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Tuesday, October 17, 2017

रोज़ाना : कुंदन शाह की याद



रोज़ाना
कुंदन शाह की याद
-अजय ब्रह्मात्‍मज
मुंबई में चल रहे मामी फिल्‍म फेस्टिवल में कुंदन शाह निर्देशित जाने भी दो यारो का खास शो तय था। यह भी सोचा गया था कि इसे ओम पुरी की श्रद्धांजलि के तौर दिखाया जाएगा। फिल्‍म के बाद निर्देशक कुंदन शाह और फिल्‍म से जुड़े सुधीर मिश्रा,विधु विनोद चापेड़ा और सतीश कौशिक आदि ओम पुरी से जुड़ी यादें शेयर करेंगे। वे जाने भी दो यारो के बारे में भी बातें करेंगे। इस बीच 7 अक्‍टूबर को कुंदन शाह का आकस्मिक निधन हो गया। तय कार्यक्रम के अनुसार शो हुआ। भीड़ उमड़ी। फिल्‍म के बाद का सेशन ओम पुरी के साथ कुंदन शाह को भी समर्पित किया गया। ज्‍यादातर बातचीत कुंदन शाह को ही लेकर हुई। एक ही रय थी कि कुंदन शाह मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री की कार्यप्रणाली में मिसफिट थे। वे जैसी फिल्‍में करना चाहते थे,उसके लिए उपयुक्‍त निर्माता खोज पाना असंभव हो गया है।
कुछ बात तो है कि उनकी जाने भी दो यारो 34 सालों के बाद आज भी प्रासंगिक लगती है। आज भी कहीं पुल टूटता है तो तरनेजा-आहूजा जैसे बिजनेसमैन और श्रीवास्‍तव जैसे अधिकारियों का नाम सामने आता है। और आज भी कोई सुधीर व विनोद बहल का बकरा बनता है। साहित्‍य से तुलना करें तो कुंदन शाह की जाने भी दो यारो देखना कहीं न कहीं हरिशंकर पारसाई और शरद जोशी को पढ़ने जैसा है। गुदगुदी होती है,हंसी आती है,लेकिन साथ ही मन छलनी होता है। कुंदन शाह ने अपने समय के यथार्थ को चुटीले और नुकीले अंदाज में पेश किया। यह फिल्‍म क्रिएटिव सनकीपन और धुन की मिसाल है।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में कैमरे के आगे-पीछे विख्‍यात हो चुकी तमाम हस्तियां इस फिल्‍म से जुड़ती चली गई थीं। सभी पर धुन सवार थी। कभी 72 झांटे लगातार शूटिंग चल रही है। नसीरूद्दीन शाह सेट पर ही सो रहे हैं और शॉट आने पर हाथ-मुह धोकर तैयार हो जाते हैं। कैमरामैन विलोद प्रधान क्रेन पर ही झपकी लेते हैं। सुबह आलू-गोभी की सब्‍जी बनती है तो शाम में गोभी-आलू की सब्‍जी परोसी जाती है। एक्‍टर को देने के लिए पर्याप्‍त पैसे नहीं हैं तो प्रोडक्‍शन इंचार्ज विधु विनोद पोपड़ा मेकअप कर के सेट पर खड़े हो जाते हैं। निर्देशक चौंकते हैं कि ऐसा क्‍यों? उन्‍हें बताया जाता है कि 2000 रुपए बचा लिए गए हैं। कम दर्शकों को मालूम होगा कि इस फिल्‍म में अनुपम खेर का एक पूरा सीक्‍वेंस था। एडीटिंग में उसे काट दिया गया,जबकि वह अनुपम खेर की पहली फिल्‍म थी...सारांश्‍ के भी पहले। यह अलग बात है कि जाने भी दो यारो में नहीं दिखने की वजह से भी उन्‍हें सारांश मिली महेश्‍ा भट्ट उस रोल में किसी नए कलाकार को लेना चाहते थे। जाने भी दो यारो के अनेक किस्‍से हैं। उन्‍हें समेटते हुए एक और किताब आनी चाहिए।

Wednesday, October 11, 2017

रोज़ाना - पचहत्‍तर के अमिताभ बच्‍चन



दरअसल...
75 के अमिताभ  बच्‍चन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अगले शुक्रवार से पहले अमिताभ बच्‍चन 75 के हो जाएंगे। उनका जन्‍म 11 अक्‍टूबर 1942 को हुआ था।
दो दिनों पहले उभरते और पहचान बनाते एक्‍टर इश्‍त्‍याक खान से मुलाकात हुई। उन्‍होंने पिछले दिन अमिताभ बच्‍चन के साथ एक ऐड की शूटिंग की थी। जिज्ञासावश मैंने पूछा कि कैसा अनुभव रहा और उनके बारे में क्‍या कहना चाहेंगे? इश्‍त्‍याक ने तपाक से जवाब दिया, इस उम्र में इतना काम कर चुकने के बाद भी सेट पर उनकी तत्‍परता चकित करती है। उन्‍होंने क्‍या-क्‍या नहीं कर लिया है,लेकिन उस ऐड में भी उनकी संलग्‍नता से लग रहा था कि वह उनका पहला काम हो। वही उत्‍साह और समर्पण...हम जैसे एक्‍टर अनेक कारणों से अपनी एकाग्रता खो देते हैं। अमिताभ बच्‍चन 75 के उम्र में किसी प्रकार की चूक से बचना चाहते हैं। अमिताभ बच्‍चन की इस खासियत को सभी दोहराते हैं। सेट पर वे खाने-पीने,आराम करने,मेकअप करने और जरूरी एक्‍सरसाइज करने के अलावा अपने वैन में नहीं बैठते। उनके हाथों में स्क्रिप्‍ट रहती है। वे अपनी पंक्तियों को दोहराते रहते हैं। कोएक्‍टर के साथ रिहर्सल करने में रुचि रखते हैं। निर्देशकों के निर्देश से इधर-उधर नहीं जाते। वे अपनी फिल्‍मों और कामयाबी का सारा ज्ञेय निर्देशकों को देते हैं। इधर दो सालों से वे लेखक की महत्‍ता और केंद्रीय योगदान के बारे में बोलने लगे हैं।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में 75 पार कर चुके कई अभिनेत्री-अभिनेता हैं,लेकिन उनमें से कोई भी अमिताभ बच्‍चन की तरह सक्रिय नहीं है। बाज दफा सोचना पड़ता है कि उम्र बढ़ने के साथ उनके काम की गति बढ़ती गई है। इन दिनों वे रोबोट की तरह काम करने लगे हैं। सुबह से देर रात वे एक्टिव रहते हैं। एक बार अभिषेक बच्‍चन ने मजाक में कहा था कि मेरे डैड घर आने के बाद भी कुछ समय तक अमिताभ बच्‍चन ही रहते हैं...तात्‍पर्य यह था कि अमिताभ बच्‍चन पूरी ऊर्जा और लगन से अपनी छवि को जीते हैं। तदनुकूल व्‍यवहार करते हैं। उनके जीवन में सब कुछ पना-तुला और व्‍यवस्थित है। मेरा अनुभव रहा है कि वे टाल-मटोल करते ही नहीं हैं। आप इंटरव्‍यू और मुलाकात के लिए आग्रह करें तो कुछ घंटों के अंदर जवाब आ जाता है कि वह हो पाएगा या नहीं? उन्‍होंने कभी देखते,सोचते हैं,बताते हैं जैसी क्रियाओं का इस्‍तेमाल नहीं किया। 75वीं सालगिरह के मौके पर बातचीत का आग्रह संदेश भेजने पर उनकी दो पंकित्‍यों के उत्‍तर में तीन बार क्षमा शब्‍द का इस्‍तेमाल था। यह शालीनता और विनम्रता दुर्लभ है।
अमिताभ बच्‍चन अपनी फिल्‍मों और विज्ञापनों के साथ कई सामाजिक कार्यों में भी व्‍यस्‍त रहते हैं। भारत सरकार से लेकर यूएन जैसी इंटरनेशनल संस्‍थाओं के लिए मुफ्त में अपनी सेवाएं देते हैं। वे हर मौके पर हर जगह उपलब्‍ध रहते हैं। टाइम मैनेजमेंट उनसे सीखना चाहिए। मुंबई की अस्‍त-व्‍यस्‍ज ट्रैफिक में भी उन्‍हें कहीं विलंब से पहुंचते नहीं देखा गया। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पुरानी कहावत है कि आप अमिताभ बच्‍चन से अपनी घड़ी मिला सकते हैं।
हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में निष्‍णात अमिताभ लिखते समय अंग्रेजी शब्‍दों को रोमन में लिखना पसंद करते हैं। इसी प्रकार हिंदी शब्‍दों को कभी रोमन में नहीं लिखते। उन्‍हं अपनी स्क्रिप्‍ट हिंदी में चाहिए होती है। स्क्रिप्‍ट में लिखे संवादों में वे अपनी संवाद अदायगी की सुविधा के लिहाज से पॉज लगाते हैं। शूटिंग में कैमरे के सामने जाने के पहले वे अपने दृश्‍यों और संवादों को अच्‍छी तरह समझ लेते हैं। उन्‍हें सेट पर कभी किसी निर्देशक से उलझते नहीं देखा गया। अमिताभ बच्‍चन फिल्‍मों और अन्‍य वीडियो सामग्रियों की डबिंग का काम सुबह में करना पसंद करते हैं। ज्‍यादातर नौजवान जब तलक पहली खय पीने की युक्ति में लगे रहते हैं,तब तक अमिताभ बच्‍चन एक-दो काम निबटा चुके होते हैं। देर रात तक उन्‍हें काम करते हुए देखा जा सकता है। उनके ब्‍लॉग,फेसबुक और ट्ीटर की देर रात की एंट्री से यह जाहिर है।
अमिताभ बच्‍चन दीर्घायु हों और ताजिंदगी सक्रिय रहें। हां,वे अपने अभिनय की शैली और फिल्‍मों के बारे में भी विस्‍तार से बताने का कष्‍ट करें।

Saturday, October 7, 2017

रोज़ाना : निर्देशक बनने की ललक



रोज़ाना
निर्देशक बनने की ललक
-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिल्‍मों में निर्देशक को कैप्‍टन ऑफ द शिप कहते हैं। निर्देशक की सोच को ही फिल्‍म निर्माण से जुड़े सभी विभागों के प्रधान अपनाते हैं। वे उसमें अपनी दक्षता और योग्‍यता के अनुसार जोड़ते हैं। उनकी सामूहिक मेहनत से ही निर्देशक की सोच साकार होकर फिल्‍म के रूप में सामने आती है। निर्देशक की सोच नियामक भूमिका निभाती है। फिल्‍म निर्माण से जुड़े सभी कलाकार और तकनीशियन एक न एक दिन निर्देशक बनने का सपना रखते हैं। उन सभी में यह ललक बनी रहती है। इन दिनों यह ललक कुछ ज्‍यादा ही दिख रही है।
पहले ज्‍यादातर व्‍यक्तियों की दिशा और सीमा तय रहती थी। वे सभी अपनी फील्‍ड में महारथ हासिल कर उसके उस्‍ताद बने रहते थे। हां,तब भी कुछ क्रिएटिव निर्देशक बनते थे। गौर करे तो पाएंगे कि उन सभी को कुछ खास कहना होता था। कोई ऐसी फिल्‍म बनानी होती थी,जो चलन में ना हो। बाकी सभी अपनी फील्‍ड में ध्‍यान देते थे। पसंदीदा निर्देशक के साथ आजीवन काम करते रहते थे। महबूब खा,बिमल राय,राज कपूर और बीआर चोपड़ा जैसे दिग्‍गजों की टीम अंत-अंत तक साथ में का म करती रही। अभी किसी भी प्रोडक्‍शन हाउस में आप चले जाएं। आप पाएंगे कि वहां इंटर्न का काम रहे युवा प्रतिभा के पास खुद की एक स्क्रिप्‍ट,जिसे वह निर्देशित करना चाहता है। इसमें कोई बुराई नहीं है। नई प्रतिभाओं को अवसर मिलने चाहिए और नई प्रतिभाओं को कोशिश करते रहना चाहिए।
मुश्किल तब होती है,जब किसी एक फील्‍ड में माहिर व्‍यक्ति बगैर पूरी तैयारी के सिर्फ निर्देशक बनने की हड़बड़ी में डायरेक्‍टर्स चेयर पर विराजमान हो जाता है। मैंने देखा है कि एक बार निर्देशक का ठप्‍पा लगने के बाद वे अपनी फील्‍ड के लिए अयोग्‍य मान लिए जाते हैं। यही धारणा बनती है कि उनका ध्‍यान खास विधा की तरफ नहीं रहेगा। वे अपनी जुगत भिड़ाने में लगे रहेंगे। ऐसा देखा भी गया है कि किसी एक विभाग के सहायक अपे काम पर पूरा ध्‍यान देने के बजाय कलाकारों और निर्माताओं से संपर्क बढ़ाने में लगे रहते हैं। मौका मिलते ही वे उन्‍हें अनी स्क्रिप्‍ट सुना देते हैं। पांस सही गिरा तो उनका काम बन जाता है। अन्‍यथा उन पर नजर रखी जाने लगती है। वे शक के दायरे में आ जाते हैं।
भारतीय समाज में रोजगार और अवसर की असुरक्षा की वजह से ऐसा हो रहा है। कायदे से होना तो यह चाहिए कि अपनी फील्‍ड में पारंगत होने के बाद खुद को निर्देशन के योग्‍य समझने और कुछ खास कहने की की जरूरत महसूस करने के बाद ही निर्देशन की तरफ बढ़ना चाहिए। अभी आप आसपास देखें ले,ाक,गीतकार,कास्टिंग डायरेक्‍टर,म्‍यूजिक डायरेक्‍टर,कैमरामैन...सभी के सभी निर्देशक बनने की ललक लिए विचर रहे हैं। 

Thursday, October 5, 2017

रोज़ाना : खलनायक बना प्रेमी



रोज़ाना
खलनायक बना प्रेमी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण का प्रेम छिपा नहीं है। दोनों फिल्‍मी पार्टियों और अंतरंग मित्रों के इवेंट में एक साथ नजर आते हैं। वे अपनी अंतरंगता जाहिर करने में भी नहीं झिझकते। दीपिका पादुकोण ऐसे अवसरों पर शांत और सौम्‍य दिखती हैं,जबकि रणवीर सिंह अपनी छवि के अनुरूप उत्‍कट और उत्‍साही प्रेमी के रूप में आकर्षित करते हैं। दोनों अपने करिअर के उठान पर हैं। वे सधी गति से आगे बढ़ रहे हैं। संजय लीला भंयसाली की पद्मावती में वे तीसरी बार एक साथ नजर आएंगे। फर्क यह रहेगा कि इस बार प्रेमी के आवेश में होने के बावजूद वे खलनायक के रोल में रहेंगे। संजय लीला भंसाली की ही रामलीला-गोलियां की रासलीला और बाजीराव मस्‍तानी में हम उन्‍हें उद्दाम प्रेमी के रूप में देख चुके हैं। दोनों ही फिल्‍मों में उनकी जोड़ी पसंद की गई।
देखा गया है कि पर्देपर नायक-नायिका की भूमिका निभा रहे निजी जीवन में एक-दूसरे के करीब या प्रेमी हों तो उनके बीच की केमिस्‍ट्री फिल्‍म के दृश्‍यों में बिखरी दिखती है। ऐसी अनेक जोडि़यों की फिल्‍मों के नाम गिनाए जा सकते हैं। निश्चित ही अभिनेता-अभिनेत्री की अंतरंगता भावमुद्राओं में साफ झलकती है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि फिल्‍म बनने के दौरान या किसी और वजह से अभिनेता-अभिनेत्री की निकटता नहीं रही तो भी पर्दे पर रोमांटिक दृयों को करते समय वे भान नहीं होने देते कि उनके बीच लकीर खींच चुकी है। हाल ही में जग्‍गा जासूस देखते समय एहसास नहीं हुआ कि रण्‍बीर कपूर और कट्रीना कैफ अलग हो चुके हैं। फिल्‍म के दृश्‍यों और संवादों के अलावा वे एक-दूसरे की तरफ देखते भी नहीं थे...बात करने का तो सवाल ही नहीं उठता।
एक तीसरा पहलू भी दिखा। रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण निजी जीवन में अलग होनो के बाद ये जवानी है दीवानी और तमाशा में एक साथ आए। उन्‍होंने रत्‍ती भर एहसास नहीं होन दिया कि उनके बीच अब पहले जैसी बात नहीं रही। दोनों ने पूरे प्रोफेशनल तरीके अपने किरदारों को निभाया और दृश्‍यों की जरूरत के मुताबिक प्रेम भी बरसाया। दोनां फिल्‍मों में दोनों को दर्शकों ने पसंद किया। आज के दौर में अब संबंध विच्‍छेद होने पर भी पहले जैसी कटुता नहीं रहती। पहले तो हीरोइनों को फिल्‍म से निकलवाने या हीरो के साथ काम करने से इंकार करने के किस्‍से आम हैं। इन दिनों भूतपूर्व प्रेमी पर्दे पर प्रेम का अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हैं।
पद्मसवतीद्ध में रणवीर सिंह की चुनौती अलग रही है। इस फिल्‍म में वे सुल्‍तान अलाउद्दी खिलजी की भूमिका में हैं। खिलजी पद्मावती से प्रेम करता है,लेकिन पद्मावती उसे बिल्‍कुल नापसंद करती है। अपने सतीत्‍व की रक्षा के लिए वह जौहर भी कर लेती है। देखना रोचक होगा कि निजी जीवन में प्रेम के झूले पर सवार रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण पर्दे पर कैसे घृणा,वितृष्‍णा और खल भाव को ला पाते हैं? शॉट के पहले तक लाड़ बरसा रहे प्रेमी कैसे शॉट में एक-दूसरे के खिलाफ शब्‍द उगल रहे होंगे? रणवीर सिंह के लिए थोड़ा आसान होगा,क्‍योंकि खिलजी तो पद्मावती के प्रेम में बिंधा था। मुश्किल दीपिका पादुकोण की होगी,क्‍योंकि पद्मावती ख्लिजी को फूटी आंख भी नहीं सुहाता था।   

Wednesday, October 4, 2017

रोज़ाना : वरुण धवन की भाषा और आवाज





रोज़ाना
वरुण धवन की भाषा और आवाज
-अजय ब्रह्मात्‍मज
फिलहाल अपनी पीढ़ी के अभिनेताओं में वरुण धवन सबसे आगे निकलते नजर आ रहे हैं। उनकी पिछली फिल्‍म जुड़वां 2 ने जबरदस्‍त बिजनेस किया है। सोमवार तक के चार दिनों में इस फिल्‍म ने 75 करोड़ से अधिक का कलेक्‍शन कर वरुण धवन के स्‍टारडम को ठोस आधार दे दिया है। 2012 में आई स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर से अभी तक के पांच सालों में वरुण धवन ने वैरायटी फिल्‍में दी हैं। उनकी फिल्‍में सफल भी हो रही हैं। इसी पांच साल में उन्‍होंने एक फ्रेंचाइजी ....दुल्‍हनिया फिल्‍म भी कर ली है। जल्‍दी ही वे शुजित समरकार और सशराज फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों में भी नजर आएंगे। कह सकते हैं कि वे इन दिनों बड़े बैनरों और बेहतरीन डायरेक्‍टर के साथ फिल्‍में कर रहे हैं।
पिछले हफ्ते आई फिल्‍म में हम ने उन्‍हें सलमान खान और गोविंदा के मिक्‍स अवतार में देखा। गौर करें तो उनके पिता डेविड धवन ने गोविंदा और सलमान खान के साथ हिंदी फिलमों की कामेडी का नई दिशा दी थी। उसमें एक नयापन तो था। और फिर दोनों सिद्धहस्‍त कलाकारों की कॉमिक टाइमिंग और द्विअर्थी संवादों के खास दर्शक थे। वैस दर्शक आज भी मौजूद हैं। हां,बीस साल पहले के सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक अब मल्‍टीप्‍लेक्‍स में आ गए हैं। संवादों में शिष्‍टता का दबाव बड़ा है,लेकिन दृश्‍यों का भेंडपान बदस्‍तूर जारी है। सुधी दर्शक खिन्‍न होकर भिन-भिन करते रहें। सच्‍चाई यही है कि जुड़वां 2 के बिजनेस ने डेविड धवन का खोश आत्‍मविश्‍वास लौटा दिया है। उनके बेटे वरुण धवन के दर्शक बढ़ गए हैं।
इस कामयाबी के बीच वरुण धवन की भाषा और आवाज खटकती है। जुड़वां और उसके पहले की फिल्‍मों में भी उनका उच्‍चारण दोष स्‍पष्‍ट है। अंग्रेजी मीडियम से पढ़ कर आए फिल्‍म कलाकारों की हिंदी में भाषा का ठेठपन नहीं रहता। हां,अभ्‍यास से वे उसे हासिल कर सकते हैं,लेकिन उसके लिए उन्‍हें जिम में जाने जैसी तत्‍परता और नियमितता निभानी पड़ेगी। साथ ही उनकी आवाज किरदारों के अनुकूल नहीं हो पाती। वे इस पर मेहनत करते भी नहीं दिखते। हिंदी ट्यूटर और वॉयस इंस्‍ट्रक्‍टर रख कर दोनों कमियों को दूर किया जा सकता है। अगर वरुण धवन को हिंदी फिल्‍मों में लंबी पारी खेलनी है। खानत्रयी और अमिताभ बच्‍चन जैसी दीर्घ लोकप्रियता हासिल करनी है तो उन्‍हें अपनी भाषा और आवज पर धान देना होगा। मुंबईकरों की हिंदी में और , और , और के भिन्‍न उच्‍चारण की दिक्‍कतें आम हैं। वे शब्‍दों के आखिरी अक्षर पर लगे अनुस्‍वार का सही उच्‍चारण नहीं कर पाते। हैं को है बोलना आम है। बोलते समय सही ठहराव और उतार-चढ़ाव से संवाद का प्रभाव और आकर्षण बढ़ता है। हिंदी का अभ्‍यास हो तो संवादों में आवश्‍यक भाव लाया जा सकता है।

Tuesday, October 3, 2017

रोज़ाना : नसीरुद्दीन शाह का नजरिया



रोज़ाना
नसीरुद्दीन शाह का नजरिया
-अजय ब्रह्मात्‍मज

कई बार नसीरूद्दीन शाह का इंटरव्‍यू पढ़ते और सुनते समय ऐसा लगता है कि एक असाधारण एक्‍टर औसत सी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में फंस गया है। वह बेमन से सारे काम कर रहा है। हिदी फिल्‍मों के साथ उनका रिश्‍ता सहज नहीं है। उन्‍हें फिल्‍म इंडस्‍ट्री की अधिकांश बातें और रवायतें अच्‍छी नहीं लगतीं। वे मौका मिलते ही शिकायती ल‍हजे में गलतियां गिनाने और कमियां बताने लगते हैं। उन्‍हें पढ़ते-सुनते समय एहसास जागता है कि आखि सब कुछ इतना गलत और कमतर है तो वे यहां क्‍यों फंसे हुए हैं? क्‍यों साधारण और कई बार घटिया भूमिकाओं की फिल्‍में करते हैं?

आठवें दशक मेंश्‍याम बेनेगल केनेतृत्‍व में जारी और प्रशंसित पैरेलल सिनेमा हिंदी फिल्‍मों केइतिहास का उल्‍लेखनीयहिस्‍सा रहा है। इसदौर में अनके यथार्थवादी फिल्‍मकार आए,जिन्‍होंने मेनस्‍ट्रीम सिनेमा केकमर्शियल स्‍टारों के पैरेलल दमदार कलाकारों को लेकर भावपूर्ण और सारगर्भित फिल्‍में बनाईं। नसीरूद्दीन शाह,शबाना आजमी,स्मिता पाटिल और ओम पुरी उस दौर के प्रमुख कलाकार रहे। उनकी सफलता और पहचान ने थिएटर में सक्रिय कलाकारों को फिल्‍मों में आने की हिम्‍मत दी। पैरेलल फिल्‍मों से पहचान और प्रतिष्‍ठा हासिल करने के बावजूद नसीरूद्दीन साहब कभी उस दौर और सिनेमा के प्रति कृतज्ञता नहीं जाहिर करते। मौका मिलते ही वे दोष भी मढ़ते हैं। कमियां बतानी चाहिए,लेकिन खुद के काम और संलग्‍नता से साफ मुकर जाने को क्‍या कहेंगे?

इन दिनों वे पुरानी फिल्‍मों की कमियों के बारे में खुल कर बोलने लगे हैं। उनकी कुछ बातों का ठोस आधार है,लेकिन उनका यह कहना कि मुझे उस समय भी गलत लग रहा था...यह बात पचती नहीं। उम्र बढ़ने और अनुभव होने के बाद हम अपनी जवानी के कामों को अलग और क्रिटिकल नजरों से देखने लगते हैं। हमें अपनी भूलें और कमजोरियां समझ में आती हैं। यह आज की दृष्टि होती है। यह कहना कि मुझे उसी समय कमी दिखरही थी,कहीं न कहीं सोच और समझदारी का विरोधाभासजाहिर करती है। गलत लगने के बावजूद संलग्‍न रहना तो एक प्रकार से अपनी ईमानदारी से समझौता करना हुआ। संदेह होता है कि या तो आप उस समय ईमानदार नहीं थे या अभी नहीं हैं।

भला नसीरूद्दीन साहब की काबिलियत से कौन इंकार कर सकता है? उन्‍होने अनेक सार्थक और महत्‍वपूर्ण फिल्‍में की हैं। अपने समकालीनों और आगे-पीछे की पीढ़ी में भी उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखता। उनका योगदार अनपैरेलल है। वे अभिनय के आदर्श और मानक हैं। कभी रिसर्च हो और रेफरेंस खोजे जाएं तो पताचलेगा कि नसीर साहब ने हिंदी फिल्‍मों में अभिनय की शैनी को निर्णायक ढंग से प्रभावित किया है। वे फिल्‍मों के साथ रंगमंच पर भी सक्रिय हैं। वे अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं। बस,उनकी नकारात्‍मकता उनकी विशाल छवि के आड़े आती है।

Saturday, September 30, 2017

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी -अजय ब्रह्मात्‍मज



रोज़ाना
मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुंचे। उनके समर्थन और आर्शीवाद से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पैर टिकाने के लिए लंबा संघर्ष किया। आज वे तन कर खड़े हैं। अपनी खास पहचान के साथ कामयाब हैं। उनकी इस कामयाबी का श्रेय मां को भी जाता है।
ऐसी प्रेरणादायी मां पर गर्व तो होना ही चाहिए। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए सफल कलाकार क्‍या आम जीवन के दूसरे क्षेत्रों के कामयाब व्‍यक्ति भी अपनी गरीब पृष्‍ठभूमि के बारे में बातें करने से हिचकिचाते हैं। अपने परिवार और मां-बाप को चर्चा और उल्‍लेख से बाहर रखते हैं। इस संदर्भ में नवाजुद्दी सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने अपनी पृष्‍ठभूमि को कभी ढांप के नहीं रखा। उसके बारे में बातें कीं और अपने भाई-बहनों की तरक्‍की के लिए मदद की। आज वे देश के परिचित स्‍टार हैं। अपनी मेहनत और योग्‍यता से समृद्धि हासिल की है। इस समृद्धि में उन्‍होंने परिजनों को शामिल किया है।
नवाजुद्दीन की मां अपने गांव में बच्‍चों की पढ़ाई पर ध्‍ययान देती हैं। खुद भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने अभी तक 300 से अधिक बच्‍चों को पढ़ाया है। ऐसी मांएं प्रेरणा बनती हैं। बेटे की कामयाबी से उनका भी रुतबा बढ़ा होगा। उससे भी बड़ी बात है कि बेटे ने उन्‍हें साथ रखा है और उन पर गर्व करता है। इस तस्‍वीर में दोनों की आंखों की चमक उनके मन के भाव जाहिर करती है। दोनों आश्‍वस्‍त और आबद्ध हैं। धन्‍य है नवाजुद्दीन और उनकी मां।

रोज़ाना : मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी



रोज़ाना
मां के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

पिछले दिनों मां-बेटे की एक तस्‍वीर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। इस तस्‍वीर में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक बुजुर्ग औरत के साथ खड़े हैं। उन्‍होंने अपनी बुजुर्ग औरत के बाएं कंधे को हथेली से कस के थाम रखा है। बुजुर्ग औरत ने नवाजुद्दीन के दाएं कंधे को अपनी हथेली से थाम रखा है। गौर करने पर पता चलता है कि वह बुजुर्ग औरत और कोई नहीं नवाजुद्दीन की मां हैं। उनका नाम मेहरू‍िनिसा सिद्दीकी है। उन्‍हें इस साल बीबीसी ने भारत की 100 प्रभावशाली महिलाओं में चुना है। नवाजुद्दीन सिउद्दीकी मां को मिले इस सम्‍मान से खुश हैं। वे इस सम्‍मनान को विशेष और अपने सभी सम्‍मानों से श्रेष्‍ठ मानते हैं।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहिचक बतोते हैं कि उनकी मां अनपढ़ थीं। नौ बच्‍चों के लालन-पालन के साथ उन्‍होंने पढाई-लिखाई सीखी। बच्‍चों के स्‍कूल जाने के साथ उनमें भी पढ़ाई की उमंग जागी। नवाजुद्दीन कहते हैं कि उनकी मां ने हमेशा पढ़ाई-लिखाई पर ध्‍याान देने की हिदायत दी। साथ ही यह भी समझाया कि जिस फील्‍ड में भी जाना हो,उसकी ट्रेनिंग लेनी चाहिए। मां की सीख से ही नवाजुद्दीन एनएसडी पहुंचे। उनके समर्थन और आर्शीवाद से उन्‍होंने हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में पैर टिकाने के लिए लंबा संघर्ष किया। आज वे तन कर खड़े हैं। अपनी खास पहचान के साथ कामयाब हैं। उनकी इस कामयाबी का श्रेय मां को भी जाता है।
ऐसी प्रेरणादायी मां पर गर्व तो होना ही चाहिए। मध्‍यवर्गीय परिवारों से आए सफल कलाकार क्‍या आम जीवन के दूसरे क्षेत्रों के कामयाब व्‍यक्ति भी अपनी गरीब पृष्‍ठभूमि के बारे में बातें करने से हिचकिचाते हैं। अपने परिवार और मां-बाप को चर्चा और उल्‍लेख से बाहर रखते हैं। इस संदर्भ में नवाजुद्दी सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने अपनी पृष्‍ठभूमि को कभी ढांप के नहीं रखा। उसके बारे में बातें कीं और अपने भाई-बहनों की तरक्‍की के लिए मदद की। आज वे देश के परिचित स्‍टार हैं। अपनी मेहनत और योग्‍यता से समृद्धि हासिल की है। इस समृद्धि में उन्‍होंने परिजनों को शामिल किया है।
नवाजुद्दीन की मां अपने गांव में बच्‍चों की पढ़ाई पर ध्‍ययान देती हैं। खुद भी पढ़ाती हैं। उन्‍होंने अभी तक 300 से अधिक बच्‍चों को पढ़ाया है। ऐसी मांएं प्रेरणा बनती हैं। बेटे की कामयाबी से उनका भी रुतबा बढ़ा होगा। उससे भी बड़ी बात है कि बेटे ने उन्‍हें साथ रखा है और उन पर गर्व करता है। इस तस्‍वीर में दोनों की आंखों की चमक उनके मन के भाव जाहिर करती है। दोनों आश्‍वस्‍त और आबद्ध हैं। धन्‍य है नवाजुद्दीन और उनकी मां।

Tuesday, September 26, 2017

रोज़ाना : संजय दत्‍त की प्रभावहीन वापसी



रोज़ाना
संजय दत्‍त की प्रभावहीन वापसी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में यह पुराना चलन है। कोई भी लोकप्रिय स्‍टार किसी वजह से कुछ सालों के लिए सक्रिय न रहे तो उसकी वापसी का इंतजार होने लगता है। अभिनेत्रियों के मामले में उनकी शादी के बाद की फिल्‍म का इंतजार रहता है। मामला करीना कपूर का हो तो उनके प्रसव की बाद की फिल्‍म से वापसी की चर्चा चल रही है। सभी को उनकी वीरे दी वेडिंग का इंतजार है। इस इंतजार में फिल्‍म से जुड़ी सोनम कपूर गौण हो गई हैं। हिंदी फिल्‍मों में अभिनेताओं की उम्र लंबी होती है। उनके करिअर में एक अंतराल आता है,जब वे अपने करिअर की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद हीरो के तौर पर नापसंद किए जाने लगते हैं तो उनकी वापसी  वे किरदार बदल कर लौटते हैं। अमिताभ बच्‍चन के साथ ऐसा हो चुका है। एक समय था जब बतौर हीरो दर्शक्‍उन्‍हें स्‍वीकार नहीं कर पा रहे थे। लेखक और निर्देशक उनके लिए उपयुक्‍त फिल्‍म लिख और सोच नहीं पा रहे थे। उस संक्रांति दौर से निकलने के बाद आज अमिताभ बच्‍चन के लिए खास स्‍पेस बन चुका है। उनके लिए अलग से फिल्‍में लिखी जा रही है। ऐसा सौभाग्‍य और सुअवसर सभी अभिनेताओं को नहीं मिल पाता।

संजय दत्‍त के जेल से लौटने के बाद निर्माता-निर्देशकों में होड़ लगी थी कि कौन उन्‍हें सबसे पहले साइन करता है। सभी उनकी वापसी को भुनाने में आगे निकल जाना चाहते थे। इस होड़ में संदीप सिंह ने बाजी मारी। उन्‍होंने ओमंग कुमार के साथ संजय दत्‍त की भूमि की घोषणा कर दी। घोषणा के बाद से भूमि से संबंधित हर मीडिया कवरेज में इसी बात पर जोर दिया गया कि यह उनकी वापसी की फिल्‍म है। खुद संजय दत्‍त भी इस भ्रम के शिकार हुए कि उनकी वापसी की फिल्‍म में दर्शकों की गहरी रुचि है। उन्‍होंने वासी की फिल्‍म के लिए भूमि के चुनाव के समर्थन में बड़ी-बड़ी बातें कीं।  यों लग रहा था कि बहुत ही धमाकेदार वापसी होने जा र‍ही है।फिल्‍म आई तो भूमि ने सभी को निराश किया। संजय दत्‍त्‍के प्रशंसक भी नाखुश दिखे। उन्‍हें लगा कि निर्देशक ने उनके प्रिय अभिनेता के साथ न्‍याय नहीं किया। गौर करें तो संजय दत्‍त से ही चूक हुई। उन्‍होंने सही ढंग की फिल्‍म नहीं चुनी। इस फिल्‍म में तमाम प्रयासों के बावजूद वे प्रभावहीन दिखे। फिल्‍म की मेकिंग और संजय दत्‍त् के किरदार के साथ निर्देशक का ट्रीटमेंट दर्श्‍कों को पसंद नहीं आया।इसी विषय पर आई हिंदी फिल्‍मों में भूमि सबसे कमजोर फिल्‍म साबित हुई। सच को क्रूर अंदाज में दिखाने पर भी दर्शक बिदक जाते हैं। भूमि के साथ तो और भी दिक्‍क्‍तें रहीं।

Wednesday, September 20, 2017

रोज़ाना : जितनी बची है,बचा लो विरासत



रोज़ाना
जितनी बची है,बचा लो विरासत
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले दिनों राज कपूर निर्मित आरके स्‍टूडियो में भीषण आग लगी। अभी तक कोई ठोस और आधिकारिक विवरण नहीं आया है कि इस आग में क्‍या-क्‍या स्‍वाहा हो गया? स्‍वयं ऋषि कपूर ने जो ट्वीट किया,उससे यही लगता है कि राज कपूर की फिल्‍मों से जुड़ी यादें आग की चपेट में आ गईं। उन्‍होंने ट्वीट किया था कि स्‍टूडियो तो फिर से बन जाएगा,लेकिन आरके फिल्‍म्‍स की फिल्‍मों से जुड़ी स्‍मृतियों और कॉस्‍ट्यूम की क्षति पूरी नहीं की जा सकती। ऋषि कपूर बिल्‍कुल ने सही लिखा। कमी यही है कि कपूर परिवार के वारिसों ने स्‍मृतियों के रख-रखाव का पुख्‍ता इंतजाम नहीं किया था। एक कमरे में सारे कॉस्‍ट्यूम आलमारियों में यों ठूंस कर रखे गए थे,ज्‍यों किसभ्‍ कस्‍बे के ड्राय क्लिनर्स की दुकान हो। हैंगर पर लदे हैंगर और उनसे लटकते कॉस्‍ट्यूम। पूछने पर तब के ज्म्म्ेिदार व्‍यक्ति ने कहा था कि कहां रखें? जगह भी तो होनी चाहिए।
हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री अपनी विरासत के प्रति शुरू से लापरवाह रही है। निर्माता और अभिनेता भी अपनी फिल्‍मों के दस्‍तावेज सहेजने में रुचि नहीं रखते। फिल्‍म निर्माता सक्रिय हो या निष्क्रिय...उनके प्रोडक्‍शन हाउस में कोई ऐसा विभाग और जिम्‍मेदार व्‍यक्ति नहीं होता जो अपनी ही फिल्‍में और उनसे संबंधित सामग्रियां को संभाल कर रखे। अधिकांश निर्माताओं को यह भी पता नहीं है कि देश में राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार(एनएफएआई) जैसी एक सरकारी संस्‍था है,जो फिल्‍म दस्‍तावेजों के संरक्षण और रख-रखाव का कार्य करती है। अब तो कुछ निजी संग्रहकर्ता भी आ गए हैं। ऐसे व्‍यक्ति और संगठन फिल्‍मी सामग्रियों की खरीद-बिक्री नहीं करतीं। उनका संरक्षण करती हैं।
आरके स्‍टूडियो में लगी आग को खतरे की घंटी के रूप में लेना चाहिए। राष्‍ट्रीय फिल्‍म अभिलेखागार के अधिकारी और संबंधित मंत्रालय इस संबंध में अभियान चलाए। सभी को बताने-समणने की जरूरत है कि फिल्‍मी सामग्रिया और यादें हमारी बहुमूल्‍य थाती हैं,जिन पर केवल उस प्रोडक्‍शन हाउस या परिवार का अधिकार नहीं है। उन्‍हें सामूहिक विरासत और राष्‍ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलना चाहिए। अभी सब कुछ नष्‍ट नहीं हुआ है। अभी कुछ पुराने स्‍टूडियो हैं और कुछ पुराने प्रोडक्‍शन हाउस के जर्जर दफ्तर...हमें वहां बची विरासत को बचाने के प्रयास में लग जाना चाहिए। हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में सक्रिय व्‍यक्तियों के बीच जागरूकता लाने की भी जरूरत है। वे सचेत रहेंगे तो किसी दुर्घटना और आपदा की स्थिति में भी बहुमूल्‍य सामग्रियों का संरक्षण किया जा सकेगा।
फिलहाल आरके स्‍टूडियो में लगी आग में नष्‍ट हुई साग्रियों का ब्‍योरा आए तो नुकसान की वास्‍तविकता पता चले। फिल्‍म इंडस्‍ट्री को लगे जागें और विरासत के प्रति लापरवाही खत्‍म करें।  

Thursday, September 14, 2017

रोज़ाना - एक दूसरे के पूरक,फिर भी मायानगरी में 'पांच' हो गया 'पान्‍च'

रोजाना

पांच हो गया पान्‍च

- अजय ब्रह्मात्मज

हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी सिनेमा में हिंदी की बात करना उचित है। देश में कहीं न कहीं दस पर परिचर्चा या बहस चल रही होगी। हिंदी सिनेमा में हिंदी के उपयोग,प्रयोग और दुरुपयोग पर लोगों की राय भिन्न हो सकती है,लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी की बड़ी भूमिका रही है। कभी इसे हिंदुस्‍तानी कहा गया,कभी उर्दू मिश्रित हिंदी तो कभी कुछ और। इसके साथ यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों का उल्लेखनीय योगदान है। देश के अंदर और विदेशों में हिंदी फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने बोलचाल की व्‍यावहारिक हिंदी सीखी है। हालांकि कोई भी हिंदी फिल्म यह सोचकर नहीं नहीं बनाई गई कि उससे हिंदी भाषा का प्रचार किया जाएगा, फिर भी ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां अहिंदीभाषी दर्शकों ने हिंदी फिल्मों से अपनी हिंदी परिमार्जित की। विदेशी विश्वविद्यालयों में नई पीढ़ी के शिक्षक विद्यार्थियों को हिंदी सिखाने के लिए हिंदी फिल्मों का टूल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कहते हैं इससे विद्यार्थी तेजी से हिंदी सीखते हैं।

इधर हिंदी फिल्‍मों में हिदी का यह सहज रूप भ्रष्‍ट हो रहा है। संवाद के तौर पर बोली जा रही हिंदी मुख्‍य रूप से रोमन में लिखी जा रही है। इससे नई पीढ़ी के अंग्रेजीदां निर्देशकों और कलाकारों को सुविधा तो हो जाती है,लेकिन हिंदी बोलने के लहजे और उच्‍चारण में खोट बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों मशहूर लेखक अतुल तिवारी ने मजेदार किस्‍सा सुनाया। स्‍टार टीवी के अधिकारियों ने उन्‍हें कहा कि आप रोमन में ही हिंदी लिख कर दें। उन्‍होंने पूछा कि मैं स्‍टार का स्‍त्‍र बढ़ गया है कैसे लिखूं। स्‍टार और स्‍तर दोनों को रोमन में लिखने के लिए एसटीएआर लिखना पड़ेगा। नए कलाकार जब आनुनासिक शब्‍दों का उच्‍चारण करते हैं तो वे बिंदी के लिए रोमन में प्रयुक्‍त एन का अलग से उच्‍चारण करते हैं। वे पांच को पान्‍च और आंखें को आन्‍खेंन् बोलते सुनाई पड़ते हैं। ,,,, और से बने शब्‍दों के उच्‍चारण में उन्‍हें दिक्‍कत होती है। बचपन से या बाद में भी हिंदी का नियमित अभ्‍यास नहीं होने की वजह से उन्‍हें अपना गलत उच्‍चारण भी गलत नहीं लगता। चूंकि निर्देशक खुद हिंदी में दक्ष नहीं होता,इसलिए वह आपत्ति भी नहीं करता। कहा और दावा किया जाता है कि डॉयलॉग इंस्‍ट्रक्‍टर भाषा सिखाने के लिए रहते हैं,लेकिन उनका योगदान सिर्फ पर्दे पर नाम के रूप में लक्षित होता है। वास्‍तव में भाषा वैसी ही भ्रष्‍ट रहती है।  

आजकल हिंदी फिल्‍मों के नाम तक हिंदी में नहीं लिखे जा रहे हैं। पर्दे पर सिर्फ अंग्रेजी में फिल्‍म का नाम आता है। पोस्‍टर और फर्स्‍ट लुक में हिंदी फिल्‍मों के नाम बेशर्मी के साथ अंग्रेजी में छापे जाते हैं। दर्शक भी मांग नहीं करते कि उन्‍हें हिंदी में पोस्‍टर मिलें। ताजा फैशन अंग्रेजी-हिंदी मिक्‍स टाइटल हैं,जैसे मुक्‍काBaaz


Thursday, September 7, 2017

रोज़ाना : दर्शकों के दो छोर



रोज़ाना
दर्शकों के दो छोर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिछले हफ्ते रिलीज हुई शुभ मंगल सावधान और बादशाहो के कलेक्‍शन पवर गौर करने के साथ देश के दर्शकों के दो छोरों को भी समझने की जरूरत है। पहली फिल्‍म बिल्‍कुल नए विषय पर है। हिंदी फिल्‍मों में ऐसे विषय वर्जित माने जाते हैं। पुरुषों के जेंट्स प्राब्‍लम पर आनंद एल राय और आर एस प्रसन्‍ना ने खूबसूरत और प्रेरक फिल्‍म बनाई। उम्‍मीद के बावजूद निर्माता-निर्देशक आश्‍वस्‍त नहीं थे कि उनकी फिल्‍में दर्शकों के बीच स्‍वीकृत होगी। फिल्‍म चली। सीमित बजट की सीमाओं में अच्‍छी चली। खुद निर्माता-निर्देशक हैरान हैं कि उन्‍होंने ऐसे प्रतिसाद के बारे में नहीं सोचा था। उन्‍हें और दूसरे निर्माताओं को हिम्‍मत मिली है कि वे आगे अपने साहस का विस्‍तार करें।
दूसरी तरफ बादशाहो है। आठनें दशक की थीम पर लगभग उसी समय की शैली में बनी इस फिल्‍म के प्रति निर्देशक और कलाकार निश्चित थे। उन्‍हें पूरा यकीन था कि बादशाहो दर्शकों को अच्‍छी लगेगी। समीक्षकों की भिन्‍न राय थी। इस फिल्‍म में हिंदी फिल्‍मों के घिसे-पिटे फामूले का इस्‍तेमाल किया गया था। नए दौर की फिल्‍मों में दृश्‍यों में तार्किकता रखी जाती है। उनमें कार्य-कारण संबंध का खयाल रखा जाता है। बादशाहो में निर्देशक ने परवाह नहीं की। अजय देवगन जैसे नई चेतना के अनुभवी अभिनेता भी दर्शकों के साथ गए। उन्‍होंने पूरे भरोसे के साथ निर्देशक का साथ दिया। नतीजा सभी के सामने है। बादशाहो उल्‍लेखनीय व्‍यवसाय कर रही है। उसे क्लिन हिट माना जा रहा है।
मिजाज और प्रस्तुति में दोनों फिल्‍में मिजाज और प्रस्‍तुति में भिन्‍न हैं। सामान्‍य भाषा में कहें तो पहली मल्‍टीप्‍लेक्‍स की फिल्‍म है और दूसरी सिंगल स्‍क्रीन की फिल्‍म है। कायदे से दोनों फिल्‍मों को उनके हिसाब से ही दर्शक मिलने चाहिए थे,लेकिन व्‍यवसाय के ट्रेंड का अध्ययन  करने वाले पंडितों के मुताबिक दोनों को मिश्रित दर्शक मिले हैं। शहरी दर्शकों ने भी बादशाहो पसंद की और छोटे शहरों के दर्शकों ने शुभ मंगल सावाधान को हाथोंहाथ लिया। वास्‍तव में भारतीय समाज में दर्शकों का स्‍पष्‍ट विभाजन नहीं किया जा सकता। किसी प्रकार के ट्रेड की भविष्‍यवाणी करना संभव नहीं है। दर्श्‍क्‍पिछले हफ्ते की तरह हमेशा ट्रेड पंडितों का चौंकाते रहे हैं। याद करे तो विकी डोनर और हेट स्‍टोरी भी एक ही तारीख को रिलीज हुई थीं और उन दोनों को भी दर्शकों ने पसंद किया था। कई बार निर्माता-निर्देशक रिलीज के समय अपनी फिल्‍मों को लेकर आशंकित रहते हैं। दर्शकों के बीच असमंजस नहीं रहता। ठीक चुनावों की तरह वे स्‍पष्‍ट रहते हैं कि इस बार उन्‍हें फलां फिल्‍म देखनी है या नहीं देखनी है? ट्रेड पंडितों के अनुमान को वे झुठला देते हैं।   

Friday, September 1, 2017

रोज़ाना : मुनाफे का परसेप्‍शन



रोज़ाना
मुनाफे का परसेप्‍शन
-अजय ब्रह्मात्‍मज
बाहुबली या दंगल के निर्माताओं ने तो कभी प्रेस विज्ञप्ति भेजी और न रिलीज के दिन से ढिंढोरा पीटना शुरु किया कि उनकी फिल्‍म मुनाफे में है। गौर करें तो देखेंगे कि लचर और कमजोर फिलमों के लिए निर्माता ऐसी कोशिशें करते हैं। वे रिलीज के पहले से बताने लगते हैं कि हमारी फिल्‍म फायदे में आ चुकी है। फिल्‍म के टेड सर्किल में यह सभी जानते हैं कि जैसे ही किसी निर्माता का ऐसा एसएमएस आता है,वह इस बात की गारंटी होता है कि स्‍वयं निर्माता को भी उम्‍मीद नहीं है। वे आश्‍वस्‍त हो जाते हैं कि फिल्‍म नहीं चलेगी। फेस सेविंग और अपनी धाक बनाए रखने के लिए वे फिल्‍म की लागत और उसके प्रचार और विज्ञापन में हुए खर्च को जोड़ कर एक आंकड़ा देते हैं और फिर बताते हैं कि इस-अस मद(सैटेलाइट,संगीत,ओवरसीज आदि) से इतने पैसे आ गए हैं। अब अगर पांच-दस करोड़ का भी कलेक्‍शन बाक्‍स आफिस से आ गया तो फिल्‍म फायदे में आ जाएगी।
मजेदार तथ्‍य यह है कि ऐसी फिल्‍मों के कलेक्‍शन और कमाई की सचचाई जानने के बावजूद मीडिया और खुद फिल्‍म सर्किल के लोग इस झूठ को स्‍वीकार कर लेते हें। जिसकी फिल्‍म होती है। व‍ि चिल्‍लता है। बाकी मुस्‍कराते हैं। अगली फिल्‍म के समय मुस्‍कराने वाला चिल्‍लाने लगता है और चिल्‍लाने वाला मुस्‍कराने लगता है। सभी फरेब रचते हैं। उस पर यकीन करते हें। फिल्‍मों के कारोबार का यह पहलू रोचक होने के साथ ही दुखद है।
सोशल मीडिया के इस दौर में ट्रेड मैग्‍जीन में कारोबार के आंकड़ों के आने के पहले से माहौल बनाया जाता है। मीडिया के लोगों से सिफारिश की जाती है कि वे निर्माता के दिए गए कलेक्‍शन और कैलकुलेशन ही बताएं और छापें। ताज्‍जुब यह है कि उन आंकड़ों के झूठ को जानते हुए भी वेब साइट और अखबारों में गलत आंकड़े छपते हैं। इन दिनों तो फिल्‍म के स्‍टार की भी मदद ली जा रही है। उन पर दबाव डाला जाता है कि वे इस झूठ को प्रचारित करें। सोशल मीडिया पर उनके प्रशेसंक और भक्‍त भी खुश हो जाते हैं कि उनका स्‍टार पॉपुलर है। उसकी फिल्‍में चल रही हैं।
देखें तो सारा खेल परसेप्‍शन का है। हिंट का परसेप्‍शन बन जाना चाहिए। हंसी तो तब आती है जब स्‍पष्‍ट रूप से नहीं चल रही फिल्‍म के निर्माता और स्‍टार बताते और शेयर करते हें कि फलां राज्‍य के फलां शहर के फलां सिनेमाघर में 6 बजे का शो हाउसफुल रहा। हर कामयाब फिल्‍म का कलेक्‍शन शुक्रवार से रविवार के बीच उत्‍तरोत्‍तर बढ़ता है। कुछ फिल्‍में अपवाद होती हैं जो सोमवार के बाद जोर पकड़ती है। ज्‍यादातर तो सोमवार तक में ही थे जाती हैं।   

Thursday, August 31, 2017

रोज़ाना : बेलौस और बेलाग सलीम खान



रोज़ाना
बेलौस और बेलाग सलीम खान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
सलमान खान जिन बातों के लिए बदनाम हैं,उनमें से एक आदत उनके पिता सलीम खान में भी है। सलमान ने अपने पिता से ही यह सीखा होगा। बस पिता की तरह वे उसे अपना हुनर नहीं बना पाए। सलीम खान हर मुद्ददे पर बेलाग दोटूक बालते हैं। उनके बयानों और बातों में कोई डर नहीं रहता। विवादास्‍पद मुद्दों पर भी अपनी राय रखने से वे नहीं हिचकते। मेरा व्‍यक्तिगत अनुभव है कि उनके जवाब विस्‍तृत होते हैं,जिसमें सवाल के हर पहलुओं के साथ उन संभावित सवालों के भी जवाब होते हैं जो बाद में पूछ जा सकते हैं। आज के मीडियाकर्मियों के लिए उनके जवाबों में से प्रासंगिक पक्तियां छांट पाना मुश्किल काम होता है। एक बार मैंने उनका नंबर मांगा और पूछा कि कब फोन करना ठीक होगा। और क्‍या वे फोन उठाते या बुलाने पर आ जाते हैं। उनका जवाब था,मैं तो रौंग नंबर पर आधे घंटे बातें करता हूं। आप फोन करना। खाली रहा तो उठा लूंगा।
यह दीगर सच्‍चाई है कि वे मीडिया से बातें करना अधिक पसंद नहीं करते। बेटे सलमान खान की फिल्‍म रिलीज हो या वे किसी विवाद में उलझे हों तो स्‍पष्‍टीकरण देने आ जाते हैं। करीबी बताते हैं कि उनके बेटे आज भी उनसे बहुत घबराते हैं। अपनी फिल्‍में उन्‍हें दिखाने में हिचकते हैं,क्‍योंकि वे फिल्‍म की कमियां बता देते हैं। सलमान खान की पिछली फिल्‍म ट्यूबलाइट के नहीं चलने का उन्‍हें अंदेशा था। उनकी राय में सलमान खान की प्रचलित इमेज से अलग किरदार होने की वजह से उनके प्रशंसक बिदक गए। उन्‍हें अपना सल्‍लू भाई नहीं दिखा। पिछले दिनों एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि फिल्‍म अच्‍छी थी,लेकिन सलमान खान के उपयुक्‍त नहीं थी। अगर इसमें कोई और स्‍टार होता तो फिल्‍म चल जाती। सलमान खान की फिल्‍म में एक्‍शन और लव नहीं हो और वह लाचार एवं पिटा दिखे तो उसके प्रशंसक कैसे बर्दाश्‍त करेंगे?
इसी इंटरव्‍यू में उन्‍होंने अक्षय की खुली तारीफ की है। उनकी राय में केवल अक्षय कुमार ने समय के साथ खुद को अच्‍छी तरह बदला है। वे परिष्‍कृत हुए हैं। उनकी राय में अजय देवगन,आमिर खान और सलमान खान में भी परिष्‍कार आया है,लेकिन अक्षय कुमार का सफर तो अकल्‍पनीय है। आज वे ऐसे अभिनेता के तौर पर उभरे हैं,जो किसी भी विषय की फिल्‍म कर सकते हैं।
इन दिनों कौन अपने बेटों को छोड़ किसी और की तारीफ करता है? यह सलीम खान की ही सलाहियत है जो वे अक्षय कुमार की उपलब्धियों पर गौर करते हैं।

Wednesday, August 30, 2017

रोज़ाना : बारिश के बहाने गाए तराने



रोज़ाना
बारिश के बहाने गाए तराने
-अजय ब्रह्मात्‍मज
हर मानसून में दो-तीन बार ऐसा होता है कि बारिश की बूंदें समुद्र की लहरों के साथ मिल कर मुंबई शहर के पोर-पोर  को आगोश में लेने के लिए बेताब थीं। दो दिनों चल रही बूंदाबांदी ने मूसलाधार रूप लिया और शहर के यातायात को अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया। देापहर होने तक पुलिस महकमे से चेतावनी जारी हो गई। संदेश दिया गया कि बहुत जरूरी न हो तो घर से नहीं निकलें। सुबह दफ्तरों को निकल चुके मुंबईकरों के लिए घर लौटना मुश्किल काम रहा। सोशल मीडिया पर अनेक संदेश आने लगे। सभी बारिश में फंसे अपने दोस्‍तों को घर बुलाने लगे। गणेश पूजा के पंडालों ने मुंबईकरों के लिए चाय-पानी और भोजन की खास व्‍यवस्‍था की। यही इस शहर का मिजाज है। बगैर आह्वान के ही सभी नागरिक अपने तई तत्‍पर रहते हैं मदद के लिए।
हिंदी फिल्‍मों में बारिश की ऐसी आपदा नहीं दिखती। फिल्‍मों में बारिश रोमांस अज्ञेर प्रेम का पर्याय है। शुरू से ही बादलों के गरजने और बिजली के चमकने के साथ अकस्‍मात बारिश होने लगती है। हीरो-हीरोइन बारिश का आनंद उठाने के साथ रोमांटिक खयालों में खो जाते हैं। उनके सोए और अनकहे जज्‍बात बारिश के बहाने तराने के रूप में गूंजने लगते हैं। पहले हीरो-हीरोइन की नजदीकियां बढ़ाने और दिखाने के लिए बारिश के दृश्‍य रखने का चलन आम था। ऐसे दृश्‍यों में दोनों की गीली चाहत बरसात में भीग कर भड़कने लगती है। हीरोइन पहले साड़ी और अब किसी भी लिबास में तरबतर होकर हीरो के साथ-साथ पुरुष दर्शकों लुभाती है। समर्थ और अनुभवी फिल्‍मकारों ने इसे सौंदर्य से परिपूर्ण रखा तो चालू फिल्‍मकारों ने कल्‍पना के अभाव में देह प्रदर्शन से दर्शकों को उत्‍तेजित किया। अप्रोच जो भी रहा,निशाने पर फिल्‍म की हीरोइनें रहीं। उन्‍हें मादक अंदाज में पेश कर दर्शकों की दबी और कुंठित भावनाओं को सुलगाया गया। यह अचानक नहीं हुआ है कि अब हिंदी फिल्‍मों में बारिश के दृश्‍य और गाने नहीं के बराबर हो गए हैं। फिल्‍मों में रोमांस का नजरिया और रवैया बदल चुका है।
हिंदी फिल्‍मों में बरसात के गानों पर रिसर्च होना चाहिए। ज्‍यादातर गानों में रोमांस के साथ हीरो-हीरोइन की कामुक इच्‍छाओं को शब्‍द दिया गया है। यों लगता है कि बरसों की दबी ख्‍वाहिश पूरा करने का वक्‍त आ गया है। रिमझिम गिरे सावन,सुलग सुलग जाए मन,बरखा रानी जरा जम के बरसो,भीगी भीगी रुत में तुम हम हम तुम,भीगी भीगी रातों में ऐसी बरसातों में,गी आज सावन की ऐसी झड़ी है जैसे अनेक गीतों के उदाहरण लिए जा सकते हैं। कुछ फिल्‍मों में जरूर बारिश का रिश्‍ता खेती और खुशहाली से जोड़ा गया,लेकिन ऐसी फिल्‍में और दृश्‍य बेहद कम हैं।
  

Tuesday, August 29, 2017

रोज़ाना : नू का न्‍यू तन का टन



रोज़ाना
नू का न्‍यू तन का टन
-अजय ब्रह्मात्मज
माता-पिता ने नाम रखा था नूतन। स्‍कूल में सहपाठी मजाक उड़ाते थे,इसलिए नूतन ने अपने नाम में नू का न्‍यू और तन का टन कर लिया...इस तरह वह नतन से न्‍यूटन हो गया। अमित मासुरकर की फिल्‍म न्‍यूटन में राजकुमार राव शीर्षक भूमिका निभा रहे हैं। उनके साथ रघुवीर यादव,संजय मिश्र,पंकज त्रिपाठी और अंजलि पाटिल मुख्‍य भूमिकाओं में हैं। राजकुमार राव ने हाल ही में रिलीज हुई बरेली की बर्फी में प्रीतम विद्रोही के रोल में दर्शकों का दिल जीता है। हर किरदार के रंग में ढल कर अलग अंदाज में पेश आ रहे राजकुमार राव इस फिल्‍म में एक नए रंग में दिखेंगे। 
 
हिंदी में ऐसी फिल्‍में कम बनती हैं,जो समसामयिक और राजनीतिक होने के साथ मनोरंजक भी हों। न्‍यूटन अमित मासुरकर का साहसी प्रयास है,जिसे आनंद एल राय का जोरदार समर्थन मिल गया है। इस फिल्‍म से जुड़ने के संतोष के बारे में आनंद एल राय कहते हैं,यह फिल्‍म मेरी जरूरत है। इस फिल्‍म से मुझे मौका मिल रहा है कि मैं समाज को कुछ रिटर्न कर सकूं। मेरे लिए ऐसी फिल्‍में लाभ-हानि से परे हैं। इसके पहले निल बटे सन्‍नाटा से जुड़ने पर ऐसा ही संतोष हुआ था। मुझे लगता है कि न्‍यूटन जैसी फिल्‍मों से जुड़ने पर मेरी रीढ़ सीधी हो जाती है। एक ताकत मिलती है। मेरा मुख्‍य काम और फिल्‍में दुनियादारी के प्रभाव में है। उससे निकलने और स्‍वार्थहीन तरीके से कुछ कर पाने का एहसास और मौका देती हैं ऐसी फिल्‍में।

न्‍यूटन को बर्लिन फिल्‍म फेस्टिवल में पुरस्‍कार मिला था। उसके बाद यह फिल्‍म चालीस फेस्टिवल में जा चु‍की है। हर फेस्टिवल से सराहना बटोरने के बाद अब यह देश के सिनेमाघरों में पहुंच रही है। अमित मासुरकर ने इसे रियलिस्‍ट तरीके से शूट किया है। हिंदी फिल्‍मों के ढांचे में रहते हुए यह फिल्‍म वास्‍तविकता का एहसास देगी। अमित मासुरकर के लिए यह फिल्‍म लोकतंत्र के सिद्धांत और व्‍यवहार में प्रचलित फर्क को नायक न्‍यूटन के नजरिए से दर्शाती है। हर बार चुनाव के दिन मतदान केंद्र पर होने वाली घटनाओं की खबरें बताती रहती हैं कि मतदान के दिन लोकतंत्र के कई रूप नजर आते हैं। लोकतंत्र के एक रूप को न्‍यूटन में हम देखेंगे। फिल्‍म का नायक न्‍यूटन एक ईमानदार और कर्तव्‍यनिष्‍ठ युवक है। वह अपने जीवन और कार्य में आदर्श व्‍यवहार करता है। सरकारी दफ्तर में क्‍लर्क की नौकरी कर रहे न्‍सूटन की इलेक्‍शन ड्यूटी लग जाती है। इस ड्यूटी का तत्‍परता से निभाने में वह भारतीय लाकतंत्र और राजनीति के सूक्ष्‍म पहलुओं से परिचित होता है।