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Friday, March 10, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया



फिल्‍म रिव्‍यू
दमदार और मजेदार
बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया
-अजय ब्रह्मात्‍मज

शशांक खेतान की बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया खांटी मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍म है। छोटे-बड़े शहर और मल्‍टीप्‍लेक्‍स-सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक इसे पसंद करेंगे। यह झांसी के बद्रीनाथ और वैदेही की परतदार प्रेमकहानी है। इस प्रेमकहानी में छोटे शहरों की बदलती लड़कियों की प्रतिनिधि वैदेही है। वहीं परंपरा और रुढि़यों में फंसा बद्रीनाथ भी है। दोनों के बीच ना-हां के बाद प्रेम होता है,लेकिन ठीक इंटरवल के समय वह ऐसा मोड़ लेता है कि बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया महज प्रेमकहानी नहीं रह जाती। वह वैदेही सरीखी करोड़ों लड़कियों की पहचान बन जाती है। माफ करें,वैदेही फेमिनिज्‍म का नारा नहीं बुलंद करती,लेकिन अपने आचरण और व्‍यवहार से पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलने में सफल होती है। करिअर और शादी के दोराहे पर पहुंच रही सभी लड़कियों को यह फिल्‍म देखनी चाहिए और उन्‍हें अपने अभिभावकों  को भी दिखानी चाहिए।
शशांक खेतान ने करण जौहर की मनोरंजक शैली अपनाई है। उस शैली के तहत नाच,गाना,रोमांस,अच्‍छे लोकेशन,भव्‍य सेट और लकदक परिधान से सजी इस फिल्‍म में शशांक खेतान ने करवट ले रहे छोटे शहरों की उफनती महात्‍वाकांक्षाओं को पिरो दिया है। लहजे और अंदाज के साथ वे छोटे शहरों के किरदारों को ले आते हैं। उन्‍होंने बहुत खूबसूरती से झांसी के सामाजिक ढांचे में मौजूद जकड़न और आ रहे बदलाव का ताना-बाना बुना है। अभी देश में झांसी जैसे हर शहर में ख्‍वाहिशें जाग चुकी है। खास कर लड़कियों में आकांक्षाएं अंकुरित हो चुकी हैं। वे सपने देखने के साथ उन पर अमल भी कर रही हैं।  उसकी वजह से पूरा समाज अजीब सी बेचैनी और कसमसाहट महसूस कर रहा है। नजदीक से देखें तो हमें अपने आसपास बद्रीनाथ मिल जाएंगे,जिन्‍हें अहसास ही नहीं है कि वे अपनी अकड़ और जड़ समझ से पिछड़ चुके हैं। ऐसे अनेक बद्री मिल जाएंगे,जो अपने माता-पिता के दबाव में रुढि़यों का विरोध नहीं कर पाते। हर बद्री की जिंदगी में वैदेही नहीं आ पाती। नतीजा यह होता है कि गुणात्‍मक और क्रांतिकारी बदलाव नहीं आ पाता।
शशांक की बद्रीनाथ की दुल्‍‍हनिया रियलिस्टिक फिल्‍म नहीं है। सभी किरदार लार्जर दैन लाइफ हैं। उनके बात-व्‍यवहार में मेलोड्रामा है। अभिनय और परफारमेंस में भी लाउडनेस है। इन सबके बावजूद फिल्‍म छोटे शहरों की बदलती सच्‍चाई को भावनात्‍मक स्‍तर पर टच करती है। फिल्‍म अपना संदेश कह जाती है। लेखक-निर्देशक किरदारों के जरिए प्रसंगों के बजाए पंक्तियों में यथास्थिति का बयान करते जाते हैं। शशांक खेतान ने किरदारों के बीच इमोशन की मात्रा सही रखी है। फिल्‍म ऐसे अनेक दृश्‍य है,जो भावुक किस्‍म के दर्शकों की आंखें नम करेंगे। शशांक ऐसे दृश्‍यों में ज्‍यादा देर नहीं रुकते।
वरुण धवन बधाई के पात्र हैं। उन्‍होंने ऐसी फिल्‍म स्‍वीकार की,जिसमें नायिका अधिक दमदार और निर्णायक भूमिका में है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे नायकों की भूमिका स्‍टार नहीं,एक्‍टर निभाते हैं। वरुण इस भूमिका में एक्‍टर के रूप में प्रभावित करते हैं। आलिया भट्ट आनी पीढ़ी की समर्थ अभिनेत्री हो चुकी हैं। उनके अथिनय का एक नया आयाम यहां देखने को मिलेगा। वरुण और आलिया दोनों पर्दे पर साथ होने पर अतिरिक्‍त आकर्षण पैदा करते हैं। फिल्‍म के अन्‍य किरदारों में आए कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में सक्षम हैं। उनके योगदान से बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया ऐसी रोचक,मनोरंजक और सार्थक हो पाई है। बद्री के दोस्‍त के रूप में साहिल वैद का अलग से उल्‍लेख होना चाहिए। हिंदी फिल्‍मों के पारंपरिक किरदार दोस्‍त को उन्‍होंने अच्‍छी तरह निभाया है।
फिल्‍म में कुछ कमियां भी हैं। नाच-गानों से भरपूर मनोरंजन की कोशिश में लेखक-निर्देशक ने थोड़ी छूट ली है। कुछ दृश्‍य बेवजह लंबे हो गए हैं। कुछ प्रसंग निरर्थक हैं। फिर भी बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया मेनस्‍ट्रीम फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए कुछ सार्थक संदेश दे जाती है।
अवधि-139 मिनट
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Sunday, March 5, 2017

हिट है हमारी जोड़ी - वरुण धवन



हिट है हमारी जोड़ी - वरुण धवन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कायदे से अभी उन्‍हें एक्टिंग करते हुए पांच साल भी नहीं हुए हैं। अक्‍टूबर 2012 में करण जौहर के निर्देशन में बनी स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर मेकं लांच हुए। तब से यह उनकी आठवीं फिल्‍म होगी। 2014 में आई शशांक खेतान की फिल्‍म हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया की फ्रेंचाइजी फिल्‍म बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में वे फिर से आलिया भट्ट के साथ दिखेंगे। उनकी आठ में से तीन फिल्‍मों की हीरोइन आलिया भट्ट हैं। कह सकते हैं कि दोनों की जोड़ी पसंद की जा रही है। इध हिंदी फिल्‍मों में जोडि़यां बननी बंद हो गई हैं। वरुण व्‍यस्‍त हैं और पांच सालों में ही स्‍क्रीन पर उन्‍होंने परफारमेंस में वैरायटी दिखाई है।
बातचीत की शुरूआत में सोशल मीडिया का जिक्र आ जाता है। वरुण ट्वीटर पर काफी एक्टिव हैं। वे उसका सही उपयोग करते हैं। इसके बावजूद वे कुछ अनग सोचते हैं, मुझे लगता है कि सोशल मीडिया हमें एंटी सोशल बना रहा है। लोग हर बात और घटना को इंटरनेट पर डालना चाहते हैं। हमारी पूरी जिंदगी इंटरनेट तक सिमट गई है। हालांकि एक्‍टर के तौर पर पब्लिसिटी के लिए मैं भी इसका इस्‍तेमाल कर रहा हूं,लेकिन मुझे थोंड़ा अनहेल्‍दी लगता है। संतुलन होना चाहिए। शुद्धता बनी रहेगी। सुकून भी रहेगा। अपनी फिल्‍मों को लेकर वरुण साकांक्ष हैं। वे खयाल रखते हैं, मेरी फिल्‍मों में संदेश भी रहे और एंटरटेनमेंट भी रहे। हंसने के साथ वे कुछ सीख कर निकलें। अभी नहीं बता सकता,लेकिन बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया में एक संदेश है।
वरुण को लांच कर चुके करण जौहर उनके गा इड हैं। किसी फिल्‍म के लिए हां कहने के पहल उनसे सलाह-मशविरा लाजिमी है। वरुण बताते हैं, करण कभी फोर्स नहीं करते। उन्‍होंने इस फिल्‍म के लिए कहा था कि बद्री... की स्क्रिप्‍ट सुन ले। मुझे हां कहते देर नहीं लगी। वे स्‍पष्‍ट करते हैं,य‍ह हंप्‍टी... की सीक्‍वल नहीं हैं। इसे लव फ्रेंचाइज कह सकते हैं। इसमें लड़का झांसी से हैं और लड़की कोटा से है। उनके बीच प्‍यार हो जाता है। दोनों शहरों के बीच चार घंटे की दूरी है,लेकिन यह चार घंटे की दूरी लोगों को बिल्‍कुल अलग कर देती है। पूरी टीम वही है। शशंक और आलिया की वजह से कंफर्ट है। देख-रेख के लिए करण हैं ही। हुई है। यह धर्मा प्रोडक्‍शन की पहली फिल्‍म है,जो झांसी और कोटा जैसे छोटे शहरों में शूटहम सभी साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं। कोई पीछे नहीं छूटा है।
अपनी को-एक्‍टर आलिया भट्ट की प्रशंसा में वरुण पीछे नहीं रहते। साथ ही वे फिल्‍म के बारे में भी बताते हैं, आलिया में जबरदस्‍त निखार आया है। आलिया के साथ काम करने में मजा आता है। हमारा अच्‍छा रिश्‍ता है। हमारी केमिस्‍ट्री दर्शकों को अच्‍छी लग रही है। हमारी पीढ़ी में जोडि़यां नहीं बन पा रही है। अभी तक हमारी पिछली दोनों फिल्‍में चली हैं। उम्‍मीद है कि यह भी चलेगी। धर्मा प्रोडक्‍शन की इस लव स्‍टोरी का फ्लेवर बिल्‍कुल अलग है। जबरदस्‍त ड्रामा है। इस फिल्‍म के लिए मैंने शशांक से वहां के यूथ के वीडियो मंगवाए थे। हाव-भाव और भाषा के लिए उन्‍हें देखा। मेरे घर पर नार्थ के काफी लोग हैं। उनसे सीखा। शशांक से साथ स्क्रिप्‍ट रीडिंग और वॉयस के अभ्‍यास हुए। इन सबसे काफी मदद मिली। सच कहूं तो मैं बद्री की तरह हो गया था।
अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में सफलता और विविधता के लिहाज से वरुण आगे हैं। फिलमों के विषय और रोल पर ध्‍यान दे रहे हैं। वरुण इसका श्रेय अपनी टीम और परिवार को देते हैं, मेरे आसपास के लोग नहीं बदले हैं। हां,कुछ नए जुड़ गए हैं। मेरी सफलता को क्रेडिट उन्‍हें मिलना चाहिए। शशांक और डैड के साथ मेरी दूसरी फिल्‍में आ रही हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे निर्देशक मुझे रिपीट करें। वरुण आज की पीड़ी के युवक हैं। अपने समय और समाज के प्रति जागरुक..वे कहते हैं, हम भी राय रखते हैं। हमारे आसपास जो हो रहा है,उस पर रिएक्‍ट करते हैं। पब्लिक प्‍लेटफार्म पर भले ही खुल कर नहीं बोल सकूं। एक हिंदुस्‍तानी की तरह कुछ चुभता है तो तकलीफ भी होती है। अपनी तकलीफ जाहिर नहीं कर पाते। अपनी पीढ़ी के बारे में यही कहूंगा कि वे जल्‍दबाजी में रिएक्‍ट न करें। पहले रिएक्‍ट कर सिकंदर न बनें। अपने फैथ्‍ट्स चेक कर लें।
वरुण की एक्टिंग किसी एक कलाकार से प्रभावित नहीं है,लेकिन मॉम-डैड के प्रभाव में उन्‍होंने पीटर सेलर्स,धर्मेन्‍द्र,देव आनंद और महमूद की काफी फिल्‍में देखी हैं। वरुण की कोशिश रहती है कि वे हिंदी की फिल्‍में देखते रहें। शायद वहीं से उन्‍हें खुराक मिलती हो।

Thursday, October 29, 2015

‘दिलवाले’ में वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्‍मज
       इस साल 18 दिसंबर को रिलीज हो रही दिलवाले वरुण धवन की 2015 की तीसरी फिल्‍म होगी। इस साल फरवरी में उनकी बदलापुर और जून में एबीसीडी 2 रिलीज हो चुकी हैं। दिलवाले उनकी छठी फिल्‍म होगी। स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर के तीन कलाकारों में वरूण धवन बाकी दोनों आलिया भट्ट और सिद्ार्थ मल्‍होत्रा से एक फिल्‍म आगे हो जाएंगे। अभी तीनों पांच-पांच फिल्‍मों से संख्‍या में बराबर हैं,लेकिन कामयाबी के लिहाज से वरुण धवन अधिक भरोसेमंद अभिनेता के तौर पर उभरे हैं।
    वरुण धवन फिलहाल हैदराबाद में रोहित शेट्टी की फिल्‍म दिलवाले की शूटिंग कर रहे हैं। इस फिल्‍म में वे शाह रुख खान के छोटे भाई बने हैं। उनके साथ कृति सैनन हैं। इन दिनों दोनों के बीच खूब छन रही है। पिछले साठ दिनों से तो वे हैदराबाद में ही हैं। आउटडोर में ऐसी नजदीकी होना स्‍वाभाविक है। यह फिल्‍म के लिए भी अच्‍छा रहता है, क्‍योंकि पर्दे पर कंफर्ट और केमिस्‍ट्री दिखाई पड़ती है। हैदराबाद में फिल्‍म के फुटेज देखने को मिले,उसमें दोनों के बीच के तालमेल से भी यह जाहिर हुआ।
    कृति सैनन और वरुण धवन की जोड़ी में एक ही समस्‍या रही। कृति थोड़ी लंबी हैं। उनके साथ के दृश्‍यों में वरुण धवन के लिए पाटला लगाया जाता था। पाटला मचिया या स्‍टूल की तरह का एक फर्नीचर होता है। शूटिंग में इसके अनेक उपयोगों में से एक उपयोग कलाकारों का कद बढ़ाना भी है। अब अगर दिलवाले में कद में छोटे वरुण धवन अगर कृति से लंगे या बराबर दिखें तो याद कर लीजिएगा कि उनके पांव के नीचे पाटला होगा। अस फिल्‍म के शाह रुख खान और काजोल भी लंबाई में कृति से छोटे हैं। वे भी कृति के साथ के दृश्‍यों में सावधान रहे। वैसे,फिल्‍म में कृति के लिए लंबी लड़की संबोधन का इस्‍तेमाल किया गया है।
    वरुण धवन इस फिल्‍म में शाह रुख खान के बेवकूफ छोटे भाई हैं,जिनकी वजह से मुसीबत आती रहती है। दिलवाले में वरुण धवन के दोस्‍त बने हैं वरुण शर्मा। सेट पर सब उन्‍हें चू चा ही कहते हैं। दोनों की दोस्‍ती उस जमाने की फिल्‍मों की याद दिलाएगी,जब हीरो के साथ एक कॉमेडियन चिपका रहता था। उसकी वजह से फिल्‍म में पैरेलल कॉमेडी ट्रैक चलता रहता था। वरुण धवन को अपने हमउम्र वरुण शर्मा के साथ सीन करने में इसलिए भी मजा आया कि दोनों ने मिल कर सीन इम्‍प्रूवाइज करते थे। रोहित ने उन्‍हें कभी-कभी खुली छूट दी। वरुण मानते हैं कि वरुण शर्मा और कृति सैनन ने रियल लाइफ एक्‍सपीरिएंस से फिल्‍म को एनरिच किया है। वे बेहिचक स्‍वीकार करते हें कि मुंबई में फिल्‍म इंडस्‍ट्री की परवरिश की वजह से रियल लाइफ का उनका एक्‍सपोजर कम है।
    वरुण धवन दिलवाले में शाह रुख के साथ काम कर बेहद खुश हैं। वे इसे किसी अचीवमेंट से कम नहीं मानते। वे कहते हें, फिल्‍म आने पर दर्शक खुद ही देख लेंगे। मेरे लिए तो इस फिल्‍म की शूटिंग ही यादगार एक्‍सपीरिएंस रही। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी सीख्‍ तो यह रही कि आप जिस सेट या लोकेशन पर शूट कर रहे हें,उसे अच्‍छी तर‍ह फील करें। उसे महसूस करें। उसकी मौजूदगी को अपने अंदर उतार लें। मेरे खयाल में इस से सेट और लोकेशन से रिश्‍ता बन जाता है। मैंने देखा है कि शाह रुख खान बगैर बताए हुए शूट से पहले अपने सेट पर घूमते हैं। एक-एक चीज को छूते हैं। इस स्‍पर्श से उनसे आत्‍मीय रिश्‍ता बन जाता है। मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया में सेट की सही जानकारी भी मिल जाती है। स्‍पेस के साथ यह भी पता चल जाता है कि कौन सी चीज कैसी है ? अब अगर दीवार ईंट की है तो आप उस पर झटके के साथ टिक सकते हैं। वही दीचार प्‍लायवुड की है तो अलग ढंग से भार डालना होगा।
    वरुण धवन को दिलवाले में रोहित शेट्टी के निर्देशन में एक्‍शन और कॉमेडी के नए गुर मिले।
   
     

Friday, June 19, 2015

फिल्‍म समीक्षा : एबीसीडी 2

स्‍टार- **1/2 ढाई स्‍टार

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
रैमो डिसूजा की फिल्म ‘एबीसीडी 2’ में डांस है, जोश है, देशभक्ति और अभिमान भी है, वंदे मातरम है, थोड़ा रोमांस भी है...फिल्मों में इनसे ही अलग-अलग संतुष्ट होना पड़ेगा। दृश्ये और प्रसंग के हिसाब से इन भाव और भावनाओं से मनोरंजन होता है। कमी रह गई है तो बस एक उपयुक्त कहानी की। फिल्म सच्ची कहानी पर आधारित है तो कुछ सच्चाई वहां से ले लेनी थी। कहानी के अभाव में यह फिल्म किसी रियलिटी शो का आभास देती है। मुश्किल स्टेप के अच्छेे डांस सिक्वेंस हैं। डांस सिक्वेंस में वरुण धवन और श्रद्धा कपूर दोनों सुरु और विन्नी के किरदार में अपनी लगन से मुग्ध करते हैं। कहानी के अभाव में उनके व्यक्तिगत प्रयास का प्रभाव कम हो जाता है। पास बैठे युवा दर्शक की टिप्पणी थी कि इन दिनों यूट्यूब पर ऐसे डांस देखे जा सकते हैं। मुझे डांस के साथ कहानी भी दिखाओ।

 सुरु और विन्नी मुंबई के उपनगरीय इलाके के युवक हैं। डांस के दीवाने सुरु और विन्नी का एक ग्रुप है। वे स्थानीय स्तुर पर ‘हम किसी से कम नहीं’ कंपीटिशन में हिस्सा लेते हैं। नकल के आरोप में वहां उनकी छंटाई हो जाती है। उसकी वजह से जगहंसाई भी होती है। इस तौहीन के बावजूद उनका जोश ठंडा नहीं होता। वे मशहूर डांसर विष्णु को ट्रेनिंग के लिए राजी करते हैं (विष्णु सर को राजी करने के दृश्य में दोहराव से फिल्म खिंचती है। विष्णु सर अपने फ्लैट में आते समय एक खास जगह पर ही लड़खड़ाते हैं। हंसे नहीं, शायद कैमरे के एंगल से वह सही जगह हो)। बहरहाल, विषणु सर राजी तो होते हैं, लेकिन उनका कुछ और गेम प्लान है। फिल्म में आगे वह जाहिर होता है, फिर भी ड्रामा नहीं बन पाता। ‘एबीसीडी 2’ में ड्रामा की कमी है। इस कमी की वजह से ही सुरु और विन्नी का रोमांस भी नहीं उभर पाता। नतीजतन दोनों के बीच का रोमांटिक सॉन्ग अचानक और गैरजरूरी लगता है। 

प्रभु देवा फिल्मों के बेहतरीन डांसर हैं। बतौर निर्देशक उनकी कुछ फिल्में सफल भी रही हैं। मतलब वे एक्टरों से अभिनय वगैरह भी करवा लेते हैं, किंतु खुद अभिनय करते समय वे निराश करते हैं। उनके लिए कुछ नाटकीय दृश्य रचे भी गए है, लेकिन वे उसमें परफार्म नहीं कर सके हैं। डांस के गुरू के तौर उन्हें कुछ सीन मिल सकते थे। वरुण धवन और श्रद्धा कपूर ने मुश्किल स्टेप भी सहज तरीके से अपनाए हैं। ऐसा नहीं लगता कि वे मेहनत कर रहे हैं। एक्टर दृश्यों को एंजॉय करें तो इफेक्ट गहरा होता है। दोनों अभी दो-तीन फिल्मो ही पुराने हैं। दिख रहा है कि वे हर फिल्म के साथ आगे बढ़ रहे हैं। पर्दे पर लगातार दिखने से स्वीकृति बढ़ती है और परफार्मेंस पसंद आ जाए तो स्टारडम में इजाफा होता है। सुरु और विन्नी की टीम के अन्य सदस्य भी डांस के दृश्यों में उचित योगदान करते हैं। अपनी पहली फिल्म ‘वेलकम टू कराची’ में निराश कर चुकी लॉरेन गॉटलिब ‘एबीसीडी 2’ में जंचती हैं। उनका डांस सिक्वेंस नयनाभिरामी (आई कैचिंग) है।

 रैमो डिसूजा ने फिल्मा में भव्यता रखी है। डांस कंपीटिशन के सेट चकमदार होने के साथ ही आकर्षक हैं। डांस के स्टेप्स नए और प्रभावशाली हैं। यहां तक कि विदेशी टीमों के नृत्यों पर भी पूरा ध्यान दिया गया है। कमी रह गई है सिर्फ कहानी की, जिसका जिक्र पहले भी किया गया। 
 अवधि- 154 मिनट

Friday, February 20, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बदलापुर

-अजय ब्रह़मात्‍मज 
श्रीराम राघवन की 'बदलापुर' हिंदी फिल्मों के प्रचलित जोनर बदले की कहानी है। हिंदी फिल्मों में बदले की कहानी अमिताभ बच्चन के दौर में उत्कर्ष पर पहुंची। उस दौर में नायक के बदले की हर कोशिश को लेखक-निर्देशक वाजिब ठहराते थे। उसके लिए तर्क जुटा लिए जाते थे। 'बदलापुर' में भी नायक रघु की बीवी और बच्चे की हत्या हो जाती है। दो में से एक अपराधी लायक पुलिस से घिर जाने पर समर्पण कर देता है और बताता है कि हत्यारे तो फरार हो गए, हत्या उसके साथी जीयु ने की। रघु उसके साथी की तलाश की युक्ति में जुट जाता है। इधर कोर्ट से लायक को 20 साल की सजा हो जाती है। रघु लायक के साथी की तलाश के साथ उस 20वें साल का इंतजार भी कर रहा है, जब लायक जेल से छूटे और वह खुद उससे बदला ले सके।
इस हिस्से में घटनाएं तेजी से घटती हैं। फिल्म की गति धीमी नहीं पड़ती। श्रीराम राघवन पहले ही फ्रेम से दर्शकों को सावधान की मुद्रा में बिठा देते हैं। अच्छी बात है कि टर्न और ट्विस्ट लगातार बनी रहती है। परिवार को खोने की तड़प और बदले की चाहत में रघु न्याय और औचित्य की परवाह नहीं करता। बदले की इस भावना में वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। यहां तक कि लायक की दोस्त झिमली को तकलीफ देने से भी वह बाज नहीं आता। नेकी और बदी गड्डमड्ड होने लगती है। श्रीराम राघवन का यही ध्येय भी है। वे अन्य फिल्मों की तरह अपने नायक को दूध का धुला नहीं दिखाते। हम नेक नायक को खल नायक में बदलते देखते हैं। रघु किसी भी सूरत में लायक और उसके साथी से अपनी बीवी और बच्चे की हत्या का बदला लेना चाहता है। इस प्रक्रिया में वह निर्मम होता जाता है।
कहानी पंद्रह साल का जंप लेती है। लायक पंद्रह साल की सजा काट चुका है। पता चलता है कि उसे कैंसर हो चुका है और अब उसकी जिंदगी का एक साल ही बचा है। कैदियों की भलाई के लिए काम कर रहे एक एनजीओ की कार्यकर्ता अकेली जिंदगी बसर कर रहे रघु से मिलती है। वह उससे आग्रह करती है कि अगर वह चाहे तो लायक की रिहाई हो सकती है। लायक का आखिरी साल राहत में गुजर सकता है। रघु पहले मना कर देता है, लेकिन लायक के साथी तक पहुंचने की उम्मीद में वह उसकी रिहाई के लिए तैयार हो जाता है। लायक की रिहाई, दूसरे साथी की पहचान और रघु की पूरी होती दिखती रंजिश के साथ घटनाएं तेज हो जाती हैं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि कहानी किरदारों और घटनाओं के बीच उलझ गई है। श्रीराम स्पष्ट हैं। वे फिल्म के क्लाईमेक्स और निष्कर्ष तक बगैर लाग-लपेट के पहुंचते हैं। यहां आगे की घटनाएं और किरदारों के व्यवहार के विस्तार व उल्लेख से दर्शकों की जिज्ञासा बाधित होगी। मजा किरकिरा होगा।
श्रीराम राघवन ने बदले की इस अनोखी कहानी में ग्रे किरदार भी अपना रंग बदलते हैं। 'बदलापुर' सिर्फ बदले की कहानी नहीं है। यह बदले में आए बदलाव की भी कहानी है। सब कुछ बदल जाता है। अच्छा अच्छा नहीं रहता और बुरे का बदला हुआ आचरण सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वह सचमुच बुरा था? नैतिकता और आदर्श को परिस्थितियों और मनोभावों के बरक्स देखना होगा। रघु और लायक के व्यवहारों को हम पारंपरिक चश्मे से नहीं आंक सकते। इस फिल्म में गौर करें तो अच्छा बुरा है और बुरा अच्छा है। श्रीराम दोनों किरदारों की जटिलताओं में गहरे घुसते हैं और उनके अंतस को उजागर कर देते हैं। हम जो देखते और पाते हैं, वह हमारे समय के उलझे समाज का द्वंद्व है। फिल्म समाप्त होने के बाद उलझन बढ़ जाती है कि किसे सही कहें और किसे गलत?
मेरे खयाल में फिल्म का कथ्य उस सामान्य दृश्य में है जब लायक अपनी मां से पिता के बारे में पूछता है। मां कहती है-क्यों पुराने चावल मे कीड़े ढ़ूंढ रहा है। मां के पास पिता के बारे में अच्छा बताने के लिए कुछ भी नहीं है। लायक को गहरी चोट लगती है। उसका एहसास जागता है। वह मां को कुछ कहता हुआ निकलता है। उसके बाद की घटना बताना उचित नहीं होगा। फिल्म के अंत में लेखक-निर्देशक ने झिमली के जरिए अनावश्यक ही अपनी बात और लायक की मंशा स्पष्ट कर दी है। वह अव्यक्त रहता तो ज्यादा प्रभावी बात होती।
वरुण धवन अपेक्षाकृत नए एक्टर हैं। उनकी मेहनत जाहिर है। उन्होंने रघु के बदलते भावों को व्यक्त करने में अच्छी-खासी मेहनत की है। दूसरी तरफ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फितरत प्रभावित करती है। वरुण की मेहनत और नवाज की फितरत से 'बदलापुर' रोचक और रोमांचक हुई है। वरुण सधे अभिनेता नवाज के आगे टिके रहते हैं। नवाज हमारे समय के सिद्ध अभिनेता हैं। लायक हमारे मन में एक साथ घृणा और हास्य पैदा करता है। वह शातिर है, लेकिन कहीं भोला भी है। वह हिंदी फिल्मों के पारंपरिक खल चरित्रों की तरह खूंखार नहीं है, लेकिन उसकी कुटिलता से सिहरन होती है। खूंखार तो हमारा नायक हो जाता है जो जान लेने के लिए आवेश में दस हथौड़े मारते हुए हांफने लगता है। यह फिल्म वरुण और नवाज के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। फिल्म में महिला किरदारों को सीमित स्पेस में ही पर्याप्त महत्व दिया गया है। उन्हें अच्छी तरह गढ़ा गया है। पांचों महिला किरदारों ने अपनी भूमिकाओं को संजीदगी से निभाया है। प्रभावशाली दृश्य राधिका आप्टे और हुमा कुरैशी को मिले हैं। यों दिव्या दत्ता, प्रतिमा कण्णन और यामी गौतम लेश मात्र भी कम असरदार नहीं हैं। कुमुद मिश्रा की सहजता और स्वाभाविकता उल्लेखनीय है।
श्रीराम राघवन ने बदले की रोमांचक फिल्म को नया ट्विस्ट दे दिया है।
अवधि: 147 मिनट
चार स्‍टार ****

Sunday, February 8, 2015

सिर्फ भाई ने किया सपोर्ट - वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्मज
-‘बदलापुर’ हमें बिग बी के एरा वाली फिल्मों की याद दिलाएगी कि नायक को फ्लैशबैक में अपनों से दूर करने वाला शख्स दिखता था। नायक का खून खौलता और वह फिर बदला लेकर ही मानता था?
आपने सही कहा, क्योंकि फिल्म के डायरेक्टर श्रीराम राघवन अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फैन हैं। इत्तफाकन बच्चन साहब की ढेर सारी फिल्में रिवेंज पर बेस्ड रही हैं, मगर ‘बदलापुर’ से हम रिवेंज ड्रामा का पैटर्न तोडऩा चाहते हैं। मिसाल के तौर पर आप अखबार में पढ़ते हो कि एक पति ने पड़ोसी से अफेयर की आशंका में अपनी पत्नी को चाकू से गोद दिया। या फलां अपराधी ने एक मासूम को एक-दो नहीं बीसियों बार तलवार या दूसरे धारदार हथियार से नृशंसतापूर्वक मारा। कोई इस किस्म की नफरत से कैसे लैस होता है, हमने उस बारे में फिल्म में पड़ताल करके बताया है। फिल्म का नायक रघु कुछ उसी तरीके से अपनी पत्नी के हत्यारों का खात्मा करता है। उसका तरीका सही है। फिल्म के अंत में हमने एक मोरल लेसन भी दिया है कि क्या ‘आंख के बदले आंख’ के भाव को न्यायोचित है। हर किरदार परतदार है। हम किसी को एकदम से राइट या रौंग करार नहीं दे सकते।
-‘बदलापुर’ टाइटिल ही रखने की खास वजह? कोई जगह है, जहां फिल्म सेट है या फिर कोई और बात है?
जी हां, फिल्म में बदलापुर एक जगह है, जहां नायक रघु रहता है। दूसरी वजह यह भी है कि फिल्म बदले पर बेस्ड है तो उसका नाम बदलापुर रखा गया है। साथ ही हर किरदार अच्छे से बुरा, बुरा से बढिय़ा, मासूम से निर्मम शख्स में तब्दील होता रहता है तो इसलिए भी फिल्म का टाइटिल बदलापुर है।
-कैरेक्टर क्रिएशन कितना आसान या चुनौतीपूर्ण रहा?
यह देखने में सिंपल रिवेंज ड्रामा लगे, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने श्रीराम से तीन-चार की नैरेशन में इस फिल्म व अपने किरदार को समझा। फिल्म रोलिंग टाइटिल से शुरू भी नहीं होती। सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिखते ही फिल्म की कहानी शुरू हो जाती है। यह काफी सीरियस फिल्म है। उन्होंने अपने पसंदीदा विजय आनंद और हिचकॉक जैसे फिल्मकारों को इस फिल्म से होमेज दिया है। हम कहते रहते हैं कि लोग काफी प्रोग्रेसिव हो गए हैं। यूथ काफी परिपक्व हो गई है, लेकिन वे इस फिल्म को कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, उससे उनकी मैच्योरिटी झलकने वाली है।
- जी हां, श्रीराम की यह खासियत ही कह सकते हैं कि उन्होंने खुद को थ्रिलर से भटकने नहीं दिया?
जी। उन्होंने काफी प्योर थ्रिलर बनाई है। थ्रिलर के लिए दरकार चीजों को काफी अनुशासनात्मक तरीके से फिल्म में पिरोया है। उस किस्म की प्योरिटी व डिसिप्लिन मुझमें पहले नहीं था।
- आप के इस चयन पर जानकार भी हतप्रभ हैं। आप के एक परिचित ने भी बीते दिनों कहा कि करियर के इस मोड़ पर वरुण को यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी?
जी हां। मेरे भी ढेर सारे दोस्तों ने कहा है कि इतने शुरूआती स्तर पर मुझे यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। पिताजी के दोस्तों ने, पिताजी खुद ने मुझसे कहा कि यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। दरअसल बहुत कम लोग जानते हैं कि मैंने यह फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के बाद साइन की थी। बहरहाल मैं एक एक्टर हूं। मेरा बुनियादी फर्ज लोगों को एंटरटेन करना है। उन्हें नया देना है। मुझे अपने इमेज के हिसाब से काम करना होता तो मैं अपने असल उम्र के नायक की भूमिका में कोई डार्क फिल्म करता, लेकिन ‘बदलापुर’ के नायक रघु की एक यात्रा है, जो नयापन लिए हुए है। फिर मैंने तीन साल अदाकारी के जो विविध आयाम बैरी जॉन के यहां सीखे, उन्हें इस किरदार में उड़लेने का मौका मिला, जिसे मैं खोना नहीं चाहता था। फिर इस फिल्म में सह-कलाकार भी मुझे टक्कर वाले मिले, जिनके संग काम कर नई चीजें सीखने को भी मिलीं।
- तो कभी ऐसी फीलिंग आती है कि सामने नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे कद्दावर कलाकार हों तो उन्हें कंपीट करना है?
कंपीट तो नहीं, लेकिन यह भाव रहता है कि मैं कहीं सीन का स्तर कमतर न कर दूं। घबराहट होती थी उनके सामने। एक्टर के तौर पर वे हैं ही इतने कमाल के। वे जब सीन में होते हैं तो एकदम से किरदार मोहम्मद लायक तुगलेकर ही बन जाते हैं। वे जमीन पर बैठ जाते हैं। दिए गए सीन को जान लगाकर निभाते हैं। उन्हें देख मैं भी रघु बन जाता था। सिर्फ यही इरादा बन जाता कि रघु के तौर पर मुझे लायक से बेइंतहा नफरत करनी है। उन्हें पीटना-मारना है। हम दोनों के तार पहले दिन से ही बैठ गए। इस पिक्चर में हम दोनों कपल हैं।
-‘बदलापुर’ करने के लिए सबने आप को मना किया। आप के बड़े भाई की क्या राय थी?
सिर्फ वे ही सपोर्टिव थे। उन्होंने कहा कि ‘बदलापुर’ जरूर करो, क्योंकि उनको विश्वास था कि मैं रघु को निभा लूंगा। उन दिनों वे अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहे थे तो उनकी दाढ़ी  बढ़ी हुई थी। मुझे विचार कौंधा कि रघु के बढ़े हुए ऐज का लुक वैसा ही रहेगा।
- आपने कहा कि हर किरदार के कार्य-कारण की ठोस वजह है। यानी विलेन की करतूतें भी जायज हैं?
यही तो इस फिल्म की यूएसपी है कि फिल्म में कौन विलेन है वह लोगों को तय करना होगा। रघु विलेन है या लायक, वह आप विभेद नहीं कर सकते। जब हम किसी आतंकी की बैक स्टोरी पता करते हैं तो मालूम पड़ता है कि उसने जान-बूझकर हथियार नहीं उठाए। मुझे हैरानी होती है कि लोग आतंकी क्यों बनते हैं? मैं यह नहीं कहता कि वे दया के पात्र हैं, लेकिन उनके खूनी बनने की वजहों की पड़ताल भी जरूरी है। तो हमने ऐसे सवालों के जवाब इस फिल्म में दिए हैं। मेरे ख्याल से यह फिल्म लोगों को प्रेरित करेगी कि अगर कोई क्रिमिनल बन रहा है तो उसे रोक लें।
- आपने यह फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के टाइम पर ही साइन की। फिर आज की तारीख में उसके आने की खास वजह?
‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के तुरंत बाद ‘मैं तेरा हीरो’ और ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ आ गई थी। मैं ‘बदलापुर’ को करने में वक्त लेना चाहता था, क्योंकि यह अलग किस्म की फिल्म है। मैंने कहानी समझने और किरदार को गढऩे में आठ से नौ महीने का वक्त लिया। रघु लोअल मिडिल क्लास फैमिली से बिलौंग करता है, जो असल में मैं नहीं हूं। ऐसे में उसकी जीवनशैली समझने के लिए श्रीराम राघवन ने मुझे 20-25 दिन मुंबई के पास ईगतपुरी इलाके में रहने को कहा। मुझसे दसियों दिन न नहाने को कहा गया। डार्क, डिप्रेसिंग कहानियां पढऩे, समझने को कहा गया। तब जाकर मैं शायद इस लायक बना कि रघु को बेहतर तरीके से निभा सकूं। मैंने उसके लिए अपनी आवाज तक बदली है। लिहाजा फिल्म अब आ रही है।



Friday, July 11, 2014

फिल्‍म समीक्षा : हंप्‍टी शर्मा की दुल्‍हनिया

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हिदी फिल्मों की नई पीढ़ी का एक समूह हिंदी फिल्मों से ही प्रेरणा और साक्ष्य लेता है। करण जौहर की फिल्मों में पुरानी फिल्मों के रेफरेंस रहते हैं। पिछले सौ सालों में हिंदी फिल्मों का एक समाज बन गया है। युवा फिल्मकार जिंदगी के बजाय इन फिल्मों से किरदार ले रहे हैं। नई फिल्मों के किरदारों के सपने पुरानी फिल्मों के किरदारों की हकीकत बन चुके हरकतों से प्रभावित होते हैं। शशांक खेतान की फिल्म 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की रीमेक या स्पूफ नहीं है। यह फिल्म सुविधानुसार पुरानी फिल्म से घटनाएं लेती है और उस पर नए दौर का मुलम्मा चढ़ा देती है। शशांक खेतान के लिए यह फिल्म बड़ी चुनौती रही होगी। उन्हें पुरानी फिल्म से अधिक अलग नहीं जाना था और एक नई फिल्म का आनंद भी देना था।
चौधरी बलदेव सिंह की जगह सिंह साहब ने ले ली है। अमरीश पुरी की भूमिका में आशुतोष राणा हैं। समय के साथ पिता बदल गए हैं। वे बेटियों की भावनाओं को समझते हैं। थोड़ी छूट भी देते हैं, लेकिन वक्त पडऩे पर उनके अंदर का बलदेव सिंह जाग जाता है। राज मल्होत्रा इस फिल्म में हंप्टी शर्मा हो गया है। मल्होत्रा बाप-बेटे का संबंध यहां भी दोहराया गया है। हंप्टी लूजर है। सिमरन का नाम काव्या हो गया है। उसमें गजब का एटीट्यूड और कॉन्फिडेंस है। वह करीना कपूर की जबरदस्त फैन है। काव्या की शादी आप्रवासी अंगद से तय हो गई है। पुरानी फिल्म का कुलजीत ही यहां अंगद है। शादी के ठीक एक महीने पहले काव्या मनीष मल्होत्रा का डिजायनर लहंगा खरीदना चाहती है, जो करीना कपूर ने कभी पहना है। अंबाला में वैसा लहंगा नहीं मिल सकता, इसलिए वह दिल्ली आती है। दिल्ली में हंप्टी और काव्या की मुलाकात होती है। पहली नजर में प्रेम होता है और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की कहानी थोड़े फेरबदल के साथ घटित होने लगती है।
शशांक खेतान की फिल्म पूरी तरह से 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' पर आश्रित होने के बावजूद नए कलाकरों की मेहनत और प्रतिभा के सहयोग से ताजगी का एहसास देती है। यह शशांक के लेखन और फिल्मांकन का भी कमाल है। फिल्म कहीं भी अटकती नहीं है। उन्होंने जहां नए प्रसंग जोड़े हैं, वे चिप्पी नहीं लगते। 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' आलिया भट्ट के एटीट्यूड और वरुण धवन की सादगी से रोचक हो गई है। दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों के मिजाज को अच्छी तरह निभाया है। वरुण के अभिनय व्यवहार में चुस्ती-फुर्ती है। वे डांस, एक्शन और रोमांस के दृश्यों में गति ले आते हैं। दूसरी तरफ आलिया ने इस फिल्म में काव्या की आक्रामकता के लिए बॉडी लैंग्वेज का सही इस्तेमाल किया है। खड़े होने के अंदाज से लेकर चाल-ढाल तक में वे किरदार की खूबियों का उतारती हैं। अलबत्ता कहीं-कहीं उनके चेहरे की मासूमियत प्रभाव कम कर देती है। लंबे समय के बाद आशुतोष राणा को देखना सुखद रहा। बगैर नाटकीय हुए वे आधुनिक पिता की पारंपरिक चिंताओं को व्यक्त करते हैं। हंप्टी शर्मा के दोस्तों की भूमिका में गौरव पांडे और साहिल वैद जंचते हैं। सिद्धार्थ शुक्ला अपनी पहली फिल्म में मौजूदगी दर्ज करते हैं।
शशांक खेतान की 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' हंसाती है। यह फिल्म रोने-धोने और बिछड़े प्रेम के लिए बिसूरने के पलों को हल्का रखती है। भिड़ंत के दृश्यों में भी शशांक उलझते नहीं हैं। यह फिल्म अंबाला शहर और दिल्ली के गलियों के उन किरदारों की कहानी है,जो ग्लोबल दौर में भी दिल से सोचते हैं और प्रेम में यकीन रखते हैं। शशांक खेतान उम्मीद जगाते हैं। अब उन्हें मौलिक सोच और कहानी पर ध्यान देना चाहिए।
अवधि: 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Saturday, October 20, 2012

फिल्‍म समीक्षा : स्टूडेंट ऑफ द ईयर

Review: Student Of The Year-अजय ब्रह्मात्मज
देहरादून में एक स्कूल है-सेंट टेरेसा। उस स्कूल में टाटा(अमीर) और बाटा(मध्यवर्गीय) के बच्चे पढ़ते हैं। उनके बीच फर्क रहता है। दोनों समूहों के बच्चे आपस में मेलजोल नहीं रखते। इस स्कूल के डीन हैं योगेन्द्र वशिष्ठ(ऋषि कपूर)। वे अपने ऑफिस के दराज में रखी मैगजीन पर छपी जॉन अब्राहम की तस्वीर पर समलैंगिक भाव से हाथ फिराते हैं और कोच को देख कर उनक मन में ‘कोच कोच होने लगता है’। करण जौहर की फिल्मों में समलैंगिक किरदारों का चित्रण आम बात हो गई है। कोशिश रहती है कि ऐसे किरदारों को सामाजिक प्रतिष्ठा और पहचान भी मिले। बहरहाल, कहानी बच्चों की है। ये बच्चे भी समलैंगिक मजाक करते हैं। इस स्कूल के लंबे-चौड़े भव्य प्रांगण और आलीशान इमारत को देखकर देश के अनगिनत बच्चों को खुद पर झेंप और शर्म हो सकती है। अब क्या करें? करण जौहर को ऐसी भव्यता पसंद है तो है। उनकी इस फिल्म के लोकेशन और कॉस्ट्युम की महंगी भव्यता आतंकित करती है। कहने को तो फिल्म में टाटा और बाटा के फर्क की बात की जाती है, लेकिन मनीष मल्होत्रा ने टाटा-बाटा के प्रतिनिधि किरदारों को कॉस्ट्युम देने में भेद नहीं रखा है। रोहन और अभिमन्यु के वार्डरोब में एक से कपड़े हैं। फिल्म की नायिका सनाया तो मानो दुनिया के सभी मशहूर ब्रांड की मॉडल है। इस स्कूल में एक पढ़ाई भर नहीं होती,बाकी खेल-कूद,नाच-गाना,लब-शव चलता रहता है। आप गलती से भी भारतभूमि में ऐसे लोकेशन और कैरेक्टर की खोज न करने लगें। स्वागत करें कि करण जौहर विदेश से देश तो आए। भविष्य में वे छोटे शहरों और देहातों में भी पहुंचेगे।
    इस फिल्म की खूबी और कमी पर बात करने से बेहतर है कि हम तीन नए चेहरों की चर्चा करें। करण जौहर ने पहली बार अपनी फिल्म के मुख्य किरदारों में नए चेहरों को मौका देने का साहस दिखाया है। भविष्य में कैरेक्टर और कंटेंट भी देश्ी हो सकते हैं। उनके तीनों चुनाव बेहतर हैं। परफारमेंस के लिहाज से सिद्धार्थ मल्होत्रा बीस ठहरते हैं। फिल्म के लेखक और कहानी का सपोर्ट अभिमन्यु को मिला है, लेकिन उस किरदार में वरुण धवन मेहनत करते दिखते हैं। मुठभेड़, दोस्ती और मौजमस्ती के दृश्यों में सिद्धार्थ और वरुण अच्छे लगते हैं। मनीष मल्होत्रा और सिराज सिद्दिकी ने उन्हें आकर्षक कॉस्ट्युम दिए हैं। फिल्म तो इन दोनों के लिए ही बनाई गई लगती है। इस फिल्म से फैशन का नया ट्रेंड चल सकता है। पहली फिल्म और रोल के हिसाब से आलिया भट्ट निराश नहीं करतीं, लेकिन उनका परफारमेंस साधारण है। आती-जाती और इठलाती हुई वह सुंदर एवं आकर्षक लगती हैं। गानों में भी उन्होंने सही स्टेप्स लिए हैं, लेकिन भावपूर्ण और नाटकीय दृश्यों में उनका कच्चापन जाहिर हो जाता है। फिल्म के सहयोगी कलाकारों का चुनाव उल्लेखनीय है। उन सभी की मदद से फिल्म रोचक बनती है। ऋषि कपूर और रोनित रॉय अपने किरदारों में फिट हैं।
    इस फिल्म के तीनों किरदारों की एंट्री को करण जौहर ने विशेष तरीके से शूट किया है। पुरानी हिंदी फिल्मों के मुखड़े लेकर नए भाव जोड़े गए हैं और उनकी पर्सनैलिटी जाहिर की गई है। फिल्म के गानों में मौलिकता नहीं है। अन्विता दत्त गुप्तन ने पुराने गीतों के मुखड़े लेकर नए शब्दों से अंतरे बनाए हैं। संगीत में भी यही प्रयोग किया गया है। करण जौहर की इस फिल्म में उनकी पुरानी सपनीली मौलिकता भी लुप्त हो गई है। देश के धुरंधर युवा फिल्मकार की कल्पनाशीलता पर कोफ्त होने से भी क्या होगा? इस फिल्म की पैकेजिंग दर्शकों को थिएटर में ला सकती है।
    एक ही अच्छी बात हुई है कि ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ ने कुछ नई और युवा प्रतिभाओं को बड़े पर्दे पर अपना हुनर दिखाने का मौका दिया है। सचमुच हमें हिंदी फिल्मों में नए चेहरों की तलाश है। भले ही वे फिल्मी परिवारों से क्यों न हों?
निर्देशक-करण जौहर, कलाकार- सिद्धार्थ मल्होत्रा, आलिया भट्ट, वरुण धवन, सगीत-विशाल-शेखर, गीत- अन्विता दत्‍त गुप्‍तन,संवाद-निरंजन आयंगार
**१/२ ढाई स्टार
अवधि-146 मिनट