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Tuesday, April 5, 2016

धुन में अपनी चली - पत्रलेखा




-अजय ब्रह्मात्‍मज
पत्रलेखा की पहली फिल्‍म सिटीलाइट्स थी। हंसल मेहता निर्देशित इस फिल्‍म में राजस्‍थान की ग्रामीण महिला की भूमिका निभाई थी। अभी उनकी दूसरी फिल्‍म लव गेम्‍स आ रही है। इसका निर्देशन विक्रम भट्ट ने किया है। इस फिल्‍म में पहली फिल्‍म के विपरीत पत्रलेखा ने एक शहरी लड़की की भूमिका निभाई है। पत्रलेखा हिंदी फिल्‍मों में अपेक्षाकृत नया नाम हैं। अजय ब्रह्मात्‍मज के साथ झंकार के लिए उन्‍होंने अपना फिल्‍मी सफर शेयर किया। साथ ही लव गेम्‍स की भी जानकारी दी।
-सिनेमा से आपका कैसे सामना हुआ। हिंदी सिनेमा से ?
0 जी मैं शिलांग से हूं। मेरे बचपन में शिलांग में हिंदी फिल्म इतनी नहीं आती थीं। मैं बंगाली परिवार से हूं। उस समय मेरे आपास के लोग अंग्रेजी फिल्में देखना ज्यादा पसंद करते थे। केवल मेरी मां हिंदी फिल्में देखा करती थी। तब मां वीसीडी लेकर आती थी। मैं मां के साथ बैठ कर हिंदी फिल्में देखा करती थी।
-आपकी मां को हिंदी फिल्‍मों का शौक कैसे हुआ ? उनका नाम क्या है?
0 पापरी पॉल नाम है उनका। वह घरेलू महिला हैं। उन्हें हिंदी फिल्में देखने में बड़ा मजा आता था। ठीक-ठीक नहीं बता सकती कि उन्‍हें हिंदी फिल्‍मों का शौक कैसे हुआ? मैं जब शिलांग में थी तो मुझ पर अच्‍छा करने का बहुत दबाव था। मुझे कहा जाता था कि अच्छे से पढाई करो। इसकी वजह से मैं कभी-भी पढाई नहीं करना चाहती थी। मेरे पिताजी सीए हैं। वह बहुत ज्यादा वर्कोहॉलिक  हैं। पढा़ई उनके जीवन का अस्तित्व है। वे मुझ पर बहुत दबाव डालते थे। स्कूल से भी दबाव रहता था। पढ़ने से मेरा मन उचट गया था। मुझे बाहर जाकर खेलना अच्छा लगताथा। फिर मेरे माता-पिता ने फैसला किया कि वे मुझे बोडिंग स्कूल भेज देंगे। फिर मैं असम वैली चली गई। मुझे लगता है कि मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट असम वैली से ही आया। उस स्कूल में मुझ पर पढाई का दबाव नहीं डाला जाता था। मेरे अदंर तब तक बहुत सारी चीजें खुल गई थी। कल्चरल एक्टिविटी में मैंने हिस्‍सा लेना शुरू किया।
-फिर...
0 यह सिलसिला दसवीं क्लास तक चला। दसवीं क्लास में मुझे लगा कि यहां से चले जाना चाहिए। यह क्यों लगा?कैसे लगा?मुझे नहीं पता। मैंने माता-पिता को बोला कि मुझे सिटी में चले जाना चाहिए। मुझे लाइफ देखनी है। मेरे माता-पिता को शायद समझ में आ गया कि पढ़ाई इसके बस की बात नहीं मैं फिर उसके बाद बोडिंग में बैगलोर आ गई। उस दो साल में फिर कुछ बदलाव हुआ। मैंने देखा कि वहां पर लोग बहुत ही कॉम्पिटिटिव थे। मैंने सिटी लाइफ देखी। शहर देखा। डिस्को में गई। उसके बाद मेरे माता-पिता को लगा कि मुझे मुंबई आ जाना चाहिए। मैं मुंबई नही आना चाहतीथी। मुझे मुंबई कभी अच्छा नहीं लगता था। मुझे ऐसा लगता था कि मुंबई बहुत बड़ा है।
फिल्‍मों का सिलसिला कैसे बना?
0 मैं अपनी धुन में ही चलती रही। कॉलेज में मेरा एक दोस्त था।वह कास्टिंग डायरेक्टर मैंने उससे कहां कि मुझे एक्टिंग करनी है। मुझे एड करना है। आप मुझे एड के लिए कास्ट कर दो। मैंने कहा कि प्लीज मुझे बुलाओ। और कब से शुरू करना है यह भी बताना। अभी भी मेरे पास उसके ईमेल हैं। बी आर चोपड़ा प्रोडक्सन हाउस के लिए मैंने पहला टीवी ऐड किया। जब सौ ऑडिशन देने के बाद एक टीवी एड में काम मिलता था। मैंने कई छोटे और बड़े टीवी ए़ड किए। मगर इन एड पर किसी की नजर नहीं गई। फिर मैंने एक टाटा डोकोमो कि ऐड की थी। वह एक बहुत ही चर्चित हुआ। मैंने रागिनी एमएमएस के लिए जीवन का पहला फिल्मी ऑडिशन  दिया। मैं शार्ट लिस्ट भी होती गई। फाइनल तक पहुंच गई। लेकिन फिर नहीं हुआ। खुद को निखारने के लिए मैंने बैरी जॉन के साथ तीन महीने का कोर्स किया। मुझे बहुत मजा आया। मैंने बहुत कुछ सीखा।
- सिटीलाइट्स के लिए कैसे चुनाव हुआ?
0 पहले इसका निर्देशन अजय बहल कर रहे थे। मैं उनसे भी मिली थी। मैाने ऑडिशन भी किया था। हंसल मेहता आए तो उन्‍हें मेरा ऑडिशन पसंद नहीं आया। मैंने हंसल सर को फोन किया। मुझे यह फिल्म करनी है। उन्‍होंने दोटूक शब्‍दों में कहा कि पत्रलेखा तुम अर्बन लड़की की तरह हो। हमें गरीब घर की लडकी चाहिए। फिर से ऑडिशन हुआ तो अचानक कुछ अच्‍छा हो गया और मैं चुन ली
-तो कैसा रहा आपका अब तक की लाइफ का अनुभव और सिनेमा का भी?
सिनेमा की सबसे बड़ी खूबी मेरे लिए यही है कि मैं किसी और दुनिया में चली जाती हूं। पत्रलेखा की चिंताएं,सपने,परिवार की समस्याएं  सिनेमा में जाते ही खत्म हो जातीं हैं। मुझे कुछ याद ही नहीं रहता है। सिनेमा के ना रहने पर मेरे लाइफ में सारी चीजें शुरू हो जाती हैं।सारी समस्याएं सामने आ जाती है।
-अभी क्या चिताएं हैं ?लव गेम्‍स के पहले की क्या चिंताएं थी। यह फिल्म कैसे मिली?इस बारे में बताएं।
0 सिटी लाइट्स के बाद मुझे तीन चार फिल्में मिलीं। मैं कोई फैसला नहीं कर पा रही थी। सात महीने बीत गए। फिर मैं गई भट्ट साहब के पास। मैंने भट्ट साहब को बोला कि मुझे काम चाहिए। भट्टसाहब ने कहा कि विक्रम फिल्म बना रहा है। आप जाकर उनसे मिल लो। विक्रम सर ने कहा कि मैं अलग तरह की फिल्म बना रहा हूं। एक काम करों तुम एक फोटोशूट करके आओ। मैंने तुम्हें उस अवतार में देखा नहीं है। मैंने ग्लैमरस फोटोशूट करवाया। विक्रम सर ने फोटो देखा और एक दिन के बाद फोन किया कि पत्रलेखा तुम हमारी फिल्म कर रही हो।
- लव गेम्‍स बोल्‍ड किस्‍म की फिल्‍म है। खास कर आप का किरदार... 0 मुझे कहानी का आइडिया नहीं था। मैं नरेशन के लिए अगले दिन गई। मेरा किरदार बहुत ही स्ट्राग है। पहनावा और सोच एक दम अलग है। राखी और रमोना दो ध्रुवों पर हैं। रमोना जैसी महिलाए हमारे समाज में हैं।
- यह रमोना है क्या?
0 कैसे बताऊं आप को। हाई सोसायटी की लड़की है। वह लाइफ की अपनी शर्तों पर जीती है। उसे तीन चीजें पसंद है। जीतना,कोकिन और लव गेम खेलना। उसके मन मुताबिक कुछ ना हो तो वह छोड़ती नहीं है। वह विनर है।सब कुछ उसके हिसाब से होना चाहिए। उसने कभी प्यार नहीं देखा है। वह हर चीज को अपने नजरिए से देखना चाहती है।उसके लिए कुछ भी सही या गलत नहीं है।
-रमोना और पत्रलेखा तो बिल्कुल अलग है।राखी भी अलग थी। रमोना को निभाना राखी जितना ही कठिन था या उससे ज्यादा?
0 जी ,रमोना राखी से ज्यादा कठिन है। राखीके पास दिल था। वह जो कर रही थी,वह अपने परिवार के लिए कर रही थी। रमोना के पास दिल ही नहीं है। वह सिर्फ अपने बारे में ही सोचती है।
-अच्छा जब आपको किरदार के बारे में पता चला तब आपने सोचा कि क्या पत्रलेखा ऐसा करेगी? घर वाले क्या कहेंगे?बाहर के लोग तो बाद में आते हैं।
0 जी पहले तो मैं शॉक में चली गई। घर आकर मैंने मा-पापा को कॉल किया। मैंने कहानी बताई। उन्होंने एक बार भी मुझे मना नहीं किया। हाल में ट्रेलर रिलीज हुआ। मैंने सबसे पहले मां को कॉल किया। मां-पापा को मेरी फिल्म पसंद आयी। मेरे परिवार का हमेशा साथ रहा है।मेरे पापा केवल एकबात बचपन से कहते थे कि जो भी करो उसमें अपना सौ प्रतिशत दो। अगर आप खाना भी बना रहे हो ना तो भी सौ प्रतिशत दो।


Friday, May 30, 2014

फिल्‍म समीक्षा : सिटीलाइट्स

Click to enlargeदुख मांजता है 
-अजय ब्रह्मात्‍मज 
माइग्रेशन (प्रव्रजन) इस देश की बड़ी समस्या है। सम्यक विकास न होने से आजीविका की तलाश में गावों, कस्बों और शहरों से रोजाना लाखों नागरिक अपेक्षाकृत बड़े शहरों का रुख करते हैं। अपने सपनों को लिए वहां की जिंदगी में मर-खप जाते हैं। हिंदी फिल्मों में 'दो बीघा जमीन' से लेकर 'गमन' तक हम ऐसे किरदारों को देखते-सुनते रहे हैं। महानगरों का कड़वा सत्य है कि यहां मंजिलें हमेशा आंखों से ओझल हो जाती हैं। संघर्ष असमाप्त रहता है।
हंसल मेहता की 'सिटीलाइट्स' में कर्ज से लदा दीपक राजस्थान के एक कस्बे से पत्नी राखी और बेटी माही के साथ मुंबई आता है। मुंबई से एक दोस्त ने उसे भरोसा दिया है। मुंबई आने पर दोस्त नदारद मिलता है। पहले ही दिन स्थानीय लोग उसे ठगते हैं। विवश और बेसहारा दीपक को हमदर्द भी मिलते हैं। यकीनन महानगर के कोनों-अंतरों में भी दिल धड़कते हैं। दीपक को नौकरी मिल जाती है। एक दोस्त के बहकावे में आकर दीपक साजिश का हिस्सा बनता है, लेकिन क्या यह साजिश उसके सपनों को साकार कर सकेगी? क्या वह अपने परिवार के साथ सुरक्षित जिंदगी जी पाएगा? फिल्म देखते समय ऐसे कई प्रश्न उभरते हैं, जिनके उत्तर हंसल मेहता मूल फिल्म 'मैट्रो मनीला' और लेखक रितेश शाह की कल्पना के सहारे खोजते हैं।
'सिटीलाइट्स' उदास फिल्म है। पूरी फिल्म में अवसाद पसरा रहता है। सुकून की जिंदगी जी रहे एक रिटायर्ड फौजी की पारिवारिक जिंदगी में आए आर्थिक भूचाल से सब तहस-नहस हो जाता है। हंसल मेहता दीपक के संघर्ष और दुख को नाटकीय तरीके से नहीं उभारते। उनके पास राजकुमार राव और पत्रलेखा जैसे सक्षम कलाकार हैं, जो अपनी अंतरंगता में भी अवसाद जाहिर करते हैं। हिंदी फिल्मों में प्रणय दृश्य की यह खूबसूरती और गर्माहट दुर्लभ है। वास्तविक स्टार जोडिय़ां भी यह प्रभाव नहीं पैदा कर सकी हैं। निश्चित ही हंसल मेहता की सूझ-बूझ और राजकुमार राव एवं पत्रलेखा के समर्पण और सहयोग से यह संभव हुआ है। फिल्म के अनेक दृश्यों में दोनों कलाकारों की परस्पर समझदारी और संयुक्त भागीदारी दिखती है। ऐसे दृश्य हिंदी फिल्मों में सोचे नहीं जाते।
अभिनय के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित राजकुमार राव ने दीपक की विवशता और लाचारी को बड़ी सहजता से प्रकट किया है। उन्हें संवादों का समुचित सहारा नहीं मिला है। वह कैमरे के सामने मनोभाव को अनावृत करने से नहीं हिचकते। उनका मौन मुखर होता है। खामोशी की खूबसूरती भावों को अभिव्यक्त कर देती है। लंबे अर्से के बाद हिंदी फिल्मों को ऐसा उम्दा कलाकार मिला है। हंसल मेहता ने उनकी प्रतिभा का सदुपयोग किया है। पत्रलेखा की यह पहली फिल्म है। राखी के समर्पण और द्वंद्व को वह आसानी से आत्मसात कर लेती हैं। उनकी भावमुद्राओं और भाषा की पकड़ से किरदार विश्वसनीय लगता है। दीपक के दोस्त की भूमिका में आए मानव कौल ने अपेक्षित जिम्मेदारी निभाई है। यह फिल्म शहरी रिश्तों के नए आयाम और अर्थ भी खोलती है।
फिल्म का गीत-संगीत प्रभावशाली है। फिल्म की थीम को रेखांकित करने के साथ वह दर्शकों को दृश्यों में दर्शकों को डुबोता है। रश्मि सिंह की गीतों के अर्थ व्यक्ति, शहर, संघर्ष और सपने के साथ वर्तमान का सच भी जाहिर करते हैं। 'सिटीलाइट्स' महानगरों की चकाचौंध और छलकती खुशी के पीछे के अंधेरे में लिपटी व्यथा को आज का संदर्भ देती है। फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा नाटकीय और रोमांचक हो गया है, लेकिन अंत फिर से चौंकाता है। इस फिल्म की एक और विशेषता है कि इसे आप देख कर ही महसूस कर सकते हैं।
इस फिल्म के कई दृश्य अभिनय का पाठ बन सकते हैं।
और हां, चालू और उत्तेजक फिल्मों के लिए महेश भट्ट से नाराज प्रशंसकों यह फिल्म सुकून देगी कि वे पुरानी राह पर लौटे हैं।
अवधि-126 मिनट
**** चार स्‍टार

Thursday, May 29, 2014

अंधेरा है महानगरों की चकाचौंध में-हंसल मेहता


-अजय ब्रह्मात्मज
    हंसल मेहता और राजकुमार राव की जोड़ी की दूसरी फिल्म ‘सिटीलाइट््स’ आ रही है। पिछले साल की ‘शाहिद’ के लिए दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। ‘सिटी लाइट’ का निर्माण महेश भट्ट और फॉक्स स्टार स्टूडियोज ने किया है। ‘सिटीलाइट्स’ में राजकुमार राव राजस्थान के दीपक की भूमिका में हैं, जो आजीविका के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे महानगर में दीपक के सरवाइवल और संघर्ष की यह कहानी छोटे शहरों से सपनों के साथ बडे शहरों में आ रहे लाखों-करोड़ों युवकों की प्रतीकात्मक कहानी है।
    हंसल मेहता से पहले इस फिल्म के निर्देशन के लिए अजय बहल को चुना गया था। उन्होंने ‘शाहिद’  देख रखी थी। उन्हें लगा कि हंसल ‘सिटीलाइट़्स’ की थीम के साथ न्याय कर सकते हैं। ऐसा लग सकता है कि हंसल मेहता ने ही इस फिल्म के लिए राजकुमार राव को चुना होगा। यहां तथ्य उल्टे हैं। राजकुमार राव पहले से फिल्म में थे। बाद में हंसल मेहता को बतौर निर्देशक बुलाया गया।
    ‘शाहिद’ के लिए मिले पुरस्कार से फर्क तो पड़ा है। हंसल बताते हैं, ‘संयोग है कि हम दोनों को पुरस्कार मिले और अब ‘सिटीलाइट्स’ आ रही है। फिल्म इंडस्ट्री और बाकी लोगों के बीच पुरस्कार से साख बढ़ी है। अब हम कुछ और भी काम कर सकते हैं। अभी मेरी चाहत है कि दर्शक यह फिल्म देखने आएं। उनका समर्थन मिलेगा और फिल्म चलेगी, तभी हमलोग बेहतरीन फिल्में ला सकेंगे। खुशी है कि इस फिल्म को समर्थन मिल रहा है। फिल्म के गीत भी लोकप्रिय हो रहे हैं।’
     ‘सिटीलाइट्स’ फिलीपिंस की फिल्म ‘मैट्रो मनीला’ पर आधारित है। फॉक्स स्टार स्अूडियोज ने महेश भट्ट से आग्रह किया था कि वे इस फिल्म को भारतीय संदर्भ देकर बनाएं। चूंकि फिल्म का कथ्य भारत के लिए भी सामयिक है, इसलिए महेश भट्ट राजी हो गए। उन्होंने अपने कैंप के मशहूर निर्देशकों को यह फिल्म नहीं दी, क्योंकि इस फिल्म का मिजाज रियल और सादा है। उन्होंने हंसल मेहता को फिल्म सौंपी। हंसल मेहता कहते हैं, ‘भट्ट साहब के बारे में अनेक धारणाएं फैली हुई हैं। मुझे उन जैसा साहसी और क्रिएटिव कोई व्यक्ति नहीं दिखता। मुंबई की शूटिंग के दौरान मैं रोजाना उनसे मिलने पहुंच जाता था और रिचार्ज होकर निकलता था। भट्ट साहब ने कहा था कि निर्भीक होकर फिल्म बनाओ। बाकी मैं देख लूंगा। वे सिर्फ आजादी ही नहीं देते। वे आजाद रहने की हिम्मत भी देते हैं।’ हंसल मेहता ‘सिटीलाइट्स’ के बारे में स्पष्ट करते हैं, ‘मैंने मूल फिल्म नहीं देखी है। मैं नहीं चाहता था कि ‘मैट्रो मनीला’ से प्रेरित या प्रभावित हो जाऊं। ‘मैट्रो मनीला’ के आधार पर रितेश शाह ने स्क्रिप्ट लिख ली थी। उस स्क्रिप्ट पर ही मैंने काम किया। मैंने केवल मुख्य किरदारों को हिमाचल प्रदेश से निकाल कर राजस्थान में बिठा दिया।’
    फिल्म के टायटल को हंसल मेहता उचित ठहराते हैं। वे तर्क देते हैं, ‘इस फिल्म के लिए यह टायटल उपयुक्त है। महानगरों की चकाचौंध में अंधेरा पसरा रहता है। रोशनी के बीच रहते हुए भी सभी के मन में अंधेरा है। आप मुंबई शहर को ही लें। ऊंची इमारतों के वासी नीचे झोपड़पट्टियों को नहीं देखते। उनकी नजर दूर समुद्र की लहरों को टटोलती रहती है। देश के छोटे शहरों से लोग महानगरों की चमक-दमक (सिटीलाइट्स) देख कर भागे आते हैं और यहां की अंधेरी गलियों में गुमनाम हो जाते हैं।’
    ‘सिटीलाइट्स’ की शूटिंग राजस्थान के एक गांव में हुई है। शूटिंग से पहले राजकुमार राव और पत्रलेखा कुछ समय के लिए उस गांव में जाकर रहे। उन्होंने स्थानीय लोगों की चाल-ढाल और भाषा सीखी। हंसल मेहता बताते हैं कि इससे काफी फर्क पड़ा, ‘राजकुमार राव हरियाणा के हैं और पत्रलेखा असम की है। फिर दोनों शहरों में रह रहे हैं। जरूरी था कि वे मेरे किरदारों की भाषा, वेशभूषा और व्यवहार को वास्तविक तरीके से पर्दे पर ले आएं। मैंने उन्हें यह मौका दिया कि वे किरदार के अनुसार कुछ सीख-समझ सकें।’

बाक्स
    राजकुमार राव ‘सिटीलाइट्स’ में दीपक की भूमिका को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं। फिल्म में दीपक का किरदार उनके देखे-सुने व्यक्तियों से भिन्न और एक हद तक आत्मकेंद्रित है। वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है। उसकी एक ही चिंता है कि वह अपनी बीवी और बेटी को सुरक्षित जिंदगी से सके। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता राजकुमार राव शूटिंग के दरम्यान किसी प्रकार का दबाव नहीं महसूस करते। वे मानते हैं कि अपने किरदार को पूरी ईमानदारी और गहराई से निभाने की चिंता भर रहती है। मैं यही कोशिश करता हूं कि दर्शकों को परिचित किरदार भी नए रूप-रंग में दिखाऊं। ‘सिटीलाइट्स’ का दीपक ‘शाहिद’ के शाहिद आजमी से स्वभाव और एटीट्यूड में भिन्न है।  
   

Wednesday, May 7, 2014

पत्रलेखा

सिटीलाइट्स की नायिका की भूमिका निभा रही पत्रलेखा शिलांग की हैं। सिटीलाइट्स उनकी पहली फिल्‍म है।