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Wednesday, August 15, 2018

फिल्म समीक्षा : गोल्ड

फिल्म समीक्षा : गोल्ड 
एक और जीत 

-अजय ब्रह्मात्मज 

इस फिल्म में अक्षय कुमार हैं और इसके पोस्टर पर भी वे ही हैं. उनकी चर्चा बाद में.

'गोल्ड' के बारे में प्रचार किया गया है कि यह 1948 में लंदन में आयोजित ओलिंपिक में आजाद भारत की पहली जीत की कहानी है.तपन दास के निजी प्रयास और उदार वाडिया के सहयोग से यह संभव हो सका था.तपन दस 1936 के उस विख्यात मैच के साक्षी थे,जब बर्लिन में बिटिश इंडिया ने गोल्ड जीता था.तभी इम्तियाज़ और तपन दास ने सोचा था कि किसी दिन जीत के बाद भारत का तिरंगा लहराएगा.आखिरकार 22 सालों के बाद यह सपना साकार हुआ,लेकिन तब इम्तियाज़ पाकिस्तानी टीम के कप्तान थे और तपन दास भारतीय टीम के मैनेजर.तपन दास भारत के पार्टीशन की पृष्ठभूमि में मुश्किलों और अपमान के बावजूद टीम तैयार करते हैं और गोल्ड लाकर 200 सालों कि अंग्रेजों कि ग़ुलामी का बदला लेते हैं.

'गोल्ड' जैसी खेल फ़िल्में एक उम्मीद से शुरू होती है. बीच में निराशा,कलह,मारपीट और अनेक रोचक मोड़ों से होते हुए फतह की ओर बढती है.सभी खेल फ़िल्में या खिलाडियों के जीवन पर आधारित फिल्मों का मूल मंत्र हिंदी फिल्मों का आजमाया मंत्र है-अंडरडॉग कि जीत.इन दिनों खेल और खिलाडियों के जीवन पर आधारित फिल्मों में राष्ट्रवाद का नवाचार चल रहा है.निर्मात,लेखक और निर्देशकों को राष्टवादी जमात में खड़ा होने का अच्छा मौका मिल जाता है.राष्ट्र गौरव की बात,देश की जीत,कुछ राष्ट्रप्रेमी संवाद और तिरंगा फहराने के साथ 'जन गन मन' का सस्वर या सांगीतिक पाठ.इन मसलों के होने पर फिल्म कीकहानी,चरित्रों के निर्वाह,प्रस्तुति और अन्विति पर दर्शकों का ध्यान नहीं जाता.वे दर्प के साथ अच्छी फीलिंग लेकर सिनेमाघरों से निकलते हैं.'गोल्ड' बिलकुल इसी प्रकार की फिल्म है.

यह सच्ची घटना पर आधारित काल्पनिक कहानी है.अगर इन्टरनेट पर भी खोज लें तो पता चल जायेगा कि पूरी टीम और खिलाडियों के नाम अलग थे.सवाल है कि ऐसी काल्पनिकता कि ज़रुरत क्यों होती है? वास्तविक खिलाडियों के नाम के साथ बी तो यह फिल्म बनायीं जा सकती थी.फिल्म में ज़िक्र होता है कि टीम पंजाब के 6 खिलाडी हैं,जबी मूल टीम में बॉम्बे के 6 खिलाडी थे.तपन दास का किरदार कमोबेश तत्कालीन टीम के कप्तान किशन लाल पर आधारित है.तथ्यों के अन अंतरों को नज़रन्दाज कर फिल्म देखें तो 'गोल्ड' निराश नहीं करती.

रीम कागटी ने आज़ादी के दौर को वास्तु,वस्र,माहौल और प्रोडक्शन के इहज से रचा है. उनकी टीम के योगदान को श्री मिलना चाहिए.केवल अक्षय कुमार और उनकी बीवी मोनी रॉय के किरदारों में थोड़ी आज़ादी इ गयी है या ढील दी गयी है.अक्षय कुमार कभी तो बंगाली लहजा ले आते हैं और कभी खालिस हिंदी बोलने लगते हैं.सहयोगी किरदारों को निभा रहे कलाकार ऐसी गलती नहीं करते.उन सभी ने अपने किरदारों को मजबूती से थम रखा है. उनकी मेहनत और लगन से ही फिल्म का प्रभाव बढ़ता है.वे किरदार याद रह जाते हैं.

इस फिल्म में सनी कौशल और विनीत कुमार सिंह संक्षिप्त भूमिकाओं के बावजूद प्रभावी हैं.उन्हें कुछ प्रभापूर्ण दृश्य मिले हैं और उन्होंने उन दृश्यों अपनी क्षमता का परिचय दिया है.किरदार के मूल स्वाभाव को समझ कर जब किरदार हव-भाव और संवाद अदायगी पर मेहनत करते हैं तो किरदार निखारते है.दिखने लगते हैं.इन दोनों के साथ अमित साध और कुनाल कपूर भी कदम मिला कर चलते हैं.अमित ने ठाकुर परिवार के एटीट्युड को साधा है और अंत तक निभाया है.

अक्षय कुमार का अभ्यास कहें या रीमा कागटी का प्रयास मानें...इस फिल्म में अक्षय कुमार कुछ दृश्यों में सधे और सटीक अभिनय से प्रभावित करते हैं.उम्र,अनुभव और विषयों की विविधता से उनके अभिनय में आया गुणात्मक बदलाव इस फिल्म में दिखता है.

रीमा कागती और उनकी टीम ने बेहतरीन प्रयास किया है.इस फिल्म का पार्श्व संगीत फिल्म की थीम को असरदार बनता है.

अवधि 153 मिनट
*** 1/2 साढ़े तीन स्टार 

Monday, May 21, 2018

अब मेरे पास लोगों के सवालों के जवाब हैंः अभिनेता विनीत कुमार सिंह

-अजय ब्रह्मात्मज

विनीत कुमार सिंह को एक उभरता हुआ अभिनेता कहना ठीक नहीं होगा। वे पिछले करीब 18 वर्षों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। कई फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाने के बाद अब जाकर इंडस्ट्री में उनकी खास पहचान बनी है। 

विनीत कुमार सिंह ने करीब 18 साल पहले एक टैलेंट हंट के जरिये मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था। उन्होंने बहुत सारे छोटे-छोटे किरदार निभाये, फिल्म ‘चेन कुली की मेन कुली की’ (2007) का सहायक निर्देशन भी किया, लेकिन उनकी अलग पहचान बनी फिल्म ‘बॉम्बे टॉकीज’ (2013) और ‘गैंग्स ऑफ वासीपुर’ (2012) से। उसके बाद जब अनुराग कश्यप की ‘अग्ली’ (2013) का कान फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन हुआ तो लोगों ने उनके अभिनय की काफी सराहना की। लेकिन अब भी वे बतौर अभिनेता कमर्शियल सफलता से दूर थे। लेकिन ये साल उनके लिए बहुत खुशकिस्मत रहा। ‘मुक्काबाज’ में उनके अभिनय और पटकथा को ना सिर्फ सराहा गया बल्कि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन किया। उसके बाद आई सुधीर मिश्र की ‘दास देव’, जिसका प्रदर्शन तो औसत रहा, लेकिन विनीत ने अपने सशक्त अभिनय से फिल्म में एक छोटी सी भूमिका में भी लोगों का दिल जीत लिया। एक लंबे संघर्ष के बाद आयुर्वेद में स्नातक और बास्केट बॉल खिलाड़ी रहे विनीत को बतौर अभिनेता सफलता हासिल हुयी है। पेश हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश
क्या ‘मुक्काबाज’ से जुड़ी आपकी उमीदें पूरी हुईं? उसके बाद का जीवन कैसा चल रहा है?
मैंने जितना सोचा था, उस से ज्यादा ही हो रहा है। ‘मुक्काबाज’ को रिलीज हुए चार महीने हो गए। इन चार महीनों में जितनी स्क्रिप्ट आयी हैं,उतनी 18 साल में नहीं आयी थीं। इसके पहले ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद भी चीजें बदली थीं। इस बार बदलाव ने रफ्तार पकड़ ली है।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का चलन है कि जिस फिल्म और किरदार से आप मशहूर होते हैं, बाद में वैसी ही फिल्मों के ऑफर आते हैं.....
वैसी तो नहीं, लेकिन उत्तर भारत की फिल्मों की तादाद ज्यादा है। मेरी पिछली फिल्में लोगों के जहन में हैं। मुझे वैसी विविधता की फिल्में आ रही हैं। मैं किसी इमेज में नहीं फंसा हूं। लोगों का बढ़ा विश्वास दिख रहा है। मेरी क्षमताओं में यकीन बढ़ा है।
क्या ऐसा कह सकते हैं कि ‘मुक्काबाज़’ ने आप की पुरानी फिल्मों को भी जिंदा कर दिया है?
बिलकुल सही कहा आप ने। मेरी पुरानी फिल्में याद आ गयी हैं। लोग नाम लेकर बताते हैं। न चली फिल्में भी लोग याद करते और कराते हैं। रिलीज के समय उन फिल्मों की कभी इतनी चर्चा नहीं हुई थी।
यह स्वाभाविक है। मशहूर होते ही आप के बारे में सारी जानकारियां तैरने लगती हैं….
जी हां, आप सही कह रहे हैं। लोगों का भरोसा इसलिए भी मिल रहा है कि ‘मुक्काबाज’ के समय ढेर सारे लोगों से मिला था। उन्हें मुझ में अब भरोसा हो रहा है। अनुराग ने मेरी स्क्रिप्ट में विश्वास किया था…। अभी बाकी लोग भी कर रहे हैं। फिल्म देखने के बाद 70 प्रतिशत लोगों ने फोन किया।
आप ने अनुराग का जिक्र किया। आज के विनीत में उनका क्या योगदान है?
अगर वे न होते तो मेरे हिस्से में यह सब नहीं आता। यह बात साफ है। मैंने हमेशा मेहनत की। सभी भूमिकाओं में की, लेकिन ऐसी पहचान नहीं मिली। अनुराग ने मेरे करियर को बनाया। मुझे एक एक्टर बनाया। आज लोगों को लगता है कि मैं एनएसडी या एफटीआईआई से हूं।
आम जिंदगी में गुरू और उस्ताद अपने चेलों और शागिर्दों को जताते रहते हैं कि मैंने क्या-क्या किया? क्या कभी अनुराग को भी ऐसे रूप में देखा है?
मैंने कभी ऐसा अनुभव नहीं किया। उन्होंने कभी नहीं जताया। हां, उनका कंसर्न रहता है। मैं संयुक्त परिवार में पला भावुक लड़का हूं। थोड़ा इमोशनल हो जाता हूं। अनुराग इस बात को जानते हैं। अनुराग ऐसे स्वाभाव के नहीं हैं। अपने योगदान का कभी भार नहीं डालते।
आप जैसे अभिनेता सफल होने तक एक उम्र गुजार चुके होते हैं। यही कामयाबी दस साल पहले आ गयी होती तो कुछ और बात होती?
कुछ चीजें हमारे वश में नहीं होतीं। पहले कुछ सालों में सफलता मिल गयी होती तो ज्यादा काम कर पाया होता। भूख थोड़ी शांत हो गयी होती। कुछ फिल्में गिनाने के लिए होतीं। फिर भी अफसोस नहीं है। इस दरम्यान सीखता रहा। अब समझ में आ रहा है कि वक्त बेकार नहीं जाता। खुद पर काम कर रहा हूं।
हम कौन सी फिल्म में आप को देखेंगे?
अक्षय कुमार के साथ ‘गोल्ड’ आएगी। उनसे बहुत कुछ सीखा। खुश रहना कोई उनसे सीखे। वे कभी स्ट्रेस में नहीं रहते। एक फिल्म और मिली है, जिसके निर्माता अनुराग कश्यप हैं।
’मुक्काबाज’ की कामयाबी से जिंदगी में क्या बदलाव आया है?
मेरी बेचैनी कम हो गयी है। मैं शांत हो गया हूं। पहले लगता था कि मैं मुंबई में गुम हो गया हूं। मैं लोगों के सवालों के जवाब नहीं दे पा रहा था। अब मेरे पास मुकम्मल जवाब है।
navjivan

Wednesday, January 17, 2018

सिनेमालोक : विनीत का लाजवाब गुस्सा



मित्रों,
लोकमत समाचार में मेरा नया कॉलम सिनेमालोक आरंभ हुआ है.आप के प्यार और प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा. 

सिनेमालोक
विनीत का लाजवाब गुस्सा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले हफ्ते रिलीज हुई अनुराग कश्‍यप निर्देशित ‘मुक्‍काबाज’ में दर्शकों ने विनीत कुमार सिंह को नोटिस किया। उत्‍तर प्रदेश के बैकड्रॉप बनी इस फिल्‍म में अनुराग कश्‍यप ने स्‍‍थानीय राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियों के बीच एक बेरोजगार युवक के बॉक्‍सर बनने की कहानी है। वह तमाम अवरोधों और बाधाओं के बीच जूझता है। अपनी जिद और कुछ शुभचिंतकों के सपोर्ट से बॉक्‍सर बनने का ख्‍वाब पूरा करता है,लेकिन....। इस लेकिन में फिल्‍म का क्‍लाइमेक्‍स है। हम फिल्‍म में मुख्‍य भूमिका अभिनेता विनीत कुमार सिंह ने निभाई है। सभी समीक्षाओं में विनीत कुमार सिंह की अदाकारी की तारीफ हुई है। अगर आप ट्वीटर पर उनका नाम सर्च करें तो तारीफ के अनेक ट्वीट मिल जाएंगे। फिल्‍म देखने के बाद शबाना आजमी ने अनुराग कश्‍यप की आत्‍मविश्‍वास के साथ वापसी का स्‍वागत करते हुए विनीत के लिए कुछ शब्‍द अलग से कहे। उन्‍होंने कहा कि मैंने भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्‍चन के बाद किसी और अभिनेता को इतने सहज और ठोस तरीके सं गुस्‍सा जाहिर करते नहीं देखा। इस लिहाज से विनीत कुमार सिंह नई सदी के एंग्रीयंग मैन हुए। अब यह मुंबई के निर्देशकों पर निर्भर करता है कि वे उन्‍हें आगे कैसी फिल्‍मों और भूमिकाओं में चुनते हैं।
कौन है विनीत कुमार सिंह? विनीत कुमार सिंह 18 साल पहले मुंबई आए। बनारस के शिक्षाप्रेमी परिवार में पले-बढ़े विनी कुमार सिंह को पिता के दबाव में अनिच्‍छा से मेडिकल की पढ़ाई करनी पड़ी। वे एनएसडी जाना चाहते थे(लिकिन पिता की स्‍पष्‍ट ना ने उन्‍हें पिता की मर्जी की पढ़ाई करने के लिए विवश किया। बहुत आसान होता है ऐसे मामलों में पिता को दोषी ठहरा देना। गौर करें तो वे अपने समाज और परिस्थिति के कारण संतानों पर ऐसे फैसले लादते हैं। बहरहाल,विनीत कुमार सिंह ने नागपुर से आयुर्वे में डिग्री और एमडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिश करने का लाइसेंस भी ले लिया। मन तो उनका मुंबई में अटका हुआ था। वह छोटे भाई-कहनों से अपने सपने शेयर किया करते थे। एक दिन बहन ने ही अखबार में दिखाया कि मुंबई में किसी प्रोडक्‍शन हाउस को नए टैलेंट की जरूरत है। विनीत कुमार सिंह मुंबई आ गए।
रोजाना सैकड़ों युवा प्रतिभाएं आंखों में सपने लिए मुंबई आती हैं। उनमें से ही कुछ शाह रूख खान और मनोज बाजपेयी बनते हैं। संघर्ष तो सभी को करना पड़ता है। खास कर किसी आउटसाइडर के लिए मुंबई की हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में घुस पाना पुराने जमाने के किसी किले में घुसने से कम नहीं होता। शुरू में विनीत निर्देशकमहेश मांजरेकर के सहयक बन गए। इस तकलीफ को कलाकार ही बता सकता है कि दिल में एक्‍टर बनने के तमन्‍ना लिए शख्‍स को किसी और एक्‍टर के आगे-पीछे घूमना पड़ता है। मन मसोस कर विनीत ने यह सब किया। इस संघर्ष में उन्‍होंने अपने सपनों को कुचलने नहीं दिया। और एक दिन उन्‍होंने तय किया कि अब वे अभिनय करेंगे। आरंभ में छोटी-मोटी भूमिकाएं मिलीं। फिर एक दिन अनुराग कश्‍यप ने उन्‍हें ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ में दानिश खान की भूमिका दी। अनुराग के साथ ही उन्‍होंने ‘बांबे टाकीज’ की ‘मुरब्‍बा’ की। और फिर अनुराग की ही फिल्‍म ‘अग्‍ली’ के नायक बने। इन मौकों के बावजूद विनीत की छटपटाहट कम नहीं हो रही थी। उन्‍होंने तय किया कि अब वे खुद को नायक बना कर अपनी कहानी लिखेंगे। उन्‍होंने क‍हानी लिखी। वही कहानी विकसित और परिवर्द्धित रूप में ‘मुक्‍काबाज’ बनी।
विनीत कुमार सिंह ‘मुकाबाज’ की कहानी लेकर निर्देशकों के पास घूम रहे थे तो सिी ने घास नहीं डाली। उन्‍हें उनमें हीरो मैटेरियल नहीं दिख रहा था। वे उनकी कहानी तो पसंद कर रहे थे,लेकिन किरदार किसी और कलाकार को सौंप देना चाहते थे। विनीत ने साफ मना कर दिया। अनुराग कश्‍यप फिर से उनकी जिंदगी में आए। उन्‍होंने विनीत में विश्‍वास किया और भरोसा दिया कि मैं फिल्‍म बनाऊंगा। एक ही शर्त है कि फिल्‍म के नायक की तरह तुम बॉक्‍सर बन कर आ जाओ। विनीत ने अनुराग कश्‍यप की सलाह गांठ बांध ली। वे बॉक्‍सर की ट्रेनिंग लेने लगे। बॉक्सिंग में दक्ष होने के बाद वे लौटे। उसके बाद की बाकी चीजें अभी ‘मुक्‍काबाज’ के रूप में दिख रही हैं। यह फिल्‍म निर्देशक और अभिनेता के परस्‍पर विश्‍वास और भरोसे से बनी फिल्‍म है।आखिरकार एक प्रतिभा चमकी।

originaly published at

http://epaperlokmat.in/lokmatsamachar/main-editions/Nagpur%20Main%20/2018-01-16/11#Article/LOKSAM_NPLS_20180116_11_2/600px

Saturday, January 13, 2018

फिल्म समीक्षा : मुक्काबाज़



सामाजिक विसंगतियों पर जोरदार मुक्‍का
-अजय ब्रह्मात्‍मज
‘मुक्‍काबाज़’ रिलीज हो चुकी है। देखने वालों में से अधिकांश ने देख भी ली होगी। फिल्‍म पर आ रही समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं सकारात्‍मक हैं। फिल्‍म में वे बहुत कुछ पा रहे हैं। कुछ बातों से वे हैरान हैं। और कुछ बातों से परेशान भी हैं। हिंदी फिल्‍मों में धर्म,जाति,वर्ण व्‍यवस्‍था और भेदभाव की मानसिकता कहानी का हिस्‍सा बन कर कम ही आती है। एक दौर था,जब श्‍याम बेनेगल के नेतृत्‍व में तमाम फिल्‍मकार सामजिक विसंगतियों पर जरूरी फिल्‍में बना रहे थे। उसमें स्‍पष्‍ट प्रतिबद्धता दिखती थे। नारे और सामाजिक बदलाव की आकांक्षा की अनुगूंज सुनाई पड़ती थी। ऐसी कोशिशों में फिल्‍म की भारतीय मनोरंजक परंपरा और दर्शकों की आह्लादित संतुष्टि कहीं छूट जाती थी। कई बार लगता था कि सब कुछ किताबी हो रहा है। तब वक्‍त था। हम सिद्धातों से शरमाते नहीं थे। यह 21 वीं सदी है। पिछले तीन सालों से देश में दक्षिणपंथी सोच की सरकार है। उनके अघोषित मूक संरक्षण में अंधराष्‍ट्रवाद और भगवा सोच का जोर बढ़ा है। ऐसे परिदृश्‍य में मुखर ‘मुक्‍काबाज़’ का आना साहसी बात है। अनुराग कश्‍यप और आनंद एल राय दोनों की ही तारीफ होनी चाहिए कि उन्‍होंने ज्वलंत मुद्दों को नंगे हाथों से छूने की कोशिश की है।
बरेली से बनारस के बीच घूमती इस फिल्‍म की कहानी उत्‍तर प्रदेश से बाहर नहीं निकलती,लेकिन सामाजिक अंतर्विरोधों को दिखाने में यह पूरे हिंदी प्रदेश को समेंट लेती है। पिछले बीस से अधिक सालों में हिंदी प्रदेश में राजनीतिक कारणों से बदलते जातीय समीकरण से उभरे द्वेष और क्‍लेश को इस फिल्‍म के चरित्र अच्‍छी तरह जाहिर करते हैं। हिंदी प्रदेश में व्‍याप्‍त पूर्वाग्रहों और धारणाओं से संचालित ये चरित्र वर्तमान समाज के प्रतिनिधि हैं। देश में गौरक्षा के नाम पर चल रहे आतंक को संकेतों से टच करती यह फिल्‍म अपने समय की जोरदार बानगी है। देश के धुरंधर और कामयाब फिल्‍मकारों को सीखना चाहिए कि कैसे वे अपनी जमीन की कहानी कह सकते हैं। अनुराग कश्‍याप की युक्ति असरदार है। कुछ दृश्‍यों में दोहराव सा लगता है,लेकिन परिस्थिति से घबराया व्‍यक्त्‍िा यूं ही जुनूं में खुद को दोहराता है। उसे लगता है कि अनसुनी का ढोंग कर रहा समाज शायद दूसरी बार रो या चिल्‍ला कर कहने पर उसकी बात सुन ले। इस फिल्‍म को दोबारा-तिबारा देखने की जरूरत है। हर बार अर्थ की नई गांठें खुलेंगी। दरअसल,अनुराग एक साथ अनेक मुद्दों और बातों को फिल्‍मों में लाने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में बहुत कुछ आता,कुछ छूटता और कुछ फिसल जाता है।
अनुराग कश्‍यप की ऐसी फिल्‍मों में राजनीति का एहसास रहता है,लेकिन खुद को अराजनीतिक घोषित कर चुके अनुराग राजनीतिक रूप से स्‍पष्‍ट और सजग नहीं हैं। उनकी सोच आधुनिक और प्रगतिशील है,इसलिए वे हमेशा समाज और सत्‍ता के विरोध में खड़े दिखते हैं....अपनी फिल्‍मों और जीवन दोनों में। बतौर जागरूक फिल्‍मकार अनुराग का राजनीतिक पाठ गहरा और ठोस हो तो वे दुनिया के अग्रिम फिल्‍मकारों में शुमार होंगे। ‘मुक्‍काबाज़’ में वे उस दिशा में कदम बढ़ाते दिख रहे हैं। उन्‍होंने संजीदगी से दैनिक जीवन में आ चुके राजनीतिक व्‍यवहार को दर्शाया है। वे बगैर मुट्ठी ताने और दांत भींचे ही अपना गुस्‍सा चरित्रों के साथ उनके संवादों में व्‍यक्‍त करते हैं। उन्‍हें अपने अभिनेताओं और तकनीकी टीम से भरपूर मदद मिली है।
फिल्‍म के सभी किरदारों पर अलग से बात की जा सकती है। समय बीतने के साथ विश्‍लेषणात्‍मक लेख आएंगे। श्रवण सिंह,भगवान दास मिश्रा,संजय कुमार और सुनयना हमारे आसपास के चरित्र हैं। हिंदी प्रदेश के दर्शक/नागरिक स्‍वयं ये चरित्र हैं या ऐसे चरित्रों के साथ जीते हैं। श्रवण सिंह का विद्रोह सिर्फ बाहर के भगवान दास मिश्रा से नहीं है। घर में पिता से रोज की खटपट से भी वह छलनी होता है। न चाहते हुए भी पिता पर बिफरना और भगवान दास पर हाथ उठा देना उसके मर्माहत व्‍यक्तित्‍व की मनोदशा है। ब्राह्मण होने के दर्प में चूर भगवान दास को एहसास ही नहीं है कि वह अमानवीय हो चुका है। सत्‍ता और वर्चस्‍वधारी व्‍यक्तियों से उनकी समीपता उनके अहंकार को खौलाती र‍हती है। संजय कुमार की आंखें में स्‍थायी अवसाद है। विवश होने के बावजूद वह टूटे नहीं हैं। वे जिस तरह से तन कर चलते हैं और श्रावण को उम्‍मीद के साथ प्रशिक्षित करते हैं। वास्‍तव में यही उनका अहिंसक बदला है। सुनयना हिंदी समाज की वह मूक लड़की है,जो सब कुछ देखती और सुनती है,लेकिन कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं रखती। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि सभी कलाकारों ने अपने किरदारों में जान भर दी है। वे अनुराग कश्‍यप के अपेक्षित भावों को अपना स्‍वभाव बना लेते हैं। विनीत कुमार सिंह की मेहनत और निर्देशक पर उनके अटूट विश्‍वास पर तो पूरा अध्‍याय लिखा जो सकती है। जोया हुसैन भावप्रवण कलाकार हैं। उन्‍होंने किरदार की सीमाओं को निभाने में अभिनय की सीमा बढ़ा दी है। अनुभवी अभिनेता जिमी शेरगिल और रवि किशन ने अपनी कलाकारी से कथ्‍य को मजबूत किया है। फिल्म में चल रहे कार्य-व्यापार घर,परिवार और समाज की धड़कने सुनाई पड़ती हैं!
इस फिल्‍म के गीतों को पढ़ने की जरूरत है। फिल्‍म में सुनने पर गीत के शब्‍दों में निहित भाव कई बार ढंग से सुनाई नहीं पड़ते। हुसैन हैदरी और अन्‍य गीतकारों के गीत कथ्‍य को ही गाढ़ा करते हैं।
अवधि- 155 मिनट
चार स्‍टार ****




Friday, December 26, 2014

फिल्‍म समीक्षा : अग्‍ली

- अजय ब्रह्मात्‍मज 
अग्ली अग्ली है सब कुछ
अग्ली अग्ली हैं सपने
अग्ली अग्ली हैं अपने
अग्ली अग्ली हैं रिश्ते
अग्ली अग्ली हैं किस्तें
अग्ली अग्ली है दुनिया
अब तो बेबी सबके संग
हम खेल घिनौना खेलें
मौका मिले तो अपनों की
लाश का टेंडर ले लें
बेबी लाश का टेंडर ले लें
क्योंकि अग्ली अग्ली है सब कुछ।
    अनुराग कश्यप की फिल्म 'अग्ली' के इस शीर्षक गीत को चैतन्य की भूमिका निभा रहे एक्टर विनीत कुमार सिंह ने लिखा है। फिल्म निर्माण और अपने किरदार को जीने की प्रक्रिया में कई बार कलाकार फिल्म के सार से प्रभावित और डिस्टर्ब होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही भूमिका निभाने की उधेड़बुन को यों प्रकट कर पाते हैं। दरअसल, इस गीत के बोल में अनुराग कश्यप की फिल्म का सार है। फिल्म के थीम को गीतकार गौरव सोलंकी ने भी अपने गीतों में सटीक अभिव्यक्ति दी है। वे लिखते हैं, जिसकी चादर हम से छोटी, उसकी चादर छीन ली, जिस भी छत पर चढ़ गए हम, उसकी सीढ़ी तोड़ दी...या फिल्म के अंतिम भाव विह्वल दृश्य में बेटी के मासूम सवालों में उनके शब्द संगदिल दर्शकों के सीने में सूइयों की तरह चुभते हैं। इन दिनों बहुत कम फिल्मों में गीत-संगीत फिल्म के भाव को छू पाते हैं। 'अग्ली' की कुरूपता समझने के लिए इन गीतों को फिल्म देखने के पहले या बाद में सुन लें तो पूरा नजरिया और संदर्भ मिल जाएगा।
         अनुराग कश्यप की 'अग्ली' शहरी जीवन और समाज में रिश्तों में आए स्वार्थ, चिढ़, ईर्ष्या, छल, कपट, द्वेष, मान मर्दन, अपमान आदि स्याह भावनाओं को समेटती हुई ऐसी कली कथा का सृजन करती है, जिसे पर्दे पर घटते देख कर मन छलनी होता है। अनुराग की इस फिल्म में केवल कली ही निष्कपट चरित्र है। वह अपने पापा को प्यार करती है। उसे नहीं मालूम कि उसकी मां पापा से क्या अपेक्षा रखती है और क्यों दूसरे पापा के साथ रहने लगती है। वह तो पापा के साथ रहने की कोशिश में इस बेरहम समाज के लालच का शिकार होती है। कली की मां शालिनी, कली के पापा राहुल, कली के दूसरे पापा सौमिक, पापा के दोस्त चैतन्य, मामा सिद्धांत, मां की दोस्त राधा सभी किसी न किसी प्रपंच में लीन हैं। वे अपने स्वार्थ और लाभ के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। रात के पौने तीन बजे अंडरवियर में हजार-हजार के नोट खोंस कर हवा में हजारों के नोट उड़ाते और सोफे पर नोट बिछा कर लेटते कली के मामा को देख कर घिन आ सकती है, लेकिन यही मुंबई जैसे शहरों की घिनौनी काली सच्चाई है। कली के मां या दोनों पापा भी तो दूध के धुले नहीं हैं। ये आत्मकेंद्रित चरित्र खुद के बाएं-दाएं भी नहीं देख पाते। मौका मिलते ही सभी गिरह काटने में माहिर हैं। बतौर -लेखक निर्देशक अनुराग कश्यप की किसी किरदार से सहानुभूति नहीं है। वे निष्ठुर भाव से उन्हें ज्यों के त्यों पेश कर देते हैं। हमारी मुलाकात एक निर्दयी निर्देशक से होती है, जिसकी कटु कल्पना शहर के अंधेरे कोनों और इंसान के संकरे विवरों में प्रवेश करती है। वहां हर किरदार को अपनी कमजोरियों से लगाव है।
        निश्चित ही 'अग्ली' अनुराग कश्यप की अलहदा फिल्म है। यहां वे चित्रण, विवरण और प्रस्तुति में मुखर हैं। वे बेलाग तरीके से हमारे समय कसैले अनुभवों को स्थितियों और घटनाओं की तरह पेश करते हैं। कली का गायब होना ऐसा हादसा है, जिसके बाद रिश्तों की कलई उतरने लगती है। गौर करें तो कली के गायब होने का क्रूर रूपक सभी चरित्रों को एक-एक कर बेनकाब करता है। उनकी असली सीरत और सूरत कुरूप है। अनुराग ने किसी भी चरित्र को नहीं बख्शा है। यहां तक कि श्रीलाल और उसकी बुआ या इंस्पेक्टर जाधव भी नहीं बच पाते। ये सभी शहरी समाज के डिस्टर्ब चरित्र हैं। वे इरिटेट करते हैं। अनुराग ने अपनी फिल्म के लिए मुंबई का खास परिवेश चुना है। जीर्ण और जर्जर इमारतों का यह मध्यवर्गीय माहौल आम तौर हिंदी फिल्मों में नहीं दिखाई देता। उनके प्रोडक्शन डिजाइनर और कैमरामैन ने रंग और परिवेश से फिल्म के कथ्य को गढ़ा और प्रभावशाली बना दिया है।
        कलाकारों के चयन और और उनके अभिनय में अनुराग कश्यप ने हिंदी फिल्मों की परिपाटी का पालन नहीं किया है। यथार्थ की जमीन पर खड़े किरदारों का सभी कलाकारों ने मजबूती से पेश किया है। राहुल भट्ट, तेजस्विनी कोल्हापुरी और रोनित रॉय ने प्रमुख किरदारों के तनाव और उलझन को समुचित मात्रा में आत्मसात और प्रस्तुत किया है। छोटी भूमिका में सिद्धांत कपूर ध्यान खींचते हैं। इस फिल्म की उपलब्धि हैं विनीत कुमार सिंह और गिरीश कुलकर्णी। अपने किरदार से विनीत का एकात्मता का नतीजा है फिल्म का टाइटल गीत। गिरीश कुलकर्णी अपनी निर्दोष सादगी से इंस्पेकटर जाधव को असली रंग देते हैं।
अवधि-127 मिनट
**** चार स्‍टार