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Sunday, November 25, 2018

संडे नवजीवन : जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी


संडे नवजीवन
जीवित पात्रों का जीवंत चित्रण वाया मोहल्ला अस्सी
अजय ब्रह्मात्मज
हिंदी फिल्मों के इतिहास में साहित्यिक कृत्यों पर फ़िल्में बनती रही हैं.और उन्हें लेकर विवाद भी होते रहे हैं.ज्यादातर प्रसंगों में मूल कृति के लेखक असंतुष रहते हैं.शिकायत रहती है कि फ़िल्मकार ने मूल कृति के साथ न्याय नहीं किया.कृति की आत्मा फ़िल्मी रूपांतरण में कहीं खो गयी.पिछले हफ्ते डॉ. काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित ‘मोहल्ला अस्सी देश के चंद सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई.इस फिल्म के प्रति महानगरों और उत्तर भारत के शहरों की प्रतिक्रियाएं अलग रहीं.यही विभाजन फिल्म के अंग्रेजी और हिंदी समीक्षकों के बीच भी दिखा.अंग्रेजी समीक्षक और महानगरों के दर्शक ‘मोहल्ला अस्सी के मर्म को नहीं समझ सके.फिल्म के मुद्दे उनके लिए इस फिल्म की बनारसी लहजे(गालियों से युक्त) की भाषा दुरूह और गैरज़रूरी रही.पिछले कुछ सालों में हम समाज और फिल्मों में मिश्रित(हिंग्लिश) भाषा के आदी हो गए हैं.इस परिप्रेक्ष्य में ‘मोहल्ला अस्सी में बोली गयी हिंदी को क्लिष्ट कहना लाजिमी है.
रिलीज से दो दिनों पहले डॉ. काशीनाथ सिंह के शहर बनारस में ‘मोहल्ला अस्सी का विशेष शो रखा गया था.फिल्म के निर्माण के समय निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह ने सोचा था कि फिल्म का प्रीमियर बनारस में रखा जायेगा. प्रीमियर में काशी और अस्सी के निवासियों और उपन्यास के पात्रों को आमंत्रित किया जायेगा.ऐसा नहीं हो सका.फिल्म की रिलीज में हुई देरी और निर्माता-निर्देशक के बीच ठनी अन्यमनस्कता से प्रदर्शन के समय जोश और उत्साह नज़र नहीं आया.यह विडंबना ही है कि हिंदी उपन्यास पर बनी हिंदी फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी का कोई पोस्टर हिंदी में नहीं आया.हिंदी दर्शकों तक पहुँचने के लिए हॉलीवुड के निर्माता तक अपनी फिल्मों के पोस्टर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में लेन लगे हैं.बनारस स्थित लेखक डॉ. काशीनाथ सिंह की शिकायत थी कि शहर में फिल्म के प्रचार के लिए ज़रूरी पोस्टर भी दीवारों पर नहीं लगे हैं.यूँ लगा कि रिलीज की रस्म अदायगी भर कर दी गयी.
बहरहाल,बनारस में आयोजित विशेष शो में ‘काशी का अस्सी के लेखक अपने पात्रों और मित्रों-परिचितों के साथ मौजूद रहे.ढाई सौ दर्शकों का स्क्रीन खचाखच भर गया था,क्योंकि पात्र और मित्र अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ आ गए थे.डॉ. काशीनाथ सिंह के लिए यह ख़ुशी का मौका था. वे अपने उपन्यास के पत्रों के साथ फिल्म देख रहे थे. लगभग 20-22 सालों पहले जिन व्यक्तियों के साथ उनका उठाना-बैठा था,जिनसे बहसबाजी होती थी....वे सभी ही अपने संवादों के साथ उपन्यास के पात्र बने.उन पात्रों को डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने खास सोच-समझ से आकार दिया और ‘मोहल्ला अस्सी का चरित्र बना दिया.फिर उन चरित्रों के अनुरूप कलाकारों का चयन किया गया.उन कलाकारों ने निर्देशक के निर्देश और अपनी समझदारी से निभाए जा रहे पात्रों को परदे पर जीवंत किया और उन्हें एक किरदार दिया..व्यक्ति,पात्र,चरित्र,अभिनेता और किरदार की यह प्रक्रिया सृजनात्मक चक्र पूरा कर उन व्यक्तियों के साथ परदे पर चल्तिफिरती नज़र आ रही थी.दर्शकों के बीच पप्पू भी मौजूद थे.वही पप्पू,जिनकी दुकान बनारस के अस्सी के लिए किसी संसद से कम नहीं थी. अंग्रेजी में इसे ‘सररियल’ अनुभव कह सकते हैं.25 सालों की फिल्म पत्रकारिता के करियर में अतीत में कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ,जब परदे के जीवंत किदर जीवित व्यक्ति के रूप में सिनेमाघर में मौजूद हों.इधर उनकी साँसें चल रही हो और उधर रील.रील औए रियल का यह संगम और समागम दुर्लभ अनुभव रहा.’मोहल्ला अस्सी के प्रदर्शन में डॉ.काशीनाथ सिंह,डॉ.गया सिंह,रामजी राय,वीरेंद्र श्रीवास्तव,पप्पू और कुछ दूसरे पात्र(जो फिल्म में नहीं आ पाए) भी आये थे. फिल्म देखने के बाद आह्लादित डॉ. काशीनाथ सिंह की अंतिम पंक्ति थ,’मैं संतुष्ट हूँ.’
प्रदर्शन के बाद की बातचीत में सभी पात्र अपने किरदारों को निभाए कलकारों के अभिनय और संवाद अदायगी की चर्चा मशगूल हुए. डॉ. गया सिंह का मन्ना था की वे पूरा तन कर चलते हैं लाठी की तरह,जबकि उन्हें निभा रहे कलाकार कमर से लचके हुए थे.हां,आवाज़ की ठसक उन्होंने पकड़ ली थी.वीरेंद्र श्रीवास्तव का किरदार राजेंद्र गुप्ता ने निभाया है.वीरेंद्र श्रीवास्तव खुश थे कि राजेंद्र गुप्ता उन्हीं की तरह लहते हैं और उन्होंने बोलने का अंदाज भी सही पकड़ा था.फिल्म में पप्पू की खास भूमिका नहीं थी.वह तो चाय ही बनता रहा,लेकिन प्रदर्शन के दिन वह भी पत्रों में शामिल होकर खुद को उनके समकक्ष महसूस कर रहा था.रवि किशन के भाव,अंदाज और चंठपन से सभी मुग्ध थे कि उन्होंने ने अस्सी के ‘अड़ीबाज’ को आत्मसात कर लिया है.उनके प्रणाम और हर हर महादेव में बनारसी बेलौसपन था.दुर्भाग्य है कि ‘मोहल्ला अस्सी निर्माण और वितरण-प्रदर्शन की आधी-अधूरी रणनीति और असमर्थ हस्तक्षेप की वजह से अपने दर्शकों तक सही संदर्भों के साथ नहीं पहुँच सकी.फिल्मों में चित्रित भारतीय समाज के लिए ‘मोहल्ला अस्सी एक ज़रूरी पाठ के तौर पर देखी और पढ़ी जाएगी.
‘मोहल्ला अस्सी नौ सालों की म्हणत और इंतज़ार का नतीजा है.मुंबई से वाराणसी की एक फ्लाइट में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने उषा गांगुली के नाटक ‘काशीनामा की समीक्षा पढ़ कर इतने प्रभावित हुए कि उसी नाम की किताब खोजने लगे.बाद में पता चला कि वह डॉ. काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी पर आधारित नाटक है.खैर,अपने मित्र और लेखक के परिचित अतुल तिवारी के साथ बनारस जाकर 2009 में उन्होंने उपन्यास के अधिकार लिए.2010 में उन्हें निर्माता विनय तिवारी मिले.2011 में मुंबई शूटिंग आरम्भ हुई और मार्च तक ख़त्म भी हो गयी.निर्माता-निर्देशक के बीच विवाद हुआ.फिल्म की रिलीज खिसकती गयी.2012 में रिलीज करने की योजना पर पानी फिर गया.2015 में पहले अवैध ट्रेलर और फिर फिल्म लीक होकर इन्टरनेट पर आ गयी.फिल्म अटक गयी.उसके बाद सीबीएफसी का लम्बा चक्कर चला.आख़िरकार दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म की रिलीज की अनुमति दी और साथ ही कहा कि कला माध्यमों में सृजनात्मक अभिवयक्ति की आज़ादी मिलनी चाहिए.
‘काशी का अस्सी उपन्यास के ‘मोहल्ला अस्सी फिल्म के रूप में रूपांतरण की रोचक कथा पर पूरी किताब लिखी जा सकती है.

   



Wednesday, October 17, 2018

संडे नवजीवन : राष्ट्रवाद का नवाचार


संडे नवजीवन
राष्ट्रवाद का नवाचार
-अजय ब्रह्मात्मज
सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ पर हिंदी फिल्म ‘उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक’ का टीजर आया. इस फिल्म में विकी कौशल प्रमुख नायक की भूमिका में है. 1 मिनट 17 सेकंड के टीजर में किसी संय अधिकारी की अनुभवी.आधिकारिक और भारी आवाज़ में वाइस् ओवर है. बताया जाता है कि ‘हिंदुस्तान के आज तक के इतिहास में हम ने किसी भी मुल्क पर पहला वार नहीं किया. 1947,61,75,99... यही मौका है उनके दिल में डरर बिठाने का. एक हिन्दुस्तानी चुप नहीं बैठेगा. यह नया हिंदुस्तान है. यह हिंदुस्तान घर में घुसेगा और मारेगा भी.’ वरिष्ठ अधिकारी की इस अधिकारिक स्वीकारोक्ति और घोषणा के बीच जवान ‘अहिंसा परमो धर्मः’ उद्घोष दोहराते सुनाई पड़ते हैं. सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने 18 सितम्बर 2016 को कश्मीर के उरी बेस कैंप में घुसपैठ की थी और 19 जवानों की हत्या कर दी थी. भारत ने डर बिठाने की भावना से सर्जिकल स्ट्राइक किया था. इस सर्जिकल स्ट्राइक को देश की वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय गर्व और शोर्य की तरह पेश कर अपनी झेंप मिटाई थी. गौर करें तो इस संवाद में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया है,लेकिन युद्ध के सालों से पाकिस्तान का ही संकेत मिलता है.इसमें 196 की ज़िक्र नहीं आता. जिस नया हिंदुस्तान’ की बात की जा रही है,वह सीधे तौर पर वर्तमान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ का अनुवाद है.
याद करे कभी हिंदी फिल्मों के नायक ‘ ये पूरब है पूरबवाले,हर जान की कीमत जानते हैं’ और ‘है प्रीत जहां की रीत सदा,मैं गीत वहां के गता हूँ. भारत का रहनेवाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ’ जैसे गीतों से भारत की विशेषताओं का बक्कन किया करते थे. राष्ट्र और राष्ट्रवाद फिल्मों के लिए नयी चिंता या टूल नहीं है. आज़ादी के पहले की मूक और बोलती फिल्मों में कभी प्रछन्न और अप्रत्यक्ष रूप से तो कभी सीधे शब्दों में भारतीय अस्मिता की पहचान और राष्ट्र गौरव का उल्लेख होता था. आज़ादी के पहले स्वतंत्रता की लडाई के दौर में मुक्ति  की चेतना और गुलामी के विरुद्ध जागरूकता फैलाने में फ़िल्मों की छोटी-बड़ी भूमिका रही है. विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवाद में फिल्मों की भूमिका और योगदान पर पारंपरिक पर्चे तो लिखे गए हैं,लेकिन फिल्मों का व्यवहारिक और उपयोगी अध्ययन और विश्लेषण नहीं किया गया है. मुग़ल बादशाहों और राजपूत राजाओं की हाथों का मकसद कहीं न कहीं दर्शकों को यह बताना और जाताना रहा है कि गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हिंदुस्तान कभी शांति,समृदधि और संस्कृति का केंद्र था. सत्य,धर्म,अहिंसा और लोकतंत्र की राह पर चल रहे भारत ने कभी पडोसी देशों पर आक्रामण नहीं किया. भारत की भूमि में कदम रखे व्यक्तियों को मेहमान माना और उन्हें बार-बार सत्ता तक सौंप दी. कुछ तो यहीं बस हाय और भारतीय समाज में घुलमिल गए,जिनमें से कुछ को अलगाने और छांटने की कोशिश की जा रही है. और कुछ शासक बन कर लूटते रहे. हिंदी फिल्मों में में इनका यशोगान मिलता है तो साथ ही शासकों के खिलाफ छटपटाहट भी जाहिर होती है.
हिंदी फिल्मों में राष्ट्रवाद कभी मुखर तरीके से व्यक्त नहीं हुआ.आज़ादी के पहले अंग्रेजों के सेंसर का डर रहता था. आज़ादी के बाद राष्ट्र गौरव के बदले राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया जाने लगा नेहरु के सपनों के सेक्युलर भारत के चरित्र गधे गए. इन फिल्मों में विविधता में एकता और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक सिद्धांतों को चरित्रों और संवादों में पिरोया जाता था. तब फिल्मों में वर्णित राष्ट्रवाद ‘भारत’ के लिए लक्षित होता था. वह किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडा या किसी नेता के भाषण से निर्दिष्ट या संचालित नहीं होता था.यह शोध और अध्ययन का विषय हो सकता है कि कैसे नेहरु और शास्त्री के आह्वान देश के प्रधानमंत्री के आग्रह के रूप में फ़िल्मकारों ,कलाकारों और नागरिकों तक संप्रेषित होते थे,जबकि आज प्रधानमंत्री का आह्वान किसी राजनीतिक पार्टी के नेता मोदी के आदेश के रूप में सुनाई पड़ता है. यही कारण है कि आज की फिल्मों में राष्ट्रगान,भारतीय तिरंगा या भारत की गौरव गाथा सुन कर राष्ट्रीय भावना का संचार नहीं होता. ‘वन्दे मातरम’ का उद्घोष ‘बोलो वन्दे मातरम’ का आदेश बन जाता है. डर लगता है कि जयघोष नहीं किया या बीच फिल्म में ‘जन गण मन’ सुन कर खड़े नहीं हुए तो कोई अदृश्य हाथ कालर पकड़ कर खींचेगा और ‘मॉब लिंचिंग’ के लिए ‘न्यू इंडिया’ के भक्तों के बीच ड्राप कर देगा. राष्ट्रवाद धीरे से अंधराष्ट्रवाद और फिर फर्जी राष्ट्रवाद में बदल गया है.
यह अनायास नहीं हुआ है. हम इसी सदी की बात करें तो ‘लगान’ या ‘चक दे इंडिया’ देखते हुए कतई भान नहीं होता कि देशभक्ति की घुट्टी पिलाई जा रही है. भुवन और कबीर खान का संघर्ष और प्रयत्न भारत के लिए है. वे अपे परिवेश और माहौल में गुलामी और क्षेत्रीयता से निकलना चाहते हैं. उनकी एकजुटता उस विजय के लिए है,जो सामूहिक है.’चक दे इंडिया’ और ‘गोल्ड’ को आगे-पीछे देखें तो स्पष्ट हो जायेगा कि फ़िल्मकार किस तरह के दबाव में सृजनात्मक एकांगिता के शिकार हो रहे हैं. ‘चक दे इंडिया’ का कबीर खान भी ‘इंडिया’ के लिए टीम बना रहा है और ‘गोल्ड’ के तपन दास की ‘इंडिया’ की जीत की आकांक्षा में फर्क है. एक खेल में जीत चाहता है तो दूसरा देश के रूप में जीत चाहता है.’हमरी टीम लंदन में ब्रिटेन को हरा कर 200 सालों की गुलामी का बदला लेगी’ या ‘हम अपना झंडा फहराएंगे और राष्ट्र गान गायेंगे’ जैसे संवाद बोलता तपन दास फर्जी देशभक्त जान पड़ता है. यह थोपा गया राष्ट्रवाद है,जो इन दिनों फैशन में है. इसे संयोग कहें या सुनियोजित चुनाव कि अक्षय कुमार  ‘न्यू इंडिया’ के भारत कुमार के रूप में उभरे हैं. उनकी फिल्मों ‘एयरलिफ्ट’,‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ और ‘पैडमैन’ में भी राष्ट्रवाद छलकाया गया है है. नीरज पाण्डेय ने ‘बेबी’ में उन्हें देशभक्ति दिखाने का पहला मौका दिया. उसके बाद उनकी फिल्मों में लगातार देशभक्ति और राष्ट्रवाद के सचेत संदेशात्मक संवाद होते हैं. मनोज कुमार और अक्षय कुमार की प्रस्तुति और धरना में बड़ा फर्क है. हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने ‘जय जान जय किसान’ के नारे को लेकर ‘उपकार’ लिखी और निर्देशित की. अभी प्रधानमंत्री ने नहीं कहा है,लेकिन सभी उन्हें सुननाने में लगे हैं. कभी जॉन अब्राहम तो कभी कोई और देशभक्ति के ‘समूह गान’ में शामिल होता दिखता है.
अभी का फर्जी राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद से प्रेरित है,जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर रचा जा रहा है.इसकी शुरुवात तो ‘आज़ादी’ के नारे से होती है,लेकिन आखिर में ‘हर हर महादेव’ सुनात्यी पड़ता है. कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’ का टीजर आप सभी ने देख ही लिया होगा. समस्या हिन्दू प्रतीकों और जयकारों से नहीं है. समस्या उनके जबरन उपयोग या दुरुपयोग को लेकर है. फिल्म शुरू होने के पहले सिनेमाघरों में राष्ट्र गान कई साल पहले से अनिवार्य हो चुका है,उसके सम्मान में खड़े होने या न हो पाने का विवाद पिछले चार सालों में समाचारों में आने लगा है.’भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह का संघर्ष भारत के एक खिलाडी का संघर्ष ‘सूरमा’ तक आते-आते भिन्न अर्थ ले लेता है.न्यू इंडिया के ‘राष्ट्रवाद’ का दवाब इतना ज्यादा है की सामान्य प्रेम कहानियों एन भी किसी न किसी बहने इसे लेप और थोपा जा रहा है..