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Friday, March 10, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया



फिल्‍म रिव्‍यू
दमदार और मजेदार
बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया
-अजय ब्रह्मात्‍मज

शशांक खेतान की बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया खांटी मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍म है। छोटे-बड़े शहर और मल्‍टीप्‍लेक्‍स-सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक इसे पसंद करेंगे। यह झांसी के बद्रीनाथ और वैदेही की परतदार प्रेमकहानी है। इस प्रेमकहानी में छोटे शहरों की बदलती लड़कियों की प्रतिनिधि वैदेही है। वहीं परंपरा और रुढि़यों में फंसा बद्रीनाथ भी है। दोनों के बीच ना-हां के बाद प्रेम होता है,लेकिन ठीक इंटरवल के समय वह ऐसा मोड़ लेता है कि बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया महज प्रेमकहानी नहीं रह जाती। वह वैदेही सरीखी करोड़ों लड़कियों की पहचान बन जाती है। माफ करें,वैदेही फेमिनिज्‍म का नारा नहीं बुलंद करती,लेकिन अपने आचरण और व्‍यवहार से पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलने में सफल होती है। करिअर और शादी के दोराहे पर पहुंच रही सभी लड़कियों को यह फिल्‍म देखनी चाहिए और उन्‍हें अपने अभिभावकों  को भी दिखानी चाहिए।
शशांक खेतान ने करण जौहर की मनोरंजक शैली अपनाई है। उस शैली के तहत नाच,गाना,रोमांस,अच्‍छे लोकेशन,भव्‍य सेट और लकदक परिधान से सजी इस फिल्‍म में शशांक खेतान ने करवट ले रहे छोटे शहरों की उफनती महात्‍वाकांक्षाओं को पिरो दिया है। लहजे और अंदाज के साथ वे छोटे शहरों के किरदारों को ले आते हैं। उन्‍होंने बहुत खूबसूरती से झांसी के सामाजिक ढांचे में मौजूद जकड़न और आ रहे बदलाव का ताना-बाना बुना है। अभी देश में झांसी जैसे हर शहर में ख्‍वाहिशें जाग चुकी है। खास कर लड़कियों में आकांक्षाएं अंकुरित हो चुकी हैं। वे सपने देखने के साथ उन पर अमल भी कर रही हैं।  उसकी वजह से पूरा समाज अजीब सी बेचैनी और कसमसाहट महसूस कर रहा है। नजदीक से देखें तो हमें अपने आसपास बद्रीनाथ मिल जाएंगे,जिन्‍हें अहसास ही नहीं है कि वे अपनी अकड़ और जड़ समझ से पिछड़ चुके हैं। ऐसे अनेक बद्री मिल जाएंगे,जो अपने माता-पिता के दबाव में रुढि़यों का विरोध नहीं कर पाते। हर बद्री की जिंदगी में वैदेही नहीं आ पाती। नतीजा यह होता है कि गुणात्‍मक और क्रांतिकारी बदलाव नहीं आ पाता।
शशांक की बद्रीनाथ की दुल्‍‍हनिया रियलिस्टिक फिल्‍म नहीं है। सभी किरदार लार्जर दैन लाइफ हैं। उनके बात-व्‍यवहार में मेलोड्रामा है। अभिनय और परफारमेंस में भी लाउडनेस है। इन सबके बावजूद फिल्‍म छोटे शहरों की बदलती सच्‍चाई को भावनात्‍मक स्‍तर पर टच करती है। फिल्‍म अपना संदेश कह जाती है। लेखक-निर्देशक किरदारों के जरिए प्रसंगों के बजाए पंक्तियों में यथास्थिति का बयान करते जाते हैं। शशांक खेतान ने किरदारों के बीच इमोशन की मात्रा सही रखी है। फिल्‍म ऐसे अनेक दृश्‍य है,जो भावुक किस्‍म के दर्शकों की आंखें नम करेंगे। शशांक ऐसे दृश्‍यों में ज्‍यादा देर नहीं रुकते।
वरुण धवन बधाई के पात्र हैं। उन्‍होंने ऐसी फिल्‍म स्‍वीकार की,जिसमें नायिका अधिक दमदार और निर्णायक भूमिका में है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे नायकों की भूमिका स्‍टार नहीं,एक्‍टर निभाते हैं। वरुण इस भूमिका में एक्‍टर के रूप में प्रभावित करते हैं। आलिया भट्ट आनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हो चुकी हैं। उनके अथिनय का एक नया आयाम यहां देखने को मिलेगा। वरुण और आलिया दोनों पर्दे पर साथ होने पर अतिरिक्‍त आकर्षण पैदा करते हैं। फिल्‍म के अन्‍य किरदारों में आए कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में सक्षम हैं। उनके योगदान से बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया ऐसी रोचक,मनोरंजक और सार्थक हो पाई है। बद्री के दोस्‍त के रूप में साहिल वैद का अलग से उल्‍लेख होना चाहिए। हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक किरदार दोस्‍त को उन्‍होंने अच्‍छी तरह निभाया है।
फिल्‍म में कुछ कमियां भी हैं। नाच-गानों से भरपूर मनोरंजन की कोशिश में लेखक-निर्देशक ने थोड़ी छूट ली है। कुछ दृश्‍य बेवजह लंबे हो गए हैं। कुछ प्रसंग निरर्थक हैं। फिर भी बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया मेनस्‍ट्रीम फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए कुछ सार्थक संदेश दे जाती है।
अवधि-139 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

युवाओं के सपने और प्रेमकहानी - शशांक खेतान



शशांक खेतान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कोलकाता में जन्‍मे और नासिक में पल-बढ़े शशांक खेतान बड़े होने पर मुंबई आ गए। यहां उन्‍होंने ह्विस्लिंग वूड इंटरनेशनल से अभिनय की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उनकी समझ में आ गया था कि उन्‍हें लेखन और डायरेक्‍शन पर ध्‍यान देना चाहिए। पढ़ाई खत्‍म होने पर शशांक ने सुभाष घई को ब्‍लैक एंड ह्वाइट और युवराज में असिस्‍ट किया। कुछ समय तक वे नसीरूद्दीन शाह के साथ भी रहे। फिर यशराज की फिल्‍म इश्‍कजादे में ऐ छोटी सी भूमिका निभा ली। हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया कर स्क्रिप्‍ट करण जौहर को भेजी। वह उन्‍हें पसंद आ गई। इस तरह जुलाई,2014 में हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया रिलीज हुई। उसमें वरुण धवन और आलिया भट्ट की जोड़ी थी। लगभीग तीन सालों के बाद फिर से उन दोनों के साथ ही वे धर्मा प्रोडक्‍शन के बैनर तले बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया लेकर आ रहे हैं। इसे वे लव फ्रेंचाइजी कह रहे हैं।
शशांक खेतान को पहली फिल्‍म में ही कामयाबी और शोहरत मिली। उसके बाद के तीन सालों में कुछ तो बदला होगा। शशांक नहीं मानते कि कुछ विशेष बदला है,मैं वही इंसान हूं। उसी पैशन और ईमानदारी से दूसरी फिल्‍म लेकर आ रहा हूं। बदलाव यह है कि इस बार मुझे निर्माता नहीं खोजना पड़ा। अभी मेरे पास करण जौहर जैसे निर्माता हैं। लेकिन इसकी वजह से जिम्‍मेदारी बढ़ गई है। हंप्‍टी... के समय प्रेशर नहीं था। वरुण और आलिया इतने बड़े और पॉपुलर स्‍टार नहीं थे। अभी बहुत कुछ सोचना पड़ता है। खुद को ही निखारना था।
बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया की कहानी उत्‍तर प्रदेश की है। करण जौहर ने भी पहली बार उत्‍तर प्रदेश का रुख किया है। शशांक बताते हैं,इसके कारण मेरी जिम्‍मेदारी थी कि मैं वहां के नुक्‍तों को पकड़ूं। हालांकि मेरी फिल्‍म वहां की भाषा में नहीं है,लेकिन फिल्‍म के संवादों में स्‍थानीय फ्लेवर ले आना था। हर शहर और इलाके में कुछ शब्‍द और मुहावरे प्रचलित होते हैं। उन्‍हें सुनते ही वहां का राग-रंग आ जाता है। दोनों फिल्‍मों के बीच में मैंने खुद को तकनीकी रूप से इम्‍प्रूव किया। मुझे करण की तरफ से छूट मिली थी कि मैं अपने कैनवास को और पुश करूं। शशांक खेतान ने करण जौहर की मनोरंजक शैली अपना ली है। उसके साथ ही वे देसीपन का टच रखते हैं। अपने अनुभवों से उन्‍हें देश के अंदरूनी इलाकों में ले जाते हैं। उनकी कहानी और किरदारों में भारतीयता झलकती है। शशांक बताते हैं, करण जाहिर नहीं करते,लेकिन वे देसी चीजें समझते हैं। तभी तो ऐसी फिल्‍म बनाने में उनकी सहमति रहती है। मेरी कोशिश है कि मैं अपनी एक शैली डेवलप कर सकूं। मैं खुशनसीब हूं कि मुझे करण का मार्गदर्शन मिल रहा है।
इस फिल्‍म में झांसी और कोटा है। वरुण यानी बद्री झांसी के हैं और आलिया यानी वैदेही कोटा की है। इन किरदारों को इन शहरों में रखने की ठीक वजह बताने से बचते हुए शशांक यहीं कहते हैं, मुझे छोटे शहरों के युवाओं के सपनों की बात करनी थी। है तो यह प्रेमकहानी ही,लेकिन उस प्रेम के पीछे उनके फैसलों का बड़ा महत्‍व है। एक खास वजह यह है कि वहां की भाषा में सुंदरता है। सुनते हुए अच्‍छा लगता है। इश्‍कजादे के समय यूपी में रहा था। तभी मैं वहां की भाषा से मुग्‍ध हो गया था। वहां के लोगों के बात करने में एक लहजा और अंदाज है। मेरा विश्‍वास है कि वह अंदाज इस फिल्‍म को कहीं और लेकर जाएगा। फिल्‍म में झांसी,कोटा और सिंगापुर की मौजूदगी की वजह फिल्‍म से स्‍पष्‍ट हो जाएगी। संक्षेप में बद्री साहूकार का बेटा है। उसने दुनिया नहीं देखी है। उसे परिवार से मिली अपनी समझ सही लगती है। वह खुश रहता है। वैदेही त्रिवेदी के अतीत के कुछ बुरे अनुभव है। उसे नए सपने हैं। वह कुछ करना चाहती है। अपने वर्तमान से वैदेही नाखुश है। बद्री और वैदेही मिलते हैं। उनके मिलने का मिड पाइंट क्‍या हो सकता है? इस तरह कहानी दिलचस्‍प हो जाती है।
शशांक अपने कलाकारों के योगदान का जिक्र करते हैं। बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में वरुण धवन और आलिया भट्ट का बड़ा योगदान है। कैसे? शशांक बताते हैं, दोनों फिल्‍मों के बीच में वरुण और आलिया ने इतनी फिलमें कर ली हैं और वे फिल्‍में पसंद भी की गई हैं। उनका अनुभव संसार बढ़ा है। उन्‍होंने अलग-अलग निर्देशकों से सीखा है। उनके इनपुट से मुझे फायदा हुआ। सिनेमा और एक्टिंग की उनकी समझदारी बढ़ गई है। शशांक मानते हैं कि अभी दोनों ही दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं। उनकी लोकप्रयता का लाभ फिल्‍म को मिलेगा।
क्‍या हंप्‍टी और बद्रीनाथ के बाद यह दुल्‍हनिया किसी और के पास भी जाएगी? क्‍यों नहीं? लव फ्रेंचाइजी है। हम पूरा भारत घूम सकते हैं।

Sunday, March 5, 2017

हिट है हमारी जोड़ी - वरुण धवन



हिट है हमारी जोड़ी - वरुण धवन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कायदे से अभी उन्‍हें एक्टिंग करते हुए पांच साल भी नहीं हुए हैं। अक्‍टूबर 2012 में करण जौहर के निर्देशन में बनी स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर मेकं लांच हुए। तब से यह उनकी आठवीं फिल्‍म होगी। 2014 में आई शशांक खेतान की फिल्‍म हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया की फ्रेंचाइजी फिल्‍म बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में वे फिर से आलिया भट्ट के साथ दिखेंगे। उनकी आठ में से तीन फिल्‍मों की हीरोइन आलिया भट्ट हैं। कह सकते हैं कि दोनों की जोड़ी पसंद की जा रही है। इध हिंदी फिल्‍मों में जोडि़यां बननी बंद हो गई हैं। वरुण व्‍यस्‍त हैं और पांच सालों में ही स्‍क्रीन पर उन्‍होंने परफारमेंस में वैरायटी दिखाई है।
बातचीत की शुरूआत में सोशल मीडिया का जिक्र आ जाता है। वरुण ट्वीटर पर काफी एक्टिव हैं। वे उसका सही उपयोग करते हैं। इसके बावजूद वे कुछ अनग सोचते हैं, मुझे लगता है कि सोशल मीडिया हमें एंटी सोशल बना रहा है। लोग हर बात और घटना को इंटरनेट पर डालना चाहते हैं। हमारी पूरी जिंदगी इंटरनेट तक सिमट गई है। हालांकि एक्‍टर के तौर पर पब्लिसिटी के लिए मैं भी इसका इस्‍तेमाल कर रहा हूं,लेकिन मुझे थोंड़ा अनहेल्‍दी लगता है। संतुलन होना चाहिए। शुद्धता बनी रहेगी। सुकून भी रहेगा। अपनी फिल्‍मों को लेकर वरुण साकांक्ष हैं। वे खयाल रखते हैं, मेरी फिल्‍मों में संदेश भी रहे और एंटरटेनमेंट भी रहे। हंसने के साथ वे कुछ सीख कर निकलें। अभी नहीं बता सकता,लेकिन बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में एक संदेश है।
वरुण को लांच कर चुके करण जौहर उनके गा इड हैं। किसी फिल्‍म के लिए हां कहने के पहल उनसे सलाह-मशविरा लाजिमी है। वरुण बताते हैं, करण कभी फोर्स नहीं करते। उन्‍होंने इस फिल्‍म के लिए कहा था कि बद्री... की स्क्रिप्‍ट सुन ले। मुझे हां कहते देर नहीं लगी। वे स्‍पष्‍ट करते हैं,य‍ह हंप्‍टी... की सीक्‍वल नहीं हैं। इसे लव फ्रेंचाइज कह सकते हैं। इसमें लड़का झांसी से हैं और लड़की कोटा से है। उनके बीच प्‍यार हो जाता है। दोनों शहरों के बीच चार घंटे की दूरी है,लेकिन यह चार घंटे की दूरी लोगों को बिल्‍कुल अलग कर देती है। पूरी टीम वही है। शशंक और आलिया की वजह से कंफर्ट है। देख-रेख के लिए करण हैं ही। हुई है। यह धर्मा प्रोडक्‍शन की पहली फिल्‍म है,जो झांसी और कोटा जैसे छोटे शहरों में शूटहम सभी साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं। कोई पीछे नहीं छूटा है।
अपनी को-एक्‍टर आलिया भट्ट की प्रशंसा में वरुण पीछे नहीं रहते। साथ ही वे फिल्‍म के बारे में भी बताते हैं, आलिया में जबरदस्‍त निखार आया है। आलिया के साथ काम करने में मजा आता है। हमारा अच्‍छा रिश्‍ता है। हमारी केमिस्‍ट्री दर्शकों को अच्‍छी लग रही है। हमारी पीढ़ी में जोडि़यां नहीं बन पा रही है। अभी तक हमारी पिछली दोनों फिल्‍में चली हैं। उम्‍मीद है कि यह भी चलेगी। धर्मा प्रोडक्‍शन की इस लव स्‍टोरी का फ्लेवर बिल्‍कुल अलग है। जबरदस्‍त ड्रामा है। इस फिल्‍म के लिए मैंने शशांक से वहां के यूथ के वीडियो मंगवाए थे। हाव-भाव और भाषा के लिए उन्‍हें देखा। मेरे घर पर नार्थ के काफी लोग हैं। उनसे सीखा। शशांक से साथ स्क्रिप्‍ट रीडिंग और वॉयस के अभ्‍यास हुए। इन सबसे काफी मदद मिली। सच कहूं तो मैं बद्री की तरह हो गया था।
अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में सफलता और विविधता के लिहाज से वरुण आगे हैं। फिलमों के विषय और रोल पर ध्‍यान दे रहे हैं। वरुण इसका श्रेय अपनी टीम और परिवार को देते हैं, मेरे आसपास के लोग नहीं बदले हैं। हां,कुछ नए जुड़ गए हैं। मेरी सफलता को क्रेडिट उन्‍हें मिलना चाहिए। शशांक और डैड के साथ मेरी दूसरी फिल्‍में आ रही हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे निर्देशक मुझे रिपीट करें। वरुण आज की पीड़ी के युवक हैं। अपने समय और समाज के प्रति जागरुक..वे कहते हैं, हम भी राय रखते हैं। हमारे आसपास जो हो रहा है,उस पर रिएक्‍ट करते हैं। पब्लिक प्‍लेटफार्म पर भले ही खुल कर नहीं बोल सकूं। एक हिंदुस्‍तानी की तरह कुछ चुभता है तो तकलीफ भी होती है। अपनी तकलीफ जाहिर नहीं कर पाते। अपनी पीढ़ी के बारे में यही कहूंगा कि वे जल्‍दबाजी में रिएक्‍ट न करें। पहले रिएक्‍ट कर सिकंदर न बनें। अपने फैथ्‍ट्स चेक कर लें।
वरुण की एक्टिंग किसी एक कलाकार से प्रभावित नहीं है,लेकिन मॉम-डैड के प्रभाव में उन्‍होंने पीटर सेलर्स,धर्मेन्‍द्र,देव आनंद और महमूद की काफी फिल्‍में देखी हैं। वरुण की कोशिश रहती है कि वे हिंदी की फिल्‍में देखते रहें। शायद वहीं से उन्‍हें खुराक मिलती हो।

Friday, July 11, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिदी फिल्मों की नई पीढ़ी का एक समूह हिंदी फिल्मों से ही प्रेरणा और साक्ष्य लेता है। करण जौहर की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के रेफरेंस रहते हैं। पिछले सौ सालों में हिंदी फिल्मों का एक समाज बन गया है। युवा फिल्मकार जिंदगी के बजाय इन फिल्मों से किरदार ले रहे हैं। नई फिल्मों के किरदारों के सपने पुरानी फिल्मों के किरदारों की हकीकत बन चुके हरकतों से प्रभावित होते हैं। शशांक खेतान की फिल्म 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की रीमेक या स्पूफ नहीं है। यह फिल्म सुविधानुसार पुरानी फिल्म से घटनाएं लेती है और उस पर नए दौर का मुलम्मा चढ़ा देती है। शशांक खेतान के लिए यह फिल्म बड़ी चुनौती रही होगी। उन्हें पुरानी फिल्म से अधिक अलग नहीं जाना था और एक नई फिल्म का आनंद भी देना था।
चौधरी बलदेव सिंह की जगह सिंह साहब ने ले ली है। अमरीश पुरी की भूमिका में आशुतोष राणा हैं। समय के साथ पिता बदल गए हैं। वे बेटियों की भावनाओं को समझते हैं। थोड़ी छूट भी देते हैं, लेकिन वक्त पडऩे पर उनके अंदर का बलदेव सिंह जाग जाता है। राज मल्होत्रा इस फिल्म में हंप्टी शर्मा हो गया है। मल्होत्रा बाप-बेटे का संबंध यहां भी दोहराया गया है। हंप्टी लूजर है। सिमरन का नाम काव्या हो गया है। उसमें गजब का एटीट्यूड और कॉन्फिडेंस है। वह करीना कपूर की जबरदस्त फैन है। काव्या की शादी आप्रवासी अंगद से तय हो गई है। पुरानी फिल्म का कुलजीत ही यहां अंगद है। शादी के ठीक एक महीने पहले काव्या मनीष मल्होत्रा का डिजायनर लहंगा खरीदना चाहती है, जो करीना कपूर ने कभी पहना है। अंबाला में वैसा लहंगा नहीं मिल सकता, इसलिए वह दिल्ली आती है। दिल्ली में हंप्टी और काव्या की मुलाकात होती है। पहली नजर में प्रेम होता है और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की कहानी थोड़े फेरबदल के साथ घटित होने लगती है।
शशांक खेतान की फिल्म पूरी तरह से 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' पर आश्रित होने के बावजूद नए कलाकरों की मेहनत और प्रतिभा के सहयोग से ताजगी का एहसास देती है। यह शशांक के लेखन और फिल्मांकन का भी कमाल है। फिल्म कहीं भी अटकती नहीं है। उन्होंने जहां नए प्रसंग जोड़े हैं, वे चिप्पी नहीं लगते। 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आलिया भट्ट के एटीट्यूड और वरुण धवन की सादगी से रोचक हो गई है। दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों के मिजाज को अच्छी तरह निभाया है। वरुण के अभिनय व्यवहार में चुस्ती-फुर्ती है। वे डांस, एक्शन और रोमांस के दृश्यों में गति ले आते हैं। दूसरी तरफ आलिया ने इस फिल्म में काव्या की आक्रामकता के लिए बॉडी लैंग्वेज का सही इस्तेमाल किया है। खड़े होने के अंदाज से लेकर चाल-ढाल तक में वे किरदार की खूबियों का उतारती हैं। अलबत्ता कहीं-कहीं उनके चेहरे की मासूमियत प्रभाव कम कर देती है। लंबे समय के बाद आशुतोष राणा को देखना सुखद रहा। बगैर नाटकीय हुए वे आधुनिक पिता की पारंपरिक चिंताओं को व्यक्त करते हैं। हंप्टी शर्मा के दोस्तों की भूमिका में गौरव पांडे और साहिल वैद जंचते हैं। सिद्धार्थ शुक्ला अपनी पहली फिल्म में मौजूदगी दर्ज करते हैं।
शशांक खेतान की 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' हंसाती है। यह फिल्म रोने-धोने और बिछड़े प्रेम के लिए बिसूरने के पलों को हल्का रखती है। भिड़ंत के दृश्यों में भी शशांक उलझते नहीं हैं। यह फिल्म अंबाला शहर और दिल्ली के गलियों के उन किरदारों की कहानी है,जो ग्लोबल दौर में भी दिल से सोचते हैं और प्रेम में यकीन रखते हैं। शशांक खेतान उम्मीद जगाते हैं। अब उन्हें मौलिक सोच और कहानी पर ध्यान देना चाहिए।
अवधि: 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Wednesday, June 18, 2014

अपेक्षाएं बढ़ गई हैं प्रेमियों की-शशांक खेतान


-अजय ब्रह्मात्मज
    धर्मा प्रोडक्शन की ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के निर्देशक शशांक खेतान हैं। यह उनकी पहली फिल्म है। पहली ही फिल्म में करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शन का बैनर मिल जाना एक उपलब्धि है। शशांक इस सच्चाई को जानते हैं। ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया ’ के लेखन-निर्देशन के पहले शशांक खेतान अनेक बैनरों की फिल्मों में अलग-अलग निर्देशकों के सहायक रहे। मूलत: कोलकाता के खेतान परिवार से संबंधित शशांक का बचपन नासिक में बीता। वहीं पढ़ाई-लिखाई करने के दरम्यान शशांक ने तय कर लिया था कि फिल्मों में ही आना है। वैसे उन्हें खेल का भी शौक रहा है। उन्होंने टेनिस और क्रिकेट ऊंचे स्तर तक खेला है। शुरू में वे डांस इंस्ट्रक्टर भी रहे। मुंबई आने पर उन्होंने सुभाष घई के फिल्म स्कूल ह्विस्लिंग वूड्स इंटरनेशनल में दाखिला लिया। ज्यादा जानकारी न होने की वजह से उन्होंने एक्टिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई के दरम्यान उनकी रुचि लेखन और डायरेक्शन में ज्यादा रही। टीचर कहा भी करते थे कि उन्हें फिल्म डायरेक्शन पर ध्यान देना चाहिए। दोस्तों और शिक्षकों के प्रोत्साहन से शशांक ने ‘ब्लैक एंड ह्वाइट’ और ‘युवराज’ में सुभाष घई के इंटर्न रहे। बाद में वे यशराज फिल्म्स से जुड़े। वहां ‘इश्कजादे’ में एक छोटी भूमिका भी निभा ली। इन पड़ावों से गुजरते हुए वे अपने लक्ष्य से अलग नहीं हुए। फिल्म की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने एक्टिंग के अपने शिक्षक नसीरुद्दीन शाह के साथ थिएटर भी किया।
    शशांक अपनी यात्रा और फिल्मी शिक्षा में नसीरुद्दीन शाह की बड़ी भूमिका मानते हैं। वे कहते हैं, ‘ह्विस्लिंग वूड्स से निकलने के बाद भी मैं नसीर सर के साथ जुड़ा रहा। उनसे बहुत कुछ सीखा। अपनी बात रियलिस्टिक तरीके से रखना आया। उनकी ट्रेनिंग के बाद मुझे करण जौहर के साथ काम करने का मौका मिला। कुछ लोगों को यह विरोधाभाषी लग सकता है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं। मेरी फिल्म में दर्शक नसीर और करण दोनों का सम्मिलित प्रभाव देखेंगे। सिचुएशन और रिएक्शन नसीर सर की सोच के मुताबिक है और उनका फिल्मांकन करण जौहर से प्रभावित है। रियलिस्टिक कहानी को करण जौहर ने भव्यता दे दी है। करण के अनुभव से मेरी फिल्म को बहुत फायदा हुआ है। ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने के लिए जरूरी तत्व उन्हीं की सलाह से आए।’
    ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के बारे में बताते हुए शशांक खेतान दो फिल्मों का जिक्र करते हैं, ‘मैंने 13 साल की उम्र में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ देखी थी। उस फिल्म ने मुझे झकझोर दिया था। मेरी पीढ़ी के दर्शकों के लिए वह फिल्म ‘मुगलेआजम’ थी। कह सकता हूं कि अगर वह फिल्म नहीं आई होती तो मैं फिल्मों में नहीं आया होता। मेरी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ को समर्पित है। फिल्मों की पढ़ाई के समय मैंने ‘कसाबलांका ’ देखी थी। वह गजब की रोमांटिक फिल्म है। इन दोनों फिल्मों का असर यह हुआ कि मैंने तय कर लिया कि मेरी पहली फिल्म रोमांटिक ही होगी। ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ की शुरुआत इसी विचार से हुई। शुरू में मैं इसे कॉन स्टोरी बना रहा था। बाद में लगा कि हंप्टी और काव्या इतने प्यारे हैं कि वे ठग नहीं हो सकते।  उन्हें फिर से लिखना शुरू किया और यह फिल्म बनी।’
    शशांक खेतान की फिल्म कहीं न कहीं उनके अपनी जीवन से भी प्रभावित है। शशांक उन चंद भाग्यशालियों में से हैं जिन्होंने जिस लडक़ी से बचपन से प्रेम किया बाद में उसी से शादी की। वे स्वीकार करते हैं, ‘सच्चा प्रेम होता है। मैं और मेरी पत्नी इसके उदाहरण हैं। हम दोनों के प्रेम से यह जाहिर होता है कि आज के समय में भी प्रेम एक शाश्वत भाव है। मैं इस विचार को मानता हूं कि प्रेम है और सच्चा प्रेम हमेशा रहेगा। मैं नई पीढ़ी के युवकों की बात नहीं मानता कि आज के समय में प्रेम संभव नहीं है। मुझे जरूरी लगा कि ऐसी फिल्म बननी चाहिए जिसमें सच्चे प्रेम की बात की जाए। मेरी चुनौती यही थी कि इसे आज के जमाने में कैसे पेश करूं। मैं इसको मेलोड्रामा नहीं बनाना चाहता था। मेरी फिल्म में दोनों को अपने प्रेम के लिए किसी से लडऩे-झगडऩे की जरूरी नहीं पड़ती।’
    ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ में मेलोड्रामा का न होना ही करण जौहर को अधिक पसंद आया। उन्होंने शशांक खेतान की स्क्रिप्ट चुनी और उन्हें निर्देशन का मौका दिया। शशांक गर्व भाव से बताते हैं, ‘मैंने धर्मा प्रोडक्शन में अपनी स्क्रिप्ट भेज दी थी। यहां की टीम को मेरी स्क्रिप्ट पसंद आयी। मुझे बुलाया गया। करण जौहर से वह मेरी पहली मुलाकात थी। मैंने अनुमान नहीं किया था कि मुझे पहली फिल्म इतनी आसानी से मिल जाएगी। करण ने मुझे कहा भी था कि उन्हें मेरी फिल्म इसीलिए पसंद आई कि उसमें मेलोड्रामा नहीं है। उन्होंने कहा कि आप ही डायरेक्ट करो।’ शशांक आगे कहते हैं, ‘गौर करें तो प्रेम का भाव बदला नहीं है। हां, प्रेमियों की अपेक्षाएं बदल रही हैं। उनके ऊपर इतने किस्म के दबाव हैं कि वे तनाव और प्रभाव में तत्क्षण फैसले ले लेते हैं। मुझे मालूम है उनमें से कई बाद में बहुत पछताते हैं। ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ यह बताने की कोशिश है कि बगैर अपेक्षाओं के भी प्रेम किया जा सकता है।’
    अपने कलाकारों के चयन के बारे में शशांक कहते हैं, ‘मैंने ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ देखी थी। उन दिनों मैं अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहा था। मुझे वरुण धवन और आलिया भट्ट कुछ दृश्यों में बहुत प्रभावशाली लगे थे। मैंने तभी सोचा था कि मेरी फिल्म में यदि ये दोनों होंगे तो मेरी बात सही तरीके से पर्दे पर आएगी। फिल्म लिखते समय अपनी किरदारों मे मैं उन्हीं दोनों को देखता रहा था। यह भी एक संयोग है कि मुझे अपनी फिल्म के लिए मनचाहे सितारे मिल गए। ’