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Friday, February 20, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बदलापुर

-अजय ब्रह़मात्‍मज 
श्रीराम राघवन की 'बदलापुर' हिंदी फिल्मों के प्रचलित जोनर बदले की कहानी है। हिंदी फिल्मों में बदले की कहानी अमिताभ बच्चन के दौर में उत्कर्ष पर पहुंची। उस दौर में नायक के बदले की हर कोशिश को लेखक-निर्देशक वाजिब ठहराते थे। उसके लिए तर्क जुटा लिए जाते थे। 'बदलापुर' में भी नायक रघु की बीवी और बच्चे की हत्या हो जाती है। दो में से एक अपराधी लायक पुलिस से घिर जाने पर समर्पण कर देता है और बताता है कि हत्यारे तो फरार हो गए, हत्या उसके साथी जीयु ने की। रघु उसके साथी की तलाश की युक्ति में जुट जाता है। इधर कोर्ट से लायक को 20 साल की सजा हो जाती है। रघु लायक के साथी की तलाश के साथ उस 20वें साल का इंतजार भी कर रहा है, जब लायक जेल से छूटे और वह खुद उससे बदला ले सके।
इस हिस्से में घटनाएं तेजी से घटती हैं। फिल्म की गति धीमी नहीं पड़ती। श्रीराम राघवन पहले ही फ्रेम से दर्शकों को सावधान की मुद्रा में बिठा देते हैं। अच्छी बात है कि टर्न और ट्विस्ट लगातार बनी रहती है। परिवार को खोने की तड़प और बदले की चाहत में रघु न्याय और औचित्य की परवाह नहीं करता। बदले की इस भावना में वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। यहां तक कि लायक की दोस्त झिमली को तकलीफ देने से भी वह बाज नहीं आता। नेकी और बदी गड्डमड्ड होने लगती है। श्रीराम राघवन का यही ध्येय भी है। वे अन्य फिल्मों की तरह अपने नायक को दूध का धुला नहीं दिखाते। हम नेक नायक को खल नायक में बदलते देखते हैं। रघु किसी भी सूरत में लायक और उसके साथी से अपनी बीवी और बच्चे की हत्या का बदला लेना चाहता है। इस प्रक्रिया में वह निर्मम होता जाता है।
कहानी पंद्रह साल का जंप लेती है। लायक पंद्रह साल की सजा काट चुका है। पता चलता है कि उसे कैंसर हो चुका है और अब उसकी जिंदगी का एक साल ही बचा है। कैदियों की भलाई के लिए काम कर रहे एक एनजीओ की कार्यकर्ता अकेली जिंदगी बसर कर रहे रघु से मिलती है। वह उससे आग्रह करती है कि अगर वह चाहे तो लायक की रिहाई हो सकती है। लायक का आखिरी साल राहत में गुजर सकता है। रघु पहले मना कर देता है, लेकिन लायक के साथी तक पहुंचने की उम्मीद में वह उसकी रिहाई के लिए तैयार हो जाता है। लायक की रिहाई, दूसरे साथी की पहचान और रघु की पूरी होती दिखती रंजिश के साथ घटनाएं तेज हो जाती हैं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि कहानी किरदारों और घटनाओं के बीच उलझ गई है। श्रीराम स्पष्ट हैं। वे फिल्म के क्लाईमेक्स और निष्कर्ष तक बगैर लाग-लपेट के पहुंचते हैं। यहां आगे की घटनाएं और किरदारों के व्यवहार के विस्तार व उल्लेख से दर्शकों की जिज्ञासा बाधित होगी। मजा किरकिरा होगा।
श्रीराम राघवन ने बदले की इस अनोखी कहानी में ग्रे किरदार भी अपना रंग बदलते हैं। 'बदलापुर' सिर्फ बदले की कहानी नहीं है। यह बदले में आए बदलाव की भी कहानी है। सब कुछ बदल जाता है। अच्छा अच्छा नहीं रहता और बुरे का बदला हुआ आचरण सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वह सचमुच बुरा था? नैतिकता और आदर्श को परिस्थितियों और मनोभावों के बरक्स देखना होगा। रघु और लायक के व्यवहारों को हम पारंपरिक चश्मे से नहीं आंक सकते। इस फिल्म में गौर करें तो अच्छा बुरा है और बुरा अच्छा है। श्रीराम दोनों किरदारों की जटिलताओं में गहरे घुसते हैं और उनके अंतस को उजागर कर देते हैं। हम जो देखते और पाते हैं, वह हमारे समय के उलझे समाज का द्वंद्व है। फिल्म समाप्त होने के बाद उलझन बढ़ जाती है कि किसे सही कहें और किसे गलत?
मेरे खयाल में फिल्म का कथ्य उस सामान्य दृश्य में है जब लायक अपनी मां से पिता के बारे में पूछता है। मां कहती है-क्यों पुराने चावल मे कीड़े ढ़ूंढ रहा है। मां के पास पिता के बारे में अच्छा बताने के लिए कुछ भी नहीं है। लायक को गहरी चोट लगती है। उसका एहसास जागता है। वह मां को कुछ कहता हुआ निकलता है। उसके बाद की घटना बताना उचित नहीं होगा। फिल्म के अंत में लेखक-निर्देशक ने झिमली के जरिए अनावश्यक ही अपनी बात और लायक की मंशा स्पष्ट कर दी है। वह अव्यक्त रहता तो ज्यादा प्रभावी बात होती।
वरुण धवन अपेक्षाकृत नए एक्टर हैं। उनकी मेहनत जाहिर है। उन्होंने रघु के बदलते भावों को व्यक्त करने में अच्छी-खासी मेहनत की है। दूसरी तरफ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फितरत प्रभावित करती है। वरुण की मेहनत और नवाज की फितरत से 'बदलापुर' रोचक और रोमांचक हुई है। वरुण सधे अभिनेता नवाज के आगे टिके रहते हैं। नवाज हमारे समय के सिद्ध अभिनेता हैं। लायक हमारे मन में एक साथ घृणा और हास्य पैदा करता है। वह शातिर है, लेकिन कहीं भोला भी है। वह हिंदी फिल्मों के पारंपरिक खल चरित्रों की तरह खूंखार नहीं है, लेकिन उसकी कुटिलता से सिहरन होती है। खूंखार तो हमारा नायक हो जाता है जो जान लेने के लिए आवेश में दस हथौड़े मारते हुए हांफने लगता है। यह फिल्म वरुण और नवाज के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। फिल्म में महिला किरदारों को सीमित स्पेस में ही पर्याप्त महत्व दिया गया है। उन्हें अच्छी तरह गढ़ा गया है। पांचों महिला किरदारों ने अपनी भूमिकाओं को संजीदगी से निभाया है। प्रभावशाली दृश्य राधिका आप्टे और हुमा कुरैशी को मिले हैं। यों दिव्या दत्ता, प्रतिमा कण्णन और यामी गौतम लेश मात्र भी कम असरदार नहीं हैं। कुमुद मिश्रा की सहजता और स्वाभाविकता उल्लेखनीय है।
श्रीराम राघवन ने बदले की रोमांचक फिल्म को नया ट्विस्ट दे दिया है।
अवधि: 147 मिनट
चार स्‍टार ****

Sunday, February 8, 2015

सिर्फ भाई ने किया सपोर्ट - वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्मज
-‘बदलापुर’ हमें बिग बी के एरा वाली फिल्मों की याद दिलाएगी कि नायक को फ्लैशबैक में अपनों से दूर करने वाला शख्स दिखता था। नायक का खून खौलता और वह फिर बदला लेकर ही मानता था?
आपने सही कहा, क्योंकि फिल्म के डायरेक्टर श्रीराम राघवन अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फैन हैं। इत्तफाकन बच्चन साहब की ढेर सारी फिल्में रिवेंज पर बेस्ड रही हैं, मगर ‘बदलापुर’ से हम रिवेंज ड्रामा का पैटर्न तोडऩा चाहते हैं। मिसाल के तौर पर आप अखबार में पढ़ते हो कि एक पति ने पड़ोसी से अफेयर की आशंका में अपनी पत्नी को चाकू से गोद दिया। या फलां अपराधी ने एक मासूम को एक-दो नहीं बीसियों बार तलवार या दूसरे धारदार हथियार से नृशंसतापूर्वक मारा। कोई इस किस्म की नफरत से कैसे लैस होता है, हमने उस बारे में फिल्म में पड़ताल करके बताया है। फिल्म का नायक रघु कुछ उसी तरीके से अपनी पत्नी के हत्यारों का खात्मा करता है। उसका तरीका सही है। फिल्म के अंत में हमने एक मोरल लेसन भी दिया है कि क्या ‘आंख के बदले आंख’ के भाव को न्यायोचित है। हर किरदार परतदार है। हम किसी को एकदम से राइट या रौंग करार नहीं दे सकते।
-‘बदलापुर’ टाइटिल ही रखने की खास वजह? कोई जगह है, जहां फिल्म सेट है या फिर कोई और बात है?
जी हां, फिल्म में बदलापुर एक जगह है, जहां नायक रघु रहता है। दूसरी वजह यह भी है कि फिल्म बदले पर बेस्ड है तो उसका नाम बदलापुर रखा गया है। साथ ही हर किरदार अच्छे से बुरा, बुरा से बढिय़ा, मासूम से निर्मम शख्स में तब्दील होता रहता है तो इसलिए भी फिल्म का टाइटिल बदलापुर है।
-कैरेक्टर क्रिएशन कितना आसान या चुनौतीपूर्ण रहा?
यह देखने में सिंपल रिवेंज ड्रामा लगे, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने श्रीराम से तीन-चार की नैरेशन में इस फिल्म व अपने किरदार को समझा। फिल्म रोलिंग टाइटिल से शुरू भी नहीं होती। सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिखते ही फिल्म की कहानी शुरू हो जाती है। यह काफी सीरियस फिल्म है। उन्होंने अपने पसंदीदा विजय आनंद और हिचकॉक जैसे फिल्मकारों को इस फिल्म से होमेज दिया है। हम कहते रहते हैं कि लोग काफी प्रोग्रेसिव हो गए हैं। यूथ काफी परिपक्व हो गई है, लेकिन वे इस फिल्म को कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, उससे उनकी मैच्योरिटी झलकने वाली है।
- जी हां, श्रीराम की यह खासियत ही कह सकते हैं कि उन्होंने खुद को थ्रिलर से भटकने नहीं दिया?
जी। उन्होंने काफी प्योर थ्रिलर बनाई है। थ्रिलर के लिए दरकार चीजों को काफी अनुशासनात्मक तरीके से फिल्म में पिरोया है। उस किस्म की प्योरिटी व डिसिप्लिन मुझमें पहले नहीं था।
- आप के इस चयन पर जानकार भी हतप्रभ हैं। आप के एक परिचित ने भी बीते दिनों कहा कि करियर के इस मोड़ पर वरुण को यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी?
जी हां। मेरे भी ढेर सारे दोस्तों ने कहा है कि इतने शुरूआती स्तर पर मुझे यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। पिताजी के दोस्तों ने, पिताजी खुद ने मुझसे कहा कि यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। दरअसल बहुत कम लोग जानते हैं कि मैंने यह फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के बाद साइन की थी। बहरहाल मैं एक एक्टर हूं। मेरा बुनियादी फर्ज लोगों को एंटरटेन करना है। उन्हें नया देना है। मुझे अपने इमेज के हिसाब से काम करना होता तो मैं अपने असल उम्र के नायक की भूमिका में कोई डार्क फिल्म करता, लेकिन ‘बदलापुर’ के नायक रघु की एक यात्रा है, जो नयापन लिए हुए है। फिर मैंने तीन साल अदाकारी के जो विविध आयाम बैरी जॉन के यहां सीखे, उन्हें इस किरदार में उड़लेने का मौका मिला, जिसे मैं खोना नहीं चाहता था। फिर इस फिल्म में सह-कलाकार भी मुझे टक्कर वाले मिले, जिनके संग काम कर नई चीजें सीखने को भी मिलीं।
- तो कभी ऐसी फीलिंग आती है कि सामने नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे कद्दावर कलाकार हों तो उन्हें कंपीट करना है?
कंपीट तो नहीं, लेकिन यह भाव रहता है कि मैं कहीं सीन का स्तर कमतर न कर दूं। घबराहट होती थी उनके सामने। एक्टर के तौर पर वे हैं ही इतने कमाल के। वे जब सीन में होते हैं तो एकदम से किरदार मोहम्मद लायक तुगलेकर ही बन जाते हैं। वे जमीन पर बैठ जाते हैं। दिए गए सीन को जान लगाकर निभाते हैं। उन्हें देख मैं भी रघु बन जाता था। सिर्फ यही इरादा बन जाता कि रघु के तौर पर मुझे लायक से बेइंतहा नफरत करनी है। उन्हें पीटना-मारना है। हम दोनों के तार पहले दिन से ही बैठ गए। इस पिक्चर में हम दोनों कपल हैं।
-‘बदलापुर’ करने के लिए सबने आप को मना किया। आप के बड़े भाई की क्या राय थी?
सिर्फ वे ही सपोर्टिव थे। उन्होंने कहा कि ‘बदलापुर’ जरूर करो, क्योंकि उनको विश्वास था कि मैं रघु को निभा लूंगा। उन दिनों वे अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहे थे तो उनकी दाढ़ी  बढ़ी हुई थी। मुझे विचार कौंधा कि रघु के बढ़े हुए ऐज का लुक वैसा ही रहेगा।
- आपने कहा कि हर किरदार के कार्य-कारण की ठोस वजह है। यानी विलेन की करतूतें भी जायज हैं?
यही तो इस फिल्म की यूएसपी है कि फिल्म में कौन विलेन है वह लोगों को तय करना होगा। रघु विलेन है या लायक, वह आप विभेद नहीं कर सकते। जब हम किसी आतंकी की बैक स्टोरी पता करते हैं तो मालूम पड़ता है कि उसने जान-बूझकर हथियार नहीं उठाए। मुझे हैरानी होती है कि लोग आतंकी क्यों बनते हैं? मैं यह नहीं कहता कि वे दया के पात्र हैं, लेकिन उनके खूनी बनने की वजहों की पड़ताल भी जरूरी है। तो हमने ऐसे सवालों के जवाब इस फिल्म में दिए हैं। मेरे ख्याल से यह फिल्म लोगों को प्रेरित करेगी कि अगर कोई क्रिमिनल बन रहा है तो उसे रोक लें।
- आपने यह फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के टाइम पर ही साइन की। फिर आज की तारीख में उसके आने की खास वजह?
‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के तुरंत बाद ‘मैं तेरा हीरो’ और ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ आ गई थी। मैं ‘बदलापुर’ को करने में वक्त लेना चाहता था, क्योंकि यह अलग किस्म की फिल्म है। मैंने कहानी समझने और किरदार को गढऩे में आठ से नौ महीने का वक्त लिया। रघु लोअल मिडिल क्लास फैमिली से बिलौंग करता है, जो असल में मैं नहीं हूं। ऐसे में उसकी जीवनशैली समझने के लिए श्रीराम राघवन ने मुझे 20-25 दिन मुंबई के पास ईगतपुरी इलाके में रहने को कहा। मुझसे दसियों दिन न नहाने को कहा गया। डार्क, डिप्रेसिंग कहानियां पढऩे, समझने को कहा गया। तब जाकर मैं शायद इस लायक बना कि रघु को बेहतर तरीके से निभा सकूं। मैंने उसके लिए अपनी आवाज तक बदली है। लिहाजा फिल्म अब आ रही है।



Monday, August 27, 2012

an interview with sriram raghvan

चवन्‍नी के पाठकों के लिए यह इंटरव्‍यू फिल्‍म रायटर्स सोसिएशन के साइट से कट-पेस्‍ट किया गया है.... Bang-bang, wham-wham! – Sriram Raghavan admits that childhood for him was a series of feature films, films like Born Free, Ben Hur and Hatari!, films that helped him get over the tedium of studies and school. Later, he was fascinated by Johnny Mera Naam, Sholay and Vijay Anand became an icon to look up to. The influence of those childhood films remains with him even today in himself and the films that he writes and makes.

It is likely that you will be treated with surprises triggering off like flying bullets if you are watching a Sriram Raghavan film. His name pronounces thrill and frolic. He is a master chef at maneuvering riveting cinematic experienceswhich take one back to his childhood. His films throw a keyed up audience into the middle of a suspenseful plot. You can let your hair down while watching gripping twists and turns in his movies.
With just three films, Ek Hasina Thi (2004), Johnny Gaddar (2007) and Agent Vinod (2012); he has become one of the most sought after writer-directors in Hindi mainstream cinema.

This Film & Television Institute of India alumnus, who has an uncanny knack of dealing with edgy subjects like con, killing, revenge and even secret agents, himself is a warm, down-to-earth personality. His candid fascination with the silver screen surfaces itself quietly freely as he talks about cinema with twinkling eyes and a perpetual smile.

He tells you how a few things didn’t quite go right with his last film Agent Vinod, in an unapologetic manner; “I knew the film was a little long, little bloated when it was being written but couldn’t crack that.” Ready to innovate and improvise till the very last minute as a director, Sriram confesses that he is rather undisciplined when it comes to writing. Apart from writing episodes of C.I.D. and Aahat; Sriram had made two short films, Raman Raghav (45 minute docudrama) and The Eight Column Affair (his student diploma film at FTII, edited by Rajkumar Hirani, which went on to win the National Film Award in 1987.

Surprisingly, at one point of time Sriram didn’t want to enter the film school. He recalls, “Saeed Mirza had told me something which I could never forget. He had said-- An institute will polish pebbles and dim diamonds.” Getting into the FTII almost did not happen. Sriram was assisting Mukul Anand in Khandala and had decided to skip the final interview. Luckily, the shooting got cancelled and Sriram showed up at FTII, just for the heck of it. The rest, as they say, is history.

(Excerpts from the interview-)

How did you get into films?
I have been fond of films since childhood. I found them better than school and at that time, they were your only escape as TV wasn’t around. I used to watch as many films as I could because my parents, especially dad, weren’t too enthusiastic about me watching too many films. Shridhar wasn’t even born at that time while I must have been just a kid. My parents allowed me to only go for films like Born Free, Ben Hur or Hatari!, but slowly I could go out of my own. I didn’t know what direction or filmmaking was all about. For me, films were a good escape to get lost into another word.

Then, I wanted to be a journalist and worked with some magazines. But I wasn’t particularly good at it as I had a very bad stammer at that time. After a few months, I backed out and joined Mukul Anand as an assistant. I had met him while doing an interview. I had told him, “I wish to know more about films.” His reply was, “Come and join me. However, there is no money.” I worked with him on his second film Aitbaar (1985) which had Dimple and Raj Babbar. Later, I joined the film school (FTII).

So you didn’t learn filmmaking between Apollo and Alankar, like your brother? Obviously, I did watch a lot of movies at these two theatres. We, me and my brother, discuss that though today we watch so many movie via different modes of viewing, like laptops, the scenes which we actually remember are from films like North By North West, Jewel Thief, Sholay, which we had watched at a very young age. These are the movies which I remember vividly. I may have seen a movie last week and even liked it but it comes and goes like that without leaving that great an impact.

What made you go for a formalized learning at FTII?
I was assisting Mukul while some of my friends were attempting the exam. I also went and took it. Due to the chance factor I got called for the interview. But I didn’t want to go because even though I was just a novice, I was actually enjoying working with Mukul.

We were shooting a song for Aitbaar in Khandala. Somehow, the shooting got cancelled for two days and while main artistes went away, rest of us stayed back. I thought of visiting my house in Pune as I was already close by. That was also the day of the interview and if shoot was there, I would not have gone.

Earlier, I had talked to Mukul about joining the film school. He was a far sighted kind of a person and told me that working with him would take me a few years to make my own film, whereas at the film institute, I could have made films instantaneously. He was also alert about the advent of TV and somehow, knew how big it was to become. He told me that though many people do without any formal learning it’s actually good to have it. “Just do it.” he said.

I had also met other filmmakers, including Saeed Mirza, while working as a journalist. I had asked Mirza if going to a film school was a better idea than doing a job and what he told me was something I could never forget. He had said, “An institute will polish pebbles and dim diamonds.”

Did FTII polish the pebble or dimmed the diamond?
(Chuckles) I have no idea. I think polished the pebble, probably.

How was the training at FTII?
I did the three year diploma in direction course at FTII. It’s a great place where one gets to watch so many films. The whole campus keeps abuzz with films screenings and subsequent discussions. Apart from the formal learning, the environment also acts upon you in an overall sense. The individual exercises also help you a lot. You try to come up with a masterpiece every time and end up making a not so good stuff. But one learns and keeps on learning from his mistakes.

How did you become a writer?
I do write stuff but I don’t think I am as prolific or disciplined as I should be. I write out of compulsion than choice. I enjoy writing but lack the discipline to sit and write. The shooting process is equally fun for me. So I finish shooting one film and then sit to write the other one. It takes me time. Now I am also trying to work with other people and collaborate, along with writing my own thing. Writing is fun for me but it requires major discipline which I need to get.

What happened after FTII?
I went to ISRO, Ahmedabad, for two years and was making documentaries on various social issues. Then I came back and for a while wasn’t doing anything. I used to write for B P Singh, the director-producer of CID and Aahat. My brother was actually writing the bulk of those episodes. But sometimes when he wasn’t free and a story was needed immediately, I would chip in. That would take care of few of my expenses. Then, I started directing some episodes of these two shows.

For almost 10 years I was trying to make a feature film but it wasn’t easy at that point of time. I made a film named Raman Raghav which never got released. I made it for a company named Media Classic which was into making Marathi TV serials.They wanted to do something on true incidents of Mumbai cops and gave me 5-6 stories based on old police case files which included the case of Charles Sobhraj escaping from the Tihar Prison.

Raman Raghav’s story was also one of them. I found him as a very fascinating character. He was probably India’s first Serial Killer. I had a lot of access to the cops who had actually worked on that case. I met all of them and got the required material. I came up with a script which was very dramatic. I had also spoken to Raghuvir Yadav and had told him about Raman Raghav’s life story; what he did and why, how he was caught and things like that.

One of the people I had met during my research was a psychiatrist who had examined and treated Raman. He told something which made a lot of sense to me. He said, “He is not criminal but a sick person. He has paranoid schizophrenia which is kind of a disease.” Then a few days before the shoot, I went back to my script and found it very fake. The murders were overly dramatic, while in reality there was no drama but a man compelled to do something. I felt the script was completely wrong and told my EP, “I will not use this script. I will just shoot what actually happened.” Of course, parts of the script remained but the drama was gone. I and Raghuvir Yadav shot it just like what had happened in reality. It didn’t remain fiction but something based on facts.

That film earned me some kind of recognition. Ramu (Ram Gopal Varma) saw it and asked me to write for him. This is how I got into writing.

What did you write after that?
I had been writing a couple of scripts for Ramu but he would back off midway saying “This is not what I want to do right now. I want to do something else.” There was one story involving an encounter cop which he wanted me to write. He gave me a lot of material while I also did some research. At one point he said “You will make this film.” My reaction was “Oh, I would love to.”

But I remember Company was just getting released at that time when he told me “I think it’s not the right time to make that film. The cops don’t want something like this to come out. Wait for some time.”

May be he saw that I was disappointed and then offered me another story to read. It was Ek Hasina Thi. It wasn’t a proper script but kind of a novelette written by a first timer. I read it and liked a lot of its elements. Then we sat and rewrote it to be made into a film.

Before that, I had mostly written for television. It’s only for B P Singh that I have written stuff which he directs otherwise, I write only what I have to direct myself. So would you say, for you, films are more important and writing is just a way to get them made?
Not really. Writing is of course a way of making films but it also has its own joy which one can relish. It’s just that for me, because I always wanted to make films eventually, all my writing got focused around what I could make or get produced. Once or twice people have told me to write for them but that was in a very initial phase. One film was even ready to be shot but then it didn’t happen. So finally the first script which I wrote was that of my own film. I wasn’t a writer first and then a filmmaker, I was a bit of both all the time.

Your first film came in 2004 and third film came in 2012. Would you say you are bit on the slow side?
Of course, there is no way I can avoid that. I am now trying to be prolific. Sometimes you don’t plan such delays, they just happen. Once you finish a film you do take six months to one year to write another one and that is time consuming. Apart from that, there are no excuses to such long gaps. I hope it doesn’t happen again.

Your brother (Shridhar Raghavan) is also a writer, any possibilities of collaborating with him? We keep talking about it but he is kind of a busy writer. We both actually want it to happen and it might happen soon. In fact, whenever he writes something he bounces it up to me. It’s like if he is writing something and I am doing something else, it’s bound to take both of us some time to reciprocate.

It’s just that we haven’t sat down together and worked on a project. We were supposed to work together for Agent Vinod but then that film was taking its own time in terms of when we were to start. So at one point of time he moved on and said “Ok, another time.” We will definitely work together. It’s like having a writer at home whose work I really like. I’d really like to work with him.
And Javed Akhtar?

I am fond of the films he has written. Personally, I have just met him once. There was a screenwriting seminar in Pune which Anjum (Rajabali) had organized. It was one of the firsts of its kind, around some 5-6 years back. He told me to speak about Salim-Javed and I readily agreed. I love Salim-Javed’s work and have grown up on their films like Zanjeer, Deewar, Sholay and Trishul. So I made some notes to come prepared and to my horror, I found Javed Saheb sitting right there in the audience! I got too nervous.

So I spoke to the audience that when I was 8-9 years of age, we used to listen to the radio which had slots for different kinds of programs, just the way TV has today. I told them about listening to the ad of Zanjeer. My father would be having a shave, few others kids would be waiting for me downstairs and I would be hearing: ‘Yaadon Kee Zanjeer Mein Lipta Hua Inteqaam Ka Shola’ followed by the ‘Diljalon’ song and ‘Prakash Mehra’s Zanjeer’ while getting ready for school.

All I can say is that I have watched Salim-Javed’s films at a very young age and they have left imprints on my mind. I have watched them many-many times as in those days, there used to be reruns in theatres. I have seen all these film 20-25 times each. That way, they get stuck in your mind and get tattooed. Even today when me and my brother, or even Rajat (Aroraa); get stuck somewhere we think of scenes from these movies.

What about Vijay Anand and his films?
Similar. I used to love Dev Anand as an actor. Probably the reason for it is that I could see films like Johnny Mera Naam and Jewel Thief at a young age. Quite at the same time while I watched Salim-Javed’s films.

We see a lot many movies and somehow, some of them stand out. May be it’s because of the way they are shot, directed and edited. Later on you learn to appreciate such films and get to know how Teesri Manzil is different from other thrillers. Vijay Anand and Hitchcock are directors whose works are textbooks for me. They are the people whose work I have liked first as viewer and then later on tried to figure out why their films worked so much.

As a writer, is there a particular genre you like to work in?
Not particularly. I have only done thrillers so far but I would like to explore other genres as well. In fact, I am currently writing a few things in other genres. It’s not like I am genre specific.

Even if I talk about Vijay Anand and Alfred Hitchcock; I mean a certain kind of thrillers. A crime novel or a crime film can explore whole lot of other things and I don’t feel restricted by doing a film in that genre.

From idea conception to actual shooting, what is your process of writing?
I wish I had done twenty films, only then I could have given a clear-cut answer. I am still finding my process. Right now, or rather so far, it’s a little haphazard. Writing with B P Singh was always a last moment kind of a thing. Friday I was asked to write something so that shooting could take place on Monday. The only motivation to write at that time was of getting paid. That could buy me some more time of my own.

It was like you know it’s a CID episode, so you work under that pressure and sometimes come up with good stuff and sometimes, not so good stuff.

The first film which I did, Ek Hasina Thi, was not actually my script. It was written by a writer named Pooja Surti and what she had written was actually like a novelette. Scenes were not defined, dialogues were little more descriptive and so on. But the essence of the story was there in that broad one-line: A girl who gets conned by a good-looking charmer eventually goes to jail where she gears up to take revenge. At that point of time, I was so desperate to make a movie that I would have probably said yes to whatever Ram Gopal Varma had given me.

What I liked about this story was that it had a love story in the beginning, followed by a jail drama section and then a revenge story in the end. So it was three different kinds of movies packed in one. I jumped on to it. Ramu asked me to flesh out the script and then we sat down and rewrote it in three months. A lot of things which made into the film actually happened while we were writing it.

What is your writing process right now?
Now I am in a different phase. On one hand I am trying to recharge myself after Agent Vinod and trying to watch as many movies, on the other I am also trying to write two scripts at a time. One I am writing on my own and another one I am writing with someone else. It’s an early stage for both these scripts where I just know the broad story. I am just jotting down scenes which I feel can happen in these films. I am not writing extensively but what I am putting together is a shoebox of ideas. One story is set in early 50s-60s and right now, what I am writing are all the possible things which can happen in that film. I can tell you only this much because after that, everything goes into a vague territory. Once I find my shoeboxes full, I will start putting pen to paper.

Somewhere the story also evolves in this kind of a process. Sometime later I will try and start writing it like the first draft of a script. Then I will write one version which is right up to the end. That is the way I wrote Johnny Gaddar. Good or bad, I write a draft till the very end. Usually it doesn’t come out good but it at least has some good points. Then you have something to improve upon. It’s a lot of rewriting actually.

Give examples from your films: What gets you fascinated to a subject and how you finish writing it?
I will take the case of Ek Hasina Thi. It has a very normal premise: A girl gets betrayed, gets into jail, escapes from there and takes her revenge. It’s not a very novel one-liner. Now what I liked is that the initial part was a love story.

So Pooja and I started working out scenes and as the first version, we wrote a very Yash Chopra kind of a love-story to establish how the relationship between the girl and the boy develops. Ramu felt we were keeping it too regular and suggested us to go a little edgier. Then he gave us a couple of leads on that. For example there was a scene which Ramu had suggested to us. There was scene in which she comes out of the supermarket, some thief snatches her bag and runs off. This main guy goes in, catches that guy and gets the bag back. She thanks him and he asks her for a cup of coffee. Now, Ramu suggested that the boy would make fun of the whole thing and say “Oh, that guy was a bit short, that’s how I could get him down.”

Similarly there is a scene in which some guys try to hassle her and he comes in and hits one of them breaking his arm. Later on he says “I broke his arm, I will have to pay him more money. I had paid them just to hassle you.” But you never know if he is lying or whether it actually happened. So these little ideas which Ramu gave us suited well to the character and made the film edgier.

We reached a point while scripting the movie where in spite of it being a thriller, there was nothing thrilling for the first 40 minutes. Ramu said, “People will think it’s a love story. Where is the thriller? We should try and inject something.” He told that since Karan, the character played by Saif (Ali Khan), is a mafia-related guy we should have had some hint of that background. To overcome this we tried to think of scenes which would not look like expository or explanatory kind of scenes. Then Ramu recalled a scene of Godfather 3 in which the lead pair is in bed when suddenly a sound is heard and a guy is found hiding. But if we had done some something too similar, it would have stood out reminding people of that film.

I think it was Pooja’s or Ramu’s idea because it wasn’t mine, but what we did was that these two are in bed when she suddenly she hears something and goes to the kitchen. We then hear her scream and we hold on Saif and wonder what happened inside. He goes there and finds that she is scared at finding a rat. That is kind of a false alarm and it also gets a laugh but I told myself “Even if it’s not the thriller I was looking for, there is some edge to it.” Then, thanks to that one scene, we got the whole motif of rats in the movie. We made her be a person who is scared of rats (Even I am terrified of rats myself!). We used rats even in the jail sequence and then again, in the absolute climax. It is magical how one gets something for one reason and then three-four more scenes fill in and suddenly it starts looking like something completely organized and planned. If we hadn’t thought about that scene in Godfather Part 3 we wouldn’t have got that sequence.

This is how ideas come in the real process of writing. What you end up with is pretty much what anyone else can write, but in the process, you have to be alert enough to keep getting those terrific little ideas otherwise, writing is a very painful and lonely kind of a thing. So one good idea can give you the momentum to do well and can charge you to go ahead.

How did Johnny Gaddar happen?
That was one script I had written even before my first film. I had seen Reservoir Dogs, Tarantino’s film, and had loved it. I read Tarantino speaking in an interview that he was so keen to make this film that he had thought of making it with newcomers in less than 50 thousand dollars. Of course, the script then went out to Harvey Keitel and became a big enough film with known actors who were willing to work in it because they loved the script.

So I thought it was a good route to take. I wanted to make a low-budget thriller without stars, with somebody new. I wanted to make it as cheap as I could. I am a big fan of the French Film Noir, filmmakers like Jean–Pierre Melville, the American Crime Thrillers of the 40s and so on.

That was the space, the world I was trying to work out. I had a list of movies like Kuberick’s The Killing and Blood Simple:All low-budget crime films. Then, I took the simple idea of ‘a caper which goes wrong’ and slowly, bit by bit, was trying to come up with a workable story. I had this story even before I met Ram Gopal Varma and made Ek Hasina Thi. So I had the script but didn’t have a producer or a financial backing. Even though it was a small-budget film nobody was interested in making it as it was about a new guy, whom nobody knew, committing all these murders. It was a very dark kind of film. So it never got made at that point but after Hasina Thi it got easier to make that film.

I also remember that much before Hasina Thi, I had also narrated it to Kundan Shah. I wanted Saif to play the title role and Kundan was working with him at that point of time.

I told him I wanted to narrate the story to Saif and he asked me to narrate it to him first. We sat at my house for a drink and chatted. But he didn’t like my story. He said “It’s just the plot which you’ve got, there is no character, story; there is no film in it.” I said it at least had an interesting plot. He then said one line which made a lot of sense to me, “The plot has no life and life has no plot.” From what he said, I understood that plot should be just an excuse to explore characters and go much beyond.

Though my script was named Johnny Gaddar even at that point of time, it wasn’t the film it became later on because it was only plot-driven. There was nothing else. Then after Hasina Thi I again took it up and rewrote it. Rewriting a script years later gives you an upper hand. I gave Dharamji’s character a wife and tried to look at each character like actual people while not thinking too much about the plot. Then, the plot and the characters kind of matched together.

What about Agent Vinod?
Vinod happened because of a meeting with Saif where both of us discussed the spy films we loved as kids, like the Bond franchise. We talked about the original Agent Vinod, starring Mahendra Sandhu, which both of us had loved. He asked me to try and do something like that. I didn’t want to remake the old film for sure because if you watch it today, it comes across as a spoof on other Bond and spy films.

So we took the title, because it sounds retro and cool, and tried to make our own contemporary film. Ours was a today’s film with a different story – only the title was borrowed from the old film.

Frankly speaking, Agent Vinod hasn’t done well enough to match our expectations but that’s a part of the game. We did spend a lot of time making it and had worked really hard on it.

Why do you think it didn’t work as you had thought it would?
After a thing hasn’t worked, every answer seems to have some value. I really can’t say. I knew the film was little long, little bloated when it was being written but couldn’t crack that. The story had already been defined in a certain way. It was a 2 hrs 40 min film which was too long for an action-thriller spy movie. It should have been only 2 hrs. But I felt it would not bother anyone if they enjoy it. Today, Anurag (Kashyap) has made a 5 hrs long film. So, if you like it you watch it; it’s not about time or length.

I don’t know the real reasons behind Agent Vinod’s poor run though I have tried to analyze. I had a co-writer for that movie, a guy named Arijit Biswas. We had spent time thinking of a good story but then we felt, we should take a very standard kind of a story. What happens in most of the spy films? -- The agent saves the world. Bond films are not about stories; they are about sequences, locations, moments and things like that. If you look at the story of Casino Royale, it is quiet a nonsensical story. I can point out more flaws in it than I have in my own film. But it doesn’t matter because it’s about the rush and the excitement which you get and which has been promised in the title.

When my film got released, many people had expected a Johnny Gaddar kind of a story. This movie wasn’t clever in that sense. And this might be one among those few reasons which I can think of after the film hasn’t done well. But I won’t be able to pin point one exact reason. May be there was a flaw in the script which for some reason I couldn’t crack. Now I have to let it go.

One flawed scene which I can think of is when Kareena’s character goes to discover the villain. There were so many cops around but she doesn’t tell them and goes all alone. That was something which seemed weak on paper itself but sometimes you try to get over these things as a director. But sometimes the problem just doesn’t get solved. I can’t make out why the movie didn’t work. All I do is to listen to the reasons which people tell me. Obviously, I have learnt from them and if I would get a chance to make another such movie, I would probably make new mistakes.

Many critiques say your films are about films. What would you say to your style of injecting references to your favorite films?
I don’t sit with a list telling myself which movies I should pay homage to. My films are about films in a way that probably most of my experiences are from films. All that I know is from films and somehow it shows up.

Having references to other movies is something which is fun. But it should not be in- your-face and hamper the story. A film can’t highlight such elements as some private jokes which only I and a few people can understand. That’s not the virtue. You can do that but it doesn’t help the film in an overall sense.

In Johnny Gaddar it all happened on its own. In fact, only after I read the reviews I could realize that there were so many references. I hadn’t thought that people were going to make a list of them. In the initial draft of the film, there was no reference to Parwana. But I remember from my childhood that it has a nice sequence of a guy taking a train, going somewhere else and creating an alibi for himself. So, I knew that the idea was from there. I asked Pooja, my co-writer of Ek Hasina Thi, “What if the remote gets switched on accidentally when these two are in bed and they find Parwana running on TV?” She laughed and agreed that it was a fun thing to do.

Later on, I used this idea in Johnny Gaddar where the protagonist watches Parwana on TV and then, formulates a plan. Otherwise how do you tell your audience that he has suddenly decided to steal the money? How do you visually do that? So that’s where Parwana came in.

In a similar incident, once Neil Nitin Mukesh had read the script and everything else had also got finalized, I went to meet his father Nitin Mukesh. He asked me why the film was titled Johnny Gaddar. I said “There is no reason, expect the fact that I like Johnny Mera Naam and this guy is a gaddar.” But he was apprehensive about this odd title and said “But still, why not a simpler name?” We had already started shooting for the film and I thought it was a question which needed to be answered.

Then there was a scene which has Vikram (Neil Nitin Mukesh’s character) going to a hotel in Pune and there he has to register himself. He would have normally said any name but not his actual one. So I thought what if the receptionist is watching the film Johnny Mera Naam on TV? It keeps coming on Sony and even today I end up watching it again and again.

One of my favorite scenes in Johnny Mera Naam is that of the confrontation between Pran and Dev Anand at the top of a hill. They fight with each other and then realize that they are actually brothers. So I thought what if that “Bol Kya Naam Hai Tera?” dialogue is being played out on TV at the hotel reception? So it clicked just like that. Then the receptionist asks about the surname in Marathi and Vikram doesn’t get it so he says “Ji?” The guy writes down the name as “Johnny G.” in his register, which eventually becomes allegoric to the title Johnny Gaddar. So again it’s like some magic idea which happens but not all the time.

Today, why do you think there are more writer-directors than sole writers or sole directors? There is no trend behind it. I think most of the directors would prefer to be given a superb script. Then they just have to shoot it and enhance in whatever manner they can. But you don’t get those scripts so easily. Somehow most writers, like Abbas Tyrewala, began as writers and then turn directors. I think other than Shridhar (Raghavan) and a few more people, majority of writers have gone this way. As directors we do write our own stuff but say for example, you have a subject and I find it interesting why would not I make a film on it? I would love to do that. So it’s not like I only direct what I write.

Does a scriptwriter contribute to the situations for songs?
I think yes, definitely. I love songs in movies. Hasina Thi didn’t have scope for songs because we were not going for that conventional love-story but it had a background score. Johnny Gaddar had a lot of music but not songs in the usual sense. For Agent Vinod, I knew I had to have songs in it because it was a big budget movie. I didn’t want a situation where someone tells me afterwards that there are four songs which need to be put in and then to wonder where do I put them.

At writing level, we are clear what can be a song situation. In Vinod, most of the songs happen while the scenes unfold. But there is no lip-sync song where the hero suddenly bursts into singing. Every song had a definite placement and has some part of the story unfolding at that time.

I can give examples how it was done in earlier films. If you take a movie like Guide and remove all its songs, it would collapse. The songs tell you so much about the character, the story and so on. With due respect to Guide, all I want to say is that I love music in films but I can’t have a hero suddenly bursting into mouthing a song.

So no lip-sync for you?
Nothing like that! I would love to do it if I get a chance. Maybe I should do it out of a gut feeling! Mostly, my films are set in realistic zones so I am bit wary of how to make that look convincing. To break that, is not easy, but people have done it. Rangeela does that beautifully – very realistic film, expect the songs are treated like a musical. So you have to find your own method to do it.

What about your future projects? Is it true that you have signed for a fantasy film, Happy Birthday with Ramesh Sippy, which will star Shah Rukh Khan and Aishwarya Rai Bachchan? Happy Birthday is a subject which is very close to me. I was to do it 2-3 years back with Mr. Ramesh Sippy but there were date issues with the actors. Most importantly, I wasn’t also happy with the climax. I didn’t have the last 30 percent, so to say, and what I had was not good enough to make me happy. I told Rameshji that I could shoot it till what I had with me and was sure that the rest would get cracked in the meanwhile. But I didn’t know how.

He got worried anticipating too many changes happening later and asked me to put it on hold. Later on, I had solved the problem but by then I had lost the dates of the actors. That is one film I want to do but it’s not immediately going into production. There is time for that. Right now I am actually writing another thriller. Luckily, I have got 3-4 producers who are interested in working with me. I am just taking off time in watching movies and planning things and maybe a bit later, will decide upon what I have to finalize.

How much time does it take you to write a subject?
I have not written too many films. Each of my films has taken its own time. From now on probably I will know if it takes me 3 months or 6 months. Otherwise, I feel, Agent Vinod has taken the longest time. Its first version took 6-9 months. That period also included a lot of reading, research and false starts.

At some point, we deiced about the characters and the story we wanted to tell. Then we began writing. Vinod, for me, was mostly about the sequences. It wasn’t about the story, really. It was meant as much for kids. Even the title Agent Vinod is not like Tinker Tailor Soldier Spy where I could have gone into serious examination of a RAW agent’s life. It meant for a fun ride. The idea was – What if there could be an Indian Bond?

I know I am not answering your question and talking more about Agent Vinod. I had decided that it wasn’t meant to be an ‘adults only’ film. Both my earlier films were not for kids. So, I deliberately kept the violence on a very fun level. Therefore, even when Vinod is tortured he is just given a serum otherwise they would probably break his knuckles and do things which are done to a spy. But here I went for a fun approach.

That is probably why many critiques felt that it did not have the cleverness of Johnny Gaddar. Well, it wasn’t meant to be but they can have their own perceptions.

If you were to take a class on script writing, what would you tell to young writers who look up to you?
I don’t teach script writing. Sometimes I go to such classes just to share my experiences. I talk about things like - What it was, what it became, how does a scene change or evolve, why had I shot it in a certain way etc. I don’t have a very academic approach to writing.

How do you teach writing? How do you teach someone to tell a joke? It’s just has to be done. I meet a lot of writers and get a lot of scripts of which out of 10, 8 are bad or unreadable. I don’t have an answer to why that happens.

I think writing is rewriting. Many people write a draft and feel they are done but maybe there is just a germ of an idea there. Maybe, there is something good which one can encapsulate.

I write till the day I go for the shoot. My scenes are open for improvement till the last moment which is one reason I don’t believe in a completely bound script. I keep one door open all the time so that I can incorporate if I get something better. Of course, I would not say tomorrow suddenly that I want a giraffe on the set but within the scene, within the dialogues, it can improve to a large extent. In Vinod, maybe I overdid that. Sometimes you should also know where to stop.

Friday, March 23, 2012

फिल्‍म समीक्षा : एजेंट विनोद

review : agent vinodचुनौतियों से जूझता एजेंट विनोद
-अजय ब्रह्मात्‍मज

एक अरसे के बाद हिंदी में स्पाई थ्रिलर फिल्म आई है। श्रीराम राघवन ने एक मौलिक स्पाई फिल्म दी है। आमतौर पर हिंदी में स्पाई थ्रिलर बनाते समय निर्देशक जेम्स बांड सीरिज या किसी और विदेशी फिल्म से प्रभावित नजर आते हैं। श्रीराम राघवन ऐसी कोशिश नहीं करते। उनकी मौलिकता ही एक स्तर पर उनकी सीमा नजर आ सकती है, क्योंकि एजेंट विनोद में देखी हुई फिल्मों जैसा कुछ नहीं दिखता। एजेंट विनोद उम्मीद जगाती है कि देश में चुस्त और मनोरंजक स्पाई थ्रिलर बन सकती है।

ऐसी फिल्मों में भी कहानी की आस लगाए बैठे दर्शकों को इतना बनाता ही काफी होगा कि एक भारतीय एजेंट मारे जाने से पहले एक कोड की जानकारी देता है। वह विशेष कुछ बता नहीं पाता। एजेंट विनोद उस कोड के बारे में पता करने निकलता है। दिल्ली से दिल्ली तक के खोजी सफर में एजेंट विनोद पीटर्सबर्ग, मोरक्को, रिगा, पाकिस्तान आदि देशों में एक के बाद एक चुनौतियों से जूझता है। किसी वीडियो गेम की तरह ही एजेंट विनोद की बाधाएं बढ़ती जाती हैं।

वह उन्हें नियंत्रित करता हुआ अपने आखिरी उद्देश्य की तरफ बढ़ता जाता है। श्रीराम राघवन ने एजेंट विनोद की बहादुरी दिखाने के लिए रोमांचक दृश्य गढ़े हैं। अपने नाम के अनुरूप एजेंट विनोद विनोदी और कूल है। दुश्मनों से घिरे रहने पर भी वह ठंडे बीयर की चाहत रखता है और मौका मिलने पर चुटीले मुहावरे बोलने से बाज नहीं आता।

सैफ अली खान ने लेखक-निर्देशक श्रीराम राघवन की कल्पना को शिद्दत और बहादुरी के साथ पर्दे पर उतारा है। एक्शन दृश्यों में सैफ जमते हैं। अच्छी बात है कि एक्शन दृश्य अविश्वसनीय नहीं हैं। हाथों और हथियारों से लड़ते समय एजेंट विनोद की तेजी और तत्परता प्रभावशाली लगती है। कई देशों, शहरों और घटनाओं में हम एजेंट विनोद को संलग्न देखते हैं। फिल्म की स्क्रिप्ट इतनी चुस्त और सटीक है कि कहीं कोई झटका या जंप नजर नहीं आता।

सैफ अली खान को उनके सहयोगी कलाकारों का भरपूर समर्थन मिला है। प्रेम चोपड़ा, गुलशन ग्रोवर,रवि किशन और जाकिर हुसैन जैसे परिचित कलाकार तो हैं ही। आदिल हुसैन, अंशुमान सिंह और बीपी सिंह जैसे नए कलाकार भी पीछे नहीं रहे हैं। पाकिस्तानी एजेंट के इरम के रूप में करीना कपूर जंची हैं।

हिंदी की उन चंद फिल्मों में एजेंट विनोद शामिल है, जिसमें पाकिस्तान का चित्रण करते समय उसे दुश्मन देश केरूप में नहीं दिखाया गया। फिल्म बड़ी सफाई से संदेश देती है कि भारत की तरह पाकिस्तान में भी कुछ लोग हैं जो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं, लेकिन दोनों देशों में कुछ अधिकारी और एजेंट ऐसे भी हैं जो अमन चाहते हैं। वे इंटरनेशनल साजिश के खिलाफ लगे हैं। एजेंट विनोद का यह संदेश महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। एंटरटेमेंट और एक्शन के बीच इस पर भी गौर करना चाहिए।

फिल्में अपने समय का आईना होती है। फिल्म में जिम्मी का भारत प्रवेश और उसके बाद की सुरक्षा चौकसी देखते हुए 26-11 के दृश्य याद आते हैं। श्रीराम राघवन ने बगैर उल्लेख किए उन स्थितियों का चित्रण किया है, जो 26-11 के समय हम ने भारतीय टीवी पर लाइव देखा था। निश्चित रूप से फिल्म में कुछ कमियां हैं। कई दृश्यों में लंबी पूछताछ और जांच के बाद भी स्मार्ट सैफ को देख कर आश्चर्य होता है, लेकिन कुछ दृश्यों में उनके सूजे होंठ, घायल चेहरे और फूली आंखें वास्तविक लगती हैं।

श्रीराम राघवन ने कला निर्देशक और कैमरामैन के सहयोग से लोकेशन को विहंगम और वास्तविक रूप दिया है। फिल्म की शुरुआत में ही अफगानिस्तान के वीरानों में छावनी के धूसर दृश्य फिल्म का मूड बना देते हैं। सभी शहरों को कैमरामैन ने नए तरीके से कहानी के संदर्भ में पेश किया है।

*** 1/2 साढ़े तीन स्टार


Thursday, March 22, 2012

रिएलिस्टिक स्पाई थ्रिलर है एजेंट विनोद

interview : shriram raghwan-अजय ब्रह्मात्‍मज

श्रीराम राघवन की तीसरी फिल्म है एजेंट विनोद। उनकी पहली फिल्म एक हसीना थी के हीरो सैफ अली खान थे। तभी से दोनों एक स्पाई थ्रिलर के लिए प्रयासरत थे। एजेंट विनोद के निर्माण में ढाई साल लग गए,लेकिन श्रीराम राघवन मानते हैं कि ऐसी फिल्मों में इतना समय लग जाना स्वाभाविक है।

एजेंट विनोद किस जोनर की फिल्म है? कुछ लोग इसे थ्रिलर कह रहे हैं तो कुछ मान रहे हैं हैं कि यह हिंदी में जेम्स बांड टाइप की फिल्म है?

यह स्पाई फिल्म है। हिंदी या किसी भी भाषा में आप स्पाई फिल्म बनाएंगे, तो लोग उसे जेम्स बांड टाइप ही कहेंगे। जेम्स बांड की फिल्मों की तरह एजेंट विनोद में भी कई लोकेशन हैं, ढेर सारे वन लाइनर हैं, रहस्यात्मक कहानी है। फिर भी हमने जेम्स बांड की कॉपी नहीं की है। बांड का प्रभाव जरूर है। उसे मैं स्पिरिट ऑफ बांड कहूंगा।

हमारे पास बांड का बजट नहीं है। जेम्स बांड की फिल्में 1000 करोड़ में बनती हैं। मैंने हिंदी फिल्मों की परंपरा से प्रभाव लिया है। आंखें, यकीन, चरस, ब्लैकमेल जैसी फिल्में आपको याद होंगी। मेरी कोशिश है कि दर्शकों को भरपूर मनोरंजन मिले। यह आज की कहानी है। रियल समय में चलती है। इसमें एक स्टाइल है। यह मेरी तीसरी फिल्म है और मुझे लगता है कि मैं मेनस्ट्रीम के ज्यादा करीब आ गया हूं। इसमें एक्शन भी है, गीत भी है, एक्टिंग भी है, डांस भी है।

जेम्स बांड तो कोल्ड वार का प्रोडक्ट था। एजेंट विनोद क्या आज के ग्लोबल टेररिज्म का प्रोडक्ट है?

इसमें टेररिज्म के तत्व हैं, लेकिन मेरा फोकस एजेंट विनोद पर है। यह ट्रेजर हंट की तरह है। फिल्म के शुरू में एक एजेंट की हत्या होती है। मरने के पहले वह एक नंबर बोलता है। उस नंबर को समझने के लिए एजेंट विनोद अपनी खोज आरंभ करता है। दर्शक एजेंट विनोद के साथ चलते हैं। उसी के नजरिए से कहानी अनफोल्ड होती है। इस खोज में दर्शकों को एडवेंचर का आनंद मिलेगा।

एजेंट विनोद पहले रूस जाता है। रूस के बाद वह मोरक्को जाता है। मोरक्को में उसे करीना कपूर मिलती है। वह एक रहस्यमयी लड़की है। वह उस पर भरोसा करता है, पर आशंकित भी रहता है। वहां से फिर एक गुप्त जगह पर जाता है। आखिरकार उसकी खोज पूरी होती है। आतंकवादी गतिविधियों की जो खबरें हम पढ़ और देख रहे हैं, वह सब इस फिल्म में आता है।

इस फिल्म का नाम एजेंट विनोद ही क्यों? मेरा सवाल विनोद को लेकर है। यह आठवें-नौंवे दशक का नाम लगता है?

चार साल पहले सैफ के साथ हम यूं ही बात कर रहे थे। हमदोनों अपनी-अपनी पसंद की फिल्में शेयर कर रहे थे। बांड की फिल्मों की भी बातें हुई। हिंदी फिल्मों में हम दोनों की कॉमन पसंद एजेंट विनोद निकली। महेंद्र संधू की यह फिल्म सालों पहले आई थी। मैंने यह फिल्म स्कूल के दिनों में देखी थी। आज यह फिल्म पुरानी लग सकती है, लेकिन उसमें भरपूर मस्ती है। हमने तभी तय किया कि इसी नाम से हम फिल्म बनाएंगे। यह रीमेक नहीं है। हमने सिर्फ टाइटिल दिया है। आपने सच कहा कि यह पुराना नाम लगता है, लेकिन इस नाम में एक आकर्षण भी है। यह टाइटिल ध्यान खींचता है। चूंकि इस नाम की एक फिल्म बनी हुई थी,इसलिए यह नाम हमारे दिमाग में आया। अन्यथा हम कोई और नाम भी रख सकते थे।

अभी के एक्शन और मौज-मस्ती के दौर में क्या स्पाई फिल्म को दर्शक मिलेंगे?

हमें याद है कि विजय आनंद और राज खोसला ने कई सारी सफल थ्रिलर फिल्में बनाई, लेकिन पिछले दो दशकों में प्रेम कहानियां और एक्शन प्रधान फिल्में ही बन रही हैं। सचमुच, मिथुन चक्रवर्ती की सुरक्षा के बाद थ्रिलर फिल्में आनी बंद हो गई थी। अब्बास-मस्तान के थ्रिलर में रोमांस ज्यादा रहता है। बीच में अनिल शर्मा की हीरो आई थी, लेकिन इस स्पाई स्टोरी में भी लव स्टोरी घुस गई थी। मुझे भी आश्चर्य होता है कि पिछले 10-15 सालों में कोई स्पाई स्टोरी या थ्रिलर फिल्म क्यों नहीं आई? अभी मैंने सुना है कि विद्या बालन की कहानी लोगों को पसंद आई है।

एजेंट विनोद के साथ एक रहस्य जुड़ा हुआ है कि इस फिल्म को पर्दे पर आने में इतना समय क्यों लगा?

न जाने कैसे एजेंट विनोद शुरू होने से डेढ़ साल पहले खबरों में आ गई थी। जॉनी गद्दार खत्म करने के बाद ही इसकी चर्चा होने लगी थी। सही बात बताऊं तो इसमें कुल ढ़ाई साल लगे। स्क्रिप्ट मैं खुद लिखता हूं। इसलिए उसमें समय लगा। दूसरे लिखने के बाद, जब मैं लोकेशन पर गया, तो वहां के नक्शे के हिसाब से फिर से कहानी में बदलाव किया। अब जैसे कि एम्सटर्डम में शूट करना चाहता था, लेकिन यह मुमकिन नहीं हो पाया। लिखते समय हमने कल्पना की उड़ानें भरीं। उन्हें पर्दे पर लाने में अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

एजेंट विनोद में सौ से ज्यादा लोकेशन है और किसी भी लोकेशन का दुहराव नहीं है। यह फिल्म लगातार चलती रहती है। इंटीरियर ड्रामा बहुत कम है। फिल्म देखते समय आप महसूस करेंगे कि हमने इतना समय क्यों लिया? यह कोई एक्सक्यूज नहीं है। आमतौर पर इतना समय नहीं लगना चाहिए। यही फिल्म हॉलीवुड में रहती, तो प्री-प्रोडक्शन में ज्यादा समय लेकर छह महीने में शूटिंग कर लेते। हमलोग दोनों काम एक साथ करते रहते हैं।पहले की दोनों फिल्में एक हसीना थी और जॉनी गद्दार आप ने अनेक सीमाओं और बंधनों के बीच की थी। सुना है इस बार आप को फ्री हैंड मिला था?

पहले की फिल्मों में थोड़ी सीमाएं थीं। एजेंट विनोद अलग तरह की लो बजट फिल्म है। यहां लो का मतलब कम नहीं, लेना है। मैंने जो भी मांगा, वह मिलता रहा। इस फिल्म और फिल्म के कैरेक्टर के साथ सैफ का जुड़ाव ज्यादा था। उन्होंने ठान ली थी कि यह फिल्म करनी है। शायद उनके बचपन का सपना था कि एक स्पाई फिल्म करेंगे। बचपन में चोर-सिपाही खेलते हैं। मुझे लगता है वहीं से इसका वायरस उनके दिमाग में घुसा होगा। सैफ लव स्टोरी और रोमांटिक फिल्मों में भी अच्छे लगते हैं, लेकिन उनमें पूरा मन नहीं लगता। सैफ ने बजट की कोई सीमा नहीं रखी। फिल्म महंगी जरूर हो गई है। दर्शकों को अच्छी लगी, तो सब कुछ वसूल हो जाएगा।

हीरो अगर निर्माता हो, तो फायदा होता है?

जरूर। उसे मालूम रहता है कि फिल्म की जरूरतें क्या-क्या हैं? इस फिल्म में दो दिनों की शूटिंग के लिए हमलोग रूस गए थे। छोटा यूनिट लेकर गए। फिर भी पैसे तो खर्च हुए। कोई और निर्माता होता, तो किसी कम खर्चीली जगह पर शूट करने के लिए दवाब डालता। हमारी कोशिश थी कि रूस का फ्लेवर आए। स्पाई फिल्म में रूस दिखे, तो कहानी का रहस्य बढ़ जाता है। निर्माता के तौर पर सैफ ने मेरी बात मानी। होम प्रोडक्शन होने के कारण उन्हें खुद को फीस नहीं देनी पड़ी।

सैफ से आप की दोस्ती कब हुई?

एक हसीना थी की शूटिंग के समय ही हुई थी। तब तक सैफ का नाम तो हो गया था, लेकिन एक्टर के तौर पर पहचान नहीं बनी थी। रामगोपाल वर्मा ने हम दोनों पर भरोसा करते हुए एक हसीना थी सौंप दी थी। एक हसीना थी ज्यादा नहीं चल सकी थी, फिर भी हम दोनों को सराहना मिली। मेरे लिए तो वह पहली फिल्म थी। सैफ के कॅरियर में वह टर्निग प्वाइंट साबित हुई। उसके बाद इंडस्ट्री ने उन पर ध्यान दिया। अलग-अलग तरह के रोल दिए। हमारे बीच एक कंफर्ट लेवल है। हमारे झगड़े भी होते हैं। हम लोग नाराज भी हो जाते हैं। यह सब फिल्म के लिए होता है।

इस फिल्म में करीना कपूर का चुनाव कैसे हुआ?

जब मैं फिल्म लिख रहा था, तभी सैफ बार-बार पूछते थे कि हीरोइन का कैरेक्टर कैसा बन रहा है। उनके दिमाग में अवश्य करीना रही होंगी। मैंने भी कहा कि करीना अच्छी एक्ट्रेस हैं। उन्हें फिल्म के लिए चुना जा सकता है। मेरे दोस्तों ने जरूर चिंता जताई कि रीयल लाइफ कपल पर्दे पर नहीं जमते। उनकी कुर्बान भी नहीं चली थी। इन बातों से मैं परेशान नहीं था। रोल और कैरेक्टर में वे फिट बैठती थी। इस फिल्म में दोनों कुछ इस ढंग से आते हैं कि दर्शककेमिस्ट्री वगैरह की चिंता नहीं करेंगे। शुरू में ही सब कुछ सेट हो जाता है।

बाकी कौन से एक्टर हैं?

लंबे समय के बाद प्रेम चोपड़ा दिखाई देंगे। वे खलनायक के तौर पर आए हैं। राम कपूर, आदिल हुसैन, धृतिमान चटर्जी, रविकिशन और गुलशन “्रोवर हैं। दिल्ली का एक नया लड़का अंशुमान सिंह भी फिल्म में है। दर्शक उसे नोटिस करेंगे। सेकेंड हाफ में वह एक खास किरदार में आता है।

फिल्म में गाने और मुजरा तक हैं। ये आपकी पसंद है या बाजार का दबाव?

मुजरा का एक सिचुएशन है। उस सिचुएशन के हिसाब से मुजरा बनाया गया है। हमारी दिक्कत है कि उस सीन में हम पूरा मुजरा नहीं दिखा सकते। अगर थोड़ा दिखाएंगे, तो दर्शक मानेंगे कि हमने धोखा दिया। हमने तय किया है कि उसे फिल्म के अंत में दिखाएंगे और टीवी प्रमोशन में इस्तेमाल करते रहेंगे। वह हिट गाना हो गया है। फिल्म देखते समय दर्शक रियलाइज कर लेंगे कि मुजरा कहां पर होता।

सैफ के बारे में क्या कहेंगे?

मुझे खुद नहीं कहना चाहिए, लेकिन उन्होंने शानदार काम किया है। इस कैरेक्टर को निभाने का वह पूरा आनंद उठा रहे थे। पर्दे पर उसे आप महसूस करेंगे। एजेंट विनोद में सिर्फ एक्शन नहीं है। इमोशन भी है। सैफ इवॉल्व्ड एक्टर हैं।

एजेंट विनोद का आइडिया कब और कैसे पैदा हुआ?

सैफ के साथ तय हो जाने पर कि स्पाई फिल्म बनानी है, मैंने कुछ लेखकों को अप्रोच किया। लेखकों से मुझे अपनी स्क्रिप्ट नहीं मिल पा रही थी। मैं दिखाना चाहता हूं कि आज का रॉ एजेंट कैसा होगा। मैंने ढेर सारे स्पाई नॉवेल पढ़े हैं। फिल्में तो सारी देखी हैं। उन सभी का निचोड़ लेकर मैंने अपनी कहानी लिखी है। ऐसी फिल्मों में कोई कहानी नहीं होती। एक उद्देश्य होता है, जिसे फिल्म का हीरो पूरा करता है। मैंने अभिजीत विश्वास की मदद ली है।

पूरी फिल्म सीक्वेंस बाई सीक्वेंस खुलती जाती है और दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ती जाएगी। इस फिल्म को देखते समय टिनटिन कॉमिक्स का मजा आएगा। ट्विस्ट और टर्न ढेर सारे हैं। एंटरटेनिंग स्पाई फिल्म है। जब मैं इसे लिख रहा था, तभी 26/11 की घटना हुई थी। मैं कल्पना करता था और टीवी देखता रहता था। दोनों में एक क्लैश चलता रहता था। रीयल घटनाएं मेरी कल्पना से ज्यादा जानदार थीं। मैं उनसे भी प्रभावित हुआ। फिल्म में मैंने एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। यह फिल्म फिक्शन है, लेकिन देशों और शहरों के नाम रीयल हैं। एजेंट विनोद जैसी घटनाएं या कहानी हो सकती हैं। अभी तक ऐसा कुछ हुआ नहीं है।

इसका मतलब भविष्य में फिल्म से प्रेरित होकर कुछ हुआ तो सारा दोष आप पर आएगा?

ऐसा होना तो नहीं चाहिए। अगर हो ही गया, तो एजेंट विनोद भी रहेगा उसमें। वह सब को बचा लेगा। दरअसल मैं एक रियलिस्टिक स्पाई थ्रिलर फिल्म लेकर आ रहा हूं। इसमें मस्ती, एक्शन, रोमांस और मजा है। इस फिल्म को देखते समय पूरा ध्यान पर्दे पर रखना होगा। अगर आप कुछ मिस करेंगे, तो फिल्म समझने में दिक्कत हो सकती है।