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Monday, October 26, 2009

DDLJ रोमैंटिंक प्रेम का नया आख्‍यान

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
यह एकदम नए परि‍प्रेक्ष्‍य की फि‍ल्‍म थी। यह ऐसे समय में आयी थी जब चारों ओर से रोमैंटि‍क प्रेम पर तरह-तरह के हमले हो रहे थे,रोमैंटि‍क प्रेम का समाज में एक सांस्‍थानि‍क स्‍थान है। गे और लेस्‍बि‍यन से लेकर फंडामेंटलि‍स्‍टों तक, कठमुल्‍ले वामपंथि‍यों से लेकर कठमुल्‍ला स्‍त्रीवादि‍नि‍यों तक सबमें रौमेंटिंक प्रेम के प्रति‍ घृणा देखी जा सकती है। ये सभी रोमैंटि‍क प्रेम को आए दि‍न नि‍शाना बनाते हैं। 'दि‍ल वाले दुल्‍हनि‍या ले जाएंगे' इस अर्थ में नए पैराडाइम की फि‍ल्‍म है क्‍योंकि‍ इसमें रोमैंटि‍क प्रेम का संस्‍थान के रूप में रूपायन कि‍या गया है। उसकी सफलता का रहस्‍य भी यही है। हमारे समाज में स्‍त्रीवादी आंदोलन ने भी रोमैंटि‍क प्रेम पर हमले कि‍ए हैं। जगह-जगह अनेक महि‍ला संगठनों का इस प्रसंग में हस्‍तक्षेप देखने में आया है। स्‍त्रीवादी संगठनों का मानना है रोमैंटि‍क प्रेम स्‍त्री की स्‍वायत्‍तता को छीन लेता है। उसे परनि‍र्भर बना देता है।
रोमैटिंक प्रेम का चि‍त्रण करते हुए फि‍ल्‍म के प्रमुख स्‍त्री पात्र कुछ इस तरह दि‍खाए गए हैं कि‍ वे स्‍त्री की शि‍रकत को बढावा देते हैं। समूची फि‍ल्‍म प्रेम पर नहीं है बल्‍कि‍ रोमैंटि‍क प्रेम के संस्‍थानगत स्‍वरूप के चि‍त्रण पर केन्‍द्रि‍त है। अमूमन हि‍न्‍दी सि‍नेमा में प्रेम कहानी का इस्‍तेमाल खूब होता रहा है,लेकि‍न इस फि‍ल्‍म में प्रेम कहानी नहीं रोमैंटि‍क प्रेम का आख्‍यान पेश कि‍या गया है। रोमैंटिक प्रेम को संस्‍थान के रूप में प्रस्‍तुत करने के कारण ही यह फि‍ल्‍म बार बार देखने को बाध्‍य करती है। फलत: रोमैटिंक प्रेम में युवाओं की शि‍रकत को बढावा देने वाली कल्‍ट फि‍ल्‍म बन गयी। यह ऐसी रोमैंटिंक प्रेम फि‍ल्‍म है जि‍समें हिंसा एकसि‍रे से गायब है। इस अर्थ में यह प्राचीनकालीन महाकाव्‍यात्‍मक रोमांस का भी अपने संचार में इस्‍तेमाल करने में सफल रही है। रोमैंटिंक प्रेम की ताकतवर फि‍ल्‍म होने के बावजूद इसमें कहीं पर भी कामुकता के मुहावरों और पद्धति‍यों का इस्‍तेमाल नहीं कि‍या गया है।
रोमैटिंक प्रेम में कामुकता अन्‍तनिर्हि‍त होती है,कामुकता के बाह्य प्रदर्शनात्‍मक हथकंडों की जरूरत नहीं होती। रोमैंटिंक प्रेम का ऐसा फार्मूला फि‍ल्‍म में इस्‍तेमाल कि‍या गया है जि‍समें स्‍त्री पात्र अपनी स्‍वायत्‍तता ,वि‍वेक , टेलेंट और चारि‍त्रि‍क गुणों की स्‍वायत्‍तता बनाए रखते हैं।
फि‍ल्‍मकार ने इसमें 'कंसर्न' और 'एडमि‍रेशन' पर ज्‍यादा जोर दि‍या है। ये दोनों तत्‍व इसके समूचे कथानक को बांधे रखते हैं। इन दो के अलावा एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी पर भी जोर है।‍ एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी के कारण ही नायक-नायि‍का एक-दूसरे के लि‍ए बने नजर आते हैं। कंसर्न का अर्थ है कि‍ आप जि‍से प्‍यार करते हैं उसके कल्‍याण के बारे में भी सोचें। कंसर्न के कारण ही प्‍यार समृद्ध होता है। अभी तक हि‍न्‍दी सि‍नेमा में कंसर्न का चरि‍त्र पि‍तृसत्‍तात्‍मक रहा है। जो संरक्षक हैं,अभि‍भावक हैं वे ही कल्‍याण के बारे में सोचते हैं। इस फि‍ल्‍म में पहलीबार ऐसा चि‍त्रण कि‍या गया है जि‍समें अभि‍भावकों का कंसर्न गौण है ,नायक-नायि‍का का कंसर्न प्रधान है।
कंसर्न या सरोकार प्रति‍स्‍पधी नहीं होते। पात्रों में जेनुइन कंसर्न नजर आता है। आमतौर पर हि‍न्‍दी सि‍नेमा में अभि‍भावकों के कंसर्न पर जोर रहता है यहां पर प्रेमीयुगल के कंसर्न पर जोर है। इस फि‍ल्‍म में नायक-नायि‍का एक -दूसरे से ही प्‍यार नहीं करते, बल्‍कि‍ नायि‍का का अपनी मॉं और पि‍ता से भी प्‍यार है इस अर्थ में प्‍यार की नायक-नायि‍का केन्‍द्रि‍त धारणा को यह फि‍ल्‍म चुनौती देती है । नायक-नायि‍का के प्‍यार के सामने अंत में नायि‍का के माता-पि‍ता समर्पण कर देते हैं। रोमैंटिंक प्रेम में 'प्रमुख' और 'नि‍र्णायक' का केन्‍द्रीय महत्‍व है। यह फि‍ल्‍म प्रेम की फि‍ल्म नहीं है अपि‍तु रोमैंटि‍क प्रेम की फि‍ल्‍म है।शाहरूख पूरी कहानी में प्रधान पात्र है किंतु प्रेम कहानी का वि‍कास कुछ इस तरह होता है कि‍ वह नि‍र्णायक नहीं रह जाता। रोमैंटि‍क प्रेम नि‍र्णायक बन जाता है। नायक अपनी प्रधानता या वि‍शि‍ष्‍टता का प्रच्‍छन्‍नत: इस्‍तेमाल करता है।वह सि‍मरन के घर में हमेशा गैर जरूरी कि‍स्‍म के कामों में उलझा रहता है। ये गैर जरूरी काम ही हैं जो उसकी गति‍वि‍धि‍यों को,उसके प्रेम को अनैति‍क नहीं बनने देते। वह जो काम करता है उन्‍हें लेकर कि‍सी को आपत्‍ति‍ नहीं है। क्‍योंकि‍ वह ऐसा कोई भी काम नहीं करता जो आपत्‍ति‍जनक हो। सि‍मरन के घर में वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म के कार्यों में शाहरूख खान की सक्रि‍यता प्रेम की एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी की धारणा को खंडि‍त करती है।
यह फि‍ल्‍म यह संदेश देती है कि‍ एक्‍सक्‍लुसि‍वि‍टी अग्राह्य चीज है। इस अर्थ में रोमैंटि‍क प्रेम में एक्‍सक्‍लुसि‍व प्रेम का आइडि‍या स्‍वास्‍थ्‍यप्रद नहीं है। इसके बारे में सवाल कि‍ए जाने चाहि‍ए। सि‍मरन (काजोल) के प्रति‍ राज (शाहरूख खान) का प्रेम एक-दूसरे के प्रति‍ प्रशंसा और कंसर्न से भरा है। प्रशंसा और कंसर्न के आधार पर ही वे दोनों करीब आते हैं। रोमैंटिंक प्रेम में प्रशंसा अनि‍वार्य तत्‍व है। इसके बि‍ना रोमैंटि‍क प्रेम का आख्‍यान नहीं बनता।
सन् 1995 में यह फि‍ल्‍म आती है। यही वह समय है जब भारत इंटरनेट और सैटेलाइट टीवी क्रांति‍ में व्‍यापक रूप में दाखि‍ल होता है। यह क्रांति‍ इस फि‍ल्‍म को भी प्रभावि‍त करती है। नायि‍का-नायक एक-दूसरे को चाहते हैं,प्‍यार करते हैं, लेकि‍न सि‍मरन की शादी कि‍सी और से तय हो जाती है,जि‍ससे शादी होती है वह भी सि‍मरन के घर आता है किंतु राज इस शादी से खुश नहीं है लेकि‍न यह बात वह छि‍पाता है और भागकर सि‍मरन के साथ शादी करने से इंकार करता है ,वह चाहता है उसके प्रेम को लोग जान जाएं ,खासकर सि‍मरन के पि‍ता (अमरीश पुरी) जान लें, वह उनकी ही अनुमति‍ से शादी करना चाहता है। अंत में कथानक का उसी दि‍शा में वि‍कास होता है। वे दोनों मि‍ल जाएं इसी दि‍शा में सि‍मरन भी प्रयास करती है। रोमैंटि‍क प्रेम में यह मि‍लन और एकीकरण सबसे महत्‍वपूर्ण तत्‍व है और यह तत्‍व तब सबसे ज्‍यादा नि‍खरकर सामने आता है जब सभी की सहमति‍ और स्‍वीकृति‍ हो। कथानक के प्रमुख दोनों पात्रों का मार्ग एक है और वे दोनों प्रेम में सफल होते हैं। रोमैंटिंक प्रेम में यदि‍ दोनों दो अलग रास्‍ते चुनते हैं तो प्रेम असफल होता है। 'दि‍ल वाले दुल्‍हनि‍या ले जाएंगे' का इस अर्थ में महत्‍व है कि‍ नायक-नायि‍का प्रेम का एक ही मार्ग चुनते हैं। हि‍न्‍दी सि‍नेमा में यह फि‍ल्‍म पैराडाइम परि‍वर्तन की सूचना है। रोमैटिंक प्रेम का नया कार्यव्‍यापार सामने आता है। इन दोनों को मि‍लाने में भगवान की मदद नहीं ली जाती।
इस फि‍ल्‍म में जो रोमैंटि‍क प्रेम है वह अपना लक्ष्‍य जानता है,रोमैंटिंक प्रेम के लक्ष्‍यहीन अंत को यह फि‍ल्‍म ठुकराती है। यह ऐसे प्रेम पर बल देती है जि‍समें प्रेमी युगल का प्‍यार एक-दूसरे को प्रसन्‍न रखने पर जोर देता है। यहां भावों के बंधन पर जोर है।संवेदनाओं के बंधन पर जोर है। कामुक बंधन पर जोर नहीं है।
प्‍यार को पुख्‍ता करने का फार्मूला क्‍या है ? इसका कोई फार्मूला नहीं हैं। सि‍मरन जब राज को मि‍लती है तो वह परायी थी। उसके बारे में राज नहीं जानता था। राज की केयरिंग और अच्‍छे व्‍यवहार ने सि‍मरन का दि‍ल जीत लि‍या। संदेश है कि‍ प्रेम के लि‍ए अन्‍य के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करना चाहि‍ए। मन से अच्‍छा व्‍यवहार करना बेहद जरूरी है। आप अन्‍य के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करेंगे तब ही अपनी प्रेमि‍का के साथ भी अच्‍छा व्‍यवहार करेंगे। राज जि‍न लोगों के बीच रहता है वे सब उसके लि‍ए अन्‍य हैं लेकि‍न उसके अच्‍छे व्‍यवहार में कहीं अंतर नहीं आता यही वजह है कि‍ वह सि‍मरन का दि‍ल जीतता है, उसके परि‍वारवालों का दि‍ल जीतता है। दर्शकों का भी दि‍ल जीतता है। अंत में रोमैटिंक प्रेम का कल्‍ट नायक बन जाता है। और इसी शाहरूख खान ने दि‍लीपकुमार की प्रेमी नायक की छवि‍ का अति‍क्रमण कि‍या है। कुछ हद तक वह संजीवकुमार के प्रेमी नायक के करीब आता है।
रोमैंटिंक प्रेम का अर्थ है आनंद। प्रेमी युगल जब मि‍लें तो एक-दूसरे को आनंदि‍त करें। आंतरि‍क संवेदनात्‍मक आनंद की सृष्‍टि‍ ही रोमैंटि‍क प्रेम की धुरी है। रोमैंटि‍क प्रेम को इस फि‍ल्‍म ने इतना महान इसलि‍ए भी बनाया क्‍योंकि‍ यह फि‍ल्‍म इंटरयुगीन नारे का प्रत्‍युत्‍तर एडवांस में देती है। इंटरयुगीन प्रेम में सेक्‍स ही महान है। आंतरि‍क संवेदनात्‍मक आनंद मि‍ले या न मि‍ले, लगाव हो या न हो, सेक्‍स होना चाहि‍ए। प्रेम की इस थ्‍योरी को यह फि‍ल्‍म अस्‍वीकार करती है। प्रेम के मूलाधार के रूप में सेक्‍स को नहीं आनंद,संवेदनात्‍मक आनंद को महत्‍ता प्रदान करती है। जाहि‍र है ऐसी स्‍थि‍ति‍ में उन औरतों को यह फि‍ल्‍म चि‍ढ़ पैदा करती है जो प्रेम में सेक्‍स खोजती रहती हैं,आकर्षित करके या फुसलाकर पटाकर प्‍यार करती हैं, उन्‍हें यह फि‍ल्‍म गले नहीं उतरती। सेक्‍स नहीं आनंद प्रेम का मूलाधार है।यही मूल संदेश है जो फि‍ल्‍ममेकर देना चाहता है। दूसरा संदेश यह भी है कि‍ यदि‍ प्रेम करना है तो अन्‍य को देखो,अन्‍य को जानने की कोशि‍श करो,अन्‍य की स्‍वीकृति‍ ,अन्‍य का प्‍यार पाने की कोशि‍श करो,अन्‍य को खुश करके आनंद अर्जित करो। हम जानते हैं कि‍ सन् 1990 के बाद से अन्‍य के प्रति‍ अलगाव बढा है। अन्‍य के प्रति‍ बढते बेगानेपन को भोगवाद और उपभोक्‍तावाद ने हवा दी है।‍ इस हवा के खि‍लाफ यह सार्थक हस्‍तक्षेप है।
शाहरूख खान और काजोल ऐसे नायक-नायि‍का के रूप में सामने आते हैं जि‍नके लि‍ए इमोशन्‍स ही तर्क है। इमोशंस ही उनके सार्वजनि‍क तर्क का आधार हैं। ये दोनों नैति‍कता और परंपरा के तर्क से संचालि‍त नहीं होते,जैसा आमतौर पर हम सभी संचालि‍त होते हैं। इमोशन्‍स को अपने तर्क का आधार बनाते ही अथवा इमोशन्‍स के तर्कों का इस्‍तेमाल करते हुए ये दोनों परंपरा,नैति‍कता,मर्यादा आदि‍ के समूचे तर्कशास्‍त्र को चुनौती देते हैं। यह कार्य वे वि‍चारधारात्‍मक तौर पर करते हैं। इसके कारण यह फि‍ल्‍म सबसे ज्‍यादा ध्‍यान खींचने में सफल रही है।
संजीवकुमार, दि‍लीपकुमार, राजकपूर,देवानन्‍द आदि‍ की प्रेम फि‍ल्‍मों में एथॉस हावी रहता है,इसका देरि‍दि‍यन वि‍लोम है पेथॉस जि‍सका बडी खूबी के साथ फि‍ल्‍ममेकर ने इस्‍तेमाल कि‍या है। पहलीबार फि‍ल्‍म में राजनीति‍क सौंदर्य, शहरी सौन्‍दर्य, परंपरागत सौन्‍दर्य सबको एक ही साथ चुनौती मि‍लती है। मि‍श्रि‍त संस्‍कृति‍ का नया सौन्‍दर्यशास्‍त्र इमोशन्‍स के तर्क के आधार पर रचा जाता है।
परंपरा,संस्‍कृति‍, महानगर,अमीर,शि‍क्षि‍त,अशि‍क्षि‍त,जाति‍भेद आदि‍ की दीवारें पंजाब के गांव में जाकर टूटती हैं। भेद की दीवारें गांव में टूटेंगी। यह एकदम नयी धारणा है और अभी तक इस पर कि‍सी ने इतनी ताकतवर फि‍ल्‍म नहीं बनायी थी। नयी आधुनि‍क मि‍श्रि‍त संस्‍कृति‍ की रौमैंटिंक प्रेम कि‍स तरह सृष्‍टि‍ कर सकती है उसे साधारणजन की फैंटेसी बना सकता है,भेद को वि‍रोध करने वाली इतनी ताकतवर अभि‍व्‍यक्‍ति‍ तो सि‍र्फ इस फि‍ल्‍म में ही संभव थी। चूंकि‍ यह समूची फि‍ल्‍म वि‍चारधारात्‍मक और दार्शनि‍क तौर पर पेथॉस के फ्रेमवर्क में बनी है अत: यह हमारी सहानुभूति‍ सहज ही अर्जित कर लेती है। यह सुचि‍न्‍ति‍त भाव से पुराने सौन्‍दर्यबोध को भी नष्‍ट करती है।
यह ग्‍लोबलाईजेशन के आरंभ की फि‍ल्‍म है इसमें सहजभाव से 'अमेरि‍की संवेदनात्‍मकता' अन्‍तर्ग्रथि‍त है। अमेरि‍की टीवी संचार की मूल दि‍शा सेंटीमेंटल इमेजों पर केन्‍द्रि‍त रही है। फि‍ल्‍म के नायक-नायि‍का रोमैंटि‍क प्रेम की सेंटीमेंटल इमेज का एकदम नया रूप तैयार करते हैं। यह उस 'अंतराष्‍ट्रीय संचार फ्लो' का अभि‍न्‍न हि‍स्‍सा है जि‍सने सारी दुनि‍या में सद्दाम के खि‍लाफ सेंटीमेंटल इमेजों को प्रक्षेपि‍त कि‍या ,समाजवाद के खि‍लाफ सेंटीमेंटल टीवी इमेजों को प्रक्षेपि‍त कि‍या। सेंटीमेंटल इमेजों के इस अंतर्राष्‍ट्रीय संचार फ्लो को बडी ही सुंदरता के साथ रोमैंटि‍क आख्‍यान में पि‍राने में फि‍ल्‍ममेकर को सफलता मि‍ली। ये ऐसी इमेजें हैं जो सहानुभूति‍ नहीं चाहतीं बल्‍कि‍ अपने इमेजों के प्रवाह में बहाए लि‍ए चली जाती हैं। अंतर्राष्‍ट्रीय मीडि‍या ने सेंटीमेंटल इमेजों को राजनीति‍क संचार के लि‍ए इस्‍तेमाल कि‍या , सेंटीमेंटल इमेजों को दर्शकों की राष्‍ट्रवादी भावनाओं को भडकाने के लि‍ए इस्‍तेमाल कि‍या।
इसके वि‍परीत 'दि‍लवाले दुल्‍हनि‍या ले जाएंगे' के फि‍ल्‍ममेकर प्रेम के संदेश के संचार और भेद की दीवार के लि‍ए सेंटीमेंटल इमेजों का इस्‍तेमाल कि‍या। इस तरह वह अंतराष्‍ट्रीय संचार फ्लो का हि‍स्‍सा बन गया और यह फि‍ल्‍म देश-वि‍देश सब जगह हि‍ट हो गयी।
आज के युग में फि‍ल्‍म या संचार की सफलता के लि‍ए इमेजों के अंतर्राष्‍ट्रीय फलो के साथ संगति‍ का होना बेहद जरूरी है। यह फि‍ल्‍म अंतर्राष्‍ट्रीय फ्लो की एक अन्‍य चीज को आत्‍मसात करती है। वह है फीलिंग ही सूचना,सूचना ही फीलिंग है। राज और सि‍मरन की फीलिंग ही सूचनाएं पैदा करती हैं। इस फि‍ल्‍म में वि‍भि‍न्‍न पात्रों की फीलिंग के माध्‍यम से ही सूचनाएं संप्रेषि‍त होती हैं। फीलिंग के आधार पर ही सूचनाओं की शक्‍ति‍ का अंदाजा लगाया जाता है। सैटेलाईट टीवी के आने बाद से यही बुनि‍यादी नीति‍ रही है वि‍श्‍व संचार की। सार्वजनि‍क परि‍दृश्‍य हो,सार्वजनि‍क वि‍वाद हों,राजनीति‍क वि‍वाद हों, घरेलू वि‍वाद हों, इत्‍यादि‍ सभी चीजों की प्रस्‍तुति‍ का मूल मंत्र है फीलिंग ही सूचना है,सूचना ही फीलिंग है। इस प्रक्रि‍या में जब आप शामि‍ल हो जाते हैं तो अवि‍वेकवाद के सामने नि‍हत्‍थे होते हैं। यही ग्‍लोबलाईजेशन का लक्ष्‍य भी है, वह चाहता है कि‍ हम अवि‍ववेकवाद के सामने वि‍वेकवाद के अस्‍त्रों से लैस नजर नहीं आएं।
DDLJ पर बारहवां लेख

Saturday, October 24, 2009

DDLJ लाइन मारना तो शाहरुख ने ही समझाया था....

-सुशांत झा
घर से नजदीकी शहर मधुबनी 35 किलोमीटर दूर था, अकेले जाने की इजाजत अक्सर नहीं मिलती थी जब डीडीएलजे का वक्त आया था। बिहार बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में जब फर्स्ट क्लास में पास हुआ तो अचानक इज्जत बढ गई, मधुबनी अकेले जाने का पासपोर्ट मिल गया-जो हमारे लिए उस वक्त कैलिफोर्नियां से कम नहीं था। उससे पहले सिनेमा का मतलब गांव का वीसीआर और दूरदर्शन पर आनेवाला सिनेमा था जो दरभंगा के कमजोर टावर की वजह से अक्सर डिस्टर्व आता था। हम कड़ियों को जोड़-जोड़ कर सिनेमा का अनुमान लगाते थे। गांव में छिटपुट घरो में टीवी आई था जो बिजली न होने की वजह से बैटरी से देखी जाती था और बैटरी चार्ज कराकर लानेवाले और टीवी चलाने वाले की इज्जत आईआईटी इंजिनियर से कम नहीं थी। हमें टीवी पर रंगोली, चित्रहार और सप्ताह में एक फिल्म देखने की इजाजत थी, इससे ज्यादा देखने पर आवारा का तमगा निश्चित था। रामायण के वक्त शायद 89 या 90 में जब मेरे बड़े चाचा जो स्कूल में मास्टर थे ने टीवी लाया था तो उनका दावा था कि उनका टीवी दुनिया का बेहतरीन ब्रांड है और मुजफ्फरपुर दुनिया का सबसे अच्छा शहर। वजह? उन्होने मुजफ्फरपुर से टीवी लाया था जहां उनके दामाद बैंक में मैनेजर थे। हमारे मनोरंजन की दुनिया में थोड़ी आफियत तब आई जब नेपाल दूरदर्शन से हर सप्ताह बेहतरीन फिल्मों का प्रसारण शुरु हुआ, उसका टावर मजबूत था और साफ दिखाई देता था। उस समय तक मैं तमाम कुमारों के साथ धर्मेंन्द्र, राजेश खन्ना और थोड़ा-2 अमिताभ बच्चन को ही हीरो मानता था। बाकी सब तो....जोकर जैसे लगते थे। मेरे फूफाजी राजेंद्र कुमार को देखकर सेंटी हो जाते॥मानो गांधी बाबा आ गए॥बोलते देखो हीरो तो ये है अकेले पूरा स्क्रीन छाप लेता है।

बहरहाल हम बोर्ड परीक्षा पास कर मधुबनी आए जहां मेरे एक चचेरे भाई ने जो आजकल एमपी पुलिस में पता नहीं क्या हैं लेकिन बहुत माल कमाए हैं(भोपाल में दो-दो मकान है) ने डीडीएलजे देखने का प्रस्ताव रखा। मैंने फौरन हामी भर दी। इससे पहले मैने शाहरुख खान को दीवाना में गांव के दुर्गापूजा में वीसीआर पर देखा था जो काफी शैतान जैसा दिखता था। मेरे गांव की एक लड़की ने उसे लुच्चा जैसा कहा था-ये बात तो बाद में समझ में आई कि लड़किया जब किसी को बहुत पसंद करती है तो ‘लुच्चा’ कहती है!

मेरे घर में मायापुरी, फिल्मी कलियां और पता नहीं कौन- कौन सी पत्रिकाएं आती थी जिसमें एक बार शाहरुख ने हेमामिलिनी के निर्देशन कौशल पर अपनी पहली ही फिल्म में सवाल उठा दिया था। हम नाराज हुए थे कि ससुरा घमंडी लगता है।

लेकिन इमानदारी की बात यहीं है यारों कि डीडीएलजे ने पहली बार हमें जवान होने का एहसास कराया था। हमें लगा कि बिना मूंछ-दाढ़ी हुए भी प्यार किया जा सकता है...पढ़ाई में फेल होने के बावजूद ये पूण्य काम किया जा सकता है। हमने आते ही अपने पापा में अनुपम खेर की शक्ल तलाशी थी जिसमें कहना न होगा हमें सौ फीसदी निराशा हाथ लगी।

मेहरवानों...कदरदानों और टिप्पणीदानों...उसके बाद शाहरुख खान नामके आदमी का ऐसा शुरुर अपन पर छाया कि हम उसकी सारी फिल्में देखते गए सिर्फ अशोका के वक्त उसको गाली दी। ससुरा, हकलाकर राजमाता के साथ ऐसा बात करता था मानो सम्राट अशोक न होकर करोलबाग का राज मलहोत्रा हो। हमने उस जमाने में 25 रुपया ब्लैक में पटना के मोना सिनेमा में गांधी मैदान के किनारे सेकेंड हैंड उपन्यास खरीदने के बाद 9 वीं बार डीडीएलजे देखी जब एक अमेरिकन डालर 20 रुपये का आता था।

बादबाकी तो विनीत और चंडीदत्त शुक्ल ने इतना लिख दिया कि स्कोप खत्म है। सच में बहुत दिन जिएगा शाहरुखवा....बहुते दिन जिएगा।
DDLJ पर आठवां लेख

Monday, October 5, 2009

हिन्दी टाकीज-जिंदगी है तो सिनेमा है और सिनेमा ही जिंदगी है-सोनाली सिंह



हिन्दी टाकीज-४८




सोनाली से चवन्नी की मुलाक़ात नहीं है। तस्वीर से ऐसा लगता है कि वह खूबसूरत और खुले दिल की हैं। जुगनुओं के पीछे भागती लड़की के हजारों सपने होंगे और उनसे जुड़ी लाखों ख्वाहिशे होंगी। चवन्नी चाहेगा कि रोज़ उनकी कुछ खेअहिशें पूरी हों.वैसे सोनाली कम से कम २२-२३ चीजों पर पक्का यकीं करती हैं। यकीनयाफ्ता सोनाली निश्चित ही ज़िन्दगी को भरपूर अंदाज़ में जीती होंगी। चवन्नी ने उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी हैं,पर भरोसे के करीबियों से उनकी तारीफें सुनी है। उनके लेखन का एक नमूना यहाँ लिखे शब्द भी है...आप उनसे संपर्क करना चाहें तो पता है... sonalisingh.smile@gmail.com


चवन्‍नी के हिन्‍दी टाकीज का कारवां जल्‍दी ही 50वे पड़ाव पर पहुंच जाएगा। सफर जार रहेगा और आप के संस्‍मरण ही चवन्‍नी के हमसफ़र होंगे। आप भी लिखें और पोस्‍ट कर दें ... chavannichap@gmail.com
यूं तो मैं जब तीन माह की थी, मैंने अपनी मौसी के साथ सिनेमा देखने जाना शुरू कर दिया था। मौसी बताती हैं कि मैं बिना शोरगुल किये चुपचाप बड़े शौक से तीन घंटे तक पिक्‍चर देख लिया करती थी। कुछ बड़ी हुई तो चाचा लोगों के साथ सिनेमा हॉल जाना शुरू कर दिया। 'नि‍गाहें', 'नगीना', 'चालबाज'... सारी की सारी श्रीदेवी की फिल्‍में... इतनी देखी, इतनी देखी कि अब मेरी आंखें श्रेदेवी को स्‍क्रीन पर देखते ही पलट जाती है। दोनों चाचा की फेवरिट हीरोइन श्रीदेवी थीं। एक के साथ पिक्‍चर देखकर आओ तो दूसरे के साथ भी वही पिक्‍चर देखने जाना पड़ता था। मैं दोनों में से किसी को भी नाराज नहीं कर सकती थी।
जब भारतीय सिनेमा के रूपहले पर्दे पर नीलम की एंट्री हुई तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली। उसके बाद काफी वर्षों तक रंगीन पर्दे का सफर थम गया। गोया अब मैं बड़ी हो गयी थी और हॉल में शरीफ लड़कियों के जाने का चलन शुरू नहीं हुआ था। रोज रात नौ के बाद एक नयी मूवी देखो। हम पापा के घर से बाहर जाने का बेसब्री से इंतजार किया करते थे।
तभी एक महान अभिनेत्री दिव्‍या भारती पर्दे पर अवतरित हुई। कितनी सुंदर थीं वो।. तब उनकी उपमा के अनरूप 'क्‍यूट' शब्‍द से हम वाकिफ नहीं थे। अचानक हादसे में जब उनकी सफलताओं का कारवां रूक गया तो हमारे कस्‍बे की गति थम गयी और मोहल्‍ले के लड़कों ने गम से खाना-पीना बंद कर दिया। रियली तब एहसास हुआ कि सिनेमा की पैठ भारतीय जनमानस में कितनी गहरी है।
चलिए।. आगे बढ़ते हैं। अपने स्‍वीट सिक्‍सटीन से सिनेमाघरीय अनुभव किसी जादुई कल्‍पना जैसे चंद्रकांता को पढ़ने से कम रोमांचक नहीं था। पहली बार घर से दूर लखनऊ में हॉस्‍टल में रह रही थी। हॉल का नाम था -'नॉवल्‍टी' और पिक्‍चर थी 'कुछ कुछ होता है'। निहायत देखने लायक सीन था जब हम कुल मिलाकर चालीस लड़कियां नॉवल्‍टी में अपनी वार्डन के साथ पिक्‍चर देखने गये थे। मिनी बस से हॉल तक एक लाइन में लगकर गये थे। साथ ही साथ वार्डन गिनती करती जा रही थीं कि कहीं एकाध अपने ब्‍यायफ्रेंड के साथ गुम तो नहीं हो गयी। एक-एक कर के हम सभी अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गये। हमारी वार्डन और हॉस्‍टल के गार्ड किनारे वाली सीटों पर बैठे हुये थे। भरसक सुरक्षा इंतजामों के बीच हमने मूवी का लुत्‍फ उठाया। पिक्‍चर का खुमार इतना था कि हॉस्‍टल लौटकर सभी के नाम फिल्‍म के पात्रों के नाम पर रख दिये गये। राहुल, टीना, वगैरह-वगैरह। हमने अपनी वार्डन का नाम मिस ब्रिगेन्‍जा रख दिया। वार्डन के साथ फिल्‍म देखने जाने का सिलसिला अजय देवगन और काजोल स्‍टारर 'प्‍यार तो होना ही था' तक चला।
अब हमने अपने-अपने ग्रुप के साथ चोरी-छिपे सिनेमा हॉल जाना शुरू कर दिया था। हॉस्‍टल में एक्‍सट्रा क्‍लासेज का बोलकर मूवीज का एक्‍सट्रा मजा लिया करते थे कि अचानक यह हादसा हो गया।
हम कहीं बाहर से लौटे थे कि देखा रूम नम्‍बर दस में लड़कियों का जमावड़ा बैठा रो रहा था। रूम नम्‍बर दस हॉस्‍टल का सबसे बड़ा रूम था इसलिये हमारी बैठक वहीं जमा करती थी। एक अफवाह इस सरापे की वजह थी कि एचआईवी इन्‍फेक्टिव लोगों ने अपना ग्रुप बना लिया है। वे 'न हम जीयेंगे और न ही तुमको जीने देंगे' की पॉलिसी पर काम कर रहे थे। वह यहां-वहां हर जगह फैले हुये थे। जो भी लड़की पिक्‍चर देखने जाती थी वे एक सीरिंज की सहायता से इन्‍फेक्‍शन आगे बढ़ा देते थे। वे इतने एक्‍सपर्ट थे कि किसी भी शिकार को एक चींटी काटने से ज्‍यादा एहसास नहीं होता था। जब लोग मूवी देखकर लौटते थे और कपड़े चेंज करते थे तब उन्‍हें अपनी पीठ पर एक स्‍टीकर चिपका मिलता था 'वेलकम टू एचआईवी फैमिली'।
हमें एचआईवी के बारे में कोई विस्‍तृत जानकारी नहीं थी। मसलन कि यह कोई जानलेवा बीमारी है और छूने से फैलती है। रोने वालियों को पूरा यकीन था कि वे एचआईवी इन्‍फेक्‍टेड हो चुकी हैं, क्‍योंकि पिछले हफ्ते क्‍लासेज बंक कर के पिक्‍चर देखकर आयी थीं। हम उन्‍हें लगातार तसल्लियां दे रहे थे कि अरे तुम्‍हारी पीठ पर तो 'वेलकम टू एचआईवी फैमिली' वाला स्‍टीकर चिपका मिला ही नहीं तो कैसे हो सकता है।
खैर या तो अफवाह जबरजस्‍त थी या बहुत मासूम थी। हमने बात दिल पर ले ली और हॉल से नाता तोड़ दिया।
टाइम बीतता गया। समय के थपेड़े कभी यहां तो हमें कभी वहां अपने साथ उड़ाते रहे। झांसी आकर तो मेरी लॉटरी खुल गयी। मिनर्वा, नटराज, खिलौना और चांदनी... चारो की चारो टॉकीज एक साथ इलाइट चौरहे पर। और साथ जाने के लिये दोस्‍तों-रिश्‍तेदारों की कंपनी बिल्‍कुल फ्री। हमें सिर्फ पिक्‍चर देखने जाने से मतलब होता था। कौन सी पिक्‍चर चल रही है - यह हॉल जाकर पता चलता था। हम कुछ भी देखते थे मसलन अक्षय कुमार की सड़ी से सड़ी पिक्‍चर और बहाना 'लाइट नहीं आ रही है चलो, पिक्‍चर देखकर आते हैं।' जैसा कुछ भी हो सकता था। सीटों का सिस्‍टम एकदम मस्‍त था, कोई कहीं भी बैठ सकता था। फर्स्‍ट क्‍लास वाले भी बालकनी में आकर बैठ जाया करते थे। फिर जब बालकनी वाले अपनी सीट की दुहायी देते थे तब टिकट चेकर आकर टिकिट चेक करता था और फर्स्‍ट क्‍लास वाली को वापस अपनी क्‍लास में भेज दिया करता था। हमें याद है कि जब 'पहेली' देखने गये। आधा घंटा लेट पहुंचे थे। उस पर आधा घंटा अंधेरे में अपनी सीट ढूंढते हुये हम लोगों के लिये खुद एक पहेली बन गये थे। शाहरुख खान की फिल्‍मों का जुनून इस कदर था कि फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो ब्‍लैक में टिकिट लेकर देखा करते थे।
झांसी मे तब नारमली पांच के बाद लड़कियां पिक्‍चर देखने नहीं जाया करती थी। फैमिली भी जाने से पहले सोचा करती थी। तभी हमने यह एडवेंचर किया था। अब फैमिली भी जाने से पहले सोचा करती थी। तभी हमने यह एडवेंचर किया था। अब शायद आप लोगों को यह मामूली बात लगे पर हमारे लिये बड़ा कारनामा थी जिसे याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 'कल हो न हो' रिलीज हो चुकी थी। यूनिवर्सिटी के टाइम शेड्यूल की वजह से शो देखने निकल नहीं पा रहे थे। बस छह से नौ का शो ही देख सकते थे। नवम्‍बर की गुलाबी सर्दियां चल रही थी। मिशन को कामयाब बनाने के लिये मैंने अपनी जूनियर प्रियंका को साथ ले लिया। हम दोनों अच्‍छे पैकअप होकर हॉस्‍टल से निकले। हमने अपने-अपने चेहरे शॉल से ढक रखे थे। डर इतना लग रहा था कि पूछो मत। अगर कोई जान-पहचान वाला देख लेता तो अच्‍छी तरह खबर लेता। खबर क्‍या मामू, वॉट लग जाती। इस तरह हमें चोरी-छिपे, डरे-सहमे सिनेमा हॉल पहुंचे। देखते क्‍या हैं बालकनी में सिर्फ पांच पुरुष और हमें मिलाकर कुछ सात स्‍त्री-पुरुष। बुरे फंसे... खैर कुछ बुरा नहीं घटा। हमने खुश तबियत से पिक्‍चर का मजा लिया और खैरियत से वापस लौट आये। जब वापस हॉस्‍टल आकर हमने अपना कारनामा सुनाया तो सभी ने दांतो तले उंगली दबा ली।
जिंदगी का रुख एकबारगी फिर लखनऊ की ओर मुड़ गया। वहां WAVE सिनेमा हॉल हमारे जीवन का पर्याय बन गया। मैंने और मेरी परमप्रिय सखी प्रज्ञा ने वहां हर हफ्ते पिक्‍चर दरेखने का रिकार्ड बनाया था। बात कुछ यूं थी कि हम थे तो बचपन की सखियां पर हमारी रुचियां कहानी घर-घर की बहुओं की तरह अलग-अलग थी। इसका सोल्‍यूशन कुछ इस तरह निकला कि एक पिक्‍चर वह मेरी पसंद की देखती थी फिर दूसरी पिक्‍चर मैं उसकी पसंद की। इस तरह हम कभी-कभार हफ्ते में दो पिक्‍चरें भी देख लिया करते थे। WAVE सिनेमा हॉल में लोग-बाग हम दोनों को देखने के इस कदर यूज्‍ड टू हो गये थे कि हमें क्‍यू में खड़े हुये देर नहीं होती थी कि मशीन ऑटोमैटिकली अपर कोर्नर सीट के दो टि‍किट निकाल कर दे दिया करती थी। जिंदगी है तो सिनेमा है और सिनेमा ही जिंदगी है - यह सिलसिला दिल्‍ली आकर भी जारी है। पंसदीदा फिल्‍मों की लिस्‍ट बहुत लंबी है पर उनके उनके साथ कुछ मीठी-मीठी बातें जुड़ जाती है और उस फिल्‍म को यादगार बना देती है।
(1) 'जोधा अकबर' तीन घंटे से ऊपर की फिल्‍म है हमें मालूम नहीं था। हम अपने तयशुदा समय से ऊपर पिक्‍चर देखकर लौटे। नाइट शो था। हॉस्‍टल का गेट बंद हो चुका था। मिन्‍नतें करने के बाद गेट तो खुल गया पर सिर्फ चाय पर रात काटनी पड़ी।
(2) 'कभी अलविदा न कहना' शायद पहली फिल्‍म थी। जिसे देखकर मैं और प्रज्ञा बहुत रोये। देखते हुये रोये सो अलग वापस लौटकर भी बहुत रोये।
(3) 'तारे जमीन पर' देखते वक्‍त हमने पूरी पिक्‍चर के दौरान बैकग्राउंड में लोगों की सुबकियां सुनी थी।
(4) 'चलते-चलते' देखने के लिये हमने ब्‍लैक टिकिट्स के लिए मारा-मारी की थी।
(5) 'कल हो न हो' देखने के लिए बहादुरी का कोई अवार्ड तो बनता है ना।.
(6) 'माचिस' और 'इस रात की सुबह' लगातार एक के बाद एक देखी थी। पिक्‍चर देखने के बाद मटरगश्‍ती सुबह तक चालू रही थी।
(7) 'दस कहानियां' देखते वक्‍त हमने अपने बॉस को उनकी गर्लफ्रैन्‍ड के साथ रंगे-हाथो पकड़ा था।
(8) 'पहेली' देखने के लिये अपनी सीट ढूंढ़ते-ढूंढते हम ही लोगों के लिये पहेली बन गये थे।
(9) 'धूम 2' देखने हॉस्‍टल की फौज गयी थी। जैसे ही रि‍तिक रोशन पर्दे पर आता हमारी जांबाज लड़‍कियां सीटियां बजानी शुरू कर देती। आसपास के अंकल हमारा दंगल देखकर हैरान थे।
(10) 'लव आज कल' छोटी रील की फिल्‍म। इम्तियाज अली से बेहद नाराजगी है। इतनी छोटी पिक्‍चर क्‍यों बनायी कि टिकट, को‍ल्‍डड्रिंक और पॉपकार्न के पैसे ही नहीं वसूल होते।

Tuesday, September 1, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा देखने का सुख - विपिन चन्द्र राय

हिन्दी टाकीज-४६
मुझे सिनेमची भी कह सकते हैं। सिनेमा देखने की लत उम्र के किस पड़ाव में लगी, याद नहीं, पर पचासवें पड़ाव तक कायम है और आगे भी कायम रहेगा। असल में मेरे पिताजी नगर दंडाधिकारी थे, सो उन्हें पास मिलता था। वे फिल्म नहीं देखते थे तो पास का सदुपयोग करना मेरा ही दायित्व बनता था। वैसा मैं करता भी था, शान से जाता था, गेटकीपर सलाम बजाता था और वीआइपी सीट पर मुझे बिठा देता था। यहां तक कि इंटरवल में मूंगफली भी ला देता था। मैं मूंगफली फोड़ता हुआ सिनेमा दर्शन का सुख उठाता था। क्या आंनद दायक दिन थे वे, बीते दिनो की याद जेहन में समायी हुई हैं।
मेरे छोटे से कस्बे जमालपुर में दो सिनेमा हाल अवंतिका और रेलवे था। उसमें प्रत्येक शनिवार को सिनेमा देखना मेरी दिनचर्या में शामिल था। सिनेमा बदले या वही हो, दोबारा देख लेता था। मुंगेर में तीन सिनेमा हाल था विजय, वैद्यनाथ और नीलम। उस जमाने में नीलम सबसे सुंदर हाल था। मुंगेर जाता तो बिना सिनेमा देखे वापस आने का सवाल नहीं था। पास जो उपलब्ध रहता था। उस जमाने में मनोरंजन का एकमात्र सर्वसुलभ साधन सिनेमा ही था। बस इसलिए वही देखता था। ढेर सारी फिल्में देखी हैं। नाम गिनाने लगूँ तो दो-चार पेज भर जायेगा। पूरे होशोहवास में बॉबी से याद आता है। फिर तो यह दौर लगातार जारी रहा। मेरा दुर्भाग्य कि बाबूजी का ट्रांसफर हो गया और फ्री सिनेमा देखना भी बंद हो गया।
संयोगवश मेरे घर के पास ही प्रकाश प्रेस था, वह अवंतिका का टिकट छापता था। प्रेस के मालिक का बेटे प्रभुनारायण से मेरी दोस्ती थी। बस उसके साथ प्रतिदिन नौ से बारह का रात वाला शो देखने जाने लगा। एक ही हाल, एक ही सिनेमा, रोज देखता, पर थकता नहीं था। असल में हमलोगों का अपना घर उस समय बन रहा था, इसकी रखवाली मैं अकेला ही करता था। मां और भाई अलग घर में,जो भाड़े का था, उसमें रहते थे। उस घर से आठ बजे तक खाना खाकर मैं बन रहे घर में आ जाता था। फिर प्रभु के साथ निकल जाता था, किसी को पता भी नहीं चलता था और मजे से सिनेमा देखने का सुख लाभ उठाता था।
क्या सुहाने दिन थे। सिनेमा हॉल में घुप्‍प अंधेरा और एकटक सबकी निगाह बड़े से परदे पर। हीरो के धांसू डायलाग पर तालियों की गड़गड़ाहट, सीटियों की गूंज, मस्ती का आलम। इन कार्यो में मेरा भी योगदान रहता था। कोई कोई दर्शक तो पैसे भी उछालते, पर मैं नहीं। क्योंकि देखता था कि गेटकीपर टार्च जलाकर पैसे चुन रहा है। मुझे यह मूर्खतापूर्ण काम लगता था, सो मैं कभी भी पैसे नहीं फेंकता था। इस नजारे का दर्शन टीवी पर दुलर्भ है, पूछिए उनसे जिन्होंने ऐसे क्षणों का प्रसन्नतापूर्वक सिनेमा हॉल में उपभोग किया है।
इंटरमीडिएट तक जमालपुर प्रवास रहा। आज एक गुप्त बात सरेआम कबूल रहा हूँ। कभी-कभार जमालपुर से भागलपुर और पटना तक की दौड़ लगा देता था। भागलपुर तक तो रेलवे टिकट भी नहीं कटाता, किसकी हिम्मत जो स्टूडेंट से टिकट मांगने की जुर्रत करता। हां,पटना के लिए टीटीई के हाथ में पांच का नोट थमा देता था, जाते वक्त और आते वक्त। अपर इंडिया एक्सप्रेस से पटना जाता था, वहां वीणा सिनेमा में फिल्म देखना और शाम सात बीस में उसी ट्रेन से वापस। किसी को पता भी नहीं चलता था। कभी मां ने पूछा कि खाने के लिए नहीं आया तो कहता कि भूख नहीं थी। बस बहाने बनाने में माहिर मैं और सिनेमा देखने में भी माहिर। काम बन जाता था। कभी भी मेरी यह चालबाजी पकड़ में नहीं आयी।
इंटर पास करने के बाद टाटा स्टील में अपरेंटिस में आ गया। जमशेदपुर में उस समय नटराज, वसंत, करीम, जमशेदपुर, जीटी और स्टार टॉकीज था। नटराज की शान ही निराली थी, एसी हॉल था। प्रत्येक बुधवार को जेटीआई जो आजकल एसएनटीआई कहलाता है, वहाँ थ्योरी क्लास होता था। हमलोगों का छह साथियों का ग्रुप था, हाफ डे क्लास से पंगा और चल देते थे सिनेमा हाल। यहां तो आजाद पंछी था, कोई रोकने-टोकने वाला भी नही। बस साइकिल उठाओ और सिनेमा हॉल की सैर करो। नटराज, वसंत, करीम, जमशेदपुर टॉकीज बंद हो गए। शहर की रौनक ही खतम हो गयी। बस ले देकर देखने लायक एक हॉल पायल बचा हुआ है, पर मेरी कॉलोनी से मानगो काफी दूर है, सो कभी-कभार ही मौका मिलता है, पर आज भी छोड़ता नहीं हूँ।
प्रसंगवश एक घटना बताता हूँ सिनेमा देखने की धुन का शिकार दो दिन के सस्पेंशन से झेलना पड़ा। आदत से लाचार स्टार टॉकीज में ढाई बजे के शो में हम छह जन थे। फिल्म खत्म होते ही बाहर निकले तो ट्रेनिंग मैनेजर से आमना-सामना हो गया। वे भी फिल्म देखने आये थे। दूसरे दिन आफिस में बुलाहट, डांट-फटकार और दो दिन का सस्पेशन आर्डर मिला। फिल्म थी गूंज उठी शहनाई। सजा भोगी पर फिल्म देखना बदस्तूर जारी रहा।
जिस समय मेरा सिनेमा देखना पूरे शबाब पर था। उस समय दर्शकों को में राजेश खन्ना की धूम थी, उसके हेयर स्टायल की नकल, आँख झपकाने की अदा के दीवाने थे। उसके बाद अभिताभ बच्चन की तूती बोलती थी। मैंने इन दोनों का कोई भी सिनेमा नहीं छोड़ा है। वैसे राजकपूर की श्री 420 और जिस देश में गंगा बहती है, दिलीप कुमार की गोपी और राम और श्याम, देवानन्द की गाइड और जानी मेरा नाम, धर्मेन्‍द्र की सीता और गीता और धर्मवीर, जीतेन्द्र की फर्ज और वारिस, राजेश खन्ना की दो रास्ते, नमकहराम, आनंद, अभिताभ बच्चन की दीवार, जंजीर, अदालत, मुकद्दर का सिंकदर, अनिल कपूर की मिस्टर इंडिया, नायक, सलमान की हम आपके है कौन, बीबी नं 1, अमिर खान की हम है राही प्यार के, सरफरोस, तारे जमीन पर शाहरूख खान की चक दे इंडिया, दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे, वीर जारा जैसी फिल्मों को हॉल में देखना अवर्णनीय अनुभव है। इसे शब्दाकिंत करना कठिन है, यह सुखकारी अनुभूति दिल में समायी हुई है। हीरोइनों में मेरी खास रुचि नहीं थी। वैसे हेमामालिनी, श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित का दीवाना हूँ। यह दीवानापन अभी भी कायम है। आजकल भी ढेर सारी फिल्में बनती है, पर मन की छूती नहीं है। लगता है कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा की तर्ज पर बनती है आज की फिल्में।
आजकल बनती है ढेरों फिल्में, अधिकांश फिल्में तो आकाशीय चैनलो की मेहरबानी से घर बैठे ही देखने को मिल जाता है। बाकी पायरेटड सीडी है ही। पर एक बात बताऊँ टीवी पर आँख गड़ाये, आँख दर्द करने लगता है। रही-सही कसर विज्ञापन पूरी कर देती है। हर दस मिनट बाद विज्ञापनों की भरमार, चिढ़ और ऊब पैदा कर देती है। एक तो छोटा स्क्रीन, फिर विज्ञापन, देखे क्या खाक।
बीते दिनो की कसक भी चुभती है, क्या उत्साह रहता था, भीड़भाड़ में धक्का-मुक्की करते हुए टिकट कटाना और बड़े परदे पर सिनेमा हॉल में सिनेमा देखना। कई बार तो ब्लैक में भी टिकट कटाता था, वापस आने का सवाल ही नहीं, चाहे जिस विधि हो, सिनेमा देखना ही था।
नौ आने से सिनेमा देखना शुरू किया था और तीस रूपये तक देखा। उसके बाद धीरे-धीरे हॉल भी बंद होने लगा। आजकल तो मल्टीप्लेक्स का जमाना है और टिकट दर हतोत्साहित करने का कारण है। आखिर जेब भी अलाऊ करें ना, लेकिन दो सौ रूपये खर्च करना अपने बूते से बाहर है। सारी सुख-सुविधा के बावजूद मल्टीप्लेक्स में दर्शकों का टोटा ही रहता है। वास्तव में सिनेमा हॉल का कोई विकल्प ही नहीं है। सरकार ने दुधारू गाय समझकर ऐसा दोहन किया कि सिनेमा के टिकट पर सिनेमा के दाम से अधिक मनोरंजन कर ही अंकित रहता है। बेचारे सिनेमा हॉल के मालिक के सामने एकमात्र चारा हॉल बंद करना ही रह गया सो बंद हो रहा है।
लेकिन मेरे जैसे अनगिनत दीवाने होंगे, जिन्हें बीते दिनो की याद सताती होगी। काश कि सरकार और सिनेमा हाल के मालिकों को सद् बुद्धि आए और सिनेमा हॉल खुल जाए। मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि सिनेमा देखने का सुख सिनेमा हॉल में उठाऊँ। आज नहीं तो कल होगा जरूर, भले हम न होगें, पर सुहाने दिन अवश्‍य आएंगे। सयाने कहते भी हैं कि दुनिया गोल है, यानी कि घूम फिर कर सिनेमा हॉल के दिन भी बहुरेंगे। फिर मैं रहूंगा, सिनेमा होगा और सिनेमा हॉल रहेगा और मस्ती के दिन रहेंगे। इसी कामनारत मनोभावो के साथ, सिनेमा हॉल को भेरी शुभकामनाएँ।
मेरी पसंदीदा फिल्में:-
(1) जिस देश में गंगा बहती है।
(2) गाइड
(3) बाबी
(4) दो रास्ते
(5) दीवार
(6) दिल वाले दुल्हनिया ले जाएगें
(7) हम आपके हैं कौन
(8) मिस्टर इंडिया
(9) गदर
(10) तारे जमीन पर

विपिन चन्द्र राय
एफ - 12, टायो कॉलोनी
जमशेपुर - 832108.
e-mail : bipinchandraroy@yahoo.in

Tuesday, August 11, 2009

हिन्दी टाकीज:काश, लौटा दे मुझे कोई वो सिनेमाघर ........ -सुदीप्ति

हिन्दी टाकीज-४५
चवन्नी को यह पोस्ट अचानक अपने मेल में मानसून की फुहार की तरह मिला.सुदीप्ति से तस्वीर और पसंद की १० फिल्मों की सूची मांगी है चवन्नी ने.कायदे से इंतज़ार करना चाहिए था,लेकिन इस खूबसूरत और धड़कते संस्मरण को मेल में रखना सही नहीं लगा.सुदीप्ति जब तस्वीर भेजेंगी तब आप उन्हें देख सकेंगे.फिलहाल हिन्दी टाकीज में उनके साथ चलते हैं पटना और सिवान...
bबिहार के एक छोटे से गाँव से निकलकर सुदीप्ति ने पटना वूमेन'स कॉलेज और जे एन यू में अपनी पढ़ाई की है। छोटी-छोटी चीजों से अक्सरहां खुश हो जाने वाली, छोटी-छोटी बातों से कई बार आहत हो जाने वाली, बड़े-बड़े सपनों को बुनने वाली सुदीप्ति की खुशियों की चौहद्दी में आज भी सिनेमा का एक बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है।जितनी ख़ुशी उनको इतिहास,कहानियों,फिल्मों और मानव-स्वभाव के बारे में बात करके मिलती है, उससे कहीं ज्यादा खुश वो पटनहिया सिनेमाघरों के किस्सों को सुनाते हुए होती हैं. झूठ बोलकर या छुपाकर ही सही, खुद सिनेमा देखने बिहार में सिनेमाघर में चले जाना, बगैर किसी पुरुष रिश्तेदार/साथी के, साहस और खुदमुख्तारी को महसूस करने का इससे बड़ा जरिया भला और क्या हो सकता था उनके लिए तब...
बढ़ती उम्र, बदलते सिनेमाघर
हम दो छोटे-छोटे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर करते हैं--एक शब्द है मज़ा और दूसरा मस्ती। मेरे लिए अगर इनका कोई मायने है तो वह सिनेमा से अभिन्न रूप से जुडा हुआ है।
ज़िन्दगी में मैंने चाहे जितने 'मज़े' किये, उनमें से नब्बे फीसदी फिल्मों की वजह से किये। आज अगर मैं किसी को कहती हूँ कि एक ज़माने में हमने भी खूब 'मस्ती' की है तो उस वक़्त कहीं न कहीं दिमाग में वो ही दौर रहता है जो ग्रेजुएशन के समय में हमारे छोटे से 'गैंग' ने फिल्में देखते हुए गुजारा।
सिनेमा मेरे लिए पैशन है....था भी...और शायद रह भी जाये...., पर वो बात अलग थी; कैसे?
चलिए बात शुरू से ही बताती हूँ।
मेरा पहला सिनेमाघर
चलती हुई कहानी देखने का मेरा सबसे पहला अनुभव तब का है, जब मैं अपने माँ-पापा के साथ एक बार सिवान के मशहूर सिनेमाघर 'दरबार हॉल' में फिल्म देखने गयी थी। जिस पहली फिल्म की धुंधली-सी छाया आज तक बनी हुई है, वो है 'राम तेरी गंगा मैली'। माशाअल्लाह...! शुरुआत ही ऐसी थी; पर मैं सिनेमा के शौकीन अपने माँ-पापा के पास से पढ़ाई के लिए अपनी नानी के घर चली आई। सिवान जिले के महाराजगंज प्रमंडल के पकवलिया नामक गाँव में।वहां से फिल्म देखने तो किसी के 'ले जाने' पर ही जाया जा सकता था. दिक्कत यह कि मामा लोग तो बाहर रह कर पढाई करते थे, अब हमें फिल्म कौन ले जाये? तभी घर में टी. वी. का दाखिला हुआ. वो रामायण-महाभारत का ज़माना था. सिनेमा न सही, टी. वी. ही सही- की तर्ज पर बचपन में टी. वी. से चिपकने की मेरी आदत हजारों लानतें सुनकर भी नहीं सुधरी.
***
जब मैं आठवीं में आई तो मेरे फ्रेंड्स महाराजगंज के ही छोटे से हॉल में जा कर फिल्मे देखते थे, पर प्रोफेसर साहब की नातिन के रूप में शहर भर में मेरी जो पहचान हो गयी थी (जिसके चलते उस छोटे से शहर में दूर से ही मेरी साईकिल तक पहचान ली जाती थी) उसे देखते हुए कभी मैंने 'रिस्क' नहीं लिया!दूरदर्शन पर जिन सैकड़ों फीचर फिल्मों को देख-देख मैंने खुद को दिलासा दिए रखा,उनमें बावर्ची ,कटी पतंग,अराधना,अभिमान जैसी फिल्में भी होती थीं,जो आस-पड़ोस के लोगों के साथ हॉउसफुल जाती थीं और सूरज का सातवाँ घोड़ा जैसी फिल्म भी होती थी, जिसे देखने बैठे घर के लोग भी एक-एक कर उठ जाते और मौसी बार-बार कहने लगती कि- "टी।वी. बंद कर दो, बैटरी बचेगी तो कल 'रिपोर्टर' (धारावाहिक) देखा जायेगा". मैं रुआंसी हो उसकी तरफ देखती और जब विज्ञापन (उस समय हम प्रचार कहते थे) आता तो बंद कर देती, पर प्राण तो उस बुद्धू बक्से में ही कैद रहते! सो मिन्नतें करती कि बीच-बीच में देख सकूँ. आज तक सूरज का सातवाँ घोड़ा उन्हीं छोटे-छोटे टुकडों में ही दिमाग में कैद है; जबकि अच्छे से देखी हुईं कई फिल्में गायब हो चुकी है. इसे अच्छे सिनेमा का प्रभाव भी कह सकते हैं या मेरे सिनेमा-प्रेम का जिद्दी रूप भी. खैर,मेरा पहला सिनेमाघर टी.वी. ही था, जिसने सिनेमा के प्रति मेरे लगाव को जिलाए रखा.
किशोर उम्र और असली सिनेमाघर की डगर
अपनी मुकम्मल याददाश्त में हॉल में देखी पहली फिल्म है- बंजारन, जो पटना के चाणक्या या एलिफिस्टन सिनेमा हॉल में मेरी पसंद से प्रकाश आचार्य जी ने दिखाया और संजीव-संदीप को मन मार कर देखना पड़ा। दरअसल हम तीनों अपने स्कूल की क्वीज़ टीम में पटना गए थे और पहला स्थान हासिल किया.क्वीज़ के दौरान नब्बे फीसदी जबाब मैंने दिए तो मेरी पसंद की फिल्म देखना तय हुआ. उन्हें तो फिल्म में क्या मज़ा आया होगा! अच्छा तो प्रकाश आचार्य जी को भी क्या खाक़ लगा होगा!! पर मेरी खातिर सबने देखी. और मुझे बंजारन ही इसलिए देखनी थी, क्योंकि उसमें मेरी फेवरिट हिरोइन श्रीदेवी थी. चाँदनी और चालबाज़ से लेकर नगीना तक सारी फिल्में मैं दशहरे के दौरान और शादियों के सीज़न में चलने वाले विडियो पर देख चुकी थी.
***
थोडा अवांतर तो है,पर एक मजेदार बात बताने से मैं अपने को रोक नहीं पा रही हूँ। उन दिनों किसी की बारात में या तो 'नाच' होता था (बिहार का खास लौंडा नाच) या किसी पैसे वाले शौकीन के यहाँ 'बाई जी का नाच'. नये-नए पर विडियो का चलन बढ़ रहा था.नाच में मुझे कुछ खास मज़ा नहीं आता था. वो मेरी परिष्कृत हो चुकी रूचि को थोड़ा भोंडा प्रतीत होता, पर विडियो देखने तो गर्मियों की दुपहर में सबके सो जाने पर झूना (जो गोली के खेल में मेरा गेम पार्टनर हुआ करता था ) के साथ खूब गयी हूँ. बचपन में मेरे लिए अच्छी बारात वही होती थी, जिसमे विडियो आए और शादी का बेस्ट समय वह,जब गर्मी की छुट्टियों में स्कूल बंद हो.मेरे लिए उस समय वीडियो सिनेमाघर से कमतर के बदले बढ़कर था.जा कर देख लेने की सहूलियत तो उसमें थी ही,नई-नई फिल्में भी देखने को मिलतीं थीं.ये दोनों सहूलियतें मेरे शहर के सिनेमाघर से जुडी हुई नहीं थीं. उन दिनों को याद कर मैं भी सिनेमा देखने की अपनी ललक के लिए रेणु जी के इन शब्दों को दुहरा भर सकती हूँ......
'तेरे लिए लाखों के बोल सहे' ;-)
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वो मेरे बोर्ड एक्जाम के दिन थे, जब हमारे शहर में हम आपके हैं कौन फिल्म लगी थी।उन दिनों वहां फिल्में रिलीज होने के साथ नहीं,बाद में लगा करती थीं. परीक्षा के ही दौरान मैंने पापा से जिद्द शुरू कर दी.वो मेरी चचेरी बहन (जिसका एक्जामिनेशन सेंटर भी महाराजगंज ही था) को सेंटर ले जाने-घर लाने के लिए मेरी नानी के यहाँ ही रह रहे थे.पापा ने टालते हुए कहा- अच्छा पहले परीक्षा दे लो. परीक्षा ख़त्म हुई तो वे चले गए, पर 'हम आपके हैं कौन' तो सुपर-डुपर हिट फिल्म थी और दरबार में आधी सीटें लेडिज थीं और यह फिल्म पूरी तरह पारिवारिक-सामाजिक थी; सो लोग अपने परिवार की औरतों को खूब दिखा रहे थे. इसलिए भी अगले कुछ महीनों तक यह लगी ही रही और जब एक-आध माह के अंतराल पर मेरे पापा आये तो मैंने उन्हें इमोशनली ब्लेकमेल करना शुरू किया.पापा सोच रहे होंगे कि कहाँ इसे ले जाऊँ और कहाँ बिठाऊंगा.लेडिज सीट पर भी अकेले बिठाने का ख्याल उन्हें तब आ भी कैसे सकता था? तो उन्होंने कहा कि अगर तुम्हारी मौसी चलेंगी तो तुम्हें ले चलेंगे. अब मौसी को मनाने का काम था जो ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ा, क्योंकि वो भी सिनेमा की शौकीन थी. इस तरह सिवान के दरबार सिनेमा हॉल में हम आपके हैं कौन वह दूसरी फिल्म रही, जिसे मैंने दसवीं (के इम्तहान के समय) की उम्र में हॉल में देखा और जाहिर सी बात है कि सलमान को देखना अच्छा लगने लगा. आज उम्र के दरिया से काफी पानी बह जाने के बाद (और बौद्धिक स्तर पर समझदार कहलाने के बाद भी) किसी भी बहस में ये साबित कर सकती हूँ कि सलमान को क्यों देखा जाना चाहिए तो कच्ची उम्र के उस लगाव के कारण ही. कुछ नहीं है उसमें तो कम से कम दर्शनीय चेहरा और सुन्दर शरीर तो है. आखिर हमारी अधिकांश हीरोइनें भी तो इनमें से एक भी होने पर सालों-साल चल जाती हैं. इस फिल्म ने और एक कमाल किया. इसे देखने से पहले तक मैं माधुरी दीक्षित को बहुत नापसंद करती थी.सिर्फ इसलिए कि मेरी फेवरिट श्रीदेवी थी,जिसे मैं पागलों की तरह पसंद करती थी... तो ज़ाहिर सी बात है की माधुरी मुझे कैसे पसंद हो? आज मैं भी अपनी वैसी पसंद पर हँस सकती हूँ /हंसती हूँ, पर तब हालत ये थी कि जैसे स्टेफी ग्राफ के किसी प्रशंसक ने मोनिका सेलेस को चलते मैच में छुरे से घायल कर दिया था, वैसे ही मैं माधुरी दीक्षित को चलती फिल्म में मार डालने का हिंसक भाव रखती थी. खैर, इस फिल्म ने मुझे माधुरी को पसंद करना तो नहीं, पर स्वीकार करना सिखा दिया.
असली सिनेमाघरों वाला मेरा हसीन शहर
१०वीं के बाद की पढ़ाई के लिए मैं पटना आ गयी। उसी शहर में,जहाँ के सिनेमाघर की शक्ल मेरी यादों में बहुत लुभावनी थी. मेरा मौसेरा भाई पटना में कोचिंग करता था. एक दिन वो मेरे हॉस्टल आया और बोला,"चल,तुझे घुमा कर लाते है". मैंने आंटी से पूछा तो उन्होंने हाँ कह दिया. हम बाहर गए तो उसने पूछा, 'कहा चलेगी'? मैंने कहा, 'फिल्म'. उसने बताया कि रीजेंट यहाँ का सबसे अच्छा हॉल है और वहां DDLJ लगी है. हम वही देखने गए. ६ बजे का शो मिला और जब हम देखने लगे तो मेरे भाई ने बताया कि इस फिल्म में काजोल उसे अच्छी लगी है. थोडी देर में जब मेरे ख्वाबों में... गाना शुरू हुआ और काजोल छोटी-सी सफ़ेद ड्रेस में बारिश में भींग -भींग नाच रही थी तो उसने अपनी सीट पर पहलू बदलते हुए कहा कि, "यहाँ नहीं,सेकेंड हाफ में अच्छी लगती है". उस समय की उसकी लाचारी पर आज हंसी आती है. खैर,रीजेंट (सिनेमाघर) और DDLJ (सिनेमा) दोनों मुझे पसंद आये.साथ ही इस रहस्य का पता चला कि स्पेशल क्लास दरअसल सबसे सस्ता वाला क्लास होता है.भाई ने जैसे मेरा इम्तिहान लेते हुए पूछा था- किस में देखोगी? स्पेशल, बी.सी., डी.सी.- देख मैंने स्पेशल कहा था. तब उसने बताया कि वो सबसे बेकार होता है. इसी के साथ यह भी पता चला (और जान कर मेरा मुंह खुला रह गया) कि डी.सी. की कीमत मात्र १२.५०रु. है. अचानक मुझे लगने लगा कि तब तो ५००रु. की अपनी पॉकेट मनी में मैं चाहूँ तो सारी फिल्में देख सकती हूँ.
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खैर, इंटर(11th-12th) में जिस हॉस्टल में थी,वो मेरी चाची के परिचितजन का था और वहां ज्यादातर स्कूली बच्चे रहते थे,सो उस दौरान मोना,अशोक,रीजेंट आदि में जो फिल्में मैंने देखीं,वो अपने पापा के पटना आने पर जिद्द करके या चाची की मेहरबानी से उनके परिवार के साथ। इस दौर की फिल्में हैं खामोशी- द म्यूजिकल, इश्क़, दिल तो पागल है आदि. खामोशी-द म्यूजिकल पापा ने दिखाई जो मेरे दिमाग पर लम्बे अरसे तक छाई रही. 'बांहों के दरमियाँ ... ' गाने से तो सलमान और अच्छा लगने ही लगा,साथ ही साथ मनीषा कोइराला मेरी नयी पसंद बनी.आज जब अपनी पसंद को एनालाइज करती हूँ तो लगता है कि मुझे पूरी तरह औरत दिखने वाली हिरोइनें पसंद आती थीं और हीरो...(?) ॥पहली शर्त तो गुडलुकिंग होना है ही. देवानंद, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, अमिताभ से लेकर हृतिक और इमरान खान तक मुझे अच्छी शक्ल वाले हीरो ही पसंद आते रहे है. जिंदगी में तो हम गुण देखते ही हैं, रुपहले परदे पर रूप ही क्यों न देखा जाये! हालाँकि इसकी एक गड़बडी है. सभी लड़कियों को पसन्द तो सलमान,आमिर,शाहरुख,हृतिक वगैरह हीरो ही आते हैं, पर रियल लाइफ में ऐसा भी होता है कि एक्स्ट्रा के रूप में भी नहीं चल पाने जैसे लड़के से तालमेल बिठानी पड़ती है. क्योंकि हमारे यहाँ शादियों में लड़के की शक्ल नहीं,अक्ल भी नहीं, आय देखी जाती है. जिसे अमिताभ जैसा छः फुट्टा पसंद हो, उसकी हालत सोचिये- जब उसे ५फ़ुट का दूल्हा मिले? खैर, अपना समाज तो विडंबनाओं से भरा समाज है ही!इस पर नया क्या रोना!!!
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हॉस्टल में रहने की असली आज़ादी मिली बी।ए. पार्ट-I में, जब मैं पटना विमेंस कॉलेज के पीछे के हॉस्टल पीटर विला में रहने लगी. यह अब भी नागेश्वर कालोनी में है.जो भी माँ-बाप अपनी व्यस्तता के चलते विमेंस कॉलेज हॉस्टल के सख्त नियम- कायदों का पालन नहीं कर सकते,पर अपनी लड़कियों को ज्यादा सुरक्षित और कड़े प्राइवेट हॉस्टल में रखना चाहते थे,उनके लिए पीटर विला से बेहतर कुछ नहीं होता था. इसी हॉस्टल में रिंकी और रश्मि के साथ मेरी जो तिकड़ी बनी,वो IIIrd year आते-आते फिल्म देखने में उस्ताद हो गयी.
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पहली फिल्म का दृश्य :
सिनेमा हॉल :अशोक
फ़िल्म : जब प्यार किया तो डरना क्या,
शो : दोपहर १२ से ०३ बजे यानी noon show।
करीब पच्चीस लड़कियाँ तरह-तरह से तैयार और फिल्म के बारे में बातें करते हुए... मैं सकपकाई हुई... चारों तरफ देखती हुई कि कहीं कोई मेरा परिचित तो नहीं है.... तब तक ढेर सारे लड़के देखने, समझने और टिकेट पा लेने की जुगत में! मुझे कभी इससे घबराहट नहीं हुई,पर उन लड़कों की हरकतों पर जब-तब गुस्सा जरुर आ रहा था और मैं अपने साथ खड़ी पूनम से कहने लगती- यार, सलमान की आँखें इतनी खूबसूरत हैं तो वह गोगल्स क्यों पहनता है?
दरअसल बी।ए।-पार्ट I (इको आनर्स) की लड़कियों ने तय किया कि जब प्यार किया तो डरना क्या लगी है और इसे ग्रुप में देखना है. डिपार्टमेन्ट की सबसे कम उम्र मैम को भी मनाया ,पर आखिर में उन्होंने दगा दे दिया.मैंने अपनी लोकल गार्जियन (चाची) से पूछा; क्योंकि तब डर बना रहता था कि पटना में रहने वाले दसियों रिश्तेदार देख कर चुगली मत खाएं . पर चाची ने चलताऊ ढंग से टाल दिया (भाई,दूसरे की लड़की!कुछ हो हवा गया तो रिस्क किसका?), पर उनके इसी ढंग ने मुझे शह्काया कि जब इन्हें मतलब ही नहीं तो पूछने से क्या फायदा ? और उस समय मोबाईल और फोन तो इतने थे नहीं कि हर बार पापा से पूछ सको! तो अब मैं बेखौफ तो नहीं,पर डर के बावजूद फिल्में देखने जाने लगी. इस तरह पहली फिल्म देखी 'जब प्यार किया तो डरना क्या'. बड़े-से परदे पर जब सलमान और अरबाज आते,हम सब जोर से चिल्लाते. इसी फिल्म और हॉल में मैंने पहली बार सीटी बजायी और चुपचाप देखने के बजाय हल्ला -गुल्ला करते हुए फिल्म देखने का मज़ा पाया.और फिर यह हॉल 'अशोक' अब मेरा पसंदीदा सिनेमाघर बन गया;क्योंकि यहाँ लड़कियों को स्पेशल प्रिविलेज मिलता था.कैसे? अभी बताती हूँ.
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अशोक में डी।सी., बी.सी. में टिकट पहले लड़कियों को मिलता था. अगर बच जाये तो ही लड़कों को. अब होता ये था कि लड़के लाइन में खड़ी लड़कियों से खूब निहोरे (request) करते थे. उनमें से कोई -कोई दया दिखाते हुए उनका पैसा लेकर टिकट ले देती,पर मैंने कभी इसका समर्थन नहीं किया.एक तो ये गलत था,साथ ही अगर उनका टिकट हम लेंगे तो वो हमारे बगल में बैठ जायेंगे और फिल्म के बीच ऐसे अवांछित तत्वों को कौन झेले!...और हॉल के कर्मचारी भी मना करते थे कि यह ठीक नहीं है.बाद में आप लोगों को ही परेशानी होगी तो मत कहियेगा.अशोक के अलावा पटना के जिन सिनेमाघरों में हम खूब गए,वो हैं- उमा, रीजेंट, वीणा, रूपक, रीजेंट, मोना. एलिफिस्टन. यहाँ तक कि अप्सरा में भी एकाध बार चले गए.यही शुकर था कि हम हॉस्टल में रहते थे और हमारे वापस लौटने की अपर लिमिट ३.३०p.m. तय थी.इसी वजह से हम दानापुर और दीघा के हॉल से वंचित रह गए!
हमारी तिकड़ी और इन सिनेमाघरों के किस्से
सबसे पहले उमा।
इसमें हमारे गैंग (मैं,रश्मि और रिंकी तो 'आजीवन सदस्य' थे, बाकी घटते-बढ़ते रहे, 2 से 8-10 की संख्या तक) ने बंधन नामक फिल्म देखी। दो रिक्शों में लद के हम पहुंचे १०.३० बजे सुबह.यहाँ एक जरुरी बात बता दूँ- हम १२ से ३का noon show ही देख सकते थे.किसी कारण से क्लास कैंसिल हो जाये तब या उबाऊ पढ़ाने वाली मैम की क्लास बंक कर या अच्छी फिल्म हो तो यूँ भी क्लास छोड़कर फिल्म देख सकते थे पर हॉस्टल किसी कीमत पर ३.३० तक लौट कर खाना खा लेना होता था,वरना पेशी हो जाती. उमा कदमकुआँ में है जो बोरिंग रोड स्थित हमारे हॉस्टल से काफी दूर था.पर उस समय मैं दिल्ली से बंधन के रिलीज की खबरें दिल्ली टाईम्स में पढ़ के गयी थी और टीम लीडर थी तो ये फिल्म देखनी ही थी. १०बजे के करीब हम लोग उमा पहुँच चुके थे. दरअसल नून शो की टिकट तत्काल ही मिलती थी. मैटनी शो की तो एडवांस में मिलती,पर नून की नहीं. करेंट बुकिंग १०.३० से होता था और ५ मिनट में जितनी हो जाये,उसके बाद ब्लैक कर देते. तो हमें ठीक १०.३० बजे पहुचने से क्या फायदा,अगर हम लाइन के शुरू के ५-७ लोगों में नहीं हो!फिर तो ब्लैक से देखना ही पड़ता. अब १२.५० की टिकट ३० रुपये में कौन खरीदना चाहेगा? इसलिये हम ९ से १० के बीच हॉल जाकर टिकट खिड़की पर खड़े हो जाते. लगभग हर हॉल में हमें टिकट १०.३० से १०.४० के बीच मिल जाती. अब समस्या रहती कि बचा हुआ टाइम कैसे खपाया जाये, तो हमने पटना के मंदिर,दरगाह और म्युजियम की खाक़ खूब छानी.इसलिए भी हमें अशोक पसंद था कि वहां से हम बिना रिक्शा का पैसा खर्च किये हनुमान मंदिर में समय गुजार सकते थे.अशोक में फिल्म देखना सबसे सस्ता और सुविधाजनक था. इसलिए 3rd year में तो हमने शायद ही कोई फिल्म वहां छोड़ी होगी. १२.५० रुपये की टिकट+१० रुपये रिक्शा भाड़ा ( एक आदमी के आने-जाने का ) ,यानी कम-से-कम २२.५० में हम एक फिल्म देख सकते थे.
खैर,उमा भी इस मायने में अच्छा था कि दूर होने की वजह से यहाँ किसी परिचित के आने की सम्भावना कम थी और अन्दर में बैठ कर इंतज़ार करने के लिए काफी जगह थी।वहां हम टिकट लेने के साथ ही अन्दर जा सकते थे. इस फिल्म में भी हम १०.३० में अन्दर चले गए और गप्प हांकने लगे. उमा काफी बड़ा हॉल था.अशोक से डेढ़ गुना बड़ा तो होगा ही. इसलिए यहाँ पर दूसरी जगहों की अपेक्षा देर से आने पर भी टिकट मिल जाती थी.कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि दूसरी जगह टिकट नहीं मिलने पर हम यहाँ आने की सोचते थे और वहां जाने पर आसानी से टिकट मिल जाता था.उमा का स्क्रीन बहुत बड़ा था,लेकिन आवाज कुछ खरखराहट के साथ आती. फिर भी ये हमारा सेकेंड फेवरेट हॉल था.उमा में जाने की एक और वजह थी-सलमान की फिल्में ज्यादातर उसी हॉल में लगती थीं. उमा में देखी सबसे यादगार फिल्म है- तक्षक. गोविन्द निहलानी की इस फिल्म को समीक्षकों ने भलें ही उतना नहीं सराहा हो, पर हमारे लिए यह उत्कृष्ट फिल्म थी.राहुल बोस का अभिनय लाजवाब था. पर फिल्म आने से पहले ही रंग दे गाने पर रिंकी और रश्मि ने हमारे हॉस्टल डे पर जो डांस किया था,उसका मुकाबला फिल्म में स्टिफ तब्बू नहीं कर पाई.और उमा में ही देखी सबसे वाहियात फिल्म थी-हेल्लो ब्रदर जिसे देखते हुए हम बीच से ही उठ कर जाने को तैयार थे.
अशोक में एक से बढ़ कर एक अनगिनत फिल्में देखी हैं हमने। दिल तो पागल है और इश्क़ तो अपनी लोकल गार्जियन के साथ देखी,पर अपने गैंग के साथ हम दिल दे चुके सनम, ताल, गाडमदर , फायर, हे राम, जख्म जैसी यादगार फिल्में यहाँ देखीं और आज भी इस हॉल मुरीद हूँ. इसमें कुछ और भी फिल्में (जैसे फिर भी दिल है हिदुस्तानी भी ) देखीं, पर वो सब उल्लेखनीय नही हैं. अशोक की खासियत यही थी कि आज तक उसमें हमने ब्लैक से टिकट खरीद कर नहीं देखी.
एक बार हम जल्दी यानी ९ बजे पहुच गए। दो लाइनें देख यह सोचा कि एक तत्काल और दूसरी एडवांस बुकिंग की लाइन होगी. हमने टिकट लिया और चले अपने ठिकाने पर; मतलब हनुमान मंदिर.उस दिन तो एक फैमिली के साथ सत्यनारायण की पूजा में भी शामिल हुए. रस्ते में थे,जब मैंने टिकट देखा (टिकट, पैसा मेरे पास ही रहता था और लौट कर हिसाब भी मैं ही करती थी.सो एक दोस्त ने मेरा नाम ही मुनीम जी रख छोडा था).टिकट पर मैटनी प्रिंट था.मैंने रिंकी को दिखाया.उसने कहा कि-"चलो जो भी होगा ...ज्यादा से ज्यादा आज नहीं देख पाएंगे".हम जब हॉल पर पहुचे तो सच में गड़बड़ हो गयी थी,पर मैं कहाँ मानाने वाली थी? मैं हॉल के मैनेजर के पास गयी और अपनी समस्या सुनाई. उसने सुना और रहम खाते हुए तीन सीटों की व्यवस्था कर दी.
बाद के दिनों में बस हम तीन जने जाने लगे थे- मैं, रिंकी और रश्मि।तीनों अपना G.S. का क्लास कॉलेज के साइंस ब्लाक की जगह सिनेमा हॉल में करने लगे थे.हम तीनों रूममेट भी थे और बैचमेट भी,तो प्राइवेसी और यूनिटी खूब थी.बस एक-एक फिल्म मैंने और रिंकी ने और मैंने और रश्मि ने अकेले देखी थी. मैं कॉमन थी, मेठ जो थी! मुझे छोड़ वे जा ही नहीं सकते थे...आखिर टिकट कौन कटाता? ब्लैकेटियर से झगडा कौन करता??
अशोक की दूसरी यादगार घटना फायर फिल्म की है। यह माँर्निंग शो में लगी थी.जाना समस्या नहीं था. वह टिकट लेना और माँर्निंग शो के लोगों को झेलना हमारे हिम्मत का इम्तेहान था.जब हम नून शो के लिए खड़े होते थे,उस वक्त भी माँर्निंग का जो क्राउड निकलता था,वो वाहियात होता था.खैर, फिल्म तो देखनी ही थी. आज भी कोई मुझे देख मेरी उम्र के बारे में गफलत में आ सकता है.ये तो १० साल पहले की बात है.टिकट लेने को और कोई राजी नहीं था.हमारे बहुत प्रयत्नों के बाद भी हॉस्टल से और लड़कियों में सिर्फ ११वीं की एक बेवकूफ किस्म की लड़की तैयार हुई थी. कहाँ तो हम सोच रहे थे कि बड़े ग्रुप में आ कर हम शर्मिंदगी से बच सकेंगे, कहाँ सिर्फ चार लड़कियाँ!! हॉल पहुँच कर सुकून मिला कि इस माँर्निंग शो में ढेर सारे अंकल लोग आंटियों के साथ आये थे.टिकट खिड़की पर पहुँच मैं बहुत गंभीर बनते हुए और ये बोलते हुए आगे बढ़ी कि अगर टिकट नहीं देगा तो हम कालेज का आई कार्ड देंगे. कैसे नहीं देगा?जैसे ही अपनी बारी आई,मुंह से निकला-"अंकल प्लीज चार टिकट दे दो". उसने सर उठा ऊपर से नीचे तक देखा, दो सेकेंड सोचा फिर बोला, "ये अडवांस की लाइन नहीं है." मैंने झेपते हुए कहा, "हमें फायर देखनी है." उसे पता था कि यह प्रचलित अर्थों में 'मॉर्निंग शो' की फिल्म नहीं है और टिकट दे दिया. साथ साथ इस बात का ख्याल भी रखा कि हमारी सीट बुजुर्गों/सयाने लोगों के बीच में हो ...so nice of him :)
फायर मूवी में ऐसा कुछ नहीं था,जिसके लिए इतना हल्ला मचा हुआ था। हमारे लिए हताश होने जैसी बात तो नहीं थी,बस दिमाग में सवाल कुलबुला रहा था.सबसे मजेदार बात यह थी कि जब नंदिता दास और जावेद जाफरी के बीच कुछ होने की गुंजाइश बनती दिखी तो उसकी शुरुआत में जोर की सीटी बजी,पर उससे ज्यादा प्रगाढ़ दृश्यों में पूरा हॉल स्तब्ध रहा.आज तक मैं समझ नहीं पाई कि ऐसा क्यों हुआ?
अशोक ही वो हॉल था,जहाँ हमने 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' देखने की हसरत भी पूरी की।फिल्म थी हे राम और हमें ये अंदाजा था कि पटना में इसके लिए मारामारी तो नहीं होगी. बस, अपन पहुँच गए 'फर्स्ट डे,फर्स्ट शो' की फैंटेसी पूरी करने. इसी फिल्म के बाद मैं रानी को पसंद करने लगी. इसमें गला काटने वाला दृश्य हमने आँखे खोल कर देखीं और लौट कर खाना नहीं खा पाए. इस फिल्म के प्रेम-दृश्य अद्भुत थे.बाद में जब नदी के द्वीप पढ़ा तो वे दृश्य बार बार स्मृति -पटल पर उभर रहे थे.प्रेम के क्षणों में कविता बुदबुदाना... , यह तो नदी के द्वीप में अद्भुत रूप में है.आज भी अशोक बहुत याद आता है.
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रीजेंट वाकई अच्छा हॉल था।उसकी बुराई बस यही थी कि वहां टिकट ब्लैक कर देते थे. कभी लड़-झगड़ कर तो कभी ब्लैक में ही टिकट खरीद यहाँ भी हमने खूब मस्ती की. हम साथ साथ है - देखने तो लगभग पूरा होस्टल ही चला गया था. इसमें हमने हर टिकट पर बस दस रुपये ज्यादा दिए थे. फिल्म ख़त्म होने पर वो भी खल रहा था और हॉस्टल की एक लड़की ने ऐसी हरकत की कि कुछ लड़कों ने नागेश्वर कालोनी तक हमारा पीछा किया. इसी हॉल मे कुछ कुछ होता है देखने आठ लोग गए थे और ये पहली फिल्म थी,जिसे हमने ५० रुपये में और वो भी स्पेशल क्लास में बैठ कर देखा.टिकट नहीं मिल रहा था तो मेरी एक दोस्त ने कहा कि चलो दूसरी जगह छोटे मिया-बड़े मिया लगी है, वही देख लेते है.पर मैं गोविंदा की फिल्म नहीं देखना चाहती थी और पूजा कि छुट्टी में घर जाने से पहले सब ये फिल्म देख लेना चाहते थे.सो हमने ब्लैक में और स्पेशल क्लास में देखी ही. हमारी दो सीनियर लड़कियाँ जो आपस में गहरी दोस्त थीं , इस फिल्म को देखते हुए इतनी बुरी तरह रोने लगीं कि बगल में बैठा आदमी घबरा ही गया.इन अनुभवों के बाद हमने तय किया कि अब अपने छोटे ग्रुप में जाएँगे. बड़े ग्रुप में मज़ा और प्रॉब्लम दोनों ज्यादा है. कोई काम करने तो बढ़ता नहीं, बस फायदा सबको चाहिए.अब हम फिल्म का प्रोग्राम सोते समय बनाते और लौट कर बताते कि देख आये है.
रीजेंट से जुडी दो मधुर यादे भीं हैं---सरफ़रोश देखने मैं और रिंकी बस दो लोग गए थे। फिल्म जब रिलीज हुई थी तो हमारी छुट्टियाँ थीं और जब वापस आये तब तक हट चुकी थी, पर डिमांड इतनी कि दुबारा लगाना पड़ा. हमारी तो मुराद पूरी हो गयी मानों. लगभग सबने देख रखी थी, सो हम दो ही गए. आज तक इस एडवेंचर का अहसास बहुत मजेदार है कि बस दो लड़कियों ने जाकर फिल्म देख ली. इससे बड़ा फिल्म संबन्धी एडवेंचर मेरे पास यही है कि दिल्ली के पी.वी.आर.प्रिया हॉल में नाइट शो में बस एक लड़की के साथ कारपोरेट फिल्म देखी. पर तब तक मैं J.N.U. में शोध छात्रा थी और प्रिया कुछ ख़ास दूर भी नहीं है.बस १.४५में जब हॉल से बाहर सड़क पर थे, तो जल्दी से ऑटो मिल जाए- इसी की कोशिश में लगे थे. खैर,अभी रीजेंटकी बात. हम लोग अक्सर सेकेंड डे पहला शो देखा करते थे, क्योंकि G.S. की क्लास शनिवार को होती थी और उसमें अटेंडेंस नहीं होता. फिल्में शुक्रवार को रिलीज होतीं और हम शनिवार बिना नागा पहुँच जाते. एक ही शुक्रवार को रिलीज हुई फिर भी दिल है हिदुस्तानी और कहो ना प्यार है. दोस्तों ने हम........का मन बनाया,लेकिन मुझे तो शाहरुख पसंद नहीं. पहले उसे बन्दर कहती थी बाद में पता चला कि बन्दर कहना रेसिस्ट होना है,तब से छोड़ दिया. अब मैं अपनी पसंद के कारण नहीं जाने का तर्क नहीं दे सकती थी. क्यों??? दोस्त बड़े कमीनें थे,याद दिला देते कि कौन-कौन सी फिल्में उन्होंने सिर्फ मेरी पसंद से देखी थी,सो मैंने तर्क दिया- शाहरुख की फिल्म है तो पहले हफ्ते भीड़ होगी तो क्यों ना दूसरी वाली देख ली जाये? बात में दम था और हम रिक्शे पे सवार हो पहुँच गए रीजेंट. भीड़ थी, पर उतनी नहीं. लड़कियों की लाइन में हम ५वे नंबर पे थे. टिकट मिल गयी. बीच का टाइम बिताने के लिए हम पटना मार्केट गए. रीजेंट गांधी मैदान के पास है वहां से हम पटना मार्केट या रेस्टोरेंट ही जाते थे. जब हॉल में घुसे तो हमें फिल्म के बारे में कुछ पता नहीं था और ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी,पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ रही थी मज़ा आ रहा था.एक लड़का तो पागलों जैसा चिल्ला रहा था,"साला शहरुखवा अब गया". इंटरवल तक तो हम रोमांचित हो उठे कि वाह क्या फिल्म है! इंटरवल के बाद और मज़ा आया, यह देख कि अब क्यूट हृतिक की जगह हैण्डसम हृतिक है. और ढर्रे पर चली आती डबल रोल वाली बात भी नहीं है.ये फिल्म हमने दुबारा देखी थी,ठीक एक महीने बाद.रूपक पता नहीं, है कि बंद हो गया. इसका रास्ता किसी गली से होकर जाता था.यह रीजेंट से काफी अन्दर था. हॉल की अच्छाई और सुविधाओं को देखते हुए तो यह एकदम बेकार था.इतना बेकार कि हम कभी यहाँ १० बजे तक जाने का नहीं सोचते थे.ज्यादा जल्दी जाते तो ११.१५ तक और हमेशा ब्लैक में ही फिल्में देखी यहाँ. अंदर जाने पर पता चलता था कि हॉल तो बहुत खाली है, पर टिकट कभी खिड़की पर नहीं मिली. हम कभी समय से गए भी नहीं, क्योंकि वहां से लौट कर कहीं जाना और दुबारा टिकट लेने जाना बहुत महंगा पड़ता. तो हम पिक्चर के टाइम से जाते और २०/३०या ४० में टिकट खरीद लेते. वहां मोल-तोल भी खूब होता था. अब सवाल तो यह है कि हम वहां जाते ही क्यों थे? दरअसल उस समय की लगभग सारी क्रिटिकली एक्लेम्ड फिल्में वही लगती थी.
रूपक में देखी यादगार फिल्में हैं अर्थ-1947, हु-तु-तू ,संघर्ष आदि। अर्थ-1947 से जुडी मजेदार घटना है.हम देर से पहुचे और ब्लैकेटिएर से रिक्वेस्ट करने लगे कि भैया हमें अच्छी जगह पर सीट देना (पता था कि फिल्म में 'सीन' है). उसने मुस्कुराते हुए जिस तरह से 'हाँ' कहा, हमें थोड़ा शक हुआ, पर उस दिन हम छः थे. सोचा, कोई नहीं, देखा जायेगा. हमें सीट तो साइड से ही मिली. छः के बाद एक् कपल था. लड़की हमारी तरफ बैठ गयी...और भी अच्छा...लेकिन ये क्या? फिल्म शुरू होने के दो मिनट पहले हमारे आगे हमारी ही उम्र के ५-६ लड़के आ कर बैठ गए. अब तो जो टेंशन शुरू हुई....उन लड़कों की आँखों में भी हमें देख एक मुस्कराहट आ गयी. खैर इतना डरते हमलोग तो हॉल हमारा दूसरा कालेज क्यों होता? अर्थ-१९४७ में राहुल खन्ना की एक साईकिल है. जैसे ही उस पर नंदिता को आगे बिठा वो ले जाता है, वैसे ही सामने वालो में किसी ने कहा,"अरे यार!मेरे मामा जी के पास भी ऐसी साईकिल है.आज समझ में आया, क्यों वे उसे छूने भी नहीं देते." ना चाहते हुए भी हमारी हंसी फूट पड़ी. हम जानते थे कि हँसना इनको बढावा देना है, पर रोक नहीं सके.अब तो उन लड़कों ने पूरी फिल्म के दौरान इतने मजेदार कमेन्ट किये कि फिल्म का मज़ा दोगुना हो गया. एक बानगी- नंदिता और राहुल के बीच एक रोमांटिक सीन है, कुछ physical closeness लिए हुए. उस सीन के पहले नंदिता रो रही थी और उसके बाद मुस्कुराती है. हमारी धड़कने भी खामोश थीं.हम मानो उस सीन के बीच से गायब हो जाना चाहते थे. तभी एक लड़के ने बहुत innocently दूसरे से पूछा," इसीलिए रो रही थी क्या?" उस टोन में कोई कमेन्ट नहीं था. हमारी हंसी दबी-दबी सी ही सही,पर निकल ही गयी.
मोना में भी खूब फिल्में देखी।हॉल ठीक ठाक था,पर रीजेंट के पास होने के कारण उसकी तुलना में थोड़ा बुरा लगता था. रीजेंट, मोना, एलिफिस्टन- तीनों आस-पास थे. किसी-ना-किसी में टिकट तो मिल ही जाता था.हमारा उस एरिया में जाना कभी बेकार नहीं हुआ.किसी- किसी बार तो हम सोचते कि तीनों लोग तीनों हॉल के पास जाएँ,चाहे जिसे टिकट मिल जाये;पर तब मोबाईल का जमाना नहीं था. हम एक-दूसरे को बताते कैसे, सो यह प्लान कभी हकीकत में नहीं बदला.मोना में हमने ऐश्वर्या की एक तरह से पहली फिल्म आ अब लौट चले देखी और पाया कि सुमन रंगनाथन उससे हॉट है.वो मेरी रिंकी का बर्थडे था,जब यह फिल्म हमने देखी. 9th फरवरी- आज तक याद है. मोना में ही हमने लगातार दो शो देखने का रिकार्ड बनाया- सत्या मोर्निंग शो में और नून शो में दिल से. परदे पर पानी पीती हुई मनीषा के गले के भीतर से पानी उतरता दिखाई दे रहा था और हमने मान लिया कि मनीषा ही हमारे समय की सबसे सुन्दर और versatile ऐक्ट्रेस है.वीणा वो आखिरी हॉल था,जहाँ हम फिल्म देखने जाते थे; बहुत मजबूरी में,जब किसी और हॉल में कोई चांस न हो.एक तो ये हॉल गन्दा था,दूसरे क्राउड वाहियात होता था.एकदम स्टेशन के पास था और रुकने की कोई जगह नहीं थी. जहाँ वेट करते थे,वो जगह एकदम सड़क पर लगती थी.देखी तो कई फिल्में यहाँ, पर याद नहीं रखीं.इसकी वजह वहां से निकलने के बाद का आफ्टर इफेक्ट था. एक-दो मज़ेदार वाकये वहाँ जरुर हुए. तब की बात है जब मन फिल्म रिलीज हुई थी. एक दिन RJD का बिहार बंद था.कॉलेज भी बंद था, क्योंकि रूलिंग पार्टी के बंद में कुछ खोलने की हिम्मत तो होती नहीं. लाइब्रेरी खुली थी.सिस्टर को बाहर से आना तो था नहीं कि वो बंद रहे?हमने तय किया कि कोई एक जाकर टिकट लेगा और हॉस्टल फ़ोन कर देगा कि क्लास चल रही है.अब मुझ-सा वीर बहादुर कौन जो जाकर टिकट ले और बाहर का माहौल देखे. मैं ८.३० बजे ही निकली, पर आंटी ने देख लिया और पूछा, "आज तो बंद है,कहाँ जा रही हो?" मैंने कहा, "लाइब्रेरी जा रही हूँ, वो बंद नहीं होगा और जल्दी जा रही हूँ कि कोई दिक्कत न हो." आंटी ने कहा, "ठीक है पर ध्यान रखना. मत ही जाओ तो अच्छा." मैंने कहा, "नहीं आंटी!जरुरी नोट्स बनाना है."इस तरह से मैं निकल गयी. सड़क से रिक्शा ले सीधे वीणा पहुंची. मुश्किल से ९ ही बजे होंगे.मैंने देखा कि लड़कियों की कोई लाइन नहीं लगी थी. मैं गयी और तीन टिकट मांगे. टिकट खिड़की पर बैठे आदमी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और दूसरों को टिकट देता रहा. मैंने थोड़ी देर में गुस्से से कहा कि "मुझे तीन टिकट दे दीजिये पहले." उस आदमी ने और अधिक गुस्से से कहा, "मोर्निंग शो का टिकट मिल रहा है यहाँ." मैं इतना अधिक सकपका गयी कि आगे कुछ पूछ भी नहीं पाई; क्योंकि सामने ही मोर्निग की फिल्म का पोस्टर लगा था- प्यासी जवानी. उस दिन तो लौट के बुद्धू घर को आये की तर्ज पर हम हॉस्टल लौट आये.अगली बार जब मन देखने गए तो और मजेदार घटना हुई.हम सुबह जल्दी ही गए और.टिकट लेने के लिए खिड़की खुलने का इंतजार कर रहे थे. सामने में एक दक्षिण भारतीय युवक था.हमने सोचा कि वो क्या समझेगा और कारू-कारू कह मजाक बनाने लगे.हमारा मकसद उसका अपमान करना नहीं था, बल्कि अपना मनोरंजन करना था. हम लोग कोई गोरे नहीं थे, पर हमारी बनिस्पत वो काला था और हमेशा हमारा मन ऐसे ही तो लगता था- अपरिचितों का आपस में मजाक बना. लेकिन वो 'कारू' शब्द समझ गया. जरुर उसकी भाषा में कारू से मिलता-जुलता काले का कोई पर्याय होगा.उसने आगे बढ़ हमसे कहा, "this is very bad.this is really bad to comment on color." आज भी मैं उसकी हिम्मत कि दाद देती हूँ कि किसी और प्रदेश में तीन लड़कियों को उसने टोका. पर हमें तो काटो तो खून नहीं. हम सभी का चेहरा लाल! हिम्मत बटोर कर रश्मि ने ही पहले कहा,"we did not mean that.we are just talking." तब तक मैं थोडी संभल गयी थी और उसे समझाना चाहा , "no, in our language karu means something else." उसने कहा, "no, i can understand little Hindi and I can sense things." वो दिल्ली में software engineer था और पटना किसी काम के सिलसिले में आया था.काम पूरा हो गया और रात की ट्रेन से उसे जाना था सो फिल्म के लिए आ गया था. मिडिल क्लास गिल्टी महसूस करते हुए हमने उसका टिकट लिया.१०.३५ से १२ बजे का समय बिताने और उसे पटना घुमाने के लिए म्युजिअम ले गए. एक रिक्शे पर हम तीनों और एक पर वो गया और दोनों का पैसा हमने दिया. म्युजिअम में रश्मि ही उसे घुमाती रही और मैं-रिंकी आपस में बुदबुदाते रहे कि अगर किसी ने इसके साथ देख लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे. अकेले फिल्म देखना तो समझ में आता है, पर इसको लेकर घुमाना? जैसे-तैसे फिल्म देखकर ख़त्म किया और इंटरवल में हमने कोल्ड ड्रिंक भी ख़रीदा,ताकि वो नहीं खरीद सके और हमें किसी और के पैसे का कुछ न लेना पड़े. फिल्म के अंत में उसने पूछा कि पूरे समय तो तुम्हीं लोगों ने खर्च किया, तो मेरे साथ लंच कर लो. हमने उसे बताया कि हमें ३.३० में हॉस्टल पहुँच जाना होता है. उसे लगा कि हम बहाना कर रहे हैं तो वो अपना शेयर देने लगा. मैं तो लेने ही वाली थी कि रश्मि की बच्ची ने मुस्कुरा कर मना कर दिया. पूरे टाइम मैं लड़ते आई कि हम उस कारू के ऊपर क्यों खर्च करें.हमारा बजट गड़बड़ा गया और उस महीने हमने एक फिल्म कम देखी.
इससे भी दिलचस्प बात हॉस्टल आकर पता चली कि उसने हमारा पता माँगा तो रश्मि ने दे दिया था।हमने उसे खूब डांटा...इतना कि वो डर गयी और कहने लगी,"मुझे लगा कि वो क्या लिखेगा? लेकिन अगर वो लिखता है तो मेरे नाम से ही लिखेगा. मुझसे ही तो बात हो रही थी सबसे ज्यादा". हमने चिढाया भी कि उस समय तो चिपक रही थी, अब क्या हुआ? जुलाई,१९९९ में ये घटना हुई थी.अगस्त तक हम डरे रहे, पर सितम्बर आते-आते भूल गए. अक्टूबर में पूजा की छुट्टियों में घर चले गए. एक दिन सुबह-सुबह जब मैं सो ही रही थी तो माँ ने पुकारा- "रूम में आओ".मैं अपनी कजिन के रूम में सोती थी. आते ही उसने उस लड़के/आदमी का नाम लेकर पूछा कि ये कौन? मुझे याद ही नहीं था.मैंने कहा- पता नहीं. माँ ने कहा तो तुम्हे चिट्ठी कैसे लिख दिया है? मैंने कहा- चिट्ठी?? माँ ने लिफाफा सामने कर दिया.ऊपर लिखा था- तो, Miss Rashmi,Rinki & Sudipti. अब तक मैंने हॉस्टल के अंकल को दसियों गालियाँ दी कि सबसे पहला नाम रश्मि का था,तो लेटर मुझे क्यों फारवर्ड किया? बाद में पता चला कि पोस्टल एड्रेस सिर्फ मेरा ही था उनके पास और रश्मि ने तो लाख-लाख शुकर मनाया; क्योंकि अगर उसके घर जाता तो उसके भैया उसे हॉस्टल से हटा ही लेते. लेकिन उस दिन मुझे अपनी माँ के सामने क्या-क्या झूठ नहीं बोलना पड़ा? कैसे मैं बची, मैं ही जानती हूँ. मेरे भोले पापा ही वो लेटर लाये थे, पर उन्होंने पढ़ा नहीं था.पढ़ा माँ ने था और फिल्म देखने की बात तो वो समझ ही गयी थी. मैंने कॉलेज फंक्शन में उसके गेस्ट होने की बात समझाई,जिसे पता नहीं माँ ने कितना सच माना, पर उसने देखा कि पत्र ज्यादातर रश्मि को ही संबोधित है.मेरा नाम बस संबोधन में ही है,तो वह थोडी निश्चिंत दिखी. लौट कर मैंने रश्मि को खूब हड़काया.दूसरी घटना: जब दिल क्या करे फिल्म रिलीज हुई,हम यह फिल्म अजय- काजोल की वजह से देखना चाह रहे थे. वीणा को नकारने के लिए हम अप्सरा में चले गए.अप्सरा गाँधी मैदान के दाहिनी तरफ है.कौटिल्य होटल के पीछे की एक गली से रास्ता जाता है.हम वहाँ पहली बार गए और पता चला कि शो आल रेडी हाउस फुल हो चुका था. जो शुद्ध झूठ था.खैर,मैंने कहा- चलो, वीणा चलते है.इससे तो बेहतर ही है.सबों ने कहा- छोड़ देते हैं आज, जब यहाँ नहीं मिल रहा तो अब वीणा पहुँच कर मिलेगा? मैंने कहा- चलो, देखते है.हम सब देर से गए और मैनेजेर से लड़ कर टिकट लिया.
पटना शहर के पटना विमेन'स कॉलेज में पढ़ते और पीटर विला में रहते हुए कमोबेश यही मेरी सिनेमाई दास्ताँ रही।आज भी संतोष इसी बात का है कि हमने कभी किसी लड़के या किसी सहेली के बॉयफ्रेंड से मदद नहीं ली, बल्कि अपने उद्यम से हर फिल्म देखी और किसी का पैसा भी अपने ऊपर नहीं खर्च करवाया, जिसके लिए लड़किया बदनाम रहती है :) !!!
आज भी इन यादों के साथ होठों पे मुस्कराहट इसलिए भी आ जाती है कि हम कभी बदनाम पटना शहर में भी छेड़खानी जैसी चीजों के शिकार नहीं हुए.उस दौर(१९९६-२०००) के पटना में कई दहशतनाक घटनाएं हुई थीं, जिससे हमारे माता-पिता डरे रहते थे,पर हम फिल्में देखने से कब बाज आने वालों में थे!!! और ऐसी कोई बुरी घटना भी नहीं घटी,जिससे आज भी हमारे मुंह का जायका बिगड़ जाये.... मुझे तो लगता है कि उन सिनेमाघरों की व्यवस्था ऐसी थी कि हम "लड़की होकर भी" वैसी-वैसी फिल्में और इतनी ढेर सारी (!) सम्मानजनक तरीके से देख सके.
पसंद की १० फिल्में-
१.कागज़ के फूल
२.सूरज का सातवां घोड़ा
३.मुगलेआज़म
४.खामोशी
खामोशी दी म्यूजिकल
६.अंगूर
७। सदमा
८.हम आपके हैं कौन
९.जब वी मेट
१०.अमिताभ बच्चन की लगभग हर फ़िल्म

Monday, July 20, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा से पहली मुलाकात-मंजीत ठाकुर

हिन्दी टाकीज-४४
मंजीत ठाकुर उत्साही व्यक्ति हैं.लेखक और पत्रकार होने के इस विशेष गुण के धनी मंजीत इन दिनों पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं.अच्छा ही है,दिल्ली की प्रदूषित हवा से जितना दूर रहें.अपने बारे में वे लिखते हैं...
मैं मजीत टाकुर.. वक्त ने बहुत कुछ सिखाया है। पढाई के चक्कर में पटना से रांची और दिल्ली तक घूमा.. बीएससी खेती-बाड़ी में किया। फिर आईआईएमसी में रेडियो-टीली पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा.. सिनेमा की सनक ने एफटीआईआई के चक्कर भी लगवा दिए। नवभारत टाइम्स में सात महीने की संक्षिप्त नौकरी के बाद से डीडी न्यूज़ का नमक खा रहा हूं। फिलवक्त सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट हूं। सिनेमा के साथ-साथ सोशल और पॉलिटिकल खबरें कवर करने का चस्का है। सिनेमा को साहित्य भी मानता हूं, बस माध्यम का फर्क है..एक जगह शब्द है तो दूसरी जगह पर चलती-फिरती तस्वीरें..। सिनेमा में गोविंदा से लेकर फैलिनी तक का फैन हूं..। दिलचस्पी पेंटिंग करने, कविताएं और नॉन-फिक्शन गद्य लिखने और कार्टून बनाने में है। निजी जिंदगी में हंसोड़ हूं, दूसरों का मज़ाक बनाने और खुद मज़ाक बनने में कोई गुरेज़ नहीं। अपने ब्लॉग गुस्ताख पर गैर-जरुरी बातें लिखता हूं.. हल्की-फुल्की तरल बातें..पिछले कुछ महीनों से भारत दर्शन पर हूं, लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल और फिर बजट के दौरान पूरे पूर्वी भारत की सड़क यात्रा ने बेहतरीन तजरबे दिए... फिल हाल गुजरात में हूं...इस उम्मीद में हूं कि सूरज की कोई खास किरण एक दिन मेरे सिर पर पड़ेगी। मानता हूं कि मैं दुनिया का सबसे ज़रुरी पत्रकार बस बनने ही वाला हूं, डीडी के लिए कई डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई हैं। लेकिन मेरा सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। आप उनसे sampark करना चाहते हैं to यहाँ likhen...manjit2007@gmail.com

या फ़ोन करें...09871700240


अपने स्कूली दिनों में कायदे से बेवकूफ़ ही था। पढ़ने-लिखने से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक में पिछली पांत का खिलाड़ी। क्रिकेट को छोड़ दें, तो बाकी किसी चीज़ में मेरी दिलचस्पी थी ही नहीं। बात तब की है जब मैं महज सात-आठ साल का रहा होऊंगा।॥ मेरे छोटे-से शहर मधुपुर में तब, दो ही सिनेमा हॉल थे, वैसे आज भी वही दो हैं।





लेकिन सिनेमा से पहली मुलाकात, याद नहीं कि कौन सी फिल्म थी वह- मम्मी के साथ हुई थी। मम्मी और कई पड़ोसिनें, मैटिनी शो में फिल्में देखने जाया करतीं। हम इतने छोटे रहे होंगे कि घर पर छोड़ा नहीं जा सकता होगा। तभी हमें मम्मी के साथ लगा दिया जाता होगा। बहनें भी साथ होतीं॥ तो सिनेमा के बारे में जो पहली कच्ची याद है वह है हमारे शहर का मधुमिता सिनेमा..।





इस सिनेमाहॉल की इमारत पहले रेलवे का गोदाम थी। थोड़ा बहुत नक्शा बदल कर इसे सिनेमा हॉल में तब्दील कर दिया था। अब इस हॉल को पुरनका हॉल कहा जाता है। महिलाओं के लिए बैठने का अलग बंदोबस्त था। आगे से काला पर्दा लटका रहता॥ जो सिनेमा शुरु होने पर ही हटाया जाता। तो सिनेमा शुरु होने से पहले जो एँबियांस होता वह था औरतों के आपस में लड़ने, कचर-पचर करने, और बच्चों के रोने का समवेत स्वर।





लेडिज़ क्लास की गेटकीपर भी एक औरत ही थीं, मुझे याद है कुछ ललिता पवारनुमा थी। झगड़ालू॥किसी से भी ना दबने वाली..उसकी पटरी किसी से नहीं खाती। चूंकि हमारे मुह्ल्ले की औरतें प्रायः फिल्में देखनो को जाती तो उस ललिता पवार से उनकी गाढ़ी छनती थी और सीट ठीक-ठाक मिल जाती। शोहदे भी उस वक्त कम ही हुआ करते होंगे, ( अरे जनाब आखिरकार हम तब तक जवान जो नहीं हुए थे) तभी औरतों की भीड़ अच्छी हुआ करती थी।





बहरहाल, फिल्म के दौरान बच्चों की चिल्ल-पों, दूध की मांग, उल्टी और पैखाने के वातावरण में हमारे अंदर सिनेमा के वायरस घर करते गए। हमने मम्मी के साथ जय बाबा अमरनाथ, धर्मकांटा, संपूर्ण रामायण, जय बजरंगबली, मदर इंडिया जैसी फिल्में देखी। रामायण की एक फिल्म में रावण के गरज कर - मैं लंकेश हूं- कहने का अंदाज़ मुझे भा गया। और घर में अपने भाईयों और दोस्तों के बीच मैं खुद को लंकेश कहता था।





मेरे पुराने दोस्त और रिश्तेदार अब भी लंकेश कहते हैं। वैसे लंकेश का चरित्र अब भी मुझे मोहित करता है, और इसी चरित्र की तरह का दूसरा प्रभावी चरित्र मुझे गब्बर और फिर मोगंबो का लगा। लेकिन तब तक मैं थोड़ा बड़ा हो गया था। और मानने लगा था कि अच्छी नायिकाओं का साथ पाने के लिए या तो आपको अच्छा और मासूम दिखने वाला अनिल कपूर होना चाहिए या फिर गुस्सैल अमित।





जब हम थोड़े और बड़े हुए तो उस काले परदे के आगे की दुनिया की खबर लेने की इच्छा बलवती होती गई। तब कर एक और सिनेमाघर शहर में बन गया। सिनेमाघर की पहली फिल्म थी- याराना। सन बयासी का साल था शायद। हम छोटे ही थे, लेकिन भाई के साथ फिल्म देखने के साथ गया। अमिताभ से पहला परिचय याराना के जरिए हुआ।





उस समय तक हमारे क़स्बे में वीडियों का आगाज़ नहीं हुआ था। बड़े भाई आसनसोल से आते तो बताते टीवी और वीडियो के बारे में। हॉल जैसा दिखता है या नहीं?? पता चला बित्ते भर के आदमी दिखते हैं, छोटा सा परदा होता है। निराश हो गया मैं । लेकिन घर पर भी लगा सकते हैं यह अहसास खुश कर गया।





बहरहाल, हमारे शहर में एक राजबाड़ी नाम की जगह है, जहां लड़कों ने आसनसोल से वीडियो लाकर फिल्में दिखाने का फैसला किया था। टिकट था - एक रुपया। औरतो के लिए फिल्म दिखाई जा रही थी-मासूम और एक और फिल्म थी दीवार। मम्मी और उनकी सहेलियां मासूम देखने गईँ। शाम में दीवार दिखाई जानी थी, बाद में जब हम और रतन भैया फिल्म देखकर लौट रहे थे। हम दोनों में विजय बनने के लिए झगड़ा हो गया। वह कहते रहे कि तुम छोटे हो कायदे से रवि तुम बनोगे, लेकिन रवि जैसा ईमानदार बनना मुझे सुहा नहीं रहा था। विजय की आँखों की आग अच्छी लगी और उस दिन के बाद से लगती ही रही। खासकर, विजय के बचपन के किरदारने जूते साफ करते हुए जब डाबर के साथी से कहा- साहब पैसे हाथ में उठाकर दो॥ मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। सच कहूं तो उस वक्त मेरा गला रुंध गया था, वीडियो देखते हुए। आज लगता है कि सलीम-जावेद ने कितनी कुशलता से सामूहिक चेतना में आत्मसम्मान की बात पैबस्त कर दी थी।





उस दिन के बाद से फिल्मों का चस्का लग गया। लेकिन घर में एक बदलाव आ गया। आर्थिक कारणों से अब मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया गया। वजह-पिताजी का देहांत हो गया था। घर में एक किस्म की संजीदगी आ गई थी। मम्मी, मां में बदल गई। उनके सरला, रानू और बाकी के उपन्यास पढ़ना छूट गया। अचानक मेरी मां मनोरमा और कांदबिनी, सरिता छोड़कर रामचरितमानस का पाठ करने लगा। एक बेहद संजीदा माहौल॥ भारी-भारी-सा। मुझे पिता के देहांत के साथ इस माहौल का भारीपन खलने लगा। बड़े भैया कमाने पर उतरे, मंझले भाई में पढाई का चस्का लगा। मुझे बेवजह ज्यादा प्यार मिलने लगा। घर के लोग सिनेमा से दूर होते गए। सबका बकाया मैं और बड़े भैया पूरा करने लगे। घर के भारीपन से दूर मैं सिनेमाहॉल में जगह तलाश करने लगा।





सरकारी स्कूल से बंक करना कोई मुस्कल काम नहीं था। मैं क्लास से भाग कर सिनेमा देखने जाने लगा। लेकिन तीन घंटे तक स्कूल और घर से दूर रहने की हिम्मत नहीं थी। उन दिनों -८६ का साल था- मधुपुर के सिनेमाघरों में जबरदस्ती इंटरवल के बाद घुस आने वालों को रोकने के लिए एक नई तरकीब अपनाई गई थी। इंटरवल में बाहर निकलते वक्त गेटकीपर एक ताश के पत्ते का टुकडा़ देता था। अब हमने एक और दोस्त के साथ इस तरकीब का फायदा उठाया। इस तरीके में हम इंटरवल के पहले की फिल्म एक दिन और बाद का हिस्सा दूसरे दिन देख लेते थे।





गिरिडीह में सवेरा सिनेमा हो, या देवघर में भगवान टॉकीज, मधुपुर में मधुमिता और सुमेर, आसनसोल में मनोज टॉकीज, हर सिनेमाहॉल का पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हमें पहचानने लगा। गेटकीपरों के साथ दोस्ती हो गई। फिल्म देखना एक जुनून बन गया। कई बार हमारे बड़े भाई ने सिनेमाहॉल में ही पकड़ कर दचककर कूटा। लेकिन हम पर असर पड़ा नहीं।





बाद में अपने अग्रीकल्चर कॉलेज के दिनों में या बाद में फिल्में पढाई के तनाव को दूर करने का साधन बन गईं। अमिताभ के तो हम दीवाने थे। शुरु में कोशिश भी की अंग्रेजी के उल्टे सात की तरह पट्टी बढा़ने की , लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। बाद में शाहरुख ने अमिताभ को रिप्लेस करने की तरकीबें लगाईं, तो डीडीएलजे ने बहुत असर छोड़ा था हम पर। नकारात्मक भूमिकाओं को लेकर मै हमेशा से सकारात्मक रहा हूं। ऐसे में बाजीगर और डर वाले शाहरुख को हमने बहुत पसंद किया था। उसके हकलाने की कला, साजन में संजय के बैसाखी लेकर लंगड़ाने की अदा, अजय देवगन की तरह फूल और कांटे वाला सोशल एलियनेशन, ॥ सब पर हाथ आजमाया। वैसे, बाज़ीगर में शाहरुख जब शिल्पा की हत्या कर देते हैं, तो हमें बड़ा अफ़सोस हुआ था। यार, ऐसे नहीं मारना चाहिए था लड़की को..सुंदर थी।





लेकिन दूरदर्शन की मेहरबानी से फिल्मों से हमारा रिश्ता और मजबूत ही हुआ। दूरदर्शन पर मेरी पहली फिल्म याद नहीं आ रहा कि साल कौन-सा था, लेकिन फिल्म थी समझौता। गाना अब भी याद है समझौता गमो से कर लो॥। फिर अमृत मंथन, अवतार, मिर्च-मसाला, पेस्टेंजी, आसमान से गिरा, बेनेगल निहलाणी की फिल्में देखने का शौक चर्राया।





लगा कि लुटेरे, मरते दम तक, लोहा, एलान-ए-जंग, हिम्मतवाला और तोहफा ॥से इतर भी फिल्में हो सकती हैँ। तो हर तरह की फिल्में देखना शुरु से शौक में शामिल रहा। और दूरदर्शन की इसमें महती भूमिका रही। जिसने कला फिल्में देखने की आदत डाल दी। तो हर स्तर की हिंदी अंग्रेजी फिल्में देखते रहे। हां, डीडी की कृपा से ही ऋत्विक घटक और सत्यजित् रे की फिल्मों से परिचय हुआ। तो सिनेमा एक शगल न रह कर ज़रुरत में बदल गया।





बहुत बाद में २००७ में एफटीआईआई में फिल्म अप्रीशिएशन के लिए पहुंचा तो पता चला कि एक पढाई ऐसी भी होती है जिसमे पढाई के दौरान फिल्मे दिखाई जाती हैं। तो पूरे कोर्स को एंजाय किया। फिल्में देखने और फिल्मे पढ़ने की तमीज आई। विश्व सिनेमा से परिचय गाढा हुआ।





गोवा और ओसियान जैसे फिल्मोत्सवों में ईरानी, फ्रेंच और इस्रायली सिनेमा से दोस्ती हुई और सिनेमा का वायरस मुझे नई जिंदगी दे रहा हैं... मैं हर स्तर के फिल्मे जी रहा हूं, और गौरव है मुझे इस बात का कि दुनिया में सिनेमा एक कला और कारोबार के रुप में जिंदा है तो मेरे जैसे दर्शक की वजह से, जो एक ही साथ रेनुवां-फेलेनी और राय-घटक का मज़ा बी ले सकता है साथ ही गोविंदा के सुख, और रनबीर के सांवरिया भी झेल सकता है।





मेरी पसंद की फिल्में



१. शोले,


२. प्यासा,


३.स्वदेश,


४.काग़ज़ के फूल


५. दीवार


६.जाने भी दो यारों


७. दस्विदानिया ७. अंगूर


८. मौसम


९ गरम हवा


१०. जागते रहो

Monday, July 13, 2009

हिन्दी टाकीज:जाने कहां गये वो सिनेमा के दिन ...-पूनम चौबे


हिन्दी टाकीज-४३

पूनम चौबे नयी पीढ़ी की पत्रकार हैं। अंग्रेजी की छात्रा हैं मगर लिखना-पढ़ना हिंदी में करती हैं। कुछ नया करने का जज्‍बा इन्‍हें पत्रकारिता में घसीट लाया है। कुछ कहानियां भी लिख चुकी हैं। मगर किसी एक विधा पर टिके रहना अपनी तौहीन समझती हैं। सो फिलहाल पहचान कहां और कैसे बनेगी, इसी में सर खपा रही हैं।

बचपन की यादों में शुमार मूवी देखने का खुमार। बरबस यह जुमला इसलिए याद आ रहा है क्‍योंकि आज भी पिक्‍चर हॉल में जाकर फिल्‍में देखने में वही मजा आता है, जो दस-बारह साल पहले था। आज भी वो यादें धुंधली नहीं पड़ीं जब मेरी जिद पर डैडी हम चारों भाई-बहनों को फिल्‍म दिखाने ले गये थे। 1996 की वह सुहानी शाम, शुक्रवार का दिन, फिल्‍म थी 'हम आपके हैं कौन' पिक्‍चर हॉल जाने के लिए डैडी से ढेरों मिन्‍नतें करनी पड़ती थीं। कारण था उनकी ऑफिस से छुट्टी न मिलना। फिर भी उस शुक्रवार की शाम को तो मैं अपनी जिद पर अड़ी रही। आखिरकार हम पिक्‍चर हॉल पहुंचे। टिकट लेने के बाद जैसे ही उस बड़े हॉल के कमरे में पहुंचे, लगा मानो, भूतों के महल में आ गये हों। ऐसा धुप अंधेरा। क्‍या ऐसा ही होता है सिनेमाघर? मुझे लगा यहां बिजली की कोई समस्‍या होगी। खैर, टिकट चेक करने वाले की टॉर्च की रोशनी ने मुझे और मेरे परिवार को हमारी सटी से मुखातिब कराया। फिल्‍म शुरू हुई पर ये क्‍या? आवाजें इतनी तेज कि कान मनो अभी फट पड़ेंगे। हर रोमांटिक सीन पर कुछ लड़कों की सीटी सुनायी देती। वैसे में भी इस कला में निपुण थी। मुझे लगा ये कोई परंपरा है। बस मैंने भी अपनी कला का एक नजारा दिखा ही दिया। लेकिन फिर पिताजी की डांट के बाद मैं दोबारा अपनी इस कला का प्रदर्शन नहीं कर पायी। मुझे दूसरी बार हैरत उस समय हुई जब इंटरवल होने के साथ ही रोशनी से पूरा सिनेमाहाल नहा गया। डैडी ने हम चारों भाई-बहनों को हॉल की कैंटीन में चलने को कहा ताकि हम कुछ खा-पी सकें। पर मुझे डर था कि कहीं कोई मेरी सीट पर बैठ गया तो क्‍या होगा। यह डर और ऊपर से सिनेमा का रोमांच, दोनों मेरे ऊपर इस तरह से हावी थे कि मैंने कैंटीन जाने का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया और अपने भाई-बहनों को वहीं, मेरी सीट पर कुछ लाने के लिए कह दिया।

आखिरकार मैंने अपने इस डर को छुपाकर बाकी लोगों को ही मेरे लिए कुछ लाने को कह दिया। तीन घंटे के बाद जब हॉल से बाहर निकली तो पूरे रास्‍ते बस फिल्‍म की ही चर्चा चलती रही। चाहे जो कुछ हो, पर मजा तो बहुत आया इस फिल्‍म में। इसके बाद दूसरी फिल्‍म 'साजन चले ससुराल' देखा। पिक्‍चर हॉल में अंधेरा होने की वजह से गलती से मम्‍मी की जगह किसी और आंटी को न जाने कितनी बार हर सीन पर कमेंट करने के नये-नये नुस्‍खे बताती रही। इंटरवल में पता चला कि मम्‍मी मेरे बाएं नहीं बल्कि दाएं साइड में बैठी थी। इसके बाद एक-दो मौके और भी आएं, जब फैमिली के साथ फिल्‍में देखने का मौका मिला। एक बार तो मेरी छोटी बहन ने हॉल में कॉकरोच को देख कर ऐसा तहलका मचाया कि उफ्फ, पूरी फिल्‍म मानों कॉकरोच बेस्‍ड फिल्‍म हो गयी थी। हर पांच मिनट पर कॉकरोच को देखने का आतंक पूरी फिल्‍म का मजा ही किरकिरा कर दिया। हां 'कुछ कुछ होता है' देखने के बाद कुछ दिनों तक काजोज जैसे बाल रखने का जो खुमार चढ़ा, वह ग्रेजुएशन तक उतरा ही नहीं। फिल्‍म भी काफी रोमांचक लगी और इसे देखने का नतीजा यह निकला कि इसे पूरे 25 बार देखने के बाद आज भी किसी फिल्‍म को देखते वक्‍त मेरे जेहन में आ जाती है। करीब चार साल पहले फिल्‍म 'बागवान' देखने का मौका मिला। चूंकि इस बार यह फिल्‍म देखना किसी करीबी दोस्‍त की तरफ से एक निमंत्रण था। हमलोग कुछ चार दोस्‍त इस आमंत्रण का हिस्‍सा बने थे। पूरी प्‍लानिंग के अनुसार यह तय हुआ कि सभी लोग ठीक पौने 12 बजे तक पिक्‍चर हॉल के बाहर मिलेंगे। मुझे थोड़ी देर हो गई। करीब बारह बज कर दस मिनट पर मैं जब हॉल पहुंची, तो मेरे बाकी दोस्‍त फिल्‍म के लुत्‍फ उठाने में मशगुल हो चुके थे। उन्‍हें यह ध्‍यान नहीं आया कि मैं उस पिक्‍चर हॉल के लिए नहीं नहीं, बल्कि उस शहर के लिए भी नयी थी। अब हॉल पहुंचने के बाद मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अब क्‍या करूं। किसी तरह हॉल के अंदर जाने का रास्‍त खोजा और अंदर पहुंच गई। मगर टिकट तो मेरे पास था ही नहीं। तब मेरे पास मोबाइल जैसी संचार सुविधा का भी अभाव था। इतनी भीड़ में दोस्‍तों को कैसे खोजूं। और जब तक टिकट पास नहीं होगा सीट मिलने का तो सवाल ही नहीं था। जब टिकट चेकर ने मेरे पास आकर मुझसे टिकट मांगा, तो मेरे दिमाग में भी एक नयी घंटी बजी। मैंने उसे थोड़े कड़े आवाज में यह कहते हुए डांट पिलायी कि एक तो मेरे दोस्‍त मुझसे बिछड़ गये हैं और उस पर आपको टिकट की पड़ी है। आपके हॉल का पूरा सिस्‍टम ही बेहद फालतू लगता है। अगर इस भीड़ में कोई खो जाये, तो शायद पूरी फिल्‍म खत्‍म हो जाये मगर वह आदमी न मिले। पहली बार इस शहर में आयी और ऐस देखने को मिला। इस शहर के ऊपर की गयी मेरी सारी रिसर्च बेकार जायेगी। कहां मैं इसके बारे में लंबी-लंबी तारीफों के पुल बांध रही थी और कहां ये... बस-बस पूनम, रहने दो। हमें मालूम हो चुका है कि तुम आ गयी हो। पीछे से मेरे दोस्‍त ने मेरी बात बीच में काटते हुए मुझे पुकारा। थैंक गॉड मेरी जान में जान आ गयी। वह टिकट चेकर तो बस मेरा मुंह देखे जा रहा था। कुछ लोग भी भौचक्‍के से मुझे और मेरे दोस्‍त को देखे जा रहे थे। आखिरकार किसी तरह उसने उनलोगों को शांत कराया और मुझे मेरी सीट तक लाकर अच्‍छी-खासी डांट भी मुफ्त में दे दी। पर मुझे तो इस बात की खुशी थी कि कुछ भी हो मैंने तो बाजी मार ली। दोस्‍त भी मिल गये और पिक्‍चर का मजा, भले ही इस हो-हल्‍ला के चक्‍कर में 20 मिनट की फिल्‍म से हाथ धोना पड़ा, पर मजा खूब आया। वेसे आज भी उन दिनों जैसी बदमाशियों का सिलसिला थमा नहीं। मौका मिला नहीं कि मैं फिर से वैसे कारनामे करने को तैयार हो जाती हूं।
मेरी पसंदीदा फिल्‍में :

१.मोहब्‍बतें

२.परदेस

३.वीर-जारा

४.बागवान

५.हम साथ-साथ हैं

६.विवाह

७.हेरा-फेरी।

८.वेलकम टू सज्‍जनपुर

९.जाने तू या जाने ना



Wednesday, July 8, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी-विनोद अनुपम


हिन्दी टाकीज-४२

हिन्दी फिल्मों के सुधि लेखक विनोद अनुपम ने आखिरकार चवन्नी का आग्रह स्वीकार किया और यह पोस्ट भेजी । विनोद अनुपम उदहारण हैं कि फिल्मों पर बेहतर लिखने के लिए मुंबई या दिल्ली में रहना ज़रूरी नहीं है। वे लगातार लिख रहे हैं और आम दर्शकों और पाठकों के बीच सिनेमा की समझ बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने परिचय में लिखा है...जब पहली ही कहानी सारिका में छपी तो सोचा भी नहीं था, कभी सिनेमा से इस कदर रिश्ता जुड़ सकेगा। हालांकि उस समय भी महत्वाकांक्षा प्रेमचंद बनने की नहीं थी, हां परसाई बनने की जरूर थी। इस क्रम में परसाई जी को खूब पढ़ा और खूब व्यंग्य भी लिखे। यदि मेरी भाषा में थोड़ी भी रवानी दिख रही हो तो निश्चय ही उसका श्रेय उन्हें ही जाता है। कहानियां काफी कम लिखीं, शायद साल में एक। शापितयक्ष (वर्तमान साहित्य), एक और अंगुलिमाल (इंडिया ठूडे) ट्यूलिप के फूल (उद्भावना), स्टेपनी (संडे इंडिया), आज भी अच्छी लग जाती है, लेकिन बाकी की दर्जन भर कहानियों के बारे में यही नहीं कह सकता। सिनेमा देखने की आदत ने, सिनेमा समझने की जिद दी, और इस जिद ने 85 से 90 के दौर में बिहार में काम कर रहे प्रकाश झा से जुड़ने का अवसर दिया। उन्हीं के सौजन्य से फिल्म अध्येता सतीश बहादुर से भी फिल्म ‘पढ़ने’ की शिक्षा ग्रहण की। और फिर प्रकाश जी ने ही फिल्म एप्रिशिएशन कोर्स के लिए पुणे भेजने की भी पहल की। सिनेमा के बारे में जितनी ही दृष्टि खुलती गई, उतनी ही मेरे लेखन को एक दिशा मिलती गई। ‘उदभावना’ के संपादक अजय कुमार ने सिनेमा अंक के अतिथि संपादक के लिए मुझसे जमालपुर में संपर्क किया तो वाकई चकित रह गया, लेकिन सही दिशा में बढ़ने का विश्वास मिला। बाद में 2002 में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा ने भी कुछ ऐसे ही आश्चर्य में डाल दिया था। पटना से प्रकाशित ‘आज’ और ‘हिन्दुस्तान’ में छपी ‘सामान्य’ सी समीक्षाओं पर मिले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ने खुशी तो दी लेकिन सिनेमा पर लेखन के प्रति चिन्ता भी। तब से मौके मिलने पर ही नहीं, मौके ढ़ूंढकर और मांगकर लिखे मैंने सिनेमा पर। आज संतोष होता है जब लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में सिनेमा पर नियमित स्तंभ दिखाई देते हैं। शायद न भी हो, लेकिन इसके पीछे कहीं न कहीं अपनी भूमिका मान मैं खुश होता रहता हूँ।

बात हाई स्कूल की है, पता नहीं क्लास कौन सा था, नौवां या दसवां। एक सहपाठी ने मेरे सिनेमा प्रेम पर मुझे काफी आत्मीयता से समझाते हुए कहा था, पता है ज्यादा सिनेमा देखने से आदमी सिनेमा में ही काम करने लगता है। मैंने कहा, ये तो अच्छी बात है भला कौन सिनेमा में काम नहीं करना चाहता? उसने मेरे उत्साह का शमन करते हुए समझाया, अरे बेवकूफ सिनेमा मतलब, सिनेमा हॉल, वो देखते हो न टार्च दिखाने वाला, गेट पर टिकट चेक करने वाला, वही सब। हालांकि उस समय मेरे लिए ये काम भी रश्क का विषय थे। हर घड़ी सिनेमा हॉल में रहने का उनका सुख सोचकर ही मैं गुदगुदा उठता था। फिर जिस तरह एक टिकट के लिए लोग गेट कीपर के पीछे आपाधापी मचाए रखते, मेरी नजर में उसका महत्ब बरकरार रखता। लेकिन उसके रहन-सहन से इतना अंदाजा तो हो ही जाता कि ये काम मजेदार जरूर है, बढ़िया नहीं। लेकिन जाहिर है सिनेमा में काम करने की बात से एक बार डर जरूर गया, लेकिन सिनेमा के सम्मोहन से मुझे मुक्ति नहीं मिल सकी। यह डर तब और घना हो गया जब मैट्रिक के इम्तेहान में उस मित्र को प्रथम श्रेणी मिली जबकि मैं चार नंबरों से रह गया। आज सोचता हूँ तो वाकई यह पागलपन ही लगता है कि अपने प्रथम श्रेणी की परम्परा वाले परिवार में आयी मेरी द्वितीय श्रेणी भी सिनेमा से मुझे दूर नहीं ले जा सकी। सिनेमा देखना जारी रहा और पढ़ाई भी। पता नहीं सिनेमा और पढ़ाई का मेरा संतुलन सायाश था अनायास, लेकिन यह जरूर हुआ कि एक प्रतियोगिता परीक्षा की सीढ़ी पार कर मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई में चला आया। फिर दूसरी प्रतियोगिता पार कर बिहार सरकार की नौकरी भी हासिल करली। साहित्य से शौक ने हिन्दी साहित्य से भी एम। ए. करवा दिया। सिनेमा देखने से अब इतना शउर आ गया था कि उस पर कुछ अपनी राय जाहिर कर सकता था, जिसे पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशन योग्य भी समझने लगी थी। एक दिन हतप्रभ रह गया जब दरवाजे पर मैंने उसी मित्र को खड़ा पाया, वर्षों बाद, मुझे क्षण भर लगा उसे पहचानने में। उसने बधाई दी। सिनेमा पर खूब लिख रहे हो, फिर कहा मैं भी कुछ करना चाहता हूँ, रास्ता बताओ। पता चला कई एक प्रतियोगिता परीक्षाओं में असफलता के बाद वह घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहा है। सिनेमा वह अब भी नहीं देखता, लेकिन यह जरूर है कि अब अपने बच्चों को सिनेमा देखने से नहीं रोकता।

सिनेमा खूब देखे मैंने, और सिनेमा देखकर खूब पिटाई भी खायी। कई पिटाई तो ऐतिहासिक थी। राजकपूर की ‘बॉबी’ के साथ कई रिकार्ड जुड़े हों, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा रिकार्ड तो यही है कि मेरे बड़े भाई साहब ने ‘बॉबी’ देखने के ‘अपराध’ में मुझे पहले कमरे में बंदकर अपने बेल्ट से पीटा, फिर बीच सड़क पर पीटते हुए स्कूल तक ले गये थे और उस लड़के को भी पीटा, जिसके साथ साईकिल पर सात किलोमीटर की सवारी कर मैं दूसरे शहर ‘बॉबी’ देखने गया था। उस समय मैं आठवीं में था, उम्र होगी बमुश्किल 14 साल। वास्तव में सिनेमा देखना उस समय भी मेरा सबसे बड़ा शगल था। दशहरा हो, दिवाली हो, रक्षा बंधन हो या सरस्वती पूजा’.... मेरे लिए इनका बड़ा महत्व यही था कि मैं सिनेमा देख सकता था। उस समय सिनेमा नून शो में चला नहीं करते थे। मैटनी शो में शाम छः बजे तक बाहर रहने की आजादी आम दिनों में मिलती नहीं थी। मिलती थी तो 4 बजे घर में हाजिरी देने के बाद। त्योहारों में घूमने के नाम पर यह छूट मिल जाती थी। ‘बॉबी’ भी सरस्वती पूजा विसर्जन के दिन देखी थी मैंने, और उसके ठीक एक दिन पहले ‘गद्दार’ भी देखली थी, प्राण, विनोद खन्ना और शायद पद्मा खन्ना....... लगातार दो दिन दो सिनेमा देखने का अक्षम्य अपराध में लगी उस पिटाई का विरोध सिर्फ मां ने किया था।

मां सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं, अच्छी खासी तनख्वाह। उनकी एक ही विलासिता थी, सिनेमा। होश आने के पहले भी और होश आने के बाद भी मां का सिनेमा देखना सदा मेरी याददाश्त से जुड़ा रहा। पिता जी सिनेमा नहीं देखते थे, बगैर किसी कारण। बस उन्हें सिनेमा हॉल का बंद वातावरण अच्छा नहीं लगता था। लेकिन मां के सिनेमा देखने का उन्हें कभी विरोध करते भी नहीं देखा हमने। बल्कि अक्सर ऐसा होता कि मां सिनेमा देखकर बाहर आती तो पिता जी आॅफिस से लौटते हुए उन्हें साथ लेते आते। उस समय लेडिज क्लास का चलन था, लेडिस के लिए अलग काउंटर होते थे और सबसे कमाल यह कि सबसे कम टिकट दर भी उन्हीं का रहता था। महिलाओं के लिए सिनेमा देखना सुखद भले न हो, सुरक्षित अवश्य था। यूं आज के मल्टीप्लेक्स और कल के बॉलकनी को देखें तो स्पष्ट लगता है यह सुखद की सीमा हमेशा बदलते रही है।

जमालपुर (बिहार) में शायद आज भी सिनेमा के प्रचार का वही परंपरागत साधन है, जो बचपन में याने लगभग 30 साल पहले था। रिक्शे पर एक लाउडस्पीकर और माईक के साथ बैठा गेटकीपर। रिक्शे के पीछे प्लाई बोर्ड के टूकड़े पर एक मध्यम आकार का रंगीन पोस्टर चिपका रहता। अमूमन रिक्शा आने का समय शुक्रवार को 9 से 10 बजे का होता। फिल्म कोई भी हो, एनाउंस एक ही सुर में होता, अवन्तिका सिनेमा के रूपहले परदे पर आज से देखें, चुपके-चुपके धुंआधार मारपीट, नाचगाने, हंसी मजाक और सीन सिनहरी से भरपूर ‘चुपके-चुपके’ फिल्म के सितारे हैं, धरमिन्दर, अमिताभ बच्चन, शर्मिला टाइगोर और जया भादुड़ी, पूरे परिवार के साथ देखें ‘चुपके-चुपके’। फिल्म का नाम बदलता जुमला जस का तस रहता, चाहे ‘दोराहा’ यदि मैं गलत नहीं तो राधा सलूजा इसकी नायिका थी और एडल्ट फिल्म होने के कारण एक तरह से बदनाम भी थी यह फिल्म, अफसोस यह फिल्म मैं आज तक नहीं देख सका हो या ‘कोशिश’ जिसमें संजीव कुमार और जया भादुड़ी दोनों ने गुंगे बहरे की भूमिका निभाई थी।

फिल्म और कलाकारों के प्रति उद्घोषक की उदासीनता रहती या सामाजिक पूर्वाग्रह का प्रभाव, अब याद करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि कभी संयोग से भी नायिका का नाम वह पहले नहीं लेता। उस फिल्म में जया भादुड़ी किसी नवोदित के साथ थी, शायद विक्रम या विजय अरोड़ा। लेकिन उदघोषक विक्रम के मुकाबले भी जया भादुड़ी को आगे करने की कोशिश नहीं करता। पुरूष सत्ता का प्रभाव हमारे मन को किस तरह अवचेतन में प्रभावित रखता है इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। यह बात आज मेरे समझ में आ रही है, लेकिन उस समय तो मेरे लिए यह उद्घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण रहती कि मैं मां को फिल्म बदलने की सूचना सबसे पहले देने से अपने आपको वंचित नहीं करना चाहता। शायद कोई समझदारी मेरी नहीं थी उस समय, मेरे लिए यह बस इसी लिए महत्वपूर्ण था कि अच्छी फिल्म की सूचना से मां को खुशी मिलती और वे फिल्म देखने की योजना बना सकती थी।

उस समय फिल्मों के चार सौ प्रिन्ट एक साथ रिलीज नहीं होते थे, न ही डिजीटल रिलीज की सुविधा थी। बस बक्से में फिल्म की रील आती, निश्चय ही छोटे शहरों तक आते-आते यह अवधि साल भी हो जाती कभी-कभी। फिर भी फिल्म देखने का उत्साह कम नहीं होता। बड़े शहरों से जैसे-जैसे फिल्म की सिल्वर जुबली याने 25 हते की सूचना आती, छोटे शहरों में फिल्म का क्रेज बनता। लेकिन तब तक फिल्म की रील घिस चुकी होती और उसके पोस्टर खत्म हो चुके होते थे। उस समय नई फिल्म के अधिकांश पोस्टर ट्रेडिल मशीन पर डेढ़ फीट बाय डेढ़ फीट के आकार में स्थानीय प्रेस में सिनेमा मालिकों द्वारा ही छपवाये जाते, आशुद्धियों से भरे इन पोस्टरों पर सिनेमा हॉल, सिनेमा के नाम के साथ सिर्फ कलाकारों के नाम होते थे। तस्वीरों वाले बड़े पोस्टर सिनेमा हॉल के अलावा शहर में सिर्फ एक जगह लगा करता था। अमूमन जिसे देखने के लिए हमलोग पहुंच ही जाया करते थे। शुक्रवार की दोपहर हमें प्रतीक्षा रहती मुंगेर के सिनेमा घरों की प्रचार गाड़ी की। अमूमन मुंगेर की प्रचार गाड़ी जीप पर बनायी जाती। तख्ते के क्यूब पर रंगीन पोस्टर चिपका कर उसे जीप पर रख दिया जाता। और साथ ही साथ माईक से एलाउंस भी होता रहता। सिनेमा और सिनेमा हॉल के नाम का तुक बिठाने में हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती। ‘हम किसी से कम नहीं’ सुनाई देता तो विजय टॉकीज गायब हो जात, विजय सुनाई देता तो ‘हम किसी से कम नहीं’। इस प्रचार गाड़ी का सबसे बड़ा आकर्षण इसके साथ उड़ने वाले रंगीन पर्चे होते थे। पतले रंगीन कागज पर छपे ये परचे मिल जाना हमारी एक उपलब्धि होती थी। आज सोचता हूँ वाकई मजेदार लगता है, अजूबा तो उस समय भी लगता था। मुंगेर के बैधनाथ सिनेमा ने एक घोड़ा गाड़ी रखी थी, मतलब बग्घी। आगे जुते घोड़े और पीछे बक्से पर सिनेमा पोस्टर के क्यूब। बैधनाथ की एक और विशेषता थी, अपनी बालकनी को उसने दो भागों में बांट लिया था, आधा डी।सी. कहा जाता था, आधे में लेडीज। डी.सी. में मात्र 8 तीन लंबे गद्देदार स्पिंग वाले सोफे थे, जिसपर सिनेमा देखना वाकई सुखद लगता था। लेकिन मुश्किल लेडीज के साथ थी, उसके ठीक पीछे प्रोजेक्शन रूम था। अक्सर ही ऐसा होता कि नायक-नायिका के बीच किसी तीसरी स्त्री का जूड़ा या फिर रोते हुए बच्चों को खड़े होकर चुप कराती किसी महिला की छवि परदे तक पहुंच जाती और दर्शकों की जबरदस्त हाजिर जवाब चुटकियों से हॉल गुंज उठता था।

मेरे होशोहवाश में आने तक देश में बिजली संकट शुरू हो गया था। बिजली जाने लगी थी, लेकिन सिनेमा घरों में जेनरेटर का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था। बिजली जाती तो घंटे-आधे घंटे तक दर्शकों को इन्तजार करना पड़ता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि आधी फिल्म में बिजली चली जाती और घंटे भर बाद घोषणा होती कि कल इसी टिकट पर आकर सिनेमा देख सकते हैं। यदि फिल्म आधी से भी कम चली होती और बिजली अनंत काल तक के लिए चली गई होती तो टिकट के पैसे वापस कर दिये जाते। हमारे लिए दुख से अधिक खुशी का अवसर होता यह, एक टिकट में दो खेल।

जमालपुर में उस समय दो सिनेमा घर थे, एक अवन्तिका और एक रेलवें, जिसे रेलवे ने अपने कर्मचारियों के मनोरंजन के लिए बनवाया था। रेलवे में रेल कर्मचारियों को उस समय (1970-1980) मात्र 80 पैसे डी.सी. के लिए देने होते थे, जबकि आम दर्शकों को 1 रूपये 60 पैसे । बगल के जिला मुख्यालय मुंगेर में तीन सिनेमा घर थे। जब कोई बड़ी हिट या चर्चित फिल्म आती तो हमलोग मुंगेर जाते। याद है मुझे ‘जयसंतोषी मां’ देखने के लिए जाना था तो स्कूल से मुझे आधी छुटटी में बुला लिया गया था और स्कूल ड्रेस में ही मां के साथ सिनेमा देखने चला गया था। मुंगेर में सिनेमा देखने हमलोगों के लिए विलासिता ही थी, क्योंकि टैक्सी में बैठकर जाना होता और सिनेमा देखने के बाद रेस्टूरेंट में चाट और कुल्फी के लिए भी पिता जी ले जाते।

पता नहीं सिनेमा देखने की आदत की शुरूआत यहीं से हुई या इसकी नींव कहीं और पड़ी लेकिन इतना जरूर था कि सिनेमा मेरे परिवार में कभी त्याजय नहीं था, सिनेमा देखने - सिनेमा पर बातें करने पर कभी किसी को आपति नहीं होती, शर्त यह कि सिनेमा देखने की स्वीकृति घर में ले ली जाय। याद नहीं वह साल कौन सा था, लेकिन यह याद है कि वह फिल्म थी ‘गंगा तेरा पानी अमृत’, जिसे पहली बार अकेले देखने मैं गया था, मां से स्वीकृति और पैसे लेकर। लेकिन जैसे-जैसे मैं ऊपर के क्लास में चढ़ता गया, सिनेमा देखने की संख्या भी बढ़ती गई, जाहिर है उस अनुपात में घर से स्वीकृति संभव नहीं थी, सो चोरी-छिपे सिनेमा देखने की शुरूआत हुई। कुछ ऐसी भी फिल्में उस समय आने लगी, जिसके लिए घर से स्वीकृति मांगनी संभव भी नहीं थी, अब ‘गुप्तज्ञान’ देखने के लिए स्वीकृति मांगता भी कैसे? और नौवीं-दसवीं का समय ऐसा था, जब ऐसी फिल्में आकर्षित ज्यादा करती थी। जमालपुर में उस समय हरेक वर्ष नवम्बर-दिस्मबर में रामायण सम्मेलन आयोजित होते थे, देश भर से मानस विद्वान वहां उपस्थित होते थे और शाम 7 बजे से 12 रात्रि तक प्रत्येक दिन प्रवचन सुनने शहर के लोग इकट्ठा होते थे। हमे भी मानस सम्मेलन में जाने के लिए आसानी से स्वीकृति मिल जाती, जिसका उपयोग मैं अकसर अपने दोस्तों के साथ 9 से 12 बजे रात्रि शो में फिल्म देखने के लिए कर लेता। और तो याद नहीं लेकिन ‘तन्हाई’ मुझे अभी तक याद है जिसे मैंने 9 से 12 के ही शो में देखा था। शत्रुध्न सिन्हा और रेहाना सुल्तान के भी नाम याद हैं, और यह भी याद है कि उस फिल्म में कुछ ‘ऐसे’ दृश्य थे, जिसने मुझे कुछ गलत करने का अहसास दिलाया था, पता नहीं अब के बच्चों को सी-ग्रेड फिल्में देखकर भी अब यह अहसास होता है या नहीं?

आज भी सिनेमा देखने के लिए कोई आधार मैं नहीं मानता। काफी बाद में फिल्म भाषा और तकनीक पर आधारित एक कार्यशाला में वरिष्ठ फिल्म अध्येता गायत्री चटर्जी ने जब यह कहा कि यदि फिल्म के बारे में जानना हो तो खूब फिल्में देखनी चाहिए, तो मुझे समझ में आया कि शायद मैं गलत नहीं था। मैंने अच्छी-बुरी जब भी जैसी जो फिल्में मिली मैंने देखी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान दोस्तों के साथ कभी-कभी एक दिन में दो शो फिल्में भी देख डालीं।

सिनेमा आज भी देखता हूँ। लगातार, काफी कम फिल्में ऐसी होती है जिसे मैं नहीं देख पाता। सिनेमा हॉल में फिल्में देखना आज भी मेरी हॉबी है, 45 वर्ष की उम्र में। लेकिन सच कहूं वो उत्साह, वो सुख अब सिर्फ ख्यालों में ही आते हैं, जिसे हमने जमालपुर-मुंगेर के तंग से सिनेमा घरों में हासिल किया। क्यों? पता नहीं, शायद इसलिए कि वहां के गेटकीपर से लेकर सिनेमा की टूटी सीटों से एक अपनापन महसूस होता था, जो आतंकित करती मल्टीप्लेक्स की भव्यता से हासिल नहीं होती।

पसंद की फिल्में:-

1. मेरा नाम जोकर
2. ब्लैक
3. स्वदेश
4. आवारा
5. गाईड
6. वेलकम टू सजनपुर
7. लगे रहो मुन्ना भाई
8. दिलवाले दुल्हनियां ले जाऐंगे
9. गोलमान
10. विवाह
कृप्या क्रम पर गौर नहीं करें

विनोद अनुपम, बी-53, सचिवालय कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-20 मो. 9334406442


Saturday, June 20, 2009

हिन्दी टाकीज:भागकर फिल्‍म देखने का मजा कुछ और था-अंजलि कुजूर


हिन्दी टाकीज-4

अंजलि कुजूर स्‍कूल में पढ़ाती हैं। अखबारों में लिखती हैं और भरपूर जिंदगी जीती हैं। उनसे बहस करने के किसी को भी बाद अपने आप शक हो सकता है। उनके छात्र उनसे डरते हैं, मगर unhen अफसोस है कि उनका इकलौता बेटा हर्ष उनसे बिल्‍कुल नहीं डरता।



बचपन में कितनी फिल्‍में देखी याद नहीं लेकिन कॉलेज में अपनी दोस्‍त के साथ जो फिल्‍म देखी, उसे आज तक नहीं भूल पायी। मेरी वह प्‍यारी दोस्‍त नेपाल की रहने वाली थी। कॉलेज में मैं और मेरी दोस्‍त अपनी दोस्‍ती के लिए सभी के बीच जाने जाते थे।
हमारी रुचि और रहन-सहन को देखकर हमारे प्रोफेसर हमेशा कहा करते थे -'यह जोड़ी गजब की है, एक पूरी तरह देशी और एक बॉर्डर पर की, फिर भी क्‍या दोस्‍ती है। हम साथ-साथ क्‍लास करते घूमते, चाट और गोलगप्‍पे खाते। सचमुच वह बहुत प्‍यारे दिन थे। खैर, बात फिल्‍म की। एक दिन हमने तय किया कि क्‍लास बंद करके फिल्‍म देखी जाये। उस समय मैं किसी खास हीरो-हीरोइन के फैन नहीं थी। पर मेरी दोस्‍त जूही चावला की बहुत बड़ी फैन थे। उसके पास जूही चावला के ढेरों फोटोग्राफ्स थे, जिसे वो सारे दोस्‍तों को दिखाया करती थी। तो तय हुआ। ' हम हैं राही प्‍यार के' देखी जाये। फिल्‍म में जूही के पिताजी उसकी शादी अपनी जाति के (मद्रासी) लड़के से तय कर देते हैं। जूही को लड़का पसंद नहीं आने के कारण वो भाग कर मेले में चली जाती है। वहां से उसे तीन बच्‍चे अपने मामा (आमिर खान) के घर ले आते हैं। तब शुरू होती है फिल्‍म की असली कहानी। साथ रहते हुए जूही और आमिर खान एक-दूसरे से प्‍यार करने लगते हैं। पर आमिर की कंपनी एक सेठ के हाथें गिरवी है, जिसकी बेटी आमिर को पसंद करती है और उससे शादी करना चाहती है। मुझे वह सीन अब भी याद है जब जूही परेशान होती है। उसकी परेशानी देखकर मेरी दोस्‍त भी रो पड़ी थी। बड़ी मुश्किल से मैंने उसे चुप कराया था। यह क्रम सिनेमा हॉल में कई बार दोहराया गया। कहा जा सकता है कि मेरा समय फिल्‍म देखने में कम और उसे चुप कराने में ज्‍यादा बीता था। हाल यह था कि फिल्‍म के खत्‍म होते-होते मेरी दोस्‍त की आंखें रोते-रोते पूरी तरह से लाल हो चुकी थीं। हालांकि वह कामेडी फिल्‍म थी। मुझे यह सोचकर और हंसी आ रही थी कि यह लड़की उदास कर देने वाली ट्रेजेडी फिल्‍में कैसे देखती होगी।
दूसरे दिन कॉलेज पहुंचकर इस किस्‍से को दोस्‍तों के सामने बयां की तो सभी खूब हंसे। पर हमारी मस्‍ती की यह कहानी तब क्‍लाइमेक्‍स पर पहुंची जब प्रोफेसर ने हम दोनों से पिछले क्‍लास से संबंधित प्रश्‍न पूछे। जवाब नहीं मिलने पर बुरी तरह डांटा। हमें डांट सुनते देख सभी के चेहरों पर हंसी आ रही थी। हमें बाद में पता चला कि प्रोफेसर ने हमें कॉलेज के गेट से बाहर जाते पहले ही देख लिया था। बहरहाल इस डांट का असर ये हुआ कि हमने दोबारा क्‍लास मिस कर कभी फिल्‍म न देखने की कसम खायी। लेकिन उन दिनों फिल्‍मों का मोह ऐसा था कि जल्‍दी ही यह कसम टूट गयी।
उन दिनों मैं हजारीबाग के एक हॉस्‍टल में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हॉस्‍टल की हेड एक सिस्‍टर थी। हास्‍टल की लड़कियों पर कड़ी नजर रखी जाती थी। किससे मिलना है, कब मिलना है, यह सब सिस्‍टर तय करती थी। कहीं आने-जाने का समय निश्चित था। अनुशासन तोड़ने का मतलब था कड़ी सजा की भागीदार बनना।
लेकिन कॉलेज के दिनों में घर से बाहर यदि लड़कियां एक साथ रहें तो शैतानियां और बदमाशी न हो, यह नामुमकिन जैसा है। ऐसे में हमारा मन सिनेमा देखना किसी बड़े युद्ध को जीतने के बराबर था। लेकिन उन दिनों भागकर सिनेमा देखने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का रोमांच ही अलग था। बल्कि सिनेमा देखने का कम और किसी की नजरों से बचने का आनंद अधिक आता था। हम लड़कियां अक्‍सर भागकर फिल्‍म देखने चली जातीं और चुपचाप चली आतीं। सिस्‍टर को किसी ने इसके बारे में बता दिया था। लेकिन रंगे हाथों नहीं पकड़ पाने के कारण वह काई कार्यवाही नहीं कर पाती थी। कई तरह की वार्निंग दी जाती पर हम लड़कियां आदत से बाज नहीं आतीं। एक दिन तय हुआ कि शाहरुख खान की सुपरहिट फिल्‍म देखी जाए। हम तय समय पर एक-दो, एक-दो करके निकले ताकि किसी को खबर न हो। रात में ही बीस लड़कियों के पैसे जमा कर लिये गये। तय यह हुआ कि एक लड़की टिकट कटा लेगी और बाकी हम सब तय समय और स्‍थान पर मिलेंगे। सब कुछ योजनानुसार हो रहा था। हम सब निश्चित जगह जमा हो कर फिल्‍म हॉल में घुस भी गये। लड़कियां हल्‍ला करने, कमेंट करने में लड़कों से पीछे नहीं थीं। तीन घंटे खूब मस्‍ती में बीते। फिल्‍म खत्‍म होने पर हम लड़कियों का झुंड हंसते-खिलखिलाते बाहर निकलने लगा। उस हॉल में अंदर जाने का एक दरवाजा था और बाहर निकलने का एक। उस दरवाजे से बाहर आने पर हमारे होश उड़ गये। हेड सिस्‍टर वहां हमारे स्‍वागत में पहले से खड़ी थी।
हम सब की हालत खराब। मुंह लटकाये हम एक-एक कर बाहर निकलते जाते और सिस्‍टर हमारा नाम नोट करती जाती। शायद सिस्‍टर को गुप्‍त सूत्रों से हमारे फिल्‍मी कार्यक्रम के बारे में पता चल गया था। आखिर उस दिन हम रंगे हाथों पकड़े गये। उसके बाद सिस्‍टर ने हमारी क्‍या दुर्गति की, उसे यहां नहीं किया जा सकता।


पसंद की दस फिल्‍में -
1.मैं हूं ना
2.कहो ना प्‍यार है
3.गाइड
4.कुछ कुछ होता है
5.शोले
6.बागबान
7.जब वी मेट
8.शूट आउट एट लोखंडवाला
9.ओंकारा
10.चक दे इंडिया