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Friday, April 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बेगम जान



फिल्‍म रिव्‍यू
बेगम जान
अहम मुद्दे पर बहकी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिलली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति...फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा। यही होता भी है।
बाल विधवा हुई बेगम जान पहले रंडी बनती है और फिर तवायफ और अंत में पंजाब के एक राजा साहब की शह और सहाता से कोठा खड़ी करती है,जहां देश भर से आई लड़कियों को शरण मिलती है। दो बस्तियों के बीच बसा यह कोठा हमेशा गुलजार रहता है। इस कोठे में बेगम जान की हुकूमत चलती है। दुनिया से बिफरी बेगम जान हमेशा नाराज सी दिखती हैं। उनकी बातचीत में हमेशा सीख और सलाह रहती है। जीवन के कड़े व कड़वे अनुभवों का सार शब्‍दों और संवादों में जाहिर होता रहता है। कोइे की लड़कियों की भलाई और सुरक्षा के लिए परेशान बेगम जान सख्‍त और अनुशासित मुखिया है।
आजादी मिलने के साथ सर सिरिल रेडक्लिफ की जल्‍दबाजी में खींची लकीर से पूर्व और पश्चिम में देश की विभाजन रेखा खिंच जाती है। नक्‍शे पर रेखा खींचते समय रेडक्लिफ का एहसास भी नहीं रहता कि वे अहम मुद्ददे पर कैसी अहमक भूल कर रहे हैं। उन्‍होंने तो रेखा खींच दी और चुपके से ब्रिटेन लौट गए,लेकिन पंाब और बंगाल में विभाजन की विभीषिका में लाखें बेघर हुए और लाखों को जान-माल की हानि हुई। इसी में बेगम जान का कोठा भी तबाह हुआ और कोठे की लड़कियों को आधुनिक पद्मसवती बनी बेगम जान के साथ जौहर करना पड़ा।
लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया,लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए। उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं,लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।
बेगम जान का किरदार एकआयामी और बड़बोला है। वह निजी आवेश में स्थितियों से टकरा जाती है। उसे राज साहब से भी मदद नहीं मिल पाती। लोकतंत्र आने के बाद राजा साहब की रियासत और सियासत में दखल पहले जैसी नहीं रह गई है। रेडक्लिफ लाइन को बेगम जान के इलाके में लागू करवाने के लिए तैनात श्रीवास्‍तव और इलियास कंफ्यूज और भवुक इंसान हैं,लेकिन वे बेरहमी से काम लेते हैं। बाद में उनका पछतावा पलले नहीं पड़ता। इतने ही संवेदनशील थे तो उन्‍हें कबीर की मदद लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? और कबीर का किरदार...माफ करें भट्ट साहब और श्रीजित कबीर समन्‍य और समरसता के प्रतीक हैं। उनके नाम के किरदार से ऐसी अश्‍लील और जलील हरकत क्‍यों? इसे सिनैमैटिक लिबर्टी नहीं कहा जा सकता।
बहरहाल, विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है,लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं,लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों(दर्जन भर)े ने बेहतर काम किया है। मास्‍टरजी और सुजीत बने अभिनेताओं विवेक मुश्रान और पितोबोस का काम यादगार है।
फिल्‍म में चित्रित होली रंगीन और आह्लादपूर्ण हैं। रंगों की ऐसी छटा इन दिनों विरले ही दिखती है। फिल्‍म भावुकता और संवादों से ओतप्रोत है,जो संयुक्‍त रूप आलोडि़त तो करती है,लेकिन कहीं पहुंचाती नहीं है।
अवधि- 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Sunday, April 9, 2017

अलहदा है बेगम का फलसफा’ : महेश भट्ट




 -अजय ब्रह्मात्‍मज
श्रीजित मुखर्जी का जिक्र मेरे एक रायटर ने मुझ से किया था। उन्‍होंने कहा कि वे भी उस मिजाज की फिल्‍में बनाते रहे हैं, जैसी ‘अर्थ’, ‘सारांश ‘जख्‍म’ थीं। उनके कहने पर मैंने ‘राजकहानी’ देखी। उस फिल्‍म ने मुझे झिझोंर दिया। मैंने सब को गले लगा लिया। मैंने मुकेश(भट्टसे कहा कि ‘राज   राज रीबूट’ हमने बहुत कर लिया। अब ‘राजकहानी’ जैसी कोई फिल्‍म करनी चाहिए। मुकेश को भी फिल्‍म अच्छी लगी। श्रीजित ने अपनी कहानी भारत व पूर्वी पाकिस्‍तान में रखी थी। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। यह प्लॉट ही अपने आप में बड़ा प्रभावी लगा। हमें लगा कि इसे पश्विमी भारत में शिफ्ट किया जाए तो एक अलग मजा होगा। हमने श्रीजित को बुलाया। फिर उन्होंने 32 दिनों में दिल और जान डालकर ऐसी फिल्‍म बनाई की क्या कहें।
   मेरा यह मानना है कि हर सफर आप को आखिरकार अपनी जड़ों की ओर ले जाता है। बीच में जरूर हम ऐसी फिल्‍मों की तरफ मुड़े़, जिनसे पैसे बनने थे। पैसा चाहिए भी। फिर भी लगातार फिल्‍म बनाने के लिए, पर रूह को छूने वाली आवाजें सुनाने  वाली कहानियां भी जरूरी हैं। यह जज्‍बा इस फिल्‍म में देखने को मिलने वाला है। कहानी जिस समय में सेट है उस वक्त की दुनिया दिखाने के लिए हम झारखंड के बीहड़ इलाके में गए और शूट किया। मुझे यकीन है कि लोग ‘बेगम जान’ की आत्‍मा और सादगी से यकीनन जुड़ेंगे।
   जो रवायत ‘सारांश’, ‘अर्थ’  ‘जख्‍म’ की है, यह उसी का विस्‍तार है। पिछले एक-डेढ दशक में हमने सफलता तो बड़ी अर्जित कर ली थी, पर हर तरफ से उसी किस्‍म की फिल्‍में बनाने की फरमाइशें आती थीं।राजकहानी’ में हमें हमारी तलाश खत्‍म होती दिखी। मौजूदा पीढी भी बड़ी भावुक है। ऊर्जावान तो वे हैं हीं, जो उनकी अपनी है। लिहाजा वे किसी चीज की जो व्‍याख्‍या करते हैं, वह अलहदा निकल कर आती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ‘बेगम जान’ से एक नई दास्तान शुरू होगी।
इत्‍तफाकन सेंसर बोर्ड भी इससे प्रभावित हुआ। वरना ‘उड़ता पंजाब’ व अन्य हार्ड हिटिंग फिल्‍मों पर उनका रवैया देख तो हम चिं‍तित थे कि कहीं इस फिल्‍म को भी अतिरिक्‍त कतरब्‍योंत न झेलनी पड़े। लिहाजा हमने ‘ सर्टिफिकेट के लिए ही अप्‍लाई किया था, पर जब उन्होंने वह फिल्‍म देखी और जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह देख हमें बड़ा ताज्‍जुब हुआ। वे भावुक हो गए। बड़े हिचकते हुए कहा कि गालियों को जरा तब्‍दील कर लिया जाए बस। इस तरह देखा जाए तो ‘बेगम जान’ ने सेंसर बोर्ड के साथ कमाल का अनुभव हमें दिया। खुद पहलाज निहलानी ने हमें फोन कर कहा कि बोर्ड वाले इस फिल्‍म की बड़ी तारीफें कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमने जिन सिद्धांतों के मद्देनजर यह फिल्‍म बनाई, वे मजबूत थे। नतीजतन, इसे सेंसर की मार नहीं झेलनी पड़ी।
जैसे ‘बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया। मनोरंजक होते हुए भी उसने बात तो कह दी न। वह देख,जब आप सिनेमाघरों से निकलते हैं तो लगता है कि हमारी बच्चियों के साथ जुल्‍म हो गया है। औरतों की आजादी की इज्‍जत की ही जानी चाहिए। यह बहुत अहम मैसेज है, पर एंटरटेनिंग तरीके से है। मतलब साफ है। आप इस दौर में इमेजेज दिखा कर घर-दुकान नहीं चला सकते। अब सेक्‍स वगैरह नहीं चलेगा। संचार के बाकी माध्‍यमों ने उसकी जरूरत पूरी कर दी है। सेक्‍स कहानी का हिस्‍सा हो तो बात बनेगी। मसलन, ‘जिस्‍म2। उसमें सेक्‍स  कहानी का हिस्‍सा था। उसे इरादतन नहीं परोसा गया था। हम दर्शकों को उल्‍लू नहीं बना सकते।
पार्टिशन को लेकर ढेर सारी कहानियां हैं, जिन्‍हें हम जीना नहीं चाहते। गिन कर पांच फिल्‍में बनी हैं उस मसले पर। हालांकि हमारी फिल्‍म शुरू होती है आज के कनॉट प्लेस से। उसके बाद हम हिंदुस्तान के बंटवारे की ओर जाते हैं। रेडक्लिफ लाइन पर जाते हैं। औरतों के सिद्धांत व उनके हक की बातें करते हैं। तो हम विशुद्ध पार्टिशन की बात नहीं करते हैं। हम औरतों के अधिकार की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। यह बदकिस्‍मती है हमारी कि औरतें तब भी गुलाम थीं, अब भी उन्हें पूरी आजादी नहीं दी गई है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि वे अपनी जिस्‍म की भी मालकिन नहीं।
फिल्‍म में ढेर सारी अभिनेत्रियां हैं। बेगम जान के लिए विद्या ही हमारी पहली च्‍वॉइस थीं। गौहर खान व इला अरूण भी हैं। इला के साथ काम कर बड़ा मजा आया। बेगम जान का फलसफा अलग है। इक मर्द उसकी मंजिल नहीं है। वह न हो तो भी वह खुद को अधूरी नहीं मानेगी। वह वेश्‍या है, मगर छाती नहीं पीटती कि उसके साथ अत्‍याचार हुआ है। वह कोठे को काम की तरह लेती है।
अमिताभ बच्चन का वॉयस ओवर इसलिए इस्तेमाल हुआ कि हम ऐसी आवाज चाहते थे, जिन्‍हें लोग सुनें। लोग इमोशन की गहराई में उतर सकें। हमने उनसे गुजारिश की तो उन्होंने बड़े विनीत भाव से उस ख्‍वाहिश को स्‍वीकारा। हालांकि उनके संग मेरा अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है। अमर सिंह के चलते हमारे रिश्‍ते में खटास आई थी। शाह रुख मामले में हमने एक स्‍टैंड लिया था! तब अमर सिंह के चलते हम दोनों के बीच जरा सी कड़वाहट थी, मगर मुकेश साथ उनके संबंध अच्छे रहे हैं। बच्चन जी खुद भी आलिया की बड़ी तारीफ करते रहते हैं। तो हम कब तलक मन में दूरियां पाले रखते।

विद्या से मिलता है बेगम का मिजाज - विद्या बालन

बेगम जान के निर्देशक श्रीजित मुखर्जी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

2010 से फिल्‍म मेकिंग में सक्रिय श्रीजित मुखर्जी ने अभी तक आठ फिल्‍में बांग्‍ला में निर्देशित की हैं। हिंदी में बेगम जान उनकी पहली फिल्‍म है। जेएनयू से अर्थशास्‍त्र की पढ़ाई कर चुके श्रीजित कहानी कहने की आदत में पहले थिएटर से जुड़े। हबीब तनवीर की भी संगत की और बाद में फिल्‍मों में आ गए। बांग्‍ला में बनी उनकी फिल्‍मों को अनेक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुके हैं। महेश भट्ट से हुई एक चांस मुलाकात ने हिंदी फिल्‍मों का दरवाजा खोल दिया। वे अपनी आखिरी बांग्‍ला फिल्‍म राजकाहिनी को हिंदी में बेगम जान नाम से ला रहे हैं। फिल्‍म की मुख्‍य भूमिका में विद्या बालन है। मूल फिल्‍म भारत-बांग्‍लादेश(पूर्वी पाकिस्‍तान) बोर्डर की थी। अग यह भारत-पाकिस्‍तान बोर्डर पर चली आई है।
पढ़ाई के बाद नौकरी तो मिडिल क्‍लास के हर लड़के की पहली मंजिल होती है। श्रीजित को बंगलोर में नौकरी मिल गई,लेकिन कहानी कहने की आदत और थिएटर की चाहत से वे महेश दत्‍तनी और अरूंधती नाग के संपर्क में आए। फिर फिल्‍मों में हाथ आजमाने के लिए मन कुलबुलाने लगा। श्रीजित ने सुरक्षा की परवाह नहीं की। उन्‍होंने तत्‍काल नौकरी छोड़ दी। तब तक निजी जिंदगी में शादी और तलाक से वे गुजर चुके थे। घर में अकेली मां थीं। अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी जैसा बोझ नहीं था। पहली फिल्‍म ऑटोग्राफ सफल रही। सफलता के साथ पुरस्‍कार भी मिले और  आगे की राह सुगम हो गई।
बेगम जान की पूष्‍ठभूमि पार्टीशन की है। मूल बांग्‍ला फिल्‍म को हिंदी में लाने के समय लोकेशन बदलना अनिवार्य लगा। पार्टीशन की देशव्‍यापी इमेजेज पंजाब से जुड़ी हैं। निर्देशक और निर्माता ने पूरी कहानी पाकिस्‍तान के बोर्डर पर शिफ्ट कर दी। बेगम जान के कोठे को देश के मेटाफर के रूप में देखें,जहां देश के सभी हिस्‍सों से आई लड़कियां काम करती हैं। उन्‍हें ऐसे संवाद दिए गए जसमें हिंदी के साथ उनके इलाके का टच हो। जया चटर्जी और उर्वशी बुटालिया की पार्टीशन से संबंधित किताब से फिल्‍म का आयडिया आया। रेडक्लिफ ने देश की आजादी के समय ब्रिटिश राज के आदेश से भारत के नक्‍शे पर एक लकीर खींच दी थी। उसमें कितने घर-परिवार और गांव बंट गए। उन्‍हें चार हफ्ते में अपना काम करना था। वहीं से मुझे लगा कि इस पर फिल्‍म बन सकती है। उसके बाद मंटो के अफसानों ने मेरे इरादे को पक्‍का कर दिया।
श्रीजित मानते हैं कि विद्या बालन ट्रेंड सेटर हैं। मेरी बेगम उनके मिजाज के करीब है,जिसके अंदर दबा हुआ गुससा है और जो अपने स्‍पेय में किसी को आने नहीं देती। मैं मानता हूं कि हिंदी फिल्‍मों में माधुरी दीक्षित के बाद विद्या ही दमदार अभिनेत्री हैं। मुझे तो यह भी लगता है कि अगर स्क्रिप्‍ट आपकी फिल्‍म का हीरो है तो उसकी हीरोइन विद्या ही हो सकती है। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों से इसे साबित किया है।
बेगम जान से यह फर्क आया है कि श्रीजित ने मुबई में ठिकाना बना लिया है। वे अब हिंदी फिल्‍में करना चाहते हैं। साथ ही मन है कि साल में एक बांग्‍ला फिल्‍म भी बनाते रहें। बांग्‍ला फिल्‍मों के लिए कोलकाता आन-जाना लगा रहेगा। मुंबई प्रोफेशनल शहर है। काम का माहौल रहता है। यहां बड़े बजट की फिल्‍में आसानी से बनाई जा सकती हैं। उनकी अगली फिल्‍म बांग्‍ला में ही है,जिसकी शूटिंग स्विटजरलैंड में होगी।
श्रीजित स्‍वीकार करते हैं कि अभी के बांग्‍ला फिल्‍ममेकर अर्बन हो चुके हैं। उनकी कहानियों में बंगाल की खुश्‍बू नहीं रहती। यही दशा दूसरे प्रदेशों से आए फिल्‍मकारों की भी है। एक सीमा के बाद हम सभी की प्रस्‍तुति समान हो गई है। अच्‍छा होगा कि फिल्‍ममेकर अपने इलाके को लेकर चलें और पूरे भारत के लिए कहानी कहें। अब तो विदेशी भी हमारे दर्शक हैं। हमें फिल्‍म की भाषा पर बहुत काम करना है।

Tuesday, April 4, 2017

राजा है बेगम का गुलाम - विद्या बालन




-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍मों के फैसले हवा में भी होते हैं।हमारी अधूरी कहानी के प्रोमोशन से महेश भट्ट और विद्या बालन लखनऊ से मुंबई लौट रहे थे। 30000 फीट से अधिक ऊंचाई पर जहाज में बैठे व्‍यक्ति सहज ही दार्शनिक हो जाते हैं। साथ में महेश भट्ट हों तो बातों का आयाम प्रश्‍नों और गुत्थियों को सुलझाने में बीतता है।  जिज्ञासु प्रवृति के महेश भट्ट ने विद्या बालन से पूछा,क्‍या ऐसी कोई कहानी या रोल है,जो अभी तक तुम ने निभाया नहीं ?’ विद्या ने कहा,मैं ऐसा कोई रोल करना चाहती हूं,जहां मैं अपने गुस्‍से को आवाज दे सकूं।भट्ट साहब चौंके,तुम्‍हें गुस्‍सा भी आता है?’ विद्या ने गंभरता से जवाब दिया, हां आता है। ऐसी ढेर सारी चीजें हैं। खुद के लिए। दूसरों के लिए भी महसूस करती हूं। फिर क्या था, तीन-चार महीने बाद वे यह कहानी लेकर आ गए।
बेगम जान स्‍वीकार करने की वजह थी। अक्सर ऐसा होता है कि शक्तिशाली व सफल होने की सूरत में औरतों में हिचक आ जाती है। वे जमाने के सामने जाहिर करने से बचती हैं कि खासी रसूखदार हैं। इसलिए कि कहीं लोग आहत न हो जाएं। सामने वाला खुद को छोटा न महसूस करने लगे। हम औरतों को सदा यह समझाया गया है कि आदमी एक पायदान ऊपर रहेगा, जबकि औरत उसके नीचे। वैसे तो मेरी परवरिश इस किस्म के माहौल में नहीं हुई है, पर मुझे भी अपने आस-पास ऐसा कुछ महसूस हुआ है। औरत के लिए बॉस होना जरा झिझक से लैस होता है। मर्द वह चीज आसानी से कर लेते हैं। बेगम जान ऐसी नहीं है। वह बड़ी पॉवरफुल है। वह जब चाहे किसी को रिझा सकती है, जब चाहे गला दबोच ले। वह फिक्र और डर से परे है। उसकी यह चीज मुझे अच्छी लगी और मैंने हां कहा।
वैसे तो यह विभाजन काल की कहानी है। बेगम जान की परवरिश लखनऊ की है, पर उसका कोठा पंजाब के शक्‍करगढ और दोरंगा इलाके के बीच है। रेडक्लिफ लाइन के बीच में पड़ता है। बेगम जान को वह छोड़कर जाने को कहा जाता है, पर वह फाइट बैक करती है। यह आज के दौर में भी सेट हो सकती थी। आज भी लोग अपनी जर-जमीन के लिए लड़ते हैं। मिसाल के तौर पर मुंबई की कैंपा कोला सोसायटी के लोग। बहरहाल, यह बहुत स्ट्रॉन्‍ग कैरेक्‍टर है। यह पीरियड फिल्‍म है, पर टिपिकल सी नहीं। कॉस्‍ट्यूम व परिवेश को छोड़ बाकी सब आज सा ही है। हालांकि अब तो कोठों-वोठों का कॉन्‍सेप्ट रहा नहीं।
उस जमाने में कोठे का कॉन्‍सेप्ट था। संभ्रांत घर के लड़के शादी से पहले वहां जाते थे। पत्‍नी के साथ कैसे पेश आना है, वह सिखाया जाता था। पिछली सदी के पांचवें छठे दशक तक तो कई अभिनेत्रियां भी वहीं से ग्‍लैमर जगत में आई थीं। बहरहाल, मुझे यह किरदार करते हुए बड़ा मजा आया। किरदार की तरह डायलॉग्‍स भी बड़े पॉवरफुल हैं। जैसे, हमें किसी का हाथ यहां से हटाए, उससे पहले उसके शरीर का पार्टिशन कर देंगे। महीना गिनना हमें आता है साहब, साला हर बार लाल करके जाता है। गालियां तो तब भी बकते थे। साथ ही वह शिकायती स्‍वभाव की नहीं है। वह अपनी सभी सदस्या से भी यही कहती है कि हम शौक  से इस पेशे में नहीं आए हैं, पर आ गए हैं तो रो-धो कर नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से काम करना है। उसकी पहुंच राजा तक है। सिल्‍क स्मिता में बेबाकपन था, पर बेगम जान में रसूख का एहसास।
मैंने बहुत साल पहले तकरीबन इसी मिजाज की मंडी देखी थी। कॉलेज के दिनों में। शबाना आजमी ने उसमें कमाल का काम किया था। मैंने इरादतन बेगम जान साइन करने के बाद उसे नहीं देखी। वह इसलिए कि मैं उनकी बहुत बड़ी फैन हूं। फिर से मंडी देखती तो शायद उनसे प्रभावित हो जाती। फिर बेगम जान में मेरे अपने रंग शायद नहीं रह पाते। साथ ही यह शबाना जी के रोल से बिल्‍कुल इतर है। यह अपनी शर्तों पर काम करती है। शबाना जी का किरदार हंस-बोल कर काम निकालता था। यहां बेगम जान इलाके के राजा तक को अपनी शर्तों पर नचाती है।
राजा के रोल में नसीरुद्दीन शाह हैं। उनके साथ यह तीसरी फिल्‍म है। राजा के रोल में उनका स्‍त्री चरित्र भी सामने उभर कर आया है। एक सीन है फिल्‍म में, जहां वे नजरें नीचीं कर बातें करते हैं। वह कमाल का बन पड़ा है। उनके साथ-साथ फिल्‍म में इला अरुण हैं। सेट पर वे हंसती-नाचती नजर आती थीं, पर कैमरा ऑन होते ही वे झट अपने किरदार में आ जाती थीं। उन्होंने अपने थिएटर का पूरा अनुभव इस्तेमाल किया है। गौहर खान का काम मुझे इश्‍कजादे में अच्छा लगा था। वह देख मैंने श्रीजित को उनके नाम की सिफारिश की थी। संयोग से उस रोल के लिए श्रीजित की भी पसंद गौहर ही थीं। तो हमने उन्हें टेक्‍सट किया। वे उस वक्‍त मक्का गई हुई थीं। जवाब दिया कि वहां से आते ही वे श्रीजित से मिलेंगी। इस तरह वे बोर्ड पर आईं।
पल्‍लवी शारदा, मिष्‍टी व फ्लोरा सैनी भी साथ में हैं। श्रीजित ने उन सबकी एक महीने के लिए अलग वर्कशॉप रखी। मेरे साथ नहीं। वे उन सब की मुझ से एक दूरी बनाकर रखना चाहते थे ताकि बेगम जान की अथॉरिटी को वे महसूस कर सकें। इसकी शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई। बड़ी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में। हमारे जाने से पहले वहां सेट टूट गया था। हम कोलकाता में शांतिनिकेतन में रूके थे। वहां से सेट पर जाने में सवा से डेढ घंटे लगते थे। शूटिंग मई की चिलचिलाती धूप में हुई थी तो हर रोज किसी न किसी को डिहाईड्रेशन होती ही थी। पांव चोटिल होता ही था।