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Monday, June 19, 2017

बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार – सलमान खान



जंग के पैरोकारों को लगता है, वे बच जाएंगे!...हाहाहा सलमान खान
हॉलीवुड में सुपरमैन और स्‍पाइडरमैन जैसे सुपरहीरो, जिन्‍हें देखने के लिए दुनिया के अधिकांश देशों के दर्शक इंतजार करते होंगे। भारत में खास कर हिंदी दर्शकों को तो सलमान(Sal Man) का इंतजार रहता है। पिछले कुछ सालों से वे अपनी फिल्‍मों की ईदी लेकर दर्शकों के बीच मनोरंजन बांटने आ जाते हैं। उन्‍होंने धीरे-धीरे एक फार्मूला तैयार किया है। वे इस फार्मूले के दायरे के बाहर नहीं जाते। उन्‍होंने अपनी सीमाओं के अंदर ही खूबियां खोज ली हैं और दर्शकों के चहेते बने हुए हैं। इस साल ईद के मौके पर उनकी फिल्‍म ट्यूबलाइट आ रही है। कबीर खान के साथ तीसरी बार उनकी जुगलबंदी नजर आएगी। एक था टाइगर और बजरंगी भाईजान की कामयाबी और तारीफ के बाद ट्यूबलाइट में उनकी जोड़ी फिर से दर्शकों को हंसाने और रुलाने आ रही है। सलमान खान ने झंकार के पाठकों के लिए अजय ब्रह्मात्‍मज से बातें कीं।
- ट्यूबलाइट की रिलीज के मौके पर हिंदी प्रदेशों के दर्शकों को क्‍या बताना चाहेंगे?
0 आप ने नोटिस किया होगा कि पिछले कुछ सालों से मैं वैसी ही फिल्‍में कर रहा हूं, जैसी हम अपने बचपन में देखा करते थे। उन फिल्‍मों के पोस्‍टर भी हमें आकर्षित करते थे। उन फिल्‍मों को देख कर थिएटर से निकलते समय ऐसी फीलिंग आती थी कि हमें भी ऐसा हीरो बनना है। मैा इन दिनों चुन कर वैसी ही फिल्‍में कर रहा हूं। फिल्‍मों का चुनाव इस आधार पर हो रहा है कि स्क्रिप्‍ट सुनते समय ही वह मुझे सारे काम छोड़ कर फिल्‍म शुरु करने का जोश दें। अगर मुझे हीरो और बाकी किरदार पसंद आ जाएं...स्‍क्रीनप्‍ले पसंद आ जाए और अंदरूनी फीलिंग आए कि फिल्‍म देख कर निकलते समय दर्शक खुश दिखें। वे हंस कर निकलें या रो कर निकलें...वे खुश दिल दिखें। या फिर उनकी चाल में मस्‍ती और स्‍वैग हो।- इन फिल्‍मों का उद्देश्‍य भी ध्‍यान में रहता है क्‍या?
0 बिल्‍कुल...अभी अपने लिए फिल्‍में नहीं करता। कोई गोल, कोई मकसद तो हो। फिल्‍म का हीरो लार्जर दैन लाइफ हो...वह अपने इमोशन से हिला दे। लार्जर दैन लाइफ का मतलब केवल यह नहीं होता कि हीरो दस लोगो को उठा कर पटक दे। दिल और दिमाग का ऐसा खेल हो कि साधारण दिख रहा व्‍यक्त्‍िा सभी का दिल जीत ले। परिवार, मोहल्‍ला, समाज और देश के लिए वह कुछ करे। उस पर सभी नाज करें। जिस पर शुरू में भरोसा नहीं रहा हो तो फिल्‍म के अंत तक सभी उस पर यकीन करने लगें। मेरी जिंदगी का सफर ऐसा ही रहा है। मेरी फिल्‍मों का हीरो कुछ-कुछ मेरे जैसा ही होता है।-खास कर बीइंग ह्ययूमन के तहत आप जो कर रहे हैं, उससे आप की छवि बदली है...0 बीइंग ह्यूमन की फिलासफी तो मेरे पैदा होने से पहले की है। मेरे वालिद और मां ने अपने बुजुर्गों से जो सीखा, वही हमें सिखाया। मैं उसे ही कंटीन्‍यू कर रहा हूं। मैंने सिर्फ इतना किया कि उसे एक संगठन का रूप दे दिया। बीइंग ह्यूमन के अस्तित्‍व में आने के पहले लोग हमें खूब बेवकूफ बना के जा रहे थे। लूट रहे थे। उसका बुरा असर यह होता था कि अगले जरूरतमंद की मदद नहीं हो पाती थी। पिछले का गुस्‍सा अगले पर निकलता था और बेकसूर व्‍यक्ति फंस जाता था। हमने छलियों को निकालने के लिए यह चैरीटेबल ट्रस्‍ट आरंभ किया। हम किसी को पैसे नहीं देते। हम स्‍कूलों की मदद कर रहे हैं। अस्‍पतालों को दान देते हैं। व्‍यक्तियों की मदद नहीं करते। अगर कोई शादी के लिए दो लाख मांगता है तो यही कहता हूं कि शादी के लिए अस्‍सी रुपए लेकर जाओ। मेरे माता-पिता की शादी अस्‍सी रुपए में हुई थी।
-ट्यूबलाइट के बिष्‍ट(लक्ष्‍मण और भरत) बंधुओं के बारे में बताएं?
0 दो भाई हैं। उनके मां-बाप नहीं हैं। बड़ा भाई लक्ष्‍मण मंदबुद्धि है। वह इतना सिंपल और सीधा है कि पूरा गांव उसे ट्यूबलाइट समझता है। वह बहुत ही प्‍यारा किरदार है। छोटा भाई उसे अपना हीरो समझता है। दोनों भाइयों के बड़े होने पर उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं। छोटा भाई वास्‍तव में बड़े भाई की तरह केयरिंग हो जाता है। भारत-चीन युद्ध के मौके पर गांव में बहाली चलती है। उसमें छोटा भाई क्‍वालीफाई कर जाता है। बड़ा भाई मतिमंद होने की वजह से नहीं चुना जाता। बड़ भाई अकेला रह जाता है। शुरु में वे इसे सामान्‍य बात मानते हैं कि बोर्डर पर जाना है और लौट आना है। जंग छिड़ जाती है और काफी जवान मारे जाते हैं। छोटा भाई नहीं लौटता। अब बड़ा भाई लक्ष्‍मण अपना यकीन जाहिर करता है कि वह छोटे भाई को ले आएगा। यह उसके पक्‍के यकीन की कहानी है। वह मिन्‍नतें करता है अपने तई कोशिश करता है। वह एक्‍शन में नहीं आता कि भाई को किसी के चंगुल से छुड़ा कर लाएगा। लक्ष्‍मण को यकीन है कि जंग रुकेगी और उसका भाई मौत के मुंह से लौट आएगा। उनके जवान अपने मां-बाप के पास लौट जाएंगे और हमारे जवान अपने भाइयों के पास आ जाएंगे। इसी कहानी में ट्विस्‍ट एंड टर्न और रोलर कोस्‍टर राइड है।
-इसे बजरंगी भाईजान जैसी फिल्‍म ही माना जा रहा है?
0 इमोशनली यह बजरंगी भाईजान से अधिक स्‍ट्रांग है। यह मैच्‍योर, लाइटर और इमोशनली गहरी जड़ों की फिल्‍म है। यह दो भाइयों की कहानी है ऑन स्‍क्रीन, जो ऑफ स्‍क्रीन भी भाई हैं। इसमें एक्टिंग और परफारमेंस नहीं है। भाई के प्रति भाई की फीलिंग है।- आप दोनों फिल्‍म में किस उम्र के बताए गए हैं?
0स्‍क्रीन एज तो है ही नहीं...पचास साल के तो हो चुके हैं। हमलोग तीन-चार के होते हैं। फिर थोड़े बड़े होते हैं और बाद में 26-27 साल के बताए गए हैं। हिंदी फिल्‍मों के हीरो की उम्र नहीं बताई जाती।
-फिल्‍म में दोनों भाइयों के साथ हाने से कोई निजी चुहलबाजी भी पर्दे पर आई है क्‍या?
0 वह तो आ ही जाती है। रियल लाइफ कनेक्‍ट पर्दे पर दिखता है। अभी जो गाना चल रहा है, उसमें हमारी केमिस्‍ट्री दिख रही है। कोई दूसरा एक्‍टर और बड़ा स्‍टार रहता तो वह रियल नहीं लगता। कुछ लोग कह रहे हैं कि भाई को प्रोमोट कर रहा हूं। अरे भाई, भाई-भाई की फिल्‍म है, इसलिए भाई को लिया। एक्‍ट करते समय ऐसी फीलिंग भी आई कि कहीं सचमुच में ऐसा हुआ तो क्‍या होगा...कल्‍पना में वास्‍तविकता का एहसास डरा गया। इस फिल्‍म में सोहैल के होने की वजह से हमेशा लगता रहा कि घर पर ही हैं। यह एक ईमानदार कोशिश है।
-आप ने शुरू में कहा कि यह फिल्‍म देख कर दर्शक निकलें तो आप की तरह बनना चाहें। आप जब बड़ हो रहे थे तो आप किस की तरह होना चाहते थे?
0 ब्रूस ली की फिल्‍में आती थीं तो थिएटर के बाहर झगड़ा हो ही होता था। केकड़ से केकड़ा आदमी भी खुद को ब्रूस ली समझता था। इस फिल्‍म से मैंने सबक लिया कि पर्दे की बात जिंदगी में भी की जा सकती है। मैं लक्ष्‍मण बनना चाहता हूं। मैं आश्‍वस्‍त हूं कि यह फिल्‍म अचेतन रूप से दर्शकों को प्रभावित करेगी। मुश्किलों में आप लक्ष्‍मण होना चाहेंगे। अपने यहां दिलीप कुमार की तरह किसी और ने असर नहीं डाला। मनोज कुमार की देशभक्ति की फिल्‍में मुझे बहुत अच्‍छी लगती थीं। अमिताभ बच्‍चन की मेरे डैड की फिल्‍मों में निभाई एंग्री यंगमैन की भूमिकाएं बहुत पसंद थीं। वह अलग और नया किरदार था। अपनी चाल-ढाल और अदाकारी से एक्‍शन फिल्‍मों में भी खूब जंचे।-चीन की अभिनेत्री जू जू के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 बहुत अच्‍छा। वह चीनी फिल्‍मों के साथ इंटरनेशनल प्रोजेक्‍ट भी कर चुकी हैं। प्रोफेशनल और सुलझी हुई लड़की है। अपनी संस्‍कृति साथ लेकर चलती हैं।
-हिंदी फिल्‍मों और भारतीय समाज में चीन की छवि निगेटिव है। क्‍या आप की...0 हम ने वह टच ही नहीं किया। हम ने वॉर की भी बात नहीं की है।- अभी पूरी दुनिया में जंग सी छिड़ी है। ऐसा लग रहा कि तीसरा  विश्‍वयुद्ध कभी भी हो सकता है... आप कुछ कहना चाहेंगे?
0ऊपर वाला हमें बचाए। कितने बेवकूफ हैं जंग के पैरोकार? क्‍या उन्‍हें नहीं मालूम कि जंग होगी तो सभी मारे जाएंगे। उन्‍हें लगता है कि वे बच जाएंगे...हाहाहा।-आखिरी सवाल, क्‍या ट्यूबलाइट आप की ईदी है दर्शकों के लिए?
0 मेरी यह फिल्‍म देखें और अपना प्‍यार बनाए रखें। ईद के तोहफे के बाद क्रिसमस की गिफ्ट भी ला रहा हूं। हमारा काम एंटेरटेन करना सा है। वहीं करते रहेंगे। यही चाहूंगा कि मेरी फिल्‍म देखने के लिए पूरा परिवार इकट्ठा हो और साथ में फिल्‍म देखे।

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Thursday, July 14, 2016

सलमान का शिष्‍य था मैं - अनंत विढाट




-अजय ब्रह्मात्‍मज
अली अब्‍बास जफर की फिल्‍म सुल्‍तान में गोविंद के किरदार में अनंत विढाट को सभी ने नोटिस किया। ऐसा कम होता है कि किसी पॉपुलर स्‍टार की फिल्‍म में कोई कलाकार सहयोगी किरदार में होने पर भी याद रह जाए। अनंत विढाट का आत्‍मविश्‍वास उनके एंट्री सीन से ही दिखता है।
दिल्‍ली के अनंत विढाट किरोड़ीमल कॉलेज से पढ़े हैं। कॉलेज की ही प्‍लेयर्स सोसायटी में सक्रियता रही। वहीं केवल अरोड़ा के सान्निध्‍य में थिएटर की आरंभिक ट्रेनिंग मिली। उसके पहले एनएसडी से संबंधित थिएटर इन एडुकेशन में भागीदारी की। 13-14 साल की उम्र से अमित का रुझान थिएटर में बढ़ा। कह सकते हैं कि छोटी उम्र से ही मंच पर कुछ करने का शौक रहा। मां-पिता ने हमेशा सपोर्ट किया। पिता ने ही एनएसडी के वर्कशाप की जानकारी दी थी और भेजा था। थिएटर का लगाव ही अनंत को पोलैंड के ग्रोटोवस्‍की इंस्‍टीट्यूट ले गया। वहां उन्‍होंने थिएटर की एक्टिंग सीखी।
लौट कर आए तो कुछ समय तक रंगमंच पर सक्रिय रहने के बाद 2012 में उन्‍हें अली अब्‍बास जफर की ही गुंडे मिली। गुडे के बाद उन्‍हें यशराज फिल्‍म्‍स की मर्दानी मिल गई। और फिर सुल्‍तान...संयोग ऐसा रहा कि अनंत की तीनों फिल्‍में यशराज फिल्‍म्‍स की हैं। अनंत इसे महज इत्‍तेफाक मानते हैं। गुंडे में हिमांशु और मर्दानी में सनी कटियाल की भूमिकाओं के बाद सुल्‍तान में गोविंद के रूप वे सभी की पहचान में आ गए हैं। अनंत स्‍वीकार करते हैं,सचमुच,सुल्‍तान का इंपैक्‍ट हुआ है। अली साहब ने पहले ही कहा था कि वह ऐसा दोस्‍त नहीं होगा जो सिर्फ दिखता है और उसका कोई योगदान नहीं होता। मेरी कोशिश यही रही कि डायरेक्‍टर के पर्सपेक्टिव से किरदार निभा लूं।
गोविंद की एंट्री पर अनंत को ढंग से संवाद दिए गए हैं और कैमरा उनके ऊपर ठहरता है। बस स्‍टैंड पर उनकी एंट्री होती है। अनंत बताते हैं, यह अली सहब की सूझ-बूझ थी कि पहले ही किरदार स्‍थापित हो जाए। बाद में पूरी कहानी सुल्‍तान और आरफा के इर्द-गिर्द हो जाए तो भी गोविंद नाम लेते ही किरदार याद आ जाए। अगर मेरा किरदार लोगों को अच्‍छा लगा और याद रहा तो इसका श्रेय डायरेक्‍टर अली साहब को जाता है।
मर्दानी के बाद अनंत के करिअर में एक गैप आया था। फिल्‍में ढंग की नहीं मिल रही थीं। कोई भी आलतू-फालतू फिल्‍म करने के बजाए अनंत ने धैर्य से काम लिया और सुल्‍तान जैसी फिल्‍म का इंतजार किया। नतीजा सभी के समान है। अनंत का अगला इंतजार आरंभ हो गया है। इस बार उन्‍हें उम्‍मीद है कि जल्‍दी ही बेहतर फिल्‍में मिलेंगी। अनतं मानते हैं,थिएटर से आए हम जैसे एक्‍टर के लिए यह बहुत ही अच्‍छा समय है। मनोज,इरफान और नवाज जैसे एक्‍टर ने एक ऑप्‍शन दिखाया है। हमें पहचान मिल रही है। प्रमुख भूमिकाएं मिल रही हैं। अगर हम किसी से कहें कि की-रोल करना चाहते हैं तो पहले की तरह कोई हंसता नहीं है। हमारी भावनाओं और इच्‍छाओं की कद्र हो रही है। अभी सपोटिंग रोल में आए कैरेक्‍टर और एक्‍टर पर भी सभी का ध्‍यान रहता है। इन दिनों एक सीन के लिए भी विश्‍वसनीय एक्‍टर लिए जा रहे हैं। मैं आशावादी हूं। आगे कुछ अच्‍छा ही देख रहा हूं।
सलमान खान जैसे अति लोकप्रिय स्‍टार के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? अनंत झट से जवाब देते हैं, मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। अपने अनुभवों के बावजूद मैं मानता हूं कि उनके साथ काम करने का विशेष अनुभव रहा। पहले या दूसरे दिन ही उन्‍होंने कहा था कि तुम अच्‍छा दिखोगे तो मैं अच्‍छा दिखूंगा और मैं अच्‍छा दिखूंगा तो तुम अच्‍छे दिखोगे। सुल्‍तान और गोविंद का रिश्‍ता दोस्‍ती का है। सलमान खान और अनंत के रिश्‍ते में तो मैं सीख ही रहा था। शिष्‍य था मैं।

Wednesday, July 6, 2016

फिल्‍म समीक्षा : सुल्‍तान




जोश,जीत और जिंदगी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

अली अब्‍बास जफर ने हरियाणा के बैकड्राप में रेवाड़ी जिले के बुरोली गांव के सुल्‍तान और आरफा की प्रेमकहानी में कुश्‍ती का खेल जोड़ कर नए तरीके से एक रोचक कथा बुनी है। इस कथा में गांव,समाज और देश के दूसरी जरूरी बातें भी आ जाती हैं,जिनमें लड़कियों की जिंदगी और प्रगति का मसला सबसे अहम है। लेखक और निर्देशक अली अब्‍बास जफर उन पर टिप्‍पणियां भी करते चलते हैं। उन्‍होंने शुरू से आखिर तक फिल्‍म को हरियाणवी माटी से जोड़े रखा है। बोली,भाषा,माहौल और रवैए में यह फिल्‍म देसी झलक देती है। एक और उल्‍लेखनीय तथ्‍य है कि सुल्‍तान में नायक-नायिका मुसलमान हैं,लेकिन यह फिल्‍म मुस्लिम सोशल नहीं है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे प्रयास लगभग नहीं हुए हैं। यह हिंदी की आम फिल्‍म है,जिसके चरित्र आसपास से लिए गए हैं। अली अब्‍बास जफर की इस कोशिश की अलग से सराहना होनी चाहिए।
सुल्‍तान गांव का नौजवान है। वह अपने दोस्‍तों के साथ पतंग लूटने और मौज-मस्‍ती करने में खुश रहता है। उसका अजीज दोस्‍त गोविंद है। उनकी अचानक टक्‍कर आरफा से हो जाती है। आरफा अपने एटीट्यूड से सुल्‍तान को प्रभावित करती है। अन्‍य फिल्‍मों की तरह यहां भी सुल्‍तान पहली ही मुलाकात में दिल दे बैठता है। आरफा कुश्‍ती की स्‍टेट चैंपियन है। वह ओलंपिक से गोल्‍ड मेडल लाने का ख्‍वाब पाले बैठी है,जिसमें उसके पिता भी उसके सहयोगी हैं। आरफा शुरू में उसे तरजीह नहीं देती। बाद में वह उसकी दोस्‍त बनने को तैयार हो जाती है। जब उसे पता चलता है कि सुल्‍तान तो उसका दीवाना है तो वह उसे झिरकती है और कुछ ऐसा करने की चुनौती देती है कि वह उसकी इज्‍जत करने लगे। यहां से फिल्‍म कुश्‍ती की थीम पर आ जाती है। आरफा की नजरों में इज्‍जत हासिल करने के लिए सुल्‍तान जी-तोड़ मेहनत करता है। वह स्‍टेट चैंपियन भी बन जाता है। दोनों की शादी होती है। जिंदगी और कुश्‍ती में दोनों रमे हुए हैं। तभी उनकी पारिवारिक जिंदगी में उथल-पुथल होती है। कुछ कड़े फैसले लिए जाते हैं। कहानी में मैलोड्रामा और इमोशन आता है। फिर तो बाकी फिल्‍मों की तरह सुल्‍तान भी एक प्रेमकहानी बन जाती है।

अली अब्‍बास जफर ने कुश्‍ती का इस्‍तेमाल खेल से अधिक सुल्‍तान और आरफा के बीच के संबंधों के मोड़-तोड़-जोड़ में किया है। पूरी फिल्‍म कुश्‍ती के धागे में पिरोयी गई है। खेलों की फिल्‍म में एक अलग किस्‍म का जोश रहता है। हम नायक या नायिका की जिद से जुड़ जाते हैं। उनकी जीत की कामना करते हैं। उनकी हार से दुखी होते हैं। इस संदर्भ में सुल्‍तान की पकड़ उतनी मजबूत नहीं रहती। सलमान खान की अपनी छवि सुल्‍तान के संघर्ष के आड़े आ जाती है। फिल्‍म के एक संवाद में सुल्‍तान की उम्र 20 बतायी जाती है। यह अनावश्‍यक संवाद सलमान खान की असली उम्र नहीं ढक पाता। हालांकि लेखक-निर्देशक ने बड़ी चतुराई से सुल्‍तान के चरित्र निर्वाह में सलमान खान की असली उम्र के फर्क के अहसास से बचने-बचाने की कोशिश की है,लेकिन सलमान की कद-काठी और ऑफ स्‍क्रीन इमेज बाध बनती है।

सलमान खान के स्‍टारडम का पूरा उपयोग हुआ है। इसके बावजूद इस फिल्‍म में सलमान खान अपनी पॉपुलर इमेज से बाहर निकलने में सफल रहे हैं। खास कर दंगल के दांव-पेच के दृश्‍यों में उनकी चपलता और वर्जिश दिखती है। अधिकांश दृश्‍यों में उन्‍होंने चरित्र का साथ निभाया है। अच्‍छी बात है कि उम्रदराज अभिनेता ऐसी चुनौतियों के मुकाबले में सफल हो रहे हैं। नाच-गानों और प्रचलित टोटकों की वजह से अलग भावभूमि पर चल रही सुल्‍तान बार-बार चालू फिल्‍मों की तरफ लौट आती है। पॉपुलर और डिफरेंट के बीच संगत बिठाने में लेखक-निर्देशक की मुश्किलें बढ़ी हैं। इसी वजह से पटकथा समतल नहीं रहती और प्रवाह टूटता है। झटके लगते हैं।
अनुष्‍का शर्मा ने आरफा के किरदार को बखूबी निभाया है। अखाड़े में उनकी फुर्ती और स्‍फूर्ति किरदार के अनुकूल है। सलमान खान के साथ के दृश्‍यों में वह उनके समकक्ष लगती हैं। निश्चित ही उन्‍हें लेख अली अब्‍बास जफर का पूरा सपोर्ट मिला है। आरफा हरियाणा की माडर्न लड़की है,जो अपने करिअर के बारे में अच्‍छी तरह जानती है। वह अपने वजूद से वाकिफ है और अपनी ख्‍वाहिशों की कुर्बानी नहीं देना चाहती। फिर भी एक खास मोड़ पर लड़की होने की वजह से उसे बड़ा फैसला लेना पड़ता है। फिल्‍म उन सवालों पर अटकती नहीं है,लेकिन सवाल छोड़ जाती है। आरफा अपने मिजाज और रवैए से समाज की परिपाटी को तोड़ती है। वहां वह असरदार लगती है। जब मैलोड्रामा और इमोशन में वह रुटीन होन लगती है तो खटकती है। भारतीय समाज में हदें तोड़ती लड़कियों को ऐसे अंतर्विरोधों से गुजरना ही पड़ता है। इस लिहाज से आरफा वास्‍‍तविक किरदार है और अनुष्‍का शर्मा ने अदायगी में वास्‍तविकता का परिख्‍य दिया है।
गौर करें तो इस फिल्‍म में हीरो यानी सलमान खान की एंट्री पर जोर नहीं दिया गया है। हीरोइन और सपोर्टिंग किरदारों की एंट्री याद रह जाती है। भले ही वह सुल्‍तान की दादी ही क्‍यों न हों। सुल्‍तान के दोस्‍त गोविंद की भूमिका में अनंत शर्मा याद रह जाते हैं। अमित साध अपने संश्‍मित अभिनय से प्रभावित करते हैं। बाकी सहयोगी कलाकरों ने अपनी जिम्‍मेदार निभायी है।

अली अब्‍बाय जफर ने सुल्‍तान में किरदारों और दृश्‍यों में देसी भाव और व्‍यवहार को ढंग से पेश किया है। किरदारों के आपसी संबंध और बातों में आई आत्‍मीयता फिल्‍म का प्रभाव बढ़ा देती है। इरशाद कामिल और विशाल-शेखर के गीत-संगीत में फिल्‍म की थीम,किरदारों के इमोशन और पॉपुलर जरूरतों पर समान रूप से ध्‍यान दिया गया है।
अवधि- 168 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार   

Monday, July 4, 2016

ओलंपिक से मिला आइडिया - अली अब्‍बास जफर




अजय ब्रह्मात्मज
अली अब्बास जफर वक्त के साथ और परिपक्व हुए हैं। यशराज बैनर के संग उनका नाता पुराना है। ‘मेरे ब्रद्रर की दुल्हन’, ‘गुंडे’ के बाद अब वे ‘सुल्तान’ लेकर आए हैं। यहां वे इंडस्ट्री के सबसे बड़े सितारे के संग काम कर रहे हैं।
अली बताते हैं, ‘ मैं वक्त के साथ कितना प्रबुद्ध हुआ हूं, यह तो ‘सुल्तान’ व भविष्‍य की फिल्में तय करेंगी। मैं जहां तक अपने सफर को समझ पाया हूं तो मेरे काम में अतिरिक्त ठहराव आया है। मैंने पहली फिल्म ‘मेरे ब्रद्रर की दुल्हन’ महज 27-28 में बना ली थी। उसकी कहानी तो मैंने 26 साल में ही लिख ली थी। तब मैं बुलबुले की भांति था। उस बुलबुले में काफी ऊर्जा थी। उस वक्त मैं अपना सब कुछ देकर फटने को आतुर था। उस फिल्म के चलने की वजह भी यही थी कि मैंने वह फिल्म जिस ऑडिएंस के लिए व जिन कलाकारों के संग बनाई थी, वह जुड़ाव स्‍थापित करने में सफल रही थी। उसमें ऐसे मुद्दे थे, जो तत्कालीन समाज के हालात थे। ‘गुंडे’ के वक्त चुनौतियां थीं। मैंने जिस दौर की कहानी के साथ डील किया था, उस वक्त तो मैं पैदा भी नहीं हुआ था। ऐसी कहानी कह रहा था, जिसमें विभाजन व माइग्रेशन का दर्द था। वहां मैंने पुराने दौर को रीक्रिएट करना सीखा। यह सीखा कि अलग-अलग किरदारों की इतर दिशाओं में चल रही कहानियों को कैसे पिरोया जाए।
‘गुंडे’ के किरदार विक्रम और बाला बतौर मेटाफर मौजूद थे। ‘सुल्तान’ में किरदार ही फिल्म का टाइटिल है। लिहाजा यहां लार्जर दैन लाइफ रोल कैसे गढ़ा जाए, वह सीखा। सितारा, खुद एवं निर्माता को कनविंस करना भी सीखा। वह भी तब, जब स्‍टार आप से हर मामले में बड़ा हो। दिलचस्प चीज यह रही कि बड़े सितारे के साथ काम करना अरेंज मैरेज जैसा है। आप दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते, पर काम साथ करना है। सौभाग्य से सलमान खान को मेरा लिखा हुआ पसंद आया। तभी वे मेरे कनविक्शन के साथ चलते चले गए। कभी डिसकसन हुआ भी तो छोटी-छोटी बातों के लिए। मिसाल के तौर पर भावुक पलों में सुल्तान अगर अश्रुपुरित आंखों की जगह ड्राई खड़ा रहे तो कैसा होगा आदि-इत्यादि। ऐसे में अपार धीरज व संयम रखते हुए ही एक फिल्मकार का विकास मुमकिन है।
    इंडस्‍ट्री एक सेट ढर्रे पर काम करती रही है। वह दुनियावी चीजों को पॉपुलर नजरिए से पेश करती है। एक आदर्श स्थिति पेश करने की कोशिश करती है। अब अली जैसे आउटसाइडर निजी परिवेश व सोच-समझ लेकर एंट्री करते हैं। तो शुरूआती दिनों में इंडस्ट्री के ढर्रे से किस किस्म के टकराव हुए। यह पूछे जाने पर अली कहते हैं, ‘ हिंदुस्‍तान के अंदर भी ढेर सारे हिंदुस्‍तान हैं। सिनेमा इसे भली-भांति समझता है। वह हम जैसों के हिंदुस्‍तान से विभेद नहीं करता। जैसे ‘सु्ल्तान’ का गाना ‘जग घुम्यो’। उसमें एक सीन है, जहां अनुष्‍का अंगीठी ला रजाई ओढे सलमान के हाथ सेंकती है। यह चीज मुंबई के लोगों को पोएट्री किस्म की लग सकती है। कई देहरादून, बिहार, भोपाल के दोस्तों ने कहा भी कि यह क्या है। सलमान सुपरमैन सरीखे हैं। उन्हें ठंड नहीं लग सकती। उन्हें रजाई में क्यों लपेटा। गाने में ही एक और सीन है, जहां अनुष्‍का गोबर के उपले बना रही है। अब एक हार्डकोर मेनस्‍ट्रीम सिनेमा से आई अभिनेत्री अनुष्‍का शर्मा ऐसा करती हुई यकीनी लगे, वह करना चुनौतीपूर्ण रहा। मगर उस प्रॉसेस में काफी कुछ सीखने को मिला। जिन लोगों ने गांव की जिंदगी नहीं देखी है, उनके लिए सलमान-अनुष्‍का का यह अवतार लार्जर दैन लाइफ लगेगा। जो जानते हैं, वे उस चीज से जुड़ाव महसूस करेंगे। यही हमारे सिनेमा की ताकत भी है। हर प्रभावित करने वाली चीज को लोग ब्रह्मा की लकीर सरीखी मान लेते हैं।
    उदाहरणस्‍वरूप ‘रंग दे बसंती’ का कैंडल मार्च तो देश में आंदोलनों का रूपक विद्रोह बन गया। मैं उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था। तब एक चलती वैन में लड़की बलात्कार का शिकार हो गई थी। उसको लेकर पूरा मूवमेंट खड़ा हो गया था। लोग इंडिया गेट पर ‘रंग दे बसंती’ वाले फॉर्म में कैंडल मार्च करने लगे। लोग हैरत में थे। अचानक युवाओं को क्या हो गया। उनके भीतर विद्रोह का लावा कैसे दहकने लगा। तो हमारे सिनेमा में यह ताकत है, जो जन आंदोलन खड़ा कर सकता है।
    ‘सुल्तान’ के निर्माण के पीछे भी यही थॉट प्रॉसेस था। एक ऐसे खेल को फिर से लोकप्रियता की बुलंदियों पर लाया जाए, जो सदियों से हमारी जड़ों में है, मगर वह हाशिए पर है। हम अगर कोलकाता से दिल्ली तक ट्रैवल करें तो बनारस, हरियाणा व अन्य इलाकों में अखाड़ा अनिवार्य रूप से मिलेगा। वह भी जहां गांव की पंचायत लगती है। हमारी मायथोलौजी में मल्ल युद्ध के अनेकानेक उदाहरण भरे पड़े हैं। यूनानियों ने जब हम पर आक्रमण किया तो इंडो-ग्रीक का सम्मलित रूप निकला, जो अलग था। इन बातों से आज की युवा पीढी अनभिज्ञ है। उन्हें इस खेल से अवगत करने के लिए एक बड़े स्‍टार की दरकार थी, जो सिल्वर स्‍क्रीन पर मल्ल युद्ध करे तो युवाओं को लगे कि कुश्‍ती भी कूल स्‍पोर्ट्स है।
       रेसलिंग यहां रूपक है। उसके जरिए यह जाहिर होता है कि परिस्थितियों के समक्ष अपने हथियार मत डालो। उठो, चलो और तब तक चलते रहो, जब तक मंजिल न मिल जाए। ‘सुल्तान’ का ख्‍याल लंदन ओलंपिक में सुशील कुमार के सफर से आया। वे फाइनल में गए थे। हालांकि रजत पदक जीत पाए थे। उसके बाद उनका इंटरव्यू आया था दूरदर्शन पर। उसमें जिन ईमानदारी से उन्होंने अपनी बात रखी। उसमें सिल्वर जीतने से ज्यादा देश के लिए गोल्ड न जीत पाने का गम था। तब मैंने दस पेज की कहानी लिखी। आदित्य चोपड़ा को सुनाई । शुरूआती हिचक के बाद वे मान गए।  उनके बाद सलमान भी इसे करने को एग्री कर गए। यह बातें ‘मेरे ब्रद्रर की दुल्हन’ और ‘गुंडे’ के बीच की हैं। सलमान ने हमारी मुलाकात में कहा कि वे फिलहाल तो ‘प्रेम रतन...’ कर रहे हैं। लिहाजा वे चाहते हैं कि वे जब 50 के हो जाएंगे, तब ‘सुल्तान’ लोगों के बीच आए। इत्तफाकन वे 50 वें साल में हैं और उनकी सिर्फ एक रिलीज आ रही है।
हम लोगों के लिए फख्र की बात यह रही कि उन्होंने इस फिल्म के लिए जितना एफर्ट किया है, उतना किसी फिल्म के लिए नहीं किया। एक टिपिकल पहलवान के लिए जैसा शरीर होना चाहिए, उन्होंने उसे एक्वायर किया। उसके लिए वेट ट्रेनिंग, दांव-पेंच सीखते थे। वह भी सुबह-शाम ढाई-ढाई घंटे। मिट्टी पर भी कुश्ती सीखी और मैट पर भी। उन्होंने पंचिंग-किकिंग और मार्शल आर्ट्स भी सीखे। खुद उन्होंने कहा कि यह उनकी सबसे मुश्किल फिल्म थी। उनके प्रशंसक जब इसे देखेंगे तो यकीनन उनकी सराहना करेंगे।

Thursday, November 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : प्रेम रतन धन पायो



-अजय ब्रह्मात्‍मज
    प्रेम रतन धन पायो सूरज बड़जात्‍या की रची दुनिया की फिल्‍म है। इस दुनिया में सब कुछ सुंदर,सारे लोग सुशील और स्थितियां सरल हैं। एक फिल्‍मी लोक है,जिसमें राजाओं की दुनिया है। उनके रीति-रिवाज हैं। परंपराओं का पालन है। राजसी ठाट-बाट के बीच अहंकार और स्‍वार्थ के कारण हो चुकी बांट है। कोई नाराज है तो कोई आहत है। एक परिवार है,जिसमें सिर्फ भाई-बहन बचे हैं और बची हैं उनके बीच की गलतफहमियां। इसी दुनिया में कुछ साधारण लोग भी हैं। उनमें प्रेम दिलवाला और कन्‍हैया सरीखे सीधे-सादे व्‍यक्ति हैं। उनके मेलजोल से एक नया संसार बसता है,जिसमें विशेष और साधारण घुलमिल जाते हैं। सब अविश्‍वसनीय है,लेकिन उसे सूरज बड़जात्‍सा भावनाओं के वर्क में लपेट कर यों पेश करते हैं कि कुछ मिनटों के असमंजस के बाद यह सहज और स्‍वाभाविक लगने लगता है।
    सूरज बड़जात्‍या ने अपनी सोच और अप्रोच का मूल स्‍वभाव नहीं बदला है। हां,उन्‍होंने अपने किरदारों और उनकी भाषा को माडर्न स्‍वर दिया है। वे पुरानी फिल्‍मों की तरह एलियन हिंदी बोलते नजर नहीं आते। हालांकि शुरू में भाषा(हिंग्लिश) की यह आधुनिकता खटकती है। सूरज बड़जात्‍या दर्शकों को आकर्षित करने के बाद सहज रूप में अपनी दुनिया में लौट आते हैं। फिल्‍म का परिवेश,भाषा,वेशभूषा और साज-सज्‍जा रजवाड़ों की भव्‍यता ले आती है। तब तक दर्शक भी रम जाते हैं। वे प्रेम के साथ राजसी परिवेश में खुद को एडजस्‍ट कर लेते हैं। सूरज बड़जात्‍या के इस हुनरमंद शिल्‍प में रोचकता है। याद नहीं रहता कि हम ने कुछ समय पहले सलमान खान की दबंग,बॉडीगार्ड और किक जैसी फिल्‍में देखी थीं। सूरज बड़जात्‍या बहुत खूबसूरती से सलमान को प्रेम में ढाल देते हैं।
    प्रेम रतन धन पायो का रूपविधान का आधार रामायण है। फिल्‍म की कथाभूमि भी अयोध्‍या के आसपास की है। रामलीला का रसिक प्रेम राजकुमारी मैथिली के सामाजिक कार्यो से प्रभावित है। वह उनके रूप का भी प्रशंसक है। वह उनके उपहार फाउंडेशन के लिए चंदा एकत्रित करता है। वह चंदा देने और मैथिली से मिलने अपने दोस्‍त कन्‍हैया के साथ निकलता है। घटनाएं कुछ यों घटती हैं कि उसे नई भूमिका निभानी पड़ती है। अपनी प्रिय राजकुमारी के लिए वह नई भूमिका के लिए तैयार हो जाता है। हम देखते हैं कि वह साधारण जन के कॉमन सेंस से राज परिवार की जटिलताओं को सुलझा देता है। वह उनके बीच मौजूद गांठों को खोल देता है। वह उन्‍हें उनके अहंकार और स्‍वार्थ से मुक्‍त करता है। कहीं न कहीं यह संदेश जाहिर होता है कि साधारण जिंदगी जी रहे लोग प्रेम और रिश्‍तों के मामले में राजाओं यानी अमीरों से अधिक सीधे और सरल होते हैं।
    प्रेम रतन धन पायो का सेट कहानी की कल्‍पना के मुताबिक भव्‍य और आकर्षक है। सूरज बड़जात्‍या अपने साधारण किरदारों को भी आलीशान परिवेश देते हैं। उनकी धारणा है कि फिल्‍म देखने आए दर्शकों को नयनाभिरामी सेट दिखें। लोकेशन की भव्‍यता उन्‍हें चकित करे। इस फिल्‍म का राजप्रासाद और उसकी साज-सज्‍जा में भव्‍यता झलकती है। रियल सिनेमा के शौकीनों को थोड़ी दिक्‍कत हो सकती है,लेकिन हिंदी सिनेमा में मनोरंजन का यह एक प्रकार है,जिसे अधिकांश भारतीय पसंद करते हैं। सूरज बड़जात्‍या की फिल्‍मों में नकारात्‍मकता नहीं रहती। इस फिल्‍म में उन्‍होंने चंद्रिका के रूप में एक नाराज किरदार रखा है। राजसी परिवार से जुड़ी होने के बावजूद वह सामान्‍य जिंदगी पसंद करती है,लेकिन अपना हक नहीं छोड़ना चाहती। सूरज बड़जात्‍या अपनी फिल्‍म में पहली बार समाज के दो वर्गों के किरदारों को साथ लाने और सामान्‍य से विशेष को प्रभावित होते दिखाते हैं। यह कहीं न कहीं उस यथार्थ का बोध भी है,जो वर्तमान परिवेश और माडर्निटी का असर है।
    हिंदी फिल्‍मों में सिर्फ मूंछें रखने और न रखने से पहचान बदल जाती है। इस फिल्‍म के अनेक दृश्‍यों में कार्य-कारण खोजने पर निराशा हो सकती है। तर्क का अभाव दिख सकता है,लेकिन ऐसी फिल्‍में तर्कातीत होती हैं। प्रेम रतन धन पायो सूरज बड़जात्‍या की फंतासी है। सलमान खान प्रेम और विजय सिंह की दोहरी भूमिकाओं में हैं। उन्‍होंने दोनों किरदारों में स्क्रिप्‍ट की जरूरत के मुताबिक एकरूपता रखी है। हां,जब प्रेम अपने मूल स्‍वभाव में रहता है तो अधिक खिलंदड़ा नजर आता है। सोनम कपूर की मौजूदगी सौंदर्य और गरिमा से भरपूर होती है। भावों और अभिव्‍यक्ति की सीमा में भी वह गरिमापूर्ण दिखती हैं। सूरज बड़जात्‍या ने उनकी इस छवि का बखूबी इस्‍तेमाल किया है। नील नितिन मुकेश के किरदार को अधिक स्‍पेस नहीं मिल सका है। स्‍वरा भास्‍कर अपने किरदार को संजीदगी से निभा ले जाती हैं। उनका आक्रोश वाजिब लगता है। अनुपम खेर लंबे समय के बाद अपने किरदार में संयमित दिखे हैं।
    गीत-संगीत फिल्‍म में दृश्‍यों और किरदारों के अनुरूप है। दो गानों अधिक हो गए हैं। उनके बगैर भी फिल्‍म ऐसी ही रहती। इस बार अंताक्षरी तो नहीं है,लेकिन उसकी भरपाई के लिए फुटबॉल मैच है।
अवधि- 174 मिनट
स्‍टार- साढ़े तीन स्‍टार  

परिपक्‍व हुआ प्रेम - सलमान खान

-अजय ब्रह्मात्‍मज
सूरज बड़जात्‍या और सलमान खान का एक साथ आना हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री की बड़ी खबर है। सलमान खान को सुरज बड़जात्‍या की फिल्‍म मैंने प्‍यार किया से ही ख्‍याति मिली थी। उनकी  फिल्‍म हम आपके हैं कौन में भी सलमान खान थे,जो पांच सालों तक सिनेमाघरों में टिकी रही। फिर हम साथ साथ हैं में दोनों साथ आए। उसके बाद एक लंबा अंतराल रहा। सूरज बड़जात्‍या अपनी कंपनी को मजबूत करने में लगे रहे और सलमान खान मसाल फिल्‍मों में अपनी मौजूदगी मजबूत करते रहे। दो साल पहले खबर आई कि सूरज बड़जात्‍या और सलमान खान साथ काम करेंगे? इस खबर से सभी चौंके,क्‍योंकि ऐसा लग रहा था कि इस बीच सलमान खान की लोकप्रियता का कद विशाल हो गया है। क्‍या वे सूरज बड़जात्‍या की सीधी-सादी पारिवारिक कहानी में जंचेंगे। कुछ तो यह भी मान रहे थे कि दोनों की निभेगी नहीं और यह फिल्‍म पूरी नहीं हो पाएगी। फिल्‍म में समय लगा। बीच में व्‍यवधान भी आए। प्रशंसकों की सांसें अटकीं। बाजार और ट्रेड के पंडित भी अनिश्चित रहे। लेकिन अब सब क्‍लीयर हो चुका है। पिछले कुछ समय से सलमान खान प्रेम रतन धन पायो का धुआंधार प्रचार कर रहे हैं। मुंबई के महबूब स्‍टूडियो को उन्‍होंने अड्डा बना रख है। सलमान की छवि तुनकमिजाज और अधीर व्‍यक्ति की है। किंतु वह एक दृष्टिकोण है। यहां वे पूरे संयम और शालीनता के साथ मीडिया और प्रशंसकों से घुलते-मिलते नजर आए। सलमान कहीं भी रहें,कुछ भी कर रहे हों,उन्‍हें देखने और उनसे मिलने वालों की भीड़ आ ही जाती है।सलमान उन्‍हें निराश नहीं करते। अपनी व्‍यस्‍तता के बीच उनके लिए मुस्‍कराते हैं। सेल्‍फी और तस्‍वीरें खिंचवाते हैं। सलमान मिश्री की डली की तरह हैं,वे जहां रहते हैं वहां उनके प्रशंसक चींटियों की तरह आ जाते हैं।
    इस बातचीत में सलमान खान से नियमित सवाल नहीं किए गए और न उन्‍होंने किसी खास फ्रेम में बात की। जागरण के लिए उन्‍की इस अबाध बातचीत में एक अलग किस्‍म का प्रवाह मिलेगा। हम-आप उनकी सरलता से परिचित होंगे। निस्‍संदेह सलमान खान अपनी पीढ़ी के सुपरस्‍टार हैं। उनकी पिछली फिल्‍मों ने एक दबंग छवि भी विकसित की है,जिसे बजरंगी भाईजान ने कुछ नरम किया। उनकी यह नरमी प्रेम रतन धन पायो में और कोमल हो गई है।
सलमान खान के शब्‍दों में....
सूरज और मैं
       मेरे लिए सूरज बड़जात्‍या की इस फिल्‍म का आना खास है। सूरज की फिल्‍मों में लोगों का विश्‍वास है। उनके प्रति दर्शकों की श्रद्धा है। उन्‍होंने 19 साल की उम्र में उन्‍होंने मैंने प्‍यार किया जैसी रोमांटिक फिल्‍म बनाई। उसमें न तो किसिंग सीन था और न कोई वल्‍गैरिटी थी। कोई एक्‍सपोजर भी नहीं था। 24 साल की उम्र में उनकी हम आपक हैं कौन रिलीज हुई। अभी सोच कर देंखें कि क्‍या 24 साल का लड़का वैसी फिल्‍म लिख सकता है ? ‘मैंने प्‍यार किया के बाद उसी टाइप की फिल्‍म आनी चाहिए थी। 22 साल की उम्र में उन्‍होंने लिखी होगी और 24 की उम्र में फिल्‍म पूरी की। उस वक्‍त हम आके हैं कौन की स्क्रिप्‍ट सुनने के बाद मुझे कॉम्‍प्‍लेक्‍स हो गया था। तब हम बागी सोच रहे थे। और इस आदमी का कैसा ग्रोथ हुआ कि छलांग लगा रहा है। परिवार के बारे में यह कितना जानता है ? यह मुमकिन नहीं था। यहं ऊंची आत्‍माओं के साथ ही हो सकता है। उसके बाद हम साथ साथ हैं आई। तब मैंने कहा था कि यह फिल्‍म हम आपके हैं कौन से हर मामले में आगे है। एक ही समस्‍या है कि हम आपके हैं कौन के पांच साल चलने के बाद छठे साल में यह फिल्‍म आ रही है। लोगों को ऐसा लगेगा कि यह उसी का विस्‍तार है। अगर यह हम आपके हैं कौन के पहले आ जाती तो सिनेमाघ्‍रों से उतरती ही नहीं। उसके बाद उन्‍हें मेरे लिए इस टाइप की फिल्‍म नहीं मिली। मैंने मैं प्रेम की दीवानी हूं और विवाह की स्क्रिप्‍ट सुनी थी। मैं पहला व्‍यक्ति था। तब हमें लगा कि हमें इन फिल्‍मों में साथ नहीं आना चाहिए।

गैप की वजह
    हम दोनों को मनमाफिक स्क्रिप्‍ट नहीं मिल पा रही थी। सूरज बामू के पास तब इस फिल्‍म का आयडिया भर था। सात-असठ साल पहले उन्‍होंने इस पर काम करना शुरू किया। मुझे सुनाया और बताया। कहानी आखिरकार पक्‍की हुई तो उन्‍होंने डेढ़ साल में इसकी रायटिंग की तो मैंने सेकेंड भर में हां कह दिया। हां कहने के बाद मैं किक और जरंगी भाईजान में व्‍यस्‍त हो गया। उन फिल्‍मों से खाली होने के बाद लौटा और आज यह फिल्‍म पूरी हो गई। दोनों ने धैर्य रखा। मुझ से ज्‍यादा सूरज बाबू ने धैर्य बनाए रखा।
घरेलू और पारिवारिक
    सूरज बाबू की फिल्‍मों में भारतीय घर और परिचार की सही तस्‍वीर आती है। घर और संयुक्‍त परिवार के माहौल को वे अच्‍छी तरह समझते हैं।पारिवारिक मूल्‍य फिल्‍म के दृश्‍यों में घुल कर आते हैं। संवादों में हर घर की बातचीत रहती है। मैंने महसूस किया है कि ऐसे संवाद तो मेरी मां,डैड और भाई बोलते हैं। सूरज बाबू भी बताते हैं कि उनकी चाची या किसी और रिश्‍तेदार ने कभी ऐसी बात कही थी। हम अपन फिल्‍मों में सुनी और देखी निगेटिव बातों को भी पॉजीटिव कर देते हैं। हमारा हर रेफरेंस परिवारों से आता है। सूरज बाबू में इतनी सच्‍चाई और मासूमियत है कि वे कोई भी कहानी गढ़ सकते हैं। आप उनकी फिल्‍म कभी भी देख सकते हैं। इन्‍होंने सेक्‍स और वल्‍गैरिटी का कभी इस्‍तेमाल नहीं किया,जबकि देश के बड़े से बड़े डायरेक्‍टर इनसे बच नहीं पाए। उनकी हीरोइन की एक डिग्निटी रहती है। सेट और स्‍क्रीन पर वह डिग्निटी दिखती है। सूरज बाबू के हीरो हीरोइन की सूरत से नहीं,सीरत से प्‍यार करते हैं। उनकी हीरोइनों को रियल लाइफ में भी देखेंगे तो एक स्‍माइल आता है। इनकी फिल्‍मों में नॉटी रोमांस रहता है। जैसे कि गुलेल मारना....इनकी फिल्‍में अच्‍छा बनने को विवश करती हैं। कम से कम इच्‍छाई का एहसास तो भर ही देती हैं।

सूरज बाबू
    सूरज और मैं एक ही उम्र के हैं। मैं उन्‍हें सूरज बाू बुलाता हूं। मैंने ही उनका यह नाम रखा। उसका भी एक किस्‍सा है। मैंने प्‍यार किया के आउटडोर के समय मैंने उन्‍हें इस नाम से बुलाना शुरू किया। मुझे मालूम था कि ये क्‍या बना रहे हैं ? उनके सच,साहस और स्प्रिचुअल लेवल की मुझे जानकारी थी। मुझे एहसास हो गया था कि मैंने प्‍यार किया के बाद वे बड़े नाम हो जाएंगे। उस वक्‍त उनके सारे असिस्‍टैंट उनसे काफी बड़े थे। वे सभी उन्‍हें सूरज,सूरज,सूरज कह कर बुलाते थे। वे तू-तड़ाक करते थे। मुझे यह बुरा लगता था। मुझ से बर्दाश्‍त नहीं होता था। मैंने उन्‍हें सूरज बाबू बुलाना शुरू किया। फिर तो दो दिनों के अंदर वे सभी के सूरज बाबू हो गए। अब सोहेल और अरबाज मुझे सलमान भाई बुलाते थे,इसलिए वे मुझे सलमान भाई पुकारने लगे। इस तरह हम भाई और बाबू हो गए।

सेट पर हम दोनों
    मैं देर से सोता हूं और थोड़ी देर से जागता हूं। सूरज बाबू जल्‍दी सोते और जल्‍दी जागते हैं। सेट पर यही रुटीन रहता था कि वे आकर मुझे जगाते थे। वे सीन सुनाते थे। उस दिन के सीन के आगे-पीछे के भी सीन सुनाते थे कि मैं सही रेफरेंस समझ सकूं। बस बातचीत के दरम्‍यान शॉट लग जाता था। मैं तैयार होकर सेट पर आता था और शॉट देता था। सूरज बाबू का काम पक्‍का होता है। शूट पर जाने के पहले दिन से पहले ही सब ठोक-बजा कर वे परफेक्‍ट कर देते हैं। सिर्फ लाइटिंग में जो समय लगे। शॉट बताने,समझाने और लेने में कोई समय नहीं लगता था। हमलोंग तो सेट पर हंसी-मजाक भी करते हैं। तफरीह भी करते हैं। यह आदमी सुबह से शाम तक वहां से हटता नहीं है। बैठते भी नहीं थे। या तो खड़े हैं या टहल रहे हैं। मैं दूर से देख कर हाथ से कोई इशारा कता थ तो वहीं से थम्‍स अप साइन देकर हौसला देते थे। बाकी डायरेक्‍टर के यहां इतनी तैयारी नहीं रहती तो मुझे बताना और समझाना पड़ता है,जिसे लोग मेरा इंटरफेरेंस कहते हैं।

मतभेद नही रहता
    कभी-कभी मैं पूछता हूं कि सूरज बाबू लाइल बदल दूं। वे पूछते हैं। लाइन पसंद अा गई तो हां कह देते हैं। नहीं तो कहते हैं कि लाइन तो यही रहेगी। मैं तो अपनी लाइन सिर्फ वहीं देख रहा हूं,जबकि वे उसके आगे-पीछे के रेफरेंस भी जाते हैं। हमारी यही कोशिश रहती है कि एक ही पेज पर रहें। कभी एकाध शब्‍द बदल दिए सुविधा के लिए तो वे मान लेते हैं।

फिल्‍म का भाव
    रोमांस और फैमिली। लड़कों को अक्ष्‍छी लड़कियां मिलें और लड़कियों को अच्‍छे लड़के मिलें1 सभी प्रेम बनना चाहें। अगर आप प्रेम बन गए तो आपकी लाइफ में आई लड़की की जिंदगी संवर जाएगी। और यह संदेश है कि लड़ने-झगड़ने से कया फायदा। साथ रहो और साथ जियो। अगर भाई-बहन या भाई-भाई के बीच प्रॉब्‍लम है तो उसे तुरंत सुलझाना चाहिए। झगड़ने के दिन ही नहीं सुलझाया जाए तो गात पेंचीदा और गहरी हो जाती है। मामला खींच जाता है। फिर एक-दूसरे पर दोष और आरोप लगने लगते हैं। अरे यार...फोन उठाओ और बात कर लो ना। एक सेकेंड में जो बात सुलझााई जा सकती है,उसे लोग जिंदगी भर उलझाए रखते हैं। इस फिल्‍म में भी फैमिली और रिश्‍ते पर जोर दिया गया है। यह हम सभी के घर की कानी है। घर के इमोशन पूरी दुनिया में एक जैसे हैं। हम त्‍योहार क्‍यों मनाते हैं ? एक साथ रहने,खाने और मिलने के लिए।
स्‍वरा और नील नितिन
    मैंने स्‍वरा की कोई फिल्‍म नहीं देखी है। मैंने उसे यहीं काम करते देखा है। जबान साफ होना... किसी के भी परफारमेंस में इसका बड़ा रोल होता है। उसकी जबान साफ है। उसका अमोश करेक्‍ट रहता है। सीन की अंडरस्‍टैंडिंग गजब की रहती है और वह उसे पर्सनल टच देती है। वह परफार्म नहीं करती है। वह अपनी जिंदगी से ले आती है। वह कैलकुलेट नहीं करती। नील बहुत ही अच्‍छा लड़का है। वह सुलझा हुआ लड़का है। पता नहीं क्‍यों वह लो फेज में है। लो फेज में होने के बावजूद उसने अपना खयाल रखा है। वह सज्‍जन परिवार का लड़का है। उसके काम में ईमानदारी झलकती है।

मैसेज नण्‍ कलाकारों के लिए
जरूरी है कि आप में टैलेंट हो,लेकिन उसके साथ ही हार्ड वर्किंग भी होनी चाहिए। हसर्ड वर्क से नोटैलेंट को टैलेंट में बदला जा सकता है। लोग मुझे कहते हैं कि इम्‍प्रूव हो गया। ओ भैया,अब नहीं होंगे तो कब होंगे। किसी भी काम में 2000 घंटे लगा दो तो एक्‍सपर्ट तो हो ही जाओगे। हम ने तो न जाने कितने हजार डाले हैं।

Friday, September 11, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हीरो

-अजय ब्रह्मात्‍मज
पैकेजिंग और शोकेसिंग नए स्‍टारों की
हीरो
    1983 में सुभाष घई की फिल्‍म हीरो आई थी। सिंपल सी कहानी थी। एक गुंडा टाइप लड़का पुलिस कमिश्‍नर की बेटी को अगवा करता है। लड़की की निर्भीकता और खूबसूरती उसे भती है। वह उससे प्रेम करने लगता है। लड़की के प्रभाव में वह सुधरने का प्रयास करता है। कुछ गाने गाता है। थोड़ी-बहुत लड़ाई होती है और अंत में सब ठीक हो जाता है। जैकी हीरो बन जाता है। उसे राधा मिल जाती है। था और है मैं फर्क आ जाता है। 2015 की फिल्‍म में 32 सालों के बाद भी कहानी ज्‍यादा नहीं बदली है। यहां सूरज है,जो राधा का अपहरण करता है। और फिर उसके प्रभाव में बदल जाता है। पहली फिल्‍म का हीरो जैकी था। दूसरी फिल्‍म का हीरो सूरज है। दोनों नाम फिल्‍म के एक्‍टर के नाम पर ही रखे गए हैं1 हिरोइन नहीं बदली है। वह तब भी राधा थी। वह आज भी राधा है। हां,तब मीनाक्षी शेषाद्रि राधा थीं। इस बार आथिया शेट्टी राधा बनी हैं।
    तात्‍पर्य यह कि 32 सालों के बाद भी अगर कोई फिल्‍मी कहानी प्रासंगिक हो सकती है तो हम समझ सकते हैं कि निर्माता,निर्देशक और उनसे भी अधिक दर्शकों की रुचि में कितना बदलाव आया है और वह कैसा बदलाव है ? नई हीरो का मुख्‍य उद्देश्‍य सूरज पंचोली और आथिया शेट्टी की शोकेसिंग करना है। बताना है कि वे हिंदी फिल्‍मों के लिए कितने मुफीद हैं। वे दोनों सलमान खान की पसंद हैं। सलमान खान ने उन्‍हें सही मंच देने के लिए हर प्रयत्‍न किया है। उनके लिए गाना भी गाया है। स्‍वाभाविक है वे सूरज और आथिया की तारीफ करें। निखिल आडवाणी के लिए अवश्‍य बड़ी चुनौती रही होगी। उन्‍हें फिल्‍म इंडस्‍ट्री के दो नवोदितों को स्‍थापित करना है। दोहरा दबाव है कि उन्‍हें मूल फिल्‍म के मैदान में ही रहना है और सलमान खान की अपेक्षाओं पर खरा उतरना है।
    फिल्‍म के पहले फ्रेम से ही बता दिया जाता है कि फिल्‍म का हीरो सूरज पंचोली अच्‍छी कद-काठी का माडर्न युवक है। वह है तो गुंडा,लेकिन दिन का नेक है। जरूरतमंदों की मदद करता है। बॉडी बनाना उसका शगल और शौक है,जो अच्‍छा बनने के दौरान पेशा बन जाता है। हिंदी फिल्‍मों में स्‍टार बनने के लिए एटीट्यूड चाहिए। अभिनय अभी प्राथमिकता नहीं है। आप पर्दे पर कैसे दिखते हैं ? फाइट और डांस में कैसे हैं? आप की जींस की फिटिंग कैसी है ? हिंदी फिल्‍मों के हीरो की यही शर्तें हैं। इस लिहाज से सूरज निराश नहीं करते। उनकी अच्‍छी पैकेजिंग की गई है। उनकी बॉडी आज के किसी भी पॉपुलर स्‍टार से कमतर नहीं है। वे रितिक रोशन और शाहिद कपूर की तरह डांस कर सकते हैं। फाइट सीन में वे लात और मुक्‍का मारने में जेन्‍यून लगते हैं। नवोदित स्‍टार से पहली ही फिल्‍म में इमोशन,ड्रामा और एक्‍सप्रेशन की उम्‍मीद करना थोड़ी ज्‍यादती होगी। दस-बारह फिल्‍मों के बाद वह सब आ जाएगा। चल गए तो वैसे भी उन पर कौन गौर करेगा ? हिंदी का उच्‍चारण सही नहीं है तो भी क्‍या फर्क पड़ता है ?
          आथिया शेट्टी को भी करीने से पेश किया गया है। बताया गया है कि वह भी आज की हिरोइनों के समान नाच-गा सकती हैं। हीरो की बांहों में उछल-कूद सकती हैं। सीन की जरूरत के मुताबिक एटीट्यूड दिखा सकती हैं। हां,आथिया पर उतनी मेहनत नहीं की गई है और न ध्‍यान ही रखा गया है। फिर भी पूरी फिल्‍म दोनों की खूबियों को बताने और कमियों को छिपाने के हिसाब से रची गई है। निखिल ने सौंपी गई जिम्‍मेदारी निभाई है। कह सकते हैं कि उन्‍होंने अपना काम ढंग से कर दिया है।
    2015 की हीरो में 1983 की हीरो की मासूमियत और मधुरता नहीं है। नई फिल्‍म देखते समय अगर कानों में परानी बांसुरी बजती रही तो दिक्‍कत हो सकती है। तब राधा ने कहा था तू मेरा हीरो है,अब सूरज कह रहा है मैं हूं हीरो तेरा। इस हीरो का संगीत भी स्क्रिप्‍ट की तरह कमजोर है। कुछ खासियतें छूट गई हैं तो उनका क्‍या रोना। निखिल आडवाणी ने आज के दर्शकों के लिए सलमान खान की इच्‍छा के मुताबिक एक फिल्‍म बनाई है,जिसमें सूरज पंचोली और आथिया शेट्टी को पेश किया गया है। कोशिश है कि वे हर तरह से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के लायक लगें।
अवधि-131 मिनट
स्‍टार ** ½ ढाई स्‍टार

Friday, July 17, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बजरंगी भाईजान

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ को देखने के कई तरीके हो सकते हैं। पॉपुलर स्टार सलमान की फिल्में समीक्षा से परे होती हैं। खरी-खोटी लिखने या बताने से बेहतर होता है कि फिल्मों की अपील की बातें की जाएं। सलमान खान की खास शैली है। एक फॉर्मूला सा बन गया है।
 ‘वांटेड’ के बाद से उनकी फिल्मों में इसी का इस्तेमाल हो रहा है। निर्देशक बदलते रहते हैं, लेकिन सलमान खान वही रहते हैं। बात तब अलग हो जाती है, जब उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत निर्देशक कबीर खान मिल जाते हैं। मनोरंजन के मसाले मेे मुद्दा मिला दिया जाता है। स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। कबीर खान ने बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती। ‘बजरंगी भाईजान’ बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं। सद्प्रभाव होता है तो ‘बजरंगी भाईजान’ का स्पष्ट संदेश है कि दोनों देशों की जनता नेकदिल और मानवीय हैं।
         पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी मध्यवर्गीय हिंदू परिवार में पला भोंदू किस्म का लड़का है। हांख्वह बजरंग बली का भक्त और सच्चा एवं ईमानदार लड़का है। उसके पिता कुछ कमाने के उद्देश्य से उसे दिल्ली जाने की सलाह देते हैं। दिल्ली पहुचने पर पवन की मुलाकात रसिका से होती है। दोनों के बीच स्वाभाविक प्रेम होता है। इस बीच एक गूंगी बच्ची भी उसके जीवन में आ जाती है। भटकी लड़की को उसके मां-बाप से मिलाने की कोशिश में बजरंगी गहरे फंसता जाता है। कहानी आगे बढ़ती है और पता चलता है कि बच्ची तो पाकिसतन की है। सरल स्वभाव का पवन उसे पाकिस्तान में उसके घर पहुंचाने की ठान लेता है। इसके बाद फिल्म में तेजी से मोड़ आते हैं। कई बार तर्क और कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता। लेखक-निर्देशक जल्दी से अपने ध्येय तक पहुंचना चाहते हैं। वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोरना चाहते हें। इसमें उनकी सहायता पाकिस्तानी टीवी रिपोर्टर चांद करता है। फिल्म जब खत्म होती है तो सभी की आंखें नम होती हैं। गूंगी बच्ची जिसे पवन मुन्नी कहता है और जो अपने मां-बाप की शाहिदा है, उसकी अंतिम पुकार दर्शकों को हिला देती है।
        ‘बजरंगी भाईजान’ हिंदी सिनेमा के इतिहास की उन चंद फिल्मों में से एक होगी, जिसमें पाकिस्तान को दुश्मन देश के तौर पर नहीं दिखाया गया है। देशभक्ति के नाम पर गालियां नहीं दी गई हैं। उन धरणाओं के प्रसंग हैं, जिनसे गलतफहमियां जाहिर होती हैं। दोनों देशों के शासकों और राजनीतिक शक्तियों ने इस वैमनस्य का बढ़ाया है। ‘बजरंगी भाईजान’ मानवीय और सौहार्दपूर्ण तरीके से उन धारणाओं को छेड़ती है। गलतफहमियां दोनों तरु से हें। भारत में रहते हुए हम अपनी कमियों से परिचित होते हैं और पाकिस्तान पहुंचने पर वहां मौजूद गलतफमियों से रूबरू होते हैं। पवन की तरह ही भोंदू टीवी रिपोर्टर की इंसानियत जागती है। बजरंगी में भाईजान लफ्ज जुड़ता है और हम देखते हैं कि कैसे दिल पिघलते हैं। सरहद पर खींची कंटीले तारों के बीच बने फाटक के दरवाजे खुलते हें। ‘बजरंगी भाईजान’ दोनों देशों को करीब लाने का नेक प्रयास करती है। 
          कलाकारों में हर्षाली मल्होरत्रा अपनी मासूमियत से दिल जीत लेती है। वह गूंगी है, लेकिन आंखें और चेहरे से प्रेम का इजहार करती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की मौजूदगी फिल्म को आगे बढ़ाने के साथ रोचक भी बनाती है। वे दर्शकों को मोहते हें। उनके किरदार और अभिनय में सादगी है। सलमान खान का किरदार इतना सरल और प्रभावशाली है कि वह दर्शकों को अपने साथ लिए चलता है। 
अवधिः 159 मिनट 
**** चार स्‍टार

Monday, July 6, 2015

खुद पर हमेशा रखना चट्टान सा भरोसा -करीना कपूर खान


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
-क्या कुछ है ‘बजरंगी भाईजान’ और जाहिर तौर पर क्या निभा रही हैं आप?
फिल्म के साथ सबसे रोचक बात तो यह है कि सलमान के संग फिर से काम कर रही हूं। ‘बॉडीगार्ड’ सफल रही थी। आम जनता भी काफी उत्साहित है कि हम दोनों साथ आ रहे हैं। फिल्म की यूएसपी कबीर खान भी हैं। मैंने पहले कभी उनके संग काम नहीं किया। वह बड़ा रोचक अनुभव रहा। मेरा किरदार बड़ा मजेदार है। वह चांदनी चौक के एक स्कूल में टीचर है। वह कैसे सलमान के किरदार से मिलती है? कैसे एक बच्ची उनकी जिंदगी में आती है? दोनों फिर कैसे उसे उसके घर पहुंचाते हैं, वह सब कुछ फिल्म में है।
- बाकी फिल्म में गाने-वाने तो होंगे ही?
हां, पर वे सब जरा हटकर हैं। ऐसे नहीं कि लंदन में प्रेमी-प्रेमिका नाच-गाना कर रहे हैं।
-और वह टीचर कैसी है? साड़ी वाली या..?
नहीं, यंग और मॉडर्न। टिपिकल चांदनी चौक वाली। वह लुक और फील तो आएगा।
- .. लेकिन दिल्ली वाली लड़कियों का रोल तो आपने पहले भी किया है?
यह वाली बड़ी मैच्योर है। पहले थोड़े बबली, चर्पी किस्म की लड़की का किरदार निभाया था। ‘जब वी मेट’ वाला तो बिल्कुल अलग ही मामला था। हां, उसे लोग मेरा सिग्नेचर रोल कहते हैं, मगर इसमें मेरा अवतार एक बेहद मैच्योर लड़की का है।
-अच्छा और फिल्म में सुनने को मिल रहा है कि पाकिस्तान की लड़की है। वहां से आ जाती है..? अगर इस पर थोड़ी  रौशनी डाल सकें तो, क्योंकि कइयों का मानना है कि जैसे ‘हिना’ में नायक हिंदुस्तान से पाकिस्तान चला जाता है, फिर वह कैसे हिंदुस्तान आता है? यहां उलटे क्रम में वह हो रहा है?
नहीं, जैसा ट्रेलर में दिखाया गया है कि सलमान का किरदार कैसे उस बच्ची को पाकिस्तान छोड़ कर आता है? उस सफर में क्या कुछ होता है, वह है इस फिल्म में। यह ‘हिना’ जैसी नहीं है। वह तो लव स्टोरी थी। यह तो ड्रामा है।
-कबीर खान के संग क्या खास बात लगी?
मेरे ख्याल से वे हमेशा बड़ी पिक्चरें बनाते हैं, लेकिन उनमें अच्छी कहानी होती है। यह नहीं कि उनमें महज गाने चल रहे हैं। वे बड़ी रस्टिक फिल्में बनाते हैं। स्क्रीन पर उनकी फिल्म काफी विश्वसनीय लगती है, इसलिए जिस सलमान को हम उनकी बाकी की फिल्मों में देखते हैं, कबीर की फिल्मों में वह बेहद अलग होता है।
-करीना को हमने ग्रो और मैच्योर होते देखा है। आप अपनी जर्नी को किस तरह देखती हैं?
लोग अक्सर कहते हैं कि एक एक्ट्रेस की शेल्फ लाइफ दस साल की होती है।
- आप के मामले में ऐसा नहीं है?
जी हां, जिस दिन ‘उड़ता पंजाब’ रिलीज होगी, उस दिन इंडस्ट्री में मैं 16 साल पूरे कर लूंगी। एक्टिंग में इतनी ताकत और दिलचस्पी आज भी है कि क्या कहूं? मुझे वह करना पसंद है। अच्छे व निरंतर परफॉरमेंसेज करना भाता है। वह मेरी रगों में दौड़ रहा है। कुछ कमर्शियल फिल्में कई लीक से जुदा फिल्में, सब कुछ करने को मिला है।
-ऑफबीट फिल्में तो आप ने तब ही कर दी थीं, जब उनकी चर्चा नहीं होती थी?
हां, पर लोग अब कह रहे हैं। मैंने विमेन सेंट्रिक फिल्में तो काफी पहले ही कर दी थी।
- पर अब जिस गति से वैसी फिल्में आ रही हैं तो कैसा लगता है?
बड़ी खुशी होती है। आज अभिनेत्रियां अपनी मर्जी व मिजाज की फिल्में कर रही हैं, वह बहुत बड़ी बात है।
- आप वे फिल्में देख पाती हैं ?
हां, कुछ तो देखी हैं, पर सब नहीं देख पाती। हां, उनके बारे में समाचारों में जो कुछ आता है, उनके बारे काफी कुछ पढ़ जरूर पाती हूं। यह भी बड़ी अच्छी बात है कि हर दशक की टॉप अभिनेत्रियां टॉप अभिनेताओं के संग काम रही हैं। वह चाहे शर्मिला जी हों, जिन्होंने राजेश खन्ना के संग काम किया। हेमा जी धर्मेंद्र के साथ। श्रीदेवी अनिल कपूर के संग। रेखा जी अमिताभ जी के साथ। वह तो हमेशा से होता आया है, लेकिन लोग पता नहीं क्यों कहते हैं कि खान के साथ बार-बार काम नहीं करना चाहिए। उन्हें विमेन सेंट्रिक फिल्में करनी चाहिए, पर कमर्शियल फिल्मों का मजबूत वजूद तो है ही। मसाला फिल्में तो बननी ही चाहिए। आम जनता को पसंद पड़ती हैं वे और कंटेंट ड्रिवेन फिल्में भी यकीनन करनी चाहिए। एक संतुलन रहे।
-लेकिन आप खुद को किस मूड में पा रही हैं? आप ‘मूडी’ भी कही जाती हैं। आप से शिकायत रही है कि आपने इंडस्ट्री को हंड्रेड पर्सेंट नहीं दिया है?
बिल्कुल, लेकिन वह समर्पण शायद अगले पांच सालों में आप लोगों को दिखे। अभी मैं वैसा कर रही हूं। मैंने बाल्की के संग पहले कभी काम नहीं किया, उनके संग कर रही हूं। अभिषेक चौबे के साथ कर रही हूं। कबीर के संग भी पहले कभी काम नहीं किया था। उनके साथ कर रही हूं। उक्त सभी की खासियत है कि उनकी फिल्में कमर्शियल जोन में रहते हुए भी काफी रियल रहती हैं।
- यानी यह माना जाए कि सिनेमा को लेकर आप की सोच व अप्रोच में फर्क आया है। अपने सफर में आपने हर किस्म के अनुभव हासिल भी कर लिए हैं?
वाकई। 15-16 साल के सफर के बाद भी काम कर रही हूं। हर किस्म के डायरेक्टर के साथ काम कर रही हूं। उन पर मेरा व मेरा उन पर पूरा भरोसा भी है।
- मुझे तो आप का वह फेज भी याद है, जब आप के बारे में एक टाइटिल दिया गया था ‘फ्लॉप फिल्मों की हिट हीरोइन’। तो उस दौर में भी खुद को भटकने व किसी और पर नाराज न होने देने से खुद को कैसे रोका?
 मेरे ख्याल से अपनी प्रतिभा पर भरोसा होना बहुत जरूरी है। मैं ऐसी ही हूं। जब कभी लोगों ने कहना शुरू किया कि करीना नहीं कर पा रही है तो बाद मैं फिनिक्स की तरह बाहर निकली हूं। मंै बचपन से ही ऐसी हूं। वह चट्टानी इरादा मुझे मेरी मां से मिला। मेरी मॉम काफी स्ट्रौंग शख्सियत रही हैं तो इन मामलों में मैं उन जैसी ही हूं।
- अच्छा खुद को आप कितनी सिंधी और कितनी पंजाबी?
सिंधी खाना बहुत पसंद है, पर दिल से, दिमाग से पूरी पंजाबी हूं। पूरी कपूर ही हूं मैं। दिल बड़ा है और खाने का शौक है।
-सैफ के संग जुड़ने के बाद तो नवाबी रंग भी चढ़ गया?
जी हां, पर हम सब बड़े मेहनती हैं। काम के लिए जो हमारी ख्वाहिश है, जो आग है, वह आज भी अंदर जलती रहती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि पच्चीस साल बाद भी हम जब बात कर रहे हों तो कहें कि ढाई दशक गुजर भी गए और पता भी नहीं चला।
- वैसा आप की वर्किंग से  झलक रहा है। आजकल तो 40 पार अभिनेत्रियों के लिए भी रोल लिखे जा रहे हैं?
एज को ग्रेसफुली ही लेना चाहिए। उसके खिलाफ नहीं होना चाहिए?

बिल्कुल नहीं, मुझे तो वह सब पसंद नहीं है।
-तो आगे की क्या रूपरेखा है? सैफ के संग इल्युमिनाटी में सक्रिय होंगी?
जी नहीं। मुझे प्रॉडक्शन में बिल्कुल इंट्रेस्ट नहीं है। अभी इतने अच्छे किरदार गढ़े जा रहे हैं। नए निर्देशक काफी अच्छा कर रहे हैं,मैं उनके साथ अभिनय करूंगी। प्रोडक्शन की ओर जरा भी ध्यान नहीं है।
-...नहीं पर जैसे अभी अनुष्का ने किया। दीपिका कर रही हैं। प्रियंका ने भी किया ताकि फिल्मों की लागत कम हो जाए। ऐसा कभी ख्याल आया हो या कोई डायरेक्टर पसंद है, जिनके संग काम करना चाहें?
जी हां डायरेक्टर तो कई पसंद हैं, जहां तक लागत कम करने की बात है तो आजकल जैसे प्रॉफिट शेयरिंग हो रही है। पहले किया भी है। वह मैं कर सकती हूं, पर एक्टिव प्रोड्यूसर होना मुमकिन नहीं। मेरी उसमें दिलचस्पी भी नहीं है।
-एक्टिंग से फुर्सत मिलते ही कहां भागती हैं?
घूमने का शौक है। दुनिया देखने निकल पड़ती हूं। फैमिली के साथ, सैफ के संग, क्योंकि हम दोनों बिजी रहते हैं। घूमना तो अच्छा भी लगता है। हर तीन-चार महीने में कोशिश रहती है कि घूमने पर निकल जाएं।
-किस तरह की यात्राएं भाती हैं?
जाड़ों में तो राजस्थान या फिर लंदन।
-राजस्थान इसलिए तो नहीं कि वहां राजे-रजवाड़े रहे हैं?
नहीं-नहीं। वहां जिस किस्म के होटल हैं। मौसम है। वहां का खाना बहुत पसंद है मुझे। घूमने का टाइम आता है तो खाना तो अहम हो ही जाता है।
-‘चमेली’ जैसी फिल्म फिर से करने का इरादा है?
वैसा कुछ तो ‘तलाश’ में भी किया था, जो मुझे बहुत अच्छी लगी थी। आज की तारीख में तो वैसे रोल लिखे जा रहे हैं। खासकर नए निर्देशकों के द्वारा तो वैसी कहानी, भूमिका आती है तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है वह सब करने में।
-इन दिनों यह बात भी उठ रही है कि अभिनेत्रियों को भी अभिनेताओं के बराबर फीस मिलनी चाहिए, क्योंकि कंगना की फिल्म 100 करोड़ करती है तो ...?
बिल्कुल बराबरी होनी चाहिए। हम भी उतनी ही मेहनत करते हैं, जितनी अभिनेता। खूबसूरत लगना भी बहुत टफ है। वह एक ऐडेड रेसपॉन्सिबिलिटी है। हीरोइन के बना हीरो भी कम है। एक अधूरापन तो रह ही जाता है।
-वह अधूरापन तो खैर जिंदगी की बाकी चीजों में भी है। दोनों के परस्पर जुड़ने व अच्छे व्यवहार से ही जिंदगी सरल-सहज बनती है?
बिल्कुल सही। रिश्ता भी लंबा निभता है तब। हीरोइन के संग भी वैसी ही बात है। वह भी बिना हीरो के अधूरी ही है। नमक होना चाहिए फिल्म में।
-‘उड़ता पंजाब’ के बारे में बता सकती हैं थोड़ा बहुत? नाम बड़ा अजीब है?
बिल्कुल। यह ड्रग ड्रामा पर बेस्ड है। बड़ी एजी फिल्म है। अलग है उसकी कहानी। कास्ट भी बड़े प्यारे हैं। सब का रोल अलहदा है। मैं उसमें ड्रग रिहैब में एक डॉक्टर का रोल प्ले कर रही हूं। मैं बड़ी एक्साइटेड हूं। लोगों ने मुझे उस सेटिंग में नहीं देखा है।
-सेटिंग मतलब क्या, लो कॉस्ट या कुछ और?
नहीं लोगों ने अब तक मुझे ग्लैमरस अवतार में ही देखा है। इस बार पहली दफा वे मुझे रियल व डीग्लैम अवतार में देखेंगे।
-और दूसरी जो आर. बाल्की वाली फिल्म है, वह उनके मिजाज वाली ही है?
यकीनन। जैसी फिल्में बनाने में उनको महारथ हासिल है। मिसाल के तौर पर ‘चीनी कम’ जैसी। उसके बाद तो अन्य स्क्रिप्ट सुन ही रही हूं, क्योंकि अभी ‘उड़ता पंजाब’ की शूटिंग खत्म ही की है। फिर बाल्की की फिल्म की शूटिंग प्रारंभ होगी। तीन-चार महीने उसमें जाएंगे।
- सलमान के बारे में क्या कुछ कहना चाहेंगी?
वे सक्सेस व फेल्योर से बहुत आगे की चीज हैं। वे इंडिया के सबसे महान कलाकार हैं।
-कोई पर्सनल एक्सपीरिएंस अगर शेयर कर सकें?
पहली बार तो उनसे भप्पी सोनी की ‘निश्चय’ के सेट पर मिली थी। मैं दस साल की थी तब। आज मैं 34 की हूं। तो बचपन से लेकर शादी से पहले तक। अब शादी के बाद हमारा एक लंबा सफर रहा है। तब से लेकर आज तक उनके नेचर में कोई बदलाव नहीं आया है। तभी वे ग्रेट हैं। बस,तब उनके मसल्स बढ़े हुए थे।
- पर बतौर एक्टर उनकी खासियत क्या है?
मेरे ख्याल से उनकी स्माइल। वह सुपरस्टार वाली स्माइल है। पूरी दुनिया उस पर फिदा हो जाए।
- आप की भी एक आभा है। उनकी भी है। आप दोनों से सालों से हम मिल भी रहे हैं। आप लोग समझ पाते हैं कि सामने वाला आप की आभा से प्रभावित हो रहा है?
मुझे तो महसूस नहीं होता। मेरे ख्याल से जो कलाकार अपने आप को ज्यादा सीरियसली नहीं लेते, उनका सदा अच्छा होता है। स्टारडम को सीरियसली नहीं लेना चाहिए। अगर लोग मेरे आभामंडल से प्रभावित होते हैं तो मैं समझ जाती हूं, पर मैं रिएक्ट नहीं करती। वैसे भी एक सुपरस्टार की इफेक्ट होनी तो चाहिए।
-नहीं, क्योंकि सोसायटी में आप जितना कंट्रीब्यूट करते हो उस अनुपात में आप लोगों को मिल नहीं रहा। मिसाल के तौर पर आप एयरपोर्ट पर जाती हैं तो वहां के सभी लोग आप को देख अलग किस्म की खुशी महसूस करते हैं?
वही हमारी कमाई है। वह अच्छा भी लगता है। लोगों में रेस्पेक्ट की भावना है। आंखों की शरम उनमें है। मैं इस मामले में लकी हूं कि लंबे समय तक काम करने के अलावा मैं जिस परिवार से ताल्लुक रखती हूं, उसको लेकर भी पब्लिक प्लेस पर लोग मुझे बहुत सम्मान देते हैं।
-क्योंकि सलमान ने भी एक बात कही थी कि लोग जब उनकी  फिल्म देखने आते हैं तो उसी फिल्म भर में उन्हें नहीं देख रहे होते। उनकी पूरी पर्सनैलिटी के साथ उनका किरदार पर्दे पर देखा जाता है?
तभी तो लोगों में उनको लेकर क्रेज है, जो लोग समझ नहीं पाते। वही एक फैन का नशा है, जो सलमान को, करीना को, शाह रुख को उस अवतार में बार-बार देखना पसंद करते हंै।



Saturday, May 9, 2015

एक नायक का अंतर्द्वद्व




-अजय ब्रह्मात्‍मज
      फिल्‍मों का पत्रकार होने की एक मुश्किल यह रहती है कि हमें फिल्‍मी सितारों के बारे में चल रही अफवाहों और प्रचलित छवि के बारे में सभी की जिज्ञासाओं के जवाब देने पड़ते हैं। ये जिज्ञासाएं ज्‍यादातर आरोप और लांछन के रूप में होती हैं। मैंने महसूस किया है कि सभी इन कलाकारों के लिए तृतीय पुरूष वह का इस्‍तेमाल करते हैं। मुझे दिक्‍कत होती है। फिल्‍म कलाकरों के लिए आप संबोधन क्‍यों नहीं होता ? क्‍यों माना जाता है कि वे बदचलन,बददिमाग और बदमाश ही होते हैं ? पर्दे पर उन्‍हें देख कर हम भाव विभोर होते हैं। अपने आचार-व्‍यवहार में उनकी नकल करते हैं। मिलने या दिख जाने पर उल्‍लसित होते हैं। इन सभी के बावजूद कहीं न कहीं फिल्‍म कलाकारें के प्रति एक तिरस्‍कार और हेय भाव रहता है। यह हमारे समाज की विडंबना है कि हम जिन्‍हें चाहते हैं,उनसे घृणा भी करते हैं।
      बुधवार 6 मई को को सलमान खान को सेशन कोर्ट ने पांच साल की सजा सुनाई और हाई कोर्ट ने चंद घंटों के अंदर ही उन्‍हें दो दिनों की अंतरिम जमानत दे दी। शुक्रवार को उनकी सजा निलंबित करने के साथ जमानत दे दी गई। खबर है कि वे शनिवार को कश्‍मीर पहुंच लाएंगे और अपनी निर्माणाधीन फिल्‍म बजरंगी भाईजान की शूटिंग में जुट जाएंगे। थोड़ी देर के लिए उनका कथित अपराध भूल जाएं और एक सामान्‍य व्‍यक्ति और कलाकार के तौर पर सलमान खान के बारे में सोचें तो हम अनुमान भी नहीं लगा सकते कि वे किस ऊहापोह से गुजर रहे होंगे। बजरंगी भाईजान देखते समय मैं यह जानने की कोशिश करूंगा कि 9-10 मई को उन्‍होंने किन दृश्‍यों की शूटिंग की थी। उन्‍हें देख कर दर्शकों की क्‍या प्रतिक्रिया रही। सार्वजनिक जिदगी जी रही हस्तियों के निजी संत्रास और एकाकीपर से हम अपरिचित ही रह जाते हैं। हम उनकी मुस्‍कान में ही डूबे रहते हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के उनके परिचित,सहयोगी और मित्र भी नहीं चाहते कि सलमान खान को सजा हो। पिछले दो दिनों में फिल्‍म बिरादरी के सदस्‍यों ने उनके घर जाकर हमदर्दी दिखाई। कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। जो छिपा र‍हा,वह कभी सामने नहीं आएगा। सच है कि कुछ हस्तियों ने हमदर्दी जताने और दिखाने के बाद सलमान खान की हालत भी जाम टकराए और जश्‍न भी मनाया। बाहर से यह इंडस्‍ट्री एक परिवार की तरह दिखती है। वास्‍तविकता यही है कि किसी भी संयुक्‍त परिवार की तरह परस्‍पर मनमुटाव और रगड़ा होने पर भी मुश्किल और अवसाद की घडि़यों में एकजुटता दिखाई जा हमदर्दी और एकजुटता दिखी भी। कुछ लोग नाराज हैं कि सलमान खान अपराधी हैं और उनके प्रति सहानुभूति नही रखी जानी चाहिए। ऐसी आपत्तियों के समय भारतीय समाज में प्रचलित व्‍यवहार पर गौर करना चाहिए। क्‍या हम अपने परिवार में किसी के अपराधी निकल जाने पर हुई सजा के समय सहानुभूति नहीं जताते। फिल्‍म इंडस्‍ट्री एक बड़ा परिवार है। सलमान खान पॉपुलर स्‍टार हैं। उनके प्रति जाहिर हमदर्दी स्‍वाभाविक है।
      सलमान खान को मैं 20 सालो से जानता हूं। लगभग हर फिल्‍म की रिलीज के आसपास और अनेक इवेंट में उनसे मुलाकातें होती रही हैं। अब आरंभिक मुलाकातों की औपचारिकता भी नहीं रह गई है। वक्‍त-जरूरत पर उनसे यों भी मुलाकतें हो जाती हैं। पिछले कुछ सालों में बीइंग ह्यूमन के अधीन चैरिटी करते हुए सलमान खान को मैंने बदलते भी देखा है। आज के सलमान वही सलमान नहीं हैं,जो छवि अभी तक प्रचलित है। उनकी उच्‍छृंखलताएं खत्‍म हो गई हैं। निजी जीवन में उनकी चिंताओं का दायरा बड़ा हुआ है। जिम्‍मेदारियों का एहसास बढ़ा है। वे व्‍यक्ति और कलाकार के तौर पर समझदार हुए हैं। सलमान खान खुद मानते हैं कि वे उम्‍दा कलाकार नहीं हैं,लेकिन वे यह जानते हैं कि उनकी जबरदस्‍त फैन फॉलोइंग है। दर्शकों से उनका सीधा कनेक्‍ट हैं। उनकी फिल्‍मों के बारे में लिखते समय हमें एहसास रहता है कि हमारे रिव्‍यू से उनके दर्शकों को फर्क नहीं पड़ता। अगर आप पिछले 10-12 की उनकी फिल्‍मों पर गौर करें तो उनमें कई कॉमन पैटर्न दिखेंगे। उनकी फिल्‍मों का संसार फैमिली के मूल्‍यों को लेकर चलता है। उन फिल्‍मों का एक अलहदा वैल्‍यू सिस्‍टम है,जो उनके प्रशंसकों को भा गया है। सलमान उनसे अलग नहीं होना चाहते। उनके प्रशंसक उन्‍हें बार-बार उसी अवतार में देख कर प्रफुल्लित होते हैं।
      सलमान खान ने कभी स्‍पष्‍ट तौर पर न‍हीं कहा कि उन्‍हें अपनी गलतियों और भूलों का एहसास है। फिर भी उनके बात-व्‍यवहार से जाहिर होता है कि वें निरंतर प्रायश्चित के मूड में चले गए हैं। उनके मानस को पढ़ पाना इतना भी जटिल नहीं है। वे जरूरतमुदों की मदद करते ही हैं। यह उनका ओढ़ा हुआ काम नहीं है। हां,इस बीच अपने परमार्थ के कार्यों को उन्‍होंने व्‍यवस्ति करने के साथ संस्‍थागत रूप दे दिया है। वे स्‍वयं इन कार्यों में रुचि लेते हैं। एक बार उन्‍होंने एक सवाल के जवाब में बताया था कि मुझे सही-सही नहीं मालूम कि मैं कितना कमाता हूं और मेरे पैसे कहां खर्च होते हैं। उन्‍हें आने पिता पर भरोसा है। पिता सलीम खान की निगरानी में सारा हिसाब-किताब होता है। सलमान खान के पारिवारिक मित्रों के पास उनके अनेक किस्‍से हैं। उन किस्‍सों से सलमान खान की जो छवि बनती है,वह दोस्‍त,मददगार,वफादार,फैमिली पर्सन और पॉपुलर कलाकार की है।
      कोर्ट के फैसलों के बीच सलमान खान निश्चित ही अंतर्द्वंद्व से गुजर रहे होंगे। अनिश्चितता तो सामान्‍य व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देती है। हमरी आह और वाह के बीच सलमान खान के सीने में चल रहे झंझावात उन्‍हें चैन और सुकून से सोने भी नहीं देते होंगे। अजीब सी बात है कि इस मामले में फंसी जिंदगियों से बड़ी चिंता यह देखी और बतायी जा रही है कि सलमान खान के जेल जाने से  फिल्‍म इंडस्‍ट्री को कितने करोड़ों का नुकसान होगा। सच कहूं तो यह चिंता व्‍यर्थ है। उनभोक्‍ता संस्‍कृति के इस दौर में हमारी संवेदनाएं और जिज्ञासाएं भी धन से जोड़ दी गई हैं। देखना यह चाहिए कि पूरे प्रकरण से गुजर रहे सलमान खान किस मनोदशा और स्थिति में हैं। इस मामले से जुड़े अन्‍य व्‍यक्तियों की जिंदगी कैसे प्रभावित हो रही है ?
            महेश भट्ट कहते हैं कि 50 के होने जा रहे सलमान खान के अंदर का बच्‍चा बड़ा ही नहीं होना चाहता। आज भले ही उसे मां की उंगलियां थाम कर चलने की जरूरत नहीं रह गई है,लेकिन भीतरी तौर पर वह मां-बाप के साए में ही सुरक्षा महसूस करता है। पर्दे पर नायक के तौर पर हर विपरीत स्थितियों का परास्‍त कर विजयी होने वाला सलमान खान निजी जिंदगी में भावनात्‍मक रुप से बहादुर नहीं है। अब वे बांद्रा का कैड ब्‍वॉय नहीं रह गए हैं। बीइंग ह्यूमन की गतिविविधयों ने उनकी इंसानियत बढ़ा दी है। वे ज्‍सादा संवेदनशील,भावुक और दयालु हो गए हैं। मुमकिन है कि वे अघोषित प्रायश्चित कर रहे हों। भारतीय संस्‍कृति में प्रायश्चय का प्रावधान है।