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Friday, April 14, 2017

फिल्‍म समीक्षा : बेगम जान



फिल्‍म रिव्‍यू
बेगम जान
अहम मुद्दे पर बहकी फिल्‍म
-अजय ब्रह्मात्‍मज

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिलली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति...फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा। यही होता भी है।
बाल विधवा हुई बेगम जान पहले रंडी बनती है और फिर तवायफ और अंत में पंजाब के एक राजा साहब की शह और सहाता से कोठा खड़ी करती है,जहां देश भर से आई लड़कियों को शरण मिलती है। दो बस्तियों के बीच बसा यह कोठा हमेशा गुलजार रहता है। इस कोठे में बेगम जान की हुकूमत चलती है। दुनिया से बिफरी बेगम जान हमेशा नाराज सी दिखती हैं। उनकी बातचीत में हमेशा सीख और सलाह रहती है। जीवन के कड़े व कड़वे अनुभवों का सार शब्‍दों और संवादों में जाहिर होता रहता है। कोइे की लड़कियों की भलाई और सुरक्षा के लिए परेशान बेगम जान सख्‍त और अनुशासित मुखिया है।
आजादी मिलने के साथ सर सिरिल रेडक्लिफ की जल्‍दबाजी में खींची लकीर से पूर्व और पश्चिम में देश की विभाजन रेखा खिंच जाती है। नक्‍शे पर रेखा खींचते समय रेडक्लिफ का एहसास भी नहीं रहता कि वे अहम मुद्ददे पर कैसी अहमक भूल कर रहे हैं। उन्‍होंने तो रेखा खींच दी और चुपके से ब्रिटेन लौट गए,लेकिन पंाब और बंगाल में विभाजन की विभीषिका में लाखें बेघर हुए और लाखों को जान-माल की हानि हुई। इसी में बेगम जान का कोठा भी तबाह हुआ और कोठे की लड़कियों को आधुनिक पद्मसवती बनी बेगम जान के साथ जौहर करना पड़ा।
लेखक-निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने फिल्‍म के मुद्दे को सही संदर्भ और परिवेश में उठाया,लेकिन बेगम जान की कहते-कहते वे कहीं भटक गए। उन्‍हें नाहक जौहर का रास्‍ता अपनाना पड़ा और पृष्‍ठभूमि में त्रवो सुबह कभी तो आएगी गीत बजाना पड़ा। अपने उपसंहार में यह फिल्‍म दुविधा की शिकार होती है। अहम मुद्दे पर अहमकाना तो नहीं,लेकिन बहकी हुई फिल्‍म हमें मिलती है।
बेगम जान का किरदार एकआयामी और बड़बोला है। वह निजी आवेश में स्थितियों से टकरा जाती है। उसे राज साहब से भी मदद नहीं मिल पाती। लोकतंत्र आने के बाद राजा साहब की रियासत और सियासत में दखल पहले जैसी नहीं रह गई है। रेडक्लिफ लाइन को बेगम जान के इलाके में लागू करवाने के लिए तैनात श्रीवास्‍तव और इलियास कंफ्यूज और भवुक इंसान हैं,लेकिन वे बेरहमी से काम लेते हैं। बाद में उनका पछतावा पलले नहीं पड़ता। इतने ही संवेदनशील थे तो उन्‍हें कबीर की मदद लेने की जरूरत क्‍यों पड़ी? और कबीर का किरदार...माफ करें भट्ट साहब और श्रीजित कबीर समन्‍य और समरसता के प्रतीक हैं। उनके नाम के किरदार से ऐसी अश्‍लील और जलील हरकत क्‍यों? इसे सिनैमैटिक लिबर्टी नहीं कहा जा सकता।
बहरहाल, विद्या बालन ने बेगम जान के किरदार को तन-मन दिया है। उन्‍होंने उसके रुआब और शबाब को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। उनकी संवाद अदायगी और गुस्‍सैल अदाकारी बेहतरी है। उनका किरदार दमदार है,लेकिन अंतिम फैसले में वह आदर्श के बावजूद कमजोर पड़ जाती है। यह विद्या की नहीं,लेखक-निर्देशक की कमजोरी है। सहयोगी किरदारों की छोटी भूमिकाओं में अभिनेत्रियों(दर्जन भर)े ने बेहतर काम किया है। मास्‍टरजी और सुजीत बने अभिनेताओं विवेक मुश्रान और पितोबोस का काम यादगार है।
फिल्‍म में चित्रित होली रंगीन और आह्लादपूर्ण हैं। रंगों की ऐसी छटा इन दिनों विरले ही दिखती है। फिल्‍म भावुकता और संवादों से ओतप्रोत है,जो संयुक्‍त रूप आलोडि़त तो करती है,लेकिन कहीं पहुंचाती नहीं है।
अवधि- 134 मिनट
*** तीन स्‍टार

Sunday, April 9, 2017

अलहदा है बेगम का फलसफा’ : महेश भट्ट




 -अजय ब्रह्मात्‍मज
श्रीजित मुखर्जी का जिक्र मेरे एक रायटर ने मुझ से किया था। उन्‍होंने कहा कि वे भी उस मिजाज की फिल्‍में बनाते रहे हैं, जैसी ‘अर्थ’, ‘सारांश ‘जख्‍म’ थीं। उनके कहने पर मैंने ‘राजकहानी’ देखी। उस फिल्‍म ने मुझे झिझोंर दिया। मैंने सब को गले लगा लिया। मैंने मुकेश(भट्टसे कहा कि ‘राज   राज रीबूट’ हमने बहुत कर लिया। अब ‘राजकहानी’ जैसी कोई फिल्‍म करनी चाहिए। मुकेश को भी फिल्‍म अच्छी लगी। श्रीजित ने अपनी कहानी भारत व पूर्वी पाकिस्‍तान में रखी थी। रेडक्लिफ लाइन बेगम जान के कोठे को चीरती हुई निकलती है। यह प्लॉट ही अपने आप में बड़ा प्रभावी लगा। हमें लगा कि इसे पश्विमी भारत में शिफ्ट किया जाए तो एक अलग मजा होगा। हमने श्रीजित को बुलाया। फिर उन्होंने 32 दिनों में दिल और जान डालकर ऐसी फिल्‍म बनाई की क्या कहें।
   मेरा यह मानना है कि हर सफर आप को आखिरकार अपनी जड़ों की ओर ले जाता है। बीच में जरूर हम ऐसी फिल्‍मों की तरफ मुड़े़, जिनसे पैसे बनने थे। पैसा चाहिए भी। फिर भी लगातार फिल्‍म बनाने के लिए, पर रूह को छूने वाली आवाजें सुनाने  वाली कहानियां भी जरूरी हैं। यह जज्‍बा इस फिल्‍म में देखने को मिलने वाला है। कहानी जिस समय में सेट है उस वक्त की दुनिया दिखाने के लिए हम झारखंड के बीहड़ इलाके में गए और शूट किया। मुझे यकीन है कि लोग ‘बेगम जान’ की आत्‍मा और सादगी से यकीनन जुड़ेंगे।
   जो रवायत ‘सारांश’, ‘अर्थ’  ‘जख्‍म’ की है, यह उसी का विस्‍तार है। पिछले एक-डेढ दशक में हमने सफलता तो बड़ी अर्जित कर ली थी, पर हर तरफ से उसी किस्‍म की फिल्‍में बनाने की फरमाइशें आती थीं।राजकहानी’ में हमें हमारी तलाश खत्‍म होती दिखी। मौजूदा पीढी भी बड़ी भावुक है। ऊर्जावान तो वे हैं हीं, जो उनकी अपनी है। लिहाजा वे किसी चीज की जो व्‍याख्‍या करते हैं, वह अलहदा निकल कर आती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ‘बेगम जान’ से एक नई दास्तान शुरू होगी।
इत्‍तफाकन सेंसर बोर्ड भी इससे प्रभावित हुआ। वरना ‘उड़ता पंजाब’ व अन्य हार्ड हिटिंग फिल्‍मों पर उनका रवैया देख तो हम चिं‍तित थे कि कहीं इस फिल्‍म को भी अतिरिक्‍त कतरब्‍योंत न झेलनी पड़े। लिहाजा हमने ‘ सर्टिफिकेट के लिए ही अप्‍लाई किया था, पर जब उन्होंने वह फिल्‍म देखी और जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह देख हमें बड़ा ताज्‍जुब हुआ। वे भावुक हो गए। बड़े हिचकते हुए कहा कि गालियों को जरा तब्‍दील कर लिया जाए बस। इस तरह देखा जाए तो ‘बेगम जान’ ने सेंसर बोर्ड के साथ कमाल का अनुभव हमें दिया। खुद पहलाज निहलानी ने हमें फोन कर कहा कि बोर्ड वाले इस फिल्‍म की बड़ी तारीफें कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमने जिन सिद्धांतों के मद्देनजर यह फिल्‍म बनाई, वे मजबूत थे। नतीजतन, इसे सेंसर की मार नहीं झेलनी पड़ी।
जैसे ‘बद्रीनाथ की दुल्‍हनिया। मनोरंजक होते हुए भी उसने बात तो कह दी न। वह देख,जब आप सिनेमाघरों से निकलते हैं तो लगता है कि हमारी बच्चियों के साथ जुल्‍म हो गया है। औरतों की आजादी की इज्‍जत की ही जानी चाहिए। यह बहुत अहम मैसेज है, पर एंटरटेनिंग तरीके से है। मतलब साफ है। आप इस दौर में इमेजेज दिखा कर घर-दुकान नहीं चला सकते। अब सेक्‍स वगैरह नहीं चलेगा। संचार के बाकी माध्‍यमों ने उसकी जरूरत पूरी कर दी है। सेक्‍स कहानी का हिस्‍सा हो तो बात बनेगी। मसलन, ‘जिस्‍म2। उसमें सेक्‍स  कहानी का हिस्‍सा था। उसे इरादतन नहीं परोसा गया था। हम दर्शकों को उल्‍लू नहीं बना सकते।
पार्टिशन को लेकर ढेर सारी कहानियां हैं, जिन्‍हें हम जीना नहीं चाहते। गिन कर पांच फिल्‍में बनी हैं उस मसले पर। हालांकि हमारी फिल्‍म शुरू होती है आज के कनॉट प्लेस से। उसके बाद हम हिंदुस्तान के बंटवारे की ओर जाते हैं। रेडक्लिफ लाइन पर जाते हैं। औरतों के सिद्धांत व उनके हक की बातें करते हैं। तो हम विशुद्ध पार्टिशन की बात नहीं करते हैं। हम औरतों के अधिकार की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। यह बदकिस्‍मती है हमारी कि औरतें तब भी गुलाम थीं, अब भी उन्हें पूरी आजादी नहीं दी गई है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि वे अपनी जिस्‍म की भी मालकिन नहीं।
फिल्‍म में ढेर सारी अभिनेत्रियां हैं। बेगम जान के लिए विद्या ही हमारी पहली च्‍वॉइस थीं। गौहर खान व इला अरूण भी हैं। इला के साथ काम कर बड़ा मजा आया। बेगम जान का फलसफा अलग है। इक मर्द उसकी मंजिल नहीं है। वह न हो तो भी वह खुद को अधूरी नहीं मानेगी। वह वेश्‍या है, मगर छाती नहीं पीटती कि उसके साथ अत्‍याचार हुआ है। वह कोठे को काम की तरह लेती है।
अमिताभ बच्चन का वॉयस ओवर इसलिए इस्तेमाल हुआ कि हम ऐसी आवाज चाहते थे, जिन्‍हें लोग सुनें। लोग इमोशन की गहराई में उतर सकें। हमने उनसे गुजारिश की तो उन्होंने बड़े विनीत भाव से उस ख्‍वाहिश को स्‍वीकारा। हालांकि उनके संग मेरा अतीत बहुत अच्छा नहीं रहा है। अमर सिंह के चलते हमारे रिश्‍ते में खटास आई थी। शाह रुख मामले में हमने एक स्‍टैंड लिया था! तब अमर सिंह के चलते हम दोनों के बीच जरा सी कड़वाहट थी, मगर मुकेश साथ उनके संबंध अच्छे रहे हैं। बच्चन जी खुद भी आलिया की बड़ी तारीफ करते रहते हैं। तो हम कब तलक मन में दूरियां पाले रखते।

विद्या से मिलता है बेगम का मिजाज - विद्या बालन

बेगम जान के निर्देशक श्रीजित मुखर्जी
-अजय ब्रह्मात्‍मज

2010 से फिल्‍म मेकिंग में सक्रिय श्रीजित मुखर्जी ने अभी तक आठ फिल्‍में बांग्‍ला में निर्देशित की हैं। हिंदी में बेगम जान उनकी पहली फिल्‍म है। जेएनयू से अर्थशास्‍त्र की पढ़ाई कर चुके श्रीजित कहानी कहने की आदत में पहले थिएटर से जुड़े। हबीब तनवीर की भी संगत की और बाद में फिल्‍मों में आ गए। बांग्‍ला में बनी उनकी फिल्‍मों को अनेक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुके हैं। महेश भट्ट से हुई एक चांस मुलाकात ने हिंदी फिल्‍मों का दरवाजा खोल दिया। वे अपनी आखिरी बांग्‍ला फिल्‍म राजकाहिनी को हिंदी में बेगम जान नाम से ला रहे हैं। फिल्‍म की मुख्‍य भूमिका में विद्या बालन है। मूल फिल्‍म भारत-बांग्‍लादेश(पूर्वी पाकिस्‍तान) बोर्डर की थी। अग यह भारत-पाकिस्‍तान बोर्डर पर चली आई है।
पढ़ाई के बाद नौकरी तो मिडिल क्‍लास के हर लड़के की पहली मंजिल होती है। श्रीजित को बंगलोर में नौकरी मिल गई,लेकिन कहानी कहने की आदत और थिएटर की चाहत से वे महेश दत्‍तनी और अरूंधती नाग के संपर्क में आए। फिर फिल्‍मों में हाथ आजमाने के लिए मन कुलबुलाने लगा। श्रीजित ने सुरक्षा की परवाह नहीं की। उन्‍होंने तत्‍काल नौकरी छोड़ दी। तब तक निजी जिंदगी में शादी और तलाक से वे गुजर चुके थे। घर में अकेली मां थीं। अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी जैसा बोझ नहीं था। पहली फिल्‍म ऑटोग्राफ सफल रही। सफलता के साथ पुरस्‍कार भी मिले और  आगे की राह सुगम हो गई।
बेगम जान की पूष्‍ठभूमि पार्टीशन की है। मूल बांग्‍ला फिल्‍म को हिंदी में लाने के समय लोकेशन बदलना अनिवार्य लगा। पार्टीशन की देशव्‍यापी इमेजेज पंजाब से जुड़ी हैं। निर्देशक और निर्माता ने पूरी कहानी पाकिस्‍तान के बोर्डर पर शिफ्ट कर दी। बेगम जान के कोठे को देश के मेटाफर के रूप में देखें,जहां देश के सभी हिस्‍सों से आई लड़कियां काम करती हैं। उन्‍हें ऐसे संवाद दिए गए जसमें हिंदी के साथ उनके इलाके का टच हो। जया चटर्जी और उर्वशी बुटालिया की पार्टीशन से संबंधित किताब से फिल्‍म का आयडिया आया। रेडक्लिफ ने देश की आजादी के समय ब्रिटिश राज के आदेश से भारत के नक्‍शे पर एक लकीर खींच दी थी। उसमें कितने घर-परिवार और गांव बंट गए। उन्‍हें चार हफ्ते में अपना काम करना था। वहीं से मुझे लगा कि इस पर फिल्‍म बन सकती है। उसके बाद मंटो के अफसानों ने मेरे इरादे को पक्‍का कर दिया।
श्रीजित मानते हैं कि विद्या बालन ट्रेंड सेटर हैं। मेरी बेगम उनके मिजाज के करीब है,जिसके अंदर दबा हुआ गुससा है और जो अपने स्‍पेय में किसी को आने नहीं देती। मैं मानता हूं कि हिंदी फिल्‍मों में माधुरी दीक्षित के बाद विद्या ही दमदार अभिनेत्री हैं। मुझे तो यह भी लगता है कि अगर स्क्रिप्‍ट आपकी फिल्‍म का हीरो है तो उसकी हीरोइन विद्या ही हो सकती है। उन्‍होंने अपनी फिल्‍मों से इसे साबित किया है।
बेगम जान से यह फर्क आया है कि श्रीजित ने मुबई में ठिकाना बना लिया है। वे अब हिंदी फिल्‍में करना चाहते हैं। साथ ही मन है कि साल में एक बांग्‍ला फिल्‍म भी बनाते रहें। बांग्‍ला फिल्‍मों के लिए कोलकाता आन-जाना लगा रहेगा। मुंबई प्रोफेशनल शहर है। काम का माहौल रहता है। यहां बड़े बजट की फिल्‍में आसानी से बनाई जा सकती हैं। उनकी अगली फिल्‍म बांग्‍ला में ही है,जिसकी शूटिंग स्विटजरलैंड में होगी।
श्रीजित स्‍वीकार करते हैं कि अभी के बांग्‍ला फिल्‍ममेकर अर्बन हो चुके हैं। उनकी कहानियों में बंगाल की खुश्‍बू नहीं रहती। यही दशा दूसरे प्रदेशों से आए फिल्‍मकारों की भी है। एक सीमा के बाद हम सभी की प्रस्‍तुति समान हो गई है। अच्‍छा होगा कि फिल्‍ममेकर अपने इलाके को लेकर चलें और पूरे भारत के लिए कहानी कहें। अब तो विदेशी भी हमारे दर्शक हैं। हमें फिल्‍म की भाषा पर बहुत काम करना है।

Tuesday, June 23, 2015

सबसे काबिल शिक्षक है पिता - महेश भट्ट

पिता महेश भट्ट

प्रस्‍तुति-अजय ब्रह्मात्‍मज
पिता हजारों शिक्षक से अधिक प्रभावशाली होता है। स्‍कूल और जिंदगी के ज्‍यादातर शिक्षक किताबी होते हैं। वे सिखाते तो हैं,लेकिन उनका सीमित असर होता है। पिता अपने बच्‍चों के जहन पर गहरा छाप छोड़ता है। खास कर अपनी बेटियों पर ... जिसका पगभाव अकल्‍पनीय होता है। अगर मेरी बेटियां और बेटा आत्‍मनिर्भर हैं तो इसमें मेरा असर है। पूजा अभी जयपुर के पास रेगिस्‍तान में शूटिंग कर रही है। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में आए आर्थिक संकट के दौर में उनलोगों के साथ फिल्‍म बना रही है,जो स्‍आर नहीं माने जाते हें। यह उसकी अपनी जीत और हिम्‍मत है। आलिया ने अपनी जिंदगी में 21 की उम्र में वह मुकाम हासिल कर लिया है,जो मुझे 50 की उम्र में भी नहीं मिला था।

अपना क्लोन न बनाएं 
यह पिता का विश्‍वास होता है कि हमारे बच्‍चे हमारे तो होते हैं,लेकिन वे हम से अलग होते हैं। यह तो मानव अधिकार की बात है कि हर किसी को अलग होने और रहने का अधिकार है। इस मुल्‍क में यह बात हम भूल जाते हैं कि बच्‍चों को अपना क्‍लोन न बनाएं। कुदरत के बेमिसाल क्रिएशन को उसकी पृथक पहचान पर अपनी मानसिकता थोपेंगे तो फिर उनकी खासियत को आप मिटा देंगे। पिता को अपने अनुभव से बेटे-बेटियों को उन हथियारों से लैस करें,जो इस जिंदगी में उनके काम आएं। उन्‍हें संस्‍कृति,सामाजिकता और नैतिकता का इल्‍म अवश्‍य दें,लेकिन उनकी पहचान को न मोड़ें या तोड़ें। उन्‍हें पसंद के फील्‍ड में जाने दें। मेरा बेटा राहुल फिटनेस फ्रीक है। उसे वही पसंद है। दूसरे बच्‍चे तो लगे रहते हैं बापों के पीछे कि मुझे लांच करो। राहुल ने हमेशा कहा कि मैं अपने मन का ही काम करुंगा। वह फिल्‍म इंडस्‍ट्री की चकाचौंध से प्रभावित नहीं है। शाहीन गजब लिखती है। वह अधीर नहीं है। उसे पेज 3 पर आने की हड़बड़ी नहीं है। परिवार में मुझे अगर कोई अंतदृष्टि देता है तो वह शाहीन ही है। बहुत ही जहीन बच्‍ची हैं।
आप के बच्‍चे तभी हीरे रह पाएंगे,जब आप अपनी धूल उन पर न लपेटें। हम होते कौन हैं बच्‍चों को आजादी देने वाले... वे आजाद पैदा होते हैं। क्‍या सूरज की रोशनी,धरती की हरियाली या आसमान की निरभ्रता आ ने दी है? इस देश में खास कर बेटियों को सदियों से नाइंसाफी झेलनी पड़ी है। हमें उनकी रक्षा तो करनी चाहिए,लेकिन उन्‍हें वह औजार भी देना चाहिए कि वे अत्‍मारक्षा कर सकें। प्‍यार के नाम पर जुल्‍म ढाना बंद करें। मर्यादा की लक्ष्‍मण रेखा न खींचें। खुले आसमान में उन्‍हें उड़ने दें। गिरने दें। गिरने की चोट और दर्द से वे सीखेंगे। दर्द तराशता है। उन्‍हें अपाहिज बना देंगे तो आप कब तक बैसाखी बने रहेंगे ? बुद्ध ने कहा था कि स्‍वयं प्रकाशित हो जाओ। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में देख लें कितने बच्‍चे अपने पिताओं की सस्‍ती नकल बन कर रह गए। वे चाह कर भी अपने पिता की तरह नहीं हो पाते।
मेरे बच्चे समझते हैं मुझे  
मुझे याद है कि अपनी किताब ए टेस्‍ट ऑफ लाइफ का कुछ अंश मैंने शाहीन को पढ़ कर सुनाया था। उसने जिस अंदाज से सुना। सुनने के बाद उसने इतना ही कहा कि डैड अब आप की जिंदगी पूरी हो गई। लोग एहसास के जिस शिखर पर पहुंचना चाहते हैं,वहां आप पहुंच चुके हैं। मुझे लगा था कि मेरी बच्‍ची के अंदर कोई बूढ़ी औरत बैठी हुई है। आलिया बचपन से ही मुझे आत्‍मस्‍थ लगती थी। मुझे याद है कि मैं घर के पास जिस्‍म की शूटिंग कर रहा था। वह स्‍कूल जाने के लिए निकली तो सेट पर आ गई। उसने बिपाशा बसु  को यों देखा कि जैसे उसे वहां होना चाहिए था। मैंने पूछा भी कि क्‍या सोच रही हो ? तुम्‍हें होना चाहिए? उसने मुस्‍करा कर कहा ,हां। पूजा के अंदर अलग चाल चलने की अदा थी। मैंने जब उसे डैडी के लिए राजी किया था तो मुकेश भट्ट नाराज हो गया था। उसके तेवर तभी दिख गए थे। कम लोगों को मालूम है कि पूजा ने आशिकी करने से मना कर दिया था। राहुल के साथ मैंने ज्‍यादा बचपन नहीं गुजारा है। मैं घर से अलग हो गया था। उसके जहन में एक कड़वा चैप्‍टर था। जाहिर है अगर बाप उसकी मां को छोड़ कर किसी और औरत के साथ रहेगा तो उसे गुस्‍सा आएगा। पाप की शूटिंग के दौरान हम बाप-बेटे एक कमरे में डेढ़ महीने ठहरे तो रिश्‍ता कायम हुआ। मैंने बताया भी कि मुझे अपने पिता से जो शिकायत थी,वही मैंने तुम्‍हारे साथ कर दिया। मेरेपता वह फासला कम नहीं कर सके। मैं करना चाहूंगा। तुम्‍हारे पास च्‍वॉयस है कि किसी विक्टिम की तरह दर्द जीते रहो या सरवाइवर की तरह दर्द को सीढ़ी बना कर आगे निकल जाओ। मैंने अपने पिता के साथ के कड़वे अनुभवों को फिल्‍मों में लाकर करिअर का स्प्रिंगबोर्ड बना दिया। उस समय उसने थोड़ा समझा। बाद में डेविड हेडली के मुद्दे के समय मैंने पिता की तरह उसकी रक्षा की थी। उस वक्‍त राहुल को एहसास हुआ कि मेरा बाप मुझे छोड़ कर कहीं नहीं गया था।

मिसफिट हूं मैं 
मेरा घर सामान्‍य घर नहीं था। आज भी नहीं है। मैंने अपने अंदाज से इनकी परवरिश की है। कभी सोनी राजदान के माता-पिता आते हैं और हमारी बेटियां उनसे झाुल-मिल रही होती हैं तो मैं दूर से उन्‍हें देख कर चकित होता रहता हूं। वैसा बचपन मुझे नहीं मिल पाया। मैं पारिवारिक जिंदगी में मिसफिट सा हूं। बच्‍चे अपने तरीके से मुझे प्‍यार करते है। आदर देते हैं। 

Thursday, June 11, 2015

मिडिल क्‍लास औरत की अधूरी कहानी-महेश भट्ट




-अजय ब्रह्मात्‍मज
    सोल्जिनित्सिन ने कहा था कि किसी भी समाज की भावनात्‍मक गहराई नापनी हो तो उस समाज की कलाएं देख लें। उससे आप उस समाज के नैतिक रेशों को पहचान लेंगे। मौसम बदलता है तो पत्‍तों से पता चलता है। समाज में परिवर्तन की आहट फिल्‍मों की बदलती कहानियों से मिलने लगती है। उनका ढांचा बदलता है। मुझे लगता है कि भारतीय समाज में गहरे स्‍तर पर परिवर्तन घट चुका है। अब मुंबई की फिल्‍म इंडस्‍ट्री में इसे महसूस किया जा रहा है। पीकू और तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स इसके उदाहरण हैं। इसकी कड़ी में हमारी अधूरी कहानी को देख सकते हैं। 21 वीं  सदी के दूसरे दशक में आ रही इन फिल्‍मों को देख कर लोगों को लग रहा है कि ऐसी कहानियां पहले नहीं आई थीं। मैं तो  कहूंगा कि ऐसा सिनेमा पहले भी था, अपनी जड़ों से जुड़ा और संस्‍कृति से संबद्ध।
    अभी की फिल्‍मों के रिदार पहले से जटिल हो गए हैं। संस्‍कारों की लगाम से वे मुक्‍त होना चाहते हैं। हमारी अधूरी कहानी मिडिल क्‍लास हिंदुस्‍तानी औरत की कहानी है। वह मंगलसूत्र पहनती है। बिंदी लगाती है। अकेली जान ही संतान पालती है। इसकी प्रेरणा मुझे अपने जीवन से ही मिली। मैंने अपनी मां को तनहा पाया। पिता के होने के बाद भी वे थे नहीं। उनकी गैरमौजूदगी का एहसास हमेशा रहा। कहीं पर यह उनकी कहानी है। मेरे पिता,मां और मेरी सौतेली मां के जीवन का सार है इसमें। फिल्‍म में आप उनके किरदारों की तलाश न करें। उनके जिए हुए सच से मैंने साच हासिल की है। सारांश,अर्थ और जनम के वक्‍त यह सच मेरी सोच में नहीं था। उस वक्‍त मेरे अंदर गुस्‍सा और आक्रोश पल रहा था। ऐसा लगता था कि हमारे ऊपर जुल्‍म हुआ है। मन में भावना रहती थी कि अपनी कहानियों में हम आप का हराएंगे और जीतेंगे।
    66 की उम्र में आने के बाद दर्द झेलने और तकलीफ पीने के बाद महसूस हो रहा है कि वे सभी इंसान थे। अभी मैं उनकी नजर से भी उस दौर को देखने की कोशिश कर रहा हूं। अभी सब बेचारे लगते हैं। सभी अपने संस्‍कारों और सीमाओं के दायरे में दिख रहे हैं। मैंने उन्‍हें ही तीन किरदारों के जरिए कहा है। उन किरदारों को विध्‍्या बालन,इमरान हाशमी और राजकुमार राव निभा रहे हैं। विद्या के अंदर सती और सीता है। राधा बनने की प्‍यास भी है। अपनी यात्रा में वह दुर्गा मां भी बन जाती है। कंेद्रीय कथा विद्या के दृष्टिकोण से कही गई है। वह बराबर का दर्जा चाहती है। हमारी अधूरी कहानी प्रासंगिक फिल्‍म है। अर्थ की शबाना आजमी में विद्रोह था। उसने अपने पति को आड़े हाथों लिया था। इसमें विद्या पति से जूझती है। यह हिंदस्‍तानी दायरे की औरत के विद्रोह की कहानी है। वह अपनी मुक्ति को पश्चिमी संदर्भ से परिभाषित नहीं कर रही है। वह पूछती है कि मांग मेरी और सिंदूर तेरे नाम का... कोख मेरी और संतान तेरे नाम का। वह मूलभूत सवाल पूछती है। वह जानना चाहती है कि शादी के बाद पति का नाम उसे जिस्‍म और रुह में क्‍यों गाड़ दिया जाता है। मेरे बचपन की यादें हैं। जिन औरतों से मेरा प्रेम हुआ,उन सभी में मैंने अपनी मां के ही अंश देखे। सभी तनहा मिलीं। मुझे तनहा छोड़ गईं। कुछ लोग कहते हैं कि मैं औरतों के नजरिए से ही अपनी कहानी कहता हूं।
    मुश्किल खेल है। मोहित सूरी ने भी मेहनत की है। हमारी अधूरी कहानी में लेखक महेश भट्ट नए मुहावरों के साथ मिलेगा। जब हम खुद अपनी जिंदगी को जीवनीकार के तौर पर देखते हैं तो ऐसी कहानियां आती हैं। यह आत्‍मकथा नहीं है। यह खुद को ही देखना है जिंदगी के आईने में...इसमें दूसरे के दर्द को भी शामिल कर लेते हैं। मोहित ने मेरी विरासत को संभाल लिया है और आगे ले गया है।
    कहानियां समाज का नैतिक कंपास होती हैं। फिल्‍मों के किरदार हमें सालों साल तक प्रभावित करते हैं। मुझे यकीन है कि वसुधा की जिंदगी दर्शकों को प्रभावित करती है। पूजा भट्ट ने क्रांतिकारी जिंदगी जी है,लेकिन इस फिल्‍म को देख कर कांपती हुई निकली थीं। हमारी अधूरी कहानी देश की आम औरतों की कहानी है। जिंदगी की सारी कहानियां अधूरी रहती हैं। संपूर्णता तो एक भ्रम है। सच्‍ची प्रेमकहानियां तड़प देती हैं। किसी ने कहा था कि जिस जिंदगी की परीक्षा नहीं हुई,वह जिंदगी बेमानी है। तो किसी ने कहा कि जिंदगी जी ही नहीं गई तो उसकी परीक्षा क्‍या होगी ? मैंने तो जिंदगी जी है और उसकी परीक्षा भी दी है।

Friday, April 17, 2015

फिल्म समीक्षा : मिस्टर एक्स

स्टार: डेढ़ स्टार
विक्रम भट्ट निर्देशित इमरान हाशमी की 'मिस्टर एक्स' 3डी फिल्म है। साथ ही एक नयापन है कि फिल्म का नायक अदृश्य हो जाता है। यह नायक अदृश्य होने पर भी अपनी प्रेमिका को चूमने से बाज नहीं आता, क्योंकि पर्दे पर इमरान हाशमी हैं। इमरान हाशमी की कोई फिल्म बगैर चुंबनों के समाप्त नहीं होती। विक्रम भट्ट 3डी तकनीक में दक्ष हैं। वे अपनी फिल्में 3डी कैमरे से शूट भी करते हैं, लेकिन इस तकनीकी कुशलता के बावजूद उनकी 'मिस्टर एक्स' में कथ्य और निर्वाह की कोई नवीनता नहीं दिखती। फिल्म पुराने ढर्रे पर चलती है।

रघु और सिया एटीडी में काम करते हैं। दोनों अपने विभाग के कर्मठ अधिकारी हैं। एक-दूसरे से प्रेम कर रहे रघु और सिया शादी करने की छट्टी ले चुके हैं। उन्हें बुलाकर एक खास असाइनमेंट दिया जाता है। कर्तव्यनिष्ठ रघु और सिया पीछे नहीं हटते। वे इस असाइनमेंट में एक कुचक्र के शिकार होते हैं। स्थितियां ऐसी बनती हैं कि दोनों एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। अदृश्य हो सकने वाला नायक अब बदले पर उतारू होता है।

वह स्पष्ट है कि कानून उसकी कोई मदद नहीं कर सकता, इसलिए कानून तोडऩे में उसे कोई दिक्कत नहीं होती। बदले की इस भिड़ंत के बीच कुछ नहाने के दृश्य हैं, जहां अदृश्य नायक अपनी नायिका को चूमता है। इस मद में अच्छी रकम खर्च हुई होगी। महंगे चुंबन हैं 'मिस्टर एक्स' में। भट्ट कैंप की फिल्म है तो जब-तब गाने भी सुनाई पड़ते हैं। दर्शक अनुमान लगा सकते हैं कि कब गना शुरू हो जाएगा।

दर्शक इस फिल्म की पूरी कहानी का अनुमान लगा सकते हैं। सब कुछ प्रेडिक्टेबल और सरल है। महेश भट्ट और विशेष फिल्म्स की फिल्मों का एक पैटर्न बन चुका है। कभी कढ़ाई सुघड़ हो जाती है तो दर्शक फिल्म पसंद कर लेते हैं। 'मिस्टर एक्स' से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। इमरान हाशमी का जादू बेअसर हो चुका है।
फिल्म में उनका किरदार ढंग से लिखा भी नहीं गया है। सिया की भूमिका में अमायरा दस्तूर कमजोर हैं,जबकि उन्हें कुछ अच्छे दृश्य मिले हैं। अरूणोदय सिंह अपनी मौजूदगी से प्रभावित नहीं काते। उन्हें अभी तक अभ्यास की जरूरत है। तिवारी की छोटी भूमिका में आया कलाकार अपनी बेवकूफियों में अच्छा लगता है।

भट्ट कैंप की फिल्मों का संगीत कर्णप्रिय होने की वजह से लोकप्रिय होता है। इस बार वह मधुरता नहीं है। पॉपुला सिंगर अंकित तिवारी भी निराश करते हैं। वे एक ही तरीके से गाने लगे हैं या उनसे वैसी ही मांग की जाती है? दोनों ही स्थितियों में उन्हें सोचना चाहिए।

और हां, इस फिल्म में हर किरदार भारद्वाज को भरद्वाज क्यों बुलाता है? उ'चारण की और भी गलतियां हैं। फिल्म में भट्ट साहब ने शीर्षक गीत में आवाज दी है। बेहतर होगा कि वे ऐसे चमत्कारिक दबावों से बचें। कृष्ण, गीता और रघु व सिया के प्रतीकात्मक नाम...सब फिजूल रहा।
अवधि- 132 मिनट

Friday, January 2, 2015

इरोटिक लव स्टोरी है खामोशियां


-अजय ब्रह्मात्मज
            करण दारा निर्देशित खामोशियांविशेष फिल्म्स के बैनर तले बनी महेश भट्ट और मुकेश भट्ट की प्रस्तुति है। भट्ट बंधुओं ने स्टारविहीन फिल्मों का सफल फार्मूला विकसित कर लिया है। उनकी फिल्मों में अपेक्षाकृत नए या कम पॉपुलर स्टार रहते हैं। फिल्म के गीत-संगीत पर पूरा ध्यान दिया जाता है। उनकी फिल्मों का कोई न कोई गीत रिलीज के पहले ही चार्टबस्टर हो जाता है। फिल्म का सब्जेक्ट बोल्ड और इरोटिक रहता है। उनकी ताजा फिल्म खामोशियांमें इन मसालों का इस्तेमाल हुआ है। महेश भट्ट अपनी फिल्मों को लेकर कभी बचाव की मुद्रा में नहीं रहते। वे स्पष्ट कहते हैं कि दर्शक ऐसी फिल्में पसंद करता है। ट्रेड के लिए भी ऐसी फिल्मों में रिस्क कम रहता है। ज्यादातर फिल्में सफल हो जाती हैं।
            खामोशियांके प्रति महेश भट्ट आश्वस्त हैं। फिल्म के बारे में वे कहते हैं,‘नई फिल्म खामोशियांमें हम राजका ड्रामा रिवाइव करने जा रहे हैं। यह त्रिकोणीय प्रेमकहानी है। इसमें जिस्मकी बिपाशा बसु जैसी हीरोइन है,जो दो मर्दों के साथ खेलती है। चुडै़ल जैसा मिजाज है उसका। इस रोल में हम ने सपना पब्बी को चुना है। उसने अपने परफारमेंस से हमें मुग्ध कर दिया है। अली फजल असफल लेखक है। वह इस लडकी के संपर्क में आता है। कहानी की तलाश में वह उससे जुड़ता है। वह उसके जानलेवा अंदाज पर फिदा हो जाता है? किस्सों-कहानियों में ऐसी लडकियां मिलती हैं,जो हूर होती हैं। किसी को भी लुभा सकती हैं। हम ने इसे इरोटिक सुपर नैचुरल ड्रामा की तरह बनाया है। इस त्रिकोणीय प्रेमकहानी का तीसरा कोण गुरमीत चौधरी है। वह मुझे सुपरस्टार मैटेरियल लग रहा है। अली फजल के परफारमेंस से लगता है कि वह बतौर एक्टर लंबा चलेगा।
            महेश भट्ट आगे कहते हैं,‘हमलोग अपनी फिल्मों में संगीत पर बहुत ध्यान देते हैं। इस फिल्म का टायटल गीत हिट हो चुका है। इस फिल्म के जरिए हम लंबे समय के बाद लव स्टोरी में लौटे हैं। राज के सिक्वल में प्रेम कहानियां नहीं थीं। इस फिल्म की खूबसूरत हीरोइन के कुछ डार्क लक्षण हैं। इस फिल्म के प्रति गर्मी बढ़ गई है।  यह फिल्म हंगामा मचाएगी।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में माना जाता है कि जनवरी महीने में रिलीज की गई फिल्में नहीं चलती हैं। महेश भट्ट ऐसे अंधविश्वास में यकीन नहीं करते। वे जोर देकर कहते हैं,‘हम ने पहले भी अपनी फिल्मों से यह मान्यता तोड़ी है और इस बार भी तोड़ेंगे। आप को बता रहा हूं कि वीकएंड में ही यह फिल्म फायदे में चली जाएगी।


Monday, August 11, 2014

सरहदें लाख खिंचे दिल मगर एक ही है -महेश भट्ट

महेश भट्ट
    पूजा की मां किरण भट्ट एंगलो इंडियन खातून हैं। उन्होने कहा कि जिंदगी कमाल का चैनल है। उस पर आ रहे पाकिस्तानी सीरियल दिल को छूते हैं। इस चैनल पर आ रहे शोज के कंटेंट भारतीय चैनलों पर आ रहे सीरियल से कई गुना बेहतर हैं। यह सुन कर एहसास हुआ कि चाहे जितना वक्त लगा,लेकिन आखिरकार पाकिस्तानी कंटेंट हमारे टीवी पर आ ही गया। म्यूजिक वगैरह तो पहले से घरों में बजता रहा है।
    किरण की बात से याद आया कि 2003 में हम पाकिस्तान गए थे। तब देश में एनडीए सरकार थी। एक माहौल था कि पाकिस्तान शत्रु देश है। पाकिस्तान जाना तो बहुत दूर की बात थी,उसके बारे में सकारात्मक सोच रखना भी गलत माना जाता था। बहुत लोगों ने कहा था कि क्या कर रहे हो? वहां जाओगे तो गृह मंत्रालय की निगाहों में आ जाओगे। जिंदगी को जोखिम में डाल रहे हो। मैंने यही कहा था कि क्या बम बनाना सीखने जा रहा हूं? मैं तो फिलमों के मंच पर जा रहा हूं। वहां की अवाम और फिल्ममेकर से मिलने जा रहा हूं। निडर होकर वहां जाने का मेरा संवैधानिक अधिकार है। जाने पर वहां जो ऊर्जा और प्यास देखी,वह उस वक्त यहां पर नजर नहीं आती थी। वक्त के साथ पिछड़ गए देश में आगे बढऩे की आतुरता थी। वहां के लोगों की तरह हम भी चाहते थे कि हिंदी फिल्में एक साथ भारत और पाकिस्तान में रिलीज हों। लोगों ने हताश किया कि 50 सालों में यह नहीं हुआ है। तुम क्या सपना देख रहे हो? कहते हैं न कि पाक नियत और इरादा हो तो आप यकीनन उसे हासिल करते हैं। हम ने यह हासिल किया।
    2007 में पहली बार आवारापन भारत-पाकिस्तान में एक साथ दिखाई पड़ी। परवेज मुशर्रफ की कोशिश से यह हो सका। तब वहां लाल मस्जिद का मसला चल रहा था। दहशतगर्द मुशर्रफ के खिलाफ थे। वहां उसे बड़ी कामयाबी मिली। इस से एक नया चैप्टर खुला। 55 सालों में जो नहीं हो सका था। वह हम ने दो सालों में कर दिखाया था। हम ने कुछ विशेष नहीं किया। कारा फिल्म फेस्टिवल जाते रहे। वहां पर माहौल बनाते रहे। यहां खुद को तैयार करते रहे। तब तक हुकूमत बदल गई थी। यूपीए सरकार आ गई थी। मैंने मनमोहन सिंह से बात की थी कि इस मोर्चे पर हम लगातार काम करते रहेंगे। उन्होंने कहा था कि मैं या परवेज मुशर्रफ रहें ना रहें,यह प्रक्रिया चलती रहेगी। दोनों देशों के नौजवान चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच की काल्पनिक दीवार टूट जाए।
    आतिफ असलम और राहत फतह अली खान यहां आए? मीरा आईं। उनके साथ हम ने नजर बनाई थी। हुमांयू सईद नाम के एक्टर आए थे। जवाद अहमद आए। पाकिस्तानी टैलेंट को लगता है कि हिंदुस्तान में मौका मिल जाए तो हम अपनी पहचान बना सकते हैं। हमलोगों ने बांग्लादेश से जेम्स को बुलाया था,जिन्होंने गैंगस्टर का गाना गाया था। दक्षिण एशिया में मुंबई की एक अहमियत है। एंटरटेनमेंट के लिए साउथ एशिया का यह सबसे बड़ा हब है। यह उम्मीद जगी है पाकिस्तान में कि वे हिंदुस्तान में आकर नाम और काम कमा सकते हैं। इसमें एक अड़चन यहां कि पाकिस्तान विरोधी राजनीति है। वह वार लॉबी को जिंदा रखती है। उनकी वजह से कुछ लोग डर के पीछे हट गए। हम तो नहीं हटे। हर मौसम में काम करते रहे। 26 11 के बाद दोनों मुल्कों के बढ़ते मेलजोल को धक्का लगा। पहिया पीछे घूम गया। इसके बावजूद लोगों में आए बदलाव की वजह से दोस्ती की प्रक्रिया खामोश तरीके से चलती रही।
    मैंने एक बार परवेज मुशर्रफ से पूछा था कि कला के क्षेत्र में उदारवादी मूल्यों पर अमल करने का खयाल उन्हें कैसे आया? उन्होंने बहुत रोचक बात बतायी था। उन्होंने कहा था कि यह अवाम बताती है। वह हाथ पकड़ कर करवा लेती है। लाहौर में हिंदुस्तान-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में हिंदुस्तान जीत गया था। हमारे खुफिया सूत्रों ने अलर्ट कर दिया था। हमें लग रहा था कि दंगे-फसाद हो सकते हैं,लेकिन लाहौर की पब्लिक ने हिंदुस्तानी क्रिकेटरों को कंधे पर उठा लिया। उन्हें राजाओं की तरह रखा। रात भर दुकाने खुली रहीं। हिंदुस्तानियों को मुफ्त में चीजें मिलती रहीं।  हमारी लाख कोशिशों के बावजूद नफरत कायम नहीं रह सकी। तो हम ने सिनेमा के जरिए दोस्ती को  आगे बढ़ाया।
    आज की बात करें तो हुमाइमा मलिक आई हैं। फवाद खान आया है। पाकिस्तानी सीरियल हिंदुस्तानी दर्शकों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। हर चैनल में पाकिस्तानी कंटेंट की की मांग है। मुझ से कहा जा रहा है कि उनके साथ  पार्टनरशिप में कुछ करें। यह अनसुनी बात है। ग्यारह साल लग गए,लेकिन देशों के इतिहास में 10-20 साल कुछ नहीं होते। हमेशा चंद लोग ही पहल करते हैं। कुछ वहां थे। हम यहां थे। बदनामियों और आलोचनाओं के बावजूद हम ने जो रास्ता खोला है,वह रंग दिखा रहा है। अभी नरेन्द्र मोदी ने जब नवाज शरीफ को आमंत्रित किया तो मुझे मनमोहन सिंह की बात याद आ गई कि मैं या परवेज मुशर्रफ रहें ना रहें। यह प्रक्रिया चलती रहेगी। दोनों मुल्कों में दक्षिणपंथी सरकारें आ गई हैं,लेकिन दोनों भारत-पाकिस्तान के सांस्कृतिक संबंधों को तेज करने के लिए आमादा हैं। यह जरूरी भी है,क्योंकि हम दोनों की जबान और तहजीब एक सी है।
    दस साल पहले हम सोच ही नहीं सकते थे कि पाकिस्तान का कंटेंट हिंदुस्तान में इतना कामयाब होगा। हमारी हिंदी फिल्में वहां सिनेमाघरों में रिलीज होंगी। याद करें तो राष्ट्रपिता महात्मा गंाधी ने कहा था - हिंदुस्तान और पाकिस्तान भाई हैं। एक दूसरे के गले मिल कर जिंदगी नहीं गुजारेंगे तो दोनों में से कोई भी चैन से नहीं जी पाएगा। कुछ लोग बहुत पहले चीजों को देख लेते हैं। बाकी लोगों को उसे समझने और अमल करने में सालों साल लग जाते हैं। आप माहौल दें तो आलिया की पीढ़ी कमाल कर देगी। बस,अपनी नफरत की राजनीति से हम इन्हें दूषित न करें। राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखें,लेकिन इतिहास का बोझ न डालें।
     एक डर यही है कि किस हद तक हम पाकिस्तानी टैलेंट का इस्तेमाल करें। पाकिस्तान में डर है कि हिंदुस्तानी फिल्मों की रिलीज का रास्ता कितना आसान करें। फिल्में मुख्य रूप से सिनेमाघरों के जरिए दर्शकों तक पहुंचती हैं। कुछ उपद्रवी सिनेमाघरों को नुकसान पहुंचाते हैं तो सभी डर जाते हैं। देशभक्ति के नाम पर घृणा फैलाने की कोशिश की जाती है। बाहरी तत्व ही रोक-टोक करते हैं। मैं याद दिला दूं कि 26 11 के बाद भी पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों की रिलीज नहीं रोकी गई थी। वहां के सिनेमाघरों में नई ऊर्जा हिंदुस्तानी सिनेमा से आया है। बातें चल रही हैं कि हिंदी फिल्मों की शूटिंग पाकिस्तान में की जाएं। उसमें अभी वक्त लगेगा। यह शिकायत नावाजिब है कि हिंदुस्तानी टैंलेंट को पाकिस्तान में तरजीह नहीं दी जाती। सच तो यह है कि वहां बाजार नहीं है। दूसरे,वे हिंदुस्तानी टैलेंट को खतरे में नहीं डालना चाहते। इसके अलावा ऐसी ताकतें तो हैं ही जो स्वागत नहीं करतीं। यह तो मानना ही पड़ेगा कि लोकतंत्र की वजह से हम अधिक उदार,सहिष्णु और सुरक्षित हैं। पाकिस्तान में माहौल खुला और उदार नहीं है।
    सरहदें जरूर खिंच गई हैं दोनों देशों के बीच,लेकिन सांस्कृतिक आदान-प्रदान कमोबेश निरंतर जारी है। अभी सिनेमा और मनोरंजन ही लोकप्रिय संस्कृति है। आप यकीन करें कि दक्षिण एशिया को जोड़े रखने में फिल्म और संगीत की बड़ी भूमिकाएं हैं।   



     

Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार

श्रद्धांजलि - मेरे शिक्षक और लेखक जय दीक्षित


-महेश भट्ट
महेश भट्ट की ‘सर’,‘फिर तेरी कहानी याद आई’,‘नाराज’,‘नाजायज’ और ‘क्रिमिनल’ जैसी फिल्मों के लेखक जय दीक्षित हिंदी के मशहूर लेखक जगदंबा प्रसाद दीक्षित का फिल्मी नाम था। उनके उपन्यास  ‘मुर्दाघर’ और ‘कआ हुआ आसमान’ काफी चर्चित रहे। पिछले हफ्ते मंगलवार को जर्मनी में उनका निधन हो गया। उन्हें याद करते हुए महेश भट्ट ने यह श्रद्धांजलि लिखी है।
    कहते हैं कि अगर आप नहीं चाहते कि मरने के साथ ही लोग आप को  भूल जाएं तो पढऩे लायक कुछ लिख जाएं या फिर लिखने लायक कुछ कर जाएं। मेरे शिक्षक, लेखक, दोस्त जय दीक्षित ने दोनों किया।
    मेरे सेलफोन पर फ्रैंकफट में हुई उनकी मौन की खबर चमकी तो यही खयाल आया। जय दीक्षित की मेरी पहली याद अपने शिक्षक के तौर पर है। वे कक्षा में शुद्ध हिंदी में पढ़ा रहे थे। उनका सुंदर व्यक्तित्व आकर्षित कर रहा था। यह सातवें दशक की बात है। वे सेंट जेवियर्स कॉलेज में फस्र्ट ईयर के छात्रों को हिंदी पढ़ा रहे थे। उनमें एक अलग धधकता ठहराव था। बहुत बाद में समझ में आया कि वे दूसरे अध्यापकों से क्यों भिन्न थे? एक दिन अखबार में मैंने खबर पढ़ी कि सेंट जेवियर्स कॉलेज के एक प्रोफेसर को राष्ट्रद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया है। इस खबर ने मुझे चौका दिया था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जय दीक्षित नक्सल थे।
    फेड आउट ़ ़ ़ फेड इन ़ ़ सालों बाद। सुंदर व्यक्तित्व के मेरे प्रोफेसर ‘एक बार फिर’ के निर्देशक विनोद पांडे के साथ एक दिन मेरे घर आए। उनकी स्थिति अच्छी नहीं दिख रही थी। वे मुझे ‘अर्थ’ की बधाई देने आए थे। ‘क्या मुझे पहचान पाए?’ उन्होंने पूछा। उनकी आवाज में स्नेह और आदर दोनों था। ‘आपने मुझे हिंदी पढ़ाया था। आप को कैसे भूल सकता हूं,’ मैंने कहा था। ‘लेकिन यह बताएं कि आप जैसा क्रांतिकारी मनोरंजन की दुनिया में क्या कर रहा है?’ मैंने सुना था कि वे विनोद पांडे की अगली फिल्म के संवाद लिख रहे हैं। उनका जवाब था। ‘यह लंबी कहानी है। क्रांति मर चुकी है और वह व्यक्ति भी मर गया। जरूरतों ने मुझे सीधा कर दिया है।’
    कुछ सालों के बाद उनका फोन आया, ‘मैं आप का शिक्षक जय दीक्षित बोल रहा हूं। सॉरी,मैं आपका समय ले रहा हूं, लेकिन कुछ जरूरी बात करनी है। क्या आप मुझे कोई काम दे सकते हैं, कोई भी। मैं अभी हताशा के भंवर में फंसा हुआ हूं।’ उनकी आवाज ऐसी लरज रही थी कि मैं कांप गया। मैंने तुरंत उन्हें काम सौंपा। फिर लंबे समय तक हम ने साथ काम किया। वे प्राय: कहा करते थे, ‘ये रहा मेरा छात्र, जो अभी मेरा शिक्षक है। अगर इन्होंने साथ नहीं दिया होता तो मैंने आत्महत्या कर ली होती।’ हमलोगों ने कई फिल्में एक साथ कीं। उनमें से एक ‘सर’ थी, जिसके लिए उन्हें संवाद लेखन का फिल्मफेअर पुरस्कार मिला था। पर उससे भी अधिक उनके संग-साथ की याद के लिए दो अविस्मरणीय पुस्तकें हैं। यूजी कृष्णमूर्ति पर लिखी दो पुस्तकों - ‘न खत्म होने वाली कहानी’ और ‘सारांश’ के अनुवाद उन्होंने ही किए थे।
    उनकी अंतिम याद उनके एक जन्मदिन की है। उनके एक दोस्त ने उनके जन्मदिन समारोह के लिए विशेष तौर पर मुझे आमंत्रित किया था। मुझे उस दिन मुंबई से बाहर जाना था, लेकिन जय दीक्षित सर के लिए मैंने अपने कार्यक्रम में बदलाव किया। उस शाम मैंने अपने जीवन में उनके योगदान को रेखांकित किया था। मेरी बातें सुन कर उनका चेहरा किसी उपलब्धि के एहसास से दीप्त हो उठा था। मैंने बताया था कि मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी क्या भूमिका रही है?
    वे कहा करते थे, ‘मुझे मौत से डर लगता है।’ मेरा जवाब होता था, ‘मौत से कौन नहीं डरता दीक्षित साहब, यहां तक कि जो ईश्वर,अगली जिंदगी और स्वर्ग की धारणा में विश्वास करते हैं, उनहें भी मृत्यु से डर लगता है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जिस ने मौत की सच्चाई को अंगीकार कर लिया हो, वह जिंदगी जीने लगता है।’ उन्होंने कहा था, ‘अपने बारे में तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन आपकी जिंदगी देख कर खुशी होती है।’
    जय दीक्षित, मेरे शिक्षक, मेरे दोस्त, मेरे लेखक और अनुवादक की जिंदगी कुछ दिनों पहले पूरी हो गई। वे अपनी मातृभूमि से कोसों दूर थे। चूंकि मैं स्वर्ग और मृत्यु के बाद के जीवन में यकीन नहीं करता, इसलिए उनसे दोबारा मुलाकात की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन सर, आप बेहिचक मेरे सपनों में मुझ से मिलने आएं। कहीं भी और कभी भी आप से मिलने में खुशी होगी।


Sunday, May 25, 2014

आजाद सोच पर फुलस्टॉप के विरुद्ध - महेश भट्ट

mahesh bhatt article
मुझे खुशफहमी नहीं है कि मेरी जो दृष्टि है, वही पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दृष्टि है। मैं पूछता हूं कि हिंदुस्तानी सिनेमा का मयार विश्व सिनेमा में ऊंचा क्यों है? चीन जो आज हर मामले में आपसे आगे है, वह क्यों सिनेमा में पीछे है? वजह सीधी-सी है, हमारी आजादी। द राइट टू फ्री स्पीच। यह फिल्म इंडस्ट्री की धड़कन है। अगर आपने इंफ्रास्ट्रक्चर बना दिया, हर किस्म की तकनीक लगा दी, लेकिन फ्री स्पीच का गला घोंट दिया, तो इंडस्ट्री दम तोड़ देगी। चीन के पास सब कुछ है, मगर आजादी नहीं है। जो समाज अपने कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों को जेहनी आजादी नहीं देता, वो शापित समाज है। इसके बाद आप कला और सिनेमा के विकास के लिए जितना चाहे पैसा लगा लीजिए, कुछ होने वाला नहीं है।

मिडिल ईस्ट, सऊदी अरब और सिंगापुर में क्या कम पैसा है? चक्कर यह है कि आजाद सोच जहां होती है, वहीं सिनेमा या कला का जन्म होता है। 1998 में जब एनडीए सत्ता में थी, तो इन्होंने सिनेमा की आजादी को रोका था। इन्होंने मेरी फिल्म ‘जख्म’ के साथ क्या किया! यह फिल्म इनकी दक्षिणपंथी हिंदू मानसिकता को आड़े हाथों लेती थी। फिल्म को ये लोग गृह मंत्रालय तक खींच ले गए, जबकि सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी दे दी थी। फिर इनके दोहरे मापदंड देखिए। एक तरफ तो फिल्म को रोकते हैं, दूसरी तरफ इसी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार देते हैं।

कैसे भूल जाएं कि ‘फना’ को गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने रिलीज होने से रोका था। ‘परजानिया’ की रिलीज पर रोक लगाई गई थी। हमारी फिल्म ‘तुम मिले’ को सिनेमाघरों से महज इसलिए उतार दिया गया था, क्योंकि मीडिया में यह बात फैली थी कि मेरे बेटे का हेडली के साथ लेना-देना है। जबकि इसका कारण सिर्फ इतना था कि मैंने हमेशा इनकी राजनीति का निडर होकर विरोध किया। संविधान अभिव्यक्ति की आजादी देता है। जब फिल्म सेंसर होती है, तो उसको पूरी आजादी के साथ प्रदर्शन का अधिकार है। हम हिंदुस्तान के अवाम हैं। हमारी आजादी, हमारी जिंदगी पर सिर्फ हमारा हक होना चाहिए।

आप बनारस की बात करते हैं। वहां की तहजीब देखिए। वहां हर किस्म के व्यक्ति ने गंगा तट पर अपनी बात निडर होकर कही है। वहां पर अघोरी हैं, कबीर हैं, मुसलमान हैं, शिवभक्त हैं...यह है हिंदुस्तान। अंग्रेजों ने जो काम किया था, तलवार की नोंक पर जिस तरह ईसाइयत थोपी थी, आपने उनसे वह उधार ले लिया। अरे, इस मुल्क में गौतम बुद्ध ने जन्म लिया, जिन्होंने मोक्ष की पूरी धारणा को नकार दिया था। वह जगह काशी से आधे घंटे की दूरी पर है... और मैं इसी हिंदुस्तान को जानता हूं।

फिल्मों की आजादी में लोग न्यूडिटी का विषय भी शामिल करते हैं। मैं पूछता हूं कि सेंसर बोर्ड के होते हुए सिनेमा ने ऐसा कौन-सा चौंका देने वाला दृश्य आपको दिखा दिया? इस मुल्क में वात्स्यायन हुए, यहां खजुराहो है। इस डिजिटल दौर में लोगों के वाट्सएप देख लीजिए। वह भी उनके जो बहुत पारिवारिक कहे जाते हैं। देखिए कि वे आपस में क्या शेयर करते हैं। सच यह है कि हिंदुस्तानी सिनेमा ने आज तक कोई ऐसी-वैसी बात दिखाई नहीं और सेंसर व कोर्ट के होते हुए दिखा भी नहीं पाएगा। भूल जाइए कि हमारा समाज न्यूडिटी की वजह से बर्बाद हो रहा है। आज के डिजिटल दौर में उपभोक्ता बिना आपकी इजाजत के वह सब कुछ देख लेता है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

फिल्म इंडस्ट्री टैक्स और आधारभूत ढांचे वगैरह की बात समय आने पर कर लेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी साहब से मेरी उम्मीद इसलिए है कि वह हिंदुस्तान के प्राइम मिनिस्टर हैं, न कि बीजेपी के। हिंदुस्तान के 69 फीसदी लोगों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया। सिर्फ 31 फीसदी ने दिया है। अतः बावजूद इसके कि वह हमारे प्रधानमंत्री हैं, हमें उनसे असहमत होने का हक है। साथ ही, उन्हें भी मानना पड़ेगा कि हमारी जैसी सोच के लोग उनके मुल्क में रहते हैं। हम मानते हैं कि लोगों में परिवर्तन होता है। अगर हममें परिवर्तन हुआ है, तो आप में भी हुआ होगा। इस देश में सम्राट अशोक की मिसाल है। वह राजा थे और बड़ी जंग के बाद बुद्ध के दिखाए रास्ते पर चल पड़े। ऐसे में, नरेंद्र मोदी से हमारा आग्रह है कि जिस जगह से वह चुनकर आए हैं, उसकी तहजीब पर गौर करें, जिसमें लक्ष्य तक पहुंचने की नेति-नेति की एक परंपरा रही है। जो आपकी सोच पर फुलस्टॉप लगा दे, वह आजाद सोच नहीं हो सकती।

फिल्‍म स्‍मरण : सारांश

सुकन्‍या वर्मा का यह लेख रिडीफ से लिया गया है। सुकन्‍या ने इतने बेहतरीन तरीके से महेश भट्ट की 'सारांश' के बारे में बताया है कि फिल्‍म की सारी विशेषताएं स्‍पष्‍ट हो जाती हैं। मूल लेख यहां है। चवन्‍नी के आग्रह पर अमित जैन,सुजीत सिन्‍हा,देदीप्‍य भानु ,इरशाद अली और स्मिता सिंह ने अपनी पसंद और राय रखी थी।
 Mahesh Bhatt’s finest film Saaransh, which celebrates its 30th anniversary on May 25, isn’t comfort cinema but it is certainly a must-watch.
An elderly man wakes up early morning, draws out his desk and begins writing a letter to his son residing in the United States. 
The mail isn’t a fancy exercise in eloquence but its simplicity conveys a father’s love, concern and commitment towards his only child until he's stirred up by a crushing realisation -- his young son is dead, he’s been dead for three months following a mugging incident on the streets of New York. 
He may be no more but those he’s left behind aren’t exactly alive either. They merely exist mindlessly, meaninglessly in denial and disbelief.
Grief is a complex emotion, every person reacts differently to it but those afflicted share one difficulty in common -- of letting go and moving on. Because the truth is, there is no real closure; it can only be suppressed through a preoccupation with purpose. 
And that’s the nature of Mahesh Bhatt’s exploration in the heart-breaking Saaransh, which is about a bereaved 60-something couple and a young girl they volunteer to protect from a politician’s misplaced ire. 
Bhatt’s finest film, which celebrates its 30th anniversary on May 25, isn’t comfort cinema. Devoid of cheer and falsehoods, Saaransh is armed with a leading man like Anupam Kher who single-handedly enriches its story into an experience so personal, poignant and profound, only the callous can stay unmoved. 
Loss of a child is a horror no parent should suffer.
But for the retired headmaster B V Pradhan (Kher) and his schoolteacher wife, Parvati (Rohini Hattangadi) residing in a middle-class locality of Mumbai’s Shivaji Park (Bhatt grew up in the area and pays loving tribute to its daily sights), the enormity of this tragedy seems even greater. 
To possess the gift of life fully knowing it wasn’t their son’s time to go is an imposition they could do without. To compete for job positions against his son’s peers is a probability Pradhan didn’t prepare for. Or to endure the humiliation at the customs office when an official dismisses his urgency to retrieve his son’s ashes as an attempt to reclaim a television set. 
TV lene nahi aaya hoon. Main apne marey hue bete ki asthiyan lene aaya hoon. Ek baap ka apne bete ki raakh par koi adhikaar hai ke nahi? Ya uske liye bhi mujhe neeche rishvat deni padegi?" he cries, exposing his broken heart and the sad state of Indian bureaucracy at once. 
Shameful, isn’t it?
Even after three decades of Saaransh, corruption proudly occupies centre stage everywhere.
If Parvati resigns herself to religion and a monk’s soothsaying -- her son will soon take reincarnation; Pradhan’s atheistic ideals leave him with no scope for that comfort either. Bitter, frightened, gloomy, he seeks the easy escape -- suicide.   
During a painful moment, he angrily defends his refusal to live, “Agar zindagi mujhe apne ghinone usoolon par jeene ko majboor kare toh main kahoonga -- nahi, kabhi nahi.” 
Under her calm surface, Parvati is far from healed. Curiously studying the young and exuberant, she notes with a tinge of envy, “Uski aankhen dekhi? Kaise chamak rahi thi. Aisa laga jaise zindagi choo gayi ho.” 
What follows is a fascinating scene wherein Parvati resolves to join Pradhan in his suicidal pursuits. He plays her, she indulges him, it’s a dangerous game but they have nothing to lose. Except they are interrupted by a presence that will change the course of their life and offer them a motive, a 'mission' to go on living -- for the time being, at least.
Financial crunch forces them to rent out their deceased son, Ajay’s room to an aspiring actress Sujata (Soni Razdan, her first film under future husband, Mahesh Bhatt). 
Bhatt slyly remarks on how tough it is for artists to obtain rental accommodation in Mumbai given Bollywood’s ill reputation even in the 1980s through Sujata’s niggling doubt and hasty admission about her profession to her potential landlords.
Her affair with Vilas (Madan Jain), son of an influential politician Gajanan Chitre, (Nilu Phule) results in pregnancy, a development that doesn’t go down well her spineless beau and his tyrant daddy. When efforts to abort the baby go in vain, Chitre begins to intimidate Sujata and her protectors -- Pradhan and Parvati.  
I found uncanny resemblance between Chitre and late Shiv Sena supremo Bal Thackeray only to learn it’s not coincidental.  In an interview to Outlook, Bhatt admits, “I did reference him. The attributes, the body type, the glasses were borrowed.”
To the filmmaker’s surprise, Thackeray was all “praise for its theme.”
What’s masterful is how Bhatt plays out the ensuing menace by building on nerves and tension in place of physical violence. 
There’s a scene I really liked, where the troika along with their family friend, Vishwanath (a pitch perfect Suhas Bhalekar) are about to get into a taxi to the hospital when one (Salim Ghouse) of the four anti-social elements constantly hovering in their neighbourhood, slowly, sinisterly kicks a can towards Pradhan. 
The cautioning tone impressed in the sound of a rolling can and Ghouse’s glowering eyes convey more aggression than if he would grab Pradhan’s collar and mouth a few threats.
Tautly edited by David Dhawan (yes, the *same* one), Saaransh scores repeatedly for underlining significant aspects of society’s shortcomings without deviating from its core emotionality. 
Bhatt points out at the pains of red-tapism, the stigma of being an unwed mother in a conservative society, the audacity of politically-backed bullies, the meekness of politically-controlled law/order officials and dismisses the theory of reincarnation to extract suitable drama, which adds texture and dimensions to his narrative preventing it from turning overemotional.
Even though striking on its own, Saaransh wouldn’t bear the same soul without Anupam Kher. It’s extraordinary how an actor can attain this degree of success in his acting debut.   
There’s a fascinating anecdote behind his casting, which I learned of while watching his famous play, Kuch Bhi Ho Sakta Hai many years ago. Sanjeev Kumar was slated to work on this Rajshri production. 
When Bhatt short-changed Kher to accommodate the saleable star, the young actor from Shimla protested furiously calling the director a ‘fraud’ among many other things. As he started to walk out in a huff, Bhatt stopped him and decided to drop the Sholay actor in favour of a rank newcomer.
Interestingly, Sanjeev Kumar was extremely moved by Kher’s work in Saaransh and rated it among one of the best performances he’d ever seen. 
At 28, he plays a father who’s lost a son perhaps his own age with the gravitas and grace of a senior citizen. Would he be able to better the same performance today? I don’t know. Honestly, I don’t want to. 
What we see of him on screen, its pure, almost spiritual, a performance for the ages -- free from the baggage of image or expectation, it’s not merely Kher’s depiction of old age but a wisdom to penetrate into Pradhan’s consciousness that distinguishes it. 
That year he beat the likes of Naseeruddin Shah in Sparsh and Dilip Kumar in Mashaal to nab the Best Actor trophy at Filmfare awards. Bhatt walked with Best Story while Madhukar S Shinde, a regular with the filmmaker through his fecund phase from Arth to Dil Hai Ki Manta Nahi won for Best Art Direction.
Playing the equally noteworthy character of Kher’s better half, a 30-something Rohini Hattangadi infuses the part-repressed, part-hysterical temperament of her Parvati with maturity far beyond her years. 
It’s hard to describe the sadness enveloping the scene where she finally wakes up to the rotten reality of her circumstances.
Tum rakshas ho,” she accuses her husband for shattering her belief that Sujata’s unborn baby is her reincarnated Ajay. 
Soni Razdan is somewhat overshadowed by the dramatic prowess of her co-stars but her underplaying wronged women always stands her in good stead. 
Through the course of all these bittersweet developments, the essence of Saaransh is fruitfully realised when the previously suicidal Pradhan accepts it’s not taking one’s life but living it on one’s terms that requires courage.
Parvati, tumhare chehre ki jhuriyon mein mere jeevan ka saaransh hai,” he concludes. 
Loss is irreplaceable but life still goes on. The flowers blooming out of their son’s ashes reiterate this.


  • Amit Jain ·
    सारांश, कर्मा, डैडी !! बेहतरीन फिल्मो में से कुछ
  • Amit Jain ·
    और अपने पिता के प्रति उनका प्रेम .. उन्होंने अपनी पिता को ट्विटर के माध्यम से अपने सभी फोल्लोवेर्स को अवगत कराया... ना जानते हुए भी बहुत कुछ जाना अनुपम के माध्यम से उनके पिता के बारे में
  • Dedipya Bhanu श्रेष्ठ फिल्म अभी आणि बाक़ी है..!!! अच्छी फिल्में कई हैं.. सारांश, डैडी और भी कई..
  • Irshad Ali अनुपम अपने शुरूआती दिनों में महेश भट्ट के साथ सारांश से पहले ही जुड़ गए थे महेश की उन पर खास नजर थी तब तक सारांश की कहानी सामने नहीं आई थी लेकिन वो जानते थे कि इस आदमी के माध्यम से अभिनय को नये अंदाज में कहा जा सकता है। अगर आपने नाम देखी हो तो तलाश करना अनुपम खेर कहां हैं। किरण अनुपम के सामने कम नहीं उतरती लेकिन सिकन्दर दोनों के सामने कहीं नहीं ठहरते। इससे साबित हो जाता है कि आदमी खुद ही खुद को तैयार करता है। इन दिनों अनुपम या उनके जैसे सशक्त लोगों को लेकर काम नहीं हो रहा क्योंकि बाजार के आगे अनुपम खेर सरीखे अभिनेताओं का कद कहीं मैच नहीं करता फिर भी वह कर्मशियल सिनेमा का लोकप्रिय नाम है। उनकी पेस्टनजी, खोसला का घोसला सरीखी फिल्में कभी भी देखी जा सकती है।

  • Sujit Sinha सारांश