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Friday, December 2, 2016

फिल्‍म समीक्षा : कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह



फिल्‍म रिव्‍यू
फिसला है रोमांच
कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सुजॉय घोष
चार सालों से ज्‍यादा समय बीत गया। मार्च 2012 में सीमित बजट में सुजॉय घोष ने कहानी निर्देशित की थी। पति की तलाश में कोलकाता में भटकती गर्भवती महिला की रोमांचक कहानी ने दर्शकों को रोमांचित किया था। अभी दिसंबर में सुजॉय घोष की कहानी 2 आई है। इस फिल्‍म का पूरा शीर्षक कहानी 2 : दुर्गा रानी सिंह है। पिछली फिल्‍म की कहानी से इस फिल्‍म को कोई संबंध नहीं है। निर्माता और निर्देशक ने पिछली कहानी की कामयाबी का वर्क कहानी 2 पर डाल दिया है। यह वर्क कोलकाता,सुजॉय घोष और विद्या बालन के रूप में नई फिल्‍म से चिपका है। अगर आप पुरानी फिल्‍म के रोमांच की उम्‍मीद के साथ कहानी 2 देखने की योजना बना रहे हैं तो यह जान लें कि यह अलहदा फिल्‍म है। इसमें भी रोमांच,रहस्‍य और विद्या हैं,लेकिन इस फिल्‍म की कहानी बिल्‍कुल अलग है। यह दुर्गा रानी सिंह की कहानी है।
दुर्गा रानी सिंह का व्‍याकुल अतीत है। बचपन में किसी रिश्‍तेदार ने उसे यहां-वहां छुआ था। उस दर्दनाक अनुभव से वह अभी तक नहीं उबर सकी है,इसलिए उसका रोमांटिक जीवन परेशान हाल है। अचानक छूने भर से वह चौंक जाती है। उसे अपने स्‍कूल में मिनी दिखती है। मिनी के असामान्‍य व्‍यवहार से दुर्गा रानी सिंह को शक-ओ-सुबहा होता है। वह मिनी के करीब आती है। घृणीत भयावह सच जानने के बाद वह मिनी को उसके चाचा और दादी के चुगल से आजाद करना चाहती है। मिनी और दुर्गा की बातचीत और बैठकों से घर की चहारदीवारी में परिवार के अंदर चल रहे बाल यौन शोषण(चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज) की जानकारी मिलती है।
सुजॉय घोष ने अपने लेखकों के साथ मिल कर समाज के एक बड़े मुद्दे को रोमांचक कहानी का हिस्‍सा बना कर चुस्‍त तरीके से पेश किया है। फिल्‍म तेज गति से आगे बढ़ती है। मिनी और दुर्गा के साथ हमारा जुड़ाव हो जाता है। दोनों का समान दर्द सहानुभूति पैदा करता है। भोले चाचा और शालीन दादी से हमें घृणा होती है। लेखक-निर्देशक ने कलिम्‍पोंग की पूष्‍ठभूमि में यहां तक की कहानी से बांधे रखा है। इंटरवल के बाद कहानी फिसलती है और फिर अनुमानित प्रसंगों और नतीजों की ओर मुड़ जाती है। रोमांच कम होता है,क्‍योंकि यह अंदाजा लग जाता है कि फिल्‍म हिंदी फिल्‍मों के प्रचलित राजमार्ग पर ही आएगी। इंटरवल के
एक ही औरत की दोहरी भूमिका में विद्या बालन फिर से साबित करती हैं कि वे ऐसी कहानियों और फिल्‍मों के लिए उचित अभिनेत्री हैं। दुर्गा रानी सिंह और विद्या सिन्‍हा के रूप में एक ही औरत के दो व्‍यक्तित्‍वों को उन्‍होने बखूबी समझा और प्रभावशाली तरीके से जीवंत किया है। दोनों की चिंता के केंद्र में मिनी है,लेकिन समय के साथ बदलते दायित्‍व का विद्या बालन अच्‍छी तरह निभाया है। विद्या बालन समर्थ अभिनेत्री हैं। वह चालू किस्‍म की भूमिकाओं में बेअसर रहती हैं,लेकिन लीक से अलग स्‍वतंत्र किरदार निभाने में वह माहिर हैं। कहानी 2 ताजा सबूत है। कामकाजी महिला के मोंटाज में विद्या बालन जंचती हैं। इस बार अर्जुन रामपाल भी किरदार में दिखे। उन्‍होंने इंद्रजीत के रूप में आ‍कर्षित किया। अन्‍य सहयोगी किरदारों में आए स्‍थानीय कलाकारों का योगदान उल्‍लेखनीय है। जुगल हंसराज की स्‍वाभाविकता फिल्‍मी खलनायक बनते ही खत्‍म हो जाती है। लेखक-निर्देशक उनके चरित्र के निर्वाह में चूक गए हैं।   
सुजॉय घोष की फिल्‍मों में कोलकाता सशक्‍त किरदार के रूप में रहता है। इस फिल्‍म में वे कोलकाता की कुछ नई गलियों और स्‍थानों में ले जाते हैं। कहानी 2 में कोलकाता,चंदनपुर और कलिम्‍पोंग का परिवेश कहानी को ठोस आधार देता है। हालांकि मुख्‍य किरदार हिंदी ही बोलते हैं,लेकिन माहौल पूरी तरह से बंगाली रहता है। सहयोगी किरदारों और कानों में आती आवाजों और कोलाहल में स्‍थानीय पुट रहता है। किरदारों के बात-वयवहार में भी बंगाल की छटा रहती है।
फिल्‍म की थीम के मुताबिक सुजॉय घोष ने फिल्‍म का रंग उदास और सलेटी रखा है।
अवधि 130 मिनट
तीन स्‍टार 

Friday, June 10, 2016

फिल्‍म समीक्षा : तीन




है नयापन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
हक है मेरा
अंबर पे
लेके रहूंगा
हक मेरा
लेके रहूंगा
हक मेरा
तू देख लेना
फिल्‍म के भाव और विश्‍वास को सार्थक शब्दों में व्‍यक्‍त करती इन पंक्तियों में हम जॉन विश्‍वास के इरादों को समझ पाते हैं। रिभु दासगुप्‍ता की तीन कोरियाई फिल्‍म मोंटाज में थोड़ी फेरबदल के साथ की गई हिंदी प्रस्‍तुति है। मूल फिल्‍म में अपहृत लड़की की मां ही प्रमुख पात्र है। तीन में अमिताभ बच्‍च्‍न की उपलब्‍धता की वजह से प्रमुख किरदार दादा हो गए हैं। कहानी रोचक हो गई है। बंगाली बुजुर्ग की सक्रियता हंसी और सहानुभूति एक साथ पैदा करती है। निर्माता सुजॉय घोष ने रिभु दासगुप्‍ता को लीक से अलग चलने और लिखने की हिम्‍मत और सहमति दी।
तीन नई तरह की फिल्‍म है। रोचक प्रयोग है। यह हिंदी फिल्‍मों की बंधी-बंधायी परिपाटी का पालन नहीं करती। कहानी और किरदारों में नयापन है। उनके रवैए और इरादों में पैनापन है। यह बदले की कहानी नहीं है। यह इंसाफ की लड़ाई है। भारतीय समाज और हिंदी फिल्‍मों में इंसाफ का मतलब आंख के बदले आंख निकालना रहा है। दर्शकों को इसमें मजा आता है। हिंदी फिल्‍मों का हीरो जब विलेन को पीटता और मारता है तो दर्शक तालियां बजाते हैं और संतुष्‍ट होकर सिनेमाघरों से निकलते हैं। तीन के नायक जॉन विश्‍वास का सारा संघर्ष जिस इंसाफ के लिए है,उसमें बदले की भावना नहीं है। अपराध की स्‍वीकारोक्ति ही जॉन विश्‍वास के लिए काफी है। रिभु दासगुप्‍ता फिल्‍म के इस निष्‍कर्ष को किसी उद्घोष की तरह नहीं पेश करते।
इंटरवल के पहले फिल्‍म की गति कोलकाता श‍हर की तरह धीमी और फुर्सत में हैं। रिभु ने थाने की शिथिल दिनचर्या से लेकर जॉन विश्‍वास के रुटीन तक में शहर की धीमी रफ्तार को बरकरार रख है। जॉन विश्‍वास झक्‍की,सनकी और जिद्दी बुजुर्ग के रूप में उभरते हैं। उनसे कोई भी खुश नजर नहीं आता। आरंभिक दृश्‍यों में स्‍पष्‍ट हो जाता है कि सभी जॉन की धुन से कतरा रहे हैं। उन्‍हें लगता है कि आठ सालों से सच जानने के लिए संघर्षरत जॉन के लिए उनके पास सटीक जवाब नहीं है। पुलिस अधिकारी से पादरी बना मार्टिन भी जॉन से बचने से अधिक छिपने की कोशिश में रहता है। अपराध बोध से ग्रस्‍त मार्टिन की जिंदगी की अपनी मुश्किलें हैं,जिन्‍हें वह अध्‍यात्‍म के आवरण में ढक कर रखता है। वह जॉन और उसकी बीवी से सहानुभूति रखता है। फिल्‍म में सरिता सरकार वर्तमान पुलिस अधिकारी है। वह भी जॉन की मदद करना चाहती है,लेकिन उसे भी कोई सुराग नहीं मिलता।
आठ सालों के बाद घटनाएं दोहराई जाने लगती हैं तो सरिता और मार्टिन का उत्‍साह बढ़ता है। वे अपने-अपने तरीके से अपहरण के नए रहस्‍य को सुलझाते हुए पुराने अपहरण की घटनाओं और आवाज के करीब पहुंचते हैं। फिल्‍म का रहस्‍य हालांकि धीरे से खुलता है,लेकिन वह दर्शकों का चौंका नहीं पाता। प्रस्‍तुति के नएपन से रोमांच झन्‍नाटेदार नहीं लगता। आम तौर पर थ्रिलर फिल्‍मों में दर्शक किरदारों के साथ रहस्‍य सुलझाने में शामिल हो जाते हैं। उन्‍हें तब अच्‍छा लगता है,जब उनकी कल्‍पना और सोच लेखक-निर्देशक और किरदारों की तहकीकात से मेल खाने लगती है। तीन पुरानी फिल्‍मों के इस ढर्रे पर नहीं चलती।
रिभु दासगुप्‍ता ने कोलकाता शहर को किरदार के तौर पर पेश किया है। हुगली,हावड़ा ब्रिज,नीमतल्‍ला घाट,इमामबाड़ा आदि प्रचलित वास्‍तु चिह्नों के साथ शहर की उन गलियों में हम जॉन के साथ जाते हैं,जो आधुनिक और परिचित कोलकाता से अलग है। पुरानी बंद मिलें,दीवारों पर उग आए पेड़,शहर की धीमी रफ्तार और जॉन का स्‍कूटर हमें कोलकाता के करीब ले आता है। फिल्‍म की शुरूआत में मच्‍छी बाजार में जॉन का मोल-मोलाई करने और मछली बेचने वाले के जवाब में शहर की रोजमर्रा जिंदगी में राजनीति के प्रभाव को भी इशारे से बता दिया गया है। एक-दो अड्डेबाजी के दृश्‍य भी होने चाहिए थे।
तीन में अमिताभ बच्‍चन को मौका मिला है कि वे अपनी स्‍थायी और प्रचलित छवि से बाहर निकल सकें। उनकी चाल-ढाल,वेशभूषा और बोली में 70 साल के बुजुर्ग का ठहराव और बेचैनी है। लंबे समय से हम उन्‍हें खास दाढ़ी में देखते रहे हैं। इस बार उनके गालों की झुर्रियां और ठुड्ढी भी दिखाई दी है। यह मामूली फर्क नहीं है। अच्‍छी बात है कि स्‍वयं अमिताभ बच्‍चन इस लुक के लिए राजी हुए,जो उनकी ब्रांडिंग के मेल में नहीं है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के रूप में हिंदी फिल्‍मों को एक उम्‍दा कलाकार मिला है,जो अपनी मौलिक भंगिमाओं से चौंकाता है। कैसे इतने सालों के संघर्ष में उन्‍होंने ख्‍चुद को खर्च होने से बचाए रखा? मौके की उम्‍मीद में संघर्षरत युवा कलाकारों को खुद को बचाए रखने की तरकीब उनसे सीखनी चाहिए। इस बार विद्या बालन अपनी मौजूदगी से प्रभावित नहीं कर सकीं। कुछ कमी रह गई।
फिल्‍म के गीतों में अमिताभ भट्टाचार्य ने फिल्‍म के भावों का अच्‍छी तरह संजोया है। उन गीतों पर गौर करेंगे तो फिल्‍म का आनंद बढ़ जाएगा।
अवधि- 137 मिनट
स्‍टार- तीन
         

Thursday, June 2, 2016

बढ़ गई है जिंदगी में हलचल -विद्या बालन




-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले हफ्ते विद्या बालन शोला जो भड़के गीत पर ठुमकती दिखाई दीं। मशहूर अभिनेता भगवान दादा के जीवन पर बनी मराठी फिल्‍म एक अलबेला में विद्या बालन ने अभिनेत्री गीता बाली का किरदार निभाया है। उनकी तीन आ रही है,जिसमें वह अमिताभ बच्‍चन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ दिखेंगी। कुछ महीनों के आराम के बाद विद्या बालन सक्रिय हो गई हैं। जल्‍दी ही वह बेगम जान की शूटिंग आरंभ करेंगी।
-यों लगता है कि एक साथ बहुत कुछ चल रहा है ?
0 हां,व्‍यस्‍त तो हो गई हूं। 10 जून को तीन रिलीज होगी। उसके बाद जून में ही 24 तारीख को एक अलबेला रिलीज होगी। दोनों में मेरे स्‍पेशल एपीयरेंस हैं।
- बेगम जान के निर्माता और निर्देशक कौन हैं?
0 भट्ट साहब निर्माता हैं। इसके निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी हैं। दो हफ्तों के अंदर शूटिंग के लिए चली जाऊंगी। उसकी शूटिंग भी पश्चिम बंगाल में होगी। कोलकाता के पास के एक शहर में लोकेशन तय किया गया है।
-एक अलबेला में आप गीता बाली का किरदार निभा रही हैं?
0 दरअसल,मेरा स्‍पेशल एपीयरेंस है। मैं ज्‍यादातर गानों में हूं। विद्याधर भट्टे मेकअप आर्टिस्‍ट हैं। उन्‍होंने परिणीता और लगे रहो मुन्‍नाभई में मेरा मेकअप किया था। वे इस फिल्‍म के मेकअप डायरेक्‍टर हैं। उनसे मेरा संपर्क रहा है। मैंने कभी उनसे कहा था कि मैं उनके साथ मराठी फिल्‍म करना चाहूंगी। मैं मुंबई में ही पैदा हुई। पली-बढ़ी। मेरी इच्‍छा थी कि मराठी फिल्‍में करूं। इसके पहले एक लावणी गीत मला जाउ दे किया था। विद्याधर जी ने बताया कि वे लोग अलबेला रीक्रिएट कर रहे हैं। उसमें गीता बाली के गाने हैं। मैंने तो लपक लिया। मराठी फिल्‍म करने की इच्‍छा पूरी होने के साथ गीता बाली का किरदार निभाने का मौका मिल रहा था। यह बॉयोपिक नहीं है।
-गीता बाली से मैच करना तो मुश्किल रहा होगा?
 0 हम दानों के चेहरे बहुत अलग हैं। अगर मैं उनकी झलक भी दे पाई हूं तो उसका श्रेय विद्याधर भट्टे जी और बाकी टीम को जाता है। मुझे शाम ढले खिड़की तले गाना बहुत पसंद है। मैं जब-तब यह गीत गुनगुनाती रहती हूं। पहले यह गाना स्क्रिप्‍ट में नहीं था,लेकिन उन्‍होंने मेरा आग्रह मान लिया। उसे मोंटाज में रखा गया। मैंने गीता जी के गाने देखे और उनके एक्‍सप्रेशन को कैच करने की कोशिश की है।
-आप की तीन भी अगले हफ्ते आ रही है?
0 सुजॉय घोष के साथ फिर से आ रही हूं। बीच में डेढ़ साल हमारी बात नहीं हुई। मैंने दुर्गा रानी सिंह का प्रस्‍ताव स्‍वीकार नहीं किया था तो उन्‍हें खराब लगा था। मैंने तब कहा था कि मैं नहीं कर पाऊंगी। सुलह हो गई तो यह फिल्‍म मिली। मुझे कोलकाता जाने के साथ फिर से थ्रिलर करने का मौका मिला। थ्रिलर में रिभु दासगुप्‍ता का नजरिया थोड़ा अलग है। मुझे उनकी स्क्रिप्‍ट अच्‍छी लगी। ऊपर से बच्‍चन साहब और नवाज के साथ थी यह फिल्‍म।
-कैसा रहा अनुभव दोनों के साथ....
0 बच्‍चन साहब के साथ मेरे कम सीन हैं।नवाज के साथ ज्‍यादा हैं। छह सालों के बाद हमारी मुलाकात हुई। शूटिंग के दरम्‍यान काफी बातें हुईं। पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों मामलों में ढेर सारी बातें हुईं थीं। उन्‍होंने बताया कि कहानी के सेट पर वे नर्वस थे और अब तो वे नवाजुद्दीन सिद्दीकी हो गए हैं।
-क्‍या कर रही हैं आप तीन में ?
0 पुलिस इंस्‍पेक्‍टर का रोल है। पहली बार ऐसा रोल कर रही हूं। मैं जांच अधिकारी हूं,इसलिए वर्दी नहीं पहनती। बहुत सख्‍त मिजाज हूं। कोलकाता में सभी डिपार्टमेंट की फूलन देवी कहते हैं। हम तीनों एक केस को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। रोचक फिल्‍म है। पुलिस अधिकारी का बॉडी लैंग्‍वेज पकड़ना जरूरी था। यूनिफार्म नहीं पहन सकी। अगली किसी फिल्‍म का इंतजार रहेगा।
-आप स्‍वच्‍छता और बालिकाओं के मुद्दों पर भी सक्रिय हैं...
0 शौचालय के अभियान से जुड़ी हूं। बालिकाओं की रक्षा के लिए भी काम करती हूं। किसी संगठन से नहीं जुड़ी हूं,लेकिन इस मुद्दे पर चल रही गतिविधियों में शामिल होती हूं।
- कहानी 2 और बेगम जान किस स्‍टेज पर हैं?
0 कहानी 2 की शूटिंग पूरी हो गई है। यह 25 नवंबर को रिलीज होगी। बेगम जान की शूटिंग शुरू होगी। यह पार्टीशन के समय की पीरियड फिल्‍म है। रियल कैरेक्‍टर नहीं है। वह एक कोठे पर रहती हैं। पार्टीशन में उनका कोठा बीच से बांट दिया जाता है। यह बंगाली फिल्‍म थी। हिंदी में इसे नार्थ में कर दिया गया है। बंगाली के डायरेक्‍टर श्रीजीत मुखर्जी ही हिंदी भी डायरेक्‍ट कर रहे हैं। लेखिका कमला दास की बॉयोपिक भी कर रही हूं।


Friday, June 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हमारी अधूरी कहानी

स्टार: 3

मोहित सूरी और महेश भट्ट एक साथ आ रहे हों तो एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद की ज सकती है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ बेहतरीन की परिधि में आते-आते रह गई है। यह फिल्मी संवादों, प्रेम के सिचुएशन और तीनों मुख्य कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए देखी जा सकती है। फिल्म में आज के ट्रेंड के मुताबिक औरतों की आजादी की भी बातें हैं। पुरूष दर्शकों को वसुधा का गुस्सा कुछ ज्यादा लग सकता है, लेकिन सच तो यही है कि पति नामक जीव ने परंपरा और मर्यादा के नाम पर पत्नियों को सदियों से बांधा और सेविका बना कर रख लिया है। फिल्म के संवाद के लिए महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक को बधाई देनी होगी। अपने पति पर भड़क रही वसुधा अचानक पति के लिए बहुवचन का प्रयोग करती है और ‘तुमलोगों’ संबोधन के साथ सारे पुरुषों को समेट लेती है। 

 वसुधा भारतीय समाज की वह अधूरी औरत है, जो शादी के भीतर और बाहर पिस रही है। वह जड़ हो गई है, क्योंकि उसकी भावनाओं की बेल को उचित सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। वह कामकाजी और कुशल औरत है। वह बिसूरती नहीं रहती। पति की अनुपस्थिति में वह अपने बेटे की परवरिश करने के साथ खुद भी जी रही है। आरव के संपर्क में आने के बाद उसकी समझ में आता है कि वह रसहीन हो चुकी है। उसे अपना अधूरापन नजर आता है। आरव खुशी देकर उसका दुख कम करना चाहता है। हालांकि फिल्म में हवस और वासना जैसे शब्दों का इस्तेकमाल हुआ है, लेकिन गौर करें तो आरव और वसुधा की अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशों में यह प्रेम का पूरक है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ स्त्री-पुरुष संबंधों की कई परतें पेश करती है। हरि-वसुधा, आरव-वसुधा, आरव की मां और उनका प्रेमी, हरि के माता-पिता .... लेखक-निर्देशक सभी चरित्रों के विस्तार में नहीं गए हैं। फिर भी उनके जीवन की झलक से प्रेम के अधूरेपन की खूबसूरती और बदसूरती दोनों नजर आती है।

 ‘हमारी अधूरी कहानी’ का शिल्प कमजोर है। आरव और वसुधा के जीवन प्रसंगों में भावनाएं तो हैं, किंतु घटनाओं की कमी है। वसुधा जिंदगी से ली गई किरदार है। आरव को पन्नों पर गढ़ गया है। अपनी भावनाओं के बावजूद वह यांत्रिक लगता है। यही कारण है कि उसकी सौम्यदता, दुविधा और कुर्बानी हमें विचलित नहीं करती। इस लिहाज से हरि जीवंत और विश्वसनीय किरदार है। रुढियों में जीने की वजह से औरतों के स्वामित्व की उसकी धारणा असंगत लगती है, लेकिन यह विसंगति अपने समाज की बड़ी सच्चाई है। पुरुष खुद को स्वामी समझता है। वह औरतों की जिंदगी में मुश्किलें पैदा करता है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ अपनी कमियों के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियों में उतरती है। लेखकों की दृष्टि पुरानी है और शब्दों पर अधिक जोर देने से भाव का मर्म कम हुआ है। फिर भी यह फिल्म पॉपुलर ढांचे में कुछ सवाल रखती है।

इमरान हाशमी ने आरव के किरदार को उसके गुणों के साथ पर्दे पर उतारा है। कशमकश के दृश्योंण में वे प्रभावित करते हैं। उन्हें किरदार(लुक और कॉस्ट्यूम) में ढालने में फिल्म की तकनीकी टीम का भी योगदान है। विद्या बालन इस अधूरी कहानी में भी पूरी अभिनेत्री हैं। वह वसुधा के हर भाव को सलीके से पेश करती हैं। पति और प्रेमी के बीच फंसी औरत के अंतर्विरोधों को चेहरे से जाहिर करना आसान नहीं रहा होगा। विद्या के लिए वसुधा मुश्किल किरदार नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में किरदार के अधूरेपन को बरकरार रखना उललेखनीय है। राजकुमार राव के बार में यही कहा जा सकता है कि हर बार की तरह उन्होंने सरप्राइज किया है। हमें मनोज बाजपेयी और इरफान खान के बाद एक ऐसा एक्टैर मिला है, जो हर कैरेक्टर के मानस में ढल जाता है। हरि की भूमिका में उन्होंने फिर से जाहिर किया है कि वे उम्दा अभिनेता हैं। राजकुमार राव और विद्या बालन के साथ के दृश्य मोहक हैं। नरेन्द्र झा छोटे किरदार में जरूरी भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत बेहतर है फिल्म के गीतों में अधूरी कहानी इतनी बार रिपीट करने की जरूरत नहीं थी। राहत फतह अली का गाया गीत फिल्म के कथ्य को कम शब्दों में बखूबी जाहिर करता है।
 वही हैं सूरतें अपनी वही मैं हूँ, वही तुम हो
मगर खोया हुआ हूँ मैं मगर तुम भी कहीं गुम हो
मोहब्बत में दग़ा की थी काफ़िर थे सो काफ़िर हैं
मिली हैं मंज़िलें फिर भी मुसाफिर थे मुसाफिर हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुंचे
 मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
अवधि- 131 मिनट

Thursday, June 11, 2015

मिडिल क्‍लास औरत की अधूरी कहानी-महेश भट्ट




-अजय ब्रह्मात्‍मज
    सोल्जिनित्सिन ने कहा था कि किसी भी समाज की भावनात्‍मक गहराई नापनी हो तो उस समाज की कलाएं देख लें। उससे आप उस समाज के नैतिक रेशों को पहचान लेंगे। मौसम बदलता है तो पत्‍तों से पता चलता है। समाज में परिवर्तन की आहट फिल्‍मों की बदलती कहानियों से मिलने लगती है। उनका ढांचा बदलता है। मुझे लगता है कि भारतीय समाज में गहरे स्‍तर पर परिवर्तन घट चुका है। अब मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री में इसे महसूस किया जा रहा है। पीकू और तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स इसके उदाहरण हैं। इसकी कड़ी में हमारी अधूरी कहानी को देख सकते हैं। 21 वीं  सदी के दूसरे दशक में आ रही इन फिल्‍मों को देख कर लोगों को लग रहा है कि ऐसी कहानियां पहले नहीं आई थीं। मैं तो  कहूंगा कि ऐसा सिनेमा पहले भी था, अपनी जड़ों से जुड़ा और संस्‍कृति से संबद्ध।
    अभी की फिल्‍मों के रिदार पहले से जटिल हो गए हैं। संस्‍कारों की लगाम से वे मुक्‍त होना चाहते हैं। हमारी अधूरी कहानी मिडिल क्‍लास हिंदुस्‍तानी औरत की कहानी है। वह मंगलसूत्र पहनती है। बिंदी लगाती है। अकेली जान ही संतान पालती है। इसकी प्रेरणा मुझे अपने जीवन से ही मिली। मैंने अपनी मां को तनहा पाया। पिता के होने के बाद भी वे थे नहीं। उनकी गैरमौजूदगी का एहसास हमेशा रहा। कहीं पर यह उनकी कहानी है। मेरे पिता,मां और मेरी सौतेली मां के जीवन का सार है इसमें। फिल्‍म में आप उनके किरदारों की तलाश न करें। उनके जिए हुए सच से मैंने साच हासिल की है। सारांश,अर्थ और जनम के वक्‍त यह सच मेरी सोच में नहीं था। उस वक्‍त मेरे अंदर गुस्‍सा और आक्रोश पल रहा था। ऐसा लगता था कि हमारे ऊपर जुल्‍म हुआ है। मन में भावना रहती थी कि अपनी कहानियों में हम आप का हराएंगे और जीतेंगे।
    66 की उम्र में आने के बाद दर्द झेलने और तकलीफ पीने के बाद महसूस हो रहा है कि वे सभी इंसान थे। अभी मैं उनकी नजर से भी उस दौर को देखने की कोशिश कर रहा हूं। अभी सब बेचारे लगते हैं। सभी अपने संस्‍कारों और सीमाओं के दायरे में दिख रहे हैं। मैंने उन्‍हें ही तीन किरदारों के जरिए कहा है। उन किरदारों को विध्‍्या बालन,इमरान हाशमी और राजकुमार राव निभा रहे हैं। विद्या के अंदर सती और सीता है। राधा बनने की प्‍यास भी है। अपनी यात्रा में वह दुर्गा मां भी बन जाती है। कंेद्रीय कथा विद्या के दृष्टिकोण से कही गई है। वह बराबर का दर्जा चाहती है। हमारी अधूरी कहानी प्रासंगिक फिल्‍म है। अर्थ की शबाना आजमी में विद्रोह था। उसने अपने पति को आड़े हाथों लिया था। इसमें विद्या पति से जूझती है। यह हिंदस्‍तानी दायरे की औरत के विद्रोह की कहानी है। वह अपनी मुक्ति को पश्चिमी संदर्भ से परिभाषित नहीं कर रही है। वह पूछती है कि मांग मेरी और सिंदूर तेरे नाम का... कोख मेरी और संतान तेरे नाम का। वह मूलभूत सवाल पूछती है। वह जानना चाहती है कि शादी के बाद पति का नाम उसे जिस्‍म और रुह में क्‍यों गाड़ दिया जाता है। मेरे बचपन की यादें हैं। जिन औरतों से मेरा प्रेम हुआ,उन सभी में मैंने अपनी मां के ही अंश देखे। सभी तनहा मिलीं। मुझे तनहा छोड़ गईं। कुछ लोग कहते हैं कि मैं औरतों के नजरिए से ही अपनी कहानी कहता हूं।
    मुश्किल खेल है। मोहित सूरी ने भी मेहनत की है। हमारी अधूरी कहानी में लेखक महेश भट्ट नए मुहावरों के साथ मिलेगा। जब हम खुद अपनी जिंदगी को जीवनीकार के तौर पर देखते हैं तो ऐसी कहानियां आती हैं। यह आत्‍मकथा नहीं है। यह खुद को ही देखना है जिंदगी के आईने में...इसमें दूसरे के दर्द को भी शामिल कर लेते हैं। मोहित ने मेरी विरासत को संभाल लिया है और आगे ले गया है।
    कहानियां समाज का नैतिक कंपास होती हैं। फिल्‍मों के किरदार हमें सालों साल तक प्रभावित करते हैं। मुझे यकीन है कि वसुधा की जिंदगी दर्शकों को प्रभावित करती है। पूजा भट्ट ने क्रांतिकारी जिंदगी जी है,लेकिन इस फिल्‍म को देख कर कांपती हुई निकली थीं। हमारी अधूरी कहानी देश की आम औरतों की कहानी है। जिंदगी की सारी कहानियां अधूरी रहती हैं। संपूर्णता तो एक भ्रम है। सच्‍ची प्रेमकहानियां तड़प देती हैं। किसी ने कहा था कि जिस जिंदगी की परीक्षा नहीं हुई,वह जिंदगी बेमानी है। तो किसी ने कहा कि जिंदगी जी ही नहीं गई तो उसकी परीक्षा क्‍या होगी ? मैंने तो जिंदगी जी है और उसकी परीक्षा भी दी है।

Tuesday, June 9, 2015

खुशी है पूरी हुई ख्‍वाहिश - विद्या बालन


-स्मिता श्रीवास्तव
सिल्वर स्क्रिन पर कभी शोख, कभी संजीदा नजर आई विद्या बालन ने बहुत सारे किरदारों को जीया है। इंटेस फिल्में उनकी पसंदीदा रही है। हमारी अधूरी कहानी उसी जॉनर की फिल्म है। इस फिल्म को करने के साथ महेश भट्ट के साथ काम करने की उनकी दिली तमन्ना भी पूरी हुई। इसमें वह वसुधा का किरदार निभा रहीं। फिल्म को लेकर उन्होंने साझा की बातें : 
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मैं महेश भट्ट और गुलजार साहब के साथ काम करने की हमेशा से ख्वाहिशमंद थी। भट्ट साहब निर्देशन से संन्यास ले चुके हैं। गुलजार साहब भी निर्देशन से दूरी बना चुके हैं। हालांकि मैंने गुलजार साहब से कई बार निर्देशन का आग्रह किया है। उनका जवाब होता है अगर फिल्म बनाई तो तुम्हारे साथ ही बनाऊंगा। मैं कहती हूं देर किस बात की बना डालिए। बहरहाल महेश भट्ट ने हमारी अधूरी कहानी की लिखी है। निर्देशन न सही उनकी लिखी कहानी पर अभिनय मौका मिला। मैंने विशेष फिल्म्स के बैनर तले बनी फिल्मों में पूर्व में काम नहीं किया था। उनकी फिल्मों और मेरी फिल्मों का मिजाज अलग रहा है। खास तौर से पिछले दस वर्षो के दौरान। कैंप से जुड़ने की कहानी दिलचस्प है। आशिकी 2 मुझे बेहद पसंद आई। मैंने निर्देशक मोहित सूरी से उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की। यह सुनकर वह मुस्कुरा दिए। शायद उन्हें लगा कि उत्साह में मैंने यह बात कही। फिर मैंने भट्ट साहब को फोन किया। भट्ट साहब की फिल्में मुझे इसलिए पसंद होती हैं क्योंकि सिर्फ सिचुएशन नहीं उनके कैरेक्टर जटिल होते थे। जबकि ज्यादातर फिल्मों में हीरो-हीरोइन कठिन परिस्थितियों से जूझते हैं। मैं उनकी फिल्म अर्थ की मुरीद थी। दोस्त के घर पढ़ने जाने के दौरान मैं उसके सीन की नकल करती थी। यह कोशिश होती थी कि बिना ग्लिसरीन के आंसू बहे। उस फिल्म का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है। मोहित में मुझे मानवीय जटिलताओं को दिखाने को लेकर गंभीरता दिखी। इंसानी फितरत बेहद अस्थिर होती है। उसकी सोच पल में तोला पल में माशा होती है। मोहित उसे दिखाने में निडर हैं। मैंने भट्ट साहब से कहा कि अर्से बाद किसी निर्देशक में आपका अख्स दिखा। यह संयोग है कि यह आपके बैनर तले बनी फिल्म है। मैं मोहित के साथ काम करने की ख्वाहिशमंद हूं। यह कहने के बाद मैंने फोन रख दिया। एक महीने बाद भट्ट ने फोन करके आफिस बुलाया। उन्होंने कहा कि आपको एक आइडिया सुनाता हूं। अगर पसंद आया तो मैं कहानी लिखूंगा। उसे मोहित निर्देशित करेंगे। मुझे कहानी बेहद पसंद आई। मुझे इंटेस चीजें पसंद हैं। हमारी अध्ूारी कहानी इंटेंस लवस्टोरी है। मुझे अच्छी लगी। मैंने झट से हां कहा। फिर उन्होंने कहानी डेवलप की। फाइनली मुझे कहानी नरेट की। उसे सुनने के बाद बिना कुछ कहे मैं उनके आफिस से निकल गई। फिर मैंने उन्हें मैसेज किया कि आप मेरी खुशी का अंदाज नहीं लगा सकते। मेरे लिए आपका स्क्रिप्ट नरेट करना बहुत बड़ी बात थी। यह हमेशा से मेरी चाहत थी। बीच में वह मुझे फोन करते रहते। उन्होंने मुझे अपनी किताब अ टेस्ट ऑफ लाइफ पढ़ने को दी। उसके साथ कहा कि अंकंवेंशनल लव क्या होता है यह किताब पढ़कर समझ आएगा। मैंने किताब पढ़ी। बीच में कोड्स भेजते। इस तरह मैंने रोल की तैयारी की। जबकि मोहित ज्यादा तैयारी में यकीन नहीं रखते। हमारी दो-दो घंटे मीटिंग होती। उसमें तमाम बातें होती। फिल्म पर महज पांच मिनट बात होती। धीरे-धीरे हमारे बीच कंफर्ट लेवल आ गया। वो एक्टर को तैयारी नहीं कराते। काम की आजादी देते हैं। जहां कमी लगती वहां अपनी राय देते।
    हर दूसरी औरत की कहानी
परिणीता के बाद मैं लवस्टोरी कर रही हूं। भट्ट साहब ने कहा कि यह दूसरी औरत की कहानी है। मैं सहमत हूं उनकी बात से। यह मानसिकता सदियों से चली आ रही कि शादी के बाद औरत आदमी की जागीर हो जाती है। हालांकि यह बात दोनों पक्षों पर लागू होनी चाहिए। आधुनिकता और शिक्षित होने के बावजूद महिलाएं भी इस धारणा से उबर नहीं पाती। आंधी में रहमान सर ने सुचित्रा सेन से कहा था कि राजनीति में रहना तुम्हारी तकदीर है। तुम क्यों शादी ब्याह के झंझट में फंस रही। औरत को सिखाया गया है कि उसकी पहचान मर्द से होती है। यहां पर इमरान का किरदार आरव वसुधा को सिर्फ इंसान के तौर पर देखता है। वह पहली बार किसी ऐसे इंसान से मिलती है जो उसे किसी की बीवी या मां के तौर पर नहीं देखता। फिर उसे प्यार करने लगता है। यह अनजाने में होता है। वसुधा शादी से नाखुश नहीं थी। उसने सोचा नहीं था कि वो शादी से बाहर प्यार महसूस करेगी। उसका पति उसके लिए पजेसिव है। वसुधा के हाथ पर अपना नाम लिखाता है। उसकी सांसों से लेकर उसके जिस्म पर अपना अधिकार मानता है। भट्ट साहब ने कहा कि ऐसे किरदार आपको अपने ईदगिर्द मिल जाएंगे। मैंने सोचा था यह प्रवृत्ति अनपढ़ लोगों में ज्यादा होगी। मगर ये हर जगह व्याप्त है। कहीं कम कहीं ज्यादा।
    मेरी अधूरी कहानी महेश भट्ट की मां की कहानी नहीं है। यह महेश भट्ट के माता-पिता, उनकी सौतेली मां और आसपास के लोगों के जीवन से प्रेरित है। जब उन्होंने मुझे यह बताया तो कहीं न कहीं प्रेशर बढ़ गया था। इस फिल्म को लेकर मैं नर्वस थी। बाद में पता चला इमरान और मोहित भी नर्वस थे। रिलेशनशिप की बारीकियों को जिस गहराई से महेश साहब ने लिखा है मोहित ने उतनी संजीदगी से उसे पर्दे पर उतारा है। यह सीन पढ़कर तुरंत करने वाली फिल्म नहीं है। उसे महसूस करना पड़ता है। फिल्म की कहानी खूबसूरती से कहती है कि सच्चा प्यार आपको बंधन में नहीं बांधता।
    सिर्फ वूमन सेंट्रिक फिल्में करना मेरा लक्ष्य नहीं। मैं अलहदा फिल्में करना चाहती हूं। वूमन सेंट्रिक फिल्म करने से फीस में इजाफा नहीं हुआ है। बल्कि कम फीस में काम करना पड़ता है। हाल में कंगना, प्रियंका और दीपिका की महिला प्रधान फिल्में हिट हुई हैं। वूमन सेंट्रिक अगर यूं ही हिट रही तो हमारा पारिश्रमिक भी हीरो के बराबर हो जाएगा। फिलहाल मैं बेनजीर भुट्टो या सुचित्रा सेन की बायोपिक नहीं कर रही। भुट्टो का प्रस्ताव भी मेरे पास नहीं आया। सुचित्रा सेन का प्रस्ताव आया था। मैं उसे करना चाहती थी। यह फिल्म बंगाली में बनेगी। राइमा सेन अपनी नानी की तरह दिखती हैं। मुझे लगा वो उसके लिए उपयुक्त लगेंगी। फिलहाल टीवी पर एक नान फिक्शन शो करने की सहमति दी है। पहली बार मुझे कोई कांसेप्ट पसंद आया है। यही वजह है कि कोई फिल्म साइन नहीं कर रही।