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Sunday, March 22, 2015

जासूस बन देखें ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ : दिबाकर बनर्जी

-अजय ब्रह्मात्‍मज
-इस फिल्म को देखने के लिए ऑडिएंस को किस तरह तैयार होना चाहिए। दर्शक आप की फिल्मों को लेकर द्वंद्व में रहते हैं।
0 बड़ा अच्छा सवाल किया आपने, लेकिन डायरेक्टर ही दर्शकों को बताता फिरे कि मेरी फिल्म को इस तरह देखो तो वह जरा अजीब सा लगता है। बहरहाल,मेरे हिसाब से हमारी फिल्मों में आजकल खाली टाइम बढ़ गया है। मैं पाता हूं कि सीन में गाने चल रहे हैं। डायलॉग चल रहा है, पर ऑडिएंस मोबाइल पर बातें कर रहे हैं। सिनेमा के बीच से बाहर जा चक्कर लगा कर आ रहे हैं। फिर वे कहना शुरू कर देते हैं कि यार हम तो बोर हो रहे हैं। इधर हिंदी फिल्में दर्शकों को बांधकर नहीं रख पा रही हैं। साथ ही सिनेमा के प्रति दर्शकों के समर्पण में भी कमी आई है। वे भी समर्पित भाव से फिल्में नहीं देखते। मेरा कहना है कि यार इतना आरामदेह सिनेमहॉल है। बड़ी सी हाई क्वॉलिटी स्क्रीन है। डॉल्बी साउंड है। अगर हम उस फिल्म के प्रति सम्मोहित न हो गए तो फिर फायदा क्या? कॉलेज स्टूडेंट को देखता हूं कि सिनेमा हॉल में बैठ वे आपस में तफरीह कर रहे हैं। मस्ती कर रहे हैं। सामने स्क्रीन पर चल रही फिल्म तो उनके लिए सेकेंडरी चीज है। सामने कितनी ही झकझोरने वाली फिल्म क्यों न हो, दर्शक समर्पित और अनुशासित भाव से फिल्में नहीं देखते।
    ऐसे माहौल में आप अगर मेरी फिल्म देखने जाएं। खासकर ब्योमकेश को तो हर सीन में क्लू है। हर सीन में दर्शकों को एक मौका है कि वे ब्योमकेश के साथ आगे बढ़ें। पहले से पकड़ सकें कि कौन क्या है? अगर ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ देखने दर्शक बतौर जासूस जाएं तो उन्हें वह फिल्म देखने में बड़ा मजा आएगा। बस दो घंटे बीस मिनट की मेरी फिल्म एकाग्रचित होकर फिल्म देखें। यह सोचकर देखें कि मुझे ब्योमकेश को हराना है तो वे फिल्म के एक-एक क्षण का मजा ले सकेंगे।
-हिंदी फिल्मों के साथ एक और समस्या रही है कि दर्शक बड़ी आसानी से सीन स्पेक्यूलेट कर लेते हैं। कई बार तो ऐसा भी देखने को मिला है कि हम कोई डायलॉग विशेष बोलते हैं और स्क्रीन पर वही कुछ सितारे भी बोल देते हैं। आप कैसे सरप्राइज करने वाले हैं?
0 इस फिल्म में एक से बढक़र एक सरप्राइजेज हैं। आप को सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलेगी। अगर आप को पहले एक-दो मिनट में फिल्म जम गई तो फिल्म के बाकी के घंटों में आप को सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलने वाली। हमने तो ट्रेलर में भी लिख दिया, एक्सपेक्ट द अनएक्सपेक्टेड। हिंदी तर्जुमा होगा, अप्रत्याशित की प्रत्याशा करें। आप बस जासूस की तरह फिल्म को देखें। हर छोटी-बड़ी, ऊंची-नीची चीज को टटोलिए। पीछे क्या हो रहा है, सामने क्या हो रहा है, वह देखिए। इतना मैं कह सकता हूं कि आप जब यह फिल्म देख, बाहर निकलेंगे तो आप को पक्का लगेगा कि आप किसी और दुनिया में गए थे।
-ब्योमकेश नायक ने ही आप को क्यों आकर्षित किया?
0 क्योंकि ब्योमकेश भारतीय है। वह ऐसा भारतीय है, जो देसी बनने के चक्कर में अतीत या इतिहास का गुलाम नहीं बन जाता। वह ठीक वैसा ही युवक है, जैसा 20 वीं सदी में कौस्मोपॉलिटन सिटी कोलकाता में रहने वाला एक शख्स हो सकता है। उसकी अंग्रेजी भी बड़ी स्ट्रौंग है। बंगाली साहित्य भी पढ़ रखा है, पर वह धोती पहनता है। वह पान भी खाता है। उसे ठुमरी भी पसंद है तो वह अंग्रेजी जैज गाना भी सुनता है। वह आज की तारीख का आधुनिक भारतीय है, जबकि वह 1943 के भारत का है। वह जो आधुनिकता थी, आज से 50-60 साल पहले, वह आधुनिकता आज हम लोगों में भी नहीं है। वह खुलापन शायद थोड़ा सा कम ही हो गया है। ब्योमकेश उस तरह का  डिटेक्टिव है, जो पारंपरिक जासूसों की वेशभूषा व ऐट्टियूड पर प्रहार करता है। ब्योमकेश के प्रति मेरे आकर्षण की एकमात्र वजह यही थी कि वह किरदार इतना देसी गढ़ा गया था कि आप उसे भारत के सिवा और कहीं इमैजिन ही नहीं कर सकते। मैंने जब बचपन में ही उस किरदार को पढ़ा था तो उस किरदार के सोच पर बड़ा गर्व हुआ था। वह जबरन देशभक्त या इंडियन होने का दावा नहीं करता था।
-ब्योमकेश बंगाली भद्रलोक है या..?
बिल्कुल भद्रलोक है। वह सिंपल मिडिल क्लास फैमिली से आता है। उसके संवाद ‘मां-बाप कौलरा ले गए, घर-बार रिश्तेदार’ से पता भी लग जाता है कि वह क्या है।
-यह पीरियड फिल्म है और ऊपर से आप के द्वारा निर्मित। आप जैसे फिल्मकारों का एक पॉलिटिकल अंडरटोन होता है, जो बेबाकी से आता है। सन् 1943 के कलकत्ते की कौन सी तस्वीर आप पेश कर रहे हैं?
0 बड़ा सही सवाल किया है आपने। उन दिनों कोलकाता को लेकर जो सबसे उल्लेखनीय बात थी वह था कोलकाता पर जापान का आक्रमण। जापान वैसे तो ब्रिटेन पर आक्रमण कर रहा था, लेकिन क्योंकि भारत ब्रिटेन के अधीन था तो टेक्निकली जापान भारत पर अटैक कर रहा था। तब क्या हुआ कि भारतीय फंस गए जापान के आक्रमण में। भारतीय अंग्रेजों से त्रस्त तो थे ही। ऊपर से जापानियों को लेकर एक किस्म के भय का माहौल भी था। वह इसलिए कि जापान कोलकाता से पहले इंडोनेशिया, बर्मा व अन्य पूर्वी एशियाई इलाकों में आक्रमण कर तबाही मचाते रहे थे। वैसे भी जब कोई सामरिक शक्ति किसी मुल्क में आती है तो उसका नतीजा अच्छा नहीं होता। दूसरी तरफ अंग्रेजों के अधीन होने के बावजूद भारत उस तारीख में स्वतंत्र गणराज्य के तौर पर काम कर रहा था। पराधीनता को लेकर ग्लानि थी, मगर हमने कभी दूसरे मुल्क के आक्रमण और उसके आर्मी के घिनौने अत्याचार को कभी नहीं देखा था। अगर जापानी आर्मी भारत में आ जाती तो भारत का इतिहास बदल जाता। इस फिल्म में इतिहास का वह चक्र भी दिखाया गया है। और एक बात जो आज लोग भूल चुके हैं कि उस वक्त ब्रिटिश सरकार जापानियों के समक्ष हथियार डालने को तैयार थी। उनका प्लान था कि अगर जापानी कोलकाता पर अटैक करते हैं तो वे कोलकाता को जापानी आर्मी के हवाले कर दिया जाएगा। उसी वक्त दूसरे वल्र्ड वॉर में ही अंग्रेजों ने हिंदुस्तान से भारी मात्रा में चावल समेट कर ग्रीस भेज दिया। अपने रंगरूटों के लिए और बंगाल में हो गई भुखमरी। 60 लाख लोग मर गए। वह अंग्रेजों के द्वारा बनाया हुआ अकाल था। एक किस्म की अनिश्चितता थी कि हम किसका साथ दें। बापू साम्राज्यवादियों के अलावा मिलिट्री रूल करने वालों के भी खिलाफ थे। आज उनकी बातों की झलक पाकिस्तान के राजनीतिक हालात देखकर पता चलते हैं कि वहां आर्मी ने क्या कुछ किया है?
-ब्योमकेश किस किस्म के केसेज को सॉल्व करता है? लॉ एंड ऑर्डर प्रॉब्लम या पॉलिटिकल प्रॉब्लम?
0 उस दौर में दोनों समस्याएं घुल-मिल गईं थीं। वल्र्ड वॉर के टाइम पर ही स्मगलिंग हो रही थी। कोलकाता में दुनिया भर के जासूस थे। शहर में अंडरवल्र्ड का साम्राज्य था। बर्मा से सारा अफीम आता और बाकी देश-दुनिया में जाता। एक और चीज थी, वहां का चाइना टाउन। हालांकि वह भी अब तब्दील हो चुका है। पुराना चाइना टाउन शहर के बीचों-बीच था। वहां हमने शूट भी किया। वह उस समय शहर की शान था। वहां स्मगलिंग भी होती थी। उसी दौरान भारत छोड़ो आंदोलन भी खत्म हुआ था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस बाहर थे। कोलकाता में एक अलग माहौल था। जापानी आक्रमण के अंदेशे भी थे। वह सब चीज हमने फिल्म में दिखाई है।
- उन सब चीजों को एक ही कहानी में पिरोना कितना चैलेंजिंग था?
0 मैंने ब्योमकेश की कहानी पर जोर दिया है। बाकी चीजें फिल्म के बैकड्रॉप में है। उस समय नौकरी की भी भारी किल्लत थी। वैसी सिचुएशन में ताजा-ताजा ग्रैजुएशन कर निकला ब्योमकेश लेक्चरार न बन सत्यानवेषी यानी डिटेक्टिव बनने का फैसला करता है। वैसा करने की क्या वजह हो सकती थी। यह फिल्म ब्योमकेश के पहले केस के इर्द-गिर्द है। मैंने अपने इंटरप्रेटेशन से ब्योमकेश को पर्दे पर उतारा है। हां शरदिंदु बंधोपाध्याय की किताब से जिन तीसों कहानियों के राइट्स मैंने लिए हैं, उनमें से कुछ चीजें लेकर मैंने ब्योमकेश के तीस सालों का सफर तो दिखाया है। दो कहानियों को लेकर फिल्म का मेन प्लॉट मैंने वल्र्ड वॉर और तत्कालीन राजनीतिक हालात के बैकड्रॉप में रखकर गढ़ा है। फिल्म में आप को पूरा विंटेज ट्रैफिक देखने को मिलेगा।
- कलाकारों के चयन की वजहें क्या कुछ रहीं?
0 सुशांत सिंह राजपूत में मुझे काफी पोटेंशियल लगा। ब्योमकेश के तौर पर मुझे यंग और वलनरेबल ब्योमकेश की दरकार थी। मैं डिटेक्टिव की टिपिकल धारणा को ध्वस्त करना चाहता था। हमारे यहां अमूमन यह होता है कि कोई अगर डिटेक्टिव है तो वह असाधारण ही होगा। उसकी पैनी नजर होगी। वगैरह-वगैरह। मेरा मानना है कि डिटेक्टिव भी इंसान ही होता है। बहरहाल मुझे एक ऐसा कलाकार चाहिए था, जो इंटेलिजेंट भी लगे, पर आम इंसानी फितरत वाला भी हो। सुशांत दोनों का बढिय़ा संतुलन साधते हैं। उन्होंने जेन्युनली खुद को ब्योमकेश में तब्दील भी किया। वे हर रात अपने कैरेक्टर स्केच के बारे में नोट्स लिखते थे। हर बारीक चीज को उन्होंने पकड़ा। आनंद तिवारी का काम मुझे जंचता है। वह चाहे उनकी ‘उड़ान’ हो या फिर कोई विज्ञापन फिल्म ही। उन के काम पर मेरी नजर ठहरती है। ब्योमकेश बख्शी के दोस्त या सहायक हम, जो कुछ कह लें के तौर पर आनंद तिवारी ने उम्दा काम किया है। वैसा अजीत ब्योमकेश बख्शी के दर्शकों ने नहीं देखा होगा। दिव्या मेनन को ढूंढा हमारे आर्ट डायरेक्टर सब्यसाची मुखर्जी ने। मेन लीड हीरोइन स्वास्तिका बंगाली फिल्मों की स्थापित अभिनेत्री हैं। उन्हें सेलेक्ट किया गया, उन्हें तो पता भी नहीं था कि हम क्या बना रहे हैं? हमारे कास्टिंग डायरेक्टर जब कोलकाता में शूट कर रहे थे तो उन्हें उड़ते-उड़ते इस फिल्म के बारे में खबर लगी। वे 15 मिनट के लिए हम लोगों से मिलने आ गईं। स्क्रीन टेस्ट दिया और चली गईं। बाद में कुछ महीनों बाद उन्हें पता चला कि उनका ऑडिशन ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ के लिए हुआ था। अंगूरी के रोल में उन्होंने जान-प्राण डाल दिए। फिर भी हम उनके चयन को लेकर सशंकित थे, क्योंकि मुंबई, दिल्ली की ऑडिएंस कहां उनसे कनेक्ट करेगी, मगर आखिर में आदित्य चोपड़ा की हामी पर उनका चयन हो गया।

Wednesday, December 10, 2014

दोनों हाथों में लड्डू : सुशांत सिंह राजपूत


-अजय ब्रह्मात्मज
सुशांत सिंह राजपूत की ‘पीके’ इस महीने रिलीज होगी। ‘पीके’ में उनकी छोटी भूमिका है। दिबाकर बनर्जी की ‘ब्योमकेश बख्शी’ में हम उन्हें शीर्षक भूमिका में देखेंगे। झंकार के लिए हुई इस बातचीत में सुशांत सिंह राजपूत ने अपने अनुभवों, धारणाओं और परिवर्तनों की बातें की हैं।
    फिल्मों में अक्सर किरदारों के चित्रण में कार्य-कारण संबंध दिखाया जाता है। लेखक और निर्देशक यह बताने की कोशिश करते हैं कि ऐसा हुआ, इसलिए वैसा हुआ। मुझे लगता है जिंदगी उससे अलग होती है। यहां सीधी वजह खोज पाना मुश्किल है। अभी मैं जैसी जिंदगी जी रहा हूं और जिन द्वंद्वों से गुजर रहा हूं, उनका मेरे बचपन की परवरिश से सीधा संबंध नहीं है। रियल इमोशन अलग होते हैं। पर्दे पर हम उन्हें बहुत ही नाटकीय बना देते हैं। पिछली दो फिल्मों के निर्देशकों की संगत से मेरी सोच में गुणात्मक बदलाव आ गया है। पहले राजकुमार हिरानी और फिर दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में समझ में आया कि पिछले आठ सालों से जो मैं कर रहा था, वह एक्टिंग नहीं कुछ और थी। मैं आप को प्वॉइंट देकर नहीं बता सकता कि मैंने क्या सीखा, लेकिन बतौर अभिनेता मेरा विकास हुआ। अगली फिल्मों में अपने किरदारों को निभाते समय रिसर्च के अलावा और बहुत सारी चीजें ध्यान में रखूंगा। किसी भी दृश्य में एक इमोशन के चार-पांच डायमेंशन आते हैं। हम उनमें से एक चुनते हैं। कई बार तो कर देने के बाद उसकी वजह खोजते हैं और खुद को सही ठहराते हैं।
    दिबाकर के साथ काम करते समय हमलोग रियल इमोशन पर खेल रहे थे। एक दृश्य बताता हूं, मैं अपनी तहकीकात कर रहा हूं। एक व्यक्ति से कुछ सवाल पूछ रहा हूं। वह व्यक्ति जवाब देते-देते मेरे सामने मर जाता है। मेरे अपने रिसर्च से उस दृश्य में मुझे गुस्सा, निराशा और कोफ्त जाहिर करनी थी। दो टेक में वह सीन हो गया। अभी मेरे पास बीस मिनट बाकी थे। दिबाकर ने आकर बताया कि इस दृश्य में एक अलग इमोशन ले आओ। तुमने अभी तक किसी को अपने सामने मरते हुए नहीं देखा है। पहली बार कोई बात करते-करते मर गया। तुम्हारी रिएक्शन में उसकी मौत के प्रति  विस्मय और आकर्षण भी होना चाहिए। इस इमोशन के साथ सीन को शूट करने पर सीन का इम्पैक्ट ही बदल जाएगा। ‘ब्योमकेश बख्शी’ से ऐसे अनेक उदाहरण दे सकता हूं।
    ‘ब्योमकेश बख्शी’ शूट करते समय मैंने एक बार भी मॉनिटर नहीं देखा। पोस्ट प्रोडक्शन और डबिंग के दौरान मैंने अपना परफॉरमेंस देखा। मैंने पाया कि मैं बिल्कुल अलग एक्टर के तौर पर सभी के सामने आया हूं। लोग तारीफ करेंगे तो थैंक्यू कहूंगा। नापसंद करेंगे तो माफी मांग लूंगा। सच यही है कि कुछ अलग काम हो गया है। दिबाकर बनर्जी की फिल्मों में प्रचलित हिंदी फिल्मों के प्रचलित ग्रामर का अनुकरण नहीं होता। ग्रामर का पालन न करने से एक ही डर लग रहा है कि कहीं कुछ ज्यादा रियल तो नहीं हो गया। बाकी फिल्म की गति इतनी तेज है। दो घंटे दस मिनट में पूरा ड्रामा खुलता है। आप यकीन करें फिल्म देखते समय पलकें भी नहीं झपकेंगी।
    हिंदी फिल्मों में पांचवें दशक के कोलकाता को दिखाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। तीन महीनों की तैयारी में किरदार मेरी आदत बन चुका था। यह तो तय था कि कुछ गलत नहीं होगा। मुझे और दिबाकर को यह देखना था कि हम कितने सही हैं। दिबाकर की सबसे अच्छी बात है कि वे किसी भी टेक को एनजी यानी नॉट गुड नहीं कहते। हर शॉट को अच्छा कहने के बाद वे एक और शॉट जरूर लेते हैं। इस फिल्म के दौरान हम दोनों ‘ब्योमकेश बख्शी’ के किरदार को एक्सप्लोर करते रहे। इस फिल्म के पहले मैंने ऐसी ईमानदारी के साथ एक्टिंग नहीं की। शूटिंग के दूसरे दिन ही चालीस सेकेंड के एक लंबे सीक्वेंस में दिबाकर ने मुझे 1936 का एक वीडियो दिखाया और समझाया कि रियल लाइफ और रील लाइफ में क्या फर्क हो जाता है? मुझे उस सीक्वेंस में एक केस सुलझाने के लिए पैदल, रिक्शा, बस, ट्राम से जाना था। अपने परफॉरमेंस में मैं दिखा रहा था कि आज मैं बहुत परेशान हूं। मुझे जल्दी से जल्दी केस सुलझाना है। दिबाकर के उस वीडियो को देखने के बाद मेरी समझ में आया कि रियल लाइफ में ऐसी परेशानी चेहरे और बॉडी लैंग्वेज में नहीं होती। हम ऐक्टर छोटे दृश्य में भी परफॉर्म करने से बाज नहीं आते। मेरे लिए यह बहुत बड़ी सीख थी। पर्दे पर हम ज्यादातर फेक होते हैं। या एक्टिंग के अपने टूल से दर्शकों को अपनी फीलिंग्स का एहसास दिलाते हैं। दिबाकर कहते थे, फिलहाल अपने टूल्स रख दो। मैंने इस  दृश्य को तीस मिनट दिया है। 29 मिनट तक अगर मेरे हिसाब से नहीं हुआ तो 30 वें मिनट में अपने टूल्स का इस्तेमाल कर लेना। शुरू में तो मैं डर गया कि बगैर टूल्स के मैं एक्टिंग कैसे करूंगा, लेकिन धीरे-धीरे मजा आने लगा?
    ‘पीके’ बहुप्रतीक्षित फिल्म है। आमिर खान और राजकुमार हिरानी जैसे दिग्गज के संग काम करना बड़े गर्व की बात है। उसमें मेरा कैमियो रोल है, मगर वह बड़ा प्रभावी है। उसमें मेरा चयन फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा के जरिए हुआ। हिरानी सर को दरअसल उस भूमिका के लिए फ्रेश चेहरा चाहिए था। उस वक्त तक मेरी ‘काय पो छे’ नहीं आई थी। मेरा ऑडिशन हुआ। वह सब को बेहद पसंद पड़ा। बाद में ‘पीके’ की शूट में देर होती गई, तब तलक ‘काय पो छे’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ आ गई। मैं थोड़ा-बहुत पॉपुलर भी हो गया। हिरानी सर ने एक दिन मुझे बुला मजाक में कहा, यार हमारी तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए। एक तो तुम्हारा चेहरा फ्रेश है। ज्यादा लोग तुम्हें जानते-पहचानते नहीं थे। अब मगर तुम स्टार भी हो गए।


Thursday, July 25, 2013

सुशांत सिंह राजपूत की 'ब्‍योमकेश बख्‍शी' बनने की तैयारी

-अजय ब्रह्मात्मज
देश में इस साल जबरदस्त मॉनसून आया हुआ है और इसके छींटे कोलकाता की गलियों और सडक़ों को मंगलवार को भीगो रहे थे। ठहरा शहर कुछ और थमकर चल रहा था। शहर की इस मद्धिम चाल के बीच भी ‘पार्क स्ट्रीट’ के पास शरगोशियां चालू थीं। मौका था ‘ब्योमकेश बख्शी’ के नायक सुशांत सिंह राजपूत के मीडिया से रू-ब-रू होने का। सुशांत सिंह राजपूत और दिबाकर बनर्जी ने मीडियाकर्मियों के साथ धरमतल्ला से खिदिरपुर तक की ट्राम यात्रा की। इस फिल्म में कोलकाता से जुड़ी पांच-छह दशक पुरानी कई चीजें देखने को मिलेंगी।
    एक सवाल के जवाब में सुशांत ने बताया कि मैं छह दिन पहले से कोलकाता में हूं। इस दरम्यान वे डिटेक्टिव ब्योमकेश के व्यक्तित्व को साकार करने के लिए स्थानीय लोगों से मिलकर बात-व्यवहार सीख रहे हैं। गौरतलब है कि दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी में वे पांचवे दशक के आरंभ(1942 के आसपास) के किरदार को निभा रहे हैं। हिंदी दर्शकों के लिए यह किरदार अपरिचित नहीं है। दूरदर्शन से प्रसारित इसी नाम के धारावाहिक में वे किरदार से मिल चुके हैं। सालों बाद दिबाकर बनर्जी को किशोरावस्था में पढ़े शर्दिंदु बनर्जी के किरदार ब्योमकेश की याद आई और उन्होंने इसे बड़े पर्दे पर लाने का फैसला किया। पिछले कुछ सालों में बंगाली में ब्योंमकेश पर अनेक टीवी शो और फिल्में आ चुकी हैं। ऋतुपर्णो घोष भी इसी किरदार को लेकर बंगाली में फिल्म बना रहे थे, जिसमें नायक के रूप में उन्होंने सुजॉय घोष को चुना था।
    दिबाकर बनर्जी के शब्दों में मुझे यह किरदार शुरू से आकर्षित करता रहा है। मुझे इस किरदार को फिल्म में लाने का मौका अभी मिला है। फिल्म सोचने के बाद कोलकाता आने पर मुझे एक और कैरेक्टर मिल गया। पहले  फिल्म में कोलकाता बैकग्राउंड में था। अब वह एक जीवंत कैरेक्टर बन चुका है। इस फिल्म को देखते समय दर्शक महसूस करेंगे कि ब्योमकेश बख्शी का फिल्मांकन कोलकाता के अलावा और कहीं हो नहीं सकता था।
    वे आगे कहते हैं, मैं खुद बंगाली हूं, लेकिन कोलकाता को इतनी अच्छी तरह नहीं जानता था। यहां आने के बाद मैंने देखा कि मॉर्डन कोलकाता में पुराना कोलकाता सांसें ले रहा है। हमने कई लोकेशन तय कर लिए हैं। अब हमारी बड़ी चुनौती है, उन्हें फिल्म में कैसे पिरोया जाए। निश्चित ही, इस फिल्म में वीएफएक्स का सदुपयोग होगा।
    पजामा-कुर्ता में आए सुशांत सिंह राजपूत में ब्योमकेश बख्शी में ढलने की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उन्होंने पिछले एक हफ्ते में कोलकाता की गलियों की सैर की है। स्थानीय लोगों से भी वे मिले हैं। बंगाली परिवारों में खाना खाया है और पुराने जमाने की कहानियां सुनी हैं। खाली समय में वे सत्यजीत रॉय समेत दूसरे अनेक बंगाली निर्देशकों की पुरानी फिल्में देख रहे हैं। उस दौर का साहित्य पढ़ रहे हैं। सबसे बड़ी बात कि वे स्वयं ब्योमकेश बख्शी के किरदार को लेकर बहुत उत्साहित हैं।
    दिबाकर बताते हैं, इस साल के आखिर तक वे फिल्म की स्क्रिप्ट पूरी कर लेंगे। जनवरी में शूटिंग आरंभ करेंगे। दिसंबर 2014 में फिल्म की रिलीज की घोषणा की जा चुकी है। ‘ब्योमकेश बख्शी’ यशराज फिल्म्स और दिबाकर बनर्जी का संयुक्त प्रोडक्शन है।