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Sunday, September 17, 2017

अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं - भूमि पेडणेकर



अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं-भूमि पेडणेकर
-अजय ब्रह्मात्‍मज
टॉयलेट एक प्रेम कथा में भूमि पेडणेकर की बहुत तारीफ हो रही है। इस तारीफ से उनकी मां खुश हैं। भूमि के फिल्‍मों में आने के बाद से मां की ख्‍वाहिश रही कि बेटी को जया भदुड़ी,शबाना आजमी और स्मिता पाटिल की कड़ी की अभिनेत्री माना जाए। ऐसा प्‍यार मिले।
- कैसे एंज्‍वॉय कर रहे हो आप टॉयलेट एक प्रेम कथा की कामयाबी और उसमें अपने काम की तारीफ से?
0 मैं तो एकदम से सन्‍न रह गई थी। मेरी पहली फिल्‍म छोटी थी। मैंने पहली बार प्रमोशन में ऐसे हिस्‍सा लिया। बड़े पैमाने पर सब कुछ चल रहा था। समझने की कोशिश कर रही थी कि मेरे साथ क्‍या हो रहा है? अब संतोष का एहसास है। फिल्‍म और मेरा काम लोगों को पसंद आया। दूसरे हफ्ते से मैं थिएटरों में जाकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं देख-सुन रही हूं।
- किन दृश्‍यों में दर्शक ज्‍यादा तालियां बजा रहे हैं?
0 सेकेड हाफ में मेरा एक मोनोलॉग है। जहों दादी मो के सामने गांव की औरतों को कुछ बता रही हूं। इंटरवल सीन है। जब केशव को डेटॉल लगा रही हूं। फिल्‍म के संदेश के साथ हमारी प्रेम कहानी के दृश्‍यों को दर्शक समझ रहे हैं1 पहली बार जब खेले में शौच के लिए जाती हूं। वह दृश्‍य भी खास है। सब मिला कर खुश हूं।
-क्‍या आप के अनुभव के दायरे में जया जैसी लड़कियां रही हैं?
0 मेरे संपर्क में कोई नहीं है। मेरी मां सातवें दशक की जया थीं। उस समय लड़कियां ज्‍यादा दबाव में रहती थीं। फिर भी मां और मौसी में जबरदस्‍त जोश था। मैंने उन दोनों से प्रेरणा ली। मेरी मां अपने समय में यूथ मूवमेंट में शामिल रही थीं। अपने हकों के लिए उन्‍होंने लड़ाई की। मेरी मां और पापा के परिवारों में प्रगतिशील सोच रही है।
-लेखक और निर्देशक से क्‍या सहायता मिली?
0 मेरी अभी तक की फिल्‍में पूरे रिसर्च के बाद लिखी गई हैं। टॉयलेट एक प्रेम कथा के लेखकों के पास सारी जानकारियां थीं। सब कुछ स्क्रिप्‍ट में था। भी नारायण सिंह गोरखपुर के हें। वे इस फिल्‍म की भाषा और मिट्टी जानते हैं। मेरे लिए आसान रहा।
-क्‍या कभी खूले में शौच की मजबूरी रही?
0 बचपन में कई बार...पूना या गोवा जाते समय रोडट्रिप में ऐसा होता था। तब हाईवे पर टॉयलेट नहीं थे। एक बार चिपलूण में एक घर का दरवाजा खटखटाया था कि हमें टॉयलेट का इस्‍तेमाल करने दें। घर की महिलाएं चौंक गई थीं।
-क्‍या स्क्रिप्‍ट पढ़ते समय अंदाजा हो गया था कि जया स्‍ट्रांग किरदार है?
0बिल्‍कुल... तब मुझे पता नहीं था कि इसमें अक्षय कुमार होंगे। मरे लिए लव स्‍टोरी बहुत खूबसूरत थी।  यह तो लग गया था कि जया औरतों को प्रेरित करेगी। मेरे मन में अक्षय सर के लिए इतना आदर है। उन्‍होंने मुझे पूरा महत्‍व दिया। जया के किरदार को चमकने दिया। मुझे मौका कदया।
-तो आप को इंतजार का फल मिला...दम लगा के हईसा के बाद आप ने अच्‍छी स्क्रिप्‍ट का इंतजार किया...धैर्य बनाए रखीं?
0 अब कह सकती हूं कि हां। तब तो सभी को लग रहा था कि मैं कोई फिल्‍म क्‍यों नहीं साइन कर रही हूं। लोग कह रहे थे कि फिल्‍म कर लो। मेरा मानना है कि सही फिल्‍में होनी चाहिए। संख्‍या बढ़ाने से क्‍या फायदा? में अपने परिवार को श्रेय दूंगी। उन्‍होंने पूरा सपोर्ट किया। मेरी मां का सहयोग रहा। उन्‍होंने मुझे कहा कि मैं शुभ मंगल सावधान करूं। यशराज फिल्‍म्‍स से होने का फायदा रहा।
-अपनी उपलब्धियों से घर में भाव बढ़ता है। कई बार दफ्तर में भी बढ़ता है। आप यशराज फिल्‍म्‍स में एक कर्मचारी थीं। अभी आप अभिनेत्री हैं। आप के और दूसरे कर्मचारियां के व्‍यवहार में कोई फर्क आया है क्‍या?
0 सभी मेरे परिचित है। मेरे प्रति उनका प्रेम रहा है। उनके साथ मेरे संबंधों में बदलाव नहीं आया है। शुरू में कुछ ने हाय-हेलो करना बंद कर दिया।फिर मैंने पहल की।मैंने कभी किसी को अनदेखा नहीं किया। मैं सभी से मिलती हूं। नया रिलेशन इवॉल्‍व हो गया है। अक्षय सर के साथ काम करने के बाद समझ गई हूं कि अच्‍छाई से बड़ी कोई चीज नहीं है।आयुष्‍मान से कितना सीखा है मैंने।
-शुभ मंगल सावधान के बारे में बताएं?
0 बहुत ही अलग किरदार है सुगंधा का। दिल्‍ली में पली-बढ़ी लड़की है। उसने सुरक्षित जिंदगी जी है। अपने पति को लेकर उसके अनेक अरमान हैं। वह कंपलीट रिलेशशिप में यकीन करती है।मुझे डायरेक्‍टर प्रसन्‍ना ने समझाया कि उन्‍हें क्‍या नहीं चाहिए और क्‍या चाहिए? उन्‍होंने तमिल की अपनी फिल्‍म को ही हिंदी दर्शकों के लिए बनाया है। इस फिल्‍म के किरदार हमें अपने घरों में मिल जाएंगे। इसमें एक समस्‍या है,लेकिन वह केवल लड़के की समस्‍या नहीं है। कई बार रिश्‍ते समस्‍याओं से बड़े होते हैं। फिल्‍म में लड़ी अपने पार्टनर के साथ खड़ी मिलती है,जब उसका कंफीडेंस लो है।वह उसके साथलड़ती है। इस फिल्‍म में किरदार की अपूर्णता को सेलिब्रेट किया गया है। बहुत ही प्रोग्रेसिव फिल्‍म है।
-फिल्‍म के निर्माता आनंद राय के साथ कैसा अनुभव रहा?
0 उनके साथ बहुत मजा आया। उन्‍होंने साफ-सुथरी फिल्‍म बनाने में गाइड किया। उनके साथ काम करने का मन था। उम्‍मीद है कि जल्‍दी ही उनके निर्देशन में काम करने का मौका मिले। वे मेरे विशलिस्‍ट में थे।
-और कौन है?
0शिमित अमीन,विशाल भारद्वाज,जोया अख्‍तर,नितेश तिवारी,शकुन बत्रा,शुजीत सरकार...इतने सारे हैं। जोया के साथ एक शॅर्ट फिल्‍म कर ली है।
-अभिषेक चौबे की अगली फिल्‍म के बारे में क्‍या कहेंगी?
0उसके बारे में अभी कुछ बताना जल्‍दबाजी होगी।
-क्‍या केवल डिग्‍लैम रोल ही करने हैं?
0 नहीं,मैं टिप टिप बरसर पानी भी गाना चाहती हूं। मैं ठोस किस्‍म की भूमिकाएं करती रहूंगी। हर तरीके के किरदार चाहिए। रियल लाइफ में मैं ग्‍लैमरस लड़की हूं। आम लड़कियों की सारी खासियतें हैं मुझ में...

Saturday, September 2, 2017

फिल्‍म समीक्षा : शुभ मंगल सावधान



फिल्‍म रिव्‍यू
जेंट्स प्राब्‍लम पर आसान फिल्‍म
शुभ मंगल सावधान
-अजय ब्रह्मात्‍मज
आर एस प्रसन्‍ना ने चार साल पहले तमिल में कल्‍याण समायल साधम नाम की फिल्‍म बनाई थी। बताते हैं कि यह फिल्‍म तमिलभाषी दर्शकों को पसंद आई थी। फिल्‍म उस पुरुष समस्‍या पर केंद्रित थी,जिसे पुरुषवादी समाज में मर्दानगी से जोड़ दिया जाता है। यानी आप इस क्रिया को संपन्‍न नहीं कर सके तो नामर्द हुए। उत्‍तर भारत में रेलवे स्‍टेशन,बस टर्मिनस और बाजार से लेकर मुंबई की लोकल ट्रेन और दिल्‍ली की मैट्रो तक में में नामर्दी का शर्तिया इलाज के विज्ञापन देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समस्‍या कितनी आम है,लेकिन पूरा समाज इस पर खुली चर्चा नहीं करता। सिर्फ फुसफुसाता है। आर एस प्रसन्‍ना अपनी तमिल फिल्‍म की रीमेक शुभ मंगल सावधान में इस फुसफसाहट को दो रोचक किरदारों और उनके परिजनों के जरिए सार्वजनिक कर देते हैं। बधाई...इस विषय पर बोल्‍ड फिल्‍म बनाने के लिए।
दिल्‍ली की मध्‍यवर्गीय बस्‍ती के मुदित(आयुष्‍मान खुराना) और सुगंधा(भूमि पेडणेकर) एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। झेंप और झिझक के कारण मुदित ऑन लाइन प्रोपोजल भेज देता है। सुगंध के मा-बाप इस अवसर को लपक लेते हैं। सुगंधा भी राजी है। दोनों का रोका होने वाला है। इसी बीच एक दिन भूमि के घर का एकांत मिलने पर मुदित को एहसास होता है कि वह परफार्म नहीं कर सकता। सुगंधा को लगता है कि बालतोड़ हो गया है और मुदित उसे जेंट्स प्राब्‍लम कहता है। सुगंधा चाहती है कि शादी के पहले मुदित इस समस्‍या का समाधान कर ले। मुदित भी कोशिश में है। बात बन नहीं पाती। शादी का दिन नजदीक आता जा रहा है। सारी तैयारियां हो चुकी हैं। दिल्‍ली से से वर-वधू का परिवार हरिद्वार पहुंच गया है। शादी के पहले सराती-बाराती दोनों पक्षों को मुदित की जेंट्स प्राब्‍लम की जानकारी मिल जाती है। होगा कि नहीं होगा पर बाजियां लग जाती हैं। और फिर...
आर एस प्रसन्‍ना ने लेखक की मदद से तमिल कथाभूमि की फिल्‍म बहुत खूबसूरती और भाव के साथ उत्‍तर भारत की हिंदी पृष्‍ठभूमि में रोपा है। निर्देशक प्रसन्‍ना के साथ निर्माता आनंद एल राय की भी तारीफ करनी होगी कि उन्‍होंने ऐसे जरूरी विषय पर मनोरंजक और आसान फिल्‍म बनाई। विषय का सरलीकरण करने में कुछ दृश्‍य ढीले हुए हैं,लेकिन उनके इस महत्‍वपूर्ण प्रयास की सराहना बनती है। इस विषय पर फिल्‍म बनाने में दृश्‍यों और संवादों में फिसलने का भारी खतरा था। यहां तक कि कलाकारों के परफार्मेंस में फूहड़ता आ सकती थी,लेकिन सभी ने सधे प्रयत्‍न से संतुलन बनाए रखा है। खास कर जेंट्स प्राब्‍लम को जाहिर करने में बगैर सही शब्‍द का इस्‍तेमाल किए ही भूमि,आयुष्‍मान और सीमा वाहवा की भाव-भंगिमा सारे अर्थ खोल देती है। बाद में परिवार के अन्‍य सदस्‍य भी शब्‍द संकेतों और व्‍यंजना में जेंट्स प्राब्‍लम पर खुलेआम विमर्श कर लेते हैं। होगा कि नहीं होगा प्रसंग अतिरेकी हो गया है,फिर भी लेखक,निर्देशक और कलाकार बहकने से बचे हैं।
दिल्‍ली और हरिद्वार के परिवेश और भाषा में रंग और लहजे का पूरा खयाल रखा गया है। फिल्‍म की तकनीकी टीम ने थीम के मुताबिक सब रख है। सहयोगी कलाकारों की चर्चा करें तो निस्‍संदेह सबसे पहले सीमा पाहवा का उल्‍लेख करना होगा। वह किरदारों में आसानी से ढलती हैं। हिंदी फिल्‍मों की नई मां को वह अच्‍छी तरह पेश कर रही हैं। सुगंधा के पिता और काका तथा मुदित के माता-पिता की भूमिकाओं में आए कलाकार फिल्‍म के माहौल और मजे को गाढ़ा करते हैं। आयुष्‍मान खुराना और भूमि पेडणेकर के अभिनय की खासियत है कि वे मुदित और सुगंधा ही लगते हैं। दोनों ने चैलेंजिंग किरदार को पूरी सहजता से निभाया है।
इस फिल्‍म की यह खासियत है कि फिल्‍मों के उल्‍लेख के बावजूद यह फिल्‍मी होने से बची है। किरदारों को उनके परिवेश में ही रखा गया है और रियलिस्‍ट होने की अतिरिक्‍त कोशिश नहीं की गई है।
अवधि- 108 मिनट
*** ½ साढ़े तीन स्‍टार  

Saturday, August 12, 2017

फिल्‍म समीक्षा : टॉयलेट- एक प्रेम कथा



फिल्‍म रिव्‍यू
शौच पर लगे पर्दा
टॉयलेट एक प्रेम कथा
-अजय ब्रह्मात्‍मज
जया को कहां पता था कि जिस केशव से वह प्‍यार करती है और अब शादी भी कर चुकी है...उसके घर में टॉयलेट नहीं है। पहली रात के बाद की सुबह ही उसे इसकी जानकारी मिलती है। वह गांव की लोटा पार्टी के साथ खेत में भी जाती है,लेकिन पूरी प्रक्रिया से उबकाई और शर्म आती है। बचपन से टॉयलेट में जाने की आदत के कारण खुले में शौच करना उसे मंजूर नहीं। बिन औरतों के घर में बड़े हुआ केशव के लिए शौच कभी समस्‍या नहीं रही। उसने कभी जरूरत ही नहीं महसूस की। जया के बिफरने और दुखी होने को वह शुरू में समझ ही नहीं पाता। उसे लगता है कि वह एक छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही है। दूसरी औरतों की तरह अपने माहौल से एडजस्‍ट नहीं कर रही है। यह फिल्‍म जया की है। जया ही पूरी कहानी की प्रेरक और उत्‍प्रेरक है। हालांकि लगता है कि सब कुछ केशव ने किया,लेकिन गौर करें तो उससे सब कुछ जया ने ही करवाया।
टॉयलेट एक प्रेम कथा रोचक लव स्‍टोरी है। जया और केशव की इस प्रेम कहानी में सोच और शौच की खल भूमिकाएं हैं। उन पर विजय पाने की कोशिश और कामयाबी में ही जया और केशव का प्रेम परवान चढ़ता है। लेखक सिद्धार्थ-गरिमा ने जया और केशव की प्रेम कहानी का मुश्किल आधार और विस्‍तार चुना है। उन्‍होंने आगरा और मथुरा के इलाके की कथाभूमि चुनी है और अपने किरदारों का स्‍थानीय रंग-ढंग और लहजा दिया है। भाषा ऐसी रखी है कि स्‍थानीयता की छटा मिल जाए और उसे समझना भी दुरूह नहीं हो। उच्‍चारण की शुद्धता के बारे में ब्रजभूमि के लोग सही राय दे सकते हैं। फिल्‍म देखते हुए भाषा कहीं आड़े नहीं आती। उसकी वजह से खास निखार आया है।
जया बेहिचक प्रधान मंत्री के स्‍वच्‍छ भारत अभियान की थीम से जुड़ी यह फिल्‍म सदियों पुरानी सभ्‍यता और संस्‍कृति के साच पर सवाल करती है। लेखकद्वय ने व्‍यंग्‍य का सहारा लिया है। उन्‍होंने जया और केशव के रूप में दो ऐसे किरदारों को गढ़ा है,जो एक-दूसरे से बेइंतहा प्रेम करते हैं। सिर्फ शौच के बारे में उनकी सोच अलग-अलग है। केशव की सोच में कभी शौच का सवाल आया ही नहीं,क्‍योंकि बचपन से उसने खुले में शौच की ही नित्‍य ्रिया माना और समझा। जया के बिदकने पर भी शौच की जरूरत उसके पल्‍ले नहीं पड़ती। उसे जया की मांग का एहसास बाद में होता है। फिर तो वह एड़ी-चोटी का जोड़ लगा देता है। गांव और आसपास की महिलाएं जागृत होती हैं और शौच एक अभियान बन जाता है।
ऐसी फिल्‍मों के साथ खतरा रहता है कि वे डाक्‍यूमेंट्री न बन जाएं। या ऐसी उपदेशात्‍मक न हो जाएं कि दर्शक दुखी हो जाएं। निर्देशक श्रीनारायण सिंह संतुलन बना कर चलते हैं। उन्‍हें अपने कलाकारों और लेखकों का पूरा सहयोग मिला है।
फिल्‍म के संवाद चुटीले और मारक हैं। परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर चल रह कुप्रथा पर अटैक करती यह फिल्‍म नारे लगाने से बची रहती है। एक छोर पर केशव के पिता पंडिज्‍जी हैं तो दूसरे छोर पर जया है। इनके बीच उलझा केशव आखिरकार जया के साथ बढ़ता है और बड़े परिवर्तन का कारक बन जाता है। पढ़ी-लिखी जया एक तरह से गांव-कस्‍बों में नई सोच के साथ उभरी लड़कियों का प्रतिनिधित्‍व करती है। वह केशव से प्रेम तो करती है,लेकिन अपने मूल्‍यों और सोच के लिए समझाौते नहीं कर सकती। और चूंकि उसकी सोच तार्किक और आधुनिक है,इसलिए हम उसके साथ हो लेते हैं। हमें केशव से दिक्‍कत होने लगती है। लेखकों ने केशव के क्रमिक बदलाव से कहानी स्‍वाभाविक रखी है। हां,सरकारी अभियान और मंत्रियों की सक्रियता का हिस्‍सा जबरन डाला हुआ लगता है। उनके बगैर या उनके सूक्ष्‍म इस्‍तेमाल से फिल्‍म ज्‍यादा असरदार लगती।
अक्षय कुमार ने केशव के रिदार को समझा है। उन्‍होंने उस किरदार के लिए जरूरी भाव-भंगिमा और पहनावे पर काम किया है। लहजे और संवाद अदायगी में भी उनकी मेहनत झलकती है। जया की भूमिका में भूमि पेडणेकर जंचती हैं। उन्‍होंने पूरी सादगी और वास्‍तविकता के साथ इस किरदार को निभाया है। उनके सहज अभिनय में जया भादुड़ी की झलग है। ग्‍लैमर की गलियों में वह नहीं मुड़ीं तो हिंदी फिल्‍मों को एक समर्थ अभिनेत्री मिल जाएगी। इस फिल्‍म की जान हैं पंडिज्‍जी यानी सुधीर पांडे। उन्‍होंने अपने किरदार को उसकी विसंगतियों को ठोस विश्‍वास के साथ निभाया है। छोटे भाई के रूप में दिव्‍येन्‍दु समर्थ परक और सहयोगी हैं। जया के मां-पिता के रूप में आए कलाकार भी स्‍वाभाविक लगे हैं। अनुपम खेर अपने अंदाज के साथ यहां भी हैं।
पर्दा सोच से हटा कर शौच पर लगाने का टाइम आ गयो।
अवधि- 161 मिनट
**** चार स्‍टार    

Saturday, February 28, 2015

फिल्‍म समीक्षा : दम लगा के हईसा


चुटीली और प्रासंगिक
-अजय ब्रह्मात्मज
    यशराज फिल्म्स की फिल्मों ने दशकों से हिंदी फिल्मों में हीरोइन की परिभाषा गढ़ी है। यश चोपड़ा और उनकी विरासत संभाल रहे आदित्य चोपड़ा ने हमेशा अपनी हीरोइनों को सौंदर्य और चाहत की प्रतिमूर्ति बना कर पेश किया है। इस बैनर से आई दूसरे निर्देशकों की फिल्मों में भी इसका खयाल रख जाता है। यशराज फिल्म्स की ‘दम लगा के हईसा’ में पहली बार हीरोइन के प्रचलित मानदंड को तोड़ा गया है। फिल्म की कहानी ऐसी है कि सामान्य लुक की एक मोटी और वजनदार हीरोइन की जरूरत थी। भूमि पेंडणेकर ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। इस फिल्म में उनके साथ सहायक कलाकारों का दमदार सहयोग फिल्म को विश्वसनीय और रियल बनाता है। खास कर सीमा पाहवा,संजय मिश्रा और शीबा चड्ढा ने अपने किरदारों को जीवंत कर दिया है। हम उनकी वजह से ही फिल्म के प्रभाव में आ जाते हैं।
    1995 का हरिद्वार ¸ ¸ ¸देश में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव की सरकार है। हरिद्वार में शाखा लग रही है। प्रेम एक शाखा में हर सुबह जाता है। शाखा बाबू के विचारों से प्रभावित प्रेम जीवन और कर्म में खास सोच रखता है। निर्देशक ने शाखा के प्रतिगामी असर का इशारा भर किया है। तिवारी परिवार का यह लड़का ऑडियो कैसेट की दुकान चलाता है। कुमारा शानू उसकी कमजोरी हैं। उनके अलावा वह पिता की चप्पल और परीक्षा में अंग्रेजी भी उसकी कमजोरी है। तिवारी परिवार अपने लाडले की शादी पढ़ी-लिखी सर्विसवाली बहू से कर देना चाहते हैं। वे उसके मोटापे को नजरअंदाज करते हैं। प्रेम न चाहते हुए भी पिता और परिवार के दबाव में शादी कर लेता है। वह अपनी पत्नी संध्या को कतई पसंद नहीं करता। एक बार गुस्से में वह कुछ ऐसा कह जाता है कि आहत संध्या उसे छोड़ कर चली जाती है। बात तलाक तक पहुंचती है। फैमिली कोर्ट उन्हें छह महीने तक साथ रहने का आदेश देता है ताकि वे एक-दूसरे को समझ सकें। इसी दौर में प्रेम और संध्या करीब आते हैं। और आखिरकार ¸ ¸ ¸
    निर्देशक शरद कटारिया ने उत्तर भारत के निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की रोजमर्रा जिंदगी से यह कहानी चुन ली है। बेमेल शादी के बहाने वे कई जरूरी मुद्दों को भी छूते चलते हें। फिल्म में प्रसंगवश सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी है। लेखक-निर्देशक ने संयमित तरीके से हरिद्वार के माहौल को रचा है। उन्होंने अपने चरित्रों को लार्जर दैन लाइफ नहीं होने दिया है। फिल्म में मध्यवर्गीय परिवारों के दैनंदिन प्रसंग और रिश्तों के ढंग हैं। प्रेम और संध्या के परिवारों के सदस्यों को भी निर्देशक ने स्वाभाविक रखा है। उनके व्यवहार, प्रतिक्रिया और संवादों से फिल्म के प्रभाव का घनत्व बढ़ता है।
    कलाकारों में संजय मिश्रा और सीमा पाहवा की तारीफ करनी होगी। उनकी जोड़ी को हम रजत कपूर की ‘आंखों देखी’ में देख चुके हैं। इन दोनों कलाकारों ने आयुष्मान खुरााना और भूमि पेंडणेकर का काम आसान कर दिया है। भूमि पेंडणेकर की यह पहली फिल्म है। बगैर आयटम सौंग और अंग प्रदर्शन के भी वह अपील करती हैं। यह अलग बात है कि भविष्य की फिल्मों के लिए उन्हें अलग से मेहनत करनी होगी। संध्या के किरदार के लिए वह उपयुक्त हैं। उन्होंने अपने किरदार को नार्मल और नैचुरल रखा है। सालों बाद हिंदी फिल्मों में बुआ दिखी है। बुआ के रूप में शीबा चड्ढा अच्छी और चुटीली हैं।
    वरुण ग्रोवर और अनु मलिक के गीत-संगीत में पीरियड का पूरा ध्यान रखा गया है। वे उस पीरियड के संगीत की नकल में भोंडे नहीं हुए हैं। वरुण ग्रोवर के गीतों में आमफहम भाषा और अभिव्यक्ति रहती है। वह यहां भी है। इस फिल्म की भाषा मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को वैसी ही लग सकती है, जैसे सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को अंग्रेजी अंग्रेजी मिश्रित भाषा लगती है। उत्तर भारत के दर्शक मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन में इस फिल्म का आनंद उठाएंगे।
अवधि- 111 मिनट
 *** १/२ साढ़े तीन स्टार