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Friday, November 25, 2016

फिल्‍म समीक्षा : डियर जिंदगी



फिल्‍म समीक्षा
डियर जिंदगी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हम सभी की जिंदगी जितनी आसान दिखती है,उतनी होती नहीं है। हम सभी की उलझनें हैं,ग्रंथियां हैं,दिक्कतें हैं...हम सभी पूरी जिंदगी उन्‍हें सुलझाते रहते हैं। खुश रहने की कोशिश करते हैं। अनसुलझी गुत्थियों से एडजस्‍ट कर लेते हैं। बाहर से सब कुछ शांत,सुचारू और स्थिर लगता है,लेकिन अंदर ही अंदर खदबदाहट जारी रहती है। किसी नाजुक क्षण में सच का एहसास होता है तो बची जिंदगी खुशगवार हो जाती है। गौरी शिंदे की डियर जिंदगी क्‍यारा उर्फ कोको की जिंदगी में झांकती है। क्‍यारा अकेली ऐसी लड़की नहीं है। अगर हम अपने आसपास देखें तो अनेक लड़कियां मिलेंगी। वे सभी जूझ रही हैं। अगर समय पर उनकी भी जिंदगी में जहांगीर खान जैसा दिमाग का डाक्‍टर आ जाए तो शेष जिंदगी सुधर जाए।
हिंदी फिल्‍मों की नायिकाएं अब काम करने लगी हैं। उनका एक प्रोफेशन होता है। क्‍यारा उभरती सिनेमैटोग्राफर है। वह स्‍वतंत्र रूप से फीचर फिल्‍म शूट करना चाहती है। उसे रघुवेंद्र से आश्‍वासन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि वह स्‍वयं ही मुकर जाती है। मानसिक दुविधा में वह अनिच्‍छा के साथ अपने मां-बाप के पास गोवा लौटती है। गोवा में उसकी मुलाकात दिमाग के डाक्‍टर जहांगीर खान से होती है। अपनी अनिद्रा के इलाज के लिए वह मिलती है तो बातचीत और सेशन के क्रम में उसके जीवन की गुत्थियों की जानकारी मिलती है। जहांगीर खान गुत्थियों की गांठों को ढीली कर देता है। उन्‍हें वह खुद ही खोलती है।
गुत्थियों को खोलने के क्रम में वह जब मां-बाप और उनके करीबी दोस्‍तों के बीच गांठ पर उंगली रखती है तो सभी चौंक पड़ते हैं। हमें क्‍यारा की जिंदगी के कंफ्यूजन और जटिलताओं की वजह मालूम होती है और गौरी शिंदे धीरे से पैरेंटिंग के मुद्दे को ले आती हैं। करिअर और कामयाबी के दबाव में मां-बाप अपने बच्‍चों के साथ ज्‍यादतियां करते रहते हैं। उन्‍हें पता ही नहीं चलता और वे उन्‍हें किसी और दिशा में मोड़ देते हैं। उनके कंधों पर हमेशा अपनी अपेक्षाओं का बोझ डाल देते हैं। बच्‍चे निखर नहीं पाते। वे घुटते रहते हैं। अपनी जिंदगी में अधूरे रहते हैं। कई बार वे खुद भी नहीं समझ पाते कि कहां चूक हो गई और उनके हाथों से क्‍या-क्‍या फिसल गया? डियर जिंदगी पैरेंटिंग की भूलों के प्रति सावधान करती है।
क्‍यारा की निजी(इस पीढ़ी की प्रतिनिधि) समस्‍या तक पहुंचने के लिए गौरी शिंदे लंबा रास्‍ता चुनती हैं। फिल्‍म यहां थोड़ी बिखरी और धीमी लगती है। हम क्‍यारा के साथ ही उसके बदलते दोस्‍तों सिड,रघुवेंद्र और रुमी से भी परिचित होते हैं। उसकी दो सहेलियां भी मिलती हैं। क्‍यारा को जिस परफेक्‍ट की तलाश है,वह उसे नहीं मिल पा रहा है। इसके पहले कि उसके दोस्‍त उसे छोड़ें,वह खुद को समेट लेती है,काट लेती है। भावनात्‍मक संबल और प्रेम की तलाश में भटकती क्‍यारा को जानकारी नहीं है कि अधूरापन उसके अंदर है। दिमाग के डाक्‍टर से मिलने के बाद यह स्‍पष्‍ट होता है। जिंदगी की छोटी तकलीफों,ग्रंथियों और भूलों को पाले रखने के बजाए उन्‍हें छोड़ देने में ही सुख है।
गोवा की पृष्‍ठभूमि में डियर जिंदगी के किरदार विश्‍वसनीय और असली लगते हैं। चमक-दमक और सजावटी जिंदगी और परिवेश में लिप्‍त फिल्‍मकारों को इस फिल्‍म सीख लेनी चाहिए। बहरहाल, गौरी शिंदे ने अपने तकनीकी सहयोगियों की मदद से फिल्‍म का कैनवास सरल और वास्‍तविक रखा है। उन्‍होंने कलाकारों के चुनाव में किरदारों के मिजाज का खयाल रखा है। क्‍यारा के परिवार के सभी सदस्‍य किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के सदस्‍य लगते हैं। उनकी बातें और चिंताएं भी मध्‍यवर्गीय सीमाओं में हैं। गौरी बारीकी से घर-परिवार और समाज की धारणाओं और मान्‍यताओं को रेखांकित करती जराती है। वह रुकती नहीं हैं। वह मूल कथा तक पहुंचती हैं।
शाह रुख खान अपनी प्रचलित छवि से अलग साधारण किरदार में सहज हैं। उनका चार्म बरकरार है। वह अपने अंदाज और किरदार के मिजाज से आकर्षक लगते हैं। ऐसे किरदार लोकप्रिय अभिनेताओं को अभिनय का अवसर देते हैं। शाह रुख खान इस अवसर का लाभ उठाते हैं। आलिया भट्ट अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभर रही हैं। उन्‍हें एक और मौका मिला है। क्‍यारा के अवसाद,द्वंद्व और महात्‍वाकांक्षा को उन्‍होंने दृश्‍यों के मुताबिक असरदार तरीके से पेश किया है। लंबे संवाद बोलते समय उच्‍चारण की अस्‍पष्‍टता से वह एक-दो संवादों में लटपटा गई हैं। नाटकीय और इमोशनल दृश्‍यों में बदसूरत दिखने से उन्‍हें डर नहीं लगता। सहयोगी भूमिकाओं में इरा दूबे,यशस्विनी दायमा,कुणाल कपूप,अंगद बेदी और क्‍यारा के मां-पिता और भाई बने कलाकारों ने बढि़या योगदान किया है।
अवधि- 149 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार

Thursday, September 8, 2016

बौना न कहें मेरे हीरो को - आनंद एल राय




-अजय ब्रह्मात्‍मज
तनु वेड्स मनु और रांझणा के निर्देशक आनंद एल राय अपनी नई फिल्‍म की तैयारियों में लगे हैं। इस बीच उनके बैनर कलर येलो ने निल बटे सन्‍नाटा और हैप्‍पी भग जाएगी फिल्‍मों का निर्माण किया। दोनों फिल्‍में सफल रही। इस बैनर की तीसरी फिल्‍म निम्‍मो भी अगले साल के आरंभ में आ जाएगी। पिछले दिनों शाह रूख खान ने एक ट्वीट से आनंद एल राय के साथ अपनी नई फिल्‍म की जानकारी दी। फिलहाल इस फिल्‍म का टायटल तय नहीं हुआ है। फिर भी कुछ खबरें रिस कर आ रही हैं। मसलन शाह रूख खान इसमें बौने की भूमिका निभाएंगे और यह फिल्‍म फिर से पश्चिम उत्‍तर प्रदेश की पृष्‍ठभूमि में होगी।
-आप की अगली फिल्‍म के लिए शाह रूख खान को किस ने चुना ? कहानी ने,फिल्‍म ने,आप ने या शाह रूख ने स्‍वयं यह फिल्‍म चुनी?
0 डायरेक्‍टर की जिंदगी में हर नई फिल्‍म कहानी से ही शुरू होती है। कहानी ने पहले मुझे चुना और फिर उसी कहानी ने उन्‍हें चुना। उसके बाद हम दोनों साथ आ गए।
-शाह रूख खान के प्रति आप के झुकाव की शुरूआत कैसे हुई?
0 पहली चंद मुलाकातों में ही स्‍पष्‍ट हो गया था कि इतने सालों के सफर और जबरदस्‍त कामयाबी के बावजूद उन्‍होंने अपने अंदर दिल्‍ली के लड़के को जिंदा रखा है। पांच मिनट की बातचीत में ही लग गया था कि उनसे कोई भी बात कहने में दो बार नहीं सोचना पड़ेगा। वे एहसास दिला देते हैं कि वे बड़े स्‍टार हैं,लेकिन इसके साथ यह भी जाहिर करते है कि उतार-चढ़ाव के साथ वे यहां तक पहुंचे हैं। वे आज जहां हैं,वहां ऐसे ही नहीं हैं। स्‍टारडम के बावजूद उनकी मासूम सादगी ही आप को उनका फैन बना देती है।
-शाह रूख दिल्‍ली से हैं।आप भी दिल्‍ली से हैं। आगामी फिल्‍म में दिल्‍ली कनेक्‍ट कितना खास होगा?
0 मैं ऐसे नहीं देख रहा। दिल्‍ली से होने के बावजूद दो लोगों का नजरिया एक सा होना जरूरी नहीं है। अपनी लाइफ को देखने का उनका नजरिया मुझे बहुत पसंद आता है। इस ऊंचाई पर शाह रूख बने रहना आसान नहीं है। उसकी वजह से हम खुद को उनके करीब पाते हैं।
-खुद शाह रूख दिल्‍ली का जिक्र करने या दिल्‍ली वालों के साथ की केमिस्‍ट्री की बात करने से नहीं हिचकते...
0 आरंभिक तौर पर इससे सहूलियत होती होगी। वे जब किसी से प्‍यार करते हैं तो उसे एक नाम या कारण दे देते हैं। मेरा मानना कि किसी इंसान के पसंद आने पर वे उसके करीब जाते हैं। उसके साथ काम करते हैं।
-क्‍या कहानी है? खबर है कि वे एक बौने व्‍यक्ति का किरदार निभा रहे हैं?
0 इस कहानी में एक इंसान है,जिसका कद छोटा है। यह उस कहानी का यूएसपी नहीं है। यह किरदार है। अगर कोई इसे सिर्फ बौने की कहानी में समेट दे तो मैं खुद को छोटा महसूस करने लगता हूं1 वह एक खूबसूरत किरदार है। अभी उस किरदार की यूएसपी नहीं बता सकता। जल्‍दी ही कुछ दिखाऊंगा।  
-कैसी फिल्‍म है? अभी सारे लोकप्रिय स्‍टार प्रयोग कर रहे हैं। यह शाह रूख का प्रयेग होगा?
0 अभी यही कह सकता हूं कि यह मेरे लिए डिफिकल्‍ट पिच है। अगर सब कुछ सही तरीके से मैंने कस लिया तो दर्शकों को अच्‍छा ही लगेगा। अच्‍छी बात है न कि 25 सालों से पॉपुलर रहे स्‍टार इस फेज में प्रयोग कर रहे हैं। नई कहानियों के नायक बन रहे हैं। थोड़ा इंतजार करें। मेरे लिए यह खास फिल्‍म है। हर कोई कह रहा है कि यह बौने की कहानी है और इसमें काफी वीएफएक्‍स है। लोग इमोशन की बातें क्‍यों नहीं कर रहे? यह इमाशन और एटीट्यूड की फिल्‍म है।ढीठ व्‍यक्ति की कहानी है।
-कहां का बैकड्राप है? आप की फिल्‍मों में स्‍थान मुखर रहाता है...
0 मैं शहर नहीं चुन रहा। मैं टेंपरामेंट और एटीट्यूड पर जोर दे रहा हूं। यह फिल्‍म मेरठ,गाजियाबाद,दिल्‍ली और मुंबई के साथ एक बार फ्लाइट लेकर न्‍यूयार्क भी जाएगा।
-फिल्‍म के टायटल को लेकर रहस्‍य बना हुआ है?
0 मैं सस्‍पेंस और सरप्राइज देर तक नहीं रोक पाता। इस बार कोशिश कर रहा हूं। इस फिल्‍म में अलग किस्‍म का रोमांस है। संगीत काफी महत्‍वपूर्ण होगा। आने वाले एक महीने में सब जाहिर हो जाएगा।
-कब से शूटिंग आरंभ कर रहे हैं?
0 इस साल के अंत या अगले साल के आरंभ में...

Friday, April 15, 2016

फिल्‍म समीक्षा : फैन




फैन
**** चार स्‍टार पहचान और परछाई के बीच

-अजय ब्रह्मात्‍मज
यशराज फिल्‍म्‍स की फैन के निर्देशक मनीष शर्मा हैं। मनीष शर्मा और हबीब फजल की जोड़ी ने यशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों को नया आयाम दिया है। आदित्‍य चोपड़ा के सहयोग और समर्थन से यशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों को नए आयाम दे रहे हैं। फैन के पहले मनीष शर्मा ने अपेक्षाकृत नए चेहरों को लेकर फिल्‍में बनाईं। इस बार उन्‍हें शाह रुख खान मिले हैं। शाह रुख खान के स्‍तर के पॉपुलर स्टार हों तो फिल्‍म की कहानी उनके किरदार के आसपास ही घूमती है। मनीष शर्मा और हबीब फैजल ने उसका तोड़ निकालने के लिए नायक आर्यन खन्‍ना के साथ एक और किरदार गौरव चान्‍दना गढ़ा है। फैन इन्‍हीं दोनों किरदारों के रोचक और रोमांचक कहानी है।
मनीष शर्मा की फैन गौरव चान्‍दना की कहानी है। दिल्‍ली के मध्‍यवर्गीय मोहल्‍ले का यह लड़का आर्यन खन्‍ना का जबरा फैन है। उसकी जिंदगी आर्यन खन्‍ना की धुरी पर नाचती है। वह उनकी नकल से अपने मोहल्‍ले की प्रतियोगिता में विजयी होता है। उसकी ख्‍वाहिश है कि एक बार आर्यन खन्‍ना से पांच मिनट की मुलाकात हो जाए तो उसकी जिंदगी सार्थक हो जाए। अपनी इसी ख्‍वाहिश के साथ वह विदाउट टिकट राजधानी से मुंबई जाता है। मुंबई पहुंचने पर वह डिलाइट होटल के कमरा नंबर 205 में ही ठहरता है। आर्यन खन्‍ना के जन्‍मदिन के मौके पर वह आर्यन खन्‍ना से मिलने की कोशिश करता है। उसकी भेंट तो हो जाती है,लेकिन पांच मिनट की मुलाकात नहीं हो पाती। आर्यन खन्‍ना उसे पांच सेंकेंड भी देने के लिए तैयार नहीं है। गौरव चान्‍दना को आर्यन खन्‍ना का यह रवैया अखर जाता है। वह अब बदले पर उतर आता है। यहां से फिल्‍म की कहानी किसी दूसरी फिल्‍म की तरह ही नायक-खलनायक या चूहे-बिल्‍ली के पकड़ा-पकड़ी में तब्‍दील हो जाती है। चूंकि किरदार थोड़े अलग हैं और उनके बीच का झगड़ा एक अना पर टिका है,इसलिण्‍ फिल्‍म रोचक और रोमांचक लगती है।
आर्यन खन्‍ना का किरदार शाह रुख खान की प्रचलित छवि और किस्‍सों से प्रेरित है। आर्यन खन्‍ना किरदार और शाह रुख खान कलाकार यों घुलमिल कर पर्दे पर आते हैं कि दर्शकों का कनेक्‍ट बनता है। शाह रुख खान पर आरोप रहता है कि वे हर फिल्‍म में शाह रुख खान ही रहते हैं। यहां उन्‍हें छूट मिल गई है। यहां तक कि फैन के रूप में आए नए किरदार गौरव चानना को भी इम्‍पोस्‍टर के रूप में शाह रुख खान की ही नकल करनी है। निस्‍संदेह फिल्‍म देखते हुए आनंद मिलता है। शाह रुख खान को बोनते हुए सुनना और उनके निराले अंदाज को देखना हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों को बहुत पसंद है। फैन में शाह रुख खान पूरे फॉर्म में हैं और किरदार के मनोभावों को बखूबी निभाते हैं। शाह रुख खान की प्रचलित छवि में में उनका अक्‍खड़पन शामिल है। निर्देशक मनीष शर्मा ने उसे भी उभारा है।
फिल्‍म आरंभ में स्‍टार और फैन के रिश्‍ते को लकर चलती है। हम इस रिश्‍ते के पहलुओं से वाकिफ होते हैं। लेखक एक फैन के मानस में सफलता से प्रेश करते हैं और उसकी दीवानगी को पर्दे पर ले आते हैं। स्‍टार से बिफरने के बाद फैन के कारनामे अविश्‍वसनीय तरीके से नाटकीय और अतार्किक हो गए हैं। गौरव चान्‍दना और आर्यन खन्‍ना के इगो की लड़ाई क्‍लाइमेक्‍स के पहले फैन के पक्ष में जाती है। थोड़ी देर के लिए यकीन नहीं होता कि गौरव चान्‍दना के पास सारे संसाधन कहां से आए कि वह आर्यन खन्‍ना जैसे पावरफुल सुपरस्‍टार से दो कदम आगे चल रहा है। वह आर्यन खन्‍ना को ऐसे मोड़ पर ला देता है कि आर्यन खन्‍ना को लगाम अपने हाथों में लेनी पड़ती है। वह गौरव चान्‍दना को सबक देने के आक्रामक तेवर के साथ निकलता है। हिंदी फिल्‍मों में नेक और खल की लड़ाई व्‍यक्तिगत हो जाती है। फैन उस परिपाटी से अलग नहीं हो पाती। फिर भी मनीष शर्मा को दाद देनी पड़ेगी कि उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए शाह रुख खान के प्रशंसकों का कुछ नया दिया है।‍
मनीष शर्मा ने इस फिल्‍म के निर्देशन में साहस का परिचय दिया है। उनके साहस को शाह रुख खान कां संबल मिला है। लकीर की फकीर बनी हिंदी फिल्‍मों में जब कुछ नया होता है तो उसे भरपूर सराहना मिलती है। फैन में स्टार और डायरेक्‍टर के संयुक्‍त प्रयास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दिक्‍कत या शिकायत यह है कि फिल्‍म आरंभ मे जिस तीव्रता,संलग्‍नता और नएपन के साथ चलती है,वह दूसरे हिस्‍से में कायम नहीं रह पाती। कहानी कई वार पुरानी लकीर पर आने या उसे छूने के बाद बिखरने लगती है। हिंदी की ज्‍यादातर फिल्‍मों के साथ इंटरवल के बाद निर्वाह की समस्‍या रहती है।
यह फिल्‍म शाह रुख खान की है। उनकी पॉपुलर भाव-भंगिमाओं को निर्देशक ने तरजीह दी है। उनके बोल-वचन का सटीक उपयोग किया है। फिल्‍म देखते समय कई बार यह एहसास होता है कि हम कहीं शाह रुख खान की बॉयोग्राफी तो नहीं देख रहे हैं। पुराने वीडियो फुटेज और इंटरव्‍यू से आर्यन खन्‍ना में शाह रुख खान का सत्‍व मिलाया गया है। शाह रुख खान के लिए यह फिल्‍म एक स्‍तर पर चुनौतीपूर्ण है,क्‍योंकि उन्‍हें गौरव की भी किरदार निभाना है। गौरव शक्‍ल-ओ-सूरत में आर्यन खन्‍ना से मिलता-जुलता है। शाह रुख खान ने उसे अलग तरीके से पेश किया है। गेटअप और मेकअप से आगे की निकलकर उसकी चाल-ढाल में भिन्‍नता लाने में कठिन अभ्‍यास करना पड़ा होगा। कुछ दृश्‍यों में शाह रुख खान की स्‍वाभाविकता पुरअसर है। यह उनकी आत्‍मुग्‍धता भी लग सकती है। गौरव चान्‍दना और शाह रुख खान की मुलाकात और भिड़ंत के सारे दृश्‍य मजेदार हैं। उन्‍हें आकर्षक लोकेशन पर शूट भी किया गया है।
एक अंतराल के बाद शाह रुख खान की ऐसी फिल्‍म आई है,जिसमें एक कहानी है। उन्‍हें अपनी अभिनय योग्‍यता और क्षमता भी दिखाने का अवसर भी मिला है। साथ ही निर्देशक मनीष शर्मा का स्‍पष्‍ट सिग्‍नेचर है। इस फिल्‍म में भी दिल्‍ली है। यह फिल्‍म पहचान और परछाई के द्वंद्व पर केंद्रित है। मिथक और मिथ्‍या में लिपटी फैन देखने लायक फिल्‍म है।
अवधि-143 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार
    

Monday, April 11, 2016

गलतियां भी हों अच्‍छी वाली - शाह रुख खान




-जागरण फीचर टीम
शाह रुख खान बीते 25 सालों से फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सक्रिय हैं। पांच दिनों बाद उनकी ‘फैन’ रिलीज हो रही है। यह फिल्‍म फैन व स्‍टार के रिश्‍ते को समर्पित है। फिल्‍म की जानकारी लेने व शाह रुख की सोच-अप्रोच जानने दैनिक जागरण की फीचर टीम एक अप्रैल की रात 10 बजे मुंबई स्थित यशराज स्‍टूडियो पहुंची। दिन- रात काम करने के आदी शाह रुख खान फिल्‍म की डबिंग में व्‍यस्‍त मिले। आखिरकार रात 12 बजे शाह रुख खान का बुलावा आया। उनकी वैनिटी वैन में टीम का स्‍वागत हुआ। उस वक्‍त वे फोन पर अपनी बेटी सुहाना की कुशलक्षेम ले रहे थे, जिसमें एक पिता की चिंता साफ झलक रही थी। पेश है उनसे खुली बातचीत :
फीचर टीम
-फैंस का स्‍टार की जिंदगी पर कितना हक होना चाहिए?
ईमानदार जवाब बहुत अलग है, मैं फिर भी बताता हूं। खासकर खुद के संदर्भ में। मुझे ऐसा लगता है कि लोकप्रियता अपने संग डर लेकर आती है। लोकप्रिय लोग डरने लग जाते हैं। इस बात का डर कि मेरा काम लोगों को पसंद नहीं आया तो पिछले 25 सालों में कमाया नाम बेकार हो जाएगा। यह डर मन में समाते ही स्‍टार वही करने लग जाता है, जो दो करोड़ लोगों को पसंद है। सच्‍चाई यह है कि आप दो करोड़ लोगों की पसंद का काम नहीं कर सकते। आखिर में आप वही कर सकते हैं, जो आप को आता है। इससे एक अलग विश्‍वास मन में आ जाता है कि आप जो भी करें, वह आप के फैंस को पसंद आना है। मैं पूरी विनम्रता से यही कहना चाहूंगा कि फैन की पसंद-नापसंद और गुस्‍से को हम हर बार गंभीरता से लेने लगे तो काम करने में दिक्‍कतें होंगी।
-आप के लिए फिल्‍में करने की मूल वजहें क्‍या होती हैं?
बात ‘डर’ के दिनों की है। उन दिनों हर एक्‍टर के पास दस-बारह फिल्‍में हुआ करती थीं। ‘डर’ की सफलता की पार्टी में देवेन वर्मा साहब ने मुझसे कहा था कि बेटा फिल्‍में तीन चीजों के लिए करना। धन, मन और फन के लिए। धन तो सभी जानते हैं। फन यानी हुनर वाला। मन यानी अपने दिल के लिए। साथ ही अपने दोस्‍तों के लिए। इन तीन चीजों का ध्‍यान रखते हुए तू संतुलन साधेगा तो सही दिशा में जाता रहेगा। सही में देखा जाए तो देवेन वर्मा साहब की सलाह बिल्‍कुल सही है। अब मैं उस सिचुएशन में हूं, जब मुझे धन की जरूरत नहीं। मैं पहले भी धन के लिए तो फिल्‍में नहीं करता था। मन के लिए करता रहता हूं। कभी कभी फन के लिए कर लेता हूं। मैं पिछले सात दिन से यहां रात-दिन काम में लगा हुआ हूं। अभी आदित्‍य और मनीष फिल्‍म का ट्रायल शो देखने गए हैं। मैं आम तौर पर अपनी फिल्‍मों का ट्रायल शो नहीं देखता। मैं उनसे बस यही पूछूंगा कि उन्‍हें फिल्‍म कैसी लगी। वह अच्‍छी बनी है कि नहीं। लब्‍बोलुआब यह कि अगर मेरे फैन मुझे वाकई चाहते हैं तो उन्‍हें मेरा काम पसंद आएगा। यह फिल्‍म मन और फन दोनों के लिए है।
-निर्देशक मनीष शर्मा लीक से हटकर फिल्‍में बनाते रहे हैं। उनके बारे में क्‍या कुछ कहना चाहेंगे।
मनीष बहुत पहले से मेरे दोस्त हैं। मुंबई आने पर सबसे पहले मुझसे ही मिले थे। उसकी सोच और विजन अलग है। असल में कहूं तो शुरू के पांच साल मैं ऐसा ही था। मेरी सोच मनीष की तरह थी। मनीष के साथ काम करना खुद को फिर से तलाशने सरीखा है। उसने मुझे अहसास कराया कि मैं अपने शुरुआती दिनों में कैसा था। इस तरह मनीष अच्छा डायरेक्टर है। उसे अपना काम पता है। हम दोनों के बीच एक खुलापन है। बिना जज किए कुछ गढऩे की आजादी वाली बात हम दोनों के बीच है। वह मुझे काफी रचनात्मक आजादी देता है। एक अर्से बाद ऐसा डायरेक्टर मिला, जो मुझे गलतियां करने का भी हक देता है। ‘फैन’ फिल्म करते-करते महसूस हुआ कि अब मुझे गंदी एक्टिंग नहीं करनी चाहिए। अच्छी वाली गलती करनी चाहिए।
-‘फैन’ के किरदारों को आत्‍मसात करने की प्रक्रिया थकाऊ तो नहीं रही?
ईमानदारी से कहूं तो गौरव को निभाना बहुत मुश्किल था, क्‍योंकि मैं उसे नहीं जानता, पर मैंने उसे क्रिएट कर दिया। अब मैं उसे आत्‍मसात करने की प्रक्रिया बयां करूं तो वह मैकेनिकल सा होगा कि उसकी चाल ऐसी कर दी। उसकी आवाज बदल दी। उसके बाल ऐसे कर दिए। उसके डील-डौल तक को शक्‍ल दे दी। यह गलत भी साबित हो सकता है। इतना कह सकता हूं कि मैंने इसे निभाने में अपने अनुभव, जानकारी का पूरा इस्‍तेमाल किया है। तभी इस फिल्‍म के लिए मैं कैसे इंटरव्यू दूं, वह तय नहीं कर पा रहा हूं। ‘माय नेम इज खान’ के किरदार का विश्‍लेषण मुमकिन है। यहां गौरव के बारे में क्‍या बताया जाए। एक युवक है, जो हजारों-लाखों फैन का प्रतिनिधित्‍व कर रहा है। उन सबकी व्‍याख्‍या कैसे मुमकिन है। तभी इसे करते वक्‍त अनजानी सी जिम्‍मेदारी थी कंधों पर।
- इस फिल्‍म के लिए मेथड एक्टिंग भी इस्‍तेमाल की ।
 मेरी एक्टिंग स्टाइटल कई एक्टिंग स्टाइल का मिश्रण है। मुझे एक्टिंग के सभी मैथेड की गहन जानकारी है। मैं उसके बारे में बहुत पढ़ता हूं। मेरे मुताबिक एक्टिंग मैथेड का मिश्रित उपयोग करना चाहिए। हो सकता है कि मेरे विचार से सभी सहमत न हो। हालांकि मेरा मानना है आपको खुद को किसी एक मैथड तक सीमित नहीं करना चाहिए। मिक्स मैथेड इस्तेमाल करना चाहिए। फैन में वॉयस को लेकर मैथेड है। उसकी आवाज एकसमान होनी चाहिए। जब मैंने पहली बार उसके लिए डायलॉग बोला तो आवाज फर्क थी। आदित्य चोपड़ा को लगा कि आवाज बदलने से लोगों को लगेगा यह शाह रुख नहीं है। लिहाजा शाह रुख को रखते हुए कुछ अलग करो। उसकी आवाज के लिए मैथेड है। मुझसे फिल्म की डबिंग नहीं होती जब तक फिल्म की पहली दो लाइनें याद न कर लूं। डबिंग से पहले मैं घर या गाड़ी में उसका रिहर्सल करता हूं। फैन में एक डायलॉग है कनेक्शन भी बड़ी कमाल की चीज है। जब मुझे लाइन मिली। इसकी डबिंग मुझे कंठ की नली दबाकर करनी पड़ती है। उसका अलग मैथेड है। एक्टिंग के समय ऐसा नहीं करना पड़ता। उसे रीक्रिएट करने का भी मैथेड है। इस किरदार की बॉडी लैंगवेज, चाल-ढाल और डांस में बहुत मैथेड करना पड़ता है।

- क्‍या आप को लगता है हमारे मुल्‍क में हीरो की क्राइसिस है। कभी अरविंद केजरीवाल तो कभी कन्‍हैया में नायक की तलाश् होती है। 
आप को वही हीरो अच्छा लगेगा जो आप की पर्सनालिटी से मेल खाता हो। या आप जिसके जैसा बनना चाहते हों। कोई तीसरा कारण नहीं होता। नायक आजकल मीडिया हाईप की वजह से क्रिएट किए जा रहें हैं। मेरे ख्याल से किसी को किसी और की या खुद की आभा में नहीं आना चाहिए। हीरो उत्‍तम गुणों से बनते हैं। मुझे मैडम क्यूरी का इतिहास नहीं मालूम, लेकिन प्रभावित करती है। मदर टेरेसा से मैं बमुश्किल ढाई मिनट मिला हूं। वे पल छाप छोड़ गए। मेरे ख्याल से हीरो उसे बनाना चाहिए जिसका काम महान हो। जिसके काम को आप नजरअंदाज न कर सकें। या फिर जो आप की पर्सलानिटी का विस्तार हों। मेरा हीरो तो मेरा ड्राइवर है। मेरी सेवा में वह दिन-रात लगा रहता है। मेरे नखरों की शिकायत नहीं करता।

-फैन के दोनों किरदारों  को आत्‍मसात करने की प्रक्रिया थकाऊ तो नहीं रही?
ईमानदारी से कहूं तो गौरव को निभाना बहुत मुश्किल था, क्‍योंकि मैं उसे नहीं जानता, पर मैंने उसे क्रिएट कर दिया। अब मैं उसे आत्‍मसात करने की प्रक्रिया बयां करूं तो वह मैकेनिकल सा होगा कि उसकी चाल ऐसी कर दी। उसकी आवाज बदल दी। उसके बाल ऐसे कर दिए। उसके डील-डौल तक को शक्‍ल दे दी। यह गलत भी साबित हो सकता है। इतना कह सकता हूं कि मैंने इसे निभाने में अपने अनुभव, जानकारी का पूरा इस्‍तेमाल किया है। तभी इस फिल्‍म के लिए मैं कैसे इंटरव्यू दूं, वह तय नहीं कर पा रहा हूं। ‘माय नेम इज खान’ के किरदार का विश्‍लेषण मुमकिन है। यहां गौरव के बारे में क्‍या बताया जाए। एक युवक है, जो हजारों-लाखों फैन का प्रतिनिधित्‍व कर रहा है। उन सबकी व्‍याख्‍या कैसे मुमकिन है। तभी इसे करते वक्‍त अनजानी सी जिम्‍मेदारी थी कंधों पर।
-राहुल ढोलकिया साथ रईस कर रहें हैं। उनके बारे में कुछ बता सकें...
उन्हें मालूम ही नहीं कमर्शियल या आर्ट क्या होता है? उनकी अपनी विशिष्‍ट शैली है। मैं फिल्म में बहुत जगह अच्छी एक्टिंग कर रहा हूं बिना यह जाने कि वह सही है या गलत। दरअसल बाकी कास्ट ने उसमें उम्‍दा काम किया है। मैं संजय लीला भंसाली के साथ भी फिल्म करुंगा। बाजीराव मस्तानी का मसला होने के बावजूद हम अच्छे दोस्त हैं। अभी बस इम्तियाज अली और आनंद एल राय की फिल्में सामने हैं। दोनों अभी स्क्रिप्‍ट लिख रहे हैं।
-         अपने निर्देशकों के साथ किस्‍ किस्‍म्‍ के क्रिएटिव डिसकशन करते हैं।
मैं हर डायरेक्‍टर के साथ सात- आठ महीने तक वक्‍त बिताता हूं। कई बार तो मैं साल भर का भी समय लेता हूं। उसके साथ मुझे मजा आता है तो मैं उसकी फिल्‍म करता हूं। मैं वक्‍त इसलिए लेता हूं कि अगर फिल्‍म नहीं चली तो बाद में वैनिटी में बैठकर रोते हुए यह जरूर कह सकें कि यार कुछ भी हो, मजा तो आया था न।
-फैन स्टार और प्रशंसक के इगो क्लैश की कहानी है। क्या आप इगोस्टिक भी हैं?
(हंसते हुए) यह सुनने में थोड़ा अहंकारी लगे, लेकिन मुझसे बड़ा इगोस्टिक, आत्ममुग्ध और अहंकारी कोई दूसरा शख्स नहीं है। वजह यह कि मैं शाह रुख खान हूं। ऊपर से फिल्म में मैं ही स्‍टार आर्यन खन्‍ना और फैन गौरव बना हूं। आर्यन खन्‍ना के रूप में हमें ऐसा हीरो चाहिए था, जो वाकई लंबे समय से स्‍टार है। चूंकि मेरा 25 साल का करियर है। शायद यही वजह है कि मैं यह रोल कर रहा। उसका कारण यह नहीं कि मैं अपना सबसे बड़ा फैन हूं। मुझे बहुत आक्वर्ड लगता हैं। कुछ ही कलाकारों का 25 साल का करियर होता है। उनके फैन की तादाद बनी रहे ऐसे कलाकार कम हैं। मुझे मौका मिलता तो किसी फिल्म में मैं अमिताभ बच्चन का फैन बनना पसंद करता। वैसे ‘फैन’ की कहानी ऐसे शख्स की है जिसकी शक्ल अपने पसंदीदा कलाकार से मिलती है। मैं स्‍वयं बॉक्सर मुहम्मद अली का फैन हूं। वजह यह कि उनके सफर में उपलब्धि की पराकाष्‍ठा और ट्रेजडी भी है। मैं यू ट्यूब पर उनकी सारी फाइटें देखता हूं। अपने बच्चों को भी दिखाई है।
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बॉक्‍स 1
हेमा जी व देव साहब को कभी ना नहीं
मैं हेमा जी और देव साहब से नहीं मिलता था। हेमा जी को मैं कतई मना नहीं कर सकता हूं। हेमा जी बुरा मान जाएंगी। मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूं। मैं देव साहब से छिपता फिरता रहता था। मैं उनके भाई साहब चेतन आनंद साहब से मिलता जुलता रहता था। वे मेरे घर आते थे। एक बार मैं देव साहब की पकड़ में आ गया था। मैं सीढियों से ऊपर जा रहा था। अचानक वे सामने आ गए। उन्‍होंने मुझसे कहा कि मेरे ऑपिफस में आ कर मिलो। उनके कहने के पहले मैंने कह दिया, ‘देव साहब मैं आप की फिल्‍म कर रहा हूं’।


बॉक्‍स 2
लंदन की मां-बेटी हैं मेरी फैन
मै फैन से मिलकर प्रभावित नहीं प्रोत्साहित और इमोशनल हो जाता हूं। मैंने लंदन में एक शो किया था। उसमें गर्मी की वजह से एक 13 साल की बच्ची बेहोश हो गई थी। उसके डैडी भी हाइपर हो गए थे। उसे तत्‍काल चिकित्‍सा दिलाने के लिए मैंने उसे बैकस्टेज से बाहर निकाला। बेहोशी की हालत में उसने मुझे आधे हर्ट वाला पैंडेंट दिया था। शायद लवर्स को देते हैं। वह पैंडेंट अभी भी मेरे पास है। वह मैंने अपनी बेटी सुहाना को भी दिखाया है। उस वाकये के दस साल बाद वह फिर मुझे मिली। न तो मुझसे उसका नाम याद था। न शक्‍ल याद थी। उसने बेहोशी वाली घटना से याद दिलाया। तब वह शादीशुदा थी। पांच साल बाद फिर हम मिले। तब उसके साथ उसकी बेटी थी। अब उसकी बेटी मुझे अपनी मां की बेहोशी की घटना याद दिलाती है। एक वाकया जर्मनी की  लडक़ी का है। शायद उसे पैरालिसिस हुआ था। चलने फिरने में सक्षम नहीं थी। वह मुझसे मिलने मुंबई आईं। वह व्हीलचेयर पर थी। मैंने उनका हाथ पकड़ा तो वह खड़ी हो गई। यह उनके लिए बहुत बड़ी बात थी। आज वह चलने फिरने में सक्षम है। उनके पैरेंट्स बेटी के चलने का श्रेय मुझे देते हैं क्योंकि मैंने उसका हाथ छुआ। हालांकि यह सच नहीं है। ऐसा उस कारण से नहीं हुआ। मुझे मालूम है कि विश्वास के चलते मैं लोगों की जिंदगियों से जुड़ता हूं। बाकी मैं कोई महान काम नहीं कर रहा।

बॉक्‍स 3 -
बच्‍चों को उनकी दादी से कैसे बचाऊं।
मैं अपने बच्‍चों को अपनी छाया, स्टारडम, अपने नाम से बचाकर रखना चाहूंगा। वह  इसलिए कि वे अपना काम खुद कर सकें। वरना खबरें तो चल ही रही है कि मेरा बेटा लौंच हो रहा है। ऐसे ही थोड़े किसी के पास भेज दूंगा जो यह कहते फिरे कि शाह रुख की फैमिली के लोग बहुत खूबसूरत हैं। यह सब कुछ बड़ा अजीब सा लगता है। मैं चाहूंगा कि वह अपनी पहचान खुद बनाए। बाकी फिल्म इंडस्ट्री से मुझे किसी को नहीं बचाना। इंडस्ट्री मेरी मां है। तो मैं क्यों अपने बच्चों को उनकी दादी से बचाकर रखूंगा। लेकिन मैं यह सुनिश्चित करना चाहूंगा कि वे वही काम करें जो उन्हें पसंद हो। हम और आर्यन लौंचिंग की खबरों को लेकर हंसते रहते हैं।
बॉक्‍स 4 :
फिल्‍म की फिक्र नहीं करता
मैं बिल्‍कुल फिक्र नहीं करता, क्‍योंकि बहुत कुछ देख लिया भई। जो सबसे अच्‍छी बनाने निकला था, वह सबसे बुरी निकली। जो सबसे बेकार बनाने चला, वह सबसे अच्‍छी निकल गई। जो एवें बनाने निकला, उसने तो कमाल ही कर दिया। मुझे कई बार जिन पटकथाओं पर हंसी आती थी, उसके बारे में लोग तारीफों के पुल बांध देते हैं।


 


Friday, December 18, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दिलवाले

कार और किरदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज

        रोहित शेट्टी की दिलवाले और आदित्‍य चोपड़ा की दिवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे में दिलवाले के अलावा एक संवाद की समानता है-बड़े-बड़ शहरों में एसी छोटी-छोटी बाते होती रहती है सैनोरीटा। इसे बोलते हुए शाह रुख खान दर्शकों को हंसी के साथ वह हसीन सिनेमाई याद भी देते हें,जो शाह रुख खान और काजोल की जोड़ी के साथ जुड़ी हुई है। ऐसा कहा और लिखा जाता है कि पिछले 20 सालों में ऐसी हॉट जोड़ी हिंदी फिल्‍मों में नहीं आई। निश्चित ही इस फिल्‍म के खयाल में भी यह जोड़ी रही होगी। ज्‍यादातर एक्‍शन और कॉमेडी से लबरेज फिल्‍में बनाने में माहिर रोहित शेट्टी ने इसी जोड़ी की उपयोगिता के लिए फिल्‍म में उनके रोमांटिक सीन और गाने रखे हैं। तकनीकी प्रभावो से वे शाह रुख और काजोल को जवान भी दिखाते हैं। हमें अच्‍छा लगता है। हिंदी स्‍क्रीन के दो प्रमियों को फिर से प्रेम करते,गाने गाते और नफरत करते देखने का आनंद अलग होता है।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में कार भी किरदार के तौर पर आती हैं। कारें उछलती हैं,नाचती हैं,टकराती हैं,उड़ती है,कलाबाजियां खाती हैं,और चींSSSSS की आवाज के साथ रुक जती हैं। रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में कारों के करतब हैरान करते हैं। यही इनका रोमांच और आनंद है। दिलवाले में कारों की संख्‍या बढ़ी है और वे मंहगी भी हो गई हैं। उनकी चकम-दमक बढ़ी है। साथ ही उन्‍हें विदेश की सड़के मिली हैं। रोहित शेट्टी ने कारों की कीमत का खयाल रखते हुए फिल्‍म में उनकी भूमिका बढ़ा दी है। उल्‍लेखनीय है कि रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में सिर्फ कार ही नहीं,किरदार भी होते हैं।
    इस बार राज/काली,मीरा,वीर,ईशिता,सिद्धू,मनी और ऑस्‍कर जैसे किरदार हैं। रोहित की फिल्‍मों में मुख्‍य किरदार भी कार्टून किरदारों की तरह आते हैं। इस बार शाह रुख और काजोल की वजह से थोड़ा बदलाव हुआ है,लेकिन उनकी वजह से फिल्‍म में शुरू के हिस्‍से में अनेक स्‍पीड ब्रेकर आ जाते हैं। रोहित रोमांस के अनजान रास्‍ते से होकर कॉमेडी और एक्‍शन के परिचित हाईवे पर आते हैं। हाईवे पर आने के पहले यह फिल्‍म झटके देती है। इन झटकों के बाद फिल्‍म सुगम और मनोरंजक स्‍पीड में आती है। उसके बाद का सफर आनंददायक और झटकारहित हो जाता है। शाह रुख और काजोल के रोमांस और नफरत के सीन अच्‍छे हैं। इस बार दोनों रोमांटिक सीन से ज्‍यादा अच्‍छे झगड़े औौर नाराजगी के सीन में दिखे हैं। फिल्‍म में 15 सालों के बाद दाढ़ी में आने पर शाह रुख ज्‍यादा कूल और आकर्षक लगते हैं। रोहित शेट्टी ने काजोल को भी पूरा महत्‍व दिया है। वे उनके किरदार को नया डायमेंशन देकर उन्‍हें अपनी क्षमता दिखाने का भी मौका देते हैं। निस्‍संदेह काजोल अपनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हैं।
    इस फिल्‍म में वरुण धवन और कृति सैनन की जोड़ी शाह रुख और काजोल की जोड़ी के साए में रह गई है। उन्‍हें गानों और यंग रोमांस के लिए रखा गया है। वे इसे पूरा भी करते हैं,लेकिन कुछ दृश्‍यों में वे भाव-मनोभाव में कंफ्यूज दिखते हें। दरअसल,उन्‍हें ढंग से गढ़ा नहीं गया है या वे दो लोकप्रिय कलाकारों के साथ घबराहट में रहे हैं। अनेक दृश्‍यों के बहाव में वरुण तैरने के बजाए बहने लगते हैं। एक दिक्‍कत रही है कि वे अपने परफारमेंस पर काबू नहीं रख सके हैं। कृति सैनन छरहरी और खूबसूरत हैं। वह किसी और अभिनेत्री सरीखी दिखने की कोशिश में अपनी मौलिकता छोड़ देती हैं। उन्‍हें अपने सिग्‍नेचर पर ध्‍यान देना चाहिए।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में सहयोगी कलाकारों का खास योगदान रहता है। इस बार भी संजय मिश्रा,बोमन ईरानी,जॉनी लीवर,मुकेश तिवारी,वरुण शर्मा और पंकज त्रिपाठी के रूप में वे मौजूद हैं। इन सभी को अच्‍छे वनलाइनर मिले हें। खास कर संजय मिश्रा ब्रांड और प्रोडक्‍ट के नामों के तुक मिलाकर संवाद बोलते हैं तो हंसी आती है। संजय मिश्रा अपने करिअर के उस मुकाम पर हैं,जहां उनकी कैसी भी हरकत दर्शक स्‍वी‍कार करने के मूड में हैं। उनकी स्‍वीकृति बढ़ गई है। यह मौका है कि वे इसका सदुपयोग करें। इस बार बोमन ने निराश किया।
    रोहित शेट्टी की फिल्‍मों में रंगों की छटा देखते ही बनती है। इस बार तो आसमान भी सतरंगी हो गया है और कई बार इंद्रधनुष उभरा है। उनकी फिल्‍मों में वस्‍तुओं और कपड़ों के रंग चटखदार,सांद्र और आकर्षक होते हैं। रंगों के इस्‍तेमाल में पूरी सोच रहती है। रोहित शेट्टी इस पीढ़ी के अलहदा फिल्‍मकार हैं,जिनकी शैली दर्शकों को पसंद आती है। दर्शकों की इस पसंद में वे बंधते जा रहे हें। सफलता के हिसाब से यह सही हो सकता है,लेकिन सृजनात्‍मकता तो प्रभावित होने के साथ सीमित हो रही है।
अवधि-163 मिनट
स्‍टार तीन स्‍टार

Tuesday, December 8, 2015

हर चेहरे पर हो मुस्‍कान-रोहित शेट्टी





-अजय ब्रह्मात्‍मज
    रोहित शेट्टी को अतिवादी प्रतिक्रियाएं मिलती हैं। कुछ उनके घोर प्रशंसक हैं तो कुछ कटु आलोचक हैं। इन दोनों से अप्रभावित रोहित शेट्टी अपनी पसंद की फिल्‍में डायरेक्‍ट करते रहते हैं। दिलवालेकी रिलीज के पहले उन्‍होंने अपनी शैली और फिल्‍म के बारे में विस्‍तार से बातचीत की।
- आप के प्रशंसक चाहते हैं कि आप अपनी शैली की फिल्‍में बनाते रहें। उनके इस आग्रह के बारे में क्‍या कहेंगे ?
0आफिस के बाहर निकलते ही सार्वजनिक स्‍थानों पर मुझे अपनी फिल्‍मों के दर्शक और प्रशंसक मिलते हैं। खतरों के खिलाड़ीके बाद लोग मुझे पहचानने लगे हैं। वे मुझे यही कहते हैं कि मस्‍त फिल्‍में होती हैं आप की। आप वही बनाते रहो। इनमें बच्‍चे,बुजुर्ग और औरतें होती हैं। उन्‍हें वही देखना है। इन तीनों ग्रुप के लोग  सोशल मीडिया साइट पर नहीं हैं। मैं उनके लिए ही फिल्‍में बनाता हूं। देश में उनकी तादाद बहुत ज्‍यादा है। अगर मैं उनके चेहरे पर स्‍माइल ला सकूं तो इससे बड़ी बात क्‍या होगी। यही मेरा एजेंडा, मोटिव और एम है। कोशिश रहती है कि मेरी फिल्‍मों में वल्‍गैरिटी न हो।मां-बेटी,बाप-बेटी एक साथ बैठ कर मेरी फिल्‍में देख सकें। उनमें कोई झेंपे नहीं। मेरी फिल्‍में लोग फैमिली के साथ देखते हैं। आप देखेंगे कि मेरी फिल्‍मों में सोमवार के बाद फैमिली दर्शकों की भीड़ बढ़ती है। वे ही मेरी फिल्‍म को हिट से सुपरहिट बनाते हैं।
-अपने कटु आलोचकों के बारे में क्‍या कहेंगे ? उनकी राय में आपकी फिल्‍में घटिया और हल्‍का मनोरंजन करती हैं ?
0 घोड़ा रेस में भागता है तो उसकी आंखों पर पट्टी बंधी होती है। वह अगल-बगल में कुछ भी नहीं देखता। मैं भी वही करता हूं। आसपास की निगेटिविटी को फटकने नहीं देता। अपनी आलोचना पर पहले गुस्‍सा आता था। अब मुझे लग गया है कि वे मेरे दर्शक नहीं हैं। हो सकता है कि वे सही हों,लेकिन मैं भी गलत नहीं हूं। मैं उनकी मर्जी और पसंद की फिल्‍में नहीं बना रहा हूं तो वे भड़के रहते हैं। नौ बलॉकबस्‍टर यों ही या संयोग से नहीं बनतीं। अब तो आलोचक भी लिखने लगे हैं कि रोहित की फिल्‍म में गाडि़यां उड़ेंगी और फिल्‍म हिट हो जाएगी।
-क्‍यों हिट होती हैं आप की फिल्‍में ?
0 मुझे नहीं मालूम। मैं अपनी फिल्‍म फ्रायडे को थिएटर में छोड़ कर आ जाता हूं। उसके बाद उन्‍हें दर्शक हिट करते हैं। किसी को कुछ नहीं मालूम।
-आप अपनी आलोचना की परवाह नहीं करते। क्‍या जानने की इच्‍छा नहीं होती कि कौन क्‍या लिख रहा है ?
0 अखबार और सोशल मीडिया साइट पर 200 लोग लिखते होंगे। उनसे क्‍या घबराना ? मैं नए डारेक्‍टर और एक्‍टर को देखता हूं कि वे ट्विटर और फेसबुक के कमेंट और स्‍टेटस से परेशान रहते हैं। सच कहूं तो वे हिंदुस्‍तान नहीं हैं। असल दर्शक तो सीधे सिनेमा देखता है। मैं क्रिटिक की परवाह क्‍यों करूं। उनमें से ज्‍यादातर के आई क्‍यू और एजेंडा से वाकिफ हूं। मुझे तो लगता है कि वे चिढ़े हुए लोग हैं। उन्‍हें दीवाली और खुशियों से नफरत है। हम सभी डरे हुए हैं। गौर करें तो मेरी फिल्‍में एक प्रोडक्‍ट हैं। हम इस प्रोडक्‍ट पर कथित संवदनशील फिल्‍ममेकर की तरह या उससे ज्‍यादा मेहनत करते हैं। मेरी फिल्‍मों के एक्‍शन सीन में बहुत ज्‍यादा मेहनत लगती है।
-फिल्‍मों की रिलीज के पहले की एक्टिविटी के बारे में क्‍या कहेंगे ?
0 पहले के फिल्‍मकारों का अच्‍छा था कि उनकी फिल्‍में सीधे थ्रिएटर में जाती थीं। अभी तो इतनी स्‍कैनिंग होती है। उसे इतने लोग देखते हैं। चर्चा होती है। पता चलता है कि मेकर का अपने प्रोडक्‍ट से विश्‍वास हिल जाता है। मेरा मानना है कि दर्शकों को डिसाइड करने दो। मुझे जो आता है,वही करता हूं।
-क्‍या कह सकते हैं कि आप को कामयाबी का फार्मूला मिल गया है ?
0 नहीं, अभी 'दिलवाले' आ रही है और मैं डरा हुआ हूं। कहा जा रहा है कि दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं।मेरी फिल्‍म तो तलवार की धार पर ही रहती है।रिलीज के पहले से आलोचना शुरू हो जाती है। रिव्‍यू में दो स्‍टार मिलते हैं। मुझे मालूम है। आप इसे मेरा धैर्य कहें या कुछ और ... सब कुछ सुनते-समझते मैं फ्रायडे को दर्शकों के बीच पहुंचूंगा। मुझे दुख इस बात का होता है कि कोई हमारी मेहनत की सराहना नहीं करता। एक घर में फिल्‍म बनाना सबसे आसान है। जो काम हम करते है,वह बहुत डिफिकल्‍ट है। मैं इतना ही कहूंगा कि मेरी फिल्‍में देखने के लिए उस माईडसेट के साथ आएं। मैं कहता हूं कि मेरे साथ दादर या बांद्रा चलें क्रिटिक। मेरे साथ फिल्‍म देखें। और फिर दर्शकों से बोलें कि फिल्‍म खराब है। मैं खुला चैलेंज करता हूं। है दम तो  आ जाओ। अगर ऐसा दम नहीं है तो मेरी फिल्‍म के बारे में मत लिखो। मैं दावा नहीं करता,लेकिन मुझे अपने दर्शकों की पसंद का अनुमान है। उनके इमोशन समझ में आने लगे हैं। लोग इसे फार्मूला कहते हैं। मेरे लिए यह वर्क कर रहा है।
-आप साजिद फरहाद के साथ लिखते समय जैसा सोचते हैं,क्‍या वैसा ही सब कुछ पर्दे पर आ जाता है ?
0 कोशिश तो यही रहती है। कई बार सीन बेहतर हो जाता है। मेरे पास ज्‍यादातर मंझे हुए एक्‍टर रहते हैं।कई बार कमजोर होता है तो मैं छोड़ता भी नहीं। सीन के सुर को पकड़ने की कोशिश करता हूं। फिर मैं टेक और दिनों की गिनती नहीं करता। मैं समझौते नहीं करता। अभी मुझे अच्‍छा बजट मिलता है। मेरी फिल्‍मों का स्‍केल दर्शकों के प्‍यार की वजह से बड़ा होता जा रहा है। एक आम दर्शक्‍अपनी मासिक कमाई का दस प्रतिशत मुझे देता है।मैं भी चाहता हूं कि उसके साथ धोखा न हो।
- 'दिलवाले' में पहली बार आप विदेश गए। ऐसा योग कैसे बना ?
0 कहानी ऐसी है।मेरे किरदार विदेश जाते और रहते हैं। मैं पहली बार विदेश जा रहा था तो मैंने तय किया कि किसी ऐसे देश चलें,जहां पहले कोई हिंदी फिल्‍म शूट नहीं हुई हो। बल्‍गारिया में हर तरह की सुविधा मिली। हमने शूटिंग में किसी प्रकार की चिंटिंग नहीं की। आइसलैंड में 'रंग दे मुझे गेरुआ'  गाने की शूटिंग हुई।
- सालों के साथ से आप की एक टीम बन गई है। कभी ऐसा नहीं लगता कि उसकी वजह से एकरसता और ठहराव दिखने लगे ?
0 उसका दूसरा पहलू है कि मैं अभी किसी को जोड़ूं तो वह दहशत में आ जाएगा। वह कुछ बोल ही नहीं पाएगा। वह इस डर में रहेगा कि कैसे बोलूं,रोहित तो हमेशा सही जाता है। मेरी टीम मुझे बोल देती है। वे साफ बताते हैं। मेरे आफिस में कोई भी बेधड़क सुझाव दे देता है। मैं सभी को फिल्‍म दिखाता हूं। उनसे सीखता हूं। मैंने अपनी फिल्‍म सभी को दिखा दी है। सभी ने अपनी बात कही। उनके हिसाब से थोड़ा फेरबदल भी किया।
-कहीं कोई दिक्‍कत भी हुई ?
0 आइसलैड में शूट किया गाना बहुत डिफिकल्‍ट रहा। राजाना हम दो घेटों से ज्‍याछा ट्रैवल करते थे। ठंड ज्‍यादा थी। चार लाख की आबादी का देश है। हम जहां के विजुअल अच्‍छे लगते थे,हम वहीं ठहर जाते थे। बहुत मंहगी जगह है। उस गाने को देख कर लग सकता है कि सीजी है। गाने में सब कुछ रियल है। हमलोग तो पूरी तरह कवर थे। काजोल ने साड़ी नहन रखी थी। ठंड के हिसाब से शाह रुख के भी कपड़े कम थे। उन्‍हें हर शॉट के बाद कंबल दिया जाता था। टीम की तकलीफ बढ़ गई थी। एक्‍शन दृश्‍यों के लिए मेरी टीम थी,बल्‍गारिया की टीम थी और दक्षिण अफ्रीका से मैंने फियर फक्‍टर की टीम बुलाई थी। उनके बीच तालमेल बिठाना भी एक काम था। इस बार एक्‍शन और गानों पर ज्‍यादा ध्‍यान दिया है।
-काजोल और शाह रुख का योग कैसे बना ?
0 फिल्‍म लिखते समय किसी का ध्‍यान नहीं था। गोलमाल 3 खत्‍म होने के बाद ही फिल्‍म लिख ली थी। दो भाइयों की कहानी और रोमांस रखा था। इसमें चेन्‍न्‍ई एक्‍सप्रेस से ज्‍यादा रोमांस है। रोमांटिक एक्‍शन फिल्‍म है। दोनों ने हमेशा प्रुव किया है। दोनों ने अलग-अलग भी काफी सफल काम किया है। दोनों साथ आते हैं तो कुछ मैजिकल हो जाता है। राज कपूर और नरगिस वाली बात नजर आती है। हम भी सीन शूट कर देते थे नार्मली,लेकिन एडिट में पर्दे पर देखते समय नया चार्म नजर आता था। उन्‍हें भी नहीं मालूम कि क्‍या जादू है। कहने के लिए तो केमिस्‍ट्री,कंफर्ट जैसी पचास बातें कही जा सकती हैं।
बाक्‍स एक गाड़ी जो उड़ती है,उसे देख कर मजा आता है। हर उड़ती गाड़ी में एक स्‍टंटमैन बैठा होता है। उस गाड़ी को तैयार करने में तीन दिन लगते हैं। पूरी नापजोख होती है। पेट्रोल है तो आग भी लग सकती है। फायर ब्रिगेड,एंबुलेंस और डाक्‍टर तैनात रहते हैं। गाड़ी को अंदर से तैयार किया जाता है। उसके अंदर केज बनाना पड़ता है। उस केज में ड्रायवर बैठता है। हम लोग यथासंभव इलेक्‍ट्रानिक कनेक्‍शन निकाल देते हैं कि आग न लगे। पेट्रोल कम से कम रखते हैं। ड्रायख्‍र सिक्‍युरिटी गेयर में रहता है। हेल्‍मेट से लेकर बाकी सारी चीजें रहती हैं। हम गाड़ी के अंदर पाइपिंग करते हैं। ड्ररइवर को सिकुड़कर अपनी सीट पर जाना पड़ता है।  कभी प्‍लेटफार्म तो कभी कैनन से गाड़ी उड़ायी जाती है। रनिंग में गाड़ी पलटती है तो उसके लिए अलग ट्रिक करनी पड़ती है। भारत में उसके दो-तीन एक्‍सपर्ट हैं। कमाल है कि विदेशी तारीफ करते हैं और अपने लोग मजाक उड़ाते हैं। हमलोग इस पर एक फिल्‍म बना रहे हैं। स्‍टंटमैन के हाथ-पैर कट और जल जाते हें।