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Friday, February 24, 2017

फिल्‍म समीक्षा : रंगून



फिल्‍म रिव्‍यू
युद्ध और प्रेम
रंगून
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    युद्ध और प्रेम में सब जायज है। युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर बनी प्रेमकहानी में भी सब जायज हो जाना चाहिए। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बैकड्रॉप में बनी विशाल भारद्वाज की रंगीन फिल्म रंगून में यदि दर्शक छोटी-छोटी चूकों को नजरअंदाज करें तो यह एक खूबसूरत फिल्म है। इस प्रेमकहानी में राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम की गुप्‍त धार है, जो फिल्म के आखिरी दृश्‍यों में पूरे वेग से उभरती है। विशाल भारद्वाज ने राष्‍ट्र गान जन गण मन के अनसुने अंशों से इसे पिरोया है। किसी भी फिल्म में राष्‍ट्रीय भावना के प्रसंगों में राष्‍ट्र गान की धुन बजती है तो यों भी दर्शकों का रक्‍तसंचार तेज हो जाता है। रंगून में तो विशाल भारद्वाज ने पूरी शिद्दत से द्वितीय विश्‍वयुद्ध की पृष्‍ठभूमि में आजाद हिंद फौज के हवाले से रोमांचक कहानी बुनी है।
    बंजारन ज्वाला देवी से अभिनेत्री मिस जूलिया बनी नायिका फिल्म प्रोड्रयूसर रूसी बिलमोरिया की रखैल है, जो उसकी बीवी बनने की ख्‍वाहिश रखती है। 14 साल की उम्र में रूसी ने उसे मुंबई की चौपाटी से खरीदा था। पाल-पोस और प्रशिक्षण देकर उसे उसने 20 वीं सदी के पांचवें दशक के शुरूआती सालों की चर्चित अभिनेत्री बना दिया था। तूफान की बेटी की नायिका के रूप में वह दर्शकों का दिल जीत चुकी है। उसकी पूरी कोशिश अब किसी भी तरह मिसेज बिलमोरिया होना है। इसके लिए वह पैंतरे रचती है और रूसी को मीडिया के सामने सार्वजनिक चुंबन और स्‍वीकृति के लिए मजबूर करती है। अंग्रेजों के प्रतिनिधि हार्डी जापानी सेना के मुकाबले से थक चुकी भारतीय सेना के मनोरंजन के लिए मिस जूलिया को बॉर्डर पर ले जाना चाहते हैं। आनाकानी के बावजूद मिस जूलिया को बॉर्डर पर सैनिकों के मनोरंजन के लिए निकलना पड़ता है। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी जमादार नवाब मलिक को दी गई है। जांबाज नवाब मलिक अपनी बहादुरी से मिस जूलिया और अंग्रेजों को प्रभावित करता है। संयोग से इस ट्रिप पर जापानी सैनिक एयर स्ट्राइक कर देते हैं। भगदड़ में सभी बिखर जाते हैं। मिस जूलिया और नवाब मलिक एक साथ होते हैं। नवाब मलिक अपनी जान पर खेल मिस जूलिया को भारतीय सीमा में ले आना चाहता है। अंग्रेजों के साथ रूसी बिलमोरिया भी मिस जूलिया की तलाश में भटक रहे हैं। उनकी मुलाकात होती है। अंग्रेज बहादुर नवाब मलिक से प्रसन्न होकर विक्‍टोरिया क्रॉस सम्मान के लिए नाम की सिफारिश का वादा करता है, लेकिन आशिक रूसी बिलमोरिया को नवाब मलिक में रकीब की बू आती है। वह उसके प्रति चौकन्ना हो जाता है। हम प्रेमत्रिकोण में नाटकीयमता की उम्‍मीद पालते हैं। कहानी आगे बढती है और कई छोरों को एक साथ खोलती है। आखिरकार वह प्रसंग और मोड़ आता है, जब सारे प्रेमी एक-एक कर इश्‍क की ऊंचाइयों से और ऊंची छलांग लगाते हैं। राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम का जज्‍बा उन्हें सब कुछ न्‍यौछावर कर देने के लिए प्रेरित करता है।
    विशाल भारद्वाज अच्छे किस्सागो हैं। उनकी कहानी में गुलजार के गीत घुल जाते हैं तो फिल्म अधिक मीठी,तरल और गतिशील हो जाती है। रंगून में विशाल और गुलजार की पूरक प्रतिभाएं मूल कहानी का वेग बनाए रखती हैं। हुनरमंद विशाल भारद्वाज गंभीर प्रसंगों में भी जबरदस्त ह्यूमर पैदा करते हैं। कभी वह संवादों में सुनाई पड़ता है तो कभी कलाकारों के स्‍वभावों में दिखता है। रंगून में भी पिछली फिल्मों की तरह विशाल भारद्वाज ने सभी किरदारों को तराश कर पेश किया है। हमें सारे किरदार अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ याद रहते हैं। यही काबिल निर्देशक की खूबी होती है कि पर्दे पर कुछ भी बेजा और फिजूल नहीं होता। मुंबई से तब के बर्मा के बॉर्डर तक पहुंची इस फिल्म के सफर में अधिक झटके नहीं लगते। विशाल भारद्वाज और उनकी तकनीकी टीम सभी मोड़ों पर सावधान रही है।
    विशाल भारद्वाज ने सैफ अली खान को ओमकारा और शाहिद कपूर को कमीनेहैदर में निखरने का मौका दिया था। एक बार फिर दोनों कलाकारों को बेहतरीन किरदार मिले हैं, जिन्हें पूरी संजीदगी से उन्होंने निभाया है। बतौर कलाकार सैफ अली खान अधिक प्रभावित करते हैं। नवाब मलिक के किरदार में शाहिद कपूर कहीं-कहीं हिचकोले खाते हैं। यह उस किरदार की वजह से भी हो सकता है। सैफ का किरदार एकआयामी है, जबकि शाहिद को प्रसंगों के अनुसार भिन्‍न आयाम व्‍यक्‍त करने थे। मिस जूलिया के रूप में कंगना रनोट आरंभिक दृश्‍यों में ही भा जाती हैं। रूसी बिलमोरिया और नवाब मलिक के प्रेम प्रसंगों में मिस जूलिया के दोहरे व्‍यक्तित्‍व की झलक मिलती है, जिसे कंगना ने बखूबी निभाया है। एक्शन और डांस करते समय वह पिछली फिल्मों से अधिक आश्‍वस्त नजर आती हैं। बतौर अदाकारा उनमें आए निखार से रंगून को फायदा हुआ है। मिस जूलिया के सहायक किरदार जुल्फी की भूमिका निभा रहे कलाकार ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अन्य सहयोगी कलाकार भी दृश्‍यों के मुताबिक खरे उतरे हैं।
    विशाल भारद्वाज की फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म की कहानी का अविभाज्‍य हिस्सा होता है। गुलजार उनकी फिल्मों में भरपूर योगदान करते हैं। दोनों की आपसी समझ और परस्पर सम्मान से फिल्मों का म्यूजिकल असर बढ़ जाता है। इस फिल्म के गानों के फिल्मांकन में विशाल भारद्वाज ने भव्‍यता बरती है। महंगे सेट पर फिल्‍मांकित गीत और नृत्‍य तनाव कम करने के साथ कहानी आगे बढ़ाते हैं।
अवधि- 167 मिनट
स्टार- चार स्‍टार

Wednesday, June 22, 2016

ले लिया है चैलेंज : शाहिद कपूर

-स्मिता श्रीवास्‍तव
शाहिद कपूर लगातार वरायटी रोल कर रहे हैं। खासकर वैसे युवाओं का, जो किन्हीं कारणों से ‘भटका’ हुआ या बागी है। मिसाल के तौर पर हैदरमें बागी युवक। अब उड़ता पंजाबमें वह भटके हुए रॉक स्टार की भूमिका में हैं। ‘हैदर’ में किरदार को रियल टच देने के लिए उन्होंने सिर मुंडवाया था। यहां उनके लंबे बाल हैं। शरीर पर टैटूओं की पेंटिंग है। साथ में ज्वैलरी है।
        शाहिद कहते हैं, ‘‘ लोग मुझे ऐसी फिल्में करने से मना करते हैं। उनकी दलील रहती है कि पता नहीं वैसी फिल्मों की कितनी आडियंस होगी। मेरा मानना है अगर कहानी उम्दा हो, उसमें इमोशन और एंटरटेनमेंट हो तो उम्मीद से अधिक आडियंस उसे देखती है। साथ ही कहानी अच्छी से कही गई हो तो। आडियंस अब उम्दा कहानियां ही देखना चाहती है।‘
एक वक्त ऐसा भी था जब ‘उड़ता पंजाब’ खटाई में पड़ गई थी। दरअसल, मैंने स्वीकृति दे दी थी। बाकी तीन किरदारों को लेकर कलाकार संशय में थे। वे फैसला नहीं कर पा रहे थे कि करे या न करें। यह फैसला आसान भी नहीं था। यह जोखिम भरा कदम था। मुझे लगा यह सुअवसर है। दर्शकों ने मुझे इस अवतार में न देखा है न कभी उम्मीद की है। यही नहीं भारतीय सिनेमा में ऐसा किरदार पर्दे पर दिखा नहीं है। लिहाजा मेरे लिए यह काफी एक्साइटिंग था।
मेरे किरदार का नाम टॉमी सिंह है। मेरे लिए बेहद एंटरटेनिंग किरदार है। स्क्रिप्ट सुनाने के दौरान निर्देशक अभिषेक चौबे ने मुझसे कहा था कि आडियंस उससे नफरत करेगी। हालांकि थोड़े समय बाद उसे पसंद करने लगेगी। यही तुम्हें ट्रांसफॉर्म करना है। टॉमी सिंह बदतमीज, लाउड और बदमिजाज है। उसे लगता है कि वह सबसे अच्छा है। हालांकि उसकी हरकतें देखकर लगेगा कि उसे कमरे से निकाल दो। यह सब चीजें आम तौर पर हीरो के किरदार में नहीं होती। यह एंटी हीरो टाइप है। मुझे यकीन है कि लोगों को पसंद आएगा। टॉमी बाहरी तौर पर भले ही बुरा हो मगर अंदरुनी तौर पर भला इंसान है। उस किरदार को निभाने मेरे लिए बड़ा चैलेंज था।
        मैंने जब पहली बार किरदार सुना था तो तभी अपने मन में उसकी एक छवि बना ली थी। मसलन उसके शरीर पर टैटू होने चाहिए। बाल जटा की तरह लंबे। पहले सोचा था कि इसके बाल कलर कर देंगे। सडक़ पर इसे चलते देखकर लगेगा कि कौन पागल जा रहा है। मैंने अभिषेक से आइडिया शेयर किया तो वह डर गए। फिर मैंने बालों का लुक बनाकर फोटो भेजी। उसे देखकर वे और डर गए। उस समय वे करीना कपूर और दिलजीत दोसांझ के साथ पहले हिस्से की शूटिंग कर रहे थे। दोनों के किरदार काफी रियलिस्टिक हैं। उन्हें लगा कि शाहिद मेरी फिल्म खराब कर देगा। शूटिंग से फुर्सत पाकर अभिषेक मुझसे मिले। फिर हमने बात की। उन्हें भी वह लुक पसंद आने लगा। टॉमी बाकी सभी किरदारों से बेहद अलग है। वह कोकीन का आदी है। वह बहुत बड़ा रॉकस्टार है। वह अपने तौर-तरीके की जिंदगी जी रहा है। यह सब भावनात्मक ही नहीं शारीरिक तौर पर भी दिखना चाहिए था। लोगों ने टॉमी के लुक को पसंद किया, यह काफी उत्साहवद्र्धक था। मेरा अनुमान था कुछ लोगों की ही प्रतिक्रिया मिलेगी। मगर बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतिक्रिया दी। शायद इसके विषय को देखते हुए।
इसका विषय ओरिजनल है। इस स्पेस में फिल्म नहीं बनी है। एक वक्त था, जब ऐसी फिल्मों को दर्शक नजरअंदाज करते थे। आज वक्त बदल चुका है। अब अगर आप कुछ अलग करते हैं तो आडियंस उसे नोटिस करती है। यही उड़ता पंजाब के साथ हुआ है। यह फ्रेश प्रोडक्ट लग रहा है। फिल्म में चार बड़े सितारे हैं लेकिन कोई स्टार सरीखा नहीं रहा। सबने अपने किरदारों को जीवंत किया है। सिर्फ इतना कहूंगा कि यह ओरिजनल फिल्म है। इसे सपोर्ट करना चाहिए। इसमें ड्रग्‍स की बात की गई है। इसकी अहमियत हमें वर्तमान में भले महसूस न हो लेकिन पांच साल बाद यह आने वाली पीढ़ी के लिए बड़ा मुद्दा बनने वाला है। इस विषय पर बात होनी चाहिए। कुछ फिल्में आप बतौर स्टार या एक्टर करते हैं। मैंने इसे अपने एक्टर की संतुष्टि के लिए किया है। साथ ही खुद को चैलेंज करने के लिए। मैं खुश हूं कि लोगों को पसंद आ रही।
        रॉकस्टार को चिरपरिचित छवि रही है। कई रॉकस्टार ने मादक पदार्थों के सेवन की बात भी स्वीकारी है। कुछ ने हताशा में आत्महत्या भी है। आप के मन-मस्तिष्क में रॉकस्टार को लेकर कैसी छवि रही है? यह पूछने पर शाहिद कपूर कहते हैं, आप टॉमी सिंह को रॉकस्टार या पॉप स्टार कह सकते हैं। वह म्यूजिशियन है। बहुत बड़ा स्टार है। इस प्रकार के कई पॉप स्टार रह चुके हैं। वह बहुत पापुलर थे। हालांकि कुछ तुनकमिजाज थे। कुछ की अल्पायु में मृत्यु हो गई। उनके बारे में थोड़ा बहुत रिसर्च किया। हालांकि मैंने ओरिजनल कैरेक्टर गढ़ा। उसे जीवित इंसान में परिणत करने की कोशिश नहीं की। यह कोई डाक्यूमेंट्री नहीं है। न ही पॉप स्टार की जिंदगी पर आधारित है। यह फिक्शन कहानी है। इसमें टॉमी सिंह को खोजना था। उसके अंदर इंसान है या नहीं यह समझना था। वह ऐसा क्यों है? यह समझना था। वही कोशिश रही कि ऐसा किरदार लाए जिसे पहले सिल्वर स्क्रीन पर देखा न गया हो। पर हां यह जरूर कहूंगा कि हमने कई स्टार के उदय की कहानी देखी है। यह एक सटार के ढलान की है। यह उसके खुद के खोजने की जर्नी है।
किरदार को जीवंत बनाने की हर कलाकार की कोशिश होती है। उसके लिए तमाम तैयारी होती है। उस जैसे लोगों से मिलने की कोशिश होती है। हालांकि शाहिद कपूर नशे के आदी व्यक्ति से मिलने से इन्कार करते हैं। वह कहते हैं, हमने कई डाक्यूमेंट्री देखी। मेरी उम्र 35 साल है। मैंने बहुत दुनिया देखी है। कई जगहों पर लोगों को अल्कोहल या नशे का सेवन करते देखा है। उस हालत में उनका व्यवहार अजीबोगरीब होता है। उन्हें आप आव्‍जर्व करते हैं। हालांकि कोकीन का नशा करने वालों की आदतें थोड़ा अलग होती है। दरअसल, मादक पदर्ा्थ और दुष्प्रभाव अलग-अलग होते हैं। मैंने और अभिषेक ने उस पर काफी रिसर्च की।
        फिल्म में पंजाब में फैली ड्रग समस्या उजागर की गई है। हालांकि शाहिद इसे पंजाब तक सीमित नहीं मानते। वह कहते हैं, मादक पदार्थों का सेवन सिर्फ पंजाब नहीं पूरे विश्व की समस्या है। इसमें पंजाब बैकड्राप है। जैसे कश्मीर पर हमने हैदर बनाई थी। हालांकि उसमें हो रही बातें सभी के हितार्थ थीं। सभी की जिंदगी में समस्याएं आती है। व्यक्तिगत संघर्ष सभी को करना पड़ता है। लत किसी भी चीज की लग सकती है। चारों किरदार ड्रग से ही संबंधित है। ड्रग्‍स  की समस्या किसी घर या राज्य तक सीमित नहीं है। पहले नशे को हेयदृष्टि से देखा जाता था। अब पार्टी वगैरह में इनका सेवन आम बात हो गई है। कम उम्र में ही लोगों को इनकी जानकारी हो रही है। इसमें वास्तविक विषय पर बात की गई है। यह किसी राज्य या देश की नहीं देशव्यापी समस्या है।हाई सोसाइटी में अल्कोहल का सेवन होना आम बात है। स्टार बनने के बावजूद शाहिद ने खुद को इन चीजों से दूर रखा है। इस बाबत वह कहते हैं, मेरा कभी मन ही नहीं किया। मुझे इसमें कभी दिलचस्पी ही नहीं रही।

Friday, June 17, 2016

फिल्‍म समीक्षा : उड़ता पंजाब

-अजय ब्रह्मात्‍मज
(हिंदी फिल्‍म के रूप में प्रमाणित हुई उड़ता पंजाब की मुख्‍य भाषा पंजाबी है। एक किरदार की भाषा भोजपुरी है। बाकी संवादों और संभाषणों में पंजाबी का असर है।)
विवादित फिल्‍मों के साथ एक समस्‍या जुड़ जाती है। आम दर्शक भी इसे देखते समय उन विवादित पहलुओं पर गौर करता है। फिल्‍म में उनके आने का इंतजार करता है। ऐसे में फिल्‍म का मर्म छूट जाता है। उड़ता पंजाब और सीबीएफसी के बीच चले विवाद में पंजाब,गालियां,ड्रग्‍स और अश्‍लीलता का इतना उल्‍लेख हुआ है कि पर्दे पर उन दृश्‍यों को देखते और सुनते समय दर्शक भी जज बन जाता है और विवादों पर अपनी राय कायम करता है। फिल्‍म के रसास्‍वादन में इससे फर्क पड़ता है। उड़ता पंजाब के साथ यह समस्‍या बनी रहेगी।
उड़ता पंजाब मुद्दों से सीधे टकराती और उन्‍हें सामयिक परिप्रेक्ष्‍य में रखती है। फिल्‍म की शुरूआत में ही पाकिस्‍तानी सीमा से किसी खिलाड़ी के हाथों से फेंका गया डिस्‍कनुमा पैकेट जब भारत में जमीन पर गिरने से पहले पर्दे पर रुकता है और उस पर फिल्‍म का टायटल उभरता है तो हम एकबारगी पंजाब पहुंच जाते हैं। फिल्‍म के टायटल में ऐसी कल्‍पनाशीलता और प्रभाव दुर्लभ है। यह फिल्‍म अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा के गहरे कंसर्न और लंबे रिसर्च का परिणाम है। कहना आसान है कि फिल्‍म डाक्‍यूमेंट्री का फील देती है। जब आप हिंदी फिल्‍मों की प्रचलित प्रेम कहानी से अलग जाकर सच्‍ची घटनाओं और समसामयिक तथ्‍यों को संवादों और वास्‍तविक चरित्रों को किरदारों में बदलते हैं तो इस प्रक्रिया में कई नुकीले कोने छूट जाते हें। वे चुभते हैं। और यही ऐसी फिल्‍मों की खूबसूरती होती है। हो सकता है कि पंजाब के दर्शकों का फिल्‍म देखते हुए कोई हैरानी नहीं हो,लेकिन बाकी दर्शकों के लिए यह हैरत की बात है। कैसे देश का एक इलाका नशे की गर्त में डूबता जा रहा है और हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। बेखबर रहना चाहते हैं। अगर एक फिल्‍मकार साहस करता है तो सरकारी संस्‍थाएं अड़ंगे लगाती है।
उड़ता पंजाब टॉमी सिंह(शाहिद कपूर),बिहारिन मजदूर(आलिया भट्ट,सरताज(दिलजीत दोसांझ),प्रीत सरीन(करीना कपूर खान) और अन्‍य किरदारों से गुंथी पंजाबी सरजमीन की कहानी है। उड़ता पंजाब में सरसों के लहलहाते खेत और भांगड़ा पर उछलते-कूदते और बल्‍ले-बल्‍ले करते मुंडे और कुडि़यां नहीं हैं। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों और पॉपुलर कल्‍चर से ओझल पंजाब है। ड्रग्‍स के नशे में डूबा और जागरुक होता पंजाब है। उड़ता पंजाब पंजाब की सच्‍ची झलक पेश करती है। वह निगेटिव या पॉजीटिव से ज्‍यादा जरूरी है। फिल्‍मों का काम सिर्फ गुदगुदाना ही तो नहीं है। झिंझोरना और अहसास करना भी तो है। उड़ता पंजाब में अभिषेक चौबे कुछ सीमाओं के साथ सफल रहते हैं। निश्चित ही इसमें उन्‍हें सहयोगी लेखक सुदीप शर्मा,संगीतकार अमित त्रिवेदी,गीतकार शेली,शिवकुमार बटालवी और वरूण ग्रोवर व अन्‍य तकनीकी टीम से पूरी मदद मिली है।
शाहिद कपूर ने टॉमी सिंह की उलझनों को अच्‍छी तरह पर्दे पर उतारा है। शाहिद लगातार किरदारों का आत्‍मसात करने और उन्‍हें निभाने में अपनी हदें तोड़ रहे हैं। इस फिल्‍म में उनका किरदार परिस्थितियों में फंसा और जूझता गायक है,जो लोकप्रियता की खामखयाली में उतराने के बाद धप्‍प से खुरदुरी जमीन पर गिरता है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है। वह संभलता और अहं व अहंकार से बाहर निकल कर किसी और के लिए पसीजता है। शाहिद कपूर की मेहनत सफल रही है। किरदार की अपनी दुविधाएं हैं,जो लेखक और निर्देशक की भी हैं। बिहारिन मजदूर के रूप में आलिया भट्ट की भाषा और बॉडी लैंग्‍वेज की कमियां ईमानदार कोशिश से ढक जाती है। भोजपुरी बोलने में लहजा परफेक्‍ट नहीं है और बॉडी लैंग्‍वेज में हल्‍का सा शहरीपन है। फिर भी आलिया की इस कोशिश की तारीफ करनी होगी कि वह किरदार में ढलती हैं। दिलजीत दोसांझ पुलिस अधिकारी की भूमिका में सहज और स्‍वाभाविक हैं। उनके बॉस के रूप में आए कलाकार मानव भी ध्‍यान खींचते हैं। लंबे समय के बाद सतीश कौशिक का सदुपयोग हुआ है। इस फिल्‍म में प्रीत सरीन के किरदार पर दूसरे किरदारों की तरह ध्‍यान नहीं दिया गया है। प्रीत और सरताज की बढ़ती अनुभूतियों और नजदीकियों में भी लेखक-निर्देशक नहीं रमे हैं। यही कारण है कि जब-जब कहानी शाहिद-आलिया के ट्रैक से जब दिलजीत-करीना के ट्रैक पर शिफ्ट करती है तो थोड़ी सी फिसल जाती है।
अच्‍छी बात है कि उड़ता पंजाब में ड्रग्‍स और नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्‍य नहीं है। डर था कि फिल्‍म में उसे रोमांटिसाइज न कर दिया गया हो। फिल्‍म के हर किरदार की व्‍यथा ड्रग्‍स के कुप्रभाव के प्रति सचेत करती है। महामारी की तरह फैल चुके नशे के कारोबार में राजनीतिज्ञों,सरकारी महकमों,पुलिस और समाज के आला नागरिकों की मिलीभगत और नासमझी को फिल्‍म बखूबी रेखांकित और उजागर करती है।
गीत-संगीत उड़ता पंजाब का खास चमकदार और उल्‍लेखनीय पहलू है। अमित त्रिवेदी ने फिल्‍म की कथाभूमि के अनुरूप संगीत संजोया है।
(फिल्‍म की मुख्‍य भाषा इसकी लोकप्रियता में अड़चन हो सकती है। मुंबई में पंजाबी के अंग्रेजी सबटायटल थे। क्‍या हिंदी प्रदेशों में हिंदी सबटायटल रहेंगे?)
अवधि- 148 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार

Thursday, October 22, 2015

फिल्‍म समीक्षा - शानदार




नहीं है जानदार
शानदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    डेस्टिनेशन वेडिंग पर फिल्‍म बनाने से एक सहूलियत मिल जाती है कि सभी किरदारों को एक कैशल(हिंदी में महल या दुर्ग) में ले जाकर रख दो। देश-दुनिया से उन किरदारों का वास्‍ता खत्‍म। अब उन किरदारों के साथ अपनी पर्दे की दुनिया में रम जाओ। कुछ विदेशी चेहरे दिखें भी तो वे मजदूर या डांसर के तौर पर दिखें। शानदार विकास बहल की ऐसी ही एक फिल्‍म है,जो रंगीन,चमकीली,सपनीली और भड़कीली है। फिल्‍म देखते समय एहसास रहता है कि हम किसी कल्‍पनालोक में हैं। सब कुछ भव्‍य,विशाल और चमकदार है। साथ ही संशय होता है कि क्‍या इसी फिल्‍मकार की पिछली फिल्‍म क्‍वीन थी,जिसमें एक सहमी लड़की देश-दुनिया से टकराकर स्‍वतंत्र और समझदार हो जाती है। किसी फिल्‍मकार से यह अपेक्षा उचित नहीं है कि वह एक ही तरह की फिल्‍म बनाए,लेकिन यह अनुचित है कि वह अगली फिल्‍म में इस कदर निराश करे। शानदार निराश करती है। यह जानदार नहीं हो पाई है। पास बैठे एक युवा दर्शक ने एक दृश्‍य में टिप्‍पणी की कि ये लोग बिहाइंड द सीन(मेकिंग) फिल्‍म में क्‍यों दिखा रहे हैं?’
    शानदार कल्‍पना और अवसर की फिजूलखर्ची है। यों लगता है कि फिल्‍म टुकड़ों में लिखी और रची गई है। इम्‍प्रूवाइजेशन से हमेशा सीन अच्‍छे और प्रभावशाली नहीं होते। दृश्‍यों में तारतम्‍य न‍हीं है। ऐसी फिल्‍मों में तर्क ताक पर रहता है,फिर भी घटनाओं का एक क्रम होता है। किरदारों का विकास और निर्वाह होता है। दर्शक किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। अफसोस कि शानदार में ऐसा नहीं हो पाता। जगिन्‍दर जोगिन्‍दर और आलिया अच्‍छे लगते हैं,लेकिन अपने नहीं लगते। उन की सज-धज पर पूरी मेहनत की गई है। उनके भाव-स्‍वभाव पर ध्‍यान नहीं दिया गया है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट अपने नकली किरदारों को सांसें नहीं दे पाते। वे चमकते तो हैं,धड़कते नहीं हैं। फिल्‍म अपनी भव्‍यता में संजीदगी खो देती है। सहयोगी किरदार कार्टून कैरेक्‍टर की तरह ही आए हैं। वे कैरीकेचर लगे हैं। लेखक-निर्देशक माडर्न प्रहसन रचने की कोशिश में असफल रहे हैं।
    फिल्‍म की कव्‍वाली,मेंहदी विद करण और सिंधी मिजाज का कैरीकेचर बेतुका और ऊबाऊ है। करण जौहर को भी पर्दे पर आने की आत्‍ममुग्‍धता से बचना चाहिए। क्‍या होता है कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री के इतने सफल और तेज दिमाग मिल कर एक भोंडी फिल्‍म ही बना पाते हैं? यह प्रतिभाओं के साथ पैसों का दुरुपयोग है। फिल्‍म का अंतिम प्रभाव बेहतर नहीं हो पाया है। इस फिल्‍म में ऐसे अनेक दृश्‍य हैं,जिन्‍हें करते हुए कलाकारों को अवश्‍य मजा आया होगा और शूटिंग के समय सेट पर हंसी भी आई होगी,लेकिन वह पिकनिक,मौज-मस्‍ती और लतीफेबाजी फिल्‍म के तौर पर बिखरी और हास्‍यास्‍पद लगती है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट ने दिए गए दृश्‍यों में पूरी मेहनत की है। उन्‍हें आकर्षक और सुरम्‍य बनाने की कोशिश की है,लेकिन सुगठित कहानी के अभाव और अपने किरदारों के अधूरे निर्वाह की वजह से वे बेअसर हो जाते हैं। यही स्थिति दूसरे किरदारों की भी है। पंकज कपूर और शाहिद कपूर के दृश्‍यों में भी पिता-पुत्र को एक साथ देखने का सुख मिलता है। खुशी होती है कि पंकज कपूर आज भी शाहिद कपूर पर भारी पड़ते हैं,पर दोनों मिल कर भी फिल्‍म को कहीं नहीं ले जा पाते।
    लेखक-निर्देशक और कलाकरों ने जुमलेबाजी के मजे लिए हैं। अब जैसे आलिया के नाजायज होने का संदर्भ...इस एक शब्‍द में सभी को जितना मजा आया है,क्‍या दर्शकों को भी उतना ही मजा आएगा ? क्‍या उन्‍हें याद आएगा कि कभी आलिया भट्ट के पिता महेश भट्ट ने स्‍वयं को गर्व के साथ नाजायज घोषित किया था। फिल्‍मों में जब फिल्‍मों के ही लोग,किस्‍से और संदर्भ आने लगें तो कल्‍पनालोक पंक्‍चर हो जाता है। न तो फंतासी बन पाती है और न रियलिटी का आनंद मिलता है। मेंहदी विद करण ऐसा ही क्रिएटेड सीन है।
    शानदार की कल्‍पना क्‍लाइमेक्‍स में आकर अचानक क्रांतिकारी टर्न ले लेती है। यह टर्न थोपा हुआ लगता है। और इस टर्न में सना कपूर की क्षमता से अधिक जिम्‍मेदारी उन्‍हें दे दी गई है। वह किरदार को संभाल नहीं पातीं।
हां,फिल्‍म कुछ दृश्‍यों में अवश्‍य हंसाती है। ऐसे दृश्‍य कुछ ही हैं।
(घोड़ा चलाना क्‍या होता है ? हॉर्स रायडिंग के लिए हिंदी में घुड़सवारी शब्‍द है। उच्‍चारण दोष के अनेक प्रसंग हैं फिल्‍म में। जैसे कि छीलो को आलिया चीलो बोलती हैं।)
अवधि- 146 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

अनुभव रहा शानदार - शाहिद कपूर




-अजय ब्रह्मात्‍मज
      उस दिन शाहिद कपूर झलक दिखला जा रीलोडेड के फायनल एपीसोड की शूटिंग कर रहे थे। तय हुआ कि वहीं लंच पर इंटरव्‍यू हो जाएगा। मुंबई के गोरेगांव स्थित फिल्मिस्‍तान स्‍टूडियो में उनका वैनिटी वैन शूटिंग फ्लोर के सामने खड़ा था।
       पाठकों को बता दें कि यह वैनिटी बैन किसी एसी बस का अदला हुआ रूप होता है। इसके दो-तिहाई हिस्‍से में स्‍टार का एकाधिकार होता है। एक-तिहाई हिस्‍से में उनके पर्सनल स्‍टाफ और उस दिन की शूटिंग के लिए बुलाए गए अन्‍य सहयोगी चढ़ते-उतरते रहते हैं। स्‍टार के कॉस्‍ट्यूम(चेंज के लिए) भी वहीं टंगे होते हें। अमूमन सुनिश्चित मेहमानों को इसी हिस्‍से के कक्ष में इंतजार के लिए बिठाया जाता है। स्‍टार की हामी मिलने के बाद बीच का दरवाजा खुलता है और स्टार आप के सामने अपने सबसे विनम्र रूप में रहते हैं। आखिर फिल्‍म की रिलीज के समय इंटरव्‍यू का वक्‍त होता है। स्‍टार और उनके स्‍टाफ को लगता है कि अभी खुश और संतुष्‍ट कर दिया तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। इतनी बार चाय या काफी या ठंडा पूछा जाता है कि लगने लगता है कि अगर अब ना की तो ये जानवर समझ कर मुंह में कांड़ी डाल कर पिला देंगे।
         बहरहाल, उस दिन सब कुछ तय था। निश्चित समय से दस मिनट ज्‍यादा हुए होंगे कि बुला लिया गया। घुसने पर पहले शाहिद की पीठ दिखी। वे कुसर्भ्‍ पर बैठे थे। उनके साने टिफिन रखा था। टिफिन्‍ के डब्‍बों में सब्जियां और दाल थी। रोटी और चावल भी था। बताया गया था कि समय की तंगी की वजह से यह व्‍यवस्‍था की गई है। आप उनके लंच के समय बात कर लें। बात शुरू ही हुई थी कि उनकी मैनेजर भी आकर बैठ गई। अब यह नया सिलसिला है। स्‍टार के साथ बातचीत के समय उनके मैनेजर या पीआर टीम का कोई सदस्‍य बैठ जाता है। उनकी आप की हिंदी बातचीत में कोई रुचि नहीं होती। वे अपनी मोबाइल में उलझी रहती हैं और अपनी मौजूदगी मात्र से डिस्‍टर्ब कर रही होती हैं। सच कहें तो इंटरव्‍यू प्रेमालाप की तरह होते हैं। किसी तीसरे की मौजूदगी कुछ बातें पूछने और बताने से रह जाती हैं। आज का यह विवरण उस परिप्रेक्ष्‍य के लिए है,जिसमें स्‍टार के इंटरव्‍यू होते हैं। और हां,20 मिनट की इस बातचीत में पीआर की एक सदस्‍य तीन बार बताने आई कि आप का समय पूरा हो गया है। इस बातचीत के दौरान शाहिद ने अपना डायट फूड भी खत्‍म किया,क्‍योंकि उन्‍हें शूट के लिए फ्लोर पर जाना था।
          शादी के बाद शाहिद कपूर के जीवन में सबसे बड़ा फर्क यही आया है कि लंच में उनके लिए घर से टिफिन आता है। शाहिद टिफिन के डब्‍बों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं,’ इससे पहले की आप शादी के बारे में पूछें। मैं ही बता देता हूं कि अब घर से टिफिन आता है। डायटिशियन के सुझाव के अनुसार ही सब कुछ तैयार किया जाता है। स्‍वाद और वैरायटी मिल रही है। इसके साथ ही शूटिंग के बाद घर लौटने पर बात करने के लिए कोई रहता है। अच्‍छी बात है कि मीरा का फिल्‍मों से कोई ताल्‍लुक नहीं है। हमलोग कुछ और बातें करते हैं। इस बातचीत में ही हम एक-दूसरे को समझ रहे होते हैं। करीब आ रहे होते हैं।‘

      ‘शानदार’ की बात चलने पर शाहिद कपूर बताते हें,’ विकास बहल से मेरी मुलाकात ‘कमीने’ के समय हुई थी। तब वे डायरेक्‍श्‍न में नहीं आए थे। इस बीव वे डायरेक्‍शन में आ गए। उन्‍होंने पहले एक छोटी फिल्‍म और फिर क्‍वीन निर्देशित की। उनकी क्‍वीन बेहद सफल रही,लेकिन मैं बता दूं कि मैंने शानदार उनकी क्‍वीन की सफलता के पहले ही साइन कर ली थी। विकास में अलग सी एनर्जी और उत्‍साह है। आप उन्‍हें ना नहीं कह सकते। उन्‍होंने बताया था कि उन्‍हें डेस्टिनेशन वेडिंग पर एक मजेदार फिल्‍म करनी है। मुझे उनका आयडिया पसंद आया और मैंने हां कर दी। हिंदी में इस कंसेप्‍ट पर बनी यह अनोखी फिल्‍म है। हिंदी सिनेमा की सभी खासियतों को विकास ने बड़े स्‍केल पर शूट किया है। मौज-मस्‍ती और नाच-गाना सब कुछ है। पूरी फिल्‍म में पार्टी ही चलती रहती है। इसमें मेरे साथ प्रतिभाशाली आलिया भट्ट हैं। यह फिल्‍म मेरे लिए खास है,क्‍योंकि इसमें मेरे पिता पंकज कपूर और मेरी बहन सना कपूर भी हैं। उन सभी के साथ होने से शानदार यादगार फिल्‍म हो गई है।‘
      शाहिद कपूर की फिल्‍मों के चुनाव में एक बदलाव दिख रहा है। वे स्‍पष्‍ट कहते हैं,’पिछले सालों में मैं प्रयोग कर रहा था। हर तरह की फिल्‍मों में हाथ आजमा रहा था। यही चाहत थी कि सफल रहूं। फिर एहसास हुआ कि इस कोशिश में मैं कई चीजें खो रहा हूं और कहीं पहुंच नहीं पा रहा हूं। विशाल भारद्वाज के साथ कमीने करते समय जैसी एकाग्रता और ऊर्जा रहती थी... उसकी कमी महसूस हो रही थी। फिर हैदर आई। उसके बाद सब कुछ तय हो गया। मन की दुविधा और बेचैनी खत्‍म हो गई। मैंने समझ लिया कि सफलता के लिए कोई फिल्‍म नहीं करनी है। वही फिल्‍म करनी है,जहां सुकून मिले और काम करने से संतुष्टि हो। शानदार भी ऐसी ही फिल्‍म है। इसके बाद उड़ता पंजाब आएगी। एके वर्सेस एसके की भी शूटिंग चल रही है। मैंने यह दाढ़ी रंगून के लिए बढ़ा रखी है। विशाल सर ने मुझे कहा कि दाढ़ी बढ़ाओ। देखें फायनली क्‍या लुक मिलता है?’ शाहिद कपूर इन दिनों घनी दाढ़ी में ही हर जगह दिख रहे हैं।
     इस फिल्‍म में शाहिद आने पिता पंकज कपूर के साथ दिखेंगे। पिता के बारे में पूछने पर वे जवाब देते हैं,’ शानदार में डैड के साथ अच्‍छा अनुभव रहा। डैड इतने बड़े एक्‍टर हैं। विकास ने हम दोनों के बीच कुछ मजेदार सीन रखे हैं। ट्रेलर में तो अभी झलक मात्र मिली है। डैड के मुकाबले मैं कहीं नहीं हूं। बाकी,इस फिल्‍म के दृश्‍यों में उनके सामने वह सब विकास ने मुझ से करवाया,जो मैं अपने डैड के सामने जिंदगी में कभी नहीं कर सकता। डैड ने भी खूब मजे लिए।‘  

Friday, October 3, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हैदर

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
1990 में कश्मीर में आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट के लागू होने के बाद सेना के दमन और नियंत्रण से वहां सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बेकाबू हो गई थी। कहते हैं कि कश्मीर के तत्कालीन हालात इतने बदतर थे कि हवाओं में नफरत तैरती रहती थी। पड़ोसी देश के घुसपैठिए मजहब और भारत विरोध केनाम पर आहत कश्मीरियों को गुमराह करने में सफल हो रहे थे। आतंक और अविश्वास के उस साये में पीर परिवार परस्पर संबंधों के द्वंद्व से गुजर रहा था। उसमें शामिल गजाला, हैदर, खुर्रम, हिलाल और अर्शिया की जिंदगी लहुलूहान हो रही थी और सफेद बर्फ पर बिखरे लाल छीटों की चीख गूंज रही थी।
विशाल भारद्वाज की 'हैदर' इसी बदहवास दौर में 1995 की घटनाओं का जाल बुनती है। 'मकबूल' और 'ओमकारा' के बाद एक बार फिर विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के कंधे पर अपनी बंदूक रखी है। उन्होंने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा कि प्रकाश झा ने अपनी फिल्मों में नक्सलवाद को हथिया लिया वर्ना उनकी 'हैदर' नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में होती। जाहिर है विशाल भारद्वाज को 'हैदर' की पृष्ठभूमि के लिए राजनीतिक उथल-पुथल की दरकार रही होगी। अन्यथा प्रेम, घृणा, प्रतिशोध और प्रेम की कहानी 'हैदर' मुंबई के कारपोरेट और दिल्ली के पॉलिटिकल बैकड्रॉप में से रोचक तरीके से कही जा सकती है। शेक्सपियर का नाटक 'हैमलेट' होने और न होने के प्रश्न को स्थायी प्रासंगिकता देती है। दुनिया भर के फिल्मकार और रंगकर्मी इसे अपने संदर्भ और परिवेश में पेश करते हैं। विशाल भारद्वाज ने कश्मीर चुना है।
विशाल भारद्वाज निस्संदेह अपनी पीढ़ी के समर्थ और संवेदनशील फिल्मकार हैं। बाजार और फैशन के दवाब से परे जाकर वे क्रिएटिव कट्टरता के साथ फिल्में बनाते हैं। अपनी फिल्मों के क्रिटिकल अप्रिसिएशन से संतुष्ट विशाल भारद्वाज को आम दर्शकों की कभी परवाह नहीं रही। इस मामले में वे आत्मनिष्ठ और आत्ममुग्ध फिल्मकार हैं। उनकी फिल्मों में भावना और संवेदना का घनत्व ज्यादा रहता है। कथ्य की इस सघनता से उनका शिल्प भी गाढ़ा और जटिल होता है। अच्छी बात है कि उनकी फिल्मों की अनेक व्याख्याएं हो सकती हैं। विशाल भारद्वाज 'हैदर' में भी सरल नहीं हैं। उन्होंने शेक्सपियर के 'हैमलेट' से प्रेरित 'हैदर' को और परतदार एवं जटिल बना दिया है।
'हैदर' नायक हैदर के प्रतिशोध से ज्यादा गजाला की ग्लानि और दुविधा को लेकर चलती है। अंदर की आंच कम करने की सलाह देते पिता के कथन का मर्म गजाला की आत्मकथन में भी व्यक्त होता है, जब वह बेटे हैदर के सामने अपनी व्यथा जाहिर करती है। जाने-अनजाने फिल्म की मुख्य घटनाओं की वजह बनती गजाला अनायास हैदर से फिल्म की केंद्रीयता छीन लेती है। विशाल भारद्वाज ने 'हैमलेट' की अपनी प्रस्तुति में कुछ किरदार जोड़े हैं। उन्होंने नाटक की नाटकीयता के फिल्म के शिल्प में बखूबी ढाला है। रूहदार दिखता तो अलग किरदार है, लेकिन वह हैदर के पिता की रूह ही है। वही हैदर को इंतकाम केलिए प्रेरित करता है। खुर्रम की वासना और लालसा हैदर की मां पर फरेब डालती है। उसकी आंखों में गोली मार कर इंतकाम लेने के पिता के संदेश से सक्रिय हैदर प्रतिशोध की आग में कवि से हत्यारा बन जाता है।
'हैदर' में सभी कलाकार अपने किरदारों को प्रभावशाली तरीके से जीने की मेहनत करते हैं। इनमें गजाला बनी तब्बू और खुर्रम बने केके मेनन अपने प्रयासों में सफल रहते हैं। हालांकि दोनों अपनी मुग्धकारी प्रतिभाएं अनेक फिल्मों में साबित कर चुके हैं, लेकिन इस फिल्म में विशाल के निर्देशन में उन्हें फिर से निखरते देखना अच्छा लगता है। शाहिद कपूर ने हैदर के बाहरी रूप को अच्छी तरह अंगीकार किया है। वे किरदार के आंतरिक द्वेष और प्रतिशोध को सही अनुपात में आत्मसात नहीं कर सके हैं। श्रद्धा कपूर अदायगी और संवाद अदायगी दोनों में विफल रही हैं। उनका खूबसूरत चेहरा भावों के अनुरूप नहीं बदलता। ललित परिमू, आशीष विद्यार्थी जैसे सहयोगी किरदारों की वेशभूषा पर ध्यान नहीं दिया गया है। इरफान सिद्धहस्त अभिनेता हैं। उनकी मौजूदगी ही काफी लगती है। यहां वे रूहदार को तरजीह देते नहीं दिखाई पड़ते। 'हैदर' की खोज है नरेंद्र झा। हैदर के पिता के रूप में उन्होंने शानदार परफारमेंस दी है।
'हैदर' है तो 1995 के कश्मीर की पृष्ठभूमि पर, लेकिन फिल्म में उस साल की राजनीतिक घटनाओं का कोई रेफरेंस नहीं है। उस साल कश्मीर में विदेशी पर्यटकों की हत्या से लेकर चरार-ए-शरीफ की आगजनी जैसी बड़ी घटनाएं हुई थीं। 'हैदर' में कहीं भी उनका हवाला नहीं मिलता। फिल्म में 'अफ्सपा(आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट) का चुत्जपा भर किया गया है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में लतीफे और मजाकिया किरदार भी रहते हैं। इस फिल्म में अभिनेता सलमान खान के प्रतिरूप बने दोनों सलमान और लतीफों पर हंसी तो आती है, मगर यह हंसी फिल्म के अभिप्राय को कमजोर करती है।
अवधि-161 मिनट 
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार 

Saturday, December 7, 2013

फिल्‍म समीक्षा : आर...राजकुमार

-अजय ब्रह्मात्‍मज
प्रभु देवा निर्देशित 'वांटेड' से ऐसी फिल्मों की शुरुआत हुई थी। ढेर सारे हवाई एक्शन, हवा में लहराते कलाकार, टूटी-फूटी चीजों का स्लो मोशन में बिखरना और उड़ना, बदतमीज हीरो, बेजरूरत के नाच-गाने और इन सब में प्रेम का छौंक, प्रेमिका के प्रति नरम दिल नायक ..दक्षिण के प्रभाव में बन रही ऐसी फिल्मों की लोकप्रियता और कमाई ने हिंदी की पॉपुलर फिल्मों का फार्मूला तय कर दिया है। प्रभुदेवा निर्देशित 'आर ..राजकुमार' इसी कड़ी की ताजा फिल्म है।
इस बार शाहिद कपूर को उन्होंने एक्शन हीरो की छवि दी है। मासूम, रोमांटिक और भोले दिखने वाले शाहिद कपूर को खूंटी दाढ़ी देकर रफ-टफ बनाया गया है। एक्शन के साथ डांस का भड़कदार तड़का है। शाहिद कपूर निश्चित ही सिद्ध डांसर हैं। श्यामक डावर के स्कूल के डांसर शाहिद कपूर को प्रभु देवा ने अपनी स्टाइल में मरोड़ दिया है। एक्शन और डांस दोनों में शाहिद कपूर की जी तोड़ मेहनत दिखती है। ऐसी फिल्मों के प्रशंसक दर्शकों को 'आर .. राजकुमार' मनोरंजक लग सकती है, लेकिन लोकप्रियता की संभावना के बावजूद इस फिल्म की सराहना नहीं की जा सकती। फिल्म में थोड़ा प्यार और बहुत ज्यादा मार है।
फिल्म का हीरो अलग-अलग दृश्यों में 'सायलेंट हो जा नहीं तो वॉयलेंट हो जाऊंगा' दोहराता है। नायकसिर्फ बोलता ही नहीं। मौका मिलते ही वह वॉयलेंट भी हो जाता है। नायक के चरित्र को इसी रंग में गढ़ा गया है। उसके चेहरे पर प्रेम से अधिक गुस्से का भाव है। उसकी आंखों से रोमांस नहीं वॉयलेंस टपकता है। लहुलूहान चेहरा लिए दिल में उबलते नायक का लक्ष्य नयिका को हासिल करना है। हिंदी फिल्मों का यह पुराना लक्ष्य रहा है। इस लक्ष्य की पूर्ति में बीच की सारी हरकतें जायज मान ली जाती हैं। इस फिल्म में तो नायक मौत के बंद मुंह से लौट कर आता है। फिल्म के एक दृश्य में 'बुलशिट शायरी' का आनंद लिया गया है। 'आर ..राजकुमार' का मनोरंजन कुछ-कुछ उसी स्तर का है।
वक्त आ गया है कि 'आर .. राजकुमार' को दर्शक परखें और तय करें कि उन्हें भविष्य में कैसी फिल्में देखनी हैं? इसकी सफलता से निर्माता-निर्देशक को फिर एक बहाना मिलेगा कि दर्शक यही चाहते हैं। अफसोस की बात है कि नायक कभी पैसों तो कभी प्रेम के लिए हिंसक तो होता है, लेकिन उसकी इस मनोवृति के पीछे ठोस लॉजिक नहीं है। फिल्म के एक प्रसंग में बताया गया है कि वह भागलपुर से आया है। अचानक भागलपुर शहर से नायक का संबंध बताने का औचित्य समझ में नहीं आता।
प्रचलित खामियों के बावजूद इस फिल्म में शाहिद कपूर और सोनाक्षी दोनों की प्रतिभाओं के नए आयाम दिखते हैं। पर्दे पर दोनों की झिझक खत्म हुई है। उन्होंने अपनी भूमिकाएं जिम्मेदारी से निभाई है। सोनाक्षी सिन्हा के नृत्य में गति और मादकता आ गई है। शाहिद कपूर भी कैमरे के आगे अधिक सहज दिखे हैं। सोनू सूद को अच्छा मौका मिला है। लंबे समय के बाद आशीष विद्यार्थी को पर्दे पर देखना सुखद था, लेकिन घिसी-पिटी भूमिका में उनका लौटना दुखद था। अफसोस कि यह सब एक स्तरहीन फिल्म में हुआ है।
फिल्म के गीत मुख्य रूप से नृत्य के लिए ही रखे गए हैं। इन गीतों पर शाहिद कपूर और सोनाक्षी सिन्हा का झूमना फिल्म के वॉयलेंस की फील को थोड़ा कम करता है। गीतों के शब्द चालू किस्म के हैं। हाल से निकलने पर 'गंदी बात, गंदी बात' कानों में बजता रहता है।
अवधि-146 मिनट
** दो स्‍टार

Friday, September 20, 2013

फिल्‍म समीक्षा : फटा पोस्‍टर निकला हीरो

दोहराव की शिकार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
समय का दबाव ऐसा है कि समर्थ और साहसी निर्देशक भी लकीर के फकीर बन रहे हैं। 'घायल', 'दामिनी' और 'अंदाज अपना अपना' के निर्देशक को 'अजब प्रेम की गजब कहानी' के बाद 'फटा पोस्टर निकला हीरो' में देखते हुए सवाल जागता है कि प्रतिभाएं साधारण और चालू क्रिएटिविटी के लिए क्यों मजबूर हो रही है? ऐसा नहीं है कि 'फटा पोस्टर निकला हीरो' निकृष्ट फिल्म है, लेकिन यह राजकुमार संतोषी के स्तर की फिल्म नहीं है। मजेदार तथ्य है कि इस फिल्म का लेखन और निर्देशन उन्होंने अकेले किया है।

'फटा पोस्टर निकला हीरो' आठवें-नौवें दशक की फार्मूला फिल्मों की लीक पर चलती है। एक भ्रष्ट पलिस ऑफिसर की ईमानदार बीवी है। पति के फरार होने के बाद वह ऑटो चलाकर बेटे को पालती है। उसका सपना है कि बेटा ईमानदार पुलिस आफिसर बने। बेटे का सपना कुछ और है। वह हीरो बनना चाहता है। संयोग से वह मुंबई आता है और फिर उसकी नई जिंदगी आरंभ होती है। इस जिंदगी में तर्क और कारण न खोजें।
राजकुमार संतोषी ने पुरानी फिल्मों में प्रचलित मां और बेटे की कहानी चुनी है। फिल्म में स्टॉक सीन हैं, जिन्हें घिसा-पिटा भी कहते हैं। उन दृश्यों में सजावट और एक्टिविटी में थोड़ी तब्दीली कर दी गई है। पूरी कोशिश है कि दर्शकों को चखे हुए हर मसाले का स्वाद मिले। फिल्म में इन दिनों के फैशन के हिसाब से बहादुरी और एक्शन के प्रसंग हैं। इन प्रसंगों में शाहिद कपूर ने पापुलर हीरो की तरह जवांमर्दी दिखाई है, लेकिन उनकी कद-काठी और चेहरे का साथ नहीं मिल पाता। हमेशा लगता है कि कुछ छूट रहा है। कुछ मिसिंग है।
फिल्म में जरूरत से ज्यादा गाने और आगे-पीछे की दृश्यों से उनकी संगति भी नहीं बैठती। एक गाना खत्म हुआ, कुछ सीन हुए और फिर एक गाना आ गया। फिल्म का हीरो पोल डांस करते हुए आयटम सॉन्ग भी गाता है। इसे भी नएपन के तौर पर पेश किया जा सकता है। इंटरवल तक यह फिल्म लंबे सिक्वेंस की वजह से ऊब पैदा करती है। इंटरवल के बाद द्वंद्व पैदा होता है। फिर सहयोगी किरदार एक्टिव हो जाते हैं। संतोषी ने इन सहयोगी भूमिकाओं में मुकेश तिवारी, संजय मिश्रा, सौरभ शुक्ला और जाकिर हुसैन जैसे उम्दा कलाकारों से अच्छा काम लिया है। उनकी सही टाइमिंग और कॉमिकल अप्रोच से फिल्म कहीं-कहीं इटरेस्टिंग हो जाती है। इन दृश्यों में फिल्म हंसाती भी है।
पूरा फोकस शाहिद कपूर पर होने की वजह से इलियाना डिक्रूज को ढंग से फ्रेम में रखा ही नहीं गया। अपने किरदार के चरित्र की तरह वह अस्थिर रहती हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे गायब हो चुकी रोती-बिसूरती मां को पर्दे पर वापस ले आई हैं, जो हमेशा बेटे को कर्तव्यनिष्ठ होने का पाठ पढ़ाती रहती हैं।
'फटा पोस्टर निकला हीरो' में राजकुमार संतोषी किसी प्रकार की चालाकी या ढोंग नहीं करते। सहज तरीके से वे ढाई-तीन दशक पुरानी शैली और संरचना की फिल्म आज के दर्शकों के लिए पेश कर देते हैं।
अवधि-146 मिनट
** दो स्‍टार

Friday, June 22, 2012

फिल्‍म समीक्षा : तेरी मेरी कहानी

review : Teri meri kahani 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
तीन दौर में फैली कुणाल कोहली की तेरी मेरी कहानी मुख्य रूप से आठ किरदारों की कहानी है। दो-दो प्रेम त्रिकोण और एक सामान्य प्रेम कहानी की इस फिल्म का सार और संदेश यही है कि समय चाहे जितना बदल जाए, प्यार अपने रूप-स्वरूप में एक सा ही रहता है। समय के हिसाब से हर काल में उसकी अभिव्यक्ति और लक्षणों में बदलाव आ जाता है, लेकिन प्रेमी युगलों की सोच,धड़कनें, मुश्किलें, भावनाएं, शंकाएं और उम्मीदें नहीं बदल पातीं।
कुणाल कोहली ने तीनों दौर की कहानियों को पेश करने का नया शिल्प चुना है। दोराहे तक लाकर वे तीनों प्रेम कहानियों को छोड़ते हैं और फिर से कहानी को आगे बढ़ाते हुए एक राह चुनते हैं, जो प्रेमी-प्रेमिका का मिलन करवाती है। तीनों दौर में प्रेमी-प्रेमियों के बीच कोई खलनायक नहीं है। उनकी शंकाएं, उलझनें और अपेक्षाएं ही कहानी को आगे बढ़ाती हैं। कहानी के विस्तार में जाने से दर्शकों की जिज्ञासा खत्म होगी।
कुणाल कोहली ने तीनों दौर के प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रियंका चोपड़ा और शाहिद कपूर को चुना है। हर काल के हिसाब से उनकी भाषा, वेशभूषा और परिवेश में फर्क दिखता है। इस फर्क को बनाए रखने में कुणाल कोहली की टीम ने कामयाब मेहनत की है। खास कर भाषा और परिवेश की भिन्नता उल्लेखनीय है। संवाद लेखक कुणाल कोहली और प्रोडक्शन डिजायनर मुनीश सप्पल का योगदान फिल्म को समृद्ध करता है।
मुनीश सप्पल ने 1910, 1960 और 2012 के काल को वास्तु और वस्तुओं से सजाया है। वास्तु निर्माण में उन्होंने बारीकी का ध्यान रखा है। पृष्ठभूमि में दिख रहा परिवेश फिल्म को जीवंत बनाता है। उनकी योग्यता फिल्म के पर्दे पर एपिक रचने में सक्षम है। उसकी छटा इस साधारण फिल्म में भी दिखती है। योग्य तकनीशियन अपनी प्रतिभा का सदुपयोग कहीं भी कर लेते हैं। संवादों की भाषा में कुणाल कोहली ने काल के भेद अनुसार उर्दू, हिंदी और हिंग्लिश में रखा है। दोनों को बधाई। वेशभूषा में तीनों काल का फर्क बहुत मोटा है।
प्रियंका चोपड़ा और शाहिद कपूर ने 1910 में आराधना-जावेद, 1960 में रुखसार-गोविंद और 2010 में राधा-कृष्ण के किरदार निभाए हैं। दोनों ने काल विशेष के अनुसार लहजा बदला है। पर्दे पर उनकी मेहनत साफ दिखती है। 1910 और 1960 के दौर थोड़े बेहतर बन पड़े हैं। 2012 शायद आज की कहानी होने के कारण ध्यान नहीं बटोर पाती। वह थोड़ी बिखरी भी रहती है। ट्विटर और फेसबुक के दौर में संबंधों की चंचलता तेज हो गई है। प्रियंका चोपड़ा और शाहिद कपूर का अभिनय सामान्य है। शाहिद कपूर जावेद से किरदार में फबते हैं। उसकी वजह किरदार की रंगीनियत है।
प्रसून जोशी के गीत और साजिद-वाजिद का संगीत फिल्म केतीन दौर की कहानी के साथ न्याय नहीं कर सका। एक मुख्तसर ़ ़ ़ गीत के अलावा कोई गीत याद नहीं रहता। पुन:श्च - कुणाल कोहली को विशेष धन्यवाद कि उन्होंने फिल्म के एंड टायटल के समय किसी आयटम गीत के बजाए अपनी फिल्म के तीनों कालों के परिवेश की तस्वीरें रखी हैं। थिएटर से निकलते-निकलते आप उन पर जरूर गौर करें।
*** तीन स्टार

Sunday, September 18, 2011

मौसम में मुहब्बत है-सोनम कपूर


-अजय ब्रह्मात्‍मज

मौसम को लेकर उत्साहित सोनम कपूर को एहसास है कि वह एक बड़ी फिल्म का हिस्सा हैं। वे मानती हैं कि पंकज कपूर के निर्देशन में उन्हें बहुत कुछ नया सीखने को मिला..

आपके पापा की पहली फिल्म में पंकज कपूर थे और आप उनकी पहली फिल्म में हैं..दो पीढि़यों के इस संयोग पर क्या कहेंगी?

बहुत अच्छा संयोग है। उम्मीद है पापा की तरह मैं भी पंकज जी के सानिध्य में कुछ विशेष दिखूं। मौसम बहुत ही इंटेंस लव स्टोरी है। जब मुझे आयत का किरदार दिया गया तो पंकज सर ने कहा था कि इसके लिए तुम्हें बड़ी तैयारी करनी होगी। पहले वजन कम करना होगा, फिर वजन बढ़ाना होगा। बाडी लैंग्वेज चेंज करनी पड़ेगी। ज्यादा मेकअप नहीं कर सकोगी।

इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही?

मैंने कहा कि इतना अच्छा रोल है तो मैं सब कुछ कर लूंगी। इस फिल्म में चार मौसम हैं। मैंने हर सीजन में अलग उम्र को प्ले किया है। इस फिल्म में मैं पहले पतली हुई, फिर मोटी और फिर और मोटी हुई। अभी उसी वजन में हूं। वजन कम नहीं हो रहा है।

वजन का खेल आपके साथ चलता रहा है। पहले ज्यादा फिर कम..।

बार-बार वजन कम-ज्यादा करना बहुत कठिन होता है। पहले तो अपनी लांचिंग फिल्म सांवरिया के लिए वजन कम किया, फिर दिल्ली-6 में वजन बढ़ाया। फिर आएशा और आई हेट लव स्टोरी के लिए कम करना पड़ा..दिक्कत तो होती है, लेकिन कैरेक्टर के हिसाब से करना पड़ता है।

वजन के साथ आपकी भाषा में भी बदलाव आया है। इसकी वजह?

मौसम में मैंने कश्मीरी मुस्लिम लड़की का रोल किया है। वह बहुत ही ठहराव वाली शांत लड़की है। उसमें नजाकत है। वह आज की माडर्न लड़कियों की तरह नहीं है। उसकी जुबान बहुत साफ है। तो जाहिर है कि बॉडी लैंग्वेज और कपड़ों के साथ ही मैंने भाषा पर भी काम किया। मुझे मेडिटेशन भी करना पड़ा। आयत जैसे ठहरे हुए किरदार को निभाना मुश्किल होता है। सही समय पर सही एक्सप्रेशन देना होता है। उछलने-कूदने से कठिन होता है, खुद को संयमित रखना। इस रोल ने मुझे निचोड़ लिया है। मैंने इस किरदार की बड़ी तैयारी की है। भगवान फुर्सत से कुछ अच्छी चीजें बनाता है। पंकज सर ने भी बहुत फुर्सत से यह फिल्म बनाई है।

पंकज कपूर के बारे में क्या कहेंगी?

मैं उनकी जबरदस्त प्रशंसक हूं। मैंने उनकी सारी फिल्में और टीवी धारावाहिक देखे हैं। करमचंद जासूस, जबान संभाल के जैसे टीवी धारावाहिकों से लेकर उनकी फिल्में तक मेरी देखी हुई हैं। बहुत उम्दा और बेहतरीन एक्टर हैं। मैंने तय कर लिया था कि उनसे सिर्फ सीखना है। मैं उन्हें स्कूल की तरह मान कर गई थी। कैसे एक्टिंग करनी है, कैसे एक्सप्रेशन देने हैं..यह सब उन्हें बताना था!

क्या इसे शुद्ध रोमांटिक फिल्म कह सकते हैं? प्यार और रोमांस की फिल्में कम हो रही हैं?

मुझे लगता है इस फिल्म का कनेक्शन दर्शकों से बनेगा। अगर आप किसी क्लासिक फिल्म को देखें तो पाएंगे कि ऐसी फिल्में न सिर्फ पसंद की जाती हैं, बल्कि याद भी रखी जाती हैं। इसमें वह क्वालिटी है। लोग ऐसी फिल्मों को बार-बार देखते हैं। अपने यहां मुगले आजम, पाकीजा और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे आदि ही देख लें। मौसम का रोमांस भी दर्शकों को पसंद आएगा।

अभी तक केवल अभिषेक ही आपके थोड़े बड़े को-एक्टर रहे हैं। बाकी सब आपकी पीढ़ी के हैं। शाहिद के बारे में क्या कहेंगी?

अभिषेक बहुत बड़े नहीं हैं। हां, वो थोड़ा पहले से काम कर रहे हैं। वे मुझसे केवल पांच साल बड़े हैं। शाहिद बहुत मेहनती हैं। वे अपने पापा की बहुत इज्जत करते हैं। उनकी हर बात मानते हैं। वह बहुत जेंटलमैन हैं। दूसरों को सम्मान और आदर देना जानते हैं। मैं तो चाहूंगी मेरे सारे को-एक्टर ऐसे ही हों।

जोया अख्तर ने एक शो में आपकी बहुत तारीफ की थी और कहा था कि आपके पास एक स्टाइल है? ऐसी राय सुनकर कैसा लगता है?

मैं किसी और के बारे में नहीं सोचती। जो मन में आता है, वही पहनती हूं। मैंने जो रिस्क लिया, वह इतना बुरा या खतरनाक भी नहीं है। कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता है तो न लगे। मैं अपनी धुन में रहती हूं। अगर कोई उसकी तारीफ करे तो अच्छा लगता है। यह उम्मीद जगती है कि कोई और भी पसंद करेगा।

आपका काम देखकर लगता है कि आप फटाफट सब कुछ अचीव करने की होड़ में नहीं हैं..

बिल्कुल सही समझा आपने। मैं यहां खास किस्म का काम करने आई हूं। मैं देख चुकी हूं कि फटाफट आने और जाने का मतलब क्या होता है। आप मेरे पापा को देखें। वे आज भी काम कर रहे हैं। मैं हड़बड़ी में अपनी सोच नहीं बदल सकती।

आपकी 'आएशा' नहीं चली तो काफी छींटाकशी हुई?

आएशा निश्चित ही अलग किस्म की फिल्म थी। मैंने प्रचार पर अधिक ध्यान नहीं दिया। मैं नहीं जानती थी कि क्या-क्या करना चाहिए? आप मानोगे नहीं कि मुझे महिला समीक्षकों ने लगभग 4 स्टार दिए और पुरुष समीक्षक फिल्म को समझ ही नहीं पाए। अब मैं किसी को यह तो नहीं कह सकती थी कि पहले जेन ऑस्टिन का उपन्यास एमा पढि़ए!

मौसम का संगीत अच्छा लग रहा है। आपका प्रिय गीत..?

एक तू ही तू। वह स्लो और सैड है। मुझे स्लो गाने पसंद हैं।

Friday, May 7, 2010

फिल्‍म समीक्षा : बदमाश कंपनी

-अजय ब्रह्मात्‍मज

सन 1994.. मुंबई की गलियों में पले तीन लुक्खे  कुछ नया करने की सोचते हैं। उनमें से करण तेज दिमाग का लड़का है। मध्यवर्गीय परिवेश और परिवार में उसका दम घुटता है। जल्दी से अमीर बनने के लिए वह पहले विदेशों से सामान लेकर आनेवाला कुरियर ब्वॉय बनता है और फिर अपनी चालाकी से एक दांव खेलता  है।

कामयाब होने के बाद उसकी ख्वाहिशें  और मंजिलें बढ़ती हैं। अब वह अमेरिका जाने का सपना देखता  है। वहां भी  वह अपनी जालसाजी में कामयाब रहता है, लेकिन बाद में उसके इगो  और जिद से त्रस्त होकर उसके दोस्त अलग हो जाते हैं। जालसाजी के एक मामले में वह फंसता है। जेल जाता है। जेल से निकलने के बाद उसमें बड़ा बदलाव आता है। वह मेहनत से इज्जत कमाने की कोशिश करता है। इस बार सारे दोस्त मिल जाते हैं और गर्लफ्रेंड भ् ाी  बीवी के तौर पर आ जाती है।

परमीत सेठी की बदमाश कंपनी पिछली सदी के अंतिम दशक में अमीर बनने का ख्वाब  देख  रहे शहरी युवकों के फरेब को जाहिर करती है। पिछले सालों में इस विषय पर कई फिल्में आई हैं। परमीत  सेठी उसी कहानी को रोचक तरीके और नए पेंच के साथ कहते हैं। बदमाश कंपनी में शाहिद कपूर नए लुक में हैं। उनके साथ वीर दास और मेइयांग  चैंग  जैसे नए सपोर्टिग  एक्टर और रब ने बना दी जोड़ी की अनुष्का  हैं। नए चेहरों की यह फिल्म बासी विषय में भी ताजगी का एहसास देती है। क्लाइमेक्स के सीन में परमीत  सेठी लड़खड़ा गए हैं। इन दिनों ज्यादातर निर्देशकों की यह दिक्कत है कि वे अपनी कहानी समेट नहीं पाते हैं। परमीत  सेठी भी फिल्म से जगी उम्मीद को अंत तक नहीं निभा पाते हैं। फिल्म का क्लाइमेक्स उलझा हुआ है।

परमीत की यह पहली फिल्म है। उस लिहाज से उनका नैरेटिव  इंटरेस्टिंग  है। उन्होंने बेपरवाह और बेफिक्र युवकों की कहानी में इमोशन  और वैल्यूज  अच्छी तरह पिरोए हैं। बदमाश कंपनी दोस्ती और परिवार के महत्व को रेखांकित  करती है। हालांकि पिता की भूमिका  बहुत लंबी नहीं है, लेकिन उनका चरित्र आदमकद है। नायक अपने पिता के सच्चरित्र से प्रभावित  होता है और अंत में बदलता है। कहानी में चरित्रों का ऐसा समीकरण पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में प्रचलित था। बिगड़े और भटके  युवक और नायक फिल्म  के अंत में सही राह पर लौट आते थे। बदमाश कंपनी नए कलेवर में उसी शैली की फिल्म  है।

कमीने के बाद शाहिद कपूर की पर्सनैलिटी में बदलाव आया है। उनकी लुक और इमेज  में फर्क आया है। पहले उनके चेहरे की मासूमियत कई बार उनके अभिनय  में बाधा बन जाती थी। अब वे मैच्योर  दिखते  हैं। उन्होंने बदमाश कंपनी में सधा अभिनय किया है। केवल उत्तेजक दृश्यों में उनकी ऊंची आवाज खटकती है। वीर दास और मेइयांग  चैंग  सहज रहे हैं। उन्होंने  मुख्य किरदार को उचित सपोर्ट दिया है। नायिका की भूमिका अच्छी तरह से परिभाषित नहीं है। इस कारण अनुष्का  शर्मा अपनी प्रतिभा  की सिर्फ झलक भर  दे पाती हैं। सीमित मौजूदगी के बावजूद उनकी बातें और अदाएं याद रहती हैं।

** 1/2  ढाई स्टार

Saturday, April 17, 2010

फिल्‍म समीक्षा : पाठशाला

हिंदी फिल्मों में शिक्षा, स्कूल, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति मुद्दा बने हुए हैं। 3 इडियट में राजकुमार हिरानी ने छात्रों पर पढ़ाई के बढ़ते दबाव को रोचक तरीके से उठाया था। अहमद खान ने पाठशाला में शिक्षा के व्यवसायीकरण का विषय चुना है। नेक इरादे के बावजूद पटकथा, अभिनय और निर्देशन की कमजोरियों की वजह से पाठशाला बेहद कमजोर फिल्म साबित होती है।

बढ़ती फीस, छात्रों को रियलिटी शो में भेजने की कोशिश, छात्रों के उपयोग की चीजों की ऊंची कीमत और मैनेजमेंट के सामने विवश प्रिंसिपल ़ ़ ़ अहमद खान ने शिक्षा के व्यवसायीकरण के परिचित और सतही पहलुओं को ही घटनाओं और दृश्यों के तौर पर पेश किया है। इस दबाव के बीच अंग्रेजी शिक्षक उदयावर और स्पोर्ट्स टीचर चौहान की पहलकदमी पर सारे टीचर एकजुट होते हैं ओर वे छात्रों को असहयोग के लिए तैयार कर लेते हैं। छोटा-मोटा ड्रामा होता है। मीडिया में खबर बनती है और मुद्दा सुलझ जाता है।

विषय की सतही समझ और कमजोर पटकथा फिल्म के महत्वपूर्ण विषय को भी लचर बना देती है। सारे कलाकारों ने बेमन से काम किया है। सभी कलाकारों के निकृष्ट परफार्मेस के लिए पाठशाला याद रखी जा सकती है। नाना पाटेकर, शाहिद कपूर, सुशांत सिंह और आयशा टाकिया सभी ढीले-ढाले और थके-थके दिखाई देते हैं। कहना चािहए कि उन सभी ने मिलकर अहमद खान के भ्रम को फिल्म का रूप दे दिया है। सिर्फ अहमद खान ही नहीं, वे सभी इस कमजोर फिल्म के हिस्से हैं।

* एक स्टार

Saturday, September 19, 2009

फिल्‍म समीक्षा:दिल बोले हडि़प्‍पा

यशराज फिल्म्स ने पंजाब का पर्दे पर इतना दोहन कर लिया है कि अब उनके सही इरादों के बावजूद फिल्म नकली और देखी हुई लगने लगी है। दिल बोले हडि़प्पा के प्रसंग और दृश्यों में बासीपन है। आम दर्शक इसके अगले दृश्य और संवाद बता और बोल सकते हैं।

वीरा (रानी मुखर्जी) का सपना है कि वह सचिन और धौनी के साथ क्रिकेट खेले। अपने इस सपने की शुरूआत वह पिंड (गांव) की टीम में शामिल होकर करती है। इसके लिए उसे वीरा से वीर बनना पड़ता है। लड़के के वेष में वह टीम में शामिल हो जाती है। निर्देशक अनुराग सिंह को लगता होगा कि दर्शक इसे स्वीकार भी कर लेंगे। 30 साल पहले की फिल्मों में लड़कियों के लड़के या लड़कों के लड़कियां बनने के दृश्यों में हंसी आती थी। अब ऐसे दृश्य फूहड़ लगते हैं। दिल बोले हडि़प्पा ऐसी ही चमकदार और रंगीन फूहड़ फिल्म है।

फिल्म में रानी मुखर्जी पर पूरा फोकस है। ऐसा लगता है कि उनकी अभिनय प्रतिभा को हर कोने से दिखाने की कोशिश हो रही है। करिअर के ढलान पर रानी की ये कोशिशें हास्यास्पद हो गई हैं। शाहिद कपूर फिल्म में बिल्कुल नहीं जंचे हैं। अनुपम खेर ऐसी भूमिकाओं में खुद को दोहराने-तिहराने के अलावा कुछ नहीं करते।


Thursday, July 2, 2009

तस्वीरों में 'कमीने'
















विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'कमीने' की चर्चा अभी से हो रही है.चवन्नी के पाठकों के लिए कुछ तस्वीरें.क्या ये तस्वीरें कुछ कहती हैं?

Tuesday, July 22, 2008

इस साल मैं काफी व्यस्त हूं-शाहिद कपूर

-अजय ब्रह्मात्मज
फिल्म जब वी मेट की कामयाबी के बाद शाहिद कपूर चर्चा में आ गए। इन दिनों वे न केवल विद्या बालन और सानिया मिर्जा, बल्कि फिल्म किस्मत कनेक्शन को लेकर भी चर्चा में हैं। प्रस्तुत हैं शाहिद कपूर से हुई बातचीत के अंश..
फिल्म किस्मत कनेक्शन से क्या उम्मीदें हैं?
फिलहाल मैं खुश हूं। मैंने फिल्म देखी है और मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि हम लोगों ने जिस रूप में इस फिल्म के बारे में सोचा था, फिल्म बिल्कुल वैसी ही बनी है। इस खुशी के साथ दर्शकों के रिऐक्शन के बारे में जानने की उत्सुकता है। अंतिम फैसला तो वही करेंगे! यह फिल्म रोमांटिक कॉमेडी है। उम्मीद है, लोग फिल्म को पसंद करेंगे।
अजीज मिर्जा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
शुरू में थोड़ी उलझन थी। हालांकि मुझे यही लगता था कि मैं 27 साल का हूं और अजीज अंकल साठ से ज्यादा के हैं। हमारा कनेक्शन मालूम नहीं कैसा होगा! लेकिन मैं चकित हुआ कि वे इंडस्ट्री के युवा निर्देशकों से ज्यादा रिलैक्स और यंग हैं। दरअसल, अजीज अंकल ऐक्टर के प्रिय डायरेक्टर हैं।
क्या खासियत है इस फिल्म में?
अजीज अंकल की फिल्मों की यही खूबी है कि वे सच्चाई के आसपास होती हैं। उनके किरदारों से लोग जुड़ाव महसूस करते हैं। उनके हीरो-हीरोइन कभी लार्जर दैन लाइफ नहीं होते! उनका हीरो कभी अच्छाइयों का पुतला नहीं होता। उनके हीरो में इनसान की तरह अच्छी-बुरी बातें रहती हैं। किस्मत कनेक्शन में उनकी पहले की फिल्मों की तरह रोजमर्रा की परेशानियां हैं। उन परेशानियों से किरदार कैसे जूझते हैं, यही इसमें दिखाया गया है। इस फिल्म में मेरा किरदार आम जिंदगी से लिया गया है। उसकी उम्र 26 की हो गई है। वह अभी तक करियर को अपना नहीं सका है!
कितना डिफरेंट है यह किरदार जब वी मेट के हीरो से?
मैं इस बात से बहुत खुश हूं कि इस फिल्म में मेरा किरदार जब वी मेट से बहुत अलग है। वह थोड़ा चुपचाप रहता था। वह अमीर खानदान से था, लेकिन इस फिल्म में मैं लाउड कैरेक्टर निभा रहा हूं। वह स्मार्ट है। वह लोगों से अपनी बात मनवा लेता है। उसके पास खाने-पीने या गाड़ी पेट्रोल भराने के भी पैसे नहीं होते, तो वह अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करता है। अपनी स्मार्टनेस से दूसरों को प्रभावित करता है। यह बिल्कुल आज का किरदार है।
किस्मत कनेक्शन नाम से लगता है कि भाग्यवादी फिल्म होगी?
यह भाग्य और किस्मत की बातें जरूर हैं, लेकिन उन फिल्मों की तरह नहीं है, जो आपको भाग्यवादी बना देती हैं या फिर बोर करती हैं! यह हल्की-फुल्की फिल्म है। इसको लोग चार बार भी देख सकते हैं। फिल्म में किसी प्रकार की नेगॅटिव फीलिंग नहीं है और न ही किसी प्रकार की रिग्रेसिव सोच है। जिंदगी को सीरियस नजरिए से न लेते हुए हल्के अंदाज में कुछ बातें कही गई हैं।
फिल्म में किस्मत की बात आपके प्रेम के संदर्भ में आई है या करियर के संदर्भ में?
इसमें मेरे कैरेक्टर के हर पहलू में मौजूद है किस्मत, क्योंकि किस्मत का कनेक्शन उसके करियर से ही बनता है, लेकिन उसमें रोमांस भी शामिल है। दोनों ही मामलों में किस्मत उसके काम आती है।
कहा जा रहा है कि आपने ज्यादातर निर्माताओं को किस्मत कनेक्शन की रिलीज के लिए रोक रखा है?
इस साल मैं काफी व्यस्त हूं। मुझे फिल्में छोड़नी पड़ी हैं। फिर मैं किसी से क्यों इंतजार करवाऊंगा! मेरी चार फिल्में घोषित हो चुकी हैं। केन घोष की फिल्म आधी बन चुकी है। विशाल भारद्वाज की फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं। उसके बाद पापा की फिल्म शुरू होगी और इस बीच यशराज की फिल्म भी शुरू करूंगा। मेरा यह नजरिया नहीं रहता कि किसी फिल्म के नतीजे के लिए इंतजार करूं! मुझे फिल्में अच्छी लगें, तो तीन-चार के लिए हां कह दूंगा। नहीं पसंद आए, तो बैठा रहना पसंद करूंगा। अच्छी चीज तो कहीं से भी आ सकती है।
आप आशुतोष गोवारीकर की फिल्म नहीं कर सके, ऐसे ही कुछ और डायरेक्टर होंगे..?
आशुतोष की फिल्म नहीं कर पाने का मुझे अफसोस है। मैं उनकी फिल्मों का प्रशंसक रहा हूं। उनकी लगान मेरी प्रिय फिल्म है। फिल्ममेकर के रूप में मैं उनकी बेहद इज्जत करता हूं। उन्हें मुंबई के एक खास मौसम में फिल्म शूट करनी थी और उन तारीखों में दो फिल्मों की शूटिंग कर रहा था, इसलिए मन मारकर न कहना पड़ा। यह मेरा नुकसान है।
विद्या बालन की अपनी पहचान है। उनके साथ कैसी निभी?
विद्या बेहद संवेदनशील ऐक्ट्रेस हैं। उन्हें ज्यादातर इंडियन रोल में ही देखा गया है। इस फिल्म में उन्हें अलग रोल मिला है। अपने रोल के लिए वे बिल्कुल सही हैं। व्यक्ति के रूप में वे बहुत अच्छी हैं। मेरी उनके साथ अच्छी निभती है। उनके साथ काम करने में मजा आया। उन्हें लेकर जिस तरीके की बातें की जा रही हैं, वे फिल्म देखने के बाद दूर हो जाएंगी।

Saturday, July 19, 2008

फ़िल्म समीक्षा:किस्मत कनेक्शन

लव स्टोरी में सोशल कंसर्न
-अजय ब्रह्मात्मज
हम आप खुश हो सकते हैं कि जाने तू या जाने ना जैसी मनोरंजक फिल्म की रिलीज के एक पखवारे के भीतर ही एक और मनोरंजक फिल्म किस्मत कनेक्शन आई है। हालांकि यह भी लव स्टोरी है, लेकिन इसमें अजीज मिर्जा का टच है। किस्मत कनेक्शन टोरंटो के बैकड्राप में बनी भारतीय इमोशन की प्रेम कहानी है, जिसमें कुछ घटनाएं और स्थितियां नई हैं।
अजीज मिर्जा की खासियत है कि उनकी फिल्में हकीकत के करीब लगती हैं। उनकी फिल्मों में यथार्थ का पुट रहता है। समानता, बराबरी, मानव अधिकार और वंचितों के अधिकार की बातें रहती हैं। लेकिन, यह सब कहानी का मुख्य कंसर्न नहीं होता। इसी फिल्म को लें। प्रतिभाशाली छात्र राज मल्होत्रा पढ़ाई पूरी करने के बाद बेरोजगार है। भविष्य बताने वाली हसीना बानो जान उसे समझाती है कि वह अपना लकी चार्म खोजे और उसे अपने साथ रखे तो उसके सारे काम हो जाएंगे।
राज मल्होत्रा की प्रिया से मीठी भिड़ंत होती रहती है। चंद भिड़ंतों के बाद राज को एहसास होता है कि प्रिया उसकी लकी चार्म है। दोनों में दोस्ती होती है और फिर दोस्ती प्यार में बदल जाती है..। जरा ठहरें, इतना सिंपल अंत नहीं है। इस बीच मनमुटाव, नोकझोंक और छोटे-मोटे हादसे भी होते हैं।
राज और प्रिया की प्रेमकहानी काल्पनिक नहीं है। वे इसी धरती पर रहते हैं। चूंकि इस फिल्म में वे टोरंटो में रहते हैं, इसलिए वहां की सामाजिक मुश्किलों से दो-चार होते हैं। अजीज मिर्जा ने राजू बन गया जेंटलमैन की मूल कहानी में कुछ घटनाएं जोड़-घटा कर किस्मत कनेक्शन बनाई है। कामयाब होने की राज की जिद और कम्युनिटी सेंटर को बचाने की प्रिया की कोशिश में हम रियल किस्म के किरदारों को देख पाते हैं।
फिल्म के सहज दृश्य और संवाद याद रह जाते हैं। शाहिद कपूर और विद्या बालन की जोड़ी बेमेल नहीं लगती। प्रिया थोड़ी मैच्योर और समझदार लड़की है, इसलिए विद्या उस रोल के लिए उपयुक्त हैं। शाहिद इस फिल्म में एक कदम आगे आए हैं। वे समर्थ अभिनेता के तौर पर उभर रहे हैं। फिल्म का गीत-संगीत विषय के अनुकूल है। उन्हें आयटम सौंग की तरह फिल्म की कहानी में चिप्पियों की तरह नहीं जोड़ा गया है।

Wednesday, October 17, 2007

रिलीज के पहले का टूटना-जुड़ना


चवन्नी की तरह आप भी ख़बरें पढ़ राहे होंगे कि इन दिनों शाहिद और करीना में नही निभ रही है.कहा जा रहा है कि करीना को सैफ की संगत पसंद आ रही है.दोनों गलबहियां दिए कभी किसी होटल में तो कभी मोटर बैक पर नज़र आ राहे हैं.इधर शाहिद और करीना ने अपनी ताज़ा फिल्म जब वी मेट के प्रचार के लिए साथ में शूटिंग की.उनहोंने इस मौक़े पर आपस में कोई बात नही की और मुँह फेर कर सैट पर बैठे मिले.चवन्नी को इस किस्से पर कतई यकीं नहीं है।

शाहिद और करीना kee बेवफाई की इस कहानी पर यकीं इसलिये भी नही होता कि दोनों की दोस्ती चार साल पुरानी है और इस दोस्ती के लिए उनहोंने इतने ताने भी सुने हैं.शुरू में दोनों परिवारों को उनका मिलना-जुलना पसंद नही था.फिर एम् एम् एस के मामले में कैसे दोनों ने मीडिया का मिल कर मुक़ाबला किया था.निशित ही यह फिल्म क प्रचार के लिए अपनाया गया पुराना हथकंडा है।

इसकी शुरुआत राज कपूर ने की थी.आपको याद होगा कि संगम की रिलीज के समय उनहोंने खुद के साथ वैजयंती माला के प्रेम के किस्से छपवाए थे.यहाँ तक कि उनके बीवी कृष्ण कपूर भी प्रचार का झूठ नही समझ सकी थीं और घर छोड कर चली गयी थीं.बाद में धर्मेंद्र,राजेश खनन,अमिताभ बछां से लेकर आज कल जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर तक यही चल रहा है.बेचारे दर्शक ...ऐसी अफवाहों पर भरोसा करते हैं .माना जाता है कि ऐसी ख़बरों से फिल्म को प्रचार मिलता है और फिल्म हिट हो जाती है।