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Friday, November 6, 2009

फ़िल्म समीक्षा : जेल

***1/2
उदास सच की तल्खी
-अजय ब्रह्मात्मज
मधुर भंडारकर की फिल्मों की अलग तरह की खास शैली है। वह अपनी फिल्मों में सामाजिक जीवन में घटित हो रही घटनाओं में से ही किसी विषय को चुनते हैं। उसमें अपने नायक को स्थापित करने के साथ वे उसके इर्द-गिर्द किरदारों को गढ़ते हैं। इसके बाद उस क्षेत्र विशेष की सुनी-समझी सूचनाओं के आधार पर कहानी बुनते हैं। इस लिहाज से उनकी फिल्मों में जीवन के यथार्थ को बेहद नजदीकी से महसूस किया जा सकता है।
चांदनी बार से लेकर फैशन तक मधुर भंडारकर ने इस विशेष शैली में सफलता हासिल की है। जेल भी उसी शैली की फिल्म है जिसमें उन्होंने नए आयामों को छुआ है।
फिल्म की शुरुआत के चंद सामान्य दृश्यों के बाद फिल्म का नायक पराग दीक्षित जेल पहुंच जाता है। फिर अंतिम कुछ दृश्यों में वह जेल के बाहर दिखता है। शक के आधार पर पुलिस कस्टडी में बंद पराग दीक्षित को दो सालों के बाद सजा मिलती है। सजा मिलने के बाद आजादी की उसकी उम्मीद टूट जाती है और वह बाहर निकलने के लिए शार्टकट अपनाता है। वह जेल से निकलने की कोशिश करता है, लेकिन वार्डर नवाब की नसीहत और भरोसे के दबाव में वह फिर से जेल लौट आता है। आखिरकार एक अच्छा वकील उसे सजा से बरी करवाता है। इस दरम्यान हम जेल की अंदरूनी जिंदगी और जेल के बाहर की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ होते हैं। फिल्म के उदास सच की तल्खी दर्शक को सुन्न कर देती है।
मधुर भंडारकर की फिल्मों के किरदार आम जिंदगी के होते हैं, इसलिए वे घिसे-पिटे और देखे-सुने जान पड़ते हैं। उन चरित्रों के बात-व्यवहार में काल्पनिकता नहीं के बराबर होती है। इसलिए उनकी फिल्मों को देखते हुए यह एहसास होता है कि हम उन किरदारों को पहचानते हैं और उनकी बातें पहले सुन चुके हैं। मधुर की यही विशेषता उन्हें बाकी फिल्मकारों से अलग कर देती है। वे सामाजिक जीवन के क्षेत्र विशेष के अंतर्विरोधों, डिंबनाओं और मुश्किलों को प्रसंगों के माध्यम से जोड़ते हैं। उनकी फिल्मों के नैरेटिव में कहानी बहुत मजबूत नहीं रहती। वे इस पर जोर भी नहीं देते। कुछ घटनाओं और प्रसंगों का तानाबाना बुनकर मधुर अपनी फिल्म पूरी करते हैं।
जेल मधुर भंडारकर के साहसिक प्रयास का अगला कदम है। इस बार वह अधिक सधे हुए हैं। पिछली फिल्मों में कथ्य की प्रासंगिकता के बावजूद सिनेमाई भाषा और तकनीक में वे थोड़े कमजोर रहे हैं। जेल में उनकी प्रतिभा और शैली परिष्कृत रूप में नजर आती है। हालांकि इस फिल्म में भी आइटम एवं रोमांटिक गीत और लता मंगेशकर के गाए भजन जैसी चिप्पियां हैं, इसके बावजूद फिल्म में एक नीम उदासी बनी रहती है। जेल हिंदी फिल्मों की मनोरंजन की सीमाओं को तोड़कर एक नया आयाम विकसित करती है। यह प्रबोधन के स्तर पर जाती है। मधुर अपनी फिल्मों में कभी अंतर्विरोधों के निदान और समाधान तक नहीं पहुंचते। वह रुपहले पर्दे पर समाज के कुछ प्रसंगों को जिंदगी के एक टुकड़े के तौर पर रख देते हैं।
जेल की सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी रोमांटिक दबाव में नहीं आती। मुग्धा गोडसे के होने के बावजूद मधुर भंडारकर ने संयम से काम लिया है। नील नितिन मुकेश और मनोज बाजपेयी के बीच के कुछ अनबोले दृश्य फिल्म की खासियत हैं। नील संयत अभिनेता हैं। वे किरदारों को अंडरप्ले करते हैं। इस फिल्म में पराग दीक्षित के सदमे को उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर जिया है। मनोज बाजपेयी निस्संदेह उत्तम अभिनेता हैं। ऐसी फिल्मों में उनकी प्रतिभा उद्घाटित होती है। मधुर ने सहयोगी किरदारों के लिए भी आर्य बब्बर, राहुल सिंह और चेतन पंडित के रूप में बेहतरीन कलाकार चुने हैं। मुग्धा गोडसे को कम दृश्य मिले हैं, लेकिन समर्पित और दृढ़ प्रेमिका के रूप में वह अच्छी लगी हैं।

Saturday, September 12, 2009

फ़िल्म समीक्षा:बाबर

-अजय ब्रह्मात्मज

उत्तर भारत के अमनगंज जैसे मोहल्ले की हवा में हिंसा तैरती है और अपराध कुलांचे भरता है। बाबर इसी हवा में सांसें लेता है। किशोर होने के पहले ही उसके हाथ पिस्तौल लग जाती है। अपने भाईयों को बचाने के लिए उसकी अंगुलियां ट्रिगर पर चली जाती हैं और जुर्म की दुनिया में एक बालक का प्रवेश हो जाता है। चूंकि इस माहौल में जी रहे परिवारों के लिए हिंसा, गोलीबारी और मारपीट अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक है, इसलिए खतरनाक मुजरिम बच्चों के आदर्श बन जाते हैं। राजनीतिक स्वार्थ, कानूनी की कमजोरी, भ्रष्ट पुलिस अधिकारी और अपराध का रोमांच इस माहौल की सच्चाई है। बाबर इसी माहौल को पर्दे पर पेश करती है।
आशु त्रिखा ने अपराध की दुनिया की खुरदुरी सच्चाई को ईमानदारी से पेश किया है। उन्हें लेखक इकराम अख्तर का भरपूर सहयोग मिला है। लेखक और निर्देशक फिल्म के नायक के अपराधी बनने की प्रक्रिया का चित्रण करते हैं। वे उसके फैसले को गलत या सही ठहराने की कोशिश नहीं करते। छोटे शहरों और कस्बों के आपराधिक माहौल से अपरिचित दर्शकों को आश्चर्य हो सकता है कि क्या बारह साल का लड़का पिस्तौल दाग सकता है? और अगर वह ऐसा करता है तो उसके परिजन उसे क्यों नहीं रोकते? इसके अलावा हिंदी फिल्मों ने मुंबई के अंडरव‌र्ल्ड को अपराध जगत का ऐसा पर्याय बना दिया है कि आम दर्शकों को किसी और माहौल से आए अपराधी विश्वसनीय नहीं लगते। सच तो यही है कि अब डकैतों पर फिल्में नहीं बनतीं, लेकिन उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में आज भी डकैतियां हो रही हैं।
आशु त्रिखा ने मुंबई से बाहर जाकर अपराध की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश की है। इस माहौल में सभी अपराधी हैं। उनके बीच वर्चस्व का संघर्ष है और राजनेता अपने हितों के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं। इन अपराधियों के समर्थन में एक भ्रष्ट तंत्र खड़ा हो चुका है। जिसमें दारोगा चतुर्वेदी जैसे भ्रष्टाचारी चालाकी से ईमानदार पुलिस अधिकारी और मुजरिम दोनों की हत्या कर पदोन्नति हासिल कर लेते हैं। बाबर उस भ्रष्ट तंत्र और विजेता बन रहे भ्रष्टाचारियों का किस्सा भी बयान करती है।
बाबर की खूबी लोकेशन, भाषा और वेशभूषा है। इस फिल्म में सब कुछ वास्तविक के बेहद करीब है। आशु त्रिखा ने फिल्म के विषय और माहौल के हिसाब से नीम रोशनी और अंधेरे के बीच फिल्म की शूटिंग की है। फिल्म का हीरो बाबर है, लेकिन कभी भी उसके हीरोइज्म को स्थापित करने या उसे आदर्श बताने का प्रयास नहीं किया गया। लखनऊ की गलियों में शूट की गई यह फिल्म लंबे समय के बाद पर्दे पर छोटे शहर को उसकी धड़कन के साथ पेश करती है।
अभिनेताओं में नायक सोहम पहली फिल्म के लिहाज से निराश नहीं करते। उनकी घबराहट और रा एनर्जी फिल्म के किरदार को ताकत देती है। अन्य कलाकारों में मिथुन चक्रवर्ती, मुकेश तिवारी, गोविंद नामदेव सामान्य तरीके से अपने चरित्रों को निभाते हैं। चंद दृश्यों में भी सुशांत सिंह प्रभावित करते हैं। ओम पुरी ने भ्रष्ट दारोगा की भूमिका को बारीकी से निभाया है। चापलूस, मतलबी और भ्रष्ट दारोगा ऐसे ही होते हैं। बाबर सच को छूती ऐसी फिल्म है, जो जुर्म और अपराध की दुनिया को ग्लोरीफाई किए बगैर उसका चित्रण करती है।

Monday, September 7, 2009

फ़िल्म समीक्षा:मोहनदास

कहानी को फिल्म में ढालने की कोशिश
-अजय ब्रह्मात्मज
**1/2
उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास पर आधारित मजहर कामरान की फिल्म देश की खुरदुरी सच्चाई को वास्तविक लोकेशन में पेश करने की कोशिश करती है। मजहर कामरान ने सिनेमाई छूट लेते हुए मूल कहानी में कुछ किरदार और प्रसंग जोड़े हैं। इससे फिल्म की नाटकीयता बढ़ी है, लेकिन सामाजिक विडंबना का मर्म हल्का हुआ है। कहानी के प्रभाव को मजहर कामरान फिल्म में पूरी तरह से नहीं उतार पाए हैं।
अनूपपुर के दस्तकार परिवार के मोहनदास की पहचान छिन जाती है। बचपन से पढ़ने-लिखने में होशियार मोहनदास बड़ा होकर ओरिएंटल कोल माइंस में नौकरी के लिए आवेदन करता है। उसका चुनाव हो जाता है, लेकिन उसकी जगह कोई और बहाल हो जाता है। वह खुद को मोहनदास बताता है, लेकिन नकली मोहनदास उसकी पहचान वापस पहीं करता। वास्तविक मोहनदास अपने नाम और पहचान की लड़ाई में थपेड़े खाता है। एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर मेघना सेनगुप्ता उसकी मदद में आगे आती है, लेकिन भ्रष्ट व्यक्तियों के कुचक्र में कोई नतीजा नहीं निकलता। ढाक के वही तीन पात ़ ़ ़ मोहनदास सामाजिक विसंगति और पूर्वाग्रह से नहीं जीत पाता।
मजहर कामरान ने फिल्म का लोकेशन वास्तविक रखा है। कलाकारों के चुनाव में उनसे चूक हुई है। अगर असली और नकली मोहनदास के कलाकारों को वह परस्पर बदल देते तो दोनों चरित्र अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली हो जाते। नकुल वैद्य असली मेाहनदास की पीड़ा नहीं व्यक्त कर पाते। इसी प्रकार मेघना सेनगुप्ता का जोड़ा गया ट्रैक आधा-अधूरा लगता है। नाटकीयता बढ़ाने के लिए हर्षव‌र्द्धन सोनी के किरदार को विस्तार दिया जा सकता था। और जज के रूप में गजानन माधव मुक्तिबोध को रखना रचनात्मक युक्ति भर है। गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी के प्रतिष्ठित जन पक्षधर कवि हैं।
मोहनदास उदय प्रकाश की साहित्यिक कृति के सिनेमाई रूपांतरण में पूरी तरह से सफल नहीं हो सकी है। हां, जो पाठक कहानी से परिचित नहीं हैं, उन्हें मोहनदास फिल्म सारगर्भित और सम्यक लग सकती है। उदय प्रकाश के पाठकों को मजहर कामरान की मोहनदास संतुष्ट नहीं करती।

Saturday, September 5, 2009

फ़िल्म समीक्षा:चिंटू जी

-अजय ब्रह्मात्मज
****
रंजीत कपूर का सृजनात्मक साहस ही है कि उन्होंने ग्लैमरस, चकमक और तकनीकी विलक्षणता के इस दौर में चिंटू जी जैसी सामान्य और साधारण फिल्म की कल्पना की। उन्हें ऋषि कपूर ने पूरा सहयोग दिया। दोनों के प्रयास से यह अद्भुत फिल्म बनी है। यह महज कामेडी फिल्म नहीं है। हम हंसते हैं, लेकिन उसके साथ एक अवसाद भी गहरा होता जाता है। विकास, लोकप्रियता और ईमानदारी की कशमकश चलती रहती है। फिल्म में रखे गए प्रसंग लोकप्रिय व्यक्ति की विडंबनाओं को उद्घाटित करने के साथ विकास और समृद्धि के दबाव को भी जाहिर करते हैं।
यह दो पड़ोसी गांवों हड़बहेड़ी और त्रिफला की कहानी है। नाम से ही स्पष्ट है कि हड़बहेड़ी में सुविधाएं और संपन्नता नही है, जबकि त्रिफला के निवासी छल-प्रपंच और भ्रष्टाचार से कथित रूप से विकसित हो चुके हैं। तय होता है कि हड़बहेड़ी के विकास के लिए कुछ करना होगा। पता चलता है कि मशहूर एक्टर ऋषि का जन्म इसी गांव में हुआ था। उन्हें निमंत्रित किया जाता है। ऋषि कपूर की राजनीतिक ख्वाहिशें हैं। वह इसी इरादे से हड़बहेड़ी आने को तैयार हो जाते हैं। हड़बहेड़ी पहुंचने के बाद जब जमीनी सच्चाई से उनका सामना होता है तो उनके अहंकार, स्वार्थ और सोच को चोट लगती है। देश के सुदूर इलाके में बसे हड़बहेड़ी गांव के भोले लोग अपनी सादगी से अहंकारी, पाखंडी और स्वार्थी ऋषि कपूर के हृदय परिव‌र्त्तन कर देते हैं।
सच और कल्पना के ताने-बाने से तैयार की गई यह फिल्म नए शिल्प का इस्तेमाल करती है। अभिनेता ऋषि कपूर के जीवन के वास्तविक तथ्यों और प्रसंगों को काल्पनिक घटनाओं से जोड़ कर रंजीत कपूर ने रोचक पटकथा लिखी है। गांव के सीधे-सादे लोगों से लेकर मुंबई के चालाक फिल्म निर्माता मलकानी और राजनीतिक दलाल अमर संघवी तक इस फिल्म में हैं। फिल्म के कई रेफरेंस वास्तविक हैं और फिल्म देखते समय हम उनका आनंद भी उठाते हैं।
कामेडी के नाम पर हिंदी फिल्मों में चल रही भेड़चाल से इतर है चिंटू जी। रंजीत कपूर ने दर्शकों को हंसाने-रुलाने का सादा तरीका चुना है। इस फिल्म में कोई तकनीकी चमत्कार या सिनेमाई कौशल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिल्म सीधे दिल में उतरती है और गुदगुदाती है। हां, फिल्म में रंगमंच का प्रभाव है। रंजीत कपूर का रंगमंच से लंबा संबंध रहा है, इसलिए यह प्रभाव स्वाभाविक है। चिंटू जी सामाजिक विडंबनाओं पर चोट करने के साथ मनोरंजन के चालू और स्वीकृत फार्मूले को भी निशाना बनाती है। रोमांटिक गीत, आयटम सांग और फिल्म की शूटिंग के दृश्यों में रंजीत कपूर ने प्रचलित लोकप्रिय शैली पर बारीकी से कटाक्ष किया है।
अभिनेताओं में यह फिल्म पूरी तरह से ऋषि कपूर पर निर्भर है। उन्होंने शिद्दत से अपनी जिम्मेदारी निभायी है। प्रियांशु चटर्जी, कुलराज रंधावा, सौरभ शुक्ला और ग्रुशा कपूर ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। बूढ़ी दाई की भूमिका में शबनम कपूर विशेष ध्यान खींचती हैं।

Saturday, August 15, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमीने

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बैड ब्वाय के एंगल से गुड ब्वाय की कहानी

-अजय ब्रह्मात्मज

वह चलता है, मैं भागता हूं-चार्ली
(लेकिन दोनों अंत में साथ-साथ एक ही जगह पहुंचते हैं। जिंदगी है ही ऐसी कमीनी।)
समकालीन युवा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। अगर आपने विशाल की पिछली फिल्में देखी हैं तो कमीने देखने का रोमांच ज्यादा होगा। अगर उनकी कोई फिल्म पहले नहीं देखी है तो शैली, शिल्प, संवाद, दृश्य, दृश्य संयोजन, संरचना, बुनावट, रंग, प्रकाश और टेकिंग सभी स्तरों पर नवीनता का एहसास होगा। एकरेखीय कहानी और पारंपरिक शिल्प के आदी दर्शकों को झटका भी लग सकता है। यह 21वीं सदी का हिंदी सिनेमा है, जो गढ़ा जा रहा है। इसका स्वाद और आनंद नया है।
विशाल भारद्वाज ने जुड़वां भाइयों की कहानी चुनी है। उनमें से एक बैड ब्वाय और दूसरा गुड ब्वाय है। बचपन की एक घटना की वजह से दोनों एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। उनकी मंजिलें अलग हैं। बैड ब्वाय जिंदगी में कुछ भी हासिल करने के दो ही रास्ते जानता है-एक शार्टकट और दूसरा छोटा शार्टकट। जबकि गुड ब्वाय ने अपनी आलमारी के भीतरी पल्ले पर 2014 तक का अपना लाइफ ग्राफ बना रखा है। नएपन के लिए जुड़वां भाइयों की इस कहानी में एक तुतलाता और दूसरा हकलाता है। कमीने बैड ब्वाय चार्ली के नजरिए से पेश की गई है।
कमीने में विशाल भारद्वाज की शैली, संवाद और शिल्प में पहले की फिल्मों की अपेक्षा निखार है। कलात्मक सृजन के हर क्षेत्र में नए और युवा सर्जक को अपनी शैली साधने में वक्त लगता है। इस फिल्म में विशाल सिद्धहस्त होने के करीब पहुंचे हैं। उन्होंने कुछ दृश्यों को तीव्र अतिनाटकीयता और चुटीलेपन के साथ रचा है। इन दृश्यों में हम रमते हैं, जबकि ये दृश्य मुख्य कहानी का हिस्सा नहीं होते। विशाल की फिल्मों में अनेक किरदार होते हैं और उनकी सुनिश्चित भूमिकाएं होती हैं। गौर करें तो पाएंगे कि उनकी फिल्मों में एक्स्ट्रा या जूनियर आर्टिस्ट की जरूरत नहीं होती। उनकी फिल्मों पर टरनटिनो (रिजर्वायर डाग, पल्प फिक्शन और किल बिल के निर्देशक) की फिल्मों का स्पष्ट प्रभाव है। भारतीय फिल्मकारों में वे एक स्तर पर जेपी दत्ता के करीब लगते हैं।
विशाल कलाकारों से काम निकालने में माहिर हैं। उनकी फिल्मों में स्टार अपना चोगा उतार कर कलाकार बन जाते हैं और फिर पर्दे पर किरदार के रूप में नजर आते हैं। कमीने में शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा अपने करिअर की उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय भूमिकाओं में हैं। जुड़वा भाइयों चार्ली और गुड्डू का चरित्रांकन इतना अलग है कि शाहिद कपूर की मेहनत रंग लाती है। प्रियंका चोपड़ा मराठी मुलगी के रूप में प्रभावित करती हैं। लेकिन जब वह हिंदी बोलने लगती हैं तो संवाद अदायगी में मराठी असर खत्म हो जाता है। अमोल गुप्ते समेत छोटी-मोटी भूमिकाओं में आए सभी कलाकारों को निर्देशक ने पूरे मनोयोग से कहानी में गूंथा है। सभी कलाकारों ने अभिनय से अपने हिस्से आए दृश्यों को प्रभावशाली बना दिया है।
फिल्म में पुराने पापुलर गानों के रेफरेंस सार्थक एवं उपयोगी हैं। विशाल को सामान्य और पापुलर रेफरेंस से परहेज नहीं है। बल्कि यूं कहें कि इनके उपयोग से वह अपने कथ्य और भाव को अधिक सघन एवं संप्रेषणीय बना देते हैं। संगीत पर उनकी उम्दा पकड़ है। चूंकि गुलजार फिल्म में सक्रिय विशाल भारद्वाज के मनोभाव समझते हैं, इसलिए उन्हें सही शब्द दे देते हैं।
कमीने में अभिनय, दृश्य संयोजन, संवाद, लोकेशन, टेकिंग आदि उत्तम है, लेकिन फिल्म का समन्वित प्रभाव थोड़ा कमजोर है। फिल्म के क्लाइमेक्स में विशाल उलझ गए हैं। यह कमी उनकी पिछली फिल्मों में भी रही है।वे उम्दा किस्म के मजबूत और रंगीन धागों का इस्तेमाल करते हैं,डिजाईन भी आकर्षक चुनते हैं,किंतु बुनावट में कसार रह जाती है.

Saturday, August 8, 2009

फ़िल्म समीक्षा:तेरे संग;चल चलें;अज्ञात






सतीश कौशिक का बेहतर अभिनय तेरे संग



किशोरावस्था के प्रेम और गर्भ जैसी जरूरी सामाजिक समस्या पर केंद्रित सतीश कौशिक की तेरे संग कमजोर पटकथा और हीरो-हीरोइन के साधारण अभिनय के कारण आवश्यक प्रभाव नहीं डाल पाती। इस विषय पर विदेशों में सुंदर, मार्मिक और भावपूर्ण फिल्में बन चुकी हैं।
माही (15 वर्ष की लड़की) और कबीर (17 वर्ष का लड़का) की इस प्रेम कहानी में फिल्मी संयोग, घटनाओं और प्रसंगों की भरमार है। माही और कबीर डिफरेंट बैकग्राउंड के किशोर हैं। उनका मिलना-जुलना, दोस्ती होना और फिर शैंपेंन के नशे में हमबिस्तर होना..। ये सारे प्रसंग अतार्किक और शुद्ध फिल्मी हैं। सतीश कौशिक से ऐसी कमजोर कोशिश की अपेक्षा नहीं की जा सकती। रूसलान मुमताज और शीना शाहाबादी अभी अभिनय के ककहरे से अपरिचित हैं। उनमें बाल कलाकारों की मौलिक स्वाभाविकता भी नहीं बची है। वे सिर्फ सुंदर और मासूम दिखते हैं। तेरे संग सतीश कौशिक के लिए देखी जा सकती है। कबीर के निम्नमध्यवर्गीय पिता की भूमिका उन्होंने पुरअसर तरीके से निभाई है।


सराहनीय प्रयास चल चलें
युवा निर्देशक उज्जवल सिंह ने सीमित बजट में एक महत्वपूर्ण फिल्म बनाने की कोशिश की है। प्रतियोगिता और सफलता के इस दौर में स्कूली बच्चों पर बढ़ते दबाव और तनाव के विषय को उन्होंने इलाहाबाद की पृष्ठभूमि में रखा है। ऐसी फिल्म में ग्लैमर और चकाचौंध नहीं हो सकता।
इलाहाबाद के एक स्कूल में 11वीं के छात्रों का एक समूह है। उसमें लड़के-लड़कियां दोनों हैं। सभी अपने अभिभावकों से दुखी हैं, क्योंकि उन पर बेहतर प्रदर्शन का अनचाहा दबाव है। इनमें से एक इस दबाव को नहीं सह पाता और आत्महत्या कर लेता है। उसके सहपाठी मानते हैं कि अभिभावक की जोर-जबरदस्ती के कारण ही उसने अपनी जान ली है। वे शहर के एक वकील से मिल कर अपने अभिभावकों पर मुकदमा कर देते हैं। हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बहस चलती है। बच्चों के प्रति परिवार, समाज और सरकार के रवैए की परतें खुलती हैं। पता चलता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में ही खोट है। जो ज्ञानार्जन पर जोर देने के बजाए छात्रों को धनार्जन के लिए तैयार करती है। उज्जवल सिंह ने बच्चों से अच्छा काम लिया है। उनकी मासूमियत और सवाल दोनों आकृष्ट करते हैं। कोर्ट ड्रामा थोड़ा नकली लगता है। वकील बने मिथुन चक्रवर्ती और अनूप सोनी के लंबे बाल खटकते हैं। कोर्ट रूम ड्रामा में नाटकीयता नहीं उभर पाई है।
इलियाराजा के संगीत निर्देशन में पीयूष मिश्रा के गीत नए शब्द और भाव के साथ हैं। लोरीनुमा गीत में मैथिली लोकगीत की दो पंक्तियों का टच सुंदर है। निश्चित ही यह फिल्म और बेहतर हो सकती थी, फिर भी उज्जवल सिंह का प्रयास सराहनीय है।
हंसी आएगी रामू की अज्ञात पर
राम गोपाल वर्मा या तो कुंद हो चुके हैं या अपनी धार का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। अंडरव‌र्ल्ड, खौफनाक और प्रेमभाव की अनेक फिल्में निर्देर्शित कर चुके राम गोपाल वर्मा की अज्ञात भी उनकी ़ ़ ़ आग की तरह भविष्य में भूल के तौर पर गिनी जाएगी।
एक जंगल में शूटिंग करने गई फिल्म यूनिट के सदस्य एक-एक कर मारे जा रहे हैं। उन्हें कौन मार रहा है? कोई नहीं जानता। हत्यारा भयावह और क्रूर है। यह सिर्फ हत्या होने के बाद लाश को देख कर पता लगता है। राम गोपाल वर्मा ने इस फिल्म की शूटिंग श्रीलंका के जंगलों में की है। जंगल को खौफनाक किरदार बनाने में वे असफल रहे हैं। बैकग्राउंड साउंड से खौफ क्रिएट करने की हर कोशिश में वह दर्शकों को डराने के बजाए हंसा देते हैं। किसी खौफनाक फिल्म को देखते हुए हंसी आए तो क्या कहेंगे? एक सवाल है कि अज्ञात में पहले प्रोड्यूसर, फिर डायरेक्टर, उसके बाद कैमरा मैन और फिर एक्शन डायरेक्टर की हत्या क्यों होती है? क्या फिल्म इंडस्ट्री में प्रचलित स्टेटस के हिसाब से यह क्रम रखा गया है। पर्दे के पीछे काम करने वाले क्यों पहले मौत के शिकार होते हैं? फिल्म अचानक से खत्म होती है और पर्दे पर अज्ञात-2 के जल्दी आने की सूचना दी जाती है। मुमकिन है अज्ञात-2 में रामू डरा सकें, इस बार तो सिर्फ हंसी आई रामू की इस कोशिश पर..।

Friday, July 31, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लव आज कल

शाश्वत प्यार का अहसास
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-अजय ब्रह्मात्मज
इम्तियाज अली निर्देशित लव आज कल बीते कल और आज की प्रेम कहानी है। 1965 और 2009 के किरदारों के जरिए इम्तियाज अली एक बार फिर साबित करते हैं कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। प्रेम ज्ञान है, आख्यान है, व्याख्यान है। यही हिंदी फिल्मों का दर्शन है।
रोमांटिक हिंदी फिल्मों में हमेशा से पटकथा प्यार और उसके विशुद्ध अहसास पर केंद्रित रहती है। हर पीढ़ी का निर्देशक अपने नजरिए से प्यार को परिभाषित करने का प्रयास करता है। इम्तियाज अली ने 2009 के जय और मीरा के माध्यम से यह प्रेम कहानी कही है, जिसमें 1965 के वीर और हरलीन की प्रेम कहानी एक रेफरेंस की तरह है। इम्तियाज अली नई पीढ़ी के निर्देशक हैं। उनके पास सुघढ़ भाषा और संवेदना है। अपनी पिछली फिल्मों सोचा न था और जब वी मेट से दमदार दस्तक देने के बाद लव आज कल के दृश्यों और प्रसंगों में इम्तियाज के कार्य कुशलता की छाप स्पष्ट नजर आती है। हिंदी फिल्मों में हम फ्लैशबैक देखते रहे हैं। लव आज कल में फ्लैशबैक और आज की कहानी साथ-साथ चलती है, कहीं कोई कंफ्यूजन नहीं होता। न सीन डिजाल्व करने की जरूरत पड़ती है और न कहीं सीन खोलने की। इम्तियाज अली का दूसरा सफल प्रयोग ऋषि कपूर की जवानी के दृश्यों में सैफ अली खान को दिखाना है। एकबारगी यह प्रयोग चौंकाता है, लेकिन चंद मिनटों बाद सब कुछ स्वाभाविक लगने लगता है।
सैफ अली खान ने दोनों किरदारों को मैनरिज्म और उच्चारण से अलग करने की अच्छी कोशिश की है। अगर पंजाबी के उच्चारण पर उन्होंने थोड़ी और मेहनत की होती तो फिल्म निखर जाती। भाषा की जानकारी ज्यादा नहीं होने पर संवाद अदायगी और भाव अभिव्यक्ति में अंतर आ जाता है। दीपिका पादुकोण के साथ कुछ यही हुआ। उनके उच्चारण साफ है, लेकिन शब्दों के सही अर्थ नहीं समझने से असली भाव उनके चेहरे पर नहीं आ पाया है। आंखें धोखा दे जाती है। इस कारण किरदार कमजोर हो जाता है। फिर भी मीरा का किरदार उनके करिअर में उल्लेखनीय रहेगा।
इम्तियाज अली की फिल्मों में किरदारों की अंतर्यात्रा और बाह्ययात्रा होती है। वे एक जगह नहीं टिकते। कहीं से चलते हैं और कहीं पहुंचते हैं। कई बार वे पुराने ठिकानों पर लौटते हैं। लव आज कल में जय-मीरा एवं वीर-हरलीन को हम विभिन्न शहरों में आते-जाते देखते हैं। उनकी ये यात्राएं खुद की खोज के लिए होती हैं। इम्तियाज की यह खूबी है कि उनके किरदार हिंदी फिल्मों के आम दर्शकों की तरह आसपास के प्रतीत होते हैं। बातचीत और लहजे से अपने से लगते हैं।
अभिनय के लिहाज से सैफ अली खान ने काफी मेहनत की है। 21वीं सदी के युवक के गुण और कंफ्यूजन को वे बेहतरीन तरीके से व्यक्त करते हैं। वहीं दीपिका पादुकोण अपने किरदार के साथ पूरा न्याय नहीं कर सकीं हैं। किरदार में गहराई आते ही उनकी अभिनय क्षमता डगमगाने लगती है। इंटरवल के बाद के नाटकीय दृश्यों में वे कमजोर पड़ जाती हैं। ऋषि कपूर अपने निराले अंदाज में प्रभावित करते हैं। नीतू सिंह की जवानी की भूमिका निभा रही अभिनेत्री लिसेल ने अपनी स्वाभाविकता से हरलीन के किरदार को विश्वसनीय बना दिया है। पहली फिल्म होने पर भी वह कैमरे के सामने सहमी नजर नहीं आती।
फिल्म का गीत-संगीत, स्क्रिप्ट के अनुरूप है। भाव पैदा करने में दोनों अहम भूमिका निभाते हैं। फिल्म का संपादन खासतौर पर सराहनीय है। आरती बजाज ने स्क्रिप्ट और दृश्य की बारीकियों को समझते हुए उन्हें अच्छी तरह जोड़ा है। लव आज कल प्यार की तरह ही एक खूबसूरत अहसास है, जिसे देखते हुए आपको बोरियत नहीं होगी।

Saturday, July 25, 2009

फ़िल्म समीक्षा:लक

-अजय ब्रह्मात्मज
माना जाता है कि हिंदी फिल्मों के गाने सिर्फ 200 शब्दों को उलट-पुलट कर लिखे जाते हैं। लक देखने के बाद फिल्म के संवादों के लिए भी आप यही बात कह सकते हैं। सोहम शाह ने सिर्फ 20 शब्दों में हेर-फेर कर पूरी फिल्म के संवाद लिख दिए हैं। किस्मत, फितरत, तकदीर, गोली, मौत और जिंदगी इस फिल्म के बीज शब्द हैं। इनमें कुछ संज्ञाएं और क्रियाएं जोड़ कर प्रसंग के अनुसार संबोधन बदलते रहते हैं। यूं कहें कि सीमित शब्दों के संवाद ही इस ढीली और लोचदार स्कि्रप्ट के लिए आवश्यक थे। अगर दमदार डायलाग होते तो फिल्म के एक्शन से ध्यान बंट जाता। सोहम की लक वास्तव में एक टीवी रियलिटी शो की तरह ही है। बस, फर्क इतना है कि इसे बड़े पर्दे पर दिखाया जा गया है। इसमें टीवी जैसा रोमांच नहीं है, क्योंकि हमें मालूम है कि अंत में जीत हीरो की ही होनी है और उसकी हीरोइन किसी भी सूरत में मर नहीं सकती। वह बदकिस्मत भी हुई तो हीरो का लक उसकी रक्षा करता रहेगा। रियलिटी शो के सारे प्रतियोगी एक ही स्तर के होते हैं। समान परिस्थितियों से गुजरते हुए वे जीत की ओर बढ़ते हैं। इसलिए उनके साथ जिज्ञासा जुड़ी रहती है। बड़े पर्दे पर के इस रियलिटी शो लक में पहले ही पता चल जाता है कि बुरे दिल का राघव (रवि किशन) आउट हो जाएगा। इंटरवल तक तो इस रियलिटी शो के प्रतियोगी जमा किए जाते हैं। उनकी जिंदगी के उदास किस्से सुनाए जाते हैं। निराशा में भी किस्मत के धनी किरदार जिंदादिल और जोशीले नजर आते हैं। अपनी-अपनी मजबूरियों से वे इकट्ठे होते हैं और फिर मूसा (संजय दत्त) उन पर भारी रकम के दांव पर लगाता है। मूसा और उसका सहयोगी तामांग (डैनी डेंजोग्पा) रियलिटो शो के संचालक हैं। लक में तर्क न लगाएं तो ही बेहतर होगा। सारे किरदार नकली और फिल्मी हैं। चूंकि लेखक और निर्देशक सोहम शाह खुद हैं, इसलिए फिल्म के बुरी होने का पूरा श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए। हां, कलाकारों ने उनकी इस कोशिश को बढ़ाया है। खासकर इमरान खान और श्रुति हासन ने। इमरान खान को मान लेना चाहिए कि सिर्फ इंस्टिक्ट से फिल्म चुनना सही नहीं है। देखना चाहिए कि आप फिल्म के किरदार में जंचते भी हैं या नहीं? एक्शन फिल्मों में हीरो का कांफीडेंस उसकी बाडी लैंग्वेज में नजर आता है। इमरान में एक्शन स्टार का कंफीडेंस नहीं है। वे एक्शन करते समय कांपते से नजर आते हैं। श्रुति हासन लक से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत कर रही हैं। अब श्रुति का कमल हासन और सारिका की बेटी होना संयोग है या लक? निर्देशक का ध्यान केवल एक्शन पर रहा है। दो-तीन एक्शन सीक्वेंस बेहतर बन पड़े हैं, लेकिन स्पेशल इफेक्ट से रूबरू दर्शक ऐसे दृश्यों की सच्चाई जानते हैं। फिल्म में इमोशन और ड्रामा रहे तो एक्शन का प्रभाव बढ़ जाता है, लेकिन लक इन दोनों ही मामलों में कमजोर है। फिल्म के अंत में एक डायलाग है - लक उन्हीं का साथ देता है जिनमें जीतने का जच्बा हो। काश, फिल्म बनाने के जज्बे से भी लक को जोड़ा जा सकता।
रेटिंग-*

Saturday, July 18, 2009

फ़िल्म समीक्षा:जश्न


सपनों और रिश्तों के बीच

-अजय ब्रह्मात्मज


भट्ट कैंप की फिल्मों का अपना एक फार्मूला है। कम बजट, अपेक्षाकृत छोटे और मझोले स्टार, इमोशनल कहानी, म्यूजिकल सपोर्ट, गीतों व संवादों में अर्थपूर्ण शब्द। इस फार्मूले में ही विशेष फिल्म्स की फिल्में कभी कमाल कर जाती हैं और कभी-कभी औसत रह जाती हैं। जश्न कमाल कर सकती है। भट्ट बंधु ने सफलता के इस फार्मूले को साध लिया है। उनकी जश्न के निर्देशक रक्षा मिस्त्री और हसनैन हैदराबादवाला हैं।
जश्न सपनों और आकांक्षाओं की फिल्म है। इसे हर जवान के दिल में पल रहे नो बडी से सम बडी होने के सपने के तौर पर प्रचारित किया गया है। फिल्म का नायक आकाश वर्मा सपनों के लिए अपनों का सहारा लेता है। लेकिन असफल और अपमानित होने पर पहले टूटता, फिर जुड़ता और अंत में खड़ा होता है। सपनों और आकांक्षाओं के साथ ही यह शहरी रिश्तों की भी कहानी है। हिंदी फिल्म के पर्दे पर भाई-बहन का ऐसा रिश्ता पहली बार दिखाया गया है। बहन खुद के खर्चे और भाई के सपने के लिए एक अमीर की रखैल बन जाती है। भाई इस सच को जानता है। दोनों के बीच का अपनापा और समर्थन भाई-बहन के रिश्ते को नया आयाम देता है। सारा आज की बहन है और आकाश भी आज का भाई है। रिश्तों के नंगे सच को लेखक-निर्देशक ने कोमलता से उद्घाटित किया है।
पाकिस्तानी एक्टर हुमायूं सईद ने अमन बजाज के शातिर, स्वार्थी, अहंकारी और लंपट किरदार को प्रभावशाली तरीके से चित्रित किया है। सिर्फ आंखों, होठों और चेहरे के भाव से कैसे दृश्य को खास और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। हिंदी फिल्मों के ढेर सारे स्टार हुमायूं सईद के निरीक्षण से सीख सकते हैं। चूंकि वे किसी हिंदी फिल्म में पहली बार दिखे हैं, इसलिए किरदार के ज्यादा करीब लगते हैं। शहाना गोस्वामी दृश्य चुरा लेती हैं। सामान्य दृश्यों में भी उनका सहज अभिनय स्वाभाविक लगता है। हालांकि जश्न में सारा का किरदार जटिल नहीं था, पर साधारण किरदार को रोचक बना देना भी तो खासियत है। अध्ययन सुमन को नाटकीय और भावुक दृश्य मिले हैं। वे निराश नहीं करते। उन्हें अपने बालों को निखारने-संवारने पर ध्यान देना चाहिए। वह उनके अभिनय के आड़े आता है।
संगीत फिल्म के थीम के मुताबिक एक संगीतकार की भावनाओं को शब्दों और ध्वनि से व्यक्त करता है। गीतों पर आज की संगीत शैली का पूरा असर है। अध्ययन ने उन गीतों को पर्दे पर जोश और जरूरी एक्सप्रेशन के साथ परफार्म किया है। और अंत में पटकथा और संवाद के लिए शगुफ्ता रफीक की तारीफ करनी होगी। इन दिनों फिल्मों के संवाद दृश्यों को भरने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उनमें न तो शब्दों की कारीगरी रह गई है और न भाव की गहराई। शगुफ्ता रफीक के संवादों में रवानी है। वे सटीक, चुस्त और दृश्यों के अनुकूल हैं।
रेटिंग : ***

Saturday, July 11, 2009

फ़िल्म समीक्षा:संकट सिटी



बड़े शहर की भूमिगत दुनिया

-अजय ब्रह्मात्मज


बड़े शहरों में एक भूमिगत दुनिया होती है। इस दुनिया में अपराधी पलते और रहते हैं। उनकी जिंदगी में भी छल, धोखा, प्रपंच और कपट है। उनके भी सपने होते हैं और उन सपनों को पाने की कोशिशें होती हैं। वहां हमदर्दी और मोहब्बत होती है तो बदले की भावना भी। पंकज आडवाणी ने संकट सिटी में इसी दुनिया के किरदारों को लिया है। इन किरदारों को हम कार चोर, मैकेनिक, फिल्म निर्माता, बिल्डर, होटल मालिक, वेश्या और चालबाज व्यक्तियों के रूप में देखते हैं।
सतह पर जी रहा आम आदमी सतह के नीचे की जिंदगी से नावाकिफ रहता है। कभी किसी दुर्घटना में भिड़ंत होने या किसी चक्कर में फंसने पर ही उस दुनिया की जानकारी मिलती है। गुरु की मुसीबत मर्सिडीज की चोरी और उसमें रखे एक करोड़ रुपए से शुरू होती है। एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद बाकी घटनाएं होती चली जाती हैं और बेचारा गुरु मुसीबतों के चक्रव्यूह में फंसता चला जाता है। निर्देशक पंकज आडवाणी ने गुरु के बहाने सड़ चुकी सामाजिक व्यवस्था में सक्रिय स्वार्थी और घटिया किस्म के पिस्सुओं (व्यक्तियों) का चेहरा दिखाया है। सभ्य समाज में हम उन्हें अपने आसपास विभिन्न पेशों (फिल्मकार, अध्यात्मिक गुरु, होटल और पब मालिक आदि) की शक्ल में देखते रहते हैं। इस फिल्म को देखते हुए हंसी आती है। उस हंसी के साथ एक टीस भी उठती है। निर्देशक ने बखूबी दृश्यों और प्रसंगों का व्यंग्यात्मक निर्वाह किया है। संकट सिटी हिंदी फिल्मों की प्रचलित कामेडी नहीं है। यह कामेडी से आगे जाती है। सिनेमा की भाषा में इसे ब्लैक कामेडी कहते है। यों समझें कि आप श्रीलाल शुक्ल, हरिशंकर परसाई या शरद जोशी को पढ़ रहे हैं। फिल्म व्यंग्य जैसा आनंद देती है। कुछ किरदार निरीह और बेचारे हैं तो कुछ धू‌र्त्त, कमीने और चालबाज। प्रासंगिक और चुटीले संवाद इन फिल्मों को खास बनाते हैं। इनके सोशल, पालिटिकल और हिस्टोरिकल रेफरेंस होते हैं। निर्देशक ने फिल्म की जरूरत और मकसद के मुताबिक के के मेनन, दिलीप प्रभावलकर, अनुपम खेर, वीरेंद्र सक्सेना, यशपाल शर्मा, हेमंत पांडे, मनोज पाहवा और चंकी पांडे को चुना और उनसे बेहतरीन काम लिया है।
रेटिंग : ***1/2

Friday, July 10, 2009

फ़िल्म समीक्षा: शार्टकट


-अजय ब्रह्मात्मज


शार्टकट की मूल मलयालम फिल्म बहुत अच्छी बनी थी। उस फिल्म में मोहन लाल को दर्शकों ने खूब पंसद किया था। लेकिन हिंदी में बनी शार्टकट उसके पासंग में भी नहीं ठहरती। सवाल उठता है कि मलयालम फिल्म पर आधारित फिल्म के लेखक के तौर पर अनीस बज्मी का नाम कैसे जा सकता है? क्यों नहीं जा सकता? उन्होंने मूल फिल्म देखकर उसे हिंदी में लिखा है। इस प्रक्रिया में भले ही मूल की चूल हिल गई हो।
इस फिल्म से यह भी पता चलता है कि फिल्मों की टाप हीरोइनें या तो आइटम सांग करती हैं या फिर गुंडों से जान बचाने की कोशिश करती हैं। फिल्म के हीरो निहायत मूर्ख होते हैं। किसी प्रकार पापुलर हो जाने के बाद वे अपनी मूर्खताओं को ही अपनी विशेषता समझ बैठते हैं। निर्देशक नीरज वोरा के पास फिल्म इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि और उसके किरदार थे। वे इनके सही उपयोग से रोचक और हास्यपूर्ण फिल्म बना सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस फिल्म को वे संभाल नहीं सके।
शार्टकट में अस्पष्टता है। फिल्म का प्रमुख किरदार शेखर है या राजू या अनवर? फिल्म की हीरोइन शेखर को मिलती है, इसलिए उसे हीरो समझ सकते हैं। लेकिन फिल्म की प्रमुख घटनाएं राजू और अनवर से जुड़ी हैं। निश्चित ही यह कंफ्यूजन शूटिंग शुरू होने के बाद का है, जो पर्दे पर आ गया है। यही वजह है कि अक्षय खन्ना, अरशद वारसी, अमृता राव और बकुल ठक्कर की कोशिशों के बावजूद फिल्म प्रभावित नहीं करती। हां, अमृता राव ने आयटम सांग और पहनावे से यह साबित किया कि आप उन्हें केवल छुईमुई और घरेलू किस्म की हीरोइन न समझें। फिर भी इन दृश्यों में उनकी झिझक चेहरे और बाडी लैंग्वेज में कई बार दिख जाती है।
रेटिंग : *1/2

Friday, July 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:कमबख्त इश्क




-अजय ब्रह्मात्मज

कोई शक नहीं कि निर्माता साजिद नाडियाडवाला पैसे खर्च करते हैं। वह अपने शौक और जुनून के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। कमबख्त इश्क की शूटिंग हालीवुड के स्टूडियो में करनी हो या फिल्म में हालीवुड के एक्टर रखने हों, वह रत्ती भर भी नहीं हिचकते। अब यह अलग बात है कि उनके लेखक और निर्देशक हिंदी फिल्म के चालू फार्मूले में हालीवुड-बालीवुड की संगति नहीं बिठा पाते। यही वजह है कि फिल्म सारी भव्यता, नवीनता और खर्च के बावजूद चूं-चूं का मुरब्बा साबित होती है। सब्बीर खान के निर्देशन में बनी कमबख्त इश्क ऊंची दुकान, फीका पकवान का ताजा उदाहरण है।
फिल्म में अक्षय कुमार और करीना कपूर की जोड़ी है। दोनों हाट हैं और दोनों के चहेते प्रशंसकों की कमी नहीं है। प्रशंसक सिनेमाघरों में आते हैं और अपने पसंदीदा सितारों को कमजोर और अनगढ़ किरदारों में देख कर निराश लौटते हैं तो अपनी शर्मिदगी में किसी और को फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताते। नतीजतन ऐसी फिल्में आरंभिक उत्साह तो जगाती हैं, लेकिन उसे जारी नहीं रख पातीं।
कमबख्त इश्क अक्षय कुमार और करीना कपूर की पुरानी फिल्म टशन से कंपीटिशन करती नजर आती है। निर्माता-निर्देशकों को समझ लेना चाहिए कि दर्शक ऐसी फिल्में स्वीकार नहीं करते। फिल्म की बुनियाद में पुरुष जाति और स्त्री जाति के प्रति परस्पर नफरत और हिकारत है। विराज (अक्षय कुमार) और सिमरिता (करीना कपूर) विपरीत लिंग के प्रति कोई सम्मान नहीं रखते। अपने जीवन के अनुभव और विश्वास से वे एक-दूसरे को हेय दृष्टि से देखते हैं। उनके बीच इतनी नफरत है कि वह धीरे-धीरे मुहब्बत में तब्दील हो जाती है। मुहब्बत का कोई लाजिक नहीं होता। इस फिल्म में स्थितियों, घटनाओं और प्रसंगों के साथ भावनाओं का भी कोई तर्क नहीं है। टुकड़ों में सोची गई यह फिल्म अंतिम प्रभाव में निहायत कमजोर साबित होती है।
अक्षय कुमार को विदूषक की भूमिका में हम कई फिल्मों में देख चुके हैं। निर्देशक उन्हें नई भावस्थिति नहीं देते। चूंकि पापुलर एक्टर को अपने सेफ जोन में खेलना अच्छा लगता है, इसलिए अक्षय कुमार भी नहीं समझ पाते कि उनकी एक जैसी भूमिकाओं और अदाओं से दर्शक ऊबने लगे हैं। करीना कपूर भी कुछ गानों और दृश्यों में सेक्सी दिखने के अलावा कोई प्रभाव नहीं छोड़ पातीं । फिल्म के नायक-नायिका के साथ बाकी किरदार भी आधे-अधूरे तरीके से गढ़े गए हैं।
हिंदी फिल्मों में 25-30 प्रतिशत संवाद अब अंग्रेजी में होने लगे हैं। गालियों और फूहड़ दृश्यों के उपयोग और सृजन में लेखक और निर्देशक अपनी भोंडी कल्पना का उपयोग करने लगे हैं। कमबख्त इश्क उसी की बानगी है। दोहराव और नकल फिल्म के संगीत में भी है। गाने कमबख्त इश्क के चल रहे होते हैं और कानों में किसी और फिल्म का पापुलर गीत सुनाई देता रहता है। संगीतकार अनु मलिक कहां से कहां पहुंच गए हैं?
रेटिंग : *1/2

Saturday, May 23, 2009

फ़िल्म समीक्षा:डिटेक्टिव नानी

रोमांचित करती है डिटेक्टिव नानी
हिंदी में ऐसी फिल्में नहीं बनतीं। फिल्म के मुख्य किरदार में बुजुर्ग नानी को लेकर रोमिला मुखर्जी ने साहस का परिचय दिया है। यह नानी कहानियों और पुरानी फिल्मों की नानी नहीं है। यहां नानी शरीर और दिमाग से स्वस्थ हैं। वह अकेली रहती हैं, लेकिन बेटी-बेटे की मदद से नहीं हिचकतीं। उनकी जिंदगी में बूढ़ी औरतों के साथ चिपक जाने वाली उदासी नहीं है। डिटेक्टिव नानी सरल और रोचक फिल्म है। सुबह की सैर से लौटती नानी को अपनी बिल्डिंग में कुछ असहज चीजें दिखती हैं। खिड़की से झांकती डरी हुई बच्ची को देख कर वह सचेत हो जाती हैं। सबसे पहले वह पुलिस को सूचना देती हैं, लेकिन उनकी लापरवाही देख खुद सक्रिय हो जाती हैं। वह अपने कामन सेंस और बच्चों की मदद से तहकीकात शुरू करती हैं। आखिरकार भेद खुलता है और सभी नानी की तारीफ करते हैं। निर्देशक रोमिला मुखर्जी की पहली कोशिश चंद सीमाओं के बावजूद सुंदर है। स्कि्रप्ट थोड़ी कसी हुई होती और अनावश्यक प्रेम का एंगल नहीं डाला गया होता तो फिल्म ज्यादा चुस्त होती। जरूरत नहीं होने पर जबरन गाने ठूंसने से फिल्म की लय टूटती है। डिटेक्टिव नानी के प्रेम प्रसंग अवांछनीय हैं। नानी की भूमिका में अवा मुखर्जी सहज हैं। उनके व्यक्तित्व में जोश और गति दिखाई पड़ती है। हिंदी फिल्मों के पर्दे पर ऐसे महिला किरदार कम दिखते हैं, जो परस्पर रिश्तों के आधुनिक तनाव और यथार्थ के प्रति संगत दृष्टिकोण रखें। नानी की बेटी तलाकशुदा है और उनकी बहू उन्हें पसंद नहीं करती, लेकिन नानी को कोई परेशानी नहीं है। वह बेटे और बेटी के बच्चों को अपने पास रखने और संभालने के लिए तैयार रहती हैं। वह सजग और अपने समाज के प्रति जागरूक हैं। इस उम्र में भी निडर और सक्रिय हैं। डिटेक्टिव नानी वयस्क दर्शकों को शायद उतनी अच्छी न लगे, लेकिन बच्चे इसे पसंद कर सकते हैं। इस फिल्म का थ्रिल बाल मन के समझने लायक है। बाल दर्शक देखना चाहेंगे कि नानी रहस्य सुलझा पाती हैं कि नहीं? फिल्म में रहस्य और रोमांच बना रहता है। रोमिला ने सीमित किरदारों के साथ सीमित बजट में दिलचस्प फिल्म रची है।

Saturday, May 16, 2009

फ़िल्म समीक्षा:९९


-अजय ब्रह्मात्मज

कहते हैं देश का हर आदमी 99 के फेर में पड़ा है। बस, एक और मिल जाए, हो जाए या पा जाए तो सभी की सेंचुरी लग जाए। आम जीवन के इसी थीम को निर्देशकद्वय राज और डीके ने अपनी फिल्म का विषय बनाया है। उन्होंने मशहूर कामिक किरदार लारेल और हार्डी की तर्ज पर एक मोटा और एक दुबला-पतला किरदार चुना है। यहां सायरस भरूचा और कुणाल खेमू इन भूमिकाओं में हैं।
मुंबई के दो छोटे जालसाज डुप्लीकेट सिम के धंधे में पकड़े जाने से बचने के लिए भागते हैं तो अपराध के दूसरे कुचक्र में शामिल हो जाते हैं। वे बुकी एजीएम का काम करने लगते हैं। उसी के पैसों की वसूली के लिए वे दिल्ली पहुंचते हैं। दिल्ली में उनका सामना विचित्र किरदारों से होता है। 99 नए किस्म की कामेडी है। पिछले कुछ समय से दर्शक एक ही किस्म की कामेडी देख कर ऊब चुके हैं, वैसे में 99 राहत की तरह है।
निर्देशकद्वय ब्लैक कामेडी और ह्यूमर के बीच में अपने किरदारों को रख पाए हैं। इस फिल्म में मजेदार ब्लैक कामेडी की संभावना थी। फिल्म बीच में स्लो हो जाती है। कामेडी फिल्मों में घटनाएं तेजी से नहीं घटे तो कोफ्त होने लगती है। मुख्य किरदार सचिन [कुणाल खेमू] और जरामुड़ [सायरस भरूचा] के बीच अच्छी केमिस्ट्री है, लेकिन लेखक और निर्देश्क ने जरामुड़ पर विशेष काम नहीं किया है। सायरस नेचुरल किस्म के एक्टर हैं, उन्हें कुछ और दृश्य एवं संवाद मिले होते तो फिल्म की रोचकता बढ़ती। कुणाल निराश तो नहीं करते, लेकिन उन्हें और अभ्यास की जरूरत है।
यह फिल्म बोमन ईरानी और राज मिस्त्री के लिए देखी जा सकती है। राज मिस्त्री के रूप में हिंदी फिल्मों को एक नया एक्टर मिला है। उनकी कामिक टाइमिंग और अभिव्यक्ति फिल्म के दृश्यों के लिए सटीक है। बोमन ऐसी फिल्मों में लाजवाब होते हैं। उनकी पत्नी के रूप में सिमोन सिंह ने किरदार के भाव को अच्छी तरह समझा और व्यक्त किया है।
भोजपुरी फिल्म के माहौल को लेकर किए गए कटाक्ष भोजपुरीभाषी दर्शकों को चुभ सकते हैं। लेखकों को ऐसे मजाक से बचना चाहिए, जो किसी भाषा विशेष को निशाना बना कर हंसाने की कोशिश करता हो। फिल्म के संवाद चुटीले और प्रासंगिक हैं। छोटे ओर सहयोगी किरदारों को गढ़ने में निर्देशक ने मेहनत की है। उनकी मौजूदगी से स्क्रिप्ट में आई फांक भरती है। पहली फिल्म के संदर्भ में निर्देशकद्वय राज निदिमोरू और कृष्णा डीके उम्मीद जगाते हैं।

Saturday, May 9, 2009

फ़िल्म समीक्षा:फ्रोजेन


-अजय ब्रह्मात्मज

शिवाजी चंद्रभूषण की पहली फिल्म फ्रोजेन की ख्याति इतनी फैल चुकी है कि इसके बारे में संतुलित और वस्तुनिष्ठ राय व्यक्त करना मुश्किल है। कहते हैं कि तीस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी इस फिल्म को 18 पुरस्कार मिल चुके हैं। इस फिल्म के प्रचार में पुरस्कारों का निरंतर उल्लेख किया जा रहा है। कहीं न कहीं दर्शकों पर दबाव डाला जा रहा है कि आप इसे देखें या न देखें, इसकी महत्ता स्वीकार कर लें। शिवाजी चंद्रभूषण की फ्रोजेन की कई विशेषताएं हैं,
मसलन:-चालीस सालों के अंतराल के बाद कोई ब्लैक एंड ह्वाइट हिंदी फिल्म रिलीज हो रही है। शिवाजी के इस क्रिएटिव साहस और उसके सुंदर परिणाम की तारीफ उचित है।
समुद्र तल से 12,000 से 20,000 फीट की ऊंचाई पर इस फिल्म की शूटिंग हुई। यह मुश्किल काम था।
-लंबे समय के बाद डैनी शीर्ष भूमिका में दिखे। उनकी योग्यता और क्षमता का शिवाजी ने सही इस्तेमाल किया।
-फ्रोजेन में हिमालय की वादियों की एकांत खूबसूरती छलकती है।
कहना मुश्किल है कि विदेशी फिल्म फेस्टिवल में फ्रोजेन को किस आधार पर पुरस्कार दिए गए हैं। सवाल पूछने का मतलब यह कतई नहीं निकालें कि फिल्म इन पुरस्कारों के योग्य नहीं है। फ्रोजेन हिंदी के फार्मूला फिल्मों से अलग है। इसकी कहानी कई स्तरों पर चलती है। हिंदी फि ल्मों में कथा निर्वाह की एकरेखीय पद्धति होती है। उसकी आदत पड़ जाने के कारण जटिल कहानी एकबारगी समझ में नहीं आती। लास्या का काल्पनिक भाई, लास्या का एकाकीपन, लास्या के पिता कर्मा का संघर्ष, कर्मा का शोक और संताप, विस्थापन की समस्या, शांत माहौल में खंजर की तरह चुभती सड़कें, दैत्यों की तरह गुजरते वाहन, निष्कपट लोगों के बीच सक्रिय कपटी शहरी, उपभोक्तावाद का प्रभाव..जाने-अनजाने शिवाजी चंद्रभूषण ने भावनाओं और कथ्यों का अंतरजाल बुना है। फिल्म में एक उदासी है, जो श्वेत-श्याम फिल्मांकन से और गहरी हो जाती है। कभी-कभी बोझिल भी महसूस होती है।
नियमित फिल्मों के जरिये मनोरंजन के शौकीन दर्शकों को यह फिल्म काफी अलग अनुभव देगी। इस नए और अलग स्वाद के लिए उन्हें तैयार रहना होगा। डैनी और आनचुक का अभिनय सधा और किरदार के अनुरूप है। लास्या की भूमिका में गौरी खरी नहीं उतर पातीं। छोटी भूमिकाओं में यशपाल शर्मा और राज जुत्शी फिल्म को रोचक बनाते हैं।
रेटिंग ***

Saturday, April 18, 2009

फ़िल्म समीक्षा:दशावतार


एक नहीं, दस कमल हासन


अगर आप कमल हासन के प्रशंसक हैं तो भी इस फिल्म को देखने जाने से पहले एक बार सोच लें। कमल हासन आत्ममुग्ध अभिनेता हैं। कुछ समय पहले तक उनकी इसी आत्ममुग्धता के कारण हमने कई प्रयोगात्मक और रोचक फिल्में देखीं। लेकिन इधर उनकी और दर्शकों की टयूनिंग नहीं बन पा रही है। वह आज भी प्रयोग कर रहे हैं। ताजा उदाहरण दशावतार है। हालांकि तमिल और हिंदी में बनी फिल्म के निर्देशक रवि कुमार है, लेकिन यह फिल्म कमल हासन का क्रिएटिव विलास है।
यह अमेरिका में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक गोविंद सोमाया की कहानी है। गोविंद सिंथेटिक जैविक हथियार बनाने की प्रयोगशाला में काम करता है। एक छोटी घटना में हम उस जैविक हथियार का प्रभाव एक बंदर पर देखते हैं। गोविंद उस जैविक हथियार को सुरक्षित हाथों में पहुंचाना चाहता है।
संयोग से बैक्टीरिया जिस डिब्बे में बंद हैं वह भारत चला जाता है। गोविंद उसकी खोज में भारत आता है। यहां से नायक और खलनायक की बचने-पकड़ने के रोमांचक दृश्य शुरू होते हैं। इन दृश्यों में जो दूसरे किरदार आते हैं, उनमें से नौ भूमिकाएं कमल हासन ने ही निभाई है। एक सहज जिज्ञासा होती है कि अगर इन्हें अलग-अलग कलाकारों ने निभाया होता तो क्या फिल्म प्रभावशाली नहीं हो पाती? निश्चित ही कमल हासन ने अपनी सभी भूमिकाओं को मेकअप और मैनरिज्म से अलग करने की कोशिश की है। लेकिन उनकी जबरदस्त प्रतिभा के बावजूद कहीं न कहीं एकरूपता बनी रहती है। हालांकि कुछ दृश्यों में कमल हासन का निजी मैनरिज्म दिख ही जाता है।
रंगराजा नांबी ने कहानी, दृश्य, परिवेश और प्रस्तुति में प्रभावित किया है। ऐसा लगता है जैसे पर्दे पर हम कोई एपिक देख रहे हैं। सभी तकनीशियनों का सहयोग फिल्म के इस हिस्से को गत्यात्मक और विशाल बनाता है। लेकिन फिल्म की गति बनी नहीं रह पाती। कहीं न कहीं एक ही कलाकार द्वारा निभाए जा रहे नौ किरदारों की भिन्नता दिखाने में कहानी छूट गई है।
कमल हासन टुकड़ों-टुकड़ों में अच्छे लगते हैं। उनकी प्रतिभा के बारे में दो राय नहीं, लेकिन उसका दुरुपयोग उचित नहीं कहा जा सकता। असिन और मल्लिका शेरावत अपनी भूमिकाओं को निभा ले जाती हैं। असिन और कमल हासन की जोड़ी में उम्र का अंतराल साफ नजर आता है। फिल्म के विशेष प्रभाव अच्छे हैं। खासकर सुनामी के दृश्यों में तकनीकी दक्षता झलकती है।

Friday, April 3, 2009

फ़िल्म समीक्षा:8x10 तस्वीर

भेद खुलते ही सस्पेंस फिस्स
नागेश कुकुनूर ने कुछ अलग और बड़ी फिल्म बनाने की कोशिश में अक्षय कुमार के साथ आयशा टाकिया को जोड़ा और एक नई विधा में हाथ आजमाने की कोशिश की। इस कोशिश में वे औंधे मुंह तो नहीं गिरे, लेकिन उनकी ताजा पेशकश पिछली फिल्मों की तुलना में कमजोर रही। कहा जा सकता है कि कमर्शियल कोशिश में वे कामयाब होते नहीं दिखते। नागेश वैसे निर्देशकों के लिए केस स्टडी हो सकते हैं, जो अपनी नवीनता से चौंकाते हैं। उम्मीदें जगाते हैं, लेकिन आगे चलकर खुद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कोल्हू में जुतने को तैयार हो जाते हैं। अपनी पहली फिल्म हैदराबाद ब्लूज से उन्होंने प्रभावित किया था। डोर तक वह संभले दिखते हैं। उसके बाद से उनका भटकाव साफ नजर आ रहा है।
8/10 तस्वीर में नागेश ने सुपर नेचुरल शक्ति, सस्पेंस और एक्शन का घालमेल तैयार किया है। जय पुरी की अपनी पिता से नहीं निभती। वह उनके बिजनेश से खुश नहीं है। पिता-पुत्र के बीच सुलह होने के पहले ही पिता की मौत हो जाती है। जय को शक है कि उसके पिता की हत्या की गई है। जय अपनी सुपर नेचुरल शक्ति से हत्या का सुराग खोजता है। उसके पास अद्भुत शक्ति है। वह तस्वीर के जरिए बाद की घटनाओं को देख सकता है। नागेश ने जय की पिता की हत्या के पहले खींची तस्वीर में मौजूद चारों व्यक्तियों के जरिए घटनाओं को जोड़ते हुए सस्पेंस बढ़ाया है। जय को लगता है कि वह हत्यारे तक पहुंच रहा है, लेकिन जब हत्यारे का पता चलता है तो हंसी आती है। नागेश ने फिल्म में लंबे समय तक सस्पेंस बनाए रखा है। सस्पेंस खुलता है तो फिल्म अचानक लड़खड़ा जाती है। सस्पेंस फिल्मों के साथ दर्शकों की जिज्ञासा तभी जुड़ी रहती है, जब कातिल भी दृश्यों में मौजूद हो और उस पर शक नहीं कर पा रहे हों।
नागेश ने शिल्प में आधुनिक तकनीक व स्पेशल इफेक्ट का सुंदर उपयोग किया है। अक्षय के एक्शन दृश्य हैरतअंगेज तो नहीं हैं, लेकिन वे किरदार से मेल खाते हैं। फिल्म का लोकेशन कहानी के उपयुक्त है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी पटकथा है। चूंकि नागेश ने खुद फिल्म लिखी है, इसलिए कह सकते हैं कि लेखक नागेश ने निर्देशक नागेश का साथ नहीं दिया। अंतिम बीस मिनट में फिल्म सपाट हो जाती है। तब तक बना रोमांच काफूर हो जाता है। फिल्म में अक्षय कुमार निराश नहीं करते। वह एक्शन दृश्यों में सहज रहते हैं। आयशा टाकिया को दो दृश्य मिले हैं। उन दृश्यों को वह निभा ले जाती हैं। जावेद जाफरी ने जटिल किरदार निभाया है और उसे कामिकल नहीं होने दिया है। शर्मिला टैगोर समेत बाकी कलाकार सामान्य हैं।
रेटिंग : **

Saturday, March 28, 2009

फ़िल्म समीक्षा:विदेश, आ देखें ज़रा और एक

दीपा मेहता की साधारण फिल्म 'विदेश '

दीपा मेहता ख्यातिलब्ध निर्देशक हैं। उनकी फिल्मों से भारतीय दर्शक परिचित हैं। भारतीय परिवेश में सामाजिक मुद्दों और महिलाओं पर केंद्रित उनकी फिल्मों पर विवाद भी हुए हैं। वह संवेदनशील फिल्मकार हैं, लेकिन विदेश में उनसे चूक हो गई है। फिल्म का विषय उनकी सोच और शैली का है पर चित्रण कमजोर है। लुधियाना की लड़की चांद (प्रिटी जिंटा) की शादी राकी (वंश भारद्वाज) से हो जाती है। अपनी आंखों में सपने लिए वह कनाडा पहुंचती है। वहां शुरू से ही उसे पति के हाथों प्रताडि़त होना पड़ता है। विदेशी भूमि में लाचार और विवश चांद की मदद जमाइका की रोजा करती है। रोजा उसे एक बूटी देती है और बताती है कि यदि वह इसे पति को पिला दे तो वह उस पर आसक्त हो जाएगा। चांद कोशिश करती है, लेकिन घोल का रंग लाल होता देख उसे बाहर फेंक आती है। संयोग से उसे नाग पी लेता है। वह इछाधारी नाग है। नाग उसके पति के रूप में आकर उसे भरपूर प्रेम देता है। असली और मायावी पति के बीच चांद की दुविधा और बढ़ती है..। दीपा मेहता ने रियल कहानी में एक फैंटेसी जोड़ी है। लेकिन फैंटेसी फिल्म का प्रभाव बढ़ाने के बजाए घटा देता है। गिरीश कर्नाड के नाटक नाग मंडल की कथा को फिल्म में डालकर उन्होंने अपनी फिल्म ही कमजोर कर दी है। लोककथा का आधुनिक चित्रण हास्यास्पद लगता है। कहते हैं कि इस फिल्म को विदेशों में काफी सराहना मिली है और प्रिटी जिंटा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के दो पुरस्कार भी मिले हैं। पहले भी बगैर मेकअप के प्रताडि़त महिला की भूमिका निभाने से कई अभिनेत्रियों को श्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार मिले हैं। कभी इस पर गौर करना चाहिए कि वे पुरस्कार कितने सही और उचित रहे हैं? हां, वंश भारद्वाज ने प्रशंसनीय अभिनय किया है। ऐसा नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है। विदेश दीपा मेहता की साधारण फिल्म है। यह परिवेश के बजाए परिवार की कहानी बन गई है। ससुराल में चांद की प्रताड़ना की वजह समझ में नहीं आती। संकेत रूप में कुछ संवाद हैं और स्थितियां हैं, लेकिन दीपा उन्हें ठोस तरीके से स्थापित नहीं करतीं।
रेटिंग :*1/2

नहीं है दम 'आ देखें जरा'

जहांगीर सुरती का आइडिया रोचक है और उन्होंने पूरे स्टाइल से उसे शूट भी किया है, लेकिन फिल्म में प्रसंग और घटनाओं की कमी है। नतीजा यह होता है कि थोड़ी देर की उत्सुकता और जोश के बाद फिल्म ठंडी हो जाती है। थ्रिलर फिल्म की सफलता इसमें है कि दर्शक अपनी सीट पर बैठे पर्दे पर आंखें गड़ाए रहें। यह तभी मुमकिन है, जब लेखक कल्पनाशील हो और निर्देशक उसकी कल्पना साकार कर सके।
रे आचार्या (नील नितिन मुकेश) की फोटोग्राफी कुछ खास नहीं चल रही है। संयोग से उसे अपने नाना का एक कैमरा मिलता है, जो भविष्य की तस्वीरें ले सकता है। रे कैमरे की मदद से अपनी गरीबी दूर करता है। लेकिन इस चक्कर में वह रा और प्रशासन की निगाहों में आ जाता है। उसके पीछे अधिकारी लग जाते हैं। एक बार उसे अपनी खिंची तस्वीर के काले प्रिंट मिलते हैं। काला प्रिंट मतलब मौत..। उसकी निश्चित मौत में छह दिन बचे हैं? अब रे की कोशिश है कि वह अपनी मौत को रोके, कैमरा सही हाथों में पहुंचाए और इस बीच अपनी प्रेमिका सिमी का दिल भी जीत ले। चूंकि हिंदी फिल्म है, इसलिए रे की तीनों कोशिशें पूरी होती हैं। लेकिन इस कोशिश में धड़-पकड़, खून-खराबा और मुंबई से बैंकाक तक की भागदौड़ चलती है। अगर लेखक का सपोर्ट मिलता और घटनाएं रोचक होतीं तो यह फिल्म ज्यादा रोमांचित करती। आ देखें जरा की शुरुआत अच्छी है, लेकिन इंटरवल तक आते-आते फिल्म बैठ जाती है। नील की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। कुछ दृश्यों में वह प्रभावित करते हैं। उनका एक अलग लुक है। इस लिहाज से फिल्म का चुनाव सही था, किंतु उनके किरदार पर मेहनत नहीं की गई। बिपाशा बसु सिर्फ मादक भाव-भंगिमाओं में ही ठीक लगती हैं।
रेटिंग : *1/2



कहानी पुरानी, एक्शन पुराना 'एक'

संगीत सिवन कामेडी फिल्मों के बाद फिर से एक्शन फिल्म बनाने की कोशिश में लगभग 25 साल पीछे चले गए हैं। कहानी ट्रीटमेंट, एक्शन और एक हद तक एक्टिंग भी तीन दशक पुरानी लगती है। परिवार का प्यार पाकर अपराधी के नेकदिल बनते किरदारों की फिल्में हम देख चुके हैं। एक में नंदू संयोग से एक परिवार का सदस्य बन जाता है। वहां रहते हुए वह बदलता है। अपनी भावनाओं को पहचानता है और एक अच्छे इंसान में तब्दील हो जाता है। फिल्म में मुंबई से पंजाब तक की भागदौड़ और पृष्ठभूमि है। नंदू की तलाश में लगे सीबीआई अधिकारी की भूमिका में नाना पाटेकर को शौकीन और मसखरा मिजाज दिया गया है। बाबी देओल के लिए इस फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। वह ऐसी घिसी-पिटी फिल्में कर चुके हैं। नाना पाटेकर अपनी भूमिका से संघर्ष करते दिखे। कई दृश्यों में उनका संघर्ष स्पष्ट हो जाता है। संगीत सिवन ने एक्शन दृश्यों में मुख्य रूप से पुरानी स्टंट शैली को रखते हुए कुछ प्रयोग किए हैं। फिर भी मारपीट और भागदौड़ की फिल्मों के शौकीन दर्शकों को एक एक हद तक ही संतुष्ट कर पाएगी।
रेटिंग : *

Tuesday, March 10, 2009

फ़िल्म समीक्षा:१३ बी,ढूंढते रह जाओगे,कर्मा और होली



-अजय ब्रह्मात्मज

ठहरता नहीं है डर 13 बी

डरावनी फिल्मों के लिए जरूरी है कि वे दर्शकों को जिज्ञासु बना दें। अब क्या होगा? यह सवाल दर्शकों के दिमाग में मंडराने लगे तो रोमांच पैदा होता है। फिर जब अगला दृश्य आए तो वह अपने प्रभाव से सिहरन और डर पैदा करे। यह प्रभाव दृश्य विधान, पाश्‌र्र्व संगीत और अभिनय से पैदा किया जाता है। 13बी देखते हुए जिज्ञासा तो बढ़ती है, लेकिन डर नहीं लगता।
फिल्म का नायक मनोहर (आर माधवन) कर्ज लेकर नया अपार्टमेंट खरीदता है और पूरे परिवार के साथ वहां शिफ्ट करता है। मनोहर का हंसता-खेलता परिवार है। इसमें उसकी बीवी के साथ बड़े भाई, भाभी, भतीजे और मां हैं। शिफ्ट होने के दिन से ही कुछ गड़बड़ शुरू हो जाती है। मनोहर पढ़ा-लिखा और तार्किक व्यक्ति है। वह संभावित दुर्घटना से परिवार को बचाने की युक्ति में ऐसे सच को छू लेता है, जो पारलौकिक शक्तियों से संचालित है। लेखक और निर्देशक विक्रम के कुमार ने हारर फिल्म में नए तत्व इस्तेमाल किए हैं। उन्होंने अनोखे ढंग से हैरतअंगेज घटनाओं को कहानी का रूप दिया है। आरंभ के कुछ मिनटों की शिथिलता के बाद फिल्म के नायक मनोहर की तरह यह जिज्ञासा बढ़ने लगती है कि आगे क्या होगा? या फिर वे संभावित दुर्घटनाओं से कैसे बचेंगे? अगर विक्रम स्क्रिप्ट को चुस्त व कसा रख पाते और डर के दृश्यों को प्रभावशाली बनाया होता तो फिल्म अधिक डरावनी होती। लंबे दृश्यों और धीमी गति की वजह से डर जगता तो है, लेकिन ठहर नहीं पाता।
फिल्म मुख्य रूप से माधवन पर केंद्रित है। उन्होंने अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभाई है। उनके पुलिस इंस्पेक्टर दोस्त की भूमिका में मुरली शर्मा ने राहत के क्षण दिए हैं और रोमांच भी बढ़ाया है। नीतू चंद्रा घरेलू बीवी के रूप में जंचती हैं। बाकी कलाकारों का उपयोग दृश्य भरने के लिए है। तमिल और हिंदी में एक साथ बनी इस फिल्म पर द्विभाषी दबाव दिखता है।

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सुस्त पटकथा की फिल्म ढूंढते रह जाओगे


शीर्षक में ही निर्माता-निर्देशक ने सचेत कर दिया है। फिर भी परेश रावल और कुणाल केमू की जोड़ी को पर्दे पर देखना रोचक लगता है। यह कॉमेडी फिल्म है। लेखक और निर्देशक ने खुद ही अपने किरदारों को कार्टून कह दिया है, इसलिए शिकायत की संभावना खत्म हो जाती है।
किस्मत के मारे फिल्म निर्माता राज और चार्टर्ड एकाउंटेंट आनंद अपनी बदहाल स्थितियों से बाहर निकलने के लिए एक ऐसी फिल्म बनाना चाहते हैं, जो सबसे घटिया और फ्लाप हो। चार फिल्मों के प्रसंगों को जोड़कर वे कहानी तैयार करते हैं और फिर शूटिंग शुरू होती है। इंटरवल के बाद का हिस्सा इसी में निकलता है। आखिर में ट्विस्ट यह आता है कि उनकी फिल्म हिट हो जाती है। वे अपने इरादों में नाकाम होते हैं। उन्हें जेल भी जाना पड़ता है। घटिया और फ्लाप फिल्म बनाने की अवधारणा ही हास्यास्पद हैं। फिर लेखक-निर्देशक अपनी अवधारणा को सही ढंग से विकसित भी नहीं कर पाए हैं। परेश रावल, कुणाल केमू और दिलीप जोशी की कोशिशों के बावजूद फिल्म संभल नहीं पाती। इन्हें पटकथा का ठोस सहारा नहीं मिल पाया। सोहा अली खान और सोनू सूद का औसत अभिनय भी फिल्म को कमजोर करता है।
*१/२
पश्चिमी शैली में बनी कर्मा और होली
देश-विदेश के कलाकारों और हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में बनी होली एंड कर्मा एक मायने में अनोखी फिल्म है। विभिन्न देशों और संस्कृतियों की पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के सम्मिलन में हम उनके पूर्वाग्रहों, संस्कारों और मान्यताओं से परिचित होते हैं। वे एक रोचक खेल खेलते हैं, जिसमें सभी अपनी जिंदगी की कोई घटना बताते हैं। इस क्रम में उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलू सामने आते हैं। फिल्म का नैरेटिव पश्चिमी शैली का है। ट्रीटमेंट में भी हिंदी फिल्मों का असर नहीं है।
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Saturday, February 21, 2009

फ़िल्म समीक्षा:दिल्ली ६


हम सब के अन्दर है काला बन्दर

-अजय ब्रह्मात्मज
ममदू, जलेबी, बाबा बंदरमार, गोबर, हाजी सुलेमान, इंस्पेक्टर रणविजय, पागल फकीर, कुमार, राजेश, रज्जो और कुमार आदि 'दिल्ली ६' के जीवंत और सक्रिय किरदार हैं। उनकी भागीदारी से रोशन मेहरा (अभिषेक बच्चन) और बिट्टू (सोनम कपूर) की अनोखी प्रेम कहानी परवान चढ़ती है। इस प्रेमकहानी के सामाजिक और सामयिक संदर्भ हैं। रोशन और बिट्टू हिंदी फिल्मों के आम प्रेमी नही हैं। उनके प्रेम में नकली आकुलता नहीं है। परिस्थितियां दोनों को करीब लाती हैं, जहां दोनों के बीच प्यार पनपता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने बिल्कुल नयी शैली और मुहावरे में यह प्रेमकहानी रची है।
न्यूयार्क में दादी (वहीदा रहमान) की बीमारी के बाद डाक्टर उनके बेटे राजन मेहरा और बहू फातिमा को सलाह देता है कि वे दादी को खुश रखने की कोशिश करें, क्योंकि अब उनके दिन गिनती के बचे हैं। दादी इच्छा जाहिर करती हैं कि वह दिल्ली लौट जाएंगी। वह दिल्ली में ही मरना चाहती हैं। बेटा उनके इस फैसले पर नाराजगी जाहिर करता है तो पोता रोशन उन्हें दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी लेता है। भारत और दिल्ली-6 यानी चांदनी चौक पहुंचाने पर रोशन की आंखें फटी रह जाती हैं। दादी के प्रति पड़ोसियों और गली के लोगों के प्रेम, आदर और सेवा भाव को देखकर वह दंग रह जाता है। यहीं उसकी मुलाकात यों कहें कि झड़प बिट्टू (सोनम कपूर) से होती है। बिट्टू मध्यवर्गीय परिवार की बेटी है। वह पिता और परिवार को उचित सम्मान देती है, लेकिन उसके अपने भी सपने हैं। वह कुछ करना चाहती है। अपनी पहचान बनाना चाहती है। एक सामान्य सी कहानी चल रही होती है, जिसमें हम रिश्तों की गर्माहट और चांदनी चौक की गर्मजोशी महसूस करते हैं। शहर में खबर फैली हुई है कि एक काला बंदर रात को उत्पात मचाता है। उस काले बंदर को किसी ने नहीं देखा है, लेकिन रात के अंधेरे में कुछ घटनाएं घटती रहती हैं। न्यूज चैनल ब्रेकिंग न्यूज में काले बंदर से संबंधित कयास लगाते रहते हैं। स्थितियां बदलती हैं और एक खास प्रसंग के बाद कहानी नाटकीय मोड़ लेती हैं। कुछ दिनों पहले तक जिस चांदनी चौक में हिंदू-मुसलमान में फर्क करना मुश्किल था। वहां दंगे शुरू हो जाते हैं और दोनों समुदायों की आक्रामकता से हिंसा भडक़ती है। सामाजिक और धार्मिक तनाव के इस मौहाल के बीच बिट्टू अपने सपनों के लिए दुस्साहसिक कदम उठाती है। रोशन उसे बचाने की कोशिश में दोनों समुदायों का कॉमन शिकार बन जाता है। बाद में भेद खुलता है तो पता चला हे कि काले बंदर का अस्तित्व बाहर नहीं है। वह तो हम सभी के अंदर कोने में बैठा रहता है, जिसे स्वार्थी तत्व अपने फायदे के लिए जगा और उकसा देते हैं।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा अपनी पिछली फिल्म 'रंग दे बसंती' से कई कदम आगे आते हैं। वे सांप्रदायिकता के सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दे को नए नजरिए से पेश करते हैं। 'दिल्ली ६' सामयिक और महत्वपूर्ण फिल्म है। मजेदार तथ्य यह है कि यह मनोरंजन और मधुर संगीत की धुनों से सजा है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की कहानी को प्रसंगों और घटनाओं से जोड़ते हुए चांदनी चौक का सुंदर कोलाज तैयार किया है, जिसमें तमाम किरदार अपनी धडक़नों के साथ मौजूद हैं। 'दिल्ली ६' चांदनी चौक का सजीव चित्रण है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने फिल्म की जरूरत के मुताबिक फिल्मांकन की पारंपरिक शैली से अलग जाकर सफल प्रयोग किए हैं। उन्हें कैमरामैन विनोद प्रधान का सम्यक सहयोग मिला है। ए आर रहमान का संगीत फिल्म के भाव का प्रभाव बढ़ाता है। उन्होंने गीतों को धुनों से तराशा है।
कलाकारों में सोनम कपूर और अभिषेक बच्चन सहज एवं स्वाभाविक हैं। निर्देशक ने उन्हें नाटकीय नहीं होने दिया है। निर्देशक का अंकुश फिल्म के नायक-नायिका को बहकने नहीं देता है। फिल्म की खूबसूरती और ताकत सहयोगी चरित्रों से बढ़ी है। इन छोटे किरदारों को समर्थ कलाकारों ने निभाया है। सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है और जरूरत से एक रत्ती ज्यादा या कम योगदान नहीं किया है। फिल्म के अंत में कसावट थोड़ी कम हुई है। कुछ दृश्य फिल्म के यथार्थ से मेल नहीं खाते। 'दिल्ली ६' हिंदी सिनेमा के बदलती छवि पेश करती है। युवा निर्देशक परंपरा को आत्मसात कर हिंदी फिल्मों की विशेषताओं को अपना कर सार्थक प्रयोग कर रहे हैं। 'दिल्ली ६' इसी दिशा में नयी पहल है।
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