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Monday, December 8, 2008

भाषा से भाव बनता है: अमिताभ बच्चन


अमिताभ बच्चन अपने पिता की रचना 'जनगीता' को स्वर देंगे.इस बातचीत में अमिताभ बच्चन ने और भी बातें बतायीं.जिस प्रकार एक सुसंस्कारित, आस्थावाहक पुत्र की तरह सदी के महानायक पिता की रचनाओं को अपना स्वर देकर उस अनमोल विरासत और परम्परा से जुड़ने के आकांक्षी है वह एक बड़ी बात है-



आपने पिता द्वारा अनूदित 'ओथेलो' में कैसियो की भूमिका निभायी थी। उनकी इच्छा थी कि आप 'हैमलेट' की भी भूमिका निभाएं। क्या इसकी संभावना बनती है?
अब तो नहीं बन सकती। अब तो 'हैमलेट' के पिता के रूप में जो भूत था वही बन पाऊंगा। हां, इस बात का खेद है कि उसे नहीं कर पाया। कभी अवसर नहीं मिल पाया। जब अवसर था तो व्यस्तता बढ़ गई थी। व्यस्तता के कारण इस ओर मैं ध्यान नहीं दे पाया। मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले दिनों में कोई न कोई इसे पढ़ेगा और इसकी बारीकी को समझेगा। कोई न कोई कलाकार इस किरदार को जरूर निभाएगा।



इस सवाल का यह भी आशय था कि क्या आप निकट भविष्य में रंगमंच पर उतर सकते हैं?
इस उम्र में थिएटर में वापस जाना मेरे लिए संभव नहीं होगा, क्योंकि थिएटर बड़ा मुश्किल काम है। जो लोग थिएटर करते हैं,उनको मैं बहुत दाद देता हूं। वे उम्र बीतने पर भी लगातार थिएटर से जुड़े रहते हैं। इतने गुण मुझमें नहीं हैं।



बच्चन जी की स्मृति में युवा और उदीयमान साहित्यकारों के लिए किसी ठोस योजना पर कोई विचार चल रहा है क्या?
इस पर विचार चल रहा है। हमने सोचा है कि एक रिसर्च इंस्टीट्यूट बने,जहां लोग बाबूजी की रचनाओं पर आकर रिसर्च कर सकें। अध्ययन करें। इस तरफ हमलोग ध्यान दे रहे हैं। उम्मीद करते हैं कि जरूर कुछ होगा।



विदेशों में साहित्यकारों के घर म्यूजियम बना दिए जाते हैं। अपने देश में कलाकारों और साहित्यकारों के प्रति यह सम्मान नहीं है। क्या आप 'सोपान' को म्यूजियम के रूप में परिवर्तित करना चाहेंगे?
बाबूजी की स्मृति में एक लाइब्रेरी जरूर होनी चाहिए। इस दिशा में हमलोगों ने कई बार सोचा है। नक्शे भी बने। फिर बनते-बनते वह योजना रह गई है। हम चाहते हैं कि रिसर्च इंस्टीट्यूट बने। वहां उनकी पुस्तकें रखी जाएं। 'सोपान' हमारा निजी गृह है। उसे हम पब्लिक के लिए नहीं खोल सकते। 'सोपान' और यहां 'प्रतीक्षा' में उनकी चीजें ज्यों की त्यों रखी हुई हैं। हमारे लिए वे प्रेरणा हैं। हम उनका आदर करते रहेंगे। हां, अगर कोई उनका प्रेमी कुछ देखना चाहेगा और हमसे आग्रह करेगा तो हम इंकार नहीं करेंगे। आम जनता के लिए हम उन्हें नहीं खोलना चाहेंगे।



एक बच्चन संग्रहालय भी हो सकता है, जहां आपके पिताजी के साथ-साथ आपसे और जया जी, अभिषेक और ऐश्वर्या से जुड़ी चीजें और यादें रखी जा सकती हैं?
अगर कोई सोचे तो करने के लिए बहुत कुछ हो सकता है। मिल-जुलकर सोचना होगा। पहली बात तो यह है कि हमने अपने आपको कभी इतना महत्वपूर्ण समझा नहीं कि हमारे लिए ऐसा कुछ हो। हां, बाबूजी के लिए कई बार सोचा है। हमलोग उनकी सारी चीजें एकत्रित कर रहे हैं। उन पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बन रही है, जिसका निर्देशन डॉ ़ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी कर रहे हैं। अगर कोई उनकी रचनाओं के रूपांतरण या अनुवाद की अनुमति लेता है तो हम कभी मना नहीं करते हैं। अभी हम अपनी सोच को मू‌र्त्त रूप नहीं दे पाए हैं।



आपको 'मधुशाला' क्यों अत्यधिक प्रिय है?
सरल है और उसमें जीवन का सार मिलता है।



आपके पिता जी ने एक बार अपनी रचनाएं स्वयं रिकॉर्ड की थीं। उस रिकॉर्ड को जारी किया जाए तो आज की पीढ़ी उनकी रचनाओं का आनंद उनके स्वर में ले सकती है। हम कब तक इसकी उम्मीद कर सकते हैं?
हाल ही में हमलोगों ने बहुत खोजने के बाद कुछ रिकॉर्ड एकत्रित किए हैं। उम्मीद करते हैं कि आने वाले वर्षो में इसका एक संग्रह निकल सके। उस समय की रिकॉर्डिग साधारण तरीके से की गई है। तब न तो हमारे पास इतने साधन थे और न ऐसी समझ थी। आकाशवाणी में रिकॉर्ड हुई चीजें ठीक हैं। व्यक्तिगत तौर पर कुछ लोगों ने कवि सम्मेलनों आदि में उनकी रचनाएं रिकॉर्ड की हैं। जैसे मुंबई में धर्मवीर भारती के यहां कभी कुछ रिकॉर्ड हो गया। कोलकाता में बिड़ला जी की संस्थाओं में कुछ रिकॉर्ड है। बहुत लोग लिखते हैं हमें कि उनके पास बाबूजी की चिट्ठियां हैं। बाबूजी हर किसी के पत्र का जवाब हाथ से लिखकर देते थे। हम उन सभी को एकत्रित कर रहे हैं। हो सकता है कि सभी पत्रों का एक संग्रह निकालें।



ऑडियो-विजुअल बहुत कम हैं?
जी, वह भी बहुत कम है। ज्यादातर घरेलू चीजें हैं। वह भी रिकॉर्ड होना तब शुरू हुआ, जब मैं फिल्मों में आया। फिल्मों में काम पाने के बाद हम एट एमएम कैमरा खरीद सके। उसके पहले तो हमारे पास साधन भी नहीं थे। अब तकनीक काफी विकसित हो गई है। इस लिहाज से हमारे पास जो चीजें हैं,उसकी क्वालिटी बहुत खराब है।



अपनी जीवन यात्रा में आपने पिता की मौजूदगी को कब सबसे ज्यादा महसूस किया?
हर पल। जब छोटे थे तब, जब बड़े हो रहे थे तब, स्कूल जाते समय। हर वर्ष। प्रत्येक अरसा उनकी यादों से भरा हुआ है। ऐसा कहना मेरे लिए संभव नहीं होगा कि उम्र के किस पड़ाव में वे ज्यादा करीब थे। उम्र बढ़ने के साथ रिश्ते का स्तर और आयाम बदल जाता है। लेकिन उनके प्रति कभी आदर-सम्मान कम नहीं हुआ। एक मर्यादा रही और बंधन रेखा का कभी उल्लंघन नहीं हुआ।



मां और पिता के सारे गुण और संस्कार आपमें समाहित हैं। हम जानना चाहेंगे कि पिता के किन गुणों पर आपने ज्यादा गौर किया और उन्हें सायास अपने जीवन में उतारना चाहा?
वे बहुत ही सरल इंसान थे। सहनशीलता उनमें बहुत थी। चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक। उनमें आत्मबल था। किसी चीज के बारे में एक बार सोच लिया और कहा कि इसे करूंगा तो जब तक वह पूरा नहीं हो जाता था तब तक उनका आत्मबल नहीं टूटता था।



बच्चन परिवार पीढि़यों से विरोधों के बीच आगे बढ़ता रहा। सार्वजनिक जीवन में आने के बाद यह विरोध कुछ ज्यादा ही हो गया। इसकी वजह क्या हो सकती है? क्या आप मानते हैं कि बच्चन जी समय से आगे सोचते और चलते थे, इसलिए प्रबल विरोध होता था? और अब आप उसी लीक पर चल रहे हैं।
हो सकता है कि यह आपका दृष्टिकोण हो। आप जैसे लोग जो समाज, जीवन और देश को एक अलग दृष्टि से देखते हैं। उन्हें लगता हो कि हम समय से आगे रहे। हम यही कहेंगे कि हमलोगों ने जानबूझ कर कभी कुछ ऐसा नहीं किया। न ही इस आशा से किया कि इस पर कुछ चर्चा होगी। हमारे मन में जो आया, वो हमने किया। अगर वह समय से आगे चल रहा है या देख रहा है तो उसका श्रेय आप हमें दे सकते हैं कि हमने ऐसा सोचा या किया। इसके साथ जो अवगुण आते हैं या चर्चा विवाद होता है, उसका न तो हमें एहसास रहा और न हमने सोचा। मेरा ऐसा मानना रहा है और मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों को कहता हूं कि यदि हम एक ऐसे प्रोफेशन में हैं,जहां पर सबकी नजर हम पर टिकी है तो इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। कहीं न कहीं जो लोग विख्यात होते हैं,उन पर ऐसी नजर रखी जाती है। यही हमारा जीवन है और इससे हमें जूझना होगा। यहां बाबूजी से सीखी सहनशीलता काम आती है।



हिंदी भाषा का संस्कार और शब्दों की समृद्ध पूंजी आपको पिता से मिली है। आपने निजी अभ्यास से उसे और विकसित एवं समृद्ध किया है। हिंदी की समृद्ध परंपरा से नयी पीढ़ी कैसे जुड़ सकती है?
उतनी नहीं मिली है,जितनी मैं चाहता हूं। इस बात का मुझे बहुत खेद है। लोग ऐसा मानते और देखते हैं कि मेरे पास भाषा की जबरदस्त पूंजी है। लेकिन ऐसा है नहीं। मैं अभी भी सोचता हूं कि मुझे बहुत कुछ सीखना है। प्रतिदिन कोशिश करता हूं कि बाबूजी के लेखन से या जो पत्रकार लिखते हैं,उनके लेखन से या कुछ पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकूं। यह काम अभी जारी है। भाषा एक समस्या है, जिसे मैं स्वीकार करता हूं। अपनी संतान से हमेशा कहता हूं कि जब तक आप अपनी भाषा ठीक से बोलना नहीं सीखेंगे, तब तक आप अपने कार्य में भी सफल नहीं हो पाएंगे। मेरा ऐसा मानना है कि अगर आप हिंदी फिल्मों में काम करते हैं तो सबसे पहले आपको हिंदी सीखनी चाहिए। अपनी भाषा सीखनी चाहिए। अगर आप मराठी फिल्मों में काम कर रहे हैं तो मराठी भाषा सीखें। अगर आप तमिल में काम कर रहे हैं तो आप तमिल सीखें। बंगाली भाषा में काम कर रहे हैं तो बंगाली सीखें। भाषा सीखना बहुत जरूरी है। भाषा से भाव बनता है। सही भाव समझ में आता है।



आपके पिता जी की दो पंक्तियां हैं-
मैं गाऊं तो मेरा कंठ, स्वर न दबे औरों के स्वर से/जीऊं तो मेरे जीवन की औरों से हो अलग रवानी/ दुनिया से अलग और आगे रहने की बात वे हमेशा सोचते रहे। इसे आप अपने जीवन में कितना उतार पाए?
पहली बात तो यह है कि किस परिस्थिति और मानसिक स्थिति में उन्होंने ये पंक्तियां लिखीं, इसे जानना बहुत मुश्किल है। अगर आप इसे मेरे लिए एक उदाहरण बनाते हैं तो यह मेरे लिए कठिन हो जाता है। मैं केवल इतना कहना चाहूंगा कि मैं जानबूझकर या निर्धारित कर किसी अलग लीक पर जाने का प्रयत्न नहीं करता हूं। अगर वह भाग्य या परिस्थितिवश हो जाता है तो मैं उसे स्वीकार कर लेता हूं। जीवन में कई बार ऐसे क्षण आए हैं,जब लीक से हटकर कोई समस्या आई हो या कोई मार्ग दिखा हो तो ऐसे अवसरों पर आम रवैया ही होता है कि भैया यह तो लीक से हटकर है। इस पर मत जाइए। पता नहीं यह रास्ता कहां जाएगा। हम केवल इतना कह सकते हैं और किसी घमंड से ऐसा नहीं कह रहे हैं कि कभी कोई ऐसा मार्ग दिखा है तो हमने चाहा है कि चलो इस पर भी चल कर देखते हैं। इस निश्चय से नहीं जाते कि यह लीक से हटकर है। यह हमारे मन में कभी नहीं रहा।



आपके बाबूजी ने 'जनगीता' की रचना की थी। उसका अधिक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ। क्या उस पुस्तक को लेकर कोई योजना है?
अच्छा हुआ कि आपने बात कर ली। इन्हीं दिनों मैं उस पर बैठ रहा हूं। अभी-अभी आदेश श्रीवास्तव ने फिल्म इंडस्ट्री के दस-बारह गायकों के साथ मेरी आवाज में 'हनुमान चालीसा' रिकॉर्ड की है। उनके किसी मित्र का बेंगलोर में हनुमान मंदिर खुल रहा था तो उन्होंने रिकॉर्ड किया था। उन्होंने मुझसे कहा तो मैंने भी गाया। वह बहुत अच्छा बना है। मैंने उनसे सारे अधिकार खरीद लिए हैं। इसका प्रचार किया जाएगा और वीडियो बनेगा। इसको जगह-जगह भेजा जाएगा। इसी स्तर पर मैं 'जनगीता' का भी पाठ करूंगा। मैंने उनसे कहा है कि वे काम करें। वे इसे संगीतबद्ध कर रहे हैं। हम प्रतिदिन इस पर लगे हुए हैं। अपनी आवाज में पूरी 'जनगीता' हम रिकॉर्ड करेंगे और इसे सबके लिए ले आएंगे। यह अवधी मिश्रित भाषा में है।



लखनऊ और भोपाल में कुछ मौलानाओं ने 'मधुशाला' पर आपत्ति की है? उसके खिलाफ फतवा जारी किया है। आप इस संबंध में क्या कहेंगे?
अब इसके ऊपर मैं क्या चर्चा करूं? देश का कानून है। वे हमें बताएं कि उन्हें क्या परेशानी है। हम उसका पालन करेंगे। जिस पुस्तक को प्रकाशित हुए सत्तर साल से ऊपर हो गए और हिंदी साहित्य में जिसे एक मापदंड माना जाता है ... इस मामले पर तो साहित्यकारों को बोलना चाहिए। मैं कुछ नहीं कहना चाहूंगा।
इस इंटरव्यू का पहला हिस्सा यहाँ पढ़ें...