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Saturday, August 12, 2017

रोज़ाना : शिकार हैं तो प्रतिकार करें



रोज़ाना
शिकार हैं तो प्रतिकार करें
-अजय ब्रह्मात्‍मज

समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता हो तो शोषण और शिकार आम बात हो जाती है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावशाली समूह अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए हर तरह के उपाय करते हैं। वे दमन और दबाव की नीति-रणनीति अपनाते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी यह आम है। खास कर बाहर से आये कलाकारों के प्रति फ़िल्म इंडस्ट्री के इनसाइडर का यह रवैया दिखता है। कुछ महीनों से कंगना रनोट के खिलाफ चल रहे बयानों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाएगा। ज्यादातर तिलमिलाये हुए हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री में जारी वंशवाद को वे दबी जबान से स्वीकार करते हैं। मझोले स्टार तो कंगना के समर्थन करने के बाद कह देते हैं कि क्यों हमें घसीट रहे हैं। हम तो उसके कैम्प के हैं,जो हमें काम दे।
कंगना रनोट की बातों में दम है। पिछले दिनों उन्होंने दोहराया कि वह आगे भी कुछ लोगों के अहम पर चोट करती रहेंगी।होता यूं है कि किसी ताकतवर की बात न मानो,प्रतिकार करो या सवाल करो तो उनका अहम घायल हो जाता है।फ़िल्म इंडस्ट्री में भी जी हुजूरी चलती है। हैं में हैं मिलते रहो और आगे बढ़ते रहो। कंगना ने तो सीधे आरोप लगा दिए थे और वह भी मुंह पर। कारण जोहर को यह बात कैसे गवारा होती। अवसर मिलते ही करण ने पलटवार किया और कंगना को सलाह दी कि फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ दें। बात पुरानी हो गयी,लेकिन अभी तक सुलग रही है। हर बार कोई हवा दे देता है।
इससे अलग एक स्थिति दिखाई देती है,जहां कुछ लोग हमेशा शिकार हो चुके व्यक्ति की मुद्रा में रहते हैं।उन्हें शिकायत रहती है। जबकि उनकी शिकायतों का ठोस आधार नहीं रहता। मज़ेदार तथ्य यह है कि ऐसे शिकायती व्यक्तियों के समर्थन में कुछ लोग मिल जाते हैं। दरअसल सफल और कामयाब व्यक्तियों की छवि खराब करने में अतिरिक्त आनंद मिलता है। ऊपरी तौर पर लगता है कि शोषित व्यक्ति का साथ दिया जा रहा है,जबकि सच्चाई कुछ और होती है। शिकार व्यक्तियों को जोरदार प्रतिकार करना चाहिए। विक्टिम मुद्रा में आ जाने से व्यक्तिगत सुकून मिल जाता है,लेकिन उससे कोई लाभ नहीं होता। देखा गया है कि विक्टिम मुद्रा में जी रहा व्यक्ति अपने ज़ख्मों को भरने नहीं देता। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे अनेक फिल्मकार मिलते हैं जो अपनी अप्रदर्शित फ़िल्म का रोना रोते रहते हैं। किसी और को दोषी ठहराते हैं। वे उस फिल्म के भंवर से नहीं निकल पाते।