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Friday, September 9, 2016

फिल्‍म समीक्षा : बार बार देखो




पल पल में दशकों की यात्रा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

नित्‍या मेहरा की फिल्‍म बार बार देखो के निर्माता करण जौहर और रितेश सिधवानी-फरहान अख्‍तर हैं। कामयाब निर्माताओं ने कुछ सोच-समझ कर ही नित्‍या मेहरा की इस फिल्‍म को हरी झंडी दी होगी। कभी इन निर्माताओं से भी बात होनी चाहिए कि उन्‍होंने क्‍या सोचा था? क्‍या फिल्‍म उनकी उम्‍मीदों पर खरी उतरी? पल पल में दशकों की यात्रा करती यह फिल्‍म धीमी गति के बावजूद झटके देती है। 2016 से 2047 तक के सफर में हम किरदारों के इमोशन और रिएक्‍शन में अधिक बदलाव नहीं देखते। हां,यह पता चलता है कि तब स्‍मार्ट फोन कैसे होंगे और गाडि़यां कैसी होंगी? दुनिया के डिजिटाइज होने के साथ सारी चीजें कैसे बदल जाएंगी? यह भविष्‍य के भारत की झलक भी देती है। इसके अलावा फिल्‍म में कलाकार,परिवेश,मकान,गाडि़यों समेत सभी चीजें साफ और खूबसूरत हैं। उनमें चमक भी है।
जय और दीया एक ही दिन पैदा होते हैं। आठ साल में दोनों की दोस्‍ती होती है। पढ़ाकू जय और कलाकार दीया अच्‍छे दोस्‍त हैं। दीया ज्‍यादा व्‍यावहारिक है। जय पढ़ाई और रिसर्च की सनक में रहता है। बड़े होने पर जय मैथ का प्रोफेसर बन जाता है और दीया आर्टिस्‍ट। दोनों के जीवन में तब मोड़ आता है,जब दीया प्रोपोज करती है। शादी के प्रस्‍ताव से घबराया जय कोई जवाब दे,इसके पहले ही उसकी चट मंगनी हो जाती है। पट शादी नहीं हो पाती...शादी के पहले जय और दीया के बीच मनमुटाव होता है। दीया कभी नहीं लौटने की बात कह चली जाती है। जय हिंदी फिल्‍मों का हीरो है। उसे शैंपेन की बोतल मिल जाती है। नशे में लुढ़कने के बाद वह सपने में भी लुढ़कता है और फिर उसकी काल्‍पनिक यात्राएं शुरू होती हैं। इन यात्राओं में ही उसके संबंधों के बिगड़ने के खयाल और मंजर हैं।
फिल्‍म अच्‍छे नोट पर आरंभ होती है। ऐसा लगता है कि नित्‍या मेहरा आज के युवा समूह में प्रचलित कमिटमेंट की समस्‍या उठाने जा रही हैं। प्रेम और दोस्‍ती को शादी तक ले जाने और उसके साथ जुड़े समर्पण से भागने की कशमकश जय और दीया के साथ भी है। जय अपने करिअर पर ध्‍यान देना चाहता है। दीया भी करिअर चाहती है,लेकिन उसकी अपनी सोच है,जिसमें घर-परिवार और पारंपरिक मर्यादाएं हैं। दिक्‍कत यह है कि लेखक-निर्देशक परस्‍पर रिश्‍तों के पहलू दिखाने में अपना पक्ष स्‍पष्‍ट तरीके से नहीं रख पाते। नतीजतन हमें जय कंफ्युज दिखता है। दीया घरेलू और पारंपरिक दायरे में नजर आती है। यह अलग बात है कि फिल्‍म के गाने गाते समय वह कट्रीन कैफ में ढल जाती है। ठ़ुमके लगाने लगती है। शारीरिक सौंदर्य दिखाने लगती है।
यकीनन,सिद्धार्थ मल्‍होत्रा और कट्रीना कैफ को फिल्‍म का कांसेप्‍ट पसंद आया होगा। इस फिल्‍म में दोनों को उम्र के अनेक पड़ाव मिलते हैं। कलाकारों को ज्‍यादा और कम उम्र की भूमिकाएं निभाने में आनंद आता है। उन्‍हें भी आया होगा,लेकिन दोनों ने बाल और मेकअप के अलावा उम्र की जरूरत के मुताबिक चाल-ढाल पर ध्‍यान नहीं दिया है। सिद्धार्थ अपने किरदार के 45 की उम्र में यों दौड़ते हैं जैसे 22 के हों। कट्रीना कैफ के बाल और उसकी गुंथाई पर मेहनत है,लेकिन बॉडी लैंग्‍वेज में कोई फर्क नहीं आता। यह दोनों कलाकारों की सीमा के साथ निर्देशक की चूक है।
यह फिल्‍म एक स्‍तर पर स्‍त्री-पुरुष के नजरियों को भी टच करती है। नायिका प्रोपोज करने की पहल करने के बावजूद सोच के स्‍तर पर पिछड़ी है। पति से उसकी उम्‍मीदें किसी घरेलू औरत जैसी ही है। पति-पत्‍नी दोनों में किसी एक की व्‍यस्‍तता और दूसरे की उम्‍मीदों में तालमेल न‍हीं बैठता तो उसका असर दांपत्‍य पर पड़ता है। भारतीय समाज में ज्‍यादातर पत्नियों को समझौते करने पड़ते हैं,लेकिन पति भी दबाव में रहते हैं। बार बार देखो जैसी फिल्‍में कुछ नया बताने की जगह बार-बार पुराने तौर-तरीकों में ले जाती हैं।
फिल्‍म के आखिर में आया काला चश्‍मा गहन प्रचार के बावजूद कुछ जोड़ नहीं पाता।
अवधि- 145 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

Friday, June 27, 2014

फिल्‍म समीक्षा : एक विलेन

एंग्री यंग मैन की वापसी 
 -अजय ब्रमात्‍मज 
 गणपति और दुर्गा पूजा के समय मंडपों में सज्जाकार रंगीन रोशनी, हवा और पन्नियों से लहकती आग का भ्रम पैदा करते हैं। दूर से देखें या तस्वीर उतारें तो लगता है कि आग लहक रही है। कभी पास जाकर देखें तो उस आग में दहक नहीं होती है। आग का मूल गुण है दहक। मोहित सूरी की चर्चित फिल्म में यही दहक गायब है। फिल्म के विज्ञापन और नियोजित प्रचार से एक बेहतरीन थ्रिलर-इमोशनल फिल्म की उम्मीद बनी थी। इस विधा की दूसरी फिल्मों की अपेक्षा 'एक विलेन' में रोमांच और इमोशन ज्यादा है। नई प्रतिभाओं की अभिनय ऊर्जा भी है। रितेश देशमुख बदले अंदाज में प्रभावित करते हैं। संगीत मधुर और भावपूर्ण है। इन सबके बावजूद जो कमी महसूस होती है, वह यही दहक है। फिल्म आखिरी प्रभाव में बेअसर हो जाती है।
नियमित रूप से विदेशी फिल्में देखने वालों का 'एक विलेन' में कोरियाई फिल्म 'आई सॉ द डेविलÓ की झलक देख सकते हैं। निस्संदेह 'एक विलेन' का आइडिया वहीं से लिया गया है। उसमें प्रेम और भावना की छौंक लगाने के साथ संगीत का पुट मिला दिया गया है। जैसे कि हम नूडल्स में जीरा और हल्दी डाल कर उसे भारतीय बना देते हैं या इन दिनों चाइनीज भेल खाते हैं, वैसे ही 'एक विलेन' कोरियाई फिल्म का भारतीय संस्करण बन जाती है। चूंकि इस फिल्म के निर्माता ने मूल फिल्म के अधिकार नहीं लिए है, इसलिए ग्लोबल दौर में 'एक विलेन' क्रिएटिव नैतिकता का भी शिकार होती है। हर देश और भाषा के फिल्मकार दूसरी फिल्मों से प्रेरित और प्रभावित होते हैं। कहा ही जाता है कि मूल का पता न चले तो आप मौलिक हैं।
'एक विलेन' मुख्य रूप से गुरु की कहानी है। आठवें और नौवें दशक की हिंदी फिल्मों में ऐ किरदार का नाम विजय हुआ करता था। तब परिवार के कातिलों से बदला लेने में पूरी फिल्म खत्म हो जाती थी। अब ऐसे ग्रे शेड के नायक की कहानी आगे बढ़ती है। सिल्वर स्क्रीन पर अपनी वापसी में एंग्री यंग मैन कुछ और भी करता है। बदला लेने और अपराध की दुनिया में रमने के बाद उसकी जिंदगी में एक लड़की आयशा आती है। आयशा प्राणघातक बीमारी से जूझ रही है। अपनी बची हुई जिंदगी में वह दूसरों की जिंदगी में खुशियां लाना चाहती है। उसे अपने एक काम के लिए गुरु उचित लगता है। इस सोहबत में दोनों का प्रेम होता है। गुरु अपराध की जिंदगी को तिलांजलि दे देता है। वह 9 से 5 की सामान्य जिंदगी में लौटता है, तभी मनोरोगी राकेश के हिंसक व्यवहार से वह फिर से एक बदले की मुहिम में निकल पड़ता है और मोहित सूरी की रोमांचक फिल्म आगे-पीछे की परतों का उजागर करती हुई बढ़ती है।
श्रद्धा कपूर निर्भीक और अकलुष आयशा के किरदार में सहज और स्वाभाविक हैं। मोहित ने उन्हें मुश्किल इमोशन नहीं दिए हैं। मौत के करीब पहुंचने के दर्द और जीने की चाहत के द्वंद्व को श्रद्धा ने व्यक्त किया है। अपनी सुंदर ख्वाहिशों में वह गुरु को बेहिचक शामिल कर लेती है। गुरु के रुप में सिद्धार्थ मल्होत्रा को ठहराव से भरे दृश्य मिले हैं। उन्होंने उन दृश्यों को बखूबी निभाया है। नई पीढ़ी के कलाकारों में सिद्धार्थ दमदार तरीके से अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं। 'एक विलेन' अभिनेता रितेश देशमुख की प्रतिभा के अनदेखे पहलू को सामने ले आती है। वे मनोरोगी और सीरियल किलर के मानस और भाव को पर्दे पर लाने में सफल रहे हैं। तीनों मुख्य कलाकार अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं। अगर फिल्म की पटकथा में दहक होती तो 'एक विलेन' इस साल की खास फिल्म हो जाती।
गीत-संगीत में निर्देशक,गीतकार और संगीतकार की मेहनत झलकती है। मिथुन, मनोज मुंतशिर और अंकित तिवारी के शब्द और ध्वनियों में फिल्म के किरदारों का अधूरेपन और टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी को अभिव्यक्ति मिली है। हालांकि संगीत पर आज के दौर का भरपूर असर है,लेकिन शब्दों में संचित उदासी-उम्मीद और निराशा-आशा फिल्म के कथ्य को सघन करती है। निर्देशक ने गीत-संगीत का सार्थक उपयोग किया है।
अवधि: 129 मिनट
*** तीन स्‍टार 

Friday, February 7, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हंसी तो फंसी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्म के अंग्रेजी हिज्जे का उच्चारण करें तो यह फिल्म 'हसी तो फसी' हो जाती है। यह इरादतन किया गया होगा। धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म है तो अक्षर जोड़ने के बजाय इस बार घटा दिया गया है। फिल्म का यही प्रभाव भी है। फिल्म में बस मनोरंजन का अनुस्वार गायब है। फिल्म मनोरंजन की जगह मनोरजन करती है। हिंदी में बिंदी का बहुत महत्व होता है। अंग्रेजी में हिंदी शब्दों के सही उच्चारण के लिए बिंदी के लिए 'एन' अक्षर जोड़ा जाता है। करण जौहर की भूल या सोच स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन इस फिल्म के साथ अनुराग कश्यप भी जुड़े हैं। अफसोस होता है कि भाषा और उच्चारण के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों?
'हंसी तो फंसी' गीता और निखिल की कहानी है, जो अपने परिवारों में मिसफिट हैं। उनकी जिंदगी परिवार की परंपरा में नहीं है। वे अलग सोचते हैं और कुछ अलग करना चाहते हैं। गीता संयुक्त परिवार की बेटी है, जिसमें केवल उसके पिता उसकी हर गतिविधि के पक्ष और समर्थन में खड़े मिलते हैं। निखिल को अपनी मां का मौखिक समर्थन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि दोनों बार-बार टकराते हैं। आखिरकार उन्हें एहसास होता है कि अलग मिट्टी से बने होने के कारण वे प्यार और जिंदगी में एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
फिल्म के प्रोमो और प्रचार से अगर आपने सोच रखा हे कि यह परिणीति चोपड़ा की एक और चुहलबाजी होगी तो मुमकिन है कि निराश होना पड़े। 'हंसी तो फंसी' स्वयं में रोचक है, लेकिन वही फिल्म नहीं है, जो भ्रम देती है। यह ए किस्म की रोमांटिक कामेडी है। इस फिल्म में परिणीति चोपड़ा का उपयोग प्रचलित छवि से अलग किया गया है। परिणीति चोपड़ा ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। वही फिल्म का आकर्षण हैं। निखिल की भूमिका में सिद्धार्थ मल्होत्रा मिसफिट लगते हैं। उनकी देहयष्टि, भावमुद्रा और चाल-ढाल से ऐसा व्यक्तित्व बनता है, जिससे कभी कोई चूक नहीं हो सकती। उनकी बेवकूफियां सहज नहीं लगतीं। इस फिल्म में अदा शर्मा चौंकाती हैं। उन्हें ठीक-ठाक भूमिका मिली है। 
'हंसी तो फंसी' के प्लस प्वॉइंट मनोज जोशी हैं। मीता के मूक समर्थन में उनका अव्यक्त दुलार जब फूटता है तो परिजन स्तब्ध रह जाते हैं। हम लोग मनोज जोशी को हास्यास्पद या मामूली किरदारों में देखते रहे हैं। वे साबित करते हैं कि किरदार और दृश्य मिलें तो उनकी अदाकारी दिख सकती हैं। शरत सक्सेना और बाकी सहयोगी कलाकार फिल्म की जरुरतें पूरी करते हैं।
अवधि-141 मिनट
** 1/2 ढाई स्‍टार

Saturday, October 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : स्टूडेंट ऑफ द ईयर

Review: Student Of The Year-अजय ब्रह्मात्मज
देहरादून में एक स्कूल है-सेंट टेरेसा। उस स्कूल में टाटा(अमीर) और बाटा(मध्यवर्गीय) के बच्चे पढ़ते हैं। उनके बीच फर्क रहता है। दोनों समूहों के बच्चे आपस में मेलजोल नहीं रखते। इस स्कूल के डीन हैं योगेन्द्र वशिष्ठ(ऋषि कपूर)। वे अपने ऑफिस के दराज में रखी मैगजीन पर छपी जॉन अब्राहम की तस्वीर पर समलैंगिक भाव से हाथ फिराते हैं और कोच को देख कर उनक मन में ‘कोच कोच होने लगता है’। करण जौहर की फिल्मों में समलैंगिक किरदारों का चित्रण आम बात हो गई है। कोशिश रहती है कि ऐसे किरदारों को सामाजिक प्रतिष्ठा और पहचान भी मिले। बहरहाल, कहानी बच्चों की है। ये बच्चे भी समलैंगिक मजाक करते हैं। इस स्कूल के लंबे-चौड़े भव्य प्रांगण और आलीशान इमारत को देखकर देश के अनगिनत बच्चों को खुद पर झेंप और शर्म हो सकती है। अब क्या करें? करण जौहर को ऐसी भव्यता पसंद है तो है। उनकी इस फिल्म के लोकेशन और कॉस्ट्युम की महंगी भव्यता आतंकित करती है। कहने को तो फिल्म में टाटा और बाटा के फर्क की बात की जाती है, लेकिन मनीष मल्होत्रा ने टाटा-बाटा के प्रतिनिधि किरदारों को कॉस्ट्युम देने में भेद नहीं रखा है। रोहन और अभिमन्यु के वार्डरोब में एक से कपड़े हैं। फिल्म की नायिका सनाया तो मानो दुनिया के सभी मशहूर ब्रांड की मॉडल है। इस स्कूल में एक पढ़ाई भर नहीं होती,बाकी खेल-कूद,नाच-गाना,लब-शव चलता रहता है। आप गलती से भी भारतभूमि में ऐसे लोकेशन और कैरेक्टर की खोज न करने लगें। स्वागत करें कि करण जौहर विदेश से देश तो आए। भविष्य में वे छोटे शहरों और देहातों में भी पहुंचेगे।
    इस फिल्म की खूबी और कमी पर बात करने से बेहतर है कि हम तीन नए चेहरों की चर्चा करें। करण जौहर ने पहली बार अपनी फिल्म के मुख्य किरदारों में नए चेहरों को मौका देने का साहस दिखाया है। भविष्य में कैरेक्टर और कंटेंट भी देश्ी हो सकते हैं। उनके तीनों चुनाव बेहतर हैं। परफारमेंस के लिहाज से सिद्धार्थ मल्होत्रा बीस ठहरते हैं। फिल्म के लेखक और कहानी का सपोर्ट अभिमन्यु को मिला है, लेकिन उस किरदार में वरुण धवन मेहनत करते दिखते हैं। मुठभेड़, दोस्ती और मौजमस्ती के दृश्यों में सिद्धार्थ और वरुण अच्छे लगते हैं। मनीष मल्होत्रा और सिराज सिद्दिकी ने उन्हें आकर्षक कॉस्ट्युम दिए हैं। फिल्म तो इन दोनों के लिए ही बनाई गई लगती है। इस फिल्म से फैशन का नया ट्रेंड चल सकता है। पहली फिल्म और रोल के हिसाब से आलिया भट्ट निराश नहीं करतीं, लेकिन उनका परफारमेंस साधारण है। आती-जाती और इठलाती हुई वह सुंदर एवं आकर्षक लगती हैं। गानों में भी उन्होंने सही स्टेप्स लिए हैं, लेकिन भावपूर्ण और नाटकीय दृश्यों में उनका कच्चापन जाहिर हो जाता है। फिल्म के सहयोगी कलाकारों का चुनाव उल्लेखनीय है। उन सभी की मदद से फिल्म रोचक बनती है। ऋषि कपूर और रोनित रॉय अपने किरदारों में फिट हैं।
    इस फिल्म के तीनों किरदारों की एंट्री को करण जौहर ने विशेष तरीके से शूट किया है। पुरानी हिंदी फिल्मों के मुखड़े लेकर नए भाव जोड़े गए हैं और उनकी पर्सनैलिटी जाहिर की गई है। फिल्म के गानों में मौलिकता नहीं है। अन्विता दत्त गुप्तन ने पुराने गीतों के मुखड़े लेकर नए शब्दों से अंतरे बनाए हैं। संगीत में भी यही प्रयोग किया गया है। करण जौहर की इस फिल्म में उनकी पुरानी सपनीली मौलिकता भी लुप्त हो गई है। देश के धुरंधर युवा फिल्मकार की कल्पनाशीलता पर कोफ्त होने से भी क्या होगा? इस फिल्म की पैकेजिंग दर्शकों को थिएटर में ला सकती है।
    एक ही अच्छी बात हुई है कि ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ ने कुछ नई और युवा प्रतिभाओं को बड़े पर्दे पर अपना हुनर दिखाने का मौका दिया है। सचमुच हमें हिंदी फिल्मों में नए चेहरों की तलाश है। भले ही वे फिल्मी परिवारों से क्यों न हों?
निर्देशक-करण जौहर, कलाकार- सिद्धार्थ मल्होत्रा, आलिया भट्ट, वरुण धवन, सगीत-विशाल-शेखर, गीत- अन्विता दत्‍त गुप्‍तन,संवाद-निरंजन आयंगार
**१/२ ढाई स्टार
अवधि-146 मिनट

Friday, September 3, 2010

फिल्‍म समीक्षा : वी आर फैमिली

-अजय ब्रह्मात्‍मज

क्या आप ने स्टेपमॉम देखी है? यह फिल्म 1998 में आई थी। कुछ लोग इसे क्लासिक मानते हैं। 12 सालों के बाद करण जौहर ने इसे हिंदी में वी आर फेमिली नाम से प्रोड्यूस किया है। सौतेली मां नाम रखने से टायटल डाउन मार्केट लगता न? बहरहाल, करण जौहर ने इसे आधिकारिक तौर पर खरीदा और हिंदी में रुपांतरित किया है। इस पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता,फिर भी इसे मौलिक नहीं कहा जा सकता। इसका निर्देशन सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। इसमें काजोल और करीना कपूर सरीखी अभिनेत्रियां हैं और अर्जुन राजपाल जैसे आकर्षक अभिनेता हैं।

हिंदी में ऐसी फिल्में कम बनती हैं, जिन में नायिकाएं कहानी की दिशा तय करती हों। वी आर फेमिली का नायक कंफ्यूज पति और प्रेमी है, जो दो औरतों के प्रेम के द्वंद्व में है। साथ ही उसे अपने बच्चों की भी चिंता है। 21 वीं सदी में तीन बच्चों के माता-पिता लगभग 15 सालों की शादी के बाद तलाक ले लेते हैं। तलाक की खास वजह हमें नहीं बतायी जाती। हमारा परिचय तीनों किरदारों से तब होता है जब तलाकशुदा पति के जीवन में नई लड़की आ चुकी है। पूर्व पत्‍‌नी माया और प्रेमिका श्रेया की आरंभिक भिड़ंत के बाद ही पता चल जाता है कि माया कैंसर से पीडि़त है और उसकी जिंदगी अब चंद दिनों के लिए बची है। सालों को लमहों में जीने की डॉक्टर की सलाह के बाद माया चाहती है कि श्रेया उसके परिवार में आ जाए और बच्चों की जिम्मेदारी संभाल ले। सब कुछ इतना भावुक,अश्रुपूर्ण और मैलोड्रामैटिक हो जाता है कि उनकी परेशानियों से कोफ्त होने लगती है। सुबकते-रोते हुए फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी।

करण जौहर ब्रांड की फिल्में विभ्रम का सृजन करती है। इस फिल्म की कथा भूमि विदेश की है। नाते-रिश्ते और स्त्री-पुरुष संबंध के पहलू विदेशी हैं। भारत के चंद महानगरों में विवाह की ऐसी समस्याओं से दंपति जूझ रहे होंगे, लेकिन मूल रूप से विदेशी चरित्रों और स्थितियों को लेकर बनी यह फिल्म अपने आसपास की लगने लगती है, क्योंकि इसमें हमारे परिचित कलाकार हैं। वे हिंदी बोलते हैं। वी आर फेमिली भारतीय कहानी नहीं है। यह थोपी हुई है। जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर विदेशियों को पीछे खड़ा कर विदेशों में फिल्मांकित इन फिल्मों से करण लगातार हिंदी फिल्मों के दर्शकों को मनोरंजन के विभ्रम में रखने में सफल हो रहे हैं। ंिहंदी सिनेमा के लिए यह अच्छी स्थिति नहीं है।

दो अभिनेता या अभिनेत्री एक साथ फिल्म में आ रहे हों तो दर्शक उनके टक्कर से मनोरंजन की उम्मीद रखते हैं। काजोल और करीना कपूर के प्रशंसक इस लिहाज से निराश होंगे, क्योंकि लेखक-निर्देशक ने उनके बीच संतुलन बना कर रखा है। काजोल और करीना कपूर दक्ष अभिनेत्रियां हैं। दोनों अपने किरदारों को सही ढंग से निभा ले गई हैं। अर्जुन रामपाल को सिर्फ आकर्षक लगना था। शंकर उहसान लॉय का संगीत अब सुना-सुना सा लगने लगा है।

** दो स्टार