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Friday, February 22, 2013

फिल्‍म समीक्षा : काय पो छे

KPC_New POSTER_30x40_hindi.jpg-अजय ब्रह्मात्मज
गुजराती भाषा का 'काय पो छे' एक्सप्रेशन हिंदी इलाकों में प्रचलित 'वो काटा' का मानी रखता है। पतंगबाजी में दूसरे की पतंग काटने पर जोश में निकला यह एक्सप्रेशन जीत की खुशी जाहिर करता है।
'काय पो चे' तीन दोस्तों की कहानी है। तीनों की दोस्ती का यह आलम है कि वे सोई तकदीरों को जगाने और अंबर को झुकाने का जोश रखते हैं। उनकी दोस्ती के जज्बे को स्वानंद किरकिरे के शब्दों ने मुखर कर दिया है। रूठे ख्वाबों को मना लेने का उनका आत्मविश्वास फिल्म के दृश्यों में बार-बार झलकता है। हारी सी बाजी को भी वे अपनी हिम्मत से पलट देते हैं।
तीन दोस्तों की कहानी हिंदी फिल्मों में खूब पसंद की जा रही है। सभी इसका क्रेडिट फरहान अख्तर की फिल्म 'दिल चाहता है' को देते हैं। थोड़ा पीछे चलें तो 1981 की 'चश्मेबद्दूर' में भी तीन दोस्त मिलते हैं। सिद्धार्थ, ओमी और जय। 'काय पो चे' में भी एक ओमी है। हिंदी फिल्मों में रेफरेंस पाइंट खोजने निकलें तो आज की हर फिल्म के सूत्र किसी पुरानी फिल्म में मिल जाएंगे। बहरहाल, 'काय पो छे' चेतन भगत के बेस्ट सेलर 'द 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ' पर आधारित है। साहित्यप्रेमी जानते हैं कि तमाम लोकप्रियता के बावजूद चेतन भगत के उपन्यासों को साहित्यिक महत्व का नहीं माना जाता। यह भी अध्ययन का विषय हो सकता है कि साधारण साहित्यिक और लोकप्रिय कृतियों पर रोचक, मनोरंजक और सार्थक फिल्में बनती रही हैं। गुलशन नंदा से लेकर चेतन भगत तक के उदाहरण साक्षात हैं। खोजने पर और भी मिल जाएंगे। ऐसी बेहतर फिल्मों पर लिखते समय यह खतरा रहता है कि कहीं साहित्य के फिल्म रुपांतरण का तिलिस्म न टूट जाए।
ईशान (सुशांत सिंह राजपूत), ओमी (अमित साध) और गोविंद (राज कुमार यादव) गहरे दोस्त हैं। एक-दूसरे के साथ समय बिताने और सपने देखते तीनों युवकों का समाज पारंपरिक और गैरउद्यमी है। इस समाज में पढ़ाई के बाद कुछ कर लेने का मतलब सिर्फ आजीविका के बेसिक साधन जुटा लेना होता है। तीनों देश में आए आर्थिक उदारीकरण के बाद के युवक हैं। उनके पास उद्यमी बनने के सपने हैं और वे खुद भी मेहनती और समझदार हैं। तीनों के साझा सपनों की पतंग का मांझा परिस्थितियों के कारण उलझता है। विवश और लाचार होने के बाद भी उनके जज्बे और जोश में कमी नहीं आती। उनके मतभेद और मनमुटाव क्षणिक हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उनकी दोस्ती का धागा नहीं टूटता। तीनों मिलकर बिट्टू मामा की मदद से खेल के सामानों की दुकान खोलते हैं। ईशान क्रिकेटर है। वह क्रिकेट की कोचिंग भी देता है। उसकी नजर (दिग्विजय देशमुख) गोटीबाज अली हाशमी पर पड़ती है। अली को निखारने की कोशिश में वह उसके परिवार के करीब आता है। साथ काम करते हुए तीनों दोस्तों की प्राथमिकताएं बदलती हैं। राजनीति का भगवा उभार रेंगता हुआ उनकी दोस्ती में घुसता है। यहां हम देखते हैं कि गुजरात के गोधरा कांड की सतह के नीचे कैसी सच्चाइयां तैर रही थीं। भूकंप से कैसे सपनों में दरार पड़े और गोधरा कांड ने कैसे मानवता पर धर्माधों को हावी होने दिया।
इस फिल्म का अघोषित नायक अली हाशमी है। वह इन युवकों की संगत में पल्लवित होता है। वह खुद के लिए उनकी संजीदगी देखता है। लगन और प्रतिभा से वह देश की नेशनल क्रिकेट टीम में शामिल होता है। उसकी उपलब्धियों के सफर में तीनों दोस्तों का जोश भी है। अली हाशमी के बहाने हम सेक्युलर हिंदुस्तान को करीब से देखते हैं, जहां बंटवारे की भगवा कोशिशों के बावजूद कैसे एकजुटता से समान सपने साकार होते हैं। लेखक-निर्देशक ने अली हाशमी पर अधिक जोर नहीं दिया है। उन्हें तो तीनों युवकों की कहानी पेश करनी थी।
निस्संदेह अनय गोस्वामी के फिल्मांकन, हितेश सोनिक के पा‌र्श्व संगीत, दीपा भाटिया के संपादन के सहयोग से अभिषेक कपूर ने 'काय पो चे' जैसी उत्कृष्ट और मनोरंजक फिल्म पेश की है। स्वानंद किरकिरे के गीत और अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की अंतर्धारा है। 'काय पो चे' गुजरात की पृष्ठभूमि में एक खास समय की ईमानदार कथा है, जब प्राकृतिक और राजनीतिक रूप से सब कुछ तहस-नहस हो रहा था। फिल्म का परिवेश और उसका फिल्मांकन स्वाभाविक है। कुछ भी लार्जर दैन लाइफ दिखाने या रचने की कोशिश नहीं की गई है।
मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग और अभिषेक कपूर का निर्देशन उल्लेखनीय है। सभी किरदारों में उपयुक्त कलाकार चुने गए हैं। मुख्य कलाकारों के रूप में सुशांत सिंह राजपूत, अमित साध, राज कुमार यादव, अमृता पुरी और मानव कौल अपनी भूमिकाओं में रचे-बसे नजर आते हैं। सभी कलाकारों की अपनी विशेषताएं हैं, जो उनके चरित्र को प्रभावशाली और विश्वसनीय बनाती हैं। पहली फिल्म होने के बावजूद सुशांत सिंह राजपूत की सहजता आकर्षित करती है। अमित साध में एक ठहराव है। वे दृश्यों में रमते हैं और टिके रहते हैं। राज कुमार यादव ज्यादा सधे अभिनेता हैं। वे किरदार के सभी भावों को दृश्यों की मांग के मुताबिक व्यक्त करते हैं। प्रेम दृश्यों और गरबा डांस में उनकी घबराहट की भिन्नता देखते ही बनती है। दोस्तों से उनकी झल्लाहट और इरादों के प्रति उत्कट अभिलाषा का मूक प्रदर्शन भी उल्लेखनीय है। मानव कौल ने अभिनय कौशल से दिखाया है कि दुष्ट और खल चरित्र के लिए किसी प्रकार के मैनरिज्म या दिखावे की आवश्यकता नहीं है।
'काय पो छे' 2013 में आई उत्कृष्ट फिल्म है। यह मनोरंजक होने के साथ प्रेरक है। देश में करवट ले रही सदी के समय की प्रादेशिक सच्चाई होकर भी यह देश की युवाकांक्षा जाहिर करती है।
-चार स्टार

Friday, November 30, 2012

फिल्‍म समीक्षा : तलाश

Talash movie  review-अजय ब्रह्मात्‍मज
लगभग तीन सालों के बाद बड़े पर्दे पर लौटे आमिर खान 'तलाश' से अपने दर्शकों और प्रशंसकों को नए ढंग से रिझाते हैं। 'तलाश' है हिंदी सिनेमा ही, लेकिन रीमा कागती और आमिर खान ने उसे अपडेट कर दिया है। सस्पेंस के घिसे-पिटे फार्मेट को छोड़ दिया है और बड़े ही चुस्त तरीके से नए तत्व जोड़ दिए हैं। छल, प्रपंच, हत्या, दुर्घटना और बदले की यह कहानी अपने अंतस में इमोशनल और सोशल है। रीमा कागती और जोया अख्तर ने संबंधों के चार गुच्छों को जोड़कर फिल्म का सस्पेंस रचा है।
'तलाश' मुंबई की कहानी है। शाम होने के साथ मुंबई की जिंदगी करवट लेती है। रीमा कागती ने अपने कैमरामैन मोहनन की मदद से बगैर शब्दों में रात की बांहों में अंगड़ाई लेती मुंबई को दिखाया है। आरंभ का विजुअल कोलाज परिवेश तैयार कर देता है। फिल्म एक दुर्घटना से शुरू होती है। मशहूर फिल्म स्टार ओंकार कपूर की गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है। उनकी कार सीफेस रोड से सीधे समुद्र में चली गई है। मुंबई पुलिस के अन्वेषण अधिकारी सुर्जन सिंह शेखावत (आमिर खान) की तहकीकात आरंभ होती है। फिल्मसिटी से दुर्घटना स्थल के बीच में एक घंटे तक ओंकार कपूर कहां रहे? इसी तलाश में दुर्घटना का राज और आगे का रहस्य छुपा है।
हर नया सुराग सुर्जन की फिर से अंधेरे में डाल देता है। निजी व्यथा और मानसिक ग्रंथि से जूझ रहा पुलिस अधिकारी हाथ में लिए मामले की गुत्थी नहीं सुलझ पा रहा है। रेड लाइट एरिया की रोजी उनकी तकहकीकात में मदद करती है। लगता है कि हम जल्दी ही वजह जान जाएंगे, लेकिन फिर से रहस्य फिसल जाता है। कहानी नई गली में मुड़ जाती है। रीमा कागती और जोया अख्तर ने 'तलाश' की मुख्य थीम के साथ चार कहानियों को जोड़ा है। इन चारों कहानियों के किरदारों और उनके परस्पर संबंधों का कहानी से जुड़ाव है। सुर्जन-रोशनी, सुर्जन-रोजी, तेहमूर की ख्वाहिशें, शशि की ब्लेकमेलिंग, पुलिस अधिकारी की जिंदगी और जिम्मेदारी, वेश्या की हशिए की दशा ़ ़ ़ इन सभी के मिश्रण से कहानी गाढ़ी और रोचक होती है। ऊपर से सस्पेंस तो है ही। लेखक-निर्देशक की खूबी है कि वे अंत तक सस्पेंस बनाए रखने में कामयाब होते हैं।
सिनेमा सस्पेंडेड रियलिटी का माध्यम है। काल्पनिक किरदारों पर यकीन करें तो कुछ कहानियों में अधिक आनंद आता है। स्पाइडरमैन, सुपरमैन, साइंस फिक्शन, हॉरर, भूत-प्रेत आदि से रची फिल्मों में घटनाओं और प्रसंगों का तार्किक आधार नहीं होता। एक फंतासी होती है, जो सिनेमाघरों के अंधेरे में दर्शकों को फिल्म की अवधि तक दर्शकों को यथार्थ में निर्लबित कर देती है। 'तलाश' का सस्पेंस इसी निलंबन पर टिका है। हिंदी फिल्मों में सस्पेंस और मर्डर मिस्ट्री के पारंपरिक निर्वाह के आदी दर्शकों को 'तलाश' की नवीनता चौंकाएगी। गौर करें कि यहां ऐसी दुर्घटना का रहस्य सुलझाना है, जो हत्या या हादसा हो सकती है।
आमिर खान ने सुर्जन की भूमिका पूरी संजीदगी के साथ निभाई है। मनोव्यथा और मनोदशा को व्यक्त करने में वे कुशल हैं। भावनाओं के आवेश में वे फफक पड़ते हैं। कठोर पुलिस अधिकारी की भावात्मक संवेदना छूती है। रानी मुखर्जी ने पत्‍‌नी रोशनी की भूमिका में सादगी बरती है। पॉजीटिव सोच की रोशनी अतीत को भींचकर भी वर्तमान में रहना चाहती है। करीना कपूर ने रोजी से मिलता-जुलता किरदार 'चमेली' में निभाया था। यहां वह उसे नया विस्तार देती हैं। 'तलाश' नवाजुद्दीन सिद्दिकी और राज कुमार यादव के दमदार किरदारों और अभिनय से संपन्न हुई है। दोनों उम्दा अभिनेता हैं। उन्हें पूरा अवसर मिला है। शशि की भूमिका निभा रहे कलाकार का अभिनय भी भावपूर्ण है। फिल्म के सहयोगी कलाकारों का चुनाव परिवेश और कहानी के अनुकूल है।
'तलाश' मोहनन के छायांकन और राम संपत के संगीत से सजी है। कुछ समय के बाद जावेद अख्तर के गीतों में नए भाव और पद सुनाई पड़े हैं। उन्हें राम संपत ने जावेद अख्तर के शब्दों को मधुर धुनों में पिरोया है। 'तलाश' के गीत आयटम सौंग या म्यूजिक की तरह नहीं हैं। इस फिल्म के कुछ संवादों का कटाक्ष समाज और सिस्टम की पोल खोल देता है। रोजी से सुर्जन सिंह कहता है, 'कानून सभी के लिए बराबर होता है।' रोजी हंस देती है और कहती है, 'आप बहुत हंसाते हो साहब।' या फिर अपने धंधे को गैरकानूनी बताते हुए जब रोजी कहती है कि हम तो किसी गिनती में नहीं आते, फिर कोई हमारी चिंता क्यों करे?
-अजय ब्रह्मात्मज
 *** 1/2 साढ़े तीन स्टार
अवधि - 140 मिनट