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Tuesday, November 4, 2008

अनुराग कश्‍यप से अंतरंग बातचीत



'सत्या' मैंने रिलीज के चंद दिनों पहले देखी थी। मनोज बाजपेयी के सौजन्य से यह संभव हुआ था। फिल्म देखने के बाद 'संझा जनसता' में मैंने 'सत्या' पर एक लेख लिखा था। मुझे किसी ने बताया था कि फिल्म के लेखक अनुराग कश्यप ने वह लेख राम गोपाल वर्मा को पढ़ कर सुनाया था और फिर उन्होंने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया था। अनुराग कश्यप से मेरी मुलाकात तब तक नहीं हुई थी। 'शूल' की रिलीज के समय मनोज बाजपेयी और अनीस रंजन के साथ मैं लखनऊ और कानपुर जा रहा था। हिंदी फिल्मों और मीडिया ग्रुप के साथ आज फैशन बन चुके मीडिया टाईअप की वह पहली घटना थी। हमलोग दिल्ली में रूके थे। वहां 'शूल' से संबंधित एक प्रेस क्रांफ्रेंस आयोजित किया गया था। वहीं अनुराग कश्यप से पहली मुलाकात हुई और उसके बाद मुलाकात का सिलसिला चलता रहा। परस्पर आदर और प्रेम का भाव हम दोनों के बीच रहा है। एक-दूसरे के काम में बगैर हस्तक्षेप किए हमलोग जरूरत के समय मिलते रहे हैं। धीरे-धीरे अनुराग कश्यप ने अपनी स्पष्टता, पारदर्शिता और कस्बाई होशियारी से फिल्म इंडस्ट्री में खास जगह बना ली है। वह प्रयोगशील युवा पीढ़ी के अगुवा भी बन चुके हैं । समय-समय पर अपनी टिप्पणियों की वजह से फिल्म इंडस्ट्री के नामवर और धुरंधर व्यक्तियों के लिए आंख की किरकिरी बने रहते हैं।
'पहली सीढ़ी' की बातचीत के लिए वे सहज तैयार हो गए। इस बातचीत में प्रश्न पूछने की मुख्य जिम्मेदारी प्रवेश भारद्वाज ने निभायी। इसे दो निर्देशकों की बातचीत भी कहा जा सकता है। मैंने इस इंटरव्यू में मुश्किल से एक चौथाई सवाल पूछे। अनुराग जितना तेज बोलते हैं, उससे ज्यादा तेज सोचते हैं, इसलिए कई बार मूल वाक्य और विचार खत्म किए बिना वे कुछ और बताने लगते हैं। इस अनौपचारिक और मुक्त बातचीत को क्रम देना मुश्किल काम था। क्रम और तारतम्य बिठाने में कुछ शब्द, वाक्य और विचारांश भी काटने पड़े। अमूमन मेरी कोशिश रहती है कि हर बातचीत इंटरव्यू देने वाले की भाषा में जस की तस ही प्रस्तुत हो … उसमें मौलिकता के साथ भिन्नता भी बनी रहती है। मैं इंटरव्यू लेनेवाले की भाषा में बातचीत पेश करने का पक्षधर नहीं हूं। ऐसे इंटरव्यू में एकरसता और दोहराव की संभावना बढ़ जाती है।
बहरहाल, अनुराग कश्यप से हुई बातचीत के कई रोचक पहलू हैं। हम यहां पूरी बातचीत नहीं दे रहे हैं। पूरी बातचीत आप अंतिका प्रकाशन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'मेरी पहली फिल्म' में पढ़ सकेंगे।

- कहां से फिल्म बनाना चाहता हूं की यात्रा शुरू हुई?
0
1993 में दिल्ली के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से यह यात्रा शुरू होती है। उसमें मैंने विटोरियो डिसिका जैसे फिल्मकारों की फिल्में देखी थीं। चिल्ड्रेन्स आर वाचिंग,बाइसिकल थीफ और दूसरी कई फिल्में दिखाई गई थीं। उनका रेट्रोस्पेक्टिव रखा गया था। उन फिल्मों ने बहुत प्रभावित किया था। उसी साल 'मैच फैक्ट्री गर्ल' भी आई थी। इन फिल्मों को देखने का बहुत असर हुआ था।
-दिल्ली में आप क्या कर रहे थे?0 मैं जन नाटय मंच में था। स्ट्रीट थिएटर करता था। कंफ्यूज था उस समय… हद से ज्यादा कंफ्यूज था। गंजेरी था और मुझे पता नहीं था कि क्या करना है। कह लें कि दिशाहीन था। मुझे लगा कि फिल्म में ही कुछ करना चाहिए। जूलोजी की पढ़ाई कर रहा था। जो प्लान थे, उन्हें थर्ड इयर तक आते-आते धरासायी कर चुका था। पिताजी से बात हुई। उनसे मैंने कहा कि बंबई जाकर कुछ करना चाहता हूं। पिता जी भी बेहद नाराज… वे बोले बंबई जाकर क्या करोगे? मैं बहाना बना कर, लड़ाई-झगड़ा कर… घर से पांच हजार रूपया लेकर मुंबई भाग कर आ गया। यह सोच रखा था कि फिल्म में ही कुछ करना है, लेकिन क्या करना है? कुछ पता नहीं था कि क्या करना है? पिक्चर कैसे बनती है, क्या प्रोसेस है, कुछ नहीं मालूम था। सिर्फ डिसिका देखा था। उसके अलावा मेरा एक्सपोजर नहीं था। उसके पहले सिनेमा का मेरा एक्सपोजर बहुत लिमिटेड था। बचपन में जो था, हमारे कल्ब में हफ्ते में दो बार फिल्में दिखाते थे। छह साल की उम्र तक वह देखता था भाग-भागकर।
- कौन सा क्लब है?
0 मैं ओबरा में रहता था, ओबरा है यू पी में रेणूपुर में… रेणुसागर तालाब के पास, बिजली का जो गढ़ है। वहां मेरा बचपन गुजरा। वहां पर एक थिएटर था। वह भी मेरे सामने बना था। चलचित्र… ग़र्वमेंट का सरकारी थिएटर चालू हुआ था चलचित्र। उसके अलावा क्लब में ओपन एयर में फिल्में दिखाते थे। मैं बचपन में वहां जाकर 'आंधी' और 'कोरा कागज' देखता था। चार-पांच साल की उम्र रही होगी। मुझे खुद नहीं मालूम क्यों देखता था? मैं आंख खोले, मुंह बाए चुपचाप देखता रहता था। पिता जी भगाते थे और बोलते थे कि क्या है? यहां क्यों आते हो ? ये बड़ों की पिक्चर है। लेकिन मैं देखता रहा। क्यों, यह मेरी समझ में नहीं आता था। लेकिन उन फिल्मों की इमेजेज आज भी दिमाग में है। उसके बाद फिल्में देखने का सिलसिला टूट गया। मैं जब हॉस्टल में पहुंचा तो शनिवार को एक फिल्म दिखाते थे। कोई पुरानी हिंदी फिल्म कभी-कभार। ज्यादातर 'दो बदन' दिखाया करते थे। स्कूल में लगभग दस बार 'दो बदन' दिखाई है। स्क्रीन पर प्रोजेक्ट कर के दिखाते थे। प्रिंसिपल की फेवरिट फिल्म थी 'दो बदन' … वही दिखाते थे।
-मुंबई के आरंभिक जीवन के बारे में बताएं,कैसे शुरूआत हुई?
0 सिंधिया स्कूल ग्वालियर में था। उसके पहले देहरादून में पढ़ा। बिखरी हुई सी जर्नी रही है। बीच में बारह-तेरह साल फिल्मों से नाता टूट गया। फिर दिल्ली आए तो बदले की भावना के साथ फिल्म देखना चालू किया। वो भी मल्कागंज इलाके में… यूनिवर्सिटी के आस-पास के अंबा, कल्पना, बत्रा… वहां हिंदी फिल्में जो लगती थीं, बस वही देख पाता था। फिर एक अनटचेबल देखी थी तो इंग्लिश फिल्मों का शौक चर्राया तो 'डाय हार्ड' आदि देखी। तीन साल वैसी फिल्में देखीं। फिर 1993 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सिनेमा से सही परिचय हुआ। सिनेमा एक्सपोजर वहां से चालू हुआ। लेकिन सिनेमा में एक्सेस नहीं था । उसके बाद मैं मुंबई आ गया । मुंबई में मेरी असली जर्नी शुरू हुई है। बाकी सब करता रहता था। थिएटर करता था , एक्टिंग करता था… समझ में नहीं आ रहा था कि एक्टिंग कर रहा हूं कि क्या कर रहा हूं। कंफ्यूजन तो था ही, दिशाहीन भी था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि किसके पास जाऊं? किसी-किसी के पास काम कर रहा था। सडक़ पर रह रहा था। मैंने एक दिन फ्रस्ट्रेशन में नाटक लिखा 'मैं … तो वह नाटक गोविंद जी निहलानी और सईद साहब मिर्जा जैसे लोगों को पसंद आया। उन सब से मिला लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मुझे लगा कि गोविंद जी मुझे बहुत ज्यादा क्रेडिट दे रहे हैं। मैंने सोचा कि मुझे मालूम है मेरी कितनी औकात और काबिलियत है और हम में कितनी समझ है। उन्होंने मुझे इब्सन का नाटक थमा दिया। उन्होंने मुझे काफ्का का ट्रायल पकड़ा दिया। वे सीरिज कर रहे थे। इसको तुम एडैप्ट करो। तुम कर सकते हो। मैंने पढ़ा, ट्रायल पढ़ा तो और कंफ्यूज हो गया। नहीं ये कैसे बन सकती है फिल्म। इस पर तो एनीमेशन फिल्म बन सकती है। मैंने कहा कि इस पर फिल्म नहीं बन सकती। उन्होंने कहा तुम सोचो। मैं इतना ज्यादा ग्रंथियों का शिकार हो गया कि खोल में चला गया। गोवंद जी के फोन आते थे केअर ऑफ नंबर पर… उनका फोन लेना बंद कर दिया। उनसे मिलना बंद कर दिया। उस समय क्या हुआ कि मैं एक आदमी से बाइचांस मिला,जिसका नाम था पंकज टिटोरिया… वे थिएटर कर रहे थे। पंकज टिटोरिया लेकर गया एक आदमी के पास उनका नाम था शिवम नायर। वहां से मेरी एक अलग जर्नी शुरू हुई। शिवम नायर के यहां मैं जिस दिन मिलने के लिए गया तो वहां कोई आदमी 'टैक्सी ड्राइवर' टेप लेकर आया था। वह बहुत एक्साइटेड था। गंदा वीसीआर था, म्युटलेटेड टेप था। मैंने वहां पर मार्टिन स्कारसिस की 'टैक्सी ड्रायवर' देखी… क़ुछ अजीब सा फैसीनेशन हो गया 'टैक्सी ड्राइवर' से। उनके यहां जाकर मैंने बोला कि मुझे लिखना है। दो-तीन दिन मैं कोने में बैठा रहता था और उनकी बातें सुनता था। श्रीराम राघवन, श्रीधर राघवन, शिव सुब्रमण्यम सब थे। शिवम चुप रहता था, श्रीराम जब बोलना चालू करता था तो अटक जाता था… श्रीराम को कुछ प्रोबलम था बोलने का। श्रीधर लगातार बोलता था। मैं सुनने लगा, मैं एक्साइटेड था श्रीधर राघवन से। उसकी एनर्जी से। श्रीधर जो-जो नाम लेता था मैं चुपचाप लिख लेता था। फिर मैं किताबे ढूंढने जाता था। मुझे मिलती नहीं थी। एक दिन मैंने श्रीधर से पूछा कि सर आप ये किताबें कहां से लेकर आते हैं? वह मुझे सांताक्रुज स्टेशन लेकर गया। सांताक्रुज इस्ट में स्टेशन के पास किताबों की दुकानें हैं।। वहीं एक किताब के एक लेखक के जरिए दूसरे लेखक को पाया। फिर तीसरे लेखक को खोजा। जेम्स एम केम को पढऩे के बाद मैं थोड़ा बेचैन होने लगा। यहां पर मुझे एक काम मिल गया। उन्होंने मुझे बोला कि एक फिल्म लिखनी है नागराजन के ऊपर। डाउन साउथ जो है, वो बंगलोर के थे। मैंने लिखना चालू किया। मैं स्ट्रकचरली अपने-आप ऑटोमेटिक हिलने लग गया। फिर वो सारा सब कुछ … ओमा स्वरूप डायरेक्ट करने वाले थे। उनको बहुत अच्छा लगा।मैंने कहा नागराजन बनाते हैं। मेरे मन में था कि मैंने स्क्रिप्ट तो लिख ली, लेकिन फिल्म कब बनेगी? क्योंकि उसके बनने से पहले एक और फिल्म बननी थी 'ऑटो शंकर'। मैंने कहा कि उसे बनाओ। उसमें वे लोग स्क्रिप्ट को शॉर्ट आउट नहीं कर पा रहे थे। बाकी शूटिंग डेट तय थी। मैं जब शूटिंग के दो दिन पहले ऑफिस में पहुंचा तो बहस चल रही थी कि शूटिंग रोक दें। स्क्रिप्ट नहीं थी। मैंने सोचा कि ये शूटिंग रूक गई तो मेरी नागराजन की शूटिंग रूक जाएगी। मैंने कहा कि सर ऐसा क्या है? इसको मत रोको या तो फिर नागराजन बना लो। उन्हें लगा कि इक्कीस साल का लौंडा है। चाहता है कि डेस्परेशन में फिल्म बन जाए। उन्होंने समझाया कि नहीं यार ऐसा नहीं है। ऐसे नहीं होता। पहले हमको ऑटो शंकर बनानी है। सब कुछ क्लियर है। मैंने कहा प्रोबलम क्या है। उन्होंने कहा स्क्रिप्ट नहीं वर्क कर रही है। मैंने कहा मैं पढ़ता हूं। स्क्रिप्ट मैं करूं? सब हैरानी से मुझे देखने लगे। सब ने शिव से कहा कि ट्राय कर लेने दो क्या जाता है? उन्होंने हिदायत दी कि लेकिन परसों शूटिंग है। मैंने कहा सर अभी करता हूं रात को और सुबह होने तक में आप को स्क्रिप्ट दे दूंगा। मैंने जोश में बोल दिया। उस समय एनर्जी बहुत थी। मैंने रातो-रात बैठकर स्क्रिप्ट लिखी और ऑफिस में स्क्रिप्ट रख कर मैं सो गया। सुबह जब उठा, डेढ़ बजे दिन में नींद खुली तो श्रीराम और बाकी सब लोग पढ़ रहे थे। मैंने रातो-रात लिखी थी स्क्रिप्ट। सब लोग पढ़ रहे थे। एक व्यू फॉर्म होता है न? सब के अंदर कुछ हुआ। वे एक नई नजर से मुझे देख रहे थे। तो मुझे कंप्लीट एक्सेस मिल गया। शूटिंग शुरू हुई। उस स्क्रिप्ट के हिसाब से शूट किया गया। मैंने वैसे ही लिख दी थी। शिव सुव्रमण्यम ने बोला कि स्क्रिप्ट अनुराग ने लिखी है तो उसे क्रेडिट तो मिलना चाहिए। उन लोगों ने मुझे एक तरह से विकसित किया। उसके बाद शिव सुव्रमण्यम, शिवम नायर, श्रीराम राघवन इन लोगों ने मुझे बढ़ाया। हमको वीसीआर और टीवी का एक्सेस मिल गया। मैं आकर पिक्चर देख सकता था। मैं टेप लाकर देखना चालू किया। नागराजन बन नहीं पा रही थी। मनोज बाजपेयी ने उसी दौरान 'दौड़' की । 'दौड़' में राम गोपाल वर्मा ने उसको देखा और उनके दिमाग में एक आयडिया आया। उन्होंने उसको कहा कि तुम्हारे साथ एक फिल्म बनानी है। एक नया रायटर लाकर दो। मनोज ने कहा कि एक आदमी फिट है, वो है अनुराग। उसने मुझे कहा कि राम गोपाल वर्मा मिलना चाहते हैं। मैंने कहा - हां? मैं तो चौंक गया। दो-तीन दिन पहले श्रीराम राघवन और हमलोग 'रंगीला' साथ में देख कर आए थे गोरेगांव के किसी थिएटर में। हमने कहा चलो। फिर वहां से 'सत्या' शुरू हुई। मैंने बहुत सारे चीजें और बातें यहां छोड़ दी हैं, जो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने कुछ कंट्रीब्यूट किया। यही मेरी मुख्य जर्नी है। उसके अलावा और सारी चीजें थीं। महेश भट्ट का भी प्रसंग हैï,लेकिन वह मेरे लिए इतना आवश्यक नहीं है।
- वो क्या चीजें और बातें हैं?
0 मैंने लिखना चालू किया था। मैंने पांच लिखना शुरू किया था। तब पांच का नाम पांच नहीं था। मिराज नाम से मैंने स्क्रिप्ट चालू की थी। 1995 में 'सत्या' के पहले नागराजन और ऑटो नारायण के फेज में। मैंने एक फिल्म लिखी थी 'मिराज'। फिल्म क्या लिखी थी, चालीस पन्ने लिखे थे। मैंने ल्यूक केमी को जाकर सुनाया। ल्यूक केमी एक्टर था। उसको मैंने विक्रम कपाडिय़ा के एक नाटक में देखा था। एक फिल्म थी 'फन'… जो आज है मेरे पास। मैंने उसे बहुत सालों तक ढूंढा । क्या था इस फिल्म में जिसने मुझे प्रेरित किया मुझे? 'फन' में एक स्ट्रकचरिंग थी। जिसको आप पांच के पास जाओगे तो एक जैसी दिखेगी। 'फन' में कुछ ऐसा था। मैंने जब ट्रेस करना चालू किया था कि कहां है? हमको एक पैटर्न दिखा था 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' में। मेरी खुद की फिल्में हैं, 'पांच' में। और 'ऑटो शंकर' जो मैंने ड्राफ्ट लिखा था। एक फोर्मुलेशन था उसमें। तीनों में एक सिमलर फार्मूला था। मैं एनालाइज कर सकता हूं क्योंकि मैंने खुद किया है।

- अनुराग कश्यप का हस्ताक्षर यहां से गढ़ा गया?
0 वहां से गढ़ा गया। वहां से मेरी नयी जर्नी आरंभ हुई। यह रियलाइजेशन हुआ कि मेरे तीनों लेखन में एक समानता है। एक पैटर्न है।

- जब आप के अंदर का लेखक जागा तो वे क्या एहसास थे, जिनसे लगा कि आप सही दिशा में हैं?
0 अंदर से एहसास हुआ। जब पहली बार लिखा था 'मिराज' तो उस समय फर्स्ट हॉफ ही लिखा था। कोई मर्डर और किलिंग नहीं था। एक जर्नी थी एक आदमी की, जिसके पास पैसा नहीं है। सडक़ छाप है। गांजा के चक्कर में घूमता रहता है। बस वाला सीन लिखा था। सारी चीजें लिखी थी। कई कैरेक्टर थे। मैं उस समय कुछ उस तरह की जिंदगी जी रहा था।

- कहीं कुछ ऐसा तो नहीं था कि मेरी आवाज कुछ अलग हो, इसलिए सचेत रूप से कुछ अलग करने की कोशिश रही हो?0 नहीं, जो चीज थी वो ये थी कि जब मैंने 'टैक्सी ड्रायवर' देखी,जब मैंने 'फन' देखी, जब डिसिका की फिल्में देखी तो मुझे आयडेंटीफिकेशन मिला अंदर से। बाकी हिंदी फिल्में जब देखता था तो मुझे लगता था कि कोई ऐसी कहानी कही जा रही है,जो किसी और के बारे में है। शायद सिनेमा यही होता है। डिसिका ने, 'फन' ने, स्कॉरसेस ने एक चीज मेरे साथ की वो यह कि सिनेमा मेरे बारे में भी है। मुझे जो कांफीडेंस आया। न्वॉयर से जो मेरा आकर्षण हुआ वो इसलिए कि वह मेरे बारे में भी है। लोगों के हिसाब से न्वॉयर बहुत कुछ होता होगा। मेरे लिए मेरा अपना खुद का मिनिंग है। मेरे लिए वह एक ऐसा माहौल है। मेरे लिए वह अंडरडॉग की कहानी है। मेरे लिए वहे गोल है। जिंदगी में हम सडक़ पर आते-जाते देखते हैं लेकिन गौर नहीं करते हैं। सब की अपनी-अपनी कहानियां है। मुझे लगा कि सिनेमा उसके बारे में भी हो सकता है। जब यह लगा मुझे तो मेरे अंदर कांफीडेंस आ गया कि हां यही मेरा सिनेमा है। मुझे यही कहना है। मुझे यही करना है। फिर जो मैं खुद को असहज महसूस करता था। उस एहसास के बाद वह खत्म हो गया। मुझे पहले लगता था कि मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। मुझे लगता था कि मैं जो सोचता हूं वो बेवकूफी है, अगर किसी को बोलूं तो वह हंस न पड़े। मुझे उर्दू नहीं आती थी। हिंदी सिनेमा लेखन वास्तव में उर्दू है। मेरी हिंदी अच्छी थी, तब जब मैं लिखता था। लेकिन मैं बोल नहीं पाता था।
- बोलते अंग्रेजी में थे?
0 नहीं अंग्रेजी भी नहीं बोलता था। खिचड़ी भाषा थी। मतलब, आप बोर्डिंग स्कूल में पढ़े हुए हैं, जहां पर सब अंग्रेजी बोलते हैं और आपको अंग्रेजी नहीं आती है। आप हिंदी बोलते हैं। आपकी खासियत क्या है कि आप हिंदी में निबंध प्रतियोगिता जीत जाते हैं। नौवीं में आप बारहवीं के लडक़े को हिंदी में पछाड़ देते हो। हिंदी में आपका कोई सानी नहीं है और जब हिस्ट्री में आप लिखते हैं तो अपनी कहानियां बना-बनाकर लिखते हैं। टीचर पास कर देता है, तब पता चलता है कि टीचर कितना उल्लू का पट्ठा है। मेरा खेल सिर्फ वहां था। मैं अच्छा लिखता था, लेकिन मैं पब्लिक स्पीकर नहीं था।

- एक लडका अनुराग कश्यप… उसमें अपना कंफीडेंस नहीं था। उस लडक़े में आत्मविश्वास कैसे आया? उसे यहां तक लाने की यात्रा किस तरह से आरंभ हुई?0 उसके लिए एक चीज बताना चाहूंगा । बचपन से मुझे कहानियां बनाने की आदत रही है। मेरे भाई-बहनों को ज्यादा याद है। मुझ से ज्यादा याद है। वे बताते हैं कि आप हर फिल्म की कहानी जानते थे। सरिता नाम की एक पत्रिका आती है। सरिता में चंचल छाया छपता है। चंचल छाया में एक लिस्ट आती थी, जिसमें सर्वोत्तम आदि श्रेणियों में फिल्मों की सूची होती थी। मेरी एक आदत थी कि मैं फिल्म के नाम से कहानियां बनाता था और अपने भाइयों-बहनों को सुनाता था। ये पिक्चर मैंने देखी है, इसमें ऐसा होता है, ऐसा होता है, इससे उनको लगता था कि मेरा भाई कितना बड़ा ज्ञानी है। सारी फिल्में देखता है। देखता कुछ नहीं था मैं। टीवी के अलावा कुछ नहीं था। एक वीडियो थिएटर था। उसमें 'नदिया के पार' ही देखता था। वहां से कहानियां बनाने की आदत पड़ी। मनोहर कहानियां, सत्यकथा जैसी पत्रिकाएं मैं छुप-छुप के पढ़ता था। यह सब था। अंदर से एक एक्साइटमेंट था।
- अपराध की कहानियां पढ़ते थे। आप ने जिन पत्रिकाओं के नाम लिए, उनसे लगता है कि क्राइम और सेक्स की कहानियों से आप का लगाव थ। उधर झुकाव था।0 हां क्राइम के साथ था। मैं आ रहा हूं उस बात पर। मेरा जर्नी का जो सबसे बड़ा महत्वपूर्ण पाइंट है। मेरी जिंदगी में सबसे बड़ी चीज जो रही, वह आज समझ में आता है कि क्यों है? मेरे अंदर काम्पलेक्स कब आया था? सीनियर स्कूल से पहले छुट्टियों में गांव जाता था या लखनऊ जाता था या अपने ननिहाल बलिया जाता था तो वहां पर एक किताब की दुकान थी मैं वहां पर जाकर बैठता था। मैं वहां वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, रानू आदि के हिंदी उपन्यास पढ़ता था। पिता जी को देखता था तो हार्डी ब्वॉयज उठा लेता था। उन्हें लगता था कि बेटा इंग्लिश पढ़ रहा है। उनके इधर-उधर होते ही उसे बंद कर सीधा वहां पहुंच जाता था। मेरी एक मौसी की लडक़ी थी हैदराबाद की,जो इस तरह के उपन्यास पढ़ती थी। वह मुझे पढऩे के लिए देती थी। बेबी दीदी। उन उपन्यासों को मैं पढ़ता था और कोने में घुसा रहता था। पढऩे का शौक था, लेकिन मेरे अंदर कहीं अपराध बोध पलने लगा। छुट्टियों के बाद जब स्कूल पहुंचा तो स्कूल की मैग्जीन देख कर वहां लिखने का मन किया। स्कूल में साहित्य सभा नाम की सोसायटी थी। मैं सोसायटी का मेम्बर बनने के लिए गया। मैंने कहानी लिखी। मैंने सातवीं क्लास में कहानी लिखी। लडक़ा है जो उत्पीड़ित ग्रंथि में जी रहा है और एक लड़का उसको बहुत तंग कर रहा है। कहानी का नाम था बिग शिफ्ट। जो मैं फील करता था स्कूल में,वही मैंने लिख दिया था। सिंधिया स्कूल बड़े लोगों का स्कूल था। जहां पर मैं एक ऐसा स्टूडेंट था जो दिवाली के दिन भी जब सभी रंगीन कपड़े पहनते थे तो मैं स्कूल का ड्रेस पहनता था। मेरे पास स्कूल के दिए हुए बाटा के जूते होते थे। एकमे का जूता था ब्लैक कलर का। स्कूल का जो सबसे गरीब तबका हो सकता था, मैं उसमें था। लिखा रहता था चेहरे पर। घड़ी तक नहीं थी। तो बहुत कॉम्पलेक्स फील करता था। सब अंग्रेजी में बात करते थे। मैं तड़ातड़ हिंदी में बात करता था। पिताजी कहते थे पढ़ाई करनी है तो उन्होंने सिंधिया स्कूल भेज दिया। उस कॉम्पलेक्स पर मैंने एक कहानी लिखी थी। मेरे एक टीचर थे पंडित आत्माराम शर्मा। उन्होंने मुझ से पूछा कि बेटा कहानी कहां से चुराई है? मैंने कहा कि कहीं से नहीं चुराई है। उन्होंने मुझे इतना लताड़ा। सच्चे नहीं हो। तुम लोग सच्चा होना सीखो। उन्होंने अंग्रेजी में जेन्युन शब्द कहा था। मुझे जेन्युन का मतलब नहीं मालूम था। उस रात डिक्शनरी में जेन्युन मतलब ढूंढ़ा। फिर मैंने कविता लिखी। मुझे अभी भी याद है। बहुत ही अजीब सी कविता थी। एक होता है न शायरी करें । कविता में एक लडक़ा आत्महत्या करना चाहता है। मैंने ऐसी कविता लिख दी आठवीं कक्षा में। एक लडक़ा जो आत्महत्या करना चाहता है। टीचर उसे देख के परेशान हो गए। पिताजी को फोन चला गया। यह लड़का ऐसा क्यों लिख रहा है। मैंने कहा कि मैंने लिखी है। शायरी की ऐसी फीलिंग आती है मेरे अंदर, ये लोग हमें ऐसा फील कराते हैं और मैं लिखना चाहता हूं। तो उन्होंने मेरा ट्रीटमेंट चालू कर दिया। काउंसलिंग करना चालू कर दिया। मैं कह रहा था मुझे लिखना है। पिताजी परेशान हो गए। प्रिंसिपल ने स्पेशल अटेंशन देना शुरू कर दिया। और फिर मेरा लिखा उन्होंने कुछ छापा ही नहीं। उन्होंने मुझे बोला कि तुम्हें लिखना नहीं आता है। गुस्से में मैंने नौवीं कक्षा में निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। वहां लगातार जीतता था। उन्होंने कहा कि किसी भी टॉपिक को लिखो। मैंने बाद में जब ध्यान दिया तो समझ में आया कि मेरी सोचने की प्रक्रिया चलती रहती थी। चीजें पढऩे पर अंदर जमा हो जाती थीं, लेकिन याद नहीं रहता था कि कहां पढ़ी थी, कब पढ़ी थी? 1982 में एशियाड हुआ था। उसके ऊपर एक निबंध प्रतियोगिता थी। मैंने इतना लंबा-चौड़ा लिख दिया। पता नहीं कहां से क्या-क्या लिख दिया? कहीं न कहीं जानकारी रहती थी, वह सब स्टोर हो जाता है, फिर एक बार निकलता है तो उमड़ कर निकलता था। जैसे आप ने उल्टी कर दी है। उस तरह की लेखन प्रक्रिया का एहसास हुआ। इतना कॉम्पलेक्स आ गया था अंदर… टीचरों ने बोल-बोल कर भर दिया था कि तुम्हें नहीं लिखना चाहिए। तुम क्या लिखते हो सारा सब कुछ। इस माहौल में आप अलग हो जाते हैं। इसके अलावा भी आप हंसी-मजाक के पात्र बन जाते हैं सब लोगों के लिए, इसको इंग्लिश नहीं आती। पिताजी ने नौवीं कक्षा में पहली बार टाइटन की घड़ी दी। उस समय टाइटन नई-नई आई थी। स्कूल में सब पूछते किसकी घड़ी है? मैं कहता था टाइटन। वे लोग चिढ़ाते थे टिटन बोलो तुम तो। ये सारी चीजें घर कर गई थीं। इन वजहों से मैं मिलता नहीं था किसी से और लाइब्रेरी में घुसा रहता था। सीनियर स्कूल में सबसे बड़ी चीज थी लाइब्रेरी। सीनियर स्कूल से अच्छी लाइब्रेरी मैंने कहीं नहीं देखी। मैंने उस समय लाइब्रेरी में छुप-छुप कर लोगों से बचने के लिए … मैंने मानसरोवर से शुरूआत की थी। सबसे आसान वही होता है। छोटी-छोटी कहानियां … पूरा मानसरोवर पढ़ा। फिर जीप में सवार इल्लियां पढ़ी। वहां से एक नयी जर्नी चालू हुई। मेरे लाइब्रेरी से अधिक प्रिय कोई जगह ही नहीं थी। फिर मैंने पल्प लिटरेचर पढऩा आरंभ किया। फिर यहां पहुंचा और मैंने डिस्कवर करना चालू किया। कैसे गुलशन नंदा, कर्नल रणजीत आदि कहानियां चुराया करते थे। कैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक चुराया करते थे। मैंने उनकी कहानियां पढ़ रखी थी। मैंने बाद में ओरिजनल पढऩा चालू किया। पता चलना चालू हो गया कि सब चोरी से भरे परे हैं और लोग मुझे बोलते हैं कि मैं जेन्युन नहीं हूं।
- वह लडक़ा है, जो कहीं अपना जगह बनाना चाहता था या प्रोग्रेस करना चाहता था। उसके अंदर वह चाहत अभी तक है या… ?0 है, कहीं न कहीं है।
- आपने पहली एक स्क्रिप्ट लिखी और फिर तय किया कि मैं इसे डायरेक्ट करूंगा?
0 वो एक प्रोसेस में इवाल्व हुआ। मतलब स्क्रिप्ट कुछ छह साल में इवॉल्व हुआ है। आयडिया कुछ चेंज हुआ है। मतलब पांच वही फिल्म नहीं है, जो मैं बनाने निकला था, जब लिखना चालू किया था। वह अधूरी फिल्म थी, जिसे मैं कभी पूरा नहीं कर पाया। जब मैंने स्क्रिप्ट पूरी कर ली और लोगों के पास ले गया तो लोगों ने कहा यार ऐसी फिल्म बनेगी नहीं। मैंने बहुत कोशिश की। मैंने कहा भांड़ में जाए। नहीं बनेगी तो मैं भी कुछ और नहीं बनाऊंगा। बनाऊंगा तो यही बनाऊंगा। पहली बार जब मेरे हाथ में कैमरा दिया गया 'सत्या' के टाइम पर। राम गोपाल वर्मा ने मुझे कैमरा दिया और बोला कि सत्या जब बंबई आता है तो वह हिस्सा मुंबई के माहौल में लो। मैं एक्साइटमेंट में था कि मैं डायरेक्टर हो गया। मैं वहां जाकर बोल रहा हूं कि अच्छा क्या करना है। एक्टर कैमरामैन को बता रहा है कि ये शॉट लो। वो कर रहा है। मेरे दिमाग में आयडिया आ रहा है, लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो रही है एक्सप्रेस करने की। मैं एक्सप्रेस कर नहीं पा रहा था। फिर मैंने कहा ये शॉट लेते हैं। ऐसे लेते हैं-वैसे लेते हैं। जब सारा टेप गया राम गोपाल वर्मा के सामने। राम गोपाल वर्मा ने सुनाना चालू किया। क्या बकबास है? यह किसने शूट किया है? मैंने तुम्हें शूट करने के लिए बोला था। मैंने कहा हां सर,लेकिन वो मुझे करने नहीं दे रहे थे। ये था और वो था… इस तरह तुम पिक्चर बनाओगे? तुम क्या करोगे? उन्होंने कहा कि करने नहीं दे रहे थे क्या होता है? उन्होंने बताया कि मैंने ऐसा कुछ बोला था। मैंने बोलना चालू किया। मैंने बताया कि मैंने सोचा था ये करेंगे-वो करेंगे। उन्होंने पूछा कि जो तुमने सोचा था वो क्यों नहीं हुआ। मैंने कहा कि सब लोग बड़े हैं। मुझ से ज्यादा जानते हैं। उन्होंने कहा कि कोई ज्यादा नहीं जानता। वहां से मुझे पहली बार थोड़ा सा कांफीडेंस आया। फिर जो कैमरामैन था जैरी हूपर, उसके साथ मैं निकल जाया करता था। फिर जो सारा आयडिया आ जाए, ये जो गणपति हुआ, मैंने कहा कैमरा लेकर निकलते हैं। गणपति शूट करते हैं। उस समय बोला गया हमें कि पागल हो गए हो, ऐसा कैसे हो जाएगा। मैंने बोला कि मैं कर के लाता हूं। मैं और जैरी कैमरा लेकर गए। कोई नहीं था हमारे साथ। गणपति हमने असली शूट किया। पूरा माहौल शूट किया। धीरे-धीरे मुझे समझ में आ रहा था। मुझे लग रहा था कि मेरे अंदर कोई प्रोबलम नहीं है। मैं बोल सकता हूं। कैमरामैन की तरह भी बोल सकता हूं। पहले लेखक होने का विश्वास जगा था। मैंने कहा जो अंदर फील करता हूं वो बोलना चाहिए। तो मैंने कहानी डेवलप करनी चालू की थी 'शूल' की। कहानी मुझे सुनाई थी राम गोपाल वर्मा ने कि एक कस्टम ऑफिसर ने किस तरह अमिताभ बच्चन को भी नहीं छोड़ा। वह अपनी ड्यूटी कर रहा था। वो जो एटीट्यूटड था उसको लेकर मैंने बनारस पर आधारित बीएचयू को लेकर उस माहौल की कहानी लिखी थी 'शूल' की। पहले मुझे बताया गया कि तुम्हें डायरेक्ट करना है। फिर वहां कुछ हुआ। फिल्म मुझे अपनी तरह से बनानी थी। फिर सेकेंड हाफ में कुछ चेंज करने का सुझाव आया। तो मैंने कहा लिखूंगा नहीं,लेकिन मैं साथ में रहूंगा।। मैं साथ में रहा। 'शूल' आई-गई खत्म हो गई। 'कौन' में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। जो स्क्रिप्ट मैंने लिखी थी, वो बनी नहीं। जो बनी थी, वो उसी में से था जो मैंने लिखी थी। कुछ इम्प्रूवाइजेशन भी थे। लेकिन क्या था कि मैंने राम गोपाल वर्मा को स्क्रिप्ट दिए, उसके छह पन्ने शुरू के पता नहीं कहा चले गए? उन्होंने सातवें से पढ़ी और फिल्म सातवें से शुरू हुई। मेरे लिए वो पहले छह पन्ने महत्वपूर्ण थे। और फिर उन्होंने पूरा पढ़ा नहीं, एक पाइंट तक इंट्रेस्ट था उसके बाद उन्होंने खुद ही इवॉल्व कर लिया। तो मैंने जो लिखा था। मुझे उस स्क्रिप्ट के साथ बहुत लगाव था। ये दो-तीन अनुभव हुए। फिर मिशन कश्मीर हुआ। जहां से मैं छोडक़र आ गया। एक होता है न कि कहानी आपने ये कही, जिससे मैं एक्साइटेड हो गया, मैं कश्मीर गया, मैंने रिसर्च की। मैंने काम किया, हमने फिल्म बनाई। ऑपरेशन टोपाज क्या था जिया उल हक का, उसे ढूंढ कर ले आए। उसको लेकर मिशन कश्मीर बनाया। जब पिक्चर बननी शुरू हुई तो पहली चीज आपने वही निकाल दिया जो मिशन कश्मीर था। जो कारण बताए गए थे वो अलग थे। हमें फ्री में रहने को जगह मिल रही थी श्रीनगर में। हमें फारूख अबदुल्ला मदद कर रहे थे। पुलिस वाले मदद कर रहे थे। वहां के एसटीएफ वाले मदद कर रहे थे। हमने बोला ये सब क्यों डाल रहे हो? मेरा लिख हटा दिया गया बिना किसी कारण के। तो मैं बहुत अपसेट था, विधु विनोद चोपड़ा के एटीट्यूटड से। ये सारी चीजें जमा होती गईं। फिर मैंने फैसला लिया कि मैं खुद डायरेक्ट करूंगा।

- ये लगभग कुछ वैसी ही बात है, जैसे टीचर आपको जेन्युन होना सीखा रहे थे। हम थोड़ा आगे बढ़ें। आप के पास चालीस पेज की एक स्क्रिप्ट थी। उसके बाद आप ने तय किया कि मैं फिल्म बनाऊंगा। यह चाहे अपने-आप में एक लड़ाई थी। चाहे पूरा अपना इवोल्यूशन था। फिर भी फिल्म डायरेक्ट करना एक पहला कदम होता है। उस दिशा में कदम उठा तो फिर आपने किया क्या? अनुराग कश्यप जो खुद को एसर्ट नहीं कर पा रहा था,जब वो कहता है कि मैं डायरेक्ट हूं तो क्या बात हुई थी? क्यों कि पहले अपने-आप को आप डायरेक्टर नहीं मान पाए थे। फिर आप ने खुद को डायरेक्टर माना। अब बात ये है कि सिनेमा में किसी का धन लगता है। कुछ लोग जोड़े जाते हैं। आप में उनका विश्वास होना चाहिए। इस संबंध में बताएं?0 बहुत इंटरनल जर्नी रही है। मेरी बहुत सारी चीजें रही हैं, जो मेरे मोहभंग की वजह से आई हैं। अब जैसे कि जिस तरह के मेरे पिताजी थे, जब मैं बड़ा हो रहा था। तो मैं कुछ आदर्शवादी टाइप का था। वो अंदर आदर्शवाद है सिनेमा को लेकर । मैं जिंदगी कैसे जीता हूं या बाकी क्या करता हूं? उस पर कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन सिनेमा को लेकर, लिटरेचर को लेकर के, जो चीजें पसंद हैं उनको लेकर के वह आइडिसलिज्म है। वो कहीं न कहीं है अभी भी है। थोड़ा -बहुत है अभी भी, कुछ साल में हो सकता है चला जाए। लेकिन अभी तक तो है। उस समय ये सारे मोहभंग चल रहे थे,लेकिन मुझे जो चीज ड्राइव करती थी, वो ये है कि मुझे अपने तरह से काम करना है। और लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि मैं किस तरह का काम करना चाहता हूं। वह ड्राइव आज भी है। मुझे लगता है लोग अभी भी नहीं समझ पा रह हैं। फिल्में रूकी हुई हैं। फिल्में बाहर नहीं आईं। मुझे लगता है कि क्यों नहीं मुझे एक्सप्रेस करने दिया जा रहा है। देखता हूं तो लगता है कि जब-जब मेरी आवाज दबाई गई है, जब-जब ठुकराया गया है तब मैंने और ज्यादा आतरिक दृढ़ता के साथ काम किया है। मेरी शुरूआत हुई 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' से। 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' मैंने निराशा में बनायी। गुस्सा भी था कि यार मुझे कोई बनाने नहीं दे रहा है। एक बात मुझे समझ में आ गई थी कि यहां का जो निर्माता है, जो पैसे वाला आदमी है, जो पूंजीवादी है, उसको लगता है कि निर्देशक का काम है कैमरा लगाना। बाकी कोई इसका काम नहीं है। तो मैंने इसी चीज के लिए तय किया कि मैं कैमरा लगा कर दिखाऊंगा। मेरे पास कोई ज्ञान नहीं था। उस समय सबसे बड़ी मदद मिली स्टार बेस्ट सेलर से। स्टार टीवी पर तब यह सीरिज चल रहा था। उस समय मेरा भाई अभिनव 'डर' नाम का सीरियल बना रहा था। उसमें उसने मेरे नाम का इस्तेमाल किया था। जब उसने मेरा नाम का इस्तेमाल किया तो मुझे पता चला कि कुछ तो है स्टैंडिंग है मेरी। मैंने कहा था भाई से कि क्या जरूरत है? भाई ने बोला कि नहीं अपना नाम दे दो तो सीरियल हो जाएगा। मैंने बोला कि अच्छा… उसने बताया कि बदले में पैसे मिलेंगे। कितने चाहिए? मैंने बड़े जोश मे आकर दस हजार रुपए मांग लिए। उन्होंने बड़ी आसानी से दे दिए। जब सीरियल चालू हुआ तो उन्होंने सीरियल का प्रोमोशन चालू किया । 'सत्या', 'शूल' और 'कौन' के लेखक का सीरियल… मुझे बहुत तकलीफ होती थी। मैं भाई को डांटता था कि तुम मेरा नाम ऐसे क्यों डाल रहे हो। मेरा भाई बोलता था कि आपके अंदर कांफीडेंस नहीं है। मैंने खुद फोन कर-कर के स्टार बेस्ट सेलर को बोला कि मेरा नाम हटाओ। लेकिन उस प्रक्रिया में मुझे रियलाइज हुआ कि मैं कुछ हूं। सब हमको बोले तुम बेवकूफ है। तेरे नाम पर प्रोमोट हो रही है चीज। तू मना क्यों कर रहा है? मैंने बोला कि शर्म आती है। उन्होंने बोला कि चूतिया आदमी है। इससे तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी कितनी स्टैंडिंग है। मैंने कहा अच्छा। उन्होंने समझाया कि तुम जाओ स्टार प्लस । तुम जो बोलेगे, वे करने के लिए दे देंगे। मैंने कहा अच्छा। उन्हें जाकर मैंने एक कहानी सुनाई। उन्होंने तुरंत स्वीकृत कर दिया। बिना जाने और देखे कि डायरेक्टर के तौर पर मेरे अंदर क्या संभावनाएं हैं? मैंने लिखी है तीन फिल्में। तब मुझे लगा यार किया जा सकता है। फिर मेरे समझ में आने लगा कि पूरा ध्यान लगा के कुछ किया जाए। इसमें कैमरा लगा के दिखाया। नटी का काम मुझे बहुत अच्छा लगा था। उसने 'अब के सावन झूम के बरसो… धूम पिचक वीडियो मैंने देखा। नटी से मेरी बात हुई दिल्ली में। नटी 'सत्या' का फैन था। नटी मुंबई आ गया। मैंने कहा करते हैं कुछ, लेकिन शूटिंग के एक दिन पहले मेरी जान निकल गई। मैंने कहा करूंगा कैसे? मैंने आज तक किया नहीं। मैंने शिवम को रात के बारह बजे फोन किया। मैंने कहा सर कल शूटिंग है। उन्होंने बोला कि हां कर। शिवम ने कहा कि पागल है, तेरा दिमाग खराब है। जो तुम ने तय किया वही जाकर कर। उन्होंने मुझे रात भर समझाया, जा कर, डर मत। तुमने हाथ डाल दिया। अगले दिन सेट पर गया तो, सुबह-सुबह शिवम ने कहा कि मैं भी आता हूं। मैं वेट कर रहा हूं कि शिवम कब आएंगे। नौ बजे का शिफ्ट था। राजेश टिबरीवाल मेरा दोस्त मेरे साथ था। डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सहयोगी यशवंत शेखावत मेरे साथ थे। यशवंत मेरे को बोल रहा है कि ऐसे करते हैं। राजेश ने भी एक सीरियल बनाया हुआ था। उसने भी कहा कि ऐसे करते हैं। मैं कंफ्यूज… मैं उन दोनों की तरह से नहीं सोच रहा था। फिर नटी ने पूछा कि करना क्या है। मैंने कहा,नटी सीन तो ये है। अब इसको कैसे करना है। मैंने बोला कि मैं इतना बता देता हूं कि कौन कहां बैठा है और क्या कर रहा है। मैंने सीन स्टेज करना चालू किया। नटी ने कहा कहां से शुरू करेंगे। पहला सीन था लडक़ी से बात हो रही है। उसको लेकर आया जा रहा है। मैंने कहा इसको लेकर आते हैं। मैंने कहा कि नटी ऐसा नहीं हो सकता है कि यहां से ये भी दिखे और वो भी दिखे। नटी ने कहा क्यों नहीं हो सकता है। तो नटी ने कैमरा लगाया। फिर धीरे-धीरे जो मेरा पहला सीन था… उसे शूट करने में मैंने फिगर आउट किया अपने-आप। पहला सीन करने में मुझे साढ़ सात घंटे लगे। उस समय मैंने फिगर आउट किया कि फिल्म बनाने का कोई मेथड नहीं है । जो मेथड है, वो आपका मेथड है। आप जैसे फिल्म को अपने दिमाग में देख रहे हो, वैसे ही बना दो। मेरा यह था कि मैं अपने-आप को एक्सप्रेस कर पाता हूं। मेरा विजुअल माइंड है। मैं विजुअली देखता हूं इन चीजों को। उसको आप कैसे एक्सप्रेस कर पाते हो अपनी टीम को।
- आप फिल्म निर्देशन में आना चाहते थे। जब निर्देशन की दिक्कतों का सामना कर रहे थे तो क्या कहीं ये लगा नहीं कि काश मैं फिल्म स्कूल गया होता। कम से कम शॉट लेने की तमीज तो होती। क्या उस समय आप के मन में यह सवाल उभरा था?
0 ये सवाल मेरे दिमाग में बहुत पहले आया था। मैंने शुरू में फिल्म स्कूल जाने की कोशिश की थी। हमेशा लेट हो गया मैं। हर जगह लेट हो जाता था। मैं जा नहीं पाया। लेकिन धीरे-धीरे जब फिल्म स्कूलवालों के साथ बैठना-उठना चालू किया, तो मुझे लगा कि फिल्म स्कूल आदमी को लिमिट कर देते हैं। मैंने अपने प्वाइंट ऑफ व्यू से यह सोच लिया था। जब मैंने डायरेक्ट करना शुरू किया तो उस समय लगता था कि काश किसी ने मुझे सिखाया होता। लेकिन करते-करते वह सब दिमाग से निकल गया। पहली चीज मेरे समझ में यही आई कि बतौर निर्देशक आपको अपने-आपको एक्सप्रेस करना है। पहले दिन मैं सीख गया कि सबसे बड़ा काम निर्देशक का ये है कि लोगों को मैनेज करना, और जो लोग अलग-अलग दिशा में सोचते हैं, उन सब की दिशा को मोड़ कर एक दिशा में लाना। सबसे बड़ा काम निर्देशक का वो मुझे पहले दिन समझ में आया। विजुअली या किसी एक चीज को जिस तरह देखते हो, मन में, मूड में, उसमें कोई गलत नहीं है, आप उसको एक्सप्रेस कितना कर पाते हो और कैमरा मैन कितना समझ पाता है। वो रिश्ता, वो रिलेशनशिप बहुत महत्वपूर्ण है। पहले दिन से ही मैंने कागज लेकर बैठना चालू किया। नटी को बोला ये फ्रेम है। उस फ्रेम में कुछ ठहरा हुआ दिखता था। फ्रेम में जब अपने माइंड में देखता हूं तो स्टैटिक देखता हूं। मूवमेंडट के साथ देखता ही नहीं। मेरा एक वो लिमिटेशन है। मूवमेंट जो आया वो नटी लेकर आया। मैं फ्रेम को हमेशा स्टैटिक देखता था। मूड में देखता था। मुझे लाइट दिखती थी। इस तरह की लाइट गिर रही है उसके चहरे पर। मुझे लगता था कि इस तरह का एक विजुअल होना चाहिए। मैं ढूंढता रहता था कि कहां पर कैमरा लगना चाहिए और मैं उसको बैठ कर स्केच करता था। मैं जो स्केच करता था, नटी वैसा लगाता था कैमरा। और नटी अपनी तरफ से मूवमेंट एड करता था। अनुराग मैं ऐसा कर रहा हूं, बोल कैसा है? और मुझे अच्छा लगता था। एक मेथड इवॉल्व हुआ। वासिक था, आरती थी… हमारी वो टीम है जो चलती आ रही है। तो हमलोगों का बेसिकली तीन या चार दिन का शूट था। फिर हमने कहा कि ये सब करना है। मेरे दिमाग में था कि अब ट्रेन के अंदर शूट करना है। सडक़ पर शूट करना है। कैसे करना है। फिर दिमाग काम करने लगा कि फिल्म ज्यादा इंपोर्टेंट है। फिल्म बनाने के लिए कुछ भी करना है। मेरा एक दोस्त था जो चैनल वी में काम करता था। चैनल वी में नया-नया डीवी कैमरा आया था। मैंने अपने दोस्त को रोल दिया। मैंने कहा तुमको रोल देता हूं। वो प्रोड्यूसर था चैनल वी में। मैंने कहा कि मुझे वह कैमरा चाहिए। रात को जब चैनल वी बंद होता था तो वह कैमरा उठाकर ले आता था। और डीवी कैमरा - मेरे दिमाग में डीवी कैमरा की यह समझ थी कि इसमें आप बिना लाइट के शूट कर सकते हो। आपको लाइट की जरूरत नहीं है। मैंने कहा कि अगर ऐसा कैमरा हाथ में आ जाए तो मैं ट्रेन में शूट कर सकता हूं। मैंने कहा ट्रेन में घूस कर शूट करूंगा। हम लोगों ने लास्ट ट्रेन पकड़ी और उसमें घुस कर के एक कंपाटमेंट हाईजैक किया। हमलोगों ने उसमें शूट किया। बैठे-बैठे यहां से विरार तक गए, विरार से बांद्रा तक की जर्नी में हमने ट्रेन का पूरा हिस्सा बिना लाइट के शूट किया। एडवांटेज मेरे साथ था कि एक कैमरा मैन ऐसा था जो रिस्क लेने को तैयार था। जिसके अंदर कीड़ा था। नटी का न्यूज रीडर बैकग्राउंड था। वो भी तैयार था एक्सपेरीमेंट करने को। हमलोग सब कुछ लगातार ऑन द स्पॉट करते रहे। यह सब करते-करते 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' खत्म होने और उसके टेलीकास्ट होने से पहले मैंने स्क्रिप्ट खतम कर दी 'पांच' की। तब उसका नाम 'मीराज' था। मैंने बीस पन्ने खतम किए, वो एक जर्नी अपने-आप हो गयी। चार दिन बैठा रहा। पांचवें दिन वो सीन दिमाग में आया किडनैपिंग वाला। और किडनैपिंग के बाद अपने-आप एक रास्ता पकड़ लिया। पांचवें दिन मैं सुबह बैठा शाम आठ बजे तक स्क्रिप्ट पूरी हो गयी। और ये नहीं था कि कुछ सोच कर बनाया था। एक दिशा में चली गई। उस समय जो स्क्रिप्ट थी उसमें पुलिस स्टेशन नहीं था। एक सीधी लीनियर कहानी इन लोगों की, जो खत्म होती थी ल्यूक के मर्डर से। स्क्रिप्ट लेकर जब मैंने लोगों सुनाना चालू किया, घूमना चालू किया… लोगों ने कहा कि कठोर अंत है, फिल्म नहीं बनेगी। उस समय फिल्म के फस्र्ट हाफ की वजह से फिल्म बनाने की इच्छा थी। ये था कि कहानी मेरी है। बनाने की इच्छा सिर्फ उसके लिए थी। अब मुझे डेस्परेशन आ गया था। उसी दौरान 'मिशन कश्मीर' का भी हादसा हुआ था। फिर 'वाटर' के लिए मैं चला गया। 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' एयर हो गया। बहुत तारीफ हुई उसकी। लोगों ने बात की । तारीफ भी उसी कारण से हुई, जिस कारण से बनाया था। लोगों ने कहा कि - क्या शूट करता है। कहानी लोगों को नहीं पसंद आई। कुछ नहीं, लोगों ने कहा कि क्या शूट करता है? मेरी ये जर्नी थी कि कभी इस स्टेज पर आऊंगा, जो कहानी कहनी है, वो कहानी भी कह सकूं। 'वाटर' रूक गई तो उस समय बहुत एंगर था , बहुत गुस्सा था। मैंने 'वाटर' लेकर जो प्रोटेस्ट हुआ था बनारस में, उस से फिल्म रूक गई थी, उसकी वजह से मेरे अंदर बहुत गुस्सा था। मैं लोगों से गुस्सा था, चीजों से गुस्सा था। उस समय मोहभंग हो गया था। विधु विनोद चोपड़ा से मोहभंग हो गया था, राम गोपाल वर्मा से मोहभंग हो गया था। 'वाटर' के पॉलिटिक्स से मेरा भ्रम टूटा था। अपने खुद के लोगों से मैं दुखी था। एक बात हमने तय की कि हमलोग प्रोटेस्ट करेंगे। हमने परचे बांटे। सबने एग्री किया। अगले दिन सब पलट गए। लोगों ने बोला कि आप कैसे बोल सकते हैं कि काशी में यह होता है। मैंने कहा कि शिल्पी थिएटर में ट्रिपल एक्स फिल्में मैंने देखी हैं। लोगों ने कहा कि झूठ बोल रहे हैं आप। मैंने कहा कि जो देखा है वह देखा है। सब मेरे खिलाफ हो गए। कहा गया कि तेरी वजह से फिल्म नहीं बनेगी। मुझे बंद कर दिया गया। शबाना आजमी से मेरा मोहभंग हो गया। यहां-वहां सब लोगों से मैं दुखी हो गया। मुझे लगा कि पिक्चर किसी को नहीं बनानी है, सब लोग खामखां हल्ला करना चाहते हैं। मेरे उपर अलग से नाराज थे सभी, क्योंकि कोई बोले नहीं अपने मन की बात। मैं जाकर बोल देता था। फिर क्या हुआ कि मीडिया वाले भी मुझे ढूंढने लग गए। सब लोग मुझे ढूंढने लगे। बहुत सालों के बाद मुझे धीरे-धीरे पता चला कि मैं एक माउथपीस बनता जा रहा था कि बाइट देना है तो बुलाओ। इसलिए मैं बचने लगा। इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि क्या कहूं? फिर मैंने कहा कि फिल्म बनाता हूं। मैंने 'शूल' में मनोज और रवीना के साथ काम किया था। जब 'पांच' की नींव गढ़ी गई तो उन दोनों को सुनाया था। मनोज को बोला था,ये करना है। कहानी सुनाई थी रवीना को और बोला था कि करना है। दोनों करने के लिए रेडी थे। 'शूल' में जब उधर से गया तो अचानक उन्हें लगने लगा कि मैं अभी काम का नहीं हूं। मनोज ने बोला कि 17 लाख रूपये चाहिए। रवीना बोला 17 लाख चाहिए। जामू जी तैयार थे फिल्म करने को। उन्होंने बोला कि 1 करोड़ 80 लाख के अंदर बना कर दो। बाद में जब फिल्म बनी तो 1 करोड़ 11 लाख में बनी थी। लेकिन 1 करोड़ 80 लाख में भी उस समय भारी लग रही थी। मैं इतना ज्यादा डिसइलूजन हो गया कि एक दिन गुस्से में मैंने तय किया कि मैं उनके साथ फिल्म बनाऊंगा, जिन्होंने कभी फिल्म नहीं की हो। हर नए आदमी के साथ फिल्म बनाऊंगा। जितने पैसे चालीस लाख-पचास लाख में फिल्म बनाऊंगा। और स्टार सिस्टम पर निर्भर नहीं रहूंगा। बड़े लोगों से दूर रहूंगा। मैंने अपने लिए नियम बनाया। सारे नियम गुस्से में बनाए थे। बहुत ज्यादा गुस्सा था। मुझे लग रहा था कि सब लोग यहां पर जो है, उनमें सिनेमा का पैशन नहीं है। सब लोग अलग कारणों से सिनेमा करना चाहते हैं। फिल्म बनाने के कारण से नहीं करना चाहते हैं। उस समय मेरे अंदर कूट-कूट कर आइडियलिज्म भरा था। उस एंगर में मैं सुधीर मिश्रा के पास गया। मैंने कहा सर ये फिल्म बनानी है। उन्होंने कहा कितने चाहिए। मैंने कहा जितने मिले, उतने में फिल्म बनानी है, मुझे नहीं मालूम मैं कैसे बनाऊंगा। हैंडीकैम पर शूट कर लूंगा मैं। 16 एम एम पर शूट कर लूंगा। तय हुआ चालीस-पचास लाख में फिल्म बनाओ। उस समय मैं सुधीर के लिए एक फिल्म लिख रहा था, जो टूटू शर्मा प्रोड्यूस करने वाले थे। उन्होंने पूछा कि कास्ट कौन है? मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम कौन-कौन रहेगा। के के के साथ मैंने 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' किया है तो के के रहेगा। बाकी नहीं मालूम। उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है। तुम कास्ट इकट्ठा करो। मैंने आदित्य श्रीवास्तव को फोन किया। स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए दी। आदित्य ने कहा कि ल्यूक कौन कर रहा है? मैंने उन्हें बताया कि ल्यूक के के कर रहा है। फिर उसने पूछा - मेरे लिए क्या सोचा है? मैंने कहा - मुर्गी। उसका जवाब था, मैं करूंगा। आदित्य श्रीवास्तव के आने से और कांफिडेंस आया। फिर विजय मौर्या दोस्त था। मैंने उस से कहा तू पोंडी कर। पोंडी वास्तव में लिखा था किसी और के लिए। मैंने टूटू को बताया कि ये कास्ट है। उनका कहना था कि यार इस कास्ट को बेचना मुश्किल है। क्या करेंगे? कोई तो लेकर आओ। मेरी एक दोस्त थी त्रिशीला पटेल। उसके घर की छत पर क्रिसमस के दिन पार्टी थी। मैंने वहां तेजस्विनी कोल्हापुरे को देखा डांस करते हुए। सत्यदेव दूबे जी के साथ वह थिएटर कर रही थी। नाटक मैंने देखा ही था। मुझे अपनी फिल्म के लिए वह ठीक लगी। मैंने उसे डांस करते हुए देखा। उसमें कुछ अजीब सी बात थी। एक अजीब सी सेक्सुवेलिटी थी। मैंने सोचा कि ये कैसी रहेगी। पूछा तेजू करेगी मेरी फिल्म। फिर मैंने सुधीर को तेजू के बारे में बताया। उसने भी कहा ठीक है। हमने तेजू से बात की। तेजू ने बताया कि मेरे लिए कुछ सोचा जा रहा है। हमलोग कुछ करनेवाले हैं। आपको टूटू जी से बात करनी पड़ेगी। सुधीर जी से बोला टूटू जी से बात करनी है। उन्होंने कहा चलो टूटू से बात करते हैं। हमने टूटू को स्क्रिप्ट सुनाई। टूटू ने कहा यार चालीस-पचास लाख में कहां फिल्म बनाओगे? कैसे बनाओगे? सुधीर मिश्रा और बृज राठी दो लोग थे। उन्होंने कहा कि मैं बनाता हूं। मैं प्रोड्यूस करता हूं। तेजू को ले रहे हो। सब लोगों को ले रहे हो तो मैं प्रोड्यूस करता हूं। उस तरह से टूटू शर्मा आए फिल्म में और फिल्म शुरू हो गई। जिस दिन टूटू शर्मा ने यह स्क्रिप्ट सुनी और यह डिसीजन लिया कि मैं प्रोड्यूस करता हूं। उसके बारह दिन के बाद शूटिंग शुरू हो गई। हुआ यों कि उन्होंने पूछा कि कब शुरू करना है? मैंने कहा , मैं रेडी हूं। मेरे लिए था कि जल्दी फिल्म शुरू हो। फिर मैं बैठा राजेश टिबरीवाल साथ। विजय मौर्या का उन्होंने एक नाटक देखा था, बोला अच्छा है। आदित्य श्रीवास्तव का काम देखा ही था टीवी में और 'सत्या' और 'बैंडिट क्वीन' में, कहा अच्छा है। के के पर सब को आपत्ति थी। इतना बढिय़ा रोल है। मैंने सोच लिया था कि मैं मनोज बाजपेयी को नहीं लाऊंगा। उस समय मेरी जिद्द थी कि मैं मनोज बाजपेयी के साथ काम ही नहीं करूंगा। मैंने कहा केके करेगा। उन्होंने कहा कि नहीं। मैंने कहा कि टेस्ट शूट करने दो। शूटिंग कैसे करोगे? मैंने सुना था… किसी एक इंटरव्यू में पढ़ा था या कहीं पढ़ा था मैंने कि किसी एक डायरेक्टर ने फिल्म बनाई थी, जबकि उसके पास पास पैसे नहीं थे। उसने ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट किए थे। मुझे वह फिल्म बहुत अच्छी लगी थी मैंने खुल्ला बोल दिया कि ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करूंगा। बिना जाने-समझे कि उसके क्या परिणाम होते हैं, मैंने कहा ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करूंगा। नटी ने मुझे घूम कर देखा- क्या हो गया? पागल हो गया है? दिमाग खराब है। मैंने कहा, हां हमलोग ट्यूब लाइट और बल्ब में शूट करेंगे। नटी डर गया। नटी बोला कैसे करेंगे? मैंने कहा कि मैं दिखाता हूं। 'चंकींग एक्सप्रेस' का वीसीडी था मेरे पास। उसका बिगनींग था। मैंने 'चंकींग एक्सप्रेस' का बिगनींग दिखाया उस। नटी को विश्वास नहीं हुआ। उसने फिर से पूछा कि ये ट्यूब लाइट में शूट हुआ है? मैंने कहा - हां ट्यूब लाइट में हुआ है। उसने कहा कि मुझे टेस्ट करना पड़ेगा। मैंने कहा कि केके को टेस्ट करते हैं। एक रूम बुक किया गया। पांच-छह ट्यूब लाइट मंगाया गया। नटी को डर था कि ट्यूब लाइट फ्लिकर आएगा। हमने बीच में ट्यूब लाइट रख दी। वह शॉट फिल्म में हमने डाला है। हमारा टेस्ट शूट है। उसमें चारो एक्टर को बैठाया। कुछ अजीब सा शूट कर रहे थे हमलोग। सभी को आशंका थी कि ट्यूब लाइट में क्या लाइट आएगी? कैसा ग्लो आएगा? नटी बहुत कांफीडेंट हो गया था। नटी ने बोला कि बाबू कुछ मैजिक हो जाएगा। मैंने कहा ठीक है। शूट दिखाया गया। केके फिर रिजेक्ट हो गया। हमलोगों ने शूटिंग प्लान कर लिया। लोकेशन जाकर ढूंढ लिया। लोकेशन क्या था कि किसी ने बोला कि वाटसन होटल है टाउन में। वाटसन में भारत में पहली बार सिनेमा का शो हुआ था। वह एक आकर्षण था कि यार वहां जाकर शूट करते हैं। लेकिन कैसे शूट करें, कहां शूट करें, वहां एक घर था जो बंद था। वह घर कुछ अठारह-बीस साल से बंद था। उसमें पुराने फर्नीचर पड़े थे। हमने घर खोला और टार्च की रोशनी में हमने लोकेशन देखी थी। मैंने कहा यहां आ जाते हैं और यहीं शूट करेंगे। उन लोगों ने बोला कि आप दिन में आकर देख लेना। मैंने कहा कि देखना नहीं है। जगह समझ में आ गई, यहीं शूट करेंगे। कैसे करेंगे? फिर आर्ट डायरेक्टर के साथ बैठा। कमरे में ऐसे करेंगे। ल्यूक का घर बनाना था। मेरी अपनी पुरानी तस्वीरें थीं, जो अभी भी है। मैंने अपने कमरे की फोटोग्राफ्स दिखाई। कैसे मैं दीवाल पर लिखता था? यहां आने के बाद मैंने अपनी पहली कविता दीवाल पर लिखी थी। पंखे पर लिखा रहता था, पंखा किसने बंद किया चूतिए? तो पंखा चलते ही रहता था। हम जमीन पर लेटते थे, पंखे पर, दीवाल पर लिखा रहता था सब कुछ। मैं ऐसे लिखता था। और पेंट करता था और स्केच करता था। मैंने अपनी सारी फोटोग्राफ दिखाई। मैंने कहा ये चाहिए मेरे को। उसने कुछ और जानना चाहा तो जिम मोरिशन की बायोग्राफी दी। मैंने कहा कि उसमें वो डॉल का फेस है। एक ऐसा डॉल का चेहरा दो। मुझे इस्तेमाल करना है। एक माहौल क्रिएट करना है। मूड क्रिएट करना है। ये पोएट्री लिखी होगी दीवाल पर ,जो वास्तव में मेरे रूम के दीवाल पर लिखी रहती थी। रिकॉगनाइज जीनियेसेस, रिकॉगनाइज मी । जवानी के दिनों में एक जोश रहता है न? आपको लगता है कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं। दुनिया नहीं समझती है। इस तरह से सब लिखा हुआ था। वो सारी चीजें दिखाईं, इवॉल्व हुआ सारा सबकुछ। वहां लोकेशन पर काम चल रहा है और यहां बोल रहे हैं केके है ही नहीं। दो दिन बचे हैं शूटिंग के लिए। कल मुहूर्त है, अनिल कपूर आनेवाला है मुहूर्त करने के लिए। अनिल कपूर ने आकर फिल्म का मुहूर्त किया । अनिल कपूर ने भी देखा और कहा यार ये लड़का कौन है। किसको हीरो बना रहे हो? जब मैंने केके को अप्रोच किया था क्रिसमस के पहले। टूटू शर्मा से मिलने के पहले, तभी से केके ने वर्क आउट चालू किया। उसने अपना शरीर बदल लिया था। उसके बाल इतने लंबे-लंबे थे। हमने कहा कि क्या करें। उसमें हाकिम आलिम जो है वो सिर्फ आलिम था। हमने कहा आलिम कुछ कर। मैं आलिम के यहां जाता था बाल कटाने। आलिम के यहां मैं बैठकर फोटो लेना चालू किया। फोटोग्राफ क्लिक करना चालू किया। तो एक लुक आया उसने बोला कि गोल्डन हाई लाइट दे दूं। मैंने कहा, दे दे… देखते हैं। उसने बाल ऐसे स्पाईक कर दी। मैंने जिंदगी में ऐसी हेअर स्टाइल नहीं देखी। हेयर स्टाइल ने किरदार का मूड ही बदल दिया। फबीया ने बोला कि यार इसके हिसाब कॉस्टूयम में मिलेट्री पैंट दूं तो एक नाजी फील आ जाएगा। तो वो आया। चीजें अपने-आप जुड़ती गर्इं। सब करके मैं केके को लेकर गया। ये सब मुहूर्त के बाद हुआ । अगले दिन शूटिंग होने वाली है। सेट पर पहली बार लेकर गया। सब लोग केके को देखकर डर गए। वह बिल्कुल बदल गया था। फिल्म टेक ऑफ कर गई। शूटिंग का पहले दिन जाकर फाइनल हुआ केके। मैंने तब तक सेट नहीं देखा था कि वासिक ने क्या किया है? मैं सेट पर गया। वहां मैंने देखा कि वासिक सेट को अलग लेवल पर ले गया था। उसने पांच चेहरे बना दिया था दीवाल पर और एक म्यूरल बना दिया था। मैंने कहा वासिक भाई ये क्या कर दिया। वासिक भाई ने बोला कि क्यों सर अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा लिखा हुआ चाहिए था, ये चेहरे नहीं चाहिए। वासिक ने बोला कि एक घंटा दो, मैं हटवा देता हूं। मैंने कहा आप हटाइए। बैठा था, मैं चेहरा देखने लगा। मैं स्क्रिप्ट पढऩे लगा। एक पन्ना पढ़ा और बोला कि वासिक भाई आप रूको। मेरा यह डर था कि अवास्तविक लगेगा। मैंने स्क्रिप्ट का पन्ना खोला, वह सीन था जब इंस्पेक्टर पहली बार आता है। मैंने कहा सीन को रीयल बना दो। मुझे इसे फिल्म का हिस्सा बना लेने दो। मैंने फिर बैठे-बैठ पहले दिन शूट करने से पहले वह सीन लिखा। ये कौन है? ल्यूक है। ये कौन है? ल्यूक है। सब ल्यूक है? नहीं वो मैं हूं। कौन वो छोटा वाला? हां, अच्छा है, वैसा वो करने से मैं देखता हूं। उसको मैंने एक थॉट प्रोसेस दिया वहीं बैठे-बैठे। मैंने कहा अभी हो गया, छोड़ दो अच्छा लग रहा है। वो वासिक का आइडिया था।
- आप तीन फिल्मों में बतौर लेखक जुड़े हुए थे। एक टेली फिल्म बना चुके थे। स्टार बेस्ट सेलर के रूप में। उसको बाद इनाम भी मिला था। ये सारी चीजें करने के बाद भी आपको फिल्म मेकिंग का कह लें नटस एंड बोल्टस या क्रिएटिव एनर्जी ऑफ फिल्मस है… स्क्रिप्ट के बाद की जो फिल्ममेकिंग है, क्योंकि कागज पर तो फिल्म लिखी या सोची जा सकती है। बनती है वो ऐसे ही मौकों से है। इसका ज्ञान तब तक नहीं था इस पर मुझे ताज्जुब हो रहा है। इस संबंध में आप थोड़ा बताएंगे क्या?
0 मैं एक चीज मानता हूं। आज जब मैं पीछे देखता हूं न? मैं बीच में बहुत परेशान रहा हूं। पहली बार यह परेशानी तब हुई थी, जब 'पांच' रूक गई थी। कुछ आठ महीने मैंने शराब ही शराब पिया। बहत्तर किलो छरहरा था मैं, जो मोटा होकर नब्बे किलो का हो गया था। तब से आज तक वह वजन गया नहीं है। अपनी आठ महीने की उस जर्नी रही में मैंने बहुत चीजें सोची थीं। आप सफल होते हैं तो माइथोलोजी क्रिएट हो जाती। अपनी फिल्म के लिए ही नहीं ,मैं 'वाटर' के लिए भी लड़ा था। जिस चीज पर मुझे फेथ था, उसके लिए लड़ा था। मुझे लगता था जो सच है उसके लिए लडऩा है। लोगों ने मुझे एक स्थान दे दिया था। ऐसी फिल्में लिखता है। 'सत्या' के बाद कुछ नहीं मिला था। 'शूल' के बाद, राम गोपाल वर्मा को छोडऩे के बाद, 'मिशन कश्मीर' छोडऩे और 'वाटर' के लिए लडऩे के बाद लोगों मुझे एक नाम दे दिया था। एक आदमी है, जो ऐसा बोलता है,साफ बोलता है। लेकिन मैं वो चीज नहीं ढूंढ रहा था। 'पांच' के बाद भी क्या हुआ? लड़ाई के बाद लोगों ने मुझे पेडेस्टल पर चढ़ा दिया । मैं किसी से नार्मल बात नहीं करता था। मैं कहीं भी जाऊं, लोग एक्सपेक्ट करते थे कि मेरे मुंह से अभी कुछ ज्ञान निकलेगा। किसी से बात करने बैठूं तो ज्ञान निकलेगा। और मैं उस तरह आदमी हूं, जो आज तक बकचोदी करता है। मैं बैठूंगा बरिस्ता पर, सिनेमा पर बातें करूंगा और दोस्तों को डीवीडी दिखा कर जलाऊंगा। सिनेमा के बारे में बात करूंगा। ऐसी बहसों से सीखने को मिलता है। मुझे आधी फिल्में प्रवेश भारद्वाज ने बतायी हैं। मेरी जर्नी अभी तक चल रही है। मैं धीरे-धीरे डिस्कवर कर रहा हूं। 'मिल विल' मैंने 2005 में डिस्कवर किया है। नयी फिल्में देखता हूं। नए फिल्ममेकर मुझे वापस रीसेट कर रहे हैं। मेरी जर्नी चलती रहती है। लेकिन लोगों ने मुझे एक अजीब से पेडेस्टल पर बैठा रखा है। मैं विचारों से प्रेरित होकर बहस करता हूं। है। ये फिल्म इस तरह से बननी चाहिए। मेरी बातों में एक तरह का आइडियलिज्म आ जाता है । लोगों ने जब मुझे पेडेस्टलपर चढ़ाया। मैंने हर चीज निर्दोष भाव से किया। मेरी यही ताकत रही। इसका भी मुझे मुझे बाद में एहसास हुआ। क्योंकि मुझे नहीं मालूम, अगर मुझे मालूम होता तो शायद मैं नहीं करता। क्योंकि मुझे नहीं मालूम था, इसलिए मैं कर गया। मुझे पहली बार वर्कशॉप पर बुलाया गया तो मेरा रिएक्शन था, मैं क्या बताऊंगा किसी को, मुझे खुद नहीं लिखना आता। उनको मेरी यह बात अच्छी लगी। मैं जब वर्कशॉप के लिए गया तो उन्होंने कहा कि आपका क्या प्रोसेस है। मैंने कहा कि 'सत्या' मैंने नहीं लिखी, 'सत्या' लिख दी गई। 'सत्या' बन गई। 'सत्या' बनी तो मैंने उसमें सीखा। मैंने अपनी गलतियां बताना चालू कीं। उसका रिएक्शन क्या हुआ कि लोगों को वह बात पसंद आई। लोगों ने कहा कि इस तरह से कोई बात नहीं करता है। लोग आकर हमको सिखाते हैं ऐसे करो, वैसे करो। एक ईमानदारी होती है निर्दोषिता में, नहीं जानने में और मैं एडमिट करता रहा कि मुझे नहीं आता था, ये हो गया था। सबको लगा कि मैं बहुत विनम्र हूं। मैं विनम्र नहीं था। मैं सच बोल रहा हूं। हां, उसका रिजल्ट आया। रिजल्ट तब आया, जब मैं एफटीआई में वर्कशॉप करने गया और मैंने बोला, यार राइटिंग-वाइटिंग कुछ नहीं फिल्म देखते हैं साथ में। मैंने तीस फिल्में देखी साथ में। मैंने कहा लिखो, राइटिंग का प्रोसेस यही है, बस लिखते रहो। पहले जानो कि तुम क्या कहना चाह रहे हो। क्या कहानी है, कहानी के माध्यम से कहो। मैं बैठता था और कहता था कि लिख-लिख के दिखाओ। लिखते थे फिर बोलते थे, इसमें ऐसा कुछ हो सकता है? तो आयडिया लेवल पर वर्कशॉप की मैंने। अ'छा ये सीन ऐसा करें तो कैसा होगा? ऐसा करें तो कैसा होगा? उसका रिजल्ट यह हुआ कि उस वर्कशॉप में 17 स्क्रिप्ट सबमिट हुई। उसके पहले जो राइटिंग वकशॉप हर साल होती है, उसमें दो ही स्क्रिप्ट सबमिडट होती थी। मैंने दो का रिकार्ड 15 स्क्रिप्ट से तोड़ा था। हर आदमी ने स्क्रिप्ट लिखी थी। सोलह स्टूडेंट थे, एक ने दो स्क्रिप्ट लिख दी थी। मैं आधे लोगों से मिलता हूं, उन्होंने ना 'पांच' देखी है और ना 'ब्लैक फ्राइडे' देखी है। और वो मुझसे मिलना चाहते हैं। प्रोड्यूसर से मिलता हू तो वे कहते हैं कि आप से मिलने की बहुत इच्छा थी। लोग बात कर रहे थे कि स्क्रिप्ट आ गई है। यह गुलाब जामुन है, इसमें चाशनी की जरूरत है। अनुराग कश्यप को ले आओ। मैंने कहा आप जानते हैं मुझे? आपने मेरा काम देखा है? आपने कुछ देखा है? हवा पर हवा बनती गई और हवा किस बात पर बनी? मैंने महसूस किया कि मैं बहुत कुछ नहीं जानता हूं। बात ये है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों को मालूम ही नहीं कि वे क्या कर रहे हैं?
- पांच पर वापस आते हैं।?
0 'पांच' बनाने के बाद मैंने ये सब महसूस किया। मुझे मालूम था कि मैं क्या कर रहा हूं। मुझे सिर्फ इतना मालूम था कि मैं क्या कर रहा हूं। ना मैं किसी ग्रेटनेस के लिए कर रहा था। ना कुछ और साबित कर रहा था 'पांच' से। मेरे सामने रोड़े आते गए और कहीं न कहीं होता है न कि आपके सामने दीवार आ गयी और दीवार तोडऩे में आपकी पर्सनालिटी थोड़ी बदल गयी। फिर दीवार आई, आज तक दीवार तोड़ रहा हूं। स्कूल से जो मेरा जर्नी चालू हुआ, वह अभी खम्त नहीं हुआ है। मेरा आत्माराम शर्मा आज भी है। या तो वह सेंसर बोर्ड के रूप में है या वह आत्माराम शर्मा सुप्रीम कोर्ट के रूप में है। और वही आत्माराम शर्मा 'पांच' बनाते समय इस रूप में था कि सीन कैसे शूट करूं? 'पांच' में जो मैंने पहला सीन शूट किया, उसे आज भी कोई फिल्ममेकर देख कर बता सकता है कि ये पहला है। क्योंकि वह इकलौता सीन है, जिसमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? तो मैंने सबकुछ शूट किया। हर एंगल से शूट किया। हर कैरेक्टर के क्लोजअप भी लिए। दोनों एक्सेस से भी शूट किया, जो किडनैपिंग का प्लान हो रहा है। तो उसमें एक्सेस भी जम्प हो रहा है। उसमें पचास चीजें हो रही हैं। धीरे-धीरे जब वह सीन एंड हो रहा है, उसे एक फिल्ममेकर समझ सकता है। पहले दिन और पहले सीन में मेरी समझ में आ गया कि पिक्चर कैसे बननी चाहिए। सीन का आरंभ अनगढ़ है। और सीन खत्म होते-होते एक रीदम आ गया उसमें। वहां से मेरी जर्नी शुरू हो गई। मेरे सामने जब चैलेंज आता है तो मैं ज्यादा अच्छा काम करता हूं। शिवम नायर भी बोलते हैं कि लास्ट मिनट क्राइसिस होता है न कि दो दिन में स्क्रिप्ट चाहिए तो तू लिखता है। तेरे को दो साल दे दें तो तू कुछ भी नहीं लिखेगा। मैं अपने-आप को लगातार प्रेशर में रखता हूं। शूटिंग करने की जगह पर व्यावहारिक समस्याएं रहती हैं। लाइट कहां लगाएं? इतनी पुरानी बिल्डिंग है। आप बाहर लाइट लगा नहीं सकते। छज्जा गिर जाएगा। सेंटर में लाइट ले लो। क्योंकि समस्याएं थी, लाइट और कहीं लग नहीं सकती थी। सेंटर में लगी तो टॉप लाइट हो गयी। टॉप लाइट डिसाइड कर के नहीं गया था। उससे एक अलग मूड क्रिएट हुआ। बहुत ज्यादा ब्राइट हो गया। मुझे लगा ज्यादा ब्राइट है। मैंने कहा नटी बहुत रोशनी है। उसने पूछा कि कितनी चाहिए। मैंने कहा कि विजुअली स्क्रीन पर इतना दिखना चाहिए। तू कितनी इस्तेमाल करता है, वह तेरे ऊपर। उस तरह से अपने प्रोसेस इवॉल्व किया। फिल्म स्टॉक से पहली बार डील कर रहा था। बार-बार नटी डांटता था। मैं जिद्द करता था कि 'लास्ट ट्रेन टू महाकाली' में तो हो गया था। नटी समझाता था, बाबा ये फिल्म स्टॉक है। ये सब फर्क मुझे नहीं मालूम था। नटी संभावना बतलाता था और मैं प्रयोग करने घुस जाता था। लाइटिंग में हमलोगों ने कई प्रयोग किए। उस तरह से एक प्रोसेस इवॉल्व होता रहा और मैं सीखता रहा। हमलोग क्लाइमेक्स शूट कर रहे थे। किसी को स्विमिंग नहीं आती थी। मैंने कहा कि चलो मैं सिखाता हूं। अठारह घंटों तक मैं सभी को पुल में सबको स्विमिंग सिखा रहा हूं। आप यहां से यहां तक का शॉट दे दो, बाकी मैं मैनेज कर लूंगा। फिर केके डाइव नहीं कर रहा था। वह फिल्म का ऑपनिंग शॉट था। कैसे करूं? मैंने कहा सेट पर आओ, शॉट इवॉल्व हुए और मजबूरी में हमने प्रयोग किया। मैंने केके को कहा कि आप जरा सा झुकना। फिर कैमरा आपसे दूर चला जाएगा और मैं डाइव करूंगा। मैं आपके पीछे रेडी खड़ा हूं। कैमरा आया वहां। मैंने डाइव किया। मैं तो डाइव कर रहा हूं। मैं डुप्लीकेट हूं। किसी को नहीं मालूम कि मैं क्या शूट कर रहा हूं। मैंने अंडरवाटर कभी शूट नहीं किया। हर चीज को क्रॉस चेक भी कर रहा हूं। करते-करते हमलोगों ने कुल अड़तीस घंटे शूट किया। जॉय का भी प्रोब्लम था। उसने कहा कि मैं बहुत मोटा हूं, मैं शर्ट नहीं उतार सकता। तो मैं खुद जॉय की शर्ट पहन कर कैमरे के सामने चला गया। हमारे पास इतना वक्त नहीं था कि वहां क्लाइमेक्स शूट कर लें। क्लाइमेक्स पर जब हमलोग पहुंचे तो बीच पर गए। वहां पानी उतरते-उतरते तीन बजा। मुझे वही लोकेशन चाहिए था। बैकग्राऊंड में फोर्ट दिख रहा था। मुझे लोकेशन की समझ है। मुझे मालूम है कि यहां शूट करूंगा तो अच्छा दिखेगा। मैंने वह लोकेशन फोर्ट के लिए ही चुना था। पानी उतरेगा नहीं तो हमलोग लाइट आगे कैसे लाएंगे। लाइट आगे नहीं लाऐंगे तो फोर्ट दिखेगा नहीं। फोर्ट पर लाइट पडऩी चाहिए। तीन बजे के बाद थोड़ा सा पानी उतरा। पांच बजे सुबह के पहले खत्म करना था, क्योंकि उसके बाद की अनुमति नहीं है। दो घंटे में ही सब करना है। नटी ने कहा, बाबा अभी टाइम नहीं है। उसने छह एच एम आई खड़ा कर के लाइट मार दिया। वहां मेरा एक दोस्त विक्रम मोटवानी पोलराइड कैमरा लेकर आया था। उसले फोटो खींच कर दिखाया। ये देख मस्त फोटो आया। फोटो कैसा? बैकग्राउंड में छह लाइट है और लाइट पीछे आ रही पीठ पर, सामने तो आ नहीं रही है। मैंने पाया कि इधर से तो चेहरा दिखता ही नहीं है। मैंने कहा कि मैं ऐसे ही शूट करूंगा इसमें आधा चेहरा दिखे आधा न दिखे तो मैजिक हो जाएगा। नटी बोला चल शूट करते हैं। हो जाएगा सीन। उसके पहले हमलोग क्या-क्या ट्राय कर चुके थे। मैंने कहा कि बारह फ्रेम पर शूट करते हैं। बारह फ्रेम पर शूट करने का मतलब है कि थोड़ा ज्यादा रिजोल्यूशन होगा, फोर्ट दिखेगा। एक्टर को स्लो चलना पड़ेगा। हमने एक पूरा सीन किया, जिसमें केके और आदित्य श्रीवास्तव धीरे-धीरे चल रहे थे। डायलॉग बोल रहे हैं। हमनें एक पूरा टेक लिया था। बाद में फूटेज देखी तो उस टेक में से हमने सिर्फ दो शॉट रखे। पांच बजे तक हमलोगों ने शूटिंग खत्म की। वहां सुबह देखी तो लाश खींच कर ले जाने का सीन भी वहीं कर दिया। वैसे 'पांच' बनी।
(बहुत मुश्किल से यह अपलोड हो पाया है.)

Sunday, August 10, 2008

पहली सीढ़ी:राज कुमार हिरानी से अजय ब्रह्मात्मज की baatcheet

'पहली सीढ़ी' निर्देशकों के इंटरव्यू की एक सीरिज है। मेरी कोशिश है कि इस इंटरव्यू के जरिए हम निर्देशक के मानस को समझ सकें। पहली फिल्म की रिलीज के बाद हर निर्देशक की गतिविधियां पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनल के माध्यम से दुनिया के सामने आ जाती हैं। हम पहली फिल्म के पहले की तैयारियों में ज्यादा नहीं जानते। आखिर क्यों कोई निर्देशक बनता है और फिर अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए उसे किन राहों, अवरोधों और मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। आम तौर पर इस पीरियड को हम 'गर्दिश के दिन' या 'संघर्ष के दिन' के रूप में जानते हैं। वास्तव में यह 'गर्दिश या 'संघर्ष से अधिक तैयारी का दौर होता है, जब हर निर्देशक मिली हुई परिस्थिति में अपनी क्षमताओं के उपयोग से निर्देशक की कुर्सी पर बैठने की युक्ति में लगा होता है। मेरी कोशिश है कि हम सफल निर्देशकों की तैयारियों को करीब से जानें और उस अदम्य इच्छा को पहचानें जो विपरीत स्थितियों में भी उन्हें भटकने, ठहरने और हारने से रोकती है। सफलता मेहनत का परिणाम नहीं होती। अनवरत मेहनत की प्रक्रिया में ही संयोग और स्वीकृति की कौंध है सफलता... क्योंकि सफलता प्रतिभा का उपसंहार नहीं होती। वह प्रतिभा में समविष्ट रहती है। प्रतिभा स्वीकृत होती है तो सफलता बन जाती है।
राजकुमार हिरानी से मेरी पहली मुलाकात विधु विनोद चोपड़ा के दफ्तर में हुई थी। फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई थी। ज्यादातर पत्रकार विधु विनोद चोपड़ा का इंटरव्यू कर रहे थे। मैंने देखा कि एक शर्मीले स्वभाव का व्यक्ति चुपचाप बैंच पर बैठा है। उनकी आंखों की चमक ने मुझे आकर्षित किया। परिचय करने पर मालूम हुआ कि वह 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' के डायरेक्टर हैं। अखबारी किस्म का औपचारिक इंटरव्यू कर मैं चला आया। फिल्म रिलीज हुई और कुछ हफ्तों के बाद सफल हो गई। फिर से मुलाकात हुई। यह मुलाकात थोड़ी लंबी और अनौपचारिक थी। इसके बाद ऐसा संयोग हुआ कि मुझे अपने सूत्रों से थोड़ा पहले जानकारी मिल गई कि 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। मैंने हिरानी को मोबाइल से संदेश भेजा। कुछ घंटों के बाद यह सूचना सार्वजनिक हो गई, लेकिन हिरानी यह नहीं भूले कि मैंने उन्हें पला संदेश दिया था। मालूम नहीं इस घटना का हमारे परिचय में क्या महत्व है, लेकिन हिरानी उसके बाद की मुलाकातों में सभी के सामने इसका इसका उल्लेख करते रहे। यह उनके स्वभाव की अंतरंगता और उदारता है।
दो कामयाब फिल्मों के निर्देशक राजकुमार हिरानी आज भी उसी शर्मीले स्वभाव के हैं। लेकिन बातचीत के दरम्यान वे खुलते हैं और बगैर किसी छिपाव, दबाव और दोहराव के अपना मत रखते हैं। राजकुमार हिरानी ने हिंदी फिल्मों को लोकप्रियता का नया शिल्प दिया है। उनकी फिल्में आम दर्शक से लेकर खास दर्शकों तक को बांधती हैं और सभी को स्पंदित एवं आनंदित करती हैं। सचमुच बड़े निर्देशक की यही खूबी होती है कि वह 'मास और 'क्लास' के विभाजन को खत्म कर देता है। उसकी फिल्में समय की सीमा में आबद्ध नहीं रहतीं। समकालीन निर्देशकों में राजकुमार हिरानी एक सशक्त हस्ताक्षर हैं।


- आप नागपुर से हैं? नागपुर हिंदू संगठन आरएसएस का गढ़ माना जाता है। क्या उनसे कभी संसर्ग रहा या आप प्रभावित हुए ?
0 कॉलेज जाने तक मुझे पता नहीं था कि नागपुर आरएसएस का गढ़ माना जाता है । वहां उनका मुख्य कार्यालय है, पर ऐसा नहीं है कि आम आदमी ज्यादा प्रभावित होते हों। हां कुछ शाखाएं लगती हैं। बचपन में देखा करता था। लोग मैदानों में शाखाएं लगाते थे। पर ऐसा नहीं है कि मैं कभी उन शाखाओं में गया या इंफूलुऐंस रहा है उनका। हिंदू संगठनों का जितना असर मुंबई में है, वैसा ही वहां भी था। ऐसा नहीं था कि हिंदू लहर चल रही हो और सभी उसमें गोते लगा रहे हों।

- किस तरह का परिवार था अपका? आपके पिता जी क्या करते हैं? हैं अभी?
0 हां, मेरे पिता जी हैं। मम्मी-डैडी नागपुर में रहते हैं। संयुक्त परिवार है हमलोगों का। तब चाचा जी साथ में थे। मेरे डैड वास्तव में टाइपराइटिंग इंस्टीट्यूट चलता था। बैकग्राउंड यह है कि वे पार्टीशन के टाइम पर पाकिस्तान से आए थे। पार्टीशन के समय वह 14-15 साल के थे। उनके पिताजी नहीं आए थे। वे पाकिस्तान में ही गुजर गए थे। मां और भाई लोग थे साथ में। आगरा के पास है फिरोजाबाद। वहां कुछ दिनों तक हमारा परिवार रिफ्यूजी कैंप में रहा। पहले वहां काम किया। वहां से फिर काम खोजते-खोजते वे नागपुर पहुंचे। कुछ टाइम नौकरी की वहां पर। उस समय टाइपराइटर का नया दौर शुरू हुआ था। तो एक टाइपराइटर लिया... टाइप करते-करते टाइपराइटिंग इंस्टीट्यूट शुरू किया। फिर बाद में डिस्ट्रीब्यूटर बनकर कर टाइपराइटर बेचते थे। मेरी स्मॉल बिजनेस फैमिली है। परिवार के दूसरे सदस्यों ने बाद में पढ़ाई-लिखाई की। ज्यादातर वकील हैं सब मेरी फैमिली में। मुझ से भी उम्मीद की जा रही थी कि मैं पढक़र वकील बनूंगा। और मैंने बी कॉम किया भी। बी कॉम के बाद एक साल लॉ भी किया। मेरा शुरू से लगाव था थिएटर की तरफ। कॉलेज के दिनों में नाटक लिखा करता थां। ऑल इंडिया रेडियो युवावाणी एक प्रोग्राम आता था। उसके लिए भी कुछ नाटक लिखे थे। खूब जम कर थिएटर करते थे। छोटा सा ग्रुप था हमारा आवाज।

- थिएटर में किस तरह के प्ले किए जाते थे?
0 छोटा सा ग्रुप था हमारा। वहां मराठी थिएटर बहुत स्ट्रौंग था। हम तो मराठी में नहीं करते थे,पर देखते बहुत थे। चाहे वो महाराष्ट्र नाट्य महोत्सव हो, वह हर साल वहां होता था। हम कुछ लोगों ने मिलकर एक थिएटर ग्रुप शुरू किया था आवास। कुछ कॉलेज के लोग थे, कुछ बाहर के थे, कुछ प्रोफेशनल... रेगुलर बेसिक पर काफी प्ले करते थे। हर किस्म के प्ले किए। ज्यादातर मराठी के लिखे हुए। मराठी से रूपांतर या कुछ बंगाली प्ले से ट्रांसलेट कर के करते थे। रेगुलर शोज भी करते थे हमलोग। होता ये था कि हिंदी थिएटर इतना स्ट्रोंग था नहीं तो टिकटें खुद बेचनी पड़ती थी। लोगों को खुद बुलाना पड़ता था। पर मजा आता था,इसलिए करते थे। काफी साल किया। वहां से शौक जागा...

- वैसा थिएटर जो बंबई या दिल्ली में हो रहा था, गंभीर किस्म के नाटक... ?
0 हमलोग का वैसा नहीं था। हमलोगों की सोच थी कि आदमी खुद धक्के खाते हुए सिखता है... वैसा थिएटर था। कोई गाइड करने वाला नहीं था। चंद शौकिया लोग थे,वे जुड़ गए थे साथ में और नाटक करना चाहते थे। मगर यह था कि हमलाग रेगुलर बेसिस पर नाटक करते थे। मुझे याद है कि साल में दो-तीन प्ले तो करते ही थे। कॉलेज से बाहर प्रोफेशनल रूप से कुछ जुटा कर। उतना पैसा जमा कर लिया जाता था कि एक हॉल बुक कर सकें। पर गाइड करने के लिए कोई था नहीं। जैसा कि दिल्ली में एनएसडी ग्रुप था या मुंबई में दूसरे ग्रुप सक्रिय थे। हमलोग खुद से धक्के खाते-खाते रास्ता ढूंढ़ते हुए मिल जाते थे थिएटर के लोग। एक किशोर कुलकर्णी जी थे, वो हैं अभी भी। उनको हम ले आते थे। वह मराठी थिएटर डायरेक्ट करते थे। उन्होंने कुछ हमारे प्ले डायरेक्टर किए तो उनसे सीखने को मिला। वैसे सीखते-सीखते कुछ करते रहे। वहीं से शौक जागा कि फिल्मों में जाया जाए और फिल्मों में कुछ किया जाए।

- बचपन में तो फिल्में देखते रहे होंगे?
0 फिल्म तो बहुत देखते थे। अक्सर जाते थे।

- पारिवारिक आउटिंग होती थी या...?
0 मुझे बचपन का याद है कि मैं दादी के साथ किसी शनिवार या रविवार को... य़ा शायद महीने में एक बार उनके साथ फिल्म देखने जाता था। डैड नहीं जा पाते थे, वेे व्यस्त रहते थे। मैं उनके साथ रिक्शा में बैठकर जाता था। मैं और मेरा भाई... दोनों को वह अपने साथ फिल्म ले जाती थीं। भारत टॉकिज था वहां पर छोटा सा। बारह आने में टिकट मिलता था एक। नीचे स्टॉल में बैठकर देखता था। उनके साथ हमने बहुत फिल्में देखी।

- किस तरह की फिल्में? उनकी च्वाइस कैसी होती थी?
0 सारी फिल्में।

- ऐसा नहीं कि ये देखना और वो नहीं देखना है?
0 ऐसा कुछ नहीं था। मुझे याद है कि मैं इतना छोटा था कि जो फिल्म देखकर आता था उसका हीरो ही मेरा आदर्श बन जाता था। मुझे ये भी याद है कि नवीन निश्चल की फिल्म देखता था तो मुझे लगता था कि नवीन निश्चल जैसा कोई नहीं है। बचपन में... आठ-दस साल के उम्र में तो यही होता है। कॉलेज पहुंचने पर आदमी की च्वाइस बनती है।

- उन दिनों की देखी हुई पहली फिल्म के बारे में बताएं,जिसकी छाप आपके मन पर रह गई हो?
0 मुझे याद है... 'संगम'। 'संगम' मुझे याद है, जब मैंने देखी थी तो उस समय बहुत अच्छी लगी थी। जब से एक च्वाइस होने लगी कि मुझे इस टाइप की फिल्में देखनी हैं तो मैँने हृषिकेश मुखर्जी की फिल्में देखनी शुरू की। तब मुझे लगा कि इस तरह की फिल्म में मुझे मजा आता है। चाहे वो 'आनंद' हो या 'गोलमाल' हो चाहे वो 'चुपके चुपके' हो। मनमोहन देसाई की फिल्में देखा करते थे। वहां एक्सपोजर ज्यादा था नहीं। बाद में इंस्टीट्यूट गया...

- नागपुर में कितने थिएटर थे उस समय?
0 नागपुर में उस समय बाईस-तेईस थिएटर... अभी भी लगता है उतने ही हैं। इधर पहला मल्टीप्लेक्स बन रहा है। उनमें से आधे से ज्यादा में आप जा नहीं सकते थे। बहुत खराब कंडीशन में थे। चंद थिएटर ठीक थे घर के पास में, वहां जाकर देखा करता था।

- आपने बताया कि 'संगम' और कौन सी याद है?
0 याद कर रहा हूं , हां 'संगम' मुझे ज्यादा याद है।

- हीरो जो पहली बार पहचान में आया हो... कि ये फलां हीरो है?
0 ये मुझे लगता है कि अमिताभ बच्चन ही थे। स्कूल में ही थे उस समय। अमिताभ वाज ए हीरो। मुझे याद है कि हम साइकिल पर स्कूल जाते थे... चाल-ढाल भी फिर कुछ वैसी हो जाती थी। अचानक लगता था कि हम भी बेस में गहरी आवाज में बात कर रहे हैं। आयडलीज्म होता था। हम भी बेस में बात करते थे। उस टाइप के कपड़े पहनना चाहते थे। अब सोच कर हंसी भी आती है। मुझे याद है कि टेलर के पास गया था... उस समय मैंने अमिताभ की कोई फिल्म देखी थी। मैंने टेलर से कहा था कि मुझे उनके टाइप की शर्ट चाहिए। अब हंसते हैं... सब दोस्त जाते थे बनवाने के लिए। एक टेलर नागपुर में था, वो बना कर देता था। फिल्म देखकर शर्ट तैयार करता था। मुझे एक फिल्म याद है। वो फिल्म थी राखी, अमिताभ और विनोद मेहरा की फिल्म थी 'बेमिशाल'। उसमें अमिताभ ने जो शर्ट पहनी थी, वह हम कई दोस्तों ने सिलवाई थी। अमिताभ तो हम सभी के आदर्श थे।

- क्या चीजें अच्छी लगती थी? फिल्म देखने के लिए उत्साह क्यों होता था? सिर्फ देखने के लिए फिल्म देखना या वहां लड़कियां मिलेंगी या वहां दोस्तों के साथ मौज-मस्ती होगी, उद्देश्य क्या होता था?
0 फिल्म देखने का आनंद उठाना ही उद्देश्य होता था।
लड़कियां तो उस टाइम... काफी पहले की बात कर रहा हूं। नागपुर काफी रूढ़िवादी शहर था। उस समय शायद लड़कियां अकेली फिल्म देखने के लिए नहीं जाती थी। दोस्तों के साथ आउटिंग करने का… मस्ती करना शामिल रहता था। कोई भी बहाना ढूंढ़ लेते थे। एक दिन बारिश पर रही थी और मैंने कहा, मौसम अच्छा है यार, फिल्म देखते हैं। मुझे याद है कि मैंने मम्मी से जाकर कहा कि फिल्म देखने जा रहा हूं। परमिशन लेनी पड़ती थी। चाचा जी थे बाजू में ,उन्होंने पूछा क्यों? अभी क्यों जा रहे हो फिल्म देखने? मैंने कहा कि मौसम अच्छा है। उन्होंने पलटकर कहा, मौसम अच्छा है तो मौसम का आनंद लो न? फिल्म देखने क्यों जा रहे हो? था शौक और काफी देखा करता था फिल्में। मुझे याद है, वहां जब कोई नई फिल्म आती थी और पॉपुलर फिल्म होती थी, ऐसा लगता था कि चलेगी बहुत तो सुबह पांच बजे के शो हुआ करते थे वहां पर। मुझे याद 'कुर्बानी' फिल्म जब लगी थी तो सुबह पांच से साढ़े सात का शो होता था। फिर साढ़े सात का शो होताथा। इस तरह दो एडिशनल शो होते थे। पहला हफ्ता चलता था। वह सुबह के सात बजे के शो में काफी फिल्में देखी है मैंने। जब कॉलेज पहुंचा तो वह समय कॉलेज का होता था। सुबह सात बजे से कॉलेज होता था... तो कई बार निकल जाते थे। ऐसा नहीं कि अक्सर... पर कभी आदमी निकल जाया करता था। 'कुर्बानी' मुझे अच्छी तरह याद है। सात बजे का शो देखने के लिए यह सोच कर गया कि सात बजे का शो है तो लोग कम जाएंगे। पहला शो है टिकट मिल जाएगी। पहुंचे तो पता लगा कि पिछली फिल्म के दर्शक लाइन में लगे हैं। वहां गुरुवार को फिल्म लगती थी। यहां शुक्रवार को लगती है। बुधवार को लास्ट शो जो फिल्म लगी थी... वो खत्म हुआ तो उसको देखकर लोग थिएटर से निकले और रात को ही लाइन में लग गए सुबह की शो देखने के लिए। इतनी पॉपुलर हुई थी 'कुर्बानी' सात बजे का शो भी हाउसफुल था। देखनी है फिल्म यह सोच लिया था। मुझे याद है कि एक लडक़ा टिकट लेकर खड़ा था । बोल रहा था एक्सट्रा टिकट-एक्सट्रा टिकट । मैं और मेरा दोस्त था। मैंने कहा कि एक्सट्रा है तो दे दो यार। तो वह कहता है कि इतना ज्यादा लूंगा। यानी वो ब्लैक कर रहा था। ब्लैक मार्केटियरं नहीं था। वो लडक़ा था ऐसे ही था कोई... हमने ले ली टिकट। हम छोडऩा नहीं चाहते थे फिल्म। पैसे थे उतने... मैंने कहा कि दे दो। उस समय साढ़े पांच रूपये के टिकट होते थे। वो कुछ सात-आठ रूपये मांग रहा था। मैंने ग्यारह रूपये दिए और कहा कि इसमें इतना ही लिखा हुआ है। तुम ब्लैक कैसे कर सकते हो। वह बहाने करने लगा। उधर हम बेताब थे कि टिकट कैसे छोड़ दें? तो ले ली। पता चला कि वह भेला लडक़ा ब्लैक मार्केटियर ही था। क्योंकि हमारी बक-झक में तीन-चार हट्टे-कट्टे से लोग आ गए। हमने उसे बारह रूपये दिए थे। एक रूपया उसने वापस नहीं दिया। वो तीन-चार लोग जमा हो गए मेरे पास। एक कहता है आपने पैसे नहीं दिए? मैंने कहा दिया। वो सोलह मांग रहा था। डर रहे हैं कि कहीं मार न पर जाए। फिर भी कह रहे हैं कि इसमें ग्यारह लिखा हुआ है। तो वह कहता है - आपने तो बारह ही दिए उसको। आप क्या ब्लैक की बात करते हो? आप दिए तो? मैं कहा दिए तो, एक वापस करो न? डरे हुए थे। तो वो कहता है कि देख लेंगे। हमने कहा देख लो... दिल नहीं हो रहा था कि फिल्म छोड़ दें। हम जाकर बैठ गए सिनेमा हॉल में जाकर। मैंने कहा देखी जाएगी। बाद में वही लडक़ा आकर बगल में बैठ गया। उसने भी एक्सट्रा टिकट खरीदी। फिल्म खत्म हुई तो हम सामने के दरवाजे से नहीं निकले। हम पीछे से निकले। कहीं वो लोग रोक न लें। एक होता था आकर्षण उस टाइम फिल्में देखने का। और कोई इंटरटेनमेंट था नहीं। टेलीविजन नहीं था।

- फिल्में देखने के अलावा और क्या चीजें पसंद आती थी, जैसे लॉबिंग कार्ड देखना। मुझे याद है हमलोग बचपन में जाते थे, फिल्म देखने से पहले चार दिन लॉबिंग कार्ड ही देखकर चले आते थे?
0 इंटरवल में निकल कर देखता था। चलो ये-ये हो गया। अब ये-ये होने वाला है। ये बाकी है। लाबिंग कार्ड देख कर स्टोरी जज करने की कोशिश करता था। फिल्म इंटरेस्टिंग होगी कि नहीं? बहुत होता था। आजकल वो सब खत्म हो गया।

- फिल्मों से आपका लगाव बढ़ता गया,लेकिन आपने कब महसूस किया कि फिल्मों में ही जाना है?
0 जब थिएटर करने लगे तो फिर मुझे लगा कि अब मुझे फिल्म में कुछ करना है। मुझे लिखने का शौक था। और मैंने घरवालों से भी कहा।इसे सौभाग्य कहें मेरा। मेरी कोई जान-पहचान नहीं थी किसी फिल्म वाले से... क़ोई एसोसिएशन नहीं था। एक तरह से टिपिकल बिजनेस फैमिली। कुछ टाइम तक खटका, मुझे लगा कि शायद... लेकिन मेरे डैड को नहीं खटका। पर बाकी परिवार में सबको लगा कि ये क्या है?

- ये क्या है में क्या सवाल थे?
0 फिल्मों में जाने का मतलब उस समय नागपुर शहर में यही होता था कि एक्टर बनने जाने चाहता है। उनको यह नहीं समझ में आता था डायरेक्टर बनने जाना चाहता है। तो काफी लोग आरंभ में हंसते रह। पर मेरे डैड... उन्होंने कहा, तुम्हें जो करना है, वो करो। हम बोलेंगे ये करो तो उसका कोई फायदा नहीं। जब तक हो यहां हमारे साथ काम करो... बाकी फिर करना है तो करो। मुझे पता भी नहीं था कि फिल्म इंस्टीट्यूट है और वहां जाने का कोई तरीका होगा। तो मैं सोच रहा था कि बंबई आऊंगा किसी के साथ काम करूंगा। तो उन्होंने ही कहा कि करना है तो फिल्म इंस्टीट्यूट से होते हुए जाओ।

- उसके पहले बंबई कोई एक्सपोजर नहीं था आपका?
0 बंबई आ चुका था एक-दो बार। शहर देखा था मैंने। पर कोई कनेक्शन नहीं था। अनजाना शहर था। उसी वजह से डैड का कहना था कि अगर करना ही है तो ट्रेंड होकर करो। अपने-आप को ट्रेंड करो। हैव द प्रोपर एजुकेशन देन गो। वही मुझसे कहते रहते थे कि फिल्म इंस्टीट्यूट जाओ... फिर मैं फिल्म इंस्टीट्यूट गया। वहां से प्रोस्पेक्टस ले लाया। फॉर्म भेजा मैंने। मैंने बी कॉम किया था। ग्रेजुएशन के बाद अप्लाय किया। तो एडमिशन नहीं हुआ। मैंने डायरेक्शन के लिए अप्लाय किया था। तो फिर मैंने लॉ करना शुरू किया... मेरी फैमिली में सब वकील थे। मगर मन वहीं लगा रहा। लॉ करने के साथ प्ले भी करते रहे, कॉलेज में भी और और बाहर भी...।

- और इस बीच प्ले चलते रहे?
0 वो तो रेगुलर चलता रहा। मुख्य आकर्षण वही था। प्ले करते रहना है, लिखते रहना है। वो सब चलता रहता था। पहली बार एडमिशन नहीं हुआ,लेकिन टेस्ट देने के बाद थोड़ा सा पता चला कि कैसे होता है। इंस्टीट्यूट में गया था तो कुछ लोगों से मिला। मुझे पता चला इंस्टीट्यूट में एडमिशन के लिए करीब तीन-चार हजार लोग अप्लाय करते हैं हर साल। और बत्तीस सीट होती हैं टोटल। तो आसान नहीं है इतना। पता लगा कि आठ सीट होती थी हर कोर्स के लिए। मुझसे किसी ने कहा कि एडीटिंग में अप्लाय करो। अगर चार हजार लोग अप्लाय करते हैं तो दो हजार लोग डायरेक्शन के लिए करते हैं। एडीटिंग के लिए पांच-छह सौ लोग करते होंगे। उसमें ज्यादा चांस है। मैंने कहा कि मुझे कुछ आयडिया नहीं एडीटिंग क्या होता है। इतना था कि चलो एडीटिंग में घुस जाएंगे तो फिर डायरेक्शन कर लेंगे, वहां से कुछ हो जाएगा। तो अगले साल एडीटिंग में अप्लाय किया।

- अप्लाय करते समय ये दिमाग में था कि किस फील्ड में जाना है?
0 ये शौक था कि फिल्म बनाना है। क्योंकि प्ले डायरेक्ट करते थे नागपुर में तो यह दिमाग में था कि फिल्म डायरेक्ट करनी है। डायरेक्शन में नहीं हुआ तो सोचा चलो अब एडीटिंग में अप्लाय करते हैं। थोड़ा समझ में आ गया था कि किस तरह के पेपर्स होते हैं। दो टेस्ट होते थे। एक एप्टीट्यूड टेस्ट होता था, वो बैंक के एग्जाम जैसा होता था। वो आपका लॉजिक समझने की कोशिश करते थे। मैंने तैयारी शुरु की। फिर पढऩा शुरू किया फिल्मों के बारे में। वर्ल्ड सिनेमा समझने की कोशिश की। नेशनल सिनेमा समझने की कोशिश की, उस समय एक्सपोजर नहीं था।

- वो कौन लोग हैं जिन्होंने मदद की थी उस समय?
0 नहीं, मैं खुद गया था इंस्टीट्यूट। एक एग्जाम दे चुका था। वहां की लायब्रेरी देखी थी। पढऩा है तो पढ़ो। तो मैंने लाइब्रेरी में एक हफ्ता बिताया। वहां से मेरे लौटने के बाद नागपुर में एक फिल्म क्लब खुला ।

- आपने चालू किया?
0 नहीं। एक अलग ग्रुप था। उन्होंने शुरू किया। वल्र्ड सिनेमा आता था, फिल्म आरकाईव से फिल्में आती थीं। वो देखना शुरू हुआ। थोड़ा एक्सपोजर मिला। पूरी तैयारी के साथ एग्जाम दिया। उस साल सलेक्शन हो गया एडीटिंग में। अब लगता है कि अच्छा ही हुआ। एडीटिंग से आज मुझे इतनी मदद मिलती है। अगर डायरेक्शन कर के आता तो बहुत थयोरीटिक्ल कोर्स होता आज। एक टेक्नीकल बैकग्राउंड है। कहानी तो आदमी लिख लेता है। वह कोई आपको सीखा नहीं सकता शायद। फिर वहां से बंबई आया।

- बंबई में किनके साथ शुरू में?
0 एडीटिंग पास कर के आया था तो मैंने कुछ साल एडीटिंग की। हुआ यह कि... मुझे जब पहला टेलीग्राम मिला था मुझे एडमिशन का... आदमी, एक छोटे शहर से आया आदमी। ऐसा लगता था कि इंस्टीट्यूट में एडमिशन हो जाएगी बस लाइफ बन गई। हम निकलेंगे यहां से फिर फिल्म बनाएंगे। इसमें क्या है? प्रोब्लम क्या है? मुझे अभी तक याद है, जब टेलीग्राम आया। टेलीग्राम आता था,यू हैव बिन सलेक्टेड फोर दिस कोर्स... मैं उसको रख नहीं पा रहा था नीचे। मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि एडमिशन हो गयी। मैं देख रहा हूं। ऐसे देख रहा हूं। यार अब तो लाइफ हो गया सेट... अब जाएंगे तीन साल कर के निकलेंगे। और हो जाएंगे। देखता रहा, पता नहीं कितने घंटों तक मैंने देखा रहा होगा। मैं नागपुर से पहला व्यक्ति था इंस्टीट्यूट जाने वाला।

- यह किस साल की बात होगी?
0 84 से 87 तक था मैं इंस्टीट्यूट में। यह 84 की बात है। फिर बस पहुंच गए इंस्टीट्यूट। सात दिन में पता लग गया कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है कि हम यहां से निकलेंगे तो दुनिया चेंज हो जाएगी। अभी तो हम सीख रहे हैं। बाहर जाकर कुछ और सीखना है। ऐसा कुछ नहीं है। वो बड़ा इंटलेक्टचुअल सी जगह थी। जाते ही स्ट्राइक हो गई इंस्टीट्यूट में... रैगिंग होती थी। कहते थे खड़े होकर चिल्लाओ। वांट मोर स्टॉक, वी वांट फलेक्सीबिलिटी। न हमको स्टॉक समझ में आता था और न फलेक्सीबिलिटी समझ में आती थी। खड़े होकर चिल्ला रहे हैं नहीं तो रैगिंग होती थी। तो वो बड़ा इंटलेक्चुअल सा माहौल था वहां पर। कोई भी कुछ भी बोलता था। थोड़ा सी छद्म बौद्धिकता थी वहां पर। तो मैं डीप्रेशन में आ गया था। और मैं वापस आ गया नागपुर। फिर बीस-पच्चीस दिन बाद टेलीग्राम आया कि वापस आ जाओ। मृणाल सेन आ रहे हैं। गर्वनिंग कॉन्सिल के मेंबर हैं। उनकी मीटिंग है। उनका घेराव करना है। तो हम पहुंच गए वापस। मृणाल सेन आए, उनका घेराव किया गया। पुलिस आई, पुलिस सबको पकडक़र ले गई। अस्सी स्टूडेंट थे जेल में बैठे। मैं सोच रहा था मैं आया था फिल्म बनाने, यहां पुलिस स्टेशन में बैठे हुए हैं। बहुत डिप्रेशन में आ गया। स्ट्राइक खत्म हुई तो फिर आए। फिर क्लासेस शुरू हुए। वहां से फिर कांफिडेंश वापस आया। जब काम करना शुरू किया, जब स्टील कैमरे दिए जाते थे, जाकर शूट करते थे। फिर यह फीलिंग आने लगी कि नहीं यार हम जानते हैं। ऐसा नहीं है कि ... ये इंटलेक्चुअलिज्म अपनी जगह पर है। कांफिडेंश वापस आया फिर इन्जॉय करने लगा आदमी। और आज मैं देखता हूं तो मुझे लगता है कि वो तीन साल कल बीते हैं।

- आपने थिएटर का अभ्यास किया था। फिल्म इंस्टीट्यूट में तो विजुअल मीडियम के हिसाब से ट्रेनिंग चल रही होगी। कितना आसान रहा देखने और सोचने में आया बदलाव?
0 इंस्टीट्यूट ट्रेंड कर रहा था। हमलोग सीख रहे थे। पुराना भूल गया था। क्योंकि जब एक बार छुट्टी में घर गया तो... बाकी ग्रुप के लोग लोग प्ले कर रहे थे। मैंने सोचा फिर प्ले करूंगा। एक प्ले था कोई डायरेक्ट कर रहा था, मैं एक्ट कर रहा था ... तब मुझे लगा कि मैं भूल गया हूं। अब मेरे लिए ये मुश्किल है ... सच कहूं तो खुसुर-पूसुर करके सब लोग बात करते थे कि इसको हो क्या गया है। पहले तो बहुत अच्छा करता था। अब ठीक से नहीं कर पा रहा है। थोड़ा सा हो गया था कुछ,बदल गया था। उस माहौल से निकल कर इस माहौल में ढल गया। कई सालों तक लगता रहा कि अभी थिएटर करना चाहिए था। लेकिन अब नहीं लगता है।

- प्रशिक्षण कितना जरू री मानते हैं?
0 मैं समझता हूं कि बहुत जरूरी है ट्रेनिंग। ऐसा नहीं कि लोग डायरेक्ट नहीं सीखते हैं। डायरेक्ट भी सीखते हैं। हमको लगता है कि औपचारिक ट्रेनिंग का फायदा यह है कि आप सब कुछ व्यवस्थित ढंग से सीखते हैं। आपको हर चीज मिल जाती है। आप पहले दिन से कैमरा लेकर खड़े हो जाते है। आप समझते हैं कि लेंसिंग क्या होता है? लाइटिंग क्या होता है। लैप क्या होता है? स्टॉक क्या होता है। यहां पर आप सीखना भी चाहो तो ... किसी को असिस्ट करोगे तो आपको पहले पता नहीं होगा। कैमरामेन आपको थोड़े ही झांकने देगा कैमरा में से। वो आपको नहीं बताएगा कि लेंस क्या होता है। वह तो काम कर रहा है। अगर आप वह सीख कर आओ यहां पर तो ... फिर देखो और करो तो यहां आसान है। ये नहीं कह रहा हूं कि ऐसे नहीं सीख सकते हैं। पर औपचारिक ट्रेनिंग बहुत बेहतर है। ट्रेनिंग से खराब स्टूडेंट भी निकलेंगे, अच्छे स्टूडेंट भी निकलेंगे। हर मेडिकल कॉलेज से निकला हुआ डाक्टर जरूरी नहीं कि अच्छा डॉक्टर होगा। पर आपको एक वातावरण मिलता है सीखने के लिए। अब आप उसका कितना फायदा उठाते हैं। इंस्टीट्यूट में पूरा माहौल मिलता है। कमाल की लाइब्रेरी उपलब्ध है। जो फिल्म आप देखना चाहो। वल्र्ड सिनेमा आपके पास उपलब्ध है। आपके सारे दोस्त दिन भर सिनेमा पर बात कर रहे हैं। माहौल कमाल का मिलता है। साइड इफेक्ट भी है। आप इंटलेक्चुअल हो जाओ। आप एटीट्यूड दिखाना शुरू कर दो आप सोचने लगो कि कुछ हो तो आप बिखर भी सकते हो। पर आप उसको पॉजिटीवली लो तो आपको बहुत फायदा होगा। मुझे लगता है कि मुझे आज भी कोई कहे जाकर पढ़ाई करो कहीं तो मैं झट से तैयार हो जाऊंगा। सच कहता हूं,मन करता है कि कुछ चीजें अभी भी कहीं जाकर सीखना चाहिए। छोटा कोर्स छह हफ्ते का या महीने-दो महीने का करना चाहिए। म्यूजिक के बारे में थोड़ा और जानना चाहता हूं। मन करता है कि किसी दिन जाकर चेक करूंगा।

- मुंबई आने के बाद पहला जॉब क्या किया आपने?
0 पहला काम किया एडीटिंग का। एक एड फिल्म की मैंने। भरत रंगाचारी फिल्ममेकर थे। उन्होंने एक एड फिल्म बनाई थी। उनकी एड फिल्म एडिट की। उसके बाद रेणु सलूजा ने मुझे ट्रेक्लींग का काम दिया। एक डाक्यूमेंट्री थी उस पर काम किया।

- डायरेक्टर का नाम क्या था?
0 एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी शबनम ने। रेणु एडिट कर चुकी थी। उसके बाद साउंड का काम करना था। दो काम किए,उसके बाद फिर दो-तीन महीनों तक कुछ काम ही नहीं था।

- काम नहीं मिलने पर पैसों की दिक्कत रही होगी ?
0 इंस्टीट्यूट में स्कॉलरशिप मिलती थी। फीस बहुत कम थी। 257 रूपये भरा करते थे हमलोग एक सेमेस्टर का। समझ लीजिए कि हमलोग मुफ्त में ही पढ़ते थे। चार-पांच सौ रूपये महीने में हो जाता था। चार सौ रूपए स्कॉलरशिप मिलती थी। हर ग्रुप में दो लोगों को मिलती थी।

- वहां ड्रग्स से कैसे बचे आप?
0 इंस्टीट्यूट में ड्रग्स का कभी प्रोब्लम नहीं रहा। मुझे नहीं लगता कि कोई भी ड्रग्स लेता था। दारू वहां बहुत चलती थी इंस्टीट्यूट में। दारू वहां बहुत पीते थे लोग,लेकिन वह सीरियस लेवल पर नहीं था। एकाध होगा कोई ऐसा मामला ... हर कॉलेज में जितना होता है, उतना होता था। यह धारणा है वहां के बारे में ... हमारे टाइम पर नहीं था। आप जो समस्या कह रहे हैं, वो समस्या तो नहीं थी,पर आने के बाद दो-तीन महीना काम नहीं था। फिर कुछ छोटा सा मिलता था। तो वो पहले छह महीने मैं कहूंगा कि थोड़ी दिक्कत थी। उस समय फैमिली ने सपोर्ट किया।

- अकेले रहे या दोस्तों के साथ रहे? किस इलाके में रहे?
0 हुआ ये मेरे साथ, मुझे याद है ... मेरा डिप्लोमा फिल्म खत्म हुआ सबसे पहले। डिप्लोमा फिल्म खत्म कर के मैं चला गया नागपुर शहर।

- क्या नाम रखे थे डिप्लोमा फिल्म का?
0 एट कॉलम अफेअर। वहां ग्रुप बनते थे। चार लोगों का एक डायरेक्टर होता था। एक कैमरामेन, एक एडिटर। मेरे साथ डायरेक्टर थे श्रीराम राघवन। वो मेरे बैच में थे। अभी उन्होंने एक हसीना थी डायरेक्ट की थी। श्रीराम राघवन डायरेक्टर, हरिनाथ कैमरामेन थे, मैं एडिटर था। डाक्यूमेंट्री बनाई जिसको नेशनल अवार्ड भी मिला था बाद में। फिल्म बनाई और मैं चला गया। हमारा एक वीडियो कोर्स होने वाला था। दो महीने का कोर्स था। उसके लिए मैं लौटकर आया एक महीने के बाद । तो पता लगा कि वह कोर्स नहीं होने वाला है। इसका मतलब हमारा तीन साल का कोर्स खत्म हो गया अब आप जाइए। मैं गया तो पता लगा कि हमारे रूम से हमारा सामान निकाल दिया गया था। एक हॉल में रख दिया गया था। जिसको हम अपना घर समझते थे। वहां जाकर पता चला कि वो घर है ही नहीं। सारे स्टूडेंट बंबई या कहीं और भी जा चुके थे। और मुझे किसी ने खबर नहीं की थी। मुझे याद है, मैं पूरा दिन बैठा रहा कैंपस में न कमरा था अपना न कुछ और। जिसे हम अपना घर समझते थे, वहां अचानक असहाय बैठे थे। अब करें क्या? पूरा दिन मैं सोचता रहा कि अब मैं करूं क्या? मैं बंबई जाऊं कि मैं नागपुर जाऊं? क्योंकि मैं कहीं जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था। मुझे लग रहा था कि दो महीने का कोर्स खत्म होगा उसके बाद बंबई के लिए तैयारी करेंगे। बंबई में घर था न ठिकाना था। नागपुर जाकर कोई फायदा नहीं है। आना तो फिर बंबई ही है। फिर मैंने कहा अभी चलते हैं। मैंने वहां से एक बैग पैक किया और बाकी सामान को हॉल में छोड़ा। मैंने सोचा कि बाद में आकर पिकअप करूंगा कभी। एक बैग लेकर मैं ... एशियाड बस चलती थी उस समय। बस पकडक़र मैं बंबई पहुंचा था सुबह पांच बजे। मैं सीधा गया था श्रीराम राघवन के यहां। उनका घर है यहां पर। उसके घर गया, बेल बजाई, उसने दरवाजा खोला, वो हंसता हुआ मुझे देख रहा था। मैंने गालियां दी। तू साला बताया नहीं मेरे को ... उसने कहा कि मैंने जानबूझकर डिसाइड किया कि नहीं बताएंगे तुमको। आने दो पता लगेगा फिर। मालूम था कि यहीं आओगे तुम। उसका बंबई में मकान था। उसके माता-पिता पूना में रहते थे। अंदर गया तो हमारे तीन और बैचमेट सोए हुए थे, गद्दे डाल के। वो नींद में थे। मैं भी जाकर सो गया। सात बजे मुझे याद है कि सिक्कों की आवाज आने लगी। खट-खट-खट सिक्के ... उठा, देखा तो सब एक-एक रूपए के क्वाइन गिन रहे थे सब लोग। क्योंकि नीचे एक फोन बूथ होता था। और घर पर फोन नहीं था। वो फोन बूथ में जाकर सुबह लग जाते थे ... एक फिल्म की डायरेक्ट्री होती थी सबके पास। डायरेक्ट्री लेकर सब फोन करते थे। जो कैमरामेन होगा तो वो कोई कैमरामेन को फोन करेगा जॉब के लिए। मैंने देखा, बोला मर गया यार। कठोर सच्चाई दिखने लगी ... ये क्या हो रहा है। मैं बैठा रहा। पूरा प्रोसेस ही होता था कि आज इसको मिलना है, आज इस डायरेक्टर को मिलना है। वो सब चलता रहता था। अगले दिन मेरे पास भी वही था। मैं डायरेक्ट्री लेकर बैठा हुआ था। कुछ सिक्के थे और सुबह से फोन लगा रहे थे। फोन लगाते थे, फिर लोगों को मिलते थे। संयोग से मुझे पहले हफ्ते में ही पहला काम मिल गया। उसके कुछ पैसे मिले। मगर उसके बाद छह महीने तक कोई काम नहीं था। फिर वो वीडियो कोर्स आ गया। दो महीनों के लिए फिर से फिल्म इंस्टीट्यूट गए। वहां से जब लौटकर आए तो लगा कि काम ऐसे मिल नहीं सकता है। हम उम्मीद में बैठे हुए थे। हम लोगों से मिलते थे लेकिन किसी को विश्वास नहीं होता था। वो आपके साथ क्यों काम करेगा। हमको पता है कि शायद हम काम में अच्छे हैं। पर उसको तो नहीं पता है। फिर मैंने एक एडीटिंग रूम ज्वाइन किया। एक स्टूडियो था एकता वीडियो, सांताक्रूज में, उस समय वीडियो का टेक्नोलॉजी शुरू हुआ था। लो बैंड में एडीटिंग होता था। यह 1988 की बात है। वहां पर मैंने जॉब किया। उस समय ऐसा नहीं लगता था कि कोई स्ट्रगल कर रहे हैं। जिसको सोचो तो ... मजा आता था।

- उस समय शादी नहीं हुई थी क्या ?
0 मेरी शादी 1994 में हुई।

- कोई इमोशनल अफेयर या कोई गर्ल फ्रेंड ... इन व्यस्तताओं से बचे हुए थे?
0 कुछ नहीं, बचे हुए नहीं थे। वंचित थे।

- सोच रखा था या ...?
0 बिल्कुल नहीं, कोई मिल जाती तो बड़ी खुशी होती। वहां मुझे बारह सौ रूपए मिलते थे। हुआ ये कि वहां, एकता वीडियो में,लोगों से मिला। वहां लोग एडीटिंग करने आते थे। एडिटर लेकर आते थे। जिसको एडिटर नहीं होता था उसके साथ हम काम करते थे। उसमें छह महीना काम किया। वहां टीवी के काम आते थे। सीरियल का काम होता था ज्यादातर। मैंने सीरियल को एडिट करना शुरू किया। फिर कांटेक्ट बन गया। एडवर्टाइज में एक बार किसी के लिए काम करो, उसको आपका काम पसंद आता है तो आपको फिर से बुलाता है। वहां छह महीना और बाहर छह महीना फ्रीलांसिंग करने के बाद मुझे नियमित रूप से एडिटींग का काम मिलना शुरू हो गया। फिर एक दिन भी फ्री नहीं होता था। एक फीचर फिल्म भी एडिट की मैंने।

- फीचर फिल्म कौन सी थी?
0 अनंत बनानी की फिल्म थी 'जजबात'। उन्होंने खुद प्रोड्यूस की थी, पर वह चली नहीं। जॉय ऑगस्टीन ने एक फिल्म बनाई थी। उनकी पहली फिल्म,जो आधे में ही बंद हो गई थी। वो एडिट की। तो मेरा फिल्म का ऐसा एक्पीरियेंस रहा कि एक फिल्म की, वो चली नहीं तो पैसे नहीं मिले उसके। फिर दूसरी की वो बंद हो गई उसके भी पैसे नहीं मिले। काम इतना रहता था कि फीचर फिल्म उस समय स्टीनबेक पर होता था। छह-छह महीना एडिट करो फिर पैसे नहीं मिलें तो ... अचानक लगने लगा कि यार ये दुकान सरवाइव नहीं कर रहा है। उस दौरान मैं एडवरटाइजिंग के कुछ लोगों से मिला। उनके लिए एड फिल्में तैयार की। वहां कुछ अच्छे किस्म के लोग मिले। जो टिपिकल फिल्मी नहीं थे। वे अच्छे लोग थे और उनसे मिलने-जुलने में अच्छा लगता था। धीरे-धीरे पता नहीं कैसे अपने आप एड फिल्म में रूचि जागी। एड फिल्म एडिट करते-करते ... कुछ डायरेक्ट करने के लिए भी मिल गई। एक आदमी चाहता था डायरेक्टर । फिर डायरेक्ट करना शुरू कर दिया। वो फिल्में बनने लगी। फिर वहां से प्रोड्यूस करना शुरू कर दिया। करते-करते एड फिल्म की प्रोड्क्शन कंपनी बन गई। गुड वर्क ... वो चलता रहा। फिर उस बीच विधु विनोद चोपड़ा की मिशन कश्मीर मिल गई।

- इस बीच डायरेक्टर बनने का सपना कैसे बचाए रखा। क्या ऐसा नहीं हुआ कि एडिटिंग में पैसे आ रहे हैं तो आप संतुष्टï होकर इसी काम को आगे बढ़ाते रहें?
0 मैं नागपुर से यह नहीं सोचकर आया था कि मैं डाक्यूमेंट्री बनाऊंगा या एड फिल्में करूंगा। मुझे नहीं लगता कि कोई यह सोच कर आता है। हो सकता है कुछ लोग डाक्यूमेंट्री या एड फिल्म का ही सोच कर आते हों। हमें नागपुर में तो मालूम ही नहीं था कि एड फिल्में क्या होती हैं? जब इंस्टीट्यूट गए थे तो टेलीविजन भी नहीं था आज जैसा।। ये था कि फिल्में करनी है तो सौ प्र्रतिशत फिल्में ही बनानी हैं। पर सही दरवाजा नहीं मिल रहा था। न ठीक किस्म के लोग मिल रहे थे। लोगों से मिलना-जुलना बहुत मुश्किल होता था। फीचर फिल्म में मेरा एक्सपोजर इतना इच्छा नहीं रहा था। फिर विनोद के साथ जब मिलना शुरू हुआ तो कुछ मजा आया। लगा कि यार यह आदमी लगन वाला है। इनके साथ काम करने का मजा है। कुछ आदमी पैसे के लिए सब कुछ करते हैं। और कुछ मजे के लिए काम करते हैं। मुझे याद है, हम इंस्टीट्यूट में जो फिल्में बनाते थे, उसमें कोई कमर्शियल दृष्टिïकोण नहीं होता था। फिर भी जितना मजा वह फिल्म बनाने में आता था। बाहर किसी एड फिल्म में नहीं आया। क्योंकि आप यहां किसी के लिए बना रहे हो। यह सोचकर कि उसको ये प्रोडक्ट बेचना है तो उस हिसाब से पैकेज करना है। इंस्टीट्यूट में सारे लोग मिलकर पैसेनेटली, सारे स्टूडेंट अपनी एक्सरसाइज करते थे। इसको ऐसा बनाएंगे। एक्सपलोर करेंगे, ये करेंगे, वो करेंगे। फिल्म बनती थी स्क्रीन होती थी। देखते थे। वास्तव में कई बार ऐसा लगता था कि रीढ़ की हड्डी सीधी है। चलते थे हम तो चाल में फर्क आ जाता था। मजा आता था। वह मजा मुझे वापस 'मुन्नाभाई' में मिला। मैंने और कुछ नहीं सोचा, इसलिए फिल्म बनाई कि मजा आ रहा है बनाने में।

- 'मिशन कश्मीर' के बाद कैसे बात बनी। विनोद ने सुझाव दिया या आपने उनसं आग्रह किया?
0 विनोद ने कभी किसी और के लिए फिल्म प्रोड्यूस नहीं की थी। वे खुद के लिए फिल्में बनाते थे। मुझे उनकी फिल्म एडिट करने में बहुत मजा आया। पहले भी एडिट कर चुका था, पर इतना मजा नहीं आया था जितना मजा इनके साथ काम करने में आया। तो उसके बाद मैं वापस गया तो सोचा कि अब अगर मैं फिल्म नहीं बनाऊंगा तो शायद कभी नहीं बना पाऊंगा। पहले होता यह था कि एड फिल्में करते थे। एक हफ्ते का गैप मिलता फिर सोचते थे कि चलो स्क्रिप्ट लिखेंगे। फिर एक हफ्ता लिखते थे। फि र एड फिल्म आ जाती थी। तीन महीने तक फिर कुछ नहीं करते थे फिर एक हफ्ते करते थे। ऐसे में सालों साल निकल गए। स्क्रिप्ट पूरी ही नहीं होती थी। अगर होती भी थी तो पसंद नहीं आती थी।

- तब तक शादी हो गई थी, बच्चे वगैरह हो गए थे?
0 हां, शादी हो गई थी। बच्चे भी हो गए थे। मेरी पत्नी काम करती हैं। आर्थिक परेशानी नहीं थी।

- आपकी पत्नी किस जॉब में थीं?
0 मेरी पत्नी इंडियन एअरलाइनस में है। तकलीफ नहीं थी। मैंने काफी काम किया था तो पैसे भी बचाए थे। मैं साच कर देखा कि अगर मैं एक साल काम न करूं तो भी सरवाइव कर सकता हूं। फिर मैंने कहा कि छह महीने ट्राई करता हूं। नहीं होगा तो फिर वापस करेंगे। ऐसा नहीं था कि काम नहीं मिलेगा। तो मैंने छह महीना सब कुछ बंद कर दिया। ऑफिस में फैक्स मशीन से स्क्रिप्ट आती थी। मैं देखता भी नहीं था। ऑफिस सब लोग डर गए थे। स्टॉफ लोग बोलते थे कि पागल हो गया है। छह महीने के बाद मुझे लगने लगा कि स्क्रिप्ट ठीक है तो मैं विनोद से मिला उस समय। यह सोचकर नहीं कि वे फिल्म प्रोड्यूस करेंगे। यह सोचकर कि मिलने गया कि आप कुछ एक्टरों से मिला दीजिए मुझे। और मैं चाहता हूं कि कोई एक्टर मान जाए तो फिर कोई फाइनेंस भी कर देगा। मेरा अपना प्रोड्क्शन हाऊस था। मैंने सोचा कोई फाइनेंसर मिल जाएगा तो मैं बना सकता हूं। बनाने का तो एक्सपीरियेंस था। उन्होंने कहा किस से मिलना है। उन्होंने कहा कि ऐसे कैसे तुम्हें किसी से मिलवाऊं। पता नहीं तुम क्या बनाना चाहते हो। फिर मैंने उन्हें स्क्रिप्ट सुनाई। उनको स्क्रिप्ट अच्छी लगी। उन्होंने कुछ सुझाव दिए। ऐसा-ऐसा करो। एक-दो महीने तक हमलोग मिलते रहे।

- पहले से स्टोरी आपके पास थी?
0 मेरे पास एक स्टोरी थी । तीन स्टूडेंट हैं, जो मेडिकल कॉलेज में हैं। उनकी एक स्टोरी थी मेरे पास में। मेरे बहुत दोस्त हैं। नागपुर में 12वीं के बाद आदमी या तो मेडिसीन करता था या इंजीनियरिंग करता था। मैं इंजीनियरिंग करना चाहता था। मेरे बहुत सारे लोग दोस्त जो 12वीं के बाद मेडिकल करना चाहते थे। मैं तो घुस नहीं पाया इंजीनियरिंग में। मेरे बहुत सारे दोस्तों इंजीनियरिंग में चले गए थे। बहुत सारे दोस्तों को मेडिकल में एडमिशन मिल गई थी। वही दोस्त थे। मैं बी कॉम कर रहा था। सुबह सात से दस कॉलेज होता था,उसके बाद फ्री। तो नाटक करते थे। उसके रिहर्सल चलते रहते थे। हमारे ग्र्रुप में कुछ मेडिकल के लडक़े थे। उन्हें कम समय मिलता था तो हम उनके हॉस्टल में जाकर रिहर्सल करते थे। मैं मेडिकल कॉलेज में बहुत जाता था। जाता था तो बहुत सारी चीजें दिखाई देती थी। और लिखने की आदत थी। एक डायरी साथ में रखते थे। जो थॉट आए लिख दो। वो थॉट इंस्टीट्यूट में भी मेरे साथ रहे। इंस्टीट्यूट से निकलने के बाद एक स्क्रिप्ट बनाई थी। मेडिकल कॉलेज के तीन स्टूडेंट की कहानी थी । उस कहानी में हंसी के प्रसंग बहुत थे। रोचक थे सीन, लेकिन उनको जोडऩे के लिए कोई कहानी नहीं थी। सीन पढ़ो तो मजा आता था मगर जोड़ता नहीं था। इसलिए वह हमेशा पड़ी रहती थी। फिर हमने दूसरी स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की वह पूरा किया। 'बाबूजी धीरे चलना' लेकिन उसमें मजा नहीं आ रहा था। वह संभल नहीं रही थी। एक मरीज है जो मर जाता है, बाद में भूत बनकर आता है और वो बताता है। वो बताता है कि क्या-क्या हुआ उसके साथ। मेडिकल सिस्टम पर टिप्पणी थी। वह थोड़ी बेहतर हुई। फिर भी मुझे लगा कि यार यह रीयल नहीं है। फिर एक दिन ये ख्याल में आया कि अगर एक भाई मेडिकल स्कूल में आ जाए । ऐसा लगा कि बहुत मस्ती भी हो सकती है। और उसके जरिए हम टिप्पणी भी कर सकते हैं। 'मिशन कश्मीर' के बाद वह थॉट आया। तब लिखना शुरू किया मैंने। जब मुझे लगा कि यह कहानी बन सकती है तो छह महीने उसे लिखा।

- फिर वह कहानी विनोद को सुनाई़?
0 हां, उनको सुनाई। उनको पसंद आई। कुछ सवाल थे उनके। दो महीने और काम किया। मुझे कु छ समय के लिए लगा कि मुझे बोल रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन मुझे किसी से मिला क्यों नहीं रहे हैं। केवल सलाह देते रहे और मैं करता रहा। फिर एक दिन उन्होंने पूछा कि कौन प्रोड्यूस कर रहा है। मैंने कहा हैं कुछ लोगों से बातें हुई हैं। बात हुई भी थी, लेकिन फायनल नहीं थी। उन्होंने मुझ से कहा कि मैं इसको करता हूं। हां, मैं प्रोड्यूस करता हूं। तो फिर वहां से बात आगे बढ़ी कि किस के साथ काम करनाचाहिए। फिर उन्होंने सलाह दी कि शाहरुख के साथ करो। मैंने सोचा और क्या चाहिए।मन में गुदगुदी उठी कि पहली फिल्म शाहरुख के साथ। उन्होंने शाहरुख को फोन किया मैंने जाकर स्क्रिप्ट सुनाई। वह 'देवदास' की शूटिंग कर रहे थे। मैंने स्क्रिप्ट उन्हें दे दी। मैं सुनाने गया था, लेकिन उन्होंने कहा कि टाइम नहीं है। स्क्रिप्ट छोड़ जाओ, मैं पढ़ लूंगा। मैंने मन में सोचा ये तो पढ़ेगा नहीं। उन्होंने स्क्रिप्ट पढ़ी और दूसरे दिन फोन किया और कहा कि मुझे स्क्रिप्ट अच्छी लगी है,मिलते हैं। फिर एक महीना तक मैं उनसे रोज मिलता रहा। बहस चलती रही । मैंने महसमस किया कि स्क्रिप्ट पसंद आने के बाद वह मुझे परख रहे थे कि ये है कौन? बना पाएगा कि नहीं। फिर एक महीने के बाद उन्होंने हां की। तय हुआ कि हम साथ में काम करेंगे।

- जबकि विधु विनोद चोपड़ा आपके साथ थे?
0 आदमी सोचता है न कि डायरेक्टर कौन है। क्या है? वह सुपरस्टार हैं। क्यों काम करें किसी नए डायरेक्टर के साथ। फिर उनकी गर्दन की तकलीफ सामने आई। वह ऑपरेशन करवाने चले गए। फिर पता लगा कि साल भी लग सकता है। दो साल भी लग सकते हैं। क्योंकि वह काफी फिल्में कर रहा थे उस वक्त। तब संजय दत्त का नाम आया। और मैं बड़ा चौंका था। उस समय लग रहा था कि एक प्रोजेक्ट शाहरुख के साथ हो रहा था और वह रुक गया। अब वही फिल्म संजय के साथ करनी होगी। बाद में लगा कि इससे ज्यादा कोई भी आदमी इस रोल को शूट नहीं कर सकता है। एक तरह से अच्छा ही हुआ।

- इस फिल्म के निर्माण के दौरान कभी ऐसा निराशा नहीं हुई कि पता नहीं फिल्म बन पाएगी कि नहीं बन पाएगी? क्या होगा?
0 नहीं, दो साल लगे। 2000 में 'मिशन कश्मीर' खत्म हुई थी। अक्तूबर से मैंने लिखनी शुरू की थी। 2001 के मध्य में विनोद को सुनार्ई। विनोद के हां कहने के बाद भी दो साल लगे इस इस फिल्म के शुरू होने में। पर मुझे विनोद ने आश्वस्त कर दिया था। इसलिए कांफिडेंस था । विनोद ने कहा था कि यह फिल्म बनेगी जरूर। हम बनाएंगे। थोड़ा टाइम लगेगा। ऐसी निराशा नहीं थी। विश्वास था कि विनोद कह रहे हैं तो फिल्म रजरूर बनेगी। पर चिंता होती थी। आदमी काम नहीं कर रहा था। एड फिल्म बंद कर दी थी तीन साल से। काम नहीं करने का अपना दबाव काम करता है। अगर पैसे की कमी होती थी तो बीच में एक एड फिल्म कर लेता था। मुझे डर कभी नहीं लगा। पहले और दूसरे मुन्नाभाई में भी तीन साल का गैप रहा। मुझे लगता है कि आप पैसे के पीछे लगातार भागते रहेंगे तो फिर आप पैसे ही कमाते रहेंगे। फिर आप स्क्रिप्ट नहीं लिख सकते। आप आराम से लिखो। पैसे तो आ ही जाते हैं, कहीं न कहीं से घूम-फिर कर कहीं-कहीं से।

- अगर प्रभाव की बात पूछूं तो आप किन निर्देशकों के नाम लेंगे? एक तो विधु विनोद चोपड़ा की संगत का असर हो सकता है। बाकी कौन?
0 हिंदी सिनेमा से प्रभावित रहा। हृषिकेश मुखर्जी का सबसे बड़ा प्रभाव है। उनकी बहुत फिल्म मैंने देखी हैं और वे मुझे अच्छी लगती हैं। आज भी वो फिल्में याद है। उस दिन 'आनंद' की बात निकली तो मैंने उसकी कविता सुना दी। मुझे पूरी कविता याद थी आनंद की 'मौत तू एक ... ' मैं भी चौंका था। बचपन में देखी थी वह फिल्म। तो फिल्में याद रह जाती हैं। गुलजार साहब के फिल्मों का काफी प्रभाव रहा है। उनकी सारी फिल्में पसंद हैं मुझे। व्यक्तिगत स्तर पर विनोद से मिलने के बाद कहुत सारी बातें समझ में आईं। उनसे सिनेमासे अधिक जिंदगी जीने का एक अंदाज सीखा है। विनोद बिल्कुल गैरफिल्मी व्यक्ति हैं। साफ दिल और ईमानदार किस्म के आदमी हैं। थोड़ा मिसअंडरस्टुड आदमी, क्योंकि वो बोलते हैं फटाफट बोल देते हैं। मैं उनको बहुत नजदीक से जानता हूं। मैं देखा है कि बहुत साफ हैं। हर स्थिति में वो एक ही चीज लेकर चलते हैं कि मुझे फेअर रहना है। वो बहुत सिद्धांतवादी हैं। मैंने उनसे बहुत सीखा है। कैसे वह अपनी फैमिली को देखते हैं? कैसे अपने काम को हैंडल करते हैं? कैसे अपनी निजी जिंदगी संभालते हैं। विनोद से कमाल का एटीट्यूड सीखा। उसने मुझे थोड़ा सा निडर बनाया। मुझे ऐसा लगता है कि उससे मेरी असुरक्षा खत्म हो गई। ऐसा नहीं था कि पहले कोई असुरक्षा थी, पर काफी फर्क पड़ा है। आदमी को डर रहता है कि काम न करूं तो क्या होगा? थोड़ा बहुत होता था कभी। पर अब बिल्कुल नहीं होता। बड़े निडर किस्म के आदमी हैं वह। लोगों को डर रहता है न कि अब मैं ये नहीं करूंगा तो क्या होगा? ये क्या बोलेगा मेरे बारे में, पैसा कमाना जरूरी है। अब बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता है। बहुत ज्यादा इस चीज का असर हुआ है मुझ पर उनका। वैसे ही काम करूं। उनका भी पैशन काम ही है। मैंने देखा है। वह कभी यह सोचकर सिनेमा नहीं बनाते कि ये बनाऊंगा तो ओवरसीज में ज्यादा चलेगा। और ये यहां पर ज्यादा चलेगा। वह जाकर एकलव्य बनाते हैं राजस्थान में... क्योंकि उनको पसंद है।

-हिंदी सिनेमा के इस दौर में आप 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' लेकर आए। उसमें वैसी चमक-दमक नहीं है। क्या कभी सोचा नहीं कि जमाने के साथ चलूं?
0 इसलिए कहता हूं कि इन फिल्ममेकर जैसी हिम्मत होनी चाहिए।मुझे एन चंद्रा साहब मिले थे फिल्म फेस्टिवल में। मैं उनसे पहले कभी नहीं मिला था। वे दौड़ते हुए आए। अभी तक याद है, मैं भूल नहीं सकता। गोवा में 'मुन्नाभाई' के रिलीज होने के कई महीनों के बाद। दौड़ कर आए और मुझसे कहा, 'तुम ने मेरी तरह के सिनेमा में मेरा विश्वास फिर से जगा दिया है। मैंने अपनी जिंदगी ऐसे सिनेमा से शुरू की थी और निडर होकर बनाता था। मुझे लगता था कि दिल से बनाना चाहिए। कहीं बाद में मुझे लगने लगा कि यार थोड़ा ये, थोड़ा वो होना चाहिए। इसमें कमर्शियल होना चाहिए। इसमें ये होना चाहिए। फिर मैं बिखर गया। उन्होंने कहा कि अगर आप यह स्क्रिप्ट मेरे पास लेकर आते तो मैं आपको ऑफिस से भगा देता। बोलता कि बेवकूफ हो गया है। अस्पताल की पिक्चर,मरीज और डॉक्टर, ये कौन देखेगा? क्योंकि कोई भी कमर्शियल एलीमेंट नहीं है इसमें। इसकी सफलता देखने के बाद मुझे लगता है कि जो दिल को अच्छा लगे, वही बनाना चाहिए। मैं तारीफ करूंगा कि उन्होंने अपने मन की बात कही। ऐसी बातों से अपना विश्वास बढ़ता है कि वही बनाना चाहिए जो दिल को अच्छा लगता है। यह सोच कर नहीं बनाएंगे कि दूसरों को क्या अच्छा लगता है। अगर हम ये सोचकर बनाएंगे कि दूसरों को ये अच्छा लगता है तो हमको कैसे पता लगेगा कि दूसरों को क्या अच्छा लगता है। हम वही बना सकते हैं जो हमको पता है और जो हमको अच्छा लगता है। फिर उम्मीद करें कि जो हमको अच्छा लगता है और वह दूसरों को भी अच्छा लगे।

- लेकिन जितना धैर्य था आपके पास था या जिस तरीके से आपने खुद को बचाए रखा। तेरह साल उधर निकल गए और तीन साल इधर... सोलह साल के बाद आप एक फिल्म बना पाए हैं? सोलह सालों तक उस ख्वाब को बचाए रखना कि कोई नई फिल्म करनी है। मैं खासकर इसलिए पूछ रहा हूं कि जो नए डायरेक्टर आते हैं यहां पर,वे बहुत जल्दी निराश होने लगते हैं। उनसे आप क्या कहना चाहेंगे? सभी को दिखता है कि राजकुमार हिरानी की 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' पहली फिल्म थी और उसने कमाल कर दिया । पहली फिल्म के पहले का जो स्ट्रगल है, उसे लोग नहीं जानते?
0 मैं यह बोलता हूं कि कभी लगा ही नहीं कि स्ट्रगल है ये। उसको नाटकीय करना चाहें और आज की सफलता के संदर्भ में हम बोल सकते हैं कि यार हमने ऐसा किया। हम ऐसे रहते थे। एक कमरे में रहते थे और तीन मिलकर रहते थे... ड्रामाटाइज कर सकते हैं, पर मजा आता था। हमलोग रहते थे साथ में दो-दो, तीन-तीन लोग एक कमरे में। श्रीराम राघवन के घर पर रहा, फिर बाद पीजी रहते थे एक गुजराती फैमिली के घर पर। उस समय यह सोचते थे था कि यार एक सिंगल रूम हो जाए जहां पर अकेले रह सकें। क्योंकि फोन पर बात करने में बड़ी दिक्कत होती थी। हॉल में जाकर फोन करना पड़ता था। गुजराती ओल्ड कपल था। वे सुनते रहते थे कि हम क्या बातें करते हैं? हम दोस्तों से खुल कर बात नहीं कर पाते थे। मैं ये कहता था कि यार एक अपना रूम हो जहां अपना फोन हो कम से कम गाली देनी है तो खुलकर दे सकते हैं। ये पीछे बैठे हुए हैं। मगर इंस्टीट्यूट से आने से यह सबसे बड़ा फायदा था कि सपोर्ट सिस्टम था। अन्यथा मेरे लिए तो कोई तरीका ही नहीं था कि मैं डायरेक्ट बंबई आ जाता। क्योंकि कोई था नहीं। इंस्टीट्यूट से क्या होता है कि हर साल बत्तीस लोग पास होते हैं। कुछ साउथ के, कुछ कलकत्ता के होते हैं। बीस-पच्चीस लोग बंबई आते हैं। और यह समझिए कि हर साल बीस-पच्चीस लोग वहां से निकलकर साथ में स्ट्रगल कर रहे हैं। तो पहले छह महीना साल भर ये होता है कि रोज शाम को सारे लोग मिलते हैं। हमलोग पांच-छह लोग रोज शाम को मिलते थे, भाई तेरा क्या हुआ? आज मैं इसको मिला, मेरे को ये काम मिला। फिर दूसरों को भेजते थे। तो अकेलापन नहीं था।

- इंस्टीट्यूट की अपनी बाउंडिंग होती है या... ?
0 कमाल की बाउंडिंग होती है। आदमी एक-दूसरे को हेल्प करता है। और वो नहीं होता तो, अकेला आदमी शायद पागल हो जाता।

- अचानक कोई आए इंस्टीट्यूट से और कहे कि आपके साथ काम करना चाहूंगा तो आप का क्या जवाब होगा?
0 अगर आपके पास उस समय जरूरत होगी, और आपको ठीक लगेगा तो आप उसको काम दोगे। मन में रहता है कि अपना इंस्टीट्यूट का है, अपने यहां का है, हेल्प करना चाहिए। जैसा मुझे नागपुर के लिए वैसा बहुत लगता है। कोई नागपुर से आ जाए, कोई अचानक मिल जाए। नागपुर का छोड़िए कोई बोल दे कि मैं बाजू वर्धा से हूं या अमरावती से हूं तो लगता है कि अरे यार अपने इलाके का है। अरे यार आओ। बातें करने का दिल करता है। इंस्टीट्यूट का मामला अलग होता है। एक तो सबको हिस्ट्री पता होता है कि फलां इस बैच में था। आप कोशिश भी करते हैं उनसे मिलने की। मैं भी निकला जैसे तो मुझे मालूम था। मैं डेविड धवन और केतन मेहता से जाकर मिला। इन लोगों से मिलते हैं। हर बार आदमी काम नहीं दे पाता है। आपके पास होगा तो आप दे पाओगे। लेकिन यह जरूर बताते हैं कि आप इधर चले जाओ, उधर जाओ। उसकी वजह से ही मैं लगातार एडीटिंग करता रहा। दिल में फिल्म बनाने की तमन्ना बैठी थी। और ये तो मैंने देखा है कि आपको साठ साल की उम्र का भी आदमी मिल जाएगा जो फिल्म बनाने निकला है। तो उसको लगता है कि फिल्म बना लूंगा अभी। अगले दो साल में हो जाएगा। भले ही जिंदगी निकली जा रही हो। मुझे नहीं लगगता कि आदमी हार जाता है। वह इसमें रहता ही है। जो निकला है फिल्म बनाने के लिए... शायद बना पाए न बना पाए तो वो बात अलग है। तो मुझे नहीं लगा मुझे सोलह साल लगग गए। शायद वह समय लगना ही था। सोलह साल लगने ही थे, क्योंकि अगर मैं कहूं कि संजय लीला भंसाली के साथ में हमलोग पास आउट हुए थे। संजय भंसाली आए और उन्होंने विनोद के साथ काम करना शुरू कर दिया था। मैं जिन लोगों से मिला उस टाइम, वे अलग थे। अगर लाइक माइंडेड लोग शुरू में मिल जाते तो शायद जल्दी हो जाता। मैं एडवरटाइजिंग में चला गया। उसने मेरे कुछ साल ले लिए। थोड़ा सा सरवाइवल का भी मामला होता है। आदमी चाहता है कि थोड़ा सा कमाए नहीं तो... फिर कौन आदमी कमाने के चक्कर में किधर चला जाए? किसको कब मौका मिले?

- इस बीच कोई सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव भी आप पर रहा?
0 नहीं, मुझे कुछ खास दिलचस्पी नहीं थी। न कोई प्रभाव रहा और ना ही कोई रुचि रही।

- आपके पिताजी माइग्रेट हुए थे पाकिस्तान से । उनके अंदर कोई कटुता या गुस्सा रहा हो?
0 बिल्कुल नहीं। मुझे लगता है कि राजनीति वक्त की लड़ाई है। विनोद का एक गाना था कि ये अलग चीजों की जंग है, इसमें बिचारा आदमी का क्या करना? बहुत फ्रेंड हैं मेरे, जो अलग कम्युनिटी के हैं और मैं बहुत शिद्दत से मानता हूं कि कोई आदमी बुरा नहीं होता। बस,परिस्थितियां होती हैं, जिनके कारण आदमी अलग ढंग से व्यवहार करता है।

- पहला शॉट का पहला दिन जिस दिन पहला एक्शन बोला था आप ने?
0 पहला शॉट लिया था हमने। रूस्तम वो अपने घर आ रहा है। उसकी टैक्सी है... उसके फादर को यहां पर बंद कर के रखा हुआ है। वो निकल कर आता है, सीढ़ी चढ़ते हुए दौड़ता है अपने फादर के कमरे में। वो पहला शॉट लिया था। उस दिन स्ट्रेस यही था कि ये फिल्म बड़ी जल्द बननी थी। विनोद ने कहा कि इतना बजट है, इतने टाइम में बनाना है। तो मैंने कलकुलेशन किया था कि हमें बीस शॉट हर दिन लेने हैं। और अगर मैं बीस शॉट नहीं ले पाऊंगा तो इस टाइम में पूरा नहीं कर सकता । सबसे बड़ा प्रेशर यही था कि बीस शॉट लेने हैं। दूसरा बड़ा प्रेशर यह था विनोद प्रधान शूट कर रहे थे इस फिल्म को। विनोद प्रधान 'देवदास' शूट कर के इस फिल्म पर आए थे। 'देवदास' में एक दिन में वह एक शॉट लेते थे। मुझ पर सबसे बड़ा प्रेशर यही था कि बीस शॉट मैं करूंगा कैसे? तो मैंने विनोद के ऊपर इतना प्रेशर डाल दिया था, रोज बोल-बोलकर कि विनोद बीस शॉट लेने हैं। ये करना है, ये करना है। तो मैंने कहा कि अगर ये नौ बजे का शॉट है तो अगर मैं दस बजे तक पहला शॉट ले पाऊं तो शायद हो जाए। पहले दिन पौने दस बजे हमलोग ने पहला शॉट शूट कर लिया। मैंने विनोद को फोन किया और कहा मैंने पहला शॉट ले लिया है पौने दस बजे। उसने कहा, 'वेरी गुड लगे रहो' और उस दिन हमने बाइस शॉट लिए थे। मुझे याद है मैंने फूल भेजे विनोद के यहां। मैंने कहा कमाल है। उसके बाद मुझे संजय मिला था। मैंने संयज को बताया कि बीस शॉट ले रहे हैं। तब मुझे संजय कहता है, बीस शॉट? उतना तो हम एक महीने में लेते थे।

- वो कितना बड़ा उत्साह होता है, जब आप डायरेक्टर के कुर्सी पर बैठे होते हैं।?
0 आय डोंट नो... मुझे लगता है कि उस टाइम एक जिम्मेदारी होती है। एक प्रेशर होता है। फस्र्ट फिल्म में तो यह प्रेशर था कि अब अपने जिम्मेदारी है। सबकुछ ठीक होना है। विनोद बिल्कुल शामिल नहीं होते हैं। वे पूरी जिम्मेदारी आपके ऊपर सौंप देते हैं। सब कुछ आपके ऊपर डाल देते हैं। उन्होंने पैसे बैंक में डाल दिए। ये चेक बुक है। आप साइन करवाकर करो। इतने में फिल्म बनानी है आपको। बात खत्म। फिर आप की जिम्मेदारी बन जाती है। अगर डायरेक्टर समझ ले कि पोजिशन ऑफ पावर में हूं, तो वो तो गलत एटीट्यूड होगा।

- पावर ऑफ क्र्रिएशन तो होता होगा?
0 नहीं उस टाइम... बोला जाए तो फटी पड़ी रहती है। कि टाइम पर खत्म नहीं हुआ तो मर जाऊंगा। ये लोकेशन मेरे पास नहीं है। मेरा तो छह-सात किलो वजन कम हो गया था 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' बनाते-बनाते।

- 'मुन्नाभाई...' रिलीज होने के तुरंत या उस दिन या उसके दो-चार दिन में जो हालत हुई या जिस ढंग से हुआ कि ये फिल्म तो गई। रिलीज के दो दिन तक पंद्रह-बीस प्रतिशत का कलेक्शन रहा?
0 रिलीज के दिन मुझे याद है, मैं गया था गेईटी सारे असिस्टेंट आए कि चलो-चलो फिल्म चलते हैं। मैं तो सो गया था उस दिन।

- कोई चिंता नहीं थी?
0 क्या हुआ कि हमलोगों ने बहुत लोगों को फिल्म दिखाई थी। कोई खरीद नहीं रहा था फिल्म। इतने डिस्ट्रीब्यूटर आए, सब देखते थे और बोलते थे ये बंबई के बाहर नहीं चलेगी। बंबई की भाषा ठाणे से आगे नहीं चलेगी। किसी ने नहीं खरीदी। आधी जगह विनोद ने रिलीज की। कई जगह नुकसान में विनोद को रिलीज करनी पड़ी। एक करोड़ अस्सी लाख कका नुकसान था, जिस समय फिल्म रिलीज हुई। किनोद ने कहा कि चलो कमा लेंगे। वीडियो वगैरह है, इसको कवर कर के हो जाएगा। तो उस प्रोसेस में हमने बहुत लोगों को फिल्म दिखाई। डिस्ट्रीब्यूटर खरीदते नहीं थे, लेकिन फ्रेंड देखते और बोलते थे कि यार बड़ी अच्छी पिक्चर है। मेरे को ये खुशी थी कि लोग फिल्म देखेंगे और बोलेंगे यार अच्छी फिल्म बनाई है। मुझे था कि मेरे मां-बाप देखेंगे। मेरी फैमिली देखेगी। मेरे दोस्त देखेंगे और बोलेंगे यार अच्छा काम किया। फिल्म चली या न चली ठीक है,काम तो अच्छा किया। वह संतोष था। रिलीज हुई उसके बाद थके हुए हालत में आकर सो गया घर में जाकर। मैं सोया हुआ था फोन आया दोपहर को। सोए नहीं थे कई महीनों से सो गए उस दिन। एक-डेढ़ बजे एसिस्टैंट का फोन आया। उसने कहा, सर जाकर फिल्म देखनी चाहिए। पब्लिक का रीएक्शन देखना चाहिए। तो हम पांच-छह लोग निकल गए गेईटी थिएटर में। अंदर घुसे... कोई जानता भी नहीं था उस टाइम। अंदर गए । मैंने गेटकीपर से पूछा कि कैसी है फिल्म? उसने अंगूठा उलट दिया। उस टाइम मेरे को लगा कि यार ये क्या हो गया? मै यह उम्मीद नहीं कर रहा था कि हंड्रेड परसेंट कलेक्शन होगा। यह था कि पचास परसेंट होगा । उसने अंगूठा उलटा किया तो मैं डर गया। अंदर गया तो कैरमबोर्ड वाला सीन चल रहा था उस समय। लोग हंस रहे, जम्प कर रहे हैं, एकाध को तो सीट पर उछलते हुए देखा। तालियां बजा रहे हैं। मैंने कहा ये ऐसे-ऐसे क्यों कर रहा है। ये तो साला लोगों को पसंद आ रही है। फिर समझ में आया कि वह बॉक्स ऑफिस की बात कर रहा था। यानी लोग ही नहीं है अंदर। फिर मैंने कहा पूरी फिल्म देखी नहीं तो, ये तो पहला ही शो चल रहा है, ये कैसे बकबास कर रहा है। फिर हम गए दूसरे थिएटर। गीता थिएटर वरली में, फिर मराठा मंदिर। फिर शाम को न्यू अम्पायर पहुंचे। वहां पहुंचते-पहुंचते जिस थिएटर में देखे कमाल का रिएक्शन। बोमन था न्यू अम्पायर के पास में रहता था। उसको बुलाया, बोला आकर देखो। वो आया तो रोने लगा, आंख से आंसू आ गए रिएक्शन देखकर। उसकी भी पहली फिल्म थी। मैंने कहा यार ऐसा होगा नहीं। लोग आने चाहिए। शाम को निकले तो नौ बजे का शो हाउसफुल था। श्याम श्राफ का फोन आया। वह डिस्ट्रीब्यूटर थे हमारे। वो कहते हैं कि मौखिक प्रचार से फिल्म चलती पर इतना फास्ट पिकअप करती है मैंने पहली बार देखा है। बारह बजे जिन लोगों ने फिल्म देखी, दोस्तों को फोन किया नाइट शो से कुछ-कुछ थिएटर में हाउसफुल होना शुरू हो गया।

- जब नेशनल अवार्ड मिल गया तब कैसा रहा?
0 ये आप ही ने बताया मुझे। नेशनल अवार्ड... मैं तब तक दूसरी फिल्म में लग गया था। पॉपूलर अवार्ड शुरू हुए। दिसंबर में रिलीज हुई फिल्म और फट-फट अवार्ड आने शुरू हुए। पहले अवार्ड तक तो लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। स्क्रीन अवार्ड हुए तो उसमें कोई ज्यादा नहीं थे। अभी रिलीज हुई थी तो लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि इसको कहां डालें। मुझे याद है कि प्रेस स्कीनिंग में किसी जर्नलिस्ट ने मुझसे कहा था कि सब देखकर निकले तो लोगों को लग रहा था कि पिक्चर अच्छी है। पर लोग ग्रेड वगैरह ठीक नहीं देना चाह रहे थे। एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि क्या बोलें? क्योंकि एक तो संजय दत्त की पिक्चर। नाम 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' तो समझ में नहीं आता कि क्या... भाई की टाइप की फिल्म लगती है। संजय दत्त की लाइन से पंद्रह फिल्में फ्लॉप थीं। मन कह रहा था कि इसको भी ठीक से रेट नहीं दें। बड़ा कन्फ्यूजन सा था। वही बात अवार्ड के साथ भी हुई । बाद में भी फिर तारीफ मिलने लगी फिल्म को। नेशनल अवार्ड... अच्छा ही लगता है सुनकर कि गुड फीलिंग कि पसंद आई लोगों को।

- आखिरी सवाल... 'लगे रहो मुन्नाभाई' में गांधी जी को लाने की बात कहां से आई? आप कितना जरूरी मानते हैं गांधी को?
0 मैं बहुत गहराई से उन्हें मानता हूं।

- वर्धा में उनका आश्रम था। नागपुर के बहुत पास है? बचपन का कोई प्रभाव मानें क्या?
0 मुझ पर ऐसा कोई गहरा प्रभाव नहीं रहा। मैंने गांधी फिल्म देखी थी। वह मुझे बहुत अच्छी लगी थी। हमेशा उनमें कोई बात लगती थी। थोड़ी बहुत उनकी किताबें पढ़ी थीं। पर ऐसा नहीं था कि कोई फिल्म बनाऊंगा कभी, कुछ नहीं। पर एक बात लगती थी। सच में गांधी फिल्म देखने के बाद कि कुछ बात है इस आदमी में... कभी भी डिस्कशन हो जाए तो लोग कहते हैं आज के जमाने गांधी चल नहीं सकते। उस जमाने में चल गए उनके तरीके। मेरे को लगता था कि उन्होंने अलग ढंग से सोचा- हड़ताल उन्होंने सोची, कोई नहीं करता था। उपवास उन्होंने सोचा उस टाइम ... आज नहीं चलेंगे शायद पॉसिबल है। पर उस टाइम वो विचित्र तरीके खोजते थे कुछ। नमक उठाए ... कुछ एक बात थी उनमें, कुछ एक जीवनशैली कहूंगा। 'एमबीबीएस' के बाद मैंने बहुत पढऩा शुरू किया। ऐसे ही। कुछ किताबें मिली। पढ़ता चला गया। तब मुझे लगा कि इनको लेकर कुछ करना चाहिए। गांधी को गाली देना आज फैशन हो गया कि गांधी को कोई भी चीज के लिए दोषी ठहरा दो। दोष मढ़ऩा सबसे आसान काम है, क्योंकि उससे अपनी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। मुझे लगा कि कुछ कहना चाहिए। अगर ऐसे ही गांधी जी को लेकर कुछ कहेंगे तो कोई सुनेगा नहीं। बोलेंगे यार बोर कर रहा है। मैंने कहा मुन्नाभाई के साथ ही कुछ कर सकते हैं। डॉक्टरों को लेकर कुछ कहते हैं तो बोर करते हैं। मुन्नाभाई डॉक्टरों को लेकर कुछ करता है तो रुचि रहेगी। मैंने फिल्म में यही कहने की कोशिश की है कि उनके सिद्धांत आज भी चल सकते हैं। हमें उनमें विश्वास करना चाहिए। इस बात का मैं उपदेश नहीं दे सकता था। मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा है । कहीं ऐसा शब्दों में नहीं कहा है। मुन्नाभाई तरीके से हो रहा है, इंटरटेनिंग वजह से हो रहा है। इमोशनल वजह से हो रहा है। अभी तक मैं खुद संदेह में था कि कैसी प्र्र्रतिक्रिया मिलेगी। कल का रेस्पांस देखकर आया तो लगगा कि हम सफल होंगे। आज रात को बच्चन साहब देख रहे हैं।

- युवा और आकांक्षी डायरेक्टर के लिए क्या संदेश देंगे?
0 संदेश नहीं देना चाहिए। सलाह देना सबसे खतरनाक चीज है। मेरे खयाल में लोग खुद सीखते हैं। हर आदमी अपने-आप धक्के खाते हुए अपनी राह खोज लेता है। आदमी जो करना चाहे तो - गांधी जी की एक पंक्ति है - उद्देश्य खोजो,साधन मिल जाएंगे। क्या करना चाहते हो, खोजो रास्ता अपने आप निकल आएगा। अगर पैशन है तो वह होता है। मेरे साथ हुआ है। हो सकता है कि लोग मुझे भाग्यशाली कहें । फिर भी मैंने जहां तक देखा है, होता है। मैं दूसरे लोगो को भी देखता हूं। तय करो कि आप क्या करना चाहते हो, अगर लगन और चाव है तो अपने-आप रास्ता निकल आता है।