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Monday, April 21, 2014

मैं अनपेक्षित भंगिमाओं का अभिनेता हूं-राजकुमार राव


-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल ही में सफल हुई  ‘क्वीन’ में राजकुमार राव ने विजय की भूमिका में दर्शकों की घृणा हासिल की। उस किरदार की यही खासियत थी। विजय ऐन शादी के मौके पर रानी को रिजेक्ट कर देता है। इस रिजेक्शन से बिसूरने के पश्चात रानी अकेली हनीमून पर निकलती है। वहां से लौटने के बाद वह रानी से क्वीन बन चुकी होती है। राजकुमार राव इन दिनों नासिक में  ‘डॉली की डोली’ की शूटिंग कर रहे हैं। शूटिंग के लिए निकलने से ठीक पहले उन्होंने झंकार से खास बातचीत की।
-  ‘क्वीन’ की कामयाबी के बाद का समय कैसा चल रहा है?
0 पार्टियां चल रही हैं। कभी कंगना की बर्थडे पार्टी तो कभी  ‘क्वीन’ की सक्सेस पार्टी। दोस्तों की छोटी-मोटी पार्टियां बीच-बीच में चलती रहती है। हम सभी बहुत खुश हैं। फिल्म दर्शकों को पसंद आई। फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया। ऐसी सफलता से  ‘क्वीन’ जैसी फिल्मों में सभी का विश्वास बढ़ता है।
- इस कामयाबी को आप कितना एंज्वॉय कर सके?
0 मेरे लिए हर कामयाबी क्षणिक होती है। बहुत खुश हूं। इससे जयादा नहीं सोचता हूं। अभी  ‘डॉली की डोली’ पर फोकस आ गया है।
-  ‘क्वीन’ के विजय को आप कैसे देखते हैं?
0 मेरे लिए वह बहुत ही नार्मल और इंपलसिव लडक़ा है। इस दुनिया में विजय जैसे लडक़ों की भरमार है। मैं उसे गलत नहीं मानता। आप गौर करें तो वह विलेन नहीं है। ग्रे शेड है उसका। मैंने उसे विलेन की तरह प्ले नहीं किया। मैं रानी से अपनी बात भर कहता हूं। उसे डांटता नहीं। मुझे नाटकीय नहीं होना था।
-  ‘शाहिद’ से कैसी और कितनी संतुष्टि मिली?
0 बहुत ज्यादा। वह बॉयोपिक फिल्म थी। शाहिद रियल कैरेक्टर था। मैं लालची एक्टर हूं। चाहूंगा कि हर फिल्म में शाहिद जैसा किरदार मिले। शाहिद मेरे लिए एक यादगार मौका रहा। फिल्म को मिली सराहना से हंसल मेहता और मुझे फायदा हुआ।  ‘काय पो छे’,  ‘शाहिद’ और  ‘क्वीन’ ... एक-एक कर आई तीनों फिल्मों ने मुझे संतुष्ट किया है। यह धारणा बनी है कि मैं सही फिल्में चुन रहा हूं।  ‘शाहिद’ के लिए मुझे फिल्मफेअर का क्रिटिक अवार्ड मिला।
- ख्याति,सराहना और पुरस्कारों के बाद अभी कक्या प्राथमिकाएं हैं?
0 अभी मैं अपनी पसंद की फिल्में चुन पा रहा हूं। ढेर सारी स्क्रिप्ट मिलती हैं। उनमें से दमदार किरदार की फिल्में चुनता हूं। कई बार दुविधा होती है, जब एक साथ एक ही समय शूट होने वाली दो फिल्में पसंद आ जाती हैं। एक को छोडऩा पड़ता है।
- स्क्रिप्ट आप सुनते हैं या पढ़ते है?
0 मैं पढऩा पसंद करता हूं। सुनते समय मैं व्यग्र होने लगता हूं। कई बार नैरेशन देने आया व्यक्ति अच्छा पाठ नहीं करता। मुंह बंद कर उबासियां लेनी पड़ती हैं तो कुढऩ होती है। पढ़ते समय अपना किरदार और फिल्म दोनों समझ में आ जाती है। फिर डायरेक्टर से बात-मुलाकात करनी होती है।
- आप प्रशिक्षित एक्टर हैं। प्रशिक्षण का क्या लाभ हुआ?
0 प्रशिक्षण और अनुभव हमेशा उपयोगी रहता है। एक्टिंग का प्रशिक्षण इंजीनियरिंग के लिए आईआईटी जाने जैसा है। आप सध जाते हैं। आत्मविश्वास बढ़ जाता है। मुझे प्रशिक्षण से बहुत लाभ हुआ। एक्टिंग का मतलब सिर्फ 20 लोगों को एक साथ मारना नहीं है या हीरोइन को भगाकर ले जाना भर नहीं है। एक्टिंग अत्यंत आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
- सीखा हुआ काम आता है क्या हिंदी फिल्मों के ढांचे में ... 
0 देखना पड़ता है आप कैसी फिल्म कर रहे हैं और किस के साथ काम करे हैं। मैं पारंपरिक तरीके से कुछ भी नहीं करना चाहता हूं। भाव तो वही रहेंगे, लेकिन मेरी प्रतिक्रिया अलग होनी चाहिए। मैं अनपेक्षित भंगिमाओं का अभिनेता हूं। हिंदी फिल्मों में एक्सप्रेशन सीमित होते गए हैं। मैं अपने किरदार को विश्वसनीय रखना चाहता हूं। इसमें सीखा और देखा हुआ काम आता है।
- आपकी आगामी  ‘सिटी लाइट्स’ कैसी फिल्म है?
0 हंसल मेहता के साथ एक और फिल्म  ़ ़ ़ हम दोनों खूब एक्साइटेड हैं। यह ‘मैट्रो मनीला’ का आधिकारिक सीमेक है। हिंदुस्तान के हिसाब से कहानी बदली हुई है। मैं दीपक हूं। राजस्थान के एक गांव से पत्नी के साथ मुंबई आता हूं। यहां आने पर जिन मुसीबतों से जूझता हूं, उसी की कहानी है ‘सिटी लाइट््स’। हम दोनों मुंबई में एडजस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह सरवाइवल और होप की फिल्म है।
-  ‘डॉली की डोली’ क्या है?
0 यह फन कॉमेडी फिल्म है। निर्माता अरबाज खान के लिए अभिषेक डोरा इसे निर्देशित कर रहे हैं। सिचुएशनल कॉमेडी है। सोनम कपूर  डॉली की भूमिका में हैं। मैं हरियाणा का जाट सोनू सहरावत हूं। मैं इस फिल्म में कुछ नया कर रहा हूं। डॉली से में अंधा प्यार करता हूं। उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं।

Saturday, October 19, 2013

फिल्‍म समीक्षा : शाहिद

गैरमामूली शख्सियत का सच
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शाहिद सच्ची कहानी है शाहिद आजमी की। शाहिद आजमी ने मुंबई में गुजर-बसर की। किशोरावस्था में सांप्रदायिक दंगे के भुक्तभोगी रहे शाहिद ने किसी भटके किशोर की तरह आतंकवाद की राह ली, लेकिन सच्चाई से वाकिफ होने पर वह लौटा। फिर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और जेल में डाल दिया। सालों की सजा में शाहिद ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। बाहर निकलने पर वकालत की पढ़ाई की। और फिर उन बेकसूर मजलूमों के मुकदमे लड़े, जो सत्ता और समाज के कानूनी शिकंजे में लाचार जकड़े थे।
शाहिद ने ताजिंदगी बेखौफ उनकी वकालत की और उन्‍हें आजाद आम जिंदगी दिलाने में उनकी मदद की। शाहिद की यह हरकत समाज के कुछ व्यक्तियों को नागवार गुजरी। उन्होंने उसे चेतावनी दी। वह फिर भी नहीं डरा तो आखिरकार उसके दफ्तर में ही उसे गोली मार दी। हंसल मेहता की फिल्म 'शाहिद' यहीं से आंरभ होती है और उसकी मामूली जिंदगी में लौट कर एक गैरमामूली कहानी कहती है।
'शाहिद' हंसल मेहता की साहसिक क्रिएटिव कोशिश है। अमूमन ऐसे व्यक्तियों पर दो-चार खबरों के अलावा कोई गौर नहीं करता। इनकी लड़ाई, जीत और मौत नजरअंदाज कर दी जाती है। गुमनाम रह जाती है। भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया और समझ जारी रहने की वजह से ही ऐसा होता है।
'शाहिद' में एक संवाद है कि सिर्फ अपने नाम और मजहब की वजह से फहीम जेल में है। अगर उसका नाम सुरेश, जैकब या कुछ और होता तो उस पर शक नहीं किया जाता। देश की यह अफसोसनाक सच्चाई है कि विभाजन के बाद से हिंदू-मुसलमान समुदाय के बीच ठोस सद्भाव कायम नहीं हो सका। ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर में हुए दंगे हैं। इस पृष्ठभूमि में 'शाहिद' सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं रह जाती। यह समुदाय, समाज और देश की कहानी बन जाती है।
हिंदी फिल्मों के नायक मुसलमान नहीं होते। यह भी एक कड़वी सच्चाई है। हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं। उनमें मुसलमान किरदार भी होते हैं, लेकिन उन्हें ज्यादातर निगेटिव शेड्स में दिखाया जाता है। दशकों पहले मुस्लिम सोशल बनते थे, जिनमें पतनशील नवाबी माहौल का नॉस्टेलजिक चित्रण होता था। तहजीब, इत्र, शायरी, बुर्के और पर्दे की बातें होती थीं। उन फिल्मों में भी मुस्लिम समाज की सोशल रिएलिटी नहीं दिखती थी। सालों पहले 'गर्म हवा' में विभाजन के बाद भारत से नहीं गए एक मुसलमान परिवार की व्यथा को एम एस सथ्यू ने सही ढंग से पेश किया था। संदर्भ और स्थितियां बदल गई हैं, लेकिन सोच और समझ में अधिक बदलाव नहीं आया। 'शाहिद' एक अर्थ में कमोबेश 'गर्म हवा' की परंपरा की फिल्म है।
सीमित बजट और संसाधनों से बनी 'शाहिद' कोई मसाला फिल्म नहीं है। तकनीकी गुणवत्ता की भी कमियां दिख सकती हैं, लेकिन मानवीय मूल्यों के लिहाज से यह उल्लेखनीय फिल्म है। विषम परिस्थितियों में एक व्यक्ति के संघर्ष और जीत को बयान करती यह फिल्म हमारे समय का पश्चाताप है। हंसल मेहता ने इसे अतिनाटकीय नहीं होने दिया है। वे दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उन्होंने शाहिद को मजबूर और बेचारे युवक के तौर पर नहीं पेश किया है। साधारण परिवार का सिंपल युवक शाहिद जिंदगी के कुछ संवेदनशील मोड़ों से गुजरने के बाद एक समझदार फैसला करता है। वह वंचितों के हक में खड़ा होता है और इस जिद में मारा भी जाता है।
राज कुमार फिल्म की शीर्षक भूमिका में हैं। उन्होंने शाहिद के डर, खौफ, संघर्ष, जिद और जीत को बखूबी व्यक्त किया है। वे हर भाव के दृश्यों में नैचुरल लगते हैं। फिल्म की कास्टिंग जबरदस्त है। शाहिद के भाइयों, मां और पत्‍‌नी की भूमिकाओं में भी उपयुक्त कलाकारों का चयन हुआ है। फिल्म के कोर्ट रूम सीन रियल हैं। 'जॉली एलएलबी' के बाद एक बार फिर हम कोर्ट रूम की बहसों को बगैर डायलॉगबाजी और सौगंध के देखते हैं।
'शाहिद' मर्मस्पर्शी और भावुक कहानी है। फिल्म के अंतिम प्रभाव से आंखें नम होती हैं, क्योंकि हम सत्ता और समाज के हाथों विवश और निहत्थे व्यक्ति की हत्या देखते हैं। यह फिल्म सिहरन देती है। खौफ पैदा करती है। हिंदी सिनेमा के वर्तमान मनोरंजक दौर में लकीर से अलग होकर एक सच कहती है।
अवधि-112 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, October 10, 2013

ताजातरीन बॉयोपिक ‘शाहिद’


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता की ‘शाहिद’ किसी व्यक्ति की जिंदगी पर बने ताजातरीन बॉयोपिक है। फरवरी 2010 में वकील शाहिद आजमी की हत्या उनके दफ्तर में कर दी गई थी। शाहिद ने ताजिंदगी उन असहायों की सहायता की, जो गलत तरीके से शक के आधार पर कैद कर लिए गए थे। उन्होंने ऐसे अनेक आरोपियों को मुक्त करवाया। शाहिद ने इसे अपनी जिंदगी का मुहिम बना लिया था, क्योंकि किशोरावस्था में वे खुद ऐसे झूठे आरोप में टाडा के अंतर्गत गिरफ्तार होकर पांच सालों तक जेल में रहे थे। पांच भाइयों में से एक शाहिद ने आक्रोश में आतंकवादी ट्रेनिंग के लिए कश्मीर की भी यात्रा की थी। वहां के तौर-तरीकों से मोहभंग होने पर मुंबई लौटे तो उन्हें टाडा के तहत सजा हो गई। जेल में ही उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और जेल से निकलने के बाद वकालत की पढ़ाई की। वे कुछ समय तक मशहूर वकील माजिद मेनन के सहायक रहे। फिर अपनी वकालत शुरू की।
    शाहिद की हत्या के तीन सालों के अंदर हंसल मेहता ने समीर गौतम सिंह की मदद से उनकी जिंदगी की छानबीन की और इस फिल्म की कहानी लिखी। सच्ची घटनाओं और तथ्यों पर आधारित ‘शाहिद’ में कल्पना का सहारा धागे की तरह किया गया है, जो घटनाओं को सिलता है। 1 करोड़ से कम बजट में बनी इस फिल्म की शूटिंग मुंबई के कुर्ला, पायधनी और गोवंडी जैसे वास्तविक लोकेशन में की गई है। शाहिद आजमी के दफ्तर में भी खास दृश्यों की शूटिंग हुई।
    पूर्वाग्रहों और वैमनस्य से विभक्त हो रहे वर्तमान समाज में शाहिद आजमी ने कानूनी दायरे में वंचितों के हक की लड़ाई लड़ी और मारे गए। हंसल मेहता ने उनकी इस खास जिंदगी को ‘शाहिद’ में बगैर नाटकीयता के चित्रित किया है। यह फिल्म अनेक फेस्टिवल में प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुकी है।



Sunday, April 14, 2013

फिल्‍मों की कास्टिंग और मुकेश छाबड़ा

कैमरे के पीछे सक्रिय विभागों में कास्टिंग एक महत्‍वपूर्ण विभाग है। पहले इसे स्‍वतंत्र विभाग का दर्जा और सम्‍मान हासिल नहीं था। पिछले पांच सालों में परिदृश्‍य बदल गया है। कोशिश है कि चवन्‍नी के पाठक इस के बारे में विस्‍तार से जान सकें। 
कास्टिंग परिद्श्‍य
-अजय ब्रह्मात्मज
    फिल्म निर्माण में इस नई जिम्मेदारी को महत्व मिलने लगा है। इधर रिलीज हो रही फिल्मों में कास्टिंग डायरेक्टर के नाम को भी बाइज्जत क्रेडिट दिया जाता है। हाल ही में रिलीज हुई ‘काय पो छे’ की कास्टिंग की काफी चर्चा हुई। इसके मुख्य किरदारों की कास्टिंग नई और उपयुक्त रही। सुशांत सिंह राजपूत, अमित साध, अमृता पुरी, राज कुमार यादव और मानव कौल आदि मुख्य किरदारों में दिखे। सहायक किरदारों में भी परिचित चेहरों के न होने से एक ताजगी बनी रही। कास्टिंग डायरेक्टर के महत्व और भूमिका को अब निर्देशक और निर्माता समझने लगे हैं।
    हालांकि अभी भी निर्माता-निर्देशक स्टारों के चुनाव में कास्टिंग डायरेक्टर के सुझाव को नजरअंदाज करते हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के स्ट्रक्चर में स्टार के पावरफुल और निर्णायक भूमिका (डिसाइडिंग फैक्टर) में होने की वजह से यह निर्भरता बनी हुई है। कह सकते हैं कि अभी तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिल्में स्टार नहीं चुनतीं। स्टार ही फिल्में चुनते हैं। फिर भी अब हीरो-हीरोइन के अलावा बाकी किरदारों के लिए कलाकारों के चयन में कास्टिंग डायरेक्टर की सलाह, समझदारी और पसंद को प्राथमिकता दी जा रही है।
    50 की उम्र के आसपास पहुंचे पाठको-दर्शकों को याद होगा कि रिचर्ड अटेनबरो की फिल्म ‘गांधी’ के निर्माण के समय बड़े पैमाने पर भारतीय कलाकारों की छोटी-बड़ी भूमिकाओं के कास्टिंग हुई थी। यहां तक भीड़ के लिए भी खास चेहरों को चुना गया था। श्याम बेनेगल ने ‘भारत एक खोज’ धारावाहिक के निर्देशन के समय देश भर से आए सैकड़ों कलाकारों में से खुद के धारावाहिक के लिए उपयुक्त कलाकारों का चुनाव किया था। ‘महाभारत’, ‘रामायण’ और ‘चाणक्य’ में भी कलाकारों की विधिवत कास्टिंग की गई थी। ‘चाणक्य’ की कास्टिंग मीनाक्षी ठाकुर ने की थी।
    फिल्मों में शेखर कपूर ने पहली बार कास्टिंग डायरेक्टर का महत्वपूर्ण इस्तेमाल किया। 1994 में आई उनकी फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ की कास्टिंग आज के चर्चित डायरेक्टर तिग्मांशु धुलिया ने की थी। सीमा विश्वास, निर्मल पांडे, मनोज बाजपेयी, गोविंद नामदेव आदि समेत दर्शनों कलाकारों को पहली बार बड़े पर्दे पर आने का मौका मिला था। नए चेहरों से फिल्म की संप्रेषणीयता प्रभावित होती है। फिल्म की विश्वसनीयता बढ़ती है। परिचित कलाकारों के मैनरिज्म से वाकिफ होने के कारण हमें किरदारों में नयापन नहीं दिखता। हम सीधे तौर पर इसे महसूस नहीं करते, लेकिन फिल्म को नापसंद करने में परिचित चेहरे से पैदा ऊब भी शामिल रहती है।

कास्टिंग डायरेक्टर की भूमिका

    कास्टिंग डायरेक्टर फिल्म के सभी किरदारों के लिए उपयुक्त कलाकारों का चुनाव करता है। निर्माता और निर्देशक के साथ उसे काम करना होता है। किसी भी फिल्म की शुरुआत में निर्माता-निर्देशक के बाद उसके पास ही स्क्रिप्ट आती है। स्क्रिप्ट पढऩे के बाद वह चरित्रों की सूची तैयार करता है। फिर उन चरित्रों के लायक कलाकारों के इंटरव्यू और ऑडिशन करने के बाद वह आरंभिक सेलेक्शन करता है। आम तौर पर हर चरित्र के लिए पहले दो-तीन कलाकारों का विकल्प चुना जाता है। फिर डायरेक्टर की मदद से आखिरी फैसला लिया जाता है। कास्टिंग डायरेक्टर के पास मौजूद कलाकारों का पुष्ट डाटा बैंक रहता है। नए कलाकारों की तलाश में वे दूसरे शहरों की यात्रा करते हैं। विभिन्न प्रकार के नाट्य समारोहों और परफार्मिंग इवेंट देखने जाते हैं।
    फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र के समान कास्टिंग डायरेक्शन में आने के लिए विशद अनुभव की जरूरत होती है। उसकी नजर और समझ पारखी हो। वह चमक-दमक या धूल से भ्रमित नहीं हो। वह प्रतिभाओं को परख सके और उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें सही भूमिकाएं दे - दिला सके।
    हिंदी फिल्मों में अभी हनी त्रेहन, जोगी, अभिमन्यु रे, शाहिद, अतुल मोंगिया, मुकेश छाबड़ा आदि एक्टिव कास्टिंग डायरेक्टर हैं। फिल्मों में आने को उत्सुक महात्वाकांक्षी युवक-युवती फिल्म निर्माण के इस जरूरी क्षेत्र को भी पेशे के तौर पर चुन सकते हैं।

शूटिंग आरंभ होते ही हमारा काम खत्म हो जाता है-मुकेश छाबड़ा
अभी ‘काय पो छे’  की कास्टिंग की सभी तारीफ कर रहे हैं। ज्यादा लोगों को नहीं मालूम कि इस फिल्म की कास्टिंग मुकेश छाबड़ा ने की है। दिल्ली से आए रंगकर्मी मुकेश छाबड़ा ने सबसे पहले रंजीत कपूर की फिल्म ‘चिंटू जी’ की कास्टिंग की थी। उस फिल्म में उन्हें पूरे मोहल्ले के लिए कलाकारों को चुनना था।  उसके बाद ‘चिल्लर पार्टी’, ‘रॉकस्टार’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘काय पो छे’, ‘तृष्णा’, ‘डी डे’, ‘हाई वे’, ‘पी के’ और ‘बॉम्बे वेलवेट’ जैसी फिल्मों की लंबी कतार है। इनमें से कुछ रिलीज हो चुकी हैं और कुछ अभी फ्लोर पर हैं।
- फिल्मों में कास्टिंग की शुरुआत कब से मानी जा सकती है?
0 कास्टिंग फिल्म निर्माण का जरूरी हिस्सा है। पहले डायरेक्टर और उनके असिस्टेंट अपनी जान पहचान के कलाकारों को विभिन्न भूमिकाओं के लिए चुन लेते थे। पहले फिल्मों में नायक-नायिकाओं के अलावा ज्यादातर भूमिकाओं में हम एक ही कलाकार को देखते थे। आप ने गौर किया होगा कि पुरानी फिल्मों में एक ही एक्टर डॉक्टर या पुलिस इंस्पेक्टर बनता था। यहां तक कि पार्टियों और भीड़ के जूनियर आर्टिस्ट भी पहचान लिए जाते थे। पिछले दस सालों में नए निर्देशकों के आने के बाद पश्चिम के प्रभाव से कास्टिंग पर ध्यान दिया जाने लगा है। मेरे जैसे कुछ तकनीशियनों को काम मिलने लगा है।
- इस फील्ड में आने का ख्याल कैसे आया?
0 मैं दिल्ली रंगमंच से आया हूं। रंगमंच के दिनों में बहुत से कलाकारों को जानता था। यहां आने के बाद कभी-कभार लोगों को सलाह दे दिया करता था। बाद में लगा कि इसे पेशे तौर पर अपनाया जा सकता है। धीरे-धीरे मेरी भी समझदारी बढ़ी है। अब स्क्रिप्ट पढ़ के किरदारों का चेहरा नजर आने लगता है। फिर अपनी याददाश्त और डाटा बैंक के सहारे मैं उन किरदारों के लायक कलाकारों को चुन लेता हूं। एक्टर तो हर जगह हैं। उनमें से कुछ लोग ही मुंबई आ पाते हैं । मेरी कोशिश रहती है कि बाहर के एक्टरों को भी काम मिले।
- कास्टिंग डायरेक्टर का कंसेप्ट कब से चलन में है?
0 मेरी जानकारी में शेखर कपूर ने ‘बैंडिट क्वीन’ में कास्टिंग का काम तिग्मांशु धूलिया को सौंपा था। उसके बाद उन्होंने मणि रत्नम की ‘दिल से’ की भी कास्टिंग की। बाद में वे स्वयं डायरेक्टर बन गए। उनके अलावा कोई और उल्लेखनीय नाम  नहीं दिखता। बाद में यशराज फिल्म्स और नए समय के निर्देशकों ने इस तरफ ध्यान दिया।
- कास्टिंग डायरेक्टर का काम क्या होता है? अपनी कार्य प्रक्रिया के बारे में बताएं?
0 सबसे पहले हमें स्क्रिप्ट दी जाती है। रायटर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के बाद हमलोग ही स्क्रिप्ट को पढ़ते हैं। कुछ डायरेक्टर स्क्रिप्ट देने के साथ ही ब्रीफ कर देते हैं। स्क्रिप्ट पढऩे के बाद हमें सोचना और खंगालना पड़ता है। सबसे पहले हम खुद ही शॉर्ट लिस्ट करते हैं। ऑडिशन और इंटरव्यू से संतुष्ट होने के बाद हम उन्हें डायरेक्टर से मिलवाते हैं। कई बार हमलोग कुछ एक्टर के लिए अड़ भी जाते हैं। शूटिंग आरंभ होने के साथ ही हमारा काम खत्म हो जाता है। डायरेक्टर तक एक्टर को ले जाने के पहले हम खुद ही उसकी जांच-परख कर लेते हैं। अब तो इतना अनुभव हो गया है कि बातचीत और व्यवहार से सामने वाले की समझ हो जाती है। हम जिन्हें छांट देते हैं,उनकी गालियां भी सुननी पड़ती है। हर फिल्म में मैं नई कास्टिंग करता हूं। बहुत कम एक्टर को दोहराता हूं।
- कुछ फिल्मों के उदाहरण से समझाएं?
0 ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कास्टिंग नौ महीनों में हुई थी। लगभग 15-20 हजार कलाकारों से मिला। विभिन्न शहरों में जाकर कास्टिंग की। पहली कोशिश यही थी कि उनकी भाषा और बोलने का लहजा फिल्म के अनुकूल हो। मुझ से जितने कलाकार मिलने आते हैं उन सभी की वीडियो रिकॉर्डिंग कर लेता हूं। ‘शाहिद’ फिल्म में राजकुमार यादव की मां के रोल के लिए मैंने हिसार की एक अभिनेत्री को बुलाया था। यहां सभी नाराज हो गए थे कि मुझे मुंबई में एक्टर नहीं मिल रहे हैं। इम्तियाज अली की ‘रॉकस्टार’ में कलाकारों के चार झुंड थे। एक तो रणबीर कपूर का जाट परिवार था। दूसरे रणबीर के कॉलेज के दोस्त थे। इसके अलावा नरगिस के दोस्त और परिवार के सदस्य थे। चौथा नरगिस के पति का प्राग का परिवार था। इम्तियाज छोटी से छोटी भूमिकाओं में भी कायदे के कलाकारों को ही रखते हैं। उनकी फिल्म मेरे लिए ज्यादा चैलेंजिंग थी। मैं मिडिल क्लास का लडक़ा हूं। मुझे नरगिस के परिवार के लिए हाई क्लास में खपने लायक कलाकारों को चुनना था। शुरू में इस काम में थोड़ी दिक्कत हुई। ‘काय पो छे’ की बात करूं तो इसकी कास्टिंग बहुत ही इंटरेस्टिंग रही। मुझे बताया गया था कि तीनों नए कलाकार होने चाहिए। जब अंतिम चुनाव के बाद मैंने सुशांत, अमित और राजकुमार के नाम सुझाए तो सभी चौंके कि इतना नया भी क्या चुनना? उन्हें दिक्कत हो रही थी कि सुशांत टीवी का एक्टर है और राजकुमार हीरो जैसा नहीं लगता है। काफी बहस-मुबाहिसा हुआ। फिर जा कर ये नाम फायनल हुए।
- हिंदी फिल्मों के संदर्भ में कास्टिंग काउच की बहुत चर्चा होती है। आप क्या कहेंगे?
0 (हंसते हुए)मेरे ऑफिस में कोई भी काउच नहीं है। मैंने भी इस तरह की बातें सुनी हैं, लेकिन कोई भी प्रोफेशनल कास्टिंग डायरेक्टर ऐसी हरकत नहीं कर सकता। हमारे ऊपर एक्टर और डायरेक्टर विश्वास करते हैं। मैं अपनी बात करूं तो मेरी एक प्रेमिका हैं। मुझे इधर-उधर झांकने की जरूरत नहीं है।



Sunday, September 16, 2012

मुझे फिल्मों में ही आना था- राज कुमार


-अजय ब्रह्मात्मज
उन्होंने अपने नाम से यादव हटा दिया है। आगामी फिल्मों में राज कुमार यादव का नाम अब सिर्फ राज कुमार दिखेगा। इसकी वजह वे बताते हैं, ‘पूरा नाम लिखने पर नाम स्क्रीन के बाहर जाने लगता है या फिर उसके फॉन्ट छोटे करने पड़ते हैं। इसी वजह से मैंने राज कुमार लिखना ही तय किया है। इसके अलावा और कोई बात नहीं है।’ राज कुमार की ताजा फिल्म ‘शाहिद’ इस साल टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई। पिछले दिनों अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ में उन्होंने शमशाद की जीवंत भूमिका निभाई। उनकी ‘चिटगांव’ जल्दी ही रिलीज होगी। एफटीआईआई से एक्टिंग में ग्रेजुएट राज कुमार ने चंद फिल्मों से ही, अपनी खास पहचान बना ली है। इन दिनों वे ‘काए पो चे’ और ‘क्वीन’ की शूटिंग कर रहे हैं।
    -आप एफटीआईआई के ग्रेजुएट हैं, लेकिन आप की पहचान मुख्य रूप से थिएटर एक्टर की है। ऐसा माना जाता है कि आप भी एनएसडी से आए हैं?
0 इस गलतफहमी से मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। दरअसल शुरू में लोग पूछते थे कि आप ने फिल्मों से पहले क्या किया है, तो मेरा जवाब थिएटर होता था। फिल्मों में लोग थिएटर का मतलब एनएसडी ही समझते हैं, इसलिए यह गलतफहमी है। अब धीरे-धीरे लोगों को मालूम हो रहा है कि मैं एफटीआईआई से आया हूं। पिछले दो-तीन सालों में और भी कुछ छात्र आए हैं।
    - एक जमाने में एफटीआईआई से एक्टर की पूरी जमात आई थी। वे सभी आज मशहूर हैं। एक अंतराल के बाद आप लोग उस ट्रेडिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी कैसी फैकल्टी है और वहां पढऩे का क्या लाभ हुआ?
0 पेंटल साहब हमारे हेड थे। फैकल्टी काफी अच्छी थी। दो सालों की पढ़ाई में उनलोगों ने एक्टिंग की बारीकियां सिखाईं। वहां थोड़ी आजादी भी दी जाती है। आप ने सही कहा। एक समय एफटीआईआई से काफी एक्टर हिंदी फिल्मों में आए। उन्होंने हिंदी फिल्मों की एक्टिंग को नई दिशा दी। बीच में वहां एक्टिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी। अब शुरू हुई है। धीरे-धीरे हमारी तादाद बढ़ेगी।
    - आप ने एफटीआईआई जाने की जरूरत क्यों महसूस की? आप के पहले नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी ने एनएसडी से पढ़ाई पूरी करने के बाद एफटीआईआई से भी अभिनय का प्रशिक्षण लिया। क्या एफटीआईआई में फिल्म एक्टिंग की खास पढ़ाई होती है?
0 मैं दिल्ली में थिएटर कर रहा था। वहां श्रीराम सेंटर से जुड़ा हुआ था। 2004 में जब एफटीआईआई में एक्टिंग का कोर्स चालू हुआ तो एक मित्र वहां गए। उनके बारे में सुनने और जानने के बाद मैंने भी एफटीआईआई में ही जाना उचित समझा। एनएसडी का ख्याल मुझे कभी नहीं आया। मुझे थिएटर करना ही नहीं था। शुरू से स्पष्ट था कि मुझे फिल्मों में एक्टिंग करनी है। मेरे दिमाग में यह बात थी कि एफटीआईआई मुंबई के नजदीक है। एफटीआईआई से निकले काफी लोग फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। मुझे लगा कि उससे थोड़ी सहूलियत होगी।
    -फिल्मों में एक्टिंग करने का फैसला कब लिया आप ने?
0 सच कहूं तो स्कूल के दिनों में सोच लिया था। स्कूल के वार्षिक समारोहों और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया करता था। दोस्तों और शिक्षकों की प्रशंसा से लगा कि मैं कुछ कर सकता हूं। उन्हीं दिनों यह ख्वाब पैदा हुआ। बाद में डांस सीखा, थिएटर किया, नाटक पढ़े, फिल्में देखी.. और खुद को फिल्मों के लिए तैयार किया।
    - अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
0 मैं गुडग़ांव का हूं। उस गुडग़ांव का, जो एक गांव हुआ करता था। अभी तो वह सिंगापुर का मुकाबला कर रहा है। हम रात में छतों पर चादर बिछाकर सोया करते थे। ऊपर तारों से सजा आकाश होता था। वहीं कुछ सपने देखे थे। मेरे पिता पटवारी थे। उन्होंने ईमानदार जिंदगी जी और उसी की सीख दी। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं। दोनों बड़े भाई भी एक्टिंग और डांसिंग के शौकीन थे। फिलहाल वे नौकरी कर रहे हैं। मुझे पर्दे पर देखकर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी होती है। शायद मैं उनके अधूरे ख्वाबों को भी जी रहा हूं। बहुत संबल मिलता है। बतौर एक्टर मुझे बचपन की सरल और साधारण जिंदगी बहुत मदद करती है। मैंने चेहरे और किरदार पढ़े हैं। वे सभी मेरे अंदर जिंदा हैं। मैंअपने परिवार और परिवेश का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे बचपन में ही अनौपचारिक ट्रेनिंग दे दी। मैं संयुक्त परिवार से आता हूं। रिश्तों की रेस्पेक्ट जानता हूं। रहते हम लोग गुडग़ांव में थे, लेकिन दिल्ली आना-जाना लगा रहता था। मुझे एक साथ गांव और शहर दोनों को समझने और जीने का मौका मिला।
    - परिवार का माहौल कैसा था? फिल्मों के प्रति मां-बाप की रुचि थी या नहीं?
0 फिल्मों के प्रति बहुत ज्यादा रूझान नहीं था, लेकिन मेरी मां अमिताभ बच्चन की जबरदस्त प्रशंसक हैं। पिताजी को राजेश खन्ना ज्यादा पसंद थे। उनके गाने वे आज भी गुनगुनाया करते हैं। भाइयों को फिल्मों का शौक था। उन्हीं के साथ मुझे भी फिल्में देखने को मिल जाती थी। मुझे बचपन से पूरी आजादी मिली। फिल्में देखने पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन मैंने कभी इसका नाजायज फायदा नहीं उठाया। मेरे ऊपर 90 प्रतिशत अंक लाने का या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का दवाब नहीं था। मैं ठीक-ठाक छात्र रहा हूं। परीक्षा के समय पढक़र फस्र्ट क्लास लाया करता था। पिताजी ने बताया था कि वे परीक्षा के दिनों में फिल्में जरूर देखते थे। उनसे यह आदत मैंने भी सीख ली।
    -फिल्मों में काम मिलने में कितनी दिक्कतें हुईं? संघर्ष कितना लंबा और कठिन रहा?
0 मुझे लगभग एक साल कथित स्ट्रगल करना पड़ा। आने के बाद मैंने भी वही तरीका अपनाया कि प्रोडक्शन हाउस में जाकर अपनी तस्वीर छोड़ो और फिर उनके फोन का इंतजार करो। ज्यादातर निराशा ही हाथ लगती थी। मैंने उन्हीं दिनों दोस्तों की मदद से अपना एक शोरील बनाया। डीवीडी के ऊपर अपनी तस्वीर चिपकाई और किसी प्रोफेशनल एक्टर की तरह उन्हें प्रोडक्शन के दफ्तरों में छोड़ा। फिर कहीं अखबार में पढ़ा कि दिबाकर बनर्जी को   ‘लव सेक्स और धोखा’ के लिए नए कलाकार चाहिए। मुझे यकीन हो गया कि मेरे लिए ही उन्होंने यह शर्त रखी है। मैंने उनके कास्टिंग डायरेक्टर से संपर्क किया। संयोग देखें कि मेरा चुनाव हो भी गया। उस एक फिल्म ने हिंदी फिल्मों में मेरा प्रवेश आसान कर दिया। उसके तुरंत बाद  ‘रागिनी एमएमएस’ मिल गई। वैसे  ‘लव सेक्स और धोखा’ की शूटिंग के बाद ही मैंने  ‘चिटगांव’ की शूटिंग शुरू कर दी थी और  ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के लिए हां कह दिया था। फिर विजॉय नांबियार ने  ‘शैतान’ में छोटा सा अपीयरेंस दिया। अभी तक के अपने काम से संतुष्ट हूं और मुझे लग रहा है कि सही दिशा में बढ़ रहा हूं।
    -अपनी फिल्म  ‘शाहिद’ के बारे में बताएं?
0 यह मुंबई के वकील शाहिद आजमी के जीवन पर आधारित है। वे ऐसे निर्दोष व्यक्तियों की वकालत करते थे, जिन्हें किसी गलतफहमी या साजिश के तहत गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने कई निरपराध आरोपियों को बरी कराया। उनके इस रवैए से परेशान होकर असामाजिक तत्वों ने राजनीतिक कारणों से उनकी हत्या कर दी। हंसल मेहता ने उनकी जिंदगी पर बहुत ही संवेदनशील फिल्म बनाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह फिल्म मेरी क्षमताओं से दर्शकों और समीक्षकों को परिचित कराएगी।
    -आप का करियर अच्छा और सीधा ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है। अभी तक की फिल्मों में किस अभिनेता या अभिनेत्री के साथ एक फ्रेम में आने की सबसे ज्यादा खुशी हुई? भविष्य में और किस के साथ आना चाहेंगे?
0  ‘चिटगांव’ में मनोज बाजपेयी के साथ आना मेरे लिए गर्व की बात थी। उनके साथ एक कनेक्शन महसूस करता हूं। वे भी दिल्ली से थिएटर कर मुंबई आए। मैं उन्हीं के पद्चिह्नों पर चल रहा हूं। उसके बाद  ‘तलाश’ की शूटिंग में आमिर खान के साथ काम करने का मौका मिला। आमिर बड़े ही सहज और डेमोक्रेटिक स्टार हैं। उन्होंने फिल्म एक्टिंग की बारीकियां बातों-बातों में सिखा दीं। भविष्य में चाहूंगा कि कभी इरफान के साथ काम करने का मौका मिले। मुझे डर है कि शायद मैं सहज नहीं रह पाऊंगा। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं और उनके प्रभामंडल से प्रभावित हूं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में एक्टिंग की नई परिभाषा गढ़ी है।