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Wednesday, September 20, 2017

रोजाना : मुश्किलें बढ़ेंगी कंगना की

रोजाना
मुश्किलें बढ़ेंगी कंगना की
-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले हफ्ते रिलीज हुई कंगना रनोट की फिल्म सिमरन दर्शकों को बहुत पसंद नहीं आई है। कंगना के प्रशंसक भी इस फिल्म से नाखुश हैं। उन्हें कुछ ज्यादा बेहतर की उम्मीद थी। इस फिल्म में कंगना रनोट का निजी व्यक्तित्व और सिमरन का किरदार आपस में गड्ड-मड्ड हुए हैं। फिल्म देखते समय दोनों एक दूसरे को ग्रहण लगाते हैं या ओवरलैप करते हैं। नतीजा यह होता है कि हम वास्तविक कंगना और फिल्मी सिमरन के झोल में फंस जाते हैं। सिमरन में हमेशा की तरह कंगना रनोट का काम का काम बढ़िया है,लेकिन फिल्म कहीं पहुंच नहीं पाती है और निराश करती है। ज्यादातर समीक्षकों ने कंगना के काम की तारीफ की है ,जबकि फिल्म उन्हें पसंद नहीं आई है।
ऐसा माना जा रहा है कि 'सिमरन' को अपेक्षित प्रशंसा और कामयाबी नहीं मिलने से कंगना रनोट की मुश्किलें बढ़ेंगी। सभी मानते हैं कि फिल्में नहीं चलती हैं तो फिल्में मिलनी भी कम होती हैं। जो लोग  यह मान रहे हैं कि पहले 'रंगून' और अभी 'सिमरन' के नहीं चलने से कंगना को फिल्में नहीं मिल पाएंगी, वह सरलीकरण के धारणा से ग्रस्त हैं । सच्चाई यह है कि दो-चार फिल्मों के फ्लॉप होने से कंगना के स्तर के स्टार के कैरियर में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। उन्हें फिल्में में मिलती रहती हैं और कंगना रनोट ने तो घोषणा कर रखी है कि 'मणिकर्णिका' के बाद वह अपनी फिल्में खुद ही डायरेक्ट करेंगी। वह लेखन और निर्देशन के प्रति गंभीर हैं। समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है। उन्होंने तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल किया है।
दरअसल कंगना की मुश्किलें दूसरे किस्म की होंगी सिमरन की रिलीज के पहले उन्होंने अपने टीवी इंटरव्यू में जिस ढंग से खुलकर बातें की और ढेर सारे राज और रहस्य उद्घाटित किए कौन से फिल्मी हस्तियां सहम गई है। पिछले दिनों एक पॉपुलर फिल्म स्टार ने स्वीकार किया कि अगर भविष्य में उन्हें कंगना रनोट के साथ कोई फिल्म मिलेगी तो  वे ना कर देंगे। वह ऐसी अभिनेत्री के साथ काम नहीं करना चाहेंगे जिसकी मौजूदगी में बात-व्यवहार को लेकर अधिक सावधानी बरतनी पड़े।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों की तरह बहुत कुछ दवा छुपा और रहस्य में रहता है उनके बारे में सभी जानते हैं लेकिन इंडस्ट्री के बाहर कोई उनकी चर्चा नहीं करता। यहां तक कि मीडिया के लोग भी ऐसे रहस्यों के मामले में अपनी आंखें और मुंह बंद रखते हैं। हिंदी फिल्मों के सभी पॉपुलर स्टार से संबंधित कुछ स्याह किस्से हैं, जो सभी कहते सुनते हो शेयर करते हैं। लेकिन उनके बारे में लेखों और संस्मरणों में कोई नहीं लिखता। एक समझदारी के तहत सब कुछ रोशनी के पीछे ढका रहता है। कंगना रनोट ने अपने वक्तव्यों से ऐसे रहस्यों को प्रकाशित कर दिया है। यही उनकी मुश्किलों का सबब बन गया है। फिल्म इंडस्ट्री का कुनबा उन्हें शक की निगाह से देखता है और आपसी मेलजोल से उन्हें दूर रखता है। अनजाने ही कंगना रनोट को अलग-थलग करने की कोशिशें आरंभ हो गई हैं। अब देखना है की कंगना रनोट इन मुश्किलों से कैसे निबटती हैं?

Wednesday, September 13, 2017

रोजाना : विश्वास जगाती लड़कियां

रोजाना
 विश्वास जगाती लड़कियां
- अजय ब्रह्मात्मज 
आठवें जागरण फिल्म फेस्टिवल के तहत पिछले दिनों रांची और जमशेदपुर में अविनाश दास की फिल्म अनारकली ऑफ आरा दिखाई गई। रांची और जमशेदपुर दोनों ही जगह के शो में भीड़ उमड़ी। हॉल की क्षमता से अधिक दर्शकों के आने से ऐसी स्थिति बन गई कि कुछ दर्शकों को को अंदर नहीं आने दिया गया। रांची और जमशेदपुर के शो हाउसफुल रहे। दोनों शहरों में शो के बाद फिल्म के निर्देशक अविनाश दास और हीरामन की भूमिका निभा रहे इश्‍तेयाक खान से दर्शकों ने सीधी बातचीत की। उन्‍होंने अपनी जिज्ञासाएं रखीं। कुछ सवाल भी किए। अच्‍छी बात रही कि दोनों शहरों में लड़कियों ने सवाल-जवाब के सत्र में आगे बढ़ कर हिस्‍सेदारी की।
अनारकली ऑफ आरा के निर्देशक अविनाश दास के लिए दोनों शहरों के शोखास मायने रख्‍ते थे। मीडिया के उनके दोस्‍त तो वाकिफ हैं। अविनाश दास ने रांची शहर से अपने करिअर की शुरूआत की थी। उन्‍होंने प्रभात खबर में तत्‍कालीन संपादक हरिवंश के मार्गदर्शन में पत्रकारिता और दुनियावी चेतना का ककहरा सीखा। इसी शहर में उनकी पढ़ाई-लिखाई भी हुई। उत्‍तर भारत खास कर बिहार में सातवें-आठवें दशक तक यह चलन था कि अपनी संतान ढंग से पढ़-लिख नहीं रही हो तो उसे किसी कड़क और सख्‍त किस्‍म के रिश्‍तेदार के पास पढ़ने के लिए भेज दिया जाता था। रिश्‍तेदारों पर इतना यकीन रहता था कि वे अपने अभिभावकत्‍व में बच्‍चे का भविष्‍य संवार देंगे। अविनाश्‍दास को दरभंगा से उनके माता-पिता ने उन्‍हें रांची में मामा के पास भेज दिया था। अविनाश के लिए वह भावुक शो था,क्‍योंकि उनकी बहनें और मामी उस शो में मौजूद थीं। भावनाओं का उद्रेकदूसरी तरफ भी दिख रहा था। अविनाश के स्‍कूल और पत्रकारिता के समय के दोस्‍त भी आए थे।
किसी भी उत्‍तर भारतीय के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है। एक फील्‍ड में करिअर के उत्‍कर्ष पर पहुंच कर वह फिल्‍म निर्देशन का सपना पाले और उसे निश्चित समय में पूरा भी कर ले। अनिाश दास को अपनी यात्रा के बारे में खुद लिखना चाहिए। वे लिख सकते हैं। बहरहाल,हम बाते कर रहे थे लड़कियों के सवालों और प्रतिक्रियाओं की। उन सभी को अनारकली की लड़ाई और जीत में अपनी जीत दिख रही थी। वे खुश थीं कि अनारकली ने वीसी चौहान को ललकारा और किसी हिरणी की तरह कुलांचे भरती हुई चलीं। कई लड़कियों केसवाल थे कि परिवार और प्रशासन से समर्थन न मिले तो वे क्‍या करें ? कैसे अपनी प्रतिष्‍ठा बनाए रखें?
रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों की लड़कियां अपने सवालों से यह विश्‍वास जगाने में सफल रहीं कि वे बदल चुकी हैं। वे बेहतरीन और हीरोइन ओरिएंटेड सिनेमा के लिए लालायित हैं।


Wednesday, August 9, 2017

रोजाना : खारिज करने का दौर



रोजाना
खारिज करने का दौर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बकवास...बहुत बुरी फिल्‍म है...क्‍या हो गया है शाह रूख को...इम्तियाज चूक गए। जब हैरी मेट सेजल के बारे में सोशल मीडिया की टिप्‍पणियों पर सरसरी निगाह डालें तो यही पढ़ने-सुनने को मिलेगा। हर व्‍यक्ति इसे खारिज कर रहा है। ज्‍यादातर के पास ठोस कारण नहीं हैं। पूछने पर वे दाएं-बाएं झांकने लगते हैं। यह हमारे दौर की खास प्रवृति है। किसी स्‍थापित को खारिज करो। पहले मूर्ति बनाओ। फिर पूजो और आखिरकार विसर्जन कर दो। हम अपने देवी-देवताओं के साथ यही करते हैं। फिल्‍म स्‍टारों के प्रति भी हमारा यही रवैया रहता है। थिति इतनी नकारत्‍मक हो चुकी है कि अगर आप ने फिल्‍म के बारे में कुछ पाम्‍जीटिव बातें कीं तो ये स्‍वयंभू आलोचक(दर्शक) आप से ही नाराज हो जाएंगे और ट्रोलिंग होने लगेगी1 जब हैरी मेट सेजल सामान्‍य मनोरंजक फिल्‍म है।
सच्‍चाई क्‍या है? हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में जकड़ी यह फिल्‍म किसी सा‍हसिक प्रयोग से बचती है। इम्तियाज अली ने खुद की रोचक शैली विकसित कर ली है। यह उसी शैली की फिल्‍म है। उनके किरदारों(प्रेमियों) का बाहरी विरोध नहीं होता। कोई दीवार नहीं बनता। कोई खलनायक भी नहीं होता। वे खुद के झंझावातों से जूझ रहे होते हैं। संगत और सोहबत में वे खुद को पा लेते हैं। और फिर एक-दूसरे को चाहने लगते हैं। समस्‍या यह है कि हिंदी फिल्‍मों के अधिकांश दर्शकद पॉपुलर फिल्‍मों में कथ्‍य की पुरानी धुरी पर टिके रह कर ही नया आस्‍वादन चाहते हैं। इम्तियाज अली हैरी और सेजल को मिलवाने में उन किरदारों के मिजाज के खिलाफ जाते हैं। हम जिन किरदारों के साथ चल रहे होते हैं। वे ही हमारा हाथ झटक देते हैं।
बहरहाल,किसी भी फिल्‍म का बिजनेस इन दिनों खास महत्‍व रखता है। उस लिहाज से देखें तो जब हैरी मेट सेजल ने वीकएंड में 45.75 करोड़ का लेक्‍शन किया है। बाहुबली,टयूबलाइट और जॉली एलएलबी इससे ऊपर हैं। पहले तीन दिनों में जब हैरी मेट सेजल का कलेक्‍शन 15 करोड़ के आसपास ही रहा। हां,कलेक्‍शन में आवश्‍यक बढ़ोत्‍तरी होती तो परिणाम उत्‍साजनक रहता। फिर भी कह सकते हैं कि दर्शकों की निष्‍ठा विपरीत नहीं हुई है। यह जरूर हुआ है कि शाह रूख खान और इम्तियाज के साथ होने से अपेक्षाएं ज्‍यादा बड़ी और ऊंची थी। माना जा रहा कि इससे शाह रूख खान को जरूरी छलांग मिलेगी। छलांग नहीं लगी,फिर भी जब हैरी मेट सेजल को खारिज करना उचित नहीं होगा। हां,निर्देशक और कलाकारों ने इस फिल्‍म के बारे में दर्शकों को ढंग से नहीं बताया। 

Wednesday, May 24, 2017

रोजाना : रंगोली सजाएंगी नीतू चंद्रा



रोजाना
रंगोली सजाएंगी नीतू चंद्रा
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अगले रविवार से दूरदर्शन से प्रसारित रंगोली की होस्‍ट बदल रही हैं। अभी तक इसे स्‍वरा भास्‍कर प्रस्‍तुत कर रही थीं। 28 मई से नीतू चंद्रा आ जाएंगी। 12 साल पहले हिंदी फिल्‍म गरम मसाला से एक्टिंग करिअर आरंभ कर चुकी हैं। नीतू चंद्रा ने कम फिल्‍में ही की हैं। बहुप्रतिभा की धनी नीतू एक्टिंग के साथ खेल में भी एक्टिव हैं। वह थिएटर भी कर रही हैं। अब वह टीवी के पर्दे को शोभायमान करेंगी। नई भूमिका में वह जंचेंगी। इस बीच उन्‍होंने भोजपुरी और मैथिली में फिल्‍मों का निर्माण किया,जिनका निर्देशन उनके भाई नितिन नीरा चंद्रा ने किया। बिहार की भाषाओं में ऑडियो-विजुअल कंटेंट के लिए कटिबद्ध भाई-बहन का समर्पण सराहनीय है।
रंगोली दूरदर्शन का कल्‍ट प्रोगांम है। कभी हेमा मालिनी इसे प्रस्‍तुत करती थीं। बाद में शर्मिला टैगोर,सारा खान,श्‍वेता तिवारी,प्राची शाह और स्‍वरा भास्‍कर भी होस्‍ट रहीं। सैटेलाइट चैनलों के पहले दूरदर्शन से प्रसारित रंगोली और चित्रहार दर्शकों के प्रिय कार्यक्रम थे। सभी को उनका इंतजार रहता था। दोनों कार्यक्रमों ने कई पीढि़यों का स्‍वस्‍थ मनोरंजन किया है। अभी जरूरत है कि रंगोली की प्रसतुति का कायाकल्‍प हो। होस्‍अ तो सभी ठीक हैं। वे दी गई स्क्रिप्‍ट को अच्‍छी तरह पेश करते हैं। इसके सेट को बदलना चाहिए। कंप्‍यूटरजनित छवियों से आकर्षण और भव्‍यता बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। सुना है कि कुछ म्‍यूजिक कंपनियां रंगोली को अपने गीत नहीं देतीं। रंगोली के बजट में उनकी रॉयल्‍टी नहीं बन पाती। मुझे लगता है कि म्‍यूजिक कंपनियों को रंगोली के लिए थोड़ी राहत देनी चाहिए। उन्‍हें ऐसे क्रम का समर्थन करना चाहिए जो शुद्ध मुनाफे के लिए नहीं तैयार की जातीं।
रंगोली का शैक्षणिक महत्‍व भी है। 1996 में बृज कोठारी ने महसूस किया था कि अगर ऑडियो-विजुअल कंटेंट के साथ सेम लैंग्‍वेज सबटाइटल्‍स दिए जाएं तो वह साक्षरता बढ़ाने के काम आ सकता है। रंगोली में इसे आजमाया गया। रंगोली के गीतों के साथ हिंदी में आ रहे सबटाटल्‍स से नवसाक्षरों में लिखने-पढ़ने की क्षमता बढ़ती है। भारत ही नहीं दूसरे देशों में भी साक्षरता बढ़ाने में सेम लैंग्‍वेज सबटाइटल्‍स उपयोगी रहा है। बीच में कुछ समय के लिए रंगोली के सबटाइटल्‍स बंद हो गए थे। अधिकारियों ने इसकी जरूरत समझ कर फिर से चालू किया है। रंगोली आज भी देश का मनोरंजन करता है। इसके साथ दी गई फिल्‍मी इतिहस के पन्‍नों से दी गई जानकारियां रोचक होती हैं। गॉसिप के बजाए ठोस जानकारियों से दर्शकों की रुचि समृद्ध होती है। हालांकि इन दिनों एफएम चैनल और गानों के ऐप्‍प की भरमार है,लेकिन रंगोली अपनी सादगी और परंपरा में आज भी दर्शकों का चहेता और नियमित कार्यक्रम है। इसे चलते रहना चाहिए।
नीतू चंद्रा अपनी प्रतिभा से इसे और दर्शनीय व आकर्षक बना सकती हैं। उन्‍हें अच्‍छी टीम मिली है। रंगोली का लेखन रीना पारीख करती हैं। उनके जुड़ने के बाद रंगोली निखरी और चटखदार हुई है।