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Thursday, October 22, 2015

फिल्‍म समीक्षा - शानदार




नहीं है जानदार
शानदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज
    डेस्टिनेशन वेडिंग पर फिल्‍म बनाने से एक सहूलियत मिल जाती है कि सभी किरदारों को एक कैशल(हिंदी में महल या दुर्ग) में ले जाकर रख दो। देश-दुनिया से उन किरदारों का वास्‍ता खत्‍म। अब उन किरदारों के साथ अपनी पर्दे की दुनिया में रम जाओ। कुछ विदेशी चेहरे दिखें भी तो वे मजदूर या डांसर के तौर पर दिखें। शानदार विकास बहल की ऐसी ही एक फिल्‍म है,जो रंगीन,चमकीली,सपनीली और भड़कीली है। फिल्‍म देखते समय एहसास रहता है कि हम किसी कल्‍पनालोक में हैं। सब कुछ भव्‍य,विशाल और चमकदार है। साथ ही संशय होता है कि क्‍या इसी फिल्‍मकार की पिछली फिल्‍म क्‍वीन थी,जिसमें एक सहमी लड़की देश-दुनिया से टकराकर स्‍वतंत्र और समझदार हो जाती है। किसी फिल्‍मकार से यह अपेक्षा उचित नहीं है कि वह एक ही तरह की फिल्‍म बनाए,लेकिन यह अनुचित है कि वह अगली फिल्‍म में इस कदर निराश करे। शानदार निराश करती है। यह जानदार नहीं हो पाई है। पास बैठे एक युवा दर्शक ने एक दृश्‍य में टिप्‍पणी की कि ये लोग बिहाइंड द सीन(मेकिंग) फिल्‍म में क्‍यों दिखा रहे हैं?’
    शानदार कल्‍पना और अवसर की फिजूलखर्ची है। यों लगता है कि फिल्‍म टुकड़ों में लिखी और रची गई है। इम्‍प्रूवाइजेशन से हमेशा सीन अच्‍छे और प्रभावशाली नहीं होते। दृश्‍यों में तारतम्‍य न‍हीं है। ऐसी फिल्‍मों में तर्क ताक पर रहता है,फिर भी घटनाओं का एक क्रम होता है। किरदारों का विकास और निर्वाह होता है। दर्शक किरदारों के साथ जुड़ जाते हैं। अफसोस कि शानदार में ऐसा नहीं हो पाता। जगिन्‍दर जोगिन्‍दर और आलिया अच्‍छे लगते हैं,लेकिन अपने नहीं लगते। उन की सज-धज पर पूरी मेहनत की गई है। उनके भाव-स्‍वभाव पर ध्‍यान नहीं दिया गया है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट अपने नकली किरदारों को सांसें नहीं दे पाते। वे चमकते तो हैं,धड़कते नहीं हैं। फिल्‍म अपनी भव्‍यता में संजीदगी खो देती है। सहयोगी किरदार कार्टून कैरेक्‍टर की तरह ही आए हैं। वे कैरीकेचर लगे हैं। लेखक-निर्देशक माडर्न प्रहसन रचने की कोशिश में असफल रहे हैं।
    फिल्‍म की कव्‍वाली,मेंहदी विद करण और सिंधी मिजाज का कैरीकेचर बेतुका और ऊबाऊ है। करण जौहर को भी पर्दे पर आने की आत्‍ममुग्‍धता से बचना चाहिए। क्‍या होता है कि फिल्‍म इंडस्‍ट्री के इतने सफल और तेज दिमाग मिल कर एक भोंडी फिल्‍म ही बना पाते हैं? यह प्रतिभाओं के साथ पैसों का दुरुपयोग है। फिल्‍म का अंतिम प्रभाव बेहतर नहीं हो पाया है। इस फिल्‍म में ऐसे अनेक दृश्‍य हैं,जिन्‍हें करते हुए कलाकारों को अवश्‍य मजा आया होगा और शूटिंग के समय सेट पर हंसी भी आई होगी,लेकिन वह पिकनिक,मौज-मस्‍ती और लतीफेबाजी फिल्‍म के तौर पर बिखरी और हास्‍यास्‍पद लगती है। शाहिद कपूर और आलिया भट्ट ने दिए गए दृश्‍यों में पूरी मेहनत की है। उन्‍हें आकर्षक और सुरम्‍य बनाने की कोशिश की है,लेकिन सुगठित कहानी के अभाव और अपने किरदारों के अधूरे निर्वाह की वजह से वे बेअसर हो जाते हैं। यही स्थिति दूसरे किरदारों की भी है। पंकज कपूर और शाहिद कपूर के दृश्‍यों में भी पिता-पुत्र को एक साथ देखने का सुख मिलता है। खुशी होती है कि पंकज कपूर आज भी शाहिद कपूर पर भारी पड़ते हैं,पर दोनों मिल कर भी फिल्‍म को कहीं नहीं ले जा पाते।
    लेखक-निर्देशक और कलाकरों ने जुमलेबाजी के मजे लिए हैं। अब जैसे आलिया के नाजायज होने का संदर्भ...इस एक शब्‍द में सभी को जितना मजा आया है,क्‍या दर्शकों को भी उतना ही मजा आएगा ? क्‍या उन्‍हें याद आएगा कि कभी आलिया भट्ट के पिता महेश भट्ट ने स्‍वयं को गर्व के साथ नाजायज घोषित किया था। फिल्‍मों में जब फिल्‍मों के ही लोग,किस्‍से और संदर्भ आने लगें तो कल्‍पनालोक पंक्‍चर हो जाता है। न तो फंतासी बन पाती है और न रियलिटी का आनंद मिलता है। मेंहदी विद करण ऐसा ही क्रिएटेड सीन है।
    शानदार की कल्‍पना क्‍लाइमेक्‍स में आकर अचानक क्रांतिकारी टर्न ले लेती है। यह टर्न थोपा हुआ लगता है। और इस टर्न में सना कपूर की क्षमता से अधिक जिम्‍मेदारी उन्‍हें दे दी गई है। वह किरदार को संभाल नहीं पातीं।
हां,फिल्‍म कुछ दृश्‍यों में अवश्‍य हंसाती है। ऐसे दृश्‍य कुछ ही हैं।
(घोड़ा चलाना क्‍या होता है ? हॉर्स रायडिंग के लिए हिंदी में घुड़सवारी शब्‍द है। उच्‍चारण दोष के अनेक प्रसंग हैं फिल्‍म में। जैसे कि छीलो को आलिया चीलो बोलती हैं।)
अवधि- 146 मिनट
स्‍टार- दो स्‍टार

अनुभव रहा शानदार - शाहिद कपूर




-अजय ब्रह्मात्‍मज
      उस दिन शाहिद कपूर झलक दिखला जा रीलोडेड के फायनल एपीसोड की शूटिंग कर रहे थे। तय हुआ कि वहीं लंच पर इंटरव्‍यू हो जाएगा। मुंबई के गोरेगांव स्थित फिल्मिस्‍तान स्‍टूडियो में उनका वैनिटी वैन शूटिंग फ्लोर के सामने खड़ा था।
       पाठकों को बता दें कि यह वैनिटी बैन किसी एसी बस का अदला हुआ रूप होता है। इसके दो-तिहाई हिस्‍से में स्‍टार का एकाधिकार होता है। एक-तिहाई हिस्‍से में उनके पर्सनल स्‍टाफ और उस दिन की शूटिंग के लिए बुलाए गए अन्‍य सहयोगी चढ़ते-उतरते रहते हैं। स्‍टार के कॉस्‍ट्यूम(चेंज के लिए) भी वहीं टंगे होते हें। अमूमन सुनिश्चित मेहमानों को इसी हिस्‍से के कक्ष में इंतजार के लिए बिठाया जाता है। स्‍टार की हामी मिलने के बाद बीच का दरवाजा खुलता है और स्टार आप के सामने अपने सबसे विनम्र रूप में रहते हैं। आखिर फिल्‍म की रिलीज के समय इंटरव्‍यू का वक्‍त होता है। स्‍टार और उनके स्‍टाफ को लगता है कि अभी खुश और संतुष्‍ट कर दिया तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। इतनी बार चाय या काफी या ठंडा पूछा जाता है कि लगने लगता है कि अगर अब ना की तो ये जानवर समझ कर मुंह में कांड़ी डाल कर पिला देंगे।
         बहरहाल, उस दिन सब कुछ तय था। निश्चित समय से दस मिनट ज्‍यादा हुए होंगे कि बुला लिया गया। घुसने पर पहले शाहिद की पीठ दिखी। वे कुसर्भ्‍ पर बैठे थे। उनके साने टिफिन रखा था। टिफिन्‍ के डब्‍बों में सब्जियां और दाल थी। रोटी और चावल भी था। बताया गया था कि समय की तंगी की वजह से यह व्‍यवस्‍था की गई है। आप उनके लंच के समय बात कर लें। बात शुरू ही हुई थी कि उनकी मैनेजर भी आकर बैठ गई। अब यह नया सिलसिला है। स्‍टार के साथ बातचीत के समय उनके मैनेजर या पीआर टीम का कोई सदस्‍य बैठ जाता है। उनकी आप की हिंदी बातचीत में कोई रुचि नहीं होती। वे अपनी मोबाइल में उलझी रहती हैं और अपनी मौजूदगी मात्र से डिस्‍टर्ब कर रही होती हैं। सच कहें तो इंटरव्‍यू प्रेमालाप की तरह होते हैं। किसी तीसरे की मौजूदगी कुछ बातें पूछने और बताने से रह जाती हैं। आज का यह विवरण उस परिप्रेक्ष्‍य के लिए है,जिसमें स्‍टार के इंटरव्‍यू होते हैं। और हां,20 मिनट की इस बातचीत में पीआर की एक सदस्‍य तीन बार बताने आई कि आप का समय पूरा हो गया है। इस बातचीत के दौरान शाहिद ने अपना डायट फूड भी खत्‍म किया,क्‍योंकि उन्‍हें शूट के लिए फ्लोर पर जाना था।
          शादी के बाद शाहिद कपूर के जीवन में सबसे बड़ा फर्क यही आया है कि लंच में उनके लिए घर से टिफिन आता है। शाहिद टिफिन के डब्‍बों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं,’ इससे पहले की आप शादी के बारे में पूछें। मैं ही बता देता हूं कि अब घर से टिफिन आता है। डायटिशियन के सुझाव के अनुसार ही सब कुछ तैयार किया जाता है। स्‍वाद और वैरायटी मिल रही है। इसके साथ ही शूटिंग के बाद घर लौटने पर बात करने के लिए कोई रहता है। अच्‍छी बात है कि मीरा का फिल्‍मों से कोई ताल्‍लुक नहीं है। हमलोग कुछ और बातें करते हैं। इस बातचीत में ही हम एक-दूसरे को समझ रहे होते हैं। करीब आ रहे होते हैं।‘

      ‘शानदार’ की बात चलने पर शाहिद कपूर बताते हें,’ विकास बहल से मेरी मुलाकात ‘कमीने’ के समय हुई थी। तब वे डायरेक्‍श्‍न में नहीं आए थे। इस बीव वे डायरेक्‍शन में आ गए। उन्‍होंने पहले एक छोटी फिल्‍म और फिर क्‍वीन निर्देशित की। उनकी क्‍वीन बेहद सफल रही,लेकिन मैं बता दूं कि मैंने शानदार उनकी क्‍वीन की सफलता के पहले ही साइन कर ली थी। विकास में अलग सी एनर्जी और उत्‍साह है। आप उन्‍हें ना नहीं कह सकते। उन्‍होंने बताया था कि उन्‍हें डेस्टिनेशन वेडिंग पर एक मजेदार फिल्‍म करनी है। मुझे उनका आयडिया पसंद आया और मैंने हां कर दी। हिंदी में इस कंसेप्‍ट पर बनी यह अनोखी फिल्‍म है। हिंदी सिनेमा की सभी खासियतों को विकास ने बड़े स्‍केल पर शूट किया है। मौज-मस्‍ती और नाच-गाना सब कुछ है। पूरी फिल्‍म में पार्टी ही चलती रहती है। इसमें मेरे साथ प्रतिभाशाली आलिया भट्ट हैं। यह फिल्‍म मेरे लिए खास है,क्‍योंकि इसमें मेरे पिता पंकज कपूर और मेरी बहन सना कपूर भी हैं। उन सभी के साथ होने से शानदार यादगार फिल्‍म हो गई है।‘
      शाहिद कपूर की फिल्‍मों के चुनाव में एक बदलाव दिख रहा है। वे स्‍पष्‍ट कहते हैं,’पिछले सालों में मैं प्रयोग कर रहा था। हर तरह की फिल्‍मों में हाथ आजमा रहा था। यही चाहत थी कि सफल रहूं। फिर एहसास हुआ कि इस कोशिश में मैं कई चीजें खो रहा हूं और कहीं पहुंच नहीं पा रहा हूं। विशाल भारद्वाज के साथ कमीने करते समय जैसी एकाग्रता और ऊर्जा रहती थी... उसकी कमी महसूस हो रही थी। फिर हैदर आई। उसके बाद सब कुछ तय हो गया। मन की दुविधा और बेचैनी खत्‍म हो गई। मैंने समझ लिया कि सफलता के लिए कोई फिल्‍म नहीं करनी है। वही फिल्‍म करनी है,जहां सुकून मिले और काम करने से संतुष्टि हो। शानदार भी ऐसी ही फिल्‍म है। इसके बाद उड़ता पंजाब आएगी। एके वर्सेस एसके की भी शूटिंग चल रही है। मैंने यह दाढ़ी रंगून के लिए बढ़ा रखी है। विशाल सर ने मुझे कहा कि दाढ़ी बढ़ाओ। देखें फायनली क्‍या लुक मिलता है?’ शाहिद कपूर इन दिनों घनी दाढ़ी में ही हर जगह दिख रहे हैं।
     इस फिल्‍म में शाहिद आने पिता पंकज कपूर के साथ दिखेंगे। पिता के बारे में पूछने पर वे जवाब देते हैं,’ शानदार में डैड के साथ अच्‍छा अनुभव रहा। डैड इतने बड़े एक्‍टर हैं। विकास ने हम दोनों के बीच कुछ मजेदार सीन रखे हैं। ट्रेलर में तो अभी झलक मात्र मिली है। डैड के मुकाबले मैं कहीं नहीं हूं। बाकी,इस फिल्‍म के दृश्‍यों में उनके सामने वह सब विकास ने मुझ से करवाया,जो मैं अपने डैड के सामने जिंदगी में कभी नहीं कर सकता। डैड ने भी खूब मजे लिए।‘  

Sunday, March 16, 2014

द क्वीन मेकर विकास बहल

चवन्‍नी के पाठकों के लिए रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग अक्‍स से साधिकार 
रिस्क लेना विकास बहल की पसंदीदा आदत है और आज उनकी यही क्वालिटी उन्हें फिल्ममेकिंग में लेकर आई है. अपने रोचक सफर को वर्तमान पीढ़ी के यह फिल्मकार रघुवेन्द्र सिंह से साझा कर रहे हैं 
मुंबई शहर की आगोश में आने को अनगिनत लोग तड़पते हैं, मगर यह खुद चंद खुशकिस्मत लोगों को अपनी जमीं पर लाने को मचलता है. विकास बहल ऐसा ही एक रौशन नाम हैं. यह शहर उनके सफर और सपनों का हिस्सा कभी नहीं था, लेकिन आज यह उनकी मंजिल बन चुका है. अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी और मधु मंटेना जैसे तीन होनहार दोस्त मिले, तो उन्हें अपने ख्वाबों का एहसास हुआ. यूटीवी जैसे स्थापित कॉरपोरेट हाउस में अनपेक्षित आय वाली नौकरी को छोडक़र उन्होंने इन दोस्तों के साथ मिलकर फैंटम नाम की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी की नींव रखी. जिसका लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण मनोरंजक फिल्मों का निर्माण करना है. खुशमिजाज, सकारात्मक सोच एवं ऊर्जा से भरपूर विकास ने निर्देशन की ओर पहला कदम बढ़ाया और चिल्लर पार्टी जैसी एक प्यारी-सी फिल्म दर्शकों के बीच आई. अब अपनी दूसरी पिक्चर क्वीन में वह एक ऐसी साहसी लडक़ी की कहानी लेकर आ रहे हैं, जो अकेले हनीमून पर निकल पड़ती है. आइये, विकास बहल के जीवन की मजेदार कहानियां जानते हैं, जिसके हिस्सों को वह किस्सों के रूप में पर्दे पर बारी-बारी से लेकर आ रहे हैं...

मैं मुंबई फिल्म बनाने नहीं आया था. मैं वर्ष 2000 में नौकरी के लिए बैंगलोर गया था. फिर उसी कंपनी (इंडिया.कॉम) ने मेरा ट्रांसफर मुंबई कर दिया. वह कंपनी बंद हो गई. फिर मैंने रेडियो मिर्ची जॉइन किया. वहां मैं मार्केटिंग हेड था. मगर तीन महीने बाद मैंने वह नौकरी छोड़ दी. मुझे काम करने में मजा नहीं आ रहा था. मैंने सोनी जॉइन किया. उस वक्त सोनी ने सब टीवी खरीदा ही था. मैं उसका क्रिएटिव हेड बन गया. जबकि मुझे कुछ नहीं पता था कि टीवी कैसे चलता है. उसके बाद मैंने यूटीवी जॉइन किया. मुझे पता नहीं था कि मुझे फिल्ममेकर बनना है. इस ओर मैं अजय बिजली की वजह से आया. क्योंकि जब मैं सोनी में था, तो वो चाहते थे कि मैं पीवीआर मूवीज जॉइन करूं. उनसे बात चल ही रही थी कि बीच में मैं रॉनी स्क्रूवाला के संपर्क में आया. मैं रॉनी का फैन था. यूटीवी जॉइन करने के बाद मैंने यूटीवी स्पॉटबॉय शुरू किया. अब मुझे पता नहीं था कि पिक्चर बनती कैसे है? पहले हफ्ते मैं कमरे में बैठा रहा. मैं गेम खेलता रहता था. चिल्लर पार्टी मैंने इसलिए लिखनी शुरू की, क्योंकि मेरे पास कुछ काम करने को नहीं था. मैंने तिग्मांशु धूलिया को फोन किया. उनके साथ मैंने सब टीवी के लिए एक शो किया था- मोहल्ला मोहब्बत वाला. वो एक छोटी-सी पर्ची पर पान सिंह तोमर फिल्म लेकर आए. मैंने उनसे कहा कि हम ये पिक्चर बना रहे हैं. उसके दो-तीन बाद मैं राजकुमार गुप्ता से मिला. मैंने आमिर की कहानी सुनी. मैंने उनसे भी कहा कि हम ये फिल्म बना रहे हैं. एक दिन मैं राजकुमार के साथ बैठे था, तो अनुराग कश्यप आ गए. उन्होंने देव डी सुनाई. मैंने कहा कि हम ये फिल्म बना रहे हैं. अब मुझे नहीं पता था कि फिल्म कितने में बनती है. तो मैं सीख-सीख कर यहां तक आया हूं.
                                                    कंगना रनौत और विकास बहल
मुझे रिस्क लेने और एक्सपेरिमेंट करने में मजा आता है. और इसी प्रक्रिया में मुझे यह एहसास हुआ कि मुझे लिखना, डायरेक्शन और प्रोडक्शन आता है. लेकिन एक समय आया, जब मुझे लगा कि मैं अपनी ही टीम को नहीं समझा पा रहा था कि मैं गैंग्स ऑफ वासेपुर क्यों बनाना चाह रहा हूं. तब मैंने तय किया कि अब मुझे किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. मुझे जो करना है, वह बस करना है. मैंने यूटीवी छोड़ दिया. मुझे लगा कि अब नहीं कर सकूंगा, तो कभी नहीं कर सकूंगा. क्योंकि मैं आर्थिक रूप से सिक्योर होता जाता, मेरी रिस्क लेने की आदत जाती रहती. जब मैंने नौकरी छोड़ी, तो मेरे पिता (हरिश्चन्द्र बहल) ने मुझसे बात करनी बंद कर दी. उनको लगा कि ये गलत फैसला है. लेकिन मैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहता था. उस वक्त मेरी पत्नी ऋचा (विकास-ऋचा की लव मैरिज हुई है. ऋचा एक इंटिरियर डिजाइनर हैं) ने बहुत सर्पोट किया. उन्होंने मुझसे तब बस एक बात कही थी कि अगर हमारे कुत्ते का खाना आता रहेगा, तो बाकी सब ठीक है. ऋचा रॉकस्टार हैं.

मेरी मम्मी (उमा बहल) का एक छोटा-सा सपना था, जिसके बारे में उन्होंने मुझे बहुत साल बाद बताया कि वह लाइब्रेरियन बनना चाहती थीं. लेकिन घर, परिवार, बच्चों के चक्कर में वह नहीं बन पाईं. और वह अपनी जिंदगी में बहुत खुश हैं. मगर उनके जीवन में एक और रास्ता खुला होता, तो उन्होंने जीवन में क्या-क्या किया होता. क्वीन फिल्म का विचार मम्मी की वजह से मेरे मन में आया है. लेकिन क्वीन फिल्म में परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि हमें क्वीन का दूसरा पहलू देखने को मिलता है. क्वीन अपनी कहानी की हीरो है और मुझे हीरो की कहानियां बहुत पसंद हैं. क्वीन मेरे लिए कालिया बनाने की तरह है. इसमें केवल अमिताभ बच्चन की जगह कंगना हैं. क्वीन का सिर्फ पॉइंट ऑफ कॉनफ्लिक्ट अलग है. पिछली पिक्चर चिल्लर पार्टी में बच्चों का एक छोटा-सा मुद्दा था. लेकिन जो मुद्दा हमारे लिए छोटा था, वो बच्चों के लिए बड़ा था. मैं अनकंवेन्शनल हीरो से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता हूं. और यही बात चिल्लर पार्टी और क्वीन की दुनिया में कॉमन बात है. कुछ लोगों ने कहा कि क्वीन के लिए कंगना रनौट क्यों? मेरे खयाल से कंगना इस तरह की लड़कियों से परिचित हैं. वह जानती हैं कि अंडर कॉन्फिडेंस लड़कियां किस तरह की होती हैं. अगर मैंने किसी दूसरी एक्ट्रेस को इस किरदार के लिए चुना होता, तो उसे क्वीन को समझने के लिए एक आम घर और कॉलेज में जाना पड़ता. कंगना से बेहतर क्वीन को कोई नहीं निभा सकता था.   
          दोस्तों की टोली विक्रमादित्य मोटवानी, अनुराग कश्यप, मधु मंटेना और विकास बहल जब मैं क्वीन लिख रहा था, तब लोगों को समझाना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था. मेरे लिए लाइफ फनी है. मैं ह्यïूमर बहुत अजीब जगहों में पाता हूं. तो वही फिल्म में आ गया, लेकिन वो बताना मुश्किल था. विक्रम मल्होत्रा ने इस स्क्रिप्ट को ग्रीन लाइट किया था. तब तक किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि हम बनाना क्या चाहते हैं. मैं बहुत सारे स्टूडियोज के पास गया था. लेकिन किसी को मेरी स्क्रिप्ट समझ में नहीं आ रही थी. दरअसल, प्रोडक्शन हाउसेज को सीधे मार्केटिंग के आइडियाज चाहिए होते हैं. उनको कोई कॉनफ्लिक्ट या स्कैंडल चाहिए. इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था. यह सच है कि बहुत-सी अच्छी फिल्में कॉरपोरेट को समझ में नहीं आती हैं, क्योंकि स्क्रिप्ट रिडिंग एक आर्ट है. यह जन्मजात होती है. आप इसे सीख नहीं सकते. हालांकि कॉरेपोरेट में कुछ अच्छे लोग भी हैं. अब कुछ कॉरपोरेट ऐसे हैैं, जो साल में 8 फिल्में बनाते हैं. अब 8 फिल्में बनाने के लिए वह कम से कम 50 रिजेक्ट करेंगे. मतलब कि पचास लोग सडक़ पर घूम रहे हैं, जिनकी फिल्म नहीं बनी और वो कॉरपोरेट को गाली दे रहे हैं. मैं भी उन पचास लोगों में से एक था, जो सडक़ पर गाली दे रहे थे. मगर हमें समझना होगा कि यह एक नई इंडस्ट्री है. कॉरपोरेट में काम करने वाले लोग अलग-अलग इंडस्ट्री से आए हैं. वो सीख रहे हैं. और फिल्ममेकिंग एक जर्नी है, लेकिन स्टूडियोज सोचते हैं कि जब वह ग्रीन लाइट देते हैं, तब वह जर्नी वहीं खत्म हो जाती है. उनको उसके पहले की एक निर्देशक की दो साल की जर्नी को समझना होगा.

जब मैं पहले दिन क्वीन शूट कर रहा था, तो मुझे नीतेश तिवारी (चिल्लर पार्टी के सह-निर्देशक) की बहुत याद आई, क्योंकि नीतेश और मैंने बाय चांस चिल्लर पार्टी साथ में लिखी और डायरेक्ट की थी. हमने कभी बैठकर यह तय नहीं किया था कि वह क्या कर रहा है और मैं क्या कर रहा हूं. किसी को क्रेडिट की नहीं पड़ी थी. मैं थोड़ा रेस्टलेस था, तो मैं मॉनीटर पर नहीं बैठता था, मैं बच्चों के साथ रहता था. नीतेश मॉनीटर के सामने बैठता था. कुछ दिन बाद हमें लगा कि अच्छा है कि दो लोग हैं, वरना ये दस बच्चे और एक कुत्ता अकेले नहीं संभलता. जब मैं क्वीन की शूटिंग करने गया, तो एक-दो दिन तो मुझे पता नहीं था कि कैमरा किधर रखना है. मैंने जाने से पहले अनुराग से बात की कि मैं जा तो रहा हूं, लेकिन ये बताओ कि फिल्म बनाते कैसे हैं? उसने बोला कि तुझे स्टोरी पता है ना, कैमरा रख और शूट कर. मुझे तीन-चार दिन लगे रिद्म आने में और फिर मैं सहज हो गया. मैंने यही समझा है कि अगर आपने अच्छा होमवर्क किया है, आपकी टीम अच्छी है और आपमें ईगो नहीं है, तो फिल्ममेकिंग आसान है. क्वीन की शूटिंग के 45 दिन, मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे दिन थे.  

मेरे समकक्ष पसंदीदा फिल्मकार

राजकुमार हिरानी
वह जिंदगी को खूबसूरती से देखते हैं. उनका नजरिया मेरे जीवन के प्रति अप्रोच से मिलता-जुलता है. हमारी फिल्म चिल्लर पार्टी उनकी वजह से रिलीज हुई. उन्होंने वह फिल्म देखी और कहा कि अब यह मेरी पिक्चर है. वहां से सबको उस फिल्म में विश्वास आना शुरू हुआ. वह चिल्लर पार्टी से निर्माता के तौर पर जुडऩा चाहते थे.

अनुराग कश्यप
अनुराग फिल्ममेकिंग के मामले में इंडिया को एक अलग लेवल पर ले जाएंगे. वह जानते हैं कि एक फिल्म को कैसे दुनिया भर में पहुंचाया जा सकता है. विश्व स्तर पर उन्हें जो पहचान मिल रही है, वह उसके हकदार हैं. क्योंकि उनकी कहानियां आउट्रेजियस होती हैं, तो लोग सोचते हैं कि वह गैर-जिम्मेदार हैं. 

विक्रमादित्य मोटवानी
वह फिल्म इंडस्ट्री में इस वक्त बेस्ट क्राफ्टमैन हैं. कोई अन्य नहीं है, जो उनके जितना फिल्म के हर डिपार्टमेंट को समझता है. वह कमाल के स्टोरीटेलर हैं. वह जिस खूबसूरती के साथ कहानी को बयां करते हैं, उनकी वह कला अतुलनीय है.

विकास बहल के बारे में तीन रोचक तथ्य
-कॉलेज के दिनों में उन्होंने मंडल कमीशन के विरूद्ध काफी धरने दिए थे और मोर्चे निकाले थे. वह आत्मदाह जैसा कदम न उठा लें, इस डर से उनके पिता ने उन्हें दो दिन तक कमरे में बंद कर दिया था.
-जेब खर्च के लिए वह दिल्ली में मेडिकल कॉन्फ्रेंस में अशरिंग का काम किया करते थे. दिवाली में स्टॉल लगाते थे और कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अपनी मंडली बनाकर पैसा इकट्ठा करते थे.
-उन्होंने एमबीए में गोल्ड मेडल हासिल किया है. इस बात का उन्हें अब तक ताज्जुब होता है.

Friday, March 7, 2014

फिल्‍म समीक्षा : क्‍वीन

   जिंदगी की रसधार में डूबी 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
विकास बहल की 'क्वीन' देखते समय एहसास हुआ कि अपने देश में लड़कियां डकार नहीं लेतीं। बचपन से परिवार और समाज की हिदायतों में पलने की वजह से उन्हें ख्याल ही नहीं आता कि डकार भी लिया जा सकता है। पेरिस में विजयलक्ष्मी की डकार पर पर्दे पर चौंकी दिल्ली के राजौरी गार्डन की रानी उर्फ क्वीन की तरह मैं भी चौंक गया था। मेरी विस्मय अलग था कि मुझे यह मामूली स्थिति मालूम नहीं थी। 'क्वीन' एक लड़की के तितली बनने की कहानी है। पंख निकलते ही वह दुनिया से दो-चार होती है। खुद को समझती और फुदकती है।
दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आ रही फिल्मों में शादी एक बड़ा जश्न होता है। इस फिल्म की शुरुआत भी मेंहदी से होती है। चाशनी में डूबी स्वीट रानी की शादी होने वाली है। ढींगड़ा अंकल का बेटा विजय उससे प्रेम करता है। फ्लैशबैक में हम देखते हैं कि वह कैसे रानी पर डोरे डालता है। उसे क्वीन नाम देता है। शादी की रजामंदी के बाद वह लंदन चला जाता है। लंदन से वह शादी के लिए लौटता है तो उसे अपनी रानी पिछड़ी और साधारण लगती है, जिंस पर कुर्ती पहनने वाली दिल्ली के मिडिल क्लास की आम लड़की। लंदन प्रवास में वह ग्लोबल मॉडर्न युवक हो गया है। शादी की नियत तारीख के दो दिन पहले विजय शादी तोड़ देता है। रानी इस झटके को बर्दाश्त नहीं कर पाती, वह एकांत और उपवास में चली जाती है। ऐसे पल में उसकी दादी सलाह देती है, वह दुखी न हो। अपने जीवन के साक्ष्य से वह रानी को वर्तमान और यथार्थ से लड़ने के लिए तैयार करती है। हम देखते हैं कि भूखी रानी पास में पड़े डब्बे से लड्डू निकाल कर गटक लेती है। अभी तक मां, पिता, भाई, सहेली और प्रेमी के साथ पली रानी का अगला फैसला होता है कि वह अकेले ही हनीमून पर जाएगी। उसने पेरिस और एम्सटर्डम जाने का सोच रखा था। घर वाले भी दिल रखने के लिए उसे जाने की इजाजत दे देते हैं।
रानी राजौरी गार्डन के अपने घर से निकलती है तो फिर निकल ही जाती है। पहले पेरिस और फिर एम्सटर्डम में उसका सामना जिन व्यक्तियों, स्थितियों और दिक्कतों से होता है, वे उसका विस्तार करते चले जाते हैं। रुढि़यों और धारणाओं की मैल उतरती चली जाती है। मन से स्वच्छ होते ही उसका पसमंजर बदल जाता है। वह सोच, विचार पहनावे और दृष्टिकोण में बदलती जाती है। रानी के व्यक्तित्व के रूपांतरण को लेखक-निर्देशक ने सहज और स्वाभाविक रखा है। दिल्ली से गई रानी और दिल्ली लौटी रानी की छवि और बॉडी लैंग्वेज को अलग-बगल में रखकर देखें तो यह परिवर्तन साफ नजर आएगा।
हिंदी फिल्मों में नायिका प्रधान, नारी स्वतंत्रता और औरतों की अभिव्यक्ति की फिल्मों में शोषण और दमन की पृष्ठभूमि रहती है। औरतें बिलखती, चीखती और छाती पीटती रहती है। विकास बहल की 'क्वीन' हिंदी फिल्मों की नारी प्रधान फिल्मों की किसी परंपरा का पालन नहीं करती। यह रानी के खुलने और खिलने की कहानी को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में पेश करती है। रानी चीखती नहीं है, सीखती है। अनजाने में हुआ एक्सपोजर उसे बंधनमुक्त कर देता है। फिल्म की कथाभूमि हमारे आसपास की है। रानी मध्यवर्गीय परिवारों की आम लड़की है, जो पंख लगते ही उड़ने को बेताब है। 'क्वीन' हिंदी सिनेमा के पर्दे पर लड़की की स्वच्छंद उड़ान है। वह किसी वाद, सोच और नारे से प्रभावित नहीं है।
कंगना रनौत ने रानी के किरदार को बखूबी पेश किया है। अगर चरित्र और कलाकार के स्वभाव में हल्की सी भी समानता हो तो पर्दे पर किरदार निखर जाता है। कंगना रनौत की 'फैशन' में यही हुआ था। 'क्वीन' में कंगना ने फिर से नैसर्गिक प्रतिभा का परिचय दिया है। उन्होंने रानी के कायांतरण के हर चरण को पूरे प्रभाव से परफॉर्म किया है। उनकी भाव मुद्राएं, संवाद अदायगी और संवादों के शब्द भी किताबी नहीं हैं। निश्चित ही संवादों में कंगना की निजी शब्दावली और एक्सप्रेशन हैं। विजयलक्ष्मी की भूमिका में लीजा हेडेन ने रुढि़मुक्त स्वच्छंद लड़की को फूहड़ और अश्लील नहीं होने दिया है। रानी के व्यक्तित्व व उसकी तब्दीली में उसकी संजीदा भूमिका है। एम्सटर्डम में मिले रानी के रूममेट की भूमिकाओं में आए तीनों कलाकारों ने कथ्य के प्रभाव को बढ़ा दिया है। और राजकुमार राव हमेशा की तरह अपने किरदार के मिजाज में रहते हैं। वे मिले हुए दृश्यों में रानी पर हावी होने की कोई कोशिश नहीं करते।
इस फिल्म का गीत-संगीत भी उल्लेखनीय है। अमित त्रिवेदी के संगीत और अन्विता दत्त के गीतों में रानी की आजादी की चपलता है। गीतों का चयन और फिल्मांकन खूबसूरत है। कहीं भी वह थोपा हुआ नहीं लगता।
'क्वीन' की रानी पर ममता कालिया की ये पंक्तियां सटीक हैं-अपनी मर्जी आप जिएंगे, जीवन का रसधार पिएंगे, कलश उठाकर ओक लगाकर, नहीं चाहिए हमें कृपाएं, करछुल-करछुल चम्मच..चम्मच।
अवधि- 146 मिनट
****  चार स्‍टार

Friday, November 25, 2011

फैंटम के पीछे की सोच

फेंटम के पीछे की सोच-अजय ब्रह्मात्‍मज

मुंबई में आए दिन फिल्मों की लॉन्चिंग, फिल्म कंपनियों की लॉन्चिंग या फिल्म से संबंधित दूसरे किस्म के इवेंट होते रहते हैं। इनका महत्व कई बार खबरों तक ही सीमित रहता है। मुहूर्त और घोषणाओं की परंपरा खत्म हो चुकी है। कॉरपोरेट घराने शो बिजनेस से तमाशा हटा रहे हैं। वे इस तमाशे को विज्ञापन बना रहे हैं। उनके लिए फिल्में प्रोडक्ट हैं और फिल्म से संबंधित इवेंट विज्ञापन...। सारा जोर इस पर रहता है कि फिल्म की इतनी चर्चा कर दो कि पहले ही वीकएंड में कारोबार हो जाए। पहले हफ्ते में ही बड़ी से बड़ी फिल्मों का कारोबार सिमट गया है। इस परिप्रेक्ष्य में मुंबई के यशराज स्टूडियो में नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की लॉन्चिंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

यश चोपड़ा, यशराज फिल्म्स और यशराज स्टूडियो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी के साथ खास किस्म की फिल्मों के एक संस्थान के रूप में विख्यात है। पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य चोपड़ा के विजन से चल रहे इस संस्थान के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का लंबा इतिहास जुड़ा है। सफल और मशहूर यश चोपड़ा की फिल्मों ने ही समकालीन हिंदी सिनेमा की दिशा और जमीन तैयार की है। आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का नया अध्याय आरंभ होता है। आदित्य चोपड़ा की शैली और सोच ने मुख्य रूप से फिल्म इंडस्ट्री से निकले फिल्मकारों को प्रभावित किया। इस तरह के सिनेमा के उत्कर्ष के दिनों में ढेर सारे युवा फिल्मकारों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया। वे अपने साथ नई सोच और शैली लेकर आए। उनके सिनेमा को स्थापित फिल्मकारों के सिनेमा के साथ जगह नहीं मिली। यहां तक कि युवा फिल्मकारों को हतोत्साहित किया गया। उन्हें मौकों और पैसों से महरूम रखा गया, ताकि वे अपने ख्वाबों के सिनेमा को शक्ल न दे सकें।

ऐसे फिल्मकारों में अनुराग कश्यप काफी आगे और वाचाल रहे। उन्होंने अपनी फिल्मों और बयानों से स्थापित सिनेमा को चुनौती दी। उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। उनकी पहली फिल्म पांच अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। फिर भी अनुराग ने हिम्मत नहीं हारी। वे किसी तरह अपनी फिल्में और जगह बनाते रहे। पांव धरने की थोड़ी-सी जगह मिली, तो उन्होंने अपनी मौजूदगी से सभी को चौंका दिया। उनकी फिल्में पसंद की गईं। उससे भी बड़ी बात है कि अनुराग को नई सोच और परिवर्तन का प्रतीक माना गया। यह सच भी है, क्योंकि अनुराग कश्यप और उनके समकालीन फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को ताजगी दी है। हालांकि उन्हें फिल्म इंडस्ट्री के ढांचे में ही काम करना पड़ा और पुराने तरीके के बीच चलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी फिल्मों से स्पष्ट कर दिया है कि उनका सिनेमा हिंदी फिल्मों में कुछ जोड़ रहा है।

अनुराग कश्यप ने अपने मित्रों विक्त्रमादित्य मोटवाणी और विकास बहल के साथ नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की शुरुआत की है। इसमें उनके साथ विक्त्रम मल्होत्रा और मधु मंटेना भी हैं। पांचों ने मिलकर फैंटम की लॉन्चिंग के साथ नई फिल्म लुटेरा की घोषणा की। लुटेरा का निर्देशन विक्त्रमादित्य मोटवाणी कर रहे हैं। इसमें रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा की जोड़ी है। छठे दशक की पृष्ठभूमि पर बन रही लुटेरा पीरियड फिल्म है। फैंटम युवा फिल्मकारों की प्रोडक्शन कंपनी हैं, जिसका उद्देश्य नए विषयों पर अलग किस्म की नई फिल्में बनाना है। अनुराग कश्यप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभी तक हम निर्माताओं के दबाव में रहते हैं। हम अपनी समझ की फिल्में नहीं बना पाते हैं। फैंटम के जरिए कोशिश होगी कि किसी फिल्मकार पर कथित बाजार का दबाव न हो। चूंकि हम सभी क्त्रिएटिव व्यक्ति हैं, इसलिए भी उम्मीद की जा सकती है कि हमारा ध्यान फिल्म के बिजनेस से अधिक विषय पर होगा।

यशराज स्टूडियो में फैंटम प्रोडक्शन कंपनी की लॉन्चिंग वास्तव में पुरानी व्यवस्था की गोद से नई व्यवस्था का जन्म लेना है। हमें इस पहल का स्वागत करना चाहिए।