चरों प्लेटफार्म किसी भी फिल्म के प्रचार के लिए मह्त्वपूर्ण हो गए हैं.उनके लिए खास रणनीति अपनाई जा रही है.कोशिश हो रही है कि ज्यादा से ज्यादा यूजर और व्यूअर इन प्लेटफार्म पर आयें.जितनी ज्याद तादाद,निर्माता-निर्देशक और स्टार की उतनी बड़ी संतुष्टि.आरंभिक ख़ुशी तो मिल ही जाती है.ख़ुशी होती है तो जोश बढ़ता है और फिल्म के प्रति उत्सूकता घनी होती है.इन दिनों फिल्मों की कमाई और कामयाबी के लिए वीकेंड के तीन दिन ही थर्मामीटर हो गए हैं.वीकेंड के तीन दिन के कलेक्शन से पता चल जाता है कि फिल्म का लाइफ टाइम बिज़नस क्या होगा?शायद ही कोई फिल्म सोमवार के बाद नए सिरे से दर्शकों को आकर्षित कर पा रही है.
पिछले हफ्ते ‘जीरो’ और ‘2.0’ के ट्रेलर जारी हुए.मुंबई के आईमैक्स वदला में प्रशंसकों और मीडिया के बीच ट्रेलर जरी कर निर्देश आनद एल राय ने अपने स्टार श रुख खान,अनुष्का शर्मा और कट्रीना कैफ के साथ मीडिया को संबोधित किया.मुख्या रूप से शाह रुख खान से ही सवाल किये जा रहे थे और वही जवाब भी दे रहे थे.निर्माता-निर्देशक ने फिल्म की कथाभूमि मेरठ का फील देने के लिए वहां के घंटाघर का कटआउट लगाया था.मेरठ के स्वाद की भी व्यवस्था की गयी थी.इन आकर्षणों के साथ शाह रुख खान का जन्मदिन भी था.लिहाजा ट्रेलर के यूट्यूब पर आते ही दर्शक और प्रशंसक टूट पड़े.दूसरी तरफ रजनीकांत और निर्देशक शंकर की टीम ने ‘2.0 के ट्रेलर लांच का आयोजन चेन्नई में किया था.मुंबई से अक्षय कुमार भी वहां गए थे.’2.0 मूल रूप से तमिल फिल्म है.इसे हिंदी समेत अन्य भाषाओँ में भी डब किया गया है.ट्रेलर भी अनेक भाषाओँ में यूट्यूब पर चल रहे हैं.दोनोंओ ही फिल्मों के त्रलेर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी है और अभी गिनती जारी है.
‘जीरो के बारे में तो अनुमान था कि इसे दर्शकों का प्यार मिलेगा.बौने शाह रुख खान के तेवर और अंदाज को सभी देखना चाहते थे.निर्माता-निर्देशक ने ट्रेलर में कुछ छिपाया नहीं है.खास कर तीनों प्रमुख किरदारों के बारे में बता दिया है.बऊआ का खिलंदड़ा और आक्रामक अंदाज पसंद आ रहा है.बऊआ ग्रंथिहीन हीरो है.उसे अपने अधूरेपन का कोई रंज नहीं है.वह मस्त रहता है और किसी के साथ भी जुड़ कर उसकी ज़िन्दगी बदल देता है.देखते ही देखते ‘जीरो के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या करोड़ों में पहुँच गयी.’2.0 का भी यही हाल रहा.उसके व्यूअर भाषाओँ की वजह से बंट गए.इन दोनों के पहले आये ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के ट्रेलर के व्यूअर की संख्या 8 करोड़ पार कर चुकी है.क्या ये सभी इन फिल्मों के दर्शक भी होंगे?
फिल्मों के ट्रेलर के व्यूअर दर्शक में तब्दील हो पते हैं क्या?इसे मापने का अभी तक कोई सूत्र विकसित नहीं हुआ है.पिछली कुछ फिल्मों के ट्रेलर ने भी यूट्यूब पर आग लगा दी थी,लेकिन बॉक्स ऑफिस तक उस आग की गर्मी नहीं पहुंची.मीडिया के विशेषज्ञ मानते हैं कि यूट्यूब के व्यूअर और थिएटर के दर्शक अलग होते हैं.यूँ समझें कि किसी भी मॉल में रोजाना फूटफॉल हजारों और लाखों में होता है,लेकिन वास्तविक खरीददारों की संख्या उनके अनुपात में बहुत कम होती है.यही हाल व्यूअर और दर्शक के बीच के गैप में नज़र आता है.
फिर भी यूट्यूब फिल्मों की प्रति उत्सुकता और लोकप्रियता का नया पैमाना बन गया है.उसके विशेषज्ञ आ गए हैं.ट्रेलर के व्यूअर जुटाने के लिए भी ऐड दिए जाते है.उन्हें बूस्ट किया जाता है.व्यूअर की संख्या के खोखलेपन को समझते हुए भी निर्माता-निर्देशक उन तरकीबों और रणनीतियों के मद में भारी राशि खर्च कर रहे हैं.मीडिया के इन्फ़्लुऐंसर की भी मदद ली जा रही है.देखें तो सोशल मीडिया और खास कर यूट्यूब नया मैदान-ए-जंग बना हुआ है.लोकप्रियता की पहली झड़प यहाँ जीतनी होती है.

Wednesday, October 31, 2018

सिनेमालोक : मुंबई में फिल्मों की फुहार


सिनेमालोक
मुंबई में फिल्मों की फुहार  
-अजय ब्रह्मात्मज
मुंबई में इन दिनों फिल्मों की बहार है.खास कर पश्चिमी उपनगर के तीन मल्टीप्लेक्स में चल रही फिल्मों की फुहार से सिनेप्रेमी भीग रहे हैं. वे सिक्त हो रहे हैं.देश-विदेश से लायी गयी चुनिन्दा फिम्लें देखने के लिए उमड़ी दर्शकों की भीड़ आश्वस्त करती है कि इन्टरनेट प्रसार के बाद फिल्मों की ऑन लाइन उपलब्धता के बावजूद दर्शक सिनेमाघरों के स्क्रीन पर फ़िल्में देखना पसंद करते हैं.फेस्टिवल सिनेमा का सामूहिक उत्सव है.दर्शकों को मौका मिलता है कि वे अपनी रिची और पसंद के मुताबिक फ़िल्में देखें और सह्दर्शक के साथ उस पर बातचीत करें.ज्यादातर नयी फिल्मों के निर्माता,निर्देशक और कलाकार फिल्मों के प्रदर्शन के बाद दर्शकों से मुखातिब होते हैं. वे उनकी जिज्ञासाओं के जवाब देते हैं.यह सुखद अनुभव होता है.फेस्टिवल के मास्टरक्लास से अंतर्दृष्टि मिलती है और विमर्शों से सिनेमहौल की दिशा और दृष्टि मिलती है.
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने आज़ादी के बाद देश में विभिन्न कला माध्यमों के विकास के लिए अनेक संस्थाओं का गठन किया,जिनके तहत कला चेतना के विकास के लिए गतिविधियाँ आयोजित की गईं.उनमें से एक महत्वपूर्ण गतिविधि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन था.1952 में पहला फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया गया था,जिसमें सिर्फ 23 देशों की फ़िल्में आ सकी थीं.इस साल ख़बरों के अनुसार 100 से अधिक देशों की फ़िल्में प्रदर्शित होंगीं.पिछले अनेक सालों से यह फेस्टिवल अब गोवा में आयोजित होने लगा है.फिल्म फेस्टिवल के प्रति सूचना और प्रसारण मंत्रालय की बेरुखी और फिल्म निदेशालय की नौकरशाही से यह फिल्म फेस्टिवल अपनी गरिमा खो चुका है. देश के दूसरे शहरों में ज्यादा सुगठित और सुविचारित फिल्म फेस्टिवल हो रहे हैं.दर्शक अपने आसपास के शहरों के फेस्टिवल में शिरकत कर लेते हैं.देखा यह जा रहा है कि सभी फेस्टिवल में 60 से 70 प्रतिशत फ़िल्में एक सी होती हैं.दुनिया भर से चर्चित 200 फिल्मों से ही सभी काम चलाते हैं.ऐसी स्थिति में हर फेस्टिवल में जाना ज़रूरी नहीं रह जाता.अब समय आ गया है कि ये फेस्टिवल सोच-विचार का भिन्नता जाहिर करें.तात्पर्य यह की सभी फेस्टिवल की अपनी खासियत हो.मुंबई में इस तरह के कुछ आयोजन इधर पॉपुलर हुए हैं.
मुंबई का फिल्म फेस्टिवल मुंबई अकादमी ऑफ़ मूविंग इमेजेज(मामी) के तहत आयोजित होता है.श्याम बेनेगल के नेतृत्व में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य के साथ की गयी थी कि फिल्म इंडस्ट्री का एक अपना फेस्टिवल हो,जिसमें इंडस्ट्री के कलाकार और तकनीशियन भी शामिल हो सकें.साथ ही हिंदी फिल्मों की केन्द्रीय नगरी होने की वजह से भी मुंबई में ऐसे फेस्टिवल की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी.आरंभिक वर्षों में महराष्ट्र सर्कार ने भी इस फेस्टिवल की मदद की.फिर अंबानी बंधुओं ने बारी-बारी से इस फेस्टिवल के लिए आवश्यक धन प्रदान किये.अभी यह फेस्टिवल जियो और स्टार के सहयोग से संचालित हो रहा है.
अनुपमा चोपड़ा और किरण राव के नेत्रित्व में मामी फिल्म फेस्टिवल अधिक पॉपुलर और व्यापक हुआ है.अनुपमा चोपड़ा फ़िल्मकार विधु विनोद चोपड़ा की पत्नी हैं और किरण राव फिल्म स्टार आमिर खान की पत्नी हैं.दोनों की पृष्ठभूमि और पहुँच से फिल्म फेस्टिवल में लोकप्रिय चेहरों की मौजूदगी बढी.आम दर्शक भी खींचे आये.इस साल तो दर्शकों और डेलिगेट की भागीदारी इतनी ज्यादा हो गयी है कि पहले दिन टिकट बुक करने की ऑन लाइन व्यवस्था कुछ घंटों के लिए बैठ गयी.बाद में स्थिति सुधरी तो भी दर्शकों को मनपसंद फ़िल्में चुनने और देखने में भी दिक्कतें हो रही हैं.बढती भीड़ और भागीदारी को देखते हुए फेस्टिवल के नियंताओं को नयी तरकीब खोजनी पड़ेगी या मल्टीप्लेक्स की संख्या बढानी पड़ेगी.
सीमाओं और कमियों के बावजूद मामी फिल्म फेस्टिवल देश का अग्रणी फिल्म फेस्टिवल बन चूका है.यह लोकतान्त्रिक,मुखर और उदार फेस्टिवल है.गोवा का सरकारी फिल्म फेस्टिवल सरकारी सोच की संकीर्णता का शिकार है.नयी सरकार के नुमाइंदों ने अपने खेमे के अयोग्य लोगों को ज़िम्मेदारी देकर इस फेस्टिवल का स्वरुप नष्ट कर दिया है.पिछले साल के आयोजन की कमियां फेस्टिवल के दौरान ही उजागर हो गयी थीं.इस साल सिनेप्रेमियों का उत्साह नज़र नहीं आ रहा है.



Tuesday, October 23, 2018

सिनेमालोक दीपिका-रणवीर की शादी


सिनेमालोक
दीपिका-रणवीर की शादी
-अजय ब्रह्मात्मज
दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी की ट्विटर पर की गयी संयुक्त घोषणा ने मीडिया की संडे की शांति में खलबली मचा दी. धडाधड अपडेट होने लगे और उनकी पंक्तियों को दोहराया और उद्धृत किया जाने लगा.हाल-फिलहाल में शादी की घोषणा कर रही किसी फिल्म स्टार जोड़ी ने पहली बार हिंदी में भी अपना सन्देश जारी किया.इस बात के लिए हिंदी फिल्मों के दोनों स्टार बधाई के पात्र हैं.ठीक है कि वर्तनी और व्याकरण की कुछ गलतियाँ हैं.जैसे कि दीपिका का नाम ही दीपीका लिखा गया है.फिर भी जिस इंडस्ट्री में अंग्रेजी का बोलबाला है,वहां पॉपुलर स्टार की ऐसी पहल के दूरगामी प्रभाव होते हैं.
बताते हैं कि 2012 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला की शूटिंग के दरम्यान दोनों करीब आये.संजय लीला भंसाली की अगली दो फिल्मों में वे फिर से साथ रहे.शूटिंग के दिनों के लम्बे साथ में दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सके.पहली फिल्म की रिलीज के बाद से ही दोनों की नजदीकियां नज़र आने लगी थीं,लेकिन शुरू में इसे रणवीर सिंह का हाइपर अंदाज माना गया.रणवीर मौके-बेमौके अपने प्रेम का सार्वजानिक इजहार करते रहे.दीपिका की स्मित मुस्कान से स्पष्ट था कि वह भी राज़ी हैं.दीपिका का व्यवहार हमेशा संयत रहा,जबकि रणवीर सिंह बेहिचक प्रेम प्रदर्शन करते रहे.
पलट कर देखें तो दीपिका पादुकोण पुराने प्रेम संबंध से निकलने के बाद डिप्रेशन की शिकार हो गयी थीं.उस दौर में उन्हें अपने परिवार से पूरा प्यार और समर्थन मिला.मुंबई में रणवीर सिंह की समझदार संवेदना और हमदर्दी से दीपिका को संबल मिला.याद करें तो दीपिका संबंध टूटने से बिखर गयी थीं.उन्हें रणवीर सिंह ने मजबूत सहारा दिया.वह उनके साथ रहे.अपने खिलंदडपने से उन्हें हंसाते रहे.रणवीर सिंह की हरकतें ऊलजलूल लग सकती हैं,लेकिन आप ठहर कर देखें तो उनके पीछे एक सिस्टम है.एनर्जी से लबालब रणवीर अपने रिएक्शन रोक नहीं पाते हैं.वे दूसरे फिल्म स्टार की तरह गले मिलने की सिर्फ औपचारिकता नहीं निभाते.मैंने पाया है कि वे प्यार से भींचते हैं.निहाल कर देते हैं.उन्होंने डिप्रेशन में डूबी दीपिका की उंगली थामी और समय पर ज़रूरी सहारा दिया.शुरू में कुछ लोगों को यही लगता रहा कि रणवीर जबरदस्ती दीपिका से चिपकने की कोशिश करते हैं.अब उन आलोचकों की समझ में आ गया होगा कि दोनों एक-दूसरे से कितना प्रेम करते हैं.
रणवीर सिंह का फ़िल्मी करियर दीपिका के आगमन के चार साल बाद शुरू हुआ. यशराज फिल्म्स की ‘बैंड बाजा बारात से सफल लेकिन छोटी शुरुआत के बावजूद रणवीर सिंह कामयाबी की छलांगे मारते हुए अपनी पीढ़ी के पॉपुलर स्टारों की कतार में आ गए. दीपिका के साथ आई तीनों फिल्मों ने बतौर स्टार और एक्टर उनकी पोजीशन मजबूत कर दी.आखिरी फिल्म ‘पद्मावत के बाद रणवीर सिंह ने जोया अख्तर की ‘गली बॉय पूरी कर ली है और अभी रोहित शेट्टी की ‘सिम्बा’ पूरी कर रहे हैं.दीपिका ने अलबत्ता ‘पद्मावत के बाद केवल एक फिल्म की घोषणा की है.तेजाब हमले की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर बन रही बायोपिक में वह मेघना गुलज़ार के निर्देशन में काम करेंगी.वह इस फिल्म की एक निर्माता भी हैं.
कयास लगाये जा रहे हैं कि दीपिका-रणवीर की शादी के बाद उनका फ़िल्मी करियर क्या करवट लेगा? अब इस तरह का सवाल बेमानी है कि क्या शादी के बाद दीपिका फिल्मों में काम करेंगी? समय बदल चुका है.अभी की अभिनेत्रियाँ न तो प्रेम छिपाती हैं और ना शादी के बाद अपने करियर को विराम देती हैं.दर्शकों की मानसिकता और स्वीकृति भी बदली है.अब वे शादीशुदा अभिनेत्रियों को बराबर पसंद करते हैं.यह हो सकता है कि भविष्य में फिल्मों के चुनाव के मामले में दीपिका की पसंद और प्राथमिकतायें बदल जाएं.समृद्धि और सम्मान हासिल कर चुकी दीपिका से यह उम्मीद भी रहेगी कि वह फिल्मों सार्थक भूमिकाएं निभाएं.अपने स्टारडम का लाभ लेकर ऐसी फ़िल्में करें जो अबी तक किसी और दबाव की वजह से वह नहीं कर पायी हों.
दोनों के सुखी दांपत्य जीवन और फ़िल्मी करियर के लिए शुभकामनाएं!


Tuesday, October 16, 2018

सिनेमालोक : लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे

सिनेमालोक
लाहौर के दूसरे प्राण भी नहीं रहे
-अजय ब्रह्मात्मज
देश के विभाजन के बाद लाहौर के दो प्राण वहां से निकले – प्राण सिकंद और प्राण नेविले. प्राण सिकंद मुंबई आये.उन्होंने लाहौर में ही एक्टिंग आरम्भ कर दी थी. मुंबई आने के बाद वे प्राण के नाम से मशहूर हुए.पहले खलनायक और फिर चरित्र भिनेता के तौर पर अपनी अदाकारी से उन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया. दूसरे प्राण दिल्ली में रुके. उन्होंने भारतीय विदेश सेवा की नौकरी की.कला,संगीत और फिल्मों में उनकी खास रूचि रही.उन्होंने लाहौर की यादों को सह्ब्दों में लिखा और भारतीय संगीत में ठुमरी और फ़िल्मी संगीत पर अनेक निबन्ध और पुस्तकें लिखीं. उन्हें के एल सहगल खास पसंद रहे.उन्होंने के एल सहगल मेमोरियल सर्किल की स्थापना की और सहगल की यादों और संगीत को जोंदा रखा. उन्होंने भारत सरकार की मदद से सहगल की जन्म शताब्दी पर खास आयोजन किया और उनके ऊपर एक पुस्तक भी लिखी.
पिछले गुरुवार को दिल्ली में उनका निधन हुआ.उनके निधन की ख़बरें अख़बारों की सुर्खिउयाँ नहीं बन पायीं.हम नेताओं,अभिनेताओं और खिलाडियों की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द ही मंडराते रहते हैं.हमें अपने समाज के साहित्यकारों,कलाकारों और इतिहासकारों की सुधि नहीं रहती.हम उनके बारे में बेखबर रहते हैं.प्राण नेविले भारत सर्कार की विदेश सेवा से मुक्त होने के पहले से कला और संगीत के अध्ययन और दस्तावेजीकरण में व्यस्त रहे.उन्होंने ब्रिटिश राज के दिनों पर गहरा रिसर्च किया था.उनकी पुस्तकों और लेखों में उस ज़माने की कहानियों और घटनाओं का विस्तृत चित्रण हुआ है.कोठेवालियों पर उनकी पुस्तक महत्वपूर्ण मानी जाती है.नैना देवी और बेगम अख्तर के मुरीद प्राण नेविले ने दोनों प्रतिभाओं पर मन से लिखा है.
प्राण नेविले से मेरा परिचय लाहौर की वजह से हुआ.नौकरी से मुक्ति और निवृति के बाद मैं लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री पर शोध कर रहा हूँ.मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि विभाजन के पहले फिल्म निर्माण में सक्रिय लाहौर के योगदान का संचयन और उल्लेख नहीं हुआ है.भारतीय इतिहासकारों ने नए देश पाकिस्तान में होने की वजह से लाहौर का उल्लेख ज़रूरी नहीं समझा और पाकिस्तान ने विभाजन के पहले के लाहौर की गतिविधियों को पाकिस्तानी सिनेमा से बहार रखा.जाहिर तौर पर पाकिस्तान का सिनेमा 1947 के बाद आरम्भ होता है.भारतीय और हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस लुप्त कड़ी पर ध्यान देने की ज़रुरत है.शोध के सिलसिले में ही मुझे प्राण नेविले की पुस्तक लाहोर – ए सेंटीमेंटल जर्नी की जानकारी मिली.इस पुस्तक के कई चैप्टर में उन्होंने आज़ादी के पहले के लाहौरी सिनेमा के बारे में लिखा है. इसके साथ लाहौर के रोज़मर्रा ज़िन्दगी को भी उन्होंने अपने संस्मरणों में याद किया है.
पिछले दिनों लाहौर फिल्म इंडस्ट्री के अध्ययन और शोध के सिलसिले में दिल्ली में उनसे मुलाक़ात का अवसर मिला.मेरी सोच रही है कि वयोवृद्ध चिंतकों को तंग नहीं किया जाना चाहिए.इसी संकोच में उनका संपर्क मिल जाने पर भी मैंने उनसे बात नहीं की.फिर लगा कि पता नहीं आज़ादी और विभाजन के पहले के लाहौर की धडकनों को महसूस किये किसी और शख्स से मेरी कब मुलाक़ात होगी?मैंने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो वे सहज ही तैयार हो गए.उन्होंने २८ अप्रैल २०१८ को 11 बजे का समय दिया. मैं आदतन समय से पहले पहुँच गया,लेकिन वे ठीक 11 बजे ही मिले.खूब साडी बातें हुईं.उनकी बातचीत से लाहौर और वहां की फिल्म इंडस्ट्री को समझने की अंतर्दृष्टि मिली.उन्होंने अपनी किताबें मुझे भेंट में दीं.वे चाहते थे कि उनकी पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित होकर हिंदी पाठकों के बीच पहुंचे.एक प्रकाशन के संपादक आश्वासन देकर निष्क्रिय हो गए.प्राण साहेब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना चाहते थे.एक दैनिक अख़बार के फीचर प्रभारी ने सूफी संगीत पर लिखे उनके शोधपूर्ण लेक को छपने का आश्वासन दिया था.वह लेख उनके जीते जी नहीं छप पाया.
तय था कि हम फिर मिलेंगे.उन्होंने मेरे काम में रूचि दिखाई थी और हर प्रकार की मदद का वादा किया था.वे चाहते थे कि मैं जल्दी से अपना काम पूरा करूं और उन्हें दिखाऊँ.मेरा शोध अब उन जैसे लाहौरियों के लिए समर्पित होगा.

Wednesday, October 10, 2018

सिनेमालोक : यौन शोषण के और किस्से आएंगे सामने


सिनेमालोक
और किस्से आएंगे सामने
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता-नाना पाटेकर प्रसंग के किसी निदान और निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले विकास बहल का मामला सामने आ गया है. उसके बाद से कुछ और नाम आये हैं.कुछ ने तो आरोप लगने की आशंका में माफ़ी मंगनी शुरू कर दी है.अगर प्रशासन ने इस मामले को उचित तरीके से सुलझाया तो यकीं करें सकदों मामले उजागर होंगे.अनेक चेहरे बेनकाब होंगे.स्त्रियों को लेकर बढ़ रही बदनीयती की सडांध कम होगी. पिछले पच्चीस सालों के अनुभव पर यही कहना चाहूँगा की भारतीय समाज की तरह फिल्म जगत में भी औरतों के प्रति पुरुषों का रवैया सम्मानजनक नहीं है.उन्हें दफ्तर,स्टूडियो औए सेट पर तमाम सावधानी के बावजूद शर्मनाक और अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है.
सोमवार की ख़बरों के मुताबिक मुंबई पुलिस ने तनुश्री दत्ता के एफ़आईआर पर कार्रर्वाई शुरू कर दी है. गृह राज्य मंत्री दीपक केसरकर ने अस्वासन दिया था कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत दर्ज करती हैं तो मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होगी.उम्मीद की जाती है कि मुंबई पुलिस तत्परता से जांच कर जल्दी ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगी.मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोसन और उत्पीडन की बातें और शिकायतें तो चलती रहती हैं,लेकिन पहली बार मामला इतना उभर कर सामने आया है.तनुश्री दत्त के मुताबिक 2008 में 26 मार्च को एक डांस सीक्वेंस की शूटिंग के समय नाना पाटेकर ने उनके साथ अवांछित दुर्व्यवहार किया.तनुश्री दत्त ने 2008 में भी इस मेल को उठाया था,लेकिन फिल्म बॉडी और पुलिस विभाग की तरफ से उन्हें राहत नहीं मिल सकी थीं.स्थितियां ऐसी बनीं कि तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री ही छोड़नी पड़ी.दास सालों के बाद उन्होंने ने इस मेल को उठा तो उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया का भरपूर सपोर्ट मिला.मिडिया  ने हर सेलेब्रिटी से सार्वजानिक मंच पर इस प्रसंग में उनसे सवाल पूछे.कुछ उदासीन रहे और सवाल को टाल गए,लेकिन ज्यादातर फ़िल्मी हस्तियों ने सपोर्ट किया.इस वजह से दबाव बढ़ा है.
इस बीच विकास बहल का मामला भी सामने आया है.विकास बहल फैंटम के चार निदेशकों में से एक थे.फिल्मों की यह प्रोडक्शन कंपनी हफिंगटन पोस्ट में आई खबर के बाद रातोंरात डिजोल्व कर दि गयी.अब इस कंपनी के निदेशक अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवानी अफ़सोस जाहिर कर रहे हैं.अपनी भूल स्वीकार कर रहे हैं.अपने आप में यह स्वीकृति उनके अच्छे रवैये को व्यक्त करती है,लेकिन यह किसी परिणाम तक नहीं पहुँचती. इधर कंगना रनोट ने ‘क्वीन की शूटिंग के समय का हवाला देकर विशाल के व्यवहार पर सवाल खड़े करते हुए उसे यौन उत्पीडन से जोड़ दिया है.कुछ लोगों को लग रहा है कि अभी विकास बहल पर मौका देख कर चौतरफा आक्रमण हो रहा है.आरोप लग रहे हैं.इस तरह के विवादों में हमेशा कुछ लोग बेवजह ‘यह भी सच,वह भी सच’ का रवैया अपनाते हैं.वे न्याय की बात करते हुए भी अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं मिलते.दूसरे दशकों से यही देखा जा रहा की हर विवाद पर कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद ये किस्से कानाफूसियों तक रह जाते हैं.
माना और बताया जा रहा है की हालीवुड के ‘मी टू के प्रभाव में भारत की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह चेतना जगी और बढ़ी है.लड़कियां खुल कर उल्लेख कर रही हैं.भारतीय समाज महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने और उनकी बात सुनने के मामले में अभी बहुत पीछे है.सबसे पहले तो उनकी शिकायत को छुपाने-दबाने की बात की जाती है.बदनामी का खौफ दिखाया जाता है.कहीं न कहीं यह धरना घर कर चुकी है कि कोई भी परिणाम नहीं निकलता.हिंदी फिल्म इन्दुस्त्री में आवाज़ उठाने वाली लड़कियों को धीरे से किनारे कर दिया जाता है.उन्हें काम मिलना बंद हो जाता है.नतीजतन महिलाएं दशकों से ख़ामोशी की साजिश की शिकार होती रहती हैं.हर दशक में ऐसे किस्से मिलेंगे,जिनमें किसी निर्माता,निर्देशक या को-स्टार ने नयी अभिनेत्रियों के शोषण की कोशिश की है.कुछ अभिनेत्रियों ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे हादसों के संकेत दिए हैं.
वक़्त आ गया है कि हम ऐसी शिकायतों को गॉसिप से अलग कर के देखें.समाज में लड़कियों और फिल्मों में अभिनेत्रियों के प्रति अपना नजरिया बदलें.

Wednesday, October 3, 2018

सिनेमालोक : फ़िल्में और गाँधी जी


सिनेमालोक
 फ़िल्में और गाँधी जी
-अजय ब्रह्मात्मज
आज महात्मा गाँधी का जन्मदिन है. 1869 में आज ही के दिन महत्मा गाँधी का जन्म पोरबंदर गुजरात में हुआ था.मोहनदास करमचंद गाँधी को उनके जीवन कल में ही महत्मा और बापू संबोधन मिल चूका था. बाद में वे राष्ट्रपिता संबोधन से भी विभूषित हुए. अनेक समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों का मनना है कि गौतम बुद्ध की तरह ही महात्मा गाँधी के नाम और काम की चर्चा अनेक सदियों तक चलती रहेगी. गाँधी दर्शन की नई टीकाएँ और व्याख्याएं होती रहेंगी. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
महात्मा गाँधी ने अपने समय के तमाम मुद्दों को समझा और निजी अनुभवों और ज्ञान से उन पर टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं दीं. बस,इस तथ्य पर ताज्जुब होता है कि उन्होंने अपने जीवन कल में पापुलर हो रहे मनोरंजन के माध्यम सिनेमा के प्रति उदासी बरती. उनसे कभी कोई आग्रह किया गया तो उन्होंने टिपण्णी करने तक से इंकार कर दिया. क्या इसकी वजह सिर्फ इतनी रही होगी कि आधुनिक तकनीकों के प्रति वे कम उदार थे. इन पूंजीवादी आविष्कारों के प्रभाव और महत्व को समझ नहीं पाए. यह भी हो सकता है कि सिनेमा उनकी सोच और सामाजिकता में प्राथमिकता नहीं रखता हो. सच्चाई यही है कि उन्होंने सिनेमा के प्रति हमेश बेरुखी जताई. उसके भविष्य के प्रति आशंका भी जाहिर की. उन्हें फ़िल्में देखने का शौक नहीं रहा. फ़िल्मी हस्तियों से उनका मिलना-जुलना नहीं होता था. केवल चार्ली चैप्लिन के साथ उनकी एक तस्वीर कभी-कभार दिखाई पड़ जाती है.
सन्‌ 1927 में इंडियन सिनैमेटोग्राफ कमेटी ने उनकी राय जानने के लिए एक प्रश्नावली भेजी तो गाँधी जी ने उसका नकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने जवाब में लिखा, 'मैं आपकी प्रश्नावली के उत्तर के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति हूं। मैंने कभी कोई सिनेमा नहीं देखा और मैं इसके प्रभाव से अनभिज्ञ हूं। अगर इस माध्यम में कोई अच्छाई है तो वह अभी सिद्घ होना बाकी है।' गाँधी जी ने बाद में भी सिनेमा की अनभिज्ञता ख़त्म नहीं की. उनकी राजनीतिक सक्रियता बढती गयी.कुछ सालों के बाद भारतीय सिनेमा की रजत जयंती के मौके पर एक स्मारिका के लिए उनसे सन्देश माँगा गया तो उनके सचिव ने जवाब दिया, 'नियमत: गांधी केवल विशेष अवसरों पर संदेश देते हैं और वह भी ऐसे उद्देश्यों के लिए जिनके गुणों पर कोई संदेह न हो। सिनेमा इंडस्ट्री की बात करें तो इसमें उनकी न्यूनतम रुचि है और इस संदर्भ में किसी को उनसे सराहना की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।' अपनी पत्रिका 'हरिजन' में एक संदर्भ में उन्हों स्पष्ट लिखा, 'मैं तो कहूंगा कि सिनेमा फिल्म ज्यादातर बुरे होते हैं।'
सिनेमा के प्रति गांधी जी के कट्टर विरोधी विचारों को देखते हुए ही ख्वाजा अहमद अब्‌बास ने उन्हें एक कुला पत्र भेजा.इस पत्र के जरिए अब्बास ने गांधी जी से फिल्म माध्यम के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने की अपील की थी। अब्बास  के पत्र का अंश है - 'आज मैं आपकी परख और अनुमोदन के लिए अपनी पीढ़ी के हाथ लगे खिलौने - सिनेमा को रखना चाहता हूं। आप सिनेमा को जुआ, सट्‌टा और घुड़दौड़ जैसी बुराई मानते हैं। अगर यह बयान किसी और ने दिया होता, तो हमें कोई चिंता नहीं होती...लेकिन आपका मामला अलग है। इस देश में या यों कहें कि पूरे विश्व में आपको जो प्रतिष्ठा मिली हुई है, उस संदर्भ में आपकी राय से निकली छोटी टिप्पणी का भी लाखों जनों के लिए बड़ा महत्व है। दुनिया के एक सबसे उपयोगी आविष्कार को ठुकराया या इसे चरित्रहीन लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। बापू, आप महान आत्मा हैं। आपके हृदय में पूर्वाग्रह के लिए स्थान नहीं है। हमारे इस छोटे खिलौने सिनेमा पर ध्यान दें। यह उतना अनुपयोगी नहीं है, जितना दिखता है। इसे आपका ध्यान, आर्शीवाद और सहिष्णु मुस्कान चाहिए।'
ख्वाजा अहमद अबबास के इस निवेदन पर गांधी जी की प्रतिक्रिया नहीं मिलती। अगर वह आजादी के बाद के वर्षों में जीवित रहते और फिल्मों के प्रभाव को करीब से देख पाते तो निश्चित ही अपनी राय बदलते,क्योंकि गांधीजी अपने विचारों में कट्‌टरपंथी नहीं थे और दूसरों से सीखने-समझने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
भारतीय समाज और विश्व इतिहास में महात्मा गांधी के महत्व के संबंध में दो राय नहीं हो सकती। गांधी के सिद्घांतों ने पूरी मानवता को प्रभावित किया है। बीसवीं सदी के दो विश्व युद्घों की विभीषिका के बीच अपने अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह से उन्होंने अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। भारतीय मानस में गांधी अचेतन रूप से मौजूद हैं। लाख कोशिशों के बावजूद उनके प्रभाव को नकार नहीं जा सकता. उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
सिनेमा और खास कर हिंदी फिल्मों में हम गांधी दर्शन से कभी ‘गांधीगिरी’(लगे रहो मुन्नाभाई) तो कभी किसी और नाम से प्रेरित और प्रभावित चरित्रों को देखते रहेंगे.  



Tuesday, September 18, 2018

सिनेमालोक : भट्ट साहब की संगत

सिनेमालोक

भट्ट साहब की संगत
( महेश भट्ट की 70 वें जन्मदिन पर खास)
-अजय ब्रह्मात्मज
कुछ सालों पहले तक महेश भट्ट से हफ्ते में दो बार बातें और महीने में दो बार मुलाकातें हो जाती थीं.आते-जाते उनके दफ्तर के पास से गुजरते समय कभी अचानक चले जाओ तो बेरोक उनके कमरे में जाने की छूट थी. यह छूट उन्होंने ने ही दी थी. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बात-व्यवहार को समझने की समझदारी उनसे मिली है.उनके अलावा श्याम बेनेगल ने मेरी फिल्म पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में अंतदृष्टि दी. फिलहाल महेश भट्ट की संगत के बारे में.इसी हफ्ते गुरुवार 20 सितम्बर को उनका 70 वां जन्मदिन है.
भट्ट साहब से मिलना तो 1982(अर्थ) और 1984(सारांश) में ही हो गया था. दिल्ली में रहने के दिनों में इन फिल्मों की संवेदना ने प्रभावित किया था.समानांतर सिनेमा की दो सक्षम अभिनेत्रियों(शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल) की यह फिल्म वैवाहिक रिश्ते में स्त्री पक्ष को दृढ़ता से रखती है.घर छोड़ते समय पूजा का जवाब ऐसे रिश्तों को झेल रही तमाम औरतों को नैतिक ताकत दे गया था.इस एक फिल्म ने शबाना आज़मी को समकालीन अभिनेत्रियों में अजग जगह दिला दी थी.कई बार फिल्म के किरदार अभिनेता-अभिनेत्रियों के व्यक्तित्व को नै छवि दे देते हैं. फिर भट्ट साहब कीसारांश' ने संवेदना और सहानुभूति के स्तर पर बी वी प्रधान की पीड़ा ने हिला दिया था.एक निर्देशक से यह दर्शक का परिचय था.
संयोग कुछ ऐसा बना कि मुंबई आना हुआ.यहां फिल्म पत्रकारिता से जुड़ने का वासर मिला. अध्ययन और शोध में रूचि होने से फिल्मों की ऐतिहासिक और सामाजिक और राजनीतिक आयामों पर विचार करने की आदत पड़ी.भट्ट साहब से दो-चार सामान्य मुलाकातें हो चुकी थीं.तभी भोपाल में आयोजित एक सेमिनार में भट्ट साहब के साथ मंच शेयर करने का मौका मिला.साम्प्रदायिकता के सवालों पर केन्द्रित उस सेमिनार में मैंने महेश भट्ट की विवादित और पुरस्कृत फिल्म  ‘ज़ख्म' के हवाले से कुछ बातें की थीं.सेमिनार में मौजूद श्रोताओं और मित्रों को आश्चर्य हुआ था की कैसे कोई भट्ट साहब की आलोचना उनके सामने कर सकता है.दूसरों की सोच से लग भट्ट साहब ने हाथ मिलाने के साथ आदतन गले से लगा लिया था.
उन दिनों मैं मुंबई में दैनिक जागरण का फिल्म प्रभारी था.फिल्म पत्रकारिता के पहलुओं को समझते हुए प्रयोग कर रहा था.मुंबई पहुँचने के दो दिनों के अन्दर ही भट्ट साहब के पीआरओ का फ़ोन आया कि भट्ट साहब तुम से मिलना चाहते हैं.इस सन्देश के साथ उसने मुझ से पूछा कि तुम ने भोपाल में ऐसा क्या बोल दिया कि वे तुम से प्रभावित हैं.आकर मिलो...तय समय पर मुलाक़ात हुई.भट्ट साहब ने फिर से गले लगाया और कहा कि फिल्म पत्रकारिता में आप जैसी सोच के पत्रकारों को अधिक सक्रिय होना चाहिए.आप मुझ से मिलते रहें.अमूमन ऐसी भिडंत के बाद फिल्मी हस्तियाँ नाराज़ हो जाती हैं और नज़रन्दाज करती हैं और यहाँ भट्ट साहब खुद ही संगत का न्योता दे रहे थे.मुझे अपनी नज़र में रख रहे थे.उसके बाद मुलाकातें बढीं और फिर एक समय आया कि उनके साथ काम करने का मौका मिला.
भट्ट साहब की संगत हमेशा प्रेरक रही.मैंने उन्हें कभी निराश और हताश नहीं देखा.कई बार नाउम्मीदी से घिरने पर उनसे संबल मिलता रहा है.रिश्तों की उलझनों की ऐसी बारीक समझ कम निर्देशकों और व्यक्तियों में मिलती है.उनकी साफगोई के पीछे अनुभवों का पुलिंदा है.फिल्मों से अलग उनका एक सांस्कृतिक और दार्शनिक व्यक्तित्व है.वे घनघोर किस्म से राजनीतिक और साम्प्रदायिकता विरोधी व्यक्ति हैं.कुछ साल पहले तक वे हर विषय और मुद्दे पर बोलने के लिए तैयार मिलते थे.अभी उन्होंने खुद को सीमित कर लिया है.कुछ तो उम्र और कुछ देश का महौल ऐसा है कि विवेकी जन भी ख़ामोशी इख़्तियार कर रहे हैं.
70 वें जन्मदिवस पर भट्ट साहब को हार्दिक बधाई.


Tuesday, September 4, 2018

सिनेमालोक : पलटन की पृष्ठभूमि


सिनेमालोक

पलटन की पृष्ठभूमि
-अजय ब्रह्मात्मज
 इस हफ्ते जेपी दत्ता कीपलटनरिलीज होगी. उनकी पिछड़ी युद्ध फिल्मबॉर्डर’  और  एलओसी कारगिलकी तरह यह भी युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी हुई फिल्म है.बॉर्डर  और एलओसी कारगिल क्रमश: 1965 और 1999 में पाकिस्तान से हुए युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में थीं.पलटनकी पृष्ठभूमि चीन के साथ 1967 में हुई झडप है. इस बार जेपी दत्ता भारत के पश्चिमी सीमांत से निकलकर पूर्वी सीमांत पर डटे हैं.उन्होंने छह सालों के अंतराल पर पिछले दोनों युद्ध फिल्में बना ली थीं.पलटनपंद्रह  सालों के बाद आ रही है.
1962 में हिंदी चीनी भाई-भाई के दौर में चीन के आकस्मिक आक्रमण से देश चौंक गया था. पर्याप्त तैयारी नहीं होने से उस युद्ध में भारत की हार हुई थी.  पंचशील के प्रवर्तक और चीन के मित्र भारतीय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को भारी सदमा लगा था. हम सभी भारतीय इस तथ्य को नहीं भूल पाए हैं कि चीन ने भारत के पीठ में छुरा घोंप दिया था. उसे युद्ध में जानमाल के नुकसान के साथ देश का मनोबल टूटा था. कहते हैं नेहरु उस सदमे से कभी नहीं निकल पाए.उस युद्ध से देश ने सबक भी लिया था.
भारत  ने पूर्वी सीमांत पर सेनाओं के चौकसी बढ़ा दी थी. हथियारों से लैस करने के साथ उन्हें किसी भी संभावित युद्ध से निबटने की ट्रेनिंग मिल चुकी थी. यही वजह है कि 5 सालों के बाद 1967 के सितंबर  महीने में जब चीन ने घुसपैठ की भारतीय सैनिकों ने मुंह तोड़ पलटवार किया. उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया. 11 सितंबर 1967 को चीन में नाथुला इलाके में उपद्रव किया था. इसकी भूमिका 5-6 महीने पहले से बन रही थी. भारत बार-बार चीन को आगाह कर रहा था,लेकिन चीन 1962 की जीत के मद में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. उल्टा पत्र लिखकर 1962 की याद दिलाते हुए धमकी दे रहा था कि भारत को सावधान रहना चाहिए.
इस बार भारत ने नाथूला में चीन को अपनी मनमानी नहीं करने दी.चार दिनों में ही भारत के वीर सैनिकों ने चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया और नाथूला में भारतीय झंडा फहराया. इस झड़प में चीन के सैकड़ों सैनिकों की जानें गई. आहत चीन ने अगले महीने ही स्थान बदल कर चो ला  में घुसपैठ की. यहाँ भी भारतीय सैनिकों ने उन्हें धूल चटाई. इन झड़पों में भारतीय सेना के शौर्य गाथा के बारे में आम भारतीय अधिक नहीं जानते. जेपी दत्ता कीपलटनइन झड़पों में भारत के युद्ध नीति, कौशल और विजय की रोमांचक कहानी पर्दे पर चित्रित करेंगी. अपनी पुरानी फिल्मों की तरह जेपी दत्ता ने युद्ध के चित्रण को वास्तविक रंग दिया है. सीजी और वीएफक्स की तकनीकी मदद से फिल्म का प्रभाव बढ़ाने में सुविधा मिली है.
जे पी दत्ता की पिछली दोनों युद्ध फिल्मों में उस समय के पॉपुलर स्टार थे. उनकी वजह से फिल्म का आकर्षण थोड़ा ज़्यादा था. इस बार अपेक्षाकृत कम पॉपुलर स्टारों के साथ उन्होंने यह फिल्म बनाई है. फिल्म की बहुत अधिक चर्चा और प्रचार नहीं है. पिच्च्ली दोनों फिल्मों की जबरदस्त कामयाबी और जेपी दत्ता का नाम ही मुख्य आकर्षण है. हिंदी में युद्ध फिल्में बनाने में जेपी दत्ता का सानी नहीं है. पहले भी वह इसे साबित कर चुके हैं.
1967 में 11 सितंबर को नाथूला की घटना घटी थी. 51 सालों के बाद 7 सितंबर 2018 को यह फिल्म रिलीज हो रही है. पडोसी देशों के बीच युद्ध न होना अच्छी स्थिति है, लेकिन हो चुके युद्ध को सिनेमा के पर्दे तक ले आना भी एक जरूरी काम है.


Tuesday, August 28, 2018

सिनेमालोक : हिंदी फिल्मों के दर्शक

सिनेमालोक

हिंदी फिल्मों के दर्शक
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले 6 सालों में दिल्ली और हिंदी प्रदेशों मैं हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है. इस बढ़त के बावजूद अभी तक हिंदी फिल्मों की कमाई  में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है. ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल मुंबई की हिस्सेदारी 31.37 प्रतिशत रही है.2012 में मुंबई की हिस्सेदारी 36.28 प्रतिशत थी. लगभग 5 प्रतिशत  की कमी शिफ्ट होकर दिल्ली और दूसरी टेरिटरी में चली गई है. कारोबार के हिसाब सेभारत में 13 टेरिटरी की गणना होती है. दशकों से ऐसा ही चला रहा है. इनके नए नामकरण और क्षेत्रों के विभाजन पर कभी सोचा नहीं गया.  मसलन अभी भी सीपी, ईस्ट पंजाब और निजाम जैसी टेरिटरी चलती हैं. राज्यों के पुनर्गठन के बाद इनमें से कई टेरिटरी एक से अधिक राज्यों में फैली है. पारंपरिक रूप से दिल्ली और यूपी एक ही टेरिटरी मानी जाती है.
हिंदी प्रदेशों के हिंदी भाषी दर्शक इस भ्रमित गर्व में रहते हैं हिंदी फिल्में उनकी वजह से ही चलती हैं. सच्चाई यह है राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को मिलाने के बावजूद फिल्मों की कुल कमाई में हिंदी प्रदेशों का प्रतिशत 25 से अधिक नहीं होता. बिहार-झारखंड का ही उदाहरण लें तो इस साल बढ़त के बावजूद उनका योगदान 2.9 प्रतिशत है. मैसूर,ईस्ट पंजाब और वेस्ट बंगाल का योगदान 5 प्रतिशत से अधिक ही है. हिंदीभाषी दर्शकों को निराधार इतराने से निकलना चाहिए. कोशिश होनी चाहिए कि वे थियेटर में जाकर फिल्में देखें. जाहिर सी बात है कि हिंदी प्रदेशों में ज्यों-ज्यों  मल्टीप्लेक्स बढ़ेंगे त्यों-त्यों दशकों में इजाफा होगा.
पिछले 6 सालों में मुंबई समेत सीआई, राजस्थान, निजाम और उड़ीसा में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है, जबकि दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब,सीपी, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, आसाम और टीएनके में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढे हैं.यह परिवर्तन शुभ है. दर्शकों की तादाद फिल्मों के विषय तय करती है. गौर करें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियां मुम्बई से निकल कर देश के अंदरूनी इलाकों में जा रही हैं. निश्चित ही हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शक हैं. यह स्वाभाविक है. दिक्कत यह है कि इन दर्शकों में से अधिकांश सिनेमाघरों में जाकर फिल्में नहीं देखते.इसके कई कारण हैं. सिनेमाघर लगातार टूट और बंद हो रहे हैं.कस्बों के सिनेमाघरों पर ताले लग रहे हैं.पहले रिपीट या देर से रिलीज की सुविधा होने से छोटे सिनेमाघरों में भी फिल्में आ जाती थीं. अब नई से नई फिल्म रिलीज के दिन ही देश-विदेश में पहुंच जाती हैं.रिलीज के वीकेंड ।इन ही दर्शक फिल्में देखना चाहते हैं. सिनेमाघर न होने से वंचित दर्शक दूसरे प्लेटफार्म पर फिल्में देख लेते हैं. मुम्बई के निर्माताओं को यकीन नहीं होगा,लेकिन यही कड़वा तथ्य है कि दर्शक स्मार्टफोन पर उनकी ताज़ा फिल्में देख रहे हैं.
दर्शकों की प्राथमिकताओं का खयाल रखते हुए निर्माताआ,वितरक और प्रदर्शकों को युक्ति निकालनी पड़ेगी. मोबाइल नेटवर्क,डाटा डिस्ट्रीब्यूटर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से वे दर्शकों तक पहुंच कर खो रहे रेवेन्यू को हासिल कर सकते हैं. छोटे और स्मार्ट सिनेमाघरों के निर्माण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. काम सीटों और आधुनिक सुविधाओं से लैस सिनेमाघर हों. स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों के बाहर के शहरों-कस्बों में सिनेमाघर बनाने में प्रशासन और स्थानीय व्यापारियों का ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मौजूद मल्टीप्लेक्स में टिकट दर भी कम करना होगा.

Tuesday, August 21, 2018

सिनेमालोक : निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका


सिनेमालोक

 निक और प्रियंका : प्रशंसकों की आशंका

-अजय ब्रह्मात्मज

 अमेरिका के गायक निक जोनस और अमेरिका में नाम कमा रही भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा का अभीरोकाहुआ है. शादी अभी दूर है. दोनों में से किसी नेअभी तक इसका संकेत नहीं दिया है.रोका’(मंगनी) हुआ है तो देर-सवेर शादी भी होगी. दोनों सेलिब्रिटी हैं. उनके सामने उनका भविष्य और कैरियर हैं. जाहिर सी बात है कि फुरसत पर सुविधा होने पर दोनों परिणय सूत्र में बंध जाएंगे. अभी कहना मुश्किल है कि शादी के बाद उनका आशियाना भारत में होगा या अमेरिका में? किसी भी देश को वे अपना स्थायी ठिकाना बनाएं. इतना तय है कि दोनों में से कोई भी कैरियर से संन्यास नहीं लेगा.दोनों एक-दूसरे की जरूरतों का ध्यान रखते हुए परस्पर मदद ही करेंगे.
निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा के साथ होने से दोनों के परिजन और प्रशंसक खुश हैं. परिजनों को तो मालूम रहा होगा लेकिन प्रशंसकों के लिए इतनी जल्दबाजी में सब कुछ हो जाना हैरानी की बात है. अमूमन सेलिब्रिटी शादी जैसे बड़े फैसले में वक्त लगाते हैं. ज्यादा उन्हें अपने कैरियर का ख्याल रहता है. भारत में खुद को स्थापित करने के बाद प्रियंका चोपड़ा ने अमेरिका के टीवी और फिल्म जगत में भी जोरदार दस्तक दी है. वहां उन्हें अभी और भी मंजिलें तय करनी है .वह भारत मैं हिंदी फिल्म भी कर रही हैं. उन्होंने अपने समय और फोकस को बहुत अच्छी तरह दोनों महाद्वीपों में बांट रखा है. दूसरी तरफ निक जोनस अभी अपने करियर की चढ़ाई पर हैं. उन्हें कामयाबी के अनेक पायदान चढ़ना है.इस पृष्ठभूमि में दोनों को बहुत सोच-समझकर अपने कदम उठाने होंगे. दोनों कामयाब होने के साथ इतने समझदार हैं कि वे अपने भविष्य विवाह को लेकर उचित निर्णय ले सकें.
 प्रियंका चोपड़ा और निक जोनस  की उम्र में 11 साल का फर्क है. प्रेम और विवाह में ऐसे फर्क सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. फिल्म  बिरादरी में अनेक जोड़ियों के बीच उम्र का यह फासला रहा है. दिलीप कुमार और सायरा बानो की उम्र में 22 सालों का अंतर है. असल चीज होती है मोहब्बत और समझदारी.  बाकी उम्र तो एक अंक मात्र है. फिर भी उन दोनों के बीच से उम्र का यह अंतर और पूर्व एवं पश्चिम से होने की वास्तविकता से उनके प्रशंसक आशंकित हैं.रोकाके दिन ही उनके घोर प्रशंसक  पत्रकार ने चिंता व्यक्त की,’ क्या लगता है? दोनों की शादी चल पाएगी?’ मैंने उनकी चिंता की वजह पूछी. उनके पास कोई ठोस आधार नहीं था फिर भी वे  उन आशंकित प्रशंसकों की चिंता ही जाहिर कर रहे थे,जिन्हें लगता है कि निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा की शादी टिकने वाली नहीं है.
आज मिलेनियल पीढ़ी के इस दौर में रिश्ते स्थायी होने के पहले ही दरकने लगते हैं. ऐसा माना और कहा जाता है कि नई पीढ़ी त्याग और जिम्मेदारियों से भागती है. दबाव पड़ने पर वे एक-दूसरे का सहारा बनने के बजाय पहले मौके पर कन्नी काट लेते हैं. पिछली और पुरानी पीढ़ी ने मिलेनियल पीढ़ी के बारे में गलत धारणाएं बना रखी हैं. पीढ़ियों के अंतर के बीच पल रही ऐसी गलतफहमियां नई नहीं है. फिल्मों से ही उदाहरण लें अतीत में अनेक अभिनेत्रियों ने विदेशियों से शादी की और आज सुखी दांपत्य जीवन जी रही हैं. प्रीति जिंटा,सेलिना जेटली,श्रिया सरन और राधिका आप्टे का उदाहरण मौजूद है. प्रियंका चोपड़ा बुद्धिमान है.  खुद निक जोनस उनकी बुद्धिमत्ता के कायल हैं. हम आशंकाओं को किनारे रख कर हम तो यही चाहेंगे दोनों सुखी और संपन्न रहें.


Tuesday, August 14, 2018

सिनेमालोक : इस 15 अगस्त को

सिनेमालोक

 इस 15 अगस्त को 

-अजय ब्रह्मात्मज

कल 15 अगस्त है. दिन बुधवार... बुधवार होने के बावजूद दो फिल्में रिलीज हो रही हैं. अमूमन हिंदी फिल्में शुक्रवार को रिलीज होती हैं, लेकिन इस बार दोनों फिल्मों के निर्माताओं ने जिद किया कि वे दो दिन पहले ही अपनी फिल्में लेकर आएंगे. रिलीज की तारीख को लेकर वे टस से मस ना हुए. दोनों 15 अगस्त की छुट्टी का लाभ उठाना चाहते हैं. इस तरह उन्हें पांच दिनों का वीकेंड मिल जाएगा. इन दिनों शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों के बारे में रविवार इन दिनों में पता चल जाता है एक ऐसा व्यवसाय करेगी?  इस बार परीक्षा के लिए दोनों फिल्मों को पांच दिनों का समय मिल जाएगा.देखना रोचक होगा इन दोनों फिल्मों को दर्शक क्या प्रतिसाद देते हैं? रीमा कागटी कीगोल्डऔर मिलाप मिलन झावेरी की फिल्मसत्यमेव जयतेआमने-सामने होंगी.

पहली फिल्मगोल्डकी पृष्ठभूमि में हॉकी है. हॉकी खिलाड़ी तपन दास के नेतृत्व में 1948 में भारत ने पहला गोल्ड जीता था. पिछले रविवार को इस उपलब्धि के 70 साल होने पर देश के सात स्थापत्यों और जगहों को सुनहरी रोशनी से आलोकित किया गया था.रीमा कागटी ने सच्ची घटना पर इस फिल्म की कहानी लिखी है. कहते हैं तपन दास के बारह सालों के अथक प्रयासों से यह मुमकिन हो पाया था. आजाद भारत में इंग्लैंड की धरती पर देश का पहला गोल्ड मेडल जीता था. राष्ट्र गौरव के क्षण को हाईलाइट करने के साथ ही जीत के संघर्ष और तैयारी पर भी रीमा ध्यान देंगी. विजेता टीम बनाना उसमें जीत का जोश भरना आसान काम नहीं रहा होगा. अक्षय कुमार इस फिल्म में तपन दास की भूमिका निभा रहे हैं.  उनकी टीम में विनीत कुमार सिंह, कुणाल कपूर, अमित साध  और सनी कौशल जैसे कलाकार हैं.

 ‘गोल्डके सामनेसत्यमेव जयतेरहेगी. मिलाप मिलन झावेरी ने आज के दौर की फिल्म में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है. हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश को ग्रस्त रखा है. सीधा और ईमानदार नागरिक भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसते हैं. देश को आर्थिक नुकसान होता है. प्रगति और विकास की योजनाएं रुक जाती हैं.सत्यमेव जयतेमें  जॉन अब्राहम और मनोज बाजपेयी की टक्कर दिखेगी. पहली बार दोनों कलाकार किसी फिल्म में एक साथ आ रहे हैं. इस फिल्म की कैच लाइन है -  ‘बेईमान पिटेगा, करप्शन मिटेगा’. मनोज बाजपेयी एक बार फिर पुलिस अधिकारी की भूमिका में बहादुरी दिखाएंगे. हाल ही में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न मेंगली गुलियां' फिल्म के लिए  एक्टर अवार्ड मिला है.

गौर करें तो दोनों ही फिल्मों की थीम राष्ट्र और देश प्रेम है. इसी वजह से उनके निर्माताओं ने रिलीज के लिए 15 अगस्त का दिन चुना है. राष्ट्रीय भावना से लबरेज इस दिन को थिएटर जा रहे दर्शकों में यह फिल्में देश प्रेम और राष्ट्रीयता का संचार करेंगी. इन दिनों हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है. फिल्में किसी भी जोनर की हों . लेखक और निर्देशक की कोशिश रहती है कि किसी दृश्य, संवाद या गाने में राष्ट्र से संबंधित कुछ संदेशात्मक बातें हों.यह तरीका बहुतों को पसंद आ रहा है. अक्षय कुमार इस दौर केभारत कुमारबन गए हैं. कवि मनोज कुमार को हम इस नाम से जानते थे.  अक्षय कुमार के ठीक पीछे जॉन अब्राहम खड़े हैं. उन्होंने परमाणु’  में संकेत दिया  कि वे भी अक्षय कुमार के रास्ते पर चल रहे हैं.

देखना रोचक होगा की इस हफ्ते दर्शक किस राष्ट्रप्रेमी को अधिक पसंद करते हैं. दोनों फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों ने प्रचार का हर जोर लगा रखा है. वे दर्शकों को अपनी फिल्मों के लिए लुभा रहे हैं.