Search This Blog

Showing posts with label रोज़ाना. Show all posts
Showing posts with label रोज़ाना. Show all posts

Monday, May 29, 2017

रोज़ाना : ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म



रोज़ाना
ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कुछ दिनों पहले हालीवुड के स्‍टार ब्रैड पिट कुछ घंटों के लिए भारत आए थे। मौका उनकी नई फिल्‍म के भारत में इवेंट का था। ब्रैड पिट की यह फिल्‍म नेटफिल्‍क्‍स के सहयोग से बनी है। नेटफिल्‍क्‍स ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म है। आप एक निश्चित रकम देकर नेटफिल्‍क्‍स पर फिल्‍में,टीवी शो और अन्‍य ऑडिये-विजुअल कार्यक्रम देख सकते हैं। भारत में नेटफिल्‍क्‍स के साथ अमैजॉन भी भविष्‍य की तैयारियों में है। ये दोनों प्‍लेटफॉर्म बड़ पैमाने पर भारतीय कंटेंट खरीद रहे हैं और भारतीय निर्माताओं व कलाकारों के सहयोग से नए कंटेंट तैयार कर रहे हैं। इन दिनों हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री का हर सक्रिय सदस्‍य किसी न किसी प्रकार इन दोनों ऑन लाइन फल्‍ेटफॉर्म में से किसी एक से जुड़ना चाह रहा है।
ब्रैड पिट ने त्रवार मशीन का निर्माण नेटफिल्‍क्‍स के लिए किया। यह फिल्‍म ऑनलाइन ही देखी जा सकेगी। माना जा रहा है कि सिनेमा का यही भविष्‍य है या फिर एक कमाईदार विकल्‍प है। वार मशीन जैसी फिल्‍में थिएटर रिलीज को ध्‍यान में रख कर नहीं बनाई जा सकती थी। हालीवुड के स्‍टूडियो भी ऐसी फिल्‍मों में निवेश करने से घबराते हैं। ब्रैड पिट ने हिम्‍मत से कामलिय और वार मशीन के ऑनलाइन दर्शकों पर भरोसा किया। मंबई प्रवास में ब्रैड पिट ने शाह रुख खान के साथ एक इंटरव्‍यू भी दिया। वहीं उन्‍होंने नेटफिल्‍क्‍स जैसे प्‍लेटफॉर्म की जरूरत और संभावना पर विचार रखे। भारतीय स्‍टार शाह रूख खान नेभी स्‍वीकार किया कि हमें भी सोचना चाहिए। हमें बाक्‍स आफिस कलेक्‍शन की निर्भरता खत्‍म करनी चाहिए।
भारत में नेटफिल्‍क्‍स और अमैजॉन जैसे ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म की सही भूमिका कुछ सालों में पता चलेगी। संक्षेप में समझने के निए उदाहरण दें तो यह शहरी यायतायात में पॉपुलर हो रहे उबर और ओला के समान है। ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म पारंपरिक एवेन्‍यू के साथ चलेंगे और सिनेमा के लोकतंत्रीकरण में सहायक होंगे। और यह जूरूरी भी है। अभी हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री कुछ घरानों और कारपोरेट हाउस की मुट्टी में है। फिल्‍म के वितरण और प्रदर्शन की लगाम सिनेमा के नए व्‍यापारियोंं ने थाम रखी है। वे अपने छिदले ज्ञान से तय करते हैं कि दर्शकों को किस तरह की फिल्‍में पसंद आएंगी। हाफ गर्लम्‍्रेंड और हिंदी मीडियम ने बाजार को बताया कि दर्शकों को क्‍या पसंद है? इसके बावजूद बेहतरीन फिल्‍मों के प्रति व्‍यापारियों का विश्‍वास नहीं बढ़ रहा है। ऑनलाइन प्‍लेटफॉर्म कंटेंट के सहारे दर्शकों के बीच जगह बनाएगा।
गौर करें तो भारत जैसे विशाल देश में जरूरत है कि सिनेमा का विकेंद्रीकरण हो। स्‍थानीय प्रतिभाओं को स्‍थानीय स्‍तर पर काम मिले। सभी को मुंबई ,चेन्‍नई या हैदराबाद जाने की जरूरत न पड़े। वे अपने माहौल में अपनी कहानियां लेकर आएं तो अपने दायरे में सफलता का इतिहास रच सकते हैं। ब्रैड पिट ने राह दिखाई है। उम्‍मीद है भारतीय स्‍टासर भी अनुकरण करेंगे।

Thursday, May 25, 2017

रोज़ाना : प्रियंका चोपड़ा की 51वीं फिल्‍म



रोज़ाना
प्रियंका चोपड़ा की 51वीं फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
भारत छोड़ कर पूरी दुनिया में आज रिलीज हो रही बेवाचप्रियंका चोपड़ा की पहली हॉलीवुड फिल्‍म है। अगर उनकी हिंदी फिल्‍मों को शामिल कर लें तो यह उनकी 51वीं फिल्‍म होगी। 50 फिल्‍मों के बाद हॉलीवुड में इस दस्‍तक से प्रियंकाचोपड़ा समेत उनके प्रशंसक खुश हैं। किसी भारतीयअभिनेत्री की बड़ी उपलब्धि की तरह इसे पेश किया जारहा है। लोकप्रिय टीवी शो पर आधारित इस फिल्‍म के प्रति दर्श्‍कों केनजरिए में भिन्‍नता हो सकती है,फिर भी यह स्‍वीकार करने में दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए कि प्रियंका चोपड़ा ने कुछ उल्‍लेखनीय हासिल किया है। देसी गर्लके नाम से विख्‍यात प्रियंका चोपड़ा की जमशेदपुर से हॉलीवुडतक की यह यात्रा देसी व छोटे शहर की लड़कियों के लिए मिसाल व प्रेरणा है।
प्रियंका चोपड़ा ने मिस इंडिया के बाद फिल्‍मों में कदम रखा। अपनी गलतियों से सीखती हुई वह आगे बढ़ती रही। माता-पिता के संरक्षण और दिशानिर्देश में प्रियंका चोपड़ा ने छोटी-छोटी कामयाबियों से हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में अपनी जगह बनायी। एक्टिंग करिअर में वह अपने साथ आई लारा दत्‍ता से काफी आगे बढ़ गईं। उन्‍होंने हिंदी फिल्‍मों के सभी मुख्‍य कलाकारों के साथ काम किया। सधी और गंभीर अभिनेत्री की भी छवि बनाई और फैशनके लिए राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार हासिल किया। प्रियंका चोपड़ा ने उसके बाद फिल्‍मों में अपनी भूमिकाओं की वैरायटी पर ध्‍यान दिया। उन्‍होंने विशाल भारद्वाज,आशुतोष गोवारिकर और संजय लीला भंसाली के साथ सराहनीय प्रयोग किए। हालांकि प्रियंका चोपड़ा ने कहीं कहा नहीं,लेकिन हिंदी फिल्‍मों में वह एक सैचुरेशन पाइंट पर पहुंच चुकी थीं। नई भूमिकाओं में भी नवीनता नहीं रह गई थी।
ऐसे ठहराव के दौर में उन्‍हें अपनी गायकी का खयाल आया। उन्‍होंने उसे साधा और अथ्‍यास किया। वह अंग्रेजी में अपने सिंगल्‍स लेकर आईं। विदेशों में पहचान हासिल की। उनका समय अमेरिका में बीतने लगा। तब ऐसा लगा था कि वह तात्‍कालिक चर्च से भटकाव की ओर बढ़ रही हैं। अब ऐसा ल्रता है कि वह उनकी दूरस्‍थ योजनाओं का पड़ाव था। उन्‍होंने अमेहिरकी टीवी शो क्‍वांटिको की भूमिका के लिए हां कहा और अमेरिकी दर्शकों की चहेती बन गईं। क्‍वांटिको के तीसरे सीजन की तैयारी चल रही है। इस टीवी शो के दौरान ही उन्‍हें बेवाच मिली। बेवाच में वह निगेटिव भूमिका में हैं। पहले इस निगेटिव किरदार का नाम विक्‍टर था। उसके लिए किसी पुरुष कलाकार से बात चल रही थी,लेकिन प्रियंका चोपड़ा से मिलने के बाद डायरेक्‍टर सेठ गॉर्डन ने किरदार का नाम विक्‍टोरिया कर दिया। प्रियंका चोपड़ा विक्‍टोरिया के रूप में दिखेंगी।
किसी भारतीय अभिनेत्री के लिए यह छोटी पउलब्धि नहीं है। यहां से नए द्वार खुलेंगे और दूसरी अभिनेत्रियों को भी प्रवेश मिलेगा। भारतीय प्रतिभाएं इंटरनेशनल सिनेमा में चमकने को तैयार हैं। प्रियंका चोपड़ा पहली चकम हैं। पिछले हफ्ते वह बेवाच के प्रमोशन में व्‍यस्‍त रहीं। मौका मिले तो कभी यूट्यूब पर उनके इंटरव्‍यू सुनें और खुश्‍ हों कि बरेली की लड़की अमेरिका के शहरों में आत्‍मविश्‍वास के साथ विचर रही है।

Saturday, May 20, 2017

रोज़ाना : नमक हलाल की री-रिलीज



रोज़ाना
नमक हलाल की री-रिलीज
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस कॉलम की शुरूआत हम ने सुभाष घई की फिल्‍म ताल की खास स्‍क्रीनिंग से की थी। मुंबई में आयोजित उस शो में फिल्‍म के संगीतकार और कैमरामैन आए थे। उन्‍होंने अपनी यादें शेयर की थीं। पुरानी फिल्‍मों को फिर से देखना या पहली बार देखना अनोखा अनुभव होता है। पुरानी पीढ़ी फिल्‍म देखते हुए डायरी के पन्‍ने पलटती है और उस शो में साथ आए दोस्‍तों-परिजनों के साथ उन लमहों को याद करती है। नई पीढ़ी ऐसी फिल्‍मों के जरिए अपने इतिहास से वाकिफ होती है। मोबाइल फोन पर फिल्‍म देखने की सुविधा आ जाने के बावजूद फिल्‍म देखने का पूरा आनंद तो बड़े पर्दे पर ही आता है।
पहले रीरिलीज का चलन था। पुरानी फिल्‍में विभिन्‍न अवसरों और ईद-होली जैसे त्‍योहारों पर रिलीज की जाती थीं। उन्‍हें देखने दर्शक उमड़ते थे। देखना है कि इस रविवार को मुंबई के जुहू पीवीआर और दिल्‍ली के नारायणा पीवीआर में 21 मई रविवार के दिन नमक हलाल देखने कितने दर्शक आते हैं? 30 अप्रैल 1982 को पहली बार रिलीज हुई यह फिल्‍म 35 सालों के बाद 21 मई को फिर से रिलीज हो रही है। प्रकाश मेहरा निर्देशित इस फिल्‍म ने रिलीज के समय तहलका मचाया था। आर्ट और पैरेलल फिल्‍मों की अभिनेत्री स्मिता पाटिल को अमिताभ बच्‍चन के साथ आज रपट जाएं गीत में देख कर सभी चौंके थे।
अमिताभ बच्‍चन ने अपने ब्‍लॉग में कभी लिखा था कि स्मिता पाटिल इस फिल्‍म और खास कर गाने के समय सहज नहीं थीं। दन्‍होंने अमिताभ बच्‍चन से इसका जिक्र भी किया था,लेकिन किसी पेशेवर कलाकार की तरह उन्‍होंने निर्देशक और गाने की जरूरत के मुताबिक अपनी झेंप खत्‍म की। उन्‍होंने गीत के मर्म को समझा और अमिताभ बच्‍चन का बेधड़क साथ दिया। बाद में शक्ति की शूटिंग के समय चेन्‍नई जाते समय उन्‍होंने पाया कि विमान के सहयात्री इसी गाने की वजह से उन्‍हें पहचान रहे हैं।
रविवार के नमक हलाल के शो से अंदाजा लगेगा कि आज के युवा दर्शक पुरानी फिल्‍मों में कितनी रुचि ले रहे हैं? नई बेकार फिल्‍मों की रिलीज में सिनेमाघर आधे से अघिक खाली रहते हैं। बेहतर होगा कि पुरानी चर्चित और कामयाब फिल्‍मों की रिलीज का सिलसिला बने। उन्‍हें दर्शकों का समर्थन मिले।

Wednesday, May 17, 2017

रोज़ाना : चीन में ‘दंगल’ के 420 करोड़



रोज़ाना
चीन में दंगल के 420 करोड़
-अजय ब्रह्मात्‍मज

5 मई 2017 को नितेश तिवारी निर्देशित और आमिर खान अभिनीत दंगल चीन में रिलीज हुई। दंगल भारत की पहली फिल्‍म है,जो इतने व्‍यापक स्‍तर पर चीन में रिलीज हुई है। 9000 से अधिक स्‍क्रीन में एक साथ चल रही दंगल के लिए चीन के दर्शक दीवाने हो गए हैं। चीनी भाषा में इस फिल्‍म का नाम श्‍वाएच्‍याओ पा! पापा रखा गया है,जिसका सीधा अर्थ होगा कुश्‍ती करें,पापादंगल पसंद आने की वजह उसका विषय और बाप-बेटी के रिश्‍तों का इमोशनल कनेक्‍शन है। इस फिल्‍म के प्रति दर्शकों की रुचि का अंदाजा इसी तथ्‍य से लगाया जा सकता है कि पिछले 11 दिनों में दंगल ने चीन में 400 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन किया है। ट्रेड पंडित मान रहे हैं कि 500 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन होगा। भारतीय फिल्‍मों का एक नया बाजार पड़ोस में तैयार हो गया है। पिछले कुछ सालों में भारतीय फिल्‍मों ने चीन में अच्‍छा कारोबार किया है। टॉप बिजनेस कर चुकी छह फिल्‍मों में से चार आमिर खान की हैं।
चीनी अखबारों के मुताबिक पिछले महीने जब आमिर खान पेइचिंग इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल में भाग लेने चीन गए थे तो उनका जोरदार स्‍वागत हुआ था। वे चीन के छंगतू शहर भी गए थे। धूम 3,3 इडियट,पीके और दंगल की कामयाबी से वे चीन में परिचित चेहरा बन चुके हैं। 3 इडियट के बाद से उनमें चीन के यवा दर्शकों ने अधिक रुचि ली,क्‍योंकि वह फिल्‍म कहीं न कहीं उनके ऊपर बन रहे दबावों को भी टच करती थी। दंगल की सफलता अप्रतयाशित नहीं है। चीनी समाज भी भारत की तरह इमोशनल है। पारिवारिक रिश्‍तों में भवनाओं की कद्र होती है। साहित्‍य और सिनेमा में रिश्‍तों और संबंधों की बातें होती हैं।
चीन में हिंदी फिल्‍मों की लोकप्रियता का इतिहास 65 साल पुराना है। राज कपूर की आवारा वहां बड़े पैमाने पर दिखाई गई थी। कई दशकों तक वह चीन में लोकप्रिय रही। 45-50 से अधिक उम्र के सभी चीनी आवारा देख चुके हैं। वे आवारा का शीर्षक गीत आवारा हूं गा सकते हैं। आवारा के रीता और राज ही उन्‍हें हर भारतीय चेहरे में दिखते थे। कहते हैं माओ त्‍से तुंग को भी आवारा पसंद थी। एक सांस्‍कृतिक प्रतिनिधि मंडल के साथ पृथ्‍वीराज कपूर चीन गए थे। वे माओ त्‍से तुंग से मिले तो उनका पहला सवाल यही था कि राज कपूर कैसे हैं? भारत ने चीन में हिंदी फिल्‍मों की लोकप्रियता का कभी राजनयिक उपयोग नहीं किया।
वर्तमान संदर्भ में दंगल की लोकप्रियता उल्‍लेखनीय है। दोनों देशों के राजनयिक संबंध मधुर नहीं हैं,लेकिन सांस्‍कृतिक संबंधों में कोई अड़चन नहीं हैं। वहां के दर्शक बेहिचक दंगल देख रहे हैं। उम्‍मीद है कि जल्‍दी ही बाहुबली 2 भी वहां रिलीज होगी। जरूरत है कि दोनों देशों के बीच फिल्‍मों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन की संभावनाओं को तेज किया जाए।

Tuesday, May 16, 2017

रोज़ाना : 'सिमरन' किरदार से 'सिमरन' फ़िल्म तक कंगना



'सिमरन' किरदार से 'सिमरन' फ़िल्म तक कंगना

कंगना रनोट फिर से सिमरन के किरदार के रूप में आ रही हैं। हंसल मेहता की की ताजा फ़िल्म में वह शीर्षक किरदार निभा रही हैं। कंगना के प्रशंसकों और और फ़िल्मप्रेमियों को याद होगा कि उनकी पहली फ़िल्म 'गैंगस्टर' में भी उनका नाम सिमरन था। अनुराग बसु निर्देशित इस फ़िल्म से कंगना ने जोरदार दस्तक दी थी और हिंदी फिल्मों में खास पहचान के साथ प्रवेश किया था। कंगना सफलता की अद्भुत कहानी हैं। गिरती-संभालती वह आज जिस मुकाम पर हैं,वह खुद में प्रेरक कहानी है। मुमकिन है कल कोई उनके इस सफर पर बायोपिक बनाए की बात सोचे।

'शाहिद' और 'अलीगढ़' जैसी चर्चित फिल्में बना चुके हंसल मेहता के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म के पहले टीज़र ने झलक दी है कि हम कंगना को फिर से एक दमदार किरदार में देखेंगे। 'तनु वेड्स मनु' के दोनों भाग और 'क्वीन' की रवानगी और ऊर्जा का एहसास देता टीज़र भरोसा दे रहा है कि किरदार और कंगना का फिर से मेल हुआ है। हंसल मेहता संवेदनशील फिल्मकार हैं। वे अपने नायकों को भावाभिव्यक्ति के दृश्य और पल देते हैं। पिछली फिल्मों में राजकुमार राव और मनोज बाजपेयी को निखरने का मौका दिया। 'सिमरन' में कंगना रनोट की क्षमता और प्रतिभा के नए पहलू दिख सकते हैं। दूसरी खास बात है कि हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा के निर्देशकों ने जिस तरह से कंगना को नजरअंदाज कर रखा है,वह किसी कलाकार को हताश कर सकता है। लेकिन हम देख रहे हैं कि कंगना अपने तेवर के साथ आगे बढ़ रही हैं।  'सिमरन' उस तेवर का उदाहरण हैं।

कंगना रनोट के कैरियर पर गौर करें तो उन्होंने बगैर किसी गॉडफादर और दिशानिर्देशक के अपनी राह बनाई है। अपनी गलतियों से सीखा से समझा है। के बार लगता है कि कंगना आत्मकेंद्रित कलाकार हैं। असुरक्षा और दबाव में वह आक्रामक हो जाती हैं। उनके आलोचक मानते हैं कि सिर्फ ध्यान खींचने के लिए  वह ऐसे बयान देती हैं। सच्चाई यह है कि कोने में घिरी बिल्ली की तरह कंगना के पास बचाव के लिए आक्रमण ही एकमात्र विकल्प है।

Wednesday, May 10, 2017

रोज़ाना : जस्टिन बीबर का जादू



रोज़ाना
जस्टिन बीबर का जादू
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जस्टिन बीबर को सुनने और देखने के लिए देश के किशोर और युवा मुबई की ओर मुखातिब हैं। भारत की पहली यात्रापर आए जस्टिन बीबर के लिए गजब का उत्‍साह है। जस्टिन बीबर इन दिनों पर्पस वर्ल्‍ड टूर पर हैं। 10 मई को मुंबई के डीवाई पाटिल स्‍टेडियम केशे के तुरंत बाद उन्‍हें 14 मई को दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग और 17 मई को केप टाउन में हिस्‍सा लेना है। जून महीने में वे नीदरलैाड,डेनमार्क,नार्वे,स्‍वीडन,स्विटजरलैंड,इटली,आयरलैंड,फ्रांस,जर्मनी,इंग्‍लैंड और कनाडा के दस शहरों में इसवर्ल्‍ड टूर के तहत वे परफार्म करेंगे। माइकल जैक्‍सन के बाद किसी इंटरनेशनल पॉपसिंगर का यह पहला शो है,जिसके प्रति इतनी जिज्ञासा और जोश है। इस बार इंटरनेट से टिकट बुक्रिग की सुविधा के कारण दूसरे शहरों के युवा और किशोरों ने महीनों पहले से अपनी सीट रिजर्व करा ली है।
पॉप सिंगर जस्टिन बीबर सोशल मीडिया की खोज और पैदाइश हैं। कभी उनकी मां यूट्यूब पर उनके वीडियो डाला करती थीं। धीरे-धीरे वे वीडियो इतने लोक‍प्रिय हुए कि उसने ऐ टैलेंट एजेंट का ध्‍यान खींचा। उसके कुछ पहले अपने शहर के टैलेंट प्रतियोगिता में उन्‍हें दूसरा स्‍थान मिला था। उनकी मां को बेटे के रुझान को जानती थीं। उन्‍होंने दो साल के जस्टिन बीबर को ड्रम लाकर दिया था,जिसे वे शौक से बजाया करते थे। उनका शौक इतना बढ़ गया था कि किसी भी जगह वे ताल बिठाने लगते थे। वे माइकल जैक्‍सन, स्‍टेवी वंडर और दूसरे पॉपुलर सिंगर के गीतों के कवर गाया करते थे और मां उनके वीडियो बना कर यूट्यूब पर डाल दिया करती थी। 2009 में उनका पहला सिंगल आया। उसे अप्रत्‍याशित लोकप्रियता मिली तो उनका पहला अलबम माय वर्ल्‍ड जारी हुआ। चार हफ्तों में उस अलबम की 1 लाख 37 हजार प्रतियां किब गईं। जस्टिन बीबर रातोंरात देश-विदेश मेंपॉपुलर हो गए। 15 साल की उम्र में ही सिंग्रिग सेसेशन बन चुके जस्टिन बीबर अपनी लोकप्रियता के आवेग में बदतमीजी करने से बाज नहीं आए। वे कई बार विवादों में फंसे और जेल भी गए। अपनी करतूतों से उन्‍हें बदनामी भी मिली। उम्र बढ़ने के साथ उनमें सलाहियत आई है,लेकिन कहा जाता है कि वे अपने कंसर्ट में आए प्रशंसकों पर थूक तक देते हैं।
जस्टिन बीबर किसी फेनोमेना से कम नहीं हैं। सिर्फ 24 की उम्र के जस्टिन बीबर की लोकप्रियता आज आकाश छू रही है। मुंबई में उनके कंसट्र में युवा और किशोर दीवानों के साथ शहर की मशहूर हस्तियां भी शामिल हैं। मुंबई के एयरपोर्ट पर उनके प्रशंसकों की एक जमात उनके पहले दर्शन के लिए धरना दिए बैठी है। खबरें आ रही हैं कि जस्टिन बीबर और उनकी लेखिका मां पैट्रिसिया मैलेट के लिए मुंबई की हस्तियां निजी उपहार तैयार कर चुकी हैं।

Tuesday, May 9, 2017

रोज़ाना बाहुबली की अद्वितीय लोकप्रियता


रोज़ाना  बाहुबली की अद्वितीय लोकप्रियता
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इस सदी में ऐसी कोई भारतीय फिल्‍म नहीं दिखती,जिसने पूरे देश दके दर्शकों को समान रूप से आकर्षित किया हो। एसएस राजामौली की बाहुबली के आरंभ और अंत के कलेक्‍शन ने ट्रेड पंडितों को चौंका दिया है। पूरे देश में आहुबली के प्रति खुशी और उत्‍साह की लहर है।ऐसे दर्शक घर से निकल कर सिनेमाघरों में पहुंच रहे हैं,जो सालों से टीवी पर ही फिल्‍में देख रहे थे। बाहुबली की लोकप्रियता अद्वितीय है। उसी अनुपात में उसका कलेक्‍शन भी है। सभी जानते हैं कि बाहुबली 2 ने 1000 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर लिया है। बाहुबली के इस करोड़ से सभी फिल्‍मकारों की सोच में मरोड़ आया है। अच्‍छा है कि हिंदी के निर्माता-निर्देशक भी कुछ बड़ा सोच रहे हैं।
पिछले दिनों उत्‍तर प्रदेश के बनारस और इलाहाबाद जाने का मौका मिला। बनारस में कंगना रनोट की मणिकर्णिका- द क्‍वीन ऑफ झांसी के पोस्‍टा के अनाचरण के साथ फिल्‍म की घोषणा थी। इस अवसर पर कंगना रनोट ने दशाश्‍वमेध घाट की गंगा आरती में हिस्‍सा लिया और गंगा में पवित्र डुबकी भी लगाई। कमल जैन के निर्माण और कृष के निर्देशन में बन रही इस फिल्‍म का वितान बाहुबली के ही समान होगा। निर्माता कमल जैन ने बाहुबली की क्रिएटिव और टेक्‍नीकल टीम को साथ में लिया है। उनकी यह फिल्‍म केवी विजयेन्‍द्र प्रसाद लिख रहे हैं। उम्‍मीदें बड़ गई हैं। माना जा रहा है कि मणिकर्णिका-द क्‍वीन ऑफ झांसी हिंदी व भारतीय फिल्‍मों के लिए मिसाल बनेगी। निश्चित ही इसके बाद राष्‍ट्रवीरों के बॉयोपिक की झड़ी लग सकती है।
इस तथ्‍य से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि दर्शक बाहुबली से मुग्‍ध है। फिल्‍म का अद्वितीय कलेक्‍शन उनकी मुग्‍धता को गाढ़ा कर रहा है। फिल्‍मों की कमाई दर्शक बढ़ाती है। आम दर्शकों पर दबाव बनता है कि वे इस लोकप्रियता से वंचित न रह जाएं। यही कारण है कि दिन और हफ्ता बीतने के बाद भी बाहुबली के दर्शक कम नहीं हो रहे हैं। अभी कोई फिल्‍म के कंटेंट और क्‍वालिटी की बात नहीं कर रहा है। फिल्‍म की तारीफ में फिनहाल क्‍यों पर विचार नहीं हो रहा है। अगर कोई सवाल खड़े कर रहा है तो उस पर समर्थक थू-थू कर पिल जा रहे हैं। किसी भी कृति के लिए यह अच्‍छी बात नहीं है। फिल्‍म हो या अन्‍य कोई सृजतात्‍मक कृति...हम उसकी कमाई और लोकप्रियता से प्रभावित होकर गुणगान में जुट जाएंगे तो उसका सही और संदर्भगत मूल्‍यांकन नहीं कर सकेंगे। और न ही उससे सबक ले पाएंगे।

Wednesday, May 3, 2017

रोज़ाना : मनोरंजन जगत के बाहुबली प्रभास



रोज़ाना
मनोरंजन जगत के बाहुबली प्रभास
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इन दिनों देश के कोने-काने और हर पत्र-पत्रिका और समाचार चैनलों पर किसी न किसी बहाने बाहुबली की ही चर्चा है। यह वाजिब है। बाहुबली ने नए कीर्तिमान स्‍थापित किए हैं। बिजनेस और मनोरंजन के लिहाज से इसकी कामयाबी अद्वितीय है। ऐस नहीं लगता कि हाल-फिलहाल में कोई और फिल्‍म इतनी चर्चित और सफल होगी। फिल्‍म की क्‍वालिटी,कंटेंट और लंबी उम्र पर बाद में बातें होंगी। फिलहाल एसएस राजामौली को सारा श्रेय दिया जा रहा है। वे इसके काबिल हैं,लेकिन इस फिल्‍म की अप्रतिम लोक्रिपयता में बाहुबली बने प्रभास की भी बड़ी भूमिका है।
हिंदी फिल्‍मों के आमिर खान की तरह हम प्रभास के समर्पण पर गर्व कर सकते हैं। युवा अभिनेताओं को उनसे सबक लेनी चाहिए कि अभिनय में एकाग्रता और परिश्रम से अकल्‍पनीय ऊंचाई हासिल की जा सकती है। हिंदी फिल्‍मों में किसी फिल्‍म की कामयाबी का श्रेय हम फिल्‍म के नायक को देते हैं। उस हिसाब से प्रभास हर प्रशंसा के याग्‍य हैं। उनकी फिल्‍म ने अभी तक 1000 करोड़ से अधिक का बिजनेस कर लिया है। अगले कुछ हफ्तों में यह आंकड़ा और ऊपर जाएगा। रजनीकांत,आमिर खान और सलमान खान के अलावा और कोई उनके करीब भी नहीं दिख रहा है। हिंदी दर्शकों के दिलों की धड़कन रणवीर सिंह,रणबीर कपूर और वरुण धवन अभी इस लोकप्रियता से कोसों दूर हैं।
सन् 2002 में तेलुगू फिल्‍मों में आए प्रभास ने पिछले पांच साल बाहुबली को दिए। इन पांच सालों में उन्‍होंने कोई और काम नहीं किया। फिल्‍में नहीं कीं। यहां तक कि 10 करोड़ का एक विज्ञापन भी ठुकराया। उन्‍होंने पूरा ध्‍यान बाहुबली पर लगा रखा था। इस समर्पण की तुलना दंगल और मंगल पांडे के लिए आमिर खान की तैयारी से की जा सकती है। निर्देशक और अभिनेता की ऐसी परस्‍पर समझदारी के परिणाम हमेशा कारगर होते हैं। जल्‍दी ही ऐसा समर्पण हमें अनुराग कश्‍यप की मुक्‍काबाज के विनीत कुमार सिंह में दिखेगा।
बाहुबली के पांच सालों के दौरान ऐसा भी वक्‍त आया,जब प्रभास की आदनी सिकुड़ गई। उन्‍हें आवश्‍यकतानुसार पैसों के लाले पड़े। ऐसे वक्‍त में भी वे नहीं हिले। उनकी छोड़ी हुई फिल्‍में उनके समकालीन प्रति‍द्वंद्वियों को मिलीं और वे फिल्‍में हिट भी हुईं। यह राजामौली का भ्‍रोसा और आश्‍वासन तथा प्रभास का अपना आत्‍मविश्‍वास ही था कि वे डटे रहे। पांच सालों तक बाहुबली का जीते रहे। मालूम नहीं हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री ने उन पर गौर किया है या नहीं? यकीन करें यदि करण जौहर या कोई और उनके साथ कोई हिंदी फिल्‍म बनाता है तो वे कमल हासन और रजनीकांत की तरह दक्षिण से हिंदी फिल्‍मों में आए सुपरस्‍टार का दर्जा पाएंगे। हिंदी के दर्शक उनके स्‍वागत के लिए तैयार हैं। वैसे हिंदी फिल्‍मों के दर्शकों ने उन्‍हें प्रभु देवा निर्देशित अजय देवगन की फिल्‍म एक्‍शन जैक्‍सन में देखा है। याद आया?

Thursday, April 27, 2017

रोज़ाना : क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा



रोज़ाना
क्‍यों नहीं होती दक्षिण भारत के फिल्‍मकारों की चर्चा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिंदी सिनेमा की चर्चा और खबरों के बीच हमारा ध्‍यान दक्षिण भारत की भाषाओं की फिल्‍मों की ओर कम ही जाता है। हम वहां के कलाकारों और निर्देशकों से अपरिचित हैं। तमिल फिल्‍मों के रजनीकांत और कमल हासन के अलावा हम तेलुगू,कन्‍नड़ और मलयालम के कलाकरों के नाम तक नहीं जानते। हालांकि टीवी पर इन दिनों दक्षिण भारतीय भाषाओं की डब फिल्‍मों की बहार है। पिछले साल तूलुगू के पावर स्‍टार पवन कल्‍याण ने बताया था कि बनारस भ्रमण के दौरान वे इस तथ्‍य से चौंक गए कि वहां की गलियों में भी लोगों ने उन्‍हें पहचाल लिया। पता चला के टीवी के जरिए ही उनकी यह पहचान बनी थी। भारत सरकार और प्रदेशों के सिनेमा संबंधी मंत्रालय देश में ही सभी भाषाओं की फिल्‍मों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन में यकीन नहीं रख्‍ते। पिछले साल बिहार सरकार में फिल्‍म वित्‍त निगम के अध्‍यक्ष बनने पर गंगा कुमार प्रादेशिक भाषाओं की फिल्‍मों का फस्टिवल किया था। ऐसी कोशिशें हर प्रदेश में होनी चाहिए।
हाल ही में तेलुगू के श्रेष्‍ठ फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ को दादा साहेब फालके पुरस्‍कार से सम्‍ममानित करने की घोषणा हुई है। इस घोषणा के बावजूद हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और न्‍यूज चैनलों पर उनके बारे में न के बराबर ही लिखा और बताया गया। के विश्‍वनाथ का पूरा नाम काशीनाधुनी विश्‍वनाथ है। 1930 में पैदा हुए के विश्‍वनाथ तेलुगू समाज में प्रात: स्‍मरणीय नाम हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभी ऐसी कोई हस्‍ती नहीं है,जिन्‍हें इस स्‍तर का आदर हासिल हो।  1960 से सक्रिय के विश्‍वनाथ ने पचास से अधिक फिल्‍मों का निर्देशन किया है। उनकी प्रमुख फिल्‍मों में शंकरभरणम,सागर संगमम,स्‍वाति मुतयम,स्‍वयंकृषि और सिरी सिरी मुवा उल्‍लेखनीय हैं। हिंदी के दर्शकों को उनकी ईश्‍वर याद होगी। अनिल कपूर और विजया शांति की यह फिल्‍म के विश्‍वनाथ की ही तेलुगू फिल्‍म की रीमेक थी। के विश्‍वनाथ ने तूलुगू,तमिल और हिंदी में फिल्‍में निर्देशित की हैं।
के विश्‍वनाथ तेलुगू सिनेमा को आम दर्शकों के बीच ले आए। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों में परिचित किरदारों को पेश किया। तेलुगू समाज के पाखंड को उन्‍होंने पर्दे पर बेनकाब किया। सजग चेतना के फिल्‍मकार के विश्‍वनाथ मानते हैं कि सिनेमा से समाज में बदलाव लाश जा सकता है। उन्‍होंने आर्ट फिल्‍में बनाने का दावा नहीं किया। उन्‍की फिल्‍में मध्‍यमार्गी कही जा सकती हैं। मनोरंजन के उद्देश्‍य को पूरा करती उनकी फिल्‍मों में निहित संदेश अवश्‍य रहता था।
फिल्‍म निदेशालय दादा साहेब फालके से सम्‍मानित फिल्‍मकार और कलाकारों की चुनिंदा फिल्‍मों का प्रदर्शन सभी प्रदेशों की राजधानियों और प्रमुख शहरो में आयोजित करे तो हम अने देश की सिनेमाई विविधता और खूबियों से परिचित हो सकते हें।

Saturday, April 22, 2017

रोज़ाना : अनारकली... को मिल रहे दर्शक



रोज़ाना
अनारकली... को मिल रहे दर्शक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हाल ही में अनारकली ऑफ आरा के निर्माता संदीप कपूर और निर्देशक अविनाश दास ने सोशल मीडिया पर शेयर किया कि उनकी फिल्‍म पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर गई है। दिल्‍ली और मुंबई के कुछ थिएटरों में वह अभी तक चल रही है। रांची और जामनगर में वह इस हफ्ते लगी है। किसी स्‍वतंत्र और छोटी फिल्‍म की यह खुशखबर खुद में बड़ी खबर है। हम सभी जानते हैं कि छोटी फिल्‍मों का वितरण और प्रदर्शन एक बड़ी समस्‍या है। पीवीआर के साथ होने पर भी अनारकली ऑफ आरा केवल 277 स्‍क्रीन में रिलीज हुई थी। इस सीमित रिलीज को भी उम्‍त कंपनी ने कायदे से प्रचारित और प्रदर्शित नहीं किया था।
मजेदार तथ्‍य है कि मुंबई में अंधेरी स्थित पीवीआर के एक थिएटर में इम्तियाज अली ने यह फिल्‍म देखी। फिल्‍म देखने के बाद उन्‍होंने निर्देशक अविनाश दास के साथ सेल्‍फी लेने के लिए फिल्‍म के पोस्‍टर या स्‍टैंडी की खाज की तो वह नदारद...उन्‍होंने ताकीद की तो थिएटर के कर्मचारियों ने स्‍टैंडी का इंतजाम किया। तात्‍पर्य यह कों की रुचि कैसी बढ़गी? बहरहाल,अनारकली ऑफ आरा दर्शकों के समर्थन से अभी तक थिएटर में बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया और जॉली एलएलबी2 के साथ टिकी है।
फिल्‍म के विषय के अनुरूप संभावित दर्शकों को टारगेट किया जाता तो इस फिल्‍म को ज्‍यादा दर्शक मिले होते। हर फिल्‍म के खास दर्शक होते हैं। अगर उन दर्शकों के बीच फिल्‍म पहुंच जाए तो उसे लाभ होता है। अनारकली ऑफ आरा मुख्‍य रूप से दिल्‍ली और मुंबई में रिलीज की गई। फिल्‍म के विषय के मुताबिक इसे मझोले और छोटे शहरों में आक्रामक प्रचार के साथ प्रदर्शित किया जाता तो आंकड़े कुछ और होते। दर्शक तो अब भी संकेत दे रहे हैं। अगर इसे नए उत्‍साह और प्रचार के साथ नए शहरों में रिलीज किया जाए तो अवश्‍य ही दर्शक मिलेंगे। अनारकली ऑफ आरा नया उदाहरण पेश करेगी।
सीमित बजट और साधनों के साथ बनी यह फिल्‍म अपने कंटेंट और स्‍वरा भास्‍कर की अदाकारी की वजह से खूब पसंद की गई है। हाल-फिलहाल में किसी दूसरे फिल्‍मकार पर पत्र-पत्रिकाओं में इतना लिखा भी नहीं गया है। यह फिल्‍म आम दर्शकों को टच करती है। सहमति के सवाल को प्रासंगिक संदर्भ में सटीक तरीके से उठाती ंयह फिल्‍म हिंदी सिनेमा के देशज स्‍वर को मुखर करती है। यही वजह है कि इस फिल्‍म के दर्शक बढ़ रहे हैं।
अनारकली ऑफ आरा भाषा,परिवेश और अदाकारी के लि‍हाज से बिहार लक्षणों की खांटी हिंदी फिल्‍म है।

Wednesday, April 19, 2017

रोज़ाना : अशांत सुशांत



रोज़ाना
अशांत सुशांत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दिनेश विजन की फिल्‍म राब्‍ता के ट्रेलर लांच पर सुशांत सिंह राजपूत और फिल्‍म पत्रकार भारती प्रधान के बीच हुई झड़प के मामले में सोशल मीडिया और मीडिया दो पलड़ों में आ गया है। सुशांत का पलड़ा भारी है। फैंस और मीडिया फैंस उनके समर्थन में उतर आए हैं। ऐसा लग रहा है कि गलती भारती प्रधान से ही हुई। अगर उस लांच के वीडियों को गौर से देखें तो पूरी स्थिति स्‍पष्‍ट होगी।
हुआ यों कि सवाल-जवाब के बीच एक टीवी पत्रकार ने कुलभूषण जाधव के बारे में सवाल पूछा,जिन्‍हे कथित जासूसी के अपराध में पाकिस्‍तान ने फांसी की सजा सुनाई है। इस सवाल को सुनते ही थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। फिर कृति सैनन ने निर्देशक दिनेश विजन का फुसफुसाकर सुझााया कि इस सवाल का जवाब नहीं दिया जाएं। दिनेश विजन ने कहा कि अभी हमलोग इस पर बातें ना करें। सवालों का सिलसिला आगे बढ़ गया। मंच के ठीक सामने बैठी सीनियर भारती प्रधान को यह बात नागवार गुजरी। उन्‍होंने खड़े होकर सवाल किया कि राष्‍ट्रीय महत्‍व के इस सवाल से कैसे बच सकते हैं? मौजूद फिल्‍म स्‍टारों का इसका जवाब देना चाहिए। सुशांत ने कमान संभाली और जवाब नहीं देने के तर्क देने लगे। वही घिसा-पिटा जवाब कि हमें इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है। भारती प्रधान ने फिर से जोर दिया तो सुशांत बिफर गए। शब्‍दों को चबाते हुए उन्‍होंने भारती से पूछा कि क्‍या आप राष्‍ट्रीय मुद्दों के सभी सवालों के उत्‍तर दे सकती हैं? सामान्‍य बातचीत अभद्र और एकतरफा हो गई। टी सीरिज के भूषण कुमार ने मामले की नजाकत को समझा और उन्‍होंने सुशांत को शांत किया।
सवाल ही कि पहली बार ही फिल्‍म स्‍टार और निर्देशक कह देते कि हम इस मुद्दे पर नहीं बोलना चाहते या हमें सही जानकारी नहीं है। वैसे देश के जागरूक नागरिक और एक्‍टर होने के नाते उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे सभी समसामयिक घटनाओं से वाकिफ रहें। ऐसे इवेंट में ही पत्रकारों को गैरफिल्‍मी जरूरी मुद्ददों पर सवाल करने के मौके मिलते हैं। बच्‍चन और खान जैसे अनुभवी स्‍टार सवालों को ढंग से डील कर लेते हैं। नए स्‍टार अहंकार और स्‍टारडम के नशे में जरूरी सवालों का मजाक बनाते हैं और उन्‍हें टालते हैं। सुशांत को अशांत होने की जरूरत नहीं थी।  

Tuesday, April 18, 2017

रोज़ाना : अशोभनीय प्रयोग



रोज़ाना
अशोभनीय प्रयोग
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों श्रीजित मुखर्जी निर्देशित बेगम जान आई। बेगम जान में विद्या बालन नायिका हैं और फिल्‍म के निर्माता हैं विशेष फिल्‍म्‍स के महेश भट्ट और मुकेश भट्ट। इस फिल्‍म ने विद्या बालन और महेश भट्ट के अपने प्रशंसकों को बहुत निराश किया।

बेगम जान पंजाब में कहीं कोठा चलाती है। उसे वहां के राजा साहब की शह हासिल है। आजादी के समय देश का बंटवारा होता है। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। भारत और पाकिस्‍तान के अधिकारी चाहते हैं कि बेगम जान कोठा खाली कर दे। 11 लड़कियों के साथ कोठे में रह रही बेगम जान अधिकारियों के जिस्‍म के पार्टीशन कर देने का दावा करती है,लेकिन ताकत उसके हाथ से निकलती जाती है। आखिरकार वह कोठे में लगी आग में बची हुई लड़कियों के साथ जौहर कर लेती है। आत्‍म सम्‍मान की रक्षा की इस कथित मध्‍ययुगीन प्रक्रिया को 1947 गौरवान्वित करते हुए दोहराना एक प्रकार की पिछड़ी सोच का ही परिचायक है। उनकी बेबसी और लाचारगी के चित्रण के और भी तरीके हो सकते थे। प्रगतिशील महेश भट्ट का यह विचलन सोचने पर मजबूर करता है,क्‍योंकि इस फिल्‍म की रिलीज के पहले उन्‍होंने कहा था कि वे अपनी पुरानी लकीर का विस्‍तार कर रहे हैं। विशेष फिल्‍म्‍स के 30 वें साल में वे फिर से अर्थ और सारांश की जमीन पर लौटना चाहते हैं।
इतना ही नहीं फिल्‍म के एक किरदार का नाम कबीर रखा गया है। वह खल चरित्र है। वह जनेऊ पहनता है और उसने खतना भी करवा रखा है। जरूरत के अनुसार पैसे लेकर वह हिंदू और मुसलमान दोनों की तरफ से दंगे-फसाद करवाता है। ऐसे किरदार का नाम कबीर रखने का क्‍या तात्‍पर्य हो सकता है? कवि और सामाजिक संत के रूप में हम कबीर को जानते हैं। उन्‍होंने अपनी रचनाओं में दोनों धर्मों के कट्टरपंथियों की आलोचना की है। ऐसे सेक्‍युलर संत का नाम एक भ्रष्‍ट ग़ुंडे को देकर महेश भट्ट और श्रीजित मुखर्जी ने कबीर की प्रतिष्‍ठा और योगदान का धूमिल किया है। कबीर हमारी सांस्‍कृतिक और साहित्यिक प्रतिमा(आयकॉन) हैं। उनके नाम के साथ ऐसा भद्दा कृत्‍य अशोभनीय है।
फिल्‍मकारों को ऐसे प्रयोगों में अतिारक्‍त सावधानी बरतनी चाहिए।  

Saturday, April 15, 2017

रोज़ाना : अपवाद हैं अभय देओल



रोज़ाना
अपवाद हैं अभय देओल
-अजय ब्रह्मात्‍मज  

देओल परिवार के अभय देओल अपने चचेरे भाइयों सनी देओल और बॉबी देओल से मिजाज में अलग हैं। उनकी जीवन शैली और फिल्‍मों की पसंद-नापसंद में साफ फर्क दिखता है। स्‍टार परिवार से होने के बावजूद उनमें स्‍टारों के नखरे नहीं हैं। वे दिखावे में नहीं रहते। पंजाबी परिवारों के गुणों-अवगुणों से भी वे दूर हैं। पढ़ाई के लिए विदेश में रहने और वहां हर रंग व वर्ण के दोस्‍तों के साथ बिताई जिंदगी ने उनकी पारंपरिक सोच बदल दी। भारत लौटने और सोचा न था जैसी फिल्‍म से शुरूआत करने के साथ ही उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कर दिया था कि उनमें देओल परिवार के फिल्‍मी और पंजाबी लक्षण नहीं हैं।
अभय देओल ने आउट ऑफ बॉक्‍स फिल्‍में कीं। जिंदगी ना मिलेगी दोबारा जैसी कमर्शियल फिल्‍म में उनकी असहजता आसानी से देखी जा सकती है। कुछ अलग और बेहतरीन करने की कोशिश में उन्‍हें अभी तक बड़ी कामयाबी नहीं मिली है,लेकिन अपने फसलों और बयानों से उन्‍होंने हमेशा जारि किया कि दूसरे स्‍टारसन की तरह लकीर के फकीर नहीं हैं। 2014 में उन्‍होंने अपनी फिल्‍म वन बा टू डिजीटल रिलीज कर सकेत दे दिया था कि मनोरंजन की दुनिया किधर खिसक रही है। तब इंडस्‍ट्री के पंडितों ने उनकी खिल्‍ली उड़ाई थी और कहा था कि उनका दिमाग फिर गया है।
फिल्‍म इंडस्‍ट्री में जब भी कोई कुछ नया करना चाहता है तो उसका मखौल उड़ाया जाता है। आरंभिक प्रयासों में सफलता नहीं मिले तो मखौल ही व्‍यक्ति का मुहावरा और परिख्‍य बन जाता है। हाल ही में गोरेपन के ऐड और एंडोर्समेंट करनेवाले फिल्‍म कलाकारों के बारे में उन्‍होंने अपनी रय जाहिर की तो उनकी प्रशंसा हुई,लेकिन सोनम कपूर ने नाराजगी में एषा देओल के एक ऐड की तस्‍वीर लगा कर सवाल किए। सोनम कपूर की इस बचकानी हरकत पर अभय देओल ने शांतचित्‍त भाव से कहा कि यह भी गलत है। अभय देओल मानते हें कि फिल्‍म कलाकरों को ऐसे विज्ञापनों का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए।
गोरापन एक गंथि है,जो भारतीय समाज में गोरों(अंग्रेजों) के दो सदी के शासन में मजबूत हुआ। भारतीय शास्‍त्रों और रीतिकाल की रचनाओं में श्‍याम वर्ण की तारीफ मिलती है। हमारे आदर्श और पूज्‍य राम और कृष्‍ण भी तो श्‍याम वर्ण के थे।

Thursday, April 13, 2017

रोज़ाना : धरम जी समझ सकते हैं...



रोज़ाना
धरम जी समझ सकते हैं...
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल सभी अखबारों में खबर थी कि सलमान खान अपनी आत्‍मकथा नहीं लिखेंगे या यों कहें कि नहीं लिख सकते। आशा पारेख की खालिद मोहम्‍मद लिखित आत्‍मकथा द हिट गर्ल के विमोचन के अवसर पर सलमान खान ने यह बयान दिया। उन्‍होंने आशा पारेख जैसी सेलिब्रिटी की तारीफ की। उन्‍होंने कहा कि आत्‍मकथा लिखना बहादुरी का काम है। मुझ से तो लाइफ में ना हो। धरम जी समझ सकते हैं.... इसके बाद हॉल में तालियां बजीं। लोग हंसे और खिलखिलाए। सलमान खान शरमाए। होंठ पोंछे और शरारती निगाहों से हॉल में मौजूद लोगों को देखा। फिर से तालियां बजीं। लगभग 20 सेकेंड के इस अंतराल में सलमान खान ने कुछ नहीं कहा,लेकिन लोगों ने सब कुछ समझ लिया। दरअसल,सलमान खान जैसी सेलिब्रिटी जब वाक्‍य अधूरा छोड़ते हैं तो आगे के शब्‍द और उनका आशय भी लोग समझ लेते हैं।
आत्‍मकथा किसी भी व्‍यक्ति का वस्‍तुनिष्‍ट और निष्‍पक्ष जीवन इतिहास है,जिसे वह खुद लिखता या लिखवाता है। पहले के कवि और शायर अपनी रचनाओं में खुद के बारे में लिख देते थे। हिंदी में आत्‍मकथा की शुरूआत साहित्‍य की अन्‍य विधाओं की तरह भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र से हुई। उन्‍होंने एक कहानी : कुछ आपबीती कुछ जगबीती नाम से आत्‍मकथा लिखी थीं। राहुल सांकृत्‍यायन और हरिवंश राय बच्‍चन की आत्‍मकथाएं मशहूर हैं। गांधी,नेहरू,राजेन्‍द्र प्रसाद की आत्‍मकथाओं से भी हम परिचित हैं। फिल्‍मी हस्तियों में आत्‍मकथा लिखने का चलन इधर बढ़ा है। ज्‍यादार फिल्‍मी हस्तियों ने दूसरे लेखकों से अपनी आत्‍कथाएं कलमबद्ध की हैं। देव आनंद ने रोमांसिंग विद लाइफ खुद लिखी थी। लिखें तो हिंदी-अंग्रेजी में दक्ष अमिताभ बच्‍चन की आत्‍मकथा रोचक होगी। खानत्रयी में अभी तक शाह रूख खान की जीवनियां आई हैं,जिनमें अनुपमा चोपड़ा की किंग ऑफ बॉलीवुड श्रेष्‍ठ है। तीनों खानों के लबे करिअर और जीवन को समेटती किताबे आनी चाहिए।
सलमान खान धरम जी के बहाने जो सकेत दे रहे थे...वास्‍तव में वह उनकी जिंदगी के रोमांस और उथल-पुथल पूर्ण जिंदगी की तरफ इशारा करता है। एक बार एक पत्रकार ने सलमान खान से उनकी हीरोइनों के बारे में एक फीचर के लिए बातचीत करने की कोशिश की तो तो मुंहफट सलमान खान का सवाल था,क्‍या बताऊं? किस के साथ कब....
फिर भी सलमान खन समेत सभी फिल्‍मी हस्तियों को अपनी आत्‍मकथा या जीवनी लिखनी-लिखवानी चाहिए। अगर वे स्‍वयं न कर पाएं तो फिल्‍म शोधार्थियों को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।
@brahmatmajay

Wednesday, April 12, 2017

रोज़ाना : शीघ्र सेहतमंद हों अमित जी



रोज़ाना/अजय ब्रह्मात्‍मज
शीघ्र सेहतमंद हों अमित जी
हर रविवार की शाम को प्रशंसक और दर्शक खिंचे चले आते हैं। धीरे-धीरे व्‍यक्तियों का समूह बढ़ता और और एक भीड़ में तब्‍दील हो जाता है। यह भीड़ अपने प्रिय अभिनेता की एक झलक और विनम्र नमस्‍कार पाने के लिए उतावली रहती है। मुंबई के उपनगर जुहू के इलाके में हर रविवार को लोगों का हुजूम अमिताभ बच्‍चन के नए आवास जलसा के सामने एकत्रित होता है। पिछले कई सालों से यह सिलसिला चल रहा है। अगर अमिताभ बच्‍चन मुंबई में हों तो वे बिना नागा हाजिर होते हैं। लकड़ी के बने अस्‍थायी चबूतरे पर खड़े होकर वे सभी का अभिवादन स्‍वीकार करते हैं। पिछले रविवार 9 अप्रैल को अस्‍वस्‍थ होने की वजह से वे अपने प्रशंसकों से मुखातिब नहीं हो सके। उन्‍हें इसका अफसोस रहा और उन्‍होंने ट्वीटर,ब्‍लॉग और फेसबुक पर अपने विस्‍तारित परिवार(एक्‍सटेंडेड फमिली) से माफी मांगी।
इस साल अक्‍तूबर में 75 के हो रहे अमिताभ बच्‍चन कई पहलुओं से मिसाल हैं। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री के सक्रिय कलाकारों में से एक अमिताभ बच्‍चन के दायित्‍व,कर्तव्‍य और मंतव्‍य को देख-सुन कर अचरज ही होता है कि वे कैसे इतने अलर्ट और जागरूक बने रहते हैं। पिछले रविवार को उनके पेट में इंफेक्‍शन हो गया था। सभी जानते हैं कि उनका पेट इंफेक्‍टेड है और खान-पान में उन्‍हें संयम का पालन करना पड़ता है। कहते हें न,ंहम सभी के अंदर मानवोचित गुण्‍-अवगुण होते हैं,जो सारे आवरण,मास्‍क और प्रतिष्‍ठा के बावजूद जाहिर हो जाते हैं। जी हां,अमिताभ बच्‍चन ने मिर्चीदार पित्‍जा खा लिया था। यकीनन उन्‍हें अपने परिजनों से डांट भी पड़ी होगी,लेकिन यह कितना स्‍वाभाविक है। याद करे,हमारे घरों के बुजुर्ग भी कैसे परहेज का उल्‍लंघन करते हैं और बीमार पड़ जाते हैं। अमिताभ बच्‍चन के साथ भी यही हुआ।
बहाहाल,अभी वे स्‍वस्‍थ हैं। हम तो यही चाहेंगे कि वे जल्‍दी से जल्‍दी सेहतकुद होकर काम पर लौटें। अपने विस्‍तारित परिवार से मिलें। अगले रविवार 16 अप्रैल को प्रशंसकों से मिलें। अमिताभ बच्‍चन की रामगोपाल वर्मा निर्देशित सरकार 3 अगले माह आ रही है। अमिताभ बच्‍चन पुराने आक्रोशित तेवर के साथ दिखेंगे। वे जल्‍दी ही आमिर खान के साथ अगली फिल्‍म की शूटिंग आरंभ करेंगे। हाल ही में हमने नीतेश तिवारी निर्देशित ठंडे तेल की एक ऐड फिल्‍म में उनका खिलंदड़ रूप देखा।
@brahmatmajay

Tuesday, April 11, 2017

रोज़ाना : मॉडर्न क्लासिक ‘ताल’ का खास शो


रोज़ाना/ अजय ब्रह्मात्‍मज
    मॉडर्न क्लासिक ताल का खास शो
महानगर मुंबई और इतवार की शाम। फिर भी सुभाष घई का निमंत्रण हो तो कोई कैसे मना कर सकता है? उत्‍तर मुंबई के उपनगर से दक्षिण मुंबई मुखय शहर में जाना ही पहाड़ चढ़ने की तरह है। इसके बावजूद खुद को रोकना मुश्किल था,क्‍योंकि सुभाष धई ने अपन फिल्‍म ताल देखने का निमंत्रण दिया था। सुभाष घई अब सिनेमाघर के बिजनेस में उतर आए हैं। वे पुराने सिनेमाघरों का जीर्णोद्धार कर उन्‍हें नई सुविधाओं से संपन्‍न कर रहे हें। उन्‍हें मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित न्‍यू एक्‍स्‍लेसियर सिंगल स्‍क्रीन में आधुनिक प्रोजेकशन और साउंड सिस्‍टम बिठा दिया है। उसयकी सज-धज भी बदल दी है। इसी सिनेमाघर में वे 1999 में बनी अपनी फिल्‍म ताल दिखा रहे थे। इस खास शो में उनके साथ म्‍यूजिक डायरेक्‍टर एआर रहमान, कैमरामैन कबीर लाल, कोरियोग्राफर श्‍यामक डावर, संवाद लेखक जावेद सिद्दीकी व गायक सुखविंदर सिंह भी मौजूद रहेथ।
फिल्‍ममेकिंग की रोचक और खास प्रक्रिया है। एक डायरेक्टर अपने विजन के अनुसार कलाकारों और तकनीशियन की टीम जमा करता है और फिर महीनों, कई बार सालों में अपनी सोच को सेल्‍युलाइड पर उतारने की कोशिश करता है। लोकप्रिय, चर्चित और देखी हुई क्‍लासिक की रचना और निर्माण प्रक्रिया से वाकिफ होने पर फिल्‍म के दृश्‍य खुलते हैं। उनके साथ जुड़ी घटनाओं को जानने पर हर दृश्‍य का रोमांच बढ़ जाता है। ताल शोमैन सुभाष घई की म्‍यूजिकल लवस्टोरी है।
मिस वर्ल्‍ड ऐश्‍वर्या राय के सौंदर्य से प्रेरित ताल में नृत्‍य और संगीत का नया आकर्षण था। एआर रहमान के लयपूर्ण संगीत की ताजगी आज भी कानों में रस घोलती है। लगातार 17 दिनों तक सुभाष घई के दिन और एआर रहमान की रातों की मेहनत से ताल का संगीत तैयार हुआ था। आनंद बख्‍शी के गीतों को रहमान ने संगीत से संवारा। शब्‍दों में लय और गति जोड़ी। श्‍यामक डावर ने उसी लय और गति को नृत्‍य में उतार दिया। ताल में ऐश्‍वर्या राय की नृत्‍य मुद्राएं भित्ति चित्रों की रूपसियों और अप्सराओं की याद दिलाती हैं।
    ताल हर लिहाज से 20 वीं सदी की मॉडर्न क्लासिक हिंदी फिल्‍म है।
@brahmatmajay