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Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, May 29, 2014

अंधेरा है महानगरों की चकाचौंध में-हंसल मेहता


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता और राजकुमार राव की जोड़ी की दूसरी फिल्म ‘सिटीलाइट््स’ आ रही है। पिछले साल की ‘शाहिद’ के लिए दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ‘सिटी लाइट’ का निर्माण महेश भट्ट और फॉक्स स्टार स्टूडियोज ने किया है। ‘सिटीलाइट्स’ में राजकुमार राव राजस्थान के दीपक की भूमिका में हैं, जो आजीविका के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे महानगर में दीपक के सरवाइवल और संघर्ष की यह कहानी छोटे शहरों से सपनों के साथ बडे शहरों में आ रहे लाखों-करोड़ों युवकों की प्रतीकात्मक कहानी है।
    हंसल मेहता से पहले इस फिल्म के निर्देशन के लिए अजय बहल को चुना गया था। उन्होंने ‘शाहिद’  देख रखी थी। उन्हें लगा कि हंसल ‘सिटीलाइट़्स’ की थीम के साथ न्याय कर सकते हैं। ऐसा लग सकता है कि हंसल मेहता ने ही इस फिल्म के लिए राजकुमार राव को चुना होगा। यहां तथ्य उल्टे हैं। राजकुमार राव पहले से फिल्म में थे। बाद में हंसल मेहता को बतौर निर्देशक बुलाया गया।
    ‘शाहिद’ के लिए मिले पुरस्कार से फर्क तो पड़ा है। हंसल बताते हैं, ‘संयोग है कि हम दोनों को पुरस्कार मिले और अब ‘सिटीलाइट्स’ आ रही है। फिल्म इंडस्ट्री और बाकी लोगों के बीच पुरस्कार से साख बढ़ी है। अब हम कुछ और भी काम कर सकते हैं। अभी मेरी चाहत है कि दर्शक यह फिल्म देखने आएं। उनका समर्थन मिलेगा और फिल्म चलेगी, तभी हमलोग बेहतरीन फिल्में ला सकेंगे। खुशी है कि इस फिल्म को समर्थन मिल रहा है। फिल्म के गीत भी लोकप्रिय हो रहे हैं।’
     ‘सिटीलाइट्स’ फिलीपिंस की फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ पर आधारित है। फॉक्स स्टार स्अूडियोज ने महेश भट्ट से आग्रह किया था कि वे इस फिल्म को भारतीय संदर्भ देकर बनाएं। चूंकि फिल्म का कथ्य भारत के लिए भी सामयिक है, इसलिए महेश भट्ट राजी हो गए। उन्होंने अपने कैंप के मशहूर निर्देशकों को यह फिल्म नहीं दी, क्योंकि इस फिल्म का मिजाज रियल और सादा है। उन्होंने हंसल मेहता को फिल्म सौंपी। हंसल मेहता कहते हैं, ‘भट्ट साहब के बारे में अनेक धारणाएं फैली हुई हैं। मुझे उन जैसा साहसी और क्रिएटिव कोई व्यक्ति नहीं दिखता। मुंबई की शूटिंग के दौरान मैं रोजाना उनसे मिलने पहुंच जाता था और रिचार्ज होकर निकलता था। भट्ट साहब ने कहा था कि निर्भीक होकर फिल्म बनाओ। बाकी मैं देख लूंगा। वे सिर्फ आजादी ही नहीं देते। वे आजाद रहने की हिम्मत भी देते हैं।’ हंसल मेहता ‘सिटीलाइट्स’ के बारे में स्पष्ट करते हैं, ‘मैंने मूल फिल्म नहीं देखी है। मैं नहीं चाहता था कि ‘मैट्रो मनीला’ से प्रेरित या प्रभावित हो जाऊं। ‘मैट्रो मनीला’ के आधार पर रितेश शाह ने स्क्रिप्ट लिख ली थी। उस स्क्रिप्ट पर ही मैंने काम किया। मैंने केवल मुख्य किरदारों को हिमाचल प्रदेश से निकाल कर राजस्थान में बिठा दिया।’
    फिल्म के टायटल को हंसल मेहता उचित ठहराते हैं। वे तर्क देते हैं, ‘इस फिल्म के लिए यह टायटल उपयुक्त है। महानगरों की चकाचौंध में अंधेरा पसरा रहता है। रोशनी के बीच रहते हुए भी सभी के मन में अंधेरा है। आप मुंबई शहर को ही लें। ऊंची इमारतों के वासी नीचे झोपड़पट्टियों को नहीं देखते। उनकी नजर दूर समुद्र की लहरों को टटोलती रहती है। देश के छोटे शहरों से लोग महानगरों की चमक-दमक (सिटीलाइट्स) देख कर भागे आते हैं और यहां की अंधेरी गलियों में गुमनाम हो जाते हैं।’
    ‘सिटीलाइट्स’ की शूटिंग राजस्थान के एक गांव में हुई है। शूटिंग से पहले राजकुमार राव और पत्रलेखा कुछ समय के लिए उस गांव में जाकर रहे। उन्होंने स्थानीय लोगों की चाल-ढाल और भाषा सीखी। हंसल मेहता बताते हैं कि इससे काफी फर्क पड़ा, ‘राजकुमार राव हरियाणा के हैं और पत्रलेखा असम की है। फिर दोनों शहरों में रह रहे हैं। जरूरी था कि वे मेरे किरदारों की भाषा, वेशभूषा और व्यवहार को वास्तविक तरीके से पर्दे पर ले आएं। मैंने उन्हें यह मौका दिया कि वे किरदार के अनुसार कुछ सीख-समझ सकें।’

बाक्स
    राजकुमार राव ‘सिटीलाइट्स’ में दीपक की भूमिका को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। फिल्म में दीपक का किरदार उनके देखे-सुने व्यक्तियों से भिन्न और एक हद तक आत्मकेंद्रित है। वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है। उसकी एक ही चिंता है कि वह अपनी बीवी और बेटी को सुरक्षित जिंदगी से सके। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता राजकुमार राव शूटिंग के दरम्यान किसी प्रकार का दबाव नहीं महसूस करते। वे मानते हैं कि अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और गहराई से निभाने की चिंता भर रहती है। मैं यही कोशिश करता हूं कि दर्शकों को परिचित किरदार भी नए रूप-रंग में दिखाऊं। ‘सिटीलाइट्स’ का दीपक ‘शाहिद’ के शाहिद आजमी से स्वभाव और एटीट्यूड में भिन्न है।  
   

Wednesday, May 7, 2014

पत्रलेखा

सिटीलाइट्स की नायिका की भूमिका निभा रही पत्रलेखा शिलांग की हैं। सिटीलाइट्स उनकी पहली फिल्‍म है।

Monday, May 5, 2014

हंसल-राजकुमार की पुरस्कृत जोड़ी की ‘सिटीलाइट्स’


-अजय ब्रह्मात्मज
    ‘शाहिद’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हंसल मेहता और राजकुमार राव की निर्देशक-अभिनेता जोड़ी एक नई फिल्म ‘सिट लाइट्स’ के साथ आ रही है। ‘सिटीलाइट्स’ महानगरों में आजीविका की तलाश में आए छोटे शहरों के विवश लोगों की प्रतिनिधि कहानी है। हंसल मेहता की ‘सिटी लाइट्स’ का नायक राजस्थान के एक छोटे से कस्बे से मुंबई आता है। भट्ट बंधुओं की कंपनी विशेष फिल्म्स के लिए बनी इस फिल्म के निर्माण में फॉक्स स्टार ने सहयोग किया है।
    संयोग ही है कि हंसल मेहता और राजकुमार राव एक साथ आए। पहले इस फिल्म के निर्देशन के लिए अजय बहल का चुनाव किया गया था। निर्माता मुकेश भट्ट से तालमेल नहीं बिठा पाने के कारण अजय बहल फिल्म से अलग हो गए थे। महेश भट्ट ने खुद ‘शाहिद’ देखी थी। उन्हें लगा कि हंसल मेहता ‘सिटी लाइट्स’ की थीम के साथ न्याय कर सकेंगे। यह फिलीपिंस की फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ की आधिकारिक रिमेक है। हिंदी में इसके किरदार स्थानीयता की वजह से बदल गए हैं। फिल्म के लिए राजकुमार राव का चुनाव पहले हो चुका था। वे फिल्म में बने रहे। हंसल मेहता के आने के बाद निर्देशक-अभिनेता की जोड़ी को जल्दी ही एक और मौका मिल गया। हिंदी फिल्मों के इतिहास में देखा गया है कि डायरेक्टर और एक्टर की परस्पर समझदारी के प्रभावशाली परिणाम निकलते हैं। ‘सिटीलाइट्स’ भी ऐसी ही एक फिल्म हो सकती है।
    हंसल मेहता ने टीवी शो से करिअर की शुरुआत की। उनकी पहली फिल्म ‘जयते’ थी, जो सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हो सकी थी। निराश हंसल मेहता अवसाद से गुजरे। फिर दोस्तों ने हिम्मत बंधायी तो उन्होंने मनोज बाजपेयी के साथ ‘दिल पे मत ले यार’ बनायी। यह फिल्म अपनी सोच, प्रकृति और प्रस्तुति में अपने समय से काफी आगे थी। फिल्म बाक्स आफिस पर विफल रही। विफलता के लंबे साए ने हंसल को कमर्शियल सिनेमा की गलीज गलियों में धकेल दिया। सफलता और कुछ कर गुजरने की उम्मीद में हंसल मेहता की कुछ फिल्मों का हश्र बुरा हुआ। हंसल मानते हैं कि वे फिल्में ईमानदार नहीं थीं, इसलिए अच्छी नहीं थीं। हंसल ने एक लंबा मौन धारण किया। वे लगभग निष्क्रिय हो गए। यह आत्ममंथन और अपनी ऊर्जा को सही दिशा देने का वक्त था। पुराने मित्र अनुराग कश्यप ने क्रिएटिव सहारा दिया। अनुराग कश्यप ने ‘जयते’ लिखी थी और वे हंसल के सहायक भी रहे थे। बहरहाल, सोच-विचार और मंथन के बाद ‘शाहिद’ की योजना बनी। उधर राजकुमार राव ने एफटीआईआई से अभिनय का प्रशिक्षण लेने के बाद मुंबई का रुख किया। उन्हें दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा’ से आरंभिक पहचान मिली। ‘रागिनी एमएमएस’ ने उन्हें आम दर्शकों के बीच पहुंचा दिया। छोटी-मोटी भूमिकाएं मिलती रही और वे अपने अभिनय के निशान छोड़ते गए। पिछले साल आई ‘काय पो छे’ और ‘शाहिद’ ने उन्हें जरूरी पहचान के साथ नाम भी दिया।
    ‘शाहिद’ की भूमिका के लिए कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने उनका नाम हंसल मेहता को सुझाया था। मुंबई के वकील शाहिद आजमी की जिंदगी की प्रेरक घटनाओं पर आधारित इस फिल्म ने सुधी दर्शकों को झकझोर दिया। आजादी के सालों बाद भी समाज में मुसलमानों की स्थिति का वास्तविक बयान करती यह फिल्म देश के सामाजिक और राजनीतिक विरोधाभास को जाहिर करती है। इस साल राष्ट्रीय पुरस्कारों में ‘शाहिद’ को श्रेष्ठ अभिनेता और निर्देशक का पुरस्कार मिला है। अब देखना है कि हंसल मेहता और राजकुमार राव की पुरस्कृत जोड़ी ‘सिटीलाइट्स’ में किस मुकाम तक पहुंचती है।
    विदेशों में पुरस्कृत होने के बाद फिल्मों के प्रति वहां के दर्शकों की ललक बढ़ जाती है। आए दिन हमें ऑस्कर से पुरस्कृत फिल्मों की जानकारी मिलती है। पुरस्कृत कलाकार, निर्देशक और तकनीशियनों की अगली फिल्मों के पोस्टर में उनके पुरस्कारों का उल्लेख किया जाता है। अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां पुरस्कृत फिल्मों को संग्रहालय की सामग्री मान लिया जाता है। पोस्टर पर लिखा या बताया नहीं जाता कि यह पुरस्कृत निर्देशक या कलाकार की अगली फिल्म है। ‘सिटीलाइट्स’ के पोस्टर पर अगर हंसल मेहता और राजकुमार राव के पुरस्कारों का उल्लेख किया जाए तो उसे अतिरिक्त वफादार दर्शक मिल सकते हैं।
    ‘सिटीलाइट्स’ माइग्रेशन के शिकार युवा दंपति के सरवाइवल और संघर्ष की उत्तेजक कहानी है। फिल्म के उदास रंग में किरदारों की बेबस जिंदगी का चित्रण यकीनन दर्शकों को द्रवित करेगा।