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Thursday, October 11, 2018

फिल्म लॉन्ड्री : #MeToo: मुंबई फिल्म उद्योग का खुला और घिनौना सच

फिल्म लॉन्ड्री
नया नहीं है यौन शोषण का मसला
-अजय ब्रह्मात्मज
तनुश्री दत्ता ने 2008 में ‘हॉर्न ओके प्लीज के सेट पर एक डांस सीक्वेंस के समय हुए अप्रत्याशित और अपमानजनक अनुहवों को शेयर करते हुए नाना पाटेकर पर यौन शोषण का ताज़ा आरोप लगाया है. इस आरोप के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यौन शोषण के मामले ने तूल पकड़ा है. पत्रकार छोटे,मझोले और बड़े फिल्म स्टार और अन्य हस्तियों से उनकी राय पूछ रहे हैं.कुछ समर्थन में तो कुछ महिलाओं के प्रति निस्संग सहानुभूति में अपनी रायरख रहे हैं. हॉलीवुड में ‘मी टू’ अभियान के जोर पकड़ने और हार्वी वाइनस्टीन का मामला सामने आने के बाद भारत में भी अभिनेत्रियों के बीच सुगबुगाहट दिख रही है. पिछले साल दबे स्वर में ही सही,लेकिन अनेक अभिनेत्रियों ने खुद के हौलनाक अनुभव शेयर किये.इसके बावजूद यह सच्चाई है कि कभी बदनामी और कभी अलग-थलग कर दिएजाने के डर से अभिनेत्रियाँ ऐसे अपराधियों के नाम लेने से हिचकिचाती हैं. एक निर्माता,एक निर्देशक.एक कास्टिंग डायरेक्टर और एक को-एक्टर का चेहराविहीन उल्लेख किया जाता है. अपराधियों का पर्दाफाश नहीं होता. कुछ समय के बाद फिल्म इंडस्ट्री पुराने ढर्रे पर चलने लगती है.
इसी साल डेज़ी ईरानी ने जब पचास साल पुराना भेद खोला कि उनके संरक्षक और अभिभावक के तौर पर साथ आए पुरुष ने उनके साथ दुष्कर्म किया तो फिल्म इंडस्ट्री में खलबली सी मच गयी.एक बार फिर पुराने किस्से सुनाई पड़ने लगे. दिक्कत यह है कि हमेशा आरंभिक शोर के बाद सब कुछ कानाफूसी में तब्दील होकर अगली घटना तक दब जाता है.याद करें कि  इसी साल अप्रैल में ‘कास्टिंग काउच’ की कितनी घटनायें सुनाई और बताई गईं. राधिका आप्टे,स्वरा भास्कर,रिचा चड्ढा,उषा जाधव ने अपने अनुभव बताये. उस समय कुछ अभिनेत्रियों ने तो ऑफ द रिकॉर्ड कुछ कास्टिंग डायरेक्टर और डायरेक्टर के नाम भी बताये. उनमें से कोई भी दोषियों के नामों के सार्वजानिक उद्घाटन का सहस नहीं कर पाया. सभी को एक ही डर है कि हिंदी फिल्मों का तंत्र उसे पीस डालेगा और निकल बहार करेगा. उनमें से एक सक्रिय अभिनेत्री तनुश्री का प्रकरण सामने आने और उनकी हिम्मत की दाद देने पर यही कहा कि उसे फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं चाहिए,इसलिए वह हिम्मत कर सकती है.सारा मसला और मामला एकता के अभाव और सामूहिक स्वर की कमी से बेजान हो जाता है. फिल्म और टीवी कलाकारों के एसोसिएशन CINTAA के मानद सचिव और प्रवक्ता सुशांत सिंह ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि 2008 में तनुश्री की शिकायत पट उचित फैसला नहीं लिया जा सका था.उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया है कि एसोसिएशन के संविधान में तीन साल से पुराने मामले पर विचार करने का प्रावधान नहीं है. उन्होंने अधिकारीयों से अपील की है कि इस मेल की निष्पक्ष जांच करवाएं.
इस बीच नाना पाटेकर के वकील ने तनुश्री दत्ता को लीगल नोटिस भेजी है.महारष्ट्र सर्कार के गृह मंत्री दीपक केसरकर ने पहले तो नाना पाटेकर के बारे कहा कि वे महज अभिनेता नहीं हैं. वह सोशल वर्कर भी हैं और उन्होंने महाराष्ट्र के लिए अनेक कार्य किये हैं. संकेत यह था कि उन्हें किसी आरोप में घसीटना उचित नहीं होगा.बाद में उन्होंने यह कहना शुरू किया कि अगर तनुश्री दत्ता पुलिस में शिकायत करती हैं तो पूरी पारदर्शिता के साथ जाँच होगी.शनिवार को तनुश्री दत्ता ने अँधेरी के ओशिवारा पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कर दिया है. तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर और गणेश आचार्य के साथ ही निर्माता सामी सिद्दीकी,निर्देशक राकेश सारंग और मनसे के कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है.अब देखना रोचक होगा कि मुंबई पुलिस और महारष्ट्र सरकार पारदर्शी जांच के लिए क्या कदम उठाती है. उन्होंने अपनी शिका्यत में लिखा है कि तीन दिनों के रिहर्सल के बाद गाने की शूटिंग के चौथे दिन 26 मार्च 2008 को ज़रुरत नहीं होने के बावजूद नाना पाटेकर सेट पर मौजूद थे. मुझे डांस सिखाने के नाम पर हाथ पकड़ कर खींच और धकेल रहे थे. इस प्रक्रिया में अनुचित तरीके से वे मुझे छू रहे थे.मुझे सब असहज लगा तो मैंने निर्माता-निर्देशक से शिकायत की.शूटिंग रोक दे गयी. एक घंटे के बाद जब मुझे बुलाया गया तो नए स्टेप जोड़ दिए गए,जो अन्तरंग होने के साथ मुझे छूने के भी थे. इस मामले में नाना पाटेकर और उनके समर्थक तर्क दे रहे हैं कि सेट पर सकदों लोगों की मौजूदगी में कैसे कोई ऐसी हरकत करेगा? बस,बाज़ार और मेले की छेडखानियों को याद करें तो वह भीड़ के बीच ही होती है.यौन उत्पीडन के दोषी उत्तेजना में हिंसक और आक्रामक हो जाते हैं. उन्हें परिणाम की चिंता नहीं रहती.अमूमन देखा गया है कि ऐसे मामलों में प्रत्यक्षदर्शी भी खामोश रह जाते हैं.फिल्म इंडस्ट्री में ताकतवर और रसूखदार का दबदबा बना रहता है.उनकी लॉबी नाराज़ होने पर इंडस्ट्री से निकाल बाहर करने का इंतजाम कर लेती है.तनुश्री के बारे में प्रचार हो गया कि वह अनप्रोफेशनल है.स्थिति यह बन गयी कि आख़िरकार तनुश्री दत्ता को फिल्म इंडस्ट्री छोडनी पड़ी.
नाना पाटेकर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय मराठी एक्टर हैं.किसी राजनीतिक पार्टी से उनका सीधा ताल्लुक नहीं है,लेकिन सत्ता में मौजूद सभी नेता बतौर अभिनेता और सोशल वर्कर उनका सम्मान करते हैं.अपने बेबाक और ढीठ व्यक्तित्व से उन्होंने एक अलग पहचान बनायीं है.फिल्म इंडस्ट्री में सभी मानते हैं कि नाना ‘नो नोंसेंस’ व्यक्ति हैं और सेट पर निर्माता-निर्देशक और सहयोगी कलाकारों से कुछ भी कह सकते हैं.रूखे व्यवहार के लिए मशहूर नाना तुनकमिजाज हैं. वे थोड़े अप्रिय और अप्रत्याशित माने जाते हैं नाना.फिल्मों में उनकी प्रतिभा की वजह से लेने के बावजूद डायरेक्टर डरे-सहमे रहते हैं.अनेक फिल्मकारों और को-एक्टर के खट्टे अनुभव रहे हैं.व्यर्थ औपचारिकताओं का पालन न करने की वजह से उनका व्यवहार उज्जड और उदंड लगता है.इसका उन्हें लाभ भी मिलता है.वह कुछ बोल कर निकल जाते हैं.उन्हें ‘मूडी' कलाकार की संज्ञा मिली हुई है.साथ कर चुके कलाकार कहते हैं कि वे ऐसे ही हैं.
तनुश्री दत्ता के ताज़ा एफ़आईआर  से स्पष्ट है कि वह पिछली बार की तरह खामोश नहीं रहेंगी.पिछली बार अपमान के घूँट पीकर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री से तौबा करनी पड़ी थी.फिल्म इंडस्ट्री में इतिहास कुरेदें तो अनेक नई-पुरानी घटनाएं मिल जायेंगीं. ‘दो शिकारी' (1979) फिल्म में बिश्वजीत ने निर्माता-निर्देशक से साठगांठ कर फिल्म में चुम्बन का दृश्य डलवाया.फिल्म की नायिका रेखा थीं.इस सीन को फिल्माते समय बिश्वजीत ने रेखा को दबोचा और निर्देशक ने पांच मिनट तक कट नहीं बोला.रेखा तब नयी-नयी थीं.माधुरी दिक्सित को भी ऐसे जबरन दृश्यों से गुजरना पड़ा है.1935 की कोलकाता के न्यू थिएटर की एक घटना है. कोलकाता के बोउ बाज़ार(रेड लाइट ) की इमाम बांदी को बी एन सरकार की टीम ने चुना और उन्हें ‘यहूदी की लड़की',’कारवां-ए-हयात' जैसी फिल्मों में काम दिया.रतन बाई को राष्ट्रिय ख्याति मिली.लेकिन जब ‘कारवां-ए-हयात' रिलीज हुई तो रतन बाई अपनी भूमिका के कट जाने से हैरान हुईं और उन्होंने इसकी लिखित शिकायत की.तब बी एन सरकार के वकील ने जवाब में जो चिट्ठी लिखी,उसमें उनकी पृष्ठभूमि का उल्लेख कर यह जताने की कोशिश की कि न्यू थिएटर ने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया,भला बी एन सरकार रतन बाई की प्रतिष्ठा को कैसे आंच पहुंचा सकते हैं? रतन बाई चुप नहीं बैठीं. उन्होंने पलट कर जवाब भेजा कि सोनागाछी,रामबागान.हरकटा गली और बोउ बाज़ार से सैकड़ों लड़कियां चुनी गईं,लेकिन उनमें से कितनी को राष्ट्रीय ख्याति मिली ? मेरी पैदाईश और पृष्ठभूमि के बारे में बता कर सरकार अपनी घृणा व्यक्त कर रहे हैं.
ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है,जिसमें अभिनेत्रियों का यौन शोषण और उत्पीडन किया गया.कानन देवी और दुर्गा खोते ने अपनी आत्मकथाओं में ऐसे बुरे अनुभवों का ज़िक्र किया है.उन दिनों तो मन ही जाता था कि सभ्य और शिक्षित परिवारों की लड़कियां फिल्मों में नहीं आतीं.अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ़ बेगम अख्तर के साथ किशोरावस्था में ही दुष्कर्म हुआ.उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया,लेकिन उसे बेटी का दर्जा नहीं दे सकीं.उसे बहन ही बताती रहीं.हर दशक में मशहूर होने के पहले अभिनेत्रियों को बुरे और अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा है.फिल्म इंडस्ट्री में यह मानी हुई बात है किआउटसाइडर लड़कियों को यह सब भुगतना ही पड़ेगा.अभी लड़कियां थोड़ी सजग हो गयी हैं.उन्हें हमेशा सचेत रहना पड़ता है.इसी हफ्ते पूजा भट्ट ने दिल्ली में बताया कि एक बार एक को-एक्टर ने एअरपोर्ट पर उनकी छाती पर हाथ रखा था.फैंटम दो दिनों पहले बंद हो गया,उसके चार निदेशकों में से एक विकास बहल पर एक सहायिका ने यौन उत्पीडन का आरोप लगाया था.फैंटम के विलयन में इस आरोप का भी असर रहा है.महिला और बाल विकास मंत्रालय के सख्त आदेश के बावजूद फिल्म कंपनियों में यौन उत्प्पेदन और शोषण की कार्रवाई के लिए ज़रूरी कमिटी नहीं हैं.शशित और उत्पीडित लड़कियां बदनामी के डर और कुछ भी नतीजा न निकलने की आशंका से घटनाओं को खुलेआम नहीं करती हैं.उन्हें सलाह दी जाती है कि देख लो,कुछ होगा नहीं और तुम्हें बदनामी मिलेगी.
तनुश्री दत्ता के मेल में ही अमिताभ बच्चन,सलमान खान और दुसरे बड़े स्टार का रवैया खेदजनक है.सपोर्ट करना तो दूर,उन्होंने सिरे से किनारा कर लिया और कुछ भी कहने से बचे.एक रेणुका शहाणे खुल कर समर्थन में आईं और उन्होंने तार्किक तरीके से अपना पक्ष रखा.युवा कलाकारों ने बेशक हमदर्दी दिखाई है.कुछ ऐसी भी प्रतिक्रियाएं आईं कि ऐसे मामले तो हर जगह होते हैं.और देखना पड़ेगा कि कौन दोषी है और किस का आरोप सही है.पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों की शिकायत को सबसे पहले ख़ारिज कर दिया जाता है.अमूमन सभी सोचते हैं कि यह कौन सी नयी बात है.’नो मीन्स नो' की किताबी और फ़िल्मी वकालत तो की जाती है,लेकिन व्यवहार में उसके पैरोकार ही पलटते नज़र आते हैं.
पिछले दो सालों में जागरूकता आई है.फिल्म इंडस्ट्री के दफ्तरों,सेट और स्टूडियो में लड़कियों की तादाद बढी है.अब अभिनेत्रिय अपनी बहनों या मां के साथ शूटिंग पर नहीं जातीं’कमरे में कोई लड़की मौजूद हो तो फिल्म यूनिट के पुरुष सदस्य अपनी टिप्पणियों,बैटन और मजाक में सावधान रहते हैं.समबन्ध और स्थितियां बदल रही है. अगर तनुश्री दत्त के आरोपों का उचित नतीजा निकला तो इसके व्यापक परिणाम होंगे.कास्टिंग काउच के अगले चरण के शोषण और उत्पीडन की संभावनाओं पर अंकुश लगेगा.