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Friday, November 25, 2011

फैंटम के पीछे की सोच

फेंटम के पीछे की सोच-अजय ब्रह्मात्‍मज

मुंबई में आए दिन फिल्मों की लॉन्चिंग, फिल्म कंपनियों की लॉन्चिंग या फिल्म से संबंधित दूसरे किस्म के इवेंट होते रहते हैं। इनका महत्व कई बार खबरों तक ही सीमित रहता है। मुहूर्त और घोषणाओं की परंपरा खत्म हो चुकी है। कॉरपोरेट घराने शो बिजनेस से तमाशा हटा रहे हैं। वे इस तमाशे को विज्ञापन बना रहे हैं। उनके लिए फिल्में प्रोडक्ट हैं और फिल्म से संबंधित इवेंट विज्ञापन...। सारा जोर इस पर रहता है कि फिल्म की इतनी चर्चा कर दो कि पहले ही वीकएंड में कारोबार हो जाए। पहले हफ्ते में ही बड़ी से बड़ी फिल्मों का कारोबार सिमट गया है। इस परिप्रेक्ष्य में मुंबई के यशराज स्टूडियो में नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की लॉन्चिंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

यश चोपड़ा, यशराज फिल्म्स और यशराज स्टूडियो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी के साथ खास किस्म की फिल्मों के एक संस्थान के रूप में विख्यात है। पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य चोपड़ा के विजन से चल रहे इस संस्थान के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का लंबा इतिहास जुड़ा है। सफल और मशहूर यश चोपड़ा की फिल्मों ने ही समकालीन हिंदी सिनेमा की दिशा और जमीन तैयार की है। आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का नया अध्याय आरंभ होता है। आदित्य चोपड़ा की शैली और सोच ने मुख्य रूप से फिल्म इंडस्ट्री से निकले फिल्मकारों को प्रभावित किया। इस तरह के सिनेमा के उत्कर्ष के दिनों में ढेर सारे युवा फिल्मकारों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया। वे अपने साथ नई सोच और शैली लेकर आए। उनके सिनेमा को स्थापित फिल्मकारों के सिनेमा के साथ जगह नहीं मिली। यहां तक कि युवा फिल्मकारों को हतोत्साहित किया गया। उन्हें मौकों और पैसों से महरूम रखा गया, ताकि वे अपने ख्वाबों के सिनेमा को शक्ल न दे सकें।

ऐसे फिल्मकारों में अनुराग कश्यप काफी आगे और वाचाल रहे। उन्होंने अपनी फिल्मों और बयानों से स्थापित सिनेमा को चुनौती दी। उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। उनकी पहली फिल्म पांच अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। फिर भी अनुराग ने हिम्मत नहीं हारी। वे किसी तरह अपनी फिल्में और जगह बनाते रहे। पांव धरने की थोड़ी-सी जगह मिली, तो उन्होंने अपनी मौजूदगी से सभी को चौंका दिया। उनकी फिल्में पसंद की गईं। उससे भी बड़ी बात है कि अनुराग को नई सोच और परिवर्तन का प्रतीक माना गया। यह सच भी है, क्योंकि अनुराग कश्यप और उनके समकालीन फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को ताजगी दी है। हालांकि उन्हें फिल्म इंडस्ट्री के ढांचे में ही काम करना पड़ा और पुराने तरीके के बीच चलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी फिल्मों से स्पष्ट कर दिया है कि उनका सिनेमा हिंदी फिल्मों में कुछ जोड़ रहा है।

अनुराग कश्यप ने अपने मित्रों विक्त्रमादित्य मोटवाणी और विकास बहल के साथ नई प्रोडक्शन कंपनी फैंटम की शुरुआत की है। इसमें उनके साथ विक्त्रम मल्होत्रा और मधु मंटेना भी हैं। पांचों ने मिलकर फैंटम की लॉन्चिंग के साथ नई फिल्म लुटेरा की घोषणा की। लुटेरा का निर्देशन विक्त्रमादित्य मोटवाणी कर रहे हैं। इसमें रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा की जोड़ी है। छठे दशक की पृष्ठभूमि पर बन रही लुटेरा पीरियड फिल्म है। फैंटम युवा फिल्मकारों की प्रोडक्शन कंपनी हैं, जिसका उद्देश्य नए विषयों पर अलग किस्म की नई फिल्में बनाना है। अनुराग कश्यप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभी तक हम निर्माताओं के दबाव में रहते हैं। हम अपनी समझ की फिल्में नहीं बना पाते हैं। फैंटम के जरिए कोशिश होगी कि किसी फिल्मकार पर कथित बाजार का दबाव न हो। चूंकि हम सभी क्त्रिएटिव व्यक्ति हैं, इसलिए भी उम्मीद की जा सकती है कि हमारा ध्यान फिल्म के बिजनेस से अधिक विषय पर होगा।

यशराज स्टूडियो में फैंटम प्रोडक्शन कंपनी की लॉन्चिंग वास्तव में पुरानी व्यवस्था की गोद से नई व्यवस्था का जन्म लेना है। हमें इस पहल का स्वागत करना चाहिए।

Saturday, June 27, 2009

फ़िल्म समीक्षा:न्यूयार्क

-अजय ब्रह्मात्मज
कबीर खान सजग फिल्मकार हैं। पहले काबुल एक्सप्रेस और अब न्यूयार्क में उन्होंने आतंकवाद के प्रभाव और पृष्ठभूमि में कुछ व्यक्तियों की कथा बुनी है। हर बड़ी घटना-दुर्घटना कुछ व्यक्तियों की जिंदगी को गहरे रूप में प्रभावित करती है। न्यूयार्क में 9/11 की पृष्ठभूमि और घटना है। इस हादसे की पृष्ठभूमि में हम कुछ किरदारों की बदलती जिंदगी की मुश्किलों को देखते हैं।
उमर (नील नितिन मुकेश) पहली बार न्यूयार्क पहुंचता है। वहां उसकी मुलाकात पहले माया (कैटरीना कैफ) और फिर सैम (जान अब्राहम) से होती है। तीनों की दोस्ती में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। उमर को लगता है कि माया उससे प्रेम करती है, जबकि माया का प्रेम सैम के प्रति जाहिर होता है। हिंदी फिल्मों की ऐसी स्थितियों में दूसरा हीरो त्याग की मूर्ति बन जाता है। यहां भी वही होता है, लेकिन बीच में थोड़ा एक्शन और आतंकवाद आता है। आतंकवाद की वजह से फिल्म का निर्वाह बदल जाता है। स्पष्ट है कि उमर और सैम यानी समीर मजहब से मुसलमान हैं। उन पर अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई को शक होता है। कहते हैं 9/11 के बाद अमेरिका में 1,200 मुसलमानों को शक के घेरे में लिया गया। समीर उनमें से एक है। नौ महीने की हिरासत में पुलिस यातना सहने के बाद वह मुक्त होता है तो उसके दिल में एफबीआई के लिए घोर नफरत है। एफबीआई को उस पर फिर से शक है, लेकिन इस बार वह समीर के दोस्त उमर को अपना एजेंट बना लेती है। पक्के सुबूत के लिए उमर का इस्तेमाल किया जाता है। एफबीआई में मुसलमान अधिकारी रोशन है, जो 9/11 के बाद मुसलमानों के प्रति फैले रोष और संदेह को मिटाना चाहता है। उसका मानना है कि इसके लिए मुसलमानों को आगे आना होगा।
दोस्ती, प्यार, रिश्ते और इज्जत जैसी भावनाओं को घोल कर न्यूयार्क तैयार की गई है। ऊपरी तौर पर रियलिस्टक और हार्ड हिटिंग लग रही यह फिल्म हिंदी फिल्मों के फार्मूले से बाहर नहीं निकल पाती। कबीर खान कहीं न कहीं यशराज फिल्म्स के प्रचलित ढांचे में खुद को ढालते नजर आते हैं। प्रसंग और स्थितियां वास्तविक होने के बावजूद गहराई से इसलिए नहीं छू पातीं क्योंकि उनमें बनावटीपन दिखाई पड़ता है। कबीर की छटपटाहट दिखाई पड़ती है। वह प्रचलित ढांचे से बार-बार निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी कोशिशों को कतर दिया जा रहा है।
कबीर खान ने अमेरिकी समाज के सोच और राजनीति की आलोचना की है, लेकिन उस धारणा को ही रेखांकित किया है कि अमेरिकी समाज में हर नागरिक को मौलिक स्वतंत्रता हासिल है। 9/11 के बाद भी आतंकवाद के संदेह में आए मुसलमान व्यक्तियों का मामला एक मुसलमान अधिकारी को सौंपा जाता है। एक मुसलमान, आतंकवादी के बेटे को अमेरिकी समाज अपना हीरो बनाने को तैयार है। अमेरिका के इस स्वच्छ, लोकतांत्रिक और आदर्शवादी सोच को लेकर कई सवाल मन में उठते हैं। न्यूयार्क अमेरिका के प्रति भरोसा रखने और जगाने का प्रयास करती है।
कलाकारों की बात करें तो पहली बार ग्लैमरहीन भूमिका में कैटरीना कैफ दिखी हैं। कुछ दृश्यों में वे जंचती हैं तो कुछ में संघर्ष करती नजर आती हैं। कबीर खान ने माया की भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की रखी है। वह कारक नहीं है। फिल्म मुख्य रूप से नील नितिन मुकेश, जान अब्राहम और इरफान खान की है। इरफान दिए गए दृश्यों में ही अभिनय के पल चुरा लेते हैं। हां, नील नितिन मुकेश फिर से साबित करते हैं कि अगर उन्हें सही चरित्र मिले तो वह निराश नहीं करेंगे। जान अब्राहम के अभिनय में अपेक्षाकृत विकास है। यातना और रोष के दृश्यों में वे अपनी सीमित भंगिमाओं से बाहर आते हैं। फिल्म में गीत-संगीत लगभग अप्रासंगिक है। न्यूयार्क को फिल्माने में निर्देशक ने कैमरामैन का सही उपयोग किया है। फिल्म इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि यह हिंदी फिल्मों के प्रचलित ढांचे में रहते हुए इश्क-मुहब्बत से परे जाकर रिश्तों और राजनीति की बात करती है।
रेटिंग : ***

Saturday, May 10, 2008

क्या अपनी फिल्में देखते हैं यश चोपड़ा?


-अजय ब्रह्मात्मज


फिल्म टशन की रिलीज और बॉक्स ऑफिस पर उसके बुरे हश्र के बाद यही सवाल उठ रहा है कि क्या यश चोपड़ा अपनी फिल्में देखते हैं? चूंकि वे स्वयं प्रतिष्ठित निर्देशक हैं और धूल का फूल से लेकर वीर जारा तक उन्होंने विभिन्न किस्म की सफल फिल्में दर्शकों को दी हैं, इसलिए माना जाता है कि वे भारतीय दर्शकों की रुचि अच्छी तरह समझते हैं। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि यशराज फिल्म्स की पांच फिल्मों में से चार औसत से नीचे और सिर्फ एक औसत या औसत से बेहतर फिल्म हो पा रही है। ऐसा तो नहीं हो सकता कि रिलीज के पहले ये फिल्में उनकी नजरों से नहीं गुजरी हों! क्या यश चोपड़ा की सहमति से इतनी बेकार फिल्में बन रही हैं?
नील एन निक्की, झूम बराबर झूम जैसी फिल्मों को देखकर कोई भी अनुभवी निर्देशक उनका भविष्य बता सकता है? खास कर यश चोपड़ा जैसे निर्देशक के लिए तो यह सामान्य बात है, क्योंकि पिछले 60 सालों में उन्होंने दर्शकों की बदलती रुचि के अनुकूल कामयाब फिल्में दी हैं। वीर जारा उनकी कमजोर फिल्म मानी जाती है, लेकिन टशन और झूम बराबर झूम के साथ उसे देखें, तो कहना पड़ेगा कि वह क्लासिक है।
दिल तो पागल है के समय यश चोपड़ा ने अपने बेटे के दबाव और प्रभाव में आकर अपनी शैली बदली। फिर भी हिंदी फिल्मों की पारंपरिक संवेदना यश चोपड़ा निर्देशित फिल्मों में बनी रही। यहां तक कि आदित्य की फिल्में भी नवीनता के आग्रह के बावजूद पारंपरिक ढांचे में ही बनी हैं। उनकी प्रस्तुति में आधुनिकता है। शिल्प पुराने अंदाज का ही है। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि आदित्य की देख-रेख में बनी फिल्म बेकार साबित हो रही हैं?
जबरदस्त प्रचार, सितारों की भीड़ और टशन टीम के अहंकार से लग रहा था कि यशराज फिल्म्स की नायाब फिल्म आ रही है। इस फिल्म के निर्देशक ने रिलीज से पहले मीडिया से कोई बात नहीं की और अब उनसे मीडिया यह पूछने के लिए भी तैयार नहीं है कि उन्होंने इतनी खराब फिल्म क्यों बनाई? यशराज फिल्म्स ने अपने हिसाब से मनोरंजन का महल खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन पहले ही दिन दर्शकों के पांव रखते यह महल ढह गया। फिल्म की इस नियति की कल्पना निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य, निर्माता आदित्य चोपड़ा और यश चोपड़ा ने नहीं की होगी।
अगर यशराज फिल्म्स से आ रही खबरों पर यकीन करें, तो फिल्मों के चुनाव और प्रस्तुति के मामले पर पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य के बीच लंबे समय से मनमुटाव चल रहा है। यश चोपड़ा की हर सलाह अनसुनी हो जाती है। यहां तक कि उनके सुझाए ऐक्टर और सब्जेक्ट भी आदित्य की टीम के लिए मायने नहीं रखते। उन पर विचार ही नहीं किया जाता। आदित्य यशराज फिल्म्स के क्रिएटिव कमांडर हैं। केवल उनके ही आदेश पर अमल होता है। यश चोपड़ा अपने प्रोडक्शन हाउस के सिग्नेचर मात्र रह गए हैं। न ही उनसे कुछ पूछा जाता है और न ही राय पर गौर किया जाता है।
दरअसल.., टशन की असफलता वह खतरे की घंटी है, जिसकी गूंज यशराज फिल्म्स के हर कोने में सुनाई पड़ी है। गहरा मंथन और विचार चल रहा है कि आखिर यशराज फिल्म्स किस प्रकार की फिल्में लेकर आए? इस साल रोडसाइड रोमियो एनिमेशन फिल्म और कुणाल कोहली की थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक रिलीज होगी। साल के अंत तक आदित्य चोपड़ा निर्देशित फिल्म रब ने बना दी जोड़ी आएगी। उम्मीद रखनी चाहिए कि आदित्य फिर से यशराज फिल्म्स को मनोरंजन की पटरी पर ले आएंगे, लेकिन अभी तो यशराज की गाड़ी पटरी से उतरी दिख रही है!