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Saturday, February 28, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दम लगा के हईसा


चुटीली और प्रासंगिक
-अजय ब्रह्मात्मज
    यशराज फिल्म्स की फिल्मों ने दशकों से हिंदी फिल्मों में हीरोइन की परिभाषा गढ़ी है। यश चोपड़ा और उनकी विरासत संभाल रहे आदित्य चोपड़ा ने हमेशा अपनी हीरोइनों को सौंदर्य और चाहत की प्रतिमूर्ति बना कर पेश किया है। इस बैनर से आई दूसरे निर्देशकों की फिल्मों में भी इसका खयाल रख जाता है। यशराज फिल्म्स की ‘दम लगा के हईसा’ में पहली बार हीरोइन के प्रचलित मानदंड को तोड़ा गया है। फिल्म की कहानी ऐसी है कि सामान्य लुक की एक मोटी और वजनदार हीरोइन की जरूरत थी। भूमि पेंडणेकर ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। इस फिल्म में उनके साथ सहायक कलाकारों का दमदार सहयोग फिल्म को विश्वसनीय और रियल बनाता है। खास कर सीमा पाहवा,संजय मिश्रा और शीबा चड्ढा ने अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। हम उनकी वजह से ही फिल्म के प्रभाव में आ जाते हैं।
    1995 का हरिद्वार ¸ ¸ ¸देश में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव की सरकार है। हरिद्वार में शाखा लग रही है। प्रेम एक शाखा में हर सुबह जाता है। शाखा बाबू के विचारों से प्रभावित प्रेम जीवन और कर्म में खास सोच रखता है। निर्देशक ने शाखा के प्रतिगामी असर का इशारा भर किया है। तिवारी परिवार का यह लड़का ऑडियो कैसेट की दुकान चलाता है। कुमारा शानू उसकी कमजोरी हैं। उनके अलावा वह पिता की चप्पल और परीक्षा में अंग्रेजी भी उसकी कमजोरी है। तिवारी परिवार अपने लाडले की शादी पढ़ी-लिखी सर्विसवाली बहू से कर देना चाहते हैं। वे उसके मोटापे को नजरअंदाज करते हैं। प्रेम न चाहते हुए भी पिता और परिवार के दबाव में शादी कर लेता है। वह अपनी पत्नी संध्या को कतई पसंद नहीं करता। एक बार गुस्से में वह कुछ ऐसा कह जाता है कि आहत संध्या उसे छोड़ कर चली जाती है। बात तलाक तक पहुंचती है। फैमिली कोर्ट उन्हें छह महीने तक साथ रहने का आदेश देता है ताकि वे एक-दूसरे को समझ सकें। इसी दौर में प्रेम और संध्या करीब आते हैं। और आखिरकार ¸ ¸ ¸
    निर्देशक शरद कटारिया ने उत्तर भारत के निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की रोजमर्रा जिंदगी से यह कहानी चुन ली है। बेमेल शादी के बहाने वे कई जरूरी मुद्दों को भी छूते चलते हें। फिल्म में प्रसंगवश सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी है। लेखक-निर्देशक ने संयमित तरीके से हरिद्वार के माहौल को रचा है। उन्होंने अपने चरित्रों को लार्जर दैन लाइफ नहीं होने दिया है। फिल्म में मध्यवर्गीय परिवारों के दैनंदिन प्रसंग और रिश्तों के ढंग हैं। प्रेम और संध्या के परिवारों के सदस्यों को भी निर्देशक ने स्वाभाविक रखा है। उनके व्यवहार, प्रतिक्रिया और संवादों से फिल्म के प्रभाव का घनत्व बढ़ता है।
    कलाकारों में संजय मिश्रा और सीमा पाहवा की तारीफ करनी होगी। उनकी जोड़ी को हम रजत कपूर की ‘आंखों देखी’ में देख चुके हैं। इन दोनों कलाकारों ने आयुष्मान खुरााना और भूमि पेंडणेकर का काम आसान कर दिया है। भूमि पेंडणेकर की यह पहली फिल्म है। बगैर आयटम सौंग और अंग प्रदर्शन के भी वह अपील करती हैं। यह अलग बात है कि भविष्य की फिल्मों के लिए उन्हें अलग से मेहनत करनी होगी। संध्या के किरदार के लिए वह उपयुक्त हैं। उन्होंने अपने किरदार को नार्मल और नैचुरल रखा है। सालों बाद हिंदी फिल्मों में बुआ दिखी है। बुआ के रूप में शीबा चड्ढा अच्छी और चुटीली हैं।
    वरुण ग्रोवर और अनु मलिक के गीत-संगीत में पीरियड का पूरा ध्यान रखा गया है। वे उस पीरियड के संगीत की नकल में भोंडे नहीं हुए हैं। वरुण ग्रोवर के गीतों में आमफहम भाषा और अभिव्यक्ति रहती है। वह यहां भी है। इस फिल्म की भाषा मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को वैसी ही लग सकती है, जैसे सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को अंग्रेजी अंग्रेजी मिश्रित भाषा लगती है। उत्तर भारत के दर्शक मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन में इस फिल्म का आनंद उठाएंगे।
अवधि- 111 मिनट
 *** १/२ साढ़े तीन स्टार