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Monday, March 7, 2016

फिल्‍म समीक्षा : जय गंगाजल




देसी मिजाज और भाषा

-अजय ब्रह्मात्‍मज
हिदी सिनेमा के फिल्‍मकार अभी ऐसी चुनौतियों के दौर में फिल्‍में बना रहे हैं कि उन्‍हें अब काल्‍पनिक कहानियों में भी शहरों और किरदारों के नामों की कल्‍पना करनी पड़ेगी। यह सावधानी बरतनी होगी कि निगेटिव छवि के किरदार और शहरों के नाम किसी वास्‍तविक नाम से ना मिलते हों। जय गंगाजल में बांकीपुर को लेकर विवाद रहा कि इस नाम का बिहार में विधान सभा क्षेत्र है। चूंकि फिल्‍म के विधायक बांकीपुर के हैं,इसलिए दर्शकों में संदेश जाएगा कि वहां के वर्त्‍तमान विधायक भी भ्रष्‍ट हैं। कल को फिल्‍म के किरदार भोलानाथ सिंह यानी बीएन सिंह नाम का कोई पुलिस अधिकारी भी आपत्ति जता सकता है कि इस फिल्‍म से मेरी बदनामी होगी। भविष्‍य अब खल और निगेटिव किरदारों के नाम दूधिया कुमार और बर्तन सिंह होंगे। शहरों के नाम भागलगढ़ और पतलूनपुर होंगे। ताकि कोई विवाद न हो। बहरहाल,प्रकाश झा की जय गंगाजल मघ्‍य प्रांत के एक क्षेत्र की कहानी है,जहां आईपीएस अधिकारी आभा माथुर की नियुक्ति होती है। मुख्‍यमंत्री की पसंद से उन्‍हें वहां भेजा जाता है।
आभा माथुर को मालूम है कि उनके क्षेत्र में सब कुछ ठीक नहीं है। वह आते ही घोषणा करती है, मैं यहां टेबल कुर्सी पर बैठ कर सलामी ठोकवाने नहीं आई हूं।वह आगे कहती है,आज समाज में उसकी इज्‍जत होती है,जो कानून तोड़ता है,लेकिन मैं उसकी इज्‍जत करती हूं जो कानून तोड़ने वाले को तोड़ता है। सच्‍चे इरादों की हिम्‍मती आभा सब कुछ साफ बता देती है। वह अपने सर्किल बाबू को बताती है कि कीचड़ धोने के लिए साफ पानी की जरूरत होती है। गंदे पानी की नहीं। आभा माथुर को भोलानाथ सिंह जैसे चालू सर्किल बाबू के साथ काम करना है,जो हर हाल में अपना काम निकालना जानते हैं और सब कुठ ठीक कर देते हैं। वे कहते हैं,हम तो नौकरी में आते ही समझ गए थे कि मस्‍ती से जीना है तो कभी अपना इमेज बनने ही ना दो। बड़ा मुश्किल होता है जीना। भोलानाथ सिंह के भ्रष्‍टाचार से ऐसी दुर्गंध आती है कि वे इलायची बांट कर दूसरों की सोच और स्‍वाभिमान में सुगंध लाने की बातें करते रहते हैं।
जय गंगाजल प्रकाश झा की परिचित शैली और सिनेमाई भाषा की सामाजिक-राजनीतिक फिल्‍म है,जिसका प्रस्‍थान आधार उनकी ही फिल्‍म गंगाजल है। गंगाजल अपराध से त्रस्‍त एक ऐसे समाज और पुलिस अधिकारी की कहानी थी,जो भीड़ के न्‍याय की दुविधा से ग्रस्‍त था। आभा माथुर भीड़ के न्‍याय का विरोध करती है। वह कानून के दायरे में ही भ्रष्‍ट राजनीतिज्ञों को सजा दिलाने में यकीन रखती है। कर्तव्‍य निर्वाह में वह अपने कथित संरक्षक की चेतावनी को भी अनसुना कर देती है। स्थिति ऐसी आती है कि उसे अकेला जूझना होता है। फिर भी वह हिम्‍मत नहीं हारती। वह अपनी निष्‍ठा और ईमानदारी से भोलेनाथ जैसे भ्रष्‍ट सर्किल बाबू का भी हृदय परिवर्तन कर देती है। समाज का समर्थन हासिल करती है।
जय गंगाजल आभा माथुर की ईमानदारी व निष्‍ठा तथा भोलेनाथ के भ्रष्‍ट आचरणों के द्वंद्व को लेकर चलनती है। इसमें बबलू और डब्‍लू पांडे जैसे बाहुबली नेता भी हैं,जिनका दावा है कि इस बांकीपुर में दाएं-बाएं,ऊपर-नीचे सब हमारे इशारे पर होता है। चार बार से विधायक चुने जा रहे बबलू पांडे को लगता है कि वे ही आजीवन विधायक चुने जाते रहेंगे। आभा माथुर उनके दंभ और भ्रम को तोड़ती है। उनके सहायक रहे भालेनाथ भी बदलते हैं और पश्‍चाताप की भावना से नेक राह अपना लेते हैं। यह फिल्‍म आभा माथुर से अधिक भोलेनाथ की कहानी हो जाती है,क्‍योंकि उस किरदार में परिस्थिति के साथ परिवर्तन आता है। वह कहानी के केंद्र में बना रहता है।
-जय गंगाजल में प्रकाश झा ने पहली बार किसी मुख्‍य किरदार की भूमिका निभायी है। उन्‍होंने किरदार में ढलने और उसे रोचक बनाए रखने की भरपूर कोशिश की है। फिर भी कुछ दृश्‍यों में कैमरे के सामने उनका संकोच जाहिर होता है। अनुभवी निर्देशक कैमरे के सामने आने पर अभिनेताओं की चुनौतियों और सीमाओं से वाकिफ होने की वजह से असहज हो सकता है। प्रकाश झा संयत और सहज रहने का सफल यत्‍न करते हैं। आभा माथुर के किरदार में प्रियंका चोपड़ा ने जोशीला अभिनय किया है। वह इस भूमिका में हमेशा तत्‍पर और त्‍वरित दिखती हैं। उन्‍हें जोरदार संवाद मिले हैं,जिन्‍हें वह बखूबी अदा करती हैं। वर्दी में उनकी चपलता देखते ही बनती है। उनके एक्‍शन दृश्‍यों में कोई डर या झिझक नहीं है। मानव कौल के रूप में हिंदी फिल्‍मों को एक ऐसा खल अभिनेता मिला है,जो चिल्‍लाता और भयानक चेहरा नहीं बनाता। उसकी करतूतें नहीं मालूम हों तो वह नेकदिल और सभ्‍य लग सकता है। इस फिल्‍म में निाद कामथ और मुरली शर्मा ने दी भूमिकाओं को अच्‍छी तरह निभया है। अन्‍य कलाकारों में राहुल भट्ट,वेगा टमोटिया,शक्ति सिन्‍हा,प्रणय नारायण आदि उल्‍लेखनीय हैं।
प्रकाश झा की जय गंगाजल देसी मिजाज की सामाजिक फिल्‍म है। लंबे समय के बाद फिल्‍म के प्रमुख किरदारों के संवाद याद रह जाते हैं। यह फिल्‍म मुद्दों से अधिक व्‍यक्तियों की भिड़ंत को लेकर चलती है।
अवधि- 148 मिनट
स्‍टार- ***1/2 साढ़े तीन स्‍टार

Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार