Search This Blog

Showing posts with label विद्या बालन. Show all posts
Showing posts with label विद्या बालन. Show all posts

Friday, April 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बेगम जान



फिल्‍म रिव्‍यू
बेगम जान
अहम मुद्दे पर बहकी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिलली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति...फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा। यही होता भी है।
बाल विधवा हुई बेगम जान पहले रंडी बनती है और फिर तवायफ और अंत में पंजाब के एक राजा साहब की शह और सहाता से कोठा खड़ी करती है,जहां देश भर से आई लड़कियों को शरण मिलती है। दो बस्तियों के बीच बसा यह कोठा हमेशा गुलजार रहता है। इस कोठे में बेगम जान की हुकूमत चलती है। दुनिया से बिफरी बेगम जान हमेशा नाराज सी दिखती हैं। उनकी बातचीत में हमेशा सीख और सलाह रहती है। जीवन के कड़े व कड़वे अनुभवों का सार शब्‍दों और संवादों में जाहिर होता रहता है। कोइे की लड़कियों की भलाई और सुरक्षा के लिए परेशान बेगम जान सख्‍त और अनुशासित मुखिया है।
आजादी मिलने के साथ सर सिरिल रेडक्लिफ की जल्‍दबाजी में खींची लकीर से पूर्व और पश्चिम में देश की विभाजन रेखा खिंच जाती है। नक्‍शे पर रेखा खींचते समय रेडक्लिफ का एहसास भी नहीं रहता कि वे अहम मुद्ददे पर कैसी अहमक भूल कर रहे हैं। उन्‍होंने तो रेखा खींच दी और चुपके से ब्रिटेन लौट गए,लेकिन पंाब और बंगाल में विभाजन की विभीषिका में लाखें बेघर हुए और लाखों को जान-माल की हानि हुई। इसी में बेगम जान का कोठा भी तबाह हुआ और कोठे की लड़कियों को आधुनिक पद्मसवती बनी बेगम जान के साथ जौहर करना पड़ा।
लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया,लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए। उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं,लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।
बेगम जान का किरदार एकआयामी और बड़बोला है। वह निजी आवेश में स्थितियों से टकरा जाती है। उसे राज साहब से भी मदद नहीं मिल पाती। लोकतंत्र आने के बाद राजा साहब की रियासत और सियासत में दखल पहले जैसी नहीं रह गई है। रेडक्लिफ लाइन को बेगम जान के इलाके में लागू करवाने के लिए तैनात श्रीवास्‍तव और इलियास कंफ्यूज और भवुक इंसान हैं,लेकिन वे बेरहमी से काम लेते हैं। बाद में उनका पछतावा पलले नहीं पड़ता। इतने ही संवेदनशील थे तो उन्‍हें कबीर की मदद लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? और कबीर का किरदार...माफ करें भट्ट साहब और श्रीजित कबीर समन्‍य और समरसता के प्रतीक हैं। उनके नाम के किरदार से ऐसी अश्‍लील और जलील हरकत क्‍यों? इसे सिनैमैटिक लिबर्टी नहीं कहा जा सकता।
बहरहाल, विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है,लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं,लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों(दर्जन भर)े ने बेहतर काम किया है। मास्‍टरजी और सुजीत बने अभिनेताओं विवेक मुश्रान और पितोबोस का काम यादगार है।
फिल्‍म में चित्रित होली रंगीन और आह्लादपूर्ण हैं। रंगों की ऐसी छटा इन दिनों विरले ही दिखती है। फिल्‍म भावुकता और संवादों से ओतप्रोत है,जो संयुक्‍त रूप आलोडि़त तो करती है,लेकिन कहीं पहुंचाती नहीं है।
अवधि- 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Sunday, April 9, 2017

अलहदा है बेगम का फलसफा’ : महेश भट्ट




 -अजय ब्रह्मात्‍मज
श्रीजित मुखर्जी का जिक्र मेरे एक रायटर ने मुझ से किया था। उन्‍होंने कहा कि वे भी उस मिजाज की फिल्‍में बनाते रहे हैं, जैसी ‘अर्थ’, ‘सारांश ‘जख्‍म’ थीं। उनके कहने पर मैंने ‘राजकहानी’ देखी। उस फिल्‍म ने मुझे झिझोंर दिया। मैंने सब को गले लगा लिया। मैंने मुकेश(भट्टसे कहा कि ‘राज   राज रीबूट’ हमने बहुत कर लिया। अब ‘राजकहानी’ जैसी कोई फिल्‍म करनी चाहिए। मुकेश को भी फिल्‍म अच्छी लगी। श्रीजित ने अपनी कहानी भारत व पूर्वी पाकिस्‍तान में रखी थी। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। यह प्लॉट ही अपने आप में बड़ा प्रभावी लगा। हमें लगा कि इसे पश्विमी भारत में शिफ्ट किया जाए तो एक अलग मजा होगा। हमने श्रीजित को बुलाया। फिर उन्होंने 32 दिनों में दिल और जान डालकर ऐसी फिल्‍म बनाई की क्या कहें।
   मेरा यह मानना है कि हर सफर आप को आखिरकार अपनी जड़ों की ओर ले जाता है। बीच में जरूर हम ऐसी फिल्‍मों की तरफ मुड़े़, जिनसे पैसे बनने थे। पैसा चाहिए भी। फिर भी लगातार फिल्‍म बनाने के लिए, पर रूह को छूने वाली आवाजें सुनाने  वाली कहानियां भी जरूरी हैं। यह जज्‍बा इस फिल्‍म में देखने को मिलने वाला है। कहानी जिस समय में सेट है उस वक्त की दुनिया दिखाने के लिए हम झारखंड के बीहड़ इलाके में गए और शूट किया। मुझे यकीन है कि लोग ‘बेगम जान’ की आत्‍मा और सादगी से यकीनन जुड़ेंगे।
   जो रवायत ‘सारांश’, ‘अर्थ’  ‘जख्‍म’ की है, यह उसी का विस्‍तार है। पिछले एक-डेढ दशक में हमने सफलता तो बड़ी अर्जित कर ली थी, पर हर तरफ से उसी किस्‍म की फिल्‍में बनाने की फरमाइशें आती थीं।राजकहानी’ में हमें हमारी तलाश खत्‍म होती दिखी। मौजूदा पीढी भी बड़ी भावुक है। ऊर्जावान तो वे हैं हीं, जो उनकी अपनी है। लिहाजा वे किसी चीज की जो व्‍याख्‍या करते हैं, वह अलहदा निकल कर आती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ‘बेगम जान’ से एक नई दास्तान शुरू होगी।
इत्‍तफाकन सेंसर बोर्ड भी इससे प्रभावित हुआ। वरना ‘उड़ता पंजाब’ व अन्य हार्ड हिटिंग फिल्‍मों पर उनका रवैया देख तो हम चिं‍तित थे कि कहीं इस फिल्‍म को भी अतिरिक्‍त कतरब्‍योंत न झेलनी पड़े। लिहाजा हमने ‘ सर्टिफिकेट के लिए ही अप्‍लाई किया था, पर जब उन्होंने वह फिल्‍म देखी और जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह देख हमें बड़ा ताज्‍जुब हुआ। वे भावुक हो गए। बड़े हिचकते हुए कहा कि गालियों को जरा तब्‍दील कर लिया जाए बस। इस तरह देखा जाए तो ‘बेगम जान’ ने सेंसर बोर्ड के साथ कमाल का अनुभव हमें दिया। खुद पहलाज निहलानी ने हमें फोन कर कहा कि बोर्ड वाले इस फिल्‍म की बड़ी तारीफें कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमने जिन सिद्धांतों के मद्देनजर यह फिल्‍म बनाई, वे मजबूत थे। नतीजतन, इसे सेंसर की मार नहीं झेलनी पड़ी।
जैसे ‘बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया। मनोरंजक होते हुए भी उसने बात तो कह दी न। वह देख,जब आप सिनेमाघरों से निकलते हैं तो लगता है कि हमारी बच्चियों के साथ जुल्‍म हो गया है। औरतों की आजादी की इज्‍जत की ही जानी चाहिए। यह बहुत अहम मैसेज है, पर एंटरटेनिंग तरीके से है। मतलब साफ है। आप इस दौर में इमेजेज दिखा कर घर-दुकान नहीं चला सकते। अब सेक्‍स वगैरह नहीं चलेगा। संचार के बाकी माध्‍यमों ने उसकी जरूरत पूरी कर दी है। सेक्‍स कहानी का हिस्‍सा हो तो बात बनेगी। मसलन, ‘जिस्‍म2। उसमें सेक्‍स  कहानी का हिस्‍सा था। उसे इरादतन नहीं परोसा गया था। हम दर्शकों को उल्‍लू नहीं बना सकते।
पार्टिशन को लेकर ढेर सारी कहानियां हैं, जिन्‍हें हम जीना नहीं चाहते। गिन कर पांच फिल्‍में बनी हैं उस मसले पर। हालांकि हमारी फिल्‍म शुरू होती है आज के कनॉट प्लेस से। उसके बाद हम हिंदुस्तान के बंटवारे की ओर जाते हैं। रेडक्लिफ लाइन पर जाते हैं। औरतों के सिद्धांत व उनके हक की बातें करते हैं। तो हम विशुद्ध पार्टिशन की बात नहीं करते हैं। हम औरतों के अधिकार की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। यह बदकिस्‍मती है हमारी कि औरतें तब भी गुलाम थीं, अब भी उन्हें पूरी आजादी नहीं दी गई है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि वे अपनी जिस्‍म की भी मालकिन नहीं।
फिल्‍म में ढेर सारी अभिनेत्रियां हैं। बेगम जान के लिए विद्या ही हमारी पहली च्‍वॉइस थीं। गौहर खान व इला अरूण भी हैं। इला के साथ काम कर बड़ा मजा आया। बेगम जान का फलसफा अलग है। इक मर्द उसकी मंजिल नहीं है। वह न हो तो भी वह खुद को अधूरी नहीं मानेगी। वह वेश्‍या है, मगर छाती नहीं पीटती कि उसके साथ अत्‍याचार हुआ है। वह कोठे को काम की तरह लेती है।
अमिताभ बच्चन का वॉयस ओवर इसलिए इस्तेमाल हुआ कि हम ऐसी आवाज चाहते थे, जिन्‍हें लोग सुनें। लोग इमोशन की गहराई में उतर सकें। हमने उनसे गुजारिश की तो उन्होंने बड़े विनीत भाव से उस ख्‍वाहिश को स्‍वीकारा। हालांकि उनके संग मेरा अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है। अमर सिंह के चलते हमारे रिश्‍ते में खटास आई थी। शाह रुख मामले में हमने एक स्‍टैंड लिया था! तब अमर सिंह के चलते हम दोनों के बीच जरा सी कड़वाहट थी, मगर मुकेश साथ उनके संबंध अच्छे रहे हैं। बच्चन जी खुद भी आलिया की बड़ी तारीफ करते रहते हैं। तो हम कब तलक मन में दूरियां पाले रखते।

विद्या से मिलता है बेगम का मिजाज - विद्या बालन

बेगम जान के निर्देशक श्रीजित मुखर्जी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

2010 से फिल्‍म मेकिंग में सक्रिय श्रीजित मुखर्जी ने अभी तक आठ फिल्‍में बांग्‍ला में निर्देशित की हैं। हिंदी में बेगम जान उनकी पहली फिल्‍म है। जेएनयू से अर्थशास्‍त्र की पढ़ाई कर चुके श्रीजित कहानी कहने की आदत में पहले थिएटर से जुड़े। हबीब तनवीर की भी संगत की और बाद में फिल्‍मों में आ गए। बांग्‍ला में बनी उनकी फिल्‍मों को अनेक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुके हैं। महेश भट्ट से हुई एक चांस मुलाकात ने हिंदी फिल्‍मों का दरवाजा खोल दिया। वे अपनी आखिरी बांग्‍ला फिल्‍म राजकाहिनी को हिंदी में बेगम जान नाम से ला रहे हैं। फिल्‍म की मुख्‍य भूमिका में विद्या बालन है। मूल फिल्‍म भारत-बांग्‍लादेश(पूर्वी पाकिस्‍तान) बोर्डर की थी। अग यह भारत-पाकिस्‍तान बोर्डर पर चली आई है।
पढ़ाई के बाद नौकरी तो मिडिल क्‍लास के हर लड़के की पहली मंजिल होती है। श्रीजित को बंगलोर में नौकरी मिल गई,लेकिन कहानी कहने की आदत और थिएटर की चाहत से वे महेश दत्‍तनी और अरूंधती नाग के संपर्क में आए। फिर फिल्‍मों में हाथ आजमाने के लिए मन कुलबुलाने लगा। श्रीजित ने सुरक्षा की परवाह नहीं की। उन्‍होंने तत्‍काल नौकरी छोड़ दी। तब तक निजी जिंदगी में शादी और तलाक से वे गुजर चुके थे। घर में अकेली मां थीं। अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी जैसा बोझ नहीं था। पहली फिल्‍म ऑटोग्राफ सफल रही। सफलता के साथ पुरस्‍कार भी मिले और  आगे की राह सुगम हो गई।
बेगम जान की पूष्‍ठभूमि पार्टीशन की है। मूल बांग्‍ला फिल्‍म को हिंदी में लाने के समय लोकेशन बदलना अनिवार्य लगा। पार्टीशन की देशव्‍यापी इमेजेज पंजाब से जुड़ी हैं। निर्देशक और निर्माता ने पूरी कहानी पाकिस्‍तान के बोर्डर पर शिफ्ट कर दी। बेगम जान के कोठे को देश के मेटाफर के रूप में देखें,जहां देश के सभी हिस्‍सों से आई लड़कियां काम करती हैं। उन्‍हें ऐसे संवाद दिए गए जसमें हिंदी के साथ उनके इलाके का टच हो। जया चटर्जी और उर्वशी बुटालिया की पार्टीशन से संबंधित किताब से फिल्‍म का आयडिया आया। रेडक्लिफ ने देश की आजादी के समय ब्रिटिश राज के आदेश से भारत के नक्‍शे पर एक लकीर खींच दी थी। उसमें कितने घर-परिवार और गांव बंट गए। उन्‍हें चार हफ्ते में अपना काम करना था। वहीं से मुझे लगा कि इस पर फिल्‍म बन सकती है। उसके बाद मंटो के अफसानों ने मेरे इरादे को पक्‍का कर दिया।
श्रीजित मानते हैं कि विद्या बालन ट्रेंड सेटर हैं। मेरी बेगम उनके मिजाज के करीब है,जिसके अंदर दबा हुआ गुससा है और जो अपने स्‍पेय में किसी को आने नहीं देती। मैं मानता हूं कि हिंदी फिल्‍मों में माधुरी दीक्षित के बाद विद्या ही दमदार अभिनेत्री हैं। मुझे तो यह भी लगता है कि अगर स्क्रिप्‍ट आपकी फिल्‍म का हीरो है तो उसकी हीरोइन विद्या ही हो सकती है। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों से इसे साबित किया है।
बेगम जान से यह फर्क आया है कि श्रीजित ने मुबई में ठिकाना बना लिया है। वे अब हिंदी फिल्‍में करना चाहते हैं। साथ ही मन है कि साल में एक बांग्‍ला फिल्‍म भी बनाते रहें। बांग्‍ला फिल्‍मों के लिए कोलकाता आन-जाना लगा रहेगा। मुंबई प्रोफेशनल शहर है। काम का माहौल रहता है। यहां बड़े बजट की फिल्‍में आसानी से बनाई जा सकती हैं। उनकी अगली फिल्‍म बांग्‍ला में ही है,जिसकी शूटिंग स्विटजरलैंड में होगी।
श्रीजित स्‍वीकार करते हैं कि अभी के बांग्‍ला फिल्‍ममेकर अर्बन हो चुके हैं। उनकी कहानियों में बंगाल की खुश्‍बू नहीं रहती। यही दशा दूसरे प्रदेशों से आए फिल्‍मकारों की भी है। एक सीमा के बाद हम सभी की प्रस्‍तुति समान हो गई है। अच्‍छा होगा कि फिल्‍ममेकर अपने इलाके को लेकर चलें और पूरे भारत के लिए कहानी कहें। अब तो विदेशी भी हमारे दर्शक हैं। हमें फिल्‍म की भाषा पर बहुत काम करना है।

Tuesday, April 4, 2017

राजा है बेगम का गुलाम - विद्या बालन




-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍मों के फैसले हवा में भी होते हैं।हमारी अधूरी कहानी के प्रोमोशन से महेश भट्ट और विद्या बालन लखनऊ से मुंबई लौट रहे थे। 30000 फीट से अधिक ऊंचाई पर जहाज में बैठे व्‍यक्ति सहज ही दार्शनिक हो जाते हैं। साथ में महेश भट्ट हों तो बातों का आयाम प्रश्‍नों और गुत्थियों को सुलझाने में बीतता है।  जिज्ञासु प्रवृति के महेश भट्ट ने विद्या बालन से पूछा,क्‍या ऐसी कोई कहानी या रोल है,जो अभी तक तुम ने निभाया नहीं ?’ विद्या ने कहा,मैं ऐसा कोई रोल करना चाहती हूं,जहां मैं अपने गुस्‍से को आवाज दे सकूं।भट्ट साहब चौंके,तुम्‍हें गुस्‍सा भी आता है?’ विद्या ने गंभरता से जवाब दिया, हां आता है। ऐसी ढेर सारी चीजें हैं। खुद के लिए। दूसरों के लिए भी महसूस करती हूं। फिर क्या था, तीन-चार महीने बाद वे यह कहानी लेकर आ गए।
बेगम जान स्‍वीकार करने की वजह थी। अक्सर ऐसा होता है कि शक्तिशाली व सफल होने की सूरत में औरतों में हिचक आ जाती है। वे जमाने के सामने जाहिर करने से बचती हैं कि खासी रसूखदार हैं। इसलिए कि कहीं लोग आहत न हो जाएं। सामने वाला खुद को छोटा न महसूस करने लगे। हम औरतों को सदा यह समझाया गया है कि आदमी एक पायदान ऊपर रहेगा, जबकि औरत उसके नीचे। वैसे तो मेरी परवरिश इस किस्म के माहौल में नहीं हुई है, पर मुझे भी अपने आस-पास ऐसा कुछ महसूस हुआ है। औरत के लिए बॉस होना जरा झिझक से लैस होता है। मर्द वह चीज आसानी से कर लेते हैं। बेगम जान ऐसी नहीं है। वह बड़ी पॉवरफुल है। वह जब चाहे किसी को रिझा सकती है, जब चाहे गला दबोच ले। वह फिक्र और डर से परे है। उसकी यह चीज मुझे अच्छी लगी और मैंने हां कहा।
वैसे तो यह विभाजन काल की कहानी है। बेगम जान की परवरिश लखनऊ की है, पर उसका कोठा पंजाब के शक्‍करगढ और दोरंगा इलाके के बीच है। रेडक्लिफ लाइन के बीच में पड़ता है। बेगम जान को वह छोड़कर जाने को कहा जाता है, पर वह फाइट बैक करती है। यह आज के दौर में भी सेट हो सकती थी। आज भी लोग अपनी जर-जमीन के लिए लड़ते हैं। मिसाल के तौर पर मुंबई की कैंपा कोला सोसायटी के लोग। बहरहाल, यह बहुत स्ट्रॉन्‍ग कैरेक्‍टर है। यह पीरियड फिल्‍म है, पर टिपिकल सी नहीं। कॉस्‍ट्यूम व परिवेश को छोड़ बाकी सब आज सा ही है। हालांकि अब तो कोठों-वोठों का कॉन्‍सेप्ट रहा नहीं।
उस जमाने में कोठे का कॉन्‍सेप्ट था। संभ्रांत घर के लड़के शादी से पहले वहां जाते थे। पत्‍नी के साथ कैसे पेश आना है, वह सिखाया जाता था। पिछली सदी के पांचवें छठे दशक तक तो कई अभिनेत्रियां भी वहीं से ग्‍लैमर जगत में आई थीं। बहरहाल, मुझे यह किरदार करते हुए बड़ा मजा आया। किरदार की तरह डायलॉग्‍स भी बड़े पॉवरफुल हैं। जैसे, हमें किसी का हाथ यहां से हटाए, उससे पहले उसके शरीर का पार्टिशन कर देंगे। महीना गिनना हमें आता है साहब, साला हर बार लाल करके जाता है। गालियां तो तब भी बकते थे। साथ ही वह शिकायती स्‍वभाव की नहीं है। वह अपनी सभी सदस्या से भी यही कहती है कि हम शौक  से इस पेशे में नहीं आए हैं, पर आ गए हैं तो रो-धो कर नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से काम करना है। उसकी पहुंच राजा तक है। सिल्‍क स्मिता में बेबाकपन था, पर बेगम जान में रसूख का एहसास।
मैंने बहुत साल पहले तकरीबन इसी मिजाज की मंडी देखी थी। कॉलेज के दिनों में। शबाना आजमी ने उसमें कमाल का काम किया था। मैंने इरादतन बेगम जान साइन करने के बाद उसे नहीं देखी। वह इसलिए कि मैं उनकी बहुत बड़ी फैन हूं। फिर से मंडी देखती तो शायद उनसे प्रभावित हो जाती। फिर बेगम जान में मेरे अपने रंग शायद नहीं रह पाते। साथ ही यह शबाना जी के रोल से बिल्‍कुल इतर है। यह अपनी शर्तों पर काम करती है। शबाना जी का किरदार हंस-बोल कर काम निकालता था। यहां बेगम जान इलाके के राजा तक को अपनी शर्तों पर नचाती है।
राजा के रोल में नसीरुद्दीन शाह हैं। उनके साथ यह तीसरी फिल्‍म है। राजा के रोल में उनका स्‍त्री चरित्र भी सामने उभर कर आया है। एक सीन है फिल्‍म में, जहां वे नजरें नीचीं कर बातें करते हैं। वह कमाल का बन पड़ा है। उनके साथ-साथ फिल्‍म में इला अरुण हैं। सेट पर वे हंसती-नाचती नजर आती थीं, पर कैमरा ऑन होते ही वे झट अपने किरदार में आ जाती थीं। उन्होंने अपने थिएटर का पूरा अनुभव इस्तेमाल किया है। गौहर खान का काम मुझे इश्‍कजादे में अच्छा लगा था। वह देख मैंने श्रीजित को उनके नाम की सिफारिश की थी। संयोग से उस रोल के लिए श्रीजित की भी पसंद गौहर ही थीं। तो हमने उन्हें टेक्‍सट किया। वे उस वक्‍त मक्का गई हुई थीं। जवाब दिया कि वहां से आते ही वे श्रीजित से मिलेंगी। इस तरह वे बोर्ड पर आईं।
पल्‍लवी शारदा, मिष्‍टी व फ्लोरा सैनी भी साथ में हैं। श्रीजित ने उन सबकी एक महीने के लिए अलग वर्कशॉप रखी। मेरे साथ नहीं। वे उन सब की मुझ से एक दूरी बनाकर रखना चाहते थे ताकि बेगम जान की अथॉरिटी को वे महसूस कर सकें। इसकी शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई। बड़ी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में। हमारे जाने से पहले वहां सेट टूट गया था। हम कोलकाता में शांतिनिकेतन में रूके थे। वहां से सेट पर जाने में सवा से डेढ घंटे लगते थे। शूटिंग मई की चिलचिलाती धूप में हुई थी तो हर रोज किसी न किसी को डिहाईड्रेशन होती ही थी। पांव चोटिल होता ही था।
   

Friday, December 2, 2016

फिल्‍म समीक्षा : कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह



फिल्‍म रिव्‍यू
फिसला है रोमांच
कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सुजॉय घोष
चार सालों से ज्‍यादा समय बीत गया। मार्च 2012 में सीमित बजट में सुजॉय घोष ने कहानी निर्देशित की थी। पति की तलाश में कोलकाता में भटकती गर्भवती महिला की रोमांचक कहानी ने दर्शकों को रोमांचित किया था। अभी दिसंबर में सुजॉय घोष की कहानी 2 आई है। इस फिल्‍म का पूरा शीर्षक कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह है। पिछली फिल्‍म की कहानी से इस फिल्‍म को कोई संबंध नहीं है। निर्माता और निर्देशक ने पिछली कहानी की कामयाबी का वर्क कहानी 2 पर डाल दिया है। यह वर्क कोलकाता,सुजॉय घोष और विद्या बालन के रूप में नई फिल्‍म से चिपका है। अगर आप पुरानी फिल्‍म के रोमांच की उम्‍मीद के साथ कहानी 2 देखने की योजना बना रहे हैं तो यह जान लें कि यह अलहदा फिल्‍म है। इसमें भी रोमांच,रहस्‍य और विद्या हैं,लेकिन इस फिल्‍म की कहानी बिल्‍कुल अलग है। यह दुर्गा रानी सिंह की कहानी है।
दुर्गा रानी सिंह का व्‍याकुल अतीत है। बचपन में किसी रिश्‍तेदार ने उसे यहां-वहां छुआ था। उस दर्दनाक अनुभव से वह अभी तक नहीं उबर सकी है,इसलिए उसका रोमांटिक जीवन परेशान हाल है। अचानक छूने भर से वह चौंक जाती है। उसे अपने स्‍कूल में मिनी दिखती है। मिनी के असामान्‍य व्‍यवहार से दुर्गा रानी सिंह को शक-ओ-सुबहा होता है। वह मिनी के करीब आती है। घृणीत भयावह सच जानने के बाद वह मिनी को उसके चाचा और दादी के चुगल से आजाद करना चाहती है। मिनी और दुर्गा की बातचीत और बैठकों से घर की चहारदीवारी में परिवार के अंदर चल रहे बाल यौन शोषण(चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज) की जानकारी मिलती है।
सुजॉय घोष ने अपने लेखकों के साथ मिल कर समाज के एक बड़े मुद्दे को रोमांचक कहानी का हिस्‍सा बना कर चुस्‍त तरीके से पेश किया है। फिल्‍म तेज गति से आगे बढ़ती है। मिनी और दुर्गा के साथ हमारा जुड़ाव हो जाता है। दोनों का समान दर्द सहानुभूति पैदा करता है। भोले चाचा और शालीन दादी से हमें घृणा होती है। लेखक-निर्देशक ने कलिम्‍पोंग की पूष्‍ठभूमि में यहां तक की कहानी से बांधे रखा है। इंटरवल के बाद कहानी फिसलती है और फिर अनुमानित प्रसंगों और नतीजों की ओर मुड़ जाती है। रोमांच कम होता है,क्‍योंकि यह अंदाजा लग जाता है कि फिल्‍म हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित राजमार्ग पर ही आएगी। इंटरवल के
एक ही औरत की दोहरी भूमिका में विद्या बालन फिर से साबित करती हैं कि वे ऐसी कहानियों और फिल्‍मों के लिए उचित अभिनेत्री हैं। दुर्गा रानी सिंह और विद्या सिन्‍हा के रूप में एक ही औरत के दो व्‍यक्तित्‍वों को उन्‍होने बखूबी समझा और प्रभावशाली तरीके से जीवंत किया है। दोनों की चिंता के केंद्र में मिनी है,लेकिन समय के साथ बदलते दायित्‍व का विद्या बालन अच्‍छी तरह निभाया है। विद्या बालन समर्थ अभिनेत्री हैं। वह चालू किस्‍म की भूमिकाओं में बेअसर रहती हैं,लेकिन लीक से अलग स्‍वतंत्र किरदार निभाने में वह माहिर हैं। कहानी 2 ताजा सबूत है। कामकाजी महिला के मोंटाज में विद्या बालन जंचती हैं। इस बार अर्जुन रामपाल भी किरदार में दिखे। उन्‍होंने इंद्रजीत के रूप में आ‍कर्षित किया। अन्‍य सहयोगी किरदारों में आए स्‍थानीय कलाकारों का योगदान उल्‍लेखनीय है। जुगल हंसराज की स्‍वाभाविकता फिल्‍मी खलनायक बनते ही खत्‍म हो जाती है। लेखक-निर्देशक उनके चरित्र के निर्वाह में चूक गए हैं।   
सुजॉय घोष की फिल्‍मों में कोलकाता सशक्‍त किरदार के रूप में रहता है। इस फिल्‍म में वे कोलकाता की कुछ नई गलियों और स्‍थानों में ले जाते हैं। कहानी 2 में कोलकाता,चंदनपुर और कलिम्‍पोंग का परिवेश कहानी को ठोस आधार देता है। हालांकि मुख्‍य किरदार हिंदी ही बोलते हैं,लेकिन माहौल पूरी तरह से बंगाली रहता है। सहयोगी किरदारों और कानों में आती आवाजों और कोलाहल में स्‍थानीय पुट रहता है। किरदारों के बात-वयवहार में भी बंगाल की छटा रहती है।
फिल्‍म की थीम के मुताबिक सुजॉय घोष ने फिल्‍म का रंग उदास और सलेटी रखा है।
अवधि 130 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, June 10, 2016

फिल्‍म समीक्षा : तीन




है नयापन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
हक है मेरा
अंबर पे
लेके रहूंगा
हक मेरा
लेके रहूंगा
हक मेरा
तू देख लेना
फिल्‍म के भाव और विश्‍वास को सार्थक शब्दों में व्‍यक्‍त करती इन पंक्तियों में हम जॉन विश्‍वास के इरादों को समझ पाते हैं। रिभु दासगुप्‍ता की तीन कोरियाई फिल्‍म मोंटाज में थोड़ी फेरबदल के साथ की गई हिंदी प्रस्‍तुति है। मूल फिल्‍म में अपहृत लड़की की मां ही प्रमुख पात्र है। तीन में अमिताभ बच्‍च्‍न की उपलब्‍धता की वजह से प्रमुख किरदार दादा हो गए हैं। कहानी रोचक हो गई है। बंगाली बुजुर्ग की सक्रियता हंसी और सहानुभूति एक साथ पैदा करती है। निर्माता सुजॉय घोष ने रिभु दासगुप्‍ता को लीक से अलग चलने और लिखने की हिम्‍मत और सहमति दी।
तीन नई तरह की फिल्‍म है। रोचक प्रयोग है। यह हिंदी फिल्‍मों की बंधी-बंधायी परिपाटी का पालन नहीं करती। कहानी और किरदारों में नयापन है। उनके रवैए और इरादों में पैनापन है। यह बदले की कहानी नहीं है। यह इंसाफ की लड़ाई है। भारतीय समाज और हिंदी फिल्‍मों में इंसाफ का मतलब आंख के बदले आंख निकालना रहा है। दर्शकों को इसमें मजा आता है। हिंदी फिल्‍मों का हीरो जब विलेन को पीटता और मारता है तो दर्शक तालियां बजाते हैं और संतुष्‍ट होकर सिनेमाघरों से निकलते हैं। तीन के नायक जॉन विश्‍वास का सारा संघर्ष जिस इंसाफ के लिए है,उसमें बदले की भावना नहीं है। अपराध की स्‍वीकारोक्ति ही जॉन विश्‍वास के लिए काफी है। रिभु दासगुप्‍ता फिल्‍म के इस निष्‍कर्ष को किसी उद्घोष की तरह नहीं पेश करते।
इंटरवल के पहले फिल्‍म की गति कोलकाता श‍हर की तरह धीमी और फुर्सत में हैं। रिभु ने थाने की शिथिल दिनचर्या से लेकर जॉन विश्‍वास के रुटीन तक में शहर की धीमी रफ्तार को बरकरार रख है। जॉन विश्‍वास झक्‍की,सनकी और जिद्दी बुजुर्ग के रूप में उभरते हैं। उनसे कोई भी खुश नजर नहीं आता। आरंभिक दृश्‍यों में स्‍पष्‍ट हो जाता है कि सभी जॉन की धुन से कतरा रहे हैं। उन्‍हें लगता है कि आठ सालों से सच जानने के लिए संघर्षरत जॉन के लिए उनके पास सटीक जवाब नहीं है। पुलिस अधिकारी से पादरी बना मार्टिन भी जॉन से बचने से अधिक छिपने की कोशिश में रहता है। अपराध बोध से ग्रस्‍त मार्टिन की जिंदगी की अपनी मुश्किलें हैं,जिन्‍हें वह अध्‍यात्‍म के आवरण में ढक कर रखता है। वह जॉन और उसकी बीवी से सहानुभूति रखता है। फिल्‍म में सरिता सरकार वर्तमान पुलिस अधिकारी है। वह भी जॉन की मदद करना चाहती है,लेकिन उसे भी कोई सुराग नहीं मिलता।
आठ सालों के बाद घटनाएं दोहराई जाने लगती हैं तो सरिता और मार्टिन का उत्‍साह बढ़ता है। वे अपने-अपने तरीके से अपहरण के नए रहस्‍य को सुलझाते हुए पुराने अपहरण की घटनाओं और आवाज के करीब पहुंचते हैं। फिल्‍म का रहस्‍य हालांकि धीरे से खुलता है,लेकिन वह दर्शकों का चौंका नहीं पाता। प्रस्‍तुति के नएपन से रोमांच झन्‍नाटेदार नहीं लगता। आम तौर पर थ्रिलर फिल्‍मों में दर्शक किरदारों के साथ रहस्‍य सुलझाने में शामिल हो जाते हैं। उन्‍हें तब अच्‍छा लगता है,जब उनकी कल्‍पना और सोच लेखक-निर्देशक और किरदारों की तहकीकात से मेल खाने लगती है। तीन पुरानी फिल्‍मों के इस ढर्रे पर नहीं चलती।
रिभु दासगुप्‍ता ने कोलकाता शहर को किरदार के तौर पर पेश किया है। हुगली,हावड़ा ब्रिज,नीमतल्‍ला घाट,इमामबाड़ा आदि प्रचलित वास्‍तु चिह्नों के साथ शहर की उन गलियों में हम जॉन के साथ जाते हैं,जो आधुनिक और परिचित कोलकाता से अलग है। पुरानी बंद मिलें,दीवारों पर उग आए पेड़,शहर की धीमी रफ्तार और जॉन का स्‍कूटर हमें कोलकाता के करीब ले आता है। फिल्‍म की शुरूआत में मच्‍छी बाजार में जॉन का मोल-मोलाई करने और मछली बेचने वाले के जवाब में शहर की रोजमर्रा जिंदगी में राजनीति के प्रभाव को भी इशारे से बता दिया गया है। एक-दो अड्डेबाजी के दृश्‍य भी होने चाहिए थे।
तीन में अमिताभ बच्‍चन को मौका मिला है कि वे अपनी स्‍थायी और प्रचलित छवि से बाहर निकल सकें। उनकी चाल-ढाल,वेशभूषा और बोली में 70 साल के बुजुर्ग का ठहराव और बेचैनी है। लंबे समय से हम उन्‍हें खास दाढ़ी में देखते रहे हैं। इस बार उनके गालों की झुर्रियां और ठुड्ढी भी दिखाई दी है। यह मामूली फर्क नहीं है। अच्‍छी बात है कि स्‍वयं अमिताभ बच्‍चन इस लुक के लिए राजी हुए,जो उनकी ब्रांडिंग के मेल में नहीं है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के रूप में हिंदी फिल्‍मों को एक उम्‍दा कलाकार मिला है,जो अपनी मौलिक भंगिमाओं से चौंकाता है। कैसे इतने सालों के संघर्ष में उन्‍होंने ख्‍चुद को खर्च होने से बचाए रखा? मौके की उम्‍मीद में संघर्षरत युवा कलाकारों को खुद को बचाए रखने की तरकीब उनसे सीखनी चाहिए। इस बार विद्या बालन अपनी मौजूदगी से प्रभावित नहीं कर सकीं। कुछ कमी रह गई।
फिल्‍म के गीतों में अमिताभ भट्टाचार्य ने फिल्‍म के भावों का अच्‍छी तरह संजोया है। उन गीतों पर गौर करेंगे तो फिल्‍म का आनंद बढ़ जाएगा।
अवधि- 137 मिनट
स्‍टार- तीन
         

Thursday, June 2, 2016

बढ़ गई है जिंदगी में हलचल -विद्या बालन




-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले हफ्ते विद्या बालन शोला जो भड़के गीत पर ठुमकती दिखाई दीं। मशहूर अभिनेता भगवान दादा के जीवन पर बनी मराठी फिल्‍म एक अलबेला में विद्या बालन ने अभिनेत्री गीता बाली का किरदार निभाया है। उनकी तीन आ रही है,जिसमें वह अमिताभ बच्‍चन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ दिखेंगी। कुछ महीनों के आराम के बाद विद्या बालन सक्रिय हो गई हैं। जल्‍दी ही वह बेगम जान की शूटिंग आरंभ करेंगी।
-यों लगता है कि एक साथ बहुत कुछ चल रहा है ?
0 हां,व्‍यस्‍त तो हो गई हूं। 10 जून को तीन रिलीज होगी। उसके बाद जून में ही 24 तारीख को एक अलबेला रिलीज होगी। दोनों में मेरे स्‍पेशल एपीयरेंस हैं।
- बेगम जान के निर्माता और निर्देशक कौन हैं?
0 भट्ट साहब निर्माता हैं। इसके निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी हैं। दो हफ्तों के अंदर शूटिंग के लिए चली जाऊंगी। उसकी शूटिंग भी पश्चिम बंगाल में होगी। कोलकाता के पास के एक शहर में लोकेशन तय किया गया है।
-एक अलबेला में आप गीता बाली का किरदार निभा रही हैं?
0 दरअसल,मेरा स्‍पेशल एपीयरेंस है। मैं ज्‍यादातर गानों में हूं। विद्याधर भट्टे मेकअप आर्टिस्‍ट हैं। उन्‍होंने परिणीता और लगे रहो मुन्‍नाभई में मेरा मेकअप किया था। वे इस फिल्‍म के मेकअप डायरेक्‍टर हैं। उनसे मेरा संपर्क रहा है। मैंने कभी उनसे कहा था कि मैं उनके साथ मराठी फिल्‍म करना चाहूंगी। मैं मुंबई में ही पैदा हुई। पली-बढ़ी। मेरी इच्‍छा थी कि मराठी फिल्‍में करूं। इसके पहले एक लावणी गीत मला जाउ दे किया था। विद्याधर जी ने बताया कि वे लोग अलबेला रीक्रिएट कर रहे हैं। उसमें गीता बाली के गाने हैं। मैंने तो लपक लिया। मराठी फिल्‍म करने की इच्‍छा पूरी होने के साथ गीता बाली का किरदार निभाने का मौका मिल रहा था। यह बॉयोपिक नहीं है।
-गीता बाली से मैच करना तो मुश्किल रहा होगा?
 0 हम दानों के चेहरे बहुत अलग हैं। अगर मैं उनकी झलक भी दे पाई हूं तो उसका श्रेय विद्याधर भट्टे जी और बाकी टीम को जाता है। मुझे शाम ढले खिड़की तले गाना बहुत पसंद है। मैं जब-तब यह गीत गुनगुनाती रहती हूं। पहले यह गाना स्क्रिप्‍ट में नहीं था,लेकिन उन्‍होंने मेरा आग्रह मान लिया। उसे मोंटाज में रखा गया। मैंने गीता जी के गाने देखे और उनके एक्‍सप्रेशन को कैच करने की कोशिश की है।
-आप की तीन भी अगले हफ्ते आ रही है?
0 सुजॉय घोष के साथ फिर से आ रही हूं। बीच में डेढ़ साल हमारी बात नहीं हुई। मैंने दुर्गा रानी सिंह का प्रस्‍ताव स्‍वीकार नहीं किया था तो उन्‍हें खराब लगा था। मैंने तब कहा था कि मैं नहीं कर पाऊंगी। सुलह हो गई तो यह फिल्‍म मिली। मुझे कोलकाता जाने के साथ फिर से थ्रिलर करने का मौका मिला। थ्रिलर में रिभु दासगुप्‍ता का नजरिया थोड़ा अलग है। मुझे उनकी स्क्रिप्‍ट अच्‍छी लगी। ऊपर से बच्‍चन साहब और नवाज के साथ थी यह फिल्‍म।
-कैसा रहा अनुभव दोनों के साथ....
0 बच्‍चन साहब के साथ मेरे कम सीन हैं।नवाज के साथ ज्‍यादा हैं। छह सालों के बाद हमारी मुलाकात हुई। शूटिंग के दरम्‍यान काफी बातें हुईं। पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों मामलों में ढेर सारी बातें हुईं थीं। उन्‍होंने बताया कि कहानी के सेट पर वे नर्वस थे और अब तो वे नवाजुद्दीन सिद्दीकी हो गए हैं।
-क्‍या कर रही हैं आप तीन में ?
0 पुलिस इंस्‍पेक्‍टर का रोल है। पहली बार ऐसा रोल कर रही हूं। मैं जांच अधिकारी हूं,इसलिए वर्दी नहीं पहनती। बहुत सख्‍त मिजाज हूं। कोलकाता में सभी डिपार्टमेंट की फूलन देवी कहते हैं। हम तीनों एक केस को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। रोचक फिल्‍म है। पुलिस अधिकारी का बॉडी लैंग्‍वेज पकड़ना जरूरी था। यूनिफार्म नहीं पहन सकी। अगली किसी फिल्‍म का इंतजार रहेगा।
-आप स्‍वच्‍छता और बालिकाओं के मुद्दों पर भी सक्रिय हैं...
0 शौचालय के अभियान से जुड़ी हूं। बालिकाओं की रक्षा के लिए भी काम करती हूं। किसी संगठन से नहीं जुड़ी हूं,लेकिन इस मुद्दे पर चल रही गतिविधियों में शामिल होती हूं।
- कहानी 2 और बेगम जान किस स्‍टेज पर हैं?
0 कहानी 2 की शूटिंग पूरी हो गई है। यह 25 नवंबर को रिलीज होगी। बेगम जान की शूटिंग शुरू होगी। यह पार्टीशन के समय की पीरियड फिल्‍म है। रियल कैरेक्‍टर नहीं है। वह एक कोठे पर रहती हैं। पार्टीशन में उनका कोठा बीच से बांट दिया जाता है। यह बंगाली फिल्‍म थी। हिंदी में इसे नार्थ में कर दिया गया है। बंगाली के डायरेक्‍टर श्रीजीत मुखर्जी ही हिंदी भी डायरेक्‍ट कर रहे हैं। लेखिका कमला दास की बॉयोपिक भी कर रही हूं।


Friday, June 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हमारी अधूरी कहानी

स्टार: 3

मोहित सूरी और महेश भट्ट एक साथ आ रहे हों तो एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद की ज सकती है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ बेहतरीन की परिधि में आते-आते रह गई है। यह फिल्मी संवादों, प्रेम के सिचुएशन और तीनों मुख्य कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए देखी जा सकती है। फिल्म में आज के ट्रेंड के मुताबिक औरतों की आजादी की भी बातें हैं। पुरूष दर्शकों को वसुधा का गुस्सा कुछ ज्यादा लग सकता है, लेकिन सच तो यही है कि पति नामक जीव ने परंपरा और मर्यादा के नाम पर पत्नियों को सदियों से बांधा और सेविका बना कर रख लिया है। फिल्म के संवाद के लिए महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक को बधाई देनी होगी। अपने पति पर भड़क रही वसुधा अचानक पति के लिए बहुवचन का प्रयोग करती है और ‘तुमलोगों’ संबोधन के साथ सारे पुरुषों को समेट लेती है। 

 वसुधा भारतीय समाज की वह अधूरी औरत है, जो शादी के भीतर और बाहर पिस रही है। वह जड़ हो गई है, क्योंकि उसकी भावनाओं की बेल को उचित सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। वह कामकाजी और कुशल औरत है। वह बिसूरती नहीं रहती। पति की अनुपस्थिति में वह अपने बेटे की परवरिश करने के साथ खुद भी जी रही है। आरव के संपर्क में आने के बाद उसकी समझ में आता है कि वह रसहीन हो चुकी है। उसे अपना अधूरापन नजर आता है। आरव खुशी देकर उसका दुख कम करना चाहता है। हालांकि फिल्म में हवस और वासना जैसे शब्दों का इस्तेकमाल हुआ है, लेकिन गौर करें तो आरव और वसुधा की अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशों में यह प्रेम का पूरक है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ स्त्री-पुरुष संबंधों की कई परतें पेश करती है। हरि-वसुधा, आरव-वसुधा, आरव की मां और उनका प्रेमी, हरि के माता-पिता .... लेखक-निर्देशक सभी चरित्रों के विस्तार में नहीं गए हैं। फिर भी उनके जीवन की झलक से प्रेम के अधूरेपन की खूबसूरती और बदसूरती दोनों नजर आती है।

 ‘हमारी अधूरी कहानी’ का शिल्प कमजोर है। आरव और वसुधा के जीवन प्रसंगों में भावनाएं तो हैं, किंतु घटनाओं की कमी है। वसुधा जिंदगी से ली गई किरदार है। आरव को पन्नों पर गढ़ गया है। अपनी भावनाओं के बावजूद वह यांत्रिक लगता है। यही कारण है कि उसकी सौम्यदता, दुविधा और कुर्बानी हमें विचलित नहीं करती। इस लिहाज से हरि जीवंत और विश्वसनीय किरदार है। रुढियों में जीने की वजह से औरतों के स्वामित्व की उसकी धारणा असंगत लगती है, लेकिन यह विसंगति अपने समाज की बड़ी सच्चाई है। पुरुष खुद को स्वामी समझता है। वह औरतों की जिंदगी में मुश्किलें पैदा करता है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ अपनी कमियों के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियों में उतरती है। लेखकों की दृष्टि पुरानी है और शब्दों पर अधिक जोर देने से भाव का मर्म कम हुआ है। फिर भी यह फिल्म पॉपुलर ढांचे में कुछ सवाल रखती है।

इमरान हाशमी ने आरव के किरदार को उसके गुणों के साथ पर्दे पर उतारा है। कशमकश के दृश्योंण में वे प्रभावित करते हैं। उन्हें किरदार(लुक और कॉस्ट्यूम) में ढालने में फिल्म की तकनीकी टीम का भी योगदान है। विद्या बालन इस अधूरी कहानी में भी पूरी अभिनेत्री हैं। वह वसुधा के हर भाव को सलीके से पेश करती हैं। पति और प्रेमी के बीच फंसी औरत के अंतर्विरोधों को चेहरे से जाहिर करना आसान नहीं रहा होगा। विद्या के लिए वसुधा मुश्किल किरदार नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में किरदार के अधूरेपन को बरकरार रखना उललेखनीय है। राजकुमार राव के बार में यही कहा जा सकता है कि हर बार की तरह उन्होंने सरप्राइज किया है। हमें मनोज बाजपेयी और इरफान खान के बाद एक ऐसा एक्टैर मिला है, जो हर कैरेक्टर के मानस में ढल जाता है। हरि की भूमिका में उन्होंने फिर से जाहिर किया है कि वे उम्दा अभिनेता हैं। राजकुमार राव और विद्या बालन के साथ के दृश्य मोहक हैं। नरेन्द्र झा छोटे किरदार में जरूरी भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत बेहतर है फिल्म के गीतों में अधूरी कहानी इतनी बार रिपीट करने की जरूरत नहीं थी। राहत फतह अली का गाया गीत फिल्म के कथ्य को कम शब्दों में बखूबी जाहिर करता है।
 वही हैं सूरतें अपनी वही मैं हूँ, वही तुम हो
मगर खोया हुआ हूँ मैं मगर तुम भी कहीं गुम हो
मोहब्बत में दग़ा की थी काफ़िर थे सो काफ़िर हैं
मिली हैं मंज़िलें फिर भी मुसाफिर थे मुसाफिर हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुंचे
 मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
अवधि- 131 मिनट

Thursday, June 11, 2015

मिडिल क्‍लास औरत की अधूरी कहानी-महेश भट्ट




-अजय ब्रह्मात्‍मज
    सोल्जिनित्सिन ने कहा था कि किसी भी समाज की भावनात्‍मक गहराई नापनी हो तो उस समाज की कलाएं देख लें। उससे आप उस समाज के नैतिक रेशों को पहचान लेंगे। मौसम बदलता है तो पत्‍तों से पता चलता है। समाज में परिवर्तन की आहट फिल्‍मों की बदलती कहानियों से मिलने लगती है। उनका ढांचा बदलता है। मुझे लगता है कि भारतीय समाज में गहरे स्‍तर पर परिवर्तन घट चुका है। अब मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री में इसे महसूस किया जा रहा है। पीकू और तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स इसके उदाहरण हैं। इसकी कड़ी में हमारी अधूरी कहानी को देख सकते हैं। 21 वीं  सदी के दूसरे दशक में आ रही इन फिल्‍मों को देख कर लोगों को लग रहा है कि ऐसी कहानियां पहले नहीं आई थीं। मैं तो  कहूंगा कि ऐसा सिनेमा पहले भी था, अपनी जड़ों से जुड़ा और संस्‍कृति से संबद्ध।
    अभी की फिल्‍मों के रिदार पहले से जटिल हो गए हैं। संस्‍कारों की लगाम से वे मुक्‍त होना चाहते हैं। हमारी अधूरी कहानी मिडिल क्‍लास हिंदुस्‍तानी औरत की कहानी है। वह मंगलसूत्र पहनती है। बिंदी लगाती है। अकेली जान ही संतान पालती है। इसकी प्रेरणा मुझे अपने जीवन से ही मिली। मैंने अपनी मां को तनहा पाया। पिता के होने के बाद भी वे थे नहीं। उनकी गैरमौजूदगी का एहसास हमेशा रहा। कहीं पर यह उनकी कहानी है। मेरे पिता,मां और मेरी सौतेली मां के जीवन का सार है इसमें। फिल्‍म में आप उनके किरदारों की तलाश न करें। उनके जिए हुए सच से मैंने साच हासिल की है। सारांश,अर्थ और जनम के वक्‍त यह सच मेरी सोच में नहीं था। उस वक्‍त मेरे अंदर गुस्‍सा और आक्रोश पल रहा था। ऐसा लगता था कि हमारे ऊपर जुल्‍म हुआ है। मन में भावना रहती थी कि अपनी कहानियों में हम आप का हराएंगे और जीतेंगे।
    66 की उम्र में आने के बाद दर्द झेलने और तकलीफ पीने के बाद महसूस हो रहा है कि वे सभी इंसान थे। अभी मैं उनकी नजर से भी उस दौर को देखने की कोशिश कर रहा हूं। अभी सब बेचारे लगते हैं। सभी अपने संस्‍कारों और सीमाओं के दायरे में दिख रहे हैं। मैंने उन्‍हें ही तीन किरदारों के जरिए कहा है। उन किरदारों को विध्‍्या बालन,इमरान हाशमी और राजकुमार राव निभा रहे हैं। विद्या के अंदर सती और सीता है। राधा बनने की प्‍यास भी है। अपनी यात्रा में वह दुर्गा मां भी बन जाती है। कंेद्रीय कथा विद्या के दृष्टिकोण से कही गई है। वह बराबर का दर्जा चाहती है। हमारी अधूरी कहानी प्रासंगिक फिल्‍म है। अर्थ की शबाना आजमी में विद्रोह था। उसने अपने पति को आड़े हाथों लिया था। इसमें विद्या पति से जूझती है। यह हिंदस्‍तानी दायरे की औरत के विद्रोह की कहानी है। वह अपनी मुक्ति को पश्चिमी संदर्भ से परिभाषित नहीं कर रही है। वह पूछती है कि मांग मेरी और सिंदूर तेरे नाम का... कोख मेरी और संतान तेरे नाम का। वह मूलभूत सवाल पूछती है। वह जानना चाहती है कि शादी के बाद पति का नाम उसे जिस्‍म और रुह में क्‍यों गाड़ दिया जाता है। मेरे बचपन की यादें हैं। जिन औरतों से मेरा प्रेम हुआ,उन सभी में मैंने अपनी मां के ही अंश देखे। सभी तनहा मिलीं। मुझे तनहा छोड़ गईं। कुछ लोग कहते हैं कि मैं औरतों के नजरिए से ही अपनी कहानी कहता हूं।
    मुश्किल खेल है। मोहित सूरी ने भी मेहनत की है। हमारी अधूरी कहानी में लेखक महेश भट्ट नए मुहावरों के साथ मिलेगा। जब हम खुद अपनी जिंदगी को जीवनीकार के तौर पर देखते हैं तो ऐसी कहानियां आती हैं। यह आत्‍मकथा नहीं है। यह खुद को ही देखना है जिंदगी के आईने में...इसमें दूसरे के दर्द को भी शामिल कर लेते हैं। मोहित ने मेरी विरासत को संभाल लिया है और आगे ले गया है।
    कहानियां समाज का नैतिक कंपास होती हैं। फिल्‍मों के किरदार हमें सालों साल तक प्रभावित करते हैं। मुझे यकीन है कि वसुधा की जिंदगी दर्शकों को प्रभावित करती है। पूजा भट्ट ने क्रांतिकारी जिंदगी जी है,लेकिन इस फिल्‍म को देख कर कांपती हुई निकली थीं। हमारी अधूरी कहानी देश की आम औरतों की कहानी है। जिंदगी की सारी कहानियां अधूरी रहती हैं। संपूर्णता तो एक भ्रम है। सच्‍ची प्रेमकहानियां तड़प देती हैं। किसी ने कहा था कि जिस जिंदगी की परीक्षा नहीं हुई,वह जिंदगी बेमानी है। तो किसी ने कहा कि जिंदगी जी ही नहीं गई तो उसकी परीक्षा क्‍या होगी ? मैंने तो जिंदगी जी है और उसकी परीक्षा भी दी है।