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Tuesday, February 24, 2015

पूरी हुई ख्‍वाहिश - नवाजुद्दीन सिद्दीकी


-अजय ब्रह्मात्मज
श्रीराम राघवन की फिल्म ‘बदलापुर’ के प्रचार के लिए नवाजुद्दीन सिद्दिकी को अपनी फिल्मों की शूटिंग और अन्य व्यस्तताओं के बीच समय निकालना पड़ा है। वे इस आपाधापी के बीच फिल्म इंडस्ट्री के बदलते तौर-तरीकों से भी वाकिफ हो रहे हैं। उन्हें अपने महत्व का भी एहसास हो रहा है। दर्शकों के बीच उनकी इमेज बदली है। वे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के समय से कई कदम आगे आ गए हैं। जब भीड़ में थे तो पहचान का संघर्ष था। अब पहचान मिली है तो भीड़ घेर लेती है। भीड़ और पहचान के इस द्वंद्व के साथ नवाज लगातार आग बढ़ते जा रहे हैं। ‘बदलापुर’ में वे वरुण धवन के ऑपोजिट खड़े हैं। इस फिल्म में दोनों के किरदार पर्दे पर पंद्रह साल का सफर तय करते हैं।
    श्रीराम राघवन ने करिअर के आरंभ में रमण राघव की जिंदगी पर एक शॉर्ट फिल्म बनाई थी। इस फि ल्म से नवाज प्रभावित हुए थे। बाद में उनकी ‘एक हसीना थी’ देखने पर उन्होंने तय कर लिया था कि कभी न कभी उनके साथ काम करेंगे। दोनों अपने संघर्ष में लगे रहे। यह संयोग ‘बदलापुर’ में संभव हुआ। नवाज बताते हैं,‘एक दिन मुझे फोन आया कि आकर मिलो। तुम्हें एक स्क्रिप्ट सुनानी है। मैं गया तो उन्होंने दो पंक्तियों में फिल्म के थीम की जानकारी दी।’ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में वन लाइन स्टोरी बतायी और सुनायी जाती है। लेखक-निर्देशक की वन लाइन स्टोरी सुनने के बाद ही निर्माता और स्टार जुड़ते हैं। श्रीराम राघवन ने तो टू लाइन सुना दी थी। पूछने पर नवाज बताते हैं,‘वह टू लाइन स्टोरी इतनी थी कि अच्छे-बुरे दो किरदार है? दोनों किरदारों में फिल्म के दौरान ट्रांसफॉर्मेशन होता है।’ यों इन वन-टू लाइन के साथ निर्देशक यह भी बताता है कि उसका ट्रीटमेंट क्या होगा और फिल्म कैसे आगे बढ़ेगी? बहरहरल,नवाज को श्रीराम के साथ काम करना था और उन्हें पक्का यकीन था कि वे कुछ नया करने का मौका देंगे।
    श्रीराम ने नवाज से बिल्कुल अलग तरीके से काम लिया। वे नवाज को दृश्य बता देते थे और उन्हें खुद ही सिचुण्शन के अनुसार संवाद बोलने की आजादी दे देते थे। पहले से कुछ भी लिखा नहीं होता था। श्रीराम के सुझाव और नवाज की समझ से ही शूटिंग के दौरान संवाद रचे गए। निर्देशकों को अमूमन अपने एक्टरों पर ऐसा भरोसा नहीं होता। सभी जानते हैं फिल्ममेकिंग महंगी प्रक्रिया है। अगर मनपसंद शॉट न मिले तो मेहनत और पैसों की बर्बादी होती है। नवाज कहते हैं,‘मुझे कैरेक्टर मालूम था। सिचुएशन और सीन मिलने पर श्रीराम के बताए भाव के अनुसार मैं कुछ बोलता था,उन्हें ही संवादों के रूप में रख लिया गया।’ ‘बदलापुर’ में नवाज का किरदार अजीबोगरीब है। वह चाहता कुछ और है,लेकिन कहता कुछ और है। नवाज बताते हैं कि यह मेरे लिए चैलेंज था।
    बातचीत के दरम्यान नवाज रोचक जानकारी देते हैं कि डेविड धवन ने मुझे ‘मैं तेरा हीरो’ के लिए बुलाया था। उसमें मुझे अरुणोदय सिंह वाली भूमिका मिली थी,लेकिन तारीखों की दिक्कत की वजह से मुझे वह फिल्म छोड़नी पड़ी। मुझे अफसोस रहा कि डेविड सर के साथ कॉमेडी नहीं कर सका। ‘बदलापुर’ में वरुण धवन मिल गए। वरुण के बारे में वे कहते हैं,‘जैसे मेरी इच्छा डेविड सर के साथ काम करने की थी,वैसे ही वरुण मेरे साथ काम करना चाहते थे। देखिए उनकी इच्छा पूरी हो गई। वरुण अपनी पीढ़ी के अलहदा अभिनेता हैं। उनमें सीखने की ललक है। कुछ नया करना चाहते हैं। शूटिंग के दौरान वे मुझ से पूछते रहते थे और मैं उन्हें निहारता रहता था। हम दोनों के बीच के बनते-बदलते रिश्ते और उनके तनाव में दर्शकों को भरपूर रोमांच मिलेगा।’   

Monday, February 23, 2015

बदलापुर : उज्जड़ हिंसा की बाढ़ में एक अहिंसक - गजेन्‍द्र सिंह भाटी

गजेंद्र सिंह भाटी


फिल्म जिस अफ्रीकी लोकोक्ति पर शुरू में खड़ी होती है कि कुल्हाड़ी भूल जाती है लेकिन पेड़ याद रखता है, उससे अंत में हट जाती है। यहीं पर ये फिल्म बॉलीवुड में तेजी से बन रही सैकड़ों हिंसक और घटिया फिल्मों से अलग हो जाती है। महानता की ओर बढ़ जाती है। पूरी फिल्म में मनोरंजन कहीं कम नहीं होता। कंटेंट, एक्टिंग, प्रस्तुतिकरण, थ्रिलर उच्च कोटि का और मौलिक लगता है। फिल्म को हिंसा व अन्य कारणों से एडल्ट सर्टिफिकेट मिला है तो बच्चे नहीं देख सकते। पारंपरिक ख़यालों वाले परिवार भी एक-दो दृश्यों से साथ में असहज हो सकते हैं। बाकी ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए। ऐसा सिनेमा उम्मीद जगाता है।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने जैसा काम किया है वैसा शाहरुख, सलमान, अमिताभ, अक्षय अपने महाकाय करियर में नहीं कर पाए हैं। फिल्म का श्रेष्ठ व सिहरन पैदा करता दृश्य वो है जहां लायक रघु से कहता है, "मेरा तो गरम दिमाग था। तेरा तो ठंडा दिमाग था? तूने लोगों को मार दिया। हथौड़े से। वो भी निर्दोष। क्या फर्क रह गया...?’ यहां से फिल्म नतमस्तक करती है। कुछ चीप थ्रिल्स हैं जिन्हें भूल जाएं तो इस श्रेणी में इससे श्रेष्ठ फिल्म याद्दाश्त में नहीं आती। अक्लमंदी और एक्टिंग के लिए "बदलापुर’ कई बार देखी जा सकती है।

Story [3/5] पत्नी और बेटे की मौत का बदला लायक (नवाजुद्दीन) से लेने रघु (वरुण) 15 साल इंतजार करता है। यहां से आगे फिल्म घिसी-पिटी हो सकती थी, पर नहीं होती। फिल्म का अंत समझदारी भरा है।
direction [4/5] श्रीराम की ये सर्वश्रेष्ठ फिल्म लगी। रिवेंज-क्राइम जॉनर में आज निर्देशक लोग जहां सिर्फ हिंसा ठूंस देते हैं वहां श्रीराम ने मैच्योर व बुद्धिमत्तापूर्ण राह ली है। अंत बेहद सुलझा है। दशकों में न देखा गया।
music [3/5] प्रिया सरैया और निर्माता दिनेश विजन ने गीत लिखे हैं। कंपोजर सचिन-जिगर हैं। जीना-जीना, चंदरिया झीनी और अज मेरा जी करदा कुछ दिन याद रहेंगे। बैकग्राउंड स्कोर न्यूनतम है, जो अच्छी बात है।
acting [4/5] नवाज जिस सीन में होते हैं, दर्शकों की सांसें थम सी जाती हैं। वरुण का ये काम ऐसा बेंचमार्क है जिसे आगे छूना उन्हीं के लिए बड़ा कठिन होगा। राधिका आप्टे ने चंद दृश्यों में काफी प्रभािवत किया। हुमा ने भी।

Friday, February 20, 2015

फिल्‍म समीक्षा : बदलापुर

-अजय ब्रह़मात्‍मज 
श्रीराम राघवन की 'बदलापुर' हिंदी फिल्मों के प्रचलित जोनर बदले की कहानी है। हिंदी फिल्मों में बदले की कहानी अमिताभ बच्चन के दौर में उत्कर्ष पर पहुंची। उस दौर में नायक के बदले की हर कोशिश को लेखक-निर्देशक वाजिब ठहराते थे। उसके लिए तर्क जुटा लिए जाते थे। 'बदलापुर' में भी नायक रघु की बीवी और बच्चे की हत्या हो जाती है। दो में से एक अपराधी लायक पुलिस से घिर जाने पर समर्पण कर देता है और बताता है कि हत्यारे तो फरार हो गए, हत्या उसके साथी जीयु ने की। रघु उसके साथी की तलाश की युक्ति में जुट जाता है। इधर कोर्ट से लायक को 20 साल की सजा हो जाती है। रघु लायक के साथी की तलाश के साथ उस 20वें साल का इंतजार भी कर रहा है, जब लायक जेल से छूटे और वह खुद उससे बदला ले सके।
इस हिस्से में घटनाएं तेजी से घटती हैं। फिल्म की गति धीमी नहीं पड़ती। श्रीराम राघवन पहले ही फ्रेम से दर्शकों को सावधान की मुद्रा में बिठा देते हैं। अच्छी बात है कि टर्न और ट्विस्ट लगातार बनी रहती है। परिवार को खोने की तड़प और बदले की चाहत में रघु न्याय और औचित्य की परवाह नहीं करता। बदले की इस भावना में वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। यहां तक कि लायक की दोस्त झिमली को तकलीफ देने से भी वह बाज नहीं आता। नेकी और बदी गड्डमड्ड होने लगती है। श्रीराम राघवन का यही ध्येय भी है। वे अन्य फिल्मों की तरह अपने नायक को दूध का धुला नहीं दिखाते। हम नेक नायक को खल नायक में बदलते देखते हैं। रघु किसी भी सूरत में लायक और उसके साथी से अपनी बीवी और बच्चे की हत्या का बदला लेना चाहता है। इस प्रक्रिया में वह निर्मम होता जाता है।
कहानी पंद्रह साल का जंप लेती है। लायक पंद्रह साल की सजा काट चुका है। पता चलता है कि उसे कैंसर हो चुका है और अब उसकी जिंदगी का एक साल ही बचा है। कैदियों की भलाई के लिए काम कर रहे एक एनजीओ की कार्यकर्ता अकेली जिंदगी बसर कर रहे रघु से मिलती है। वह उससे आग्रह करती है कि अगर वह चाहे तो लायक की रिहाई हो सकती है। लायक का आखिरी साल राहत में गुजर सकता है। रघु पहले मना कर देता है, लेकिन लायक के साथी तक पहुंचने की उम्मीद में वह उसकी रिहाई के लिए तैयार हो जाता है। लायक की रिहाई, दूसरे साथी की पहचान और रघु की पूरी होती दिखती रंजिश के साथ घटनाएं तेज हो जाती हैं। थोड़ी देर के लिए लगता है कि कहानी किरदारों और घटनाओं के बीच उलझ गई है। श्रीराम स्पष्ट हैं। वे फिल्म के क्लाईमेक्स और निष्कर्ष तक बगैर लाग-लपेट के पहुंचते हैं। यहां आगे की घटनाएं और किरदारों के व्यवहार के विस्तार व उल्लेख से दर्शकों की जिज्ञासा बाधित होगी। मजा किरकिरा होगा।
श्रीराम राघवन ने बदले की इस अनोखी कहानी में ग्रे किरदार भी अपना रंग बदलते हैं। 'बदलापुर' सिर्फ बदले की कहानी नहीं है। यह बदले में आए बदलाव की भी कहानी है। सब कुछ बदल जाता है। अच्छा अच्छा नहीं रहता और बुरे का बदला हुआ आचरण सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वह सचमुच बुरा था? नैतिकता और आदर्श को परिस्थितियों और मनोभावों के बरक्स देखना होगा। रघु और लायक के व्यवहारों को हम पारंपरिक चश्मे से नहीं आंक सकते। इस फिल्म में गौर करें तो अच्छा बुरा है और बुरा अच्छा है। श्रीराम दोनों किरदारों की जटिलताओं में गहरे घुसते हैं और उनके अंतस को उजागर कर देते हैं। हम जो देखते और पाते हैं, वह हमारे समय के उलझे समाज का द्वंद्व है। फिल्म समाप्त होने के बाद उलझन बढ़ जाती है कि किसे सही कहें और किसे गलत?
मेरे खयाल में फिल्म का कथ्य उस सामान्य दृश्य में है जब लायक अपनी मां से पिता के बारे में पूछता है। मां कहती है-क्यों पुराने चावल मे कीड़े ढ़ूंढ रहा है। मां के पास पिता के बारे में अच्छा बताने के लिए कुछ भी नहीं है। लायक को गहरी चोट लगती है। उसका एहसास जागता है। वह मां को कुछ कहता हुआ निकलता है। उसके बाद की घटना बताना उचित नहीं होगा। फिल्म के अंत में लेखक-निर्देशक ने झिमली के जरिए अनावश्यक ही अपनी बात और लायक की मंशा स्पष्ट कर दी है। वह अव्यक्त रहता तो ज्यादा प्रभावी बात होती।
वरुण धवन अपेक्षाकृत नए एक्टर हैं। उनकी मेहनत जाहिर है। उन्होंने रघु के बदलते भावों को व्यक्त करने में अच्छी-खासी मेहनत की है। दूसरी तरफ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फितरत प्रभावित करती है। वरुण की मेहनत और नवाज की फितरत से 'बदलापुर' रोचक और रोमांचक हुई है। वरुण सधे अभिनेता नवाज के आगे टिके रहते हैं। नवाज हमारे समय के सिद्ध अभिनेता हैं। लायक हमारे मन में एक साथ घृणा और हास्य पैदा करता है। वह शातिर है, लेकिन कहीं भोला भी है। वह हिंदी फिल्मों के पारंपरिक खल चरित्रों की तरह खूंखार नहीं है, लेकिन उसकी कुटिलता से सिहरन होती है। खूंखार तो हमारा नायक हो जाता है जो जान लेने के लिए आवेश में दस हथौड़े मारते हुए हांफने लगता है। यह फिल्म वरुण और नवाज के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। फिल्म में महिला किरदारों को सीमित स्पेस में ही पर्याप्त महत्व दिया गया है। उन्हें अच्छी तरह गढ़ा गया है। पांचों महिला किरदारों ने अपनी भूमिकाओं को संजीदगी से निभाया है। प्रभावशाली दृश्य राधिका आप्टे और हुमा कुरैशी को मिले हैं। यों दिव्या दत्ता, प्रतिमा कण्णन और यामी गौतम लेश मात्र भी कम असरदार नहीं हैं। कुमुद मिश्रा की सहजता और स्वाभाविकता उल्लेखनीय है।
श्रीराम राघवन ने बदले की रोमांचक फिल्म को नया ट्विस्ट दे दिया है।
अवधि: 147 मिनट
चार स्‍टार ****

Monday, February 16, 2015

फेमस होने के लिए फिल्में नहीं करती- राधिका आप्टे


-अजय ब्रह्मात्मज
    इस साल राधिका आप्टे की पांच फिल्में रिलीज होंगी। सबसे पहले 20 फरवरी को श्रीराम राघवन की ‘बदलापुर’ आएगी। उसके बाद र्फैटम और शेमारू के कोप्रोडक्शन में बनी ‘हंटर’ आएगी। फिर ‘कौन कितने पानी में’ आ जाएगी। ‘पाच्र्ड’ भी इसी साल रिलीज होगी। केतन मेहता की ‘माउंटेन मैन’ की तारीख की घोषणा नहीं हुई है। हिंदी की पांच फिल्मों के साथ एक मलयाली फिल्म ‘हरम’ है। एक तेलुगू फिल्म की शूटिंग चल रही है। रोहित बत्रा की इंटरनेशनल फिल्म ‘द फील्ड’ की तैयारी चल रही है। हिंदी फिल्मों के दो बड़े डायरेक्टर के साथ इंटरनेशनल सहयोग से बन रही दो शॉर्ट फिल्में भी हैं। अनुराग बसु के साथ एपिक चैनल के लिए ‘चोखेर बाली’ मिनी सीरिज पूरी हो चुकी है।
    कह सकते हैं कि राधिका आप्टे बहुभाषी अभिनेत्री हैं। महाराष्ट्र के पुणे की निवासी इस सक्रियता के बावजूद हिंदी की सामान्य अभिनेत्रियों की तरह बात-व्यवहार नहीं करतीं। अपने काम के प्रति उत्साह तो रहता है,लेकिन उसके बारे में शोर मचाने से परहेज करती हैं राधिका। इधर एक फर्क आया है कि अब वह हिंदी फिल्मों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं,इसलिए उनकी अन्य भाषाओं की फिल्में धीरे-धीरे कम हो रही हैं। अंग्रेजी पर भी उनकी नजर है। राधिका आप्टे हिंदी दर्शकों के लिए परिचित चेहरा नहीं हैं,लेकिन उनकी फिल्मों की संख्या बताती है कि जल्दी ही वह पहचान और नाम हासिल करेंगीं।
    राधिका के माता-पिता पुणे के मशहूर डॉक्टर हैं। चौदह सालों से थिएटर में सक्रिय राधिका ने मुंबई के पृथ्वी थिएटर और एनसीपीए मेंं कुछ शो किए थे। वहीं निर्देशकों ने उन्हें देखा और अपनी फिल्मों के ऑफर दिए। राधिका बताती है, ‘मुझे ‘शोर इन द सिटी’ और ‘रक्तचरित्र’ ऐसे ही मिल गई थी। इन दोनों फिल्मों की रिलीज के पहले मैं लंदन चली गई थी। वहां क्लासिकल डांस सीखने गई थी। उसकी वजह से दो साल का गैप आ गया।’ अन्य अभिनेत्रियां फिल्मों में एक बार आ जाने के बाद अगले काम की उम्मीद में यहां से टसकती नहीं हैं। राधिका के लंदन जाने के निर्णय पर सभी को हैरानी हुई थी। वह स्पष्ट करती हैं,‘फिल्मों की तो मेरी प्लानिंग ही नहीं थी। मैं थिएटर में व्यस्त थी। मेरे पांच-छह शो एक साथ चल रहे थे। उन्हें समेटने के बाद मैंने लंदन की तैयारी कर रखी थी,इसलिए मौका मिलते ही मैं निकल गई। हिंदी फिल्मों का तो मालूम है न ़ ़ ़ एक बार सिलसिला चल गया तो फिर कुछ और नहीं कर सकती। मुझे कंटेम्पररी डांस सीखना था,उसके लिए जितनी कम उम्र हो उतना अच्छा।’
    राधिका अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट हैं। बेलाग तरीके से वह अपनी बात रखती हैं,‘मुझे हिंदी फिल्मों का स्टार नहीं बनाना है। मुझे इंटरनेशनल फिल्में करनी हंै। मालूम नहीं है कि मेरा रास्ता क्या होगा? इस लक्ष्य के लिए मुझे अच्छी फिल्में करनी हैं। इंटरनेशनल से मेरा आशय हालीवुड या किसी और देश की फिल्मों से नहीं है। ऐसी इंटरनेशनल फिल्में भारत की भी हो सकती हैं। थोड़ा आउट ऑफ बॉक्स काम हो तो अच्छा लगता है। मन लगता है। हिंदी में ‘बदलापुर’ जैसी फिल्में हों तो ठीक है। इरादा है कि कंटेंट ड्रिवेन फिल्में करूं।’ राधिका जोर देती हंै कि मुझे कंटेंट और एक्सपेरिमेंट पसंद है। एक जैसी फिल्में करने का क्या फायदा? वह समझाती हैं,‘मकसद अलग-अलग काम करना है। फेमस होने के लिए फिल्में नहीं करनी हैं। मेरी इच्छा एक्टिंग के नए आयामों को छूना है।’ स्कूल के समय से ही थिएटर से जुड़ी राधिका पढऩे-लिखने में तेज थीं। 11 वीें करने के बाद एक वर्कशॉप में मोहित टाकरकर से हुई मुलाकात ने दिशा दे दी। उन्होंने ‘ब्रेन सर्जन’ प्ले के लिए आमंत्रित किया। पुणे के आसक्त थिएटर से राधिका 2003 में जुड़ीं और अभी तक उनके साथ रंगमंच पर सक्रिय हैं।
    नृत्य,रंगमंच और फिलमों में एक साथ एक्टिव राधिका मानती हैं कि फॉर्म में अलग होने के बावजूद इनमें एकात्मता है। वह उनमें अधिक भेद नहीं करतीं। राधिका बताती हैं,‘परफारमेंस की चिंता एक सी रहती है। एक्सप्रेशन बदलता है। थिएटर में डायरेक्ट ऑडिएंस के सामने रहना होता है,जबकि फिल्म में प्रिंट होने के पहले सुधारने की संभावना रहती है। फिल्म में एकरेखीय शूटिंग नहीं होती है,इसलिए परितृप्ति अलग किस्म की होती है। चूंकि मैं अलग किस्म की फिल्में करती हूं,इसलिए मेरे अनुभव अलग हैं। शुरू की दोनों फिल्मों के बद मुझे अबला नारी की ढेर सारी फिल्में मिलीं। मैंने सिरे से मना कर दिया। मुझे किसी छवि में नहीं बंधना है। इंडस्ट्री बांधने की कोशिश करती है।’
    शादीशुदा राधिका आप्टे लोगों के इस सवाल या विस्मय से परेशान हो जाती है ़ ़ ़ ‘अरे, आप की शादी हो गई है।’ ‘शादी हो जाने से अभिनेत्री होने की मेरी योग्यता में क्या फर्क पड़ता है। हिंदी फिल्मों में हीरोइनों की शादी क्यों बड़ा मुद्दा बन जाता है? मरी जिंदगी है? मैं चाहे जब शादी करूं?’ पूछती है राधिका आप्टे।
   


Tuesday, February 10, 2015

कैरीकेचर नहीं है झिमली-हुमा कुरेशी




- अजय ब्रह्मात्मज
    हुमा कुरेशी को जानकारी थी कि श्रीराम राघवन जल्दी ही अपनी फिल्म आरंभ करने जा रहे हैं। इच्छा तो थी ही कि उनके साथ काम करने का मौका मिले। जल्दी ही उन्हें कॉल भी आ गया कि श्रीराम ने नैरेशन के लिए बुलाया है। इस कॉल से ही उत्साह बढ़ गया। हुमा बताती हैं,‘तब मुझे नहीं मालूम था कि क्या स्टोरी है? किस किरदार के लिए मुझे बुलाया जा रहा है। मैं गई। नैरेशन डेढ़-दो घंटे तक चला। सच्ची कहूं तो उस समय आधी बात समझ में नहीं आई। मैं तो इस उत्साह के नशे में थी कि उनके साथ फिल्म करूंगी। न्वॉयर फिल्म को अच्छी तरह समझते हैं। फिल्मों में आने के पहले उपकी ‘एक हसीना थी’ देखी थी। इस फिल्म ने मुझे सैफ अली खान का प्रशंसक बना दिया था। फिल्म का हीरो ग्रे शेड का था।’
    हुमा और वरूण की फिल्में ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ एक ही साल रिलीज हुई थीं। दोनों विपरीत जोनर की फिल्में थीं। हुमा को पता चला कि वरूण ‘बदलापुर’ में ग्रे शेड का रोल कर रहे हैं। वह चौंकी। अपना विस्मय जाहिर करती हैं हुमा,‘मेरी समझ में नहीं आया कि क्यों चाकलेटी हीरो ऐसी फिल्म कर रहा है। नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ मैं काम कर चुकी थी। उनके बारे में तो पता था। बहरहाल,इस फिल्म मेें वरुण ने काफी मेहनत की थी।’ ‘बदलापुर’ में हुमा सेक्स वर्कर का किरदार निभा रही हैं। अपने किरदार के बारे में वह कहती हैं,‘फिल्म में मेरा नाम झिमली है। पहली बार सेक्स वर्कर का रोल कर रही हूं। मुझे वरुण की बीवी के रोल का ऑप्शन भी मिला था,जिसे यामी गौतम निभा रही हैं। अपने कंफर्ट जोन से निकलने के लिए मैंने सेक्स वर्कर का किरदार चुना। नए लुक और इमोशन पर काम किया है मैंने। मेरे लिए डिफिकल्ट फिल्म है। फिल्म में मेरा एज जंप भी है। फिल्म में वरुण और नवाज के साथ मेरा लंबा रिश्ता रहता है।’ हुमा स्पष्ट करती हैं कि हिंदी फिल्मों में प्रचलित सेक्स वर्कर से अलग रोल है झिमली का।
    हुमा जानती हैं कि हिंदी फिल्मों में सभी अभिनेत्रियों ने एक न एक बार सेक्स वर्कर का रोल किया है। पहले उनकी एक छवि बन गई थी। उन्हें कुछ गाने-वाने भी मिलते थे। ‘बदलापुर’ की कहानी के केंद्र में झिमली नहीं है। हुमा की कोशिश रही कि सेक्स वर्कर का रोल कैरीकेचर न बन जाए। इस कोशिश में उन्हें श्रीराम का सहयोग मिला।हुमा स्पष्ट करती हैं,‘झिमली एक लडक़ी और इंसान भी तो है। भारत में मर्जी से कोई भी सेक्स वर्कर नहीं बनता। उन्हें इस तरफ धकेला जाता है। वे एक बार इसमें फंस जाती हैं तो निकलना मुश्किल हो जाता है।’ हुमा अपनी फिल्मों से संतुष्ट हैं और मानती हैं कि उनकी शुरूआत अच्छी हुई। व स्वीकार करती हैं,‘अलग किस्म के निर्देशकों के साथ अच्छी शुरूआत करने का यह फायदा हुआ कि मुझे जल्दी ही पहचान मिल गई। अगर मैं मेनस्ट्रीम फिल्मों से आती तो इस पहचान में वक्त लगता। अभी मुझे वैरायटी के साथ अपने रोल पर मेहनत करने की जरूरत है। मुझे लगता है कि सभी की उम्मीदों पर मुझे खरा उतरना चाहिए।’
    अपनी अलग शुरूआत के बावजूद हुमा कुरेशी मेनस्ट्रीम फिल्मों की दीवानी हैं। वह बेलाग शब्दों में कहती हैं,‘मुझे यह बताने में कोई शर्म नहीं है कि ऐसी फिल्में देख कर ही फिल्मों में आने का मन हुआ। मैं चाहती हूं कि मां अपनी सहेलियों के साथ मेरी फिल्में देखने जाएं और फिर मेरी चर्चा हो। दो चीजें मेरे फेवर में नहीं थी-वजन और इमेज। मैंने अपना वजन कम किया है। इमेज में बंधना नहीं चाहती। मैं तो कॉमेडी फिल्मों के लिए भी तैयार हूं। मेरा अपना सर्किल बन चुका है। कोशिश तो यही है कि हर तरह की फिल्में करूं।’
    हुमा की नजरों में श्रीराम राघवन इस पीढ़ी के अकेले निर्देशक हैं जिन्हें थ्रिलर फिल्मों में मजा आता है। उनकी फिल्में विदेशी फिल्मकारों से प्रभावित नहीं होतीं। विजय आनंद और गुरु दत्त उनके आदर्श रहे हैं। यही वजह है कि उनकी फिल्मों की स्टायल शुद्ध भारतीय होती है।

   

Sunday, February 8, 2015

सिर्फ भाई ने किया सपोर्ट - वरुण धवन


-अजय ब्रह्मात्मज
-‘बदलापुर’ हमें बिग बी के एरा वाली फिल्मों की याद दिलाएगी कि नायक को फ्लैशबैक में अपनों से दूर करने वाला शख्स दिखता था। नायक का खून खौलता और वह फिर बदला लेकर ही मानता था?
आपने सही कहा, क्योंकि फिल्म के डायरेक्टर श्रीराम राघवन अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फैन हैं। इत्तफाकन बच्चन साहब की ढेर सारी फिल्में रिवेंज पर बेस्ड रही हैं, मगर ‘बदलापुर’ से हम रिवेंज ड्रामा का पैटर्न तोडऩा चाहते हैं। मिसाल के तौर पर आप अखबार में पढ़ते हो कि एक पति ने पड़ोसी से अफेयर की आशंका में अपनी पत्नी को चाकू से गोद दिया। या फलां अपराधी ने एक मासूम को एक-दो नहीं बीसियों बार तलवार या दूसरे धारदार हथियार से नृशंसतापूर्वक मारा। कोई इस किस्म की नफरत से कैसे लैस होता है, हमने उस बारे में फिल्म में पड़ताल करके बताया है। फिल्म का नायक रघु कुछ उसी तरीके से अपनी पत्नी के हत्यारों का खात्मा करता है। उसका तरीका सही है। फिल्म के अंत में हमने एक मोरल लेसन भी दिया है कि क्या ‘आंख के बदले आंख’ के भाव को न्यायोचित है। हर किरदार परतदार है। हम किसी को एकदम से राइट या रौंग करार नहीं दे सकते।
-‘बदलापुर’ टाइटिल ही रखने की खास वजह? कोई जगह है, जहां फिल्म सेट है या फिर कोई और बात है?
जी हां, फिल्म में बदलापुर एक जगह है, जहां नायक रघु रहता है। दूसरी वजह यह भी है कि फिल्म बदले पर बेस्ड है तो उसका नाम बदलापुर रखा गया है। साथ ही हर किरदार अच्छे से बुरा, बुरा से बढिय़ा, मासूम से निर्मम शख्स में तब्दील होता रहता है तो इसलिए भी फिल्म का टाइटिल बदलापुर है।
-कैरेक्टर क्रिएशन कितना आसान या चुनौतीपूर्ण रहा?
यह देखने में सिंपल रिवेंज ड्रामा लगे, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने श्रीराम से तीन-चार की नैरेशन में इस फिल्म व अपने किरदार को समझा। फिल्म रोलिंग टाइटिल से शुरू भी नहीं होती। सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिखते ही फिल्म की कहानी शुरू हो जाती है। यह काफी सीरियस फिल्म है। उन्होंने अपने पसंदीदा विजय आनंद और हिचकॉक जैसे फिल्मकारों को इस फिल्म से होमेज दिया है। हम कहते रहते हैं कि लोग काफी प्रोग्रेसिव हो गए हैं। यूथ काफी परिपक्व हो गई है, लेकिन वे इस फिल्म को कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, उससे उनकी मैच्योरिटी झलकने वाली है।
- जी हां, श्रीराम की यह खासियत ही कह सकते हैं कि उन्होंने खुद को थ्रिलर से भटकने नहीं दिया?
जी। उन्होंने काफी प्योर थ्रिलर बनाई है। थ्रिलर के लिए दरकार चीजों को काफी अनुशासनात्मक तरीके से फिल्म में पिरोया है। उस किस्म की प्योरिटी व डिसिप्लिन मुझमें पहले नहीं था।
- आप के इस चयन पर जानकार भी हतप्रभ हैं। आप के एक परिचित ने भी बीते दिनों कहा कि करियर के इस मोड़ पर वरुण को यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी?
जी हां। मेरे भी ढेर सारे दोस्तों ने कहा है कि इतने शुरूआती स्तर पर मुझे यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। पिताजी के दोस्तों ने, पिताजी खुद ने मुझसे कहा कि यह फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। दरअसल बहुत कम लोग जानते हैं कि मैंने यह फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के बाद साइन की थी। बहरहाल मैं एक एक्टर हूं। मेरा बुनियादी फर्ज लोगों को एंटरटेन करना है। उन्हें नया देना है। मुझे अपने इमेज के हिसाब से काम करना होता तो मैं अपने असल उम्र के नायक की भूमिका में कोई डार्क फिल्म करता, लेकिन ‘बदलापुर’ के नायक रघु की एक यात्रा है, जो नयापन लिए हुए है। फिर मैंने तीन साल अदाकारी के जो विविध आयाम बैरी जॉन के यहां सीखे, उन्हें इस किरदार में उड़लेने का मौका मिला, जिसे मैं खोना नहीं चाहता था। फिर इस फिल्म में सह-कलाकार भी मुझे टक्कर वाले मिले, जिनके संग काम कर नई चीजें सीखने को भी मिलीं।
- तो कभी ऐसी फीलिंग आती है कि सामने नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे कद्दावर कलाकार हों तो उन्हें कंपीट करना है?
कंपीट तो नहीं, लेकिन यह भाव रहता है कि मैं कहीं सीन का स्तर कमतर न कर दूं। घबराहट होती थी उनके सामने। एक्टर के तौर पर वे हैं ही इतने कमाल के। वे जब सीन में होते हैं तो एकदम से किरदार मोहम्मद लायक तुगलेकर ही बन जाते हैं। वे जमीन पर बैठ जाते हैं। दिए गए सीन को जान लगाकर निभाते हैं। उन्हें देख मैं भी रघु बन जाता था। सिर्फ यही इरादा बन जाता कि रघु के तौर पर मुझे लायक से बेइंतहा नफरत करनी है। उन्हें पीटना-मारना है। हम दोनों के तार पहले दिन से ही बैठ गए। इस पिक्चर में हम दोनों कपल हैं।
-‘बदलापुर’ करने के लिए सबने आप को मना किया। आप के बड़े भाई की क्या राय थी?
सिर्फ वे ही सपोर्टिव थे। उन्होंने कहा कि ‘बदलापुर’ जरूर करो, क्योंकि उनको विश्वास था कि मैं रघु को निभा लूंगा। उन दिनों वे अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहे थे तो उनकी दाढ़ी  बढ़ी हुई थी। मुझे विचार कौंधा कि रघु के बढ़े हुए ऐज का लुक वैसा ही रहेगा।
- आपने कहा कि हर किरदार के कार्य-कारण की ठोस वजह है। यानी विलेन की करतूतें भी जायज हैं?
यही तो इस फिल्म की यूएसपी है कि फिल्म में कौन विलेन है वह लोगों को तय करना होगा। रघु विलेन है या लायक, वह आप विभेद नहीं कर सकते। जब हम किसी आतंकी की बैक स्टोरी पता करते हैं तो मालूम पड़ता है कि उसने जान-बूझकर हथियार नहीं उठाए। मुझे हैरानी होती है कि लोग आतंकी क्यों बनते हैं? मैं यह नहीं कहता कि वे दया के पात्र हैं, लेकिन उनके खूनी बनने की वजहों की पड़ताल भी जरूरी है। तो हमने ऐसे सवालों के जवाब इस फिल्म में दिए हैं। मेरे ख्याल से यह फिल्म लोगों को प्रेरित करेगी कि अगर कोई क्रिमिनल बन रहा है तो उसे रोक लें।
- आपने यह फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के टाइम पर ही साइन की। फिर आज की तारीख में उसके आने की खास वजह?
‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के तुरंत बाद ‘मैं तेरा हीरो’ और ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया’ आ गई थी। मैं ‘बदलापुर’ को करने में वक्त लेना चाहता था, क्योंकि यह अलग किस्म की फिल्म है। मैंने कहानी समझने और किरदार को गढऩे में आठ से नौ महीने का वक्त लिया। रघु लोअल मिडिल क्लास फैमिली से बिलौंग करता है, जो असल में मैं नहीं हूं। ऐसे में उसकी जीवनशैली समझने के लिए श्रीराम राघवन ने मुझे 20-25 दिन मुंबई के पास ईगतपुरी इलाके में रहने को कहा। मुझसे दसियों दिन न नहाने को कहा गया। डार्क, डिप्रेसिंग कहानियां पढऩे, समझने को कहा गया। तब जाकर मैं शायद इस लायक बना कि रघु को बेहतर तरीके से निभा सकूं। मैंने उसके लिए अपनी आवाज तक बदली है। लिहाजा फिल्म अब आ रही है।