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Wednesday, June 28, 2017

रोज़ाना : शाह रूख खान की ईद



रोज़ाना
शाह रूख खान की ईद
-अजय ब्रह्मात्‍मज
ईद के मौके पर शाह रूख खान बुलाते हैं। वे मीडियाकर्मियों को ईद की दावत देते हैं। इस दावत में देर-सबेर वे शामिल होते हैं। मीडियाकर्मियों से जत्‍थे में मिलते हैं। उनसे अनौपचारिक बातें करते हैं। अफसोस कि ये अनौपचारिक बातें भी रिकार्ड होती हैं। अगले दिन सुर्खियां बनती हैं। अब न तो फिल्‍म स्‍टार के पास सब्र है और न पत्रकारों के पास धैर्य...स्‍टार की हर बात खबर होती है। वे खुद भी पीआर के प्रेशर में में हर मौके को खबर बनाने में सहमति देने लगे हैं। या कम से कम तस्‍वीरें तो अगले दिन आ ही जाती हैं। चैनलों पर फटेज चलते हैं। सभी के करोबार को फायदा होता है।
हर साल ईद के मौके पर सलमान खान की फिल्‍में रिलीज हो रही हैं और शाह रूख खान से ईद पर उनकी अगली फिल्‍मों की बातें होती हैं,जो दीवाली या क्रिसमस पर रिलीज के लिए तैयार हो रही होती हैं। वक्‍त ऐसा आ गया है कि पत्रकार हर मुलाकात को आर्टिकल बनाने की फिक्र में रहते हैं। उन पर संपादकों और सहयोगी प्रकाशनों का अप्रत्‍यक्ष दबाव रहता है। अघोषि प्रतियोगिता चल रही होती है। सभी दौड़ रहे होते हैं। इस दौड़ में सभी पहले पहुंचना चाहते हैं। अच्‍छा है कि जो पिछड़ जाए,वह भी विजेता माना जाता है।
इस ईद की बात करें तो बारिश की वजह से शाह रूख खान ने अपने बंगले मननत के पास के पांचसितारा होटल में लंच का इंतजाम किया था। वे आए। घोषित समय से डेढ़-दो घंटे देर से आना उनके लिए सामान्‍य बात है। अगर किसी इवेंट पर किसी दिन वे समय पर आ जाएं तो आश्‍चर्य होगा और अनेक पत्रकार उस इवेंअ पर उनसे मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारों ने भी स्‍टारों के हिसाब से मार्जिन तय कर लिया है। केवल अमिताभ बच्‍चन और आमिर खान समय के पाबंद हैं। बहरहाल,शाह रूख ने हमारे जत्‍थे से कुछ रोचक बातें कीं। बाद में दूसरे जत्‍थों के बीच भी उन्‍होंने लगभा वे ही बातें कीं। मसलनएईद की रात बच्‍चों के लिए खाना बनाने की बात। उन्‍होंने हमें विस्‍तार से बताया कि जब हैरी मेट सेजल की शूटिंग के दौरान अपने मेजबान से सीखी। मेजबान मियां-बीवी ने शाह रूख खान को इतालवी व्‍यंजनों के पाक विधि सिखाई। अगर बनाते समय कुद भूल जाता है तो गूगल है ही मदद के लिए। और हो,छठे-छमाही खाने बनाने के शौकीन सभी पतियों और मर्दां की तरह शाह रूख खान भी किचेन में बहुत कुछ फैला देते हैं।
शाह रूख खान की ईद से आया कि अब त्‍योहारों के ऐसे सार्वजनिक आयोजन फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कम हो गए हैं। पहले होली,दीवाली और ईद पर ऐसे कई आयोजन होते थे। उनसे खबरें भी नहीं जुड़ी रहती थीं। सभी त्‍योहार के रंग में रहते थे। यह चिंता नहीं रहती थी कि क्‍यो बोलें और कैसे दिखें? मीडिया के प्रकोप और सोशल मीडिया के आतंक ने त्‍योहारों का जश्‍न छीन लिया है। सब कुछ रुटीन और फैशन सा हो गया है। हर हाथ में मोबाइल के साथ आए कैमरे और सेल्‍फी की धुन ने त्‍योहारों की लय तोड़ दी है।

Tuesday, June 27, 2017

रोज़ाना : एयरपोर्ट लुक



रोज़ाना
एयरपोर्ट लुक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मिलीभगत है। ज्‍यादातर बार फोटोग्राफर को मालूम रहता है कि कब कौन सी सेलिब्रिटी कहां मौजूद रहेगी। उनकी पीआर मशीनरी सभी फोटोग्राफर और मीडियाकर्मियों को पूर्वसूचना दे देते हैं। विदेशों की तरह भारत में पापाराजी नहीं हैं। यहां दुर्लभ तस्‍वीरों और खबरों की भी सामान्‍य कीमत होती है। विदेशों में एक दुर्लभ तस्‍वीर के लिए फोटोग्राफर भारी खर्च करते हैं और धैर्य से घात लगाए रते हैं। यह बंसी डाल कर मछली पकड़ने से अधिक अनिश्चित और वक्‍तलेवा काम होता है। मुंबई में फिल्‍मी सितारों की निजी गतिविधियों की जानकारी छठे-छमाही ही तस्‍वीरों में कैद होकर आती है। बाकी सब पूर्वनियोजित है,जो खबरों की तरह परोसा जा रहा है।
ऐसी ही पूर्वनियोजित खबरों व तस्‍वीरों में इन दिनों एयरपोर्ट लुक का चलन बढ़ा है। एयरपोर्ट लुक उस खास तस्‍वीर के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है,जो मुंबई से बाहर जाते-आते समय एयरपोर्ट के अराइवल और डिपार्चर के बाहर फिल्‍मी सितारों उतारी जाती हैं। गौर करेंगे कि कुछ फिल्‍मी हस्तियों की तस्‍वीरें बार-बार आती हैं। इसका चलन इतना ज्‍यादा बढ़ गया है कि उम्रदराज और कम लोकप्रिय सितारों को भी ऐसी तस्‍वीरों के लिए तैयार रहना पड़ता है। उन्‍हें अपने लुक और ड्रेस का खास खयाल रखना पड़ता है। उन्‍हें यह भी खखल रखना पड़ता है कि हेयर स्‍टाइल,ज्‍वेलरी व अक्‍सेसरीज और ड्रेस में रिपीटिशन न हो। इसके लिए सितारों की टीम चौकस रहती है। कई बार एयरपोर्ट लुक की तस्‍वीरों के साथ सारे ब्रांड की जानकारी रहती है। बताया जाता है कि पर्स किस ब्रांड का है और चश्‍मा किस ब्रांड का है...आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह जानकारी स्‍टार की पीआर टीम ही देती है। प्रचलित और लोकप्रिय सितारों की इमेज को इससे लाभ होता होगा,लेकिन आउट ऑफ जॉब और कम फिल्‍में कर रही सितारों को जबरन इस मुश्किल से गुजरना होता है।
पिछले दिनों एक मुलाकात में भीदेवी कोफ्त जाहिर कर रही थीं। उन्‍हें निजी काम से लगातार चेन्‍नई जाना होता है। कुछ घरेलू और पारिवारिक काम होते हैं। वह सुबह जाती हैं और शाम तक लौट आती है। इधर कुछ दिनों से अब उन्‍हें भी खयाल रखना पड़ता है कि आते-जाते समय एक ही ड्रेस न हो। और वह पूरे मेकअप में रहें। कुछ सितारों का यह अतिरिक्‍त खर्च लगता है,लेकिन सभी कर रहे हैं तो उन्‍हें भी करना पड़ता है। आप न करें और कभी किसी फोटोग्राफर के कैमरे में सामान्‍य तस्‍वीर कैद हो गई तो अगले दिन वही तस्‍वीर अखबारों में होगी और नीचे कुछ सवाल छोड़ दिए जाएंगे।
सचमुच,ग्‍लैमर की दुनिया में बने और टिके रहने की अपनी समस्‍याएं हैं। हम चाहते भी हैं कि हमारे पसंदीदा सितारे हमेशा सज-धज में रहें। अभिनेत्रियों की मुश्किलें ज्‍यादा रहती हैं,क्‍योंकि उनकी सज-धज में विकल्‍प और चुनौतियां हैं। अभिनेता तो जैसे-तैसे भी दिख सकते हैं। उन्‍हें अधिक फर्क नहीं पड़ता। अभिनेत्रियों की छवि खराब हुई या उनकी स्‍टाइल फीकी पड़ी तो दस तरह की बातें होने लगती हैं। कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उन्‍हें थम्‍स डाउन मिलता है। बताया जाता है कि उनका फैशन सेंस अपडेटेड नहीं है।

Thursday, June 22, 2017

रोज़ाना : झकास अनिल कपूर



रोज़ाना
झकास अनिल कपू
-अजय ब्रह्मात्‍मज

अनीस बज्‍मी की मुबारकां के ट्रेलर लांच के मौके पर अनिल कपूर मौजूद थे। मंच पर उनकी उर्जा देख कर सभी खुश थे। उन्‍हें इस उम्र(61 वर्ष) में भी उर्जावान देख कर हैरानी नहीं होती। वे अपने समकालीनों में सबसे चुस्‍त-दुरुस्‍त हैं। वे लगातार काम कर रहे हैं। उन्‍होंने अभी तक अपने जूते नहीं टांगे हैं। इसकी कोई संीाावना भी नहीं है। इसी ट्रेलर लांच में जब आतिया शेट्टी और इलियाना डिक्रूज उन्‍हें बार-बार सर संबोधित कर रही थीं तो उन्‍होंने बिफर कर कहा,क्‍या कभी मैंने तुम दोनों को मैथ्‍स या साइंस पढ़ाया है या मुझे ब्रिटेन की महारनी ने सर का खिताब दिया है। प्‍लीज मुझे सर न कहो। अनिल कपूर की यही झकास अदा है। वे जवानों के बीच उनसे भी अधिक जवान दिखते हैं। वे नहीं चाहते कि उन्‍हें बुजुर्ग बता कर दरकिनार कर दिया जाए। डेनी डेंजोग्‍पा उनके नियमित कसरत की तारीफ करते हैं। शूटिंग की व्‍यस्‍तता के बीच भी वे वाक और रन के लिए समय निकाल लेते हैं।
अड़तीस साल हो गए। सन् 1979 में अनिल कपूर ने उमेश मेहरा की फिल्‍म हमारे तुम्‍हारे में एक छोटी भूमिका निभाई थी। यों कैमरे के सामने वे 1971 में ही आ गए थे। 1971 में बन रही तू पायल मैं गीत में शशि कपूर के बचपन के रोल में अनिल कपूर थे। यह फिल्‍म रिलीज नहीं हो पाई थी। बापू की तेलुगू फिल्‍म वंश वृक्षम में उन्‍हें पहली प्रमुख भूमिका मिली थी। हिंदी में वो सात दिन उनकी पहली फिल्‍म थी। अड़तीस सालों में सैंकड़ों फिल्‍में करने के बाद भी अनिल कपूर अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में पूरे दम-खम के साथ सक्रिय हैं। अभी भतीजे अर्जुन कपूर के साथ उनकी फिल्‍म मुबारकां आएगी। अर्जुन कपूर के डबल रोल की इस फिल्‍म में उनका महत्‍वपूर्ण किरदार है। ठीक है कि उन्‍हें फिल्‍मों में अमिताभ बच्‍चन की तरह केंद्रीय भूमिकाएं नहीं मिल पा रही हैं,लेकिन फिल्‍मों में उनकी मौजूदगी नजरअंदाज नहीं होती।
सुरिन्‍दर कपूर के मझले बेटे अनिल कपूर ने परिवार के साथ मुश्किल दिनों में संघर्ष किया। चेंबूर साधारण मध्‍यवर्गीय बस्तियों में उनकी परवरिश हुई। वहां के शब्‍द,मुहावरे और चाल-ढाल उनके व्‍यक्तित्‍व का हिस्‍सा हैं। उन्‍होंने ही हिंदी फिल्‍मों में झकास शब्‍द प्रचलित किया। झकास का मतलब बेहतरीन व अतिउत्‍तम होता है। उनके डांसिंग स्‍टेप्‍य में चेंबूर की बस्तियों कर मस्‍ती रहती है। डांस के झटके और ठुमकों से वे मुंबई के आम दर्शकों को प्रभावित करते हैं। अनिल कपूर ने फिल्‍मी करिअर में भिन्‍न मिजाज की फिल्‍में कीं और उन्‍हें संजीदगी से पर्दे पर उतारा। उनके किरदारों का भोलापन हमेशा पसंद किया गया। वे अपने किरदारों को पूरे उमंग और उर्जा के साथ निभाते हैं।
कम लोग जानते हैं कि उनके पिता सुरिन्‍दर कपूर ने फिल्‍मों में साधारण शुरुआत की थी। कभी उनके परिवार को राज कपूर के गैरेज में भी रहना पड़ा था। बाद में वे शम्‍मी कपूर की पूर्व पत्‍नी गीता बाली के सेक्रेटरी बन गए थे। यहां से उनकी जिंदगी में बदलाव आया। परिवार की हालत सुधरी। सुरिन्‍दर कपूर के परिवार की तीसरी पीढ़ी की सोनम कपूर और राज कपूर के परिवार की तीसरी पीढ़ी के रणबीर कपूर संजय लीला भंसाली की फिल्‍म सांवरिया में एक साथ लांच हुए थे। अनिल कपूर के परिवार की यह अनकही कहानी है।

Wednesday, June 21, 2017

रोज़ाना : फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय



रोज़ाना
फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय
-अजय ब्रह्मात्‍मज
गौर किया होगा...इम्तियाज अली ने अपनी फिल्‍म 'जब हैरी मेट सेजल' के पहले लुक और नाम की घोषणा दो पोस्‍टरों के साथ की थी। बाद में दोनों पोस्‍टर को एक पोस्‍टर में डाल कर पूरा नाम लिखा गया। इस फिल्‍म के नाम की चर्चा अभी तक नहीं थमी है। कुछ इसे इम्तियाज अली की पुरानी फिल्‍म से प्रेरित मानते हैं तो कुछ इसे लेखक-निर्देशक(इम्तियाज स्‍वयं) की सोच और कल्‍पना का दिवालियापन समझ रहे हैं। यह नाम चल तो रहा है,लेकिन गति नहीं पकड़ सका है। जब हैरी मेट सेजल की संपूर्णता टुकड़ों में ही अपनी प्रेम कथा परोसेगी।
हाल ही में जब हैरी मेट सेजल के मिनी ट्रेलर जारी किए गए। इस ट्रेलर को जारी करने के दो दिन पहले इम्तियाज अली और शाह रूख खान मीडिया से मिले थे। उन्‍होंने प्रायवेट स्‍क्रीनिंग के दौरान अपनी बातें रखी थं और बताया था कि वे ऐसा क्‍यों कर रहे हैं। दो-तीन छोटी झलकियों के बाद एक गाना जारी किया जाएगा। कोशिश यह है कि दर्शक फिल्‍म के फ्लेवर,फन और ज्‍वॉय के लिए तैयार हो सकें। इम्तियाज अली इसे नए मिजाज की फिल्‍म मानते हैं,इसलिए पारंपरिक ट्रेलर लाकर स्‍वाद नहीं बिगाड़ना चाहते। क्‍या यह उनकी मार्केटिंग स्‍ट्रेटजी मात्र है या सचमुच फिल्‍म की भिन्‍नता की वजह से उन्‍हें यह तरकीब अपनानी पड़ी है।
हर नई फिल्‍म की रिलीज के समय बड़े स्‍टारों की घबराहट अति पर होती है। वे दर्शकों तक पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। नई तरकीबें अपनाते हैं। दर्शकों को चौंकाते हें। पूरी कोशिश रहती है कि दर्शक आकर्षण या जिज्ञासा पूरी करने सिनेमाघरों में पहुंचें। फिर फिल्‍म अच्‍छी लगे तो दोबारा-तिबारा आएं। इन दिनों फिल्‍में देखना मंहगा काम हो गया है। फिर भी दर्शक दोबारा-तिबारा आते हैं। उनसे ही फिल्‍में हिट होती हैं। चूंकि शा रूख खान अपने समकालीन दोनों खानों से थोड़े पिछड़ चुके है,इसलिए उन्‍हें जबरदस्‍त कामयाबी की जरूरत है। फिल्‍मों के बड़े स्‍टारों को स्‍वयं या आपस में दो-चार असफलताओं से फर्क नहीं पड़ता हो,लेकिन प्रशंसकों का जोश ठंडा पड़ता है। दर्शक भी घटते हैं।
इर्शक और प्रशंसक दो श्रे‍णियां हैं। लोकप्रिय स्‍टारों को दोनों की जरूरत पड़ती है। सोशल मीव रहते हैं। वे अपने प्रिय स्‍टारों के लिए माहौल बनाते हैं। नए दौर में ट्वीटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के फैन क्‍लब,ग्रुप और हैंडल स्‍टार के नौकरी साफ्ता स्‍टाफ चलाने लगे हैं। मूड और माहौल बनाने में उनकी भूमिका होती है। हालांकि कोई भी स्‍टार स्‍वीकार नहीं करता,लेकिन सोशल मीडिया पर अधिकांश एक्टिविटी स्‍टार की मर्जी और जानकरी में होती है।
यह देखना रोचक होगा कि टुकड़ों में दी गई झलकियों से इम्तियाज अली और शाह रूख खान कितने दर्शक बना पाते हैं? दोनों की पिछली फिल्‍में थोड़ी नरम पही हैं।

Tuesday, June 20, 2017

रोज़ाना : क्‍या ‘कन्‍हैया’ मिल पाएगा प्रधानमंत्री से



रोज़ाना
क्‍या कन्‍हैया मिल पाएगा प्रधानमंत्री से
-अजय ब्रह्मात्‍मज
चौंके नहीं, कन्‍हैया राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आगामी फिल्‍म मेरे प्रिय प्रधान मंत्री का बाल नायक है। वह मुंबई के गांधीनगर(कल्पित) चाल में रहता है। अपनी मां के लिए व‍ि चिंतित है। चाल में शौखलय का इंतजाम न होने से उसकी मां को खुले में शौच के लिए जाना होता है। वह अपनी मां के लिए शौचालय बनवाना चाहता ह। इस कोशिश में उसे पता चलता है कि देश के प्रधान मंत्री उसकी मदद कर सकते हैं। वे स्‍वच्‍छ भारत भारत अभियान में शौच पर बहुत जोर देते हैं। यहां तक कि लाल किले के प्राचीर से भी उन्‍होंने देशवासियों का आह्वान किया था। कन्‍हैया उन्‍हें चिट्ठी लिखता है। वह उनसे मिलने की कोशिश करता है,लेकिन...
राकेश ओमप्रकाश मेहरा को इस फिल्‍म का आयडिया पसंद आया। लगभग चार साल पहले वाया दिल्‍ली बिहार से मुंबई आए मनोज मैरता ने इस फिल्‍म के आयडिया पर काम किया। उन्‍हें इस फिल्‍म का आयडिया जमुनापार के इलाके में में दिल्‍ली मैट्रो से सफर के दौरान हुआ। उन्‍होने जमुना के किनारे झ़ग्‍गी-झोंपड़ी के औरतों और मर्दो को डब्‍बा उठाए शौच के लिए लिए जाते और पानी के पाईप के आसचास शौच करते देखा। उन्‍होंने व‍हीं कन्‍हैया और उसकी मां की यह कहानी सोची। मुंबई आने के बाद मनोज मैरता दबंग के लेखक दिलीप शुक्‍ला के सहायक हो गए। उन्‍होंने दिलीप शुक्‍ला से अपना आयडिया शेयर किया। दिलीप शुक्‍ला की सलाह थी कि इसे लिख डालो। बतौर लेखक यह तुम्‍हारा करिअर बदल देगा। मनोज ने फिल्‍म लिखने के साथ उसके निर्देशन का भी इरादा किया। वे फिल्‍म के निर्देशन की कोशिशों में नगे। तभी उनकी मुलाकात रोकश ओमप्रकाश मेहरा से हुई। मेहरा को फिल्‍म का आय‍डिया बहुत पसंद आया। न्‍होंने इसे निर्देशित करने की बात कही।
इस बीच राकेश ओमप्रकाश मेहरा महात्‍वाकांक्षी फिल्‍म मिर्जिया की शूटिंग में व्‍यस्‍त हो गए। उससे फ्री होने के बाद उन्‍होंने मेरे प्‍यारे प्रधान मंत्री की शूटिंग आरंभ की है। कन्‍हैया की भूमिका के लिए अनेक बच्‍चों के ऑडिशन के बाद उन्‍होंने ओम का चुनाव किया। उसके साथ और चार बच्‍चे हैं। कन्‍हैया की मां की भूमिका अंजलि पाटिल निभा रही हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्‍मों की भव्‍यता और पैमाने के लिहाज से यह सीमित बजट की फिल्‍म है। इसमें हिंदी फिल्‍मों के परिचित और चर्चित चेहरे भी नहीं हैं के हिसाब से अपनी बड़ी फिल्‍म मानते हैं।
संयोग देखें कि भगत सिंह के जीवन से प्रेरित रंग दे बसंती के समय जैसे भगत सिंह पर अनेक फिल्‍में आ गई थीं,वैसे ही मेरे प्रिय प्रधान मंत्री के समय शौच के विषय पर दूसरी फिल्‍में भी आ रही हैं। उनमें अक्षय कुमार की टॉयलेट एक प्रेम कथा पर सभी का ध्‍यान लगा है।  

Saturday, June 17, 2017

रोज़ाना : अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है एक किरदार



रोज़ाना
अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है एक किरदार
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म रिलीज होने के पहले या बाद में हम लेखकों से बातें नहीं करते। सभी मानते हें कि किसी जमाने में सलीम-जावेद अत्‍यंत लोकप्रिय और मंहगे लेखक थे। उस जमाने में भी फिल्‍मों की रिलीज के समय उनके इंटरव्‍यू नहीं दपते थे। उन्‍होंने बाद में भी विस्‍तार से नहीं बताया कि जंजीर के विजय को कैसे सोचा और गढ़ा। कुछ मोटीज जानकारियां आज तक मीडिया में तैर रही हैं। अमिताभ बच्‍चन स्‍वयं अपने किरदारों के बारे में अधिक बातें नहीं करते। वे लेखकों और निर्देशकों को सारा श्रेय देकर खुद छिप जाते हैं। अगर हिंदी फिल्‍मों के किरदारों को लेकर विश्‍लेषणात्‍मक बातें की जाएं तो कई रोचक जानकारियां मिलेंगी। क्‍यों कोई किरदार दर्शकों का चहेता बन जाता है और उसे पर्दे पर जी रहा कलाकार भी उन्‍हें भा जाता है? इसे खोल पाना या डिकोड कर पाना मुश्किल काम है।
अगर फिल्‍म किसी खास चरित्र पर नहीं है या बॉयोपिक नहीं है तो हमेशा प्रमुख चरित्र अनेक व्‍यक्तियों का पुंज होता है। जीवन में ऐसे वास्‍तविक चरित्रों का मिलना मुश्किल है। सबसे पहले लेखक लिखते समय अपने चरित्रों का स्‍केच और उनके अर्तसंबंधों का ग्राफ तैयार करता है। हिंदी फिल्‍मों का नायक चरित्र परतदार होता है। ये परतें विभिन्‍न व्‍यक्तियों से अती हैं। लेखक अनेक व्‍यक्तियों के समुच्‍चय से एक किरदार गढ़ता है। शायर निदा फाजली ने कहा था... हर आदमी में होते हैं. दस-बीस आदमी. जिसको भी देखना हो. कई बार देखना... उन्‍होंने फिल्‍मों के अनुभव से ही ऐसी बात कही होगी। लेखकों के गढ़ने के बाद ये किरदार निर्देशक के पास पहुंचते हैं। वह उन्‍हें सोच और दृष्टि देता है। लेखक के गढ़न को अभिव्‍यक्ति देता है। इसके बाद कलाकार अपनी विशेषताओं के अनुरूप ही उस किरदार को पर्दे पर जीता है। वह उस किरदार में अपने अनुभव और साक्ष्‍य से व्‍यक्तियों को जोड़ता है। कई बार कलाकार नाम लेकर बता देते हें कि उन्‍होंने फलां फिल्‍म का किरदार किस व्‍यक्ति पर आधारित किया था।
अगले हफ्ते सलमान खान की ट्यूबलाइट रिलीज होगी। इस फिल्‍म में सलमान खान की मासूमियत दर्शकों को भा रही है। उन्‍हें यह किरदार बजरंगी भाईजान का ही विस्‍तार लग रहा है। मंदबुद्धि के इस सीधे-सादे किरदार को निभाने में सलमान खान को काफी मशक्‍कत करनी पड़ी है। पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने बताया कि इस फिल्‍म के लक्ष्‍मण बिष्‍ट को उन्‍होंने मुख्‍य रूप से सत्‍या और परवेज के गुणों से विकसित किया है। बता दें कि सत्‍या महेश मांजरेकर के बेटे हैं। वे इन दिनों सलमान खान की संगत में रहते हैं। सलमान खान ने चेहरे का भाव सत्‍या से लिया है। उनकी सादगी और भोलेपन को अपना लिया है। इसके अलावा अपने डुप्‍लीकेट परवेज के भी गुण अपनाए हैं। सलमान खान के सेट पर परवेज हमेशा मौजूद रहते हें। असिस्‍टैंट उन्‍हें खड़ा कर ही शॉट की तैयारी करते हैं और लाइटिंग करते हैं। कभी-कभी लौंग शॉट में भी परवेज को सलमान खान की जगह खड़ा कर दिया जाता है। सलमान खान पहले ही बता चुके हैं कि उनकी कॉमिक टाइमिंग सोहैल खान से प्रेरित है। नाराजगी और गुस्‍सा दिखाने के लिए वे अपने डैड या अरबाज खान के भाव चुरा लेते हैं।
फिल्‍म देखते समय जरूरी नहीं है कि आप सलमान खान में इन व्‍यक्तियों की खोज करें।

Wednesday, June 14, 2017

रोज़ाना : चाहिए यूपी की कहानी

रोज़ाना
चाहिए यूपी की कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों फिल्‍मों में स्क्रिप्‍ट और संवाद लिख चुके जयपुर,राजस्‍थान के मूल निवासी रामकुमार सिंह ने दो ट्वीट किए। उन्‍होंने ट्वीट में राजस्थान की मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे को टै किया और लिखा... मैडम, हम राजस्थान की कहानी सिनेमा में कहना चाहते हैं पर निर्माता हमसे यूपी की कहानी मांगते हैं, क्योंकि वहां सब्सिडी मिलती है। अगले ट्वीट में उन्‍होंने आग्रह किया... बॉलीवुड में राजस्थान और राजस्थानियों के बारे में कुछ सोचिये मैडम प्लीज।
रामकुमार सिंह की इस व्‍यथा के दो पहलू स्‍पष्‍ट हैं। एक तो राजस्‍थान में कोई ठोस फिल्‍म नीति नहीं हैं। हालांकि पारंपरिक तौर पर राजे-रजवाड़ों के किलों की शूटिंग के लिए हिंदी फिल्‍मकार राजस्‍थान जाते रहे हैं। हाल ही में राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि की पद्मावती की शूटिंग में संजय लीला भंसाली की शूटिंग में विध्‍न पड़ा और उन्‍हें उन दृश्‍यों की शूटिंग के लिए नासिक जाना पड़ा और मुंबई आना पड़ा। राजस्‍थान में सुविधाएं मिल जाती हैं,लेकिन किसी प्रकार की रियायत या सब्सिडी की व्‍यवस्‍था नहीं है। राजस्‍थान की प्रादेशिक फिल्‍म इंडस्‍ट्री का हाल अच्‍छा नहीं है। बहुत कम फिल्‍में बनती हैं और जो बनती हैं उनका स्‍तर श्‍लघनीय नहीं होता। यूपी या झारखंड की जैसी राजस्‍थान की फिल्‍म नीति नहीं होने से निर्माताओं का ध्‍यान उधर नहीं जाता और स्‍थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्‍साहन नहीं मिलता। राजस्‍थान से मुंबई आए कहानीकार और फिल्‍मकार अपनी माटी और भाषा की कहानियों के बदले चालू किस्‍म की हिंदी फिल्‍में लिखने लगते हैं। स्‍वयं रामकुमार सिंह ने जेड प्‍लस की स्क्रिप्‍ट के बाद सरकार 3 के संवाद लिखे। उनकी पहली व्‍यथा रोचक है कि निर्माता यूपी की कहानियां मांगते हैं,क्‍योंकि वहां सब्सिडी मिलती है। यह सच्‍चाई है और इस सच्‍चाई ने हिंदी फिल्‍मों को भ्रष्‍ट भी किया है। निर्माता लेखकों से जबरन यूपी की कहानियां लिखवाते हैं और निर्देशकों को शूटिंग के लिए यूपी ले जाने हैं।
पिछले दिनों ऐसी अनेक हिंदी फिल्‍में आई,जिनकी कहानी यूपी की थी या फिर जिनकी शूटिंग यूपी में की गई थी। याद होगा कि अखिलेश यादव की यूपी की सरकार के दिनों में जारी फिल्‍म सब्सिडी की वजह से अनेक फिल्‍में यूपी पहुंच गई थी। यूपी में सरकार बदलने के बाद निर्माता ठिठके हैं,लेकिन माना जा रहा है यूपी की फिल्‍म नीति वैसे ही चलती रहेगी। अभी पिछले दिनों आई फिल्‍म बहन होगी तेरी देखते हुए साफ लग रहा था कि फिल्‍म की कथाभूमि और पृष्‍ठभूमि में कोई तालमेल नहीं है। लखनऊ के एक मोहल्‍ले में पंजाबी परिवार और पहाड़ी परिवार की लड़की-लड़के के बीच की प्रेमकहानी विश्‍वसनीय नहीं लग रही थी। ऊपर से एक हरियाणवी कनेक्‍शन भी आ गया था। साफ दिख रहा था कि दिल्‍ली की पृष्‍टभूमि पर लिखी गई कहानी को जबरन लखनऊ में रोप दिया गया है।
अगर आर्गेनिक तरीके से यूपी की कहानी नहीं होगी तो सिर्फ सब्सिडी के लालच में यूपी की छौंक देने से न तो फिल्‍म का स्‍वाद यूपी का होगा और न ही दर्शकों को फिल्‍म जंचेगी। हां,निर्माताओं को अपनी लागत का कुछ हिस्‍सा भले ही सब्सिडी के रूप में मिल मिल जाएगा।

Tuesday, June 13, 2017

रोज़ाना : ‘बोर्डर के 20 साल



रोज़ाना
बोर्डर के 20 साल
-अजय ब्रह्मात्‍मज
20 सालों पहले 13 जून 1997 को जेपी दत्‍ता निर्देशित बोर्डर रिलीज हुई थी। 1971 के भारत-पाकिस्‍तान युद्ध के समय बीकानेर के पास लोंगोवाल सीमांत पर हुई मुठभेड़ में भारतीय सैनिकों की इस शौर्यगाथा को देश के दर्शकों ने खूब सराहा था। 1997 में बाक्‍स आफिस पर सबसे ज्‍यादा कलेक्‍शन करने वाली राष्‍ट्रीय भावना की इस फिल्‍म के साथ देश के दर्शकों का भावनात्‍मक रिश्‍ता है। हम इसे भारत के विजय प्रयाण के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं। पिछले साल रक्षा मंत्रालय और फिल्‍म समारोह निदेशालय ने आजादी की 70 वीं सालगरिह की शुरुआत के मौके पर पिछले साल बोर्डर का विशेष प्रदर्शन किया था। बोर्डर को कुल 62 पुरस्‍कार मिले थे।
पिछले रविार को जेपी दत्‍ता ने बोर्डर के 20 साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में यूनिट और मीडिया के सदस्‍यों को याद किया। उन्‍होंने इस मौके पर ट्राफी बांटी। फिल्‍म के मुख्‍य कलाकार सनी देओल शहर से बाहर होने की वजह से नहीं पहुंच सके। सुनील शेट्टी,जैकी श्राफ,पूजा भट्ट ने इस मौके पर बोर्डर के निर्माण के दिनों को याद किया। सभी के लिए बोर्डर यादगार फिल्‍म थी। जेपी दत्‍ता ने अपने भाई दिव्‍य दत्‍ता के बलिदान और डायरी से इस फिल्‍म की कथा सच्‍ची घटनाओं के आधार पर बुनी थी। फिल्‍म के सिनेमाई रुपांतरण में थोड़ी नाटकीय छूट ली गई थी।
जेपी दत्‍ता ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि ततकालीन प्रधनमंत्री नरसिंहा राव ने इस फिल्‍म को पूर्ण समर्थन दिया था। विनोद खन्‍ना के साथ जेपी दत्‍ता उनसे मिलने गए थे। फिल्‍म के बारे में जानने के बाद उन्‍होंने सेना और अ  न्‍य संबंधित विभागों को पूर्ण सहयोग का आदेश दिया था। सेना और सरकार के सहयोग के बिना इस पैमाने की फिल्‍म सोची भी नहीं जा सकती थी। जेपी दत्‍ता ने बोर्डर के निर्माण में सैलनको की भरपूर मदद ली थी। यह फिल्‍म उन्‍होंने भारतीय सेना को समर्पित भी की थी। हिंदी में वार फिल्‍में कम बनी हैं। बोर्डर बेहतरीन वार फिल्‍म है,जिसमें एक एंटी वार संदेश भी था। युद्ध की व्‍यर्थता को जावेद अख्‍तर ने सार्थ शब्‍द दिए थे...
मेरे दुश्‍मन,मेरे भाई,मेरे हमसाये
हम अपने अपने खेतों में, गेहूँ की जगह चावल की जगह
ये बन्दूकें क्यों बोते हैं
जब दोनों ही की गलियों में, कुछ भूखे बच्चे रोते हैं
आ खाएं कसम अब जंग नहीं होने पाए
और उस दिन का रास्ता देखें,
जब खिल उठे तेरा भी चमन, जब खिल उठे मेरा भी चमन
तेरा भी वतन मेरा भी वतन, मेरा भी वतन तेरा भी वतन
मेरे दोस्त, मेरे भाई, मेरे हमसाये

20 सालों के बाद भी भारत-पाकिस्‍तान के बीच स्थितियां बहुत अधिक नहीं बदली हैं। युद्धविरोधी संदेश पर गौर नहीं किया गया। दोनों तरफ से गोलीबारी होती है और आए दिन जवान व सामान्‍य नागरिक हताहत होते हैं।
जेनी दत्‍ता ने एक अंतराल के बाद फिर से निर्देशन में आने का फैसला किया है। युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर ही वे पलटन का निर्माण और निर्देशन करेंगे। यह फिल्‍म सितंबर में फ्लोर पर जा रही है।

Saturday, June 10, 2017

रोज़ाना : नाम और पोस्‍टर



रोज़ाना
नाम और पोस्‍टर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
इम्तियाज अली की शाह रूख खान और अनुष्‍का शर्मा की फिल्‍म का टायटल फायनल हो गया। जब हैरी मेट सेजल नाम से फिल्‍म के पोस्‍टर एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित किए गए है। गौर करें तो यह दो पोस्‍टर का सेट है,जिसमें पहले पोस्‍टर पर जब हैरी और दूसरे पोस्‍टर पर मेट सेजल लिखा बया है। दोनों किरदारों के नाम लाल रंग में लिखे गए हैं। पोस्‍टर में टैग लाइन है...ह्वाट यू सीक इज सीकिंग यू। जलालुद्दीन रुमी की यह पक्ति इम्तियाज अली को बेहद पसंद है। उन्‍होंने इस पंक्ति को फिल्‍म में संवाद के तौर पर रखा है। हिंदी साहित्‍य से परिचित पाठक लगभग इसी भाव पर लिखी रामनरेश त्रिपाठी की अन्‍वेषण शीर्षक कविता याद कर सकते हैं...
मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में।
तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में।
सारे संबंध पारस्‍परिक होते हैं। हम जिसकी तलाश में रहते है,वह खुद हमारी तलाश में रहता है। भारतीय दर्शन में तत् त्‍वम असि भी कहा गया है। इम्तियाज अली भी अपनी फिल्‍मों में संबंधों और भावों की तलाश में रहते हैं। ऊपरी तौर पर उनकी फिल्‍में एक सी लगती हैं,लेकिन उनमें तलाश की भिन्‍नता देखी जा सकती है।
सरल प्रेमकहानी की फिल्‍मों के लिए विख्‍यात इम्तियाज अली संगुफित व्‍यक्ति हैं। उनकी आंखों में ख्‍वाहिशों से अधिक खोज झलकती है। अपनी फिल्‍मों को लकर वह उलझते हैं। फिल्‍म का टायटल डिसाइड करने में इम्तियाज अली को देरी लगती है। याद करें तो जब वी मेट टायटल फायनल करने के पहले भी उन्‍होंने समय लिया था। उस फिल्‍म के लिए जनमत संग्रह किया गया था और आखिरकार जब वी मेट पर सहमति बनी थी। उसके पहले पंजाब मेल और इश्‍क वाया भटिंडा टायटल उछले थे। इस बार पहले रिंग और फिर रहनुमा टाटल मीडिया में चलते रहे। जब हैरी मेट सेजल सुनते ही हॉलीवुड की फिल्‍म ह्वेन हैरी मेट सैली का स्‍मरण होता है। स्‍वयं इम्तियाज अली की फिल्‍म जब वी मेट भी याद आती है। फिल्‍म देखने के बाद ही सही विश्‍लेषण हो सकता है कि यह टायटल कितना उपयुक्‍त है।
फिलहाल सोशल मीडिया पर इस टायटल का सकारत्‍मक स्‍वागत नहीं हुआ है। कुछ लोगों ने तो इसे बुरे टायटल का अवार्ड देने तक की बात लिखी है। फिल्‍म में सेजल नाम आने से ऐसा लग रहा है कि अनुष्‍का का गुजरात से संबंध हो सकता है। कुछ आलोचकों को यह टायटल किसी गुजराती नाटक का भ्रम देता है। हालांकि शेस्‍पीयर ने कहा था कि नाम में क्‍या रख है? लेकिन फिल्‍मों के संदर्भ में किसी भी फिल्‍म का पहला संकेत टायटल ही देता है। दर्शक उससे अनुमान लगाते हैं कि फिल्‍म की कहानी क्‍या हो सकती है? इम्तियाज अली में रोमांस और किरदारों का सफर तो रहेगा ही। उनकी अनायास मुलाकात भी कहानी का मूल हो सकती है।
जब हैरी मेट सेजल दो पोस्‍टरों का सेट है। हिंदी फिल्‍मों के इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। प्रचार और सिनमाघरों की युविधा के लिए मुमकिन है कि बाद में एक पोस्‍टर आए,जिस पूर पूरा टायटल लिखा हो।

Thursday, June 8, 2017

रोज़ाना : मनमोहन सिह पर बनेगी फिल्‍म



रोज़ाना
मनमोहन सिह पर बनेगी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

किसी राजनीतिक व्‍यक्ति की जिंदगी फिल्‍म का रोचक हिस्‍सा हो सकती है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री की चुप्‍पी के इतने किस्‍से हैं। विरोधी पार्टियों और आलोचकों ने उन पर फब्तियां कसीं। उन्‍हें मौनमोहन जैसे नाम दिए गए। मीडिया में उनका मखौल उड़ाया गया,फिर भी एक अर्थशास्‍त्री के रूप में उनके योगदार को भारत नहीं भुला सकता। आर्थिक उदारीकरण से लेकर विश्‍वव्‍यापी मंदी के दिनों में भी उन्‍होंने अपनी अर्थ नीतियों से विकासशील देश को बचाया। आर्थिक प्रगति की राह दिखाई। 2004 से 2008 तक उनके मीडिया सलाहकार रहे संजॉय बारू ने मनामोहन के व्‍यक्तित्‍व पर संस्‍मरणात्‍मक पुस्‍तक लिखी थी। 2014 में प्रकाशित इस पुस्‍तक का नाम द एक्‍सीडेटल प्राइममिनिस्‍टर - द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमाहन सिंह है। इस पुस्‍तक के प्रकाशन के समय ही विवाद हुआ था। दरअसल,दृष्टिकोण और व्‍याख्‍या से तथ्‍यों की धारणाएं बदल जाती हैं। कई बार ऐसी किताबों की व्‍याख्‍या से प्रचलित धारणाओं की पुष्टि कर देती है।
अब इसी पुस्‍तक पर एक फिल्‍म बनने जा रही है। इस फिल्‍म में अनुपम खेर भूतपूर्व प्रधानमंत्री की भूमिका निभाएंगे। संजॉय बारू की संस्‍मरणात्‍मक किताब का फिल्‍मीकरण हंसल मेहता ने किया है। हंसल मेहता हिंदी फिल्‍मों के सफल निर्देशक हैं। उन्‍होंने शाहिद और अलीगढ़ दो बॉयोपिक निर्देशित किए हैं। अभी वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर बन रहे एक शो से भी जुड़ हैं। तात्‍पर्य यह कि जीवनी और बॉयोपिक में सिद्धहस्‍त हंसल मेहता ने फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट लिखी है। फिल्‍म का निर्देशन विजय रत्‍नाकर गुट्टे करेंगे। इस फिल्‍म से वे निर्देशन में कदम रख रहे हैं। फिल्‍म के निर्माता बोहरा ब्रदर्स हैं। साथ में सहनिर्माता अशोक पंडित हैं। अशोक पंडित अपने भाजपा और हिंदूवादी बयानों के लिए विख्‍यात हैं। फिल्‍म से जुड़े क्रिएटिव व्‍यक्तियों में कुछ घनघोर भाजपा समर्थक हैं तो स्क्रिप्‍ट लेखक हंसल मेहता बिल्‍कुल भाजपा विरोधी हैं। अभी नहीं कहा जा सकता कि फिल्‍म मूल किताब से कितनी अलग और नाटकीय होगी। मूल किताब विवादास्‍पद रही है। इससे कांग्रेस का राजनीतिक शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। माना जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेसविरोधी लहर बढ़ाने में पुस्‍तक ने मदद की थी।
योजना के मुताबिक द एक्‍सीडेटन प्राइममिनिस्‍टर अगले साल दिसंबर 2018 में रिलीज होगी। उसके कुछ महीनों के बाद फिर से लोकसभा चुनाव होंगे। एक मान्‍यता यह है कि इस फिल्‍म से मूल किताब के प्रभाव को दोहराने की कोशिश होगी। निश्चित ही ऐसी फिल्‍मों का बनना और रिलीज होना हिंदी फिल्‍मों के लिए साहसिक काम है। फिल्‍में तो नेहरू  अमूमन फिल्‍मकार समकालीन या निकट अतीत की राजनतिक हस्तियों पर फिल्‍में बनाने से कतराते हैं। उन्‍हें व्‍यर्थ के विवाद की वजह से फिल्‍म के अटक जाने का डर रहता है।
द एक्‍सीडेंटल प्राइममिनिस्‍टर का इंतजार रहेगा।

Wednesday, June 7, 2017

रोज़ाना : रानी की आएगी फिल्‍म



रोज़ाना
रानी की आएगी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज
दो महीने पहले 4 अर्पैल को रानी मुखर्जी की नई फिल्‍म हिचकी की शूटिंग आरंभ हुई थी। दो महीनों के अंदर इसकी शूटिंग पूरी हो गई। 5 जून को यशराज फिल्‍म्‍स ने फिल्‍म की समाप्ति की तस्‍वीर भेजी। रानी मुखर्जी की हिचकी फटाफट पूरी की गई है। उन्‍होंने अपने करिअर में सबसे ज्‍यादा फिल्‍में यशराज फिल्‍म्‍स के साथ ही की हैं। यशराज के साथ 2002 में साथिया से आरंभ हुई उनकी यात्रा मर्दानी तक पहुंची है। हिचकी उनकी अगली फिल्‍म होगी। यशराज बैनर के तहत हिचकी के निर्माता मनीष शर्मा हैं। इस व्‍यवस्‍था के अंतर्गत मनीष शर्मा की यह तीसरी फिल्‍म होगी। इसके पहले वेदम लगा के हईसा और मेरी प्‍यारी बिंदु कर निर्माण कर चुके हैं। इनमें से पहली चली और प्रशंसित हुई थी,दूसरी फिसली और निंदित हुई है।
रानी मुखर्जी का फिल्‍मी करिअर हिंदी में राजा की आएगी बारात से आरंभ हुआ। बीस साल पहले 1997 में आई इस फिल्‍म से रानी मुखर्जी को पहचान मिल गई थी। आमिर खान के साथ गुलाम में आती क्‍या खंडाला गाती हुई वह दर्शकों की प्रिय बनीं और करण जौहर की कुछ कुछ होता है से वह लोकप्रिय अभिनेत्रियों की अगली कतार में आ गईं। फिर तो उन्‍हें पलट कर या ठहर कर नहीं देखना पड़ा। शुरू में अपनी खसखस आवाज की वजह से उन्‍हें आलोचना का शिकार होना पड़ा था। गुलाम में महेश भट्ट ने उनके संवाद किसी और की आवाज में डब करवाए थे। बाद में वही आवाज उनकी खासियत बन गई। उन्‍होंने संजय लीला भंसाली की ब्‍लैक में अद्भुत अभिनय किया था। इसके बाद उनकी कुछ फिल्‍में फ्लाप हुईं। उथल-पुथल के उन सालों में वह फिल्‍मों के चुनाव और अपने अभिनय पर ध्‍यान नहीं दे सकीं। एक अंतराल के आद राजकुमार गुप्‍ता की 2011 में आई नो वन किल्‍ड जेसिका से उनकी वापसी हुई। रानी मुखर्जी ने अप्रैल 2014 में यशराज फिल्‍म्‍स के उत्‍तराधिकरी आदित्‍य चोपड़ा केसाथ शादी कर ली। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री किसी बड़ डायरेक्‍टर या प्रोड्सर से शादी करने के बाद अभिनेत्रियों को फिल्‍मों के ऑफर नहीं मिलते। यही रानी मुखर्जी के साथ भी हुआ।
बहरहाल, रानी मुखर्जी ने तीन साल पहले आई मर्दानी से संकेत दिया था कि वह कायदे की फिल्‍मों में काम करने को तैयार हैं। तीन सालों केबाद उनकी हिचकी आ रही है। हिचकी एक ऐसी लड़की की कहानी है,जो अपनी कमियों को नजरअंदाज कर कुछ पाना चाहती है। किसी भी तरह वह अपना सपना पूरा करनाचाहती है। यह फिल्‍म देश की उन तमाम लड़कियों की कहानी है,जिन्‍हें कमियों की वजह से आगे नहीं आने दिया जाता। जाहिर सी बात है कि रानी मुखर्जी अब साधारण किस्‍म की फिल्‍में करने के लिए मजबूर नहीं हैं,लेकिन किसी फिल्‍म की कामयाबी सिर्फ कलाकार की योग्‍यता पर निर्भर नहीं करती। लेखक,निर्देशक और बाकी टीम ही उसके अभिनय को सार्थक रंग देते हैं। मनीष शर्मा की संवेदना और बोध पर भरोसा किया जा सकता है,लेकिन सिद्धार्थ पी मल्‍होत्रा आश्‍वस्ति नहीं देते। उनकी पिछली फिल्‍म वी आर फैमिली बेअसर रही थी।

Tuesday, June 6, 2017

रोज़ाना : पर्दे पर भी सगे भाई



रोज़ाना
पर्दे पर भी सगे भाई
-अजय ब्रह्मात्‍मज

कबीर खान की ट्यूबलाइट में सहोदर सलमान खान और सोहेल खान सगे भाइयों के रोल में नजर आएंगे। कबीर खान ने पर्देपर उन्‍हें लक्ष्‍मण और भरत का नाम दिया है। भरत और लक्ष्‍मण भारतीय मानस में भाईचारे के मिसाल रहे हैं। कहीं न कहीं कबीर उस मिथक का लाभ उठाना चाहते होंगे। ट्यूबलाइट दो भाइयों की कहानी है। उनमें अटूट प्रेम और भाईचारा है। लक्ष्‍मण मतिमंद है,इसलिए सभी उसे ट्यूबलाइट कहते हैं। भारत-चीन युद्ध के उस दौर में एक भाई लड़ने के लिए सीमा पर चला जाता है और नहीं लौटता। दूसरे ट्यूबलाइट भाई को यकीन है कि युद्ध बंद होगा उसका भाई जरूर लौटेगा। अपने उस यकीन से वह कोशिश भी करता है। कबीर खान ने सगे भाइयों की भूमिका के नलए सलमान खान के साथ सोहेल खान को चुना। उनका मानना है कि पर्दे पर एक-दो सीन के साथ ही दर्शक उन्‍हें सगे भाइयों के तौर पर मान लेंगे। गानों और नाटकीय दृश्‍यों मेंद दोनों भाइयों का सगापन आसानी से जाहिर होगा। सलमान खान के अपने भाइयों से मधुर रिश्‍ते हैं। सलमान खान ने भी अपनी बातचीत में कहा कि भाई के रोल में किसी पॉपुलर और बड़े स्‍टार को लेने पर सगापन दिखाने के लिए कुछ सीन रखने पड़ते। साोहेल के रहने से यह काम आसान हो गया।
हिंदी फिल्‍मों में अनेक सगे और सहोदर भाई एक ही समय में एक्टिव रहे हैं। अपनी योग्‍यता और लोकप्रियता से उनके स्‍टेटस में फर्क रहा है। सहोदर भाइयों में कपूर खानदान के तीनो भाई राज कपूर,शम्‍मी कपूर और शशि कपूर सफलतम कहे जा सकते हैं। ऐसा संयोग रहा कि उन भाइयों को साथ लेकर किसी ने फिल्‍म बनाने की कोशिश नहीं की। अगर किसी फिल्‍म में आए भी तो गौण भूमिकाओं या कैमियो में रहे जैसे कि आवाराआवारा में शशि कपूर ने बड़ भाई राज कपूर के बचपन की भूमिका निभाई थी। कपूर के अलावा कुमार(अशोक,अनूप और किशोर) भाइयों को भी अच्‍छी सफलता मिली थी। उनकी चलती का नाम गाड़ी को कैसे भुलाया जा सकता है? इस फिल्‍म में तीनों भाइयों की तिगड़ी देखते ही बनती है।
 पर्दे पर रियल लाइफ के सगे भाइशें में दिलीप कुमार और नासिर खान गंगा जमुना में नजर आए थे। फिरोज खन,संजय खान और अकबर खान ने अलग-अलग फिल्‍मों में सगे भाइयों की भूमिका निभाई। सनी देओल और बॉबी देओल सगे भाइयों के रूप में अपने में नजर आए थे। हाल ही में काबिल में रोणित राय और रोहित राय खल सगे भाइयों के रूप में रितिक रोशन के मुकाबले में दिखे। सलमान खान ने दबंग में अरबाज खान के सौतेले भाई चुलबुल पांडे की भूमिका निभाई थी। भाइयों की नई पीढ़ी फिल्‍मों में नहीं दिख रही है। हां,दोबारा में रियल भाई-बहन हुमा कुरैशी और साकिब सलीम भाई-बहन की ही भूमिकाओं में दिखे।

Saturday, June 3, 2017

रोज़ाना : इतने सारे फाल्‍के अवार्ड?



रोज़ाना
इतने सारे फालके अवार्ड?
-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल अखबारों और चैनलों पर खबर थी कि प्रियंका चोपड़ा और कपिल शर्मा को दादा साहेब फाल्‍के अकादेमी अवार्ड से सम्‍मानित किया गया। इस खबर को पढ़ते समय पाठक अकादेमी शब्‍द पर गौर नहीं करते। एक भ्रम बनता है कि उन्‍हें प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्‍के अवार्ड कैसे मिल गया? देश में खास कर महाराष्‍ट्र में दादा साहेब फाल्‍के के नाम से और भी अवार्ड हैं। दादा साहेब फाल्‍के के नाम पर चल रहे इन पुरस्‍कारों से देश के सर्वोच्‍च फिल्‍म पुरस्‍कार की मर्यादा मलिन होती है।
राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कारों की घोषणा के साथ या आसपास दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार की भी घोषणा होती है। यह पुरस्‍कार से अधिक सम्‍मन है। सिनेमा में अप्रतिम योगदान के लिए किसी एक फिल्‍मी हस्‍ती को यह पुरस्‍कार दिया जाता है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन दिए जाने वाले राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार की यह श्रेणी अत्‍यंत सम्‍मानीय है। इस साल दक्षिण के के विश्‍वनाथ को इस पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया है। कायदे से सूचना एवं प्रसारण मंत्राालय को इस आशय की अधिसूचना जारी करनी चाहिए कि देश में दादा साहेग फाल्‍के के नाम से कोई और पुरस्‍कार नहीं दिया जा सकता। ऐसा करने से राष्‍ट्रीय सम्‍मान की गरिमा बची रहेगी और किसी प्रकार का कंफ्यूजन नहीं होगा। कोई चौंकेगा नहीं कि कपिल शर्मा को दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार कैसे मिल गया?
होना तो यह चाहिए कि खुद फिल्‍म इंडस्‍ट्री के सदस्‍य इस पुरस्‍कार समारोह में शामिल न हों। इसे ग्रहण न करें। सच्‍चाई यह है कि पुरस्‍कार और सम्‍मान की भूखी फिल्‍म इंडस्‍ट्री किसी भी आयोजन के लिए दौड़ी चली जाती है। इन दिनों इतने पुरस्‍कार दिए जा रहे हैं कि उनका महत्‍व घट गया है। सभी जानते हैं कि ये पुरस्‍कार सुविधा और उपलब्‍धता के हिसाब से भी दिए जाते हैं। कई बार अंतिम क्षणों में विजेताओं के नाम बदल जाते हैं या किसी स्‍टार को खुश करने के लिए नई कैटेगरी बना दी जाती है। अब तो फिल्‍म स्‍टार खुलेआम कहने लगे हैं कि पुरस्‍कार रखो अपने पास,हमें तो समारोह में परफार्म करने के पैसे दे दो। पुरस्‍कार समारोहों में परफार्म करने का पारिश्रमिक करोड़ों में मिलता है,जबकि पुरस्‍कार से लाखों का काम और नाम भी नहीं मिलता।
वक्‍त आ गया है कि भारत सरकार और केंद्रीय फिल्‍म निदेशालय दादा साहेब फाल्‍के से मिलते-जुलते नामों से चल रहे पुरस्‍कारों के प्रति गंभीर हो और उन्‍हें तत्‍काल नाम बदलने का आदेश दे। अगर फिल्‍म इंडस्‍ट्री स्‍वयं सम्‍मान नहीं कर पा रही है तो उसे सरकारी अधिसूचना से लागू करना होगा।

Thursday, June 1, 2017

रोज़ाना : फिल्‍में नहीं,चमके सितारे



रोज़ाना
फिल्‍में नहीं,चमके सितारे
-अजय ब्रह्मात्‍मज

भारत में सबसे अधिक फिल्‍में बनती हैं। यहां की फिल्‍म इंडस्‍ट्री हॉलीवुड के मुकाबले खड़ी है। अब तो दंगल और बाहुबली का उदाहरण दिया जा सकता है कि हमारी फिल्‍में 1000 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन करती हैं। निश्चित ही आगामी वर्षें में भारतीय फिल्‍मों का कैनवास बड़ा होगा। बड़े पैमाने पर तकनीकी गुण्‍वत्‍ता के साथ उनका निर्माण और वितरण होगा। अधिकाधिक आय की संभावनाएं बनेंगी। इस प्रयाण के बावजूद जब इंटरनेशनल फेस्टिवल और मंचों पर भारतीय फिल्‍में नहीं दिखतीं तो अफसोस होता है। मन मसोस कर रह जाना पड़ता है।
हाल ही में संपन्‍न कान फिल्‍म समारोह की भारतीय मीडिया में चर्चा रही। रोजाना कुछ तस्‍वीरें छपती रहीं। मुख्‍य रूप से ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन,सोनम कपूर और दीपिका पादुकोण की आकर्षक और नयनाभिरामी तस्‍वीरों से पत्र-पत्रिकाएं भरी रहीं। हम ने यह भी देखा कि उन्‍हें घेरे फोटोग्राफर खड़ रहे और उन्‍होंने मटकते हुए रेड कार्पेट पर पोज किया। ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन 2002 से कान फिल्‍म समारोह में जा रही हैं। सोनम कपूर को भी छह साल हो गए। इस साल दीपिका पादुकोण के भी कदम रेड कार्पेट चूमते रहे। संयोग है कि भारत की तीनों अभिनेत्रियां एक सौंदर्य प्रसाधन के विज्ञापन के सिलसिले में वहां थीं। उनका अपनी या दूसरों की फिल्‍मों से कोई लेना-देना नहीं था। एक कंपनी भारतीय अभिनेत्रियों का इस्‍तेमाल अपने प्रोडक्‍ट के प्रचार के लिए कर रही थी और हम भारतीय अपनी अभिनेत्रियों की उपलब्धियों पर इठला रहे थे। उन अभिनेत्रियों की व्‍यक्तिगत उपलब्धि से इंकार नहीं किया जा सकता,लेकिन कान फिल्‍म समारोह आखिर फिल्‍मों का समारोह है। अगर भारत की फिल्‍में किसी उल्‍लेखनीय श्रेणी में वहां शामिल नहीं हैं तो हमें सोचने की जरूरत है।
सिर्फ अभिनेत्रियां ही नहीं। भारत सरकार का प्रतिनिधिमंडल भी वहां रहता है। कुछ निर्माता निजी तौर पर वहां जाते हैं। कुछ अपनी फिल्‍मों की शोकेसिंग करते हैं। जैसे कि नंदिता दास ने मंटो का पोस्‍टर रिलीज किया। -संघमित्रा के साथ एआर रहमान और श्रुति हसन मौजूद रहे। प्रियंका चोपड़ा की मां मधु चोपड़ा अपनी सिक्‍कमी फिल्‍म पाहुना का ट्रेलर दिखाने गई थीं। फंड ,निवेश और रुचि जुटाने के लिए ऐसी कवायदें की जाती हैं। यह भी माना जाता है कि वहां दिखाने के बाद देश के दर्शकों और निवेशकों की रुचि भी बढ़ती है। सवाल फिर भी बना रहता है कि आखिर क्‍यों भारतीय फिल्‍में शामिल नहीं हो सकीं? क्‍या हमारी फिल्‍में उस स्‍तर की नहीं होतीं या हमारे छोटे-मझोले फिल्‍मकार फिल्‍म फेस्टिवल के बारे में सोच ही नहीं पाते।
इस साल एफटीआईआई की पायल कपाडि़या की फिल्‍म आफ्टरनून क्‍लाउड्स स्‍टूडेंट श्रेणी में शामिल हुई थी,जिसकी मीडिया में कोई चर्चा नहीं थी।
(कृपया इसे छोटा न करें हर गुरूवार की तरह।)

Wednesday, May 31, 2017

रोज़ाना : जे पी दत्‍ता की ‘पलटन’



रोज़ाना
जे पी दत्‍ता की पलटन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
खबरें आ रही हैं कि जेपी दत्‍ता उमराव जान की रिलीज के 11 सालों के बाद फिर से लाइट कैमरा एक्‍शन कहने के लिए तैयार हैं। वे पलटन नाम की फिल्‍म का निर्देशन करेंगे,जिसमें उनके चहेते फिल्‍म स्‍टार अभिषेक बच्‍चन रहेंगे। अभिषेंक बच्‍चन के साथ सूरज पंचोली और पुलकित सम्राट भी फिल्‍म में होगे। जेपी दत्‍ता की बोर्डर के सीक्‍वल की खबरें लंबे समय तक चलीं। यह फिल्‍म धरी रह गई। सबसे बड़ी वजह बजट और कलाकारों की भागीदारी है। इन दिनों फिल्‍म स्‍टार किसी भी भी को 30 से 60 दिनों का समय देते हैं और चाहते हैं कि एक ही शेड्यूल में फिल्‍म पूरी हो जाए। अगर आज के माहौल में जेपी दत्‍ता की एलओसी कारगिल की कल्‍पना करें तो वह असंभव हो जाएगी।  इस पैमाने,स्‍तर और समय के साथ अभी फिल्‍में बनाना मुश्किल हो चुका है। ऐसा लगता है कि बाहुबली फिल्‍मों की कामयाबी ने ही जेपी दत्‍ता को अपने किस्‍म की एपिक फिल्‍म के लिए तैयार किया होगा।
अभिशेक बच्‍चन और करीना कपूर की पहली फिल्‍म रिफ्यूजी के निर्देशक जेपी दत्‍ता ही थे। उन्‍हें उन दोनों का गॉडफादर कहा जाता है। वे दिन दूसरे थे। तब अभिषेक बच्‍चन और करीना कपूर की बड़ी बहन करिश्‍मा कपूर के बीच प्रेम था। दोनों की सगाई और शादी की बातें चल रही थीं। रिफ्यूजी की रिलीज के समय मुंबई के द क्‍लब में शानदार पार्टी हुई थी,जिसमें बच्‍चन और कपूर परिवार के सभी सदस्‍य शामिल हुए थे। बाद में अनजान कारणों से यह यह संबंध पक्‍का नहीं हुआ। दोनों परिवारों के बीच भी खटास हुई। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कुछ कहानियां सभी जानते हैं,लेकिन उन्‍हें कोई बताता या लिखता नहीं है। कभी तो लिहाज और कभी समाज के डर से सभी उसे भूल जाते हैं। बहरहाल, अभिषेक बच्‍चन और जेपी दत्‍ता के संबंध बने रहे। जेपी दत्‍ता ने तो अभिषेक बच्‍चन और ऐश्‍वर्या राय के साथ उमराव जान भी बनाई। यह फिल्‍म रेखा की उमराव जान के पासंग में भी नहीं बैठ सकी।
पलटन अंग्रेजी शब्‍द प्‍लैटून का प्रचलित हिंदी रूप है। सैनिकों की टुकड़ी को पलटन कहते हैं। आम भाषा में जिसे दस्‍ता भी कहा जाता है। जेपी दत्‍ता की पलटन 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर है। कारगिल और 1971 के युद्ध पर जेपी दत्‍ता ने एलओसी कारगिल और बोर्डर का निर्देशन किया था,इस बार वे भारत-चीन युद्ध की पृष्‍ठभूमि में कुछ जांबाज सैनिकों की कहानी कहेंगे। उल्‍लेखनीय है कि कबीर खान की ट्यूबलाइट भी भारत-चीन युद्ध की पृष्‍ठभूमि पर है,लेकिन उसकी कहानी युद्ध से अधिक भोले युवक लक्ष्‍मण(सलमान खान) की है। जेपी दत्‍ता को इस बार अपने पिता ओपी दत्‍त की क्रिएटिव कमी महसूस होगी। उनकी सारी फिल्‍मों की पटकथा और संवाद में उनका भारी योगदान रहता था।
जरूरत है कि पलटन जैसी फिल्‍मों के साथ जेपी दत्‍ता लौटें। आज के दर्शकों को सघन भाव और संबंधों की ऊष्‍मा से भरे किरदारों को किसी एपिक फिल्‍म में देखने का आनंद मिले।