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Sunday, January 10, 2016

बाजी मेरे हाथ - रणवीर सिंह




-अजय ब्रह्मात्‍मज
      रणवीर सिंह की बाजीराव मस्‍तानी 100 करोड़ी क्‍लब में जा चुकी है। उससे भी बड़ी उपलब्धि है कि सभी उनकी भूमिका और अभिनय की तारीफ कर रहे हैं। बहुत कम ऐसा होता है,जब किरदार और कलाकार दोनों ही दर्शकों को पसंद आ जाएं। दरअसल,लोकप्रियता की यह द्वंद्वात्‍मक प्रक्रिया है। इस फिल्‍म की सफलता और सराहना से रणवीर सिंह अपनी पीढ़ी के संभावनाशील अभिनेता के तौर पर उभरे हैं। इस पहचान ने उनकी एनर्जी को नया आयाम दे दिया है। उनकी अगली फिल्‍म आदित्‍य चोपड़ा के निर्देशन में आ रही बेफिकरे है।
    फिलहाल वे लंबी छ़ुट्टी पर निकल चुके हैं। इस छ़ुट्टी में ही वे बेफिकरे के लुक और परिधान की तैयारी करेंगे। बाजीराव के किरदार से बाहर निकलने के लिए भी जरूरी है कि वे थोड़ा आराम करें। अपने अंदर से उसे उलीचें और फिर नए किरदार को आत्‍मसात करें। वे उत्‍साहित हैं कि उन्‍हें आदित्‍य चोपड़ा के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। कम लोग जानते हैं कि आदित्‍य चोपड़ा उनके खास मेंटोर है। उनके करिअर के अहम फैसले भी वाईआरएफ(यशराज फिल्‍म्‍स) टैलेंट टीम की सलाह से लिए जाते हैं। बैंड बाजा बारात की रिलीज के बाद के पांच सालों में ही रणवीर सिंह ने पूरी संभावना जाहिर की है। अब यह उनके निर्देशकों पर निर्भर करता है कि वे उन्‍हें किन रूपों में ढालते हैं।
    बाजीराव मस्‍तानी में रणवीर सिंह ने रिलीज के पहले उम्‍मीद से अधिक आशंका ही जगाई थी। अपने खिलंदड़े अंदाज और इवेंट में बहुरुपिया मौजूदगी से उन्‍होंने दर्शकों को भ्रमित कर रखा था। यह तो तय था कि बाजीराव के रूप में संजय लीला भंसाली ने उनके साने चुनौतीपूर्ण दृश्‍य रखे होंगे और साथ ही अंकुश भी लगा रखा होगा। ऐसे हालात में निर्देशक और अभिनेता में संगति न बैठे तो गुड़ के गोबर होने में देर नहीं लगती। खुशी की बात है कि रणवीर सिं‍ह ने अपने परफारमेंस से बाजीराव में जान फूंक दी। उन्‍होंने इस किरदार के लिए आवश्‍यक सभी मनोभावों के उद्रेक के लिए यथायोग मेहनत की। 21 वीं सदी की दूसरी महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक फिल्‍म बाजीराव मस्‍तानी से उन्‍होंने अपने प्रशंसकों को खुश और आलोचकों को संतुष्‍ट किया।
    बाजीराव मस्‍तानी की कामयाबी से इतरा रहे रणवीर सिंह फिल्‍म के प्रति आश्‍वस्ति के चरण बताते हैं,पहले फैमिली और फ्रेड्स की तारीफ मिली। लगा कि ये तो करते ही हैं। फिर इंडस्‍ट्री के सीनियर्स ने तारीफ की तो थोड़ा भरोसा हुआ कि उन्‍हें मेरा काम पसंद आया। फिर भी लगा कि फिल्‍म बिरादरी के सीनियर्स तो औपचारिकतावश आलोचना नहीं करते। उसके बाद समीक्षकों की राय मिली। कमोबेश सभी ने तारीफ की तो आत्‍मविश्‍वास बढ़ा। हमारी तरह दर्शकों के बीच भी आशंका रही होगी। तभी तो पहले दिन कलेक्‍शन नहीं आया,लेकिन अगले दिन से वर्ड ऑफ माउथ का असर दिखा। यह फिल्‍म बॉक्‍स आफिस पर कुलांचें भरती रही । दूसरे हफ्ते में भी फिल्‍म स्‍ट्रांग रही। हर कोने से तारीफ मिली। आखिरकार हमारी मेहनत रंग लाई। कह सकता हूं कि बाजीराव मस्‍तानी को दर्शकों ने हिट किया है।
      हर फिल्‍म में कलाकार के लिए कुछ सीन इमोशनली तो कुछ फिजीकली भारी और मुश्किल होते हैं। बाजीराव मस्‍तानी में रणवीर सिंह को क्‍लाइमेक्‍स में ऐसी मुश्किल आई। वे बताते हैं, क्‍लाइमेक्‍स ने मुझे पागल कर दिया था। फिल्‍म की शुरुआत से ही हर दिन शाम में संजय सर से उस सीन पर चर्चा होती थी। एक साल तक उस सीन ने मुझे बेचैन रखा। मैं थिएटर के गुरु से मिलने गया। शूटिंग के दिन सुबह तक मुझे नहीं मालूम था कि मेरा अप्रोच क्‍या होगा ? क्‍लाइमेक्‍स के 11 दिनों की शूटिंग में हर दिन बेचैनी और परेशानी का रहा। बरहवें दिन की सुबह निढाल होकर मैं बेहोश हो गया था। कैमरा असिस्‍टैंट के कंधे पर सिर रखते ही मैं लड़खड़ा गया और बेसुध होकर गिर गया। खुशी की बात है कि सभी ने क्‍लाइमेक्‍स की तारीफ की। जब लोग किसी विशेष सीन की विस्‍तार में चर्चा करें तो मान लेना चाहिए कि उस सीन ने उनके दिलों को छू लिया है।
    हर बेहतरीन फिल्‍म दर्शकों के साथ कलाकारों को भी प्रभावित करती है। बाजीराव मस्‍तानी ने रणवीर सिंह को क्‍या सिखाया? रणवीर बताते हैं, जिंदगी में दिल के रिश्‍तों की अहमियत होनी चाहिए। दिल के रिश्‍तों के बारे में समाज कैसे बता सकता है कि क्‍या सही है और क्‍या गलत? बाजीराव ने राज और समाज छोड़ दिया और मस्‍तानी के साथ गया। इस फिल्‍म में मेरा एक संवाद है....दुश्‍मनों की छाती में तलवार पिरोना आसान है,पर रिश्‍तों की मोतियों में धागा पिरोना बहुत ही मुश्किल है।
    रणवीर सिंह को उम्‍मीद है कि 2016 उनके लिए 2015 से अधिक फलकारी होगा। इस साल वे नई ऊंचाइयां हासिल करेंगे।
   

Friday, December 18, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बाजीराव मस्‍तानी




-अजय ब्रह्मात्‍मज
कल्‍पना और साक्ष्‍य का भव्‍य संयोग

      यह कहानी उस समय की है,जब मराठा साम्राज्‍य का ध्‍वज छत्रपति साहूजी महाराज के हाथों में लहरा रहा था और जिनके पेशवा थे बाजीराव वल्हाड़। तलवार में बिजली सी हरकत और इरादों में हिमालय की अटलता,चितपावन कुल के ब्राह्मनों का तेज और आंखों में एक ही सपना... दिल्‍ली के तख्‍त पर लहराता हुआ मराठाओं का ध्‍वज। कुशल नेतृत्‍व,बेजोड़ राजनीति और अकल्‍पनीय युद्ध कौशल से दस सालों में बाजीराव ने आधे हिंदुस्‍तान पर अपना कब्‍जा जमा लिया। दक्षिण में निजाम से लेकर दिल्‍ली के मुगल दरबार तक उसकी बहादुरी के चर्चे होने लगे।
       इस राजनीतिक पृष्‍ठभूमि में रची गई संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक प्रेमकहानी है बाजीराव मस्‍तानी। बहादुर बाजीराव और उतनी ही बहादुर मस्‍तानी की यह प्रेमकहानी छोटी सी है। अपराजेय मराठा योद्धा बाजीराव और  बुंदेलखंड की बहादुर राजकुमारी मस्‍तानी के बीच इश्‍क हो जाता है। बाजीराव अपनी कटार मस्‍तानी को भेंट करता है। बुंदेलखंड की परंपरा में कटार देने का मतलब शादी करना होता है। मस्‍तानी पुणे के लिए रवाना होती है ताकि बाजीराव के साथ रह सके। यहां बाजीराव बचपन की दोस्‍त काशीबाई के साथ शादी कर चुके हैं। मस्‍तानी के आगमन पर बाजीराव की मां नाखुश होती है। वह मस्‍तानी का तिरस्‍कार और अपमान करती हैं। बड़ी वजह उसका मुसलमान होना है। थोड़े समय के असमंजस के बाद बाजीराव तय करता है कि वह मस्‍तानी को अपना लेगा। रिश्‍तों के इस दास्‍तान में ही तब का हिंदुस्‍तान भी नजर आता है। उस समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों पर भी टिप्‍पणियां होती हैं।
    संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्‍तानी में कथात्‍मक तत्‍व कम हैं। ज्‍यादा पेंच और घटनाएं नहीं हैं। इस फिल्‍म में विपुल दृश्‍यात्‍मक सौंदर्य है। ऐसे विजुअल हिंदी फिल्‍मों में कम दिखाई पड़ते हैं। भंसाली ने  सभी दृश्‍यों को काल्‍पनिक विस्‍तार दिया है। वे उन्‍हें भव्‍य और विशद रूप में पेश करते हैं। वाड़ा,महल,युद्ध के मैदान के चित्रण में में गहन बारीकी दिखाई पड़ती है। संजय और उनके तकनीकी सहयोगी बाजीराव के समय की वास्‍तु कला,युद्ध कला,वेशभूषा,सामाजिक आचरण और व्‍यवहार,राजनीतिक और पारिवारिक मर्यादाओं का कहानी में समावेश करते हैं। उनके चित्रांकन के लिए आवश्‍यक भव्‍यता से वे नहीं हिचकते। अपनी खास शैली के साथ इस फिल्‍म में भी भंसाली मौजूद हैं। उस काल को दिखाने में उन्‍होंने ऐतिहासिक साक्ष्‍यों के साथ कल्‍पना का योग किया है। वे एक अप्रतिम संसार रचते हैं,जिसमें गतिविधियों का विस्‍तार करते हैं। वे उनके फिल्‍मांकन में ठहरते हें। राजसी कारोबार,पारिवारिक अनुष्‍ठान और युद्ध के मैदान में भंसाली स्‍वयं विचरते हैं और दर्शकों को अभिभूत करते हैं।
    भंसाली ने बाजीराव,मस्‍तानी और काशीबाई के किरदार को गढ़ा है। साथ ही बाजीराव की मां,चीमा और नाना जैसे किरदारों से इस छोटी कहानी में नाटकीयता बढ़ाई है। देखें तो सभी राज और पेशवा परिवारों में वर्चस्‍व के लिए एक तरह की साजिशें रची गई हैं। बाजीराव खुद के बारे में कहता है...चीते की चाल,बाज की नजर और बाजीराव की तलवार पर संदेह नहीं करते,कभी भी मात दे सकती है। हम फिल्‍म में स्‍फूर्तिवान बाजीराव को पूरी चपलता में देखते हैं। मस्‍तानी की आरंभिक वीरता पुणे आने के बाद पारिवारिक घात का शिकार होती है। उसकी आंखें पथरा जाती हैं। यों लगता है कि उसके सपने उन आंखों में जम गए हैं। किसी बाघिन को पिंजड़े में डाल दिया गया हो। बाजीराव से बेइंतहा मोहब्‍बत करने के साथ वह मर्यादाओं का खयाल रखने में वह संकुचित हो जाती है। काशीबाई के साथ स्थितियों ने प्रहसन किया है। फिर भी वह कठोर दिन होकर भी नारी के सम्‍मान और पति के अभिमान में कसर नहीं आने देती। संजय लीला भंसाली ने तीनों किरदारों को पर्याप्‍त गरिमा और परिप्रेक्ष्‍य दिया है। इनमें कोई भी भावनात्‍मक छल में नहीं शामिल है।
     बाजीराव मस्‍तानी के मुख्‍य कलाकार प्रियंका चोपड़ा,दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने अपने किरदारों को आवश्‍यक गहराई और गंभीरता दी है। रणवीर तो अपने नाम के अनुरूप ही कुशल योद्धा दिखते हैं। युद्ध के मैदान में उनकी स्‍फूर्ति घुड़सवारी,तलवारबाजी और आक्रामकता में स्‍पष्‍ट नजर आती है। सेनापति के रूप में वे योद्धाओं को ललकारने में सक्षम हैं। रणवीर सिंह ने युद्ध के मैदान से लेकर भावनात्‍मक उथल-पुथल के घमासान तक में बाजीराव के गर्व और द्वंद्व को अपेक्षित भाव दिए हैं। दीपिका पादुकोण इस दौर की सक्षम अथनेत्री के तौर पर निखरती जा रही हैं। उन्‍होंने योद्धा के कौशल और माशूका की कसक को खूबसूरती के साथ पेश किया है। बच्‍चे को कंधे पर लेकर युद्ध करती मस्‍तानी किसी बाघिन की तरह लगती है। प्रियंका चोपड़ा के किरदार काशीबाई के लिए अधिक स्‍पेस नहीं था। अपनी सीमित उपस्थिति में ही प्रियंका चोपड़ा पभावित करती हैं। इस किरदार को लेखक-निर्देशक का सपोर्ट भी मिला है। वास्‍तन में काशीबाई का किरदार ही बाजीराव और मस्‍तानी की प्रेमकहानी का पेंच है।
      संजय लीला भंसाली ने 21 वीं सदी का दूसरी ऐतिहासिक फिल्‍म प्रस्‍तुत की है। इसके पहले हम आशुतोष गोवाकरकर की जोधा अकबर देख चुके हैं। आशुतोष की तरह भंसाली ने भी अपने समय के सामाजिक,वैचारिक और धार्मिक मुद्दों को स्‍पर्श किया है। बाजीराव और मस्‍तानी के प्रेम की बड़ी अड़चन दोनों के अलग धर्म का होना है। संवादों और प्रसंगों के माध्‍यम से भंसाली ने बाजीराव के माध्‍यम से अपना पक्ष रखा है। खास कर मराठा राजनीति में इस ऐतिहासिक प्रसंग पर ध्‍यान देना चाहिए।
     बाजीराव मस्‍तानी के प्रोडक्‍शन पर अलग से लिखा जा सकता है। संजय लीला भंसाली की टीम ने उस दौर को राजसी भव्‍यता और विशालता दी है। उन्‍होंने संगीत,सेट,पार्श्‍व संगीत,दृश्‍य संयोजन,युद्ध की कोरियोग्राफी में अपनी कुशलता जाहिर की है। फिल्‍म के वे हिस्‍से मनोरम और उल्‍लेखनीय है,जब पार्श्‍व संगीत पर गतिविधियां चल रही हैं। बिंगल,दुदुंभि,ढोल और नगाड़ों की ध्‍वनि जोश का संचार करती है। बगैर कहे ही सब उद्घाटित होता है।
     फिल्‍म के क्‍लाइमेक्‍स से थोड़ी निराशा होती है। संभ्रम की स्थिति में आए बाजीराव के ये दृश्‍य लंबे हो गए हैं। हां, एक और बात उल्‍लेखनीय है कि फिल्‍म के अधिकांश कार्य व्‍यापार सूर्यास्‍त और सूर्योदय के बीच ही होते हें। गोधूलि वेला का फिल्‍म में अत्‍यधिक अस्‍तेमाल हुआ है। इसलिए फिल्‍म का रंग भी धूसर रखा गया है।
अवधि-158 मिनट
स्‍टार- चार स्‍टार
       

Wednesday, December 9, 2015

अलग है मेरा तरीका -रणवीर सिंह


-अजय ब्रह्मात्मज
अभिनेता रणवीर सिंह की अदाकारी में लगातार निखार आ रहा है। संजय लीला भंसाली के संग वे साल की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ लेकर आ रहे हैं।

- क्या बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है?
जी हां, बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं। वह बार-बार ऐसा कहता रहता है, क्योंकि कई लोग ऐसे हैं, जो उनकी मुहब्बत के खिलाफ हैं। लिहाजा वह चाहता है कि लोग उनके रिश्ते को समझें व उसका सम्मान करें।
-संजय लीला भंसाली के व इतिहास के बाजीराव में कितना अंतर है? या फिर दोनों को एक जैसा ही रखा गया है?
एक किताब है ‘पेशवा घराण्याचां इतिहास’। उसमें दर्ज कहानी को संजय सर ने खूबसूरती से दर्शाया है। फिल्म उस किताब पर आधारित है। बाजीराव और मस्तानी के बारे में जो व्याख्या वहां की गई है, उसे ही फिक्शन की शक्ल दी गई है। वे यह नहीं कह रहे हैैं कि दोनों के रिश्तों की कशमकश असल में भी वैसी ही रही होगी, जैसा फिल्म में है।
-बाजीराव आपके लिए क्या हैैं?
मैैंने स्कूल में केवल शिवाजी महाराज के इतिहास के बारे में पढ़ा था। पेशवा बाजीराव के बारे में पूर्ण विवरण नहीं दिया गया था। उनके बारे में ज्यादा पढ़ाया नहीं गया था। स्कूल में केवल शिवाजी महाराज पर ही फोकस किया गया था। वह भी पूर्ण जानकारी। अफजल खान और शिवाजी महाराज की कहानी को सबको याद करनी पड़ती थी। परीक्षा में अफजल खान के बारे में पूछा जाना को तय था। मैैंने कभी पेशवा बाजीराव का नाम नहीं सुना था। वैसे तो मैैं हिंदी फिल्मों का कीड़ा हूं। संजय सर का मैैं बचपन से प्रशंसक रहा हूं। उस वक्त सुनने में आया था कि भंसाली सर बाजीराव मस्तानी फिल्म बड़े पैमाने पर बनाना चाह रहे हैैं। तब मैैंने इसके बारे में सुना था। उसके बाद उन्होंने गुंडे के समय मुझे इस फिल्म का प्रस्ताव दिया था। उस वक्त भी मुझे बाजीराव के बारे में ज्यादा नहीं पता था। मैैंने केवल विकिपीडिया पर मिली जानकारी ही पड़ी थी। जब नैरेशन सुना, तब पता चला कि यह सच में एक महान व्यक्ति थे। उसके साथ-साथ वे एक समर्पित पति, एक बेटा, एक पिता, एक योद्धा  और एक लीडर थे। उन्होंने अपने जीवन में कई सारे किरदार निभाए। वक्त से पहले उनका देहांत भी हो गया था। उस समय उन्होंने चालीस से अधिक लड़ाई लड़ी थी। उन सभी में उनकी जीत हुई। उन्होंने काफी कुछ पा लिया था। निर्देशन टीम ने बाजीराव के लिए एक रिसर्च मटेरियल तैयार किया था। वह मुझे दिया गया था। मैं उसका अभ्यास करता था। तीन हफ्तों के लिए मैैं एक होटल के कमरे में बंद था। मैैंने उस दौरान ढेर सारी मराठी फिल्में देखीं। एक मराठी कोच आते थे। हम एक साथ काफी घंटे बिताते थे। टे्रनर आते थे। मेरे शरीर को योद्धा की तरह बनाने के लिए टे्रनिंग दी जाती थी। मैैं सुबह से लेकर देर रात तक सिर्फ इस किरदार की तैयारी की। नैरेशन सुनने पर मुझे लगा कि यह अलग किरदार निभाने का अनोखा मौका है। हर स्तर पर नई आवाज, चाल -ढाल का नया रंग। बाजीराव की सारी आदतें, उनकी आवाज पर बारीकी से काम किया। भंसाली सर का काम करने का यही तरीका है। वे बतौर क्रिएटिव होने के नाते एक्टर को अपनी टीम में ले आते हैैं। वे अपने एक्टर के साथ सारी टीम को चुनौती भी देते हैं। वे बड़े निराले किस्म के निर्देशक हैैं। मेरे लिए तो अच्छा काम मिस्टर भंसाली के साथ ही होता है। वे मुझे उडऩे के लिए पंख दे देते हैैं। वे मुझे दिल से काम करने की सलाह देते हैैं।

-पंख के साथ कोई मंजिल भी दिखाते हैैं?
जी हां। देते हैैं। वे रोज चुनौती देते हैैं, लेकिन बोल कर नहीं। उनके रूतबे से ही पता चल जाता है कि वे आज हमसे क्या उम्मीद करते हैैं। वे सीन को पूरा रम कर फिल्माने की कोशिश करेंगे। वे हर बारीकी पर काम कर देते हैैं। एक बार सीन पूरा हो जाए तो मॉनिटर के पीछे चना खाते हुए एक्टिंग देखेंगे। तब एक्टर को अपने एक्टिंग से उन्हें व्यस्त रखना जरूरी है। वे उस समय एक्टर को देखते हैैं। महसूस करते हैैं। वे स्क्रीन पर केवल एक्टर की आंखे देखते हैैं। वे आंख में सच्चाई खोजते हैैं। जिसमें उन तक वह बात जानी चाहिए। साथ ही उनके अंदर सीन को देखकर भावना निकलकर आनी चाहिए। दिल को बात छू जानी चाहिए।

-भंसाली पारदर्शक हैैं या कुछ और?
हां वे पारदर्शक हैैं। अच्छा करने पर एक्टर को दुनिया का किंग बना देंगे। नतीजतन एक्टर अधिक प्रेरित हो जाता है। वहीं काम पसंद न आने पर वे तो भी बोल देंगे। हमें तब पता चल जाता है कि उन्हें काम नहीं भा रहा है यानि कुछ गलती हो रही है। उन्हें एक गिफ्ट मिला है। वे बारीकी से काम करते भी हैैं और करवाते भी हैैंं। उन्होंने एक दिन सर खुजाते हुए मुझे और प्रियंका को कहा, जम नहीं रहा है। आप लोग आपस में विचार करके कुछ तो करो। फिर कई बार ऐसा हुआ है कि वे मॉनिटर से भावुक होकर निकलते हैैं। मैैं सीन करता रहता हूं वे शॉट कट ही नहीं करते थे। मैैं पूछता क्या हुआ। जवाब मिलता कि मैैं भावुकता के कारण कट ही नहीं बोल पाया। भूल गया। वे सीन में घुस जाते हैैं। हमारे साथ सीन में समा जाते हैैं। एक बात है कि वे अलग किस्म के निर्देशक हैैं। ‘गोलियों की रासलीला-राम लीला’ के बाद यह उनकी सबसे बड़ी फिल्म है। मुझे फख्र है कि मैैं इस फिल्म का हिस्सा हूं। उन्होंने मुझे अपना सबसे पसंदीदा किरदार दिया। उसके लिए मेरा चुनाव किया।

-आप ने कहा कि बाजीराव पति भी है पिता भी। योद्धा भी है लीडर भी। फिल्म के अंदर कौन सा रूप ज्यादा है?
यह फिल्म बाजीराव की प्रेम कहानी दर्शाती है। इसके बावजूद फिल्म में हर पहलू दिखेगा। हर रूप देखने को मिलेगा। जैसा कि मैैंने पहले कहा। बहुत ही खूबसूरती से हर ढंग दिखेगा।

-आप बाजीराव से किस स्तर पर जुड़ाव महसूस करते हैैं?
वे निडर थे। उन्हें जो सही लगता था वे वही करते थे। वे किसी की परवाह नहीं करते थे। वे किसी चीज में विश्वास करते हैैं तो उसके लिए आखरी सांस तक लड़ते थे। वे सही का साथ हमेशा देते थे। उनकी जिंदगी का मकसद मराठा साम्राज्य को बढ़ाना था। वे उसके लिए जज्बे के साथ काम करते रहे। मैैं उनकी इसी खूबी से संबंध महसूस करता हूं। मुझे भी एक परिचित कलाकार बनना है। मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य है। इस वजह से मैैं अपने काम को पूरे जज्बे के साथ करता हूं। मेरा मानना है कि हम जो करना चाहते हैैं उसमें जी जान लगा देनी चाहिए।
-दो बेहतरीन अभिनेत्रियों के साथ काम करके कोई जटिलता महसूस होती है?
नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैैं किसी भी चीज से दबाव महसूस नहीं करता हूं। मुझमें आत्मविश्वास है। मेरे ख्याल से एक्टिंग में कोई सही गलत नहीं होता है। कोई स्पर्धा भी नहीं है। मैैं तो यह चाहता हूं कि इस फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति का काम मिलाकर बाजीराव मस्तानी यादगार फिल्म बनें। मेरा किरदार अलग है। मेरा काम करने का तरीका अलग है। मुझे ऐसा कुछ महसूस नहीं होता। हां कई बार अपने सह कलाकारों के एक्ट से अचरज में पड़ जाता हूं। एक बार शॉट में दीपिका ने एक संवाद ऐसे बोला कि मैैं अपनी लाइन भूल गया। मैैं उनसे उम्मीद नहीं की थी। मैैं तो खो गया। मैैं तो मानता हूं कि दमदार एक्टरों के साथ काम करके मेरा काम भी दमदार हो जाता है। कमजोर एक्टर के साथ काम कमजोर हो जाता है।

Monday, May 18, 2015

काम अनूठे ही करता हूं - रणवीर सिंह


-अजय ब्रह्मात्मज
    रणवीर सिंह अभी विश्राम कर रहे हैं। ‘बाजीराव मस्तानी’ की शूटिंग के समय अपने घोड़े आर्यन से गिर जाने के कारण उनके कंधे का एक लिगमेंट फट गया था। दो हफ्ते पहले उसकी सर्जरी हुई। रणवीर ने ऑपरेशन बेड से अपनी सेल्फी शेयर की तो कुछ ने इसे उनके हौसले से जोड़ा तो कुछ ने इसे उनकी पर्सनैलिटी से जोड़ कर दिखावे की बात की। रणवीर बताते हैं,‘क्या हुआ कि ऑपरेशन बेड पर एनेस्थीसिया की तैयारी चल रही थी तभी कोई सेल्फी की मांग करने लगा। मैंने उसे अपनी स्थिति का हवाला देकर तत्काल मना कर दिया। बाद में मैंने सोचा कि सेल्फी दे देनी चाहिए थी। वह नहीं दिखा तो मैंने खुद ही सेल्फी ली और उसे शेयर कर दिया। पहले कभी किसी ने ऐसा नहीं किया था। मुझे अच्छा लगा। मैं तो हमेशा वही करता हूं,जो पहले किसी ने नहीं किया हो। मेरे लिए वह मस्ती थी।’ राजस्थान में अस्पताल में जांच के समय भी प्रशंसकों न उन्हें घेर लिया था। रणवीर को इनसे दिक्कत नहीं होती। उन्हें तब उलझन होती है,जब कोई खाते वक्त या वाशरूम इस्तेमाल करते समय सेल्फी या तस्वीर उतारने की मांग करता है। वे ऐसी एक घटना सुनाते हैं,‘मुंबई के एक पांच सितारा होटल में मैं वाशरूम में खडा लघुशंका निवारण कर रहा था तो कोई मेरा वीडियो उतार रहा था। मैंने उन्हें मना किया। मैं आम तौर पर ऐसी हरकतों से नाराज नहीं होता,लेकिन यह तो हद है न?’ आजकल बहुत मुश्किल हो गई है,क्योंकि सभी के पास मोबाइल फोन है और हर फोन में कैमरा है।
    रणवीर सिंह की कोशिश रहती है कि वे अपने प्रशंसकों को खुश रखें। वे अपने अनुभव का सार बताते हैं,‘ अगर मेरी एक छोटी सी हरकत से कोई खुश हो जाए तो क्या दिक्कत है? मुझे तब बहुत अच्छा लगता है,जब कोई मुझे देखता है और उसकी आंखें चौड़ी हो जाती हैं। उसके होंठों की मुस्कान मुझे भी खुशी देती है। मुझे यह क्षमता मिली है कि अगर मैं किसी का आलिंगन करूं या साथ में फोटो खिंचवा लू या चूम लूं तो अगले तीन दिनों तक वह खुश रहेगा या रहेगी। उनसे मुझे दुआ और पॉजीटिव एनर्जी मिलती है। मैं उनकी दी एनर्जी और खुशी ही उन्हें लौटाता हूं। अभी लंबे विश्राम के बाद एक दिन बाहर निकला तो लोगों को देख मैं खुद ही मचल उठा। मैं पीपल्स पर्सन हूं।’
    रणवीर सिंह का उत्साह छलकता रहता है। उनके आलोचकों को यह सब दिखावा लगता है,लेकिन उन्हें करीब से जानने वाले कहते हैं रणवीर ऐसे ही हैं। वह प्रदर्शन नहीं करते। खुद के इस गुण के बारे में रणवीर स्पष्ट करते हैं,‘मेरी नैचुरल वायरिंग हाई एनर्जी की है। बचपन से ऐसा हूं। मेरे गैरफिल्मी दोस्त बता सकते हैं कि मैं रत्ती भर भी नहीं बदला हूं। वैसी ही मस्ती करता हूं। मेरे रिपोर्ट कार्ड में टीचर की टिप्पणी हुआ करती थी कि मेरे नेचर में गर्मजोशी है। मैं मंडलीबाज लड़का हूं। मुझे यह भी पता है कि लोगों को मेरी खुशी के पीछे किसी बड़े गम का भ्रम है। वे कहते हैं कि कैमरा ऑन होते ही मैं खुश हो जाता हूं। वर्ना मैं खड़ूस हूं। मैं खुशमिजाज हूं। मुझे सभी का आर्शीवाद मिला है। मैं क्यों नाखुश रहूं?’
    अपनी अनंत खुशी की वजह रणवीर सिंह को मालूम है। पूछने पर वे बेहिचक बताते हैं,‘मुझे लाइफ में एक ही चीज करनी थी। मुझे हीरो बनना था। और वह हो गया। एक्टर बनने के बाद मेरी खुशी खत्म ही नहीं हुई है। मैंने जो चाहा,वह मिल गया। उदासी भी आती है,लेकिन वह तो सभी के साथ है। अपने आलोचकों से मैं यही कहूंगा कि वे भी खुश रहें। मेरी खुशी अगर दिखावा है तो वे भी खुशी का दिखावा करें। कुढ़ना बंद करें। मैं एंटरटेनर हूं। मेरा काम ही है लोगों को खुश करना। अगर मेरे व्यवहार से लोग खुश हो रहे हैं तो मैं अपना काम ठीक से कर रहा हूं।’
    जोया अख्तर की ‘दिल धड़कने दो’ का ट्रेलर आ गया है। इस फिल्म में रणवीर कबीर मेहरा का किरदार निभा रहे हैं। अभी तक की अपनी भूमिकाओं से अलग रोल में वे जंच रहे हैं। जिज्ञासा होती है कि वे ‘दिल धड़कने दो’ में क्या कर रहे हैं? रणवीर सिंह अपने किरदार और फिल्म की जानकारी देते हैं,‘मैं अमीर मेहरा परिवार का लड़का हूं। इस फिल्म में सभी किरदारों की जर्नी है,जो एक-दूसरे से टकराती है। मेरे माता-पिता की शादी की 30वीं वर्षगांठ पर सभी रिश्तेदार और दोस्त जमा हुए हैं। इस फिल्म में मेरे पास एक हवाई जहाज है। मुझे उससे बहुत लगाव है। माता-पिता मेरे सामने शर्त रखते हैं कि अगर हवाई जहाज रखना है तो हमारी बात माननी होगी। हम तुम्हारी शादी करवाना चाहते हैं। फिल्म में आप देखेंगे कि कैसे मेरी जिंदगी की मुश्किलें बढ़ती हैं और उस पर सभी के क्या रिएक्शन होते हैं। मैं पहली बार अर्बन किरदार निभा रहा हूं। जोया ने एडीटिंग के दौरान एक मुलाकात में कहा था कि मुझे अंदाजा नहीं था कि तुम इतने अर्बन दिख सकते हो? मेरा जवाब था कि मैं तो हूं ही अर्बन। बांद्रा में पला-बढ़ा। चार साल अमेरिका में रहा। मेरी मानसिकता ऐसी ही है। दर्शकों ने मुझे इस रूप में कभी नहीं देखा है। हाल ही में विक्रादित्य मोटवाणी ने कहा कि ‘लूटेरा’ की शूटिंग के समय मुझे एहसास हुआ था कि आप आभिजात्य किरदारों में सही लगोगे।’ रणवीर सिंह जोया अख्तर की शैली और पेशगी के प्रशंसक हैं। ‘दिल धड़कने दो’ में अपनी मौजूदगी से वे संतुष्ट हैं। इस फिल्म में सब कुछ बहुत संपन्न और समृद्ध है।
    ‘गुंडे’ में प्रियंका चोपड़ा रणवीर कपूर की लव इंटरेस्ट थीं। ‘दिल धड़कने दो’ में वह उनकी बहन बनी है? और अगली फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ में उनकी पत्नी हैं। रणवीर सिंह एक्टिंग में इमोशनल शिफ्ट कैसे ले आते हैं? प्रियंका चोपड़ा को वे किस रूप में देखते हैं? रणवीर सिंह जोरदार ठहाका लगाते हैं। वे समझाते हैं,‘ जब लवर प्ले किया था तो मैं एक्टिंग कर रहा था। यों कहें कि ओवर एक्टिंग कर रहा था। लाउड एक्टिंग कर रहा था। दरअसल मैंने प्रियंका को हमेशा भाई की नजर से देखा है। ‘बाजीराव मस्तानी’ में संजय लीला भंसाली की वजह से एक अलग डायनेमिक है। इसमें वह मेरी बीवी हैं,लेकिन हमारी दोस्ती बचपन की है। ‘दिल धड़कने दो’ में हम दोनों ज्यादा रियल लगेंगे।’
     ‘बाजीराव मस्तानी’ के बाद क्या? रणवीर सिंह ने अभी तय नहीं किया है। उन्हें आनंद राय की फिल्म समेत तीन फिल्मों करी स्क्रिप्ट पसंद आई है। तीनों बड़ी फिल्में हैं। उनके बारें में रणवीर कुछ भी बताने से हिचकते हैं। वे इतना ही कहते हैं,‘मैं भाग्यशाली हूं कि इन फिल्मों ने मुझे चूज किया है। तीनों इंडस्ट्री की बड़ी फिल्में होंगी।’
   

Tuesday, April 21, 2015

इन दिनों मैं समय बिताने के लिए चलता हूं।


मुंबई में कई बार एक इवेंट या मुलाकात के बाद दूसरे इवेंट या मुलाकात के बीच इतना समय नहीं रहता कि मैं घर लौट सकूं या ऑफिस जा सकूं। ऐसी स्थिति आने पर मैं चलता हूं। कई बार अगले ठिकाने तक पैदल जाता हूं। समय कट जाता है और कुछ नई चीजें दिखाई पड़ जाती हैं। आज लाइट बॅक्‍स के प्रिव्‍यू शो के बाद मुझे रणवीर सिंह के घर जाना था। खार जिमखाना तक मैं पैदल ही चल पड़ा। बाकी तो मजा आया,लेकित तीन बार पसीने से तरबतर हुआ। रणवीर के अपार्टमेंट में घुसते समय झेंपा और सकुचाया हुआ था। क्‍यों,रणवीर मिलते ही भर पांज भींच लेते हैं। मुझे डर था कि कहीं दरवाजे पर ही मुलाकात हुई तो क्‍या होगा ? पसीने से तरबतर व्‍यक्ति की झप्‍पी ठीक नहीं रहेगीत्र गनीमत है। मुझे वक्‍त मिला। चसीना सूख गया। और फिर रणवीर मिले तो वैसे ही मिलना हुआ। भर पांज की भींच और ढेर सारी बातें....हर अच्‍छी मुलाक़ात की तरह आज की मुलाकात भी अधूरी ही रही।



Sunday, November 16, 2014

फिल्‍म समीक्षा : किल दिल

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
भारतीय समाज और समाज शास्त्र में बताया जाता रहा है कि मनुष्य के स्वभाव और सोच पर परवरिश और संगत का असर होता है। जन्म से कोई अच्छा-बुरा नहीं होता। इस धारणा और विषय पर अनेक हिंदी फिल्में बन चुकी हैं। शाद अली ने इस मूल धारणा का आज के माहौल में कुछ किरदारों के जरिए पेश किया है। शाद अली की फिल्मों का संसार मुख्य रूप से उत्तर भारत होता है। वे वहां के ग्रे शेड के किरदारों के साथ मनोरंजन रचते हैं। इस बार उन्होंने देव और टुटु को चुना है। इन दोनों की भूमिकाओं में रणवीर सिंह और अली जफर हैं।
            क्रिमिनल भैयाजी को देव और टुटु कचरे के डब्बे में मिलते हैं। कोई उन्हें छोड़ गया है। भैयाजी उन्हें पालते हैं। आपराधिक माहौल में देव और टुटु का पढ़ाई से ध्यान उचट जाता है। वे धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में कदम रखते हैं। भैयाजी के बाएं और दाएं हाथ बन चुके देव और टुटु की जिंदगी मुख्य रूप से हत्यारों की हो गई है। वे भैयाजी के भरोसेमंद शूटर हैं। सब कुछ ठीक चल रहा है। एक दिन उनकी मुलाकात दिशा से हो जाती है। साहसी दिशा पर देव का दिल आ जाता है। किलर देव के दिल में प्रेम की घंटियां बजने लगती हैं। हालांकि टुटु उसे भैयाजी के गुस्से और दिशा की स्थिति से आगाह करता है, लेकिन देव पर तो प्रेम की धुन चढ़ चुकी है। अब वह किलर से दिलदार बनना चाह रहा है। शरीफों की जिंदगी जीना चाह रहा है।
शाद अली ने अपनी पुरानी फिल्मों से अलग सरल राह चुनी है। उन्होंने कहानी दो हिस्सों में बांटी है। पहले हिस्से में अपराधी बनने से लेकर शरीफ होने की कहानी है। दूसरे हिस्से में शराफत से होने की दिक्कतों की दास्तान है। फिल्म में उन्हें बेहतर इंसान होना ही था। वे मुश्किलों को सुलझा कर हो भी जाते हैं। फिल्म अच्छा द्वंद्व रचती है, लेकिन उस अनुपात में नाटकीय नहीं हो पाती। संभावना थी। देव और टुटु के साथ भैयाजी के संबंधों के टूटने पर हाई वोल्टेज ड्रामा हो सकता था। फिल्म रणवीर सिंह और गोविंदा जैसे दो सशक्त कलाकार थे। ऐसे अनेक दृश्य हैं, जिनमें इंटेनसिटी और ड्रामा को बढ़ाया नहीं गया है। देव को मारने निकले भैयाजी के गुर्गे का सीक्वेंस प्रहसन बन कर रह गया है।
शाद अली पटकथा में आसान रास्ते चुनते हैं। रणवीर सिंह की स्वाभाविक ऊर्जा का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया है। गोविंदा ने अपने किरदार को समझा और सही ढंग से पेश किया हे। अगर वे कम नाचते और गाते तो अधिक प्रभावशाली लगते। अली जफर रणवीर सिंह को बराबरी का साथ नहीं दे पाए हैं। किलर की भूमिका में वे कमजोर हैं। बॉडी लैंग्वेज और आवाज में रफनेस लाने की उन्होंने कोशिश जरूर की है, लेकिन बात बनी नहीं है। परिणीति चोपड़ा दिशा के किरदार में नहीं ढल सकी हैं। देव और दिशा के बीच के भावनात्मक दृश्य कम हैं। दोनों ज्यादातर चुहल ही करते रहते हैं। चुहलबाजी में वे ठीक लगते हैं। इश्कबाजी उनसे हो नहीं सकी है। या फिर शाद अली ने उधर ध्यान ही नहीं दिया है।
'किल दिल' के गानों के शब्दों पर गौर करें तो गुलजार ने किरदारों के स्वभाव और भाव का अभिव्यक्ति दी है। इन अभिव्यक्तियों को शाद अली पर्दे पर नहीं दिखा सके हैं। देव और टुटु की कुचल चुकी जिंदगी की यह दास्तान हमदर्दी नहीं पैदा कर पाती। गीत-संगीत ज्यादा भावपूर्ण और प्रभावकारी हो गया है। गुलजार की आवाज में बोली गई पंक्तियां कानों में गूंजती और अर्थ घोलती हैं।
अवधिः 128 मिनट
*** तीन स्‍टार

Tuesday, October 21, 2014

खुशियां बांटता हूं मैं-रणवीर सिंह



-अजय ब्रह्मात्मज
    रणवीर सिंह से यह बातचीत शुरु ही होने जा रही थी कि उन्हें रितिक रोशन का एसएमएस मिला,जिसमें उन्होंने रणवीर सिंह को ‘बैंग बैंग डेअर’ के लिए आमंत्रित किया था। रणवीर सिंह ने बातचीत आरंभ करने के पहले उनका चैलेंज स्वीकार किया। उन्होंने झट से अपनी मैनेजर को बुलाया और आवश्यक तैयारियों का निर्देश दिया। अचानक उनकी घड़ी पर मेरी नजर पड़ी। रात के बारह बजे उनकी घड़ी में 6 बजने जा रहे थे। सहज जिज्ञासा हुई कि उनकी घड़ी छह घंटे आगे है या छह घंटे पीछे? झुंझला कर उन्होंने हाथ झटका और कहा,‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मेरी घड़ी स्लो क्यों हो जा रही है? यह तो अपशकुन है। ‘फाइंडिंग फैनी’ के कैमियो रोल के लिए मुझे यह घड़ी गिफ्ट में मिली थी। होमी अदजानिया से पूछना होगा। उनकी फिल्म तो निकल गई। यह घड़ी क्यों स्लो हो गई?’ रणवीर सिंह बताते हैं कि होमी बड़े ही फनी मिजाज के हैं। उनके साथ फिल्म करने में मजा आएगा।
    एनर्जी से भरपूर रणवीर सिंह कभी गंभीर मुद्रा में नहीं रहते। गंभीर सवालों के जवाब में भी उनकी हंसी फूट पड़ती है। ऐसा लगता है कि वे बहुत सोच-समझ कर जवाब नहीं देते,लेकिन गौर करें तो उनके रवैए में एक संतुलित लय और गति रहती है। वे अनायास मुग्ध करते हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक चायनीज खाद्य प्रोडक्ट के लिए रणवीर चिंग का रूप धारण किया। अभी वे ‘दिल धडक़ने दो’ की शूटिंग पूरी कर रहे हैं। मैं पूछता हूं,‘अभी आप किस मानसिक अवस्था में हैं?’ अपनी गतिविधियों की वे मानसिक गिनती करते हैं और कहते हैं,‘काफी रोचक समय में यह सवाल पूछा है आप ने। अभी ‘किल दिल’ का ट्रेलर आया है। ‘दिल धडक़ने दो’ की शूटिंग के आखिरी दिन हैं। उसके बाद ‘बाजीराव मस्तानी’ की शूटिंग आरंभ हो जाएगी। मेरा एंडोर्समेंट हिट रहा। कह सकता हूं कि समय अच्छा चल रहा है। देखना है कि ‘किल दिल’ को दर्शक किस रूप में लेते हैं। ‘बाजीराव मस्तानी’ का रोल डिमांडिंग है। वह भी संजय सर के साथ। मेरी तैयारियां पर्याप्त हैं कि नहीं। घुड़सवारी,तलवारबाजी,मराठी लहजा और लुक पर काम कर चुका हूं। बाल भी उड़ा दूंगा। बाजीराव बहुत ही परतदार और जटिल कैरेक्टर है। उसके लिए नए कोशल सीखने होंगे। 100 करोड़ से अधिक का बजट है। मेरे लिए तो यह ‘कैरेक्टर ऑफ द लाइफटाइम’ है।’
    ‘बाजीराव मस्तानी’ संजय लीला भंसाली की महत्वाकांक्षी फिल्म है। मराठा शासक के पेशवा यानी प्रधानमंत्री बाजीराव ने 18 वीं सदी के आरंभ में छत्रपति साहू राजे भोंसले के प्रधानमंत्री के तौर पर प्रशासन और सेना की कमान संंभाली थी। मस्तानी के साथ उनके प्रेम के किस्से ंिकवदंती बन गए थे। इस किरदार को पर्दे पर जी पाना निश्चित ही बड़ी चुनौती है। रणवीर सिंह बताते हैं,‘बाजीराव एक साथ मौका और चुनौती है। बाजीराव राजनीतिज्ञ होने के साथ योद्धा है। वह पिता,बेटा,भाई,प्रेमी,स्टेट्समैन और सेनापति है। इस फिल्म में उनके व्यक्तित्व के हर पहलू को दिखाना और समेटना है। यह सब करते हुए मराठी लहजा भी बनाए रखना है। अब ‘मुगलेआजम’ का दौर नहीं है। संवादों को बातचीत का स्वरूप देना है। अभी तो मुश्किल दिख रही है। अगर मेरा टास्क मुझे डराता है तो सच्ची मजा आता है। ऐसा डर मुझे पहली फिल्म में लगा था। उसके बाद ‘लुटेरा’ के समय घबराया हुआ था। उस किरदार में ठहराव लाना मेरे लिए आसान नहीं था। देखें तो उस फिल्म में मेरा किरदार विलेन का था।  उसके लिए दर्शकों के मन में सिंपैथी पैदा करना था। विक्रमादित्य मोटवाणी के स्कूल का परफारमेंस करना था। वह कैरेक्टर मेरे जैसा नहीं था। वह हर मोड़ पर कुछ ऐसा कर रहा था,जो दर्शकों  को खराब व्यक्ति होने का फीलिंग दें ,लेकिन अंत में उनका दिल जीत ले। ‘ ़ ़ ऱामलीला’ में अलग किस्म का डर था। भंसाली साहब के साथ पहली बार काम कर रहा थ। वे निचोड़ देते हैं। वह उस वक्त की मेरी सबसे बड़ी फिल्म थी। कैरेक्टर की इंटेनसिटी,डांस,चैलेंजिंग सीन,भंसाली की स्टायल में घुल जाना। कई बा ऑन द स्पॉट टास्क दे देते हैं वे। उसी समय अपने इमोशन बदलने पड़ते हैं। ‘गुंडे’ एक्शन फिल्म थी। बॉडी बनाई थी। 55 डिग्री सेंटीग्रेड में शूटिंग करना। टे्रन के ऊपर भागना। हमारी चमड़ी पर पकौड़े उग आए थे। शरीर तल गया था। ‘लुटेरा’ सबसे ज्यादा चैलेंजिंग रही है और अभी ‘बाजीराव मस्तानी’ होगी।’
    अभी तक के करिअर में केवल मनीष शर्मा के साथ रणवीर सिंह ने दूसरी फिल्म की है। दूसरी बार डायरेक्ट करने वालों में संजय लीला भंसाली दूसरे डायरेक्टर होंगे। रणवीर चाहते हैं,‘मुझे अपने सभी डायरेक्टरों के साथ दोबारा काम करने में मजा आएगा। विक्रमादित्य मोटवाणी,जोया अख्तर,संजय लीला भंसाली  के साथ अनुभवों का विस्तार होगा। ‘बाजीराव मस्तानी’ में 18 वीं सदी का किरदार निभाना है। उन दिनों लोगों के बात-व्यवहार और एक्शन में भी ठहराव था। बोलना,चलना-फिरना,जीवनशैली सब कुछ मेरे अनुभव से अलग होगा। कहानी मुख्य रूप से लवस्टोरी है,लेकिन बाकी चीजों पर भी ध्यान दिया जाएगा। बड़े स्केल पर वार सीन किए जाएंगे।’
    रणवीर सिंह हमेशा चुहलबाजी करते क्यों नजर आते हैं? ऑफ स्क्रीन उनकी एनर्जी और लाइट मूड का आकर्षण मुग्ध करता है। क्या उन्होंने यह एटीट्यूड विकसित किया है या यह एक छद्म है? रणवीर जवाब देते हुए गंभी हो जाते हैं,‘मेरी पर्सनैलिटी का हिस्सा होने के साथ यह उसका क्रिटिक भी है। मैं कर्क राशि का हूं। कर्क यानी केकड़े की तरह वह बाहर से कठोर और अंदर से कोमल होता है। वे फील ज्यादा करते हैं। इमोशनल और सेंसिटिव होते हैं। आज के जमाने में ऐसा होने पर दिक्कतें बढ़ जाती हैं,इसलिए डिफेंस मेकेनिज्म विकसित करना पड़ता है। कुछ कोल्ड व्यवहार करते हैं। मैं आसानी से प्रभावित हो जाता हूं। सच कहूं तो मैं बहुत गंभीर और चिंतनशील हूं। मैं हंसी-मजाक से लोगों को खुश करने की कोशिश करता हूं। मैं इसी उद्देश्य से रचा गया हूं कि सभी में पॉजीटिव एनर्जी भरूं। खुशियां बांटता हूं मैं। बचपन से ही मैं ऐसा हूं। क्लास में मैं मॉनीटर और हेड ब्वॉय भी रहा। हमेशा से मुझ में लोगों से ज्यादा जोश रहा है।’ लीड करना और अपने समकालीनों से आगे रहना रणवीर की आदत बन गई है। उनमें कुछ करने और कर दिखाने का जुनून दिखता है। वे अपने बारे में कहते हैं,‘जब आप को अपने काम में सफलता मिलती है तो आप या तो उससे खुश होकर वहीं अटक जाते हैं या फिर अपनी चाहत और बढ़ा देते हैं। मैंने अपनी चाहतें बढ़ा ली हैं। लगातार अच्छा काम करना चाह रहा हूं। जी-जान और लगन से काम कर रहा हूं।’
    रणवीर सिंह खुद को एथलीट ही मानते हैं। एक रिकॉर्ड बनाने के बाद अब उसे अपने ही रिकॉर्ड तोड़ते रहना है। रणवीर कपूर बताते हैं,‘आप मेरे ट्विटर अकाउंट पर जाकर देख सकते हैं। मैं एथलीट और स्पोर्ट्स के लोगों को फॉलो करता हूं। उनके मोटिवेशनल कोट से मुझे प्रेरणा मिलती है। खिलाड़ी के दर्शन और सोच से मैं प्रभावित होता हूं।’ रणवीर स्पष्ट कहते हैं,‘मैं पढ़ता नहीं हूं। मैं विजुअली सोचता और चीजें याद रखता हूं। विजुअल मेमोरी का इंसान हूं। सोचता हूं भी तो विजुअली ही सोचता हूं। बात करते समय मेरे दिमाग में पिक्चर चल रहा होता है।’
    बातचीत और भी लंबी चली। रात ने तारीख बदल दी। रणवीर लगातार बताए जा रहे थे। तभी उनकी मैनेजर ने आगाह किया कि उन्हें सुबह 7 बजे से शूट पर रहना है। चेहरे पर रात में जगने की थकान दिखेगी तो जोया अख्तर को दिक्कत होगी।

Tuesday, August 26, 2014

करें टिप्‍पणी या लिखें कहानी : रणवीर सिंह और अजय ब्रह्मात्‍मज

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रणवीर सिंह पिछले दिनों एक चायनीज नूडल्‍स और अन्‍य खाद्य पदार्थ के उत्‍पादों के ऐड की शूटिंग कर रहे थे। मैं वहां पहुंच गया। उस मुलाकात के इन दृश्‍यों पर आप की टिप्‍पणी और कहानी की अपेक्षा है। सर्वाधिक रोचक और टिप्‍पण्‍ी के लिए एक-एक पुरस्‍कार सुनिश्चित है।


Friday, February 14, 2014

फिल्‍म समीक्षा : गुंडे

दोस्ती-दुश्मनी की चटख कहानी
-अजय ब्रह्मात्‍मज
यशराज फिल्म्स की अली अब्बास जफर निर्देशित 'गुंडे' देखते समय आठवें दशक की फिल्मों की याद आना मुमकिन है। यह फिल्म उसी पीरियड की है। निर्देशक ने दिखाया भी है कि एक सिनेमाघर में जंजीर लगी हुई है। यह विक्रम और बाला का बचपन है। वे बडे होते हें तो 'मिस्टर इंडिया' देखते हैं। हिंदी फिल्में भले ही इतिहास के रेफरेंस से आरंभ हों और एहसास दें कि वे सिनेमा को रियल टच दे रही हैं, कुछ समय के बाद सारा सच भहरा जाता है। रह जाते हैं कुछ किरदार और उनके प्रेम, दुश्मनी, दोस्ती और बदले की कहानी। 'गुंडे' की शुरुआत शानदार होती है। बांग्लादेश के जन्म के साथ विक्रम और बाला का अवतरण होता है। श्वेत-श्याम तस्वीरों में सब कुछ रियल लगता है। फिल्म के रंगीन होने के साथ यह रियलिटी खो जाती है। फिर तो चटखदार गाढ़े रंगों में ही दृश्य और ड्रामा दिखाई पड़ते हैं।
लेखक-निर्देशक अली अब्बास जफर ने बिक्रम और बाला की दोस्ती की फिल्मी कहानी गढी है। ऐसी मित्रता महज फिल्मों में ही दिखाई पड़ती है, क्योंकि जब यह प्रेम या किसी और वजह से टूटती है तो अच्छा ड्रामा बनता है। दोस्ती में एक-दूसरे के लिए जान देने की कसमें खाने वाले दुश्मनी होने पर एक-दूसरे की जान लेने पर उतारु हो जाते हैं। बाद में पता चलता है कि दुश्मनी तो गलतफहमी में हो गई थी। 'गुंडे' कुछ ऐसी ही फिल्म है,जो हिंदी फिल्मों के सारे आजमाए फार्मूलों को फिर से इस्तेमाल करती है। फिल्म देखते समय रोमांच, थ्रिल और आनंद आना स्वाभाविक है,क्योंकि लंबे समय से ऐसी फिल्में नहीं आई हैं। 'गुंडे' हिंदी फिल्मों की मसाला परंपरा का बखूबी निर्वाह करतर है। उसके लिए रणवीर सिंह, प्रियंका चोपड़ा और इरफान खान जैसी प्रतिभाओं का इस्तेमाल करती है।
कोलकाता और धनबाद की कथाभूमि की यह फिल्म ढाका से शुरु होती है। बिक्रम और बाला रोजी-रोटी के जुगाड़ में गैरकानूनी गतिविधयों में शामिल हो जाते हैं। बीच में उन्हें पश्चाताप भी होता है कि अगर बचपन में सिी ने उनका हाथ थाम लिया होता तो वे गुंडे नहीं बनते। गुडा बड़ा ही बदनाम शब्द है। मान लिया गया है कि यह गैरकानूनी और गलत काम करने वालों के लिए इस्तेमाल होता है। यहां जयशंकर प्रसाद की कहानी 'गुंडा' की याद दिलाना काफी होगा। सुधी दर्शक एक बार अवश्य उस कहानी को खोज कर पढ़ लें। हमारे समाज की कहानी 'गुंडा' से 'गुंडे' तक आ चुकी है।
अली अब्बास जफर की 'गुंडे' में सब कुछ गाढ़ा है। इतना गाढ़ा है कि अति की वजह से उसका स्वाद कभी-कभी कड़वा लगता है। इमोशन, एक्शन, दुश्मनी, दोस्ती, नाच-गाना और डायलॉग डिलीवरी तक में निर्देशक की तरफ से पूरी टीम को हिदायत है कि कुछ भी हल्का और पतला न हो। यह गाढ़ापन ही 'गुंडे' की खासियत है। संवादों को संजय मासूम ने गाढ़ा किया है। एक इरफान खान और दूसरी प्रियंका चोपड़ा ने इस गाढ़ेपन में भी अपनी पहचान नहीं छोड़ी है। उन दोनों ने फिल्म की अतिशयता को क किया है। इरफान ने अपने किरदार को बेलौस तरीके से पर्दे पर उतारा है। उनके अंदाज में शरारत है। प्रियंका ने अपनी संवाद अदायगी को सुधारा है। वह इस फिल्म में नंदिता के किरदार के द्वंद्व को प्रभावशाली तरीके से व्यक्त करती हैं।
फिल्म का गीत-संगीत मधुर और फिल्म के विषय और किरदारों के अनुकूल है। एक सूफी गीत ही गैरजरूरी लगता है। मौला रहम करे हिंदी फिल्मों पर। हर फिल्म में सूफी गीत-संगीत से अब ऊब सी होने लगी है। फिर भी इरशाद कामिल और सोहेल सेन ने शब्द और ध्वनि के सथ मधुर और सार्थक प्रयोग किए हैं।
अवधि-153 मिनट
*** तीन स्टार

Wednesday, January 15, 2014

गुंडे फिल्‍म का जिया गीत

गुंडे फिल्‍म के इस गाने में प्रियंका चोपड़ा के परिधानों के बदलते लाल,सफेद,हरे और बैंगनी रंगों का कोई खास मतलब भी है क्‍या ? क्‍या फिल्‍म में और भी रंग दिखेंगे ?


Friday, November 15, 2013

फिल्‍म समीक्षा : गाेलियों की रासलीला राम-लीला

भावावेग की प्रेमलीला 
-अजय ब्रह्मात्‍मज

ऐन रिलीज के समय फिल्म का नाम इतना लंबा हो गया। धन्य हैं 'राम-लीला' टाइटल पर आपत्ति करने वाले ... बहरहाल, ' ...राम-लीला' विलियम शेक्सपियर के मशहूर नाटक 'रोमियो-जूलियट' पर आधारित फिल्म है, इसीलिए इस प्रेम कहानी के शीर्षक में पहले पुरुष का नाम आया है। एशियाई प्रेम कहानियों में स्त्रियों का नाम पहले आता है, 'हीर-रांझा', 'लैला-मजनू', 'शीरीं-फरिहाद', 'सोहिनी-महिवाल' आदि। संजय लीला भंसाली ने 'रोमियो-जूलियट' की कहानी को गुजरात के रंजार में स्थापित किया है, जहां सेनाड़ा और रजाड़ी परिवारों के बीच पुश्तैनी दुश्मनी चल रही है। इन परिवारों के राम और लीला के बीच प्रेम हो जाता है। 'रोमियो-जूलियट' नाटक और उस पर आधारित फिल्मों की तरह ' ...राम-लीला' भी ट्रैजिक रोमांस है।
संजय लीला भंसाली सघन आवेग के निर्देशक हैं। उनकी फिल्मों में यह सघनता हर क्षेत्र में दिखाई देती है। खास कर किरदारों को गढ़ने और उनके भावात्मक संवेग की रचना में वे उत्तम हैं। उनके सामान्य दृश्य भी गहरे और परतदार होते हैं। रंग, दृश्य, ध्वनि और भाषा से वे विषय के अनुरूप वातावरण तैयार करते हैं। संजय हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय पारंपरिक रूपकों का सुंदर इस्तेमाल करते हैं। उन्हें अपनी सौंदर्य दृष्टि से निखारते हैं। उनमें नवीनता लाते हैं। ' ...राम-लीला' घोर पारंपरिक फिल्म है। कहानी, चरित्र, कथानक और घटनाओं में किसी अन्य ट्रैजिक रोमांस के शिल्प का ही पालन किया गया है, लेकिन प्रस्तुति की भव्यता और कलाकारों की अभिनय प्रवीणता से उनमें नए आयाम जुड़ जाते हैं। संजय लीला भंसाली की ' ़ ़ ़ राम-लीला' रंगीन, भव्य, चमकदार और रोचक है।
फिल्म के प्रमुख चरित्र राम और लीला के रूप में रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की केमिस्ट्री ओर एनर्जी पहले फ्रेम से ही जाहिर हो जाती है। संजय ने दोनों चरित्रों की एंट्री पर खास ध्यान दिया है। हिंदी फिल्मों के पारंपरिक दर्शकों के लिए नायक-नायिका की एंट्री खास महत्व रखती है। एंट्री की बाजी जीतने के बाद संजय ने उनके प्रेम, भिड़ंत और विद्वेष की मोहक दृश्य-संरचना की है। रणवीर सिंह ने राम को भावनात्मक उफान की पूरी उर्जा के साथ पर्दे पर पेश किया है। बस कहीं-कहीं संवाद अदायगी में उनकी आवाज मार खाती है। दीपिका पादुकोण तो सौंदर्य की बेफिक्र अभिव्यक्ति हो गई हैं। उनका गहन आत्मविश्वास नृत्य, दृश्य, संवाद अदायगी और भावाभिव्यक्ति में दिखाई देता है। संजय ने इस बार उनकी आंखों के साथ चपलता और खामोशी का सार्थक उपयोग किया है। दीपिका की प्रतिभा के ये नए आयाम ' ... राम-लीला' में प्रकट हुए हैं। लापरवाह लहराती, भागती और फिर पलटकर देखती दीपिका की मादकता 'हम दिल दे चुक सनम' की ऐश्वर्या राय की याद दिला देती है।
सहयोगी कलाकारों में सुप्रिया पाठक का चरित्र एकआयामी है, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे मोहक रंग दिया है। उनकी निष्ठुरता कंपा देती है। गुलशन देवैया और रिचा चढ्डा इस फिल्म की उपलब्धि हैं। राम और लीला की तरह उनके चरित्र को खुले तरीके से विकसित होने का मौका नहीं मिला है, फिर भी वे मिले दृश्यों में प्रभावशाली हैं। उन्होंने अपने चरित्रों को ढंग से समझा और पेश किया है। अभिमन्यु सिंह समेत दूसरे कलाकार अपनी भूमिकाओं से फिल्म में कुछ जोड़ते हैं और नाटकीयता को गाढ़ा करते हैं।
' ...राम-लीला' भाषाविदों के लिए अध्ययन योग्य है। रंजार की स्थानीय भाषा में अंग्रेजी का घुलना और भाषा प्रवाह में निरंतर सुनाई पड़ना सचमुच शोध और विश्लेषण का विषय है। ' ...राम-लीला' के प्रमुख किरदार स्थानीय रंग-ढंग में होने के बावजूद इंग्लिश व‌र्ड्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। और हां, ' ...राम-लीला' के कथानक में मोबाइल फोन की भी बड़ी भूमिका है। घटनाओं के जोड़, मोड़ और तोड़ में उसका उपयोग हुआ।
फिल्म के नृत्य-गीत सम्मोहक हैं। नृत्य निर्देशकों ने उन्हें भव्य तरीके से संजोया और पेश किया है। रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की मेहनत और संगत रंग लाई है। गीतों के बोल और संगीत की मधुरता के योग से गीत-नृत्य फिल्म का आकर्षण बढ़ाते हैं। फिल्म का छायांकन नयनाभिरामी है।
संजय लीला भंसाली की फिल्मों में अभी तक बमुशिकल थप्पड़ की आवाज तक आती थी। इस बार तो गोलियों की रासलीला है। भरपूर एक्शन के बावजूद रोमांस गुम नहीं होता। किरदारों और कलकारों का समुचित भावावेग '...राम-लीला' को मनोरंजक प्रेमलीला में बदल देता है।
***1/2 साढ़े तीन स्‍टार 
अवधि - 157 मिनट

Sunday, July 7, 2013

मुझे भी बेलने पड़े हैं पापड़-रणवीर सिंह


-अजय ब्रह्मात्मज
रणवीर सिंह का पहली ही फिल्म से पहचान और स्टारडम मिल गई। ऐसा लगता है कि उनके लिए शुरूआत आसान रही। पहली बार रणवीर सिंह शेयर कर रहे हैं अपने हिस्से का संघर्ष ़  ़ ़
    फिल्मों में स्ट्रगल करने के दौरान एक बर्थडे पर मेरी बहन केक के ऊपर कैंडिल नहीं लगाया था। उन्होंने कैंडिल की जगह फिल्मों के छोटे-छोटे कार्ड लगाए थे और उनमें स्टारों की जगह मेरी तस्वीर लगा दी थी। मैंने उन्हें फेंका नहीं। उन्हें अपने विजन बोर्ड पर लगा दिया। आते-जाते उसे ही देखता रहता था। आप यकीन करें छह-आठ महीने के अंदर मुझे ऑडिशन के लिए कॉल मिल गए। ऑडिशन सफल रहा। ‘बैंड बाजा बारात’ मिल गई। फिल्म हिट रही। और आज देखो, कमाल ही हो गया।
    मुझ में योग्यता है। चाहत है। हिंदी फिल्मों की मेनस्ट्रीम में आने की चाहत थी। मुझे पहले भी फिल्मों के ऑफर मिल रहे थे, लेकिन मैंने ‘बैंड बाजा बारात’ का दांव खेला। मैंने तीन-चार फिल्में छोड़ दी थीं। उनके निर्माताओं ने मुझे पागल करार कर दिया था। अपना थोबड़ा तो देखो। हम 15-20 करोड़ निवेश करने को तैयार हैं और तुम रिजेक्ट कर रहे हो। तुम्हारा कोई बाप-दादा यहां नहीं है। न जाने क्या सोच रहे हो?
    मुझे यशराज फिल्म्स की फिल्म मिली। उसके पहले उन्होंने कभी नए एक्टरों को मौका नहीं दिया था। मुझे सोलो फिल्म मिली। संयोग ऐसा रहा कि यशराज फिल्म्स और मेरी खोज टकरा गई। अभिमन्यु रे हाउस कास्टिंग डायरेक्टर थे। शानू शर्मा ने मेरे बारे में आदित्य चोपड़ा को बताया था। उन्होंने बुला लिया। मैंने ऑडिशन में अपना वैरिएशन दिखाया था। ‘लक बाई चांस’ मुझे फिल्म मिल गई। जोया अख्तर की इसी नाम की फिल्म ‘मेरी स्टोरी हो सकती है।’ ‘मोहब्बतें’ में तीन नए चेहरे थे, लेकिन शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय भी थे। यहां तो मैं अकेला था। ऑडिशन के लिए मुझे तीन बातें बताई गई थी। एक तो दिल्ली का है। उम्र 19-20 है और मस्त मौला है। तब मैं 24 का था। मैंने 4 दिनों तक अपने हिसाब से कैरेक्टर की स्टडी थी। दिल्ली का लहजा सीख और ऑडिशन दे आया। उनका पहला सवाल था कि दिल्ली का हूं क्या? उन्हें आश्चर्य हुआ कि मैं बांद्रा का हूं।
    सिफ संयोग तो नहीं होता। मौका मिलने पर खुद को उसके योग्य साबित करना पड़ता है। यानी लहर उठे तो आप उसके साथ जाने के लिए तैयार हों। मेरे डैड बिजनेशमैन हैं। ऑटोमोबाइल में मोटरसाइकिल की डिलिंग करते हैं। मेरी मम्मी होममेकर हैं। मेरे परिवार का फिल्मों से कोई कनेक्शन नहीं था कि फिल्में मिले। दसवीं करने तक मैंने तय कर लिया था कि मुझे तो मेनस्ट्रीम एक्टर ही बनना है। मैं स्टडी और स्पोटर््स में अच्छा था। डांस शो, ड्रामा और डिबेट में आगे रहता था। तब मेरे दोस्त और टीचर कहने लगे थे कि तू तो एक दिन एक्टर बनेगा। मेरी बुआ कहती थी कि तुम में नौटंकीपना  है, उस से लगता है कि तू एक्टर बनने के लिए ही पैदा हुआ है। उन दिनों रितिक रोशन, जाएद खान, तुषार कपूर, अभिषेक बच्चन की लांचिंग चल रही थी। मेरा विश्वास हिल गया था। फिर मैंने सोचा कि कॉपी रायटर बन जाऊंगा। 16 से 19 की उम्र में मैंने वी चैनल की मार्केटिंग टीम में काम किया। एक एड एजेंसी में कॉपी भी लिखता था। उन दिनों एक कॉपी लिखी थी - ‘क्वाइल का मारा, मच्छर नहीं मरा। ले आइए लाल, देखिए कमाल।’
        अमेरिका में पढ़ाई के समय एक बार मुझे परफॉर्म करने का मौका मिला। वहां सभी देशों के स्टूडेंटस थे। मुझे ‘दीवार’ का डायलॉग याद था। मैंने वही सुना दिया। सभी को पसंद आया तो मेरे अंदर भी कुछ कौंधा। लगा कि यही करना चाहिए। परफॉर्म करना चाहिए। एक्टिंग करनी चाहिए। आयडिया पहले से था ही। अब वह मजबूत हो गया। वही मेरी जिंदगी का टर्निंग पाइंट बना। मैंने सोचा कि अभी कोशिश नहीं की तो जिंदगी भर अफसोस रहेगा। उसी रात मैंने डैड से बात की। मैंने कहा भी कि आने मुझे किसी और पढ़ाई के लिए भेजा है, लेकिन मेरा मन कुछ और कर रहा है। डैड ने समझाया कि पढ़ाई पूरी कर लो। फिर जो करना है, उसे दिल से करो। तुम दिल से करोगे तो सब ठीक हो जाएगा। कॉम्प्रोमाइज करोगे तो कुछ भी नहीं मिलेगा। यह 2004-5 की बात है। मैंने अपनी पढ़ाई के साथ थिएटर ज्वॉयन कर लिया। वीकएंड में नाटक करने लगा। अच्छी ट्रेनिंग हो गई। अमेरिका से मैं 2006-7 में लौट कर आया।
    बांद्रा में एक छोटा सा स्कूल है लर्नर ऐकेडमी। फस्र्ट से टैंथ तक वहीं पढ़ा। छोटा स्कूल था। क्लास में 20-30 ब'चे ही होते थे। वहां सभी को जानते थे। सीनियर-जूनियर सभी को। उन दिनों हमारा परिवार बांद्रा तालाब के पास रहता था। 15 साल की उम्र तक वहीं रहा। नानी का घर भी नहीं था। मेरे मम्मी-डैडी की पैदाइश मुंबई की है, लेकिन उनके माता-पिता पार्टीशन के समय करांची से आए थे। मेरी दादी मुसलमान हैं और दादा सिख। नाना-नानी दोनों सिंधी हैं।
    शाद अली से मेरी पुरानी जान-पहचान थी। मुंबई में कॉलेज की पढ़ाई के दिनों में एक बार उनके घर चला गया था। दरअसल वहां कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा की बर्थडे पार्टी चल रही थी। बिना निमंत्रण के मैं वहां पहुंच गया था। जब मैं घुसा तो ‘माई नेम इज लखन’ गाना चल रहा था। किसी से हाय-हेलो नहीं ़ ़ ़सीधे डांस फ्लोर पर चला गया। लंबे बाल, कानों में बाली ़ ़ ़ शाद से वहीं पहली मुलाकात हुई। उन्होंने सोचा कि पागल बंदा है। उन्होंने दोस्त बना लिया। हमारे कॉमन इंटरेस्ट है - क्रिकेट, मेनस्ट्रीम मुवीज और मेनस्ट्रीम ह्यूमर को एक्सप्लेन नहीं किया जा सकता। उनकी फिल्मों में देख कर समझ सकते हैं। बहरहाल, लौट कर उनसे ही मिला। उन्होंने ‘झूम बराबर झूम’ पूरी कर ली थी। एड फिल्में बना रहे थे। मैं उनका असिस्टेंट डायरेक्टर बन गया। यही सोच का काम शुरू किया कि कुद सीखूंगा। कभी कोई मिल गया तो फिल्मों की कोशिश भी कर लूंगा। एंट्री तो लेनी थी। असिस्टैंट डायरेक्टर होने पर सब कुछ देखने को मिलता है। प्रोडक्शन, कास्टिंग, शूट ़ ़ ़ सब कुछ जानने का मौका मिला है। सारी चीजों का अनुभव हो जाता है।
    मुझे लगा कि अगर एक्टिंग के लिए मेरा केमिकल रिएक्शन हो रहा है तो मुझे यही करना चाहिए। असिस्ट करते समय मैंने पूरा ध्यान दिया था। डेढ़ साल के बाद मैंने फिल्मों के लिए तैयार हो गया। उन दिनों में एक बेस बन गया। सुनील मनचंदा जी से दोस्ती हो गई थी। ढेर सारे कास्टिंग डायरेक्टर से मुलाकात हो गई थी। ये लोग फोरफ्रंट पर नहीं होते, लेकिन बहुत सहयोगी होते हैं। पहला रोल मिलने के पहले ऑडिशन के लिए जाता रहता था। कंफिडेंस बढ़ता जा रहा था। उसी कंफीडेंस के कारण मैंने ‘बैंड बाजा बारात’ के डायरेक्टर से मुलाकात हुई थी।
    एक्टिंग की शुरुआत करने से पहले मैंने किशोर नामित कपूर की एक्टिंग क्लास की। वहां पर लगा कि यह ट्रेनिंग तो एकदम नए लोगों के लिए है। तब तक मैंने बहुत कुछ सीख-समझ लिया था। फिर भी एक्टिंग क्लासेज से फायदा हुआ। उसके बाद मैंने मकरंद देशपांडे का थिएटर ग्रुप 'वॉयन किया था। थिएटर ग्रुप में तुरंत रोल नहीं मिलता। उनके साथ समय बिताना पड़ता है। बाकी दस तरह के काम करने पड़ते हैं। कील ठोकने से लेकर रनर तक का काम किया। छोटे से छोटा काम किया। रियल ऑडिएंस के सामने परफॉर्म करना चाहता था। मकरंद देशपांडे के एक प्ले ‘कविता भाग गई’ में एक्सट्रा का रोल किया था। उसके आगे कुछ नहीं किया। आठ महीने के बाद लगा कि कब तक यहां रहूंगा? स्टेज पर जाने का चांस कब मिलेगा? मुझे तो फिल्मों में जाना है। फिर क्यों थिएटर में वक्त बर्बाद करूं? थिएटर छोड़ दिया। फिर से अनुभवों को लेकर निकल गया। मुझे कोई अफसोस नहीं है। अगर मैंने वे सारे काम नहीं किए होते। पापड़ नहीं बेले होते तो मुझे अपने काम का महत्व समझ में नहीं आता।  



Friday, July 5, 2013

फिल्‍म समीक्षा : लुटेरा

Lootera-अजय ब्रह्मात्‍मज 
आप किसी भी पहलू से 'लुटेरा' का उल्लेख करें। आप पाएंगे कि चाहे-अनचाहे उसकी मासूमियत और कोमलता ने आप को भिगो दिया है। इस प्रेम कहानी का धोखा खलता जरूर है,लेकिन वह छलता नहीं है। विक्रमादित्य मोटवाणी ने अमेरिकी लेखक ओ हेनरी की कहानी 'द लास्ट लीफ' का सहारा अपनी कहानी कहने के लिए लिया है। यह न मानें और समझें कि 'लुटेरा' उस कहानी पर चित्रित फिल्म है। विक्रम छठे दशक के बंगाल की पृष्ठभूमि में एक रोचक और उदास प्रेम कहानी चुनते हैं। इस कहानी में अवसाद भी है,लेकिन वह 'देवदास' की तरह दुखी नहीं करता। वह किरदारों का विरेचन करता है और आखिरकार दर्शक के सौंदर्य बोध को उष्मा देता है। अपनी दूसरी फिल्म में ही विक्रम सरल और सांद्र निर्देशक होने का संकेत देते हैं। ठोस उम्मीद जगते हैं।
फिल्म बंगाल के माणिकपुर में दुर्गा पूजा के समय के एक रामलीला के आरंभ होती है। बंगाली परिवेश,रोशनी और संवादों से हम सीधे बंगाल पहुंच जाते हैं। विक्रम बहुत खूबसूरती से बगैर झटका दिए माणिकपुर पहुंचा देते हैं। फिल्म की नायिका पाखी रायचौधरी (सोनाक्षी सिन्हा)को जिस तरह उसके पिता वात्सल्य के साथ संभाल कर कमरे में ले जाते हैं,लगभग वैसे ही दर्शकों को संभालते हुए विक्रम अपनी फिल्म में ले आते हैं। आप भूल जाते हैं कि थोड़ी देर पहले थिएटर में आने के समय तक आप 2013 की यातायात समस्याओं को झेल रहे थे। याद भी नहीं रहता कि आप की जेब में मोबाइल है और आप को बेवजह देख लेना चाहिए कि कहीं कोई मैसेज तो नहीं आया है।
फिल्म सीधे बंगाल की धरती पर विचरती है। हम इस समाज और इसके किरदारों को सत्यजित राय की अनेक फिल्मों में देख चुके हैं। विक्रम यहां सत्यजित राय की शैली का युक्तिपूर्ण और सामयिक इस्तेमाल कर अपने किरदारों को पेश कर देते हैं। फिर उनके हिंदी संवादों से हम हिंदी फिल्मों की सिनेमाई दुनिया में आ जाते हैं। 'लुटेरा' का पीरियड और परिवेश चुभता नहीं है। निश्चित ही इसके लिए फिल्म के प्रोडक्शन डिजायनर और कॉस्ट्यूम डिजायनर समत अन्य तकनीशियनों को भी धन्यवाद देना होगा कि उनकी काबिलियत से यह फिल्म संपूर्णता को छूती नजर आती है।
फिल्म में पाखी के पिता भीलों के राजा की कहानी सुनाते हैं,जिसकी जान तोते में बसती थी। पाखी की जान का रिश्ता पत्ती से बन जाता है। फिल्म का यह रोचक दृष्टांत है। पाखी के शांत और सुरम्य जीवन में किसी मोहक राजकुमार की तरह वरूण (रनवीर सिंह) प्रवेश करता है। अचानक पाखी के मन की की थिर झील में हिलोरें उठने लगती हैं। भावनाओं की कोमल कोपलें फूटती हैं। वरूण भी इस प्रेम को स्वीकार करता है। पाखी के पिता को भी वरूण अपनी बेटी के लिए होनहार और उपयुक्त लगता है।
दोनों के परिणय सूत्र में बंधने-बांधने की तैयारियां शुरू होती हैं कि ़ ़ ़इस कि के बाद फिल्म मोड़ लेती है। यहां से विक्रम कहानी और चरित्रों को अलग दिशा और उठान में जाते हैं। उन्होंने दोनों प्रमुख कलाकारों के साथ बाकियों को भी हुनर दिखाने के अवसर दिए हैं।
विक्रम की 'लुटेरा' सोनाक्षी सिन्हा और रनवीर सिंह के करियर की उल्लेखनीय फिल्म रहेगी। इन दिनों फिल्मों की तमाम प्रतिभाएं कथित मनोरंजन की भेड़चाल में छीजती जा रही हैं। यहां एक फिल्म में दो युवा प्रतिभाओं को अपनी प्रतिभा की सधनता दिखाने का मौका मिला है। गौर करें तो रनवीर सिंह अपनी पिछली फिल्मों के चरित्रों के मिजाज के विस्तार में हैं,लेकिन इस बार उनका चरित्र जटिल और द्वंद्व में उलझा है। रनवीर ने अत्यंत सहजता से वरूण उर्फ नंदू उर्फ आत्मानंद त्रिपाठी के चरित्र को निभाया है। सोनाक्षी सिन्हा के बारे में धारणा रही है कि पॉपुलर स्टारों के सहारे वह बॉक्स ऑफिस की बेजोड़ हीरोइन रही हैं। उनके आलोचक भी स्वीकार करेंगे कि उन्होंने 'लुटेरा' में अपनी अनछुई और अनजान प्रतिभा को उजागर किया है। विक्रम की फिल्म ने उन्हें तराशा और तपाया है। सोनाक्षी ने पाखी को जिया है। अन्य कलाकार भी उल्लेखनीय हैं।
पाखी के जमींदार पिता के रूप में बरूण चंदा उल्लेखनीय हैं। हिंदी फिल्मों में किरदारों के बारे में बताने के लिए कुछ सीन खर्च करने पड़ते हैं। बरूण दा की उपस्थिति मात्र से उन दृश्यों की बचत हो गई है। आदिल हुसैन फिर से प्रभावशाली भूमिका में नजर आते हैं। आरिफ जकारिया,दिब्येन्दु भट्टाचार्य,विक्रांत मैसी और दिव्या दत्ता अपेक्षाकृत छोटी और जरूरी भूमिकाओं में संग योगदान करते हैं। इस फिल्म की एक प्रासंगिक खासियत है। फिल्म देखते समय आप ने संवादों पर धान ही नहीं दिया होगा। फिल्म में डॉयलॉगबाजी नहीं है। सारे भाव-अनुभाव सहज शब्दों में संप्रेषित होते हैं। संवाद लेखक अनुराग कश्यप का योगदान सराहनीय है। साथ ही फिल्म के एक खास दृश्य में बाबा नागार्जुन की कविता 'अकाल और उसके बाद' का युक्तिगत उपयोग उसे हिंदी मिजाज देता है। सभी भाषाओं में दो किरदारों को भाव की एक ही जमीन पे लाने के लिए लेखक-निर्देशक कविताओं का इस्तेमाल करते रहे हें। हिंदी फिल्मों में भी हम अंग्रेजी की कविताएं या अशआर सुनते रहे हैं। अनुराग कश्यप ने बाबा नागार्जुन की की कविता 'कई दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास' से पाखी और वरूण के बीच प्रेम का संचार कराया है। बाबा की कविता के इस्तेमाल के लिए टीम लुटेरा को अतिरिक्त बधाई।
फिल्म के गीत-संगीत और सिनेमैटोग्राफी का जिक्र होना ही चाहिए। अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य की जोड़ी ने भावपूर्ण और परिवेशात्मक संगीत देता है। केवल मोनाली ठाकुर के स्वर में 'संवार' की 'सवार' ध्वनि खलती है। फोटोग्राफी में महेंद्र शेट्टी के सटीक एंगल और विजन से फिल्म की खूबसूरती बढ़ गई है। और हां फिल्म के निर्माताओं को धन्यवाद कि उन्होंने ऐसे विध्वंयात्मक मनोरंजन के दौर में विक्रमादित्य की सोच को संबल दिया।
अवधि-187 मिनट
**** 1/2 साढ़े चार स्टार