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Tuesday, August 14, 2018

सिनेमालोक : इस 15 अगस्त को

सिनेमालोक

 इस 15 अगस्त को 

-अजय ब्रह्मात्मज

कल 15 अगस्त है. दिन बुधवार... बुधवार होने के बावजूद दो फिल्में रिलीज हो रही हैं. अमूमन हिंदी फिल्में शुक्रवार को रिलीज होती हैं, लेकिन इस बार दोनों फिल्मों के निर्माताओं ने जिद किया कि वे दो दिन पहले ही अपनी फिल्में लेकर आएंगे. रिलीज की तारीख को लेकर वे टस से मस ना हुए. दोनों 15 अगस्त की छुट्टी का लाभ उठाना चाहते हैं. इस तरह उन्हें पांच दिनों का वीकेंड मिल जाएगा. इन दिनों शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्मों के बारे में रविवार इन दिनों में पता चल जाता है एक ऐसा व्यवसाय करेगी?  इस बार परीक्षा के लिए दोनों फिल्मों को पांच दिनों का समय मिल जाएगा.देखना रोचक होगा इन दोनों फिल्मों को दर्शक क्या प्रतिसाद देते हैं? रीमा कागटी कीगोल्डऔर मिलाप मिलन झावेरी की फिल्मसत्यमेव जयतेआमने-सामने होंगी.

पहली फिल्मगोल्डकी पृष्ठभूमि में हॉकी है. हॉकी खिलाड़ी तपन दास के नेतृत्व में 1948 में भारत ने पहला गोल्ड जीता था. पिछले रविवार को इस उपलब्धि के 70 साल होने पर देश के सात स्थापत्यों और जगहों को सुनहरी रोशनी से आलोकित किया गया था.रीमा कागटी ने सच्ची घटना पर इस फिल्म की कहानी लिखी है. कहते हैं तपन दास के बारह सालों के अथक प्रयासों से यह मुमकिन हो पाया था. आजाद भारत में इंग्लैंड की धरती पर देश का पहला गोल्ड मेडल जीता था. राष्ट्र गौरव के क्षण को हाईलाइट करने के साथ ही जीत के संघर्ष और तैयारी पर भी रीमा ध्यान देंगी. विजेता टीम बनाना उसमें जीत का जोश भरना आसान काम नहीं रहा होगा. अक्षय कुमार इस फिल्म में तपन दास की भूमिका निभा रहे हैं.  उनकी टीम में विनीत कुमार सिंह, कुणाल कपूर, अमित साध  और सनी कौशल जैसे कलाकार हैं.

 ‘गोल्डके सामनेसत्यमेव जयतेरहेगी. मिलाप मिलन झावेरी ने आज के दौर की फिल्म में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है. हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश को ग्रस्त रखा है. सीधा और ईमानदार नागरिक भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसते हैं. देश को आर्थिक नुकसान होता है. प्रगति और विकास की योजनाएं रुक जाती हैं.सत्यमेव जयतेमें  जॉन अब्राहम और मनोज बाजपेयी की टक्कर दिखेगी. पहली बार दोनों कलाकार किसी फिल्म में एक साथ आ रहे हैं. इस फिल्म की कैच लाइन है -  ‘बेईमान पिटेगा, करप्शन मिटेगा’. मनोज बाजपेयी एक बार फिर पुलिस अधिकारी की भूमिका में बहादुरी दिखाएंगे. हाल ही में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न मेंगली गुलियां' फिल्म के लिए  एक्टर अवार्ड मिला है.

गौर करें तो दोनों ही फिल्मों की थीम राष्ट्र और देश प्रेम है. इसी वजह से उनके निर्माताओं ने रिलीज के लिए 15 अगस्त का दिन चुना है. राष्ट्रीय भावना से लबरेज इस दिन को थिएटर जा रहे दर्शकों में यह फिल्में देश प्रेम और राष्ट्रीयता का संचार करेंगी. इन दिनों हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है. फिल्में किसी भी जोनर की हों . लेखक और निर्देशक की कोशिश रहती है कि किसी दृश्य, संवाद या गाने में राष्ट्र से संबंधित कुछ संदेशात्मक बातें हों.यह तरीका बहुतों को पसंद आ रहा है. अक्षय कुमार इस दौर केभारत कुमारबन गए हैं. कवि मनोज कुमार को हम इस नाम से जानते थे.  अक्षय कुमार के ठीक पीछे जॉन अब्राहम खड़े हैं. उन्होंने परमाणु’  में संकेत दिया  कि वे भी अक्षय कुमार के रास्ते पर चल रहे हैं.

देखना रोचक होगा की इस हफ्ते दर्शक किस राष्ट्रप्रेमी को अधिक पसंद करते हैं. दोनों फिल्मों के निर्माताओं और कलाकारों ने प्रचार का हर जोर लगा रखा है. वे दर्शकों को अपनी फिल्मों के लिए लुभा रहे हैं.


Wednesday, August 1, 2018

सिनेमालोक : जब गीतों के बोल बनते हैं मुहावरा

सिनेमालोक

जब गीतों के बोल बनते हैं मुहावरा

-अजय ब्रह्मात्मज

दस दिनों पहले अतुल मांजरेकर  की फिल्म ‘फन्ने खान' का एक गाना जारी हुआ था.इस सवालिया गाने की पंक्तियाँ हैं,’
खुदा तुम्हें प्रणाम है सादर
पर तूने दी बस एक ही चादर
क्या ओढें क्या बिछायेंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे
दो रोटी और एक लंगोटी
एक लंगोटी और वो भी छोटी
इसमें क्या बदन छुपाएंगे
मेरे अच्छे दिन कब आयेंगे अच्छे दिन कब आयेंगे?
गाना बेहद पोपुलर हुआ.इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया गया.यह देश के निराश नागरिकों का गाना बन गया.’अच्छे दिनों' के वाडे के साथ आई वर्तमान सरकार से लोग इसी गाने के बहाने सवाल करने लगे.सवाल का स्वर सम्मोहिक हुआ तो नुमैन्दों के कान खड़े हुए.कुछ तो हुआ कि जल्दी ही महज दस दिनों में इसी गाने की कुछ और पंक्तिया तैरने लगीं.अब उसी गाने का विस्तार है…
जो चाह था
हो ही गया वो
अब न कोई खुशियाँ रोको
सपनों ने पंख फैलाये रे
मेरे अच्छे दिन हैं आये रे.
ऐसा माना जा रहा है कि निर्माता-निर्देशक पर दबाव पड़ा तो उन्होंने इस गीत को बदल दिया.’अच्छे दिन कब आयेंगे?’ के सवाल को ‘अच्छे दिन आये रे' कर दिया और सपनों के पंख फैलाने की बात कही.निर्देशक अतुल मांजरेकर का बयान आया है कि इस गाने के अकारण राजनीतिकरण से बात बढ़ी और निर्माताओं के पास कॉल आये. किसी भी प्रकार के विवाद से बचने के लिए गीत का अगला हिस्सा डालना पड़ा.
इरशाद कामिल ने बताया कि मूल रूप में पूरा गाना यूँ ही लिखा गया है.किसी दबाव में पंक्तियाँ नहीं बदली गयी हैं.कुछ गानों में ख़ुशी और ग़म के वर्सन होते हैं,कुछ में आशा-निराशा के.इस गाने में आशा-निराशा को व्यक्त करते शब्द हैं.दोनों वर्सन आगे-पीछे ज़रूर आये हैं.लोगबाग जो मतलब निकाल रहे हैं,वैसा कुछ नहीं हुआ है.’ फिल्मों,फ़िल्मी गानों और संवादों में दर्शक अपनी उम्मीदें,गुस्सा और शिकायतें पा जाते हैं तो वे उसे सराहते हैं और उन्हें अपनी पंक्तिया बना लेते हैं.यह किसी गीतकार और संवाद लेखक की अप्रतिम सफलता होती है कि उसके बोल और संवाद मुहावरे बन जाएँ.इरशाद कामिल के गीतों में यह प्रभाव मिलता है.उनके गीत वर्तमान समय के भाव और मंशा को बहुत खूबसूरती के साथ बगैर आक्रामक हुए व्यक्त करते हैं.इस बार भी ऐसा ही हुआ है.
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस गीत के पहले बोलों ने समाज के नाखुश और निराश नागरिकों को वाणी दी.यही करण है कि वे अपने आम सवालों को इस गीत के बहाने पोस्ट करने लगे.सत्ताधारी शक्तियां हमेशा ऐसे मौकों पर अतिरिक्त तौर पर सावधान रहती हैं.अगर सत्ता निरकुंश हो तो ज्यादा सजग रहती है.वह बवंडर बनने के पहले ही हवा का रुख बदलती है.निश्चित ही निर्माताओं को फ़ोन आये होंगे.हो सकता है,उन्हें आग्रह के अंदाज में आदेश दिया गया हो.निर्माता डरपोक नहीं होते.उन्हें विवाद से संभावित हानि का व्यवसायिक डर रहता है.अगर अभिव्यक्ति का डर रहता तो इस गाने की रिकॉर्डिंग ही नहीं होती.हम जानते हैं कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा साहसी निर्माता-निर्देशक हैं.उनकी ‘रंग दे बसंती’ मिसाल है. लेकिन यह भी सच है कि इन दिनों ढेर सारे लेखक निजी अंकुश के साथ लेखन कर रहे हैं.यह प्री सेंसरशिप है.यह अभिव्यक्ति को सीमित और संकीर्ण कर रही है.
फिलहाल यह तो जाहिर हुआ कि सरकार और सत्ता गीत के बोलों से भी घबराती है.

Tuesday, July 10, 2018

सिनेमालोक : बेहतरीन प्रयास है ‘सेक्रेड गेम्स’


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बेहतरीन प्रयास हैसेक्रेड गेम्स

-अजय ब्रह्मात्मज
अश्वत्थामा,हलाहल,अतापी वतापी,ब्रह्मास्त्र सरम,प्रेतकल्प,रूद्र और ययाति… यह नेटफ्लिक्स पर आरंभ हुए सेक्रेड गेम्स के 8 अध्याय हैं. इन्हें हम 8 एपिसोड के रूप मे देखेंगे.सेक्रेड गेम्स’  विक्रम चंद्रा का उपन्यास है. यह 2006 में प्रकाशित हुआ था. 900 से अधिक पृष्ठों के इस उपन्यास को वरुण ग्रोवर,वसंत नाथ और स्मिता सिंह ने वेब सीरीज के रूप में ढाला है. रूपांतरण की प्रक्रिया लंबी और श्रमसाध्य रही. तीनों लेखकों ने वेब सीरीज के लिए उचित प्रसंगों,किरदारों और विवरणों में काट-छांट की है. कुछ घटाया है तो कुछ जोड़ा भी है. दरअसल, अभिव्यक्ति के दो भिन्न माध्यम होने की वजह से यह रूपांतरण जरूरी हो जाता है. उपन्यास पढ़ते वक्त हम लेखक के विवरणों के आधार पर दृश्य और किरदारों की कल्पना करते हैं. लेखक शब्दों के माध्यम से स्थान,माहौल और चरित्रों का चित्रण करता है. वह पाठक की कल्पना को उड़ान देता है. लेखक और पाठक के बीच कोई तीसरा नहीं होता. इससे भिन्न दृश्य माध्यम में उस उपन्यास को एक लेखक स्क्रिप्ट में बदलता है और फिर निर्देशक अपनी तकनीकी टीम की मदद से स्थिति एवं मनःस्थिति को दृश्य और संवाद में बदलता है. दृश्य माध्यम दर्शकों की कल्पना कतर देता है. दर्शक पर्दे पर सब कुछ देख रहा होता है और संवादों से चरित्रों का व्यवहार समझ रहा होता है.

साहित्य और सिनेमा के जटिल रिश्ते पर बहुत कुछ लिखा गया है. प्रायः सुनाई पड़ता है कि लेखक निर्देशक के काम से असंतुष्ट रहे. कहा जाता है कि दृश्य माध्यम में साहित्य की आत्मा को खो जाती है.सेक्रेड गेम्सउपन्यास पढ़ चुके पाठकों को वेब सीरीज देखते हुए ऐसी दिक्कत हो सकती है. इसके लेखकों और निर्देशकों ने उपयोगिता और सुविधा के अनुसार फेरबदल किए हैं. इस फेरबदल में विक्रम चंद्रा की सहमति रही है, लेकिन पाठक असहमत हो सकते हैं. किसी भी रूपांतरण में माध्यमों की भिन्नता की वजह से स्वभाविक रुप स कुछ चीजें खो या जुड़ जाती हैं. पाठक और दर्शकों के लिए बेहतर तो यही होता है कि हर माध्यम का अलग आनंद लें, क्योंकि रसास्वादन की प्रक्रिया माध्यमों के हिसाब से बदल जाती है. ;सेक्रेड गेम्स; उपन्यास औरसेक्रेड गेम्सवेब सीरीज दो भिन्न सृजनात्मक कृतियां हैं. उपन्यास विक्रम चंद्रा ने लिखा है, जबकि वेब सीरीज के सृजन में लेखकों और निर्देशकों के साथ पूरी तकनीकी टीम रही है. वेब सीरीज उन सभी का सम्मिलित प्रयास है.

विक्रमादित्य मोटवानी और अनुराग कश्यप अलग शैली और सोच के निर्देशक हैं. दोनों के युगल प्रयास और सामंजस्य का खूबसूरत उदाहरण हैसेक्रेड गेम्स. इसके दो मुख्य किरदार हैं - गणेश गायतोंडे और सरताज सिंह. सूचना के मुताबिक गणेश गायतोंडे के ट्रैक का निर्देशन अनुराग कश्यप ने किया है. वह ऐसी कहानियों को पर्दे पर लाने में माहिर हैं. हिंसा,अपराध और अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया रचने में उनका मन रमता है. समाज के वंचित और वर्जित किरदार उन्हें प्रिय रहे हैं. इस सीरीज में उन्होंने जी गैंग के सरगना गणेश गायतोंडे की मानसिकता,चिंता और महत्वकांक्षा पर रोशनी डाली है. वह खतरनाक अपराधी है. दूसरी तरफ ईमानदार पुलिस अधिकारी सरताज सिंह है. गणेश गाय गायतोंडे ने पहले ही एपिसोड में सरताज सिंह को सूचना देने के साथ चुनौती भी दे दी है. पहले तो वह अपने लौटने की सूचना देता है, सरताज सिंह जब तक उसके पास पहुंचे गणेश गायतोंडे खुद को ही गोली मार देता है. मरने से पहले वह सरताज सिंह को बता चुका है कि 25 दिनों में बचा सकते हो तो मुंबई को बचा लो. उसकी यह चेतावनीसेक्रेड गेम्सका रोचक और रोमांचक ड्रामा रचती ह

नेटफ्लिक्स पर ओरिजिनल इंडियन कंटेंट के तौर पर सेक्रेड गेम्स का प्रसारण एक नई शुरुआत है. पहली बार किसी भारतीय शो को एक साथ 100 से अधिक देशों के दर्शक मिले हैं. यह एक बड़ी उपलब्धि है. अभी तक हम दुनिया के शो देखते-सराहते रहे हैं. अब दुनिया भी भारतीय कंटेंट देखेगी. दृश्य माध्यम में काम कर रहे हैं लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों को बड़ा अवसर मिला है.फिलहालसेक्रेड गेम्सदेखें और फिर उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा करें.

Tuesday, July 3, 2018

सिनेमालोक : कम हो गयी है फिल्मों की शेल्फ लाइफ


सिनेमालोक
कम हो गयी है फिल्मों की शेल्फ लाइफ

-अजय ब्रह्मात्मज 
फिल्म बुरी हो तो तीन दिन,फिल्म अच्छी हो तो भी तीन ही दिन,फिल्म बहुत अच्छी हो तो कुछ और दिन। इन दिनों सिनेमाघरों में फिल्मों के टिकने की यही मियाद हो गई है। हफ्ते-दो हफ्ते तो शायद ही कोई फिल्म चल पाती है। कुछ सालों पहले तक फिल्मों के 50 दिन 100 दिन पूरे होने पर नए पोस्टर छपते और चिपकाए जाते थे।उन्हें सेलिब्रेट किया जाता था। उसके भी कुछ साल पहले फिल्में 25-50 हफ्ते पूरा करती थीं। फिल्मों की सिल्वर और गोल्डन जुबली मनाया जाती थी। फ़िल्म यूनिट से जुड़े कलाकारों को जुबली की याद में ट्रॉफी दी जाती थी। पुराने कलाकारों और फिल्मी हस्तियों के घरों में ट्रॉफी रखने के तझे मिल जाएंगे। अब तो यह सब कहने-सुनने की बातें हो गई हैं।

पिछले दिनों एक युवा मित्र ने पूछा कि आजकल फिल्मों की शेल्फ लाइफ कितनी राह गयी है? विचार करें तो आश्चर्य होगा कि हमें जनवरी और फरवरी की सफल फिमों के भी नाम याद करने पड़ते हैं। पिछले साल और उसके भी पहले के सालों की फिल्मों के बारे में कोई पूछ दे तो गूगल खंगालना पड़ता है। ठीक है कि डिजिटल एज में ध्यान और स्मृति की भी अवधि कम हुई है,लेकिन हर हफ्ते आती-जाती फिल्में पलकें झपकने की गति से ओझल हो रही हैं। इनकी शेल्फ लाइफ कम हो रही है। वजह देखी और सोची नहीं जा रही है। किसे फ़िक्र है? सभी धंधे में लगे हैं। निर्माताआ से दर्शक तक नफा-नुकसान की बातें करते है। फ़िल्म कारोबार का तरीका बदल गया है। पहले वीएचएस और सीडी-डीवीडी के रूप में फिल्में घरों की शोभा बढ़ती थीं। हम सभी अपनी पसंद की फिल्में संग्रहित करते थे। अब वह भी चलन खत्म हो गया है। डिजिटल आगे में स्मार्ट फ़ोन पर स्पर्श मात्र से फिल्में उपलब्ध हो जा रही हैं। इस सुविधा ने हमारी पसंद को बिखेर दिया है। गौर करें तो हमने चुनना भी बंद कर दिया है।

वास्तव में फ़िल्म देखने और उसके कारोबार के तरीके में आये बदलाव की वजह से यह हुआ है। मल्टीप्लेक्स आने के बाद से सिनेमाघरों में स्क्रीन की संख्या बढ़ गयी है। उनमें नई फिल्म के ज्यादा से ज्यादा शो रखे जाते हैं। अभी ' संजू' का ही उदाहरण लें 4-6 स्क्रीन के मल्टीप्लेक्स में इसके 25 से 28 शो चल रहे हैं। सिंगल स्क्रीन के शो के हिसाब से मल्टीप्लेक्स में एक ही दिन में हफ्ते भर के शो हो जाते हैं। कहा जा सकता है कि सिंगल स्क्रीन में सीटों की संख्या ज्यादा होती थी। होती थी,लेकिन शहर के कुछ ही सिंगल थिएटर 1000 से ज्यादा सीटों के होते थे। और इन सिनेमाघरों में आम तौर पर दर्शकों का प्रतिशत 25-40 से अधिक नहीं रहता था। सारी फिल्में 'शोले' या 'जय संतोषी मां' नहीं होती थीं। तात्पर्य यह है कि किसी भी फ़िल्म के लिए दर्शकों की संख्या कमोबेश आज की तरह ही थी। इधर सिनेमाघरों के मालिक का यही रोना है कि दर्शक थिएटर में आने काम हो गए हैं। दर्शकों का बड़ा हिस्सा फिल्में किसी और जरिये से देख रहा है। दर्शकों की भी आदतें बदल रही हैं।

फिल्मों की शेल्फ लाइफ का कम होना उनकी क्वालिटी से संबंधित नहीं है। फिल्में आज भी उतनी ही घटिया और बढ़िया बन रही हैं जैसी आज से 10-20 साल पहले बनती थीं। देखने-दिखाने के तरीके में आये बदलाव से फिल्में दर्शकों का दोहन जल्दी से कर लेती हैं। उन्हें हफ्तों और महीनों का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। आजकल कुछ ही हफ़ों के बाद फिल्मों के 'लाइफटाइम बिज़नेस' के आंकड़े आ जाते हैं।