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Sunday, August 20, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बरेली की बर्फी



फिल्‍म समीक्षा
बदली है रिश्‍तों की मिठास
बरेली की बर्फी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
शहर बरेली,मोहल्‍ला- एकता नगर, मिश्रा सदन,पिता नरोत्‍तम मिश्रा,माता- सुशीला मिश्रा।
नरोत्‍तम मिश्रा का बेटा और सुशीला मिश्रा की बेटी बिट्टी मिश्रा। पिता ने बेटे की तरह पाला और माता ने बेटी की सीमाओं में रखना चाहा। बिट्टी खुले मिजाज की बरेली की लड़की है। अपने शहर में मिसफिट है। यही वजह है कि उसे लड़के रिजेक्‍ट कर के चले जाते हैं। मसलनृएक लड़के ने पूछ लिया कि आप वर्जिन हैं ना? तो उसने पलट कर उनसे यही सवाल कर दिया। लड़का बिदक गया। दो बार सगाई टूट चुकी है। माता-पिता की नजरों और परेशानी से बचने का उसे आसान रास्‍ता दिखता है कि वह घर छोड़ दे। भागती है,लेकिन ट्रेन के इंतजार में करेली की बर्फी उपन्‍यास पढ़ते हुए लगता कि उपन्‍यास की नायिका बबली तो हूबहू वही है। आखिर उपन्‍यासकार प्रीतम विद्रोही उसके बारे में कैसे इतना जानते हैं? वह प्रीतम विद्रोही से मिलने की गरज से घर लौट आती है।
बरेली की बर्फी उपन्‍यास का भी एक किससा है। उसके बारे में बताना उचित नहीं होगा। संक्षेप में चिराग पांडे(आयुष्‍मान खुराना) ने अपनी प्रमिका की याद में वह उपन्‍यास लिख है। पहचान और पकड़े जाने के डर से किताब पर उन्‍होंने अपने दब्‍बू दोस्‍त प्रीतम विद्रोही का नाम छाप दिया...तस्‍वीर भी। बेचारे प्रीतम की ऐसी धुनाई हुई कि उन्‍हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। उधर बिट्टी प्रीतम को खोजते-खोजत चिराग से टकरा गई। दिलजले आशिक का दिल बिट्टी पर आ गया,लेकिन बिट्टी तो प्रीतम प्‍यारे की तलाश में थी।
बरेली जैसे शहर के ये किरदार भारत के किसी और शहर में कमोबेश इसी रंग में मिल सकते हैं। फिल्‍म के लेखक नितेश तिवारी ने किरदारों को सही सीन और प्रसंग दिए हैं। उन्‍हें विश्‍वसनीय बनाया है और उन्‍हें उपयुक्‍त संवाद दिए हैं। चरित्रों को गढ़ने में वे पारंगत हैं। उन्‍होंने किरदारों की छोटी-छोटी हरकतों और बातों से इसे सिद्ध किया है। नितेश मिवारी की स्क्रिप्‍ट का समुचित फिल्‍मांकन किया है अश्विनी अरूयर तिवारी ने। और उन्‍हें कलाकारों का भरपूर सहयोग मिला है। परिचित कलाकारों के साथ कुछ अनजान कलाकार भी दिखे हैं। अनजान कलाकार प्रतिभाशाली हो और किरदार के अनुरूप उनकी कास्टिंग हुई हो तो फिल्‍म निखर जाती है। चिराग पांडे के दोस्‍त और प्रीतम विद्रोही की मां सबूत हैं। दोनों कलाकार जंचे हैं। वे याद रह जाते हैं।
इस फिल्‍म की खूबसूरती इसका परिवेश है। वह खूबसूरती गाड़ी हो जाती अगर किसी भी रेफरेंस से फिल्‍म के समय की जानकारी मिल जाती। मुमकिन है नितेश तिवारी ऐसे रेफरेंस से बचे हों। बहरहाल,फिल्‍म के संवाद देशज और कस्‍बाई हैं। किरदारों की चिंताएं,मुश्किलें और उम्‍मीदें देसी दर्शकों की परिचत हैं। बिट्टी जैसी लड़कियां छोटे शहरों में बड़ी तादाद में उभरी हैं। शहर और मध्‍यवर्ग की मर्यादाओं को तोड़ती ये लड़कियां महानगरीय दर्शकों को चिचित्र लग सकती हैं। उनके व्‍यवहार और रिश्‍तों की जटिलताओं के साथ उनकी आकांक्षाओं को हमें शहर के परिवेश के दायरे में ही देखना होगा। नितेश तिवारी और अश्विनी अरूयर तिवारी ने कुछ छूटें ली हैं। उन्‍हें किरदारों को मजबूत बनाने के लिए ऐसा करना पड़ है।
पंकज त्रिपाठी और सीमा पाहवा फिल्‍म के आधार किरदार हैं। दोनों ने बिट्टी को वर्तमान व्‍यक्तित्‍व दिया है। उनसे मिली आजादी और हद में ही बिट्टी खिली है। छोटे शहर के बाप-बेटी के बीच का ऐसा रिश्‍ता हिंदी फिल्‍मों में नहीं दिखा है। कृति सैनन ने बिट्टी के जज्‍बात को आत्‍मसात किया है। अभिनय के स्‍तर पर निर्देशक और कोएक्‍टर के सान्निध्‍य में उन्‍होंने कुछ नया किया है। अगर उनके लुक पर थोड़ा काम किया जाता तो और बेहतर होता। आयुष्‍मान खुराना अपने किरदार में हैं। चिराग पांडे को उन्‍होंने उसके संकोच,सोच और दुविधाओं के साथ पर्दे पर उतारा है। वहीं राजकुमार राव दब्‍बू प्रीतम विद्रोही की भूमिका में सही लगे हैं। उन्‍हें इस फिल्‍म में रंग बदलने के मौके मिले हैं। उन्‍होंने हर रंग की छटा बिखेरी है।
अवधि-122 मिनट
साढ़े तीन स्‍टार ***1/2

Friday, June 9, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बहन होगी तेरी



फिल्‍म रिव्‍यू
उम्‍मीद से कम
बहन होगी तेरी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
अजय पन्‍नालाल की बहन होगी तेरी लखनऊ के एक मोहल्‍ले की कहानी है। एक ही गली में रह रहे गट्टू और बिन्‍नी की इस प्रेमकहानी में अनेक पेंच हैं। गट्टू और उस जैसे युवक मोहेल्‍ले की सभी लड़कियां बहन होती हैं के दर्शन में यकीन नहीं रखते। राखी के दिन वे भागते फिरते हैं कि कहीं कोई लड़की राखी न बांध दे। सभी लड़कों को भाई बना कर लड़कियों की रक्षा की इस दकियानूसी सोच पर बेहद रोचक और मजेदार फिल्‍म की उम्‍मीद बहन होगी तेरी पूरी नहीं कर पाती।
गट्टू मोहल्‍ले के दूसरे लड़कों की तरह ही राखी के दिन बचता फिरता है। दब्‍बू और लूजर गट्टू पड़ोस की बिन्‍नी को पसंद करता है। वह उसी के साथ शादी करना चाहता है। मोहल्‍ले के पुराने रिश्‍ते(भाई-बहन) उसके आड़े आते हैं। उसके अपने परिवार के साथ ही बिन्‍नी का परिवार भी उसे भाई होने और वैसे ही आचरण करने की शिक्षा देते हैं। गट्टू की लगातार कोशिशों के बाद बिन्‍नी उससे प्रेम करने लगती है,लेकिन परिवार के दबाव के आगे उसकी एक नहीं चलती। रिश्‍तेदारी और स्थितियां उलझती चली जाती हैं। लंबी उलझन के बाद गट्टू साहस दिखाता है और पूरे मोहल्‍ले के सामने अपने दिल की बात कह कर बिन्‍नी को भी प्रभावित करता है। एक सामान्‍य युवक विपरीत स्थितियों के बीच अपनी ख्‍वाहिश पूरी करता है।
राजकुमार राव ने गट्टू की भूमिका को ईमानदारी और नएपन के साथ निभाया है। इस साधारण किरदार को विश्‍वसनीय और रोचक बनाने की कोशिश में वे सफल रहते हैं। उन्‍हें दूसरे किरदारों और कलाकारों से बराबर का सहयोग नहीं मिल पाया है। समस्‍या किरदारों की गढ़न और उनके निर्वाह में है। बिन्‍नी खुद अपने बारे में जितने दावे करती है,उसका किरदार उन दावों के विपरीत दबावों के आगे समर्पण करता जाता है। दूसरे,बिन्‍नी और श्रुति हसन में अधिक तालमेल नहीं है। भाष,लहजा और चाल-ढाल में वह बिन्‍नी को व्‍यक्त्त्वि नहीं दे पाती हैं। निश्चित ही यह दोष लेखक और निर्देशक का भी है कि वे गट्टू के समकक्ष बिन्‍नी का नहीं ला पाए। बहन होगी तेरी दो प्रमुख कलाकारों के बेमेल होले के साथ उन्‍के निभाए किरदारों में संगति नहीं होने से बेअसर रह जाती है। हमेशा राजकुमार राव को अतिरिक्‍त कोशिश करनी पड़ती है।
लखनऊ की पृष्‍ठभूमि में पंजाबी,हरियाणवी और पहाड़ी परिवारों को लाना ही अपने आप में फिजूल कवायद लगती है। वे लखनऊ के किरदार ही नहीं लगते। इस फिल्‍म में शहर की मौजूदगी धड़कनों के साथ नहीं है। लखनऊ के लहजे और नफासत का अभाव है। लेखक निर्देशक ने कुछ सोच कर ही ऐसे किरदारों को चुना होगा,लेकिन वे फिल्‍म के कथ्‍य में कुछ जोड़ नहीं पाते हैं। फिल्‍म बिखरी-बिखरी सी लगती है। बहन होगी तेरी में अनेक उम्‍दा कलाकार हैं। वे स्क्रिप्‍ट की सीमाओं में घुट जाते हैं। उनका योगदान नजर नहीं आता।
बहन होगी तेरी कस्‍बों और छोटे शहरों में लड़के-लड़कियों के संबंध और व्‍यवहार पर दिलचस्‍प टिप्‍पणी है,जिसे लेखक-निर्देशक रोचक नहीं बनाए रख सके।
अवधि- 128 मिनट
** दो स्‍टार

Saturday, March 18, 2017

बार- बार नहीं मिलता ऐसा मौका - राजकुमार राव



राजकुमार राव
-अजय ब्रह्मात्‍मज

राजकुमार राव के लिए यह साल अच्‍छा होगा। बर्लिन में उनकी अमित मासुरकर निर्देशित फिल्‍म न्‍यूटन को पुरस्‍कार मिला। अभी ट्रैप्‍ड रिलीज हो रही है। तीन फिल्‍मों बरेली की बर्फी,बहन होगी तेरी और ओमेरटा की शूटिंग पूरी हो चुकी है। जल्‍दी ही इनकी रिलीज की तारीखें घोषित होंगी।
-एक साथ इतनी फिल्‍में आ रही हैं। फिलहाल ट्रैप्‍ड के बारे में बताएं?
0 ट्रैप्‍ड की शूटिंग मैंने 2015 के दिसंबर में खत्‍म कर दी थी। इस फिल्‍म की एडीटिंग जटिल थी। विक्रम ने समय लिया। पिछले साल मुंबई के इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्टिवल मामी में हमलोगों ने फिल्‍म दिखाई थी। तब लोगों को फिल्‍म पसंद आई थी। अब यह रेगुलर रिलीज हो रही है।
-रंगमंच पर तो एक कलाकार के पेश किए नाटकों का चलन है। सिनेमा में ऐसा कम हुआ है,जब एक ही पात्र हो पूरी फिल्‍म में...
0 हां, फिल्‍मों में यह अनोखा प्रयोग है। यह एक पात्र और एक ही लोकेशन की कहानी है। फिल्‍म के 90 प्रतिशत हिस्‍से में मैं अकेला हूं। एक्‍टर के तौर पर मेरे लिए चुनौती थी। ऐसे मौके दुर्लभ हैं। फिलिकली और मेंटली मेरे लिए कष्‍टप्रद था। खाना नहीं खाना,दिन बीतने के साथ दुबला होना,उसी माहौल में रहना...लेकिन मजा आया।
- शूटिंग पैटर्न क्‍या रखा आप सभी ने। इस फिल्‍म में समय के साथ आप को कमजोर और दुर्बल दिखना था...
0 अच्‍छी बात रही कि शूटिंग लीनियर आर्डर में सीक्‍वेंस के हिसाब से ही की। और कोई तरीका भी नहीं था। एक बार फ्लैट में आ जाने के बाद आर्गेनिक प्रोसेस था। हर दिन के हिसाब से ग्राफ बना था। हम उसे ही भरते गए। फिलम में जब खाना खत्‍म हुआ था,तभी से मेरा खाना भी बंद हो गया था। दिन भर में दो-चार घूंट पानी और बहुत कमजोरी होने पर ब्‍लैक कॉफी... खाने के नाम पर मुझे सिर्फ एक-दो गाजर दिए जाते थे। पहली बार पता चला कि खाना न खाओ तो गुस्‍सा आता है। हताशा बढ़ती है। कई बार झटके से खड़े होने पर चक्‍कर भी आए। तकलीफें सहता रहा,क्‍योंकि पता नहीं फिर ऐसा मौका दोबारा कब मिले। मुझे पहले से बता दिया गया था कि यह सब होगा तो मैं पहले से तैयार था।
- ट्रैप्‍ड को आप ने एडवेंचर,चैलेंज या एक्‍सपेरिमेंट के तौर पर लिया?
0 सबसे पहले तो मुझे विक्रम के साथ काम करना था। उड़ान के समय से ही वे मेरे विश लिस्‍ट में थे। उनसे आयडिया सुन कर ही मैं उत्‍साहित हो गया था। स्क्रिप्‍ट सुनने के बाद तो तय हो गया कि इसे नहीं छोड़ना है। यह रोल मेरे लिए चैलेंज ही था। जैसे शाहिद का रोल था या अभी ओमेरटा का रोल है। इस चैलेंज के साथ खुशी भी थी कि विक्रम के साथ काम करने का मौका मिल रहा है।
- आप का जो किरदार मिल रहे हैं,वे साधारण किस्‍म के असाधारण लोग हैं। हिंदी फिल्‍मों के मेनस्‍ट्रीम किरदार नहीं हैं वे,जिन्‍हें कुछ रुटीन काम करने होते हैं। मुश्किल स्थितियों में फंसे हाशिण्‍ के लोग हैं...
0 फिलमों में वे हाशिए के हो सकते हैं,लेकिन रियल लाइफ में तो ऐसे ही साधारण लोगों की संख्‍या ज्‍यादा है। मैं तो उन्‍हें मेनस्‍ट्रीम ही मानता हूं। मैंने सोच कर ऐसे रोल नहीं चुने हैं। मुझे मिलते गए। अच्‍छी बात है कि मुझे मिले किरदारों के फिल्‍मी रेफरेंस नहीं मिलते। उन किरदारों से मैं दर्शकों के दिलों तक पहुंचा हूं। वे मुझे बताते हैं उन्‍होंने मेरे किरदारों में खुद को कैसे देखा?
-अच्‍छा है कि आप को हंसल मेहता और विक्रमादित्‍य मोटवाणी जैसे डायरेक्‍टर चुन रहे हैं। उन्‍के साथ आप की छनती भी है।
0 इनकी वजह से ही हम हैं। वे हमें मौके दे रहे हैं। वे ऐसे किरदारों को ला रहे हैं,जो हिंदी सिनेमा के अनदेखे किरदार हैं। वे फिल्‍में पुश कर रहे हैं। वे किसी फार्मूला के तहत चालू फिल्‍में नहीं बना रहे हैं। अभी हमें अलग नजरों से देखा जाने लगा है। अब न्‍यूटन देख कर वे सभी चौंके थे।
-क्‍या है न्‍यूटन में...
0 वह एक आयडियलिस्टिक लड़के नूतन कुमार की फिल्‍म है,जिसने अपना नाम बदल कर न्‍यूटन कुमार कर लिया है। नूतन किसी लड़की का नाम लगता है। उसे छत्‍तीसगढ़ के नक्‍सल इलाके में वोटिंग के लिए भेजा जाता है। वह खुद चााहता है कि वहां वोटिंग हो,जबकि और किसी का इंटरेस्‍ट नहीं है। इसी में ब्‍लैक कामेडी बनती है।
-आप की बरेली की बर्फी और बहन होगी तेरी यूपी में शूट हुईं। उनके बारे में क्‍या बताएंगे?
0 दोनों ही छोटे शहरों की फिल्‍मों हैं। उनमें मुझे मजेदार और कम तकलीफ वाले किरदार मिले हैं। शूटिंग में मजा आया। मैं भी पहली बार लखनऊ की गलियों में घूमा। इस फिल्‍म के जरिए उधर के किरदारों से मिला। ओमेरटा के बारे में मत पूछिएगा। उसके बारे में कुछ भी नहीं बता सकता। सख्‍त हिदायत है निर्देशक की।

Friday, March 17, 2017

फिल्‍म समीक्षा : ट्रैप्‍ड



फिल्‍म रिव्‍यू
जिजीविषा की रोचक कहानी
ट्रैप्‍ड
-अजयं ब्रह्मात्‍मज
हिंदी फिल्‍मों की एकरूपता और मेनस्‍ट्रीम मसाला फिल्‍मों के मनोरंजन से उकता चुके दर्शकों के लिए विक्रमादित्‍य मोटवाणी की ट्रैप्‍ड राहत है। हिंदी फिल्‍मों की लीक से हट कर बनी इस फिल्‍म में राजकुमार राव जैसे उम्‍दा अभिनेता हैं,जो विक्रमादित्‍य मोटवाणी की कल्‍पना की उड़ान को पंख देते हैं। यह शौर्य की कहानी है,जो परिस्थितिवश मुंबई की ऊंची इमारत के एक फ्लैट में फंस जाता है। लगभग 100 मिनट की इस फिल्‍म में 90 मिनट राजकुमार राव पर्दे पर अकेले हैं और उतने ही मिनट फ्लैट से निकलने की उनकी जद्दोजहद है।
फिल्‍म की शुरूआत में हमें दब्‍बू मिजाज का चशमीस शौर्य मिलता है,जो ढंग से अपने प्‍यार का इजहार भी नहीं कर पाता। झेंपू,चूहे तक से डरनेवाला डरपोक,शाकाहारी(जिसके पास मांसाहारी न होने के पारंपरिक तर्क हैं) यह युवक केवल नाम का शौर्य है। मुश्किल में फंसने पर उसकी जिजीविषा उसे तीक्ष्‍ण,होशियार,तत्‍पर और मांसाहारी बनाती है। ट्रैप्‍ड मनुष्‍य के सरवाइवल इंस्टिंक्‍ट की शानदार कहानी है। 21 वीं सदी के दूसरे दशक में तमाम सुविधाओं और साधनों के बीच एक फ्लैट में बंद व्‍यक्ति किस कदर लाचार और हतप्रभ हो सकता है? ऐसी मुश्किल में फंसे बगैर इसकी कल्‍पना तक नहीं की जा सकती।
ट्रैप्‍ड देखते समय पर्दे पर एक टक और अपलक देखने की जरूरत पड़ेगी। आज के चलन के मुताबिक अगर मोबाइल पर पल भर के लिए भी निगाह अटकी तो मुमकिन है कि तेजी से आगे बढ़ रही फिल्‍म का कोई सीन निकल जाए और फिर यह समझ में न आए कि अभी जो हो रहा है,वह कैसे हो रहा है? राजकुमार राव ने शौर्य की उलझन,मुश्किल,बेचारगी और हिम्‍मत को पूरी शिद्दत से पर्दे पर जीवंत किया है। हम शौर्य के व्‍यक्तित्‍व और सोच में आ रहे रूपातंरण से परिचित होते हैं। शौर्य से हमें हमदर्दी होती है और उसकी विवशता पर हंसी भी आती है। चूहे के साथ चल रहा शौर्य का एकालाप मर्मस्‍पर्शी है। दोनों ट्रैप्‍ड हैं। फिल्‍म में ऐसे अनेक प्रसंग हैं,जहां सिर्फ हाव-भाव और बॉडी लैंग्‍वेज से राजकुमार राव सब कुछ अभिव्‍यक्‍त करते हैं।
विक्रमादित्‍य मोटवाणी अपनी पीढ़ी के अनोखे फिल्‍मकार हैं। उनके मुख्‍य किरदार हमेशा परिस्थितियों में फंसे होते हैं,लेकिन वे निराश या हताश नहीं होते। वे वहां से निकलने और सरवाइव करने की कोशिश में रहते हें। उनकी यह कोशिश फिल्‍म को अलग ढंग से रोचक और मनोरंजक बनाती है। उन्‍होंने ट्रैप्‍ड में मुंबई महानगर में व्‍यक्ति के संभावित कैद की कल्‍पना की है। उन्‍हें राजकुमार राव का भरपूर साथ मिला है। शौर्य के किरदार के लिए आवश्‍यक स्‍फूर्ति,चपलता,गंभीरता,लरज और गरज राजकुमार ले आते हैं। किरदार के क्रमिक शारीरिक और मानसिक रूपांतरण को उन्‍होंने खूबसूरती से जाहिर किया है। यह फिल्‍म अभिनय के छात्रों को दिखाई और पढ़ाई जा सकती है।
फिल्‍म में कैमरे और साउंड का जबरदस्‍त उपयोग हुआ है।
अवधि 102 मिनट
**** चार स्‍टार

Saturday, March 4, 2017

वक्‍त के साथ बदला है सिनेमा - विक्रमादित्‍य मोटवाणी



 विक्रमादित्‍य मोटवाणी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
विक्रमादित्‍य मोटवाणी की लूटेरा 2010 में आई थी। प्रशंसित फिल्‍में उड़ान और लूअेरा के बाद उम्‍मीद थी कि विक्रमादित्‍य मोटवाणी की अगली फिल्‍में फआफट आएंगी। संयोग कुछ ऐसा रहा कि उनकी फिल्‍में समाचार में तो रहीं,लेकिन फलोर पर नहीं जा सकीं। अब ट्रैप्‍ड आ रही है। राजकुमार राव अभिनीत यह अनोखी फिल्‍म है।
सात सालों के लंबे अंतराल की एक वजह यह भी रही कि विक्रमादित्‍य मोटवाणी अपने मित्रों अनुराग कश्‍यप,विकास बहल और मधु मंटेना के साथ प्रोडक्‍शन कंपनी फैंटम की स्‍थापना और उसकी निर्माणाधीन फिल्‍मों में लगे रहे। वे अपना पक्ष रखते हैं, मैं कोशिशों में लगा था। लूटेरा के बाद भावेश जोशी की तैयारी चल रही थी। लगातार एक्‍टर बदलते रहे और फिर उसे रोक देना पड़ा। बीच में एक और फिल्‍म की योजना भी ठप्‍प पड़ गई। प्रोडक्‍शन के काम का दबाव रहा। इन सगकी वजह से वक्‍त निकलता गया और इतना गैप आ गया।
ट्रैप्‍ड जैसी अपारंपरिक फिल्‍म का आयडिया कहां से आया? हिंदी की आम फिल्‍मों से अलग संरचना और कथ्‍य की इस फिल्‍म की योजना कैसे बनी? विक्रमादित्‍य बताते हैं, यह मेरा आयडिया नहीं है। अमित जोशी का एक मेल मिला था। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों के एक-दो सिनोप्सिस भेजे थे। यह आयडिया मुझे अच्‍छा लगा था। मैंने स्क्रिप्‍अ की मांग की तो कोई जवाब नहीं आया। दो महीनों के बाद वे 120 पेज की स्क्रिप्‍ट लेकर आए। मैंने अमित जोशी के साथ हार्दिक मेहता को जोड़ा और उन्‍हें स्क्रिप्‍ट डेवलप करने के लिए कहा। मैंने सोचा था कि स्क्रिप्‍ट तैयार कर लेते हैं। जब 20-25 दिन का समय और कोई एक्‍टर मिलेगा तो कर लेंगे। बीच में ऐसा एक विंडो आया तो मैंने राजकुमार से पूछा। वे राजी हो गए। वे आगे कहते हैं, राजकुमार राव ही मेरी पहली और आखिरी च्‍वाइस थे। मसान के समय राजकुमार राव फायनल हो चुके थे। फिर किसी वजह से वे अलग हो गए। उसके पहले से ही मेरे मन में था कि उनके साथ एक फिल्‍म करनी है। ट्रैप्‍ड के रोल के लिए वे सही चुनाव हैं। वनरेबल और ऑनेस्‍ट किरदार में वे सही लगे।
ट्रैप्‍ड ऊंची बिल्डिंग में फंसे एक व्‍यक्ति की कहानी है। फिल्‍म में अकेले किरदार की भूमिका राजकुमार राव निभा रहे हैं। इस फिल्‍म का निर्देशन किसी चुनौती सें कम नहीं रही। एक्‍टर और डायरेक्‍टर को मिल कर घटनाएं इतनी तेज और रोचक रखनी थीं कि दर्शकों का इंटरेस्‍ट बना रहे। विक्रमादित्‍य बताते हैं, हम ने स्क्रिप्‍ट पर मेहनत की थी। दर्शको को इंटरेस्‍ट हर सीन में बना रहे। मैं इसे किरदार के दिमाग से नहीं बना रहा था। मुझे इंटरेस्टिंग एक्‍टर मिल गया था। उनकी वजह से थोड़ा काम आसान हो गया था।
विक्रमादित्‍य ने फिल्‍म का बजट सीमित रखा। वे ऐसी फिल्‍मों के लिए इसे जरूरी मानते हैं, इस फिल्‍म को हम 20 करोड़ में नहीं बना सकते थे। किसी पॉपुलर स्‍टार के साथ भी बनाते तो फिल्‍म मंहगी हो जाती और दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ जातीं। अभी ऐसी फिल्‍मों के दर्शक आ गए हैं। यों अभी दंगल जैसी कमर्शियल फिल्‍में बन रही हैं। पिछले साल कमर्शियल फिल्‍मों में भी वैरायटी आ गई है। अभी अक्षय कुमार ने जॉली एलएलबी2 जैसी फिल्‍म की। पांच-दस साल पहले आप इन स्टारों के साथ ऐसी फिल्‍मों की कल्‍पना नहीं कर सकते थे। हम ने अपनी औकात में ही ट्रैप्‍ड बनायी है। इस फिल्‍म के ट्रेलर पर आ रहे रिएक्‍शन से विक्रम खुश हैं। सभी को लग रहा है कि राजकुमार राव फोन क्‍यों नहीं कर रहे? विक्रमादित्‍य हंसते हैं, मैं अभी नहीं बताऊंगा। उसके पीछे एक राज है। मुझ से तो कुछ पत्रकारों ने भी पूछा।
विक्रमादित्‍य मोटवाणी की अगली फिल्‍म भावेश जोशी में हर्षवर्द्धन कपूर हैं। नाम से ऐसा लगता है कि यह कोई बॉयोपिक है। विक्रमादित्‍य इस अनुमान से इंकार करते हैं, यह एक सजग युवक की कहानी है। यों समझें कि 21 वीं सदी के दूसरे दशक का एंग्री यंग मैन है। नाम के प्रति आकर्षण के बारे में सच यह है कि मेरे स्‍कूल का एक दोस्‍त था भावेश जोशी। उसके नाम को ऐसा असर था कि सभी उसे पूरा नाम लेकर बुलाते थे। मैंने फिल्‍म का वही नाम रख दिया।
विक्रमादित्‍य मोटवाणी हर तरह की फिल्‍में करना चाहते हैं। उनके प्रशंसकों को बता दें कि फिल्‍मों की इंटरनेशनल साइट आईएमडीबी की सूची में उनकी उड़ान दुनिया की बेहतरीन 200 फिल्‍मों में शामिल है।

Friday, February 26, 2016

फिल्‍म समीक्षा : अलीगढ़



साहसी और संवेदनशील
अलीगढ़
-अजय ब्रह्मात्‍मज

हंसल मेहता की अलीगढ़ उनकी पिछली फिल्‍म शाहिद की तरह ही हमारे समकालीन समाज का दस्‍तावेज है। अतीत की घटनाओं और ऐतिहासिक चरित्रों पर पीरियड फिल्‍में बनाना मुश्किल काम है,लेकिन अपने वर्त्‍तमान को पैनी नजर के साथ चित्रबद्ध करना भी आसान नहीं है। हंसल मेहता इसे सफल तरीके से रच पा रहे हैं। उनकी पीढ़ी के अन्‍य फिल्‍मकारों के लिए यह प्रेरक है। हंसल मेहता ने इस बार भी समाज के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के व्‍यक्ति को चुना है। प्रोफेसर सिरस हमारे समय के ऐसे साधारण चरित्र हैं,जो अपनी निजी जिंदगी में एक कोना तलाश कर एकाकी खुशी से संतुष्‍ट रह सकते हैं। किंतु हम पाते हैं कि समाज के कथित संरक्षक और ठेकेदार ऐसे व्‍यक्तियों की जिंदगी तबाह कर देते हैं। उन्‍हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं। उन्‍हें शर्मसार किया जाता है। प्रोफेसर सिरस जैसे व्‍यक्तियों की तो चीख भी नहीं सुनाई पड़ती। उनकी खामोशी ही उनका प्रतिकार है। उनकी आंखें में उतर आई शून्‍यता समाज के प्रति व्‍यक्तिगत प्रतिरोध है।
प्रोफेसर सिरस अध्‍ययन-अध्‍यापन से फुर्सत पाने पर दो पैग ह्विस्‍की,लता मंगेशकर गानों और अपने पृथक यौन व्‍यवहार के साथ संतुष्‍ट हैं। उनकी जिंदगी में तब भूचाल आता है,जब दो रिपोर्टर जबरन उनके कमरे में घुस कर उनकी प्रायवेसी को सार्वजनिक कर देते हैं। कथित नैतिकता के तहत उन्‍हें मुअत्‍तल कर दिया जाता है। उनकी सुनवाई तक नहीं होती। बाद में उन्‍हें नागरिक अधिकारों से भी वंचित करने की कोशिश की जाती है। उनकी अप्रचारित व्‍यथा कथा से दिल्‍ली का युवा और जोशीला रिपोर्टर चौंकता है। वह उनके पक्ष से पाठकों को परिचित कराता है। साथ ही प्रोफेसर सिरस को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करता है। प्रोफेसर सिरस बेमन से कोर्ट में जाते हैं। तब के कानूनी प्रावधान से उनकी जीत होती है,लेकिन वे जीत-हार से आगे निकल चुके हैं। वे सुकून की तलाश में बेमुरव्‍वत जमाने से चौकन्‍ने और चिढ़चिढ़े होने के बावजूद छोटी खुशियों से भी प्रसन्‍न होना जानते हैं।
पीली मटमैली रोशनी और सांवली छटा के दृश्‍यों से निर्देशक हंसल मेहता प्रोफेसर सिरस के अवसाद को पर्दे पर बखूबी उतारते हैं। उन्‍होंने उदासी और अवसन्‍न्‍ता को अलग आयाम दे दिया है। पहले दृश्‍य से आखिरी दृश्‍य तक की फीकी नीम रोशनी प्रोफेसर सिरस के अंतस की अभिव्‍यक्ति है। हंसल मेहता के शिल्‍प में चमक और चकाचौंध नहीं रहती। वे पूरी सादगी से किरदारो की जिंदगी में उतरते हैं और भावों का गागर भर लाते हैं।दरअसल,कंटेंट की एकाग्रता उन्‍हें फालतू साज-सज्‍जा से बचा ले जाती है। वे किरदार के मनोभावों और अंतर्विरोधों को कभी संवादों तो कभी मूक दूश्‍यों से जाहिर करते हैं। इस फिल्‍म में उन्‍होंने मुख्‍य कलाकारों की खामोशी और संवादहीन अभिव्‍यक्ति का बेहतरीन उपयोग किया है। वे प्रोफेसर सिरस का किरदार गढ़ने के विस्‍तार में नहीं जाते। शाहिद की तरह ही वे प्रोफेसर सिरस के प्रति दर्शकों की सहानुभूति नहीं चाहते। उनके किरदार हम सभी की तरह परिस्थितियों के शिकार तो होते हैं,लेकिन वे बेचारे नहीं होते। वे करुणा पैदा करते हैं। दया नहीं चाहते हैं। वे अपने तई संघर्ष करते हैं और विजयी भी होते हैं,लेकिन कोई उद्घोष नहीं करते। बतौर निर्देशक हंसल मेहता का यह संयम उनकी फिल्‍मों का स्‍थायी प्रभाव बढ़ा देता है।
अभिनेताओं में पहले राजकुमार राव की बात करें। इस फिल्‍म में वे सहायक भूमिका में हैं। अमूमन थोड़े मशहूर हो गए कलाकार ऐसी भूमिकाएं इस वजह से छोड़ देते हेंकि मुझे साइड रोल नहीं करना है। अलीगढ़ में दीपू का किरदार निभा रहे राजकुमार राव ने साबित किया है कि सहायक भूमिका भी खास हो सकती है। बशर्ते किरदार में यकीन हो और उसे निभाने की शिद्दत हो। राजकुमार के लिए मनोज बाजपेयी के साथ के दृश्‍य चुनौती से अघिक जुगलबंदी की तरह है। साथ के दृश्‍यों में दोनों निखरते हैं। राजकुमार राव के अभिनय में सादगी के साथ अभिव्‍यक्ति का संयम है। वे एक्‍सप्रेशन की फिजूलखर्ची नहीं करते। मनोज बाजपेयी ने फिर से एक मिसाल पेश की है। उन्‍होंने जाहिर किया है कि सही स्क्रिप्‍ट मिले तो वे किसी भी रंग में ढल सकते हैं। उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के एकाकीपन को उनकी भंगुरता के साथ पेश किया है। उनकी चाल-ढाल में एक किस्‍म का अकेलापन है। मनोज बाजपेयी ने किरदार की भाव-भंगिमा के साथ उसकी हंसी,खुशी और उदासी को यथोचित मात्रा में इस्‍तेमाल किया है। उन्‍होंने अभिनय का मापदंड खुद के साथ ही दूसरों के लिए भी बढ़ा दिया है। उन्‍होंने यादगार अभिनय किया है। फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में वे कविता की तरह संवादों के बीच की खामोशी में अधिक एक्‍सप्रेसिव होते हैं।
निश्चित ही यह फिल्‍म समलैंगिकता के प्रश्‍नों को छूती है,लेकिन यह कहीं से भी उसे सनसनीखेज नहीं बनाती है। समलैंगिकता इस फिल्‍म का खास पहलू है,जो व्‍यक्ति की चाहत,स्‍वतंत्रता और प्रायवेसी से संबंधित है। हिंदी फिल्‍मों में समलैंगिक किरदार अमूमन भ्रष्‍ट और फूहड़ तरीके से पेश होते रहे हैं। ऐसे किरदारों को साधरण निर्देशक मजाक बना देते हैं। हंसल मेहता ने पूरी गंभीरता बरती है। उन्‍होंने किरदार और मुद्दा दोनों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाया है। लेखक अपूर्वा असरानी की समझ और अपनी सोच से उन्‍होंने समलैंगिकता और सेक्‍शन 377 के प्रति दर्शकों की समझदारी दी है। अलीगढ़ साहसिक फिल्‍म है।
अवधि- 120 मिनट
स्‍टार- साढ़े चार स्‍टार

जीवन में संतुष्‍ट होना बहुत जरूरी : राजकुमार राव




-अजय ब्रह्मात्‍मज  
प्रतिभावान राजकुमार राव की अगली पेशकश ‘अलीगढ़़’ है। समलैंगिक अधिकारों व व्‍यक्ति की निजता को केंद्र में लेकर बनी इस फिल्‍म में राजकुमार राव पत्रकार दीपू सेबैस्टिन की भूमिका में हैं। दीपू न्‍यूज स्‍टोरी को सनसनीखेज बनाने में यकीन नहीं रखता। वह खबर में मानव अधिकारों को पुरजोर तरीके से रखने का पैरोकार है। 
राजकुमार राव अपने चयन के बारे में बताते हैं, ‘दीपू का किरदार तब निकला, जब मनोज बजापयी कास्ट हो रहे थे। उस वक्‍त हंसल मेहता सर की दूसरे एक्टरों से भी बातें हो रही थीं। नवाज से बातें हुईं। और भी एक्टरों के नाम उनके दिमाग में घूम रहे थे। जैसे कि नाना पाटेकर। वह सब केवल दिमाग में चल रहा था। तब दीपू का किरदार फिल्म में था ही नहीं। जहन में भी नहीं थी। केवल एक हल्का स्केच दिमाग में था। जब स्क्रिप्ट तैयार हुई तब पता चला कि दीपू तो प्रिंसिपल  कास्ट है। जैसे वो बना हंसल ने तय कर लिया कि यह राजकुमार राव का रोल है। हंसल मेहता के मुताबिक उन्‍हें मेरे बिना फिल्म बनाने की आदत नहीं है। दरअसल हम दोनों की जो कला है, कला में आप विस्तार करते हो। अपने भीतर के कलाकार को उभारने का मौका मिलता है। एक कलाकार के जरिए। दूसरे कलाकार के जरिए। एक दूसरे से बांटने का काम होता है। उनके लिए मैं सिग्नेचर बन चुका हूं।
वे मुझ पर काफी भरोसा करते हैं। ठीक वैसे, जैसे किसी पिता को अपने लायक बेटे पर होता है। सर का औऱ मेरा एक कनेक्शन है। वह केवल फिल्म तक नही है। वह सिर्फ डायरेक्टर और एक्टर का नहीं है। वह उसके भी आगे है। बहुत आगे। हम हर तरह की बात करते हैं। हम मस्ती करते हैं। पार्टी करते हैं। गोसिप करते हैं। फिल्म पर ढेर सारी बातें करते हैं। जब मैं सर के साथ काम करता हूं तो बतौर एक्टर बहुत चैलेंज महसूस करता हूं। वह इस तरह के किरदार मेरे लिए लिखते हैं। मुझे करने का मौका देते हैं। एक्टर के तौर पर मुझे बहुत मजा आता है। मेरे जितने भी बेहतरीन काम रहे हैं। जैसे शाहिद। मैं मानता हूं कि उसमें हंसल सर सबसे ऊपर आते हैं। मैंने कई फिल्में की लेकिन उन सब चीजों का मौका मुझे सर के साथ ही आता है। हंसल सर ऐसा एक माहौल देते हैं। एक स्पेस देते हैं कि बतौर एक्टर मैं बहुत खुला हुआ महसूस करता हूं। मुझे लगता है कि मैं किसी को कुछ दिखाने के लिए नहीं कर रहा हूं। मैं केवल अपने लिए काम कर रहा हूं।
मनोज बाजपयी प्रोफेसर सिरस की भूमिका में हैं। प्रोफेसर सिरस को समलैंगिकता के आरोप में अलीगढ़ युनिवर्सिटी से निकाला जाता है। राजकुमार राव सिरस के बारे में अपनी सोच जाहिर करते हैं, ‘प्रोफेसर सिरस मेरे लिए एक ऐसा बंदा है जो जिंदगी को जीना जानता है। उसमें कमाल का टैलेंट हैं।वह आइडियल आदमी है। हम सभी कहीं ना कहीं दूसरों पर निर्भर करते हैं अपनी खुशी के लिए या फिर अपना दुख बांटने के लिए। वहीं वह ऐसा आदमी है जो अपनी दुनिया में बहुत खुश है। उसको जीवन से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। उसके लिए उसका संगीत या यूं कह सकते हैं कि वह अपने स्पेस में बेहद खुश है। इस किरदार से मैंने एक शब्द सीखा कि जीवन में कंटेंट होना बहुत जरूरी है। नहीं तो दिमाग को तो कुछ ना कुछ चाहिए ही रहता है। हमें अपने रोज के जीवन में कुछ ना कुछ चाहिए ही रहता है। कभी गाड़ी .कभी घर को कभी नए दोस्त।
दीपू सेबैस्टियन एक ऐसा इंसान है जिसे कुछ नहीं चाहिए। उसे केवल अपना स्पेस चाहिए। यह सोसायटी उसे वह भी देने को तैयार नहीं है। उससे सबकुछ छिन लिया जा रहा है। मैंने सिरस से यहीं सीखा। मनोज बाजपयी सर उनके साथ मेरा खास नाता है। जब मैं बड़ा हो रहा था तो मैंने शूल देखकर बड़ा हो रहा था। उनका एक प्रभाव मुझ पर रहा है। वह बतौर एक्टर मुझ पर हावी रहे हैं। उनकी परफॉरमेंस से मैं प्रभावित हो जाता था। एक तरफ शाहरूख खान की डीडीएलजे देखकर उनकी भी नकल करता था। वैसा बनना चाह रहा था। दूसरा मैं शूल देख रहा था। मैं मनोज सर की नकल करता था। मुझ पर उनका बहुत बड़ा प्रभाव रहा है। वह आज तक है।

Sunday, February 21, 2016

अभिनेता राजकुमार राव और निर्देशक हंसल मेहता की बातचीत




अजय ब्रह्मात्‍मज

( हंसल मेहता और राजकुमार राव की पहली मुलाकात शाहिद की कास्टिंग के समय ही हुई थी। दोनों एक-दूसरे के बारे में जान चुके थे,लेकिन कभी मिलने का अवसर नहीं मिला। राजकुमार राव बनारस में गैंग्‍स ऑफ वासेपुर की शूटिंग कर रहे थे तब कास्टिंग डायरेक्‍टर मुकेश छाबड़ा ने उन्‍हें बताया था कि हंसल मेहता शाहिद की प्‍लानिंग कर रहे हैं। राजकुमार खुश हुएफ उन्‍हें यह पता चला कि लीड और ऑयोपिक है तो खुशी और ज्‍यादा बढ़ गई। इधर हंसल मेहता को उनके बेटे जय मेहता ने राजकुमार राव के बारे में बताया। वे तब अनुराग कश्‍यप के सहायक थे। एक दिन मुकेश ने राजकुमार से कहा कि जाकर हंसल मेहता से मिल लो। मुकेश ने हंसल को बताया कि राजकुमार मिलने आ रहा है। तब तक राजकुमार उनके दफ्तर की सीढि़यां चढ़ रहे थे। हंसल मेहता के पास मिलने के सिवा कोई चारा नहीं था। दोनों मानते हैं कि पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच रिश्‍ते की बिजली कौंधी। अब तो हंसल मेहता को राजकुमार राव की आदत हो गई है और राजकुमार राव के लिए हंसल मेहता डायरेक्‍टर के साथ और भी बहुत कुछ हैं।)
राजकुमार राव और हंसल मेहता की तीसरी फिल्‍म है अलीगढ़। दोनों के बीच खास समझदारी और अंतरंगता है। स्थिति यह है कि हंसल अपनी फिल्‍म उनके बगैर नहीं सोच पाते और राजकुमार राव उन पर खुद से ज्‍यादा यकीन करते हैं। झंकार के लिए यह खास बातचीत...यहां राजकुमार राव के सवाल हैं और जवाब दे रहे हैं हंसल मेहता।
-सिटीलाइट्स के बाद जब ईशानी ने आप का यह कहानी भेजी तो ऐसा क्‍यों लगा कि इसी पर फिल्‍म बनानी चाहिए? उन दिनों तो आप ढेर सारी कहानियां पढ़ रहे थे?
0 मैं कहानी के इंतजार में था। कई विचारों पर काम कर रहा था। सच कहूं तो मैं कहानियां ,खोजता नहीं। कहानियां ख्‍ुद ही मेरे पास आ जाती हैं। उस वक्‍त उनका मेल आ गया।वह भी जंक मेल में चला गया था। पढ़ते ही वह विचार मुझे प्रभावित कर गया। फिर भी उन्‍हें फोन करने के पहले मैंने तीन-चार घंटे का समय लिया।
-क्‍श्या लिखा था उन्‍होंने मेल में ?
0 उन्‍होंने प्रोफेसर सिरस के बारे में लिखा था कि एएमयू में ऐसे एक प्रोफेसर थे,जिनका इंतकाल हो गया था। उन्‍हें सेक्‍सुअलिटी के मुद्दे पर सस्‍पेंड कर दिया गया था। बेसिक थॉट था। प्रोफेसर सिरस से संबंणित कुछ आर्टिकल थे। मैंने उसी शाम ईशानी को बुलाया। ईशानी स्क्रिप्‍ट लिखने के लिए तैयार नहीं थी। तभी हमलोग सिटीलाइट्स की एडीटिंग कर रहे थे। मैंने अपने एडीटर अपूर्वा असरानी से पूछा कि क्‍या तुम लिखोगे? अपूर्वा कूद पड़ा। वह पहले से जानता था मुद्दे के बारे में। मैंने शैलेष सिंह को निर्माता के तौर पर जोडा। फिल्‍म पर काम शुरू हो गया। लिखने के दौरान ही तुम्‍हारे कैरेक्‍टर दीपू सैबेस्टियन का जन्‍म हुआ। हमें अकेली जिंदगी जी रहे प्रोफेसर सिरस की कहानी कहने के लिए कोई चाहिए था। फिर यह सिरस और दीपू की कहानी बन गई।
- शाहिद पर काम करते समय हम ने कहां सोचा था कि उसे नेशनल अवार्ड मिल जाएगा। अभी अजीगढ़ चर्चा में है। क्‍या निर्माण के दौरान यह अहसास था कि समलैंगिक अधिकारों की यह फिल्‍म ऐसी प्रासंगिक हो जाएगी? व्‍यक्ति सिरस से बढ़ कर अब यह एक सामाजिक विषय की फिल्‍म हो गई है।
0 हमेशा मेरी कोशिश रहती है कि मानव अधिकारों की कहानी पूरी जिम्‍मेदारी के साथ कहें। हम उन पर फिल्‍में क्‍यों बनाते हैं,क्‍योंकि वे समाज के बहुसंख्‍यकों से अलग हैं। हम उन्‍हें अल्‍पसंख्‍यक कहते हैं। चाहे वे मुसलमान हों या माइग्रैंट हों या होमोसेक्‍सुअल हों। मेरी कोशिश रहती है कि मैं उन्‍हें इंसान की तरह पेश करूं और उनके अधिकारों की बात करूं। समाज में उनकी मौजूदगी को रेखांकित करना ही ऐसी फिल्‍मों का ध्‍येय हो जाता है। जब हम लिख रहे थे तो सेक्‍शन 377 पर कोई बात करने को तैयार नहीं था। संसद ने चुप्‍पी साध ली थी। संसद यों भी निष्क्रिय ही रहता है। सड़क और संसद में बड़ा अंतर आ गया है। सभी चाहते हैं कि यह लॉ हटे। अब सुप्रीम कोर्ट लोगों की इच्‍छाओं पर ध्‍यान दे रहा है। अलीगढ़ अब उस लड़ाई का हिस्‍सा बन गई है।
- इस फिल्‍म का मकसद क्‍या है ?
0 सीधी सी बात है कि एक व्‍यक्ति अपने बंद कमरे में क्‍या कर रहा है,यह उसका निजी मामला है। दो व्‍यक्ति राजीखुशी क्‍या कर रहे हैं,उससे स्‍टेट का क्‍या लेनादेना है अगर वे समाज को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। हम फिल्‍म में यही दिखा रहे हैं। एक व्‍यक्ति की जिंदगी  कुछ लोगों ने तबाह कर दी।
-अगर आ से पूछूं कि बीच के दौर के हंसल मेहता और आज के हंसल मेहता में क्‍या अंतर दिखता है?
0 हर फिल्‍म में सेंसर से लड़ाई। फिल्‍म की रिलीज का संघर्ष... इसके बावजूद मैं थकता नहीं। बीच की फिल्‍मों में मैं थक जाता था। उनमें कहने के लिए कुछ नहीं रहता था। इन फिल्‍मों से मुझे ऊर्जा मिलती है। एक मकसद मिल गया है मुझे। उस दौर में मैं फिल्‍मों से अपने खाली समय भर रहा था। उन फिल्‍मों की एक भूमिका रही। मुझे असफलता मिली। उसकी वजह से मैंने अंदर झांका। और ऐसी फिल्‍मों की तरफ लौटा।

Friday, June 12, 2015

फिल्‍म समीक्षा : हमारी अधूरी कहानी

स्टार: 3

मोहित सूरी और महेश भट्ट एक साथ आ रहे हों तो एक बेहतरीन फिल्म की उम्मीद की ज सकती है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ बेहतरीन की परिधि में आते-आते रह गई है। यह फिल्मी संवादों, प्रेम के सिचुएशन और तीनों मुख्य कलाकारों के जबरदस्त अभिनय के लिए देखी जा सकती है। फिल्म में आज के ट्रेंड के मुताबिक औरतों की आजादी की भी बातें हैं। पुरूष दर्शकों को वसुधा का गुस्सा कुछ ज्यादा लग सकता है, लेकिन सच तो यही है कि पति नामक जीव ने परंपरा और मर्यादा के नाम पर पत्नियों को सदियों से बांधा और सेविका बना कर रख लिया है। फिल्म के संवाद के लिए महेश भट्ट और शगुफ्ता रफीक को बधाई देनी होगी। अपने पति पर भड़क रही वसुधा अचानक पति के लिए बहुवचन का प्रयोग करती है और ‘तुमलोगों’ संबोधन के साथ सारे पुरुषों को समेट लेती है। 

 वसुधा भारतीय समाज की वह अधूरी औरत है, जो शादी के भीतर और बाहर पिस रही है। वह जड़ हो गई है, क्योंकि उसकी भावनाओं की बेल को उचित सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है। वह कामकाजी और कुशल औरत है। वह बिसूरती नहीं रहती। पति की अनुपस्थिति में वह अपने बेटे की परवरिश करने के साथ खुद भी जी रही है। आरव के संपर्क में आने के बाद उसकी समझ में आता है कि वह रसहीन हो चुकी है। उसे अपना अधूरापन नजर आता है। आरव खुशी देकर उसका दुख कम करना चाहता है। हालांकि फिल्म में हवस और वासना जैसे शब्दों का इस्तेकमाल हुआ है, लेकिन गौर करें तो आरव और वसुधा की अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशों में यह प्रेम का पूरक है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ स्त्री-पुरुष संबंधों की कई परतें पेश करती है। हरि-वसुधा, आरव-वसुधा, आरव की मां और उनका प्रेमी, हरि के माता-पिता .... लेखक-निर्देशक सभी चरित्रों के विस्तार में नहीं गए हैं। फिर भी उनके जीवन की झलक से प्रेम के अधूरेपन की खूबसूरती और बदसूरती दोनों नजर आती है।

 ‘हमारी अधूरी कहानी’ का शिल्प कमजोर है। आरव और वसुधा के जीवन प्रसंगों में भावनाएं तो हैं, किंतु घटनाओं की कमी है। वसुधा जिंदगी से ली गई किरदार है। आरव को पन्नों पर गढ़ गया है। अपनी भावनाओं के बावजूद वह यांत्रिक लगता है। यही कारण है कि उसकी सौम्यदता, दुविधा और कुर्बानी हमें विचलित नहीं करती। इस लिहाज से हरि जीवंत और विश्वसनीय किरदार है। रुढियों में जीने की वजह से औरतों के स्वामित्व की उसकी धारणा असंगत लगती है, लेकिन यह विसंगति अपने समाज की बड़ी सच्चाई है। पुरुष खुद को स्वामी समझता है। वह औरतों की जिंदगी में मुश्किलें पैदा करता है। ‘हमारी अधूरी कहानी’ अपनी कमियों के बावजूद स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियों में उतरती है। लेखकों की दृष्टि पुरानी है और शब्दों पर अधिक जोर देने से भाव का मर्म कम हुआ है। फिर भी यह फिल्म पॉपुलर ढांचे में कुछ सवाल रखती है।

इमरान हाशमी ने आरव के किरदार को उसके गुणों के साथ पर्दे पर उतारा है। कशमकश के दृश्योंण में वे प्रभावित करते हैं। उन्हें किरदार(लुक और कॉस्ट्यूम) में ढालने में फिल्म की तकनीकी टीम का भी योगदान है। विद्या बालन इस अधूरी कहानी में भी पूरी अभिनेत्री हैं। वह वसुधा के हर भाव को सलीके से पेश करती हैं। पति और प्रेमी के बीच फंसी औरत के अंतर्विरोधों को चेहरे से जाहिर करना आसान नहीं रहा होगा। विद्या के लिए वसुधा मुश्किल किरदार नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म में किरदार के अधूरेपन को बरकरार रखना उललेखनीय है। राजकुमार राव के बार में यही कहा जा सकता है कि हर बार की तरह उन्होंने सरप्राइज किया है। हमें मनोज बाजपेयी और इरफान खान के बाद एक ऐसा एक्टैर मिला है, जो हर कैरेक्टर के मानस में ढल जाता है। हरि की भूमिका में उन्होंने फिर से जाहिर किया है कि वे उम्दा अभिनेता हैं। राजकुमार राव और विद्या बालन के साथ के दृश्य मोहक हैं। नरेन्द्र झा छोटे किरदार में जरूरी भूमिका निभाते हैं।

गीत-संगीत बेहतर है फिल्म के गीतों में अधूरी कहानी इतनी बार रिपीट करने की जरूरत नहीं थी। राहत फतह अली का गाया गीत फिल्म के कथ्य को कम शब्दों में बखूबी जाहिर करता है।
 वही हैं सूरतें अपनी वही मैं हूँ, वही तुम हो
मगर खोया हुआ हूँ मैं मगर तुम भी कहीं गुम हो
मोहब्बत में दग़ा की थी काफ़िर थे सो काफ़िर हैं
मिली हैं मंज़िलें फिर भी मुसाफिर थे मुसाफिर हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुंचे
 मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
अवधि- 131 मिनट

Friday, January 23, 2015

फिल्‍म रिव्‍यू : डॉली की डोली

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
हंसी के साथ तंज भी
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार
अभिषेक डोगरा और उमाशंकर सिंह की लिखी कहानी पर अभिषेक डोगरा निर्देशित 'डॉली की डोली' ऊपरी तौर पर एक लुटेरी दुल्हन की कहानी लगती है, लेकिन लेखक-निर्देशक के संकेतों पर गौर करें तो यह परतदार कहानी है। लेखक और निर्देशक उनके विस्तार में नहीं गए हैं। उनका उद्देश्य हल्का-फुल्का मनोरंजन करना रहा है। वे अपने ध्येय में सफल रहे हैं, क्योंकि सोनम कपूर के नेतृत्व में कलाकारों की टीम इस प्रहसन से संतुष्ट करती है।
डॉली (सोनम कपूर) की एक टीम है, जिसमें उसके भाई, पिता, मां और दादी हैं। ये सभी मिल कर हर बार एक दूल्हा फांसते हैं और शादी की रात जेवर और कपड़े-लत्ते लेकर चंपत हो जाते हैं। यही उनका रोजगार है। डॉली की टीम अपने काम में इतनी दक्ष है कि कभी सुराग या सबूत नहीं छोड़ती। डॉली का मामला रॉबिन सिंह (पुलकित सम्राट) के पास पहुंचता है। वह डॉली को गिरफ्तार करने का व्यूह रचता है और उसमें सफल भी होता है, लेकिन डॉली उसे भी चकमा देकर निकल जाती है। वह फिर से अपनी टीम के साथ नई मुहिम पर निकल जाती है।
लेखक-निर्देशक आदर्श और उपदेश के भार से नहीं दबे हैं। उन्हें डॉली की तकलीफ और लाचारी से भी अधिक मतलब नहीं है। वे उसके उन मुहिमों और करतूतों की कहानी कहते हैं, जो सामाजिक विडंबना और प्रचलित धारणा का प्रहसन रचती है। इस प्रहसन के लिए वे जरूरी किरदार समाज से ही चुनते हैं। इन किरदारों की लालसा, इच्छा और लंपटता से हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं, जो हमें पहले हंसने और फिर हल्का सा सोचने के लिए मजबूर करते हैं।
'डॉली की डोली' पूरी तरह से सोनम कपूर की फिल्म है। 'खूबसूरत' के बाद एक बार फिर सोनम ने साबित किया है कि अगर ढंग की स्क्रिप्ट और किरदार मिले तो वह अपनी सीमाओं के बावजूद फिल्म को रोचक बना सकती हैं। सोनम कपूर के हास्य में एक शालीनता है। वह हंसी-मजाक के दृश्यों में भाव-मुद्राओं या संवादों से फूहड़ नहीं होतीं। निश्चित ही लेखक-निर्देशक की मदद से वह ऐसा कर पाती हैं। 'डॉली की डोली' के मुश्किल दृश्यों में उनका संयम और आत्मविश्वास दिखता है।
अन्य कलाकारों में राजकुमार राव ने गन्ना किसान सोनू सहरावत की भूमिका में अभिभूत किया है। हरियाणवी किरदार को उन्होंने भाषा, संवाद अदायगी और अपने हाव-भाव से जीवंत कर दिया है। नए-नए अमीर बने हरियाणवी किसान की ठस को बहुत खूबसूरती से वे आत्मसात करते हैं। मनोज की भूमिका में वरुण शर्मा भी प्रभावित करते हैं। उनका जोर हंसाने पर रहा है, इसलिए कई बार वह जबरन प्रतीत होता है। सहयोगी कलाकारों में मोहम्मद जीशान अयूब और मनोज जोशी स्वाभाविक हैं। दादी की भूमिका निभा रही प्रौढ़ अभिनेत्री याद रह जाती हैं। पुलकित सम्राट के अभिनय में सलमान खान की छाया खटकती है, हालांकि उन्होंने अपने अंदाज और अदायगी पर मेहनत की है।
'डॉली की डोली' में कथ्य की नवीनता नहीं है, लेकिन परिचित कथ्य को ही अभिषेक डोगरा और उमाशंकर सिंह ने रोचक तरीके से पेश किया है। छोटे-छोटे दृश्यों के जोड़ से गति बनी रहती है, जिन्हें संवादों की पींग मिलती रहती है। लेखक-निर्देशक ने अपना काम जिस ईमानदारी और ध्येय से किया है, उसे सही तरीके से तकनीकी टीम और कलाकारों ने पर्दे पर उतारा है।
अवधि: 100 मिनट

Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, May 29, 2014

अंधेरा है महानगरों की चकाचौंध में-हंसल मेहता


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता और राजकुमार राव की जोड़ी की दूसरी फिल्म ‘सिटीलाइट््स’ आ रही है। पिछले साल की ‘शाहिद’ के लिए दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ‘सिटी लाइट’ का निर्माण महेश भट्ट और फॉक्स स्टार स्टूडियोज ने किया है। ‘सिटीलाइट्स’ में राजकुमार राव राजस्थान के दीपक की भूमिका में हैं, जो आजीविका के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे महानगर में दीपक के सरवाइवल और संघर्ष की यह कहानी छोटे शहरों से सपनों के साथ बडे शहरों में आ रहे लाखों-करोड़ों युवकों की प्रतीकात्मक कहानी है।
    हंसल मेहता से पहले इस फिल्म के निर्देशन के लिए अजय बहल को चुना गया था। उन्होंने ‘शाहिद’  देख रखी थी। उन्हें लगा कि हंसल ‘सिटीलाइट़्स’ की थीम के साथ न्याय कर सकते हैं। ऐसा लग सकता है कि हंसल मेहता ने ही इस फिल्म के लिए राजकुमार राव को चुना होगा। यहां तथ्य उल्टे हैं। राजकुमार राव पहले से फिल्म में थे। बाद में हंसल मेहता को बतौर निर्देशक बुलाया गया।
    ‘शाहिद’ के लिए मिले पुरस्कार से फर्क तो पड़ा है। हंसल बताते हैं, ‘संयोग है कि हम दोनों को पुरस्कार मिले और अब ‘सिटीलाइट्स’ आ रही है। फिल्म इंडस्ट्री और बाकी लोगों के बीच पुरस्कार से साख बढ़ी है। अब हम कुछ और भी काम कर सकते हैं। अभी मेरी चाहत है कि दर्शक यह फिल्म देखने आएं। उनका समर्थन मिलेगा और फिल्म चलेगी, तभी हमलोग बेहतरीन फिल्में ला सकेंगे। खुशी है कि इस फिल्म को समर्थन मिल रहा है। फिल्म के गीत भी लोकप्रिय हो रहे हैं।’
     ‘सिटीलाइट्स’ फिलीपिंस की फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ पर आधारित है। फॉक्स स्टार स्अूडियोज ने महेश भट्ट से आग्रह किया था कि वे इस फिल्म को भारतीय संदर्भ देकर बनाएं। चूंकि फिल्म का कथ्य भारत के लिए भी सामयिक है, इसलिए महेश भट्ट राजी हो गए। उन्होंने अपने कैंप के मशहूर निर्देशकों को यह फिल्म नहीं दी, क्योंकि इस फिल्म का मिजाज रियल और सादा है। उन्होंने हंसल मेहता को फिल्म सौंपी। हंसल मेहता कहते हैं, ‘भट्ट साहब के बारे में अनेक धारणाएं फैली हुई हैं। मुझे उन जैसा साहसी और क्रिएटिव कोई व्यक्ति नहीं दिखता। मुंबई की शूटिंग के दौरान मैं रोजाना उनसे मिलने पहुंच जाता था और रिचार्ज होकर निकलता था। भट्ट साहब ने कहा था कि निर्भीक होकर फिल्म बनाओ। बाकी मैं देख लूंगा। वे सिर्फ आजादी ही नहीं देते। वे आजाद रहने की हिम्मत भी देते हैं।’ हंसल मेहता ‘सिटीलाइट्स’ के बारे में स्पष्ट करते हैं, ‘मैंने मूल फिल्म नहीं देखी है। मैं नहीं चाहता था कि ‘मैट्रो मनीला’ से प्रेरित या प्रभावित हो जाऊं। ‘मैट्रो मनीला’ के आधार पर रितेश शाह ने स्क्रिप्ट लिख ली थी। उस स्क्रिप्ट पर ही मैंने काम किया। मैंने केवल मुख्य किरदारों को हिमाचल प्रदेश से निकाल कर राजस्थान में बिठा दिया।’
    फिल्म के टायटल को हंसल मेहता उचित ठहराते हैं। वे तर्क देते हैं, ‘इस फिल्म के लिए यह टायटल उपयुक्त है। महानगरों की चकाचौंध में अंधेरा पसरा रहता है। रोशनी के बीच रहते हुए भी सभी के मन में अंधेरा है। आप मुंबई शहर को ही लें। ऊंची इमारतों के वासी नीचे झोपड़पट्टियों को नहीं देखते। उनकी नजर दूर समुद्र की लहरों को टटोलती रहती है। देश के छोटे शहरों से लोग महानगरों की चमक-दमक (सिटीलाइट्स) देख कर भागे आते हैं और यहां की अंधेरी गलियों में गुमनाम हो जाते हैं।’
    ‘सिटीलाइट्स’ की शूटिंग राजस्थान के एक गांव में हुई है। शूटिंग से पहले राजकुमार राव और पत्रलेखा कुछ समय के लिए उस गांव में जाकर रहे। उन्होंने स्थानीय लोगों की चाल-ढाल और भाषा सीखी। हंसल मेहता बताते हैं कि इससे काफी फर्क पड़ा, ‘राजकुमार राव हरियाणा के हैं और पत्रलेखा असम की है। फिर दोनों शहरों में रह रहे हैं। जरूरी था कि वे मेरे किरदारों की भाषा, वेशभूषा और व्यवहार को वास्तविक तरीके से पर्दे पर ले आएं। मैंने उन्हें यह मौका दिया कि वे किरदार के अनुसार कुछ सीख-समझ सकें।’

बाक्स
    राजकुमार राव ‘सिटीलाइट्स’ में दीपक की भूमिका को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। फिल्म में दीपक का किरदार उनके देखे-सुने व्यक्तियों से भिन्न और एक हद तक आत्मकेंद्रित है। वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है। उसकी एक ही चिंता है कि वह अपनी बीवी और बेटी को सुरक्षित जिंदगी से सके। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता राजकुमार राव शूटिंग के दरम्यान किसी प्रकार का दबाव नहीं महसूस करते। वे मानते हैं कि अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और गहराई से निभाने की चिंता भर रहती है। मैं यही कोशिश करता हूं कि दर्शकों को परिचित किरदार भी नए रूप-रंग में दिखाऊं। ‘सिटीलाइट्स’ का दीपक ‘शाहिद’ के शाहिद आजमी से स्वभाव और एटीट्यूड में भिन्न है।  
   

Monday, April 21, 2014

मैं अनपेक्षित भंगिमाओं का अभिनेता हूं-राजकुमार राव


-अजय ब्रह्मात्मज
    हाल ही में सफल हुई  ‘क्वीन’ में राजकुमार राव ने विजय की भूमिका में दर्शकों की घृणा हासिल की। उस किरदार की यही खासियत थी। विजय ऐन शादी के मौके पर रानी को रिजेक्ट कर देता है। इस रिजेक्शन से बिसूरने के पश्चात रानी अकेली हनीमून पर निकलती है। वहां से लौटने के बाद वह रानी से क्वीन बन चुकी होती है। राजकुमार राव इन दिनों नासिक में  ‘डॉली की डोली’ की शूटिंग कर रहे हैं। शूटिंग के लिए निकलने से ठीक पहले उन्होंने झंकार से खास बातचीत की।
-  ‘क्वीन’ की कामयाबी के बाद का समय कैसा चल रहा है?
0 पार्टियां चल रही हैं। कभी कंगना की बर्थडे पार्टी तो कभी  ‘क्वीन’ की सक्सेस पार्टी। दोस्तों की छोटी-मोटी पार्टियां बीच-बीच में चलती रहती है। हम सभी बहुत खुश हैं। फिल्म दर्शकों को पसंद आई। फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया। ऐसी सफलता से  ‘क्वीन’ जैसी फिल्मों में सभी का विश्वास बढ़ता है।
- इस कामयाबी को आप कितना एंज्वॉय कर सके?
0 मेरे लिए हर कामयाबी क्षणिक होती है। बहुत खुश हूं। इससे जयादा नहीं सोचता हूं। अभी  ‘डॉली की डोली’ पर फोकस आ गया है।
-  ‘क्वीन’ के विजय को आप कैसे देखते हैं?
0 मेरे लिए वह बहुत ही नार्मल और इंपलसिव लडक़ा है। इस दुनिया में विजय जैसे लडक़ों की भरमार है। मैं उसे गलत नहीं मानता। आप गौर करें तो वह विलेन नहीं है। ग्रे शेड है उसका। मैंने उसे विलेन की तरह प्ले नहीं किया। मैं रानी से अपनी बात भर कहता हूं। उसे डांटता नहीं। मुझे नाटकीय नहीं होना था।
-  ‘शाहिद’ से कैसी और कितनी संतुष्टि मिली?
0 बहुत ज्यादा। वह बॉयोपिक फिल्म थी। शाहिद रियल कैरेक्टर था। मैं लालची एक्टर हूं। चाहूंगा कि हर फिल्म में शाहिद जैसा किरदार मिले। शाहिद मेरे लिए एक यादगार मौका रहा। फिल्म को मिली सराहना से हंसल मेहता और मुझे फायदा हुआ।  ‘काय पो छे’,  ‘शाहिद’ और  ‘क्वीन’ ... एक-एक कर आई तीनों फिल्मों ने मुझे संतुष्ट किया है। यह धारणा बनी है कि मैं सही फिल्में चुन रहा हूं।  ‘शाहिद’ के लिए मुझे फिल्मफेअर का क्रिटिक अवार्ड मिला।
- ख्याति,सराहना और पुरस्कारों के बाद अभी कक्या प्राथमिकाएं हैं?
0 अभी मैं अपनी पसंद की फिल्में चुन पा रहा हूं। ढेर सारी स्क्रिप्ट मिलती हैं। उनमें से दमदार किरदार की फिल्में चुनता हूं। कई बार दुविधा होती है, जब एक साथ एक ही समय शूट होने वाली दो फिल्में पसंद आ जाती हैं। एक को छोडऩा पड़ता है।
- स्क्रिप्ट आप सुनते हैं या पढ़ते है?
0 मैं पढऩा पसंद करता हूं। सुनते समय मैं व्यग्र होने लगता हूं। कई बार नैरेशन देने आया व्यक्ति अच्छा पाठ नहीं करता। मुंह बंद कर उबासियां लेनी पड़ती हैं तो कुढऩ होती है। पढ़ते समय अपना किरदार और फिल्म दोनों समझ में आ जाती है। फिर डायरेक्टर से बात-मुलाकात करनी होती है।
- आप प्रशिक्षित एक्टर हैं। प्रशिक्षण का क्या लाभ हुआ?
0 प्रशिक्षण और अनुभव हमेशा उपयोगी रहता है। एक्टिंग का प्रशिक्षण इंजीनियरिंग के लिए आईआईटी जाने जैसा है। आप सध जाते हैं। आत्मविश्वास बढ़ जाता है। मुझे प्रशिक्षण से बहुत लाभ हुआ। एक्टिंग का मतलब सिर्फ 20 लोगों को एक साथ मारना नहीं है या हीरोइन को भगाकर ले जाना भर नहीं है। एक्टिंग अत्यंत आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
- सीखा हुआ काम आता है क्या हिंदी फिल्मों के ढांचे में ... 
0 देखना पड़ता है आप कैसी फिल्म कर रहे हैं और किस के साथ काम करे हैं। मैं पारंपरिक तरीके से कुछ भी नहीं करना चाहता हूं। भाव तो वही रहेंगे, लेकिन मेरी प्रतिक्रिया अलग होनी चाहिए। मैं अनपेक्षित भंगिमाओं का अभिनेता हूं। हिंदी फिल्मों में एक्सप्रेशन सीमित होते गए हैं। मैं अपने किरदार को विश्वसनीय रखना चाहता हूं। इसमें सीखा और देखा हुआ काम आता है।
- आपकी आगामी  ‘सिटी लाइट्स’ कैसी फिल्म है?
0 हंसल मेहता के साथ एक और फिल्म  ़ ़ ़ हम दोनों खूब एक्साइटेड हैं। यह ‘मैट्रो मनीला’ का आधिकारिक सीमेक है। हिंदुस्तान के हिसाब से कहानी बदली हुई है। मैं दीपक हूं। राजस्थान के एक गांव से पत्नी के साथ मुंबई आता हूं। यहां आने पर जिन मुसीबतों से जूझता हूं, उसी की कहानी है ‘सिटी लाइट््स’। हम दोनों मुंबई में एडजस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह सरवाइवल और होप की फिल्म है।
-  ‘डॉली की डोली’ क्या है?
0 यह फन कॉमेडी फिल्म है। निर्माता अरबाज खान के लिए अभिषेक डोरा इसे निर्देशित कर रहे हैं। सिचुएशनल कॉमेडी है। सोनम कपूर  डॉली की भूमिका में हैं। मैं हरियाणा का जाट सोनू सहरावत हूं। मैं इस फिल्म में कुछ नया कर रहा हूं। डॉली से में अंधा प्यार करता हूं। उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं।

Thursday, January 2, 2014

दरअसल : 2013 की उपलब्धि हैं राजकुमार और निम्रत


-अजय ब्रह्मात्मज
    बाक्स आफिस और लोकप्रियता के हिसाब से कलाकारों की बात होगी तो राजकुमार राव और निम्रत कौर किसी भी सूची में शामिल नहीं हो पाएंगे। चरित्र, चरित्रांकन और प्रभाव के एंगल से बात करें तो पिछले साल आई हिंदी फिल्मों के कलाकारों में उन दोनों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा। हंसल मेहता निर्देशित ‘शाहिद’ और रितेश बत्रा निर्देशित ‘द लंचबाक्स’ देखने के बाद आप मेरी राय से असहमत नहीं हो सकेंगे। दोनों कलाकारों ने अपने चरित्रों को आत्मसात करने के साथ उन्हें खास व्यक्तित्व दिया। दोनों अपनी-अपनी फिल्मों में इतने सहज और स्वाभाविक हैं कि फिल्म देखते समय यह एहसास नहीं रहता कि व्यक्तिगत जीवन में राजकुमार राव और निम्रत कौर कुछ और भी करते होंगे।
    हिंदी फिल्मों में कभी-कभार ही ऐसे कलाकारों के दर्शन होते हैं। समीक्षक, दर्शक और फिल्म पत्रकार इन्हें अधिक तरजीह नहीं देते, क्योंकि ये फिल्म से पृथक नहीं होते। इनके बारे में चटपटी टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी स्वाभाविकता को व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। दूसरे कथित स्टारडम नहीं होने से इन्हें अपेक्षित लाइमलाइट नहीं मिल पाता। ‘शाहिद’ और ‘द लंचबाक्स’ में श्रेष्ठ अभिनय और प्रदर्शन के बावजूद 2013 की उपलब्धियों में दोनों कलाकारों को शामिल नहीं किया गया। पत्र-पत्रिकाओं में इनके बारे में अलग से नहीं लिखा गया। टीवी चैनलों के पास वक्त नहीं है कि वे इनके प्रयासों को रेखांकित कर सकें। बहुत संभव है कि 2013 की फिल्मों के लिए दिए जाने वाले अवाडर््स में भी इनका नाम न हों। हिंदी फिल्मों में ज्यादातर चमक चलती है। खोटा भी चमकदार है तो वह खरा पर भारी पड़ता है।
    राजकुमार राव और निम्रत कौर अपारंपरिक कलाकार हैं। हिंदी फिल्मों में लाउड और ओवर द वोर्ड अभिनय को ही आम दर्शक नोटिस करते हैं। उसे ही एक्टिंग मान लिया जाता है। देखा गया है कि किरदारों को अंडरप्ले या रियलिस्ट तरीके से पोट्रे करने पर कलाकारों की मेहनत अनदेखी रह जाती है। वे फिल्म के अविभाज्य हिस्से होते हैं।  उनकी फिल्मों की तारीफ करते समय हम उस प्रभाव को नहीं समझ पाते, जो उनके परफारमेंस के कारण होता है। ‘शाहिद’ और ‘द लंचबॉक्स’ के साथ यही हो रहा है। दोनों फिल्मों की तारीफ में भी राजकुमार राव और निम्रत कौर गौण हैं।
    राजकुमार राव ने एफटीआईआई से अभिनय का प्रशिक्षण लिया। हिंदी फिल्मों में प्रशिक्षित अभिनेताओं को अयोग्य ही माना जाता है। पापुलर कलाकारों ने यह भ्रम फैलाया है कि अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सकता, जबकि अभी चल रहे समर्थ अभिनेताओं की पृष्ठभूमि में रंगमंच या प्रशिक्षण रहा है। बहरहाल, राजकुमार ने बहुत पहले तय किया था कि उन्हें फिल्मों में ही आना है। यही वजह है कि दिल्ली के समीप गुडग़ांव से होने के बावजूद उन्होंने कभी एनएसडी में दाखिले की नहीं सोची। वे सीधे एफटीआईआई गए और फिर मुंबई आ गए। दिबाकर बनर्जी की ‘लव सेक्स और धोखा’ उनकी पहली फिल्म थी। ‘शाहिद’ उनकी आखिरी फिल्म है। राजकुमार राव इन दिनों हंसल मेहता के निर्देशिन में ‘सिटी लाइट््स’ की शूटिंग कर रहे हैं। राजस्थान के बैकड्रॉप पर बन रही इस फिल्म के निर्माता मुकेश भट्ट हैं। इसके अलावा सोनम कपूर के साथ वे ‘डॉली की डोली’ और विद्या बालन के साथ ‘मेरी अधूरी कहानी’ भी कर रहे हैं।
    निम्रत कौर ने अभी तक कोई फिल्म साइन नहीं की है। ‘द लंचबॉक्स’ से मिली तारीफ और उम्मीद से कमतर कोई भी फिल्म वह कर नहीं सकतीं। पहली फिल्म चर्चित हो जाने के ये अंतर्निहित खतरे हैं। ‘द लंचबॉक्स’ की चर्चा से यह फर्क जरूर पड़ा है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी पहचान और साख बढ़ गई है। उन्हें प्रस्ताव मिल रहे हैं। कुछ तय भी हो चुके हैं, लेकिन घोषणा बाकी है। निम्रत कौर ने अभिनय की दुनिया में आने के बाद कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। वह सही ब्रेक की प्रतीक्षा मेंथिएटर में खुद को मांजती रहीं । उन्होंने माडलिंग और ऐड फिल्में जरूर कीं और खुद को व्यस्त रखा। फिल्मों में काम पाने की कोशिश में ही निम्रत कौर इंडस्ट्री के तौर-तरीके से परिचित होती गई। बगैर किसी रंजिश और हीन भावना के वह प्रयास करती रहीं। इंतजार और धैर्य काम आया। ‘द लंचबॉक्स’ ने उन्हें बड़ा प्रतिसाद दिया। पिछले दिनों एक बातचीत में उन्होंने बताया कि वह टाइपकास्ट नहीं हो रही हैं। ‘द लंचबॉक्स’ के लगभग साथ आए कैडबरी ऐड से उनकी इमेज एक खांचे में बंधने से बच गई। कुछ लोगों ने इस संयोग को निम्रत कौर की रणनीति माना। मुख्यधारा की ग्लैमरयुक्त फिल्म पत्रकारिता में निम्रत कौर पर भी वाजिव ध्यान नहीं दिया गया है।